अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
६१८ * अग्निपुराण *
प्राप्ति होती है। यदि दही, मधु और घीसे मिले हुए चावलसे आहुति दी जाय तो सौभाग्यकी सिद्धि एवं वशित्वकी प्राप्ति होती है॥ ११$\frac{१}{२}$॥
घोष (ह), असृक् (र), प्राण (य), शान्ति (औ), अर्धी (उ) तथा दण्ड (अनुस्वार)—यह सब मिलकर सूर्यदेवका 'ह्र्यौं ॐ'—ऐसा 'मार्तण्डभैरव' नामक बीज होता है। इसको बिम्ब-बीजसे$^१$ सम्पुटित कर दिया जाय तो यह साधकोंको धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति करानेवाला होता है। पाँच ह्रस्व अक्षरोंको आदिमें बीज बनाकर उनके द्वारा पाँच मूर्तियोंका न्यास करे। यथा—'अं सूर्याय नमः। इं भास्कराय नमः। उं भानवे नमः। एं रवये नमः। ओं दिवाकराय नमः।'$^२$ दीर्घस्वरोंके बीजसे हृदयादि अङ्गन्यास करे। यथा—'आं हृदयाय नमः।' इत्यादि। इस प्रकार न्यास करके ध्यान करे—'भगवान् सूर्य ईशानकोणमें विराजमान हैं। उनकी अङ्गकान्ति सिन्दूरके सदृश अरुण है। उनके आधे वामाङ्गमें उनकी प्राणवल्लभा विराज रही हैं'॥ १२-१३$\frac{१}{२}$॥
('श्रीविद्यार्णव-तन्त्र'में मार्तण्डभैरव-बीजको ही दीर्घ स्वरोंसे युक्त करके उनके द्वारा हृदयादि-न्यासका विधान किया गया है। यथा—'ह्र्यां हृदयाय नमः।' 'ह्र्यीं शिरसे स्वाहा।' इत्यादि।)
फिर ईशानकोणमें कृतान्तके लिये निर्माल्य और चण्डके लिये दीप्ततेज (दीपज्योति) अर्पित करे। रोचना, कुङ्कुम, जल, रक्त चन्दन, अक्षत, अङ्कुर, वेणुबीज, जौ, अगहनी, धानका चावल, सावाँ, तिल तथा राई और जपाके फूल अर्घ्यपात्रमें डाले। फिर उस अर्घ्यपात्रको सिरपर रखकर दोनों घुटने धरतीपर टिका दे और सूर्यदेवको अर्घ्य अर्पित करे। अपने मन्त्रसे अभिमन्त्रित नौ कलशोंद्वारा ग्रहोंका पूजन करके ग्रहादिकी शान्तिके लिये शान्ति-कलशके जलसे स्नान एवं सूर्यमन्त्रका जप करनेसे मनुष्य सब कुछ पा सकता है। (एक सौ अड़तालीसवें अध्यायमें कथित) 'संग्रामविजय-मन्त्र'में बीजपोषक बिन्दुयुक्त अग्नि—रकार अर्थात् 'र' जोड़कर उस सम्पूर्ण मन्त्रका मूर्धासे लेकर चरणपर्यन्त व्यापकन्यास करके मूलमन्त्रका, अर्थात् उसके उच्चारणपूर्वक सूर्यदेवका 'आवाहनी' आदि मुद्राओंके प्रदर्शनपूर्वक पूजन करे। तदनन्तर यथोक्त अङ्गन्यास करके अपने-आपका रविके रूपमें चिन्तन करे। अर्थात् मेरी आत्मा सूर्यस्वरूप है, ऐसी भावना करे। मारण और स्तम्भनकर्ममें सूर्यदेवके पीतवर्णका, आप्यायनमें श्वेतवर्णका, शत्रुघातकी क्रियामें कृष्णवर्णका तथा मोहनकर्ममें इन्द्रधनुषके समान वर्णका चिन्तन करे। जो सूर्यदेवके अभिषेक,जप, ध्यान, पूजा और होमकर्ममें सदा तत्पर रहता है, वह तेजस्वी, अजेय तथा श्रीसम्पन्न होता है और युद्धमें विजय पाता है। ताम्बूल आदिमें उक्त मन्त्रका न्यास करके जपपूर्वक उसमें खसका इत्र डाले तथा अपने हाथमें भी 'संग्राम-विजय'के बीजोंका न्यास करके उस हाथसे किसीको वह ताम्बूल अर्पण करे, अथवा उस हाथसे किसीका स्पर्श कर ले तो वह उसके वशमें हो जाता है ॥ १४–२२ ॥
'इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गणपति तथा सूर्यकी अर्चाका कथन' नामक तीन सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०१॥
१. 'शारदातिलक' में बिम्बबीज 'हिं' बताया गया है। उसका उद्धार यों किया गया है—'यान्तं दहननेत्रेन्दुसहितं तदुदीरितम्' (१४। १७)
२. सूर्यादि पाँच मूर्तियोंका उल्लेख 'शारदातिलक' में है।
* अध्याय ३०२ * ६११
तीन सौ दोवाँ अध्याय
नाना प्रकारके मन्त्र और औषधोंका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—‘ऐं कुलजे ऐं सरस्वति स्वाहा’— यह ग्यारह अक्षरोंका मन्त्र मुख्य ‘सरस्वतीविद्या’ है। जो क्षारलवणसे रहित आहार ग्रहण करते हुए मन्त्रोंकी अक्षरसंख्याके अनुसार उतने लाख मन्त्रका जप करता है, वह बुद्धिमान् होता है। अत्रि (द्), अग्नि (र्), वामनेत्र (ई) तथा बिन्दु (ं) ‘द्रीं’—यह मन्त्र महान् विद्रावणकारी (शत्रुको मार भगानेवाला) है। वज्र और कमल धारण करनेवाले पीत वर्णवाले इन्द्रका आवाहन करके उनकी पूजा करे और घी तथा तिलकी एक लाख आहुतियाँ दे। फिर तिलमिश्रित जलसे इन्द्रदेवताका अभिषेक करे। ऐसा करनेसे राजा आदि अपने छीने गये राज्य आदि तथा राजपुत्र आदि (मनोवाञ्छित वस्तुओं)-को पा सकते हैं। हल्लेखा (ह्रीं)—यह ‘शक्तिदेवा’ नामसे प्रसिद्ध है। इसका उद्धार यों है—घोष (ह), अग्नि (र), दण्डी (ई), दण्ड (ं) ‘ह्रीं’। शिवा और शिवका पूजन करके शक्तिमन्त्र (ह्रीं)-का जप करे। अष्टमीसे लेकर चतुर्दशीतक आराधनामें संलग्न रहे। हाथोंमें चक्र, पाश, अङ्कुश एवं अभयकी मुद्रा धारण करनेवाली वरदायिनी देवीकी आराधना करके होम आदि करनेपर उपासकको सौभाग्य एवं कवित्वशक्तिकी प्राप्ति होती है तथा वह पुत्रवान् होता है॥ १–५॥
‘ॐ ह्रीं ॐ नमः कामाय सर्वजनहिताय सर्वजनमोहनाय प्रज्वलिताय सर्वजनहृदयं ममाऽऽत्मगतं कुरु कुरु ॐ ॥’—इसके जप आदि करनेसे यह मन्त्र सम्पूर्ण जगत्को अपने वशमें कर सकता है॥ ६–७॥
‘ॐ ह्रीं चामुण्डे अमुकं दह दह पच पच मम वशमानयानय स्वाहा ॐ।’ यह चामुण्डाका वशीकरणमन्त्र कहा गया है। स्त्रीको चाहिये कि वशीकरणके प्रयोगकालमें त्रिफलाके ठंडे पानीसे अपनी योनिको धोये। अश्वगन्धा, यवक्षार, हल्दी और कपूर आदिसे भी स्त्री अपनी योनिका प्रक्षालन कर सकती है। पिप्पलीके आठ तन्दुल, कालीमिर्चके बीस दाने और भटकटैयाके रसका योनिमें लेप करनेसे उस स्त्रीका पति आमरण उसके वशमें रहता है। कटीरमूल, त्रिकटु (सोंठ, मिर्च और पीपल)-का लेप भी उसी तरह लाभदायक होता है। हिम, कैथका रस, मागधीपिप्पली, मुलहठी और मधु—इनके लेपका प्रयोग दम्पतिके लिये कल्याणकारी होता है। शक्कर मिला हुआ कदम्ब-रस और मधु—इसका योनिमें लेप करनेसे भी वशीकरण होता है। सहदेई, महालक्ष्मी, पुत्रजीवी, कृताञ्जलि (लज्जावती)—इन सबका चूर्ण बनाकर सिरपर डाला जाय तो इहलोकके लिये उत्तम वशीकरणका साधन है। त्रिफला और चन्दनका क्वाथ एक प्रस्थ अलग हो और दो कुडव अलग हो, भँगरैया तथा नागकेसरका रस हो, उतनी ही हल्दी, क्षम्बुक, मधु, घीमें पकायी हुई हल्दी और सूखी हल्दी—इन सबका लेप करे तथा बिदारीकंद और जटामांसीके चूर्णमें चीनी मिलाकर उसको खूब मथ दे। फिर दूधके साथ प्रतिदिन पीये। ऐसा करनेवाला पुरुष सैकड़ों स्त्रियोंके साथ सहवासकी शक्ति प्राप्त कर लेता है॥ ८–१६॥
गुप्ता, उड़द, तिल, चावल—इन सबका चूर्ण बनाकर दूध और मिश्री मिलाये। पीपल, बाँस और कुशकी जड़, ‘वैष्णवी’ और ‘श्री’ नामक ओषधियोंकी जड़ तथा दूर्वा और अश्वगन्धाका मूल—इन सबको पुत्रकी इच्छा रखनेवाली नारी दूधके साथ पीये। कौन्ती, लक्ष्मी, शिवा और धात्री (आँवलेका बीज), लोध्र और वटके अङ्कुरको स्त्री ऋतुकालमें घी और दूधके साथ
६२० * अग्निपुराण *
पीये। इससे उसको पुत्रकी प्राप्ति होती है। पुत्रार्थिनी नारी 'श्री' नामक ओषधिकी जड़ और वटके अङ्कुरको दूधके साथ पीये। श्री, वटाङ्कुर और दूर्वा—इनके रसका नस्य ले और पीये भी। 'श्री' और 'कमल' की जड़को, अश्वत्थ और उत्तरके मूलको दूधके साथ पीये। कपासके फल और पल्लवको दूधमें पीसकर तरल बनाकर पीये। अपामार्गके नूतन पुष्पाग्रको भैंसके दूधके साथ पीये। उपर्युक्त साढ़े पाँच श्लोकोंमें पुत्रप्राप्तिके चार योग बताये गये हैं॥ १७–२१ $\frac{१}{२}$॥
यदि स्त्रीका गर्भ गलित हो जाता हो तो उसे शक्कर, कमलके फूल, कमलगट्टा, लोध, चन्दन और सारिवालता—इनको चावलके पानीमें पीसकर दे या लाजा, यष्टि (मुलहठी), सिता (मिश्री), द्राक्षा, मधु और घी—इन सबका अवलेह बनाकर वह स्त्री चाटे॥ २२–२३॥
आटरूप (अडूसा), कलाङ्गली, काकमाची, शिफा (जटामांसी)—इन सबको नाभिके नीचे पीसकर छाप दे तो स्त्री सुखपूर्वक प्रसव कर सकती है॥ २४॥
लाल और सफेद जवाकुसुम, लाल चीता और हींगपत्री पीये। केसर, भटकटैयाकी जड़, गोपी, षष्ठी (साठीका तृण) और उत्पल—इनको बकरीके दूधमें पीसकर तैल मिलाकर खाय तो सिरमें बाल उगते हैं। अगर सिरके बाल झड़ रहे हों तो यह उनको रोकनेका उपाय है॥ २५–२६॥
आँवला और भँगरेयाका एक सेर तैल, एक आढक दूध, षष्ठी और अञ्जनका एक पल तैल—ये सब सिरके बाल, नेत्र और सिरके लिये हितकारक होते हैं॥ २७॥
हल्दी, राजवृक्षकी छाल, चिञ्चा (इमलीका बीज), नमक, लोध और पीली खारी—ये गौओंके पेट फूलनेकी बीमारीको तत्काल रोक देते हैं॥ २८॥
'ॐ नमो भगवते त्र्यम्बकायोपशमयोपशमय चुलु चुलु मिलि मिलि भिदि भिदि गोमानिनि चक्रिणि हूं फट्। अस्मिन् ग्रामे गोकुलस्य रक्षां कुरु शान्तिं कुरु कुरु कुरु ठ ठ ठ'॥ २९–३०॥
यह गोसमुदायकी रक्षाका मन्त्र है।
'घण्टाकर्ण महासेन वीर बड़े बलवान् कहे गये हैं। वे जगदीश्वर महामारीका नाश करनेवाले हैं, अतः मेरी रक्षा करें।' ये दोनों श्लोक और मन्त्र गोरक्षक हैं, इनको लिखकर घरपर टाँग देना चाहिये॥ ३१॥
इति प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नाना प्रकारके मन्त्र और औषधोंका कथन' नामक तीन सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०२॥
तीन सौ तीनवाँ अध्याय
अष्टाक्षर मन्त्र तथा उसकी न्यासादि विधि
