भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
४६ -शालग्राम-मूर्तियोंके लक्षण९३७५ -शिवपूजाके अङ्गभूत होमकी विधि१५३
४७ -शालग्राम-विग्रहोंकी पूजाका वर्णन९४७६ -चण्डकी पूजाका वर्णन१५७
४८ -चतुर्विंशति-मूर्तिस्तोत्र एवं द्वादशाक्षर स्तोत्र९५७७ -घरकी कपिला गाय, चूल्हा, चक्की, ओखली, मूसल, झाडू और खंभे आदिका पूजन एवं प्राणाग्निहोत्रकी विधि१५८
४९ -मत्स्यादि दशावतारोंकी प्रतिमाओंके लक्षणोंका वर्णन९६
५० -चण्डी आदि देवी-देवताओंकी प्रतिमाओंके लक्षण९८७८ -पवित्राधिवासनकी विधि१६०
५१ -सूर्यादि ग्रहों तथा दिक्पाल आदि देवताओंकी प्रतिमाओंके लक्षणोंका वर्णन१०२७९ -पवित्रारोपणकी विधि१६५
५२ -चौंसठ योगिनी आदिकी प्रतिमाओंके लक्षण१०४८० -दमनकारोपणकी विधि१६७
५३ -लिङ्ग आदिका लक्षण१०५८१ -समयाचार-दीक्षाकी विधि१६८
५४ -लिङ्ग-मान एवं व्यक्ताव्यक्त लक्षण आदिका वर्णन१०७८२ -समय-दीक्षाके अन्तर्गत संस्कार-दीक्षाकी विधिका वर्णन१७७
५५ -पिण्डिकाका लक्षण१११८३ -निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत अधिवासनकी विधि१७९
५६ -प्रतिष्ठाके अङ्गभूत मण्डपनिर्माण, तोरण-स्तम्भ, कलश एवं ध्वजके स्थापन तथा दस दिक्पाल-यागका वर्णन११२८४ -निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत निवृत्तिकला-शोधन-विधि१८२
५७ -कलशाधिवासकी विधिका वर्णन११४८५ -निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत प्रतिष्ठाकलाके शोधनकी विधिका वर्णन१८४
५८ -भगवद्विग्रहको स्नान और शयन करानेकी विधि११५८६ -निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत विद्याकलाका शोधन१८७
५९ -अधिवास-विधिका वर्णन११९८७ -निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत शान्तिकलाका शोधन१८९
६० -वासुदेव आदि देवताओंके स्थापनकी साधारण विधि१२२८८ -निर्वाण-दीक्षाकी अवशिष्ट विधिका वर्णन१९०
६१ -अवभृथस्नान, द्वारप्रतिष्ठा और ध्वजारोपण आदिकी विधिका वर्णन१२४८९ -एकतत्त्व-दीक्षाकी विधि१९३
६२ -लक्ष्मी आदि देवियोंकी प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि१२७९० -अभिषेक आदिकी विधिका वर्णन१९३
६३ -विष्णु आदि देवताओंकी प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि तथा पुस्तक-लेखन-विधि१२८९१ -देवार्चनकी महिमा तथा विविध मन्त्र एवं मण्डलका कथन१९४
६४ -कुआँ, बावड़ी और पोखरे आदिकी प्रतिष्ठाकी विधि१३०९२ -प्रतिष्ठाके अङ्गभूत शिलान्यासकी विधिका वर्णन१९६
६५ -सभा-स्थापन और एकशालादि भवनके निर्माण आदिकी विधि, गृहप्रवेशका क्रम तथा गोमातासे अभ्युदयके लिये प्रार्थना१३२९३ -वास्तुपूजा-विधि२००
९४ -शिलान्यासकी विधि२०२
६६ -देवता-सामान्य-प्रतिष्ठा१३४९५ -प्रतिष्ठा-काल-सामग्री आदिकी विधिका कथन२०३
६७ -जीर्णोद्धार-विधि१३६९६ -प्रतिष्ठामें अधिवासकी विधि२०७
६८ -उत्सव-विधिका कथन१३६९७ -शिव-प्रतिष्ठाकी विधि२१४
६९ -स्नपनोत्सवके विस्तारका वर्णन१३७९८ -गौरी-प्रतिष्ठा-विधि२१९
७० -वृक्षोंकी प्रतिष्ठाकी विधि१३८९९ -सूर्यदेवकी स्थापनाकी विधि२२०
७१ -गणपतिपूजनकी विधि१३९१०० -द्वार-प्रतिष्ठा-विधि२२०
७२ -स्नान, संध्या और तर्पणकी विधिका वर्णन१३९१०१ -प्रासाद-प्रतिष्ठा२२१
७३ -सूर्यदेवकी पूजा-विधिका वर्णन१४४१०२ -ध्वजारोपण२२२
७४ -शिवपूजाकी विधि१४६१०३ -शिवलिङ्ग आदिके जीर्णोद्धारकी विधि२२४
१०४ -प्रासादके लक्षण२२५
१०५ -नगर, गृह आदिकी वास्तु-प्रतिष्ठा-विधि२२७
१०६ -नगर आदिके वास्तुका वर्णन२३१

