भारतकोश
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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

८०-८१ ।।

प्रसन्नतासे भरे हुए वानरोंने उन सब वृक्षोंको घेर लिया था। उस पर्वतपर बहुत-सी रमणीय बावड़ियाँ तथा छोटे-छोटे जलाशय थे, जहाँ चकवे विचरते और जलकुक्कुट निवास करते थे। जलकाक और क्रौञ्च भरे हुए थे तथा सूअर और हिरन उनमें पानी पीते थे॥

रीछ, तरक्षु (लकड़बग्घे), सिंह, भयंकर बाघ तथा बहुसंख्यक दुष्ट हाथी, जो बड़े भीषण थे, सब ओरसे आ-आकर उन जलाशयोंका सेवन करते थे॥ ८४ ॥

खिले हुए सुगन्धित कमल, कुमुद, उत्पल तथा जलमें होनेवाले भाँति-भाँतिके अन्य पुष्पोंसे वहाँके जलाशय बड़े रमणीय दिखायी देते थे॥ ८५ ॥

उस पर्वतके शिखरोंपर नाना प्रकारके पक्षी कलरव करते थे। वानर उन जलाशयोंमें नहाते, पानी पीते और जलमें क्रीड़ा करते थे॥ ८६ ॥

वे आपसमें एक-दूसरेपर पानी भी उछालते थे। कुछ वानर पर्वतपर चढ़कर वहाँके वृक्षोंके अमृततुल्य मीठे फलों, मूलों और फूलोंको तोड़ते थे। मधुके समान वर्णवाले कितने ही मदमत्त वानर वृक्षोंमें लटके और एक-एक द्रोण शहदसे भरे हुए मधुके छत्तोंको तोड़कर उनका मधु पी लेते और स्वस्थ (संतुष्ट) होकर चलते थे॥८७-८८१/२ ॥

पेड़ोंको तोड़ते, लताओंको खींचते और बड़े-बड़े पर्वतोंको प्रतिध्वनित करते हुए वे श्रेष्ठ वानर तीव्र गतिसे आगे बढ़ रहे थे॥८९१/२ ॥

दूसरे वानर दर्पमें भरकर वृक्षोंसे मधुके छत्ते उतार लेते और जोर-जोरसे गर्जना करते थे। कुछ वानर वृक्षोंपर चढ़ जाते और कुछ मधु पीने लगते थे॥ ९०१/२ ॥

उन वानरशिरोमणियोंसे भरी हुई वहाँकी भूमि पके हुए बालवाले कलमी धानोंकी क्यारियोंसे ढकी हुई धरतीके समान सुशोभित हो रही थी॥ ९१ ॥

कमलनयन महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी महेन्द्र पर्वतके पास पहुँचकर भाँति-भाँतिके वृक्षोंसे सुशोभित उसके शिखरपर चढ़ गये॥ ९२ ॥

महेन्द्र पर्वतके शिखरपर आरूढ़ हो दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामने कछुओं और मत्स्योंसे भरे हुए समुद्रको देखा॥ ९३ ॥

इस प्रकार वे सह्य तथा मलयको लाँघकर क्रमशः महेन्द्र पर्वतके समीपवर्ती समुद्रके तटपर जा पहुँचे, जहाँ बड़ा भयंकर शब्द हो रहा था॥ ९४ ॥

उस पर्वतसे उतरकर भक्तोंके मनको रमानेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीराम सुग्रीव और लक्ष्मणके साथ शीघ्र ही सागर-तटवर्ती परम उत्तम वनमें जा पहुँचे॥ ९५॥

जहाँ सहसा उठी हुई जलकी तरङ्गोंसे प्रस्तरकी शिलाएँ धुल गयी थीं, उस विस्तृत सिन्धुतटपर पहुँचकर श्रीरामने कहा— ॥ ९६॥

‘सुग्रीव! लो, हम सब लोग समुद्रके किनारे तो आ गये। अब यहाँ मनमें फिर वही चिन्ता उत्पन्न हो गयी, जो हमारे सामने पहले उपस्थित थी॥ ९७॥

‘इससे आगे तो यह सरिताओंका स्वामी महासागर ही विद्यमान है, जिसका कहीं पार नहीं दिखायी देता। अब बिना किसी समुचित उपायके सागरको पार करना असम्भव है॥ ९८॥

‘इसलिये यहीं सेनाका पड़ाव पड़ जाय और हमलोग यहाँ बैठकर यह विचार आरम्भ करें कि किस प्रकार यह वानर-सेना समुद्रके उस पारतक पहुँच सकती है’॥ ९९॥

इस प्रकार सीताहरणके शोकसे दुर्बल हुए महाबाहु श्रीरामने समुद्रके किनारे पहुँचकर उस समय सारी सेनाको वहाँ ठहरनेकी आज्ञा दी॥ १००॥

वे बोले—‘कपिश्रेष्ठ! समस्त सेनाओंको समुद्रके तटपर ठहराया जाय। अब यहाँ हमारे लिये समुद्र-लङ्घनके उपायपर विचार करनेका अवसर प्राप्त हुआ है॥ १०१॥

‘इस समय कोई भी सेनापति किसी भी कारणसे अपनी-अपनी सेनाको छोड़कर कहीं अन्यत्र न जाय। समस्त शूरवीर वानर-सेनाकी रक्षाके लिये यथास्थान चले जायें। सबको यह जान लेना चाहिये कि हमलोगोंपर राक्षसोंकी मायासे गुप्त भय आ सकता है’॥ १०२॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर लक्ष्मणसहित सुग्रीवने वृक्षावलियोंसे सुशोभित सागर-तटपर सेनाको ठहरा दिया॥ १०३॥

समुद्रके पास ठहरी हुई वह विशाल वानर-सेना मधुके समान पिङ्गलवर्णके जलसे भरे हुए दूसरे सागरकी-सी शोभा धारण करती थी॥ १०४॥

सागर-तटवर्ती वनमें पहुँचकर वे सभी श्रेष्ठ वानर समुद्रके उस पार जानेकी अभिलाषा मनमें लिये वहीं ठहर गये॥ १०५॥