जब चन्द्रमा जन्म-नक्षत्रपर हों और सूर्य सातवीं राशिपर हो तो उसे 'पूषाका काल' समझना चाहिये। उस समय श्वासकी परीक्षा करे। जिसके कण्ठ और ओष्ठ अपने स्थानसे चलित हो रहे हों, जिसकी नाक टेढ़ी हो गयी और जीभ काली पड़ गयी हो, उसका जीवन अधिक-से-अधिक सात दिन और रह सकता है॥ १–२॥
तार (ॐ), मेष (न), विष (म), दन्ती (ओ), दीर्घस्वरयुक्त 'न' तथा 'र' (ना रा), 'य णा', रस (य)—यह भगवान् विष्णुका अष्टाक्षर-मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय) है।* इसका अङ्गन्यास इस प्रकार है—
* 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' के अनुसार इस मन्त्रका विनियोग-वाक्य इस प्रकार होना चाहिये—ॐ अस्य श्रीअष्टाक्षरमहामन्त्रस्य साध्यनारायणऋषिः, गायत्री छन्दः, परमात्मा देवता सर्वाभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः। (द्रष्टव्यः सप्तविंश श्वास, श्लोक १३-१४)
| * अध्याय ३०३ * | ६२१ |
|---|
'क्रुद्धोल्काय स्वाहा हृदयाय नमः। महोत्काय स्वाहा शिरसे स्वाहा। वीरोल्काय स्वाहा शिखायै वषट्। द्युल्काय स्वाहा कवचाय हुम्। सहस्रोल्काय स्वाहा अस्त्राय फट्।' $^१$—इन मन्त्रोंको क्रमशः पढ़ते हुए हृदय, सिर, शिखा, दोनों भुजा तथा सम्पूर्ण दिग्भागमें न्यास करे॥ ३ $\frac{१}{२}$॥
कनिष्ठासे लेकर कनिष्ठातक आठ अँगुलियोंके तीनों पर्वोंमें अष्टाक्षर मन्त्रके पृथक्-पृथक् आठ अक्षरोंको 'प्रणव' तथा 'नमः' से सम्पुटित करके बोलते हुए अङ्गुष्ठके अग्रभागसे उनका क्रमशः न्यास करे।$^२$ तर्जनीमें, मध्यमासे युक्त अङ्गुष्ठमें, करतलमें तथा पुनः अङ्गुष्ठमें प्रणवका न्यास 'उत्तार' कहलाता है। अतः पूर्वोक्त न्यासके पश्चात् 'बीजोत्तारन्यास' करे। अष्टाक्षर मन्त्रके वर्णोंका रंग यों समझे—आदिके पाँच अक्षर क्रमशः रक्त, गौर, धूम्र, हरित और सुवर्णमय कान्तिवाले हैं तथा अन्तिम तीन वर्ण श्वेत हैं। इस रूपमें इन वर्णोंकी भावना करके इनका क्रमशः न्यास करना चाहिये। न्यासके स्थान हैं—हृदय, मुख, नेत्र, मूर्धा, चरण, तालु, गुह्य तथा हस्त आदि॥ ४—७॥
हाथोंमें और अङ्गोंमें बीजन्यास करके फिर अङ्गन्यास करे।$^३$ जैसे अपने शरीरमें न्यास किया जाता है, उसी तरह देवविग्रहमें भी करना चाहिये। किंतु देवशरीरमें करन्यास नहीं किया जाता है। देवविग्रहके हृदयादि अङ्गोंमें विन्यस्त वर्णोंका गन्ध-पुष्पोंद्वारा पूजन करे। देवपीठपर धर्म आदि, अग्नि आदि तथा अधर्म आदिका भी यथास्थान न्यास करे। फिर उसपर कमलका भी न्यास करना चाहिये॥ ८-९॥
पीठपर ही कमलके दल, केसर, किञ्जल्कका व्यापक सूर्यमण्डल, चन्द्रमण्डल तथा अग्निमण्डल—इन तीन मण्डलोंका पृथक्-पृथक् क्रमशः न्यास करे। वहाँ सत्त्व आदि तीन गुणोंका तथा केसरोंमें स्थित विमला आदि शक्तियोंका भी चिन्तन करे। उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या तथा ईशाना। ये आठ शक्तियाँ आठ दिशाओंमें स्थित हैं और नवीं अनुग्रहा शक्ति मध्यमें विराजमान है। योगपीठकी अर्चना करके उसपर श्रीहरिका आवाहन और पूजन करे॥ १०—१२॥
पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, पीताम्बर तथा आभूषण—ये पाँच उपचार हैं। इन सबका मूल (अष्टाक्षर) मन्त्रसे समर्पण किया जाता है। पीठके पूर्व आदि चार दिशाओंमें वासुदेव आदि चार मूर्तियोंका तथा अग्नि आदि कोणोंमें क्रमशः श्री, सरस्वती, रति और शान्तिका पूजन करे॥ १३-१४॥
इसी प्रकार दिशाओंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्मका तथा विदिशाओं (कोणों)-में मुसल,
१. इन मन्त्रोंके अन्तमें 'स्वाहा' पद जोड़नेके विषयमें 'त्रैलोक्यमोहन-तन्त्र'का निम्नाङ्कित वचन प्रमाण है—
'क्रुद्धोल्कादिपदैर्वह्निजायान्तैर्जातिसंयुतैः।' 'तन्त्रप्रकाश'में भी ऐसा ही कहा गया है—
'एषां विभक्तियुक्तानां भवेदन्तेऽग्निवल्लभा।'
२. 'नारायणीयतन्त्र'में भी ऐसा ही कहा है—
कनिष्ठादितदन्तानामङ्गुलीनां त्रिपर्वसु। ज्येष्ठाग्रेण नमस्ताररुद्धानष्टाक्षरान् न्यसेत्॥ इति॥
३. 'शारदातिलक' पञ्चदश पटलके श्लोक पाँचकी व्याख्याके अनुसार हाथोंमें सृष्टि, स्थिति एवं संहारके क्रमसे न्यास करना चाहिये। दाहिनी तर्जनीसे लेकर वाम तर्जनीतक मन्त्रके आठ अक्षरोंका न्यास 'सृष्टिन्यास' है। दोनों तर्जनीसे आरम्भ कर दोनों कनिष्ठापर्यन्त दो आवृत्तिमें इन आठ अक्षरोंका न्यास 'स्थितिन्यास' है। दाहिनी कनिष्ठासे लेकर वाम कनिष्ठापर्यन्त न्यास 'संहारन्यास' है। 'क्रुद्धोल्काय' इत्यादिसे मूलमें जो हृदयादि न्यास कहा है, वही 'अङ्गन्यास' है। इस प्रकार कराङ्गन्यास करके पुनः अङ्गन्यासकी विधि 'शारदातिलक' की व्याख्यामें स्पष्ट की गयी है। यथा—'षडङ्गन्यास' की विधिसे छः अक्षरोंका अङ्गोंमें क्रमशः न्यास करके शेष दो अक्षरोंका उदर और पृष्ठमें न्यास करना चाहिये। प्रयोग इस प्रकार है—'ॐ हृदयाय नमः। नं शिरसे स्वाहा। मों शिखायै वषट्। नां कवचाय हुम्। रां नेत्राभ्यां वौषट्। यं अस्त्राय फट्। णां उदराय नमः। यं पृष्ठाय नमः।' इति। ईशानशिव गुरुदेवका वचन भी ऐसा ही है।
अस्य स्याद्धृदयं तारः शिरोनार्णः शिखा च मो। नावर्णः कवचं शस्त्रं रावर्णो नयनं परः॥
उदरं पृष्ठमन्त्यौ च वर्णौ हि नमसा युतौ॥
६२२ * अग्निपुराण *
खड्ग, शार्ङ्गधनुष तथा वनमालाकी क्रमशः अर्चना करे ॥ १५ ॥
मण्डलके बाहर गरुडकी पूजा करके भगवान् नारायणदेवके सम्मुख विराजमान विष्वक्सेन तथा सोमेशका मध्यभागमें और आवरणसे बाहर इन्द्र आदि परिचारकवर्गके साथ भगवान्का सम्यक् पूजन करनेसे साधकको अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है ॥ १६-१७ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अष्टाक्षर-पूजा-विधि वर्णन' नामक तीन सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०३ ॥
तीन सौ चारवाँ अध्याय
पञ्चाक्षर-दीक्षा-विधान; पूजाके मन्त्र
अग्निदेव कहते हैं—मेष (न) सर्गि विष—विसर्ग युक्त मकार (मः) षसे पहलेका अक्षर श और उसके साथ अक्षि—इकार (शि) दीर्घोदक (वा) मरुत् (य)—यह पञ्चाक्षर मन्त्र (नमः शिवाय$^१$) शिवस्वरूप तथा शिवप्रदाता है। इसके आदिमें ॐ लगा देनेपर यह षडक्षर मन्त्र हो जाता है। इसका अर्चन (भजन) करके मनुष्य देवत्व आदि उत्तम फलोंको प्राप्त कर लेता है ॥ १ $\frac{१}{२}$ ॥
ज्ञानस्वरूप परब्रह्म ही परम बुद्धिरूप है। वही सबके हृदयमें शिवरूपसे विराजमान है। वह शक्तिभूत सर्वेश्वर ही ब्रह्मा आदि मूर्तियोंके भेदसे भिन्न-सा प्रतीत होता है। मन्त्रके अक्षर पाँच हैं, भूतगण भी पाँच हैं तथा उनके मन्त्र और विषय भी पाँच हैं। प्राण आदि वायु पाँच हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच-पाँच हैं। ये सब-की-सब वस्तुएँ पञ्चाक्षर-ब्रह्मरूप हैं। इसी प्रकार यह सब कुछ अष्टाक्षर मन्त्ररूप भी है ॥ २-४ ॥
दीक्षा-स्थानका मन्त्रोच्चारणपूर्वक पञ्चगव्यसे प्रोक्षण करे। फिर वहाँ समस्त आवश्यक सामग्रीका संग्रह करके विधिपूर्वक शिवकी पूजा करे। तत्पश्चात् मूलमन्त्र, इष्ट-मूर्तिसम्बन्धी मन्त्र तथा अङ्गसम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा अक्षत छींटते हुए भूतापसारणपूर्वक रक्षात्मक क्रिया सम्पादित करे। फिर दूधमें चरु पकाकर उसके तीन भाग करे। उनमेंसे एक भाग तो इष्टदेवताको निवेदित कर दे, दूसरे भागकी आहुति दे और तीसरा शिष्यसहित स्वयं ग्रहण करे। फिर आचमन एवं सकलीकरण करके आचार्य शिष्यको हृदय-मन्त्रसे अभिमन्त्रित एक दन्तधावन दे, जो दूधवाले वृक्ष आदिका काष्ठ हो। उससे दाँतोंका शोधन करके, उसे चीरकर उसके द्वारा जीभ साफ करनेके बाद धोकर पृथ्वीपर फेंक दे ॥ ५-८ ॥
यदि पूर्वदिशासे फेंकनेपर वह दन्तकाष्ठ उत्तर या पश्चिम दिशाकी ओर जाकर गिरे तो शुभ होता है, अन्यथा अशुभ होता है। पुनः अपने सम्मुख आते हुए शिष्यको शिखाबन्धके$^२$ द्वारा रक्षित करके ज्ञानी गुरु वेदीपर उसके साथ कुशके बिस्तरपर सो जाय। शिष्य सोते समय रातमें जो स्वप्न देखे, उसे प्रातःकाल अपने गुरुको सुनावे ॥ ९-१० ॥
$^१.$ 'शारदातिलक' तथा 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' के अनुसार पञ्चाक्षर मन्त्रका विनियोग इस प्रकार है—'अस्य श्रीशिवपञ्चाक्षरमन्त्रस्य (षडक्षरमन्त्रस्य वा) वामदेव ऋषिः पङ्क्तिश्छन्दः सदाशिवो देवता चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धये जपे विनियोगः।' इसका न्यास यों होगा—'वामदेवाय ऋषये नमः शिरसि। पङ्क्तिच्छन्दसे नमः मुखे। श्रीसदाशिवदेवतायै नमः हृदि।'
$^२.$ मूलमन्त्रसे सजातीय शिखामन्त्र, यथा—'शिं शिखायै वषट्' द्वारा अथवा अघोरादि मन्त्रोंद्वारा गुरु शिष्यकी शिखा बाँध दे। यही 'शिखाबन्धाभिरक्षण' अथवा शिष्यको शिखाबन्धके द्वारा रक्षित करना है। ('शारदातिलक' की व्याख्या)
- अध्याय ३०४ * ६२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
यदि स्वप्न शुभ एवं सिद्धिसूचक हुए तो उनसे मन्त्र तथा इष्टदेवके प्रति भक्ति बढ़ती है। तत्पश्चात् पुनः मण्डलार्चन करना चाहिये। 'सर्वतोभद्र' आदि मण्डल पहले बताये गये हैं। उन्हींमेंसे किसी एकका पूजन करना चाहिये। पूजित हुआ मण्डल सम्पूर्ण सिद्धियोंका दाता है॥ ११॥
पहले स्नान और आचमन करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक देहमें मिट्टी लगाये। फिर पूर्ववत् कल्पित शिवतीर्थमें साधक अघमर्षण-मन्त्रके जपपूर्वक स्नान करे। फिर विद्वान् पुरुष हस्ताभिषेक$^१$ (हाथोंकी शुद्धि) करके पूजागृहमें प्रवेश करे। मूलमन्त्रसे योगपीठपर कमलासनका न्यास (चिन्तन) करे। मूलसे ही पूरक, कुम्भक तथा रेचक प्राणायाम करे॥ १२-१३॥