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अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्य
१०७-भुवनकोष (पृथ्वी-द्वीप आदि)-का तथा स्वायम्भुव सर्गका वर्णन२३२१४१-छत्तीस कोष्ठोंमें निर्दिष्ट ओषधियोंके वैज्ञानिक प्रभावका वर्णन३०१
१०८-भुवनकोश-वर्णनके प्रसंगमें भूमण्डलके द्वीप आदिका परिचय२३३१४२-चोर और जातकका निर्णय, शनि-दृष्टि, दिन-राहु, फणि-राहु, तिथि-राहु तथा विष्टि-राहुके फल और अपराजिता-मन्त्र एवं ओषधिका वर्णन३०२
१०९-तीर्थ-माहात्म्य२३५१४३-कुब्जिका-सम्बन्धी न्यास एवं पूजनकी विधि३०५
११०-गङ्गाजीकी महिमा२३६१४४-कुब्जिकाकी पूजा-विधिका वर्णन३०७
१११-प्रयाग-माहात्म्य२३६१४५-मालिनी आदि नाना प्रकारके मन्त्र और उनके षोढा-न्यास३०९
११२-वाराणसीका माहात्म्य२३७१४६-त्रिखण्डी-मन्त्रका वर्णन; पीठस्थानपर पूजनीय शक्तियों तथा आठ अष्टक देवियोंका कथन३११
११३-नर्मदा-माहात्म्य२३८१४७-गुह्यकुब्जिका, नवा त्वरिता तथा दूतियोंके मन्त्र एवं न्यास-पूजन आदिका वर्णन३१३
११४-गया-माहात्म्य२३८१४८-संग्राम-विजयदायक सूर्य-पूजनका वर्णन३१४
११५-गया-यात्राकी विधि२४२१४९-होमके प्रकार-भेद एवं विविध फलोंका कथन३१४
११६-गयामें श्राद्धकी विधि२४६१५०-मन्वन्तरोंका वर्णन३१५
११७-श्राद्ध-कल्प२४८१५१-वर्ण और आश्रमके सामान्य धर्म, वर्णों तथा विलोमज जातियोंके विशेष धर्म३१७
११८-भारतवर्षका वर्णन२५४१५२-गृहस्थकी जीविका३१८
११९-जम्बू आदि महाद्वीपों तथा समस्त भूमिके विस्तारका वर्णन२५५१५३-संस्कारोंका वर्णन और ब्रह्मचारीके धर्म३१८
१२०-भुवनकोश-वर्णन२५६१५४-विवाहविषयक बातें३२०
१२१-ज्योतिःशास्त्रका कथन२५९१५५-आचारका वर्णन३२१
१२२-कालगणना—पञ्चाङ्गमान-साधन२६३१५६-द्रव्य-शुद्धि३२३
१२३-युद्धजयार्णव-सम्बन्धी विविध योगोंका वर्णन२६६१५७-मरणाशौच तथा पिण्डदान एवं दाह-संस्कार-कालिक कर्तव्यका कथन३२४
१२४-युद्धजयार्णवीय ज्योतिषशास्त्रका सार२७२१५८-गर्भस्राव आदि सम्बन्धी अशौच३२६
१२५-युद्धजयार्णव-सम्बन्धी अनेक प्रकारके चक्रोंका वर्णन२७३१५९-असंस्कृत आदिकी शुद्धि३३२
१२६-नक्षत्र-सम्बन्धी पिण्डका वर्णन२७७१६०-वानप्रस्थ-आश्रम३३३
१२७-विभिन्न बलोंका वर्णन२७९१६१-संन्यासीके धर्म३३४
१२८-कोटचक्रका वर्णन२८०१६२-धर्मशास्त्रका उपदेश३३६
१२९-अर्धकाण्डका प्रतिपादन२८२१६३-श्राद्धकल्पका वर्णन३३७
१३०-विविध मण्डलोंका वर्णन२८२१६४-नवग्रह-सम्बन्धी हवनका वर्णन३४१
१३१-घातचक्र आदिका वर्णन२८३१६५-विभिन्न धर्मोंका वर्णन३४२
१३२-सेवा-चक्र आदिका निरूपण२८६१६६-वर्णाश्रम-धर्म आदिका वर्णन३४३
१३३-नाना प्रकारके बलोंका विचार२८८१६७-ग्रहोंके अयुत-लक्ष-कोटि हवनोंका वर्णन३४४
१३४-त्रैलोक्यविजया-विद्या२९११६८-महापातकोंका वर्णन३४७
१३५-संग्रामविजय-विद्या२९२१६९-ब्रह्महत्या आदि विविध पापोंके प्रायश्चित्त३४८
१३६-नक्षत्रोंके त्रिनाडी-चक्र या फणीश्वरचक्रका वर्णन२९५१७०-विभिन्न प्रायश्चित्तोंका वर्णन३५०
१३७-महामारी-विद्याका वर्णन२९५१७१-गुप्त पापोंके प्रायश्चित्तका वर्णन३५३
१३८-तन्त्रविषयक छः कर्मोंका वर्णन२९७
१३९-साठ संवत्सरोंमें मुख्य-मुख्यके नाम एवं उनके फल-भेदका कथन२९८
१४०-वश्य आदि योगोंका वर्णन२९९

