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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२४ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६९ | ४०७

२४ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ६९४०७

जागृत होती है। इसके बिना जागृत हुए ईश्वर के दर्शन नहीं होते। तुम एकाग्रता के साथ निर्जन में गाया करना -

‘‘‘जागो माँ कुलकुण्डलिनी! तुम नित्यानन्द-स्वरूपिणी!
प्रसुप्तभुजगाकारा आधारपद्मवासिनी!’

‘‘गाना गाकर ही रामप्रसाद सिद्ध हुए थे। व्याकुल होकर गाना गाने पर ईश्वरदर्शन होते हैं।’’

मणि – जी हाँ, यह सब एक बार करने से ही मन का खेद मिट जाता है।

श्रीरामकृष्ण – अहा! खेद मिट जाता है – सत्य है।

‘‘योग के सम्बन्ध की दो-चार बातें तुम्हें बतला देनी चाहिए।

गुरू ही सब करते हैं। नरेन्द्र स्वतः सिद्ध

‘‘बात यह है कि अण्डे के भीतर बच्चा जब तक बड़ा नहीं हो जाता तब तक चिड़िया उसे नहीं फोड़ती।

‘‘परन्तु कुछ साधना करनी चाहिए। गुरु ही सब कुछ करते हैं, परन्तु अन्त में कुछ साधना भी करा लेते हैं। बड़े पेड़ को काटते समय जब लगभग काटना समाप्त हो जाता है तो कुछ हटकर खड़ा हुआ जाता है। पेड़ फिर आप ही हरहराकर टूट जाता है।

‘‘जब नाली काटकर पानी लाया जाता है, और जब वह समय आता है कि थोड़ासा ही काटने से नहर के साथ नाली का योग हो जाय, तब नाली काटनेवाला कुछ हटकर खड़ा हो जाता है। तब मिट्टी भीगकर धँस जाती है और नहर का पानी हरहराकर नाली में घुस पड़ता है।

‘‘अहंकार, उपाधि, इन सब का त्याग होने के साथ ही ईश्वर के दर्शन होते हैं। मैं पण्डित हूँ, मैं अमुक का पुत्र हूँ, मैं धनी हूँ, मैं मानी हूँ, इन सब उपाधियों को त्याग देने से ही ईश्वर के दर्शन होते हैं।

‘‘ईश्वर ही सत्य हैं और सब अनित्य – संसार अनित्य है – इसे विवेक कहते हैं। विवेक के हुए बिना उपदेशों का ग्रहण नहीं होता।

‘‘साधना करते करते ही उनकी कृपा से लोग सिद्ध होते हैं। कुछ परिश्रम भी करना चाहिए। इसके बाद दर्शन और आनन्द।

‘अमुक स्थान पर सोने का घड़ा गड़ा हुआ है, यह सुनते ही मनुष्य दौड़ पड़ता है और खोदने लग जाता है। खोदते खोदते सिर से पसीना निकल जाता है। बहुत देर तक खोदने के बाद कहीं कुदार में ठनकार आती है। तब कुदार फेंककर वह देखने लगता है कि घड़ा निकला या नहीं? घड़ा अगर दीख पड़ा तब तो उसके आनन्द का पारावार नहीं रह जाता – वह नाचने लगता है।

४०८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ दिसम्बर, १८८३

“घड़ा बाहर लाकर उसमें से मुहरें निकालकर वह गिनता है। तब कितना आनन्द होता है! दर्शन, स्पर्श और सम्भोग – क्यों?” मणि – जी हाँ। श्रीरामकृष्ण कुछ देर चुप हो रहे। फिर कहने लगे – “जो मेरे अपने आदमी हैं, उन्हें डाँटने पर भी वे आएँगे। “अहा! नरेन्द्र का कैसा स्वभाव है! माँ काली को पहले उसके जी में जो आता था वही कहता था। मैंने चिढ़कर एक दिन कहा था ‘मूर्ख, तू अब यहाँ न आना।’ तब वह धीरे धीरे जाकर कुछ काम करने लगा। जो अपना आदमी है, उसको तिरस्कार करने पर भी वह नाराज नहीं होता – क्यों?” मणि – जी हाँ। श्रीरामकृष्ण – नरेन्द्र स्वतःसिद्ध है। निराकार पर उसकी निष्ठा है। मणि (सहास्य) – जब आता है तब एक महाभारत रच लाता है। श्रीरामकृष्ण आनन्द से हँसते हुए कहते हैं – “हाँ सच हैं।”

(४)

दूसरे दिन मंगलवार, २५ दिसम्बर, कृष्णपक्ष की एकादशी है। दिन के ग्यारह बजे का समय होगा। श्रीरामकृष्ण ने अभी भोजन नहीं किया। मणि और राखाल आदि भक्त श्रीरामकृष्ण के कमरे में बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण (मणि से) – एकादशी करना अच्छा है। इससे मन बहुत पवित्र होता है और ईश्वर पर भक्ति होती है, समझे? मणि – जी हाँ। श्रीरामकृष्ण – धान की लाही और दूध – यही खाओगे, क्यों?

परिच्छेद ७०

परिच्छेद ७०

रामचन्द्र दत्त के बगीचे में

आज बुधवार है, २६ दिसम्बर १८८३ ई.। श्रीरामकृष्ण रामबाबू का नया बगीचा देखने जा रहे हैं।

रामबाबू श्रीरामकृष्ण को साक्षात् अवतार जानकर उनकी पूजा करते हैं। वे प्रायः दक्षिणेश्वर में आते हैं और श्रीरामकृष्ण के दर्शन तथा उनकी पूजा करते हैं। सुरेन्द्र के बगीचे के पास उन्होंने नया बगीचा तैयार किया है। इसी बगीचे को देखने के लिए श्रीरामकृष्ण जा रहे हैं।

गाड़ी में मणिलाल मल्लिक, मास्टर तथा अन्य दो-एक भक्त हैं। मणिलाल मल्लिक ब्राह्म समाज के हैं। ब्राह्म भक्तगण अवतार नहीं मानते हैं।

श्रीरामकृष्ण (मणिलाल के प्रति) – उनका ध्यान करना हो तो पहले उनके उपाधिशून्य स्वरूप का ध्यान करने की चेष्टा करनी चाहिए। वे उपाधियों से शून्य, वाक्य और मन से परे हैं। परन्तु इस ध्यान द्वारा सिद्धि प्राप्त करना बहुत ही कठिन है।

“वे मनुष्य में अवतीर्ण होते हैं, उस समय ध्यान करने की विशेष सुविधा होती है। मनुष्य के बीच में नारायण हैं। देह आवरण है, मानो लालटेन के भीतर बत्ती जल रही है, या मानो काँच में से भीतर की बहुमूल्य वस्तुएँ दिखायी दे रही हैं।”

गाड़ी से उतरकर श्रीरामकृष्ण बगीचे में पहुँचे। राम तथा अन्य भक्तों के साथ पहले तुलसी-कानन देखने के लिए जा रहे हैं।

तुलसी-कानन देखकर श्रीरामकृष्ण खड़े होकर कह रहे हैं, “वाह, सुन्दर स्थान है यह! यहाँ पर ईश्वर का चिन्तन अच्छा होता है।”

श्रीरामकृष्ण अब तालाब के दक्षिणवाले कमरे में आकर बैठे। रामबाबू ने थाली में अनार, सन्तरा तथा कुछ मिठाई लाकर उन्हें दी। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ आनन्द करते हुए फल आदि ग्रहण कर रहे हैं।

कुछ देर बाद सारे बगीचे में घूम रहे हैं।

अब पास ही सुरेन्द्र के बगीचे में जा रहे हैं। थोड़ी देर पैदल जाकर गाड़ी में बैठेंगे। गाड़ी से सुरेन्द्र के बगीचे में जाएँगे।

भक्तों के साथ पैदल जाते हुए श्रीरामकृष्ण ने देखा कि पासवाले बगीचे में एक वृक्ष

४१० श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ दिसम्बर, १८८३

के नीचे एक साधु अकेले खटिया पर बैठे हैं। देखते ही वे साधु के पास पहुँचे और आनन्द के साथ उनसे हिन्दी में वार्तालाप करने लगे।

श्रीरामकृष्ण (साधु के प्रति) - आप किस सम्प्रदाय के हैं - गिरि या पुरी कोई उपाधि है क्या?