(सुषुम्णा नाड़ीके मार्गसे) जीवात्माको ऊपर ब्रह्मरन्ध्रस्थित सहस्रारचक्रमें ले जाकर परमात्मामें योजित (स्थापित) कर दे। सिरसे लेकर शिखापर्यन्त जो बारह अङ्गुल विस्तृत स्थान है, वही 'ब्रह्मरन्ध्र' है। उसीमें स्थित परमात्माके भीतर जीवको ('हंसः सोऽहम्'—इस मन्त्रद्वारा) संयोजित करनेके पश्चात् (यह चिन्तन करे कि सम्पूर्ण भूतोंके तत्त्व बीजरूपसे अपने-अपने कारणमें संहारक्रमसे विलीन हो गये हैं। इस प्रकार प्रकृतिपर्यन्त समस्त तत्त्वोंका परमात्मामें लय हो गया है। तदनन्तर) वायुबीज (यकार)-के द्वारा वायुको प्रकट करके उसके द्वारा अपने शरीरको सुखा दे। इसके बाद अग्निबीज (रकार)-से अग्नि प्रकट करके उसके द्वारा उस समस्त शुष्क शरीरको जलाकर भस्म कर दे। (उसमेंसे दग्ध हुए पापपुरुषके भस्मको विलगकर) अपने शरीरके भस्मको अमृतबीज (वकार)-से प्रकट अमृतकी धारासे आप्लावित कर दे॥ १४॥
(इसके बाद विलीन हुए प्रत्येक तत्त्वके बीजको अपने-अपने स्थानपर पहुँचाकर दिव्य शरीरका निर्माण करे।) दिव्य स्वरूपका ध्यान करके जीवात्माको पुनः ले आकर हृदयकमलमें स्थापित कर दे। ऐसा करनेसे आत्मशुद्धि सम्पादित होती है। तदनन्तर न्यास करके पूजन आरम्भ करे॥ १५॥
पञ्चाक्षर-मन्त्रके न, म आदि पाँच वर्ण क्रमशः कृष्ण, श्वेत, श्याम, रक्त और पीत कान्तिवाले हैं। नकारादि अक्षरोंसे क्रमशः अङ्गन्यास करे। उन्हीं अङ्गोंमें तत्पुरुष आदि पाँच मूर्तियोंका भी न्यास करना चाहिये$^२$॥ १६॥
तदनन्तर अङ्गुष्ठसे कनिष्ठापर्यन्त पाँच अँगुलियोंमें क्रमशः अङ्गमन्त्रोंका सर्वतोभावेन न्यास$^३$ करके पाद, गुह्य, हृदय, मुख तथा मूर्धामें मन्त्राक्षरोंका न्यास$^४$ करे। इसके बाद मूर्धा, मुख, हृदय, गुह्य और पाद—इन अङ्गोंमें व्यापक-न्यास$^५$ करके मूलमन्त्रके अक्षरोंका तथा अङ्गमन्त्रोंका भी वहीं
१. करशुद्धिका एक प्रकार यह भी है—अङ्गुष्ठ आदि सभी अँगुलियोंमें, दोनों हाथोंके अन्तर्भागमें, बाह्यभागमें तथा दोनों हाथोंके पार्श्वभागमें अस्त्रमन्त्र (फट्)-का व्यापकन्यास किया जाय।
२. इसका प्रयोग इस प्रकार है। पहले निम्नाङ्कित रूपसे मूर्तिसहित करन्यास करे—'नं तत्पुरुषाय नमः तर्जन्योः। मं अघोराय नमः मध्यमयोः। शिं सद्योजाताय नमः कनिष्ठिकयोः। वां वामदेवाय नमः अनामिकयोः। यं ईशानाय नमः अङ्गुष्ठयोः।' तत्पश्चात् अङ्गन्याससहित मूर्तिन्यास करे। यथा—'नं तत्पुरुषाय हृदयाय नमः। मं अघोराय शिरसे स्वाहा। शिं सद्योजाताय शिखायै वषट्। वां वामदेवाय कवचाय हुम्। यं ईशानाय अस्त्राय फट्।' करन्यासमें यहाँ मध्यमाके बाद कनिष्ठा, फिर अनामिका, तत्पश्चात् अङ्गुष्ठका क्रम 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र'के तीसवें श्वास तथा 'शारदातिलक'के अठारहवें पटलके अनुसार है।
३. प्रयोग इस प्रकार है—नं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। मं तर्जनीभ्यां स्वाहा। शिं मध्यमाभ्यां वषट्। वां अनामिकाभ्यां हुम्। यं कनिष्ठिकाभ्यां फट्।
४. नं पादयोः न्यस्यामि। मं गुह्ये न्यस्यामि। शिं हृदये न्यस्यामि। वां मुखे न्यस्यामि। यं मूर्धनि न्यस्यामि।
५. व्यापकन्यास 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' (श्वास ३०) तथा 'शारदातिलक' (पटल १८)-में इस प्रकार कहा गया है—
$$\begin{array}{lcl}
\text{नमोऽस्तु स्थाणुभूताय} & \text{ज्योतिर्लिङ्गामृतात्मने।} & \text{चतुर्मूर्तिवपुश्छायाभासिताङ्गाय} & \text{शम्भवे॥} \
\text{इति} & \text{मन्त्रेण} & \text{मूर्धादिपादपर्यन्तं} & \text{व्यापकं} & \text{न्यसेत्।}
\end{array}$$
६२४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
न्यास करे$^१$। फिर अग्नि आदि कोणोंमें प्रकट पीठके धर्म आदि पादोंका, जो क्रमशः रक्त, पीत, श्याम और श्वेत वर्णके हैं, चिन्तन करके उनमें साध्यमन्त्रके अक्षरोंका न्यास करे तथा पूर्वाद दिशाओंमें स्थित अधर्म आदिका चिन्तन करके उनमें अङ्गमन्त्रोंका न्यास$^२$ करे। इस प्रकार योगपीठका चिन्तन करके उसके ऊपर अष्टदल कमलका और सूर्यमण्डल, सोममण्डल तथा अग्निमण्डल—इन तीन मण्डलोंका एवं सत्त्वादि गुणोंका चिन्तन करे॥ १७—१९॥
इसके बाद अष्टदल कमलके पूर्वाद दलोंपर वामा आदि आठ शक्तियोंका तथा कर्णिकाके ऊपर नवीं (मनोन्मनी) शक्तिका न्यास या चिन्तन करे। इन शक्तियोंके नाम इस प्रकार हैं—वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलविकारिणी, बलविकारिणी, बलप्रमथनी, सर्वभूतदमनी तथा नवीं मनोन्मनी। ये शक्तियाँ ज्वालास्वरूपा हैं और इनकी कान्ति क्रमशः श्वेत, रक्त, सित, पीत, श्याम, अग्नि-सदृश, असित, कृष्ण तथा अरुण वर्णकी है। इस प्रकार इनका चिन्तन करे॥ २०—२२॥
तदनन्तर 'अनन्तयोगपीठाय नमः' से योगपीठकी पूजा करके हृदयकमलमें शिवका आवाहन करे। यथा—
स्फटिकाभं चतुर्बाहुं फालशूलधरं शिवम्।
साभयं वरदं पञ्चवदनं च त्रिलोचनम्॥
'जिनकी कान्ति स्फटिकमणिके समान श्वेत है, जो चार भुजाओंसे सुशोभित हैं और उन हाथोंमें फाल, शूल तथा अभय एवं वरद मुद्राएँ धारण करते हैं, जिनके पाँच मुख और प्रत्येक मुखके साथ तीन-तीन नेत्र हैं, उन भगवान् शिवका मैं ध्यान एवं आवाहन करता हूँ।'
इसके बाद कमलदलोंमें तत्पुरुषादि पञ्चमूर्तियोंकी स्थापना करे। यथा—नं तत्पुरुषाय नमः (पूर्वे)। मं अघोराय नमः (दक्षिणे)। शिं सद्योजाताय नमः (पश्चिमे)। वां वामदेवाय नमः (उत्तरे)। यं ईशानाय नमः (ईशाने)।
तत्पुरुष चतुर्भुज हैं। उनका वर्ण श्वेत है। उनका स्थान कमलके पूर्ववर्ती दलमें है। अघोरके आठ भुजाएँ हैं और उनकी अङ्गकान्ति असित (श्याम) है। इनका स्थान दक्षिणदलमें है। सद्योजातके चार मुख और चार ही भुजाएँ हैं। उनका पीत वर्ण है और स्थान पश्चिमदलमें है। वामदेवविग्रह स्त्री (देवी पार्वती)—के साथ विलसित होता है। उनके भी मुख तथा भुजाएँ चार-चार ही हैं। कान्ति अरुण है। इनका स्थान उत्तरवर्ती कमलदलमें है। ईशानके पाँच मुख हैं। वे ईशान-दलमें स्थित हैं। उनका वर्ण गौर है तथा वे सब कुछ देनेवाले हैं॥ २३—२६॥
तत्पश्चात् इष्टदेवके अङ्गोंका यथोचित पूजन करे$^३$। फिर अनन्त, सूक्ष्म, सिद्धेश्वर (अथवा शिवोत्तम) और एकनेत्रका पूर्वाद दिशाओंमें (नाममन्त्रसे) पूजन करे। एकरुद्र, त्रिनेत्र, श्रीकण्ठ तथा शिखण्डीका ईशान आदि कोणोंमें पूजन करे। ये सब-के-सब विद्येश्वर हैं और कमल इनका आसन है। इनकी अङ्गकान्ति क्रमशः श्वेत, पीत, सित, रक्त, धूम्र, रक्त, अरुण और नील है। ये सभी चतुर्भुज हैं और चार हाथोंमें शूल, वज्र, बाण और धनुष लिये रहते हैं। इनके मुख भी चार-चार ही हैं। इसके बाद तृतीय अष्टदल-कमलमें उत्तरादि दलोंमें प्रदक्षिण-क्रमसे उमा, चण्डेश, नन्दीश्वर, महाकाल, गणेश्वर, वृषभ, भृङ्गिरिटि तथा स्कन्दका पूजन करे॥ २७—३०॥
तत्पश्चात् पूर्वाद दिशाओंमें चतुरस्र रेखापर इन्द्रादि दिक्पालों तथा उनके अस्त्र—वज्र, शक्ति,
१. नं मूर्ध्ने नमः। मं वक्त्राय स्वाहा। शिं हृदयाय वषट्। वां गुह्याय हुम्। यं पादाभ्यां फट्।
२. नं धर्माय नमः (अग्निकोणपादे)। मं ज्ञानाय नमः (नैर्ऋत्यपादे)। शिं वैराग्याय नमः (वायव्यपादे)। वां यं ऐश्वर्याय नमः (ऐशानपादे)। अधर्माय नमः (पूर्वे)। अज्ञानाय स्वाहा (दक्षिणे)। अवैराग्याय वषट् (पश्चिमे)। अनैश्वर्याय हुं फट् (उत्तरे)।
३. उनके षडङ्ग-पूजनका क्रम यों है—द्वितीय अष्टदलकमलके केसरोंमें—ॐ हृदयाय नमः (देवस्य रक्षाग्रकेसरे)। नं शिरसे स्वाहा (वामाग्रकेसरे ईशाने)। मं शिखायै वषट् (पृष्ठदक्षिणे)। शिं कवचाय हुम् (पृष्ठवामे)। वां नेत्रत्रयाय वौषट् (अग्रे)। यं अस्त्राय फट् (अग्रादिचतुर्दिक्षु)। (श्रीविद्यार्णवतन्त्र)
| * अध्याय ३०५ * | ६२५ |
|---|
दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा, शूल, चक्र और पद्मका पूजन करे*। इस प्रकार छः आवरणोंसहित इष्टदेवताकी पूजा करके गुरु अधिवासित शिष्यको पञ्चगव्यपान कराये। फिर आचमन कर लेनेपर उसका प्रोक्षण करे। इसके बाद नेत्रान्त अर्थात् नूतन शुक्ल वस्त्रकी पट्टीसे नेत्र-मन्त्र (वौषट्)-का उच्चारण करते हुए गुरु शिष्यके नेत्रोंको बाँध दे। फिर उस शिष्यको मण्डपके दक्षिणद्वारमें प्रवेश कराये। वहाँ आसन आदि या कुशपर बैठे हुए शिष्यका गुरु शोधन करे। पूर्वोक्त रीतिसे शरीर आदि पाञ्चभौतिक तत्त्वोंका क्रमशः संहार करके शिष्यका परमात्मामें लय किया जाय; फिर सृष्टिमार्गसे देशिक शिष्यका पुनरुत्पादन करे। इसके बाद उस शिष्यके दिव्य शरीरमें न्यास करके उसे प्रदक्षिणक्रमसे पश्चिमद्वारपर लाकर उसके द्वारा पुष्पाञ्जलिका क्षेपण कराये। जिस देवताके ऊपर वे फूल गिरें, उसके नामको आदिमें रखते हुए शिष्यके नामका निर्देश करे। तत्पश्चात् (नेत्रका बन्धन खोलकर) यज्ञभूमिके पार्श्वभागमें सुन्दर नाभि और मेखलासे युक्त खुदे हुए कुण्डमें शिवाग्निको प्रकट कराकर, स्वयं उसका पूजन करके, फिर शिष्यसे भी उसकी अर्चना कराये। फिर ध्यानद्वारा आत्मसदृश शिष्यको संहारक्रमसे अपनेमें लीन करके पुनः उसका सृष्टिक्रमसे उत्पादन करे। तदनन्तर उसके हाथमें अभिमन्त्रित कुश दे और हृदयादि मन्त्रोंद्वारा पृथिवी आदि तत्त्वोंके लिये आहुति प्रदान करे॥ ३१—३८॥