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अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
१७२-समस्त पापनाशक स्तोत्र .............................३५४२०९-धनके प्रकार; देश-काल और पात्रका विचार; पात्रभेदसे दानके फल-भेद; द्रव्य-देवताओं तथा दान-विधिका कथन...........................३९४
१७३-अनेकविध प्रायश्चित्तोंका वर्णन ....................३५५२१०-सोलह महादानोंके नाम; दस मेरुदान, दस धेनुदान और विविध गोदानोंका वर्णन ........३९८
१७४-प्रायश्चित्तोंका वर्णन ...................................३५९२११-नाना प्रकारके दानोंका वर्णन ......................४००
१७५-व्रतके विषयमें अनेक ज्ञातव्य बातें .............३६०२१२-विविध काम्य-दान एवं मेरुदानोंका वर्णन ....४०३
१७६-प्रतिपदा तिथिके व्रत .................................३६४२१३-पृथ्वीदान तथा गोदानकी महिमा..................४०५
१७७-द्वितीया तिथिके व्रत ................................३६४२१४-नाड़ीचक्रका वर्णन ...................................४०६
१७८-तृतीया तिथिके व्रत .................................३६६२१५-संध्या-विधि ..........................................४०८
१७९-चतुर्थी तिथिके व्रत .................................३६८२१६-गायत्री-मन्त्रके तात्पर्यार्थका वर्णन..................४११
१८०-पञ्चमी तिथिके व्रत ..................................३६९२१७-गायत्रीसे निर्वाणकी प्राप्ति ........................४१३
१८१-षष्ठी तिथिके व्रत ....................................३६९२१८-राजाके अभिषेककी विधि ...........................४१३
१८२-सप्तमी तिथिके व्रत .................................३६९२१९-राजाके अभिषेकके समय पढ़नेयोग्य मन्त्र .....४१५
१८३-अष्टमी तिथिके व्रत .................................३७०२२०-राजाके द्वारा अपने सहायकोंकी नियुक्ति और उनसे काम लेनेका ढंग........................४१८
१८४-अष्टमी-सम्बन्धी विविध व्रत .....................३७१२२१-अनुजीवियोंका राजाके प्रति कर्तव्यका वर्णन..४१९
१८५-नवमी तिथिके व्रत ...................................३७३२२२-राजाके दुर्ग, कर्तव्य तथा साध्वी स्त्रीके धर्मका वर्णन ..........................................४२०
१८६-दशमी तिथिके व्रत ...................................३७४२२३-राष्ट्रकी रक्षा तथा प्रजासे कर लेने आदिके विषयमें विचार .........................................४२२
१८७-एकादशी तिथिके व्रत ...............................३७४२२४-अन्तःपुरके सम्बन्धमें राजाके कर्तव्य; स्त्रीकी विरक्ति और अनुरक्तिकी परीक्षा तथा सुगन्धित पदार्थोंके सेवनका प्रकार ...........................४२४
१८८-द्वादशी तिथिके व्रत .................................३७५२२५-राज-धर्म—राजपुत्र-रक्षण आदि ................४२७
१८९-श्रवणद्वादशी-व्रतका वर्णन .........................३७५२२६-पुरुषार्थकी प्रशंसा; साम आदि उपायोंका प्रयोग तथा राजाकी विविध देवरूपताका प्रतिपादन .....४२८
१९०-अखण्ड-द्वादशी-व्रतका वर्णन .....................३७७२२७-अपराधोंके अनुसार दण्डके प्रयोग...............४३०
१९१-त्रयोदशी तिथिके व्रत .................................३७७२२८-युद्ध-यात्राके सम्बन्धमें विचार....................४३४
१९२-चतुर्दशी-सम्बन्धी व्रत ...............................३७८२२९-अशुभ और शुभ स्वप्नोंका विचार ................४३५
१९३-शिवरात्रि-व्रत ........................................३७९२३०-अशुभ और शुभ शकुन.............................४३६
१९४-अशोकपूर्णिमा आदि व्रतोंका वर्णन ..............३७९२३१-शकुनके भेद तथा विभिन्न जीवोंके दर्शनसे होनेवाले शुभाशुभ फलका वर्णन .................४३७
१९५-वार-सम्बन्धी व्रतोंका वर्णन .......................३८०२३२-कौए, कुत्ते, गौ, घोड़े और हाथी आदिके द्वारा होनेवाले शुभाशुभ शकुनोंका वर्णन.......४३९
१९६-नक्षत्र-सम्बन्धी व्रत .................................३८०२३३-यात्राके मुहूर्त और द्वादश राजमण्डलका विचार...................................................४४१
१९७-दिन-सम्बन्धी व्रत...................................३८२२३४-दण्ड, उपेक्षा, माया और साम आदि नीतियोंका उपयोग.....................................४४३
१९८-मास-सम्बन्धी व्रत ...................................३८३२३५-राजाकी नित्यचर्या ..................................४४४
१९९-ऋतु, वर्ष, मास, संक्रान्ति आदि विभिन्न व्रतोंका वर्णन .........................................३८४
२००-दीप-दान-व्रतकी महिमा एवं विदर्भराज-कुमारी ललिताका उपाख्यान...................३८४
२०१-नवव्यूहार्चन ............................................३८६
२०२-देवपूजाके योग्य और अयोग्य पुष्प .............३८७
२०३-नरकोंका वर्णन .........................................३८८
२०४-मासोपवास व्रत .......................................३८९
२०५-भीष्मपञ्चकव्रत ........................................३९१
२०६-अगस्त्यके उद्देश्यसे अर्घ्यदान एवं उनके पूजनका कथन.........................................३९१
२०७-कौमुद-व्रत .............................................३९३
२०८-व्रतदानसमुच्चय........................................३९४

