BharatKosha
Back to the archive

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

किस्सा सुनाकर कहा कि-महाराज ! तुम धर्मात्मा हो इसवास्ते

Page 90Permalink

( ८८ ) सिंहासनबत्तीसी.

यह कहकर मुर्दा लेकर दोनों किनारेपर आये. राजाको तमाम किस्सा सुनाकर कहा कि-महाराज ! तुम धर्मात्मा हो इसवास्ते धर्म विचारके हमारा न्याय करो. योगी बोला-महाराज ! मैं कहताहूं सो आप ध्यान लगाकर सुनिये इस बैतालने बहुत मुर्दे खाये और यह मुर्दा मैंने अपने दांवपर पाया है और यह नाहक मुझसे तक रार करता है ! और कहता है कि-मैं तुझे न दूंगा. मैं इससे बिनती करके माँगता हूं और कहता हूं कि- गोया यह प्रसाद मैंने तुझसे पाया. यह नहीं मानता. तब राजाने बैतालको पूंछा कि- तू अपने भी मुझसे बात कह ? बह बोला-महाराज ! यह योगी बडा मूर्ख है, जो इसने मुझसे राहमें झगडा लगाया. मैं हजार कोशसे इस मुदको ले आयाहूं और यह मुझसे मांग रहा है. मैं इसे क्यों कर दूंगा ? इस मुर्देके लिये मैंने बहुत कष्ट किया. यह नाहक देखके मन चलाता है. मैं क्या कहूं कि, जो जो मैंने इसके वास्ते दुःख उठाया है और आहारके समयमें इस दुष्टने आन सताया. और इसका न्याय तेरे हाथ है; क्योंकि तू धर्मात्मा राजा है. जो तू कहेगा सो मुझे प्रमाण है. तब राजा कहने लगा कि-तुम दोनोंही बड़े हो इस वास्ते यह प्रसाद हमें दो कुछ तुमसे हम मांगते हैं. तब तुम्हारा न्याय हम चुकावेंगे. यह सुन योगीने हँसकर झोलीमेंसे एक गट्ठा निकाल राजाके हाथ देकर कहा-राजा ! तुझे जिनता

तेरहवीं पुतली १३. (८९)

Page 91Permalink

तेरहवीं पुतली १३. (८९)

द्रव्य अभीष्ट होगा उतना यह बटुआ देगा, और इसमेंसे कभी कम न होगा, पुनि बैतालने कहा-राजा ! मैं एक मोहनी तिलक तुझे देताहूं इसे जब तू घिसकर टीका देगा, तब सब तुझे दबेंगे तेरे सामने कोई न होगा. ये दोनोंने प्रसाद राजाको दिया. उसने करओटकर लिया और बोला कि-सुन बैताल ! तू इस मुर्देको छोडदे और मेरे घोडेको खा, यह मुर्दा योगीके हवाले करदे; क्योंकि तू भूखा न रहे और उसका कामभी बंद न होय यह सुनतेही बैताल उस घोड़ेको खागया और योगी मुर्दा ले अपना मंत्र साधने लगा. राजा वीरोंको बुलाय उनपर सवार हो अपने देशको चला. रास्तेमें एक भिकारी सन्मुख चला आताथा, उसने देखा कि, शकबँधी राजा आता है, डरते डरते उसने सवाल किया कि-महाराज ! आपके नगरमें मैं बहुत दिन रहा लेकिन कुछभी अर्थ मेरा सिद्ध न हुवा. अब मैं कुछ तुमसे माँगता हूँ, मेरे तईं दीजिये. यह सुनतेही राजाने वह बटुआ उसके हाथ दिया और उसका भेद बताया. वह अशीस दे अपने घरको गया और राजाभी अपने मंदिरमें आया. इतनी बात कह त्रिलोचनी. पुतली बोली-सुन राजा भोज ! ऐसा दानी और ऐसा साहसी जो होगा सोही इस सिंहासनपर बैठे; नहीं तो पातक है. उसके दूसरे दिनराजा सबेर उठ स्नान ध्यानकर दरबारमें आन बैठा. और दीवान मुत्सद्दियोंको बुलाकर कहा-

चौदहवीं पुतली-

Page 92Permalink

( ९० ) सिंहासनबत्तीसी. कि-आज मेरा चित्त बहुत प्रसन्न है. जल्दी चलकर सिंहासन- पर बैठूंगा. इतनी बात कह वहांसे उठ सिंहासनके पास आ- कर गोदान कर ब्राह्मणको वृत्ति कर दी. फिर गणेशको मना सिंहासनपर बैठनेको पाव बढ़ाया इतनेमें त्रिलोचना नामक-