वहाँ डेरा डालते हुए उन श्रीराम आदिकी सेनाओंके संचरणसे जो महान् कोलाहल हुआ, वह महासागरकी गम्भीर गर्जनाको भी दबाकर सुनायी देने लगा॥ १०६॥

सुग्रीवद्वारा सुरक्षित वह वानरोंकी विशाल सेना श्रीरामचन्द्रजीके कार्य-साधनमें तत्पर हो रीछ, लांगूर और वानरोंके भेदसे तीन भागोंमें विभक्त होकर ठहर गयी॥

महासागरके तटपर पहुँचकर वह वानर-सेना वायुके वेगसे कम्पित हुए समुद्रकी शोभा देखती हुई बड़े हर्षका अनुभव करती थी॥ १०८ ॥

जिसका दूसरा तट बहुत दूर था और बीचमें कोई आश्रय नहीं था तथा जिसमें राक्षसोंके समुदाय निवास करते थे, उस वरुणालय समुद्रको देखते हुए वे वानरयूथ पति उसके तटपर बैठे रहे॥ १०९ ॥

क्रोधमें भरे हुए नाकोंके कारण समुद्र बड़ा भयंकर दिखायी देता था। दिनके अन्त और रातके आरम्भमें—प्रदोषके समय चन्द्रोदय होनेपर उसमें ज्वार आ गया था। उस समय वह फेन-समूहोंके कारण हँसता और उत्ताल तरङ्गोंके कारण नाचता-सा प्रतीत होता था। चन्द्रमाके प्रतिबिम्बोंसे भरा-सा जान पड़ता था। प्रचण्ड वायुके समान वेगशाली बड़े-बड़े ग्राहोंसे और तिमि नामक महामत्स्योंको भी निगल जानेवाले महाभयंकर जल-जन्तुओंसे व्याप्त दिखायी देता था॥ ११०-१११ ॥

वह वरुणालय प्रदीप्त फणोंवाले सर्पों, विशालकाय जलचरों और नाना पर्वतोंसे व्याप्त जान पड़ता था॥ ११२ ॥

राक्षसोंका निवासभूत वह अगाध महासागर अत्यन्त दुर्गम था। उसे पार करनेका कोई मार्ग या साधन दुर्लभ था। उसमें वायुकी प्रेरणासे उठी हुई चञ्चल तरङ्गं, जो मगरों और विशालकाय सर्पोंसे व्याप्त थीं, बड़े उल्लाससे ऊपरको उठती और नीचेको उतर आती थीं॥ ११३ ॥

समुद्रके जल-कण बड़े चमकीले दिखायी देते थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो सागरमें आगकी चिनगारियाँ बिखेर दी गयी हों। (फैले हुए नक्षत्रोंके कारण आकाश भी वैसा ही दिखायी देता था।) समुद्रमें बड़े-बड़े सर्प थे (आकाशमें भी राहु आदि सर्पाकार ही देखे जाते थे)। समुद्र देवद्रोही दैत्यों और राक्षसोंका आवास-स्थान था (आकाश भी वैसा ही था; क्योंकि वहाँ भी उनका संचरण देखा जाता था)। दोनों ही देखनेमें भयंकर और पातालके समान गम्भीर थे। इस प्रकार समुद्र आकाशके समान और आकाश समुद्रके समान जान पड़ता था। समुद्र और आकाशमें कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था॥ ११४-११५ ॥

जल आकाशसे मिला हुआ था और आकाश जलसे, आकाशमें तारे छिटके हुए थे और समुद्रमें मोती। इसलिये दोनों एक-से दिखायी देते थे॥ ११६ ॥

आकाशमें मेघोंकी घटा घिर आयी थी और समुद्र तरङ्गमालाओंसे व्याप्त हो रहा था। अतः समुद्र और आकाश दोनोंमें कोई अन्तर नहीं रह गया था॥ ११७ ॥

परस्पर टकराकर और सटकर सिन्धुराजकी लहरें आकाशमें बजनेवाली देवताओंकी बड़ी-बड़ी भेरियोंके समान भयानक शब्द करती थीं॥ ११८ ॥

वायुसे प्रेरित हो रत्नोंको उछालनेवाली जलकी तरङ्गोंके कलकल नादसे युक्त और जल-जन्तुओंसे भरा हुआ समुद्र इस प्रकार ऊपरको उछल रहा था, मानो रोषसे भरा हुआ हो॥ ११९ ॥

उन महामनस्वी वानरवीरोंने देखा, समुद्र वायुके थपेड़े खाकर पवनकी प्रेरणासे आकाशमें ऊँचे उठकर उत्ताल तरङ्गोंके द्वारा नृत्य-सा कर रहा था॥ १२० ॥

तदनन्तर वहाँ खड़े हुए वानरोंने यह भी देखा कि चक्कर काटते हुए तरङ्ग-समूहोंके कल-कल नादसे युक्त महासागर अत्यन्त चञ्चल-सा हो गया है। यह देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ॥ १२१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौथा सर्ग पूरा हुआ॥ ४ ॥


* दिनमें दोपहरीके समय अभिजित् मुहूर्त होता है, इसीको विजय-मुहूर्त भी कहते हैं। यह यात्राके लिये बहुत उत्तम माना गया है। यद्यपि—'भुक्तौ दक्षिणयात्रायां प्रतिष्ठायां द्विजन्मनि। आधाने च ध्वजारोहे मृत्युदः स्यात् सदाभिजित्॥' इस ज्योतिष-रत्नाकरके वचनके अनुसार उक्त मुहूर्तमें दक्षिणयात्रा निषिद्ध है, तथापि किष्किन्धासे लङ्का दक्षिणपूर्वके कोणमें होनेके कारण वह दोष यहाँ नहीं प्राप्त होता है।

पाँचवाँ सर्ग

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पाँचवाँ सर्ग

श्रीरामका सीताके लिये शोक और विलाप

नीलने, जिसकी विधिवत् रक्षाकी व्यवस्था की गयी थी, उस परम सावधान वानर-सेनाको समुद्रके उत्तर तटपर अच्छे ढंगसे ठहराया॥ १ ॥

मैन्द और द्विविद—ये दो प्रमुख वानरवीर उस सेनाकी रक्षाके लिये सब ओर विचरते रहते थे॥ २ ॥

