श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
by भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य)
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विरुद्ध प्रतीत होता है किन्तु निर्गुणश्रुति का तात्पर्य है कि ब्रह्म में कोई प्राकृत गुण नहीं है सगुण श्रुति में सत्यसंकल्प सत्यकाम आदि उन अलौकिक गुणों का उल्लेख है जो कि एकमात्र परमात्मा में ही है, जीव या जड़ में कदापि संभव नहीं है। श्रुतियों में कहीं-कहीं ऐसा भी उल्लेख है कि ब्रह्म में कोई अवगुण नहीं हैं अपितु अनेक कल्याण गुण हैं। श्रुतियों के उल्लेख निर्विकार आदि शब्द जगत के आदि कारण रूप ब्रह्म के ज्ञापक हैं “जीव ब्रह्म भिन्न है” जीव ब्रह्म एक है 'ब्रह्म निर्गुण है” ब्रह्म सगुण है "इत्यादि वाक्यों का संदर्भानुसार अलग-अलग अभिप्राय है। जहाँ एकता की बात है वहाँ जीव ब्रह्म और जीव प्रकृति में भेद है ये प्रकृति और जीव, ब्रह्म के शरीर से भिन्न कुछ और नहीं है इस कथन में वदतोव्याघात नहीं होता। यही विशिष्टाद्वैत का अभिप्राय है। इस मत के समर्थन में आचार्य रामानुज ने अनेक प्रकार से विचार किया है जो कि संक्षेप में इस प्रकार है । आचार्य के मत में ब्रह्म जिज्ञासा का वही अधिकारी है जिसे कर्म और कर्मफल की अनित्यता का यथोचित ज्ञान हो चुका हो । उसे प्रथम शास्त्र चिन्तन करना होगा तभी उसे कर्मफल की अनित्यता का परिज्ञान हो सकेगा तभी उसे उससे मुक्त होने की अभिलाषा होगी तथा स्थिर फलावाप्ति की इच्छा के फल- स्वरूप ब्रह्म की जिज्ञासा होगी। अविद्या की निवृत्ति ही वास्तविक प्रयोजन है। उपासना द्वारा ब्रह्म साक्षात्कार हो जाने पर ही अज्ञान से छुटकारा संभव है । मुक्त जीव ईश्वर के दास के रूप में ईश्वर की नित्यलीला में अपार आनन्द का उपभोग करता है । ध्यान और उपासना ही मुक्ति के साधन हैं, ज्ञान मुक्ति का साधन नहीं है. ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान से अविद्या की निवृत्ति नहीं हो सकती क्योंकि जब बन्धन पारमार्थिक है तब इस प्रकार के ज्ञान से उसकी निवृत्ति कैसे संभव है। वेदन, ध्यान' उपासना आदि शब्द भक्ति के ही सूचक हैं । भक्ति, साधन और फल दो प्रकार की है । जिज्ञास्य ब्रह्म, सगुण और सविशेष हैं उसकी शक्ति माया है । वह अशेष कल्याणकारी गुणों के आलय हैं उनमें हेयता नहीं है । सर्वेश्वरत्व सर्वेशितृत्व सर्वफलप्रदत्व, सर्वाधारत्व, सर्वकार्योत्पादकत्व, समस्तद्रव्य शरीरत्व आदि उनके लक्षण है । चिदचिच्छरीरत्व उनका मुख्य लक्षण है । समस्तचिदचिद् विशेष रूप में वे जगत के उपादान कारण हैं, संकल्प विशिष्ट रूप में निमित्त कारण हैं। भगवान नारायण, सृष्टिकर्त्ता, कर्मफलदाता, नियन्ता और सर्वान्तर्यामी है । पर, व्यूह, विभव अन्तर्यामी और अर्चावतार भेद से वे पाँच प्रकार के
हैं। शंख चक्र गदा पद्मधारी चतुर्भुज, किरीटादि दिव्य आभूषणों से सुज्जित वे श्री, भू, लीला देवी सहित विराजते हैं। मत्स्य, कूर्म, सिंह, वराह, परशुराम श्रीराम, बलभद्र, श्रीकृष्ण, और कल्कि उनके मुख्य अवतार हैं। इनमें भी मुख्य, गौण, पूर्ण, अंश आदि अनेक भेद हैं। भगवदवतार कर्म प्रयोजन से नहीं हो स्वेच्छा से होते हैं। दुष्कृतों का विनाश और साधुओं का परित्राण ही अवतार सबंधिनी इच्छा है। जीव, ब्रह्म के ही समान चेतन है और ब्रह्म का शरीर है, किन्तु ब्रह्म विभु हैं जीव अणु है। ब्रह्म जीव में सजातीय विजातीय भेद नहीं हैं अपितु स्वगत भेद है। ब्रह्म पूर्ण है, जीव खण्डित है, ब्रह्म ईश्वर है, जीव दास है। मुक्त जीव भी ईश्वर का दास है। जीव कार्य है, ईश्वर कारण है, दोनों ही स्वयं प्रकाश, चेतन ज्ञानाश्रय और आत्मस्वरूप हैं। जीव देहेन्द्रिय मन प्राणादि से भिन्न है। जीव नित्य है उसका स्वरूप भी नित्य है। जीव प्रत्येक शरीर में भिन्न है,। स्वाभाविक रूप में सुखी है कि तु उपाधिवश उसे संसार भोग प्राप्त होते हैं। भगवान के दासत्व की प्राप्ति ही जीव की मुक्ति है बैकुण्ठ में श्री, भू लीला सहित नारायण की सेवा करना ही परमपुरुषार्थ है। प्राकृत देह विच्युत हो जाने पर अप्राकृत देह