शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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भूमिका कश्मीर में त्रिक-शासन का आविर्भाव लगभग आठवीं शताब्दी (ई०) से माना जाता है । उपलब्ध शैव-ग्रन्थों के अनुसार त्रिक-शासन को शैव-शासन या शैवागम भी कहते हैं । यह शासन उतना ही प्राचीन माना गया है जितना वेद । सम्भवतः वेद- विस्तार के साथ ही शैवागम का भी आविर्भाव हुआ हो । अतः जैसे वेद अनादि माने जाते हैं वैसे ही शैवागम को भी अनादि मानना युक्ति-युक्त दीख पड़ता है । कश्मीर के त्रिक-शासन के अनुयायियों की भी यही धारणा है । उनके विश्वास तथा मान्यता के अनुसार शैवागम का इतिहास तन्त्रालोक तथा इसकी टीका के आधार पर इस प्रकार है— प्रथमतः परमशिव की परसंवित्तिरूपा परावाणी में समस्त शास्त्र परबोधरूपता से विकसित हुआ ही ठहरा रहता है, फिर पश्यन्ती दशा में अहंपरामर्शरूपता से ही उदय करता है— इस पश्यन्ती दशा में भी वाच्य-वाचकरूपता का भेद प्रतीत नहीं होता । तत्पश्चात् वही शास्त्र मध्यमा वाणी में अवतरित होकर अपने में ही वाच्य- वाचक भाव को प्रकट करके उदय करता है और अन्त में वही शास्त्र वैखरी दशा में आकर तथा वाच्य-वाचक भाव को प्रकट करके बाहर जगत् में अवतरित हो जाता है और स्फुटरूपता को प्राप्त होता है । शैवागम के अनुसार मुख्य रूप से यह शास्त्र पाँच प्रवाहों में प्रसारित होता है । यही पाँच प्रवाह शिव की पाँच शक्तियों का विकास है । ये पाँच शक्तियाँ चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया कहलाती हैं । इनको क्रमशः ईशान, तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव और अघोरवक्त्र कहते हैं । इस प्रकार अगाध विश्वव्यापी शिव के पाँच मुखों से प्रवाहित हुई शैव-शास्त्र रूप सरिताएँ मूलतः बयानवे धाराओं में बह निकलीं । यह धाराएँ भिन्न-भिन्न प्रवृत्ति वाले जीवों की भिन्न-भिन्न आवश्यकताओं के अनुसार ही बहीं । ये ही अभेदरूप भैरव-शास्त्र, भेदाभेदरूप रुद्रशास्त्र और भेद-रूप शिवशास्त्र के रूप में प्रकट हुए । इस प्रकार ये सब शास्त्र तीन श्रेणियों में बाँटे जा सकते हैं— १. अभेद या अद्वैत—जगद्रूप नानाता में एकता के अनुभव का प्रत्यभिज्ञान । इन शास्त्रों को भैरव-शास्त्र कहते हैं । २. भेदाभेद—एकता और अनेकता के दोनों दृष्टिकोणों के अनुसार सिद्धान्तों का कथन । इन शास्त्रों को रुद्र-शास्त्र कहते हैं ।
viii ३. भेद—नानाता में ही इस सिद्धान्त के सार का अवलोकन होना। इन शास्त्रों को शिव-शास्त्र कहते हैं। कलियुग के पूर्व ऋषि-मुनि इन शैव-सिद्धान्तों का प्रवचन तथा प्रचार मौखिक रूप में ही किया करते थे। अतः यह दर्शन शिष्य-प्रशिष्यों द्वारा कथन-श्रवण से ही संसार के जीवों का उद्धार करता रहा। परन्तु कलियुग का आविर्भाव होते ही वे ऋषि-मुनि गुफाओं और गिरि-कन्दराओं में छिप गए; सम्भवतः इसलिए कि वे अपने शान्त वातावरण में ही रहा करते थे और कलियुग में होने वाले अन्यायों तथा विक्षेपों से दूर रहकर ही परम-तत्त्व के अभ्यास में रहना चाहते थे। परिणाम यह हुआ कि कलियुगीय वातावरण के बढ़ने के साथ-साथ कालान्तर में इस क्रम का लोप हो गया। ऐसी दशा में भगवान् शिव पीड़ित जनता पर दया करते हुए कैलाश पर्वत पर श्रीकण्ठ के रूप में प्रकट हुए और ऋषि दुर्वासा को शैव-शास्त्रों का उपदेश किया। श्रीकण्ठनाथ ने दुर्वासा को पृथ्वीतल पर जीवों का पुनरुत्थान करने के लिए इसी त्रिक- शासन का फिर से प्रचार करने को कहा। इस प्रकार त्रिक-शासन की प्रणाली फिर से आगे बढ़ने लगी। ऋषि दुर्वासा त्रिक-शासन के विज्ञाता थे। उन्होंने प्रचार कार्य को आगे बढ़ाने के लिए अपनी अलौकिक मानसिक शक्ति से तीन मानसिक पुत्रों को जन्म दिया। उनके नाम त्र्यम्बक, आमर्दक और