समुद्रके किनारे सेनाका पड़ाव पड़ जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने अपने पास बैठे हुए लक्ष्मणकी ओर देखकर कहा— ॥ ३ ॥

‘सुमित्रानन्दन! कहा जाता है कि शोक बीतते हुए समयके साथ स्वयं भी दूर हो जाता है; परंतु मेरा शोक तो अपनी प्राणवल्लभाको न देखनेके कारण दिनोंदिन बढ़ रहा है॥ ४ ॥

‘मुझे इस बातका दुःख नहीं है कि मेरी प्रिया मुझसे दूर है। उसका अपहरण हुआ—इसका भी दुःख नहीं है। मैं तो बारंबार इसीलिये शोकमें डूबा रहता हूँ कि उसके जीवित रहनेके लिये जो अवधि नियत कर दी गयी है, वह शीघ्रतापूर्वक बीती जा रही है॥ ५ ॥

‘हवा! तुम वहाँ बह, जहाँ मेरी प्राणवल्लभा है। उसका स्पर्श करके मेरा भी स्पर्श कर। उस दशामें तुझसे जो मेरे अङ्गोंका स्पर्श होगा, वह चन्द्रमासे होनेवाले दृष्टिसंयोगकी भाँति मेरे सारे संतापको दूर करनेवाला और आह्लादजनक होगा॥ ६ ॥

‘अपहरण होते समय मेरी प्यारी सीताने जो मुझे ‘हा नाथ!’ कहकर पुकारा था, वह पीये हुए उदरस्थित विषकी भाँति मेरे सारे अङ्गोंको दग्ध किये देता है॥

‘प्रियतमाका वियोग ही जिसका ऽंइंधन है, उसकी चिन्ता ही जिसकी दीप्तिमती लपटें हैं, वह प्रेमाग्नि मेरे शरीरको रात-दिन जलाती रहती है॥ ८ ॥

‘सुमित्रानन्दन! तुम यहीं रहो। मैं तुम्हारे बिना अकेला ही समुद्रके भीतर घुसकर सोऊँगा। इस तरह जलमें शयन करनेपर यह प्रज्वलित प्रेमाग्नि मुझे दग्ध नहीं कर सकेगी॥ ९ ॥

‘मैं और वह वामोरु सीता एक ही भूतलपर सोते हैं। प्रियतमाके संयोगकी इच्छा रखनेवाले मुझ विरहीके लिये इतना ही बहुत है। इतनेसे भी मैं जीवित रह सकता हूँ॥ १० ॥

‘जैसे जलसे भरी हुँऽइ क्यारीके सम्पर्कसे बिना जलकी क्यारीका धान भी जीवित रहता है—सूखता नहीं है, उसी प्रकार मैं जो यह सुनता हूँ कि सीता अभी जीवित है, इसीसे जी रहा हूँ॥ ११ ॥

‘कब वह समय आयेगा, जब शत्रुओंको परास्त करके मैं समृद्धिशालिनी राजलक्ष्मीके समान कमलनयनी सुमध्यमा सीताको देखूँगा॥ १२ ॥

‘जैसे रोगी रसायनका पान करता है, उसी प्रकार मैं कब सुन्दर दाँतों और बिम्बसदृश मनोहर ओठोंसे युक्त सीताके प्रफुल्लकमल-जैसे मुखको कुछ ऊपर उठाकर चूमूँगा॥ १३ ॥

‘मेरा आलिङ्गन करती हुँऽइ प्रिया सीताके वे परस्पर सटे हुए, तालफलके समान गोल और मोटे दोनों स्तन कब किंचित् कम्पनके साथ मेरा स्पर्श करेंगे॥ १४ ॥

‘कजरारे नेत्रप्रान्तवाली वह सती-साध्वी सीता, जिसका मैं ही नाथ हूँ, आज अनाथकी भाँति राक्षसोंके बीचमें पड़कर निश्चय ही कोऽइ रक्षक नहीं पा रही होगी॥

‘राजा जनककी पुत्री, महाराज दशरथकी पुत्रवधू और मेरी प्रियतमा सीता राक्षसियोंके बीचमें कैसे सोती होगी॥ १६ ॥

‘वह समय कब आयेगा, जब कि सीता मेरे द्वारा उन दुर्धर्ष राक्षसोंका विनाश करके उसी प्रकार अपना उद्धार करेगी, जैसे शरत्कालमें चन्द्रलेखा काले बादलोंका निवारण करके उनके आवरणसे मुक्त हो जाती है॥ १७ ॥

‘स्वभावसे ही दुबले-पतले शरीरवाली सीता विपरीत देशकालमें पड़ जानेके कारण निश्चय ही शोक और उपवास करके और भी दुर्बल हो गयी होगी॥ १८ ॥

‘मैं राक्षसराज रावणकी छातीमें अपने सायकोंको धँसाकर अपने मानसिक शोकका निराकरण करके कब सीताका शोक दूर करूँगा॥ १९ ॥

‘देवकन्याके समान सुन्दरी मेरी सती-साध्वी सीता कब उत्कण्ठापूर्वक मेरे गलेसे लगकर अपने नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहायेगी॥ २० ॥

‘ऐसा समय कब आयेगा, जब मैं मिथिलेशकुमारीके वियोगसे होनेवाले इस भयंकर शोकको मलिन वस्त्रकी भाँति सहसा त्याग दूँगा?’॥ २१ ॥

बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजी वहाँ इस प्रकार विलाप कर ही रहे थे कि दिनका अन्त होनेके कारण मन्द किरणोंवाले सूर्यदेव अस्ताचलको जा पहुँचे॥ २२ ॥

उस समय लक्ष्मणके धैर्य बँधानेपर शोकसे व्याकुल हुए श्रीरामने कमलनयनी सीताका चिन्तन करते हुए संध्योपासना की॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

५ ॥

छठा सर्ग

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छठा सर्ग

रावणका कर्तव्य-निर्णयके लिये अपने मन्त्रियोंसे समुचित सलाह देनेका अनुरोध करना

इधर इन्द्रतुल्य पराक्रमी महा त्मा हनुमान्‌जीने लङ्कामें जो अत्यन्त भयावह घोर कर्म किया था, उसे देखकर राक्षसराज रावणका मुख लज्जासे कुछ नीचेको झुक गया और उसने समस्त राक्षसोंसे इस प्रकार कहा— ॥