से नारायण के समान भोग प्राप्त करना ही मुक्ति है। ब्रह्म के साथ अभिन्नता प्राप्त करना कदापि संभव नहीं है, क्योंकि जीव स्वरूपतः नित्य, नित्यदास, नित्य अणु है। मुक्त जीव में आठों गुणों का आविर्भाव होता है। भगवान नारायण भूमा हैं उनके श्री चरणों में आत्म-समर्पण करने से ही जीव को वास्तविक शान्ति मिल सकती है। सर्वस्व निवेदन करने से ही प्रभु की कृपा प्राप्त हो सकती है तभी वे जीव का वरण करते हैं (अपनाते हैं) प्रभु के अनुकूल, आचरण करने का संकल्प, प्रतिकूल आचरण का वर्जन तथा सब विधियों का त्याग कर उनकी शरण होना ही समर्पण संन्यास या प्रपत्ति है। ऐसी प्रपत्ति या न्यासविद्या से भगवदावाप्ति होती है। इस समय इस संप्रदाय में बड़गल और तिङ्गल दो मत दृष्टिगत होते हैं जो कि— . वैष्णवों में विवाद रूप से प्रचलित हैं। दोनों ही अपने को प्रथम का हो का दावा करते हे और उस पक्ष में अपने प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, किन्तु गने दृष्टि से विचार करने पर और आचार्य चरण के सिद्धान्त का मनन भीर करने पर दोनों ही विचारधाराओ की प्राचीनता सिद्ध हो जाती है, ankurnagpal108@gmail.com
७ आचार्य चरण ने प्रपत्ति भक्ति की महत्ता के साथ पूर्व मीमांसा को भी जब उत्तर मीमांसा का ही अंग माना है तब कर्मकाण्ड की महत्ता भी तो उनको स्वीकृत थी, अतः दोनों ही धारायें प्राचीन हैं यह तो कालान्तर में तिलक धारण आदि कुछ परिवर्त्तनों के साथ दोनों ने अपने को पृथक् करके विवाद प्रारम्भ कर दिया है। सही बात तो यह है कि वैष्णव संप्रदायों की नींव तो रागात्मिका भक्ति ही है उसी पर इनके प्रासाद खड़े हैं, आचार्य श्री रामानुज के प्रथम जितने भी आलवार सन्त हुए वे सभी गाढानुरागी थे आचार्य चरण उनसे पूर्णतः प्रभावित थे। कुमारिल आदि मीमांसकों के मत जब प्रबल हुए तो कर्मकाण्ड की अर्हता भक्तों को स्वीकारनी पड़ी। पंद्रहवीं सोलहवीं शताब्दी में पूरे भारत में सभी वैष्णव संप्रदायों में पुनः उनकी असली प्रकृति उभड़ी और वे सारे के सारे प्रभु चरणों की गाढानुरक्ति में निमग्न हो गए अतः कर्मकाण्ड में शिथिलता आना स्वाभाविक ही था। भक्तिमार्ग तो समन्वयात्मक है उसमें सभी का निर्वाह सदा से होता रहा है इसलिए भगवान ने स्वयं ही श्रीमद्भागवत में उद्धव को उपदेश देते हुए भक्ति मार्ग के इस वैशिष्ट्य का स्पष्ट उल्लेख किया है—“न निर्विण्णः नाऽतिसक्तः भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः” अर्थात् भक्ति योग उसी को लाभदायी होता है जो कि न तो एकदम ही कर्म का त्याग कर देता है और न एकदम ही कर्म में आसक्त हो जाता है। इस भगवदाज्ञा को मानकर पारस्परिक मतभेद को त्यागकर मित्रतापूर्वक प्रभु कृपा प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए, यही भक्ति मार्ग की शोभा है विशिष्टाद्वैत तो माया को भी भगवान का ही अंग मानता है, तभी तो वह वास्तविक अद्वैत वादी होने का दावा करता है इसमें भेद भाव का अवसर ही नहीं है। आचार्य चरण ने अपने सिद्धान्त और उपासना की पुष्टि के लिए लगभग पचास ग्रन्थों की रचना की है जो कि इस प्रकार हैं— (१) श्री भाष्य (२) विशिष्टाद्वैत भाष्य (३) वेदान्त संग्रह (४) वेदान्त सार (५) वेदान्त दीप · ६) वेदान्त तत्त्वसार (७) वेदार्थ संग्रह (८) गीताभाष्य (६) श्वेताश्वतरोपनिषद् भाष्य (१०) मुण्डकोपनिषद् भाष्य (११) प्रश्नोपनिषद् भाष्य (१२) ईशोपनिषद् भाष्य (१३) विष्णु सहस्रनाम भाष्य (१४) न्यास परि शुद्धि (१५) न्याय सिद्धाञ्जन (१६) पाञ्चरात्र रक्षा (१७) योग सूत्र भाष्य (१८) मणि दर्पण (१६) रत्न प्रदीप (२०) न्याय रत्नमाला (२१) गुण रत्नकोष (२२) मति मानुष (२३) देवता पारम्य (२) चक्रोल्लास (२५) कूट संदोह (२६) वार्त्ता माला (२७) शत दूषणी (२८) गद्य त्रय (२६) शरणागति गद्य (३०) ankurnagpal108@gmail.com