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अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
२३६-संग्राम-दीक्षा—युद्धके समय पालन करनेयोग्य नियमोंका वर्णन४४५विक्रय, दत्ताप्रदानिक, क्रीतानुशय, अभ्युपेत्या-शुश्रूषा, संविद्व्यतिक्रम, वेतनादान तथा द्यूत-समाह्वयका विचार५०६
२३७-लक्ष्मीस्तोत्र और उसका फल४४९२५८-व्यवहारके वाक्पारुष्य, दण्डपारुष्य, साहस, विक्रीयासम्प्रदान, सम्भूय-समुत्थान, स्तेय, स्त्री-संग्रहण तथा प्रकीर्णक—इन विवादास्पद विषयोंपर विचार५१२
२३८-श्रीरामके द्वारा उपदिष्ट राजनीति४५१२५९-ऋग्विधान—विविध कामनाओंकी सिद्धिके लिये प्रयुक्त होनेवाले ऋग्वेदीय मन्त्रोंका निर्देश..५२१
२३९-श्रीरामकी राजनीति४५३२६०-यजुर्विधान—यजुर्वेदके विभिन्न मन्त्रोंका विभिन्न कार्योंके लिये प्रयोग५२६
२४०-द्वादशराजमण्डल-चिन्तन४५८२६१-सामविधान—सामवेदोक्त मन्त्रोंका भिन्न-भिन्न कार्योंके लिये प्रयोग५३१
२४१-मन्त्रविकल्प४६३२६२-अथर्वविधान—अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंका विभिन्न कर्मोंमें विनियोग५३२
२४२-सेनाके छः भेद, इनका बलाबल तथा छः अङ्ग४६८२६३-नाना प्रकारके उत्पात और उनकी शान्तिके उपाय५३४
२४३-पुरुष-लक्षण वर्णन४७५२६४-देवपूजा तथा वैश्वदेव-बलि आदिका वर्णन५३५
२४४-स्त्रीके लक्षण४७६२६५-दिक्पालस्नानकी विधिका वर्णन५३८
२४५-चामर, धनुष, बाण तथा खड्गके लक्षण४७७२६६-विनायक-स्नानविधि५३९
२४६-रत्न-परीक्षण४७८२६७-माहेश्वर-स्नान आदि विविध स्नानोंका वर्णन; भगवान् विष्णुके पूजनसे तथा गायत्रीमन्त्रद्वारा लक्ष-होमादिसे शान्तिकी प्राप्तिका कथन५४१
२४७-गृहके योग्य भूमि; चतुःषष्टिपद वास्तुमण्डल और वृक्षारोपणका वर्णन४७९२६८-सांवत्सर-कर्म; इन्द्र-शचीकी पूजा एवं प्रार्थना; राजाके द्वारा भद्रकाली तथा अन्यान्य देवताओंके पूजनकी विधि; वाहन आदिका पूजन तथा नीराजना५४२
२४८-विष्णु आदिके पूजनमें उपयोगी पुष्पोंका कथन४८०२६९-छत्र, अश्व, ध्वजा, गज, पताका, खड्ग, कवच और दुन्दुभिकी प्रार्थनाके मन्त्र५४४
२४९-धनुर्वेदका वर्णन—युद्ध और अस्त्रके भेद, आठ प्रकारके स्थान, धनुष, बाणको ग्रहण करने और छोड़नेकी विधि आदिका कथन४८१२७०-विष्णुपञ्जरस्तोत्रका कथन५४६
२५०-लक्ष्यवेधके लिये धनुष-बाण लेने और उनके समुचित प्रयोग करनेकी शिक्षा तथा वेध्यके विविध भेदोंका वर्णन४८४२७१-वेदोंके मन्त्र और शाखा आदिका वर्णन तथा वेदोंकी महिमा५४७
२५१-पाशके निर्माण और प्रयोगकी विधि तथा तलवार और लाठीको अपने पास रखने एवं शत्रुपर चलानेकी उपयुक्त पद्धतिका निर्देश४८६२७२-विभिन्न पुराणोंके दान तथा महाभारत-श्रवणमें दान-पूजन आदिका माहात्म्य५४८
२५२-तलवारके बत्तीस हाथ, पाश, चक्र, शूल, तोमर, गदा, परशु, मुद्गर, भिन्दिपाल, वज्र, कृपाण, क्षेपणी, गदायुद्ध तथा मल्लयुद्धके दाँव और पैंतरोंका वर्णन४८७२७३-सूर्यवंशका वर्णन५५०
२५३-व्यवहारशास्त्र तथा विविध व्यवहारोंका वर्णन४८८२७४-सोमवंशका वर्णन५५३
२५४-ऋणादान तथा उपनिधि-सम्बन्धी विचार४९४२७५-यदुवंशका वर्णन५५४
२५५-साक्षी, लेखा तथा दिव्यप्रमाणोंके विषयमें विवेचन४९८२७६-श्रीकृष्णकी पत्नियों तथा पुत्रोंके संक्षेपसे नाम-निर्देश तथा द्वादश संग्रामोंका संक्षिप्त परिचय५५६
२५६-पैतृक धनके अधिकारी; पत्नियोंका धनाधिकार; पितामहके धनके अधिकारी; विभाज्य और अविभाज्य धन; वर्णक्रमसे पुत्रोंके धनाधिकार; बारह प्रकारके पुत्र और उनके अधिकार; पत्नी-पुत्री आदिके, संसृष्टीके धनका विभाग; क्लीब आदिका अनधिकार; स्त्रीधन तथा उसका विभाग५०२२७७-तुर्वसु आदि राजाओंके वंशका तथा अङ्ग-वंशका वर्णन५५८
२५७-सीमा-विवाद, स्वामिपाल-विवाद, अस्स्वामि-

