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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

‘मेरा पर्वतके समान विशाल शरीर है। मैं हाथमें तीखा त्रिशूल धारण करता हूँ और मेरी दाढ़ें भी बहुत तीखी हैं। मेरे सिंहनाद करनेपर इन्द्र भी भयसे थर्रा उठेंगे॥ ४४ १/२ ॥

‘अथवा यदि मैं शस्त्र त्याग करके भी वेगपूर्वक शत्रुओंको रौंदता हुआ रणभूमिमें विचरने लगूँ तो कोऽइ भी जीवित रहनेकी इच्छावाला पुरुष मेरे सामने नहीं ठहर सकता॥ ४५ १/२ ॥

‘मैं न तो शक्तिसे, न गदासे, न तलवारसे और न पैने बाणोंसे ही काम लूँगा। रोषसे भरकर केवल दोनों हाथोंसे ही वज्रधारी इन्द्र-जैसे शत्रुको भी मौतके घाट उतार दूँगा॥ ४६ १/२ ॥

‘यदि राम आज मेरी मुट्ठीका वेग सह लेंगे तो मेरे बाणसमूह अवश्य ही उनका रक्त पान करेंगे॥ ४७ १/२ ॥

‘राजन्! मेरे रहते हुए तुम किसलिये चिन्ताकी आगसे झुलस रहे हो? मैं तुम्हारे शत्रुओंका विनाश करनेके लिये अभी रणभूमिमें जानेको उद्यत हूँ॥ ४८ १/२ ॥

‘तुम्हें रामसे जो घोर भय हो रहा है, उसे त्याग दो। मैं रणभूमिमें राम, लक्ष्मण और महाबली सुग्रीवको अवश्य मार डालूँगा॥ ४९ १/२ ॥

‘युद्ध उपस्थित होनेपर मैं राक्षसोंका संहार करनेवाले उस हनुमान्‌को भी जीवित नहीं छोड़ूँगा, जिसने लङ्का जलायी थी। साथ ही अन्य वानरोंको भी खा जाऊँगा। आज मैं तुम्हें अलौकिक एवं महान् यश प्रदान करना चाहता हूँ॥ ५०-५१ ॥

‘राजन्! यदि तुम्हें इन्द्र अथवा स्वयम्भू ब्रह्मासे भी भय है तो मैं उस भयको भी उसी तरह नष्ट कर दूँगा, जैसे सूर्य रात्रिके अन्धकारको॥ ५२ ॥

‘मेरे कुपित होनेपर देवता भी धराशायी हो जायँगे। (फिर मनुष्यों और वानरोंकी तो बात ही क्या है?) मैं यमराजको भी शान्त कर दूँगा। सर्वभक्षी अग्निका भी भक्षण कर जाऊँगा॥ ५३ ॥

‘नक्षत्रोंसहित सूर्यको भी पृथ्वीपर मार गिराऊँगा, इन्द्रका भी वध कर डालूँगा और समुद्रको भी पी जाऊँगा॥ ५४ ॥

‘पर्वतोंको चूर-चूर कर दूँगा। भूमण्डलको विदीर्ण कर डालूँगा। आज मेरे द्वारा खाये जानेवाले सब प्राणी दीर्घकालतक सोकर उठे हुए मुझ कुम्भकर्णका पराक्रम देखें। यह सारी त्रिलोकी आहार बन जाय तो भी मेरा पेट नहीं भर सकता॥ ५५-५६ ॥

‘दशरथकुमार श्रीरामका वध करके मैं तुम्हें उत्तरोत्तर सुखकी प्राप्ति करानेवाले सुख-सौभाग्यको देना चाहता हूँ। लक्ष्मणसहित रामका वध करके सभी प्रधान-प्रधान वानरयूथपतियोंको खा जाऊँगा॥ ५७॥

‘राजन्! अब मौज करो, मदिरा पीओ और मानसिक दुःखको दूर करके सब कार्य करो। आज मेरे द्वारा राम यमलोक पहुँचा दिये जायँगे; फिर तो सीता चिरकाल (सदा)-के लिये तुम्हारे अधीन हो जायगी’॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६३ ॥


१. कार्यको आरम्भ करनेका उपाय, पुरुष और द्रव्यरूप सम्पत्ति, देश-कालका विभाग, विपत्तिको टालनेका उपाय और कार्यकी सिद्धि—ये पाँच प्रकारके योग हैं।
२. जब अपनी वृद्धि और शत्रुकि हानिका समय हो तब दण्डोपयोगी यान (युद्धयात्रा) उचित है। अपनी और शत्रुकि समान स्थिति हो तो सामपूर्वक संधि कर लेना उचित है। तथा जब अपनी हानि और शत्रुकि वृद्धिका समय हो, तब उसे कुछ देकर उसका आश्रय ग्रहण करना उचित होता है।
३. यहाँ यह बात कही गयी है कि शास्त्रके अनुसार प्रातःकाल धर्मका, मध्याह्नकालमें अर्थका और रात्रिमें कामसेवनका विधान है; अतः उन-उन समयोंमें धर्म आदिका सेवन करना चाहिये अथवा प्रातःकालमें धर्म और अर्थरूप द्वन्द्वका, मध्याह्नकालमें अर्थ और धर्मका और रात्रिमें काम और अर्थका सेवन करे। जो हर समय केवल कामका ही सेवन करता हे, वह पुरुषोंमें अधम कोटिका है।

चौंसठवाँ सर्ग

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चौंसठवाँ सर्ग

महोदरका कुम्भकर्णके प्रति आक्षेप करके रावणको बिना युद्धके ही अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिका उपाय बताना

अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले विशालकाय एवं बलवान् राक्षस कुम्भकर्णका यह वचन सुनकर महोदरने कहा—॥ १ ॥

‘कुम्भकर्ण! तुम उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए हो; परंतु तुम्हारी दृष्टि (बुद्धि) निम्नश्रेणीके लोगोंके समान है। तुम ढीठ और घमंडी हो, इसलिये सभी विषयोंमें क्या कर्तव्य है—इस बातको नहीं जान सकते॥ २ ॥

‘कुम्भकर्ण! हमारे महाराज नीति और अनीतिको नहीं जानते हैं, ऐसी बात नहीं है। तुम केवल अपने बचपनके कारण धृष्टतापूर्वक इस तरहकी बातें कहना चाहते हो॥ ३ ॥

‘राक्षसशिरोमणि रावण देश-कालके लिये उचित कर्तव्यको जानते हैं और अपने तथा शत्रुपक्षके स्थान, वृद्धि एवं क्षयको अच्छी तरह समझते हैं॥ ४ ॥