साधु - लोग मुझे परमहंस कहते हैं।

श्रीरामकृष्ण - अच्छा, अच्छा। शिवोऽहम् - यह अच्छा है। परन्तु एक बात है। यह सृष्टि, स्थिति और प्रलय सभी कुछ हो रहा है, उन्हीं की शक्ति से। यह आद्याशक्ति और ब्रह्म अभिन्न हैं। ब्रह्म को छोड़कर शक्ति नहीं होती। जिस प्रकार जल को छोड़कर लहर नहीं होती, वाद्य को छोड़कर वादन नहीं होता।

“जब तक उन्होंने इस लीला में रखा है, तब तक द्वैत ज्ञान होता है। शक्ति को मानने से ही ब्रह्म को मानना पड़ता है; जिस प्रकार रात्रि का ज्ञान रहने से ही दिन का ज्ञान होता है! ज्ञान की समझ रहने से ही अज्ञान की समझ होती है।

“और एक स्थिति में वे दिखाते हैं कि ब्रह्म, ज्ञान तथा अज्ञान से परे हैं, मुँह से कुछ कहा नहीं जाता। जो है सो है।”

इस प्रकार कुछ वार्तालाप होने के बाद श्रीरामकृष्ण गाड़ी की ओर जा रहे हैं। साधु भी उन्हें गाड़ी तक पहुँचा देने के लिए साथ साथ आ रहे हैं। मानो श्रीरामकृष्ण उनके कितने दिनों के परिचित हैं, साधु की बाँह में बाँह डालकर वे गाड़ी की ओर जा रहे हैं।

साधु उन्हें गाड़ी पर चढ़ाकर अपने स्थान पर आ गए।

अब श्रीरामकृष्ण सुरेन्द्र के बगीचे में आए हैं। भक्तों के साथ बैठकर साधु की ही बात शुरू की!

श्रीरामकृष्ण - ये साधु अच्छे हैं। (राम के प्रति) जब तुम आओगे तो इस साधु को दक्षिणेश्वर के बगीचे में ले आना।

“ये साधु बहुत अच्छे हैं। एक गाने में कहा है - सरल हुए बिना सरल को पहचाना नहीं जाता।

“निराकारवादी - अच्छा ही है। वे ही निराकार और साकार हुए हैं, - और भी कितने ही कुछ हैं। जिनका नित्य है, उन्हीं की लीला है। वही जो वाणी व मन से परे हैं, नाना रूप धारण करके अवतीर्ण होकर काम कर रहे हैं। उसी ‘ॐ’ से ‘ॐ शिव’ ‘ॐ काली’ व ‘ॐ कृष्ण’ हुए हैं। निमन्त्रण में मालिक ने एक छोटे लड़के को भेज दिया है - उसका कितना मान है, क्योंकि वह अमुक का नाती या पोता है।”

सुरेन्द्र के बगीचे में भी कुछ जलपान करके श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर की ओर भक्तों के साथ जा रहे हैं।

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परिच्छेद ७१

ईशान मुखोपाध्याय के मकान पर

(१)

कर्मयोग। क्या चिरकाल तक कर्म करना पड़ेगा?

दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर में आरती का मधुर शब्द सुनायी दे रहा है। उसी के साथ प्रभाती-राग से मन्दिर की शहनाई बज रही है। श्रीरामकृष्ण उठकर मधुर स्वर से नामोच्चारण कर रहे हैं। कमरे में जिन जिन देवियों और देवताओ के चित्र टँगे हुए थे, एक-एक करके उन्हें प्रणाम किया। फिर पश्चिमवाले गोल बरामदे में जाकर भागीरथी के दर्शन किए और प्रणाम किया। भक्तों में भी कोई कोई वहाँ हैं। उन लोगों ने प्रातःकृत्य समाप्त करके क्रमशः श्रीरामकृष्ण को आकर प्रणाम किया।

राखाल श्रीरामकृष्ण के साथ इस समय यहीं हैं। बाबूराम पिछली रात को आए हैं। मणि श्रीरामकृष्ण के पास आज चौदह दिन से हैं।

आज बृहस्पतिवार है, अगहन की कृष्णा त्रयोदशी, २७ दिसम्बर १८८३ ई.। आज सबेरे ही स्नानादि समाप्त करके श्रीरामकृष्ण कलकत्ता जाने की तैयारी कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण ने मणि को बुलाकर कहा, “आज ईशान के यहाँ जाने के लिए कह गए हैं। बाबूराम जाएगा और तुम भी हमारे साथ चलना।” मणि जाने के लिए तैयार होने लगे।

जाड़े का समय है। सुबह आठ बजे का समय होगा। श्रीरामकृष्ण को ले जाने के लिए नौबतखाने के पास गाड़ी आकर खड़ी हुई। चारों ओर फूल के पेड़ हैं, सामने भागीरथी। सब दिशाएँ प्रसन्न जान पड़ती हैं। श्रीरामकृष्ण ने देवताओं के चित्रों के पास खड़े होकर प्रणाम किया। फिर माता का नाम लेते हुए यात्रा करने के लिए गाड़ी पर बैठ गए। साथ बाबूराम और मणि हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण की बनात, बनात की बनी हुई कान ढकनेवाली टोपी और मसाले की थैली साथ ले ली है, क्योंकि जाड़े का समय है, सन्ध्या होने पर श्रीरामकृष्ण बनात ओढ़ेंगे।

श्रीरामकृष्ण का मुखमण्डल प्रसन्न है। सब रास्ता आनन्द से पार कर रहे हैं। दिन के नौ बजे होंगे। गाड़ी कलकत्ते में आकर श्यामबाजार से होकर मछुआ-बाजार में आकर

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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४१२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ दिसम्बर, १८८३

खड़ी हुई। मणि ईशान का घर जानते थे। चौराहे पर गाड़ी फिराकर ईशान के घर के सामने खड़ी करने के लिए कहा।

ईशान आत्मीयों के साथ आदरपूर्वक सहास्यमुख श्रीरामकृष्ण की अभ्यर्थना कर उन्हें नीचेवाले बैठकखाने में ले गए। श्रीरामकृष्ण ने भक्तों के साथ आसन ग्रहण किया।

कुशल-प्रश्न हो जाने के बाद श्रीरामकृष्ण ईशान के पुत्र श्रीश के साथ बातचीत करने लगे। श्रीश एम. ए., बी. एल. पास करके अलीपुर में वकालत कर रहे हैं। एण्ट्रेंस और एफ. ए. की परीक्षाओं में विश्वविद्यालय में उनका प्रथम स्थान आया था। इस समय उनकी आयु लगभग तीस वर्ष की होगी। जैसा पाण्डित्य है, वैसा ही विनय भी है। लोग उन्हें देखकर यह समझ लेते हैं कि ये कुछ नहीं जानते। हाथ जोड़कर श्रीश ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। मणि ने श्रीरामकृष्ण को उनका परिचय दिया और कहा, "ऐसी शान्त प्रकृति का मनुष्य दीख नहीं पड़ता।"

श्रीरामकृष्ण (श्रीश के प्रति) – क्यों जी, तुम क्या करते हो?