‘निशाचरो! वह हनुमान्, जो एक वानरमात्र है, अकेला इस दुर्धर्ष पुरीमें घुस आया। उसने इसे तहस-नहस कर डाला और जनककुमारी सीतासे भेंट भी कर लिया॥ २ ॥

‘इतना ही नहीं, हनुमान्ने चैत्यप्रासादको धराशायी कर दिया, मुख्य-मुख्य राक्षसोंको मार गिराया और सारी लङ्कापुरीमें खलबली मचा दी॥ ३ ॥

‘तुमलोगोंका भला हो। अब मैं क्या करूँ? तुम्हें जो कार्य उचित और समर्थ जान पड़े तथा जिसे करनेपर कोर्इ अच्छा परिणाम निकले, उसे बताओ॥ ४ ॥

‘महाबली वीरो! मनस्वी पुरुषोंका कहना है कि विजयका मूल कारण मन्त्रियोंकी दी हुर्इ अच्छी सलाह ही है। इसलिये मैं श्रीरामके विषयमें आपलोगोंसे सलाह लेना अच्छा समझता हूँ॥ ५ ॥

‘संसारमें उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके पुरुष होते हैं। मैं उन सबके गुण-दोषोंका वर्णन करता हूँ॥ ६ ॥

‘जिसका मन्त्र आगे बताये जानेवाले तीन लक्षणोंसे युक्त होता है तथा जो पुरुष मन्त्रनिर्णयमें समर्थ मित्रों, समान दुःख-सुखवाले बान्धवों और उनसे भी बढ़कर अपने हितकारियोंके साथ सलाह करके कार्यका आरम्भ करता है तथा दैवके सहारे प्रयत्न करता है, उसे उत्तम पुरुष कहते हैं॥ ७-८ ॥

‘जो अकेला ही अपने कर्तव्यका विचार करता है, अकेला ही धर्ममें मन लगाता है और अकेला ही सब काम करता है, उसे मध्यम श्रेणीका पुरुष कहा जाता है॥ ९ ॥

‘जो गुण-दोषका विचार न करके दैवका भी आश्रय छोड़कर केवल ‘करूँगा’ इसी बुद्धिसे कार्य आरम्भ करता है और फिर उसकी उपेक्षा कर देता है, वह पुरुषोंमें अधम है॥ १० ॥

‘जैसे ये पुरुष सदा उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके होते हैं, वैसे ही मन्त्र (निश्चित किया हुआ विचार) भी उत्तम, मध्यम और अधम-भेदसे तीन प्रकारका समझना चाहिये॥ ११ ॥

‘जिसमें शास्त्रोक्त दृष्टिसे सब मन्त्री एकमत होकर प्रवृत्त होते हैं, उसे उत्तम मन्त्र कहते हैं॥ १२ ॥

‘जहाँ प्रारम्भमें कई प्रकारका मतभेद होनेपर भी अन्तमें सब मन्त्रियोंका कर्तव्यविषयक निर्णय एक हो जाता है, वह मन्त्र मध्यम माना गया है॥ १३ ॥

‘जहाँ भिन्न-भिन्न बुद्धिका आश्रय ले सब ओरसे स्पर्धापूर्वक भाषण किया जाय और एकमत होनेपर भी जिससे कल्याणकी सम्भावना न हो, वह मन्त्र या निश्चय अधम कहलाता है॥ १४ ॥

‘आप सब लोग परम बुद्धिमान् हैं; इसलिये अच्छी तरह सलाह करके कोई एक कार्य निश्चित करें। उसीको मैं अपना कर्तव्य समझूँगा॥ १५ ॥

‘(ऐसे निश्चयकी आवश्यकता इसलिये पड़ी है कि) राम सहस्रों धीरवीर वानरोंके साथ हमारी लङ्कापुरीपर चढ़ाई करनेके लिये आ रहे हैं॥ १६ ॥

‘यह बात भी भलीभाँति स्पष्ट हो चुकी है कि वे रघुवंशी राम अपने समुचित बलके द्वारा भाई, सेना और सेवकोंसहित सुखपूर्वक समुद्रको पार कर लेंगे॥ १७ ॥

‘वे या तो समुद्रको ही सुखा डालेंगे या अपने पराक्रमसे कोई दूसरा ही उपाय करेंगे। ऐसी स्थितिमें वानरोंसे विरोध आ पड़नेपर नगर और सेनाके लिये जो भी हितकर हो, वैसी सलाह आपलोग दीजिये’॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ॥ ६ ॥

सातवाँ सर्ग

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सातवाँ सर्ग

राक्षसोंका रावण और इन्द्रजित्के बल-पराक्रमका वर्णन करते हुए उसे रामपर विजय पानेका विश्वास दिलाना

राक्षसोंको न तो नीतिका ज्ञान था और न वे शत्रुपक्षके बलाबलको ही समझते थे। वे बलवान् तो बहुत थे; किंतु नीतिकी दृष्टिसे महामूर्ख थे। इसलिये जब राक्षसराज रावणने उनसे पूर्वोक्त बातें कहीं, तब वे सब-के-सब हाथ जोड़कर उससे बोले— ॥ १ १/२ ॥

‘राजन्! हमारे पास परिघ, शक्ति, ऋष्टि, शूल, पट्टिश और भालोंसे लैस बहुत बड़ी सेना मौजूद है; फिर आप विषाद क्यों करते हैं॥ २ १/२ ॥

‘आपने तो भोगवतीपुरीमें जाकर नागोंको भी युद्धमें परास्त कर दिया था। बहुसंख्यक यक्षोंसे घिरे हुए कैलासशिखरके निवासी कुबेरको भी युद्धमें भारी मार-काट मचाकर वशमें कर लिया था॥ ३-४ ॥

‘प्रभो! महाबली लोकपाल कुबेर महादेवजीके साथ मित्रता होनेके कारण आपके साथ बड़ी स्पर्धा रखते थे; परंतु आपने समराङ्गणमें रोषपूर्वक उन्हें हरा दिया॥ ५ ॥