वैकुण्ठ गद्य (३१) विष्णु विग्रह (३२) संशन स्तोत्र (३३) पंच पटल (३४) अष्टादश रहस्य (३५) कण्टकोद्धार (३६) नित्य पद्धति (३७) नित्याराधन विधि (३८) नारायण मंत्रार्थ (३६) संकल्प सूर्योदय टीका (४०) सच्चरित्र रक्षा (४१) राम पटल (४२) राम पद्धति (४३) राम पूजा पद्धति (४४) राम रहस्य (४५) रामार्चापद्धति (४६) रामायण व्याख्या (४७) दिव्य सूरि प्रभाव दीपिका (४८) सर्वार्थ सिद्धि (४६) भगवदाराधन क्रम, इत्यादि । इन ग्रन्थों के अतिरिक्त आचार्य श्री ने ७२ वाक्यों का उपदेश भक्तों को दिया था किन्तु उनका पालन कलिकाल में असंभव मानकर आचार्य चरण ने ६ विशेष वाक्यों का उपदेश दिया जिनका सारांश इस प्रकार है— (१) कर्मानुष्ठान को भगवत्कैङ्कर्य समझ कर करना चाहिए, और फलेच्छा रहित होकर भगवन्मन्त्र का जप करना चाहिए । श्री भाष्य को आदर से श्रवण- मनन करना चाहिए । इस भाष्य का लोक में प्रचार करने से ईश्वर कैङ्कर्य हो जाता है । (२) यदि इसमें असमर्थ हों तो द्राविड़ ग्रन्थों का अहर्निश पाठ करना चाहिए । (३) यदि यह भी न हो सके तो दिव्य देशों में भगवत्कैङ्कर्य करना चाहिए और भगवन्मूर्त्तियों की प्रतिष्ठा करनी चाहिए । (४) यदि यह भी न हो तो अर्थ के सहित निरन्तर मन्त्रद्वय का अनुसन्धान करना चाहिए । (५) यदि इसमें भी गति न हो तो दिव्य देशों में कुटी बनाकर निरन्तर वास करना चाहिए । (६) यदि ऐसा भी न कर सके तो, ज्ञान भक्ति वैराग्य युक्त शरणांगति धर्म के मर्मज्ञ अहकार ममता मुक्त भगवद् भक्तों के आश्रय में सदा रहना चाहिए । यह सम्प्रदाय श्री (लक्ष्मी) के नाम से प्रसिद्ध है, इस सिद्धान्त की आद्या- चार्या श्री जी ही थीं । श्री पराशर व्यास पराङ्कुश, आदि इस संप्रदाय के प्रसिद्ध आचार्य है । कहा जाता है, आचार्य श्री रामानुज ने कांचीपूर्ण स्वामी से छः प्रश्न किये थे कि—परम तत्त्व क्या है ? सिद्धान्त क्या है ? मोक्ष के अनेक उपाय है परन्तु कौन सा सुलभ है ? अन्तिम कर्त्तव्य क्या है ? प्रपन्न का मोक्ष कब होगा ? मैं किन आचार्य से शिष्यता ग्रहण करू ? कांचीपूर्ण स्वामी ने, भगवान वरदराज से इन प्रश्नों की जिज्ञासा की, भगवान ने आकाशवाणी द्वारा इनका उत्तर दिया कि—समस्त जगत का कारण मै नारायण ही परतत्त्व । ईश्वर जीव का भेद ही सिद्धान्त है । शरणागति ही मोक्षोपाय है । अन्तकाल में यदि मेरे भक्त मेरा स्मरण न भी कर सकें तो भी उनकी मुक्ति होती है। प्रपन्न भक्त का मोक्ष व कर्त्ता मैं हूँ महापूर्णाचार्य की शिष्यता ग्रहण करो । कहा जाता है कि श्री रामानुजाचार्य ने ७४ पीठों की स्थापना की थी । कालान्तर में श्री वरवर मुनि स्वामी ने ८ पीठों की स्थापना की । इन पीठस्थ आचार्यों और श्रीमन्तो के द्वारा ही इस सम्प्रदाय की श्रीवृद्धि हो रही है । स्वामी ललित कृष्ण ankurnagpal108@gmail.com
अवतरणिकाः प्रथम अध्याय (प्रथम पाद) मंगलाचरण भूमिका अध्याय की अवतरणिका जिज्ञासाधिकरण (सूत्र १) अथ और अतः शब्द का अर्थ निरूपण-ब्रह्म और जिज्ञासा शब्दार्थ धर्म जिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा का पौर्वापर्य क्रम निरूपण ब्रह्म मीमांसा और कर्म मीमांसा की एक शास्त्रीयता का प्रतिपादन-अध्ययन विधि और स्वरूप निरूपण। पृ०१-८ लघु पूर्वपक्ष ब्रह्म मीमांसा के लिए कर्म मीमांसा की अनपेक्षता के समर्थनपूर्वक सापेक्षता का खण्डन। तत्त्वमसि आदि महावाक्य जनित ज्ञान से अविद्या निवृत्ति का समर्थन एवं श्रवण मनन आदि के स्वरूपों का निरू- पण। पृ०८-१३ लघु सिद्धान्त वाक्य जन्य ज्ञान की मोक्ष साधनता का खण्डन तथा शास्त्रोक्त “ज्ञान” और “वेदन” आदि शब्दों की ध्यानार्थकता का प्रतिपादन ध्यान की ध्रुवानु- स्मृति रूपता, भक्ति रूपता तथा मोक्ष साधनता का समर्थन एवं ब्रह्मजिज्ञासा में कर्म ज्ञान की आवश्य- कता का समर्थन। पृ०१३-२४ महा पूर्वपक्ष शांकर मत उत्थापनः-ब्रह्म सत्यता, जगन्मिथ्यात्व एवं मिथ्यात्व का लक्षण। अविद्या का लक्षण और स्वरूप निरूपण। अद्वैतज्ञान से अविद्या निवृत्ति का समर्थन। प्रत्यक्ष के साथ शास्त्र की विरुद्धता में ankurnagpal108@gmail.com