श्रीश – जी, मैं अलीपुर जा रहा हूँ, वकालत करता हूँ।

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – ऐसा आदमी और वकालत!

(श्रीश से) – "अच्छा, तुम्हें कुछ पूछना है? - संसार में अनासक्त होकर रहना, क्यों?"

श्रीश – परन्तु कार्य के निर्वाह के लिए संसार में कितने ही अनुचित काम करने पड़ते हैं। कोई पापकर्म कर रहा है, कोई पुण्यकर्म। यह सब क्या पहले के कर्मों का फल है? क्या यह करते ही रहना होगा?

श्रीरामकृष्ण – कर्म कब तक हैं? – जब तक उन्हें प्राप्त न कर सको। उन्हें प्राप्त कर लेने पर सब चले जाते हैं। तब पापपुण्य के पार जाया जाता है।

"फल आ जाने पर फूल चला जाता है। फूल दीख पड़ता है फल होने के लिए।

"सन्ध्यादि कर्म कितने दिन के लिए? – जितने दिन तक ईश्वर का नामस्मरण करते हुए रोमांच न हो आए, आँखों में आँसू न आ जाएँ। ये सब अवस्थाएँ ईश्वर-प्राप्ति के लक्षण है, ईश्वर पर शुद्धा-भक्ति प्राप्त करने के लक्षण हैं।

"उन्हें जान लेने पर मनुष्य पाप और पुण्य दोनों के परे चला जाता है। रामप्रसाद ने कहा है, भुक्ति और मुक्ति को मैं मस्तक पर धारण करता हूँ; और काली ब्रह्म है, यह मर्म जानकर धर्माधर्म को मैंने छोड़ ही दिया है।

"उनकी ओर जितना बढ़ोगे, उतना ही वे कर्म घटा देंगे। गृहस्थ की बहू गर्भवती होने पर उसकी सास धीरे धीरे उसका काम घटा देती है। जब दसवाँ महीना होता है, तब बिलकुल काम घटा दिया जाता है। बच्चा हो जाने पर वह उसी को लेकर व्यस्त रहती है, उसी को लेकर आनन्द करती है।"

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

२७ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ७१ | ४१३

२७ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ७१४१३

श्रीश – संसार में रहते हुए उनकी ओर जाना बड़ा कठिन है।

अभ्यास-योग और निर्जन में साधना

श्रीरामकृष्ण – क्यों? अभ्यास-योग है। उस देश में बढ़ई की औरतें चिउड़ा बेचती हैं। वे कितनी ओर ध्यान देकर कितने काम सम्हालती हैं, सुनो। एक तो ढेंकी चल रही है, हाथ से वह धान सरका रही है, और एक हाथ से बच्चे को गोद में लेकर दूध पिला रही है। ऊपर के जो खरीदार आते हैं, उनसे मोल-तोल कर रही है, इधर ढेंकी का काम भी चल रहा है। खरीदार से कहती है, ‘तो तुम्हारे ऊपर जो बाकी पैसे हैं, वे सब दे जाना, तब और चीज ले जाना।’ देखो, लड़के को दूध पिलाना, ढेंकी चल रही है उसमें धान सरकाना और कूटे हुए धान निकालना, और इधर खरीदार के साथ बातचीत करना, ये सब एक साथ कर रही है। इसे ही अभ्यास-योग कहते हैं; परन्तु उसका पन्द्रह आना मन ढेंकी पर लगा हुआ है; क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि ढेंकी हाथ पर गिर जाय; और एक आना मन लड़के को दूध पिलाने और खरीदार से बातचीत करने में है। इसी तरह जो लोग संसार में हैं उन्हें पन्द्रह आना मन ईश्वर को देना चाहिए। न देने से सर्वनाश हो जाएगा – काल के हाथ पड़ना होगा। और एक आने से दूसरे काम करो।

“ज्ञान हो जाने पर संसार में रहा जा सकता है, परन्तु पहले तो ज्ञानलाभ करना चाहिए। संसार-रूपी जल में मन-रूपी दूध रखने पर दोनों मिल जाएँगे। इसलिए मन-रूपी दूध का दही बनाकर निर्जन में उसे मथकर, उससे मक्खन निकालकर, तब उसे संसार-रूपी पानी में रखना चाहिए। इससे यह स्पष्ट है कि साधना चाहिए। पहली अवस्था में निर्जन में रहना जरूरी हैं। पीपल का पेड़ जब छोटा रहता है, तब उसके चारों ओर घेरा लगाना पड़ता हैं; नहीं तो बकरे और गौएँ उसे चर जाती हैं। परन्तु उसकी पेड़ी मोटी हो जाने पर घेरा खोल दिया जा सकता है। तब तो हाथी बाँध देने पर भी उस पेड़ का कुछ नहीं बिगड़ता।

“इसीलिए प्रथम अवस्था में कभी कभी निर्जन में जाना पड़ता है। साधना आवश्यक है। भात खाओगे – बैठे बैठे कह रहे हो लकड़ी में आग है और उसी आग से चावल पकता है। इस तरह कहने से ही क्या भात तैयार हो जाएगा? एक और लकड़ी ले आकर दोनों को रगड़ना चाहिए; आग तभी तैयार होगी।

“भंग खाने से नशा होता है, आनन्द होता है। न तुमने खाया, न कुछ किया – बैठे बैठे केवल ‘भंग भंग’ कर रहे हो! क्या इससे कभी नशा या आनन्द होता है?

मनुष्यजीवन का उद्देश्य – 'दूध पियो'

“पढ़ना-लिखना चाहे लाख सीखो, ईश्वर पर भक्ति हुए बिना – उन्हें प्राप्त करने की इच्छा हुए बिना – सब मिथ्या है। केवल पण्डित है, परन्तु यदि विवेक-वैराग्य नहीं

४१४श्रीरामकृष्णवचनामृत२७ दिसम्बर, १८८३

है, तो उसकी दृष्टि कामिनी-कांचन पर अवश्य रहेगी। गीध बहुत ऊँचे उड़ते हैं, परन्तु उनकी दृष्टि मरघट पर ही रहती है।

“जिस विद्या के प्राप्त करने पर मनुष्य उन्हें पा सकता है, वही यथार्थ विद्या है, और सब मिथ्या है। अच्छा, ईश्वर के सम्बन्ध में तुम्हारी क्या धारणा है?”