चौदहवीं पुतली-

बोली-हे राजा भोज ! पहिले कथा सुन जो मैं कहतीहूं पीछे सिंहासनपर बैठ. यह बात राजाने सुनतेही पांव खैंच लिया. और सिंहासनके नीचे आसन बिछाया बैठगया. तब पुतली बोली कि-राजा ! सुन एक- दिन राजा बीर विक्रमादित्यने अपने प्रधानको बु- लाकर कहा कि-मैं यज्ञ करूंगा जिसमें पुण्य हो और आगेका निस्तार होवे. दीवानने सुनते ही देशदेशको नौता भेजा जहां तलक राजा प्रजा थे उन्हें बुलाया. कर्नाटक, गुज- रात, काश्मीर, कन्नोज, तिलंगान इन नगरोंको भी नौता भेज जितने ब्राह्मण थे उन्हें बुलाया और सातों द्वीपोंको नौता भेजा वहांके राजाओंको तलब किया. फिर एक बीराको पाता- लके राजाके पास नौता 'भेज उसे बुलाया और दूसरे बीराको

चौदहवीं पुतली १४. (९१)

Page 93Permalink

चौदहवीं पुतली १४. (९१) स्वर्गको रवाना कर देवताओंको नौता भेज बुलाया और एक ब्राह्मणको बुलाकर कहा कि-तुम समुद्रके पास जाकर हमारा दंडवत कहो और निवेदन करो कि-राजा विक्रमादित्यने यज्ञका आरंभ किया है और आपको बहुत नम्रता कर बुलाया है. वह ब्राह्मण तुरंत वहाँसे चला और कितनेएक दिनोंमें साग- रके तीरपर जा पहुँचा और वहां देखता तौ क्या है कि, न कोई मनुष्य है और न कोई वहां पशु पक्षी है. केवल जलही जल नजर आता है. तब उस ब्राह्मण अपने जीमें चिंता कर कहने लगा कि-राजाका संदेश किससे कहूं? यहा तो कोई जीव दिखाई नहीं देता उधर है तो जलही जल है. ऐसा अपने मनमें विचारकर वह पुकारा कि-राजा वीरविक्रमादित्यका नौता मैं दिये आता हूँ और तुम जल्दी पहुँचना. इतना कह वहांसे वह जब चला तब प्रत्यक्ष एक बूढ़े ब्राह्मणके रूप समुद्र नजर आया. और उसने पूछा कि-बीर विक्रमादित्यने हमें किसवास्ते बुलाया है? तब उसने कहा कि-राजाके यहां यज्ञ है ! और तुम्हें जरूर बुलाया है तब समुद्र बोला कि-मैं चलूंगा पर मेरे चलनेसे पानी जो यहांसे बढ़ेगा तौ कई नगर डूब जावेंगे इसलिये मेरी तरफसे तुम राजाको विनती कर कहना कि, मेरे न आनेका कुछ पछताव न करना. मैं इस सबबसे पहुँच नहीं सक्ता. तब समुद्रने ब्राह्मणको पाँच लाल दिये और एक घोडा राजाको सौंप दिया, और आप वहीं रहा- तब ब्राह्मण सब-

तुम लो. मैने तुम्हें दिया है यह कहकर त्रिलोचना पुतलीने

Page 94Permalink

( ९२ ) सिंहासनबत्तीसी. सत हो राजाके पास गया. वे पांच रत्न राजाको दिया और घोडा अपने खडा कियाँ फिर सब वहांका वृत्तांत कहा. तब राजाने प्रसन्न हो ब्राह्मणसे कहा कि-यह लाल और घोडा तुम लो. मैने तुम्हें दिया है यह कहकर त्रिलोचना पुतलीने राजा भोजको समझाया कि, सुन राजा भोज ! ऐसा पदार्थ राजा विक्रमने देते विलंब न किया. वे लाल और घोडा कई राजाओंकी कीमतके थे ऐसे दानी राजाके आसनपर बैठनेके योग्य तू नहीं॥ पंडित तू है पर माया तुझसे छूटती नहीं. वह दिनभी योंही गुजर गया, दूसरे रोज राजा फिर सिंहासनपर बैठनेको तैयार हो गया. तब अनूपवती- पंद्रहवीं पुतली १५- कहने लगी-सुन राजा भोज ! राजा वीर विक्रमादि- त्यके गुण कहनेमें नहीं आसकते जो बात कहने योग्य होवे तो कहिये. अयुक्त कहतेहुए जी शक खाता है. राजा बोला-तू कह. मेरा जी सुननेको चाहता है जैसी बात हुई है वैसी कह इसमें तुझे दोष नहीं तब अनूपवती बोली, अच्छा अब मैं कहती हूँ वह तुम कान देकर सुनिये. एक दिन राजा विक्रमादित्य सभामें बैठा था. और कहींसे पंडित आया. उसने आक-

पंद्रहवीं पुतली १५. ( ९३ )