‘यक्षोंकी सेनाको विचलित करके बंदी बना लिया और कितनोंको धराशायी करके कैलासशिखरसे आप उनका यह विमान छीन लाये थे॥ ६ ॥

‘राक्षसशिरोमणे! दानवराज मयने आपसे भयभीत होकर ही आपको अपना मित्र बना लेनेकी इच्छा की और इसी उद्देश्यसे आपको धर्मपत्नीके रूपमें अपनी पुत्री समर्पित कर दी॥ ७ ॥

‘महाबाहो! अपने पराक्रमका घमंड रखनेवाले दुर्जय दानवराज मधुको भी, जो आपकी बहिन कुम्भीनसीको सुख देनेवाला उसका पति है, आपने युद्ध छेड़कर वशमें कर लिया॥ ८ ॥

‘विशालबाहु वीर! आपने रसातलपर चढ़ाई करके वासुकि, तक्षक, शङ्ख और जटी आदि नागोंको युद्धमें जीता और अपने अधीन कर लिया॥ ९ ॥

‘प्रभो! शत्रुदमन राक्षसराज! दानवलोग बड़े ही बलवान्, किसीसे नष्ट न होनेवाले, शूरवीर तथा वर पाकर अद्भुत शक्तिसे सम्पन्न हो गये थे; परंतु आपने समराङ्गणमें एक वर्षतक युद्ध

करके अपने ही बलके भरोसे उन सबको अपने अधीन कर लिया और वहाँ उनसे बहुत-सी मायाएँ भी प्राप्त कीं॥ १०-११ ॥

‘महाभाग! आपने वरुणके शूरवीर और बलवान् पुत्रोंको भी उनकी चतुरंगिणी सेनासहित युद्धमें परास्त कर दिया था॥ १२ ॥

‘राजन्! मृत्युका दण्ड ही जिसमें महान् ग्राहके समान है, जो यम-यातना-सम्बन्धी शाल्मलि आदि वृक्षोंसे मण्डित है, कालपाशरुपी उत्ताल तरंगें जिसकी शोभा बढ़ाती हैं, यमदूतरूपी सर्प जिसमें निवास करते हैं तथा जो महान् ज्वरके कारण दुर्जय है, उस यमलोकरूपी महासागरमें प्रवेश करके आपने यमराजकी सागर-जैसी सेनाको मथ डाला, मृत्युको रोक दिया और महान् विजय प्राप्त की। यही नहीं, युद्धकी उत्तम कलासे आपने वहाँके सब लोगोंको पूर्ण संतुष्ट कर दिया था॥ १३—१५ ॥

‘पहले यह पृथ्वी विशाल वृक्षोंकी भाँति इन्द्रतुल्य पराक्रमी बहुसंख्यक क्षत्रिय वीरोंसे भरी हुई थी॥ १६ ॥

‘उन वीरोंमें जो पराक्रम, गुण और उत्साह थे, उनकी दृष्टिसे राम रणभूमिमें उनके समान कदापि नहीं हैं; राजन्! जब आपने उन समरदुर्जय वीरोंको भी बलपूर्वक मार डाला, तब रामपर विजय पाना आपके लिये कौन बड़ी बात है?॥ १७ ॥

‘अथवा महाराज! आप चुपचाप यहीं बैठे रहें। आपको परिश्रम करनेकी क्या आवश्यकता है। अकेले ये महाबाहु इन्द्रजित् ही सब वानरोंका संहार कर डालेंगे॥ १८ ॥

‘महाराज! इन्होंने परम उत्तम माहेश्वर यज्ञका अनुष्ठान करके वह वर प्राप्त किया है, जो संसारमें दूसरेके लिये अत्यन्त दुर्लभ है॥ १९ ॥

‘देवताओंकी सेना समुद्रके समान थी। शक्ति और तोमर ही उसमें मत्स्य थे। निकालकर फेंकी हुई आँतें सेवारका काम देती थीं। हाथी ही उस सैन्य-सागरमें कछुओंके समान भरे थे। घोड़े मेढकोंके समान उसमें सब ओर व्याप्त थे। रुद्रगण और आदित्यगण उस सेनारूपी समुद्रके बड़े-बड़े ग्राह थे। मरुद्गण और वसुगण वहाँके विशाल नाग थे। रथ, हाथी और घोड़े जलराशिके समान थे और पैदल सैनिक उसके विशाल तट थे; परंतु इस इन्द्रजितने देवताओंके उस सैन्य-समुद्रमें घुसकर देवराज इन्द्रको कैद कर लिया और उन्हें लङ्कापुरीमें लाकर बंद कर दिया॥ २०—२२ ॥

‘राजन्! फिर ब्रह्माजीके कहनेसे इन्होंने शम्बर और वृत्रासुरको मारनेवाले सर्वदेववन्दित इन्द्रको मुक्त किया। तब वे स्वर्गलोकमें गये॥ २३ ॥

‘अतः महाराज! इस कामके लिये आप राजकुमार इन्द्रजित्को ही भेजिये, जिससे ये रामसहित वानर-सेनाका यहाँ आनेसे पहले ही संहार कर डालें॥ २४ ॥

‘राजन्! साधारण नर और वानरोंसे प्राप्त हुई इस आपत्तिके विषयमें चिन्ता करना आपके लिये उचित नहीं है। आपको तो अपने हृदयमें इसे स्थान ही नहीं देना चाहिये। आप अवश्य ही रामका वध कर डालेंगे’॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
७ ॥

आठवाँ सर्ग

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आठवाँ सर्ग

प्रहस्त, दुर्मुख, वज्रदंष्ट्र, निकुम्भ और वज्रहनुका रावणके सामने शत्रु-सेनाको मार गिरानेका उत्साह दिखाना

इसके बाद नील मेघके समान श्यामवर्णवाले शूर सेनापति प्रहस्त नामक राक्षसने हाथ जोड़कर कहा— ॥

‘महाराज! हमलोग देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और सर्प सभीको पराजित कर सकते हैं; फिर उन दो मनुष्योंको रणभूमिमें हराना कौन बड़ी बात है॥ २ ॥