श्रीश – जी, इतना बोध हुआ है कि कोई एक ज्ञानमय पुरुष हैं। उनकी सृष्टि देखने पर उनके ज्ञान का परिचय मिलता है। एक बात कहता हूँ – जिन देशों में जाड़ा ज्यादा होता है, वहाँ मछलियों और दूसरे जल-जन्तुओं को बचा रखने के लिए ईश्वर ने यह कुशलता दिखायी है कि जितना ही अधिक जाड़ा पड़ता है उतना ही पानी सिमटता जाता है, परन्तु आश्चर्य यह है कि बर्फ बनने से पहले ही पानी कुछ हलका हो जाता है, और उस समय पानी का फैलाव ज्यादा हो जाता है। तालाब के पानी में वहाँ जाड़े में मछलियाँ अनायास ही रह सकती हैं। पानी के ऊपरी हिस्से में बर्फ जम गयी है, परन्तु नीचे के हिस्से में ज्यों का त्यों पानी बना रहता है। अगर खूब ठण्डी हवा चलती है, तो वह हवा बर्फ पर ही लगती है, नीचे का पानी गरम रहता है।

श्रीरामकृष्ण – वे हैं यह बात संसार देखने से ही मालूम हो जाती है। परन्तु उनके सम्बन्ध में कुछ सुनना एक बात है, उन्हें देखना और बात, और उनसे वार्तालाप करना और बात है। किसी ने दूध की बात सुनी है, किसी ने दूध देखा है, और किसी ने दूध पिया है! आनन्द तो देखने से होगा, पर पीने से देह सबल होगी, तभी तो लोग हृष्टपुष्ट होंगे। ईश्वर के दर्शन जब होंगे, तभी तो शान्ति होगी। जब उनसे वार्तालाप होगा, तभी तो आनन्द होगा और शक्ति बढ़ेगी।

मुमुक्षुत्व समयसापेक्ष

श्रीश – उन्हें पुकारने का अवसर मिलता ही नहीं।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – यह ठीक है; समय हुए बिना कुछ नहीं होता। किसी लड़के ने सोने के पहले अपनी माँ से कहा था, ‘माँ, जब मुझे टट्टी की इच्छा हो, तब उठा देना।’ उसकी माँ ने कहा, ‘बेटा, टट्टी की इच्छा तुम्हें स्वयं उठाएगी, मुझे उठाना न होगा।’

“जिसे जो कुछ देना चाहिए, यह उनका पहले से ही ठीक किया हुआ है। घर की एक पुरखिन अपनी बहुओं को एक बर्तन से नापकर चावल बनाने के लिए देती थी, पर उतना चावल उन लोगों के लिए कम पड़ता था। एक दिन वह नापनेवाला बर्तन फूट गया; इससे बहुएँ बहुत खुश हुईं। पर उस पुरखिन ने कहा, ‘तुम्हारे नाचने-कूदने या खुशी मनाने से क्या हुआ; मैं चावल अपनी मुट्ठी से नाप सकती हूँ, मुझे अन्दाज मालूम है!’

(श्रीश से) – “क्या करोगे, पूछते हो? उनके श्रीचरणों में सब कुछ समर्पित कर

२७ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ७१ | ४१५

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दो, उन्हें आम मुखत्यारी दे दो! वे जो कुछ अच्छा समझें, करें। बड़े आदमी पर अगर भार दे दिया जाय, तो वह कभी बुराई नहीं कर सकता।

“साधना की भी आवश्यकता है। परन्तु साधक दो तरह के होते हैं। एक तरह के साधकों का स्वभाव बन्दर के बच्चे जैसा होता है, दूसरे तरह के साधक का बिल्ली के बच्चे जैसा। बन्दर का बच्चा किसी तरह खुद अपनी माँ को पकड़े रहता है। इसी तरह कोई साधक सोचते हैं, हमें इतना जप करना चाहिए, इतनी देर तक ध्यान करना चाहिए, इतनी तपस्या करनी चाहिए, तब कहीं ईश्वर मिलेंगे। इस तरह के साधक अपने प्रयत्न से ईश्वर-प्राप्ति की आशा रखते हैं।

“परन्तु बिल्ली का बच्चा खुद अपनी माँ को नहीं पकड़ सकता। वह पड़ा हुआ बस ‘मीऊँ मीऊँ’ करके पुकारता है। उसकी माँ चाहे जो करे। उसकी माँ कभी उसे बिस्तर पर ले जाती है, कभी छत पर लकड़ी की आड़ में रख देती है, और कभी उसे मुँह में दबाकर यहाँ-वहाँ रखती फिरती है। वह स्वयं अपनी माँ को पकड़ना नहीं जानता। इसी तरह कोई कोई साधक स्वयं हिसाब करके साधन-भजन नहीं कर सकते कि इतना जप करूँगा, इतना ध्यान करूँगा। वह केवल व्याकुल होकर रो-रोकर उन्हें पुकारता है। उसका रोना सुनकर वे फिर रह नहीं सकते। आकर दर्शन देते हैं।”

(२)

ईश्वर कर्ता हैं, तथापि कर्मों के लिए जीव उत्तरदायी है।

दिन चढ़ आया है। घर के मालिक ने भोजन के लिए घर में कच्ची रसोई का सामान तैयार कराया है। वे बड़े व्यस्त हैं। वे घर के भीतर जाकर भोजन का प्रबन्ध कर रहे हैं।

दिन बहुत हो गया है, इसीलिए श्रीरामकृष्ण भोजन के लिए जल्दी कर रहे हैं। वे उसी कमरे में टहल रहे हैं। मुख पर प्रसन्नता झलक रही है। कभी कभी केशव कीर्तनिया से वार्तालाप कर रहे हैं।

केशव कीर्तनिया – वही करण और वही कारण हैं; दुर्योधन ने कहा था,

‘त्वया हृषीकेश हृदिस्थितेन, यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि।’

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – हाँ, वही सब कराते हैं; यह ठीक है। कर्ता वही हैं, मनुष्य तो यन्त्र-स्वरूप है।

“और यह भी ठीक है कि कर्मफल भी है। मिर्च खाने पर पेट जलता रहेगा। पाप करने से उसका फल अवश्य भोगना होगा।

“जिसे सिद्धि हो गयी है, जिसने ईश्वर को पा लिया है, वह फिर पाप नहीं कर सकता। उसके पैर बेताल नहीं पड़ते। जिसका सधा हुआ गला है, उसके स्वर में सा रे ग म बिगड़ने नहीं पाता।”

४१६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ दिसम्बर, १८८३

भोजन तैयार है। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ मकान के भीतर गए और उन्होंने आसन ग्रहण किया। ब्राह्मण का मकान है व्यंजन कई तरह के तैयार कराये गए हैं, ऊपर से अनेक प्रकार की मिठाइयाँ भी लायी गयी हैं।

दिन के तीन बजे का समय होगा। भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण ईशान के बैठकखाने में आकर बैठे। पास में श्रीश और मास्टर बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण श्रीश के साथ फिर बातचीत करने लगे।

श्रीरामकृष्ण – तुम्हारा क्या भाव है? सोऽहं या सेव्य-सेवक?

