अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
text श्रीराम विजय
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अशोक-वाटिकामें सीता
ततः सीतां नमस्कृत्य हनूमानब्रवीद्वचः ।
आज्ञापयतु मां देवि भवती रामसन्निधिम् ॥ (अ० रा० सु० ५ । १)
सुन्दरकाण्ड - सर्ग १: हनुमान्जीका समुद्रोलङ्घन और लंका-प्रवेश
ॐ
अध्यात्मरामायण
सुन्दरकाण्ड
प्रथम सर्ग
हनुमान्जीका समुद्रोल्लङ्घन और लंका-प्रवेश।
श्रीमहादेव उवाच
शतयोजनविस्तीर्णं समुद्रं मकरालयम्।
लिलङ्घयिषुरानन्दसन्दोहो मारुतात्मजः ॥ १ ॥
ध्यात्वा रामं परात्मानमिदं वचनमब्रवीत्।
पश्यन्तु वानराः सर्वे गच्छन्तं मां विहायसा ॥ २ ॥
अमोघं रामनिर्मुक्तं महाबाणमिवाखिलाः।
पश्याम्यद्यैव रामस्य पत्नीं जनकनन्दिनीम् ॥ ३ ॥
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! आनन्दघन श्रीहनुमान्जी सौ योजनतक फैले हुए और मकरादि दुष्ट जल-जन्तुओंसे पूर्ण समुद्रको लाँघनेके लिये उद्यत हो परमात्मा रामका स्मरण कर इस प्रकार बोले—"हे वानरगण ! तुम सब इस ओर देखो। मैं भगवान् रामके छोड़े हुए अमोघ बाणके समान आकाश-मार्गसे जाता हूँ। मैं आज ही रामप्रिया जनकनन्दिनी श्रीसीताजीको देखूँगा ॥ १–३ ॥
कृतार्थोऽहं कृतार्थोऽहं पुनः पश्यामि राघवम्।
प्राणप्रयाणसमये यस्य नाम सकृत्स्मरन् ॥ ४ ॥
नरस्तीर्त्वा भवाम्भोधिमपारं याति तत्पदम्।
किं पुनस्तस्य दूतोऽहं तदङ्गाङ्गुलिमुद्रिकः ॥ ५ ॥
तमेव हृदये ध्यात्वा लङ्घयिष्याल्पवारिधिम्।
इत्युक्त्वा हनुमान्बाहु प्रसार्रायतवालधिः ॥ ६ ॥
ऋजुग्रीवोर्ध्वदृष्टिः सन्नाकुञ्चितपदद्वयः।
दक्षिणाभिमुखस्तूर्णं पुप्लुवेऽनिलविक्रमः ॥ ७ ॥
निश्चय ही, अब मैं कृतकार्य होकर ही पुनः श्रीरघुनाथजीका दर्शन करूँगा। प्राण-प्रयाणके समय जिनके नामका एक वार स्मरण करनेसे ही मनुष्य अपार संसार-सागरको पार कर उनके परमधामको चला जाता है, फिर मैं उन्हींका दूत उनके अवयव-रूप अँगुलिकी अँगूठी लिये हुए अपने हृदयमें उन्हीं-का ध्यान करता हुआ इस तुच्छ समुद्रको लाँघ जाऊँ तो इसमें कौन बड़ी बात है?" ऐसा कह श्रीहनुमान्जीने अपनी बाँहें फैलायीं और पूँछको सीधा किया तथा तुरन्त ही गरदनको सीधा एवं दृष्टिको ऊपरकी ओर कर पाँव सिकोड़ लिये और दक्षिणकी ओर मुख करके वायु-वेगसे उड़ान लगायी ॥ ४–७ ॥
आकाशाच्चरितं देवैर्वीक्ष्यमाणो जगाम सः।
दृष्ट्वाऽनिलसुतं देवा गच्छन्तं वायुवेगतः ॥ ८ ॥
परीक्षणार्थं सत्त्वस्य वानरस्येदमब्रुवन्।
गच्छत्येष महासत्त्वो वानरो वायुविक्रमः ॥ ९ ॥
उस समय वे देवताओंके देखते-देखते आकाश-मार्गसे बड़े तीव्र वेगसे जा रहे थे। पवनपुत्र हनुमान्जीको इस प्रकार वायु-वेगसे जाते देख देवताओंने उनकी सामर्थ्यकी परीक्षाके लिये आपसमें इस प्रकार कहा—"यह महाशक्तिशाली वानर वायुके समान तीव्र वेगसे जा रहा है ॥ ८-९ ॥ किन्तु पता
| २०४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १ |
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लङ्कां प्रवेष्टुं शक्तो वा न वा जानीमहे बलम् ।<br>एवं विचार्य नागानां मातरं सुरसाभिधाम् ॥१०॥<br>अब्रवीद्देवतावृन्दः कौतूहलसमन्वितः ।<br>गच्छ त्वं वानरेन्द्रस्य किञ्चिद्विघ्नं समाचर ॥११॥<br>ज्ञात्वा तस्य बलं बुद्धिं पुनरेहि त्वरान्विता ।<br>इत्युक्ता सा ययौ शीघ्रं हनुमद्विघ्नकारणात् ॥१२॥<br>आवृत्य मार्ग पुरतः स्थित्वा वानरमब्रवीत् ।<br>एहि मे वदनं शीघ्रं प्रविशस्व महामते ॥१३॥<br>देवैस्त्वं कल्पितो भक्ष्यः क्षुधासम्पीडितात्मनः ।<br>तामाह हनुमान्मातरहं रामस्य शासनात् ॥१४॥<br>गच्छामि जानकीं द्रष्टुं पुनरागम्य सत्वरः ।<br>रामाय कुशलं तस्याः कथयित्वा त्वदाननम् ॥१५॥<br>प्रवेक्ष्ये देहि मे मार्गं सुरसायै नमोऽस्तु ते ।<br>इत्युक्ता पुनरेवाह सुरसा क्षुधितास्म्यहम् ॥१६॥<br>प्रविश्य गच्छ मे वक्त्रं नो चेत्त्वां भक्षयाम्यहम् ।<br>इत्युक्तो हनुमानाह मुखं शीघ्रं विदारय ॥१७॥<br>प्रविश्य वदनं तेऽद्य गच्छामि त्वरान्वितः ।<br>इत्युक्त्वा योजनायामदेहो भूत्वा पुरः स्थितः ॥१८॥ | नहीं यह लंकामें घुस सकेगा या नहीं । अतः इसके बलका पता लगाना चाहिये।” परस्पर ऐसा विचारकर उन्होंने कुतूहलवश नागमाता सुरसासे कहा— “सुरसे ! तुम अभी जाकर इस वानरश्रेष्ठके मार्गमें कुछ विघ्न खड़ा करो और इसकी बल-बुद्धिका पता लगाकर तुरन्त लौट आओ ।” देवताओंके इस प्रकार कहनेपर वह तुरन्त ही हनुमान्जीको विघ्न उपस्थित करनेके लिये गयी ॥१०–१२॥ वह उनके मार्गको सामनेसे रोककर खड़ी हो गयी और बोली—“हे महामते ! आओ, शीघ्र ही मेरे मुखमें प्रवेश करो; मैं भूखसे अत्यन्त व्याकुल थी, अतः देवताओंने तुम्हें मेरा भक्ष्य बनाया है ।” तब हनुमान्जीने उससे कहा—“हे मातः ! मैं श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे जानकीजीको देखनेके लिये जा रहा हूँ । वहाँसे शीघ्र ही लौटकर श्रीरघुनाथजीको उनका कुशल-समाचार सुनाकर फिर मैं तेरे मुखमें प्रवेश करूँगा । हे सुरसे ! मैं तुझे प्रणाम करता हूँ, तू मेरा मार्ग छोड़ दे ।” इसपर सुरसाने फिर कहा—“मुझे बड़ी भूख लगी है । अतः एक बार मेरे मुखमें प्रवेश करके फिर चले जाना, नहीं तो मैं तुम्हें खा जाऊँगी ।” तब हनुमान्जीने कहा— “अच्छा तो शीघ्र ही अपना मुख खोल । मैं अभी तेरे मुखमें घुसकर तुरन्त ही लंकाको चला जाऊँगा ।” ऐसा कह हनुमान्जी अपना शरीर एक योजन लम्बा-चौड़ा बनाकर सामने खड़े हो गये ॥ १३–१८ ॥ दृष्ट्वा हनुमतो रूपं सुरसा पञ्चयोजनम् ।<br>मुखं चकार हनुमान् द्विगुणं रूपमादधत् ॥१९॥<br>ततश्चकार सुरसा योजनानां च विंशतिम् ।<br>वक्त्रं चकार हनुमान्त्रिंशद्योजनसम्मितम् ॥२०॥<br>ततश्चकार सुरसा पञ्चाशद्योजनायतम् ।<br>वक्त्रं तदा हनूमांस्तु बभूवाङ्गुष्ठसन्निभः ॥२१॥<br>प्रविश्य वदनं तस्याः पुनरेत्य पुरः स्थितः ।<br>प्रविष्टो निर्गतोऽहं ते वदनं देवि ते नमः ॥२२॥<br>एवं वदन्तं दृष्ट्वा सा हनूमन्तमथाब्रवीत् ।<br>गच्छ साधय रामस्य कार्यं बुद्धिमतां वर ॥२३॥ | हनुमान्जीका वह रूप देखकर सुरसाने अपना मुख पाँच योजन फैलाया; तब हनुमान्जीने अपना शरीर उससे दूना कर लिया ॥ १९ ॥ फिर सुरसाने अपना मुख बीस योजन किया तो हनुमान्जीने अपना देह तीस योजनका कर लिया ॥ २० ॥ इसपर जब सुरसाने अपना मुख पचास योजन फैलाया तो हनुमान्जी अँगूठेके समान छोटे-से आकारके हो गये और चट उसके मुखमें जाकर बाहर निकल आये तथा उसके सामने खड़े होकर बोले—‘हे देवि ! मैं तुम्हारे मुखमें जाकर फिर निकल आया हूँ, अब तुम्हें नमस्कार है” ॥ २१-२२ ॥ हनुमान्जीको इस प्रकार कहते देख सुरसा बोली—“हे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ ! जाओ, श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सिद्ध करो । हे वानर ! देवता-लोग तुम्हारा बल जानना चाहते थे अतः उन्होंने मुझे
सर्ग १ ] | सुन्दरकाण्ड | २०५
देवैः सम्प्रेषिताऽहं ते बलं जिज्ञासुभिः कपे ।
दृष्ट्वा सीतां पुनर्गत्वा रामं द्रक्ष्यसि गच्छ भोः ॥२४॥
इत्युक्त्वा सा ययौ देवलोकं वायुसुतः पुनः ।
जगाम वायुमार्गेण गरुत्मानिव पक्षिराट् ॥२५॥
समुद्रोऽप्याह मैनाकं मणिकाञ्चनपर्वतम् ।
गच्छत्येष महासत्त्वो हनूमान्मारुतात्मजः ॥२६॥
रामस्य कार्यसिद्ध्यर्थं तस्य त्वं सचिवो भव ।
सगरैर्वर्धितो यस्मात्पुराऽहं सागरोऽभवम् ॥२७॥
तस्यान्वये बभूवासौ रामो दाशरथिः प्रभुः ।
तस्य कार्यार्थसिद्ध्यर्थं गच्छत्येष महाकपिः ॥२८॥
त्वमुत्तिष्ठ जलात्तूर्णं त्वयि विश्रम्य गच्छतु ।
स तथेति प्रादुरभूज्जलमध्यान्महोन्नतः ॥२९॥
नानामणिमयैः शृङ्गैस्तस्योपरि नराकृतिः ।