‘जिसने वृद्ध पुरुषोंकी उपासना या सत्संग नहीं किया है और जिसकी बुद्धि गँवारोंके समान है, ऐसा बलवान् पुरुष भी जिस कर्मको नहीं कर सकता—जिसे अनुचित समझता है, वैसे कर्मको कोर्इ बुद्धिमान् पुरुष कैसे कर सकता है ?॥ ५ ॥

‘जिन अर्थ, धर्म और कामको तुम पृथक्-पृथक् आश्रयवाले बता रहे हो, उन्हें ठीक-ठीक समझनेकी तुम्हारे भीतर शक्ति ही नहीं है॥ ६ ॥

‘सुखके साधनभूत जो त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ एवं काम) हैं, उन सबका एकमात्र कर्म ही प्रयोजक है (क्योंकि जो कर्मानुष्ठानसे रहित है, उसका धर्म, अर्थ अथवा काम—कोर्इ भी पुरुषार्थ सफल नहीं होता)। इसी तरह एक पुरुषके प्रयत्नसे सिद्ध होनेवाले सभी शुभाशुभ व्यापारोंका फल यहाँ एक ही कर्ताको प्राप्त होता है (इस प्रकार जब परस्पर विरुद्ध होनेपर भी धर्म और कामका अनुष्ठान एक ही पुरुषके द्वारा होता देखा जाता है, तब तुम्हारा यह कहना कि केवल धर्मका ही अनुष्ठान करना चाहिये, धर्मविरोधी कामका नहीं, कैसे संगत हो सकता है?)॥ ७ ॥

‘निष्कामभावसे किये गये धर्म (जप, ध्यान आदि) और अर्थ (धनसाध्य यज्ञ, दान आदि) —ये चित्तशुद्धिके द्वारा यद्यपि निःश्रेयस (मोक्ष)-रूप फलकी प्राप्ति करानेवाले हैं तथापि कामना-विशेषसे स्वर्ग एवं अभ्युदय आदि अन्य फलोंकी भी प्राप्ति कराते हैं। पूर्वोक्त जपादिरूप या क्रियामय नित्य-धर्मका लोप होनेपर अधर्म और अनर्थ प्राप्त होते हैं और उनके रहते हुए प्रत्यवायजनित फल भोगना पड़ता है (परंतु काम्य-कर्म न करनेसे प्रत्यवाय नहीं होता, यह धर्म और अर्थकी अपेक्षा कामकी विशेषता है)॥ ८ ॥

‘जीवोंको धर्म और अधर्मके फल इस लोक और परलोकमें भी भोगने पड़ते हैं। परंतु जो कामनाविशे ोषके उद्देश्यसे यत्नपूर्वक कर्मोंका अनुष्ठान करता है, उसे यहाँ भी उसके सुख-मनोरथकी प्राप्ति हो जाती है। धर्म आदिके फलकी भाँति उसके लिये कालान्तर या लोकान्तरकी अपेक्षा नहीं होती है (इस तरह काम धर्म और अर्थसे विलक्षण सिद्ध होता है)॥ ९ ॥

‘यहाँ राजाके लिये कामरूपी पुरुषार्थका सेवन उचित है ही*। ऐसा ही राक्षसराजने अपने हृदयमें निश्चित किया है और यही हम मन्त्रियोंकी भी सम्मति है। शत्रुके प्रति साहसपूर्ण कार्य करना कौन-सी अनीति है (अतः इन्होंने जो कुछ किया है, उचित ही किया है)॥ १० ॥

‘तुमने युद्धके लिये अकेले अपने ही प्रस्थान करनेके विषयमें जो हेतु दिया है (अपने महान् बलके द्वारा शत्रुको परास्त कर देनेकी जो घोषणा की है) उसमें भी जो असंगत एवं अनुचित बात कही गयी है, उसे मैं तुम्हारे सामने रखता हूँ॥ ११ ॥

‘जिन्होंने पहले जनस्थानमें बहुत-से अत्यन्त बलशाली राक्षसोंको मार डाला था, उन्हीं रघुवंशी वीर श्रीरामको तुम अकेले ही कैसे परास्त करोगे?॥ १२ ॥

‘जनस्थानमें श्रीरामने पहले जिन महान् बलशाली निशाचरोंको मार भगाया था, वे आज भी इस लङ्कापुरीमें विद्यमान हैं और उनका वह भय अबतक दूर नहीं हुआ है। क्या तुम उन राक्षसोंको नहीं देखते हो?॥ १३ ॥

‘दशरथकुमार श्रीराम अत्यन्त कुपित हुए सिंहके समान पराक्रमी एवं भयंकर हैं, क्या तुम उनसे भिड़नेका साहस करते हो? क्या जान-बूझकर सोये हुए सर्पको जगाना चाहते हो? तुम्हारी मूर्खतापर आश्चर्य होता है!॥ १४ ॥

‘श्रीराम सदा ही अपने तेजसे देदीप्यमान हैं। वे क्रोध करनेपर अत्यन्त दुर्जय और मृत्युके समान असह्य हो उठते हैं। भला कौन योद्धा उनका सामना कर सकता है?॥ १५ ॥

‘हमारी यह सारी सेना भी यदि उस अजेय शत्रु का सामना करनेके लिये खड़ी हो तो उसका जीवन भी संशयमें पड़ सकता है। अतः तात! युद्धके लिये तुम्हारा अकेले जाना मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता है॥ १६॥

‘जो सहायकोंसे सम्पन्न और प्राणोंकी बाजी लगाकर शत्रुओंका संहार करनेके लिये निश्चित विचार रखनेवाला हो, ऐसे शत्रुको अत्यन्त साधारण मानकर कौन असहाय योद्धा वशमें लानेकी इच्छा कर सकता है?॥

‘राक्षसशिरोमणे! मनुष्योंमें जिनकी समता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है तथा जो इन्द्र और सूर्यके समान तेजस्वी हैं, उन श्रीरामके साथ युद्ध करनेका हौसला तुम्हें कैसे हो रहा है?’॥ १८॥

रोषके आवेशसे युक्त कुम्भकर्णसे ऐसा कहकर महोदरने समस्त राक्षसोंके बीचमें बैठे हुए लोकोंको रुलानेवाले रावणसे कहा—॥ १९॥

‘महाराज! आप विदेहकुमारीको अपने सामने पाकर भी किसलिये विलम्ब कर रहे हैं? आप जब चाहें तभी सीता आपके वशमें हो जायगी॥ २०॥