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अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
२७८-पुरूवंशका वर्णन५५९३१५-स्तम्भन आदिके मन्त्रोंका कथन६४९
२७९-सिद्ध ओषधियोंका वर्णन५६१३१६-त्वरिता आदि विविध मन्त्र एवं कुब्जिका-विद्याका कथन६५१
२८०-सर्वरोगहर औषधोंका वर्णन५६४
२८१-रस आदिके लक्षण५६७३१७-सकलादि मन्त्रोंके उद्धारका क्रम६५१
२८२-आयुर्वेदरोक्त वृक्ष-विज्ञान५६९३१८-अन्तःस्थ, कण्ठोष्ठ तथा शिवस्वरूप मन्त्रका वर्णन; अघोरास्त्र-मन्त्रका उद्धार, ‘विघ्नमर्द’ नामक मण्डल तथा गणपति-पूजनकी विधि६५४
२८३-नाना रोगनाशक ओषधियोंका वर्णन५७०
२८४-मन्त्ररूप औषधोंका कथन५७३
२८५-मृतसंजीवनकारक सिद्ध योगोंका कथन५७४३१९-वागीश्वरीकी पूजा एवं मन्त्र आदि६५६
२८६-मृत्युंजय योगोंका वर्णन५७८३२०-सर्वतोभद्र आदि मण्डलोंका वर्णन६५७
२८७-गज-चिकित्सा५८०३२१-अघोरास्त्र आदि शान्ति-विधानका कथन६५९
२८८-अश्ववाहन-सार५८२३२२-पाशुपतास्त्र-मन्त्रद्वारा शान्तिका कथन६६०
२८९-अश्व-चिकित्सा५८५३२३-गङ्गा-मन्त्र, शिवमन्त्रराज, चण्डकपालिनी-मन्त्र, क्षेत्रपाल-बीजमन्त्र, सिद्धविद्या, महामृत्युंजय, मृतसंजीवनी, ईशानादि मन्त्र तथा इनके छः अङ्ग एवं अघोरास्त्रका कथन६६२
२९०-अश्व-शान्ति५८८
२९१-गज-शान्ति५८९
२९२-गवायुर्वेद५९०
२९३-मन्त्र-विद्या५९२३२४-कल्पाघोर रुद्रशान्ति६६४
२९४-नाग-लक्षण५९९३२५-रुद्राक्ष-धारण, मन्त्रोंकी सिद्धादि संज्ञा तथा अंश आदिका विचार६६६
२९५-दष्ट-चिकित्सा६०३
२९६-पञ्चाङ्ग-रुद्रविधान६०६३२६-गौरी आदि देवियों तथा मृत्युंजयकी पूजाका विधान६६८
२९७-विषहारी मन्त्र तथा औषध६०७
२९८-गोनसादि-चिकित्सा६०८३२७-विभिन्न कर्मोंमें उपयुक्त माला, अनेकानेक मन्त्र, लिङ्ग-पूजा तथा देवालयकी महत्ताका विचार६६९
२९९-बालादिग्रहहर बालतन्त्र६१०
३००-ग्रहबाधा एवं रोगोंको हरनेवाले मन्त्र तथा औषध आदिका कथन६१३
३२८-छन्दोंके गण और गुरु-लघुकी व्यवस्था६७०
३०१-सिद्धि-गणपति आदि मन्त्र तथा सूर्यदेवकी आराधना६१६३२९-गायत्री आदि छन्दोंका वर्णन६७१
३३०-‘गायत्री’ से लेकर ‘जगती’ तक छन्दोंके भेद तथा उनके देवता, स्वर, वर्ण और गोत्रका वर्णन६७१
३०२-नाना प्रकारके मन्त्र और औषधोंका वर्णन६१९
३०३-अष्टाक्षर मन्त्र तथा उसकी न्यासादि-विधि६२०
३०४-पञ्चाक्षर-दीक्षा-विधान; पूजाके मन्त्र६२२३३१-उत्कृति आदि छन्द, गण-छन्द और मात्रा-छन्दोंका निरूपण६७६
३०५-पचपन विष्णुनाम६२६
३०६-श्रीनरसिंह आदिके मन्त्र६२७३३२-विषमवृत्तका वर्णन६८२
३०७-त्रैलोक्यमोहन आदि मन्त्र६२९३३३-अर्धसमवृत्तोंका वर्णन६८५
३०८-त्रैलोक्यमोहिनी लक्ष्मी एवं भगवती दुर्गाके मन्त्रोंका कथन६३१३३४-समवृत्तका वर्णन६८६
३३५-प्रस्तार-निरूपण६९३
३०९-त्वरिता-पूजा६३४३३६-शिक्षानिरूपण६९७
३१०-अपरतत्वरिता-मन्त्र एवं मुद्रा आदिका वर्णन६३६३३७-काव्य आदिके लक्षण६९९
३११-त्वरिता-मन्त्रके दीक्षा-ग्रहणकी विधि६३९३३८-नाटक-निरूपण७०३
३१२-त्वरिता-विद्यासे प्राप्त होनेवाली सिद्धियोंका वर्णन६४१३३९-शृङ्गारादि रस, भाव तथा नायक आदिका निरूपण७०५
३१३-नाना मन्त्रोंका वर्णन६४३३४०-रीति-निरूपण७०८
३१४-त्वरिताके पूजन तथा प्रयोगका विज्ञान६४६३४१-नृत्य आदिमें उपयोगी आङ्गिक कर्म७०९