प्राह यान्तं हनूमन्तं मैनाकोऽहं महाकपे ॥३०॥
समुद्रेण समादिष्टस्त्वद्विश्रामाय मारुते ।
आगच्छामृतकल्पानि जग्ध्वा पक्वफलानि मे ॥३१॥
विश्रम्यात्र क्षणं पश्चाद्गमिष्यसि यथासुखम् ।
एवमुक्तोऽथ तं प्राह हनूमान्मारुतात्मजः ॥३२॥
गच्छतो रामकार्यार्थं भक्षणं मे कथं भवेत् ।
विश्रामो वा कथं मे स्याद्गन्तव्यं त्वरितं मया ॥३३॥
इत्युक्त्वा स्पृष्टशिखरः कराग्रेण ययौ कपिः ।
किञ्चिद्दूरं गतस्यास्य छायां छायाग्रहोऽग्रहीत् ॥३४॥
सिंहिका नाम सा घोरा जलमध्ये स्थिता सदा ।
आकाशगामिनां छायामाक्रम्याकृष्य भक्षयेत् ॥३५॥
तया गृहीतो हनुमांश्चिन्तयामास वीर्यवान् ।
केनेदं मे कृतं वेगरोधनं विघ्नकारिणा ॥३६॥
तुम्हारे पास भेजा था । मुझे निश्चय है कि तुम सीताजीको देखकर फिर शीघ्र ही रघुनाथजीसे मिलोगे । अब तुम जाओ” ॥ २३-२४ ॥
ऐसा कहकर सुरसा देवलोकको चली गयी और श्रीहनुमान्जी फिर आकाश-मार्गसे पक्षिराज गरुड़के समान चलने लगे ॥ २५ ॥ इसी समय समुद्रने भी सुवर्ण और मणियोंसे युक्त मैनाक पर्वतसे कहा— “देखो, ये महाशक्तिशाली पवनपुत्र हनुमान्जी राम-कार्यके लिये जा रहे हैं; तुम उनकी सहायता करो । पूर्वकालमें मुझे सगर-पुत्रोंने बढ़ाया था, इसीसे मैं सागर कहलाता हूँ ॥ २६-२७ ॥ ये दशरथनन्दन भगवान् राम उन्हींके वंशमें प्रकट हुए हैं और ये कपिराज उन्हींका कार्य सिद्ध करनेके लिये जा रहे हैं ॥ २८ ॥ तुम तुरन्त ही जलसे ऊपर उठ जाओ, जिससे ये तुम्हारे ऊपर कुछ देर विश्राम लेकर आगे जायँ ।” तब मैनाक पर्वत ‘बहुत अच्छा’ कह तुरन्त अपने अनेक मणिमय शिखरोंसे पानीसे ऊपर बहुत ऊँचा निकल आया । और उन शृङ्गोंके ऊपर मनुष्याकारसे स्थित होकर उसने जाते हुए हनुमान्जीसे कहा— “हे महाकपे ! मैं मैनाक हूँ । हे मारुते ! समुद्रने मुझे तुम्हें विश्राम देनेके लिये आज्ञा दी है । आओ, मेरे ये अमृत-तुल्य फल खाओ ॥ २९-३१ ॥ कुछ देर यहाँ विश्राम करके फिर आनन्दपूर्वक चले जाना ।” मैनाकके इस प्रकार कहनेपर पवनपुत्र हनुमान्जी बोले—॥ ३२ ॥ “राम-कार्यके लिये जाते हुए मैं भोजनादि कैसे कर सकता हूँ ? और मुझे जल्दी ही जाना है, अतः विश्रामका अवकाश भी कहाँ है ?”॥ ३३॥
ऐसा कह कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी (मैनाकका मान रखनेके लिये) उसके शिखरको केवल अँगुल़ीसे छूकर आगे चल दिये । वे कुछ ही आगे बढ़े थे कि उनकी छायाको एक छायाग्रहने पकड़ लिया ॥ ३४ ॥ वह सिंहिका नामकी एक घोर राक्षसी थी जो सदा जलमें रहकर आकाशमें जाते हुए जीवोंकी छाया पकड़कर उन्हें खींच लेती थी और खा जाया करती थी ॥ ३५ ॥ उससे पकड़े जानेपर महापराक्रमी श्रीहनुमान्जी सोचने लगे—‘यह ऐसा कौन विघ्न-कारक है जिसने मेरा वेग रोक लिया ? दिखायी
text २०६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १
दृश्यते नैव कोऽप्यत्र विस्मयो मे प्रजायते । तो यहाँ कोई देता नहीं, इससे मुझे बड़ा आश्चर्य एवं विचिन्त्य हनूमानधो दृष्टिं प्रसारयत् ॥३७॥ हो रहा है।' ऐसे सोचते-सोचते उन्होंने अपनी दृष्टि नीचेकी ओर की तो उन्हें वहाँ बड़े विकराल रूप और तत्र दृष्ट्वा महाकायां सिंहिकां घोररूपिणीम् । स्थूल शरीरवाली सिंहिका राक्षसी दिखलायी दी । उसे पपात सलिले तूर्णं पद्भ्यामेवाहनद्रुषा ॥३८॥ देखते ही वे तुरन्त जलमें कूद पड़े और बड़े क्रोधसे उसे लातोंसे ही मार डाला ॥३६-३८॥ इसके पश्चात् पुनरुत्प्लुत्य हनुमान्दक्षिणाभिमुखो ययौ । हनुमान्जी फिर उछलकर दक्षिणकी ओर चलने लगे, ततो दक्षिणमासाद्य कूलं नानाफलद्रुमम् ॥३९॥ और समुद्रके दक्षिण-तटपर पहुँच गये, जहाँ नाना प्रकारके फलवाले वृक्ष लगे हुए थे ॥३९॥ और तरह- नानापक्षिमृगाकीर्णं नानापुष्पलतावृतम् । तरहके पक्षियों और मृगोंसे पूर्ण तथा विविध भाँतिकी ततो ददर्श नगरं त्रिकूटाचलमूर्धनि ॥४०॥ पुष्पलताओंस आवृत था । वहाँ पहुँचकर उन्होंने त्रिकूट पर्वतके शिखरपर बसी हुई लंकापुरी देखी प्राकारैर्बहुभिर्युक्तं परिखाभिश्च सर्वतः । जो सब ओरसे अनेकों परकोटों और खाइयोंसे प्रवेक्ष्यामि कथं लङ्कामिति चिन्तापरोऽभवत्॥४१॥ घिरी हुई थी। उसे देखकर वे सोचने लगे कि मुझे किस प्रकार इस नगरमें जाना चाहिये ॥४०-४१॥ फिर निश्चय रात्रौ वेक्ष्यामि सूक्ष्मोऽहं लङ्कां रावणपालिताम् । किया कि मैं रात्रिके समय सूक्ष्म शरीर धारणकर इस एवं विचिन्त्य तत्रैव स्थित्वा लङ्कां जगाम सः॥४२॥ रावणप्रतिपालित लंकापुरीमें प्रवेश करूँगा । यह विचारकर वे वहीं ठहर गये और फिर (रात्रि होनेपर) लंकाकी ओर चले ॥ ४२ ॥
धृत्वा सूक्ष्मं वपुर्द्वारं प्रविवेश प्रतापवान् । जिस समय महाप्रतापी श्रीहनुमान्जीने सूक्ष्म शरीर तत्र लङ्कापुरी साक्षाद्राक्षसीवेषधारिणी ॥४३॥ धारण कर नगरके द्वारमें प्रवेश किया उस समय वहाँ साक्षात् लंकापुरी राक्षसीका रूप धारण किये खड़ी थी प्रविशन्तं हनूमन्तं दृष्ट्वा लङ्का न्यतर्जयत् । ॥ ४३ ॥ उसने हनुमान्जीको नगरमें जाते देख डाँटा कस्त्वं वानररूपेण मामनादृत्य लङ्किनीम् ॥४४॥ और पूछा—"तू कौन है जो इस रात्रिके समय मुझ लंकिनीका अनादर कर चोरके समान वानररूपसे प्रविश्य चोरवद्रात्रौ किं भवान्कर्तुमिच्छति । नगरमें जा रहा है ? और (यहाँ) तू क्या करना इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षी पादेनाभिजघान तम्॥४५॥ चाहता है ?" ऐसा कह उसने क्रोधसे आँखें लाल कर उनके लात मारी ॥ ४४-४५ ॥ तब हनुमान्जीने हनुमानपि तां वाममुष्टिनाऽवज्ञयाऽहनत् । उसकी अवज्ञा करते हुए उसे बायें हाथका घूँसा मारा, तदैव पतिता भूमौ रक्तमुद्वमती भृशम् ॥४६॥ जिससे वह बहुत-सा रुधिर वमन करती हुई पृथिवी- पर गिर पड़ी ॥ ४६ ॥ फिर कुछ देर पीछे लंकिनीने उत्थाय प्राह सा लङ्का हनूमन्तं महाबलम् । उठकर महाबली हनुमान्जीसे कहा—"हे हनुमन् ! हनूमन् गच्छ भद्रं ते जिता लङ्का त्वयाऽनघ ॥४७॥ जाओ, तुम्हारा कल्याण हो; हे अनघ ! तुम लंकापुरी- को जीत चुके ॥ ४७ ॥ पूर्वकालमें मुझसे श्रीब्रह्माजीने पुराऽहं ब्रह्मणा प्रोक्ता ह्यष्टाविंशतिपर्यये । कहा था कि 'अट्ठाईसवें चतुर्युगके त्रेतायुगमें त्रेतायुगे दाशरथी रामो नारायणोऽव्ययः ॥४८॥ अविनाशी नारायणदेव दशरथकुमार रामरूपसे अवतीर्ण होंगे और उनकी योगमाया महाराज जनकके घरमें जनिष्यते योगमाया सीता जनकवेश्मनि । सीताजी होकर प्रकट होंगी, क्योंकि मैंने पहले कभी भूभारहरणार्थाय प्रार्थितोऽयं मया क्वचित् ॥४९॥ उनसे पृथिवीका भार उतारनेके लिये प्रार्थना की थी
सर्ग १ ] सुन्दरकाण्ड २०७