‘राक्षसराज! मुझे एक ऐसा उपाय सूझा है, जो सीताको आपकी सेवामें उपस्थित करके ही रहेगा। आप उसे सुनिये। सुनकर अपनी बुद्धिसे उसपर विचार कीजिये और ठीक जँचे तो उसे काममें लाइये॥ २१॥

‘आप नगरमें यह घोषित करा दें कि महोदर, द्विजह्व, संह्लादी, कुम्भकर्ण और वितर्दन—ये पाँच राक्षस रामका वध करनेके लिये जा रहे हैं॥ २२॥

‘हमलोग रणभूमिमें जाकर प्रयत्नपूर्वक श्रीरामके साथ युद्ध करेंगे। यदि आपके शत्रुओंपर हम विजय पा गये तो हमारे लिये सीताको वशमें करनेके निमित्त दूसरे किसी उपायकी आवश्यकता ही नहीं रह जायगी॥ २३॥

‘यदि हमारा शत्रु अजेय होनेके कारण जीवित ही रह गया और हम भी युद्ध करते-करते मारे नहीं गये तो हम उस उपायको काममें लायेंगे, जिसे हमने मनसे सोचकर निश्चित किया है॥ २४॥

रामनामसे अङ्कित बाणोंद्वारा अपने शरीरको घायल कराकर खूनसे लथपथ हो हम यह कहते हुए युद्धभूमिसे यहाँ लौटेंगे कि हमने राम और लक्ष्मणको खा लिया है। उस समय हम

आपके पैर पकड़कर यह भी कहेंगे कि हमने शत्रुको मारा है। इसलिये आप हमारी इच्छा पूरी कीजिये॥ २५-२६ ॥

‘पृथ्वीनाथ! तब आप हाथीकी पीठपर किसीको बिठाकर सारे नगरमें यह घोषणा करा दें कि भाई और सेनाके सहित राम मारा गया॥ २७ ॥

‘शत्रुदमन! इतना ही नहीं, आप प्रसन्नता दिखाते हुए अपने वीर सेवकोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ, तरहतर हकी भोग-सामग्रियाँ, दास-दासी आदि, धन-रत्न, आभूषण, वस्त्र और अनुलेपन दिलावें। अन्य योद्धाओंको भी बहुत-से उपहार दें तथा स्वयं भी खुशी मनाते हुए मद्यपान करें॥ २८-२९ ॥

‘तदनन्तर जब लोगोंमें सब ओर यह चर्चा फैल जाय कि राम अपने सुहृदोंसहित राक्षसोंके आहार बन गये और सीताके कानोंमें भी यह बात पड़ जाय, तब आप सीताको समझानेके लिये एकान्तमें उसके वासस्थानपर जायें और तरह-तरहसे धीरज बँधाकर उसे धन-धान्य, भाँति-भाँतिके भोग और रत्न आदिका लोभ दिखावें॥

‘राजन्! इस प्रवञ्चनासे अपनेको अनाथ माननेवाली सीताका शोक और भी बढ़ जायगा और वह इच्छा न होनेपर भी आपके अधीन हो जायगी॥ ३२ ॥

‘अपने रमणीय पतिको विनष्ट हुआ जान वह निराशा तथा नारी-सुलभ चपलताके कारण आपके वशमें आ जायगी॥ ३३ ॥

‘वह पहले सुखमें पली हुई है और सुख भोगनेके योग्य है; परंतु इन दिनों दुःखसे दुर्बल हो गयी है। ऐसी दशामें अब आपके ही अधीन अपना सुख समझकर सर्वथा आपकी सेवामें आ जायगी॥ ३४ ॥

‘मेरे देखनेमें यही सबसे सुन्दर नीति है। युद्धमें तो श्रीरामका दर्शन करते ही आपको अनर्थ (मृत्यु)-की प्राप्ति हो सकती है; अतः आप युद्धस्थलमें जानेके लिये उत्सुक न हों, यहीं आपके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि हो जायगी। बिना युद्धके ही आपको सुखका महान् लाभ होगा॥ ३५ ॥

‘महाराज! जो राजा बिना युद्धके ही शत्रुपर विजय पाता है, उसकी सेना नष्ट नहीं होती। उसका जीवन भी संशयमें नहीं पड़ता, वह पवित्र एवं महान् यश पाता तथा दीर्घकालतक लक्ष्मी एवं उत्तम कीर्तिका उपभोग करता है’॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६४ ॥


* यहाँ महोदरने रावणकी चापलूसी करनेके लिये ‘कामवाद’ की स्थापना या प्रशंसा की है। यह आदर्श मत नहीं है। वास्तवमें धर्म, अर्थ और काममें धर्म ही प्रधान है; अतः उसीके सेवनसे प्राणिमात्रका कल्याण हो सकता है।

पैंसठवाँ सर्ग

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पैंसठवाँ सर्ग

कुम्भकर्णकी रणयात्रा

महोदरके ऐसा कहनेपर कुम्भकर्णने उसे डाँटा और अपने भाई राक्षसशिरोमणि रावणसे कहा— ॥ १ ॥

‘राजन्! आज मैं उस दुरात्मा रामका वध करके तुम्हारे घोर भयको दूर कर दूँगा। तुम वैरभावसे मुक्त होकर सुखी हो जाओ॥ २ ॥

‘शूरवीर जलहीन बादलके समान व्यर्थ गर्जना नहीं किया करते। तुम देखना, अब युद्धस्थलमें मैं अपने पराक्रमके द्वारा ही गर्जना करूँगा॥ ३ ॥

‘शूरवीरोंको अपने ही मुँहसे अपनी तारीफ करना सहन नहीं होता। वे वाणीके द्वारा प्रदर्शन न करके चुपचाप दुष्कर पराक्रम प्रकट करते हैं॥ ४ ॥

‘महोदर! जो भीरु, मूर्ख और झूठे ही अपनेको पण्डित माननेवाले होंगे, उन्हीं राजाओंको तुम्हारे द्वारा कही जानेवाली ये चिकनी-चुपड़ी बातें सदा अच्छी लगेंगी॥ ५ ॥

‘युद्धमें कायरता दिखानेवाले तुम-जैसे चापलूसोंने ही सदा राजाकी हाँ-में-हाँ मिलाकर सारा काम चौपट किया है॥ ६ ॥

‘अब तो लङ्कामें केवल राजा शेष रह गये हैं। खजाना खाली हो गया और सेना मार डाली गयी। इस राजाको पाकर तुमलोगोंने मित्रके रूपमें शत्रुका काम किया है॥ ७ ॥