श्रीनाथ हुए। इन तीनों मानसिक पुत्रों को क्रमशः अभेद, भेद और भेदाभेद शाखाओं में प्रचार द्वारा जनता का आध्यात्मिक जीवन-स्तर उन्नत करने का आदेश मिला। त्र्यम्बक ने स्त्री-समुदाय के शिक्षार्थ अपनी ध्यान-शक्ति से एक कन्या को उत्पन्न किया। इससे अर्ध-त्र्यम्बक शाखा आरम्भ हुई। अतः साढ़े तीन मठिकाओं में त्रिक-दर्शन जगत् में फिर से आरम्भ हुआ और इसे सर्वश्रेष्ठ माना गया। जैसे तन्त्रालोक की टीका में कहा है— वेदाच्छैवं ततो वामं ततो दक्षं ततः कुलम्। ततो मतं ततश्चापि त्रिकं सर्वोत्तमं परम्॥ अद्वैत शैव-शासन का प्रचार त्र्यम्बक और अर्धत्र्यम्बक से हुआ। यह परम्परा चौदह पीढ़ियों तक चलती रही। इन शिष्यों को सिद्ध कहा जाता था। आमर्दक की भेद शाखा तथा श्रीनाथ की भेदाभेद शाखा के बारे में कोई परिचय प्राप्त नहीं होता है। सम्भवतः यह दोनों शाखाएँ कुछ अनावश्यक प्रतीत हुई हों जिससे इनका आगे प्रचार होना रुक गया हो। पन्द्रहवीं पीढ़ी में मानसिक पुत्रों द्वारा गुरु-शिष्य क्रम भंग हुआ। इस पीढ़ी का प्रति- निधि, जिसके नाम का पता नहीं चलता है, मानसिक पुत्र को उत्पन्न करने में असफल
रहा। उसने एक ब्राह्मण की कन्या से विवाह किया जिससे एक पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम संगमादित्य था। यह पहला पुत्र था जिसका जन्म इस शाखा में माता के गर्भ से हुआ। संगमादित्य को पिता ने उपदेश किया। आगे पिता-पुत्र के रूप से ही गुरु-शिष्य क्रम जारी रहा। संगमादित्य अपनी यात्रा के क्रम से कश्मीर आया और शान्त तथा सात्त्विक वातावरण में रहने की इच्छा से बाद में यहीं निवास करने लगा। उसने वर्षादित्य को जन्म दिया। वर्षादित्य से अरुणादित्य, उससे आनन्द और आनन्द से सोमानन्द का जन्म हुआ। आगे भौतिक रूप में पिता-पुत्र द्वारा गुरु-शिष्य क्रम नहीं रहा। अब यह परम्परा गुरु-शिष्य क्रम से ही चलने लगी, जो इस प्रकार रही — सोमानन्द → उत्पलदेव → लक्ष्मणगुप्त → अभिनव गुप्त → क्षेमराज आदि । संगमादित्य कश्मीर में उस समय आये थे जिस समय महाराजा ललितादित्य यहाँ राज्य करते थे। ललितादित्य एक धर्मनिष्ठ, कर्त्तव्य-परायण तथा योग्य शासक थे। वह अपने कल्याण के साथ-साथ जनता के कल्याण का भी ध्यान रखते थे। प्रजा में धर्म-प्रेरणा के भाव जगाने में उन्होंने श्लाघनीय योग-दान दिया। कश्मीर में शैव-शासन के प्रचार का कारण बनने का श्रेय इसी प्रजावत्सल तथा प्रसिद्ध महाराजा को प्राप्त हुआ। भारतवर्ष में गंगा-जमुना के बीच में एक सुन्दर स्थान अन्तर्वेदी में अत्रिगुप्त नाम से एक शैवाचार्य रहा करते थे। वह एक सद्गृहस्थ थे और शैव-शासन के उत्तम अभ्यास में ही अपने जीवन को दिव्य तथा धन्य बनाने में व्यस्त थे। एक बार महाराजा ललितादित्य भ्रमण करते हुए इस उत्तम स्थान अन्तर्वेदी में गये। वहाँ उनका सम्पर्क शैव-आचार्य श्री अत्रिगुप्त के साथ हुआ। महाराजा उनके ज्ञान तथा प्रतिभा से प्रभा- वित हुए। उन्होंने आचार्य को कश्मीर आने की प्रार्थना की। इसे ऋषि ने स्वीकार किया। अत्रिगुप्त कश्मीर आये। महाराजा ने उनका बड़ा आदर-सत्कार किया और यहाँ ही निवास करने की प्रार्थना की। उस समय महाराजा का राज्य-भवन श्रीनगर से कुछ पांच मील दूर दक्षिण-पूर्व में ल्यतपुर के स्थान पर था। वहाँ से आगे दो-तीन मील (सम्भवतः पाम्पोर में) राजा प्रवरसेन का पुराना राज्य-भवन था। इसी राज्य- भवन को अत्रिगुप्त और उनके गृहस्थ के रहने के योग्य बनाने के लिए मरम्मत किया गया। शैवाचार्य ने यहीं रहकर कश्मीर में शैव-शास्त्र का प्रचार किया और शेष जीवन यहीं बिताया। आगे लगभग चार पीढ़ियों की इसी परम्परा में वराहगुप्त को एक पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ जिसका नाम नरसिंह गुप्त था। इनसे ही तन्त्रालोक के रचयिता स्वनामधन्य अभिनवगुप्तपाद का जन्म हुआ। उनके तर्क-गुरु श्रीलक्ष्मणगुप्ताचार्य थे।