पृथ्वी, जल, तेज और वायु—इनमेंसे प्रत्येकके लिये इनके नाम-मन्त्रसे सौ-सौ आहुतियाँ देकर आकाशतत्त्वके लिये मूलमन्त्र (ॐ नमः शिवाय)—से सौ आहुतियाँ दे। इस प्रकार हवन करके उसकी पूर्णाहुति करे। फिर अस्त्र-मन्त्र (फट्)-का उच्चारण करके आठ आहुतियाँ दे। तत्पश्चात् विशेष शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त (होम या गोदान) करे। अभिमन्त्रित कलशका पूजन कर पीठस्थित शिष्यका अभिषेक करे। फिर गुरु शिष्यको समयाचार सिखावे। शिष्य स्वर्ण-मुद्रा आदिके द्वारा अपने गुरुका पूजन करे। इस प्रकार यहाँ 'शिवपञ्चाक्षर' मन्त्रकी दीक्षा बतायी गयी। इसी तरह विष्णु आदि देवताओंके मन्त्रोंकी भी दीक्षा दी जाती है॥ ३९—४१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पञ्चाक्षरमन्त्रकी दीक्षाके विधानका वर्णन' नामक तीन सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०४॥
तीन सौ पाँचवाँ अध्याय
पचपन विष्णुनाम
अग्निदेव कहते हैं— मुने! जो मनुष्य भगवान् विष्णुके निम्नाङ्कित पचपन नामोंका जप करता है, वह मन्त्रजप आदिके फलका भागी होता है तथा तीर्थोंमें पूजनादिके अक्षय पुण्यको प्राप्त करता है। पुष्करमें पुण्डरीकाक्ष, गयामें गदाधर, चित्रकूटमें राघव, प्रभासमें दैत्यसूदन, जयन्तीमें जय, हस्तिनापुरमें जयन्त, वर्धमानमें वाराह, काश्मीरमें चक्रपाणि, कुब्जाभ (या कुब्जास्र)-में
* 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र'में पूजनके मन्त्र इस प्रकार दिये गये हैं—'देवाग्रभागमारभ्य लं इन्द्राय सुराधिपतये पीतवर्णाय वज्रहस्ताय ऐरावतवाहनाय नमः। इं अग्नये तेजोऽधिपतये रक्तवर्णाय शक्तिहस्ताय मेषवाहनाय नमः। हं यमाय प्रेताधिपतये कृष्णवर्णाय दण्डहस्ताय महिषवाहनाय नमः। क्षं नेत्रत्रये रक्षोऽधिपतये धूम्रवर्णाय खड्गहस्ताय प्रेतवाहनाय नमः। वं वरुणाय यादसाम्पतये शुक्लवर्णाय पाशहस्ताय मकरवाहनाय नमः। यं वायवे प्राणाधिपतये धूम्रवर्णाय अङ्कुशहस्ताय मृगवाहनाय नमः। ह्रीं ईशानाय विद्याधिपतये स्फटिकवर्णाय शूलहस्ताय वृषभवाहनाय नमः। इति सम्पूज्य इन्द्रेशानयोर्मध्ये—आं ब्रह्मणे लोकाधिपतये रक्तवर्णाय पद्महस्ताय हंसवाहनाय नमः। निर्ऋतिवरुणयोर्मध्ये—ह्रीं अनन्ताय नागाधिपतये गौरवर्णाय चक्रहस्ताय गरुडवाहनाय नमः। इति सम्पूज्य द्वितीयवीथ्याम्—वज्राय नमः। शक्तये०। दण्डाय०। खड्गाय०। पाशाय०। अङ्कुशाय०। गदायै०। त्रिशूलाय०। पद्माय०। चक्राय०। इस प्रकार इन-इन आयुधोंका उन-उन दिक्पालोंके निकटवर्ती स्थानमें पूजन करना चाहिये।'
६२६ * अग्निपुराण *
जनार्दन, मथुरामें केशवदेव, कुब्जाम्रकमें हृषीकेश, गङ्गाद्वारमें जटाधर, शालग्राममें महायोग, गोवर्धनगिरिपर हरि, पिण्डारकमें चतुर्बाहु, शङ्खोद्धारमें शङ्खी, कुरुक्षेत्रमें वामन, यमुनामें त्रिविक्रम, शोणतीर्थमें विश्वेश्वर, पूर्वसागरमें कपिल, महासागरमें विष्णु, गङ्गासागर-सङ्गममें वनमाल, किष्किन्धामें रैवतकदेव, काशीतटमें महायोग, विरजामें रिपुंजय, विशाखयूपमें अजित, नेपालमें लोकभावन, द्वारकामें कृष्ण, मन्दराचलमें मधुसूदन, लोकाकुलमें रिपुहर, शालग्राममें हरिका स्मरण करे॥ १-९॥
पुरुषवटमें पुरुष, विमलतीर्थमें जगत्प्रभु, सैन्धवारण्यमें अनन्त, दण्डकारण्यमें शार्ङ्गधारी, उत्पलावर्तकमें शौरि, नर्मदामें श्रीपति, रैवतकगिरिपर दामोदर, नन्दामें जलशायी, सिन्धुसागरमें गोपीश्वर, माहेन्द्रतीर्थमें अच्युत, सह्याद्रिपर देवदेवेश्वर, मागधवनमें वैकुण्ठ, विन्ध्यगिरिपर सर्वपापहारी, औण्ड्रमें पुरुषोत्तम और हृदयमें आत्मा विराजमान हैं। ये अपने नामका जप करनेवाले साधकोंको भोग तथा मोक्ष देनेवाले हैं, ऐसा जानो॥ १०-१३॥
प्रत्येक वटवृक्षपर कुबेरका, प्रत्येक चौराहेपर शिवका, प्रत्येक पर्वतपर रामका तथा सर्वत्र मधुसूदनका स्मरण करे। धरती और आकाशमें नरका, वसिष्ठतीर्थमें गरुडध्वजका तथा सर्वत्र भगवान् वासुदेवका स्मरण करनेवाला पुरुष भोग एवं मोक्षका भागी होता है। भगवान् विष्णुके इन नामोंका जप करके मनुष्य सब कुछ पा सकता है। उपर्युक्त क्षेत्रमें जो जप, श्राद्ध, दान और तर्पण किया जाता है, वह सब कोटिगुना हो जाता है। जिसकी वहाँ मृत्यु होती है, वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। जो इस प्रसंगको पढ़ेगा अथवा सुनेगा, वह शुद्ध होकर स्वर्ग (वैकुण्ठधाम)-को प्राप्त होगा*॥ १४-१७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विष्णुके पचपन नामविषयक' तीन सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०५॥
* अग्निरुवाच —
जपन् वै पञ्चपञ्चाशद् विष्णुनामानि यो नरः। मन्त्रजप्यादिफलभाक् तीर्थेष्वर्चादि चाक्षयम्॥
पुष्करे पुण्डरीकाक्षं गयायां च गदाधरम्। राघवं चित्रकूटे तु प्रभासे दैत्यसूदनम्॥
जयं जयन्त्यां तद्वच्च जयन्तं हस्तिनापुरे। वाराहं वर्धमाने च काश्मीरे चक्रपाणिनम्॥
जनार्दनं च कुब्जास्रे मथुरायां च केशवम्। कुब्जाम्रके हृषीकेशं गङ्गाद्वारे जटाधरम्॥
शालग्रामे महायोगं हरिं गोवर्धनाचले। पिण्डारके चतुर्बाहुं शङ्खोद्वारे च शङ्खिनम्॥
वामनं च कुरुक्षेत्रे यमुनायां त्रिविक्रमम्। विश्वेश्वरं तथा शोणे कपिलं पूर्वसागरे॥
विष्णुं महोदधौ विद्याद् गङ्गासागरसंगमे। वनमालं च किष्किन्ध्यां देवं रैवतकं विदुः॥
काशीतटे महायोगं विरजायां रिपुंजयम्। विशाखयूपे ह्यजितं नेपाले लोकभावनम्॥
द्वारकायां विद्धि कृष्णं मन्दरे मधुसूदनम्। लोकाकुले रिपुहरं शालग्रामे हरिं स्मरेत्॥
पुरुषं पुरुषवटे विमले च जगत्प्रभुम्। अनन्तं सैन्धवारण्ये दण्डके शार्ङ्गधारिणम्॥
उत्पलावर्तके शौरिं नर्मदायां श्रियः पतिम्। दामोदरं रैवतके नन्दायां जलशायिनम्॥
गोपीश्वरं च सिन्ध्वब्धौ माहेन्द्रे चाच्युतं विदुः। सह्याद्रौ देवदेवेशं वैकुण्ठं मागधे वने॥
सर्वपापहरं विन्ध्ये औण्ड्रे तु पुरुषोत्तमम्। आत्मानं हृदये विद्धि जपतां भुक्तिमुक्तिदम्॥
वटे वटे वैश्रवणं चत्वरे चत्वरे शिवम्। पर्वते पर्वते रामं सर्वत्र मधुसूदनम्॥
नरं भूमौ तथा व्योम्नि वसिष्ठे गरुडध्वजम्। वासुदेवं च सर्वत्र संस्मरन् भुक्तिमुक्तिभाक्॥
नामान्येतानि विष्णोश्च जप्त्वा सर्वमवाप्नुयात्। क्षेत्रेष्वेतेषु यच्छ्राद्धं दानं जप्यं च तर्पणम्॥
तत्सर्वं कोटिगुणितं मृतो ब्रह्ममयो भवेत्। यः पठेच्छृणुयाद्वापि निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात्॥
(अग्निपु० ३०५। १-१७)
- अध्याय ३०६ * ६२७
तीन सौ छठा अध्याय श्रीनरसिंह आदिके मन्त्र
अग्निदेव कहते हैं—मुने! स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन, उत्सादन, भ्रामण, मारण तथा व्याधि—ये ‘क्षुद्र’संज्ञक आभिचारिक कर्म हैं। इनसे छुटकारा कैसे प्राप्त हो? यह बात बताऊँगा; सुनो—॥ १ ॥
‘ॐ नमो भगवते उन्मत्तरुद्राय भ्रम भ्रम भ्रामय भ्रामय अमुकं वित्रासय वित्रासय उद्भ्रामय उद्भ्रामय रुद्र रौद्रेण रूपेण हूं फट् स्वाहा’१॥ २ ॥
श्मशान-भूमिमें रातको इस मन्त्रका तीन लाख जप करे। फिर चिताकी आगमें धतूरेकी समिधाओंद्वारा हवन करे। इस प्रयोगसे शत्रु सदा भ्रान्त होता—चक्करमें पड़ा रहता है। सुनहरे गेरूसे शत्रु की प्रतिमा बनाकर उक्त मन्त्रका जप करे। फिर मन्त्रजपसे अभिमन्त्रित की हुई सोनेकी सूइयोंसे उस प्रतिमाके कण्ठ अथवा हृदयको बींधे। इस प्रयोगसे शत्रु की मृत्यु हो जाती है। गधेका बाल (अथवा खराश्वा—मयूरशिखा नामक ओषधिके पत्ते), चिताका भस्म, ब्रह्मदण्डी (ब्रह्मदारु या तूतकी लकड़ी) तथा मर्कटी (करंजभेद)—इन सबको जलाकर भस्म (चूर्ण) बना ले। उस भस्म या चूर्णको उक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उत्सादनका प्रयोग करनेवाला पुरुष शत्रुके घरपर अथवा उसके मस्तकपर फेंक दे२॥ ३-५॥
भृगु (स) आकाश (ह), दीप्त (दीर्घ आकारयुक्त) रेफसहित भृगु (स) अर्थात् (सहस्रा), फिर र, वर्म (हुम्) और फट् इस प्रकार सब मिलकर मन्त्र बना—‘सहस्रार हुं फट्।’ इसका अङ्गन्यास इस प्रकार है—‘आचक्राय स्वाहा, हृदयाय नमः। विचक्राय स्वाहा, शिरसे स्वाहा। सुचक्राय स्वाहा, शिखायै वषट्। धीचक्राय स्वाहा, कवचाय हुम्। संचक्राय स्वाहा, नेत्रत्रयाय वौषट्। ज्वालाचक्राय स्वाहा, अस्त्राय फट्।’ ये न्यास पूर्ववत् कहे गये हैं।३ अङ्गन्यासपूर्वक जपा हुआ सुदर्शनचक्र मन्त्र पूर्वोक्त ‘क्षुद्र’संज्ञक अभिचारों तथा ग्रहबाधाओंको हर लेनेवाला और समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है॥ ६–८॥
उक्त सुदर्शन-मन्त्रके छः अक्षरोंका क्रमशः मूर्धा, नेत्र, मुख, हृदय, गुह्य तथा चरण—इन छः अङ्गोंमें न्यास करे। इसके बाद चक्रस्वरूप भगवान् विष्णुका ध्यान करे—‘भगवान् चक्राकार कमलके आसनपर विराजमान हैं। उनकी आभा
१. ‘तन्त्रसार-संग्रह’ १७ वें पटल, श्लोक ३०में भी इस मन्त्रका यही रूप है। इस मन्त्रका अङ्गन्यास इस प्रकार करना चाहिये— ‘ॐ नमो भगवते हृदयाय नमः। उन्मत्तरुद्राय शिरसे स्वाहा। भ्रम भ्रम भ्रामय भ्रामय शिखायै वषट्। अमुकं वित्रासय वित्रासय कवचाय हुम्। उद्भ्रामयोद्भ्रामय नेत्रत्रयाय वौषट्। रुद्र रौद्रेण रूपेण हुं फट् स्वाहा अस्त्राय फट्।’