१० शास्त्र की प्रधानता तथा सगुणवाक्य की अपेक्षा निर्गुण बोधक वाक्य की प्रधानता का समर्थन । “सत्यज्ञानमनन्तं” श्रादि पदों की निर्विशेष वस्तु मात्र बोधकता का निरूपण और लक्षणा वृत्ति विचार । सामानाधिकरण्य विचार । भेद प्रतीति की सत्यता का खण्डन । अनुभूति की सद्रूपता, स्वप्रका- शता, नित्यता, निर्विकारता, एकता और आत्मता का समर्थन । विषय विज्ञाता और व्यावहारिक “अहं” पदार्थ की अनात्मकता का विश्लेषण । पृ०२४-४६ महा सिद्धान्त १. शांकरमत निरसनः- निर्विशेष वस्तु की अप्रामाणिकता तथा सविशेष वस्तु ग्राहिता का निरू- पण । शब्द प्रमाण की सविशेष वस्तु ग्राहिता का स्थापन, वेदांत सम्मत निर्विकल्प ज्ञान निरूपण तथा नैयायिक निर्विकल्प ज्ञान का खण्डन । २. भेदाभेदवाद का निराकरणः-अनुमान की सविशेष वस्तु विषयकता का निरूपण । प्रत्यक्ष की सन्मात्र ग्राहिता का खण्डन तथा भेदवाद में आरोपित दोषों का प्रत्याख्यान । ३. शरीर संस्थान की स्थापना, घटादि वस्तु के मिथ्या- नुमान का खण्डन तथा सत् और अनुभूति की एकता निराकरण । अनुभूति की स्वप्रकाशता, नित्यता निर्विकारता और ऐकता का निराकरण । संवित्’ (अनुभूति) की आत्मता का निराकरण तथा “अहं” पदार्थ की श्रात्मता ज्ञान स्वरूपता और ज्ञानशीलता का समर्थन । ज्ञाता के मिथ्यात्व का खण्डन, विकार- शील श्रंतःकरण की ज्ञातृता का निराकरण, परोक्त ज्ञातृता की व्यवस्था का दोष कथन । संवित् और आत्मा की अज्ञानाश्रयता का खण्डन । सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में “अहं” पदार्थ के प्रकाश का समर्थन, मोक्षदशा में भी “अहं” पदार्थ की अनुवृत्ति का समर्थन । ankurnagpal108@gmail.com
११ शास्त्र और प्रत्यक्ष के विरोध में शास्त्र की प्रधानता या प्रामाणिकता का खण्डन भेदवासना की दोषरूपता का निराकरण । असत्य या मिथ्या पदार्थ जन्य सत्य- ज्ञान की उत्पत्ति का खण्डन स्फोटवाद का निराकरण । ४. वेदांत वाक्यों की निर्विशेष वस्तुमात्र बोधकता खण्डन पूर्वक सविशेष वस्तु बोधकता का स्थापन । पराविद्या की सविशेष वस्तु बोधकता का समर्थन । “सत्यं ज्ञानमनन्तं” श्रुति के सत्य आदि पदों की अखंडार्थता में सामानाधिकरण की अनुपपत्ति का प्रदर्शन तथा सविशेषार्थकता का निरूपण । सगुण और निर्गुण बोधक श्रुतियों की भिन्न भिन्न विषयों की सार्थकता निरूपण पूर्वक विरोध का परिहार । ब्रह्म की ज्ञातृता एवं ज्ञेयता के निषेध का खण्डन । ब्रह्म की भेद प्रतिपादक एवं भेद निषेधिका श्रुतियों की स्वमतानुसार व्याख्या और अविरोध स्थापन । ब्रह्म के निर्विशेष भाव के प्रतिपादन में परपक्ष द्वारा प्रस्तुत श्रुति स्मृति वाक्यों का स्वमतानुसार सविशेष भाव से प्रतिपादन तथा उन वाक्यों की उपबृंहण विधि का निरूपण । जीव और ब्रह्म के भद उपपादन के लिए “द्वासुपर्णा” आदि श्रुति का निरूपण तथा मुक्तावस्था में भी दोनों की पृथकता का विवेचन । ५. अविद्या कल्पना में दोष प्रदर्शन:- (i) अविद्या की ब्रह्माश्रयता का निराकरण (ii) अविद्या द्वारा ब्रह्म तिरोधान की अनुपपत्ति (iii) अविद्या की दोष रूपता की अनुपपत्ति (iv) अविद्या की अनिर्वच- नीयता की अनुपपत्ति (v) तम या अन्धकार की द्रव्यता का समर्थन (vi) अज्ञान की भावरूपता का विवेचन (vii) अविद्या की भावरूपता के खण्डन ankurnagpal108@gmail.com
१२ के प्रसंग में अविद्या की प्रत्यक्ष विषयता की स्थापना अविद्याऽनुमान का खण्डन, अनिर्वचनीय ख्याति और असत्ख्याति आदि का दूषण ज्ञापन एवं सत्ख्याति का समर्थन। तत्त्वमसि महावाक्य के अर्थ निरूपण के प्रसंग में अभेदवाद तथा औपाधिक एवं स्वाभाविक भेदाभेद वाद में सामानाधिकरण्य की अनुपपत्ति का प्रदर्शन। मनुष्यादि शरीरों मे आत्म विशेषणता का समर्थन। चेतन और अचेतन सभी वस्तुओं की ब्रह्म शरीरता एवं ब्रह्म की ही कार्य कारणात्मक अवस्था का प्रतिपादन। ब्रह्म तत्त्वविज्ञान मे अज्ञान निवृत्ति की अनुपपत्ति। सूत्रार्थ योजना और ब्रह्म विचार की व्यर्थता का संशय। ६. ब्रह्म विचार की आवश्यकता का प्रतिपादन, शब्द और अर्थ संबंधी प्रतीति के नियम का निरूपण, वेद की कार्यपरता के पक्ष मे भी ब्रह्म जिज्ञासा की आव- श्यकता का प्रतिपादन। शब्द की कार्यपरता का खण्डन। ‘शेष’ के लक्षण और विषय तथा कृत्युद्दे- श्यता एवं ‘नियोग’ पर विचार। पृ०४६-२२७ २ जन्माद्यधिकरण (सूत्र २) १. सूत्रार्थ निरूपण, जगज्जन्मादि के लक्षण में आपत्ति, तथा विशेषण, विशेष्य भाव पर विचार। २. [सिद्धान्त] ब्रह्म की जगज्जन्मादिलक्षणता का सम- र्थन, ‘‘सत्य-ज्ञान-अनन्त’’ शब्दों की व्याख्या ३. निर्विशेष ब्रह्मवाद में ‘‘ब्रह्मजिज्ञासा’’ और ‘‘जन्माद्य- स्य यतः’’ इन सूत्रों की अनर्थकता का प्रदर्शन। पृ०२२८-३६ ३ शास्त्र योनित्वधिकरण (सूत्र ३) १. सूत्रार्थ निरूपण। २. पूर्वपक्ष—ब्रह्म की शास्त्रयोनिता पर आपत्ति। ankurnagpal108@gmail.com