‘यह देखो, अब मैं शत्रुको जीतनेके लिये उद्यत होकर समरभूमिमें जा रहा हूँ। तुमलोगोंने अपनी खोटी नीतिके कारण जो विषम परिस्थिति उत्पन्न कर दी है, उसका आज महासमरमें समीकरण करना है— इस विषम संकटको सर्वदाके लिये टाल देना है’॥ ८ ॥

बुद्धिमान् कुम्भकर्णने जब ऐसी वीरोचित बात कही, तब राक्षसराज रावणने हँसते हुए उत्तर दिया— ॥

‘युद्धविशारद तात! यह महोदर श्रीरामसे बहुत डर गया है, इसमें संशय नहीं है। इसीलिये यह युद्धको पसंद नहीं करता है॥ १० ॥

‘कुम्भकर्ण! मेरे आत्मीयजनोंमें सौहार्द और बलकी दृष्टिसे कोई भी तुम्हारी समानता करनेवाला नहीं है। तुम शत्रुओंका वध करने और विजय पानेके लिये युद्धभूमिमें जाओ॥ ११ ॥

‘शत्रुदमन वीर! तुम सो रहे थे। तुम्हारे द्वारा शत्रुओंका नाश करानेके लिये ही मैंने तुम्हें जगाया है। राक्षसोंकी युद्धयात्राके लिये यह सबसे उत्तम समय है॥ १२ ॥

‘तुम पाशधारी यमराजकी भाँति शूल लेकर जाओ और सूर्यके समान तेजस्वी उन दोनों राजकुमारों तथा वानरोंको मारकर खा जाओ॥ १३ ॥

‘वानर तुम्हारा रूप देखते ही भाग जायँगे तथा राम और लक्ष्मणके हृदय भी विदीर्ण हो जायँगे’॥ १४ ॥

महाबली कुम्भकर्णसे ऐसा कहकर महातेजस्वी राक्षसराज रावणने अपना पुनः नया जन्म हुआ-सा माना॥

राजा रावण कुम्भकर्णके बलको अच्छी तरह जानता था, उसके पराक्रमसे भी पूर्ण परिचित था; इसलिये वह निर्मल चन्द्रमाके समान परम आह्लादसे भर गया॥ १६ ॥

रावणके ऐसा कहनेपर महाबली कुम्भकर्ण बहुत प्रसन्न हुआ। वह राजा रावणकी बात सुनकर उस समय युद्धके लिये उद्यत हो गया और लङ्कापुरीसे बाहर निकला॥ १७ ॥

शत्रुओंका संहार करनेवाले उस वीरने बड़े वेगसे तीखा शूल हाथमें लिया, जो सब-का-सब काले लोहेका बना हुआ, चमकीला और तपाये हुए सुवर्णसे विभूषित था॥ १८ ॥

उसकी कान्ति इन्द्रके अशनिके समान थी। वह वज्रके समान भारी था तथा देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, यक्षों और नागोंका संहार करनेवाला था॥ १९ ॥

उसमें लाल फूलोंकी बहुत बड़ी माला लटक रही थी और उससे आगकी चिनगारियाँ झड़ रही थीं। शत्रुओंके रक्तसे रँगे हुए उस विशाल शूलको हाथमें लेकर महातेजस्वी कुम्भकर्ण रावणसे बोला—‘मैं अकेला ही युद्धके लिये जाऊँगा। अपनी यह सारी सेना यहीं रहे॥ २०-२१ ॥

‘आज मैं भूखा हूँ और मेरा क्रोध भी बढ़ा हुआ है। इसलिये समस्त वानरोंको भक्षण कर जाऊँगा।’ कुम्भकर्णकी यह बात सुनकर रावण बोला— ॥ २२ ॥

‘कुम्भकर्ण! तुम हाथोंमें शूल और मुद्गर धारण करनेवाले सैनिकोंसे घिरे रहकर युद्धके लिये यात्रा करो, क्योंकि महामनस्वी वानर बड़े वीर और अत्यन्त उद्योगी हैं। वे तुम्हें अकेला या असावधान देख दाँतोंसे काट-काटकर नष्ट कर डालेंगे; इसलिये सेनासे घिरकर सब ओरसे

सुरक्षित हो यहाँसे जाओ। उस दशामें तुम्हें परास्त करना शत्रुओंके लिये बहुत कठिन होगा। तुम राक्षसोंका अहित करनेवाले समस्त शत्रुदलका संहार करो'॥ २३-२४ ॥

यों कहकर महातेजस्वी रावण अपने आसनसे उठा और एक सोनेकी माला, जिसके बीच-बीचमें मणियाँ पिरोयी हुई थीं, लेकर उसने कुम्भकर्णके गलेमें पहना दी॥ २५ ॥

बाजूबंद, अँगूठियाँ, अच्छे-अच्छे आभूषण और चन्द्रमाके समान चमकीला हार—इन सबको उसने महाकाय कुम्भकर्णके अङ्गोंमें पहनाया॥ २६ ॥

उतना ही नहीं, रावणने उसके विभिन्न अङ्गोंमें दिव्य सुगन्धित फूलोंकी मालाएँ भी बँधवा दीं और दोनों कानोंमें कुण्डल पहना दिये॥ २७ ॥

सोनेके अङ्गद, केयूर और पदक आदि आभूषणोंसे भूषित तथा घड़ेके समान विशाल कानोंवाला कुम्भकर्ण घीकी उत्तम आहुति पाकर प्रज्वलित हुई अग्निके समान प्रकाशित हो उठा॥ २८ ॥

उसके कटिप्रदेशमें काले रंगकी एक विशाल करधनी थी, जिससे वह अमृतकी उत्पत्तिके लिये किये गये समुद्रमन्थनके समय नागराज वासुकिसे लिपटे हुए मन्दराचलके समान शोभा पाता था॥ २९ ॥

तदनन्तर कुम्भकर्णकी छातीमें एक सोनेका कवच बाँधा गया, जो भारी-से-भारी आघात सहन करनेमें समर्थ, अस्त्र-शस्त्रोंसे अभेद्य तथा अपनी प्रभासे विद्युत्के समान देदीप्यमान था। उसे धारण करके कुम्भकर्ण संध्याकालके लाल बादलोंसे संयुक्त गिरिराज अस्ताचलके समान सुशोभित हो रहा था॥ ३० ॥