Page 95Permalink

पंद्रहवीं पुतली १५. ( ९३ ) राजाके सम्मुख एक श्लोक पढा वह सुनकर राजा मनमें बहुत प्रसन्न हुवा, इस श्लोकका मुद्दा यह था कि, मित्रद्रोही और विश्वासघातकी जो हैं सो नरक भोग करेंगे, जबतलक चंद्र और सूर्य हैं. यह सुनकर लाख रुपये राजाने उस ब्राह्मणको दान दिये और कहा कि-इसका अर्थ मुझे समझाकर कहो कि, क्या वृत्तांत है इसका ? तब वह ब्राह्मण कहने लगा कि—एक राजा बड़ा अज्ञानी था-उसकी रानी जो प्राणकी आधार थी, पलपरभी राजा उसे आपसे जुदा न करता था. जब सभामें बैठता था तब साथही जांघपर ले बैठता था. और जब शिकारको जाता था तब दूसरे घोडेपर बिठा साथ ले लेता. गरज जागना, सोना, खाना, पीना,एकही साथ था. पर ऐसा मूर्ख था कि, किसीसे लजाता न था. रानीको दृष्टिमें रखता था. एक दिन उसके प्रधा- नने अवसर पाकर हाथ जोड़ और शिर नवा कहने लगा कि-स्वामी ! जो मुझे जीव दान दें तो मैं एक बात कहू तब राजा बोला-अच्छा. वह बोला कि-महाराज ! रानीके संग आप शोभा नहीं पाते. राजकुलकी आन और मर्याद रहती नहीं आपको देश देशके राजा हँसते हैं, और कहते हैं कि- ऐसी सुंदरी राजाके मनमें बसी है कि, पलक ओटभी नहीं करता. एक मेरी बात मानिये. जो आपको वह बहुत प्यारी है तो एक चित्रपट लिखवाइये और अपने पास रखिये. इसमें लोक निंदा न करेंगे. यह बात प्रधानकी राजाके मनमें भाई

Page 96Permalink

( ९४ ) सिंहासनबत्तीसी. और कहा-अच्छा चित्रकारको बुलाकर चित्र लिखावो. मंत्रीने उसको बुला भेजा. वह तुर्त आकर हाजिर हुआ और वह कैसा था कि ज्योतिषविद्यामें अति निपुण था. और चित्रकारी विद्यामें भी पंडित था. उसे राजाने कहा कि-रानीकी मूर्त्तिका पट लिख दे जो मैं अपनी नजरमें हमेशा रक्खूं सुन- कर इस शारदापुत्रने मस्तक झुकाके कहा-महाराज ! अच्छा. मैं लिख लाताहू. राजासे रुखसत हो अपने घरको आया. और लिखना आरंभ किया. सो ऐसा कि जानें अभी इंद्रलोकसे अप्सरा उतरी है और उस रानीका जैसा अंग जहां था तैसाही उसने अपनी विद्याके जोरसे लिखा. जब वह तसबीर तैयार हुई तब लेकर राजाके पास गया. और राजाने देखकर बहुत पसंद किया. अंग अंग उसने निरख देखा नखसे शिख तलक गोया सांचेकी ढाली हुईथी. राजाकी दृष्टि देखते देखते दाहनी जांघपर जा पड़ी तो वहां एक तिल देखा तब बहुतसा अपने जीमें घबराया और कहने लगा कि-इसने रानीकी जांघका तिल क्योंकर देखा ? हो न हो रानीसे इसकी मुलाकात है. इस तरह अपने मनमें विचार क्रोधकर दीवानसे कहा कि-इस चित्रकारको तुरत बुलाओ उसने सुन- तेही उसे बुला भेजा. जाना कि, राजा खुश हुआ है. सो कुछ इनाम देगा. जब वह आनकर राजाके सन्मुख हुआ तब बधि- कको बुलाकर हुकुम किया कि इसकी गर्दन मारके आँखें

पंद्रहवीं पुतली १५. (९५)

