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अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

* अध्याय २९३ * ५९७

प्राप्त किया हुआ, पुस्तकके पन्नेमें लिखा हुआ अथवा गाथामें कहा गया मन्त्र नहीं जपना चाहिये। यदि ऐसे मन्त्रका जप किया जाय तो वह अनर्थ उत्पन्न करता है। जो जप, होम तथा अर्चना आदि भूरि क्रियाओंद्वारा मन्त्रकी साधनामें संलग्न रहता है, उसके मन्त्र स्वल्पकालिक साधनसे ही सिद्ध हो जाते हैं। जिसने एक मन्त्रको भी विधिपूर्वक सिद्ध कर लिया है, उसके लिये इस लोकमें कुछ भी असाध्य नहीं है; फिर जिसने बहुत-से मन्त्र सिद्ध कर लिये हैं, उसके माहात्म्यका किस प्रकार वर्णन किया जाय ? वह तो साक्षात् शिव ही है। एक अक्षरका मन्त्र दस लाख जप करनेसे सिद्ध हो जाता है। मन्त्रमें ज्यों-ज्यों अक्षरकी वृद्धि हो, त्यों-ही-त्यों उसके जपकी संख्यामें कमी होती है। इस नियमसे अन्य मन्त्रोंके जपकी संख्याके विषयमें स्वयं ऊहा कर लेनी चाहिये। बीज-मन्त्रकी अपेक्षा दुगुनी-तिगुनी संख्यामें मालामन्त्रोंके जपका विधान है। जहाँ जपकी संख्या नहीं बतायी गयी हो, वहाँ मन्त्र-जपादिके लिये एक सौ आठ या एक हजार आठ संख्या जाननी चाहिये। सर्वत्र जपसे दशांश हवन एवं तर्पणका विधान मिलता है ॥ १६-२५ ॥

जहाँ किसी द्रव्य-विशेषका उल्लेख न हो, वहाँ होममें घृतका उपयोग करना चाहिये। जो आर्थिक दृष्टिसे असमर्थ हो, उसके लिये होमके निमित्त जपकी संख्यासे दशांश जपका ही सर्वत्र विधान मिलता है। अङ्ग आदिके लिये भी जप आदिका विधान है। सशक्तिक-मन्त्रके जपसे मन्त्रदेवता साधकको अभीष्ट फल देते हैं। वे साधकके द्वारा किये गये ध्यान, होम और अर्चन आदिसे तृप्त होते हैं। उच्चस्वरसे जपकी अपेक्षा उपांशु (मन्दस्वरसे किया गया) जप दसगुना श्रेष्ठ कहा गया है। यदि केवल जिह्वा हिलाकर जप किया जाय तो वह सौ गुना उत्तम माना गया है। मानस (मनके द्वारा किये जानेवाले) जपका महत्त्व सहस्रगुना उत्तम कहा गया है। मन्त्र-सम्बन्धी कर्मका सम्पादन पूर्वाभिमुख अथवा दक्षिणाभिमुख होकर करना चाहिये। मौन होकर विहित आहार ग्रहण करते हुए प्रणव आदि सभी मन्त्रोंका जप करना चाहिये। देवता तथा आचार्यके प्रति समान दृष्टि रखते हुए आसनपर बैठकर मन्त्रका जप करे। कुटी, एकान्त एवं पवित्र स्थान, देवमन्दिर, नदी अथवा जलाशय—ये जप करनेके लिये उत्तम देश हैं। मन्त्र-सिद्धिके लिये जौकी लप्सी, मालपूए, दुग्ध एवं हविष्यान्नका भोजन करे। साधक मन्त्रदेवताका उनकी तिथि, वार, कृष्णपक्षकी अष्टमी-चतुर्दशी तथा ग्रहण आदि पर्वोंपर पूजन करे। अश्विनीकुमार, यमराज, अग्नि, धाता, चन्द्रमा, रुद्र, अदिति, बृहस्पति, सर्प, पितर, भग, अर्यमा, सूर्य, त्वष्टा, वायु, इन्द्राग्नि, मित्र, इन्द्र, जल, निर्ऋति, विश्वेदेव, विष्णु, वसुगण, वरुण, अजैकपात्, अहिर्बुध्न्य और पूषा—ये क्रमशः अश्विनी आदि नक्षत्रोंके देवता हैं। प्रतिपदासे लेकर चतुर्दशीपर्यन्त तिथियोंके देवता क्रमशः निम्नलिखित हैं—अग्नि, ब्रह्मा, पार्वती, गणेश, नाग, स्कन्द, सूर्य, महेश, दुर्गा, यम, विश्वदेव, विष्णु, कामदेव और ईश, पूर्णिमाके चन्द्रमा और अमावास्याके देवता पितर हैं। शिव, दुर्गा, बृहस्पति, विष्णु, ब्रह्मा, लक्ष्मी और कुबेर—ये क्रमशः रविवार आदि वारोंके देवता हैं। अब मैं 'लिपिन्यास'का वर्णन करता हूँ॥ २६-३६$\frac{१}{२}$॥

साधक निम्नलिखित प्रकारसे लिपि (मातृका) न्यास करे— 'ॐ अं नमः, केशान्तेषु। ॐ आं नमः, मुखे। ॐ इं नमः, दक्षिणनेत्रे। ॐ ईं नमः, वामनेत्रे। ॐ उं नमः, दक्षिणकर्णे। ॐ ऊं नमः, वामकर्णे। ॐ ऋं नमः, दक्षिणनासापुटे। ॐ ॠं नमः, वामनासापुटे। ॐ लूं नमः, दक्षिणकपोले। ॐ लूं नमः, वामकपोले। ॐ एं नमः, ऊर्ध्वोष्ठे।

५९८ * अग्निपुराण *

ॐ ऐं नमः, अधरोष्ठे। ॐ ओं नमः, ऊर्ध्वदन्तपङ्क्तौ। ॐ औं नमः, अधोदन्तपङ्क्तौ। ॐ अं नमः, मूर्ध्नि। ॐ अः नमः, मुखवृत्ते। ॐ कं नमः, दक्षिणबाहुमूले। ॐ खं नमः, दक्षिणकूर्परे। ॐ गं नमः, दक्षिणमणिबन्धे। ॐ घं नमः, दक्षिणहस्ताङ्गुलिमूले। ॐ ङं नमः, दक्षिण- हस्ताङ्गुल्यग्रे। ॐ चं नमः, वामबाहुमूले। ॐ छं नमः, वामकूर्परे। ॐ जं नमः, वाममणिबन्धे। ॐ झं नमः, वामहस्ताङ्गुलिमूले। ॐ ञं नमः, वामहस्ताङ्गुल्यग्रे। ॐ टं नमः, दक्षिणपादमूले। ॐ ठं नमः, दक्षिणजानुनि। ॐ डं नमः, दक्षिणगुल्फे। ॐ ढं नमः, दक्षिणपादाङ्गुलिमूले। ॐ णं नमः, दक्षिणपादाङ्गुल्यग्रे। ॐ तं नमः, वामपादमूले। ॐ थं नमः, वामजानुनि। ॐ दं नमः, वामगुल्फे। ॐ धं नमः, वामपादाङ्गुलिमूले। ॐ नं नमः, वामपादाङ्गुल्यग्रे। ॐ पं नमः, दक्षिणपार्श्वे। ॐ फं नमः, वामपार्श्वे। ॐ बं नमः, पृष्ठे। ॐ भं नमः, नाभौ। ॐ मं नमः, उदरे। ॐ यं त्वगात्मने नमः, हृदि। ॐ रं असृगात्मने नमः, दक्षांसे। ॐ लं मांसात्मने नमः, ककुदि। ॐ वं मेदात्मने नमः, वामांसे। ॐ शं अस्थ्यात्मने नमः, हृदयादि-दक्षहस्तान्तम्। ॐ षं मज्जात्मने नमः, हृदयादि-वामहस्तान्तम्। ॐ सं शुक्रात्मने नमः, हृदयादि-दक्षपादान्तम्। ॐ हं आत्मने नमः, हृदयादिवामपादान्तम्। ॐ लं परमात्मने नमः, जठरे। ॐ क्षं प्राणात्मने नमः, मुखे।' इस प्रकार आदिमें 'प्रणव' और अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर लिपीश्वरों- मातृकेश्वरोंका न्यास किया जाता है॥ ३७-४०॥

श्रीकण्ठ, अनन्त, सूक्ष्म, त्रिमूर्ति, अमरेश्वर, अर्धीश, भारभूति, तिथीश, स्थाणुक, हर, झिण्टीश, भौतिक, सद्योजात, अनुग्रहेश्वर, अक्रूर तथा महासेन—ये सोलह 'स्वर-मूर्तिदेवता' हैं। क्रोधीश, चण्डीश, पञ्चान्तक, शिवोत्तम, एकरुद्र, कूर्म, एकनेत्र, चतुरानन, अजेश, सर्वेश, सोमेश, लाङ्गलि, दारुक, अर्द्धनारीश्वर, उमाकान्त, आषाढी, दण्डी अद्रि, मीन, मेष, लोहित, शिखी, छगलाण्ड, द्विरण्ड, महाकाल, कपाली, भुजङ्गेश, पिनाकी, खड्गीश, बक, श्वेत, भृगु, नकुली, शिव तथा संवर्तक—ये 'व्यञ्जन-मूर्तिदेवता' माने गये हैं॥ ४१-४६॥

उपर्युक्त श्रीकण्ठ आदि रुद्रोंका उनकी शक्तियोंसहित क्रमशः न्यास करे। (श्रीविद्यार्णव- तन्त्रमें इनकी शक्तियोंके नाम इस प्रकार दिये गये हैं—पूर्णोदरी, विरजा, शाल्मली, लोलाक्षी, वर्तुलाक्षी, दीर्घघोणा, सुदीर्घमुखी, गोमुखी, दीर्घजिह्वा, कुण्डोदरी, ऊर्ध्वकेशी, विकृतमुखी, ज्वालामुखी, उल्कामुखी, श्रीमुखी तथा विद्यामुखी—ये रुद्रोंकी 'स्वर-शक्तियाँ' हैं। महाकाली, महासरस्वती, सर्वसिद्धि, गौरी, त्रैलोक्यविद्या, मन्त्रशक्ति, आत्मशक्ति, भूतमाता, लम्बोदरी, द्राविणी, नागरी, खेचरी, मञ्जरी, रूपिणी, वीरिणी, काकोदरी, पूतना भद्रकाली, योगिनी, शङ्खिनी, गर्जिनी, कालरात्रि, कूर्दिनी, कपर्दिनी, वज्रिका, जया, सुमुखी, रेवती, माधवी, वारुणी, वायवी, रक्षोविदारिणी, सहजा, लक्ष्मी, व्यापिनी और महामाया—ये 'व्यञ्जनस्वरूपा रुद्रशक्तियाँ' कही गयी हैं।)

इनके न्यासकी विधि इस प्रकार है—'ह्सौं अं श्रीकण्ठाय पूर्णोदर्यै नमः। ह्सौं आं अनन्ताय विरजायै नमः।' इत्यादि। इसी तरह अन्य स्वरशक्तियोंका न्यास करना चाहिये। व्यञ्जन- शक्तियोंके न्यासके लिये यही विधि है। यथा—'ह्सौं कं क्रोधीशाय महाकाल्यै नमः। ह्सौं खं चण्डीशाय महासरस्वत्यै नमः।' इत्यादि। साधकको चाहिये कि उदयादि अङ्गोंका भी न्यास करे; क्योंकि सम्पूर्ण मन्त्र साङ्ग होनेपर ही सिद्धिदायक होते हैं। हृल्लेखाको व्योम-बीजसे युक्त करके इन अङ्गोंका न्यास करना चाहिये। हृदयादि अङ्ग मन्त्रोंको अन्तमें

* अध्याय २९४ * ५९९


जोड़कर बोलना चाहिये। यथा—'ह्वां हृदयाय नमः। ह्रीं शिरसे स्वाहा। हूं शिखायै वषट्। हैं कवचाय हुम्। ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ह्रः अस्त्राय फट्।' यह 'षडङ्गन्यास' कहा गया है। पञ्चाङ्गन्यासमें नेत्रको छोड़ दिया जाता है। निरङ्ग-मन्त्रका उसके स्वरूपसे ही अङ्गन्यास करके क्रमशः वागीश्वरी देवी (ह्रीं)-का एक लाख जप करे तथा यथोक्त (दशांश) तिलोंकी आहुति दे। लिपियोंकी अधिष्ठात्री देवी वागीश्वरी अपने चार हाथोंमें अक्षमाला, कलश, पुस्तक और कमल धारण करती हैं। कवित्व आदिकी शक्ति प्रदान करती हैं। इसलिये जपकर्मके आदिमें सिद्धिके लिये उनका न्यास करे। इससे अकवि भी निर्मल कवि होता है। मातृका-न्याससे सभी मन्त्र सिद्ध होते हैं॥ ४७–५१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मन्त्र-परिभाषाका वर्णन' नामक
दो सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९३॥