सारे अङ्गोंमें सभी आवश्यक आभूषण धारण करके हाथोंमें शूल लिये वह राक्षस कुम्भकर्ण जब आगे बढ़ा, उस समय त्रिलोकीको नापनेके लिये तीन डग बढ़ानेको उत्साहित हुए भगवान् नारायण (वामन)-के समान जान पड़ा॥ ३१ ॥

भाईको हृदयसे लगाकर उसकी परिक्रमा करके उस महाबली वीरने उसे मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् वह युद्धके लिये चला॥ ३२ ॥

उस समय रावणने उत्तम आशीर्वाद देकर श्रेष्ठ आयुधोंसे सुसज्जित सेनाओंके साथ उसे युद्धके लिये विदा किया। यात्राके समय उसने शङ्ख और दुन्दुभि आदि बाजे भी बजवाये॥ ३३ ॥

हाथी, घोड़े और मेघोंकी गर्जनाके समान घरघराहट पैदा करनेवाले रथोंपर सवार हो अनेकानेक महामनस्वी रथी वीर रथियोंमें श्रेष्ठ कुम्भकर्णके साथ गये॥ ३४ ॥

कितने ही राक्षस साँप, ऊँट,गधे, सिंह, हाथी, मृग और पक्षियोंपर सवार हो-होकर उस भयंकर महाबली कुम्भकर्णके पीछे-पीछे गये॥ ३५ ॥

उस समय उसके ऊपर फूलोंकी वर्षा हो रही थी। सिरपर श्वेत छत्र तना हुआ था और उसने हाथमें तीखा त्रिशूल ले रखा था। इस प्रकार देवताओं और दानवोंका शत्रु तथा रक्तकी गन्धसे मतवाला कुम्भकर्ण, जो स्वाभाविक मदसे भी उन्मत्त हो रहा था, युद्धके लिये निकला॥ ३६ ॥

उसके साथ बहुत-से पैदल राक्षस भी गये, जो बड़े बलवान्, जोर-जोरसे गर्जना करनेवाले, भीषण नेत्रधारी और भयानक रूपवाले थे। उन सबके हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र थे॥ ३७ ॥

उनके नेत्र रोषसे लाल हो रहे थे। वे सभी कऽइ व्याम* ऊँचे और काले कोयलेके ढेरकी भाँति काले थे। उन्होंने अपने हाथोंमें शूल, तलवार, तीखी धारवाले फरसे, भिन्दिपाल, परिघ, गदा, मूसल, बड़े-बड़े ताड़के वृक्षोंके तने और जिन्हें कोऽइ काट न सके, ऐसी गुलेलें ले रखी थीं॥ ३८-३९ ॥

तदनन्तर महातेजस्वी महाबली कुम्भकर्णने बड़ा उग्र रूप धारण किया, जिसे देखनेपर भय मालूम होता था। ऐसा रूप धारण करके वह युद्धके लिये चल पड़ा॥ ४० ॥

उस समय वह छः सौ धनुषके बराबर विस्तृत और सौ धनुषके बराबर ऊँचा हो गया। उसकी आँखें दो गाड़ीके पहियोंके समान जान पड़ती थीं। वह विशाल पर्वतके समान भयंकर दिखायी देता था॥ ४१ ॥

पहले तो उसने राक्षस-सेनाकी व्यूह-रचना की। फिर दावानलसे दग्ध हुए पर्वतके समान महाकाय कुम्भकर्ण अपना विशाल मुख फैलाकर अट्टहास करता हुआ इस प्रकार बोला—॥ ४२ ॥

‘राक्षसो! जैसे आग पतंगोंको जलाती है, उसी प्रकार मैं भी कुपित होकर आज प्रधान-प्रधान वानरोंके एक-एक झुंडको भस्म कर डालूँगा॥ ४३ ॥

‘यों तो वनमें विचरनेवाले बेचारे वानर स्वेच्छासे मेरा कोऽइ अपराध नहीं कर रहे हैं; अतः वे वधके योग्य नहीं हैं। वानरोंकी जाति तो हम-जैसे लोगोंके नगरोद्यानका आभूषण है॥ ४४ ॥

‘वास्तवमें लङ्कापुरीपर घेरा डालनेके प्रधान कारण हैं—लक्ष्मणसहित राम। अतः सबसे पहले मैं उन्हींको युद्धमें मारूँगा। उनके मारे जानेपर सारी वानर-सेना स्वतः मरी हुई-सी हो जायगी’॥ ४५ ॥

कुम्भकर्णके ऐसा कहनेपर राक्षसोंने समुद्रको कम्पित-सा करते हुए बड़ी भयानक गर्जना की॥ ४६ ॥

बुद्धिमान् राक्षस कुम्भकर्णके रणभूमिकी ओर पैर बढ़ाते ही चारों ओर घोर अपशकुन होने लगे॥ ४७ ॥

गदहोंके समान भूरे रंगवाले बादल घिर आये। साथ ही उल्कापात हुआ और बिजलियाँ गिरीं। समुद्र और वनोंसहित सारी पृथ्वी काँपने लगी॥ ४८ ॥

भयानक गीदड़ियाँ मुँहसे आग उगलती हुई अमङ्गलसूचक बोली बोलने लगीं। पक्षी मण्डल बाँधकर उसकी दक्षिणावर्त परिक्रमा करने लगे॥ ४९ ॥

रास्तेमें चलते समय कुम्भकर्णके शूलपर गीध आ बैठा। उसकी बायीं आँख फड़कने लगी और बायीं भुजा कम्पित होने लगी॥ ५० ॥

फिर उसी समय जलती हुई उल्का भयंकर आवाजके साथ गिरी। सूर्यकी प्रभा क्षीण हो गयी और हवा इतने वेगसे चल रही थी कि सुखद नहीं जान पड़ती थी॥

इस प्रकार रोंगटे खड़े कर देनेवाले बहुत-से बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हुए; किंतु उनकी कुछ भी परवा न करके कालकी शक्तिसे प्रेरित हुआ कुम्भकर्ण युद्धके लिये निकल पड़ा॥ ५२ ॥

वह पर्वतके समान ऊँचा था। उसने लङ्काकी चहारदीवारीको दोनों पैरोंसे लाँघकर देखा कि वानरोंकी अद्भुत सेना मेघोंकी घनीभूत घटाके समान छा रही है॥ ५३ ॥

उस पर्वताकार श्रेष्ठ राक्षसको देखते ही समस्त वानर हवासे उड़ाये गये बादलोंके समान तत्काल सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग चले॥ ५४ ॥