Page 97Permalink

पंद्रहवीं पुतली १५. (९५) निकालके मेरेपास ले आओ जब वह उसे मारने चला तब दीवानभी बिदा हो पीछे हो लिया बाहर निकल जल्लादसे कहा कि-तू इसे मुझे दे और आंखें हरनकी निकालका राजाके पास लेजा. जल्लादने प्रधानका कहना किया. और दीवान राजाकी तरफसे बहुत बेइतिबार हुआ कि, ऐसा मूर्ख राजा हमने नहीं देखा, न सुना. गुणवंत पुरुषोंको यों जीता मारे. कदाचित् गुणवान् पुरुषसे कुछ तकसीर हो जाय तो उससे देशसे निकाल देते हैं. यह राजाओंका चलन हमेशासे है. पर कोई राजाओंकी बातपर न भूले मुहमें तो उनके अमृत रहता है और पेटमें बिषभरे हुए हैं. जो कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं. इस तरह दीवानने अपने जीमें बिचारकर डरते डरते उसे छिपा रक्खा और जल्लाद हिरनकी आंखें निकाल राजाके पास लेगया कि महाराज ! उसको मारकर आंखें निकालकर आपके पास लाया हूं. राजाने हुक्म किया कि, इन आंखोंको संडासमें लेजाकर डालदो, इस तरह वह साअत तो यों टलगई. फिर कितनेएक दिनोंके बाद उस राजाका बेटा एकदिन अकेला शिकारको गया जाते जाते एक महाबनमें जा निकला, एक शेर वहां नजर आया. बाघको देख वह राजपुत्र बहुत घबराया तब घोडा वहीं छोड़ एक वृक्षपर चढ़ गया. उसके ऊपर जो देखे तो एक रींछ बैठा है. रींछको देखतेही उसके हाथ पांव फूलगये और कांपने लगा, चाहे कि, बेहाल होकर गिरें. इतनेमें वह रींछ बोला

Page 98Permalink

( ९६ ) सिंहासनबत्तीसी. कि-ऐ कुँवर ! तू अपने मनमें भय मत कर. मैं तुझे नहीं खाऊंगा; क्योंकि, तू मेरे शरण आया है और मैंने तुझे जीवदान दिया है. अब तू निःसंदेश होकर आनंदसे यहां बैठ. यह बात रींछसे सुन उसके जीमें जी आया. इसमें दिन बीतगया और रात होगई तब रींछ बोला—राजपुत्र ! अब तो रात होगई यह नाहर शत्रु हम दोनोंको बैठा है इस वक्त सोना जीका जियान है. बेहतर यह है कि, दो दो पहर रात हम आपसमें जागें. आधी २ रात जागना. आधीरात तू जाग और आधी रात मैं जागूं राजपुत्रने कहा-बहुत अच्छा. रींछने कहा-पहले दोपहर रातको तू सोरह. मैं अब जागताहूं और पिछले दो याम निशाको तू जागियो, मैं सो रहूंगा. आपसमें इस तरह दोनोंने करार किया. और राजपुत्र सोरहा वह रींछ बैठा और चौकी देने लगा. इतनेमे शेरने रींछसे कहा कि-तू मेरी बात सुन और अज्ञानी मत हो. यह मनुष्य तो अपना भक्ष्य है तू क्यों विषका बीज बोता है? इसे नीचे डालदे हम दोनों इसे खाजाँय. यह आदमी है और हम तुम दोनों बनबासी हैं. हाथका माणिक गिरके हाथ फिर नहीं आता. जब यह जाग उठेगा और तू सोवेगा तो वह तेरा शिर काटकर फेंक देवेगा. अब यही बेह- तर है कि, मेरा कहना कर. फिर यह अवसर न पावेगा और आखिरको तू पछतावेगा रींछने जवाब दिया कि-सुन अज्ञानी बाघ ? अपने ऊपर अपराध लेना उचित नहीं ? जितना होता है

पंद्रहवीं पुतली १५. (९७)

Page 99Permalink

पंद्रहवीं पुतली १५. (९७) पाप राजाके मारने और वृक्षके काटने, गुरुसे झूठ बोलने और- वन जलाने और विश्वासघात करनेसे, इतनाही होताहै. शरणा- गताको मारने इन सबका पाप महापाप है. और यह पाप किसी तरहसे छूटता नहीं. इसने मेरी शरण ली है. क्या हुआ जो एक जी मैने न खाया ? तब बाघ खफा होकर बोला, कि-तूनेमेरा कहा तो न माना इस वास्ते मैभी तुझे जीता न जाने दूंगा. इतनेमें रींछकी बारी तो होगई और राजपुत्र जागया रींछ सोया. वह चौकी देने लगा. इससेभी बाघने वही बात की कि- भाई ! जो मैं कहूं सो तू सुन. भूलकरभी तू इससे मत पतिया सोकर सुबहको जब उठेगा तब अलसाकर तुझे खा जायगा. यह मुझसे कह चुका है कि, सोकर उठूं तो मैं इसे खाजाऊं. इससे यह भला है कि तू पहलेही इस रींछको गिरा दे. जो मैं इसे खाजाऊ और अपनी राहालूं तूंभी सहीह सलामत अपने घरको जा. उसके प्रबोध देनेसे यह बातोंमें आ गया और उस डह- नीको पकड़ ऐसा हिलाया कि जिससे वह रींछ तले गिरपड़े इससे उसकी आँख खुल गई और टहनीसे लिपट कर रह गया. और इससे कहा कि-अय पापी ! जो तूने मुझसे सलूक किया उससे मैंने तेरी जान रक्खी और तू मतिहीन मेरे मारनेको तयार हुआ. अब जो मैं तुझे मार कर खाजाऊं तो तू क्या करेगा ? यह बाते रींछकी सुनतेही इसकी जान सूख गई. और ७

Page 100Permalink

( ९८ ) सिंहासनबचीसी.