‘पहले हमलोग असावधान थे। हमारे मनमें शत्रुओंकी ओरसे कोई खटका नहीं था। इसीलिये हम निश्चिन्त बैठे थे। यही कारण है कि हनुमान् हमें धोखा दे गया। नहीं तो मेरे जीते-जी वह वानर यहाँसे जीता-जागता नहीं जा सकता था॥ ३ ॥

‘यदि आपकी आज्ञा हो तो पर्वत, वन और काननोंसहित समुद्रतककी सारी भूमिको मैं वानरोंसे सूनी कर दूँ॥ ४ ॥

‘राक्षसराज! मैं वानरमात्रसे आपकी रक्षा करूँगा, अतः अपने द्वारा किये गये सीता-हरणरूपी अपराधके कारण कोई दुःख आपपर नहीं आने पायेगा’॥ ५ ॥

तत्पश्चात् दुर्मुख नामक राक्षसने अत्यन्त कुपित होकर कहा— ‘यह क्षमा करनेयोग्य अपराध नहीं है, क्योंकि इसके द्वारा हम सब लोगोंका तिरस्कार हुआ है॥ ६ ॥

‘वानरके द्वारा हमलोगोंपर जो आक्रमण हुआ है, यह समस्त लङ्कापुरीका, महाराजके अन्तःपुरका और श्रीमान् राक्षसराज रावणका भी भारी पराभव है॥ ७ ॥

‘मैं अभी इसी मुहूर्त्तमें अकेला ही जाकर सारे वानरोंको मार भगाऊँगा। भले ही वे भयंकर समुद्रमें, आकाशमें अथवा रसातलमें ही क्यों न घुस गये हों’॥

इतनेहीमें महाबली वज्रदंष्ट्र अत्यन्त क्रोधसे भरकर रक्त, मांससे सने हुए भयानक परिघको हाथमें लिये हुए बोला— ॥ ९ ॥

‘दुर्जय वीर राम, सुग्रीव और लक्ष्मणके रहते हुए हमें उस बेचारे तपस्वी हनुमान्से क्या काम है?॥ १० ॥

‘आज मैं अकेला ही वानर-सेनामें तहलका मचा दूँगा और इस परिघसे सुग्रीव तथा लक्ष्मणसहित रामका भी काम तमाम करके लौट आऊँगा॥ ११ ॥

‘राजन्! यदि आपकी इच्छा हो तो आप यह मेरी दूसरी बात सुनें। उपायकुशल पुरुष ही यदि आलस्य छोड़कर प्रयत्न करे तो वह शत्रुओंपर विजय पा सकता है॥ १२ ॥

‘अतः राक्षसराज! मेरी दूसरी राय यह है कि इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, अत्यन्त भयानक तथा भयंकर दृष्टिवाले सहस्रों शूरवीर राक्षस एक निश्चित विचार करके मनुष्यका रूप धारण कर श्रीरामके पास जायँ और सब लोग बिना किसी घबराहटके उन रघुवंशशिरोमणिसे कहें कि हम आपके सैनिक हैं। हमें आपके छोटे भांऽइ भरतने भेजा है। इतना सुनते ही वे वानर-सेनाको उठाकर तुरंत लङ्कापर आक्रमण करनेके लिये वहाँसे चल देंगे॥ १३—१५ ॥

‘तत्पश्चात् हमलोग यहाँसे शूल, शक्ति, गदा, धनुष, बाण और खड्ग धारण किये शीघ्र ही मार्गमें उनके पास जा पहुँचें॥ १६ ॥

‘फिर आकाशमें अनेक यूथ बनाकर खड़े हो जायँ और पत्थरों तथा शस्त्र-समूहोंकी बड़ी भारी वर्षा करके उस वानर-सेनाको यमलोक पहुँचा दें॥ १७ ॥

‘यदि इस प्रकार हमारी बातें सुनकर वे दोनों भांऽइ श्रीराम और लक्ष्मण सेनाको कूच करनेकी आज्ञा दे देंगे और वहाँसे चल देंगे तो उन्हें हमारी अनीतिका शिकार होना पड़ेगा; उन्हें हमारे छलपूर्ण प्रहारसे पीड़ित होकर अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा॥ १८ ॥

तदनन्तर पराक्रमी वीर कुम्भकर्णकुमार निकुम्भने अत्यन्त कुपित होकर समस्त लोकोंको रुलानेवाले रावणसे कहा— ॥ १९ ॥

‘आप सब लोग यहाँ महाराजके साथ चुपचाप बैठे रहें। मैं अकेला ही राम, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान् तथा अन्य सब वानरोंको भी यहाँ मौतके घाट उतार दूँगा’॥ २० १/२ ॥

तब पर्वतके समान विशालकाय वज्रहनु नामक राक्षस कुपित हो जीभसे अपने जबड़ेको चाटता हुआ बोला— ॥ २१ १/२ ॥

‘आप सब लोग निश्चिन्त होकर इच्छानुसार अपना-अपना काम करें। मैं अकेला ही सारी वानर-सेनाको खा जाऊँगा॥ २२ १/२ ॥

‘आपलोग स्वस्थ रहकर क्रीड़ा करें और निश्चिन्त हो वारुणी मदिराको पियें। मैं अकेला ही सुग्रीव, लक्ष्मण, अंगद, हनुमान् और अन्य सब वानरोंका भी यहाँ वध कर डालूँगा’॥ २३-२४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

८ ॥

नवाँ सर्ग

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नवाँ सर्ग

विभीषणका रावणसे श्रीरामकी अजेयता बताकर सीताको लौटा देनेके लिये अनुरोध करना

तत्पश्चात् निकुम्भ, रभस, महाबली सूर्यशत्रु, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, महापार्श्व, महोदर, दुर्जय अग्निकेतु, राक्षस रश्मिकेतु, महातेजस्वी बलवान् रावणकुमार इन्द्रजित्, प्रहस्त, विरूपाक्ष, महाबली वज्रदंष्ट्र, धूम्राक्ष, अतिकाय और निशाचर दुर्मुख—ये सब राक्षस अत्यन्त कुपित हो हाथोंमें परिघ, पट्टिश, शूल, प्रास, शक्ति, फरसे, धनुष, बाण तथा पैनी धारवाले बड़े-बड़े खड्ग लिये उछलकर रावणके सामने आये और अपने तेजसे उद्दीप्त-से होकर वे सब-के-सब उससे बोले—॥ १–५ ॥