“संसारियों के लिए सेव्य-सेवक का भाव बहुत अच्छा है। सब सांसारिक काम तो कर रहे हैं, ऐसी अवस्था में ‘मैं वही हूँ’ यह भाव कैसे आ सकता है? जो कहता है, ‘मैं वही हूँ’, उसके लिए तो संसार स्वप्नवत् है; उसका अपना शरीर और मन भी स्वप्नवत् है, उसका ‘मैं’ भी स्वप्नवत् है; अतएव संसार का काम वह नहीं कर सकता। इसीलिए सेव्य-सेवक भाव, दास-भाव बहुत अच्छा है।

“दास-भाव हनुमान का था। श्रीराम से हनुमान ने कहा था ‘राम, कभी तो मैं सोचता हूँ, तुम पूर्ण हो – मैं अंश हूँ, तुम प्रभु हो – मैं दास हूँ, और जब तत्त्व का ज्ञान हो जाता है, तब देखता हूँ, मैं ही तुम हूँ, और तुम्हीं मैं हो।’

“तत्त्वज्ञान के समय सोऽहम् हो सकता है, परन्तु वह दूर की बात है।”

श्रीश – जी हाँ, दास-भाव से आदमी निश्चिन्त हो सकता है। प्रभु पर सब कुछ निर्भर है। कुत्ता बड़ा स्वामिभक्त है, इसीलिए स्वामी पर सब भार देकर वह निश्चिन्त रहता है।

साकार निराकार – नाममाहात्म्य

श्रीरामकृष्ण – अच्छा, तुम्हें साकार ज्यादा पसन्द है या निराकार? बात यह है कि जो निराकार है, वही साकार भी है। भक्त की आँखों को वे साकार रूप से दर्शन देते हैं। जैसे अनन्त जलराशि, महासमुद्र, जिसका न ओर है न छोर; उसी जल में कहीं कहीं बर्फ जम गयी है; ज्यादा ठण्डक पहुँचने पर पानी जमकर बर्फ हो जाता है। उसी तरह भक्ति-हिम द्वारा साकार रूप के दर्शन होते हैं। फिर जिस तरह सूर्योदय होने पर बर्फ गल जाती है – ज्यों का त्यों पानी हो जाता है, उसी तरह ज्ञानमार्ग या विचार-मार्ग से होकर जाने पर साकार रूप के दर्शन नहीं होते, फिर तो सब निराकार ही निराकार दीख पड़ता है। ज्ञान-सूर्योदय होने पर साकार बर्फ गल जाती है।

“परन्तु देखो, जिसकी निराकार सत्ता है, उसी की साकार भी है।”

शाम होने को है। श्रीरामकृष्ण उठे। अब दक्षिणेश्वर को लौटनेवाले हैं। बैठकखाने के दक्षिण ओर जो बरामद़ा है, उसी पर खड़े होकर ईशान से बातचीत कर रहे हैं। वहीं

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कोई कह रहे हैं, “यह तो मैं नहीं देखता कि ईश्वर का नाम लेने से प्रत्येक समय फल होता है।”

ईशान ने कहा, “यह क्या ? बट का बीज कितना छोटा होता है, परन्तु उसके भीतर कितना बड़ा पेड़ छिपा रहता है पर वह पेड़ देर से दिखायी देता है।

श्रीरामकृष्ण – हाँ हाँ, फल देर से होता है।

ईशान का मकान उनके ससुर स्वर्गीय श्री क्षेत्रनाथ चटर्जी के मकान के पूर्व ओर है। दोनों मकानों में आने-जाने का रास्ता है। श्रीरामकृष्ण चटर्जी महाशय के मकान के फाटक के पास आकर खड़े हुए। ईशान अपने बन्धु-बान्धवों को साथ लेकर श्रीरामकृष्ण को गाड़ी पर चढ़ाने के लिए आए हैं।

श्रीरामकृष्ण ईशान से कह रहे हैं, “तुम संसार में ठीक ‘पाँकाल’ मछली की तरह हो। वह रहती तो है तालाब के बीच में, पर उसकी देह में कीच छू नहीं जाती।

“माया के इस संसार में विद्या और अविद्या दोनों ही हैं। परमहंस वह है, जो हंस की तरह दूध और पानी के एक साथ रहने पर भी पानी छोड़कर दूध निकाल लेता है; चींटी की तरह बालू और चीनी के मिले रहने पर भी बालू में से चीनी निकाल ले सकता है।”

( ३ )

समन्वय और निष्ठा भक्ति। अपराध और ईश्वर-कोटि

शाम हो गयी है। श्रीरामकृष्ण भक्त रामचन्द्र के घर आए हुए हैं। यहाँ से होकर दक्षिणेश्वर जाएँगे।

रामचन्द्र के बैठकखाने को आलोकित करते हुए भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण बैठे हुए हैं। श्री महेन्द्र गोस्वामी से बातचीत कर रहे हैं। गोस्वामीजी उसी मोहल्ले में रहते हैं। श्रीरामकृष्ण इन्हें प्यार करते हैं। जब श्रीरामकृष्ण रामचन्द्र के यहाँ आते हैं तब गोस्वामीजी आकर इनसे मिल जाया करते हैं।

श्रीरामकृष्ण – वैष्णव, शाक्त सब के पहुँचने की जगह एक है; परन्तु मार्ग और और हैं। जो सच्चे वैष्णव हैं, वें शक्ति की निन्दा नहीं करते।

गोस्वामी (सहास्य) – हर-पार्वती हमारे माँ बाप हैं।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – Thank You (थैंक यू) – माँ बाप हैं।

गोस्वामी – इसके सिवाय किसी की निन्दा करने से, खास कर वैष्णवों की निन्दा से, अपराध होता है – वैष्णवापराध। सब अपराधों की क्षमा है, परन्तु वैष्णवापराध की क्षमा नहीं है।

श्रीरामकृष्ण – अपराध सब को नहीं होता। जो ईश्वरकोटि हैं, उनको अपराध नहीं होता। जैसे श्रीचैतन्यसदृश अवतारी पुरुषों को।

४१८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ दिसम्बर, १८८३

“बच्चा अगर बाप का हाथ पकड़कर चलता हो, तो वह गड्ढे में गिर सकता है, परन्तु अगर बाप बच्चे का हाथ पकड़े हुए हो तो बच्चा कभी नहीं गिर सकता।

“सुनो, मैंने माँ से शुद्धा-भक्ति की प्रार्थना की थी। माँ से कहा था, 'यह लो अपना धर्म, यह लो अपना अधर्म; मुझे शुद्धा-भक्ति दो। यह लो अपनी शुचि, यह लो अपनी अशुचि, मुझे शुद्धा-भक्ति दो। माँ, यह लो अपना पाप यह लो अपना पुण्य, मुझे शुद्धा-भक्ति दो।'”

गोस्वामी – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – सब भक्तों को नमस्कार करना। परन्तु 'निष्ठाभक्ति' भी है। सब को प्रणाम तो करना, परन्तु हृदय का उमड़ता हुआ प्यार एक ही पर हो। इसी का नाम निष्ठा है।

“राम-रूप के सिवाय और कोई रूप हनुमान को न भाता था। गोपियों की इतनी निष्ठा थी कि उन्होंने द्वारका में पगड़ीवाले श्रीकृष्ण को देखना ही न चाहा।

“स्त्री अपने देवर-जेठ आदि को पैर धोने के लिए पानी और बैठने को आसन आदि देकर सेवा करती है; परन्तु पति की जैसी सेवा करती है, वैसी वह किसी दूसरे की नहीं करती। पति के साथ उसका सम्बन्ध कुछ दूसरा है।”

रामचन्द्र ने कुछ मिठाइयाँ देकर श्रीरामकृष्ण की पूजा की।

अब वे दक्षिणेश्वर जानेवाले हैं। मणि से उन्होंने बनात लेकर शरीर ढक लिया और टोपी पहन ली। अब भक्तों के साथ वे गाड़ी पर चढ़ने लगे। रामचन्द्र आदि भक्त उन्हें चढ़ा रहे हैं, मणि भी गाड़ी पर बैठे, वे भी दक्षिणेश्वर लौट जाएँगे।

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परिच्छेद ७२

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परिच्छेद ७२

दक्षिणेश्वर में राखाल, राम, केदार प्रभृति के साथ

ब्रह्मज्ञान के सम्बन्ध में वार्तालाप

(१)

श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर बैठ रहे हैं। कालीमाता के दर्शन के लिए कालीघाट जाएँगे। श्री अधर सेन के घर होकर जायेंगे वहाँ से अधर भी साथ जायेंगे। आज शनिवार, अमावस्या है २९ दिसम्बर, १८८३। दिन के एक बजे का समय होगा।

गाड़ी उनके कमरे के उत्तर के तरफ के बरामदे के पास आकर खड़ी है। मणि गाड़ी के द्वार के पास आकर खड़े हुए।

मणि (श्रीरामकृष्ण से) – क्या मैं भी चलूँ?