अपने दिलमे जाना कि, अब यह मुझे मुकर्रर खायगा. इतनेमें सबेरा होगया. बाघ उठकर वहांसे चला गया. रींछने उसके कानो- में मूत दिया और कहा-तुझे जीते तो क्या मारूं ? क्योंकि, अब यहां तेरा कोई बचानेवाला नहीं है. इससे असमर्थ जानकर मैं तुझे छोड देताहूं. यह कहकर रींछ तो चला गया और वह गूँगा बहरा हो बहुत घबरा और व्याकुल हो घरमें आया. राजा उसकी दशा देख अपने जीमें चिंता करने लगा. महलोंमें यह खबर हुई तो रानियां कूक मार मार रोने लगी. और कहने लगी कि-भगवान्ने यह क्या अयुक्त किया. कोई कहने लगी कि-किसीने इसे छला है तिससे इसकी यह हालत हो गई है. तब राजाने सोचकर दीवानसे कहा कि-जितने गुणी लोग हैं मंत्र- यंत्र जाननेवाले अपने नगरमें उन सबको बुलाकर कुँवरको दिखलाओ. प्रधानने आदमियोंको भेज सब सयानोंको बुलाया और उनसे कहा-जिससे इसे आराम होय ऐसा काम किया चाहिये. तब वे अपने २ मंत्र यंत्र करने लगे. जिस कदर कि उन्होने उसका उतार किया परंतु कुछभी फायदा न हुआ. तब हारकर उनसबोंने जवाब दिया कि, हमारी विद्या यहां कुछ काम नहीं करती. जब मंत्रीने यह देखा कि-उन्होंके गुणोंसे उसे कुछ आराम न हुवा, तब राजासे हाथ जोड़ विनती किया कि-महाराज ! मेरे पुत्रकी बहू जो है सो बड़े गुणवती है. इस

और उस योगीने मंत्र, यंत्र तंत्र, विद्या सब उसे सिखादी है !

Page 101Permalink

वास्ते आप आज्ञा कीजिये तो मै उसके तईं ले आऊं और वह कुँवरको देखे भगवान् चाहे तो आराम हो जायगा. इसके सिवाय और कुछ यत्न नहीं. राजाने कहा-तेरे बेटकी स्त्री क्या जाने ? तब फिर दीवानने कहा-महाराज ! वह एक योगीकी चेली है, और उस योगीने मंत्र, यंत्र तंत्र, विद्या सब उसे सिखादी है ! राजाने आज्ञा दी और दीवान सवार हो अपने घरको चला गया और वहां चित्रकारको बुला सब अवस्था वहांकी कही और कहा कि-मै इस तरहसे राजाको बचन देकर आयाहूं. तुम स्त्रीका भेष बनाकर मेरे संग चलो. तंग उसने कबूल किया. और स्त्रीका भेष बन साथ हो लिया. दोनों सवार होकर राजाके पाय आये लोग महलमें उसे परदा करके लेगये. दरमि- यान एक कनात खैंचला. और उस तरफ कनातके उसे बैठाया. राजा और लडका और दीवान ये तीनें कनातके बाहर बैठे और उसने कनातके अंदरसे कहा कि-कुवरको स्नान करावा कपडे बदलवा चौका दिलवा एक पठढा बिछवाकर बिठाओ और कुँवरको कहो कि, तुम सावधान होकर बैठो और जोन मै मंत्र कहूं सो तू कान देकर सुन. बिभीषण बडा शूर बीर था और दगा करके रामचंद्ररे जा मिला. उन्होंने रावणका राज सब खराब किया, और अपने कुलका नाश किया. उस लाजसे एक वर्षतक सिर न उठाया. और अपने कियेका फल पाया.

Page 102Permalink

( १०० ) सिंहासनबत्तीसी.