दो सौ चौरानबेवाँ अध्याय

नाग-लक्षण*

**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! अब मैं नागोंकी उत्पत्ति, सर्पदंशमें अशुभ नक्षत्र आदि, सर्पदंशके विविध भेद, दंशके स्थान, मर्मस्थल, सूतक और सर्पदष्ट मनुष्यकी चेष्टा—इन सात लक्षणोंको


* अग्निपुराणमें जिस धन्वन्तरि-सुश्रुत-संवादद्वारा आयुर्वेदका प्रतिपादन किया गया है, वही विस्तारपूर्वक 'सुश्रुत' ग्रन्थमें वर्णित है। सर्पोंके सम्बन्धमें 'सुश्रुत' ग्रन्थमें (पू० तन्त्र, कल्पस्थान, अध्याय ४ में) जो कुछ कहा गया है, उसका सारांश इस प्रकार है— सर्प दो प्रकारके होते हैं—'दिव्य' और 'भौम'। दिव्य सर्प वासुकि और तक्षक आदि हैं। वे इस पृथ्वीका बोझ उठानेवाले हैं; प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी होते हैं। वे कुपित हो जायें तो फुफकार और दृष्टिमात्रसे सम्पूर्ण जगत्‌को दग्ध कर सकते हैं। वे सदा नमस्कारके ही योग्य हैं। उनके डसनेकी कोई दवा नहीं है। चिकित्सासे उनका कोई प्रयोजन नहीं है।

परंतु जो भूमिपर उत्पन्न होनेवाले सर्प हैं, जिनकी दाढ़ोंमें विष होता है तथा जो मनुष्योंको काटते हैं, उनकी संख्या अस्सी है। उन सबके पाँच भेद हैं—दर्वीकर, मण्डली, राजिमान्, निर्विष और वैकरञ्ज। राजिमान्‌को ही अग्निपुराणमें 'राजिल' कहा गया है। इनमें 'दर्वीकर' छब्बीस, 'मण्डली' बाईस, 'राजिमान्' (या राजिल) दस, 'निर्विष' बारह तथा 'वैकरञ्ज' तीन प्रकारके होते हैं। वैकरञ्जोंद्वारा मण्डली तथा राजिलके संयोगसे उत्पन्न चित्रित सर्प सात प्रकारके माने गये हैं। मण्डलीके संयोगसे उत्पन्न चार और राजिलके संयोगसे उत्पन्न तीन। इस तरह इनके अस्सी प्रकार हुए।

दर्वीकर सर्प चक्र, हल, छत्र, स्वस्तिक और अङ्कुशका चिह्न धारण करनेवाले, फणयुक्त तथा शीघ्रगामी होते हैं। मण्डली सर्प विविध मण्डलोंसे चित्रित, मोटे तथा मन्दगामी हुआ करते हैं। वे अग्नि तथा सूर्यके तुल्य तेजस्वी जान पड़ते हैं। राजिमान् अथवा राजिल सर्प चिकने होते हैं। वे तिरछी, ऊर्ध्वगामिनी एवं बहुरंगी रेखाओंद्वारा चित्रित-से जान पड़ते हैं। चरकने भी इन सर्पोंके विषयमें ऐसा ही, किंतु संक्षिप्त विवरण दिया है—

दर्वीकरः फणी ज्ञेयो मण्डली मण्डलाफणः ।
बिन्दुलेखो विचित्राङ्गः पतङ्गः स्यात्तु राजिमान् ॥

'फणवाले (दर्वीकर) सर्प वायुको प्रकुपित करते हैं। मण्डली सर्पोंके दंशनसे पित्तका प्रकोप बढ़ता है तथा राजिमान् सर्प कफ-प्रकोपको बढ़ानेवाले होते हैं।' (सुश्रुत, उत्तरतन्त्र, कल्पस्थान ४।२९)

'राजिमान् सर्प रातके पिछले पहरमें, मण्डली सर्प रातके शेष तीन पहरोंमें और दर्वीकर सर्प दिनमें चरते और विचरते हैं।'
(सुश्रुत, उत्तरतन्त्र, कल्पस्थान ४।३१)

'दर्वीकर सर्प तरुणावस्थामें, मण्डली वृद्धावस्थामें और राजिमान् सर्प मध्यवयमें उग्र विषवाले होकर लोगोंकी मृत्युके कारण बनते हैं। (सुश्रुत ४।३२) मण्डली सर्पोंको गोनस भी कहते हैं।'

'सुश्रुत-संहिता'की 'आयुर्वेद-तत्त्व-संदीपिका' व्याख्यामें सर्पोंका वर्गीकरण इस प्रकार दिया गया है—

६०० * अग्निपुराण *


कहता हूँ॥ १ ॥
शेष, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंखपाल एवं कुलिक—ये आठ नागोंमें श्रेष्ठ हैं। इन नागोंमेंसे दो नाग ब्राह्मण, दो क्षत्रिय, दो वैश्य और दो शूद्र कहे गये हैं*। ये चार वर्णोंके नाग क्रमशः दस सौ, आठ सौ, पाँच सौ और तीन सौ फणोंसे युक्त हैं। इनके वंशज पाँच सौ नाग हैं। उनसे असंख्य नागोंकी उत्पत्ति हुई है। आकारभेदसे


सर्पोंका वर्गीकरण

                           सर्पोंका वर्गीकरण
                                  |
            +---------------------+---------------------+
            |                                           |
           भौम                                         दिव्य
            |                      (वासुकि आदि दिव्य दृष्टि-निश्वासवाले देवरूप और पूजनीय)
            |
    +-------+-------+
    |               |
  सविष           निर्विष (१२)
    |
    +---------------+-------------------+-------------------+
    |               |                   |                   |
दर्वीकर (२६)     मण्डली (२२)        राजिमान् (१०)       वैकरञ्ज (७+३)=१०
 (फणवाले)      (अल्प फणवाले)         (फणविहीन)          दर्वीकर, मण्डली
 शीघ्रगामी       मन्दगामी, स्थूल    विविध रंगकी रेखाओंसे   तथा राजिमान् सर्पोंकी
चक्र, हल, छत्र,  मण्डलाकार चकत्ते    चित्रित श्लेष्मप्रकोपक,  संकर संतानें होती हैं।
स्वस्तिक, अङ्कुश-  शरीरपर होते हैं।   रात्रिके अन्तिम प्रहरमें  द्विदोष प्रकोपक,
धारी, वातप्रकोपक, चमकते सूर्यके समान  विचरण करनेवाले,      चित्र-विचित्र स्वभाव व
दिवाचारी, तरुणा-  तेजयुक्त, पित्त-    मध्यम आयुमें घातक   आकृतिके, विविध प्रकारके
वस्थामें घातक    प्रकोपक, पूर्वरात्रिमें                    प्रभावकारी
                विचरनेवाले, वृद्धा-
                वस्थामें घातक

‘सुश्रुत-संहिता’, पू० तन्त्र, कल्पस्थान, अध्याय ४ श्लोक २५ से २८ तक कुछ विशेष चिह्न और रंगोंके आधारपर सर्पोंमें ब्राह्मणादि जातियोंकी परिकल्पना की गयी है। जो सर्प मोती और चाँदीके समान सफेद, कपिल वर्णके सुनहरे रंगके तथा सुगन्धयुक्त होते हैं, वे जातिसे ब्राह्मण माने गये हैं। जो स्निग्ध वर्ण (चिकने), अत्यन्त क्रोधी, सूर्य और चन्द्रमाके समान आकृतिके या छत्र अथवा कमलके समान चिह्न धारण करनेवाले होते हैं, उन्हें क्षत्रिय जातिका सर्प मानना चाहिये। जो काले और वज्रके समान रंगवाले हैं अथवा जो कान्तिसे लाल, धूमिल एवं कबूतरके-से दिखायी देते हैं, वे सर्प वैश्य माने गये हैं। जिनका रंग भैसों और चीतोंके समान हो, जो कठोर त्वचावाले हों, वे भाँति-भाँतिके विचित्र रंगवाले सर्प शूद्र जातिके होते हैं।

*'तन्त्रसार-संग्रह' की 'विषनारायणीय' टीकामें ब्राह्मण आदि वर्णवाले दो-दो नागोंके क्रमके विषयमें एक श्लोक उपलब्ध होता है—

आद्यन्तौ च तदाद्यन्तौ तदाद्यन्तौ च मध्यगौ।

‘आदि और अन्तके नाग ब्राह्मण हैं। उसके बाद पुनः आदि-अन्तके नाग क्षत्रिय हैं, तत्पश्चात् पुनः आदि-अन्तके नाग वैश्य हैं और मध्यवर्ती दो नाग शूद्र हैं।’

‘शारदातिलक’ १०।७ में इन नागोंको त्वरिता देवीका आभूषण बताया गया है। उक्त श्लोककी टीकामें उद्धृत ‘नारायणीय तन्त्र'के श्लोकोंमें इन नागोंका ध्यान इस प्रकार बताया गया है—

अनन्तकुलिकौ विप्रौ वह्निवर्णावुदाहृतौ। प्रत्येकं तु सहस्रेण फणानां समलंकृतौ ॥
वासुकिः शङ्खपालश्च क्षत्रियौ पीतवर्णकौ। प्रत्येकं तु फणासप्तशतसंख्याविराजितौ ॥
तक्षकश्च महापद्मो वैश्यावेतावुभौ स्मृतौ। नीलवर्णौ फणापञ्चशतौ तुङ्गोत्तमाङ्गकौ ॥
पद्मकर्कोटकौ शूद्रौ फणात्रिशतकौ सितौ।

* अध्याय २९४ * ६०१


सर्प फणी, मण्डली और राजिल—तीन प्रकारके माने जाते हैं। ये वात, पित्त और कफप्रधान हैं। इनके अतिरिक्त व्यन्तर, दोषमिश्र तथा दर्वीकर जातिवाले सर्प भी होते हैं। ये चक्र, हल, छत्र, स्वस्तिक और अंकुशके चिह्नोंसे युक्त होते हैं। गोनस सर्प विविध मण्डलोंसे चित्रित, दीर्घकाय और मन्दगामी होते हैं। राजिल सर्प स्निग्ध तथा ऊर्ध्वभाग और पार्श्वभागमें रेखाओंसे सुशोभित होते हैं। व्यन्तर सर्प मिश्रित चिह्नोंसे युक्त होते हैं। इनके पार्थिव, आप्य (जलसम्बन्धी), आग्नेय और वायव्य—ये चार मुख्य भेद और छब्बीस अवान्तर भेद हैं। गोनस सर्पोंके सोलह, राजिलजातीय सर्पोंके तेरह और व्यन्तर सर्पोंके इक्कीस भेद हैं। सर्पोंकी उत्पत्तिके लिये जो काल बताया गया है, उससे भिन्न कालमें जो सर्प उत्पन्न होते हैं, वे ‘व्यन्तर’ माने गये हैं। आषाढ़से लेकर तीन मासोंतक सर्पोंकी गर्भस्थिति होती है। गर्भस्थितिके चार मास व्यतीत होनेपर (सर्पिणी) दो सौ चालीस अंडे प्रसव करती है। सर्प-शावकके उन अंडोंसे बाहर निकलते ही उनमें स्त्री, पुरुष और नपुंसकके लक्षण प्रकट होनेसे पूर्व ही प्रायः सर्पगण उनको खा जाते हैं। कृष्णसर्प आँख खुलनेपर एक सप्ताहमें अंडेसे बाहर आता है। उसमें बारह दिनोंके बाद ज्ञानका उदय होता है। बीस दिनोंके बाद सूर्यदर्शन होनेपर उसके बत्तीस दाँत और चार दाढ़ें निकल आती हैं। सर्पकी कराली, मकरी, कालरात्रि और यमदूतिका—ये चार विषयुक्त दाढ़ें होती हैं। ये उसके वाम और दक्षिण पार्श्वमें स्थित होती हैं। सर्प छः महीनेके बाद केंचुलको छोड़ता है और एक सौ बीस वर्षतक जीवित रहता है। शेष आदि सात नाग क्रमशः रवि आदि वारोंके स्वामी माने गये हैं। वे वारेश दिन तथा रात्रिमें भी रहते हैं। (दिनके सात भाग करनेपर पहला भाग वारेशका होता है। शेष छः भागोंका अन्य छः नाग क्रमशः उपभोग करते हैं।) शेष आदि सात नाग अपने-अपने वारोंमें उदित होते हैं, किंतु कुलिकका उदय सबके संधिकालमें होता है। अथवा महापद्म और शङ्खपालके साथ कुलिकका उदय माना जाता है। मतान्तरके अनुसार महापद्म और शङ्खपालके मध्यकी दो घड़ियोंमें कुलिक* का उदय होता है। कुलिकोदयका समय सभी कार्योंमें दोषयुक्त