१३ ३. उत्तरपक्ष—ब्रह्म के संबंध में प्रत्यक्ष की अविषयता एवं ब्रह्म की अनुमेयता का समर्थन। ४. [सिद्धान्त]—ब्रह्म की शास्त्रयोनिता का प्रतिपादन और अनुमेयता का खण्डन। पृ०२३६-५३ ४ समन्वयाधिकरण (सूत्र ४) १- सूत्रार्थ निरूपण, ब्रह्मबोधक वेदांत वाक्यों की व्यर्थता और ब्रह्म की शास्त्रप्रमाणकता पर संशय। २. वेदांत वाक्यों की व्यर्थता का परिहार और नियोग विधि पर विचार मोक्ष की उत्पत्ति प्राप्ति आदि साध्य विलक्षणता का प्रतिपादन, शब्द आदि विधियों पर की गई शंका का परिहार तथा शब्द द्वारा अपरोक्ष ज्ञानोत्पत्ति का समर्थन। ३. जीवन्मुक्ति सिद्धान्त का खण्डन। मोक्ष की ध्यान नियोग साध्यता का समर्थन। ४. भेदाभेदवाद का निराकरण, जीवब्रह्म के स्वाभाविक अभेद तथा औपाधिक भेद का प्रतिपादन। ५. [सिद्धान्त]—ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणकता, और सिद्ध वस्तु प्रतिपादन में शब्द शक्ति का समर्थन। —पृ०२५३-६२ ५ ईक्षत्यधिकरण (सूत्र ५-१२) १. सांख्योक्त प्रधान की जगत् कारण अनर्हता ज्ञापन, प्रधान की जगत्कारणता पर संशय और समर्थन, प्रधान की अशब्दता का प्रतिपादन और जगत् कारणता का खण्डन। २. ईक्षणश्रुति की गौणार्थता की कल्पना करते हुए, प्रधान में ईक्षणता की संभावना, तथा उसकी ईक्षणता का निराकरण। ३. प्रधान की सत्शब्द प्रतिपादकता का खण्डन। ankurnagpal108@gmail.com
१४ ४. हेयता वचन के अभाव हेतुक प्रधान को सत्-शब्द प्रतिपादकता का निराकरण। प्रधान की सत् शब्द वाच्यता के समर्थन में प्रतिज्ञा विरोध का निर्देश। जीव की सुषुप्तावस्था में प्राप्त सत् स्वरूपता के आधार पर, प्रधान के लिए प्रयुक्त सत् शब्दकता का खण्डन। ५. समस्त वेदांत वाक्यों की ब्रह्मकारणावगति के आधार पर प्रधान की जगत्कारणता का निराकरण एवं ब्रह्म की जगत् कारणता का प्रतिपादन। सत्य संकल्प आदि श्रुति के आधार पर सगुणब्रह्म की जगत्कारणता का उपपादन तथा निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्मवाद का खण्डन। —पृ० २६२-३०६ ६ आनन्दमयाधिकरण (सूत्र १३-२०) १. अधिकरण की भूमिका। २. वेदांत वाक्योक्त "आनन्दमय" शब्दार्थ के सम्बन्ध में संशय एवं उसकी जीवार्थता की कल्पना, शाखाचन्द्र आदि दृष्टान्त से आनन्दमय के जीवत्व का प्रतिपादन। शंकर सम्मत 'पुच्छ ब्रह्म' श्रुति पर विचार। ३. [सिद्धान्त]—आनन्दमय की परब्रह्मता का निरू- पण तथा उसके जीवत्व पक्ष का निरसन। परब्रह्म के जीवभाव और जगत्कारणभाव के मिथ्यात्व का निराकरण। तत्त्वमसि आदि वाक्यों में लक्षणा तथा उनके औपलक्ष्य सामानाधिकरण्य पर विचार, प्रासंगिक रूप से जैमिनीय “अरुणाधि- करणन्याय” से सूत्र का उपसंहार। ४. मयट् प्रत्यय के विकारार्थ का निराकरण तथा प्राचु- र्यार्थ का समर्थन। आनन्द हेतुता से परमात्मा की आनन्दमयता तथा मांत्रवर्णिक हेतुता से आनन्दमय की परमात्मकता का समर्थन। ankurnagpal108@gmail.com
५५ ५. बद्ध, मुक्त आदि अवस्थाओं वाले जीव की आनन्द- मयता से अनुपपत्ति तथा आनन्दमय से उसका भेद दिग्दर्शन । सृष्टि विषयक संकल्प वाले सृष्टा का आनन्दमय के रूप में समर्थन और उसी हेतु से जीवात्मा की पृथकता का प्रतिपादन । आनन्दमय ब्रह्म की प्राप्ति से जीव के आनन्दी होने के आधार पर जीव की भिन्नता का उपपादन । —पृ ३०६-५४ ७ अन्तराधिकरण (सूत्र २१-२२) १. पूर्वपक्ष--आदित्य मण्डलस्थ और नेत्रस्थ पुरुष की जीवभाव और देवभाव आदि रूपों में संभावना । २. (सिद्धान्त)--आदित्य और नेत्रमध्यवर्ती पुरुष की परब्रह्मता की उपस्थापना । परब्रह्म की सगुणता तथा भक्तानुग्रह से विचित्र जगदाकार के रूप में आविर्भावता का वर्णन । भेदोक्ति के आधार पर अक्षि और