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अध्याय विषयपृष्ठ-संख्याअध्याय विषयपृष्ठ-संख्या
३४२- अभिनय और अलंकारोंका निरूपण .........७११३६६- क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ग ......................८०३
३४३- शब्दालंकारोंका विवरण ..........................७१४३६७- सामान्य नाम-लिङ्ग .................................८०७
३४४- अर्थालंकारोंका निरूपण ..........................७२०३६८- नित्य, नैमित्तिक और प्राकृत प्रलयका वर्णन .....८१०
३४५- शब्दार्थोभयालंकार .................................७२५३६९- आत्यन्तिक प्रलय एवं गर्भकी उत्पत्तिका
३४६- काव्यगुण-विवेक .................................७२७वर्णन ..................................................८११
३४७- काव्यदोष-विवेक .................................७३०३७०- शरीरके अवयव .....................................८१४
३४८- एकाक्षरकोष ........................................७३२३७१- प्राणियोंकी मृत्यु, नरक तथा पापमूलक
३४९- व्याकरण-सार .......................................७३४जन्मका वर्णन .......................................८१६
३५०- संधिके सिद्ध रूप ...................................७३५३७२- यम और नियमोंकी व्याख्या; प्रणवकी महिमा
३५१- सुबन्त-सिद्ध रूप ...................................७३९तथा भगवत्पूजनका माहात्म्य .....................८१९
३५२- स्त्रीलिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूप ......................७५३३७३- आसन, प्राणायाम और प्रत्याहारका
३५३- नपुंसकलिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूप .................७५५वर्णन ..................................................८२१
३५४- कारक-प्रकरण ...................................७५६३७४- ध्यान .................................................८२२
३५५- समास-निरूपण ...................................७६१३७५- धारणा ...............................................८२४
३५६- त्रिविध तद्धित-प्रत्यय .............................७६३३७६- समाधि ..............................................८२६
३५७- उणादिसिद्ध शब्दरूपोंका दिग्दर्शन ................७७१३७७- श्रवण एवं मननरूप ज्ञान .........................८२८
३५८- तिङ्‌विभक्त्यन्त-सिद्ध रूपोंका वर्णन ............७७५३७८- निदिध्यासनरूप ज्ञान ..............................८३०
३५९- कृदन्त शब्दोंके सिद्ध रूप .........................७७९३७९- भगवत्स्वरूपका वर्णन तथा ब्रह्मभावकी
३६०- स्वर्ग-पाताल आदि वर्ग ............................७८१प्राप्तिका उपाय .......................................८३१
३६१- अव्यय-वर्ग .........................................७८८३८०- जडभरत और सौवीर-नरेशका संवाद-अद्वैत
३६२- नानार्थ-वर्ग ..........................................७९१ब्रह्मविज्ञानका वर्णन .................................८३३
३६३- भूमि, वनौषधि आदि वर्ग ..........................७९४३८१- गीता-सार ............................................८३७
३६४- मनुष्य-वर्ग ..........................................७९९३८२- यमगीता ..............................................८४१
३६५- ब्रह्म-वर्ग .............................................८०२३८३- अग्निपुराणका माहात्म्य ............................८४३

चित्र-सूची

सादे

चित्रपृष्ठचित्रपृष्ठ
१- वक्ता व्यास, श्रोता सूत ....................................१२- भगवान् ब्रह्मा ..........................................२४०
२- वक्ता वसिष्ठ, श्रोता व्यास-शुकदेव ........................१३- अष्टभुज विष्णु ..........................................२४०
३- वक्ता अग्निदेव, श्रोता वसिष्ठ ..............................१४- त्रैलोक्यमोहन श्रीहरि .................................२४०
४- वक्ता नारद, श्रोता वाल्मीकि ..............................१५- विश्वरूप विष्णु ..........................................२४०
५- हरि हर भगवान् .........................................१०११६- श्रीलक्ष्मीजी .............................................३५७
६- स्कन्दस्वामी ..............................................१०११७- श्रीसरस्वतीजी ..........................................३५७
७- चण्डी-बीसभुजा ........................................१०११८- श्रीगङ्गाजी ...............................................३५७
८- दुर्गा-अठारहभुजा .......................................१०११९- श्रीयमुनाजी .............................................३५७
९- संध्यादेवी-प्रातःकाल ...................................१४०इनके अतिरिक्त पञ्चशलाका-वेध, राहुचक्र, सर्पाकार
१०- संध्यादेवी-मध्याह्न ...................................१४०राहु, नरचक्र, रक्षायन्त्र-रेखाचित्र तथा कई चक्र-सम्बन्धी
११- संध्यादेवी-सायंकाल ..................................१४०कोष्ठक लेखोंके बीच-बीचमें दिये गये हैं।

अग्निपुराणका संक्षिप्त परिचय

भारतीय जीवन-संस्कृतिके मूलाधार 'वेद' हैं। वेद भगवान्के स्वाभाविक उच्छ्वास हैं, अतः वे भगवत्स्वरूप ही हैं। श्रुत ब्रह्मवाणीका संरक्षण परम्परासे ऋषियोंद्वारा होता रहा, इसीलिये इसे 'श्रुति' कहते हैं। भगवदीय वाणी वेदोंके सत्यको समझनेके लिये षडङ्ग, अर्थात् शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छन्द, निरुक्त और ज्योतिषका अध्ययन आवश्यक था। परंतु जन-साधारणके लिये यह भी सहज सम्भव न होनेसे पुराणोंका कथोपकथन आरम्भ हुआ, जिससे वैदिक सत्य रोचक ऐतिहासिक आख्यायिकाओंद्वारा जन-जनतक पहुँच सके। इसीलिये कहा जाता है कि पुराणोंका कथोपकथन उतना ही प्राचीन है, जितना वैदिक ऋचाओंका संकलन और वंशानुवंश-संरक्षण। अध्ययनकी पाश्चात्त्य विश्लेषण-विवेचन-पद्धतिको सर्वोपरि मानकर पुराणोंको ईसा-जन्मके आस-पास अथवा उसके बादका ठहराना सर्वथा भ्रान्त तथा अनुचित है। भारतके आदिकालमें समाजका प्रतिभासम्पन्न समुदाय जिस प्रकार वेदोंके अध्ययन-अध्यापन-निर्वचनमें निमग्न रहा, उसी प्रकार उसी कालमें समाजके साधारण समुदायको धर्ममें लगाये रखनेके लिये पुराणोंका कथन-श्रवण-प्रवचन होता रहा। शतपथब्राह्मण (१४।२।४।१०)-में आया है कि 'चारों वेद, इतिहास, पुराण—ये सब महान् परमात्माके ही निःश्वास हैं।' अथर्ववेद (११।७।२४)-में आया है—'यज्ञसे यजुर्वेदके साथ ऋक्, साम, छन्द और पुराण उत्पन्न हुए।'