‘अनन्त (शेषनाग) और कुलिक—ये दो नाग ब्राह्मण कहे गये हैं। इनकी अङ्गकान्ति अग्निके समान उज्ज्वल है। इनमेंसे प्रत्येक सहस्र फणोंसे समलंकृत हैं। वासुकि और शङ्खपाल—ये क्षत्रिय हैं। इनकी कान्ति पीली है। इनमेंसे प्रत्येक सात सौ फणोंद्वारा सुशोभित हैं। तक्षक और महापद्म—ये दो नाग वैश्य माने गये हैं। इनकी अङ्गकान्ति नीली है। इनके उन्नत मस्तक पाँच-पाँच सौ फणोंसे अलंकृत हैं। पद्म तथा कर्कोटक—ये दो नाग शूद्र हैं और उनकी कान्ति श्वेत है।’

निम्नाङ्कित रीतिसे नागोंके वर्ण आदिको जानना चाहिये—

नागोंके नामवर्णरंगफण
१-शेषनाग (अनन्त)ब्राह्मणअग्निके समान१,०००
२-कुलिकब्राह्मणउज्ज्वल१,०००
१-वासुकि, २ शङ्खपालक्षत्रियपीत७००
अग्निपुराणके अनुसार८००
१-तक्षक, २ महापद्मवैश्यनील५००
१-पद्म, २ कर्कोटकशूद्रश्वेत३००

* प्रतिदिन दिनमानके सात भागोंमें वारेशसे आरम्भ कर कुलिकके सिवा अन्य सात नाग क्रमशः एक-एक अंशके स्वामी होते हैं। लोकप्रचलित फलित ग्रन्थोंमें शनिका अंश ही कुलिकका अंश माना गया है। इसलिये महापद्म और शङ्खपालके मध्यकी दो घड़ी ही सर्वसम्मत ‘कुलिकोदयकाल’ प्रतीत होता है।

६०२ * अग्निपुराण *

माना गया है। सर्पदंशमें तो वह विशेषतः अशुभ है। कृत्तिका, भरणी, स्वाती, मूल, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वभाद्रपदा, अश्विनी, विशाखा, आर्द्रा, आश्लेषा, चित्रा, श्रवण, रोहिणी, हस्त नक्षत्र, शनि तथा मङ्गलवार एवं पञ्चमी, अष्टमी, षष्ठी, रिक्ता—चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी एवं शिवा (तृतीया) तिथि सर्पदंशमें निन्द्य मानी गयी हैं। पञ्चमी और चतुर्दशी तिथियोंमें सर्पका दंशन विशेषतः निन्दित है। यदि सर्प चारों संध्याओंके समय, दग्धयोग या दग्धराशिमें डँस ले, तो अनिष्टकारक होता है। एक, दो और तीन दंशनोंको क्रमशः 'दृष्ट', 'विद्ध' और 'खण्डित' कहते हैं। सर्पका केवल स्पर्श हो, परंतु वह डँसे नहीं तो उसे 'अदंश' कहते हैं। इसमें मनुष्य सुरक्षित रहता है। इस प्रकार सर्पदंशके चार भेद हुए। इनमें तीन, दो एवं एक दंश वेदनाजनक और रक्तस्राव करनेवाले हैं। एक पैर और कूर्मके समान आकारवाले दंश मृत्युसे प्रेरित होते हैं। अङ्गोंमें दाह, शरीरमें चींटियोंके रेंगनेका-सा अनुभव, कण्ठशोथ एवं अन्य पीड़ासे युक्त और व्यथाजनक गाँठवाला दंशन विषयुक्त माना जाता है, इनसे भिन्न प्रकारका सर्पदंश विषहीन होता है। देवमन्दिर, शून्यगृह, वल्मीक (बाँबी), उद्यान, वृक्षके कोटर, दो सड़कों या मार्गोंकी संधि, श्मशान, नदी-सागर-संगम, द्वीप, चतुष्पथ (चौराहा), राजप्रासाद, गृह, कमलवन, पर्वतशिखर, बिलद्वार, जीर्णकूप, जीर्णगृह, दीवाल, शोभाञ्जन, श्लेष्मातक (लिसोडा) वृक्ष, जम्बूवृक्ष, उदुम्बरवृक्ष, वेणुवन (बँसवारी), वटवृक्ष और जीर्ण प्राकार (चहारदीवारी) आदि स्थानोंमें सर्प निवास करते हैं। इन्द्रिय-छिद्र, मुख, हृदय, कक्ष, जत्रु (ग्रीवामूल), तालु, ललाट, ग्रीवा, सिर, चिबुक (ठुड्डी), नाभि और चरण—इन अङ्गोंमें सर्पदंश अशुभ है। विषचिकित्सकको सर्पदंशकी सूचना देनेवाला दूत यदि हाथोंमें फूल लिये हो, सुन्दर वाणी बोलता हो, उत्तम बुद्धिसे युक्त हो, सर्पदष्ट मनुष्यके समान लिङ्ग एवं जातिका हो, श्वेतवस्त्रधारी हो, निर्मल और पवित्र हो, तो शुभ माना गया है। इसके विपरीत जो दूत मुख्यद्वारके सिवा दूसरे मार्गसे आया हो, शस्त्रयुक्त एवं प्रमादी हो, भूमिपर दृष्टि गड़ाये हो, गंदा या बदरंग वस्त्र पहने हो, हाथमें पाश आदि लिये हो, गद्गदकण्ठसे बोल रहा हो, सूखे काठपर बैठा हो, खिन्न हो तथा जो हाथमें काले तिल लिये हो या लाल रंगके धब्बेसे युक्त वस्त्र धारण किये हो अथवा भीगे वस्त्र पहने हुए हो, जिसके मस्तकके बालोंपर काले और लाल रंगके फूल पड़े हों, अपने कुचोंका मर्दन, नखोंका छेदन या गुदाका स्पर्श कर रहा हो, भूमिको पैरसे खुरच रहा हो, केशोंको नोंच रहा हो या तिनके तोड़ रहा हो, ऐसे दूत दोषयुक्त कहे गये हैं। इन लक्षणोंमेंसे एक भी हो तो अशुभ है॥ २-२८॥

अपनी और दूतकी यदि इडा अथवा पिङ्गला या दोनों ही नाड़ियाँ चल रही हों, उन दोनोंके इन चिह्नोंसे डँसनेवाले सर्पको क्रमशः स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक जाने। दूत अपने जिस अंगका स्पर्श करे, रोगीके उसी अंगमें सर्पका दंश हुआ जाने। दूतके पैर चञ्चल हों तो अशुभ और यदि स्थिर हों तो शुभ माने गये हैं॥ २९-३०॥

किसी जीवके पार्श्वदेशमें स्थित दूत शुभ और अन्य भागोंमें स्थित अशुभ माना गया है। दूतके निवेदनके समय किसी जीवका आगमन शुभ और गमन अशुभ है। दूतकी वाणी यदि अत्यन्त दोषयुक्त हो अथवा सुस्पष्ट प्रतीत न होती हो तो वह निन्दित कही गयी है। उसके सुस्पष्ट एवं विभक्त वचनोंद्वारा यह ज्ञात होता है कि सर्पका

  • अध्याय २९५ * ६०३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

दंशन विषयुक्त है अथवा विषरहित। दूतके वाक्यके आदिमें 'स्वर' और 'कादि' वर्गके भेदसे लिपिके दो प्रकार माने जाते हैं। दूतके वचनसे वाक्यके आरम्भमें स्वर प्रयुक्त हो, तो सर्पदष्ट मनुष्यकी जीवनरक्षा और कादिवर्गोंके प्रयुक्त होनेपर अशुभकी आशङ्का होती है। यह मातृका-विधान है। 'क' आदि वर्गोंमें आरम्भके चार अक्षर क्रमशः वायु, अग्नि, इन्द्र और वरुणदेवता-सम्बन्धी होते हैं। कादि वर्गोंके पञ्चम अक्षर नपुंसक माने गये हैं। 'अ' आदि स्वर ह्रस्व और दीर्घके भेदसे क्रमशः इन्द्र एवं वरुणदेवता-सम्बन्धी होते हैं। दूतके वाक्यारम्भमें वायु और अग्निदैवत्य अक्षर दूषित और ऐन्द्र अक्षर मध्यम फलप्रद हैं। वरुणदैवत्य वर्ण उत्तम और नपुंसक वर्ण अत्यन्त अशुभ हैं॥ ३१-३५॥

विषचिकित्सकके प्रस्थानकालमें मङ्गलमय वचन, मेघ और गजराजकी गर्जना, दक्षिणपार्श्वमें फलयुक्त वृक्ष हो और वामभागमें किसी पक्षीका कलरव हो रहा हो, तो वह विजय या सफलताका सूचक है। प्रस्थानकालमें गीत आदिके शब्द शुभ होते हैं। दक्षिणभागमें अनर्थसूचक वाणी, चक्रवाकका रुदन-ऐसे लक्षण सिद्धिके सूचक हैं। पक्षियोंकी अशुभ ध्वनि और छींक-ये कार्यमें असिद्धि प्रदान करते हैं। वेश्या, ब्राह्मण, राजा, कन्या, गौ, हाथी, ढोलक, पताका, दुग्ध, घृत, दही, शङ्ख, जल, छत्र, भेरी, फल, मदिरा, अक्षत, सुवर्ण और चाँदी-ये लक्षण सम्मुख होनेपर कार्यसिद्धिके सूचक हैं। काष्ठपर अग्निसे युक्त शिल्पकार, मैले कपड़ोंका बोझ ढोनेवाले पुरुष, गलेमें टंक (पाषाणभेदक शस्त्र) धारण किये हुए मनुष्य, शृगाल, गृध्र, उलूक, कौड़ी, तेल, कपाल और निषिद्ध भस्म-ये लक्षण नाशके सूचक हैं। विषके एक धातुसे दूसरे धातुमें प्रवेश करनेसे विषसम्बन्धी सात रोग होते हैं। विषदंश पहले ललाटमें, ललाटसे नेत्रमें और नेत्रसे मुखमें जाता है। मुखमें प्रविष्ट होनेके बाद वह सम्पूर्ण धमनियोंमें व्याप्त हो जाता है। फिर क्रमशः धातुओंमें प्रवेश करता है॥ ३६-४१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नागलक्षणकथन नामक दो सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९४॥


दो सौ पंचानबेवाँ अध्याय

दष्ट-चिकित्सा

अग्निदेव कहते हैं-वसिष्ठ! अब मैं मन्त्र, ध्यान और ओषधिके द्वारा साँपके द्वारा डँसे हुए मनुष्यकी चिकित्साका वर्णन करता हूँ। 'ॐ नमो भगवते नीलकण्ठाय'-इस मन्त्रके जपसे विषका नाश होता है*। घृतके साथ गोबरके रसका पान करे। यह ओषधि साँपके डसे हुए मनुष्यके जीवनकी रक्षा करती है। विष दो प्रकारके कहे जाते हैं-'जङ्गम' विष, जो सर्प


* 'सुश्रुत' में मन्त्रग्रहणकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है- 'स्त्री, मांस और मधु (मद्य)-का सेवन छोड़कर, मिताहारी और पवित्र होकर मन्त्र ग्रहण करना चाहिये। मन्त्र-साधकको कुशके आसनपर बैठना और सोना चाहिये। मन्त्रकी सिद्धिके लिये वह यत्नपूर्वक गन्ध, माल्य, उपहार, बलि, जप और होमके द्वारा देवताओंका पूजन करे। अविधिपूर्वक उच्चारित अथवा स्वरवर्णसे हीन मन्त्र सिद्धिप्रद नहीं होते हैं। इसलिये मन्त्रप्रयोगके साथ-साथ औषध-उपचार आदिका क्रम भी चालू रखना चाहिये।'
(सुश्रुत, उत्तर तन्त्र, कल्पस्थान ५।१३)

६०४ * अग्निपुराण *


और मूषक आदि प्राणियोंमें पाया जाता है एवं दूसरा 'स्थावर' विष, जिसके अन्तर्गत शृङ्गी (सिंगिया) आदि विषभेद हैं॥ १-२॥

शान्तस्वरसे युक्त ब्रह्मा (क्षौं), लोहित (ह्रीं), तारक (ॐ) और शिव (हौं)—यह चार अक्षरोंका वियति-सम्बन्धी नाममन्त्र है*। इसे शब्दमय तार्क्ष्य (गरुड) माना गया है॥ ३-४॥

'ॐ ज्वल महामते हृदयाय नमः, गरुड विशाल शिरसे स्वाहा, गरुड शिखायै वषट्, गरुडविषभञ्जन प्रभेदन प्रभेदन वित्रासय वित्रासय विमर्द्दय विमर्द्दय कवचाय हुम्, उग्ररूपधारक सर्वभयंकर भीषय भीषय सर्वं दह दह भस्मीकुरु कुरु स्वाहा, नेत्रत्रयाय वौषट् । अप्रतिहतशासनं वं हूं फट् अस्त्राय फट्।'