| सभार्यो राघवो भ्रात्रा गमिष्यति महावनम् ।<br>तत्र सीतां महामायां रावणोऽपहरिष्यति ॥५०॥<br>पश्चाद्रामेण साचिव्यं सुग्रीवस्य भविष्यति ।<br>सुग्रीवो जानकीं द्रष्टुं वानरान्प्रेषयिष्यति ॥५१॥<br>तत्रैको वानरो रात्रावागमिष्यति तेऽन्तिकम् ।<br>त्वया च भर्त्सितः सोऽपि त्वां हनिष्यति मुष्टिना ५२<br>तेनाहता त्वं व्यथिता भविष्यसि यदानघे ।<br>तदैव रावणस्यान्तो भविष्यति न संशयः ॥५३॥<br>तस्मात्त्वया जिता लङ्का जितं सर्वं त्वयाऽनघ ।<br>रावणान्तःपुरवरे क्रीडाकाननमुत्तमम् ॥५४॥<br>तन्मध्येऽशोकवनिका दिव्यपादपसङ्कुला ।<br>अस्ति तस्यां महावृक्षः शिंशपानाम मध्यगः ॥५५॥<br>तत्रास्ते जानकी घोरराक्षसीभिः सुरक्षिता ।<br>दृष्ट्वैव गच्छ त्वरितं राघवाय निवेदय ॥५६॥<br>धन्याऽहमप्यद्य चिराय राघव-<br>स्मृतिर्ममासीद्भवपाशमोचिनी ।<br>तद्भक्तसङ्गोऽप्यतिदुर्लभो मम<br>प्रसीदतां दाशरथिः सदा हृदि ॥५७॥<br>उल्लङ्घितेऽम्बुधौ पवनात्मजेन<br>धरासुतायाश्च दशाननस्य ।<br>पुस्फोर वामाक्षि भुजश्च तीव्रं<br>रामस्य दक्षाङ्गमतीन्द्रियस्य ॥५८॥ | ॥ ४८-४९ ॥ वे श्रीरामचन्द्रजी भाई लक्ष्मण और भार्या सीताके सहित महावन (दण्डकारण्य) में जायेंगे। वहाँ महामायारूपिणी श्रीसीताजीको रावण हर ले जायगा ॥५०॥ तदनन्तर रामके साथ सुग्रीवकी मित्रता होगी और सुग्रीव जानकीजीकी खोजके लिये वानरोंको भेजेगा ॥ ५१ ॥ उनमेंसे एक वानर रात्रिके समय तेरे पास आयेगा । वह तुझसे तिरस्कृत होनेपर तेरे मुक्का मारेगा ॥ ५२ ॥ हे अनघे ! जिस समय तू उसके प्रहारसे व्याकुल हो जायगी उसी समय रावणका अन्त होगा—इसमें सन्देह नहीं ॥ ५३ ॥ अतः हे निष्पाप हनुमन् ! तुमने (मुझ) लंकाको जीत लिया तो सभीको जीत लिया । रावणके अन्तःपुरमें एक अत्युत्तम क्रीडावन है ॥ ५४ ॥ उसमें दिव्य वृक्षोंसे सम्पन्न एक अशोकवाटिका है । उसके बीचों-बीचमें एक अति विशाल शिंशपा (सीसमका) वृक्ष है ॥ ५५ ॥ श्रीजानकीजी वहींपर भयंकर राक्षसियों-के पहरेमें रहती हैं । तुम उनका दर्शन कर शीघ्र ही श्रीरघुनाथजीको उनका समाचार सुनाओ ॥ ५६ ॥ आज बहुत दिनोंमें मुझे श्रीरामचन्द्रजीकी संसार-बन्धनको नष्ट करनेवाली स्मृति हुई है और उनके भक्तका अति दुर्लभ सङ्ग प्राप्त हुआ है । अतः आज मैं धन्य हूँ । मेरे हृदयमें विराजमान वे दशरथनन्दन राम मुझपर सदा प्रसन्न रहें ॥ ५७ ॥<br>पवननन्दन हनुमान्जीके समुद्र लाँघते ही पृथिवी-पुत्री श्रीसीताजी और रावणकी बाँयीं भुजा और बाँये नेत्र तथा इन्द्रियातीत श्रीरामचन्द्रजीके दाँये अंग बड़े जोरसे फड़कने लगे ॥ ५८ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
सुन्दरकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
सुन्दरकाण्ड - सर्ग २: हनुमान्जीका वाटिकामें जाना तथा रावणका सीताजीको भय दिखलाना
| २०८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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द्वितीय सर्ग
हनुमान्जीका वाटिकामें जाना तथा रावणका सीताजीको भय दिखलाना।
| श्रीमहादेव उवाच | |
|---|---|
| ततो जगाम हनुमान् लङ्कां परमशोभनाम् ।<br>रात्रौ सूक्ष्मतनुर्भूत्वा बभ्राम परितः पुरीम् ॥ १ ॥<br>सीतान्वेषणकार्यार्थी प्रविवेश नृपालयम् ।<br>तत्र सर्वप्रदेशेषु विविच्य हनुमान्कपिः ॥ २ ॥<br>नापश्यज्जानकीं स्मृत्वा ततो लङ्काऽभिभाषितम् ।<br>जगाम हनुमान् शीघ्रमाशोकवनिकां शुभाम् ॥ ३ ॥<br>सुरपादपसम्बाधां रत्नसोपानवापिकाम् ।<br>नानापक्षिमृगाकीर्णां स्वर्णप्रासादशोभिताम् ॥ ४ ॥<br>फलैरानम्रशाखाग्रपादपैः परिवारिताम् ।<br>विचिन्वन् जानकीं तत्र प्रतिवृक्षं मरुत्सुतः ॥ ५ ॥<br>ददर्शाभ्रंलिहं तत्र चैत्यप्रासादमुत्तमम् ।<br>दृष्ट्वा विस्मयमापन्नो मणिस्तम्भशतान्वितम् ॥ ६ ॥<br>समतीत्य पुनर्गत्वा किञ्चिद्दूरं स मारुतिः ।<br>ददर्श शिंशपावृक्षमत्यन्तनिबिडच्छदम् ॥ ७ ॥<br>अदृष्टातपमाकीर्णं स्वर्णवर्णविहङ्गमम् ।<br>तन्मूले राक्षसीमध्ये स्थितां जनकनन्दिनीम् ॥ ८ ॥<br>ददर्श हनुमान् वीरो देवतामिव भूतले ॥<br>एकवेणीं कृशां दीनां मलिनाम्बरधारिणीम् ॥ ९ ॥<br>भूमौ शयानां शोचन्तीं रामरामेति भाषिणीम् ।<br>त्रातारं नाधिगच्छन्तीमुपवासकृशां शुभाम् ॥१०॥ | श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! तदनन्तर श्रीहनुमान्जी अति सुशोभिता लंकापुरीमें गये और सूक्ष्म शरीर धारण कर रात्रिमें नगरमें सब ओर घूमते रहे ॥ १ ॥ सीताजीका पता लगानेके लिये वे राज-मन्दिरमें घुस गये, वहाँ सब ओर ढूँढ़नेपर भी जब उन्हें जानकीजी न मिलीं तो उन्हें लंकिनीका कथन याद आया और वे तुरन्त ही अति मनोज्ञ अशोकवाटिकामें पहुँचे ॥ २-३ ॥ वह वाटिका कल्पवृक्षोंसे पूर्ण थी, उसकी बावड़ियोंकी सीढ़ियाँ रत्नजटित थीं, उसमें नाना प्रकारके पक्षी और मृगगण विचर रहे थे तथा सुवर्ण-निर्मित महलोंकी अपूर्व शोभा थी ॥ ४ ॥ वह वाटिका फलोंके भारसे झुकी हुई शाखाओंवाले वृक्षोंसे घिरी हुई थी। वहाँ प्रत्येक वृक्षके नीचे जानकीजीको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते पवननन्दन हनुमान्जीने एक अति सुन्दर देवालय देखा। वह इतना ऊँचा था कि उसके शिखर बादलोंसे टकराते थे। सैकड़ों मणिमय स्तम्भोंसे युक्त उस देवालयको देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ५-६ ॥ उससे कुछ और आगे बढ़े तो उन्होंने एक अत्यन्त घने पत्तोंवाला शिंशपा (सीसमका) वृक्ष देखा ॥७॥ उसके नीचे धूप कभी नहीं जाती थी और वह सुनहरी पक्षियोंसे आकीर्ण था। वीरवर हनुमान्जीने देखा कि उस वृक्षके नीचे श्रीजानकीजी पृथिवीपर स्थित देवताके समान राक्षसियोंसे घिरी हुई बैठी हैं। उनके बालोंकी जुड़कर एक वेणी हो गयी है, वे अत्यन्त दुर्बल और दीन-अवस्था में हैं तथा मैले-कुचैले वस्त्र धारण किये हुए हैं ॥ ८-९ ॥ ऐसी अवस्थामें पृथिवीपर पड़ी हुई वे अति शोकपूर्वक 'राम-राम' कह रही हैं उन्हें अपना कोई रक्षक भी दिखायी नहीं देता और वे उपवास करनेसे अति दुर्बल हो गयी हैं ॥ १० ॥ |
| शाखान्तच्छदमध्यस्थो ददर्श कपिकुञ्जरः ।<br>कृतार्थोऽहं कृतार्थोऽहं दृष्ट्वा जनकनन्दिनीम् ॥११॥<br>मयैव साधितं कार्यं रामस्य परमात्मनः ।<br>ततः किलकिलाशब्दो बभूवान्तःपुराद्बहिः ॥१२॥ | कपिश्रेष्ठ श्रीहनुमान्जी शाखाओंके पत्तोंमें छिपकर उन्हें देखने लगे और मन-ही-मन कहनेलगे कि 'आज जानकीजीको देखकर मैं कृतार्थ हो गया, कृतार्थ हो गया ! अहा ! परमात्मा रामका कार्य मेरे ही द्वारा सिद्ध हुआ।' इसी समय अन्तःपुरमेंसे बड़े किलकिला शब्दकी आवाज आयी ॥ ११-१२ ॥ तब हनुमान्जीने यह |
सर्ग २ ] सुन्दरकाण्ड २०९
किमेतदिति संल्लीनो वृक्षपत्रेषु मारुतिः ।
आयान्तं रावणं तत्र स्त्रीजनैः परिवारितम् ॥१३॥
दशास्यं विंशतिभुजं नीलाञ्जनचयोपमम् ।
दृष्ट्वा विस्मयमापन्नः पत्रखण्डेष्वलीयत ॥१४॥
रावणो राघवेणाशु मरणं मे कथं भवेत् ।
सीतार्थमपि नायाति रामः किं कारणं भवेत् ॥१५॥
इत्येवं चिन्तयन्नित्यं राममेव सदा हृदि ।
तस्मिन्दिनेऽपररात्रौ रावणो राक्षसाधिपः ॥१६॥
स्वप्ने रामेण सन्दिष्टः कश्चिदागत्य वानरः ।
कामरूपधरः सूक्ष्मो वृक्षाग्रस्थोऽनुपश्यति ॥१७॥
इति दृष्ट्वाऽद्भुतं स्वप्नं स्वात्मन्येवानुचिन्त्य सः ।
स्वप्नः कदाचित्सत्यः स्यादेवं तत्र करोम्यहम् ॥१८॥
जानकीं वाक्शरैर्विद्ध्वा दुःखितां नितरामहम् ।
करोमि दृष्ट्वा रामाय निवेदयतु वानरः ॥१९॥
इत्येवं चिन्तयन्सीतासमीपमगमद्द्रुतम् ।
नूपुराणां किङ्किणीनां श्रुत्वा शिञ्जितमङ्गना ॥२०॥
सीता भीता लीयमाना स्वात्मन्येव सुमध्यमा ।
अधोमुख्यश्रुनयना स्थिता रामार्पितान्तरा ॥२१॥
रावणोऽपि तदा सीतामालोक्याह सुमध्यमे ।
मां दृष्ट्वा किं वृथा सुभ्रू स्वात्मन्येव विलीयसे ॥२२॥
रामो वनचराणां हि मध्ये तिष्ठति सानुजः ।
कदाचिद्दृश्यते कैश्चित्कदाचिन्नैव दृश्यते ॥२३॥
मया तु बहुधा लोकाः प्रेषितास्तस्य दर्शने ।
न पश्यन्ति प्रयत्नेन वीक्षमाणाः समन्ततः ॥२४॥
किं करिष्यसि रामेण निःस्पृहेण सदा त्वयि ।
त्वया सदाऽऽलिङ्गितोऽपि समीपस्थोऽपि सर्वदा २५
२७
सोचकर कि 'यह क्या गड़बड़ है' वृक्षके पत्तोंमें छिपे-छिपे देखा कि स्त्रियोंसे घिरा हुआ रावण उसी ओर आ रहा है ॥ १३ ॥ उसके दश मुख, बीस भुजा और कज्जल-समूहके समान काले शरीरको देखकर हनुमान्जीको बड़ा विस्मय हुआ और वे पत्तोंमें छिप गये ॥ १४॥
रावणको सदा यही चिन्ता रहती थी कि 'किस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे जल्दी-से-जल्दी मेरा मरण हो, न जाने क्या कारण है कि वे अभीतक सीताके लिये भी नहीं आये ?' इस प्रकार निरन्तर भगवान् रामका ही हृदयमें स्मरण रहनेसे राक्षसराज रावणने उसी दिन शेषरात्रिमैं स्वप्नमें देखा कि रामका सन्देश लेकर आया हुआ कोई स्वेच्छारूपधारी वानर सूक्ष्म शरीरसे वृक्षकी शाखापर बैठा हुआ देख रहा है ॥ १५-१७ ॥ इस अद्भुत स्वप्नको देखकर उसने अपने मनमें सोचा—'कदाचित् यह स्वप्न ठीक ही हो; अतः अब अशोकवनमें चलकर मुझे एक काम करना चाहिये—मैं जानकीजीको अपने वाग्बाणोंसे वेधकर अत्यन्त दुःखी करूँ जिससे वह वानर यह सब देखकर रामचन्द्रजीको सुनावे' ॥ १८-१९ ॥