२. ‘तन्त्रसार-संग्रह’ में इस श्लोकका पाठ इस प्रकार मिलता है— सप्तग्रामोत्थवल्मीकमृत्स्त्राविषतरुत्वचौ । कर्ण्यग्रिमन्थवन्दाकौ पक्षौ मूकद्विषद्विषोः ॥ खरवालं चिताभस्म ब्रह्मदण्डी च मर्कटी। गृहे वा मूर्ध्नि तच्चूर्णं क्षिप्तमुत्सादनं रिपोः ॥ (१७ पटल, श्लोक ७०-७२) ‘सात गाँवोंके बिमॉटकी मिट्टी, विषवृक्षकी छाल, कर्णी (कमलगट्टा), अग्रीमन्थवन्दाक (वस्तुविशेष), काकपंslug, उल्लूकी पाँख, खरबाल, चिताभस्म, ब्रह्मदण्डी (शहतूतकी लकड़ी) और मर्कटी (करंज)—इन दस वस्तुओंका भस्म-चूर्ण यदि शत्रुके घरपर या उसके मस्तकपर डाल दिया जाय तो उसका उत्सादन (उजड़कर अन्यत्र जाना अथवा वहीं नष्ट हो जाना ) होता है।’
३. ‘शारदातिलक’में यहाँ आत्मरक्षाके लिये दिग्बन्ध करने और अग्निमय प्राकार (चहारदीवारी) निर्माण करनेकी आवश्यकता बताते हुए दिग्बन्ध-मन्त्र एवं अग्नि-प्राकार-मन्त्र—दिये गये हैं, जो इस प्रकार हैं—‘ॐ ऐन्द्रीं (आग्नेयीम् इत्यादि) चक्रेण बध्नामि नमश्चक्राय स्वाहा’—यह ‘दिग्बन्ध’ है तथा ‘ॐ त्रैलोक्यं रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।’—यह अग्निमय-प्राकारमन्त्र है। द्रष्टव्य—पटल १५, श्लोक ७५।
६२८ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
अग्निसे भी अधिक तेजस्विनी है। उनके मुखमें दाढ़ें हैं। वे चार भुजाधारी होते हुए भी अष्टबाहु हैं। वे अपने हाथोंमें क्रमशः शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, मुसल, अङ्कुश, पाश और धनुष धारण करते हैं। उनके केश पिङ्गलवर्णके और नेत्र लाल हैं। उन्होंने अरोंसे त्रिलोकीको व्याप्त कर रखा है। चक्रकी नाभि (नाहा) उस अग्निसे आविद्ध (व्याप्त) है। उसके चिन्तनमात्रसे समस्त रोग तथा अरिष्टग्रह नष्ट हो जाते हैं। सम्पूर्ण चक्र पीतवर्णका है। उसके सुन्दर अरे रक्तवर्णके हैं। उन अरोंका अवान्तरभाग श्यामवर्णका है। चक्रकी नेमि श्वेतवर्णकी है। उसमें बाहरकी ओरसे कृष्णवर्णकी पार्थिवी रेखा है। अरोंसे युक्त जो मध्यभाग है, उसमें समस्त अकारादि वर्ण हैं।' इस प्रकार दो चक्र-चिह्न अङ्कित करे ॥ ९-१२ ॥
आदि (उत्तरवर्ती) चक्रपर कलशका जल ले अपने आगे समीपमें ही स्थापित करे। दूसरे दक्षिण चक्रपर सुदर्शनकी पूजा करके वहाँ अग्निमें क्रमशः घी, अपामार्गकी समिधा, अक्षत, तिल, सरसों, खीर और गोघृत—सबकी आहुतियाँ दे। प्रत्येक वस्तुकी एक हजार आठ आहुतियाँ पृथक्-पृथक् देनी चाहिये ॥ १३-१४ ॥
विधि-विधानका ज्ञाता विद्वान् प्रत्येक द्रव्य हुतशेष भाग कलशमें डाले। तदनन्तर एक प्रस्थ (सेर) अन्नद्वारा निर्मित पिण्ड उस कलशके भीतर रखे। फिर विष्णु आदि देवोंके लिये सब देय वस्तु वहीं दक्षिण भागमें स्थापित करे ॥ १५ ॥
इसके बाद 'सर्वशान्तिकर विष्णुजनों (भगवान् विष्णुके पार्षदों)-को नमस्कार है। वे शान्तिके लिये यह उपहार ग्रहण करें। उनको नमस्कार है।'—इस मन्त्रको पढ़कर हुतशेष जलसे बलि समर्पित करे। किसी काष्ठ-फलकपर या कलशमें अथवा दूधवाले वृक्षकी लकड़ीसे बनवाये हुए दधिपूर्ण काष्ठपात्रमें बलिकी वस्तु रखकर प्रत्येक दिशामें अर्पित करे। यह करके ही द्विजोंके द्वारा होम कराना चाहिये। दक्षिणासहित दो बार किया हुआ यह होम भूत-प्रेत आदिका नाशक होता है ॥ १६-१८ ॥
दही लगे हुए पत्तेपर लिखित मन्त्राक्षरोंद्वारा किया गया होम क्षुद्र रोगोंका नाशक होता है। दूर्वासे होम किया जाय तो वह आयुकी, कमलोंकी आहुति दी जाय तो वह श्री (ऐश्वर्य)-की और गूलर-काष्ठसे हवन किया जाय तो वह पुत्रकी प्राप्ति करानेवाला होता है। गोशालामें घीके द्वारा आहुति देनेसे गौओंकी प्राप्ति एवं वृद्धि होती है। इसी प्रकार सम्पूर्ण वृक्षोंकी समिधासे किया गया होम बुद्धिकी वृद्धि करनेवाला होता है ॥ १९-२० ॥
'ॐ क्षौं नमो भगवते नारसिंहाय ज्वालामालिने दीप्त दंष्ट्रायाग्निनेत्राय सर्वरक्षोघ्नाय सर्वभूतविनाशाय सर्वज्वरविनाशाय दह दह पच पच रक्ष रक्ष हुं फट्* ॥ २१ ॥'
—यह भगवान् नरसिंहका मन्त्र समस्त पापोंका निवारण करनेवाला है। इसका जप आदि किया जाय तो यह क्षुद्र महामारी, विष एवं रोगोंका हरण कर सकता है। चूर्णीभूत मण्डूक-वयस् (औषध-विशेष)-से हवन किया जाय तो वह जलस्तम्भन और अग्नि-स्तम्भन करनेवाला होता है ॥ २१-२२ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नरसिंह आदिके मन्त्रोंका कथन' नामक तीन सौ छठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०६ ॥
* 'ॐ क्षौं' ज्वालामालाओंसे समलंकृत दीप्तिमती दंष्ट्राओंसे देदीप्यमान, अग्निमय नेत्रवाले, सर्वराक्षससंहारक, सर्वभूतविनाशक, सर्वज्वरापहारक भगवान् नरसिंहको नमस्कार है। जलाओ, जलाओ, पकाओ, पकाओ, मुझे बचाओ, बचाओ हुं फट्।'
—यह इस मन्त्रका अर्थ है।
- अध्याय ३०७ * ६२९
तीन सौ सातवाँ अध्याय
त्रैलोक्यमोहन आदि मन्त्र
अग्निदेव कहते हैं—मुने! अब मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धिके लिये 'त्रैलोक्यमोहन' नामक मन्त्रका वर्णन करूँगा॥ १॥
ॐ श्रीं ह्रीं हूं ओम्, ॐ नमः पुरुषोत्तम पुरुषोत्तमप्रतिरूप लक्ष्मीनिकास सकलजगत्क्षोभण सर्वस्त्रीहृदयदारण त्रिभुवनमदोन्मादकर सुर-मनुजसुन्दरीजनमनांसि तापय तापय दीपय दीपय शोषय शोषय मारय मारय स्तम्भय स्तम्भय द्रावय द्रावयाकर्षयाकर्षय परमसुभग सर्वसौभाग्यकर कामप्रदामुकं (शत्रुम्) हन हन चक्रेण गदया खड्ङ्गेन सर्वबाणैर्भिन्द भिन्द पाशेन कट्ट कट्ट अङ्कुशेन ताडय ताडय त्वर त्वर किं तिष्ठसि यावत्तावत् समीहितं मे सिद्धं भवति हुं फट्, नमः * ॥ २ ॥
ॐ पुरुषोत्तम त्रिभुवनमदोन्मादकर हुं फट् हृदयाय नमः। सुरमनुजसुन्दरीमनांसि तापय तापय शिरसे स्वाहा। दीपय दीपय शोषय शोषय मारय मारय स्तम्भय स्तम्भय द्रावय द्रावय कवचाय हुम्। आकर्षयाकर्षय महाबल हुं फट् नेत्रत्रयाय वौषट्। त्रिभुवनेश्वर सर्वजनमनांसि हन हन दारय दारय ॐ मम वशमानयानय हुं फट् अस्त्राय फट्। त्रैलोक्यमोहन हृषीकेशाप्रतिरूप सर्वस्त्री-हृदयाकर्षण आगच्छ-आगच्छ नमः । (सर्वाङ्गे) व्यापकम् ॥ ३ ॥
इस प्रकार मूलमन्त्रयुक्त व्यापक न्यास बताया गया। फिर पूजन तथा पचास हजारकी संख्यामें जप करके अभिषेक करे। तत्पश्चात् वैदिक विधिसे स्थापित कुण्डाग्निमें सौ बार आहुति दे। दही, घी, खीर, सघृत चरु तथा औटाये हुए दूधकी पृथक्-पृथक् बारह-बारह आहुतियाँ मूलमन्त्रसे दे। फिर अक्षत, तिल और यवकी एक हजार आहुतियाँ देनेके पश्चात् त्रिमधु, पुष्प, फल, दही तथा समिधाओंकी सौ-सौ बार आहुतियाँ दे ॥ ४–६ ॥
तदनन्तर पूर्णाहुति-होम करके हुतावशिष्ट सघृत चरुका प्राशन करे-कराये। फिर ब्राह्मण-भोजन कराकर आचार्यको उचित दक्षिणा आदिसे संतुष्ट करे। यों करनेसे मन्त्र सिद्ध होता है। स्नान करके विधिवत् आचमन करे और मौनभावसे यागमन्दिरमें जाकर पद्मासनसे बैठे और तान्त्रिक विधिके अनुसार शरीरका शोषण करे। पहले राक्षसों तथा विघ्नकारक भूतोंका दमन करनेके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें सुदर्शनका न्यास करे। साथ ही यह भावना करे कि वह सुदर्शन अस्त्र पाँच क्लेशोंके बीजभूत, धूम्रवर्ण एवं प्रचण्ड अनिलरूप मेरे सम्पूर्ण पापको, जो नाभिमें स्थित है, शरीरसे अलग कर रहा है। फिर हृदयकमलमें स्थित 'रं' बीजका स्मरण करके ऊपर, नीचे तथा अगल-बगलमें फैली हुई अग्निकी ज्वालाओंसे उस पाप-पुञ्जको जलाकर भस्म कर दे। फिर
* इस मन्त्रका अर्थ यों है—'ॐ श्रीं ह्रीं हूं ओम् सच्चिदानन्दस्वरूप पुरुषोत्तम! पुरुषोत्तमप्रतिरूप! लक्ष्मीनिकेतन! आप अपने सौन्दर्यसे सम्पूर्ण जगत्को क्षुब्ध कर देनेमें समर्थ हैं। समस्त स्त्रियोंके हृदयको दरण-उन्मथित कर देनेवाले हैं। त्रिभुवनको मदोन्मत्त कर देनेकी शक्ति रखते हैं। देवसुन्दरियों तथा मानवसुन्दरियोंके मनको (प्रीति-अग्निमें) तपाइये, तपाइये; उनके रागको उद्दीप्त कीजिये, उद्दीप्त कीजिये; सोखिये, सोखिये; मारिये, मारिये; उनका स्तम्भन कीजिये; स्तम्भन कीजिये; द्रवित कीजिये, द्रवित कीजिये; आकर्षित कीजिये, आकर्षित कीजिये। परम सौभाग्यनिधे! सर्वसौभाग्यकारी प्रभो! आप सबकी मनोवाञ्छित कामना पूर्ण करनेवाले हैं। मेरे अमुक शत्रु का हनन कीजिये, हनन कीजिये। चक्रसे, गदासे और खड्गसे; समस्त बाणोंसे बेधिये, बेधिये। पाशसे आवृत्त कीजिये, बाँध लीजिये। अङ्कुशसे ताडित कीजिये, ताडित कीजिये। जल्दी कीजिये, जल्दी कीजिये। क्यों रुकते या ठहरते हैं? जबतक मेरा सारा मनोरथ पूर्ण न हो जाय, तबतक यत्नशील रहिये। हुं फट् नमः॥'
६३० * अग्निपुराण *
मूर्धा (ब्रह्मरन्ध्र)-में अमृतका चिन्तन करके सुषुम्णानाड़ीके मार्गसे आती हुई अमृतकी धाराओंसे अपने शरीरको बाहर और भीतरसे भी आप्लावित करे ॥ ७—११॥
इस प्रकार शुद्धशरीर होकर मूलमन्त्रसे तीन बार प्राणायाम करे। फिर मस्तक और मुखपर तथा गुह्यभाग, ग्रीवा, सम्पूर्ण दिशा, हृदय, कुक्षि एवं समस्त शरीरमें हाथ रखकर उनमें शक्तिका न्यास करे। इसके बाद सूर्यमण्डलसे सम्परात्माका आवाहन करके ब्रह्मरन्ध्रके मार्गसे हृदय-कमलमें लाकर चिन्तन करे। वे परात्मा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न हैं। प्रणवका उच्चारण करते हुए परात्माका स्मरण करना चाहिये ॥ १२–१४॥