श्रीरामकृष्ण – क्यों?

मणि – एक बार कलकत्ते के मकान से होकर आता।

श्रीरामकृष्ण (चिन्तित होकर) – फिर जाओगे? क्यों? यहाँ अच्छे तो हो।

मणि घर लौटेंगे, कुछ घण्टों के लिए; परन्तु श्रीरामकृष्ण की इसके लिए सम्मति नहीं है।

(२)

आज रविवार, ३० दिसम्बर, पूस की शुक्ला प्रतिपदा है। दिन के तीन बजे होंगे। मणि पेड़ के नीचे अकेले टहल रहे हैं। एक भक्त ने आकर कहा, “प्रभु बुलाते हैं।” कमरे में श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। मणि ने जाकर प्रणाम किया और जमीन पर भक्तों के बीच बैठ गए।

कलकत्ते से राम, केदार आदि भक्त आये हुए हैं। उनके साथ एक वेदान्तवादी साधु भी आए हैं। श्रीरामकृष्ण जिस दिन रामचन्द्र का बगीचा देखने गए थे उस दिन उस साधु से भेंट हुई थी। साधु पासवाले बगीचे में एक पेड के नीचे अकेले एक चारपाई पर बैठे हुए थे। राम आज श्रीरामकृष्ण की आज्ञा से उस साधु को अपने साथ लेते आए हैं। साधु ने भी श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की थी।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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४२० श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० दिसम्बर, १८८३

श्रीरामकृष्ण उस साधु के साथ आनन्दपूर्वक वार्तालाप कर रहे हैं। उन्होंने अपने पास छोटे तख्त पर साधु को बैठाया है। बातचीत हिन्दी में हो रही है।

श्रीरामकृष्ण – यह सब तुम्हें कैसा जान पड़ता है?

साधु – यह सब स्वप्नवत् है।

श्रीरामकृष्ण – ब्रह्म सत्य और संसार मिथ्या, यही न? अच्छा जी, ब्रह्म कैसा है?

साधु – शब्द ही ब्रह्म है। अनाहत शब्द।

श्रीरामकृष्ण – परन्तु शब्द का प्रतिपाद्य भी तो एक है। क्यों जी?

साधु – वही वाच्य है और वही वाचक भी है।

यह बात सुनते ही श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गए। चित्रवत् स्थिर बैठे हुए हैं। साधु और भक्तगण आश्चर्यचकित होकर श्रीरामकृष्ण की यह समाधि-अवस्था देख रहे हैं। केदार साधु से कह रहे हैं, “यह देखिए, इसे समाधि कहते हैं”।

साधु ने ग्रन्थों में ही समाधि की बात पढ़ी थी। समाधि कैसे होती है, यह उन्होंने कभी नहीं देखा था।

श्रीरामकृष्ण धीरे धीरे अपनी प्राकृत अवस्था में आ रहे हैं। अभी जगन्माता के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। कहते हैं – “माँ, अच्छा हो जाऊँ, बेहोश न कर देना। साधु के साथ सच्चिदानन्द की बातें करूँगा। सच्चिदानन्द की बातें करते हुए आनन्द मनाऊँगा।”

साधु निर्वाक् होकर देख रहे हैं और ये सब बातें सुन रहे हैं। अब श्रीरामकृष्ण साधु से बातचीत करने लगे। कहते हैं – अब तुम ‘सोऽहम्’ उड़ा दो। अब ‘हम और तुम’ लेकर विलास करें।

जब तक ‘हम’ और ‘तुम’ यह भाव है, तब तक माँ भी हैं। आओ, उन्हें लेकर आनन्द किया जाय। श्रीरामकृष्ण के कथन का शायद यही मर्म है।

कुछ देर इस तरह बातचीत हो जाने के बाद श्रीरामकृष्ण पंचवटी में टहलने चले गए। राम, केदार, मास्टर आदि उनके साथ हैं।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – साधु को तुमने कैसा देखा।

केदार – उसका शुष्क ज्ञान है। अभी उसने हण्डी चढ़ायी भर है – अभी चावल नहीं चढ़ाए गए।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह ठीक है, परन्तु है त्यागी। जिसने संसार को त्याग दिया है, वह बहुत-कुछ आगे बढ़ गया है।

“साधु अभी प्रवर्त्तक है। उन्हें अगर कोई प्राप्त न कर सका, तो उसका कुछ भी नहीं हुआ। जब उनके प्रेम में मस्त हुआ जाता है, तब और कुछ नहीं सुहाता। तब तो – ‘आदरणीय श्यामा माँ को बड़े यत्न से हृदय में धारण किए रहो। मन तू देख और मैं देखूँ, और कोई न देखने पाए।’ ”

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

३० दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ७२ | ४२१

३० दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ७२ | ४२१

केदार श्रीरामकृष्ण के भाव के अनुरूप एक गीत गाते हैं -

(भावार्थ) – “सखि, मन की बात कैसे कहूँ? कहने की मनाई है। दर्द को समझनेवाले के बिना प्राण कैसे बच सकेंगे! जो मन का मीत होता है वह देखते ही पहचान में आ जाता है। वह विरला ही होता है।...”

श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में लौट आए हैं। चार बजे का समय है - कालीमन्दिर खुल गया। श्रीरामकृष्ण साधु को लेकर कालीमन्दिर जा रहे हैं। मणि भी साथ हैं।

कालीमन्दिर में प्रवेश कर श्रीरामकृष्ण भक्तिपूर्वक माता को प्रणाम कर रहे हैं। साधु भी हाथ जोड़कर सिर झुका माता को बारम्बार प्रणाम कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, दर्शन कैसे हुए?

साधु (भक्तिभाव से) – काली प्रधान है।

श्रीरामकृष्ण – काली और ब्रह्म दोनों अभेद हैं। क्यों जी?

साधु – जब तक बहिर्मुख है तब तक काली को मानना होगा। जब तक बहिर्मुख है तब तक भले बुरे दोनों भाव हैं - तब तक एक प्रिय और दूसरा त्याज्य, यह भाव है ही।

“देखिये न, नाम और रूप ये सब तो मिथ्या ही हैं, परन्तु जब तक मैं बहिर्मुख हूँ तब तक मुझे स्त्रियों को त्याज्य समझना चाहिए। और उपदेश के लिए 'यह अच्छा है, यह बुरा है' यह भाव रखना चाहिए - नहीं तो भ्रष्टाचार फैलेगा।”

श्रीरामकृष्ण साधु के साथ बातचीत करते हुए कमरे में लौटे।

श्रीरामकृष्ण – देखा, साधु ने कालीमन्दिर में प्रणाम किया।

मणि – जी हाँ।

(३)

दूसरे दिन सोमवार, ३१ दिसम्बर है। दिन का तीसरा पहर, चार बजे का समय होगा। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ कमरे में बैठे हुए हैं। बलराम, मणि, राखाल, लाटू, हरीश आदि भक्त भी हैं। श्रीरामकृष्ण मणि और बलराम से कह रहे हैं -

“हलधारी का ज्ञानियों जैसा भाव था। वह अध्यात्मरामायण, उपनिषद् – यही सब दिनरात पढ़ता था। इधर साकार की बातों से मुँह फेरता था। मैंने जब कंगालों के भोजन कर जाने पर उनकी पत्तलों से थोड़ा थोड़ा अन्न लेकर खाया, तब उसने कहा, 'तेरे लड़कों का विवाह कैसे होगा?' मैंने कहा, 'क्यों रे साला, मेरे लड़के-बच्चे भी होंगे! आग लगे तेरे गीता और वेदान्त पढ़ने में!' देखो न, इधर तो कहता है – संसार मिथ्या है और फिर विष्णुमन्दिर में नाक सिकोड़कर ध्यान!”