‘हमलोग आज ही राम, सुग्रीव, लक्ष्मण और उस कायर हनुमान्को भी मार डालेंगे, जिसने लङ्कापुरी जलायी है’॥ ६ ॥

हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये खड़े हुए उन सब राक्षसोंको जानेके लिये उद्यत देख विभीषणने रोका और पुनः उन्हें बिठाकर दोनों हाथ जोड़ रावणसे कहा—॥ ७ ॥

‘तात! जो मनोरथ साम, दान और भेद—इन तीन उपायोंसे प्राप्त न हो सके, उसीकी प्राप्तिके लिये नीतिशास्त्रके ज्ञाता मनीषी विद्वानोंने पराक्रम करनेके योग्य अवसर बताये हैं॥ ८ ॥

‘तात! जो शत्रु असावधान हों, जिनपर दूसरे-दूसरे शत्रुओंने आक्रमण किया हो तथा जो महारोग आदिसे ग्रस्त होनेके कारण दैवसे मारे गये हों, उन्हींपर भलीभाँति परीक्षा करके विधिपूर्वक किये गये पराक्रम सफल होते हैं॥ ९ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी बेखबर नहीं हैं। वे विजयकी इच्छासे आ रहे हैं और उनके साथ सेना भी है। उन्होंने क्रोधको सर्वथा जीत लिया है। अतः वे सर्वथा दुर्जय हैं। ऐसे अजेय वीरको तुमलोग परास्त करना चाहते हो॥ १० ॥

‘निशाचरो! नदों और नदियोंके स्वामी भयंकर महासागरको जो एक ही छलाँगमें लाँघकर यहाँतक आ पहुँचे थे, उन हनुमान्जीकी गतिको इस संसारमें कौन जान सकता है अथवा कौन उसका अनुमान लगा सकता है? शत्रुओंके पास असंख्य सेनाएँ हैं, उनमें असीम बल और

पराक्रम है; इस बातको तुमलोग अच्छी तरह जान लो। दूसरोंकी शक्तिको भुलाकर किसी तरह भी सहसा उनकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये॥ ११-१२ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजीने पहले राक्षसराज रावणका कौन-सा अपराध किया था, जिससे उन यशस्वी महात्माकी पत्नीको ये जनस्थानसे हर लाये?॥ १३ ॥

‘यदि कहें कि उन्होंने खरको मारा था तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि खर अत्याचारी था। उसने स्वयं ही उन्हें मार डालनेके लिये उनपर आक्रमण किया था। इसलिये श्रीरामने रणभूमिमें उसका वध किया; क्योंकि प्रत्येक प्राणीको यथाशक्ति अपने प्राणोंकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये॥ १४ ॥

‘यदि इसी कारणसे सीताको हरकर लाया गया हो तो उन्हें जल्दी ही लौटा देना चाहिये; अन्यथा हमलोगोंपर महान् भय आ सकता है। जिस कर्मका फल केवल कलह है, उसे करनेसे क्या लाभ?॥ १५ ॥

‘श्रीराम बड़े धर्मात्मा और पराक्रमी हैं। उनके साथ व्यर्थ वैर करना उचित नहीं है। मिथिलेशकुमारी सीताको उनके पास लौटा देना चाहिये॥ १६ ॥

‘जबतक हाथी, घोड़े और अनेकों रत्नोंसे भरी हुई लङ्कापुरीका श्रीराम अपने बाणोंद्वारा विध्वंस नहीं कर डालते, तबतक ही मैथिलीको उन्हें लौटा दिया जाय॥ १७ ॥

‘जबतक अत्यन्त भयंकर, विशाल और दुर्जय वानर-वाहिनी हमारी लङ्काको पददलित नहीं कर देती, तभीतक सीताको वापस कर दिया जाय॥ १८ ॥

‘यदि श्रीरामकी प्राणवल्लभा सीताको हमलोग स्वयं ही नहीं लौटा देते हैं तो यह लङ्कापुरी नष्ट हो जायगी और समस्त शूरवीर राक्षस मार डाले जायँगे॥ १९ ॥

‘आप मेरे बड़े भाई हैं। अतः मैं आपको विनयपूर्वक प्रसन्न करना चाहता हूँ। आप मेरी बात मान लें। मैं आपके हितके लिये सच्ची बात कहता हूँ—आप श्रीरामचन्द्रजीको उनकी सीता वापस कर दें॥ २० ॥

‘राजकुमार श्रीराम जबतक आपके वधके लिये शरत्कालके सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी, उज्ज्वल अग्रभाग एवं पंखोंसे सुशोभित, सुदृढ़ तथा अमोघ बाणोंकी वर्षा करें, उसके पहले ही आप उन दशरथनन्दनकी सेवामें मिथिलेशकुमारी सीताको सौंप दें॥ २१ ॥

‘भैया! आप क्रोधको त्याग दें; क्योंकि वह सुख और धर्मका नाश करनेवाला है। धर्मका सेवन कीजिये; क्योंकि वह सुख और सुयशको बढ़ानेवाला है। हमपर प्रसन्न होइये, जिससे हम पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित जीवित रह सकें। इसी दृष्टिसे मेरी प्रार्थना है कि आप दशरथनन्दन श्रीरामके हाथमें मिथिलेशकुमारी सीताको लौटा दें’॥ २२ ॥

विभीषणकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावण उन सब सभासदोंको विदा करके अपने महलमें चला गया॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९ ॥

दसवाँ सर्ग

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दसवाँ सर्ग

विभीषणका रावणके महलमें जाना, उसे अपशकुनोंका भय दिखाकर सीताको लौटा देनेके लिये प्रार्थना करना और रावणका उनकी बात न मानकर उन्हें वहाँसे विदा कर देना