आदित्यपुरुष की जीव से पृथकता का विवेचन । —पृ०३५४-६३ ८ आकाशाधिकरण (सूत्र २३) १. पूर्वपक्ष--आकाश शब्द की भूताकाश रूपक शंका । २. (सिद्धान्त) आकाश शब्द की परब्रह्मता का प्रतिपादन । —पृ०३६३-७० ९ प्राणाधिकरण (सूत्र २४) आकाश के दृष्टान्त से प्राण शब्द की परमार्थता का निरूपण । —पृ०३७०-७१ १० ज्योतिरधिकरण (सूत्र २५-२८) १. ज्योति शब्द की आदित्य आदि अर्थों में शंका । २. (सिद्धान्त) ज्योति शब्द की परब्रह्मता का उपपादन । गायत्री छन्दोल्लेख्य ज्योति शब्द की अब्रह्मता की शंका का निरास । भूत, पृथिवी, शरीर और हृदय ankurnagpal108@gmail.com
१६ आदि गायत्री के चार रूपों का निरूपण तथा गायत्री का ब्रह्म के रूप में उपपादन । सप्तमी एवं पंचमी विभक्ति से निर्दिष्ट ज्योति शब्द की अग्राह्यार्थता का निरास । —पृ० ३७१-७६ ११. ऐन्द्रप्राणाधिकरण (सूत्र २८-३२) १. ऐन्द्र प्रोक्त “प्राण” शब्द की जीवादि अर्थ में शंका तथा परमात्मार्थ रूप से उसका समाधान । २ जीवार्थ रूप से पुनः शंका तथा प्राण की अध्यात्म उपदेश के रूप से बहुल चर्चा होने से उसकी ब्रह्म रूपता का सुदृढ़ उपपादन । ३. शास्त्रलब्ध ज्ञान के अनुसार ऐन्द्र कृत उपदेश की परमात्मपरता का समर्थन । प्राण शब्द की मुख्य प्राणार्थ रूप से की गई शंका का सतर्क समाधान ।—पृ० ३७६-८५ (द्वितीय पाद) विषय, भूमिका, प्रथम पाद से संबंध, प्रथम पाद के विषय का संक्षिप्त विवरण, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ पादों के वक्तव्य विषयों की पूर्व पीठिका। —पृ० ३८५-८६ १ प्रसिद्ध्याधिकरण (सूत्र १-८) १. पूर्वपक्ष—श्रुत्युक्त मनोमयादि विशिष्ट पदार्थ की जीवता तथा ब्रह्म शब्द की जीवार्थता का समर्थन । २. (सिद्धान्त)—मनोमयादि शब्द और ब्रह्म शब्द की परब्रह्मार्थता का निरूपण । मनोमयादि वाक्योक्त गुणराशि का ब्रह्म संबंधी उपपादन । जीव कर्तृं ता और कर्मता का विरोध, ब्रह्म संबंधी अनुकूल शब्द विशेष तथा स्मृति प्रमाणों का प्रदर्शन । हृदय में ब्रह्म की स्थिति का प्रतिपादन तथा हृदयस्थ ब्रह्म की संभाव्य भोग प्रसक्ति का प्रत्याख्यान । —पृ० ३८६-४०५ २. अत्ताधिकरण (सूत्र ९-१२) १. ब्राह्मण आदि समस्त की जीवता का समर्थन, सर्व- भोक्ता हेतुक उनकी ब्रह्मता का प्रतिपादन । ankurnagpal108@gmail.com
१७ २. कर्म फलोल्लेख होने से भोक्ता की ब्रह्मता में संशय गुहा प्रविष्ट आत्माओं की जीवता और ब्रह्मता का समर्थन कठोपनिषद् के वाक्यों की पर्यालोचना द्वारा ब्रह्म पक्ष का समर्थन । —पृ०४०५-१४ ३. अन्तराधिकरण (सूत्र १३-१८) १. पूर्वपक्ष—नेत्र पुरुष की जीवता का अनुमोदन । २. (सिद्धान्त) अक्षि पुरुष की परमात्मकता का निरूपण । जगत की स्थिति परिचालन आदि के आधार पर अक्षि पुरुष की परमात्मकता का उपपादन । "कं खं ब्रह्म" इत्यादि श्रुति कथित सुखविशिष्टाभिधान के अनुसार परमात्मा का निर्धारण । उपकोशल उपाख्यान वर्णित अग्नि संवाद द्वारा परमात्मा का उपपादन । नियति, स्थिति और तद्संभवता हेतु से छायात्मा और जीवात्मा की अक्षि पुरुषता का प्रतिषेध । —पृ०४१४-२४ ४. अन्तर्याम्यधिकरण (सूत्र १६-२१) १. पूर्वपक्ष—अन्तर्यामी शब्द का पृथिवी आदि की अधिष्ठात्री [
५८ एक विज्ञान से सर्व विज्ञान रूप विशिष्ट फल निधान तथा जीव की अपेक्षा श्रेष्ठत्वाभिधान के आधार पर अन्तर्यामी शब्द की जीव और प्रधानार्थकता का निराकरण । ३. परापरा भेद से द्विविध विद्या का निरूपण । ब्रह्म प्राप्ति के उपाय भूत अपरोक्ष ज्ञान की भक्तिरूपता का प्रतिपादन तथा अंगहीन और अयथानुष्ठित कर्म की निष्फलता ज्ञापन । —पृ०४३१-४० ६. वैश्वानराधिकरण (सूत्र २५-३३) १. पूर्वपक्षः—वैश्वानर शब्द से जाठराग्नि, भूताग्नि और देवता अर्थ की संभावना का संशय । २. (सिद्धान्त) परमात्मा के विशेषधर्मों के आधार पर वैश्वानर की परमात्मकता का प्रतिपादन । अग्निमूर्धा इत्यादि के निर्देश से वैश्वानर की परमात्मकता का निरूपण । पूर्व सूत्रीय युक्ति से देवता और भूताग्नि की वैश्वानरता का खण्डन । वैश्वानर की ब्रह्मता का जैमिनि के मतानुसार अविरोध और उपपत्ति । आश्मरथ्य और बादरि आचार्यों के मत से अविरोध का उपपादन जैमिनि मतानुसार वैश्वानर उपासना तथा उपासक के देह में उपास्य का विवेचन । —पृ०४४०-५५ (तृतीय पाद) १. द्युभ्वाद्यधिकरण (सूत्र १-६) १. पूर्वपक्ष--द्यु भूलोक आदि के आश्रय के रूप में अभि- हित पदार्थ की जीवता की संभावना का संशय । २. (सिद्धान्त)-लोकाभिहित पदार्थ की परमात्मकता की, उपस्थापना, भेद निर्देश हेतुक जीवता का खण्डन, प्रकरणानुसार ब्रह्मार्थकता का समर्थन । —पृ०४५६-६२ २. भूमाधिकरण (सूत्र ७-८) १. भूमा शब्द की व्याख्या ankurnagpal108@gmail.com