यह सोचकर वह तुरन्त सीताजीके पास चला । (उसके साथकी स्त्रियोंके) नूपुर (पायजेब) और किंकिणी (करधनी) आदिकी झनकार सुनकर सुन्दर कटिवाली कल्याणी सीताजी घबड़ाकर अपने शरीरको सिकोड़ नीचेको मुख करके बैठ गयीं । उस समय उनके नेत्रोंमें जल भर आया और हृदय भगवान् राममें लग गया ॥ २०-२१ ॥ सीताजीको देखकर रावण बोला—'हे कमनीय कटि और सुन्दर भृकुटिवाली ! तू मुझे देखकर वृथा क्यों इतनी सिकुड़ती है ? ॥ २२ ॥ अब, राम तो अपने भाईके साथ वनचरोंमें रहता है, वह कभी तो किसीको दिखायी देता है और कभी दिखायी भी नहीं देता ॥ २३ ॥ मैंने तो उसे देखनेके लिये कितने ही लोग भेजे, किन्तु बहुत प्रयत्नपूर्वक सब ओर देखनेपर भी वह उनको कहीं दिखायी नहीं दिया ॥ २४ ॥ अब रामसे तुझे क्या काम है ? वह तो तुझसे सदा उदासीन रहता है । सदा तेरे पास रहते हुए और सदा तुझसे आलिंगित होते हुए भी उसके हृदयमें अभीतक तेरे प्रति स्नेह
२१० अध्यात्मरामायण [सर्ग २]
हृदयेऽस्य न च स्नेहस्त्वयि रामस्य जायते ।
त्वत्कृतान्सर्वभोगांश्च त्वद्गुणानपि राघवः ॥ २६ ॥
भुञ्जानोऽपि न जानाति कृतघ्नो निर्गुणोऽधमः ।
त्वमानीता मया साध्वी दुःखशोकसमाकुला ॥ २७ ॥
इदानीमपि नायाति भक्तिहीनः कथं व्रजेत् ।
निःसत्त्वो निर्ममो मानी मूढः पण्डितमानवान् ॥ २८ ॥
नराधमं त्वद्विमुखं किं करिष्यसि भामिनि ।
त्वय्यतीव समासक्तं मां भजस्वासुरोत्तमम् ॥ २९ ॥
देवगन्धर्वनागानां यक्षकिन्नरयोषिताम् ।
भविष्यसि नियोक्त्री त्वं यदि मां प्रतिपद्यसे ॥ ३० ॥
नहीं हुआ । रामको तुझसे जितने भोग प्राप्त हुए हैं और तुझमें जितने गुण हैं उन सबको भोगकर भी वह कृतघ्न, गुणहीन और अधम कभी उनकी याद भी नहीं करता । तुझ-जैसी सतीको दुःख और शोकसे व्याकुल देखकर ही मैं ले आया था ॥ २५-२७ ॥ और देख, वह तो अभीतक नहीं आया; जब उसे तुझमें प्रेम ही नहीं है तो आता कैसे ? वह सर्वथा असमर्थ, ममताशून्य, अभिमानी, मूर्ख और अपनेको बड़ा बुद्धिमान् माननेवाला है ॥ २८ ॥ हे भामिनि ! अपनेसे उदासीन उस नराधमसे तुझे क्या लेना है ?* देख, मैं राक्षस-श्रेष्ठ तुझसे अत्यन्त प्रेम करता हूँ, अतः तू मुझे ही अंगीकार कर ॥ २९ ॥ यदि तू मेरे अधीन रहेगी तो देव, गन्धर्व, नाग, यक्ष और किन्नर आदिकी स्त्रियोंका शासन करेगी” ॥ ३० ॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा सीताऽमर्षसमन्विता ।
उवाचाधोमुखी भूत्वा निधाय तृणमन्तरे ॥ ३१ ॥
राघवाद्भियता नूनं भिक्षुरूपं त्वया धृतम् ।
रहिते राघवाभ्यां त्वं शुनीव हविरध्वरे ॥ ३२ ॥
हृतवानासि मां नीच तत्फलं प्राप्स्यसेऽचिरात् ।
यदा रामशराघातविदारितवपुर्भवान् ॥ ३३ ॥
रावणके ये वचन सुनकर सीताजीको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने शिर नीचा कर लिया और बीचमें तृण रखकर† कहा—॥ ३१ ॥ “अरे नीच ! इसमें सन्देह नहीं, श्रीरघुनाथजीसे डरकर ही तूने भिक्षुका रूप धारण किया था, और उन दोनों रघुश्रेष्ठोंकी अनुपस्थितिमें ही, कुत्ता जिस प्रकार सूनी यज्ञशालासे हवि ले जाता है उसी प्रकार तू मुझे हर लाया है; सो तू बहुत शीघ्र ही उसका फल पायेगा । जिस समय भगवान् रामकी बाणवर्षासे विदीर्ण
* यहाँ २३ से २८ श्लोकतक रावणने गूढ़भावसे निन्दाके मिससे भगवान् रामकी स्तुति की है । इनका तात्पर्य इस प्रकार है—
“राम अपने भाईके सहित वनवासी तपस्वियोंमें रहते हैं । उनमेंसे वे ( ध्यान-धारणादि द्वारा ) कभी किसीको दिखायी देते हैं और कभी ( ध्यान-धारणासे भी ) दिखायी नहीं देते ॥ २३ ॥ मैंने तो उनका साक्षात्कार करनेके लिये कई बार अपनी इन्द्रियोंको उधर लगाया है, किन्तु बहुत कुछ प्रयत्न करनेपर भी मुझे उनका साक्षात्कार नहीं हुआ ॥ २४ ॥ (तुम साक्षात् योगमाया हो, परब्रह्मरूप रामके साथ तुम्हारा सदा सहवास है और उसके साथ तादात्म्य भी है किन्तु ) फिर भी वह सर्वदा निःस्पृह और असंग है। उसे तुम्हारी परवा नहीं है ॥ २५ ॥ निःस्पृह और असंग होनेसे परब्रह्मरूप रामको तुम, मायारूपिणीसे बन्धन भी नहीं होता और न वह तुम्हारे (मायाके) गुण या भोगोंमें ही फँसता है ॥ २६ ॥ सांख्यवादीगण (उपचारसे) उसे भोक्ता भी कहते हैं तथापि उन्हींके मतानुसार ‘जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः’ इस श्रुतिके अनुसार वह ‘मैं भोक्ता हूँ’ ऐसा अभिमान नहीं करता । इसी प्रकार वह कृतघ्न (किये हुए कर्मोंका नाश करनेवाला) निर्गुण (सत्त्व, रज, तमसे रहित) और अधम (न धमति शब्दविषयो भवति—जो शब्दका विषय न हो अर्थात् अशब्द) भी है ॥ २७ ॥ उसकी मायापर प्रीति नहीं है इसलिये वह अभीतक नहीं आया । इससे रावण अपनेको लक्ष्य करके कहता है कि वह अब भी मेरे हृदयमें नहीं आता क्योंकि भक्तिहीन होनेसे मेरा हृदय उसतक कैसे पहुँच सकता है? वह निर्गुण, समतारहित, अमानी, मूढ (मू=शिवः+उः=ब्रह्मा ताभ्याम् ऊढः—ध्यानविषयीकृतः अर्थात् शिव और ब्रह्माके ध्येय) और विद्वानोंमें सम्मानित है ॥ २८ ॥ नराधम (नराः अधमाः यस्मात् स नराधमः—मनुष्य जिससे अधम हैं अर्थात् पुरुषोत्तम) विमुख (माया-पराङ्मुख) ।
† पतिव्रता स्त्रीको पर-पुरुषसे प्रत्यक्ष वार्तालाप नहीं करना चाहिये । यदि कोई अनिवार्य प्रसंग आ पड़े तो भी कोई जड़ वस्तु ही बीचमें रख लेनी चाहिये । इस नियमके अनुसार ही सीताजीने बीचमें तृण रखा था ।
सर्ग २ ]
सुन्दरकाण्ड
२११
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ज्ञास्यसेऽमानुषं रामं गमिष्यसि यमान्तिकम्।<br>समुद्रं शोषयित्वा वा शरैर्बद्ध्वाऽथ वारिधिम् ॥३४॥<br>हन्तुं त्वां समरे रामो लक्ष्मणेन समन्वितः।<br>आगमिष्यत्यसन्देहो द्रक्ष्यसे राक्षसाधम ॥३५॥<br>त्वां सपुत्रं सहबलं हत्वा नेष्यति मां पुरम्।<br>श्रुत्वा रक्षःपतिः क्रुद्धो जानक्याः परुषाक्षरम्॥३६॥<br>वाक्यं क्रोधसमाविष्टः खड्गमुद्यम्य सत्वरः।<br>हन्तुं जनकराजस्य तनयां ताम्रलोचनः ॥३७॥<br>मन्दोदरी निवार्याह पतिं पतिहिते रता।<br>त्यजैनां मानुषीं दीनां दुःखितां कृपणां कृशाम् ३८<br>देवगन्धर्वनागानां बह्व्यः सन्ति वराङ्गनाः।<br>त्वामेव वरयन्त्युच्चैर्मदमत्तविलोचनाः ॥३९॥ | होकर तू यमलोकको जायगा उस समय ही तू अमानव रामको जानेगा। अरे राक्षसाधम ! इसमें सन्देह नहीं, तू शीघ्र ही देखेगा कि तुझे युद्धमें मारनेके लिये भाई लक्ष्मणसहित भगवान् राम समुद्रको सुखाकर अथवा उसपर बाणोंका पुल बनाकर यहाँ आयेंगे ॥ ३२-३५॥ और तुझे पुत्र और सेनाके सहित मारकर मुझे अयोध्यापुरी ले जायेंगे।”<br><br>जानकीजीके ये कठोर वचन सुनकर राक्षसराज रावणको अत्यन्त क्रोध हुआ और वह क्रोधसे नेत्र लाल कर तुरन्त ही खड्ग खींचकर जनकनन्दिनी सीताजीको मारनेपर उतारू हो गया ॥ ३६-३७ ॥ तब, पतिके हितमें तत्पर रहनेवाली महारानी मन्दोदरीने अपने पतिको रोकते हुए कहा— “पतिदेव ! इस दीना, क्षीणा, दुःखिया एवं कातर मानवीको छोड़ दीजिये ॥ ३८॥ आपके लिये तो देवता, गन्धर्व और नागादिकोंकी ऐसी अनेकों मदमत्तनयना मनोहारिणी महिलाएँ हैं जो बड़े चावसे आपहीको वरण करना चाहती हैं” ॥ ३९ ॥ |