शाम हो गयी है। बलराम आदि भक्त कलकत्ता चले गये हैं। श्रीरामकृष्ण अपने

४२२ श्रीरामकृष्णवचनामृत · ३० दिसम्बर, १८८३

कमरे में बैठे हुए माता का चिन्तन कर रहे हैं। कुछ देर बाद मन्दिर में आरती का मधुर शब्द सुनायी पड़ने लगा।

रात के आठ बज चुके हैं। श्रीरामकृष्ण भाव में आकर मधुर स्वर से माता के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। मणि जमीन पर बैठे हुए हैं।

श्रीरामकृष्ण मधुर कण्ठ से नामोच्चारण कर रहे हैं – “हरि ॐ! हरि ॐ! हरि ॐ!”

माँ से कह रहे हैं – “माँ! ब्रह्मज्ञान देकर मुझे बेहोश न कर रखना। मैं ब्रह्मज्ञान नहीं चाहता माँ! मैं आनन्द करूँगा! विलास करूँगा!”

फिर कहते हैं – “माँ, मैं वेदान्त नहीं जानता – जानना भी नहीं चाहता! माँ, तुझे पाने पर वेद-वेदान्त कितने नीचे पड़े रहते हैं!”

“अरे कृष्ण! मैं तुझे कहूँगा, ‘यह ले – खा ले – बच्चे!’ कृष्ण! कहूँगा, ‘तू मेरे ही लिए देहधारण करके आया है।’ ”

परिच्छेद ७३

परिच्छेद ७३

ईश्वर-दर्शन के उपाय

(१)

श्रीरामकृष्ण तथा तान्त्रिक भक्त

आज पौष शुक्ला चतुर्थी है; २ जनवरी १८८४। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में निवास कर रहे हैं। आजकल राखाल, लाटू, हरीश, रामलाल, मास्टर दक्षिणेश्वर में निवास कर रहे हैं।

दिन के तीन बजे का समय होगा – श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने के लिए मणि बेलतला से उनके कमरे की ओर आ रहे हैं। वे एक तान्त्रिक भक्त के साथ पश्चिम के बरामदे में बैठे हैं।

मणि ने आकर भूमि पर माथा टेककर प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण ने उन्हें अपने पास बैठने के लिए कहा। सम्भव है, तान्त्रिक भक्त के साथ वार्तालाप करते करते उन्हें भी उपदेश देंगे। श्री महिम चक्रवर्ती ने तान्त्रिक भक्त को श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने के लिए भेजा है। भक्त गेरुआ वस्त्र धारण किये हैं।

श्रीरामकृष्ण – (तान्त्रिक भक्त के प्रति) – ये सब तान्त्रिक साधना के अंग हैं; कपाल-पात्र में सुधा का पान करना! उस सुधा को कारणवारि कहते हैं, है न?

तान्त्रिक – जी हाँ!

श्रीरामकृष्ण – ग्यारह पात्र, न?

तान्त्रिक – तीन तोला भर! शव-साधना के लिए।

श्रीरामकृष्ण – पर मैं तो सुरा छू तक नहीं सकता।

तान्त्रिक – आपका सहजानन्द है, यह आनन्द होने पर और फिर क्या चाहिए!

श्रीरामकृष्ण – फिर देखो, मुझे जप-तप भी अच्छे नहीं लगते। सदा स्मरण-मनन रहता है। अच्छा, षट्चक्र क्या चीज है?

तान्त्रिक – जी, वह सब अनेक तीर्थों की तरह है। प्रत्येक चक्र में शिव शक्ति विराजमान हैं, वे आँख से देखे नहीं जाते, शरीर काटने पर भी नहीं मिलते।

४२४श्रीरामकृष्णवचनामृत२ जनवरी १८८४

मणि चुपचाप सब सुन रहे हैं, उनकी ओर देखकर श्रीरामकृष्ण तान्त्रिक भक्त से पूछ रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (तान्त्रिक के प्रति) – अच्छा, बीजमन्त्र पाये बिना क्या कुछ सिद्ध होता है?

तान्त्रिक – होता है, विश्वास द्वारा – गुरुवाक्य पर विश्वास!

श्रीरामकृष्ण – (मणि की ओर इशारा करके) – विश्वास!

तान्त्रिक भक्त के चले जाने पर ब्राह्म समाज के श्री जयगोपाल सेन आये। श्रीरामकृष्ण उनके साथ वार्तालाप कर रहे हैं। राखाल, मणि आदि भक्तगण पास बैठे हैं। तीसरे पहर का समय है।

श्रीरामकृष्ण – (जयगोपाल के प्रति) – किसी से, किसी मत से विद्वेष नहीं करना चाहिए। निराकारवादी, साकारवादी, सभी उन्हीं की ओर जा रहे हैं; ज्ञानी, योगी, भक्त सभी उन्हें खोज रहे हैं। ज्ञानमार्ग के लोग कहते हैं, ब्रह्म; योगीगण कहते हैं आत्मा, परमात्मा; भक्तगण कहते हैं, भगवान; फिर यह भी है, नित्यदेव नित्यदास।

जयगोपाल – कैसे जानूँ कि सभी पथ सत्य हैं?

श्रीरामकृष्ण – किसी एक पथ से ठीक-ठीक जा सकने पर उनके पास पहुँचा जा सकता है, उस समय सभी पथों का पता भी जाना जा सकता है। जैसे एक बार किसी तरह यदि छत पर उठना सम्भव हो सके, तो लकड़ी की सीढ़ी से भी उतरा जा सकता है, पक्की सीढ़ी से भी, एक बाँस के सहारे भी और एक रस्सी के द्वारा भी।

“उनकी कृपा होने पर भक्त सब कुछ जान सकता है। उन्हें एक बार प्राप्त करने पर सब कुछ जान सकोगे। एक बार किसी भी तरह बड़े बाबू के साथ साक्षात्कार करना चाहिए, उनसे बातचीत करनी चाहिए – तब बाबू स्वयं ही बता देंगे कि उनके कितने बगीचे, तालाब, या कम्पनी के काग़ज़ हैं।”

ईश्वर-दर्शन के उपाय

जयगोपाल – उनकी कृपा कैसे होती है?