मातृकामय कमल बनावे। उसके आठों दिशाओंमें आठ दल हों। पूर्वादि दलोंमें दो-दोके क्रमसे समस्त स्वरवर्णोंको लिखे। कवार्गादि सात वर्गोंके अन्तिम दो-दो अक्षरोंका भी प्रत्येक दलमें उल्लेख करे। उस कमलके केसरभागको वर्गके आदि अक्षरोंसे अवरुद्ध करे तथा कर्णिकामें अग्निबीज 'रं' लिखे। मन्त्रका साधक उस कमलको हृदयस्थ करके बायें हाथकी हथेलीपर उसका चिन्तन करे। अङ्गुष्ठ आदिमें वियति-मन्त्रके वर्णोंका न्यास करे और उनके द्वारा भेदित कलाओंका भी चिन्तन करे। तदनन्तर चौकोर 'भू-पुर' नामक मण्डल बनावे, जो पीले रंगका हो और चारों ओरसे वज्रद्वारा चिह्नित हो। यह मण्डल इन्द्रदेवताका होता है। अर्धचन्द्राकार वृत्त जलदेवता-सम्बन्धी है। कमलका आधा भाग शुक्लवर्णका है। उसके देवता वरुण हैं। फिर स्वस्तिक-चिह्नसे युक्त त्रिकोणाकार तेजोमय वह्निदेवताके मण्डलका चिन्तन करे। वायुदेवताका मण्डल बिन्दुयुक्त एवं वृत्ताकार है। वह कृष्णमालासे सुशोभित है, ऐसा चिन्तन करे॥ ५-८॥

ये चार भूत अङ्गुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा और अनामिका—इन चार अँगुलियोंके मध्यपर्वोंमें स्थित अपने निवासस्थानोंमें विराजमान हैं और सुवर्णमय नागवाहनसे इनके वासस्थान आवेष्टित हैं। इस प्रकार चिन्तनपूर्वक क्रमशः पृथ्‍वी आदि तत्त्वोंका अङ्गुष्ठ आदिके मध्यपर्वमें न्यास करे। साथ ही वियति-मन्त्रके चार वर्णोंको भी क्रमशः उन्हींमें विन्यस्त करे। इन वर्णोंकी कान्ति उनके सुन्दर मण्डलोंके समान है। इस प्रकार न्यास करनेके पश्चात् रूपरहित शब्दतन्मात्रमय शिवदेवताके आकाशतत्त्वका कनिष्ठाके मध्यपर्वमें चिन्तन करके उसके भीतर वेदमन्त्रके प्रथम अक्षरका न्यास करे। पूर्वोक्त नागोंके नामके आदि अक्षरोंका उनके अपने मण्डलोंमें न्यास करे। पृथ्‍वी आदि भूतोंके आदि अक्षरोंका अङ्गुष्ठ आदि अँगुलियोंके अन्तिम पर्वोंपर न्यास करे तथा विद्वान् पुरुष गन्धतन्मात्रादिके गन्धादि गुणसम्बन्धी अक्षरोंका पाँचों अँगुलियोंमें न्यास करे॥ ९-१२॥

इस प्रकार न्यास-ध्यानपूर्वक तार्क्ष्य-मन्त्रसे रोगीके हाथका स्पर्शमात्र करके मन्त्रज्ञ विद्वान् उसके स्थावर-जंगम दोनों प्रकारके विषोंका नाश कर देता है। विद्वान् पुरुष पृथ्‍वीमण्डल आदिमें विन्यस्त वियति-मन्त्रके चारों वर्णोंका अपनी श्रेष्ठ दो अँगुलियोंद्वारा शरीरके नाभिस्थानों और पर्वोंमें न्यास करे। तदनन्तर गरुडके स्वरूपका इस प्रकार ध्यान करे—'पक्षिराज गरुड दोनों घुटनोंतक सुनहरी आभासे सुशोभित हैं। घुटनोंसे लेकर नाभितक उनकी अङ्गकान्ति बर्फके समान सफेद है। वहाँसे कण्ठतक वे कुङ्कुमके समान अरुण प्रतीत होते हैं और कण्ठसे केशपर्यन्त


* इन चारों अक्षरोंका उद्धार 'तन्त्राभिधानकोष' के अनुसार किया गया है।

  • अध्याय २९५ * ६०५

उनकी कान्ति असित (श्याम) है। वे समूचे ब्रह्माण्डमें व्याप्त हैं। उनका नाम चन्द्र है और वे नागमय आभूषणसे विभूषित हैं। उनकी नासिकाका अग्रभाग नीले रंगका है और उनके पंख बड़े विशाल हैं।' मन्त्रज्ञ विद्वान् अपने-आपका भी गरुडके रूपमें ही चिन्तन करे। इस तरह गरुडस्वरूप मन्त्रप्रयोक्ता पुरुषके वाक्यसे मन्त्र विषपर अपना प्रभाव डालता है। गरुडके हाथकी मुट्ठी रोगीके हाथमें स्थित हो तो वह उसके अङ्गुष्ठमें स्थित विषका विनाश कर देती है। मन्त्रज्ञ पुरुष अपने गरुडस्वरूप हाथको ऊपर उठाकर उसकी पाँचों अँगुलियोंके चालनमात्रसे विषसे उत्पन्न होनेवाले मदपर दृष्टि रखते हुए उस विषका स्तम्भन आदि कर सकता है॥ १३-१७$\frac{१}{२}$॥

आकाशसे लेकर भू-बीजपर्यन्त जो पाँच बीज हैं, उन्हें 'पञ्चाक्षर मन्त्रराज' कहा गया है। (उसका स्वरूप इस प्रकार है—हं, यं, रं, वं, लं।) अत्यन्त विषका स्तम्भन करना हो तो इस मन्त्रके उच्चारणमात्रसे मन्त्रज्ञ पुरुष विषको रोक देता है। यह 'व्यत्यस्तभूषण' बीजमन्त्र है। अर्थात् इन बीजोंको उलट-फेरकर बोलना इस मन्त्रके लिये भूषणरूप है। इसको अच्छी तरह साध लिया जाय और इसके आदिमें 'संप्लवं प्लावय प्लावय'—यह वाक्य जोड़ दिया जाय तो मन्त्र-प्रयोक्ता पुरुष इसके प्रयोगसे विषका संहार कर सकता है॥ १८-१९$\frac{१}{२}$॥

इस मन्त्रके भलीभाँति जपसे अभिमन्त्रित जलके द्वारा अभिषेक करनेमात्रसे यह मन्त्र अपने प्रभावद्वारा उस रोगीसे डंडा उठवा सकता है, अथवा मन्त्रजपपूर्वक की गयी शङ्खभेर्यादिकी ध्वनिको सुननेमात्रसे यह प्रयोग रोगीके विषको अवश्य ही दग्ध कर देता है। यदि भू-बीज 'लं' तथा तेजोबीज 'रं' को उलटकर रखा जाय, अर्थात् 'हं, यं, लं, वं, रं'—इस प्रकार मन्त्रका स्वरूप कर दिया जाय तो उसका प्रयोग भी उपर्युक्त फलका साधक होता है। अर्थात् उससे भी विषका दहन हो जाता है। भू-बीज और वायु-बीजका व्यत्यय करनेसे जो मन्त्र बनता है वह (हं लं रं वं यं) विषका संक्रामक होता है, अर्थात् उसका अन्यत्र संक्रमण करा देता है। मन्त्र-प्रयोक्ता पुरुष रोगीके समीप बैठा हो या अपने घरमें स्थित हो, यदि गरुडके स्वरूपका चिन्तन तथा अपने-आपमें भी गरुडकी भावना करके 'रं वं,'—इन दो ही बीजोंका उच्चारण (जप) करे तो इस कर्मको सफल बना सकता है। गरुड और वरुणके मन्दिरमें स्थित होकर उक्त मन्त्रका जप करनेसे मन्त्रज्ञ पुरुष विषका नाश कर देता है। 'स्वधा' और श्रीके बीजोंसे युक्त करके यदि इस मन्त्रको बोला जाय तो इसे 'जानुदण्डिमन्त्र' कहते हैं। इसके जपपूर्वक स्नान और जलपान करनेसे साधक सब प्रकारके विष, ज्वर, रोग और अपमृत्युपर विजय पा लेता है॥ २०-२४॥

१-पक्ष पक्षिपक्ष महापक्ष महापक्ष वि वि स्वाहा। २-पक्ष पक्षिपक्ष महापक्ष महापक्ष क्षि क्षि स्वाहा॥

—ये दो पक्षिराज गरुडके मन्त्र हैं। इनके द्वारा अभिमन्त्रण करने, अर्थात् इनके जपपूर्वक रोगीको झाड़नेसे ये दोनों मन्त्र विषके नाशक होते हैं॥ २५-२६॥

'पक्षिराजाय विद्महे पक्षिदेवाय धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात्।'—यह गरुड-गायत्रीमन्त्र है॥ २७॥

उपर्युक्त दोनों पक्षिराज-मन्त्रोंको 'रं' बीजसे आवृत करके उनके पार्श्वभागमें भी 'रं' बीज जोड़ दे। तदनन्तर दन्त, श्री, दण्डि, काल और लाङ्गलीसे उन्हें युक्त कर दे और आदिमें

६०६ * अग्निपुराण *


पूर्वोक्त 'नीलकण्ठ-मन्त्र' जोड़ दे। इस प्रकार बताये गये मन्त्रका वक्षःस्थल, कण्ठ और शिखामें न्यास करे। उक्त दोनों मन्त्रोंका संस्कार करके उन्हें स्तम्भमें अङ्कित करे॥ २८॥

इसके पश्चात् निम्नाङ्कित रूपसे न्यास करे— 'हर हर स्वाहा हृदयाय नमः। कपर्दिने स्वाहा शिरसे स्वाहा। नीलकण्ठाय स्वाहा शिखायै वषट्। कालकूटविषभक्षणाय हुं फट् कवचाय हुम्।' इससे भुजाओं तथा कण्ठका स्पर्श करे। 'कृत्तिवाससे नेत्रत्रयाय वौषट् नीलकण्ठाय स्वाहा अस्त्राय फट्*'॥ २९॥

जिनके पूर्व आदि मुख क्रमशः श्वेत, पीत, अरुण और श्याम हैं, जो अपने चारों हाथोंमें क्रमशः अभय, वरद, धनुष तथा वासुकि नागको धारण करते हैं, जिनके गलेमें यज्ञोपवीत शोभा पाता है और पार्श्वभागमें गौरीदेवी विराजमान हैं, वे भगवान् रुद्र इस मन्त्रके देवता हैं। दोनों पैर, दोनों घुटने, गुह्यभाग, नाभि, हृदय, कण्ठ और मस्तक—इन अङ्गोंमें मन्त्रके अक्षरोंका न्यास करके दोनों हाथोंमें अङ्गुष्ठ आदि अँगुलियोंमें अर्थात् तर्जनीसे लेकर तर्जनीपर्यन्त अँगुलियोंमें मन्त्राक्षरोंका न्यास करके सम्पूर्ण मन्त्रका अङ्गुष्ठोंमें न्यास करे॥ ३०—३२$\frac{१}{२}$॥

इस प्रकार ध्यान और न्यास करके शीघ्र ही बँधी हुई शूलमुद्राद्वारा विषका संहार करे। कनिष्ठा अँगुली ज्येष्ठासे बँध जाय और तीन अन्य अँगुलियाँ फैल जायँ तो 'शूलमुद्रा' होती है। विषका नाश करनेके लिये बायें हाथका और अन्य कार्यमें दक्षिण हाथका प्रयोग करना चाहिये॥ ३३-३४॥

ॐ नमो भगवते नीलकण्ठाय चिः। अमलकण्ठाय चिः। सर्वज्ञकण्ठाय चिः। क्षिप क्षिप ॐ स्वाहा। अमलनीलकण्ठाय नैकसर्पविषापहाय। नमस्ते रुद्र मन्यवे।

—इस मन्त्रको पढ़कर झाड़नेसे विष नष्ट हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। रोगीके कानमें जप करनेसे अथवा मन्त्र पढ़ते हुए जूतेसे रोगीके पासकी भूमिपर पीटनेसे विष उतर जाता है। रुद्रविधान करके उसके द्वारा नीलकण्ठ महेश्वरका यजन करे। इससे विष-व्याधिका विनाश हो जाता है॥ ३५-३६॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'दष्ट-चिकित्साका कथन' नामक दो सौ पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९५॥


दो सौ छियानबेवाँ अध्याय

पञ्चाङ्ग-रुद्रविधान

**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! अब मैं 'पञ्चाङ्ग-रुद्र-विधान'का वर्णन करता हूँ। यह परम उत्तम तथा सब कुछ प्रदान करनेवाला है। 'शिवसंकल्प' इसका हृदय, 'पुरुषसूक्त' शीर्ष, 'अद्भ्यः सम्भूतः०' (यजु० ३१।१७) आदि सूक्त शिखा और 'आशुः शिशानः' आदि अध्याय इसका कवच है। शतरुद्रिय-संज्ञक रुद्रके ये पाँच अङ्ग हैं। रुद्रदेवका ध्यान करके इसके पञ्चाङ्गभूत रुद्रोंका क्रमशः जप करे। 'यज्जाग्रतो०' आदि छः ऋचाओंका शिवसंकल्प-सूक्त (यजु० ३४।१—६) इसका हृदय है। इसके शिवसंकल्प ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द कहे गये हैं। 'सहस्रशीर्षा०' (यजु० ३१)-से प्रारम्भ होनेवाला पुरुषसूक्त इसका शीर्षस्थानीय है। इसके नारायण ऋषि,