कि सब कुल गँवाया. और भस्मासुने महादेवजी तपस्या कर बर पाया और उन्हींसेही विश्वासघात किया कि, पार्वतीजीको लेनेकी इच्छा की और उसकाभी फल उसने तुर्त पाया कि, क्षणभरमे आपही जलमे भस्म होगया. और कुँवर ? तु मित्र द्रोही और विश्वासघाती क्यों हुआ है ? सोएहुए रीछको तूने नीचे ढकेल दिया ! उसने तो तेरेपर उपकार किया था और तूने उसका बुरा बिचारा. पर उसमें तेरा दोष कुछ नहीं है, तेरे पिताका दोष है; इसवास्ते कि, जैसा बीज होवेगा वैसाही फल होवेगा. यह तुमने अपने पिताके पापसे दुःख पाया. इतनी बात सुनतेही कुँवर सचेत हो बोल उठा. तब राजा बोला-अय सुंदरी ! तू सच कह कि तूने वह बनका जानावर क्योंकर पहॅचाना ? यह उसे सुनकर उसने जवाब दिया कि- राजा! मैं अपनी पूर्व अवस्था तेरे आगे प्रकट करतीहु सो चित्त लगाय सुनो जब मै अपने गुरूके पास पढ़ने जातीथी तब गुरूका अति सेवा करतीथी. गुरूने प्रसन्न होकर एक मंत्र मुझे बताया. वह मंत्र मैने साधा, तबसे सरस्वती मेरे मनमें बसी है. और जैसे मैने रानीकी जांघका तिल पहँचाना वैसेही बनके रिंछकोभी जाना. यह सुनतेही राजा प्रसन्न हो पदरा दरमियानसे दूरकर दिया और कहा कि-तू सच्चा शारद- पुत्र है, तेरे गुणको मैने अब जाना. यह कह राजाने आधा राज उसे दिया और अपना मंत्री किया. इतनी बात कह

सोरहवीं पुतली १६. ( १०१ )

Page 103Permalink

सोरहवीं पुतली १६. ( १०१ ) वह ब्राह्मण बोला कि-राजा वीरविक्रमादित्य ! यह इस श्लोकका अर्थ है. यह कथा उस ब्राह्मणके मुंहसे सुनकर राजा वीर विक्रमादित्यने उसे हजार गांव वृत्ति कर दिया. यह बात कहकर पुतली बोली कि-सुन राजा भोज ! तुझमें इतना गुण कहां है ? और अब इस नगरमें विक्रमादित्यके समान राजा होना मुश्किल है. मैंने तुझसे यह सच बात कही. और तू इस सिंहासनके योग्य नहीं. ऐसा सुन उस दिनकीभी साअत जाती रही. राजा महलमें दाखिल हुआ और अपने प्रधान और पुरोहितको बुलाके वह हालत कही. दूसरे दिन सुबहको उठ स्नान पूजा कर ध्यान लगा सिंहासनके पास जाकर खड़ा हुआ और प्रधानको बुलाकर कहा कि-अब मेरा जी चाहता है कि, सिंहासनपर आज बैठूं. बेहतर है कि, दुघड़ी अच्छा मुहूर्त इस वक्त मुझे देख दो. तब दिवानने कहा-महाराज ! आप तो बैठियेगा पर पुतलियां आपके आगे रोरो मरेंगी. राजा उठकर खड़ा रहा तब सुन्दरवती-- सोलहवीं पुतली-- बोल उठी-सुन राजा भोज ! मैं तुझसे विचार कर कथाका अहवाल कहती हूं. उज्जैन नगरीमें छत्तीस कौम और चार जाति बसती थीं. एक वहांकाही नगरसेठ जिसके यहां अति धन था

Page 104Permalink

(१०२) सिंहासनबत्तीसी.

और बड़ा प्रतापी था नगरके लोगोंको व्यौहार करनेके लिये बहुत माया देता लेताथा. जो कोई उसके पास अपना स्वार्थ. विचार कर जाताथा वह खाली फिरकर नहीं आताथा. उसका बेटा रत्नसेन नाम बहुत सुंदर था, और अति विद्यावान् माता पिताकी आज्ञामें निशिदिन रहता. उस सेठके मनमें आया कि, कहीं अच्छी सुन्दरी कन्या ठहरा उसकी शादी कर दें. ऐसा ठहराय ब्राह्मणोंको बुला देश देश भेजा और कह दिया कि, जहां कहीं अच्छी लडकी ठहरे वहांका टीका लेके तुम आओगे तो बहुत कुछ धन तुम्हें दूंगा. और कुछ रुपये खर्चको दे बिदा किया. ब्राह्मण देश देश ढूढ़ने लगे. उनमेंसे एक ब्राह्मणने समाचार पाया कि-समुद्रके पार एक सेठ है और उसकी बेटी बहुत सुंदर है उसेभी वरकी तलाश है. यह सुनकर एक जहाजपर बैठ समुद्रके पार हुआ. वहां जा सेठका ठिकाना पूँछकर उसके द्वारपर ठहरा. और खबर दी कि, उज्जैन नगरीसे एक ब्राह्मण वहांके सेठका आया है. यह खबर सुन उस सेठने उसको बुलाया और दंडवत् कर आसन दे बिठाया. ब्राह्मण आशीष देकर बैठा. सेठने पूंछा-किस कार्यके लिये तुम आये हो ? सो कहो ? ब्राह्मणने कहा-हमारे सेठने अपने लड़केकी शादीके लिये भेजा है, और कह दिया है कि, जहां कन्या अच्छी कुलीनकी ठहरे वहांका टीका ले हमारे पास