सूत्रों का मनन करके कश्मीर में शैव-शासन का प्रचार करो'। फलतः वसुगुप्त ने ऐसा
X श्रीशम्भुनाथ, जो एक गृहस्थी थे, श्रीअभिनवगुप्त के त्रिकमार्ग (अभेद शैवमत) के गुरु थे। नरसिंह गुप्त की पूर्व वंश-परम्परा में ही वसुगुप्त का जन्म हुआ था। वसुगुप्त ने बौद्धमत का खण्डन करने के लिए अपना प्रयत्न सफल करना चाहा परन्तु वह असमर्थ रहा। शैव-शासन के अभिभव को सहन न करते हुए, वसुगुप्त ने कश्मीर में श्रीनगर से बारह मील दूर हार्वन के पास महादेव पर्वत के किसी भाग में तपस्या आरम्भ करके भगवान् शिव की आराधना की। आशुतोष भगवान् शिव ने उसे स्वप्न में आदेश दिया कि 'दाछीगाम की वनस्थली में एक बड़ी शिला है। इस पर शिव-सूत्र खुदे हुए हैं। इन सूत्रों का मनन करके कश्मीर में शैव-शासन का प्रचार करो'। फलतः वसुगुप्त ने ऐसा ही किया। प्रातः जब वह ढूँढ़ते हुए इस विशाल शिला के पास आया तो इसके स्पर्श- मात्र से ही शिला उलट गई और शिव-सूत्र इस पर खुदे हुए मिले। वसुगुप्त ने इन सूत्रों का भली भाँति विचार तथा मनन किया और देश में इनका प्रचार करने लगा। यह विशाल शिला अब भी दाछीगाम के वन में मौजूद है और इसे 'शंकर-पल' के नाम से जाना जाता है। कश्मीर में त्रिक-शासन का प्रचार, इस तरह, वसुगुप्त के शिव-सूत्रों से हुआ। फिर इन्हीं शिव-सूत्रों के आधार पर श्रीवसुगुप्त जी ने स्पन्द-सूत्रों की रचना की जिन सूत्रों पर उनके सच्छिष्य कल्लटाचार्य ने व्याख्या की। अतः कल्लट को स्पन्दशास्त्र का प्रथम आचार्य गिना जाने लगा। त्रिक-शासन का दूसरा शास्त्रीय रूप श्री सोमानन्द रचित शिवदृष्टि से प्रवर्तन में आया, जिसकी उन्हीं के सच्छिष्य श्रीउत्पल देव ने प्रत्यभिज्ञा- दर्शन के रूप में व्याख्या की। कहते हैं कि उत्पलदेव ने अपने पुत्र विभ्रमाकर की प्रार्थना से प्रेरित होकर ही शिवदृष्टि की व्याख्या 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' शास्त्र की कारि- काओं में लिखी। श्रीसोमानन्दनाथ और श्रीवसुगुप्त के स्थिति काल आठवीं-नौवीं शताब्दी में माने जाते हैं। अतः कई शताब्दियों से दबे हुए इस शिव-शासन का पुनरु- त्थान इसी समय श्रीवसुगुप्त द्वारा आरम्भ हुआ। क्योंकि इस समय से आरम्भ हुए इस उत्तर-कालिक अद्वैत-शैव दर्शन का प्रचार-क्षेत्र कश्मीर ही रहा, अतः इसका नाम भी कश्मीर शैव दर्शन पड़ गया। इस समय से पूर्व चौथी-पाँचवीं शताब्दी में कश्मीर में ही कुल-शाखा और क्रम- शाखा के प्रचार भी हुए थे। शैव-दर्शन के ये चारों क्रम-प्रत्यभिज्ञा, स्पन्द, कुल और क्रम-त्रिक शासन के अन्तर्गत ही माने जाते हैं क्योंकि इन चारों क्रमों में शिव, शक्ति और नर (अणु) की विधात्मक सत्ता पर ही अद्वैत परम तत्त्व का विमर्श किया गया है। यह समय तो शैव-दर्शन के पूर्वकाल से सम्बन्धित है। उत्तरकाल में गुरु-शिष्य परम्परा आगे चलती रही। उत्पलाचार्य के शिष्य श्री लक्ष्मणगुप्त थे जो श्रीअभिनवगुप्त-पाद के तर्क-गुरु थे। इनके त्रिकमार्ग अर्थात् अद्वैत
xi शैव मत के गुरु श्रीशम्भुनाथ थे जो एक गृहस्थ थे । श्रीअभिनवगुप्त ब्रह्मचारी थे । वे बड़ी आयु तक अपनी बहुमुखी प्रतिभा से त्रिक-मत का प्रचार-प्रसार करते रहे । इससे पूर्व इन्होंने संस्कृत साहित्य में ध्वनि-शास्त्र ओर नाट्य-शास्त्र को अत्युत्तम योगदान दिया । तन्त्रालोक में इन्होंने शैवदर्शन को क्रमपूर्वक ओर विस्तार से समझाया । इसके अतिरिक्त इनके ग्रन्थ तन्त्रसार, परा-त्रिंशिका, परमार्थसार आदि और अपने परमगुरु उत्पलाचार्य की ईश्वर प्रत्यभिज्ञा कारिकाओं पर विशद टीकाएँ प्राप्य हैं । सारांश यह कि कश्मीर शैव दर्शन को इन्होंने भावी समय के लिए परिपुष्ट तथा प्रभावित किया । अभिनवगुप्तपाद का आविर्भाव ईसवी की दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में हुआ था । इनके प्रतिभाशाली शिष्य श्रीक्षेमराज ने शिवसूत्र पर विमर्शिनी लिखी जिसकी अन्य टीकाओं की अपेक्षा सराहना की गई है । इन्होंने स्वच्छन्द-तन्त्र पर भी टीका लिखी है । इनके शिष्य श्रीयोगराज ने अभिनवगुप्तपाद के परमार्थसार पर टीका लिखी है । इन्होंने श्रीअभिनवगुप्त से ही शिक्षा प्राप्त की थी । इनके कार्य को आगे श्रीजयरथ ने चलाया । इनका स्थितिकाल बारहवीं शताब्दी कहा जाता है । इन्होंने तन्त्रालोक पर अति सुन्दर टीका लिखी । फिर इस परम्परा में श्रीशिवोपाध्याय का नाम आता है । यह अठारहवीं शताब्दी के उत्तम शैव सन्त माने जाते हैं । इनका निवास स्थान हब्बाकदल के आस- पास वितस्ता नदी के पश्चिम तट पर था । इन्होंने विज्ञानभैरव-तन्त्र की विवृति लिखी है । बीच-बीच में इस परम्परा का लोप होता जैसा दिखाई देता है । परन्तु सरिता की तरह जो बीच-बीच में घने बनों में से गुजरने के कारण दिखाई भी नहीं देती है और मैदानों में पहुँच कर प्रकट होती है, यह परम्परा कश्मीर में आगे बढ़ती गई । उन्नी- सवीं शताब्दी में मनुदेव एक उत्तम कोटि के शैव-सन्त हुए । इनके सुयोग्य शिष्य स्वामी राम एक सिद्ध शैव-सन्त हुए जो बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में शिव-स्वरूप में समा गए । इनकी सिद्धियों से कश्मीर के लोग, क्या हिन्दू क्या मुसलमान अभी तक प्रभावित हैं । इनके शिष्यों में मुख्य स्वामी महताब काक हुए जो बड़े युक्ति-कुशल तथा सिद्ध सन्त थे । इनका आश्रम अपने ही गुरु महाराज से स्थापित श्रीराम (त्रिक) आश्रम, फतेहकदल, श्रीनगर में ही रहा । पूर्व दो शताब्दी में हुए इन सिद्ध-सन्तों ने कोई ग्रन्थ लेख आदि नहीं लिखे । परन्तु शिष्यों द्वारा शैव-दर्शन का प्रचार-प्रसार करते रहे । पूर्वाचार्यों के ग्रन्थ शिव-सूत्र और ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा कश्मीर शैव दर्शन की विशेषता आप रखते हैं । इन्हीं का प्रचार ग्रन्थ तथा टीकाएँ लिखने से जो आगे बढ़ता चला आया था ? अब अध्यापन तथा उपदेश आदि के द्वारा आगे बढ़ता रहा है । स्वामी महताबकाक के सह-शिष्य स्वामी विद्याधर जी एक महान् तपस्वी थे । इन का भी स्थापित किया 'श्रीविद्याधर आश्रम' करणनगर, श्रीनगर में अब भी अपने दैनिक सत्संग कार्य में व्यस्त है । इसके अतिरिक्त उन के शिष्य स्वामी महादेव जी ने रतनीपोरा
xii में भी एक आश्रम की स्थापना की है। श्रीराम (त्रिक) आश्रम में भी आज तक शिष्यगण तथा भक्तजन दैनिक पाठ्य-क्रम चलाते हैं । स्वामी महताब काक के शिष्यों में ब्रह्मचारी लक्ष्मण जू (श्री स्वामी ईश्वर स्वरूप जी महाराज) अग्रगण्य हैं और इनका आश्रम इशबर (निशात) में ईश्वर आश्रम के नाम से विख्यात है। यहाँ प्रति रविवार को शैव-शास्त्रों के प्रवचन होते हैं और इनके भक्त तथा श्रद्धालु प्रशंसक इनके सत्संग तथा व्याख्यानों से लाभान्वित होते हैं। शैव दर्शन के आदिम ग्रन्थ इस शिव-सूत्र का अध्ययन विस्तार से करने का लाभ इन पंक्तियों के लेखक को किसी पूर्व पुण्य-पुञ्ज के परिणाम स्वरूप प्राप्त हुआ और उन्हीं की इच्छा के अनुसार इस अपार आनन्द की अनुभूति को सर्व साधारण में बांट कर अपने को धन्य मानता है । जानकीनाथ कौल 'शान्ति-कुटीर', ७७ द्राबीयार कमल श्रीनगर-कश्मीर