श्रीरामकृष्ण – सदा उनके नाम व गुणों का कीर्तन करना चाहिए, जहाँ तक सम्भव हो सांसारिक चिन्तन का त्याग करना चाहिए। तुम खेती करने के लिए अनेक कष्ट से खेत में जल ला रहे हो, परन्तु खेत की मेंड़ पर के एक छेद में से सब जल बाहर निकल जा रहा है। तब तो नाली काटकर जल लाना व्यर्थ हुआ, वृथा श्रम ही हुआ।

“चित्तशुद्धि होने पर, विषय-भोग की आसक्ति दूर हो जाने पर व्याकुलता आयेगी। तुम्हारी प्रार्थना ईश्वर के पास पहुँचेगी। टेलिग्राफ का तार टूटा रहने पर अथवा उसमें अन्य कोई दोष रहने पर तार का समाचार नहीं पहुँचेगा।

२ जनवरी, १८८४ परिच्छेद ७३ ४२५

२ जनवरी, १८८४ परिच्छेद ७३ ४२५

“मैं व्याकुल होकर एकान्त में रोता था। ‘कहाँ हो नारायण’ कह कर रोता था। रोते-रोते बाह्य ज्ञान लुप्त हो जाता था। मैं महावायु में लीन हो जाता था।

“योग कैसे होता है? टेलिग्राफ का तार टूटा न रहने पर या उसमें कोई दोष न रहने पर होता है। विषयों के प्रति आसक्ति का एकदम त्याग।

“किसी प्रकार की कामना-वासना नहीं रखनी चाहिए। कामना-वासना रहने पर उसे सकाम भक्ति कहते हैं, निष्काम भक्ति को अहेतुकी भक्ति कहते हैं। तुम प्यार करो या न करो फिर भी मैं तुम्हें प्यार करता हूँ – इसीका नाम है अहेतुक प्रेम!

“बात यह है, – उनसे प्रेम करना। प्रेम गहरा होने पर दर्शन होता है। पति पर सती का आकर्षण, सन्तान पर माँ का आकर्षण और विषयप्रिय व्यक्ति का सांसारिक विषयों के प्रति आकर्षण – ये तीन आकर्षण यदि एक ही साथ हो तो ईश्वर का दर्शन होता है।”

जयगोपाल विषयप्रिय व्यक्ति है, क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण उन्हीं के योग्य ये सब उपदेश दे रहे हैं?

ज्ञान-पथ और विचार-पथ। भक्तियोग और ब्रह्मज्ञान

श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में बैठे हुए हैं। रात के आठ बजे होंगे। आज पूस की शुक्ला पञ्चमी है; बुधवार, २ जनवरी, १८८४। कमरे में राखाल और मणि हैं। श्रीरामकृष्ण के साथ रहने का मणि का आज इक्कीसवाँ दिन है।

श्रीरामकृष्ण ने मणि को तर्क-विचार करने से मना किया है।

श्रीरामकृष्ण – (राखाल से) – ज्यादा तर्क-विचार करना अच्छा नहीं। पहले ईश्वर है, फिर संसार। उन्हें पा लेने पर उनके संसार के सम्बन्ध में भी ज्ञान हो जाता है।

(मणि और राखाल से) “यदु मल्लिक से बातचीत करने पर उसके कितने मकान हैं, कितने बगीचे हैं, कम्पनी के कागजात कितने हैं – यह सब समझ में आ जाता है।

“इसीलिए तो ऋषियों ने वाल्मीकि को ‘मरा-मरा’ जपने के लिए उपदेश दिया था। इसका एक विशेष अर्थ है। ‘म’ का अर्थ है ईश्वर और ‘रा’ का अर्थ संसार, – पहले ईश्वर, फिर संसार।

“कृष्णकिशोर ने कहा था, ‘मरा-मरा’ शुद्ध मन्त्र है; क्योंकि वह ऋषि का दिया हुआ है। ‘म’ अर्थात् ईश्वर और ‘रा’ अर्थात् संसार।

“इसीलिए वाल्मीकि की तरह पहले सब कुछ छोड़कर निर्जन में व्याकुल हो रो-रोकर ईश्वर को पुकारना चाहिए। पहले आवश्यक है ईश्वर-दर्शन। उसके बाद है तर्क-विचार – शास्त्र और संसार के सम्बन्ध में।

(मणि के प्रति) “इसीलिए तुमसे कहता हूँ, अब और अधिक तर्क-विचार न करना। यही बात कहने के लिए मैं झाऊतल्ले से उठकर आया हूँ। ज्यादा तर्कविचार करने

४२६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ जनवरी, १८८४

पर अन्त में हानि होती है। अन्त में हाजरा की तरह हो जाओगे। मैं रात में अकेला रास्ते पर रो-रोकर टहलता और कहता था, 'माँ, मेरी विचार-बुद्धि पर वज्रप्रहार कर दो।'

"कहो, अब तो तर्क-विचार न करोगे?"

मणि – जी नहीं।

श्रीरामकृष्ण – भक्ति से ही सब कुछ प्राप्त होता है। जो लोग ब्रह्मज्ञान चाहते हैं, यदि वे भक्तिमार्ग पकड़े रहें, तो उन्हें ब्रह्मज्ञान भी हो जाता है।

"उनकी दया रहने पर क्या कभी ज्ञान का अभाव भी होता है? उस देश में (कामारपुकुर में) धान नापते हैं। जब राशि चुक जाती है, तब एक आदमी और धान ठेल देता है, इस तरह राशि फिर तैयार हो जाती है। माँ ही ज्ञान की राशि पूरी करती जाती हैं।

"उन्हें प्राप्त कर लेने पर पण्डितगण सब घास-पात की तरह जान पड़ते हैं। पद्मलोचन ने कहा था, तुम्हारे साथ अछूतों के घर की सभा में भी जाऊँगा, इसमें भला हर्ज ही क्या है? – तुम्हारे साथ चमार के यहाँ भी जाकर मैं भोजन कर सकता हूँ।

"भक्ति के द्वारा सब मिलते हैं। उन्हें प्यार कर सकने पर फिर किसी चीज का अभाव नहीं रह जाता। माता भगवती के पास कार्तिकेय और गणेश बैठे हुए थे। उनके गले में मणियों की माला पड़ी थी। माता ने कहा, जो पहले इस ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करके आ जायगा, उसी को मैं यह माला दे दूँगी। कार्तिक उसी समय फौरन ही मयूर पर चढ़कर चल दिये। गणेश ने धीरे-धीरे माता की परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया। गणेश जानते थे, माता के भीतर ही ब्रह्माण्ड है। माँ ने प्रसन्न होकर गणेश को हार पहना दिया। बड़ी देर बाद कार्तिक ने आकर देखा कि उनके दादा हार पहने हुए बैठे थे।

"मैंने माँ से रो-रोकर कहा था, 'माँ! वेद-वेदान्त में क्या है, मुझे बता दो, – पुराण-तन्त्रों में क्या है, मुझे बता दो।'

"उन्होंने मुझे सब कुछ बता दिया है – कितनी बातें दिखायी हैं।

"सच्चिदानन्द गुरु को रोज प्रातःकाल पुकारते हो न?"

मणि – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – गुरु कर्णधार हैं। फिर देखा, 'मैं' एक अलग हूँ, 'तुम' एक अलग। फिर कूदा और मछली बन गया। देखा कि सच्चिदानन्द-समुद्र में आनन्दपूर्वक विचर रहा हूँ।

"ये सब बड़ी ही गुह्य कथाएँ हैं। तर्क-विचार करके क्या समझोगे? वे जब दिखा देते हैं, तब सब प्राप्त होता है, किसी वस्तु का अभाव नहीं रहता।"

शुक्रवार, ४ जनवरी १८८४ ई.। दिन के चार बजे के समय श्रीरामकृष्ण पंचवटी में बैठे हैं। मुख पर हँसी है और साथ हैं मणि, हरिपद आदि। हरिपद के साथ स्व. आनन्द चॅटर्जी के बारे में बातें हो रही हैं और घोषपाड़ा के साधन-भजन की बातें।