दूसरे दिन सबेरा होते ही धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले भीमकर्मा महातेजस्वी वीर विभीषण अपने बड़े भाई राक्षसराज रावणके घर गये। वह घर अनेक प्रासादोंके कारण पर्वतशिखरोंके समूहकी भाँति शोभा पाता था। उसकी ऊँचाई भी पहाड़ की चोटीको लज्जित करती थी। उसमें अलग-अलग बड़ी-बड़ी कक्षाएँ (ड्योढ़ियाँ) सुन्दर ढंगसे बनी हुई थीं। बहुतेरे श्रेष्ठ पुरुषोंका वहाँ आना-जाना लगा रहता था। अनेकानेक बुद्धिमान् महामन्त्री, जो राजाके प्रति अनुराग रखनेवाले थे, उसमें बैठे थे। विश्वसनीय, हितैषी तथा कार्यसाधनमें कुशल बहुसंख्यक राक्षस सब ओरसे उस भवनकी रक्षा करते थे। वहाँकी वायु मतवाले हाथियोंके निःश्वाससे मिश्रित हो बवंडर-सी जान पड़ती थी। शङ्ख-ध्वनिके समान राक्षसोंका गम्भीर घोष वहाँ गूँजता रहता था। नाना प्रकारके वाद्योंके मनोरम शब्द उस भवनको निनादित करते थे। रूप और यौवनके मदसे मतवाली युवतियोंकी वहाँ भीड़-सी लगती रहती थी। वहाँके बड़े-बड़े मार्ग लोगोंके वार्तालापसे मुखरित जान पड़ते थे। उसके फाटक तपाये हुए सुवर्णके बने हुए थे। उत्तम सजावटकी वस्तुओंसे वह महल अच्छी तरह सजा हुआ था, अतएव वह गन्धर्वोंके आवास और देवताओंके निवासस्थान-सा मनोरम प्रतीत होता था। रत्नराशिसे परिपूर्ण होनेके कारण वह नागभवनके समान उद्भासित होता था। जैसे तेजसे विस्तृत किरणोंवाले सूर्य महान् मेघोंकी घटामें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी विभीषणने रावणके उस भवनमें पदार्पण किया॥ १—७ ॥

वहाँ पहुँचकर उन महातेजस्वी विभीषणने अपने भाईकी विजयके उद्देश्यसे वेदवेत्ता ब्राह्मणोंद्वारा किये गये पुण्याहवाचनके पवित्र घोष सुने॥ ८ ॥

तत्पश्चात् उन महाबली विभीषणने वेदमन्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मणोंका दर्शन किया, जिनके हाथोंमें दही और घीके पात्र थे। फूलों और अक्षतोंसे उन सबकी पूजा की गयी थी॥ ९ ॥

वहाँ जानेपर राक्षसोंने उनका स्वागत-सत्कार किया। फिर उन महाबाहु विभीषणने अपने तेजसे देदीप्यमान और सिंहासनपर विराजमान कुबेरके छोटे भाई रावणको प्रणाम किया॥ १० ॥

तदनन्तर शिष्टाचारके ज्ञाता विभीषण ‘विजयतां महाराजः’ (महाराजकी जय हो) इत्यादि रूपसे राजाके प्रति परम्पराप्राप्त शुभाशंसासूचक वचनका प्रयोग करके राजाके द्वारा दृष्टिके संकेतसे बताये गये सुवर्णभूषित सिंहासनपर बैठ गये॥ ११ ॥

विभीषण जगत्‌की भली-बुरी बातोंको अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने प्रणाम आदि व्यवहारका यथार्थरूपसे निर्वाह करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा अपने बड़े भाई महामना रावणको प्रसन्न किया और उससे एकान्तमें मन्त्रियोंके निकट देश, काल और प्रयोजनके अनुरूप, युक्तियोंद्वारा निश्चित तथा अत्यन्त हितकारक बात कही—॥ १२-१३ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! जबसे विदेहकुमारी सीता यहाँ आयी हैं, तभीसे हमलोगोंको अनेक प्रकारके अमङ्गलसूचक अपशकुन दिखायी दे रहे हैं॥ १४ ॥

‘मन्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक धधकानेपर भी आग अच्छी तरह प्रज्वलित नहीं हो रही है। उससे चिनगारियाँ निकलने लगती हैं। उसकी लपटके साथ धुआँ उठने लगता है और मन्थनकालमें जब अग्नि प्रकट होती है, उस समय भी वह धूएँसे मलिन ही रहती है॥ १५ ॥

‘रसोईघरोंमें, अग्निशालाओंमें तथा वेदाध्ययनके स्थानोंमें भी साँप देखे जाते हैं और हवन-सामग्रियोंमें चीटियाँ पड़ी दिखायी देती हैं॥ १६ ॥

‘गायोंका दूध सूख गया है, बड़े-बड़े गजराज मदरहित हो गये हैं, घोड़े नये ग्राससे आनन्दित (भोजनसे संतुष्ट) होनेपर भी दीनतापूर्ण स्वरमें हिनहिनाते हैं॥ १७ ॥

‘राजन्! गधों, ऊँटों और खच्चरोंके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनके नेत्रोंसे आँसू गिरने लगते हैं। विधिपूर्वक चिकित्सा की जानेपर भी वे पूर्णतः स्वस्थ हो नहीं पाते हैं॥ १८ ॥

‘क्रूर कौए झुंड-के-झुंड एकत्र होकर कर्कश स्वरमें काँव-काँव करने लगते हैं तथा वे सतमहले मकानोंपर समूह-के-समूह इकट्ठे हुए देखे जाते हैं॥ १९ ॥

लङ्कापुरीके ऊपर झुंड-के-झुंड गीध उसका स्पर्श करते हुए-से मड़राते रहते हैं। दोनों संध्याओंके समय सियारिनें नगरके समीप आकर अमङ्गलसूचक शब्द करती हैं॥ २० ॥

‘नगरके सभी फाटकोंपर समूह-के-समूह एकत्र हुए मांसभक्षी पशुओंके जोर-जोरसे किये जानेवाले चीत्कार बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी पड़ते हैं॥ २१ ॥

‘वीरवर! ऐसी परिस्थितिमें मुझे तो यही प्रायश्चित्त अच्छा जान पड़ता है कि विदेहकुमारी सीता श्रीरामचन्द्रजीको लौटा दी जायँ॥ २२ ॥