* यह अङ्गन्यास 'शारदातिलक' और 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र'में इसी प्रकार उपलब्ध है।

* अध्याय २९७ * \hfill ६०७


पुरुष देवता और अनुष्टुप् एवं त्रिष्टुप् छन्द जानने चाहिये। 'अद्भ्यः सम्भूतः०' आदि सूक्तके उत्तरगामी नर ऋषि हैं। इनमें क्रमशः पहले तीन मन्त्रोंका त्रिष्टुप् छन्द, फिर दो मन्त्रोंका अनुष्टुप् छन्द और अन्तिम मन्त्रका त्रिष्टुप् छन्द है तथा पुरुष इसके देवता हैं। 'आशुः शिशानः०' (यजु० १७।३३) आदि सूक्तमें बारह मन्त्रोंके इन्द्र देवता और त्रिष्टुप् छन्द हैं। इन सत्रह ऋचाओंके सूक्तके ऋषि 'प्रतिरथ' कहे गये हैं, किंतु देवता भिन्न-भिन्न माने गये हैं। कुछ मन्त्रोंके पुरुवित् देवता हैं। अवशिष्ट देवतासम्बन्धी मन्त्रोंका छन्द अनुष्टुप् कहा गया है। 'असौ यस्ताम्रो०' (यजु० १६।६) मन्त्रके पुरुल्लिङ्गोक्त देवता और पंक्ति छन्द हैं। 'मर्माणि ते०' (यजु० १७।४९) मन्त्रका त्रिष्टुप् छन्द और लिङ्गोक्त देवता हैं। सम्पूर्ण रुद्राध्यायके परमेष्ठी ऋषि, 'देवानाम्' इत्यादि मन्त्रोंके प्रजापति ऋषि और तीनों ऋचाओंके कुत्स ऋषि हैं। 'मा नो महान्तमुत मा नो०' (यजुर्वेद १६।१५) और 'मा नस्तोके०' (यजु० १६।१६) आदि दो मन्त्रोंके एकमात्र उमा तथा अन्य मन्त्रोंके रुद्र और रुद्रगण देवता हैं। सोलह ऋचाओंवाले आद्य अनुवाकके रुद्र देवता हैं। प्रथम मन्त्रका छन्द गायत्री, तीन ऋचाओंका अनुष्टुप्, तीन ऋचाओंका पंक्ति, सात ऋचाओंका अनुष्टुप् और दो मन्त्रोंका जगती छन्द है। 'नमो हिरण्यबाहवे०' (यजु० १६।१७) मन्त्रसे लेकर 'नमो वः किरिकेभ्यः०' (यजु० १६।४६) तक रुद्रगणकी तीन अशीतियाँ हैं। रुद्रानुवाकके पाँच ऋचाओंके रुद्र देवता हैं। बीसवीं ऋचा भी रुद्रदेवता-सम्बन्धिनी है। पहली ऋचाका छन्द बृहती, दूसरीका त्रिजगती, तीसरीका त्रिष्टुप् और शेष तीनका अनुष्टुप् छन्द है। श्रेष्ठ आचरणसे युक्त पुरुष इसका ज्ञान पाकर उत्तम सिद्धिका लाभ करता है। 'त्रैलोक्य-मोहन' मन्त्रसे भी विष-व्याधि आदिका विनाश होता है। वह मन्त्र इस प्रकार है—'इं श्रीं ह्रीं हूं त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः।' (त्रैलोक्यमोहन विष्णुको नमस्कार है) निम्नाङ्कित आनुष्टुभ नृसिंह-मन्त्रसे भी विष-व्याधिका विनाश होता है॥ १–१६॥

(आनुष्टुभ नृसिंह-मन्त्र)
ॐ हृं इं उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
'जो उग्र, वीर, सर्वतोमुखी तेजसे प्रज्वलित, भयंकर तथा मृत्युकी भी मृत्यु होते हुए भी भक्तजनोंके लिये कल्याणस्वरूप हैं, उन महाविष्णु नृसिंहका मैं भजन करता हूँ।' हृदयादि पाँच अङ्गोंके न्याससे युक्त यही मन्त्र समस्त अर्थोंको सिद्ध करनेवाला है। श्रीविष्णुके द्वादशाक्षर और अष्टाक्षर मन्त्र भी विष-व्याधिका नाश करनेवाले हैं। 'कुब्जिका त्रिपुरा गौरी चन्द्रिका विषहारिणी।'—यह प्रसादमन्त्र विषहारक तथा आयु और आरोग्यका वर्धक है। सूर्य और विनायकके मन्त्र भी विषहारी कहे गये हैं। इसी तरह समस्त रुद्रमन्त्र भी विषका नाश करनेवाले हैं॥ १७–२१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पञ्चाङ्ग-रुद्रविधान' नामक दो सौ छियानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९६॥


दो सौ सत्तानबेवाँ अध्याय

विषहारी मन्त्र तथा औषध

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! 'ॐ नमो भगवते रुद्राय छिन्द-छिन्द विषं ज्वलितपरशुपाणये स्वाहा।'—इस मन्त्रसे और 'ॐ नमो भगवते पक्षिरुद्राय दष्टकमुत्थापयोत्थापय, दष्टकं कम्पय

६०८ * अग्निपुराण *


कम्पय जल्पय जल्पय सर्पदष्टमुत्थापयोत्थापय लल लल बन्ध बन्ध मोचय मोचय वररुद्र गच्छ गच्छ वध वध त्रुट त्रुट वुक वुक भीषय भीषय मुष्टिना विषं संहर संहर ठ ठ।'—इस ‘पक्षिरुद्र-मन्त्र’से सर्पदष्ट मनुष्यको अभिमन्त्रित करनेपर उसके विषका नाश हो जाता है। ॐ नमो भगवते रुद्र नाशय विषं स्थावरजङ्गमं कृत्रिमाकृत्रिमं विषमपविषं नाशय नानाविषं दष्टकविषं नाशय धम धम दम दम वम वम मेघान्धकारधारावर्षकर्ष निर्विषीभव संहर संहर गच्छ गच्छ आवेशय आवेशय विषोत्थापनरूपं मन्त्राद् विषधारणम् 'ॐ क्षिप ॐ क्षिप स्वाहा' 'ॐ ह्रां ह्रीं ख्रीं सः ठं द्रौं ह्रीं ठः ।'—यह मन्त्र जप आदिके द्वारा सिद्ध होनेपर सदैव सर्पोंको बाँध लेता है।

गोपीजनवल्लभाय स्वाहा’—यह मन्त्र सम्पूर्ण अभीष्ट अर्थोंको सिद्ध करनेवाला है। इसमें आदिके एक, दो, तीन और चौथा अक्षर बीजके रूपमें होगा। इससे हृदय, सिर, शिखा और कवचका न्यास होगा। फिर ‘कृष्णचक्राय अस्त्राय फट्’ बोलनेसे पञ्चाङ्गन्यासकी क्रिया पूरी होगी।

ॐ नमो भगवते रुद्राय प्रेताधिपतये हुलु हुलु गर्ज गर्ज नागान् भ्रामय भ्रामय मुञ्च मुञ्च मोहय मोहय कट्ट कट्ट आविश आविश सुवर्णपतङ्ग रुद्रो ज्ञापयति स्वाहा ॥ १-५॥

यह ‘पातालक्षोभ-मन्त्र’ है। इसके द्वारा रोगीको अभिमन्त्रित करनेसे यह उसके लिये विषनाशक होता है। दंशक सर्पके डँस लेनेपर जलते काष्ठ, तप्त शिला, आगकी ज्वाला अथवा गरम कोकनद (कमल) आदिके द्वारा दंश-स्थानको जला दे—सेंक दे; इससे विषका उपशमन होता है। शिरीषवृक्षके बीज और पुष्प, आकके दूध और बीज एवं सोंठ, मिर्च तथा पीपल—ये पान, लेपन और अञ्जन आदिके द्वारा विषका नाश करते हैं। शिरीष-पुष्पके रससे भावित सफेद मिर्च पान, नस्य और अञ्जन आदिके द्वारा विषका उपसंहार करती है, इसमें संशय नहीं है। कड़वी तोरई, वच, हींग तथा शिरीष और आकका दूध, त्रिकटु और मेषाम्भ—इनका नस्य आदिके रूपमें प्रयोग होनेपर ये विषका हरण करते हैं। अङ्कोल और कड़वी तुम्बीके सर्वाङ्गके चूर्णसे नस्य लेनेसे विषका अपहरण होता है। इन्द्रायण, चित्तक, द्रोण (गूमा), तुलसी, धतूरा और सहा—इनके रसमें त्रिकटुके चूर्णको भिगोकर खानेसे विषका नाश होता है। कृष्णपक्षकी पञ्चमीको लाया हुआ शिरीषका पञ्चाङ्ग विषहारी है ॥ ६—१२॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘विषहारी मन्त्रौषधका कथन’ नामक दो सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९७॥


दो सौ अठानबेवाँ अध्याय

गोनसादि-चिकित्सा

**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! अब मैं तुम्हारे सम्मुख गोनस आदि जातिके सर्पोंके विषकी चिकित्साका वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो। ‘ॐ ह्रां ह्रीं अमलपक्षि स्वाहा’—इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित ताम्बूलके प्रयोगसे मन्त्रवेत्ता मण्डली (गोनस) सर्पके विषका हरण करता है। लहसुन, अङ्कोल, त्रिफला, कूट, वच और त्रिकटु—इनका सर्पविषमें पान करे। सर्पविषमें स्नुहीदुग्ध, गोदुग्ध, गोदधि और गोमूत्रमें पकाया हुआ गोघृत पान करना चाहिये। राजिलजातीय सर्पके डँस लेनेपर सैन्धवलवण, पीपल, घृत, मधु, गोमयरस और साहीकी आँतका भक्षण करना

* अध्याय २९८ * ६०९


चाहिये। सर्पदष्ट मनुष्यको पीपल, शर्करा, दुग्ध, घृत और मधुका पान करना चाहिये। त्रिकटु, मयूरपिच्छ, विडालकी अस्थि और नेवलेका रोम—इन सबको समान भाग लेकर चूर्ण बना ले। फिर भेड़के दूधमें भिगोकर उसकी धूप देनेसे सभी प्रकारके विषोंका विनाश होता है। पाठा, निर्गुण्डी और अङ्कोलके पत्रको समान भागमें लेकर तथा सबके समान लहसुन लेकर बनाया हुआ धूप भी विषनाशक है। अगस्त्यके पत्तोंको काँजीमें पकाकर उसकी भापसे डसे हुए स्थानको सेंका जाय, इससे विष उतर जाता है॥ १-७॥

मूषक सोलह प्रकारके कहे गये हैं। कपासका रस तेलके साथ पान करनेसे 'मूषक-विष'का नाश होता है। फलिनी (फलिहारी)-के फूलोंका सोंठ और गुड़के साथ भक्षण करना चाहिये। यह विषरोगनाशक है। लूताएँ (मकड़ी) बीस प्रकारकी कही गयी हैं। इनके विषकी सावधानीसे चिकित्सा करनी चाहिये। पद्म, पद्माक, काष्ठ, पाटला, कूट, तगर, नेत्रबाला, खस, चन्दन, निर्गुण्डी, सारिवा और शेलु (लिसोड़ा)—ये लूता-विषहारीगण हैं। गुञ्जा, निर्गुण्डी और अङ्कोलके पत्र, सोंठ, हल्दी, दारुहल्दी, करञ्जकी छाल—इनको पकाकर 'लूताविष'से पीड़ित मनुष्यका पूर्वोक्त ओषधियोंसे युक्त जलके द्वारा सेचन करे॥ ८-१३॥

अब 'वृश्चिक-विष'का अपहरण करनेवाली ओषधियोंको सुनो। मञ्जिष्ठा, चन्दन, त्रिकटु तथा शिरीष, कुमुदके पुष्प—इन चारों योगोंको एकत्रित करना चाहिये। ये योग लेप आदि करनेपर वृश्चिक-विषका विनाश करते हैं।

'ॐ नमो भगवते रुद्राय चिवि चिवि च्छिन्द च्छिन्द किरि किरि भिन्द भिन्द खड्गेन च्छेदय च्छेदय शूलेन भेदय भेदय चक्रेण दारय दारय ॐ हूं फट्।'

इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित अगद (औषध) विषार्त मनुष्यको दे। यह गर्दभ आदिके विषका विनाश करता है। त्रिफला, खस, नागरमोथा, नेत्रबाला, जटामांसी, पद्मक और चन्दन—इनको बकरीके दूधके साथ पिलानेपर गर्दभ आदिके विषोंका नाश होता है। शिरीषका पञ्चाङ्ग और त्रिकटु गोजरके विषका हरण करता है। स्नुही-दुग्धके साथ सिरसकी छाल 'उन्दूरज दर्दुर' (मेढक)-के विषका शमन करती है। त्रिकटु और तगरमूल घृतके साथ प्रयुक्त होनेपर 'मत्स्यविष'का नाश करते हैं। यवक्षार, त्रिकटु, वच, हींग, बायबिडंग, सैन्धवलवण, तगर, पाठा, अतिबला और कूट—ये सभी प्रकारके 'कीट-विषों'का विनाश करते हैं। मुलहठी, त्रिकटु, गुड और दुग्धका—इनका योग 'पागल कुत्ते'के विषका हरण करता है॥ १४-१७॥

'ॐ सुभद्रायै नमः, ॐ सुप्रभायै नमः'—यह ओषधि उखाड़नेका मन्त्र है। भगवान् ब्रह्माने सुप्रभादेवीको आदेश दे रखा है कि मानवगण जो ओषधियाँ बिना विधि-विधानके ग्रहण करते हैं, तुम उन ओषधियोंका प्रभाव ग्रहण करो। इसलिये पहले सुप्रभादेवीको नमस्कार करके ओषधिके चारों ओर मुट्ठीसे जौ बिखेरकर पूर्वोक्त मन्त्रका दस बार जप करके ओषधिको नमस्कार करे और कहे—'तुम ऊर्ध्वनेत्रा हो; मैं तुम्हें उखाड़ता हूँ।' इस विधिसे ओषधिको उखाड़े और निम्नाङ्कित मन्त्रसे उसका भक्षण करे—

नमः पुरुषसिंहाय नमो गोपालकाय च।
आत्मनैवाभिजानाति रणे कृष्णः पराजयम्।
अनेन सत्यवाक्येन अगदो मेऽस्तु सिद्धयतु॥

'पुरुषसिंह भगवान् गोपालको बारंबार नमस्कार है। युद्धमें अपनी पराजयकी बात श्रीकृष्ण ही जानते हैं—इस सत्य वाक्यके प्रभावसे यह अगद मुझे सिद्धिप्रद हो।'

स्थावर विषकी ओषधि आदिमें निम्नलिखित

६१० * अग्निपुराण *

मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये—
‘ॐ नमो वैदूर्यमात्रे तत्र रक्ष रक्ष मां सर्वविषेभ्यो गौरि गान्धारि चाण्डालि मातङ्गनि स्वाहा हरिमाये।’

विषका भक्षण कर लेनेपर पहले वमन कराके विषयुक्त मनुष्यका शीतल जलसे सेचन करे। तदनन्तर उसको मधु और घृत पिलाये और उसके बाद विरेचन कराये॥ १८-२४॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गोनसादि-चिकित्सा-कथन' नामक दो सौ अठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९८॥


दो सौ निन्यानबेवाँ अध्याय

बालादिग्रहहर बालतन्त्र

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! अब मैं बालादि ग्रहोंको शान्त करनेवाले 'बालतन्त्र'को कहता हूँ। शिशुको जन्मके दिन 'पापिनी' नामवाली ग्रही ग्रहण कर लेती है। उससे आक्रान्त बालकके शरीरमें उद्वेग बना रहता है। वह माँका दूध पीना छोड़ देता है, लार टपकाता है और बारंबार ग्रीवाको घुमाता है। यह सारी चेष्टा पापिनी ग्रहीके कारणसे ही होती है। इसके निवारणके लिये पापिनी ग्रही और मातृकाओंके उद्देश्यसे उनके योग्य विविध भक्ष्य पदार्थ, गन्ध, माल्य, धूप एवं दीपकी बलि प्रदान करे। पापिनीद्वारा गृहीत शिशुके शरीरमें धातकी, लोध, मजीठ, तालीसपत्र और चन्दनसे लेप करे और गुग्गुलसे धूप दे। जन्मके दूसरे दिन 'भीषणी' ग्रही शिशुको आक्रान्त करती है। उससे आक्रान्त शिशुकी ये चेष्टाएँ होती हैं—वह खाँसी और श्वाससे पीड़ित रहता है तथा अङ्गोंको बारंबार सिकोड़ता है। ऐसे बालकको बकरीके मूत्र, अपामार्ग और चन्दनके साथ घिसी हुई पिप्पलीका सेवन कराना—अनुलेप लगाना चाहिये। गोशृंग, गोदन्त तथा केशोंकी धूप दे एवं पूर्ववत् बलि प्रदान करे। तीसरे दिन 'घण्टाली' नामकी ग्रही बच्चेको ग्रहण करती है। उसके द्वारा गृहीत शिशुकी निम्नलिखित चेष्टाएँ होती हैं। वह बारंबार रुदन करता है, जँभाइयाँ लेता है, कोलाहल करता है एवं त्रास, गात्रोद्वेग और अरुचिसे युक्त होता है—ऐसे शिशुको केसर, रसाञ्जन, गोदन्त और हस्तिदन्तको बकरीके दूधमें पीसकर लेप लगाये। नख, राई और बिल्वपत्रसे धूप दे तथा पूर्वोक्त बलि अर्पित करे। चौथी ग्रही 'काकोली' कही गयी है। इससे गृहीत बालकके शरीरमें उद्वेग होता है। वह जोर-जोरसे रोता है। मुँहसे गाज निकालता है और चारों दिशाओंमें बारंबार देखता है। इसकी शान्तिके लिये मदिरा और कुल्माष (चना या उड़द)-की बलि दे तथा बालकके गजदन्त, साँपकी केंचुल और अश्वमूत्रका प्रलेप करे। तदनन्तर राई, नीमकी पत्ती और भेड़ियेके केशसे धूप दे। 'हंसाधिका' पाँचवीं ग्रही है। इससे गृहीत शिशु जँभाई लेता, ऊपरकी ओर जोरसे साँस खींचता और मुट्ठी बाँधता है। ऐसी ही अन्य चेष्टाएँ भी करता है। 'हंसाधिका'को पूर्वोक्त बलि दे। इससे गृहीत शिशुके शरीरमें काकड़ासिंगी, बला, लोध, मैनसिल और तालीसपत्रका अनुलेपन करे। 'फट्कारी' छठी ग्रही मानी गयी है। इससे आक्रान्त बालक भयसे चिहुँकता, मोहसे अचेत होता और बहुत रोता है, आहारका त्याग कर देता है और अपने अङ्गोंको बहुत हिलाता-डुलाता है। 'फट्कारी'के उद्देश्यसे भी पूर्वोक्त बलि प्रदान करे। इससे गृहीत शिशुका राई,

* अध्याय २९९ *
६११

गुग्गुल, कूट, गजदन्त और घृतसे धूपन और अनुलेपन करे। 'मुक्तकेशी' नामकी ग्रही जन्मके सातवें दिन बालकपर आक्रमण करती है। इससे आक्रान्त बालक दुःखातुर रहता है। उसके शरीरसे सड़नेकी-सी गन्ध आती है। वह जृम्भा, कोलाहल, अत्यधिक रुदन और काससे पीड़ित रहता है। ऐसे बालकको व्याघ्रके नखोंकी धूप देकर बच, गोमय और गोमूत्रसे अनुलिप्त करे। 'श्रीदण्डी' नामवाली ग्रही शिशुको आठवें दिन पकड़ती है। इससे ग्रस्त बालक दिशाओंको देखता, जीभको हिलाता, खाँसता और रोता है। 'श्रीदण्डी'के उद्देश्यसे पूर्वोक्त पदार्थोंकी विविध बलि दे। इससे पीड़ित शिशुको हींग, बच, सफेद सर्षप और लहसुनसे धूपित तथा अनुलिप्त करे। 'ऊर्ध्वग्रही' नवीं महाग्रही है। इससे ग्रस्त बालक उद्वेग और दीर्घ उच्छ्वाससे युक्त होता है। वह अपनी दोनों मुट्ठियोंको चबाता है। ऐसे शिशुको लाल चन्दन, कूट, बच और सरसोंसे लेप और वानरके नख एवं रोमसे धूपन करे। दसवीं 'रोदनी' नामकी ग्रही है। इससे गृहीत शिशुकी निम्नलिखित चेष्टाएँ होती हैं। वह सदा रोता है, उसका शरीर नील वर्ण और सुगन्धसे युक्त हो जाता है। ऐसे शिशुको निम्बका धूप और कूट, बच, राई तथा रालका लेपन करे। 'रोदनी' ग्रहीके उद्देश्यसे लाजा, कुल्माष, वनमूँग और भातकी बलि दे। इस प्रकार ये धूपदान आदिकी क्रियाएँ शिशुके जन्मके तेरहवें दिनतक की जाती हैं। (शेष तीन दिनोंकी सारी क्रियाएँ दसवें दिनके समान समझनी चाहिये।)॥ १–१८$\frac{१}{२}$॥

एक मासके शिशुको 'पूतना' नामकी ग्रही ग्रहण करती है। उसका स्वरूप शकुनि (पक्षिणी—बकी)-का है। इससे पीड़ित बालक कौएके समान काँव-काँव करता, रोता, लंबी साँसें लेता, आँखोंको बारंबार मींचता और मूत्रके समान गन्धसे युक्त होता है। ऐसे बालकको गोमूत्रसे स्नान कराना और गोदन्तसे धूपित करना चाहिये। 'पूतना'के उद्देश्यसे ग्रामकी दक्षिणदिशामें करञ्जवृक्षके नीचे एक सप्ताहतक प्रतिदिन पीतवस्त्र, रक्तमाल्य, गन्ध, तैल, दीप, त्रिविध पायसान्न, तिल और पूर्वोक्त पदार्थोंकी बलि दे। दो मासके शिशुको 'मुकुटा' नामकी ग्रही ग्रहण करती है। इससे आक्रान्त शिशुका शरीर पीला और ठण्डा पड़ जाता है। उसको सर्दी होती है, नाकसे पानी गिरता है और मुख सूख जाता है। इस ग्रहीके निमित्त पुष्प, गन्ध, वस्त्र, मालपूए, भात और दीपककी बलि प्रदान करे। इससे ग्रस्त बालकको कृष्णागुरु और सुगन्धबाला आदिसे धूपित करे। बालकको तृतीय मासमें 'गोमुखी' ग्रहण करती है। इससे आक्रान्त शिशु बहुत नींद लेता है, बारंबार मलमूत्र करता है और जोर-जोरसे रोता है। 'गोमुखी'को पहले यव, प्रियङ्गु, कुल्माष, शाक, भात और दूधकी पूर्व दिशामें बलि देनी चाहिये। तदनन्तर मध्याह्नकालमें शिशुको पञ्चभङ्ग* या पञ्चपत्रसे स्नान कराकर घीसे धूपित करे। चतुर्थ मासमें 'पिङ्गला' नामकी ग्रही बालकको पीड़ित करती है। इससे गृहीत बालकका शरीर सफेद और दुर्गन्धयुक्त होकर सूखने लगता है। ऐसे शिशुकी मृत्यु अवश्य हो जाती है। पाँचवीं 'ललना' नामकी ग्रही होती है। इससे पीड़ित शिशुका शरीर शिथिल होता है और मुख सूखने लगता है। उसकी देह पीली पड़ जाती है और अपानवायु निकलती है। 'ललना'की शान्तिके लिये दक्षिणदिशामें पूर्वोक्त पदार्थोंकी बलि दे। छठे मासमें 'पङ्कजा' नामकी ग्रही शिशुको पीड़ित करती है। इससे गृहीत शिशुकी चेष्टाएँ रुदन और विकृत स्वर आदि हैं। 'पङ्कजा'को भी पूर्वोक्त पदार्थ, भात, पुष्प, गन्ध आदिकी बलि प्रदान करे। सातवें महीनेमें 'निराहारा' नामकी ग्रही


* पलाश, गूलर, पीपल, वट और बेलके पत्ते 'पञ्चपत्र' या 'पञ्चभङ्ग कहलाते हैं।'