प्राक्कथन त्रिकशासन के अनुसार शिवसूत्र आगम शास्त्र का बहुत ही आवश्यक अंग है। द्वैतदर्शन से अधिवासित इस जीवलोक में अद्वैत-दर्शन के रहस्यसम्प्रदाय का विच्छेद न होने अपितु इसका पुनरुत्थान करने के लिए ही इन सूत्रों का आविर्भाव हुआ था। भगवान् शिव से प्रेरित भट्ट कल्लट के गुरु आचार्य वसुगुप्त द्वारा इन सूत्रों का प्रचार ईसा की आठवीं-नौवीं शताब्दी में कश्मीर में हुआ। इस अद्वैत शास्त्र की महत्ता को जानकर ही इस पर 'विमर्शिनी' नाम की संस्कृत टीका के लेखक क्षेमराज ने इसे 'शिवोपनिषत्-संग्रह' का नाम दिया था। यद्यपि 'शिवसूत्र' के यह ७७ सूत्र शैवागम के अनुसार तीन उपायों में बाँटे गए हैं तथापि भगवत्पाद ईश्वरस्वरूप श्रीस्वामी लक्ष्मण जू के आशीर्वादात्मक आमुख के अनुसार 'साधक जन के उपयोग की सम्भावना शाक्तोपाय पर ही निर्भर है।' अतः विज्ञ पाठक-जन का ध्यान इस बात की ओर आकृष्ट करना आवश्यक है कि स्पन्द- शाखा शाक्तोपाय के अन्तर्गत ही मानी गई है। साधारण साधक के लिए यही उपाय सुलभ है। पन्द्रहवीं शताब्दी तक शिवसूत्र पर संस्कृत में एक वृत्ति, दो वार्त्तिक और एक टीका लिखी गई। यद्यपि आधुनिक काल में भी इस ग्रन्थविशेष के हिन्दी और अंग्रेजी में व्याख्या तथा अनुवाद छप चुके हैं तथापि अद्वैत शैव दर्शन में पारंगत, धुरन्धर विद्वान् और सफल योगी श्रीस्वामी लक्ष्मण जू ने शिवसूत्र पर इस 'विमर्श' नाम की हिन्दी टीका को 'साधक-जन के अवगाहनाथं सरल तथा सुबोध' बताकर सराहा है। तभी तो भक्त-जन और विचारक-वर्ग के समक्ष इसे प्रस्तुत करने का साहस किया जा रहा है। विनीत लेखक ने इन सूत्रों पर, कई वर्ष पूर्व श्रीस्वामीजी महाराज के चरण कमलों के समक्ष बैठकर विचार किया था। फिर जब इस 'शिवसूत्र विमर्श' की पाण्डु- लिपि को भगवत्पाद के सामने रखा तो इसका आद्योपान्त अवलोकन कर उन्होंने हर्ष पूर्वक इसे मुद्रण में लाने की इच्छा प्रकट की। अतः “तवैव वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये”। अन्त में आशीर्वादात्मक धन्यवाद के पात्र हैं श्री ओं प्रकाश कौल जिन्होंने प्रेमपूर्वक, शुद्ध और स्वच्छ ढंग से प्रेस-कापी तैयार की, और अनुपम कौल जिसने दक्षता से पुस्तक का पुनरवलोकन किया। उन सज्जनों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है जिनके सफल परामर्श से यह यज्ञ सम्पन्न हुआ। नैवेद्य साधक तथा पाठक-जन के हाथ में है। ज. न. क.
सूत्र पृष्ठ
शिवसूत्र
प्रथम विकास
सूत्र पृष्ठ १. चैतन्यमात्मा । १ २. ज्ञानं बन्धः । २ ३. योनिवर्गः कलाशरीरम् । ३ ४. ज्ञानाधिष्ठानं मातृका । ३ ५. उद्यमो भैरवः । ३ ६. शक्तिचक्रसंधाने विश्वसंहारः । ५ ७. जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः । ५ ८. ज्ञानं जाग्रत् । ६ ९. स्वप्नो विकल्पाः । ६ १०. अविवेको मायासीषुप्तम् । ६ ११. त्रितयभोक्ता वीरेशः । ७ १२. विस्मयो योगभूमिकाः । ७ १३. इच्छाशक्तिरुमा कुमारी । ८ १४. दृश्यं शरीरम् । ८ १५. हृदये चित्तसंघट्टाद्दृश्यस्वापदर्शनम् । ९ १६. शुद्धतत्त्वसंधानाद्वाऽपशुशक्तिः । १० १७. वितर्क आत्मज्ञानम् । ११ १८. लोकानन्दः समाधिसुखम् । ११ १९. शक्तिसंधाने शरीरोत्पत्तिः । ११ २०. भूतसंधान-भूतपृथक्त्व-विश्वसंघट्टाः । १२ २१. शुद्धविद्योदयाच्चक्रेशत्वसिद्धिः । १३ २२. महाह्रदानुसंधानान्मन्त्रवीर्यानुभावः । १३
द्वितीय विकास
१. चित्तं मन्त्रः । १४ २. प्रयत्नः साधकः । १४ ३. विद्याशरीरसत्ता मन्त्ररहस्यम् । १५ ४. गर्भे चित्तविकासोऽविशिष्टविद्यास्वप्नः । १७
xvi सूत्र पृष्ठ ५. विद्यासमुत्थाने स्वाभाविके खेचरी शिवावस्था। १८ ६. गुरुरुपायः। २० ७. मातृकाचक्रसंबोधः। २० ८. शरीरं हविः। २१ ९. ज्ञानमन्नम्। २२ १०. विद्यासंहारे तदुत्थस्वप्नदर्शनम्। २३ तृतीय विकास १. आत्मा चित्तम्। २४ २. ज्ञानं बन्धः। २५ ३. कलादीनां तत्त्वानामविवेको माया। २५ ४. शरीरे संहारः कलानाम्। २७ ५. नाडीसंहार-भूतजय-भूतकैवल्य-भूतपृथक्त्वानि। २९ ६. मोहावरणात् सिद्धिः। ३१ ७. मोहजयादनन्ताभोगात् सहजविद्याजयः। ३३ ८. जाग्रत् द्वितीयकरः। ३४ ९. नर्तक आत्मा। ३४ १०. रङ्गोऽन्तरात्मा। ३५ ११. प्रेक्षकाणीन्द्रियाणि। ३५ १२. धीवशात् सत्त्वसिद्धिः। ३५ १३. सिद्धः स्वतन्त्रभावः। ३६ १४. यथा तत्र तथान्यत्र ३७ १५. बीजावधानम्। ३७ १६. आसनस्थः सुखं हृदे निमज्जति। ३८ १७. स्वमात्रानिर्माणमापादयति। ३९ १८. विद्याऽविनाशे जन्मविनाशः। ३९ १९. कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः। ४० २०. त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम्। ४० २१. मग्नः स्वचित्तेन प्रविशेत्। ४१ २२. प्राणसमाचारे समदर्शनम्। ४२ २३. मध्येऽवरप्रसवः। ४२ २४. मात्रास्वप्रत्ययसंधाने नष्टस्य पुनरुत्थानम्। ४३ २५. शिवतुल्यो जायते। ४६ २६. शरीरवृत्तिर्व्रतम्। ४७
xvii सूत्र पृष्ठ २७. कथा जपः ४९ २८. दानमात्मज्ञानम् । ५० २९. योऽविवस्थो ज्ञाहेतुश्च । ५० ३०. स्वशक्तिप्रचयोऽस्य विश्वम् । ५१ ३१. स्थितिलयौ । ५२ ३२. तत्प्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृभावात् । ५३ ३३. सुखदुःखयोर्बहिर्मननम् । ५४ ३४. तद्विमुक्तस्तु केवली । ५६ ३५. मोहप्रतिसंहतस्तु कर्मात्मा । ५६ ३६. भेदतिरस्कारे सर्गान्तरकर्मत्वम् । ५७ ३७. करणशक्तिः स्वतोऽनुभवात् । ५८ ३८. त्रिपदाद्यनुप्राणनम् । ५९ ३९. चित्तस्थितिवच्छरीरकरणबाह्येषु । ६० ४०. अभिलाषाद्बहिर्गतिः संवाह्यस्य । ६५ ४१. तदारूढप्रमितेस्तत्क्षयाज्जीवसंक्षयः । ६६ ४२. भूतकञ्चुकीतदा विमुक्तो भूयः पतिसमः परः । ६७ ४३. नैसर्गिकः प्राणसंबन्धः । ६८ ४४. नासिकान्तर्मध्यसंयमात् किमत्र सव्यापसव्यसौषुम्नेषु । ६९ ४५. भूयः स्यात् प्रतिमीलनम् । ७०
(रिक्त पृष्ठ)
शिवसूत्र विमर्श में प्रतिपादित विषय प्रथम विकास (शाम्भवोपाय की दृष्टि से शिवस्वरूप के अनुभव का स्फुरण) क्रमांक विषय सूत्रांक पृष्ठ १. आत्मा का लक्षण १ १ २. जीव के बन्धन का कारण २, ३ २ ३. तीन मलों का बन्धकत्व ४ ३ (क) उपाय क्रमाभ्यास में— ४. बन्धन से छूटने का उपाय ५ ३ ५. भैरव समाधि का प्रकार ६ ५ ६. समाधि-व्युत्थान में अभेद ७ ५ ७. जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति लक्षण ८,९,१० ६ ८. तुर्यातीत अवस्था ११ ७ ९. परचित् तत्त्व में स्थिति १२ ७ १०. योगी की इच्छा-शक्ति १३ ८ ११. दृश्य-वर्ग अपना ही स्वरूप १४ ८ १२. योगी संसार को कैसे देखता है १५ ९ (ख) अनुपायक्रमाभ्यास में— १३. अनादिसिद्ध शिव दशा १६ १० १४. शुद्धतत्त्व में अनुसंधान से साधारण विचार भी स्वात्म-विमर्श रूप है १७ १० १५. मायावी जगत् में योगैश्वर्य का चमत्कार (परिमित सिद्धियां) १८,१९,२० ११ १६. तुर्य का अनुभव २१ १३ १७. तुर्यातीत का अनुभव २२ १३ द्वितीय विकास (शाक्तोपाय के द्वारा शिवस्वरूप के अनुभव का वर्णन) १. शाक्त-परामर्श वाले का मन १ १४ २. आराधना में प्रयत्न की आवश्यकता २ १४
XX क्रमांक विषय सूत्रांक पृष्ठ ३. मन्त्र-वीर्य ३ १५ ४. मितसिद्धियों में ध्येय को भूलना ४ १७ ५. ईश्वर-कृपा से परप्रमातृभाव की सहज-स्थिति ५ १८ ६. सहज-स्थिति की प्राप्ति का उपाय ६ २० ७. अहं-परामर्श का तात्त्विक क्रम ७,८,९ २० ८. स्वेच्छानुसंधान की कमी—एक रुकावट १० २३ तृतीय विकास (आणवोपाय द्वारा शिवस्वरूप के आनन्दानुभव का वर्णन) —साधारण जीवोपाय— १. जीवात्मा का स्वरूप (तीनों परामर्शों में) १ २४ २. चित्त के बन्धन का कारण २ २५ ३. तत्त्वों का अविवेक माया (तत्त्व-वर्णन) ३ २५ (क) आत्म-व्याप्ति प्रकरण— ४. समाधि में ही आत्मलाभ (आणवोपाय से ध्यान की विधि) ४ २७ ५. अन्य साधन—प्राणायाम, धारणा, प्रत्याहार, समाधि ५,६ २९ (ख) शिव-व्याप्ति प्रकरण— ६. समाधि और व्युत्थान दोनों में आनन्द ७ ३१ ७. शक्तिरूपता का वर्णन ८ ३३ ८. विश्वनाटक का नट ९ ३४ ९. नट-नाट्य-स्थान १० ३४ १०. विश्वनाटक के दर्शक ११ ३५ ११. विशेष सात्त्विक बुद्धि से जगदानन्द-प्राप्ति १२ ३६ १२. स्वतन्त्रता की सिद्धि १३,१४ ३६ १३. स्वरूपस्थिति में सावधानता १५,१६ ३७ १४. विश्वव्यापिनी इच्छा १७,१८ ३९ १५. प्रमादवश मातृका द्वारा बहिर्मुखता १९ ३९ १६. चित्स्वरूपता की अनिवार्यता २० ४० १७. तीनों अवस्थाओं में तुर्यरस के सेचन का उपाय २१ ४१ १८. योगी की विश्वमय-अवस्था का अनुभव (तुर्यातीत पद) २२ ४३ १९. मन्दप्राय योगी का अनुभव २३,२४ ४३