उनके स्मरणके लिये गायत्री-मन्त्र इस प्रकार है—'त्रैलोक्यमोहनाय विद्महे। स्मराय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्। इति।' परात्माका अर्चन करनेके पश्चात् यज्ञसम्बन्धी द्रव्यों और शुद्ध पात्रका प्रोक्षण करे। विधिपूर्वक आत्मपूजा करके वेदीपर उसकी अर्चना करे ॥ १५-१६ ॥
कूर्म-अनन्त आदिके रूपमें कल्पित पीठपर कमल एवं गरुड़के आसनपर विराजमान त्रैलोक्यमोहन भगवान् विष्णु सर्वाङ्गसुन्दर हैं और वयके अनुरूप लावण्य तथा यौवनको प्राप्त हैं। उनके अरुणनयन मदसे घूर्णित हो रहे हैं। वे परम उदार तथा स्मरसे विह्वल हैं। दिव्य माला, वस्त्र और अनुलेप उनकी शोभा बढ़ाते हैं। मुखपर मन्दहास्यकी छटा छिटक रही है। उनके परिवार और परिकर अनेक हैं। वे लोकपर अनुग्रह करनेवाले, सौम्य तथा सहस्रों सूर्योंके समान तेजस्वी हैं। उन्होंने हाथोंमें पाँच बाण धारण कर रखे हैं। उनकी समस्त इन्द्रियाँ पूर्णकाम हैं। उनके आठ भुजाएँ हैं। देवाङ्गनाएँ उन्हें घेरकर खड़ी हैं। उनकी दृष्टि लक्ष्मीदेवीके मुखपर गड़ी है। ऐसे भगवान्का भजन करे। उनके आठ हाथोंमें क्रमशः चक्र, शङ्ख, धनुष, खड्ग, गदा, मुसल, अङ्कुश और पाश शोभा पाते हैं। आवाहन आदिके द्वारा उनकी अर्चना करके अन्तमें उनका विसर्जन करना चाहिये ॥ १७–२१ ॥
यह भी चिन्तन करे कि भगवान् अपने ऊरु तथा जंघापर श्रीलक्ष्मीजीको बैठाये हुए हैं और वे दोनों हाथोंसे पतिका आलिङ्गन करके स्थित हैं। उनके बायें हाथमें कमल है। वे शरीरसे हृष्ट-पुष्ट हैं तथा श्रीवत्स और कौस्तुभसे सुशोभित हैं। भगवान्के गलेमें वनमाला है और शरीरपर पीताम्बर शोभा पाता है। इस प्रकार चक्र आदि आयुधोंसे सम्पन्न श्रीहरिका पूजन करे ॥ २२-२३ ॥
'ॐ सुदर्शन महाचक्रराज दह दह सर्वदुष्टभयं कुरु कुरु छिन्द छिन्द विदारय विदारय परमन्त्रान् ग्रस ग्रस भक्षय भक्षय भूतानि त्रासय त्रासय हुं फट् स्वाहा'—इस मन्त्रसे चक्र सुदर्शनकी पूजा करे।
'ॐ महाजलचराय हुं फट् स्वाहा। पाञ्चजन्याय नमः ।'
—इस मन्त्रसे शङ्खकी पूजा करे।
'महाखड्ग तीक्ष्ण छिन्द छिन्द हुं फट् स्वाहा खड्गाय नमः ।'¹—इससे खड्गकी पूजा करे।
'शाङ्गिण्य सशराय नमः।'—इससे धनुष और बाणकी पूजा करे। 'ॐ भूतग्रामाय विद्महे। चतुर्विधाय धीमहि। तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात्।'—यह भूतग्राम²-गायत्री है। 'संवर्तक मुशल पोथय पोथय हुं फट् स्वाहा।'—इस मन्त्रसे मुशलकी³ पूजा करे। 'पाश बन्ध बन्धाकर्षयाकर्षय हुं फट्'—
१. 'महाशाङ्गिण्य सशराय हुं फट् स्वाहा, शाङ्गिण्य नमः।'-यह सर्वसम्मत शार्ङ्गधनुष-सम्बन्धी मन्त्र है। (शारदातिलकसे)
२. यह 'भूतग्राम-गायत्री' क्रमप्राप्त गदामन्त्रके लिये आयी जान पड़ती है। इससे गदाका पूजन करना चाहिये। 'शारदातिलक'में कौमोदकी गदाके मन्त्रका स्वरूप यों उद्धृत हुआ है—
'महाकौमोदकि महाबले सर्वासुरान्तकि प्रसीद प्रसीद हुं फट् स्वाहा, कौमोदक्यै नमः ।'
३. 'संवर्तक महामुशल पोथय पोथय हुं फट् स्वाहा, मुशलाय नमः ।'—यह पूरा-पूरा 'मुशल-मन्त्र' है।
- अध्याय ३०८ * ६३१
इस मन्त्रसे पाशका$^१$ पूजन करे। 'अङ्कुश$^२$ कट्ट हुं फट्'—इससे अङ्कुशकी पूजा करे।
भगवान्की भुजाओंमें स्थित अस्त्रोंका तत्तत्-अस्त्र-सम्बन्धी इन्हीं मन्त्रोंसे क्रमशः पूजन करे॥ २४-२७॥
'ॐ पक्षिराजाय हुं फट्'—इस मन्त्रसे पक्षिराज गरुडकी पूजा करे। कर्णिकामें पहले अङ्ग-देवताओंका विधिवत् पूजन करे। फिर पूर्व आदि दलोंमें लक्ष्मी आदि शक्तियों तथा चामरधारी तार्क्ष्य आदिकी अर्चना करे। शक्तियोंकी पूजाका प्रयोग अन्तमें करना चाहिये। पहले देवेश्वर इन्द्र आदि दण्डीसहित पूजनीय हैं। लक्ष्मी और सरस्वती पीतवर्णकी हैं। रति, प्रीति और जया—ये शक्तियाँ श्वेतवर्णा हैं। कीर्ति तथा कान्ति श्वेतवर्णा हैं। तुष्टि तथा पुष्टि—ये दोनों श्यामवर्णा हैं। इनमें स्मरभाव (प्रेममिलनकी उत्कण्ठा) उदित रहती है। लोकेश (ब्रह्माजी तथा दिक्पाल)-पर्यन्त देवताओंकी पूजा करके अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। निम्नाङ्कित मन्त्रका ध्यान और जप करे। उसके द्वारा होम और अभिषेक करे। (मन्त्र यों है—) 'ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं हूं त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः।'—इस मन्त्रद्वारा पूर्ववत् पूजन आदि करनेसे साधक सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जल तथा सम्मोहनी वृक्षके पुष्पद्वारा उक्त मन्त्रसे नित्य तर्पण करे। ब्रह्मा, इन्द्र, श्रीदेवी, दण्डी, बीजमन्त्र तथा त्रैलोक्यमोहन विष्णुका पूजन करके उक्त मन्त्रका तीन लाख जप करनेके पश्चात् कमलपुष्प, बिल्वपत्र तथा घीसे एक लाख होम करे। उक्त हवन-सामग्रीमें चावल, फल, सुगन्धित चन्दन आदि द्रव्य और दूर्वा भी मिला ले। इन सबके द्वारा हवनकर्म सम्पादित करके मनुष्य दीर्घ आयुकी उपलब्धि करता है। उस जप, अभिषेक तथा होमादि क्रियासे संतुष्ट होकर भगवान् विष्णु उपासकको अभीष्ट फल प्रदान करते हैं॥ २८-३६॥
'ॐ नमो भगवते वराहाय भूर्भुवःस्वः पतये भूपतित्वं मे देहि दापय स्वाहा।'—यह वराह भगवान्का मन्त्र है। इसका पञ्चाङ्गन्यास इस प्रकार है—'ॐ नमो हृदयाय नमः। भगवते शिरसे स्वाहा। वराहाय शिखायै वषट्। भूर्भुवःस्वःपतये कवचाय हुम्। भूपतित्वं मे देहि दापय स्वाहा अस्त्राय फट्।' इस प्रकार पञ्चाङ्ग-न्यासपूर्वक वराह-मन्त्रका प्रतिदिन दस हजार बार जप करनेसे मनुष्य दीर्घ आयु तथा राज्य प्राप्त कर सकता है॥ ३७-३८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'त्रैलोक्यमोहनमन्त्रका वर्णन' नामक तीन सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०७॥
तीन सौ आठवाँ अध्याय
त्रैलोक्यमोहिनी लक्ष्मी एवं भगवती दुर्गाके मन्त्रोंका कथन
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! वान्त (श्), वह्नि (र), वामनेत्र (ईकार) और दण्ड (अनुस्वार)—इनके योगसे 'श्रीं' बीज बनता है, जो 'श्री' देवीका मन्त्र है और सब सिद्धियोंको देनेवाला है।
(इसका अङ्गन्यास इस प्रकार करना चाहिये—)
$^१$. पाशका सर्वसम्मत मन्त्ररूप 'शारदातिलक' में इस प्रकार वर्णित हुआ है—'महापाश बन्ध बन्ध आकर्षयाकर्षय हुं फट् स्वाहा, पाशाय नमः।'
$^२$. अङ्कुश-मन्त्र भी अपने पूर्णरूपमें इस प्रकार उपलब्ध होता है—'महाङ्कुश कट्ट कट्ट हुं फट् स्वाहा, अङ्कुशाय नमः।'
६३२ * अग्निपुराण *
(प्रथम प्रकार) महाश्रियै महाविद्युत्प्रभे स्वाहा, हृदयाय नमः। श्रियै देवि विजये स्वाहा, शिरसे स्वाहा। गौरि महाबले बन्ध-बन्ध स्वाहा, शिखायै वषट्। धृतिः स्वाहा, कवचाय हुम्। महाकाये पद्महस्ते हुं फट्, अस्त्राय फट्। (दूसरा प्रकार) 'श्रियै स्वाहा, हृदयाय नमः। श्रीं फट्, शिरसे स्वाहा। श्रीं नमः' शिखायै वषट्। श्रियै प्रसीद नमः। कवचाय हुम्। श्रीं फट्, अस्त्राय फट्।' [इसी तरह अन्यान्य प्रकार भी तन्त्र-ग्रन्थोंमें कहे गये हैं।]॥१-२॥
—इस प्रकार 'श्री'-मन्त्रके नौ अङ्गन्यास बतलाये गये हैं। उनमेंसे किसी एकका आश्रय ले$^१$। पद्माक्षकी मालासे पूर्वोक्त मन्त्रका तीन लाख या एक लाख बार जप ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला है। साधक लक्ष्मी अथवा विष्णुके मन्दिरमें श्रीदेवीका पूजन करके धन प्राप्त कर सकता है। खदिरकाष्ठसे प्रज्वलित अग्निमें घृतमिश्रित तण्डुलोंकी एक लाख आहुतियाँ दे। इससे राजा वशीभूत हो जाता है तथा लक्ष्मीकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती है। श्रीमन्त्रसे अभिमन्त्रित सर्षपजलसे अभिषेक करनेपर सब प्रकारकी ग्रहबाधा शान्त होती है। एक लाख बिल्वफलोंका होम करनेसे लक्ष्मीकी प्राप्ति और धनकी वृद्धि होती है॥३-५$\frac{१}{२}$॥
साधक चार द्वारोंसे युक्त निम्नाङ्कित 'शक्रवेश्म'का चिन्तन करे। पूर्वद्वारपर क्रीडामें संलग्न दोनों भुजाओंको ऊपर उठाये हुए श्वेत कमलको धारण करनेवाली श्यामवर्णा वामनाकृति बलाकीका ध्यान करे। दक्षिणद्वारपर ऊपर उठाये हुए एक हाथमें रक्तकमल धारण करनेवाली श्वेताङ्गी वनमालिनीका चिन्तन करे। पश्चिमद्वारपर दोनों हाथोंको ऊपर उठाकर श्वेत पुण्डरीकको धारण करनेवाली हरितवर्णा विभीषिका नामवाली श्रीदूतीका ध्यान करे। उत्तरद्वारपर शाङ्करीकी धारणा करे। 'शक्रवेश्म'के मध्यमें अष्टदल कमलका निर्माण करे। कमलदलोंपर क्रमशः शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धका ध्यान करे। उनकी अङ्गकान्ति क्रमशः अञ्जन, दुग्ध, केसर और सुवर्णके समान है। वे सुन्दर वस्त्रोंसे विभूषित हैं। उस अष्टदल कमलके आग्नेय आदि दलोंपर गुग्गुलु, कुरण्टक, दमक और सलिल नामक दिग्गजोंकी धारणा करे। ये चारों स्वर्ण-कलशोंको धारण करनेवाले हैं। कमलकी कर्णिकामें श्रीदेवीका स्मरण करे। वे चार भुजाओंसे युक्त हैं। उनकी अङ्गकान्ति सुवर्णके समान है। उनकी ऊपर उठी हुई दोनों भुजाओंमें कमल है तथा दक्षिणहस्तमें अभयमुद्रा और वामहस्तमें वरमुद्रा सुशोभित हो रही है। वे शुभ्र एवं सुवासित वस्त्र तथा गलेमें एक श्वेत माला धारण करती हैं। उन श्रीदेवीका ध्यान एवं सपरिवार पूजन करके मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर लेता है॥६-१४$\frac{१}{२}$॥