६१२ * अग्निपुराण *

शिशुको ग्रहण करती है। इससे पीड़ित शिशु दुर्गन्ध और दन्तरोगसे युक्त होता है। 'निराहारा'के निमित्त मिष्टान्न और पूर्वोक्त पदार्थोंकी बलि दे। आठवें मासमें 'यमुना' नामवाली ग्रही शिशुपर आक्रमण करती है। इससे पीड़ित शिशुके शरीरमें दाने (फोड़े-फुन्सियाँ) उभर आते हैं और शरीर सूख जाता है। इसकी चिकित्सा नहीं करानी चाहिये। नवम मासमें 'कुम्भकर्णी' नामवाली ग्रहीसे पीड़ित हुआ बालक ज्वर और सर्दीसे कष्ट पाता है तथा बहुत रोता है। 'कुम्भकर्णी'के शान्त्यर्थ पूर्वोक्त पदार्थ, कुल्माष (उड़द या चना) आदि पदार्थोंकी ईशानकोणमें बलि दे। दशम मासमें 'तापसी' ग्रही बालकपर आक्रमण करती है। इससे ग्रस्त बालक आहारका परित्याग कर देता है और आँखें मूँदे रहता है। 'तापसी'के उद्देश्यसे घण्टा, पताका, पिष्टान्न आदि पदार्थोंकी बलि प्रदान करे। ग्यारहवीं 'राक्षसी' नामकी ग्रही है। इससे गृहीत बालक नेत्ररोगसे पीड़ित होता है। उसकी चिकित्सा व्यर्थ होती है। बारहवें महीनेमें 'चञ्चला' ग्रही शिशुको ग्रहण करती है। इसके द्वारा आक्रान्त बालक दीर्घ निःश्वास और भय आदि चेष्टाओंसे युक्त होता है। इस ग्रहीके शान्त्यर्थ मध्याह्नके समय पूर्वदिशामें कुल्माष और तिल आदिकी बलि दे॥ १९—३२$\frac{१}{२}$॥

द्वितीय वर्षमें 'यातना' नामकी ग्रही शिशुको ग्रहण करती है। इससे शिशुको 'यातना' सहनी पड़ती है और उसमें रोदन आदि दोष प्रकट होते हैं। 'यातना' ग्रहीको तिलके गूदे और पूर्वोक्त पदार्थोंकी बलि दे। स्नान आदि कर्म पूर्ववत् विधिसे करना चाहिये। तृतीय वर्षमें बालकपर 'रोदिनी' अधिकार करती है। इससे ग्रस्त बालक काँपता और रोता है तथा उसके पेशाबमें रक्त आता है। इसके उद्देश्यसे गुड़, भात, तिलका पूआ और पीसे हुए तिलकी बनी प्रतिमा दे। बालकको तिलमिश्रित जलसे स्नान कराकर पञ्चपत्र और राजफलके छिलकेसे धूप दे॥ ३३—३५॥

चतुर्थ वर्षमें 'चटका' नामकी राक्षसी शिशुको ग्रहण करती है। उससे ग्रस्त हुए बालकको ज्वर आता है और सारे अङ्गोंमें व्यथा होती है। चटकाको पूर्वोक्त पदार्थ एवं तिल आदिकी बलि दे और बालकको स्नान कराकर उसके लिये धूपन करे। पञ्चम वर्षमें 'चञ्चला' शिशुपर अधिकार कर लेती है। इससे पीड़ित बालक ज्वर, भय और अङ्ग-शैथिल्यसे युक्त होता है। चञ्चलाको भात आदि पदार्थोंकी बलि दे और बालकको काकड़ासिंगीसे धूपित करे। साथ ही पलाश, गूलर, पीपल, बड़ और बिल्वपत्रके जलसे उसका अभिषेक किया जाय। छठे वर्षमें 'धावनी' नामकी ग्रही बालकपर आक्रमण करती है। उससे गृहीत बालकका शरीर नीरस होकर सूखने लगता है। उसके अङ्ग-अङ्गमें पीड़ा होती है। इसके उद्देश्यसे सात दिनतक पूर्वोक्त पदार्थोंकी बलि और बालकका भृङ्गराजसे स्नापन और धूपन करे॥ ३६—३८$\frac{१}{२}$॥

सप्तम वर्षमें 'यमुना' ग्रहीसे पीड़ित बालक सर्दी, मुक्ता तथा अत्यन्त हास एवं रोदनसे युक्त होता है। इस ग्रहीके निमित्त पायस और पूर्वोक्त पदार्थ आदिकी बलि दे एवं बालकका पूर्ववत् विधिसे स्नापन और धूपन करे। अष्टम वर्षमें 'जातवेदा' नामकी ग्रही बालकपर अधिकार करती है। इससे पीड़ित बालक भोजन छोड़ देता है और बहुत रोता है। जातवेदाके निमित्त कृसर (खिचड़ी), मालपूए और दही आदिकी बलि प्रदान करे। बालकको स्नान कराके धूपित भी करे। नवम वर्षमें 'काला' नामकी ग्रही बालकको पकड़ती है। इससे ग्रस्त बालक अपनी भुजाओंको कँपाता है, गर्जना करता है और भयभीत रहता है। कालाके शान्त्यर्थ कृसर, मालपूए, सत्तू, कुल्माष और पायस (खीर)-की बलि दे। दसवें वर्षमें 'कलहंसी' बालकको ग्रहण करती है। इससे उसके शरीरमें जलन होती है, अङ्ग दुर्बल

* अध्याय ३०० * ६१३


हो जाते हैं और वह ज्वरग्रस्त रहता है। इसके निमित्त पाँच दिनतक पूरी, मालपूए, दधि और अन्नकी बलि देनी चाहिये। बालक का निम्बपत्रोंसे धूपन और कूटका अनुलेपन करे। ग्यारहवें वर्षमें कुमारको 'देवदूती' नामकी ग्रही ग्रहण करती है। इससे वह कठोर वचन बोलता है। 'देवदूती'के उद्देश्यसे पूर्ववत् बलिदान और लेपादिक करे। बारहवें वर्षमें 'बलिका'से आक्रान्त बालक श्वास-रोगसे युक्त होता है। इसके निमित्त भी पूर्वोक्त विधिसे बलि एवं लेपादि करे। तेरहवें वर्षमें 'वायवी' ग्रहीका आक्रमण होता है। इससे पीड़ित कुमार मुखरोग तथा अङ्गशैथिल्यसे युक्त होता है। वायवीको अन्न, गन्ध, माल्य आदिकी बलि दे और बालकको पद्मपत्रसे स्नान करावे। राई और निम्बपत्रोंसे धूपित करे। चौदहवें वर्षमें 'यक्षिणी' बालकपर अधिकार करती है। इससे वह शूल, ज्वर, दाह आदिसे पीड़ित होता है। यक्षिणी के उद्देश्यसे पूर्वोक्त विविध भक्ष्य-पदार्थोंकी बलि विहित है। इसकी शान्तिके लिये पूर्ववत् स्नान आदि भी करने चाहिये। पंद्रहवें वर्षमें बालकको 'मुण्डिका' ग्रहीसे कष्ट प्राप्त होता है। उससे पीड़ित बालकके सदा रक्तपात होता रहता है। इसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये॥ ३९—४७॥

सोलहवीं 'वानरी' नामकी ग्रही है। इससे पीड़ित नवयुवक भूमिपर गिरता है और सदा निद्रा तथा ज्वरसे पीड़ित रहता है। वानरीको तीन दिनतक पायस आदिकी बलि दे एवं बालकको पूर्ववत् स्नान आदि कर्म कराये। सत्रहवें वर्षमें 'गन्धवती' नामकी ग्रही आक्रमण करती है। इससे ग्रस्त बालकके शरीरमें उद्वेग बना रहता है और वह जोर-जोरसे रोता है। इस ग्रहीको कुल्माष आदिकी बलि दे और पूर्ववत् स्नान, धूपन तथा लेपन आदि कर्म करे। दिनकी स्वामिनी ग्रही 'पूतना' कही जाती है और वर्ष-स्वामिनी 'सुकुमारी'॥ ४८-५०॥

ॐ नमः सर्वमातृभ्यो बालपीडासंयोगं भुञ्ज भुञ्ज चुट चुट स्फोटय स्फोटय स्फुर स्फुर गृह्ल गृह्लाक्रन्दयाऽऽक्रन्दय एवं सिद्धरूपो ज्ञापयति। हर हर निर्दोषं कुरु कुरु बालिकां बालं स्त्रियं पुरुषं वा सर्वग्रहाणामुपक्रमात्। चामुण्डे नमो देव्यै हुं ढुं ह्रीं अपसर अपसर दुष्टग्रहान् हूं तद्यथा गच्छन्तु गृह्यकाः, अन्यत्र पन्थानं रुद्रो ज्ञापयति॥ ५१-५२ ॥

—इस सर्वकामप्रद मन्त्रका बालग्रहोंके शान्त्यर्थ प्रयोग करे॥ ५३॥

ॐ नमो भगवति चामुण्डे मुञ्च मुञ्च बालं बालिकां वा बलिं गृह गृह जय जय वस वस॥ ५४॥

—इस रक्षाकारी मन्त्रका सर्वत्र बलिदानकर्ममें पाठ किया जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कार्तिकेय, पार्वती, लक्ष्मी एवं मातृकागण ज्वर तथा दाहसे पीड़ित इस कुमारको छोड़ दें और इसकी भी रक्षा करें। (इस मन्त्रसे भी बालग्रहजनित पीड़ाका निवारण होता है।) ॥५५॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'बालादिग्रहहर बालतन्त्र-कथन' नामक दो सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९९॥


तीन सौवाँ अध्याय

ग्रहबाधा एवं रोगोंको हरनेवाले मन्त्र तथा औषध आदिका कथन

**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! अब मैं ग्रहोंके उपहार और मन्त्र आदिका वर्णन करूँगा, जो ग्रहोंको शान्त करनेवाले हैं। हर्ष, इच्छा, भय और शोकादिसे, प्रकृतिके विरुद्ध तथा अपवित्र

६१४* अग्निपुराण *

भोजनसे और गुरु एवं देवताके कोपसे मनुष्यको पाँच प्रकारके उन्माद होते हैं। वे वातज, कफज, पित्तज, सन्निपातज और आगन्तुक कहे जाते हैं। भगवान् रुद्रके क्रोधसे अनेक प्रकारके देवादि ग्रह उत्पन्न हुए। वे ग्रह नदी, तालाब, पोखरे, पर्वत, उपवन, पुल, नदी-संगम, शून्य गृह, बिलद्वार और एकान्तवर्ती इकले वृक्षपर रहते और वहाँ जानेवाले पुरुषोंको पकड़ते हैं। इसके सिवा वे सोयी हुई गर्भवती स्त्रीको, जिसका ऋतुकाल निकट है उस नारीको, नंगी औरतको तथा जो ऋतुस्नान कर रही हो, ऐसी स्त्रीको भी पकड़ते हैं। मनुष्योंके अपमान, वैर, विघ्न, भाग्यमें उलट-फेर इन ग्रहोंसे ही होते हैं। जो मनुष्य देवता, गुरु, धर्मादि तथा सदाचार आदिका उल्लङ्घन करता है, पर्वत और वृक्ष आदिसे गिरता है, अपने केशोंको बार-बार नोचता है तथा लाल आँखें किये रुदन और नर्तन करता है, उसको 'रूप'-ग्रहविशेषसे पीड़ित जानना चाहिये। जो मानव उद्वेगयुक्त, दाह और शूलसे पीड़ित, भूख-प्याससे व्याकुल और शिरोरोगसे आतुर होता और 'मुझे दो, मुझे दो'—यों कहकर याचना करता है, उसे 'बलिकामी' ग्रहसे पीड़ित जाने। स्त्री, माला, स्नान और सम्भोगकी इच्छासे युक्त मनुष्यको 'रतिकामी' ग्रहसे गृहीत समझना चाहिये॥ १—८॥

व्योमव्यापी, महासुदर्शनमन्त्र, विटपनासिक, पातालनारसिंहादि मन्त्र तथा चण्डीमन्त्र—ये ग्रहोंका मर्दन—ग्रहपीड़ाका निवारण करनेवाले हैं*॥ ९॥

(अब ग्रहपीडानाशन भगवान् सूर्यकी आराधना बतलाते हैं—) सूर्यदेव अपने दाहिने हाथोंमें पाश, अङ्कुश, अक्षमाला और कपाल तथा बायें हाथोंमें खट्वाङ्ग, कमल, चक्र और शक्ति धारण करते हैं। उनके चार मुख हैं। वे आठ भुजा और बारह नेत्र धारण करते हैं। सूर्यमण्डलके भीतर कमलके आसनपर विराजमान हैं और आदित्यादि देवगणोंसे घिरे हुए हैं। इस प्रकार उनका ध्यान और पूजन करके सूर्योदयकालमें उन्हें अर्घ्य दे। अर्घ्यदानका मन्त्र इस प्रकार है—श्वास (य), विष (ओं), अग्रिमान् रण्डी (र्+ओं), हल्लेखा (ह्रीं)—ये संकेताक्षर हैं। इन सबको जोड़कर शुद्ध मन्त्र हुआ—) 'यौं रौं ऐं ह्रीं कलशार्कायभूर्भुवः स्वरों ज्वालिनीकुलमुद्धर'॥ १०—१२$\frac{१}{२}$॥