छिन्न-भिन्न हुए बादलोंके समूहकी भाँति उस अतिशय प्रचण्ड वानर-वाहिनीको सम्पूर्ण दिशाओंमें भागती देख मेघोंके समान काला कुम्भकर्ण बड़े हर्षके साथ सजल जलधरके सदृश गम्भीर स्वरमें बारंबार गर्जना करने लगा॥ ५५ ॥

आकाशमें जैसी मेघोंकी गर्जना होती है, उसीके समान उस राक्षसका घोर सिंहनाद सुनकर बहुत-से वानर जड़से कटे हुए सालवृक्षोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ५६ ॥

महाकाय कुम्भकर्णने शूलकी ही भाँति अपने एक हाथमें विशाल परिघ भी ले रखा था। वह वानर-समूहोंको अत्यन्त घोर भय प्रदान करता हुआ प्रलय-कालमें संहारके साधनभूत कालदण्डोंसे युक्त भगवान् कालरुद्रके समान शत्रुओंका विनाश करनेके लिये पुरीसे बाहर निकला॥ ५७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६५ ॥


* लंबाईका एक नाप। दोनों भुजाओंको दोनों ओर फैलानेपर एक हाथकी उँगलियोंके सिरेसे दूसरे हाथकी उँगलियोंके सिरेतक जितनी दूरी होती है, उसे ‘व्याम’ कहते हैं।

छाछठवाँ सर्ग

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छाछठवाँ सर्ग

कुम्भकर्णके भयसे भागे हुए वानरोंका अङ्गदद्वारा प्रोत्साहन और आवाहन, कुम्भकर्णद्वारा वानरोंका संहार, पुनः वानर-सेनाका पलायन और अङ्गदका उसे समझा-बुझाकर लौटाना

महाबली कुम्भकर्ण पर्वत-शिखरके समान ऊँचा और विशालकाय था। वह परकोटा लाँघकर बड़ी तेजीके साथ नगरसे बाहर निकला॥ १ ॥

बाहर आकर पर्वतोंको कँपाता और समुद्रको गुँजाता हुआ-सा वह उच्चस्वरसे गम्भीर नाद करने लगा। उसकी वह गर्जना बिजलीकी कड़कको भी मात कर रही थी॥

इन्द्र, यम अथवा वरुणके द्वारा भी उसका वध होना असम्भव था। उस भयानक नेत्रवाले निशाचरको आते देख सभी वानर भाग खड़े हुए॥ ३ ॥

उन सबको भागते देख राजकुमार अङ्गदने नल, नील, गवाक्ष और महाबली कुमुदको सम्बोधित करके कहा— ॥ ४ ॥

'वानर वीरो! अपने उत्तम कुलों और उन अलौकिक पराक्रमोंको भुलाकर साधारण बंदरोंकी भाँति भयभीत हो तुम कहाँ भागे जा रहे हो?॥ ५ ॥

'सौम्य स्वभाववाले बहादुरो! अच्छा होगा कि तुम लौट आओ। क्यों जान बचानेके फेरमें पड़े हो? यह राक्षस हमारे साथ युद्ध करनेकी शक्ति नहीं रखता। यह तो इसकी बड़ी भारी विभीषिका है— इसने मायासे विशाल रूप धारण करके तुम्हें डरानेके लिये व्यर्थ घटाटोप फैला रखा है॥ ६ ॥

'अपने सामने उठी हुई राक्षसोंकी इस बड़ी भारी विभीषिकाको हम अपने पराक्रमसे नष्ट कर देंगे। अतः वानरवीरो! लौट आओ'॥ ७ ॥

तब वानरोंने बड़ी कठिनाईसे धैर्य धारण किया और जहाँ-तहाँसे एकत्र हो हाथोंमें वृक्ष लेकर वे रणभूमिकी ओर चले॥ ८ ॥

लौटनेपर वे महाबली वानर मतवाले हाथियोंकी भाँति अत्यन्त क्रोध और रोषसे भर गये और कुम्भकर्णके ऊपर ऊँचे-ऊँचे पर्वतीय-शिखरों, शिलाओं तथा खिले हुए वृक्षोंसे प्रहार करने लगे। उनकी मार खाकर भी कुम्भकर्ण विचलित नहीं होता था॥ ९-१० ॥

उसके अङ्गोंपर गिरी हुई बहुतेरी शिलाएँ चूरचूर हो जाती थीं और वे खिले हुए वृक्ष भी उसके शरीरसे टकराते ही टूक-टूक होकर पृथ्वीपर गिर पड़ते थे॥ ११ ॥

उधर क्रोधसे भरा हुआ कुम्भकर्ण भी अत्यन्त सावधान हो महाबली वानरोंकी सेनाओंको उसी प्रकार रौंदने लगा, जैसे बढ़ा हुआ दावानल बड़े-बड़े जंगलोंको जलाकर भस्म कर देता है॥ १२ ॥

बहुत-से श्रेष्ठ वानर खूनसे लथपथ हो धरतीपर सो गये। जिन्हें उठाकर उसने ऊपर फेंक दिया, वे लाल फूलोंसे लदे हुए वृक्षोंकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े॥ १३ ॥

वानर ऊँची-नीची भूमिको लाँघते हुए जोर-जोरसे भागने लगे। वे आगे-पीछे और अगल-बगलमें कहीं भी दृष्टि नहीं डालते थे। कोई समुद्रमें गिर पड़े और कोई आकाशमें ही उड़ते रह गये॥ १४ ॥

उस राक्षसने खेल-खेलमें ही जिन्हें मारा, वे वीर वानर जिस मार्गसे समुद्र पार करके लङ्कामें आये थे, उसी मार्गसे भागने लगे॥ १५ ॥

भयके मारे वानरोंके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी। वे नीची जगह देख-देखकर भागने और छिपने लगे। कितने ही रीछ वृक्षोंपर जा चढ़े और कितनोंने पर्वतोंकी शरण ली॥ १६ ॥

कितने ही वानर और भालू समुद्रमें डूब गये। कितनोंने पर्वतोंकी गुफाओंका आश्रय लिया। कोई गिरे, कोई एक स्थानपर खड़े न रह सके, इसलिये भागे। कुछ धराशायी हो गये और कोई-कोई मुर्दोंके समान साँस रोककर पड़ गये॥ १७ ॥

उन वानरोंको भागते देख अङ्गदने इस प्रकार कहा— ‘वानरवीरो! ठहरो, लौट आओ। हम सब मिलकर युद्ध करेंगे॥ १८ ॥