१. 'शारदातिलक' ८।२ की टीकामें अग्निपुराणोक्त द्विविध अङ्गन्यास इसी प्रकार उद्धृत किये गये हैं। परंतु मूलमें 'षड् दीर्घयुक्तबीजेन कुर्यादङ्गानि षट् क्रमात्।' कहा है; उसके अनुसार, 'श्रीं हृदयाय नमः। श्रीं शिरसे स्वाहा। श्रूं शिखायै वषट्। श्रैं कवचाय हुम्। श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्। श्रः अस्त्राय फट्।' इस प्रकार न्यास करे।
२. शक्रवेश्म-यन्त्रका इस प्रकार निर्माण करना चाहिये—
* अध्याय ३०८ * ६३३
पूर्वोक्त उपासनाके समय द्रोणपुष्प, कमल और बिल्वपत्रको सिरपर धारण न करे। पञ्चमी और सप्तमीके दिन क्रमशः लवण और आँवलेका परित्याग कर दे। साधक खीरका भोजन करके श्रीसूक्तका जप करे तथा श्रीसूक्तसे ही श्रीदेवीका अभिषेक करे। आवाहनसे लेकर विसर्जनपर्यन्त सभी उपचार-अर्पण श्रीसूक्तकी ऋचाओंसे करता हुआ ध्यानपूर्वक श्रीदेवीका पूजन करे। बिल्व, घृत, कमल और खीर—ये वस्तुएँ एक साथ या अलग-अलग भी श्रीदेवीके निमित्त होममें उपयुक्त हैं। यह होम लक्ष्मीकी प्राप्ति एवं वृद्धि करनेवाला है॥ १५-१७॥
विषं (म), हि, मज्जा (ष), काल (म), अग्नि (र), अत्रि (द), निष्ठ (इ), नि, स्वाहा (मर्दिषमर्दिनि स्वाहा)—यह भगवती महिषमर्दिनी (महालक्ष्मी)-का अष्टाक्षर-मन्त्र कहा गया है॥ १८॥
‘ॐ ह्रीं महामहिषमर्दिनि स्वाहा।’—यह मूलमन्त्र है। इसका पञ्चाङ्गन्यास इस प्रकार करे—‘महिषमर्दिनि हुं फट्, हृदयाय नमः। महिषशत्रूत्सादिनि हुं फट्, शिरसे स्वाहा। महिषं भीषय हुं फट्, शिखायै वषट्। महिषं हन हन देवि हुं फट्, कवचाय हुम्। महिषसूदनि हुं फट्, अस्त्राय फट्।’
यह अङ्गोंसहित ‘दुर्गाहृदय’ कहा गया है, जो सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है। दुर्गादेवीका निम्नाङ्कित प्रकारसे पीठ एवं अष्टदल-कमलपर पूजन करे॥ १९-२०॥
‘ॐ ह्रीं दुर्गे दुर्गे रक्षिणि स्वाहा’—यह दुर्गाका मन्त्र है। अष्टदलपद्मपर दुर्गा, वरवर्णिनी, आर्या, कनकप्रभा, कृत्तिका, अभयप्रदा, कन्यका और सुरूपा—इन शक्तियोंके क्रमशः आदिके सस्वर अक्षरोंमें बिन्दु लगाकर उन्हीं बीजमन्त्रोंसे युक्त नाममन्त्रोंद्वारा यजन करे। यथा—‘दुं दुर्गायै नमः’ इत्यादि। इनके साथ क्रमशः चक्र, शङ्ख, गदा, खड्ग, बाण, धनुष, अङ्कुश और खेट—इन अस्त्रोंकी भी अर्चना करे। अष्टमी आदि तिथियोंपर लोकेश्वरी दुर्गाकी पूजा करे। दुर्गाकी यह उपासना पूर्ण आयु, लक्ष्मी, (आत्मरक्षा) एवं युद्धमें विजय प्रदान करनेवाली है। साध्यके नामसे युक्त मन्त्रसे तिलका होम ‘वशीकरण’ करनेवाला है। कमलोंके हवनसे ‘विजय’ प्राप्त होती है। शान्तिकी कामना करनेवाला दूर्वासे हवन करे। पलाश-समिधाओंसे पुष्टि, काकपक्षाके हवनसे मारण एवं विद्वेषणकर्म सिद्ध होते हैं। यह मन्त्र सभी प्रकारकी ग्रहबाधा एवं भयका हरण करता है॥ २१—२६॥
‘ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षिणि स्वाहा’—यह अङ्गसहित ‘जय दुर्गा’ बतलायी गयी है। यह साधककी रक्षा करती है। ‘मैं श्यामाङ्गी, त्रिनेत्रभूषिता, चतुर्भुजा, शङ्ख, चक्र, शूल एवं खड्गधारिणी रौद्ररूपिणी रणचण्डीस्वरूपा हूँ’—ऐसा ध्यान करे। युद्धके प्रारम्भमें इस ‘जयदुर्गा’का जप करे। विजयके लिये खड्ग आदिपर दुर्गाका पूजन करे॥ २७—२९॥
‘ॐ नमो भगवति ज्वालामालिनि गृध्रगणपरिवृते चराचररक्षिणि स्वाहा’—युद्धके निमित्त इस मन्त्रका जप करे। इससे योद्धा शत्रुओंपर विजय प्राप्त करता है॥ ३०-३१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘लक्ष्मी आदिकी पूजाका वर्णन’ नामक तीन सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०८॥
६३४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
तीन सौ नवाँ अध्याय
त्वरिता-पूजा
**अग्निदेव कहते हैं—**मुने! त्वरिता-विद्याका ज्ञान भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है; अतः अब उसीका वर्णन करूँगा। पहले ‘ॐ आधारशक्त्यै नमः।’— इस मन्त्रसे आधारशक्तिका स्मरण और वन्दन करे। फिर महासिंहस्वरूप सिंहासनकी ‘ॐ प्रों पुरु पुरु महासिंहाय नमः।’— इस मन्त्रसे और आसनस्वरूप कमलकी ‘पद्माय नमः।’— इस मन्त्रसे पूजा करे। तदनन्तर मूलमन्त्रका उच्चारण करके त्वरितादेवीकी पूजा करे। यथा— ‘ॐ ह्रीं हुं खे च च्छे क्षः स्त्रीं हूं क्षैं ह्रीं फट्² त्वरितायै नमः। इसका अङ्ग-न्यास इस प्रकार है—खे च हृदयाय नमः। च च्छे शिरसे नमः (शिरसे स्वाहा)। छे क्षः शिखायै नमः (शिखायै वषट्)। क्षः स्त्री कवचाय नमः (कवचाय हुम्)। स्त्रीं हूं नेत्राय (नेत्रत्रयाय) नमः (वौषट्)। हूं क्षैं अस्त्राय नमः (अस्त्राय फट्)॥ १-२॥
[इसी प्रकार करन्यास करके निम्नाङ्कित गायत्रीका जप करे—]
‘ॐ त्वरिताविद्यां विद्महे। तूर्णविद्यां च धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्।’— यह ‘त्वरिता-गायत्री मन्त्र’ है।
तदनन्तर पीठगत कमल-कर्णिकाके केस्रोंमें पूर्वादि क्रमसे अङ्ग-देवताओंका पूजन करे। यथा—
‘खे च हृदयाय नमः (पूर्वे)। च च्छे शिरसे नमः (अग्निकोण)। छे क्षः शिखायै नमः (दक्षिणे)। क्षः स्त्री कवचाय नमः (नैर्ऋत्ये)। स्त्रीं हूं नेत्रत्रयाय नमः (पश्चिमे)। हूं क्षे अस्त्राय नमः (वायव्ये)।' तत्पश्चात् उत्तरदिशामें 'श्रीप्रणीतायै नमः'— इस मन्त्रसे श्रीप्रणीताका तथा ईशानकोणमें 'श्रीगायत्र्यै नमः' से गायत्रीका पूजन करे॥ ३ $\frac{१}{२}$ ॥
तदनन्तर बाह्यगत तीन गोलाकार रेखाओंके
१. ‘क्षुं हुं हं वज्रदेह पुरु पुरु क्षिं क्षिं गर्ज गर्ज हं हुं क्षां पञ्चाननाय नमः।’—यह पीठमन्त्र है। इससे देवीको आसन देना और आसनकी पूजा करनी चाहिये। (शा० ति० १० पटल)
२. त्वरिता-मन्त्रका विनियोग 'शारदातिलक' दशमपटलमें इस प्रकार बताया गया है—'ॐ अस्य श्रीत्वरिताद्वादशाक्षरमन्त्रस्यार्जुनऋषिर्विराट् छन्दः, त्वरिता देवता प्रणवो बीजं (केषांचिन्मते हुं बीजम्), ह्रीं शक्तिः (क्षें कीलकम्) समस्तपुरुषार्थफलप्राप्तये जपे विनियोगः।' 'श्रीविद्यार्णव' में एक जगह 'ईश' को और दूसरी जगह 'सौरि' को ऋषि कहा है। वहाँ 'हुं' शक्ति, 'स्त्रीं' बीज और 'क्षें' कीलक बताया है।
ध्यान
श्यामां बर्हिकलापशेखरयुतामाबद्धपर्णांशुकां गुञ्जाहारलसत्पयोधरभरामष्टाहिपान् बिभ्रतीम्।
ताटङ्काङ्गदमेखलागुणरणन्मञ्जीरतां प्रापितान् कैरातों वरदाभयोद्यतकरां देवीं त्रिनेत्रां भजे॥
[भगवान् शंकर और भगवती पार्वती अर्जुनपर कृपा करनेके लिये किरात और किरातीके वेषमें उनके समक्ष प्रकट हुए थे, उस रूपमें देवी पार्वती बहुत शीघ्र भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करती या करनेके लिये त्वरायुक्त (उतावली) रहती हैं, इसलिये इन्हें 'त्वरिता' की संज्ञा दी गयी है। उन्हींका ध्यान किया गया है। उसका अर्थ यों है—]
'मैं किरातीके वेषमें प्रकट हुई त्रिनेत्रधारिणी देवी पार्वतीका भजन (चिन्तन) करता हूँ। उनकी अङ्गकान्ति श्यामा है तथा अवस्थामें भी वे श्यामा (सोलह वर्षकी तरुणी) हैं। मोरपंखका मुकुट एवं वलय धारण करती हैं। कोमल पल्लवोंको जोड़कर बनाये हुए वस्त्रसे उनका कटिप्रदेश सुशोभित है। उनके पीन पयोधर गुञ्जाओंके हारसे विलसित हैं। आठ अहीश्वरोंको वे आभूषणोंके रूपमें धारण करती हैं; उनमेंसे दो कानोंके ताटङ्क बने हैं, दो भुजाओंमें बाजूबंदकी आवश्यकता पूरी करते हैं, दो कमरमें करधनीकी लड़ोंका काम देते हैं और दो पैरोंके खनखनाते मञ्जीर बन गये हैं। इस अनुपम वेषभूषासे विभासित त्वरितादेवीके उठे हुए हाथ वरद और अभयकी मुद्रासे मनोरम प्रतीत होते हैं।'
ऋष्यादिन्यास—'अर्जुनाय (सौरये ईशाय वा) ऋषये नमः, शिरसि। विराट्छन्दसे नमः, मुखे। त्वरितानित्यादेवतायै नमः, हृदि। ॐ बीजाय नमः, गुह्ये। ह्रीं (अथवा हुम्) शक्तये नमः, पादयोः। क्षें कीलकाय नमः, नाभौ।'
* अध्याय ३०९ * ६३५
बीचमें स्थित दो वीथियोंमेंसे देवीके सामनेवाले दलाग्रके बाह्यभागमें 'कोदण्डशरधारिण्यै फट्कार्यै नमः।' से फट्कारीकी पूजा करे। फिर उसके बाहरवाली वीथीमें देवीके सम्मुख 'गदापाणये किङ्कराय नमः।' से किङ्करकी पूजा करके कहे—'किङ्कर रक्ष रक्ष त्वरिताज्ञया स्थिरो भव।' इसके बाद द्वारके दक्षिणपार्श्वमें जयाकी और वामपार्श्वमें विजयाकी पूजा करे—'जयायै नमः, विजयायै नमः।' तत्पश्चात् कमलके पूर्वादि दलोंमें— 'हूंकार्यै नमः। खेचर्यै नमः। चण्डायै नमः। छेदिन्यै नमः। क्षेपिण्यै नमः। स्त्रीकायै नमः। हूंकार्यै नमः। क्षेमङ्कर्यै नमः।' इन मन्त्रोंसे 'हूंकारी' आदि आठ मन्त्राक्षरशक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये।
त्वरिता-विद्या 'तोतला', 'त्वरिता' और 'तूर्णा' —इन तीन नामोंसे कही जाती है। इसके अक्षरोंका सिर, भ्रू-युगल, ललाट, कण्ठ, हृदय, नाभि, गुह्य (मूलाधार), ऊरुद्वय, जानुद्वय, जङ्घाद्वय, ऊरुद्वय, चरणद्वयमें न्यास करके समस्त विद्याद्वारा व्यापकन्यास करना चाहिये*॥४—६॥