| ततोऽब्रवीद्दशग्रीवो राक्षसीर्विकृताननाः।<br>यथा मे वशगा सीता भविष्यति सकामना।<br>तथा यतध्वं त्वरितं तर्जनादरणादिभिः ॥४०॥<br>द्विमासाभ्यन्तरे सीता यदि मे वशगा भवेत्।<br>तदा सर्वसुखोपेतं राज्यं भोक्ष्यति सा मया ॥४१॥<br>यदि मासद्वयादूर्ध्वं मच्छां नाभिनन्दति।<br>तदा मे प्रातराशाय हत्वा कुरुत मानुषीम् ॥४२॥<br>इत्युक्त्वा प्रययौ स्त्रीभी रावणोऽन्तःपुरालयम्।<br>राक्षस्यो जानकीमेत्य भीषयन्त्यः स्वतर्जनैः॥४३॥ | तब रावणने बहुत-सी विकराल वदनवाली राक्षसों-से कहा— “हे निशाचरियो ! भय अथवा आदर जिस उपायसे भी सीता कामनायुक्त होकर शीघ्र ही मेरे अधीन हो जाय, तुम सब लोग वही करो ॥ ४० ॥ यदि दो महीनेके भीतर वह मेरे वशीभूत हो जायगी तो सर्व-सुख-सम्पन्न होकर मेरे साथ राज्य भोगेगी ॥४१॥ और यदि दो महीनेतक भी यह मेरी शय्यापर आना स्वीकार न करे तो इस मानवीको मारकर मेरा प्रातःकालका कलेवा बना देना” ॥ ४२ ॥<br><br>ऐसा कह रावण अपनी स्त्रियोंके साथ अन्तःपुरको चला गया और राक्षसियाँ सीताजीके पास आकर उन्हें अपने-अपने उपायोंसे भयभीत करने लगीं ॥४३॥ |
| तत्रैका जानकीमाह यौवनं ते वृथा गतम्।<br>रावणेन समासाद्य सफलं तु भविष्यति ॥४४॥<br>अपरा चाह कोपेन किं विलम्बेन जानकि।<br>इदानीं छेद्यतामङ्गं विभज्य च पृथक् पृथक् ॥४५॥<br>अन्या तु खड्गमुद्यम्य जानकीं हन्तुमुद्यता।<br>अन्या करालवदना विदार्यास्यमभीषयत् ॥४६॥ | उनमेंसे एक बोली— “जानकि ! तेरा यौवन वृथा ही गया, यदि तू रावणका सहवास करे तो यह सफल हो जाय” ॥ ४४ ॥ दूसरीने क्रोध दिखाते हुए कहा— “जानकि ! अब (हमारी बात माननेमें) देर क्यों करती है?” इसी प्रकार कोई खड्ग निकालकर जानकीजीको मारनेके लिये तैयार होकर बोली कि “इसके अंगोंको काटकर अभी अलग-अलग कर डालो।” तथा कोई भयंकर मुखवाली राक्षसी अपना मुख फाड़कर डराने लगी ॥४५-४६॥ |
| २१२ | अध्यात्मरामायणं | [ सर्ग २ |
|---|
एवं तां भीषयन्तीस्ता राक्षसीर्विकृताननाः ।<br>निवार्य त्रिजटा वृद्धा राक्षसी वाक्यमब्रवीत् ॥४७॥<br>शृणुध्वं दुष्टराक्षस्यो मद्वाक्यं वो हितं भवेत् ॥४८॥<br>न भीषयध्वं रुदतीं नमस्कुरुत जानकीम् ।<br>इदानीमेव मे स्वप्ने रामः कमललोचनः ॥४९॥<br>आरुह्यैरावतं शुभ्रं लक्ष्मणेन समागतः ।<br>दग्ध्वा लङ्कापुरीं सर्वां हत्वा रावणमाहवे ॥५०॥<br>आरोप्य जानकीं स्वाङ्के स्थितो दृष्टोऽद्रिमूर्धनि ।<br>रावणो गोमयह्रदे तैलाभ्यक्तो दिगम्बरः ॥५१॥<br>अगाहत्पुत्रपौत्रैश्च कृत्वा वदनमालिकाम् ।<br>विभीषणस्तु रामस्य सन्निधौ हृष्टमानसः ॥५२॥<br>सेवां करोति रामस्य पादयोर्भक्तिसंयुतः ।<br>सर्वथा रावणं रामो हत्वा सकुलमञ्जसा ॥५३॥<br>विभीषणायाधिपत्यं दत्त्वा सीतां शुभाननाम् ।<br>अङ्के निधाय स्वपुरीं गमिष्यति न संशयः ॥५४॥<br><br>त्रिजटाया वचः श्रुत्वा भीतास्ता राक्षसास्त्रियः ।<br>तूष्णीमासंस्तत्र तत्र निद्रावशमुपागताः ॥५५॥<br>तर्जिता राक्षसीभिः सा सीता भीताऽतिविह्वला ।<br>त्रातारं नाधिगच्छन्ती दुःखेन परिमूर्च्छिता ॥५६॥<br>अश्रुभिः पूर्णनयना चिन्तयन्तीदमब्रवीत् ।<br>प्रभाते भक्षयिष्यन्ति राक्षस्यो मां न संशयः ।<br>इदानीमेव मरणं केनोपायेन मे भवेत् ॥५७॥<br>एवं सुदुःखेन परिप्लुता सा<br>विमुक्तकण्ठं रुदती चिराय ।<br>आलम्ब्य शाखां कृतनिश्चया मृतौ<br>न जानती कञ्चिदुपायमङ्गना ॥५८॥ | तब, सीताजीको इस प्रकार डराती हुई उन विक्रतवदना राक्षसियोंको रोककर त्रिजटा नामकी एक वृद्धा राक्षसी बोली—॥४७॥ “अरी दुष्टा राक्षसियो ! मेरी बात सुनो, इसीसे तुम्हारा हित होगा ॥४८॥ तुम इन रोती-विलखती जानकीजीको मत डराओ, बल्कि इन्हें नमस्कार करो । मैंने अभी-अभी स्वप्नमें देखा है कि कमललोचन भगवान् राम लक्ष्मणके साथ श्वेत ऐरावत हाथीपर चढ़कर आये हैं। और मैंने उन्हें सम्पूर्ण लंकापुरीको जलाकर तथा रावणको युद्धमें मारकर सीताजीको अपनी गोदमें लिये पर्वत-शिखर पर बैठे हुए देखा है। रावण गलेमें मुण्डमाला पहने शरीरमें तैल लगाये नंगा होकर अपने पुत्र-पौत्रोंके साथ गोबरके कुण्डमें डुबकी लगा रहा है और विभीषण प्रसन्नचित्तसे रघुनाथजीके पास बैठा हुआ अति भक्तिपूर्वक उनकी चरण-सेवा कर रहा है। इससे निश्चय होता है कि रामचन्द्रजी अनायास ही रावणका कुलसहित नाश कर विभीषणको लंकाका राज्य देंगे और सुमुखी सीताको गोदमें बिठाकर निस्सन्देह अपने नगरको चले जायेंगे” ॥४९-५४॥<br><br>त्रिजटाके ये वचन सुनकर वे राक्षसियाँ डर गयीं । वे चुपचाप जहाँ-तहाँ बैठ गयीं और कुछ देर पीछे उन्हें नींद आ गयी ॥५५॥ राक्षसोंके डरानेसे सीताजी अत्यन्त भयभीत और विह्वल हो गयीं और अपना कोई सहायक न देखकर वे दुःखसे मूर्छित हो गयीं ॥ ५६ ॥ फिर आँखोंमें आँसू भरकर अति चिन्ताकुल होकर इसप्रकार कहने लगीं— “इसमें सन्देह नहीं प्रातःकाल होते ही राक्षसियाँ मुझे खा जायँगी। ऐसा कौन उपाय है जिससे मुझे अभी मौत आ जाय” ॥५७॥ इस प्रकार मौतका निश्चय करके भी उसका कोई साधन न देखकर कल्याणी सीता वृक्षकी शाखा पकड़े हुए अत्यन्त दुःखसे भरकर बहुत देरतक फूट-फूटकर रोती रहीं ॥ ॥ ५८ ॥
<div align="center">इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
सुन्दरकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
</div>
सुन्दरकाण्ड - सर्ग ३: जानकीजीसे भेंट, वाटिका-विध्वंस और ब्रह्मपाश-बन्धन
सर्ग ३] सुन्दरकाण्डम् २१३
तृतीय सर्ग
जानकीजीसे भेंट, वाटिका-विध्वंस और ब्रह्मपाश-बन्धन ।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! इस प्रकार रोते-रोते सीताजीने सोचा—"अच्छा तो, मैं फाँसी लगाकर ही अपना शरीर क्यों न छोड़ दूँ ? इन राक्षिसयोंके बीचमें रहकर रघुनाथजीके बिना जीनेसे लाभ ही क्या है ? ॥ १ ॥ फाँसी लगानेके लिये मेरी लम्बी वेणी पर्याप्त होगी।" जानकीजीको इस प्रकार मरनेका निश्चय करती देख सूक्ष्मरूपधारी श्रीहनुमान्जी हृदयमें कुछ विचारकर उनके कानोंमें पड़नेयोग्य धीमी वाणीसे शनैः-शनैः इस प्रकार कहने लगे ॥ २-३ ॥ "इक्ष्वाकु-वंशमें उत्पन्न हुए अयोध्यापति महाराज दशरथ बड़े प्रतापी थे। उनके त्रिलोकीमें विख्यात चार पुत्र हुए। वे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चारों ही देवताओंके समान शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न हैं ॥ ४-५ ॥ उनमेंसे बड़े भाई राम भ्राता लक्ष्मण और भार्या सीताके सहित अपने पिताकी आज्ञासे दण्डकारण्यमें आये थे। वे महामना वहाँ गौतमी नदीके तीरपर पञ्चवटी आश्रममें रहते थे। उस आश्रमसे श्रीरामचन्द्रजीकी अनुपस्थितिमें दुरात्मा रावण महाभागा जनकनन्दिनी सीताजीको ले गया। तब अति शोकाकुल भगवान् रामने जानकीजीको इधर-उधर ढूँढ़ते हुए पृथिवीपर पड़े पक्षिराज जटायुको देखा। उसे तुरन्त ही दिव्यधाम पहुँचाकर वे ऋष्यमूक-पर्वतपर आये ॥ ६-९ ॥ वहाँ आकर आत्मदर्शी भगवान् रामने सुग्रीवसे मित्रता की और उसकी स्त्रीका हरण करनेवाले दुष्ट वालीको मारकर उसे राज्यपदपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार श्रीरघुनन्दनने मित्रका कार्य सिद्ध किया। वानरराज सुग्रीवने भी समस्त वानरोंको बुलाकर सब ओर सीताजीकी खोज करनेके लिये भेजा। उन्हींमेंसे एक मैं भी सुग्रीवका मन्त्री वानर हूँ। मैं सम्पातिके कथनानुसार सौ योजन समुद्र लाँघकर तुरन्त लङ्कापुरीमें आया और यहाँ सर्वत्र शुभलक्षणा सीताजीको ढूँढ़ा। शनैः-शनैः अशोकवाटिका में ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैंने यह शिंशपा वृक्ष देखा और यहाँ रामचन्द्रजीकी महारानी देवी |
|---|---|