‘यदि तुम भाग गये तो सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके भी कहीं तुम्हें ठहरनेके लिये स्थान मिल सके, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता (सुग्रीवकी आज्ञाके बिना कहीं भी जानेपर तुम जीवित नहीं बच सकोगे)। इसलिये सब लोग लौट आओ। क्यों अपने ही प्राण बचानेकी फिक्रमें पड़े हो?॥ १९ ॥

‘तुम्हारे वेग और पराक्रमको कोई रोकनेवाला नहीं है। यदि तुम हथियार डालकर भाग जाओगे तो तुम्हारी स्त्रियाँ ही तुमलोगोंका उपहास करेंगी और वह उपहास जीवित रहनेपर भी तुम्हारे लिये मृत्युके समान दुःखदायी होगा॥ २० ॥

‘तुम सब लोग महान् और बहुत दूरतक फैले हुए श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुए हो। फिर साधारण वानरोंकी भाँति भयभीत होकर कहाँ भागे जा रहे हो ? यदि तुम पराक्रम छोड़कर भयके कारण भागते हो तो निश्चय ही अनार्य समझे जाओगे॥ २१ ॥

‘तुम जन-समुदायमें बैठकर जो डींग हाँका करते थे कि हम बड़े प्रचण्ड वीर हैं और स्वामीके हितैषी हैं, तुम्हारी वे सब बातें आज कहाँ चली गयीं?॥ २२ ॥

‘जो सत्पुरुषोंद्वारा धिक्कृत होकर भी जीवन धारण करता है, उसके उस जीवनको धिक्कार है, इस तरहके निन्दात्मक वचन कायरोंको सदा सुनने पड़ते हैं। इसलिये तुमलोग भय छोड़ो और सत्पुरुषोंद्वारा सेवित मार्गका आश्रय लो॥ २३ ॥

‘यदि हमलोग अल्पजीवी हों और शत्रुके द्वारा मारे जाकर रणभूमिमें सो जायँ तो हमें उस ब्रह्मलोककी प्राप्ति होगी, जो कुयोगियोंके लिये परम दुर्लभ है॥ २४ ॥

‘वानरो! यदि युद्धमें हमने शत्रुको मार गिराया तो हमें उत्तम कीर्ति मिलेगी और यदि स्वयं ही मारे गये तो हम वीरलोकके वैभवका उपभोग करेंगे॥ २५ ॥

‘श्रीरघुनाथजीके सामने जानेपर कुम्भकर्ण जीवित नहीं लौट सकेगा; ठीक उसी तरह, जैसे प्रज्वलित अग्निके पास पहुँचकर पतङ्ग भस्म हुए बिना नहीं रह सकता॥ २६ ॥

‘यदि हमलोग प्रख्यात वीर होकर भी भागकर अपने प्राण बचायेंगे और अधिक संख्यामें होकर भी एक योद्धाका सामना नहीं कर सकेंगे तो हमारा यश मिट्टीमें मिल जायगा’॥ २७ ॥

सोनेका बाजूबंद धारण करनेवाले शूरवीर अङ्गद जब ऐसा कह रहे थे, उस समय उन भागते हुए वानरोंने उन्हें ऐसा उत्तर दिया, जिसकी शौर्य-सम्पन्न योद्धा सदा निन्दा करते हैं॥ २८ ॥

वे बोले—‘राक्षस कुम्भकर्णने हमारा घोर संहार मचा रखा है; अतः यह ठहरनेका समय नहीं है। हम जा रहे हैं; क्योंकि हमें अपनी जान प्यारी है’॥ २९ ॥

इतनी बात कहकर भयानक नेत्रवाले भीषण कुम्भकर्णको आते देख उन सब वानर-यूथपतियोंने विभिन्न दिशाओंकी शरण ली॥ ३० ॥

तब उन भागते हुए सभी वीर वानरोंको अङ्गदने सान्त्वना और आदर-सम्मानके द्वारा लौटाया॥ ३१ ॥

बुद्धिमान् वालिपुत्रने उन सबको प्रसन्न कर लिया। वे सब वानरयूथपति सुग्रीवकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करते हुए खड़े हो गये॥ ३२ ॥

तदनन्तर ऋषभ, शरभ, मैन्द, धूम्र, नील, कुमुद, सुषेण, गवाक्ष, रम्भ, तार, द्विविद, पनस और वायुपुत्र हनुमान् आदि श्रेष्ठ वानर-वीर तुरंत ही कुम्भकर्णका सामना करनेके लिये रणक्षेत्रकी ओर बढ़े॥ ३३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६६ ॥

सरसठवाँ सर्ग

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सरसठवाँ सर्ग

कुम्भकर्णका भयंकर युद्ध और श्रीरामके हाथसे उसका वध

अङ्गदके पूर्वोक्त वचन सुनकर वे सब विशालकाय वानर मरने-मारनेका निश्चय करके युद्धकी इच्छासे लौटे थे॥ १ ॥

महाबली अङ्गदने उनके पूर्व-पराक्रमोंका वर्णन करके अपने वचनोंद्वारा उन्हें सुदृढ़ एवं बल-विक्रमसम्पन्न बनाकर खड़ा कर दिया था॥ २ ॥

अब वे वानर मरनेका निश्चय करके बड़े हर्षके साथ आगे बढ़े और जीवनका मोह छोड़कर अत्यन्त भयंकर युद्ध करने लगे॥ ३ ॥

उन विशालकाय वानर-वीरोंने वृक्ष तथा बड़े-बड़े पर्वत-शिखर लेकर तुरंत ही कुम्भकर्णपर धावा किया॥

परंतु अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए विक्रमशाली महाकाय कुम्भकर्णने गदा उठाकर शत्रुओंको घायल करके उन्हें चारों ओर बिखेर दिया॥ ५ ॥

कुम्भकर्णकी मार खाकर आठ हजार सात सौ वानर तत्काल धराशायी हो गये॥ ६ ॥

वह सोलह, आठ, दस, बीस और तीस-तीस वानरोंको अपनी दोनों भुजाओंसे समेट लेता और जैसे गरुड़ सर्पोंको खाता है, उसी प्रकार अत्यन्त क्रोधपूर्वक उनका भक्षण करता हुआ सब ओर दौड़ता-फिरता था॥ ७ ॥

उस समय वानर बड़ी कठिनाईसे धैर्य धारण करके इधर-उधरसे एकत्र हुए और वृक्ष तथा पर्वतशिखर हाथमें लेकर संग्रामभूमिमें डटे रहे॥ ८ ॥