ग्रहोंका ध्यान

सूर्यदेव कमलके आसनपर विराजमान हैं। उनकी अङ्गकान्ति अरुण है। वे रक्तवस्त्र धारण करते हैं। उनका मण्डल ज्योतिर्मय है। वे उदार स्वभावके हैं और दोनों हाथोंमें कमल धारण करते हैं। उनकी प्रकृति सौम्य है तथा सारे अङ्ग दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं। सूर्य आदि सभी ग्रह सौम्य, बलदायक तथा कमलधारी हैं। उन सबका वस्त्र विद्युत्-पुञ्जके समान प्रकाशमान है। चन्द्रमा श्वेत, मङ्गल और बुध लाल, बृहस्पति पीतवर्ण, शुक्र शुक्लवर्ण, शनैश्चर काले कोयलेके समान कृष्ण तथा राहु और केतु धूमके समान


* 'सहस्रार हुं फट्'—यह 'सुदर्शन' या 'महासुदर्शनमन्त्र' है। यह व्यापक प्रभावशाली होनेके कारण 'व्योमव्यापी' कहा गया है। 'विटपनासिक' शब्द नृसिंहरूपकी उग्रताका सूचक है। बड़े-बड़े वृक्ष उनकी नासिकाके अन्तर्गत आ जाते हैं। पृथ्वी और पाताललोकमें उनका प्रताप फैला हुआ है तथा पाताललोकमें उनका प्रादुर्भाव हुआ था, इसलिये भी उनको 'पातालनारसिंह' कहते हैं।

'पातालनारसिंहमन्त्र' इस प्रकार है—

'उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥'

दुर्गासप्तशतीके सभी मन्त्र यहाँ 'चण्डीमन्त्र'के नामसे अभिहित हुए हैं। 'नारसिंहाद्या'के आदि पदसे 'वीरनृसिंह' तथा 'सुदर्शन-नृसिंहादि' मन्त्र समझने चाहिये। 'वीरनृसिंह-मन्त्र' इस प्रकार है—'ॐ नमो भगवते वीरनृसिंहाय ज्वालामालापिनद्धाङ्गायाग्निनेत्राय सर्वभूतविनाशनाय दह दह पच पच रक्ष रक्ष ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा।' इसका एक दूसरा रूप इस प्रकार भी है—'ॐ नमो भगवते वीरनृसिंहाय ज्वालामालिने दीप्तदंष्ट्रायाग्निनेत्राय सर्वरक्षोघ्नाय सर्वभूतविनाशनाय सर्वज्वरं विनाशय हन हन दह दह पच पच बन्ध बन्ध रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।' 'सुदर्शन-नृसिंहमन्त्र इस प्रकार है—'ॐ सहस्रारज्वालावर्तिने क्षौं हन हन हुं फट् स्वाहा।'

  • अध्याय ३०० * ६१५

वर्णवाले बताये गये हैं। इन सबके बायें हाथ बायीं जाँघपर स्थित हैं और दाहिने हाथमें अभयमुद्रा शोभा पाती है। ग्रहोंके अपने-अपने नामके आदि अक्षर बिन्दुयुक्त होकर बीजमन्त्र होते हैं। 'फट्' का उच्चारण करके दोनों हाथोंका संशोधन करे। फिर अङ्गुष्ठसे लेकर करतलपर्यन्त करन्यास और नेत्ररहित हृदयादि पञ्चाङ्गन्यास करके भानुके मूल बीजस्वरूप तीन अक्षरों (ह्नां, ह्रीं, सः)$^१$ द्वारा व्यापकन्यास करे। उसका क्रम इस प्रकार है—मूलाधारचक्रसे पादाग्रपर्यन्त प्रथम बीजका, कण्ठसे मूलाधारपर्यन्त द्वितीय बीजका और मूर्धासे लेकर कण्ठपर्यन्त तृतीय बीजका न्यास करे।$^२$ इस प्रकार अङ्गन्याससहित व्यापकन्यासका सम्पादन करके अर्घ्यपात्रको अस्त्र-मन्त्रसे प्रक्षालित करे और पूर्वोक्त मूलमन्त्रका उच्चारण करके उस पात्रको जलसे भर दे। फिर उसमें गन्ध, पुष्प, अक्षत और दूर्वा डालकर पुनः उसे अभिमन्त्रित करे। उस अभिमन्त्रित जलसे अपना और पूजाद्रव्यका अवश्य ही प्रोक्षण करे॥ १३-१९॥

तत्पश्चात् योगपीठकी कल्पना करके उस पीठके पायोंके रूपमें 'प्रभूत' आदिकी कल्पना करे। वे क्रमशः इस प्रकार हैं—प्रभूत, विमल, सार, आराध्य और परमसुख। आग्नेयादि चार कोणोंमें और मध्यभागमें इनके नामके अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर इनका आवाहन-पूजन करे। योगपीठके ऊपर हृदयकमलमें तथा दिशा-विदिशाओंमें दीप्ता आदि शक्तियोंकी स्थापना करे।$^३$ पीठके ऊपरी भागमें हृदयकमलको स्थापित करके उसके केसरोंमें आठ शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। 'रां दीप्तायै नमः पूर्वस्याम्। रीं सूक्ष्मायै नमः आग्नेयकेसरे। रूं जयायै नमः दक्षिणकेसरे। रें भद्रायै नमः नैर्ऋत्यकेसरे। रैं विभूत्यै नमः पश्चिमकेसरे। रौं विमलायै नमः वायव्यकेसरे। रौँ अमोघायै नमः उत्तरकेसरे। रं विद्युतायै नमः ईशानकेसरे। रः सर्वतोमुख्यै नमः मध्ये।'—इस प्रकार शक्तियोंकी अर्चना करके 'ॐ ब्रह्मविष्णुशिवात्मकाय सौराय योगपीठाय नमः।'—इस मन्त्रसे समस्त पीठकी पूजा करे। सुव्रत! तत्पश्चात् रवि आदि मूर्तियोंका आवाहन करके उन्हें पाद्यादि समर्पित करे और क्रमशः हृदादि षडङ्गन्यासपूर्वक पूजन करे। 'खं कान्तौ' इत्यादि संकेतसे 'खं खखोल्काय नमः' यह मन्त्र प्रकट होता है। (यथा 'खं' मन्त्रका स्वरूप है—कान्त—'ख' है, दण्डिनी—'ख' है, चण्ड—'उकार' है (संधि करनेपर 'खो' हुआ) मज्जादशनसंयुता मांसा 'ल' दीर्घा—दीर्घस्वर आकारसे युक्त जल 'क' अर्थात् 'का' तथा वायु—'यकार'। इन सबके अन्तमें हृद्—नमः) इसके उच्चारणपूर्वक 'आदित्यमूर्तिं परिकल्पयामि, रविमूर्तिं परिकल्पयामि, भानुमूर्तिं परिकल्पयामि, भास्करमूर्तिं परिकल्पयामि, सूर्यमूर्तिं परिकल्पयामि'


१. इनका उद्धार 'शारदातिलक' में इस प्रकार है—
आकाशमग्निदीर्घेन्दुसंयुक्तं भुवनेश्वरी। सर्गान्बितो भृगुर्भानोस्त्र्यक्षरो मनुरीरितः॥ (१४।५८)

२. जैसा कि 'शारदातिलक' में निर्देश किया गया है—
आधारादि पदाग्रान्तं कण्ठादाधारकवधि। मूर्धादि कण्ठपर्यन्तं क्रमाद् बीजत्रयं न्यसेत्॥ (१४।५९)

३. 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' में 'प्रभूत' आदि पीठपादों और शक्तियोंकी स्थापना एवं पूजाके विषयमें इस प्रकार उल्लेख मिलता है—
अग्निकोणे प्रभूतञ्च विमलं नैर्ऋते यजेत्। सारं वायव्यकोणे च समाराध्यं तथैशके॥
सुखं परमपूर्वं च यजेन्मध्ये तु मन्त्रवित्।
दलमूलेषु पूर्वादि मध्ये च विधिपूर्वकम्। दीप्तासूक्ष्मे जयाभद्रे विभूतिर्विमलान्विता॥
अमोघा विद्युता चान्या नवमी सर्वतोमुखी। पीठशक्तिः क्रमादेता ह्यग्निवर्णाः सुभूषिताः॥
प्रभूत आदिके लिये पूजा-मन्त्र इस प्रकार है—'प्रभूताय नमः आग्नेये। विमलाय नमः नैर्ऋत्ये। साराय नमः वायव्ये। आराध्याय नमः ऐशान्याम्। परमसुखाय नमः मध्ये।' शक्तियोंके पूजामन्त्र मूलमें ही दिये गये हैं।

६१६ * अग्निपुराण *


यों कहना चाहिये। इन मूर्तियोंके पूजनका मन्त्र इस प्रकार है—‘ॐ आदित्याय नमः। एं रवये नमः। ॐ भानवे नमः। इं भास्कराय नमः। अं सूर्याय नमः।’ अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, ईशानकोण और वायव्यकोण—इन चार कोणोंमें तथा मध्यमें हृदादि पाँच अङ्गोंकी उनके नाम-मन्त्रोंसे पूजा करनी चाहिये। वे कर्णिकाके भीतर ही उक्त दिशाओंमें पूजनीय हैं। अस्त्रकी पूजा अपने सामनेकी दिशामें करनी चाहिये। पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः चन्द्रमा, बुध, गुरु और शुक्र पूजनीय हैं तथा आग्नेय आदि कोणोंमें मङ्गल, शनैश्चर, राहु और केतुकी पूजा करनी चाहिये॥ २०—२५ $\frac{१}{२}$ ॥

पृश्निपर्णी, हींग, बच, चक्र (पित्तपापड़ा), शिरीष, लहसुन और आमय—इन ओषधियोंको बकरेके मूत्रमें पीसकर अञ्जन और नस्य तैयार कर ले। उस अञ्जन और नस्यके रूपमें उक्त औषधोंका उपयोग किया जाय तो वे ग्रहबाधाका निवारण करनेवाले होते हैं। पाठा, पथ्या (हर्रै), वचा, शिग्रु (सहिजन), सिन्धु (सेंधा नमक), व्योष (त्रिकटु)—इन औषधोंको पृथक्-पृथक् एक-एक पल लेकर उन्हें बकरीके एक आढक दूधमें पका ले और उस दूधसे घी निकाल ले। वह घी समस्त ग्रहबाधाओंको हर लेता है। वृश्चिकाली (बिच्छू-घास), फला, कूट, सभी तरहके नमक तथा शार्ङ्गक—इनको जलमें पका ले। उस जलका अपस्मार रोग (मिरगी)-के विनाशके लिये उपयोग करे। विदारीकंद, कुश, काश तथा ईखके क्वाथसे सिद्ध किया हुआ दूध रोगीको पिलाये। जेठीमधु और भथएके एक दोन रसमें घीको पकाकर दे। अथवा पञ्चगव्य घीका उस रोगमें प्रयोग करे। अब ज्वर-निवारक उपाय सुनो—॥ २६-३०॥

ज्वर-गायत्री

ॐ भस्मास्त्राय विद्महे। एकदंष्ट्राय धीमहि। तन्नो ज्वरः प्रचोदयात्॥ ३१॥

(इस मन्त्रके जपसे ज्वर दूर होता है।) श्वास (दमा)-का रोगी कृष्णोषण (काली मिर्च), हल्दी, रास्ना, द्राक्षा और तिलका तैल एवं गुड़्का आस्वादन करे। अथवा वह रोगी जेठीमधु (मुलहठी) और घीके साथ भार्गीका सेवन करे या पाठा, तिक्ता (कुटकी), कर्णा (पिप्पली) तथा भार्गीको मधुके साथ चाटे। धात्री (आँवला), विश्वा (सोंठ), सिता (मिश्री), कृष्णा (पिप्पली), मुस्ता (नागरमोथा), खजूर मागधी (खजूर और पीपल*) तथा पीवरा (शतावर)—ये औषध हिक्का (हिचकी) दूर करनेवाले हैं। उपर्युक्त तीनों योग मधुके साथ लेने चाहिये। कामल-रोगसे ग्रस्त मनुष्यको जीरा, माण्डूकपर्णी, हल्दी और आँवलेका रस पिलाना चाहिये। त्रिकटु, पद्मकाष्ठ, त्रिफला, वायविडङ्ग, देवदारु तथा रास्ना—इन सबको सममात्रामें लेकर चूर्ण बना ले और खाँड मिलाकर उसे खाये। इस औषधसे अवश्य ही खाँसी दूर हो जाती है॥ ३२—३५॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'ग्रहबाधाहारी मन्त्र तथा औषधका कथन' नामक तीन सौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३००॥


तीन सौ एकवाँ अध्याय

सिद्धि-गणपति आदि मन्त्र तथा सूर्यदेवकी आराधना

**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! शार्ङ्गी (गकार), दण्डी (अनुस्वारयुक्त) हो, उसके साथ पद्मेश—विष्णु (ईकार) और पावक (रकार) हो तो इन चार अक्षरोंके मेलसे पिण्डीभूत बीज (ग्रीं)


* यहाँ पिप्पलीका नाम दुबारा आया है। जो द्रव्य दो बार आया हो, उसका दो भाग लिया जाता है।