xxi क्रमांक विषय सूत्रांक पृष्ठ २०. तुर्य-चमत्कार से युक्त योगी २५,२६ ४६ २१. संसिद्ध योगी के आलापादि २७,२८ ४९ २२. परमार्थज्ञान प्रदान करने में समर्थ योगी २९,३०,३१ ५० २३. तुर्य-चमत्कार के विमर्श से योगी की निष्कम्पता ३२,३३,३४ ५३ २४. कर्मात्मा जीव ३५ ५६ २५. अनर्गल शक्तिपात से स्वातन्त्र्ययोग का उदय ३६,३७ ५७ २६. सावधानता की आवश्यकता (शब्दस्पर्शादि विषयों के उपभोग पर रुद्रयामलतन्त्र से उद्धृत कई अभ्यासों के उदाहरण) ३८ ५८ २७. बाह्यरूपता में भी अभ्यास का दृढीकरण ३९ ६३ २८. विमर्श शिथिल पड़ने पर विषयोन्मुख प्रसर ४० ६५ २९. तुर्यानन्द दशा में व्यक्तिगत अभिलाषा का नाश ४१ ६६ ३०. सुप्रबुद्ध योगी की देह में स्थिति (शंका-समाधान) ४२,४३ ६६ ३१. ऐसे योगी की अलौकिकता ४४ ७० ३२. उस परमयोगी के योग का फल ४५ ७१ शिवसूत्रसार — ७२
xxii या काचिद् वै क्वचिदपि दशा किञ्चिदभ्यासपूरा- दानन्दाख्या भवभयहरा स्यात् सुभक्तस्य सद्यः । सिद्धिः सैषा सुरपितृनृणां यस्य भक्त्या भवेन्नु तं स्वात्मानं विभववपुषं सद्गुरुं वै प्रपद्ये ॥ अर्थ—'कहीं किसी दीर्घकाल तक निरन्तर चलने वाले धारावाहिक अभ्यास से किसी श्रेष्ठ भक्त को तो तत्काल कोई अनिर्वचनीय, भवभयहारिणी आनन्दा- वस्था प्राप्त हो जाती है, वही उसकी सिद्धि है । देवताओं, पितरों तथा मनुष्यों को यह उत्कृष्ट सिद्धि, जिनकी भक्ति (सेवा-पूजा) से उपलब्ध होती है. उन ज्ञानादि ऐश्वर्यमय स्वरूप वाले निजात्म-स्वरूप सद्गुरु की मैं शरण लेता हूं।'
ॐ नमः श्री शाम्भवे स्वात्मानन्दप्रकाशवपुषे शिवसूत्र विमर्श प्रथम विकास पहले विकास में शाम्भव उपाय की दृष्टि से शिवस्वरूप के अनुभव का स्फुरण कहा है । शाम्भव उपाय इस प्रकार है : 'अकिञ्चिच्चिन्तकस्यैव गुरुणा प्रतिबोधतः । जायते यः समावेशः शाम्भवोऽसावुदाहृतः ॥' (मालिनीविजयोत्तर तन्त्र अधिकार २, श्लोक २३) अर्थ—गहरे और गम्भीर स्वरूप-ज्ञान के द्वारा निर्विकल्पभाव में स्थिति पाये हुये योगी को (सद्गुरु कृपाकटाक्ष से) जो भगवदावेश होता है उसे (शाम्भवोपाय से प्राप्त) शाम्भव मुद्रा कहते हैं । अब प्रस्तुत सूत्र में सूचित किया जाता है कि शिव कौन है, उसका स्वरूप क्या है और शैवदर्शन में उसका वर्णन किस प्रकार हुआ है । चैतन्यमात्मा ॥१॥ चैतन्यम्—ज्ञानरूप क्रिया में स्वातन्त्र्य आत्मा—भाव और अभावरूप जगत् का स्वरूप (है) । व्याख्या—जिससे चेतना प्रधान होती है वह चेतन है। उसका ज्ञानरूप क्रिया में स्वातन्त्र्य ही चैतन्य है । यही आत्मा अर्थात् चेतनता का स्वरूप है । चेतनता ही भूः भुवः स्वः रूप इस सारे जगत् का स्वरूप है । यह लौकिक देह, प्राण, पुर्यष्टक, शून्य, बुद्धि, जाग्रत्, आदि आत्मा नहीं हैं । अतः इस भावरूप और अभावरूप जगत् का जो स्वभाव है वही आत्मा है । वह सब प्रकार की ज्ञानरूप क्रिया में स्वतन्त्र है । अतः जानने की क्रिया में स्वातन्त्र्य ही आत्मा है । इस सम्बन्ध में यह वार्तिक है : “चैतन्यमात्मनो रूपं सिद्धं ज्ञानक्रियात्मकम् । तस्यानावृतरूपत्वाच्छिवत्वं केन वार्यते ॥” (भट्टभास्कर विरचित शिवसूत्र वार्तिक-१५) अर्थ—जानने की क्रिया में स्वतन्त्रता ही चैतन्य-आत्मा का स्वरूप है । मलत्रय के आवरण से रहित होने के कारण उसके शिवभाव में कोई बाधा नहीं रहती ।