त्वरितादेवी साक्षात् पर्वतराजनन्दिनीकी स्वरूपभूता हैं, इसलिये इनका नाम 'पार्वती' है। शबर (किरात)-का वेष धारण करनेसे उनको 'शबरी' कहा गया है। वे सबकी स्वामिनी या सबपर शासन करनेमें समर्थ होनेसे 'ईशा' कही गयी हैं। उनके एक हाथमें वरमुद्रा और दूसरेमें अभयमुद्रा शोभा पाती है। मोरपंखका कंगन पहननेसे उनका नाम 'मयूरवलया' है। मयूरपिच्छका मुकुट धारण करनेसे उन्हें 'पिच्छमौलि' कहा जाता है। नूतन पल्लव ही उनके वस्त्रके उपयोगमें आते हैं, अतः वे 'किसलयांशुका' कही गयी हैं। वे सिंहासनपर विराजमान होती हैं। मोरपंखका छत्र धारण करती हैं। त्रिनेत्रधारिणी तथा श्यामवर्णा देवी हैं। आपादतलगलम्बिनी माला (वनमाला) उनका आभूषण है। ब्राह्मणजातीय दो नाग (अनन्त और कुलिक) देवीके कानोंके आभूषण हैं। क्षत्रियजातिके दो नागराज (वासुकि और शङ्खपाल) उनके बाजूबंद बने हुए हैं। वैश्यजातीय दो नाग (तक्षक और महापद्म) त्वरितादेवीके कटिप्रदेशमें किङ्किणी बनकर रहते हैं और शूद्रजातीय दो सर्प (पद्म तथा कर्कोटक) देवीके चरणोंमें नूपुरकी शोभा प्रदान करते हैं। साधक स्वयं भी देवीस्वरूप होकर उनके मन्त्रका एक लाख जप करे। पूर्वकालमें देवेश्वर शिव किरातरूपमें प्रकट हुए थे। उस समय देवी पार्वती भी तदनुरूप ही किराती बन गयी थीं। सब प्रकारकी सिद्धियोंके लिये उनका ध्यान करे। उनके मन्त्रका जप करे तथा उनका पूजन करे। देवीकी आराधना विष आदि सब प्रकारके उपद्रवोंको हर लेती है॥७—१०$\frac{\text{१}}{\text{२}}$॥
(पूर्ववर्णनके अनुसार) कमलके पूर्वादि दलके भीतर कर्णिकामें आठ सिंहासनोंपर निम्नाङ्कित देवियोंका क्रमशः पूजन करे। हृदयादि छः अङ्गोंसहित प्रणीता और गायत्रीका पूजन करे। पूर्वादि दलोंमें हूंकारी आदिकी पूजा करे। दलाग्रभागमें देवी त्वरिताके सम्मुख फट्कारीकी पूजा करे। इन सब देवियोंके नाममन्त्रके साथ 'श्रीं' बीज लगाकर उसीसे इनकी पूजा करना चाहिये। हूंकारी आदिके आयुध और वर्ण उस-उस दिशाके दिक्पालोंके ही समान हैं। परंतु फट्कारी देवी धनुष धारण करती हैं। मण्डलके द्वार-भागोंमें जया तथा विजयाकी पूजा करे। ये दोनों देवियाँ सुनहरे रंगकी छड़ी धारण करती हैं। उनके बाह्यभागमें देवीके समक्ष द्वारपाल किङ्करका पूजन करना चाहिये, जिसे 'वर्वर' कहा गया है। उसका मस्तक मुण्डित है।
* 'श्रीविद्यार्णव-तन्त्र'के अनुसार उक्त ग्यारह अङ्गोंमें ही सम्पुटित अक्षरोंका न्यास करना चाहिये। ऊरुद्वयको दो बार गिननेसे बारह अङ्ग होते हैं, उनमें मूलके बारह अक्षरोंका न्यास करे।
६३६ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
(मतान्तरके अनुसार उसके सिरके केश ऊपरकी ओर उठे रहते हैं।) वह लगुडधारी है। उसका स्थान जया-विजयाके बाह्यभागमें है। इस प्रकार पूजन करके सिद्धिके लिये हवनीय द्रव्योंद्वारा योन्याकार कुण्डमें हवन करे॥११-१४॥
उज्ज्वल धान्यसे हवन करनेपर सुवर्ण-लाभ होता है। गोधूमसे हवन करनेपर पुष्टि-सम्पत्ति प्राप्त होती है। जौ, धान्य (चावल) और तिलोंकी मिश्रित हवनसामग्रीसे हवन करनेपर सब प्रकारकी सिद्धि सुलभ होती है तथा ईतिभयका नाश हो जाता है। बहेड़ेका हवन किया जाय तो शत्रुको उन्माद हो जाता है। सेमरसे हवन करनेपर शत्रुके प्रति मारणका प्रयोग सफल होता है। जामुनके फलकी आहुतियाँ दी जायँ तो उनसे धन-धान्यकी प्राप्ति होती है। नील कमलके हवनसे तुष्टि होती है। लाल कमलोंद्वारा होम करनेसे महापुष्टि होती है। कुन्दके फूलोंसे होम किया जाय तो महान् अभ्युदय होता है। मल्लिका-कुसुमोंसे हवन करनेपर ग्राम या नगरमें क्षोभ होता है। कुमुद-कुसुमोंकी आहुतिसे साधक सब लोगोंका प्रिय हो जाता है॥१५-१७॥
अशोक-सुमनोंसे होम किया जाय तो पुत्रकी और पाटलासे होम करनेपर उत्तम अङ्गनाकी प्राप्ति होती है। आम्रफलकी आहुतिसे आयु, तिलोंके हवनसे लक्ष्मी, बिल्वके होमसे श्री तथा चम्पाके फूलोंके हवनसे धनकी प्राप्ति होती है। महुएके फूलों और बेलके फलोंसे एक साथ होम करनेपर सर्वज्ञता-शक्ति सुलभ होती है। त्वरितामन्त्रके तीन लाख जप, होम, ध्यान तथा पूजनसे समस्त अभिलषित वस्तुओंकी प्राप्ति होती है। मण्डलमें त्वरितादेवीकी अर्चना करके त्वरिता-गायत्रीसे पचीस आहुतियाँ दे। फिर मूलमन्त्रसे पल्लवोंकी तीन सौ आहुतियाँ देकर दीक्षा ग्रहण करे। दीक्षासे पूर्व पञ्चगव्य-पान कर ले। दीक्षितावस्थामें सदा चरु (हविष्य)-का भोजन करना चाहिये॥१८-२०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'त्वरितापूजा-कथन' नामक तीन सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ॥३०९॥
तीन सौ दसवाँ अध्याय
अपरत्वरिता-मन्त्र एवं मुद्रा आदिका वर्णन
**अग्निदेव कहते हैं—**मुने! अब मैं दूसरी 'अपरा विद्या' का वर्णन करता हूँ, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है। धूलिसे निर्मित, वज्र-चिह्नसे आवृत और चौकोर भूपुरमण्डलमें त्वरितादेवीकी पूजा करे। उस मण्डलके भीतर योगपीठपर कमलका निर्माण भी होना चाहिये। मण्डलके पूर्वादि दिशाओं तथा कोणोंमें कुल मिलाकर आठ वज्र अङ्कित होंगे। मण्डलके भीतर वीथी, द्वार, शोभा तथा उपशोभाकी भी रचना करे। उसके भीतर उपासक मनुष्य त्वरितादेवीका चिन्तन करे। उनके अठारह भुजाएँ हैं। उनकी बायीं जङ्घा तो सिंहकी पीठपर प्रतिष्ठित है और दाहिनी जङ्घा उससे दुगुनी बड़ी आकृतिमें पीढ़े या खड़ाऊँपर अवलम्बित है। वे नागमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। दायें भागके हाथोंमें क्रमशः वज्र, दण्ड, खड्ग, चक्र, गदा, शूल, बाण, शक्ति तथा वरद मुद्रा धारण करती हैं और वामभागके हाथोंमें क्रमशः धनुष, पाश, शर, घण्टा, तर्जनी, शङ्ख, अङ्कुश, अभयमुद्रा तथा वज्र नामक आयुध लिये रहती हैं॥१-५॥
त्वरितादेवीके पूजनसे शत्रु का नाश होता है। त्वरिताका आराधक राज्यको भी अनायास ही जीत लेता है। वह दीर्घायु तथा राष्ट्रकी विभूति बन जाता है। दिव्य और अदिव्य (दैविक और
- अध्याय ३१० * | ६३७ ---|---
लौकिक) सभी सिद्धियाँ उसके अधीन हो जाती हैं। (त्वरिताको 'तोतला त्वरिता' भी कहते हैं। इस नामकी व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये—) 'तल' शब्दसे सातों पाताल, काल, अग्नि और सम्पूर्ण भुवन गृहीत होते हैं। ॐकारसे परमेश्वरसे लेकर जितना भी ब्रह्माण्ड है, उन सबका प्रतिपादन होता है। अपने मन्त्रके आदि अक्षर ॐकारसे देवी तलपर्यन्त 'तोय'का त्वरित भ्रामण (प्रक्षेपण) करती हैं, इसलिये वे 'तोतला त्वरिता' कही गयी हैं॥ ६-७$\frac{१}{२}$॥
अब मैं त्वरिता-मन्त्रको प्रस्तुत करनेका प्रकार (अर्थात् मन्त्रोद्धार) बता रहा हूँ। भूतलपर स्वरवर्ग लिखे। (स्वरवर्गमें सोलह अक्षर हैं—अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः। इसके बाद व्यञ्जन वर्णोंको भी वर्गक्रमसे लिखे—) कवर्गके लिये सांकेतिक नाम तालुवर्ग है। स्वरवर्ग पहला है और तालुवर्ग दूसरा। तीसरा जिह्वा-तालुकवर्ग है। (इसमें चवर्गके अक्षर संयोजित हैं।) चतुर्थ वर्ग तालु-जिह्वाग्र कहा गया है। (इसमें टवर्गके अक्षर हैं।) पञ्चम जिह्वादन्तक वर्ग है। (इसमें तवर्गके अक्षर हैं।) षष्ठ वर्गका नाम है—ओष्ठपुट-सम्पन्न। (इसमें पवर्गके अक्षर हैं।) सातवाँ मिश्रवर्ग है। (इसमें अन्तःस्थ—य, र, ल, वका समावेश है।) आठवाँ वर्ग ऊष्मा या शवर्ग है। इन्हीं वर्गोंके अक्षरोंसे मन्त्रका उद्धार करे॥ ८-१०॥
छठे स्वर ऊकारपर आरूढ़ ऊष्माका द्वितीय अक्षर हकार बिन्दु (अनुस्वार)-से युक्त हो (हूं)। तालुवर्गका द्वितीय अक्षर 'खकार' ग्यारहवें स्वर 'एकार'से युक्त हो (खे)। जिह्वा-तालु-समायोगका केवल प्रथम अक्षर 'चकार' हो, उसके नीचे उसी वर्गका दूसरा अक्षर 'छकार' हो और वह ग्यारहवें स्वर 'एकार'से संयुक्त (च्छे) हो। तालुवर्गका प्रथम अक्षर 'क्' हो, फिर उसके नीचे ऊष्माका द्वितीय अक्षर 'ष्'को देखकर जोड़ दे और उसे सोलहवें स्वर—'अः'से संयुक्त करे (क्षः)। ऊष्माका तीसरा अक्षर 'स्' हो, उसके नीचे जिह्वादन्त-समायोगके प्रथम अक्षर 'तकार'को जोड़े। उसके नीचे मिश्रवर्गका दूसरा अक्षर 'रकार' जोड़े और उसे चौथे स्वर 'ईकार'से जोड़ दे—(स्त्री)। तदनन्तर तालुवर्गके आदि अक्षर 'क्' के नीचे ऊष्माका द्वितीय अक्षर 'ष्' जोड़ दे और उसको ग्यारहवें स्वरसे मिला दे—(क्षे)। इसके बाद ऊष्माके अन्तिम अक्षर 'हकार'को अनुस्वारयुक्त करके पाँचवें स्वरपर आरूढ़ कर दे (हुं)। ओष्ठसम्पुटयोगसे दूसरा अक्षर 'फ्' और जिह्वाग्र तालुयोगसे द्वितीय अक्षर 'ट्'को पञ्चम 'ण'के रूपमें परिणत करके जोड़ना चाहिये। स्वर तथा अर्द्ध-व्यञ्जन वर्णोंके साथ उद्धृत हुए—ये अक्षर 'तोतला त्वरिता'के मन्त्र हैं। इनके आदिमें ॐकार और अन्तमें 'नमः' जोड़नेपर जो मन्त्र बने, उसका तो जप करे, किंतु अग्निकार्य (हवन)-में 'नमः'को हटाकर 'स्वाहा' जोड़ देना चाहिये। (तात्पर्य यह है कि 'ॐ हूं खे च्छे क्षः स्त्री क्षे हुं फट् नमः।'—यह जपमन्त्र है और 'ॐ हूं खे च्छे क्षः स्त्री क्षे हुं फट् स्वाहा'—यह हवनोपयोगी मन्त्र है) ॥ ११–१८॥
इसका अङ्गन्यास इस प्रकार है—ॐ ह्रीं हूं हः हृदयाय नमः। हां हः शिरसे स्वाहा। ह्रीं ज्वल ज्वल शिखायै वषट्। हनु हनु (अथवा हुलु हुलु), कवचाय हुम्। ह्रीं श्रीं क्षूं नेत्रत्रयाय वौषट्। नवाँ (फ) और आधा अक्षर (ट्) रूप जो तोतला-त्वरिता-विद्या है, उसीको देवीका नेत्र कहा गया है। 'क्षौं हः खौं हूं फट् अस्त्राय फट्।' ये गुह्य अङ्गमन्त्र हैं। इनका पहले न्यास करे॥ १९-२०॥
त्वरिताके अङ्गोंका वर्णन आगे चलकर करूँगा। इस समय त्वरिता-विद्याके अङ्गोंका वर्णन मुझसे सुनो—प्रथम दो बीजाक्षर या मन्त्राक्षर हृदय हैं, तीसरा और चौथा—ये दो अक्षर स्थिर हैं, पाँचवाँ और छठा—ये अक्षर शिखाके मन्त्र