| उद्बन्धनेन वा मोक्ष्ये शरीरं राघवं विना ।<br>जीवितेन फलं किं स्यान्मम रक्षोऽधिमध्यतः ॥१॥<br>दीर्घा वेणी समात्यर्थमुद्बन्धाय भविष्यति ।<br>एवं निश्चितबुद्धिं तां मरणायाथ जानकीम् ॥ २ ॥<br>विलोक्य हनुमान्किञ्चिद्विचार्यैतदभाषत ।<br>शनैः शनैः सूक्ष्मरूपो जानक्याः श्रोत्रगं वचः ॥३॥<br>इक्ष्वाकुवंशसम्भूतॊ राजा दशरथो महान् ।<br>अयोध्याधिपतिस्तस्य चत्वारो लोकविश्रुताः ॥४॥<br>पुत्रा देवसमाः सर्वे लक्षणैरुपलक्षिताः ।<br>रामश्च लक्ष्मणश्चैव भरतश्चैव शत्रुहा ॥ ५ ॥<br>ज्येष्ठो रामः पितुर्वाक्याद्दण्डकारण्यमागतः ।<br>लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया भार्यया सह ॥ ६ ॥<br>उवास गौतमीतीरे पञ्चवट्यां महामनाः ।<br>तत्र नीता महाभागा सीता जनकनन्दिनी ॥ ७ ॥<br>रहिते रामचन्द्रेण रावणेन दुरात्मना ।<br>ततो रामोऽतिदुःखार्तो मार्गमाणोऽथ जानकीम् ॥८॥<br>जटायुषं पक्षिराजमपश्यत्पतितं भुवि ।<br>तस्मै दत्त्वा दिवं शीघ्रमृष्यमूकमुपागमत् ॥ ९ ॥<br>सुग्रीवेण कृता मैत्री रामस्य विदितात्मनः ।<br>तद्भार्याहारिणं हत्वा वालिनं रघुनन्दनः ॥१०॥<br>राज्येऽभिषिच्य सुग्रीवं मित्रकार्यं चकार सः ।<br>सुग्रीवस्तु समानाय्य वानरान्वानरप्रभुः ॥११॥<br>प्रेषयामास परितो वानरान्परिमार्गणे ।<br>सीतायास्तत्र चैकोऽहं सुग्रीवसचिवो हरिः ॥१२॥<br>सम्पातिवचनाच्छीघ्रमुल्लङ्घ्य शतयोजनम् ।<br>समुद्रं नगरीं लङ्कां विचिन्वन् जानकीं शुभाम् ॥१३॥<br>शनैरशोकवनिकां विचिन्वन् शिंशपातरोः । |
| २१४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
|---|
अद्राक्षं जानकीमत्र शोचन्तीं दुःखसम्प्लुताम् ॥ १४ ॥
रामस्य महिषीं देवीं कृतकृत्योऽहमागतः ।
इत्युक्त्वोपररामाथ मारुतिर्बुद्धिमत्तरः ॥ १५ ॥
जानकीजीको अति क्लेशसे शोक करते पाया । इनके दर्शनसे मेरा यहाँ आना सफल हो गया ।” ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् श्रीहनुमान्जी मौन हो गये ॥ १०-१५ ॥
सीता क्रमेण तत्सर्वं श्रुत्वा विस्मयमाययौ ।
किमिदं मे श्रुतं व्योम्नि वायुना समुदीरितम् ॥ १६ ॥
स्वप्नो वा मे मनोभ्रान्तिर्यदि वा सत्यमेव तत् ।
निद्रा मे नास्ति दुःखेन जानाम्येतत्कुतो भ्रमः ॥ १७ ॥
येन मे कर्णपीयूषं वचनं समुदीरितम् ।
स दृश्यतां महाभागः प्रियवादी समाग्रतः ॥ १८ ॥
क्रमशः ये सब बातें सुनकर सीताजीको बड़ा विस्मय हुआ और वे कहने लगीं, “मैने जो आकाशमें शब्द सुना है वह क्या वायुका उच्चारण किया हुआ है ? ॥ १६ ॥ अथवा स्वप्न या मेरे मनकी भ्रान्ति है ? अथवा यह सब सत्य ही तो नहीं है, क्योंकि दुःखके कारण नींद तो मुझे आती नहीं, (फिर स्वप्न कैसे हो सकता है ?) और मैं प्रत्यक्ष सुन रही हूँ इसलिये यह भ्रम भी कैसे हो सकता है ? (अतः निश्चय ही यह सब यथार्थ है) ॥ १७ ॥ सुतरां, जिसने मेरे कानोंको अमृतके समान प्रिय लगनेवाले ये वचन कहे हैं वह प्रियभाषी महाभाग मेरे सामने प्रकट हों” ॥ १८ ॥
श्रुत्वा तज्जानकीवाक्यं हनुमान्पत्रखण्डतः ।
अवतीर्य शनैः सीतापुरतः समवस्थितः ॥ १९ ॥
कलविङ्कप्रमाणाङ्गो रक्तास्यः पीतवानरः ।
ननाम शनकैः सीतां प्राञ्जलिः पुरतः स्थितः ॥ २० ॥
जानकीजीके ये वचन सुनकर हनुमान्जी शनैः-शनैः उस वृक्षके पत्र-भागसे उतरकर सीताजीके सामने खड़े हो गये ॥ १९ ॥ उस समय उन्होंने अरुण-वदन, पीतवर्ण और कलविंक (चटक) पक्षीके बराबर आकारवाले वानरके रूपसे धीमेसे सामने आकर सीताजीको हाथ जोड़कर प्रणाम किया ॥ २० ॥
दृष्ट्वा तं जानकी भीता रावणोऽयमुपागतः ।
मां मोहयितुमायातो मायया वानराकृतिः ॥ २१ ॥
इत्येवं चिन्तयित्वा सा तूष्णीमासीदधोमुखी ।
उसे देखकर जानकीजीको यह भय हुआ कि मुझे फँसानेके लिये मायासे वानररूप धारण कर यह रावण ही आया है ॥ २१ ॥ यह सोचकर वे चुपचाप नीचेको मुख किये बैठी रहीं ।
पुनरप्याह तां सीतां देवि यत्त्वं विशङ्कसे ॥ २२ ॥
नाहं तथाविधो मातस्त्यज शङ्कां मयि स्थिताम् ।
दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्य परमात्मनः ॥ २३ ॥
सचिवोऽहं हरीन्द्रस्य सुग्रीवस्य शुभप्रदे ।
वायोः पुत्रोऽहमखिलप्राणभृतस्य शोभने ॥ २४ ॥
तब हनुमान्जीने सीताजीसे फिर कहा— “देवि ! आप जैसी आशङ्का कर रही हैं मैं वह नहीं हूँ । हे मातः ! मेरे विषयमें आपको जो शङ्का हो रही है उसे दूर करें । हे शुभप्रदे ! मैं तो कोसलाधिपति परमात्मा रामका दास और वानरराज सुग्रीवका मन्त्री हूँ तथा हे शोभने ! सम्पूर्ण जगत्के प्राणस्वरूप पवनदेवका मैं पुत्र हूँ” ॥ २२-२४ ॥
तच्छ्रुत्वा जानकी प्राह हनूमन्तं कृताञ्जलिम् ।
वानराणां मनुष्याणां सङ्गतिर्घटते कथम् ॥ २५ ॥
यथा त्वं रामचन्द्रस्य दासोऽहमिति भाषसे ।
तामाह मारुतिः प्रीतो जानकीं पुरतः स्थितः ॥ २६ ॥
यह सुनकर श्रीजानकीजीने हाथ बाँधे खड़े हुए हनुमान्जीसे कहा—“तुम जो कहते हो कि मैं श्रीरामचन्द्रजीका दास हूँ, सो भला वानर और मनुष्योंकी मित्रता कैसे हो सकती है ?” तब सामने खड़े हुए हनुमान्जीने प्रसन्न होकर जानकीजीसे कहा ॥ २५-२६ ॥ “शबरीकी प्रेरणासे
सर्ग ३ ] सुन्दरकाण्ड २१५
| ऋष्यमूकमाद्रामः शबर्या नोदितः सुधीः।<br>सुग्रीवो ऋष्यमूकस्थो दृष्टवान् रामलक्ष्मणौ ॥२७॥ | परम बुद्धिमान् भगवान् राम ऋष्यमूक पर्वतपर आये । उस पर्वतपर बैठे हुए सुग्रीवने जब (दूरहीसे) राम और लक्ष्मणको आते देखा तो मनमें भय मानकर मुझे उनका आशय जाननेके लिये भेजा । तब मैं ब्रह्मचारीका वेष बनाकर रामजीके पास आया ॥ २७-२८ ॥ और उनका शुद्ध भाव जानकर उन्हें कन्धेपर चढ़ा सुग्रीवके पास ले गया तथा (राम और सुग्रीव) दोनोंकी मित्रता करा दी ॥ २९ ॥ सुग्रीवकी पत्नीको वालीने छीन लिया था । रघुनाथजीने उसे एक ही बाणसे मारकर सुग्रीवको वानरोंके राज्यपदपर अभिषिक्त कर दिया । तब सुग्रीवने आपकी खोजके लिये बड़े-बड़े वीर और पराक्रमी वानरोंको दिशा-विदिशाओंमें भेजा ॥ ३०-३१ ॥ उस समय मुझे चलता देख श्रीरघुनाथजीने मुझसे आदरपूर्वक कहा ॥ ३२॥ 'हे पवननन्दन ! मेरा सब काम तुम्हारे ऊपर निर्भर है । तुम सीताजीसे मेरी और लक्ष्मणकी सब कुशल कहना ॥ ३३ ॥ तथा अपनी पहचानके लिये मेरी यह उत्तम अँगूठी जिसपर मेरे नामके अक्षर खुदे हुए हैं, सीताजीको अति सावधानीसे दे देना' ॥ ३४ ॥ ऐसा कहकर उन्होंने अपनी अँगुलीसे उतारकर वह अँगूठी मुझे दी । मैं उसे बड़ी सावधानीसे लाया हूँ । देवि ! आप यह अँगूठी देखिये" ॥ ३५ ॥ ऐसा कह हनुमान्जीने वह अँगूठी देवी जानकीजीको दे दी और नमस्कार कर हाथ जोड़े हुए दूर खड़े हो गये ॥ ३६ ॥ उस रामनामाङ्किता मुद्रिकाको देखकर सीताजी अति आनन्दित हुईं और उसे शिरसे लगाकर नेत्रोंसे आनन्दाश्रु बहाने लगीं ॥ ३७ ॥ |
| भीतो मां प्रेषयामास ज्ञातुं रामस्य हृद्गतम् ।<br>ब्रह्मचारिवपुर्धृत्वा गतोऽहं रामसन्निधिम् ॥२८॥ | |
| ज्ञात्वा रामस्य सद्भावं स्कन्धोपरि विधाय तौ ।<br>नीत्वा सुग्रीवसमीपर्य सख्यं चाकरवं तयोः ॥२९॥ | |
| सुग्रीवस्य हृता भार्या वालिना तं रघूत्तमः ।<br>जघानेकेन बाणेन ततो राज्येऽभ्यषेचयत् ॥३०॥ | |
| सुग्रीवं वानराणां स प्रेषयामास वानरान् ।<br>दिग्भ्यो महाबलान्वीरान् भवत्याः परिमार्गणे ॥३१॥ | |
| गच्छन्तं राघवो दृष्ट्वा मामभाषत सादरम् ॥३२॥ | |
| त्वयि कार्यमशेषं मे स्थितं मारुतनन्दन ।<br>ब्रूहि मे कुशलं सर्वं सीतायै लक्ष्मणस्य च ॥३३॥ | |
| अङ्गुलीयकमेतन्मे परिज्ञानार्थमुत्तमम् ।<br>सीतायै दीयतां साधु मन्नामाक्षरमुद्रितम् ॥३४॥ | |
| इत्युक्त्वा प्रददौ मह्यं कराग्रादङ्गुलीयकम् ।<br>प्रयत्नेन मयानीतं देवि पश्याङ्गुलीयकम् ॥३५॥ | |
| इत्युक्त्वा प्रददौ देव्यै मुद्रिकां मारुतात्मजः ।<br>नमस्कृत्यः स्थितो दूराद्बद्धाञ्जलिपुटो हरिः ॥३६॥ | |
| दृष्ट्वा सीता प्रमुदिता रामनामाङ्कितां तदा ।<br>मुद्रिकां शिरसा धृत्वा स्रवदानन्दनेत्रजा ॥३७॥ | |