तत्पश्चात् मेघके समान विशाल शरीरवाले वानरशिरोमणि द्विविदने एक पर्वत उखाड़कर पर्वतशिखरके समान ऊँचे कुम्भकर्णपर आक्रमण किया॥ ९ ॥

उस पर्वतको उखाड़कर द्विविदने कुम्भकर्णके ऊपर फेंका; किंतु वह उस विशालकाय राक्षसतक न पहुँचकर उसकी सेनामें जा गिरा॥ १० ॥

उस पर्वत-शिखरने राक्षससेनाके कितने ही घोड़ों, हाथियों, रथों, गजराजों तथा दूसरे-दूसरे राक्षसोंको भी कुचल डाला॥ ११ ॥

उस समय वह महान् युद्धस्थल, जिसमें शैल-शिखरके वेगसे कितने ही घोड़े और सारथि कुचल गये थे, राक्षसोंके रुधिरसे गीला हो गया॥ १२ ॥

तब भयानक सिंहनाद करनेवाले राक्षस-सेनाके रथियोंने प्रलयकालीन यमराजके समान भयंकर बाणोंसे गर्जते हुए वानरयूथपतियोंके मस्तकोंको सहसा काटना आरम्भ किया॥ १३ ॥

महामनस्वी वानर भी बड़े-बड़े वृक्ष उखाड़कर शत्रुसेनाके रथ, घोड़े, हाथी, ऊँट और राक्षसोंका संहार करने लगे॥ १४ ॥

हनुमान्जी आकाशमें पहुँचकर कुम्भकर्णके मस्तकपर पर्वत-शिखरों, शिलाओं और नाना प्रकारके वृक्षोंकी वर्षा करने लगे॥ १५ ॥

परंतु महाबली कुम्भकर्णने अपने शूलसे उन पर्वतशिखरोंको फोड़ डाला और बरसाये जानेवाले वृक्षोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥ १६ ॥

तत्पश्चात् उसने अपने तीक्ष्ण शूलको हाथमें लेकर वानरोंकी उस भयंकर सेनापर आक्रमण किया। यह देख हनुमान्जी एक पर्वत-शिखर हाथमें लेकर उस आक्रमणकारी राक्षसका सामना करनेके लिये खड़े हो गये॥ १७ ॥

उन्होंने कुपित हो श्रेष्ठ पर्वतके समान भयानक शरीरवाले कुम्भकर्णपर बड़े वेगसे प्रहार किया। उनकी उस मारसे कुम्भकर्ण व्याकुल हो उठा। उसका सारा शरीर चर्बीसे गीला हो गया और वह रक्तसे नहा गया॥

फिर तो उसने भी बिजलीके समान चमकते हुए शूलको घुमाकर जिसके शिखरपर आग जल रही हो, उस पर्वतके समान हनुमान्जीकी छातीमें उसी तरह मारा, जैसे स्वामी कार्तिकेयने अपनी भयानक शक्तिसे क्रौञ्चपर्वतपर आघात किया था॥ १९ ॥

उस महासमरमें शूलकी चोटसे हनुमान्जीकी दोनों भुजाओंके बीचका भाग (वक्षःस्थल) विदीर्ण हो गया। वे व्याकुल हो गये और मुँहसे रक्त वमन करने लगे। उस समय पीड़ाके मारे उन्होंने बड़ा भयंकर आर्तनाद किया, जो प्रलयकालके मेघोंकी गर्जनाके समान जान पड़ता था॥ २० ॥

हनुमान्जीको आघातसे पीड़ित देख राक्षसोंके हर्षकी सीमा न रही। वे सहसा जोर-जोरसे कोलाहल करने लगे। इधर कुम्भकर्णके भयसे पीड़ित एवं व्यथित हुए वानर युद्धभूमि छोड़कर भागने लगे॥ २१ ॥

यह देख बलवान् नीलने वानरसेनाको धैर्य बँधाने एवं सुस्थिर रखनेके लिये बुद्धिमान् कुम्भकर्णपर एक पर्वतका शिखर चलाया॥ २२ ॥

उस पर्वत शिखरको अपने ऊपर आता देख कुम्भकर्णने उसपर मुक्केसे आघात किया। उसका मुक्का लगते ही वह शिखर चूर-चूर होकर बिखर गया और आगकी चिनगारियाँ तथा लपटें निकालता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २३ ॥

इसके बाद ऋषभ, शरभ, नील, गवाक्ष और गन्धमादन—इन पाँच प्रमुख वानरवीरोंने कुम्भकर्णपर धावा किया॥ २४ ॥

वे महाबली वीर चारों ओरसे घेरकर युद्धस्थलमें महाकाय कुम्भकर्णको पर्वतों, वृक्षों, थप्पड़ों, लातों और मुक्कोंसे मारने लगे॥ २५ ॥

यद्यपि ये लोग बड़े जोर-जोरसे प्रहार करते थे, तथापि उसे ऐसा जान पड़ता था मानो कोई धीरेसे छू रहा हो। अतः इनकी मारसे उसे तनिक भी पीड़ा नहीं हुई। उसने महान् वेगशाली ऋषभको अपनी दोनों भुजाओंमें भर लिया॥ २६ ॥

कुम्भकर्णकी दोनों भुजाओंसे दबकर पीड़ित हुए भयंकर वानरशिरोमणि ऋषभके मुँहसे खून निकलने लगा और वे पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २७ ॥

तदनन्तर उस समरभूमिमें इन्द्रद्रोही कुम्भकर्णने शरभको मुक्केसे मारकर नीलको घुटनेसे रगड़ दिया और गवाक्षको थप्पड़से मारा। फिर क्रोधसे भरकर उसने गन्धमादनको बड़े वेगसे लात मारी॥ २८ ॥

उसके प्रहारसे व्यथित हुए वानर मूर्च्छित हो गये और रक्तसे नहा उठे। फिर कटे हुए पलाश-वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २९ ॥

उन महामनस्वी प्रमुख वानरोंके धराशायी हो जानेपर हजारों वानर एक साथ कुम्भकर्णपर टूट पड़े॥

पर्वतके समान प्रतीत होनेवाले वे समस्त महाबली वानर-यूथपति उस पर्वताकार राक्षसके ऊपर चढ़ गये और उछल-उछलकर उसे दाँतोंसे काटने लगे॥ ३१ ॥

वे वानरशिरोमणि नखों, दाँतों, मुक्कों और हाथोंसे महाबाहु कुम्भकर्णको मारने लगे॥ ३२ ॥