२ : शिवसूत्र विमर्श चैतन्य (चिति) ही आत्मा है । अतः चैतन्य और आत्मा में राहु के शिर की तरह कल्पना से ही भेद दिखाई देता है । वास्तव में कोई भेद नहीं । जो चेत्यमान न हो ऐसा स्वभाव न कोई हो सकता है, न किसी का हो सकता है और न कभी हो सकता है । अतः चेत्यमान स्वप्रकाश चिदेकरस चैतन्य ही स्वभाव है, वही आत्मा है । जब चैतन्य समस्त विश्व का स्वभाव है तो उसकी साधना ही क्या और उसके लिये उपाय ही कैसा । इसमें प्रमाण की कोई आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि चैतन्य सदा स्वयंप्रकाश चिद्रूप है और उस पर कोई आवरण नहीं डाल सकता है । श्री त्रिकहृदय में कहा है : "स्वपदा स्वशिरश्छायां यद्वल्लङ्घितुमीहते । पादोद्देशे शिरो न स्यात्तथैवं बैन्दवी कला ॥" अर्थ—ज्यों ज्यों अपना पैर अपने ही सिर की छाया को लाँघने की इच्छा से आगे बढ़ता है त्यों त्यों सिर की छाया आगे और आगे होती जाती है । यही बात बैन्दवी कला (चिति) के विषय में है । चिति को, उसी से बनी, बुद्धि आदि से समझना असंभव है । और भी, स्पन्दकारिका में : "तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः । भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥" अर्थ—सर्वात्मक स्वभाव से शब्द और अर्थ की चिन्ता में वह कोई अवस्था नहीं है जो शिवभाव को प्रकट न करती हो । अतः भोक्ता ही भोग्यरूप में सदा और सर्वत्र ठहरा है । यह स्वरूप-विकास-शक्ति ही स्वातन्त्र्य शक्ति है । अतः शिव का स्पन्दतत्त्वरूप चैतन्य सदा स्वयंप्रकाश परमार्थसत् है ॥१॥ सम्बन्ध—आत्मा का लक्षण बता कर अब जीव के बन्धन का कारण अगले दो सूत्रों में बताते हैं । ज्ञानं बन्धः ॥२॥ ज्ञानं—अनात्मा (अर्थात् देह, प्राण, पुर्यष्टकादि रूप) को ही आत्मा जानना बन्धः—बन्धन है । व्याख्या—विषयों का ज्ञान होना ही बन्धन है । इस प्रकार जिस अवस्था में द्वैत का ज्ञान होता है वह अज्ञान है और बन्धन का कारण है । ऐसा आणवमल के कारण होता है । आत्मा में जब अपूर्णता का अनुभव होता है तब इसे आणवमल कहते हैं । इसी से आत्मा अणु अर्थात् जीव कहलाता है । वह देह, प्राण, पुर्यष्टक आदि को ही आत्मा जानता है जिससे उसे विषयों का ही ज्ञान रहता है ॥२॥
प्रथम विकास : ३ सम्बन्ध—यही आणवमल संसार के अङ्कुर का कारण (कार्ममल) बन जाता है जिसकी ओर अगले सूत्र में संकेत किया है। योनिवर्गः कलाशरीरम् ॥३॥ योनि—भेदप्रथा की हेतु माया (का) वर्गः—प्रपञ्च अर्थात् फैलना (यह मायीयमलस्वरूप बन्धन है और) कलाशरीरम्—(कलातत्त्व से पृथ्वी तत्त्व तक शुभाशुभवासनामय) जो व्यापार है वह भी बन्धन का हेतु है। व्याख्या—माया का समूह ही भेदप्रथा का हेतु है। (भिन्नवेद्यप्रथा) वेद्यवर्ग में भिन्नता के ज्ञान को मायीयमल कहते हैं। अतः 'यह', 'वह', 'मैं' आदि का ज्ञान भी बन्धन है। इस स्वरूप-संकोच शक्ति को माया-शक्ति कहते हैं। जीव में जब 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ' इत्यादि शुभ और अशुभ वासनायें पैदा होती हैं तो इसे कार्ममल कहते हैं। इसमें जन्म और भोग को देने वाले कर्त्ता आत्मा का अबोध होता है। यह भी जीव के बन्धन का कारण है ॥३॥ सम्बन्ध—अब इन तीनों मलों का बन्धकत्व कहते हैं। ज्ञानाधिष्ठानं मातृका ॥ ४ ॥ ज्ञान—द्वैतज्ञान का अधिष्ठानं—आधार (अर्थात् आणवमल, मायीयमल और कार्ममलरूप कारण) मातृका—बहिर्मुखता को प्राप्त हुई संवित् (अर्थात् अज्ञाता-माता) है। व्याख्या—तीन मलों के आवरण से जीव को द्वैतज्ञान की दृढ़ता होती है। इससे वह ऐसे बन्धन में पड़ जाता है कि स्वात्म-विश्रान्तिरूप अन्तर्मुख-भाव से निरन्तर अलग रहता है और बहिर्मुखता के ज्ञान में भूला रहता है। यह सब अज्ञात संवित् के कारण ही होता है। अतः जीव बन्धन में रहता है ॥४॥ सम्बन्ध—अब इस बन्धन के सम्बन्ध से छूटने का उपाय (जो मलत्रय को हटाना है) कहते हैं। उद्यमो भैरवः ॥ ५ ॥ उद्यमः—मलत्रय को हटाने का उद्योग। भैरवः—भैरव रूप (अर्थात् स्वस्वरूप को प्रकट करने का हेतु) है।