| कपे मे प्राणदाता त्वं बुद्धिमानसि राघवे ।<br>भक्तोऽसि प्रियकारी त्वं विश्वासोऽस्ति तवैव हि ॥३८॥ | तदनन्तर वे कहने लगीं—"कपिवर ! तुम मेरे प्राणदाता हो ! तुम बड़े ही बुद्धिमान् और रघुनाथजीके भक्त तथा प्रियकारी हो । मुझे निश्चय है उनको भी तुम्हारा ही पूर्ण विश्वास है ॥ ३८ ॥ यदि ऐसा न होता तो तुम पर-पुरुषको वे मेरे पास क्यों भेजते ? हनूमन् ! मेरी सारी आपदाएँ तुमने देख ही ली हैं ॥ ३९ ॥ रामको ये सब बातें सुना देना जिससे उन्हें मुझपर दया |
| नो चेन्मत्सन्निधिं चान्यं पुरुषं प्रेषयेत्कथम् ।<br>हनूमन्दृष्टमखिलं मम दुःखादिकं त्वया ॥३९॥ | |
| सर्वं कथय रामाय यथा मे जायते दया ।<br>मासद्वयावधि प्राणाः स्थास्यन्ति मम सत्तम ॥४०॥ |
| २१६ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ३ |
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नागमिष्यति चेद्रामो भक्षयिष्यति मां खलः।<br>अतः शीघ्रं कपीन्द्रेण सुग्रीवेण समन्वितः ॥४१॥<br>वानरानीकपैरः सार्धं हत्वा रावणमाहवे।<br>सपुत्रं सबलं रामो यदि मां मोचयेत्प्रभुः ॥४२॥<br>तत्तस्य सदृशं वीर्यं वीर वर्ण्यं वर्णितम्।<br>यथा मां तारयेद्रामो हत्वा शीघ्रं दशाननम् ॥४३॥<br>तथा धत्स्व हनुमन्वाचा धर्ममवाप्नुहि। | उत्पन्न हो। हे साधुश्रेष्ठ ! अब मेरे प्राण दो ही मास और रहेंगे ॥४०॥ यदि इस बीचमें रघुनाथजी न आये तो यह दुष्ट मुझे खा जायगा। अतः यदि भगवान् राम वानरराज सुग्रीवके सहित अन्य वानर-यूथपोंको लेकर तुरन्त ही रावणको पुत्र और सेनाके सहित संग्राममें मारकर मुझे छुड़ायेंगे तो ही उनका यह पुरुषार्थ ठीक होगा। और तभी तुम इस वर्णन-किये पुरुषार्थका वर्णन करना। हे हनुमन् ! तुम भी ऐसी युक्तिसे उनसे सब बातें कहना जिससे वे शीघ्र ही रावणको मारकर मेरा उद्धार करें। ऐसा करके तुम भी वाचिक पुण्य प्राप्त करो।” हनूमानपि तामाह देवि दृष्टो यथा मया ॥४४॥<br>रामः सलक्ष्मणः शीघ्रमागमिष्यति सायुधः।<br>सुग्रीवेण ससैन्येन हत्वा दशमुखं बलात् ॥४५॥<br>समानेष्यति देवि त्वामयोध्यां नात्र संशयः। | तब हनुमान्जीने उनसे कहा—“देवि ! मैंने जैसा कुछ देखा है उससे तो यही प्रतीत होता है कि लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र ही अस्त्र-शस्त्र लेकर सेनायुक्त सुग्रीवके सहित आयेंगे और रावणको बलपूर्वक मारकर तुम्हें अयोध्या ले जायेंगे। देवि ! इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है।” तमाह जानकी रामः कथं वारिधिमाततम् ॥४६॥<br>तीर्त्वाऽऽयास्यत्यमेयात्मा वानरानीकपैरः सह। | इसपर जानकीजी कहने लगीं, “भगवान् राम् अमेयात्मा हैं, (उनके शरीरका कोई माप नहीं है, वे सर्वव्यापक हैं) किन्तु वानर-यूथपोंके साथ वे किस प्रकार समुद्रको पार करके यहाँ आयेंगे?” हनूमानाह मे स्कन्धावारुह्य पुरुषर्षभौ ॥४७॥<br>आयास्यतः ससैन्यश्च सुग्रीवो वानरेश्वरः।<br>विहायसा क्षणेनैव तीर्त्वा वारिधिमाततम् ॥४८॥<br>निर्दहिष्यति रक्षौघांस्त्वत्कृते नात्र संशयः।<br>अनुज्ञां देहि मे देवि गच्छामि त्वरयान्वितः॥४९॥<br>द्रष्टुं रामं सह भ्रात्रा त्वरयामि तवान्तिकम्।<br>देवि किञ्चिदभिज्ञानं देहि मे येन राघवः ॥५०॥<br>विश्वसेन्मां प्रयत्नेन ततो गन्ता समुत्सुकः। | हनुमान्जी बोले—“वे दोनों नरश्रेष्ठ मेरे कन्धों-पर चढ़कर आयेंगे और वानरराज सुग्रीव सेनासहित इस विस्तीर्ण समुद्रको आकाश-मार्गसे एक क्षणमें पार-कर तुम्हें प्राप्त करनेके लिये सम्पूर्ण राक्षस-समूहको भस्म कर डालेंगे। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। हे देवि ! अब मुझे आज्ञा दो; मैं अभी-अभी अनुज-सहित भगवान् रामका दर्शन करनेके लिये जाता हूँ और उन्हें तुरन्त तुम्हारे पास लानेका प्रयत्न करता हूँ। देवि ! मुझे कोई ऐसा चिह्न दो जिससे श्रीरघुनाथजी मेरा विश्वास करें। उसे लेकर मैं बड़ी सावधानीसे उत्सुकतापूर्वक उनके पास जाऊँगा।” ततः किञ्चिद्विचार्याथ सीता कमललोचना ॥५१॥<br>विमुच्य केशपाशान्ते स्थितं चूडामणिं ददौ।<br>अनेन विश्वसेद्रामस्त्वां कपीन्द्र सलक्ष्मणः ॥५२॥<br>अभिज्ञानार्थमन्यच्च वदामि तव सुव्रत। | तब कमललोचना सीताजीने कुछ सोच-विचारकर अपने केशपाशमें स्थित चूडामणिको निकाला और उसे हनुमान्जीको देकर कहा—“हे कपिवर ! इससे भगवान् राम और लक्ष्मण तुम्हारा विश्वास करेंगे॥४१-५२॥ हे सुव्रत ! उनको विश्वास दिलानेके
सर्ग ३ ] | सुन्दरकाण्ड | २१७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| चित्रकूटगिरौ पूर्वमेकदा रहसि स्थितः ।<br>मदङ्के शिर आधाय निद्राति रघुनन्दनः ॥५३॥<br>ऐन्द्रः काकस्तदाऽऽगत्य नखैस्तुण्डेन चासकृत् ।<br>मत्पादाङ्गुष्ठमारक्तं विददारामिषाशया ॥५४॥<br>ततो रामः प्रबुद्ध्याथ दृष्ट्वा पादं कृतव्रणम् ।<br>केन भद्रे कृतं चैतद्विप्रियं मे दुरात्मना ॥५५॥<br>इत्युक्त्वा पुरतोऽपश्यद्वायसं मां पुनः पुनः ।<br>अभिद्रवन्तं रक्ताक्तनखतुण्डं चुकोप ह ॥५६॥<br>तृणमेकमुपादाय दिव्यास्त्रेणाभियोज्य तत् ।<br>चिक्षेप लीलया रामो वायसोपरि तज्ज्वलन्॥५७॥<br>अभ्यद्रवद्वायसञ्च भीतो लोकान् भ्रमन्पुनः ।<br>इन्द्रब्रह्मादिभिश्चापि न शक्यो रक्षितुं तदा ॥५८॥<br>रामस्य पादयोरग्रेऽपतद्भीत्या दयानिधेः ।<br>शरणागतमालोक्य रामस्तमिदमब्रवीत् ॥५९॥<br>अमोघमेतदस्त्रं मे दत्त्वैकाक्षमतो व्रज ।<br>सव्यं दत्त्वा गतः काक एवं पौरुषवानपि ॥६०॥<br>उपेक्षते किमर्थं मामिदानीं सोऽपि राघवः । | लिये एक बात और बतलाती हूँ—एक दिन चित्रकूट पर्वतपर श्रीरघुनाथजी एकान्तमें मेरी गोदमें शिर रखे सो रहे थे ॥५३॥ इसी समय इन्द्रका पुत्र (जयन्त) काक-वेषमें वहाँ आया और मांसके लोभसे मेरे पैरके लाल-लाल अँगूठेको अपनी चोंच तथा पञ्जोंसे फाड़ डाला ॥५४॥ तदनन्तर जब श्रीरामचन्द्रजी जागे तो मेरे पैरमें घाव हुआ देखकर बोले—“प्रिये ! किस दुरात्माने मेरा यह अप्रिय किया है ?” ॥५५॥ वे यह कह ही रहे थे कि उन्होंने अपने सामने उस कौएको बारम्बार मेरी ओर आते देखा । उसकी चोंच और पञ्जे रुधिरसे सने हुए थे। उसे देखकर उन्हें बड़ा क्रोध हुआ ॥५६॥ उन्होंने तुरन्त ही एक तृण उठाकर उसपर दिव्यास्त्रका प्रयोग किया और उसे लीलासे ही उस कौएकी ओर फेंक दिया । उसके तापसे सन्तप्त हो वह काक भयभीत होकर त्रिलोकीमें भटकता फिरा किन्तु जब इन्द्र, ब्रह्मा आदिसे भी उसकी रक्षा न हो सकी तो बहुत ही डरता-डरता दयानिधान भगवान् रामके चरणोंमें गिरा । उसे शरणागत देख श्रीरामचन्द्रजीने उससे कहा—॥५७–५९॥ “मेरा यह अस्त्र अमोघ है। (यह कभी व्यर्थ नहीं जा सकता)। अतः तू केवल अपनी एक आँख देकर यहाँसे चला जा। तब वह काक अपनी बायीं आँख देकर चला गया। जो ऐसे पुरुषार्थी हैं वे ही श्रीरघुनाथजी न जाने इस समय क्यों मेरी उपेक्षा कर रहे हैं ?” |
| हनूमानपि तामाह श्रुत्वा सीतानुभाषितम् ॥६१॥<br>देवि त्वां यदि जानाति स्थितामत्र रघूत्तमः ।<br>करिष्यति क्षणाद्भस्म लङ्कां राक्षसमण्डिताम्॥६२॥ | सीताजीका यह कथन सुनकर हनुमान्जीने कहा—<br>“देवि ! जिस समय श्रीरघुनाथजीको तुम्हारे यहाँ होनेका पता चलेगा उस समय इस राक्षस-मण्डल-मण्डिता लंकाको वे एक क्षणमें ही भस्म कर डालेंगे” ॥६०-६२॥ |
| जानकी प्राह तं वत्स कथं त्वं योत्स्यसेऽसुरैः ।<br>अतिसूक्ष्मवपुः सर्वे वानराश्च भवादृशाः ॥६३॥ | जानकीजीने कहा—"वत्स ! तुम अत्यन्त सूक्ष्म शरीरवाले हो, अतः राक्षसोंसे कैसे लड़ सकोगे ? और सब वानर भी तो तुम्हारे ही समान होंगे ? ॥६३॥ |