सोलहवीं पुतली १६. ( १०३ )

Page 105Permalink

सोलहवीं पुतली १६. ( १०३ )

पहुँचो. सेठ यह सुनकर बोला-मेरीभी यही इच्छा थी कि, पुत्रीका ब्याह मैं कहाँ करूंगा ? पर भगवानने घर बैठेही संयोग कर दिया. फिर कहा कि-कुछ दिन तुम यहां आराम करो, मैं अपना पुरोहित तुम्हारे साथ कर दूंगा. वह लड़केको देख टीका जाकर देगा और तुमभी इस लड़कीको देखलो. और वहां जाकर उस सेठसे कहो कि, अपनी आँखों देख आयाहूं. वह ब्राह्मण कितनेक दिनोंतक वहां रहा और उस कन्याको अपनी आंखोंसे देख सेठके ब्राह्मणको साथ ले उज्जैन नगरीको फिर चला तब उस सेठने अपने पुरोहितसे कह दिया कि, टीका दे ब्याहकी तैयारी जल्दी कर आना. ये दोनों वहांसे चल जहाजपर चढ़ कितनेक दिनोंमें उज्जैन नगरीमें आन पहुँचे. ब्राह्मणने सेठको खबर दी कि, मैं कन्या ठहरा आयाहूं. सेठने दूसरे दिन उस ब्राह्मणको बुलाया और लड़केको अपने पास बैठा दिखलाया. ब्राह्मणने देख उसे तिलक कर दिया. और हाथ जोड़ अपने सेठकी तरफसे बिनती कर कहा कि-आप जल्दीसे बरात लेकर आइये. हम जाकर वहां तैयारी करते हैं. ऐसा ठहराकर फिर रुखसत हो वह ब्राह्मण अपने मुल्कको गया. वहां जा सेठसे यहाँका सब समाचार कहा. सेठ यह खबर सुनकर ब्याहका सामान तैयार करने लगा. और इधर यह सेठ ब्याहकी तैयारी करने लगा. कारखानेमें नौबत बजने लगी, और मंगलाचार होने लगा.

Page 106Permalink

( १०४ ) सिंहासनबत्तीसी.

तरह तरहकी तैयारियां कीं. जितने कुटुंबके लोग थे उन्होंको नये नये जोड़े पहिना अपने साथ ले जानेको तैयार हो रहा. नाच राग रंग खुशीसे होने लगे. इस तरह तमाम शहरकी जियाफत करते करते बरातकी तैयारी होरही. ब्याहका दिन नजदीक पहुँचा, अजबस कि जाना दूरका था फिक्र करने लगा कि अरसा थोड़ा रहा है. समुद्रपार इतने दिनोंमें हम क्योंकर जा सकेंगे ? यह बात सुनकर इसके सब भाई बंधु अंदेशा करने लगे और खुशी तमाम शादीकी भूलगये. इसमें एक शख्सने आकर उस सेठसे कहा कि-इस कन्याका प्रारब्ध होगा तो इस लग्नमें विवाह होगा. और मैं एक यत्न बताताहूं तुम इसकी फिक्र मत करों. भगवान् चाहे तो बनजाय. तब उसने हाथ जोडकर कहा कि-भाई ! यातो भगवानके हाथ हमारी लज्जा या तेरे हाथ जिससे हमारा काम बने सो कह ? वह कहने लगा-कई एक महीने हुए हैं कि-एक बढ़ई उडनखटोला बनाकर राजाके पास ले आयाथा और वह कहताथा कि; इस खटोलेका यह स्वभाव है कि, इसपर बैठकर जहां तुम्हारी इच्छा हो वहां जाओ, यह पहुँचावेगा. राजाने सुनकर उसको दो लाख रुपये दिये, और खटोला ले लिया. वह अब राजाके घरमें होवेगा इसवास्ते तुम राजाके पास जाओ और सब हालत राजासे कहो तो राजा वह खटोला देगा और तुम्हारा सब काम सिद्ध होजायगा.