जो पुरातन आख्यान ऋषियोंकी स्मृतियोंमें सुरक्षित थे और जो वंशानुवंश ऋषि-कण्ठोंसे कीर्तित थे, उन्हींका संकलन और विभागीकरण भगवान् वेदव्यासद्वारा हुआ। उन आख्यायिकाओंको व्यवस्थित करके प्रकाशमें लानेका श्रेय भगवान् वेदव्यासको है, इसी कारण वे पुराणोंके प्रणेता कहलाये; अन्यथा पुराण भी वेदोंकी भाँति ही अनादि, अपौरुषेय एवं प्रामाणिक हैं।

भगवान् वेदव्यासद्वारा प्रणीत अठारह महापुराणोंमें अग्निपुराणका एक विशेष स्थान है। विष्णुस्वरूप भगवान् अग्निदेवद्वारा महर्षि वसिष्ठजीके प्रति उपदिष्ट यह अग्निपुराण ब्रह्मस्वरूप है, सर्वोत्कृष्ट है तथा वेदतुल्य है। देवताओंके लिये सुखद और विद्याओंका सार है। इस दिव्य पुराणके पठन-श्रवणसे भोग-मोक्षकी प्राप्ति होती है।

पुराणोंके पाँच लक्षण बताये गये हैं— १. सृष्टि-उत्पत्ति-वर्णन, २. सृष्टि-विलय-वर्णन, ३. वंश-परम्परा-वर्णन, ४. मन्वन्तर-वर्णन और ५. विशिष्ट-व्यक्ति-चरित्र-वर्णन। पुराणके पाँचों लक्षण तो अग्निपुराणमें घटित होते ही हैं, इनके अतिरिक्त वर्ण्य-विषय इतने विस्तृत हैं कि अग्निपुराणको 'विश्वकोष' कहा जाता है। मानवके लौकिक, पारलौकिक और पारमार्थिक हितके लगभग सभी विषयोंका वर्णन अग्निपुराणमें मिलता है। प्राचीनकालमें न तो मुद्रणकी प्रथा थी और न ग्रन्थ ही सहज सुलभ होते थे। ऐसी परिस्थितिमें विविध विषयोंके महत्त्वपूर्ण विवेचनका एक ही स्थानपर एक साथ मिल जाना, यह एक बहुत बड़ी बात थी। इसी कारण अग्निपुराण बहुत जनप्रिय और विद्वद्वर्ग-समादृत रहा।

सम्पूर्ण सृष्टिके कारण भगवान् विष्णु हैं, अतः अग्निपुराणमें भगवान्के विविध अवतारोंका संक्षिप्त वर्णन किया गया है। भगवान् विष्णु ही मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण और बुद्धके रूपमें अवतरित हुए

१२ * अग्निपुराण *

तथा कल्कि के रूपमें अवतरित होंगे। भगवान्‌के अवतारोंकी संख्या निश्चित नहीं है; परंतु सभी अवतारोंका हेतु यही है कि सभी वर्ण और आश्रमके लोग अपने-अपने धर्ममें दृढ़तापूर्वक लगे रहें। जगत्‌की सृष्टिके आदिकारण श्रीहरि अवतार लेकर धर्मकी व्यवस्था और अधर्मका निराकरण ही करते हैं।

भगवान् विष्णुसे ही जगत्‌की सृष्टि हुई। प्रकृतिमें भगवान् विष्णुने प्रवेश किया। क्षुब्ध प्रकृतिसे महत्तत्त्व, फिर अहंकार उत्पन्न हुआ। फिर अनेक लोकोंका प्रादुर्भाव हुआ, जहाँ स्वायम्भुव मनुके वंशज एवं कश्यप आदिके वंशज परिव्याप्त हो गये। भगवान् विष्णु आदिदेव हैं और सर्वपूज्य हैं। प्रत्येक साधकको आत्मकल्याणके लिये विधिपूर्वक भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये। भगवान्‌की पूजाका विधान क्या है, पूजाके अधिकारकी प्राप्ति किस प्रकार हो सकती है, यज्ञके लिये कुण्डका निर्माण एवं अग्निकी स्थापना किस तरह की जाय, शिष्यद्वारा आचार्यके अभिषेकका विधान क्या है तथा भगवान्‌का पूजन एवं हवन किस प्रकार सम्पन्न किया जाय, इसका विस्तृत वर्णन अग्निपुराणमें है। मन्त्र एवं विधिसहित पूजन-हवन करनेवाला अपने पितरोंका उद्धारक एवं मोक्षका अधिकारी होता है।

देव-पूजनके समान महत्त्व ही देवालय-निर्माणका है। देवालय-निर्माण अनेक जन्मके पापोंको नष्ट कर देता है। निर्माण-कार्यके अनुमोदनमात्रसे ही विष्णुधामकी प्राप्तिका अधिकार मिल जाता है। कनिष्ठ, मध्य और श्रेष्ठ—इन तीन श्रेणीके देवालयोंके पाँच भेद अग्निपुराणमें बताये गये हैं—१. एकायतन २. त्र्याायतन, ३. पञ्चायतन, ४. अष्टायतन तथा ५. षोडशायतन। मन्दिरोंका जीर्णोद्धार करनेवालेको देवालय-निर्माणसे दूना फल मिलता है। अग्निपुराणमें विस्तारसे बताया गया है कि श्रेष्ठ देव-प्रासादके लक्षण क्या हैं।