| श्रुत्वा तद्वचनं देव्यै पूर्वरूपमदर्शयत् ।<br>मेरुमन्दरसङ्काशं रक्षोगणविभीषणम् ॥६४॥<br>दृष्ट्वा सीता हनूमन्तं महापर्वतसन्निभम् । | देवी जानकीजीके ये वचन सुनकर हनुमान्जीने उन्हें अपना पूर्वरूप दिखलाया। जो मेरु और मन्दर पर्वतके समान अति विशाल और राक्षसोंको भय उत्पन्न करनेवाला था ॥६४॥ हनुमान्जीको महापर्वतके समान विशालकाय देखकर सीताजीको अपार |
| २१८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
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| हर्षेण महताऽऽविष्टा प्राह तं कपिकुञ्जरम् ॥६५॥ | आनन्द हुआ और वे उन कपिश्रेष्ठसे कहने लगीं—॥ ६५ ॥ “हे महासत्त्व ! तुम बड़े ही सामर्थ्यवान् |
| समर्थोऽसि महासत्त्व द्रक्ष्यन्ति त्वां महाबलम् । | हो; अच्छा, अब तुम शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजीके पास |
| राक्षस्यस्ते शुभः पन्था गच्छ रामान्तिकं द्रुतम् ॥६६॥ | जाओ । हे महावीर ! तुम्हें राक्षसियाँ देख लेंगी, (अतः अब तुम जाओ ) तुम्हारा मार्ग कल्याण- |
| बुभुक्षितः कपिः प्राह दर्शनात्पारणं मम । | मय हो ॥ ६६ ॥ हनुमान्जीको भूख लगी हुई थी । |
| भविष्यति फलैः सर्वैस्तव दृष्टौ स्थितैर्हि मे ॥६७॥ | वे बोले—“देवि ! आपका दर्शन कर अब मुझे आपके सामने लगे हुए फलोंसे पारण करनेकी इच्छा होती |
| तथेत्युक्तः स जानक्या भक्षयित्वा फलं कपिः । | है” ॥ ६७ ॥ तब जानकीजीके ‘बहुत अच्छा’ कहने- |
| ततः प्रस्थापितोऽगच्छज्जानकीं प्रणिपत्य सः । | पर कपिवरने वे फल खाये और उनके विदा करनेपर |
| किञ्चिद्दूरमथो गत्वा खात्मन्येवान्वचिन्तयत् ॥६८॥ | उन्हें प्रणाम करके चल दिये । फिर कुछ दूर चलनेपर उन्होंने अपने मनमें सोचा ॥ ६८ ॥ ‘जो दूत अपने |
| कार्यार्थमागतो दूतः स्वामिकार्याविरोधतः । | स्वामीके कार्यके लिये आकर उसमें किसी प्रकारका |
| अन्यत्किञ्चिदसम्पाद्य गच्छत्यधम एव सः ॥६९॥ | विघ्न न करनेवाला कोई और कार्य न करके यों ही चला जाता है वह अधम ही है ॥ ६९ ॥ अतः |
| अतोऽहं किञ्चिदन्यच्च कृत्वा दृष्ट्वाऽथ रावणम् । | मैं कुछ और भी करूँगा और रावणसे मिलकर |
| सम्भाष्य च ततो रामदर्शनार्थं व्रजाम्यहम् ॥७०॥ | तथा बातचीत कर फिर श्रीरघुनाथजीके दर्शनार्थ जाऊँगा” ॥ ७० ॥ |
| इति निश्चित्य मनसा वृक्षखण्डान्महाबलः । | मनमें ऐसा निश्चय कर महाबली हनुमान्जीने वृक्षों- |
| उत्पाट्याशोकवनिकां निर्वृक्षामकरोत्क्षणात् ॥७१॥ | को उखाड़कर अशोकवाटिकाको एक क्षणमें ही वृक्षहीन कर दिया ॥ ७१ ॥ जिसके नीचे श्रीसीताजी |
| सीताऽऽश्रयनगं त्यक्त्वा वनं शून्यं चकार सः । | बैठी थीं उस वृक्षको छोड़कर शेष समस्त वाटिकाको |
| उत्पाटयन्तं विपिनं दृष्ट्वा राक्षस्योषितः ॥७२॥ | उन्होंने उजाड़ डाला । उन्हें वन उजाड़ते देख |
| अपृच्छन् जानकीं कोऽसौ वानराकृतिरुद्भटः ॥७३॥ | राक्षसियोंने जानकीजीसे पूछा, “यह वानराकार विकट वीर कौन है ?” ॥ ७२-७३ ॥ |
| जानक्युवाच | जानकीजी बोलीं— इस राक्षसी मायाको आप ही |
| भवत्य एव जानन्ति मायां राक्षवनिर्मिताम् । | लोग जानें। दुःख और शोकसे आतुर मैं यह क्या जानूँ ? |
| नाहमेनं विजानामि दुःखशोकसमाकुला ॥७४॥ | ॥ ७४ ॥ जानकीजीके इस प्रकार कहनेपर भयपीडिता |
| इत्युक्तास्त्वरितं गत्वा राक्षस्यो भयपीडिताः । | राक्षसियोंने रावणके पास जा उसे हनुमान्जीकी सारी |
| हनूमता कृतं सर्वं रावणाय न्यवेदयन् ॥७५॥ | करतूत कह सुनायी ॥७५॥ वे कहने लगीं— “देव ! एक |
| देव कश्चिन्महासत्त्वो वानराकृतिदेहभृत् । | बड़े पराक्रमी वानराकार प्राणीने सीताजीसे सम्भाषण |
| सीतया सह सम्भाष्य ह्यशोकवनिकां क्षणात् । | कर एक क्षणमें ही सारी अशोकवाटिका उजाड़ दी |
| उत्पाट्य चैत्यप्रासादं बभञ्जामितविक्रमः ॥७६॥ | है। उस महापराक्रमीने मन्दिरके प्रासादको भी तोड़ डाला और उसके सब रक्षकोंको मारकर इस समय |
| प्रासादरक्षिणः सर्वान्हत्वा तत्रैव तस्थिवान् । | भी वह वहीं बैठा हुआ है ।” वनविध्वंसका यह महान् |
| तच्छ्रुत्वा तूर्णमुत्थाय वनभङ्गं महाऽप्रियम् ॥७७॥ | अप्रिय समाचार सुनकर राक्षसराज रावण तुरन्त उठा |
| सर्ग ३] | सुन्दरकाण्ड | २१९ |
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| किङ्करान्प्रेषयामास नियुतं राक्षसाधिपः ।<br>निर्भयश्चैत्यप्रासादप्रथमन्तरसंस्थितः ॥७८॥<br>हनुमान्पर्वताकारो लोहस्तम्भकृतायुधः ।<br>किञ्चिल्लाङ्गूलचलनो रक्तास्यो भीषणाकृतिः ॥७९॥<br>आपतन्तं महासङ्घं राक्षसानां ददर्श सः ।<br>चकार सिंहनादं च श्रुत्वा ते मुमुहुर्भृशम् ॥८०॥<br>हनूमन्तमथो दृष्ट्वा राक्षसा भीषणाकृतिम् ।<br>निजघ्नुर्विविधास्त्रौधैः सर्वराक्षसघातिनम् ॥८१॥<br>तत उत्थाय हनुमान्मुद्गरेण समन्ततः ।<br>निष्पिपेप क्षणादेव मशकानिव यूथपः ॥८२॥<br>निहतान्किङ्करान् श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः।<br>पञ्च सेनापतींस्तत्र प्रेषयामास दुर्मदान् ॥८३॥<br>हनूमानपि तान्सर्वांल्लोहस्तम्भेन चाहनत् ।<br>ततः क्रुद्धो मन्त्रिसुतान्प्रेषयामास सप्त सः ॥८४॥<br>आगतानपि तान्सर्वान्पूर्ववद्वानरेश्वरः ।<br>क्षणान्निःशेषतः हत्वा लोहस्तम्भेन मारुतिः॥८५॥<br>पूर्वस्थानमुपाश्रित्य प्रतीक्षन् राक्षसान् स्थितः ।<br>ततो जगाम बलवान्कुमारोऽक्षः प्रतापवान् ॥८६॥<br>तमुत्पपात हनुमान् दृष्ट्वाऽऽकाशे समुद्गरः ।<br>गगनात्त्वरितो मूर्ध्नि मुद्गरेण व्यताडयत् ॥८७॥<br>हत्वा तमक्षं निःशेषं बलं सर्वं चकार सः ॥८८॥<br>ततः श्रुत्वा कुमारस्य वधं राक्षसपुङ्गवः ।<br>क्रोधेन महताऽऽविष्ट इन्द्रजेतारमब्रवीत् ॥८९॥<br>पुत्र गच्छाम्यहं तत्र यत्रास्ते पुत्रहा रिपुः ।<br>हत्वा तमथवा बद्ध्वा आनयिष्यामि तेऽन्तिकम् ॥<br>इन्द्रजित्पितरं प्राह त्यज शोकं महामते ।<br>मयि स्थिते किमर्थं त्वं भाषसे दुःखितं वचः ॥९१॥ | और उसने दश लाख सेवकोंको भेजा। इधर, पर्वताकार हनुमान्जी लोहेके खम्भको शस्त्ररूपसे लिये हुए उस टूटे-फूटे मन्दिरके प्रथम भागमें बैठे थे। उनकी पूँछ कुछ-कुछ हिल रही थी, तथा मुख अरुणवर्ण और आकृति भयानक थी॥ ७६-७९॥ राक्षसोंके समूहको आया देख उन्होंने घोर सिंहनाद किया, जिसे सुनकर वे सब अत्यन्त स्तब्ध हो गये॥ ८०॥ फिर सम्पूर्ण राक्षसोंको मारनेवाले भीषणाकार हनुमान्जीको देखकर राक्षसोंने उनपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र छोड़े ॥ ८१॥ तदनन्तर, यूथपति गजराज जैसे मच्छरोंको मसल डालता है वैसे ही हनुमान्जीने उठकर अपने मुद्गरसे एक क्षणमें ही सबको चारों ओरसे पीस डाला ॥ ८२॥<br><br>अपने किङ्करोंका मरण सुनकर रावण क्रोधसे पागल हो गया और उसने वहाँ पाँच बड़े बाँके सेनापतियोंको (अपनी सेनाके साथ) भेजा॥ ८३॥ हनुमान्जीने अपने लोह-स्तम्भसे तुरन्त ही उन सबको मार डाला। तब उसने अति क्रोधित होकर सात मन्त्रिपुत्रोंको भेजा॥ ८४॥ वानराधीश पवननन्दनने, वहाँ आनेपर उन सबको भी पहलेकी भाँति एक क्षणमें ही उस लोह-स्तम्भसे मार डाला॥ ८५॥ और अपने पूर्व-स्थानमें ही बैठकर अन्य राक्षसोंके आनेकी बाट देखने लगे। तब अति बलवान् और प्रतापशाली राजकुमार अक्ष आया॥ ८६॥ उसे देखकर हनुमान्जी अपना मुद्गर लेकर आकाशमें उड़ गये और बड़े वेगसे ऊपरसे ही उसके मस्तकपर मुद्गरका प्रहार किया। इस प्रकार अक्षको मारकर उसकी सेनाका भी नामो-निशान मिटा दिया॥ ८७-८८॥<br><br>राजकुमार अक्षके वधका वृत्तान्त पाकर राक्षसराज रावण अत्यन्त क्रोधमें भरकर इन्द्रजित्से बोला— "बेटा! जहाँ मेरे पुत्रका मारनेवाला मेरा शत्रु है मैं वहाँ जाता हूँ और उसे मारकर या बाँधकर तेरे पास लाता हूँ" ॥ ८९-९०॥ इन्द्रजित्ने पितासे कहा—"हे महामते! शोक न कीजिये; मेरे रहते हुए आप ऐसे दुःखमय वचन क्यों बोलते हैं?॥ ९१॥ मैं उस |