Page 107Permalink

यह सुनतेही वहखुशी होकर राजद्वारपर गया और द्वार- पालसे कहा कि-मेरी खबर महाराजसे जाहिर कर दो. तब दरवानोंने जाकर दीवानसे अर्ज की की, नगरसेठ द्वारेपर हाजिर है. आपकी आज्ञा हो तो राजाके दर्शनको आवें. दिवा- नने कहा कि—बुलाओ. दरवान आकार उस सेठको अंदर लेगया. उसने वहां जाकर दीवानको दंडवत् की और बिनति कर कहने लगा कि—महाराज ! आपके दर्शनको मैं आया हूँ और अपना बडा जरुरका कामभी है. यह सुनकर दीवानने कहा कि—राजा महलमें है. सेठ यह सुन अति उदास होगया और कहा कि— मेरा बडा कार्य है सो कि, लडकेकी शादी है और जाना तो समुद्रके पार है और चारदीन बीचमें बाकी हैं, इसमे जो न पहुँच सकें तो मेरे कुलकी हंसी और बडी हागी होगी. बनियेसे यह बात सुनकर दीवानने राजासे जाकर सब हकीकत जाहिर की तब राजाने आज्ञा दी कि, वह उडनखटोला इसे लेजाकर दो और जो कुछ वह कहेगा वैसीही सब तयारी करदो. जो किसी तरह उनके काममें विघ्न न आवे. तब प्रधानने खटोला मँगवा बनियको देदिया और कहा कि-जो कुछ सामान तुम्हें दर- कार हो सो कहो महाराजका यह हुक्म हुवा है कि, उसको जो कुछ चाहिये होय सो दे दो. तब सेठने कहा कि-महाराजकी दयारो सब कुछ है पर मेरी यही जरुर थी और आपकि

Page 108Permalink

[Page-header: ( १०६ ) सिंहासनबत्तीसी.]

कृपासे सब काम सिध्द होगया है. महाजन खटोला लिये अपने घरको आया. और ब्राह्मणको बुलाकर साथ लिया लडका और आप उसपर बैठ समुद्रपार चला. एक अरसेमें वहां जाकर पहुँचा. वहां जाकर देखे तो मंगलाचार सारे नगरमें हो रहा है और सब लोग राह देखरहे हैं. जब लोगोंने देखा तो हाथों हाथ ले गये. जाकर एक हवेलीमें उतारा और अपने सेठको खबर दी कि, तुम्हारा संबंधी बरात लेकर आन पहुचा है. वह सेठभी वहांसे उसकी मुलाकातको आप आया और इन तीन आदमियोंको देखकर अपने जीमें बहुत पछताया. और पूंछा कि- क्या सबब है जो तुम इस तरहसे आयेहो ? तब सब अवस्था अपनी सुनाई. सुनतेही उस सेठने अपने गुमास्तेसे कहा कि- कल ब्याह है और आज बरातकी तैयारी सब तुम जल्दी करदो कि जिसमें शहरके लोग न हँसें. उन्होंने सब तैयारी बात कहतेही करदी. दुसरे दिन बरात लेकर वह सेठ व्याहने गया और बेटेका ब्याह किया. उस सेठने हाथी घोडे जोडे पालकी मियाने जडाऊ गहने और बहुतसा कुछ दान दहेज दिया. इसने वहांसे सब लेकर जहाजमें रखकर जहाज रवाना कर दिया और आप खटोलापर सवार हो अपने शहरमें आया. और नयेसिरमें शादी रचाई. ब्राह्मणोंको बहुत कुछ दान दिया और कुछ जबाहिर पोशाक और बाजे तुहफा और तहायफ

सोलहवीं पुतली १६. ( १०७ )

Page 109Permalink

सोलहवीं पुतली १६. ( १०७ ) थालोंमें रख और चार घोड़े खासे लेकर राजाके नगरको चला और वहांसे खटोला जो लेगया था, वहभी फेर देन जब द्वारेपर पहुंचा तब द्वारपालसे कहा-कि, महाराजको मेरी खबर दो. तब द्वारपालोंने राजाको जाकर कहा. राजाने खबर सुन उसे बुला लिया और जो कुछ वह लेगयाथा जाकर उसने राजाकी भेंट किया. और कहा-महाराज ! आपके पुण्यप्रतापसे सब काम अच्छा हुवा. अब इस दासकी भेंट आपको कबूल करनी चाहिये. तब राजा सुन हँसकर बोला कि, मेरा यह स्वभाव है कि, दी हुई चीज मैं फेर नहीं लेता ! यह खलोटा मैने तुझको दिया. और जो कुछ तू तुहफे-लाया है यह सब तुहफे और लाख रुपये अपने खजानेसे मँगवाया और कहा कि, ये हमने तेरे बेटेको दिये. इस वास्ते कि, इसकी शादी हुई है गरज ये सब कुछ इनायत करके मानदै उसे रुखसत किया. वह प्रसन्न हो अपने घरको आया. इतनी बात कह वह पुतली बोली-सुन राजा भोज ! राजा बीरविक्रमादित्यकी बराबरी इंद्रभी नहीं कर सकता था. और तुम तो किस गिनतीमें हो ? जो तूने अपना मन बढ़ाया है. इससे तू बाज आ. इन बातोंमें वहभी दिन गुजर गया. तब राजा महलमें दाखिल हुआ. रात जिस तिस तरह गुजरगई. फिर जब सुबह होगई तब राजा सिंहासनपर बैठनेका इरादा करके वहां आगया. तब सत्यवती