१. जिज्ञासाधिकरण एवं महासिद्धान्त (मायावाद-खण्डन व सविशेष ब्रह्म-सिद्धि)
१६ २. पूर्वपक्ष--भूमा की जीवता का संशय ३- (सिद्धान्त)-भूमा की परमात्मकता का निरूपण तथा उसकी सुखरूपता आदि विशिष्ट गुणों का उप- पादन । —पृ०४६२-७७ ३. अक्षराधिकरण (सूत्र ९-११) १. पूर्वपक्ष--वेदोक्त अक्षर शब्द की प्रधान, जीव और पर ब्रह्म अर्थों में अभिशंका उत्थापन पूर्वक प्रधान और जीव के अर्थ में संभावना का संशय । २. (सिद्धान्त) सर्व जगत् विधारकत्ता, सर्वशास्ता और अच्युतत्व के आधार पर अक्षर तत्त्व की परब्रह्मार्थकता का प्रतिपादन । —पृ०४७७-८३ ४. ईक्षति कर्माधिकरण (सूत्र १२) १. त्रैमात्रिक प्रणवोपासना की प्रतिपादक श्रुति के अर्थ का विवेचन । उपास्य “पर पुरुष” की जीवार्थकता का निरास, ईक्षणीय “पर पुरुष” की ब्रह्मात्मकता का प्रतिपादन । —पृ०४८३-८७ ५. दहराधिकरण (सूत्र १३-२२) १. पूर्वपक्ष—“दहराकाश” की जीवात्मकता और भूता- काशता का संशय । २. (सिद्धान्त) सत्यकामता, आदि विशिष्ट गुणों के आधार पर दहर की परब्रह्मता का निरूपण । ३. सुषुप्ति में जीवों की दहराकाश गति की प्रकाशिका श्रुति, दहर के लिए प्रयुक्त ब्रह्मलोक शब्द के उल्लेख तथा दहर के ब्रह्म संबंधीय गुणों के आधार पर उसकी परमात्मकता का समाधान । ४. गति श्रुति के अन्यार्थ का निरूपण । विश्वधारण महिमा, अपहतपाप्मता आदि विशिष्ट गुण, के अनुसार दहर की ब्रह्मात्मकता का उपपादन । ५. दहर की जीवताविषयक संभावना का समाधान जीव की अविद्या रहित अवस्था के प्रदर्शन के निमित्त
२० दहर की जीवोल्लेखना का निरूपण। अल्पत्व श्रुति के आधार पर अब्रह्मभाव संबन्धी शंका का समा- धान। दहर के अनुरूप अवस्था वाले जीव को ही दहर स्वीकारने का निराकरण तथा स्मृत्यानुसार भी दहर की ब्रह्मरूपकता का निरूपण। —पृ०४८७-५०६ ६. प्रमिताधिकरण [सूत्र २३-४१] १. पूर्वपक्ष--अंगुष्ठ परिमित पुरुष की जीवात्मकता और परमात्मकता के विचार में जीवात्मकता का समर्थन। २. (सिद्धान्त)---श्रंगुष्ठ परिमित पुरुष की परमात्मकता का उपस्थापन तथा मानव हृदय के परिमाणानुसार पुरुष की अंगुष्ठ परिमिति की सिद्धि। —पृ०५०६-६ १. प्रासंगिक देवताधिकरण [सूत्र २५-२६] १. पूर्वपक्ष--मनुष्य भिन्न जीवों का उपासना में अन- धिकार प्रदर्शन। २, (सिद्धान्त)—मनुष्येतर देवतादिकों के उपासनाधि- कार का प्रतिपादन तथा उनकी शरीरता का सम- र्थन। देवताओं की शरीरता स्वीकारने में, अनेकों यज्ञों में उनकी युगपद् उपस्थिति की असंभावना का निराकरण तथा वैदिक शब्द के विरोध का परिहार। देवादिसृष्टि की शब्द पूर्वकता का प्रतिपादन तथा मंत्रमय वेद की नित्यता का समर्थन। प्रत्येक प्रलय के अन्त में समानाकार सृष्टि का समर्थन। —पृ०५०६-२१ (ii) प्रासंगिक मध्वधिकरण (सूत्र ३०-३२) १. पूर्वपक्ष-मधु आदि विद्याओं में, वसु आदि देवताओं के उपासना अधिकार के असंभव होने से जैमिनी के मतानुसार उपासना में देवताओं के अनधिकार का विवेचन। ज्योतिर्मय ब्रह्मोपासना मात्र में अधिकार का ज्ञापन। ankurnagpal108@gmail.com
२१ २. (सिद्धान्त)--बादरायण के मतानुसार देवताओं के उपासनाधिकार का प्रतिपादन । --पृ०५२१-२५ (iii) प्रासंगिक अपशूद्राधिकरण (३३-३६) १. पूर्वपक्ष--ब्रह्मविद्या में शूद्रों के अधिकार का समर्थन २. (सिद्धान्त) - ब्रह्म विद्या में शूद्रों के अनधिकार का उपस्थापन, ब्रह्म विद्यार्थी जानश्रुति की क्षत्रियता का प्रतिपादन चित्ररथ वंशीय राजा अभिप्रतारी के साहचर्य निर्देश से जानश्रुति की क्षत्रियता की पुष्टि । ब्रह्मविद्या में उपनयन अपेक्षित होने से शूद्रों के वेद श्रवण, अध्ययन और अधिकार रहित होने की पुष्टि । स्मृति प्रमाणों से भी अनधिकार का समर्थन । निर्विशेष ब्रह्मवादी मत से शूद्र के अन- धिकार की अनुपपत्ति । अधिकरण की परि- समाप्ति-ज्योति शब्द से उल्लेख परिमित पुरुष की परब्रह्मता का प्रतिपादन तथा अन्य संभावना का निरास । --पृ०५२५-४३ ७ अर्थान्तरत्वाधिकरण (सूत्र ४२-४४) १. पूर्वपक्ष--नामरूप निर्वाहक आकाश शब्दोक्त आत्मा में मुक्तात्मा और परमात्मा की संभावना की तुलना में मुक्तात्मा का समर्थन । २ (सिद्धान्त) - सुषुप्ति और उत्क्रमण काल में आकाश और जीव के स्पष्ट भेद उल्लेख होने से तथा आकाश के लिए प्रयुक्त पति शब्द के प्रयोग से आकाश की परमात्मकता की पुष्टि । --पृ०५४३-४६ (चतुर्थपाद) १. आनुमानिकाधिकरण (सूत्र १-७) १. पूर्वपक्ष--कठोपनिद् के “महतः परमव्यक्तम्” मंत्र के आधार पर सांख्य परिकल्पित प्रधान की जगत्का- रणता की कल्पना । ankurnagpal108@gmail.com
२१ २. (सिद्धान्त)—अव्यक्त शब्द से रथरूप से परिकल्पित शरीर के निर्देश से, अव्यक्त शब्द की सूक्ष्म शरीरता का समर्थन तथा रथरूपक की सार्थकता का विवेचन ज्ञेयता के अभाव में प्रधान का निराक- रण। प्रधान में ज्ञेयता की सम्भावना का खंडन करते हुए प्राज्ञ आत्मा की ज्ञेयता की पुष्टि। परम पुरुष, उसके उपासक तथा उपासना प्रणाली संबंधी प्रश्नोत्तरों का उल्लेख। महत् शब्द के दृष्टान्त से सांख्योक्त प्रधान की सम्भावना का निराकरण। —पृ० ५५०-६५ २ चमसाधिकरण सूत्र (८ १०) १. पूर्वपक्ष—वेदोक्त अजा शब्द की सांख्योक्त प्रधाना- र्थता का समर्थन। २. (सिद्धान्त)—चमस दृष्टान्त से प्रधान के अपरिग्रह का निरूपण। ब्रह्मोत्पन्न अजा ग्रहण के हेतु तथा आदित्य की मधुत्व कल्पना के समान, ब्रह्मकारणिका प्रकृति की अजत्व कल्पना की संगति का प्रदर्शन। अजा शब्द की शांकर मतोक्त तेज, जल और अन्नार्थ प्रतिपादकता का निराकरण। —पृ० ५६५-७६ ३. संख्योपसंग्रहाधिकरण सूत्र (११-१३) १. पूर्वपक्ष—"पंच पंचजना." श्रुति से सांख्योक्त प्रधान के पचीस तत्त्वों की परिकल्पना। २. (सिद्धान्त) श्रौत और सांख्य के पच्चीस तत्त्वों की नितान्त भिन्नता से उक्त मत का निराकरण। पंचजन शब्द से प्राण आदि पांच का तथा काण्व शाखा के अनुसार ज्योति शब्द से विषय प्रकाशिका इन्द्रियों की पंच संख्या का निरूपण ! —पृ० ५७६-८२ ४. कारणत्वाधिकरण सूत्र (१४-१५) १. पूर्वपक्ष—"तदैक्षत" श्रुति की प्रधान कारणपरता का समर्थन। २. (सिद्धान्त)—आकाश आदि की कारणता के रूप से अवधारित, परब्रह्म की जगत्कारणता का समर्थन ankurnagpal108@gmail.com
२३ तथा पूर्ववर्त्ती वाक्य की अनुवृत्ति के आधार पर परब्रह्म की कारणता का अवधारण । —पृ०५८२-८७ ५ जगद्वाचित्वाधिकरण सूत्र (१६-१८) १. पूर्वपक्ष-“यः एतेषां” श्रुत्युक्त पुरुष शब्द से साङ्गोक्त पुरुष का समर्थन । २. (सिद्धान्त)-कर्त्ता पद से परमात्मता का निरूपण तथा जीवात्म दर्शन पक्ष का खण्डन । जीव और मुख्य प्राण परता का प्रत्याख्यान जैमिनि मत के अनुसार परमात्मसत्ता के ज्ञापन के लिए जीव के उल्लेख का निरूपण । —पृ०५८७-६६ ६ वाक्यान्वयाधिकरण [सूत्र १६-२२] १. पूर्वपक्ष-“आत्मा वा अरे” श्रुति कथित आत्मा की जीवता की परिकल्पना । २. (सिद्धान्त)- समस्त वेदांत वाक्यों की तात्पर्य पर्यालो- चना से आत्मा शब्द की ब्रह्मार्थकता का प्रतिपादन । ३. आश्मरथ्य 'औडुलोमि, काशकृत्स्न आदि आचार्यों के मत से भी परमात्मकता का प्रतिपादन । पृ०५६६-६१६ ७ प्रकृत्यधिकरण [सूत्र २३-२८] १. पूर्वपक्ष-उपादान और निमित्त कारणकी लोकसिद्ध पृथकता से परब्रह्म की निमित्तकारणता मात्र की परिकल्पना । २. (सिद्धान्त -सृष्टि विषयक चिन्ता प्रणाली के आधार पर तथा साक्षात् संबंध से ब्रह्म की निमित्त और उपादान कारणता का विवेचन । स्थूल, सूक्ष्म अवस्था भेद से निरंजनता आदि बोधक वाक्यों का उपपादन तथा ब्रह्म के जगदुपादानता बोधक वाक्य का वर्णन । —पृ०६१६-३५ ८ सर्वव्याख्यानाधिकरण [सूत्र २६] जगत् कारणता बोधक समस्त वेदांत वाक्यों की ब्रह्म कारणपरता का निरूपण । —पृ०६३५-३६ ankurnagpal108@gmail.com