देवालयमें किस प्रकारकी देव-प्रतिमा स्थापित की जाय, इसका बड़ा सूक्ष्म, एवं अत्यन्त विस्तृत वर्णन इसमें है। शालग्रामशिला अनेक प्रकारकी होती है। द्विचक्र एवं श्वेतवर्ण शिला 'वासुदेव' कहलाती है, कृष्णकान्ति एवं दीर्घ छिद्रयुक्त 'नारायण' कहलाती है। इसी प्रकार इसमें संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, परमेष्ठी, विष्णु, नृसिंह, वाराह, कूर्म, श्रीधर आदि अनेक प्रकारकी शालग्राम-शिलाओंका विशद वर्णन है। देवालयमें प्रतिष्ठित करनेके लिये भगवान् वासुदेवकी, दशावतारोंकी, चण्डी, दुर्गा, गणेश, स्कन्द आदि देवी-देवताओंकी, सूर्यकी, ग्रहोंकी, दिक्पाल, योगिनी एवं शिवलिङ्ग आदिकी प्रतिमाओंके श्रेष्ठ लक्षणोंका वर्णन है। देवालयमें श्रेष्ठ लक्षणोंसे सम्पन्न श्रीविग्रहोंकी स्थापना सभी प्रकारके मङ्गलोंका विधान करती है। अग्निपुराणोक्त विधिके अनुसार देवालयमें देव-प्रतिमाकी स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा करानेसे परम पुण्य होता है। श्रेष्ठ साधकके लिये यही उचित है कि अत्यन्त जीर्ण, अङ्गहीन, भग्न तथा शिलामात्रावशिष्ट (विशेष चिह्नोंसे रहित) देव-प्रतिमाका उत्सवसहित विसर्जन करे और देवालयमें नवीन मूर्तिका न्यास करे। जो देवालयके साथ अथवा उससे अलग कूप, वापी, तड़ागका निर्माण करवाता या वृक्षारोपण करता है, वह भी बहुत पुण्यका लाभ करता है।

भारतवर्षमें पञ्चदेवोपासना अति प्राचीन है। गणेश, शिव, शक्ति, विष्णु और सूर्य—ये पाँचों देव आदिदेव भगवान्‌की ही पाँच अभिव्यक्तियाँ हैं; परंतु सब तत्त्वतः एक ही हैं। गणपति-पूजन, सूर्य-पूजन, शिव-पूजन, देवी-पूजन और विष्णु-

  • अग्निपुराणका संक्षिप्त परिचय * १३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

पूजनके महत्त्वका भी अग्निपुराणमें स्थान-स्थानपर प्रतिपादन हुआ है।

साधनाके क्षेत्रमें श्रेष्ठ गुरु, श्रेष्ठ मन्त्र, श्रेष्ठ शिष्य और सम्यक् दीक्षाका बड़ा महत्त्व है। जिससे शिष्यमें ज्ञानकी अभिव्यक्ति करायी जाय, उसीका नाम 'दीक्षा' है। पाशमुक्त होनेके लिये जीवको आचार्यसे मन्त्राराधनकी दीक्षा लेनी चाहिये। सविधि दीक्षित शिष्यको शिवत्वकी प्राप्ति शीघ्र होती है।

जहाँ भक्त-मन-वाञ्छा-कल्पतरु भगवान्‌के सिद्ध श्रीविग्रहोंके देवालय हैं, अथवा जहाँ सर्वलोकवन्दनीय श्रीहरिके प्रीत्यर्थ ऋषि-मुनियोंने कठिन साधना की है, वही भूमि 'तीर्थ' कहलाती है, जिसके सेवनसे भोग-मोक्षकी प्राप्ति होती है। तीर्थ-सेवनका फल सबको समान नहीं होता। जिसके हाथ, पैर और मन संयमित हैं तथा जो जितेन्द्रिय, लघ्वाहारी, अप्रतिग्रही, निष्पाप है, उसी तीर्थयात्रीको तीर्थ-सेवनका यथार्थ फल मिलता है। ऐसे तीर्थयात्रीको पुष्कर, कुरुक्षेत्र, काशी, प्रयाग, गया आदि तीर्थोंका सेवन करना चाहिये। गयातीर्थमें शास्त्रोक्त विधिसे श्राद्ध करनेपर नरकस्थ पितर स्वर्गके अधिकारी और स्वर्गस्थ पितर परमपदके अधिकारी होते हैं।

काम-क्रोधग्रस्त मानवद्वारा नहीं चाहते हुए भी अज्ञानवश बलात् पापाचरण हो जाता है। पातक तो अनेक प्रकारके हैं; पर कभी-कभी ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी और गुरुतल्पगमन-जैसे महापातक भी घटित हो जाते हैं। इन पातकोंसे विमुक्तिका उपाय प्रायश्चित्त है। पातक, उपपातक, महापातकके परिशमनार्थ अनेक प्रकारके प्रायश्चित्तका निर्देश किया गया है। यदि कुछ भी न हो सके तो भगवान् विष्णुकी स्तुति करे। भगवान् विष्णुके समस्त पापनाशक स्तोत्रके आश्रयसे समस्त पातक विनष्ट हो जाते हैं।

आत्मशुद्धि तथा शरीर-शुद्धिका एक महान् साधन 'व्रत' भी है। शास्त्रोक्त नियमको ही 'व्रत' कहते हैं। इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह आदि विशेष नियम व्रतके ही अङ्ग हैं। व्रत करनेवालेको किंचित् कष्ट सहन करना पड़ता है, अतः इसे 'तप' भी कहते हैं। क्षमा, सत्य, दया, दान, शौच, इन्द्रियसंयम, देवपूजा, अग्निहोत्र, संतोष तथा चोरीका अभाव-ये दस नियम सामान्यतः सम्पूर्ण व्रतोंमें आवश्यक माने गये हैं। भगवान् अग्निदेवने महर्षि वसिष्ठको तिथि, वार, नक्षत्र, दिवस, मास, ऋतु, वर्ष, संक्रान्ति आदिके अवसरपर होनेवाले स्त्री-पुरुष-सम्बन्धी व्रत बताये हैं, जिनसे आत्यन्तिक कल्याणका सम्पादन होता है।

ग्रहों और नक्षत्रोंकी स्थिति भी मानवकी सफलता-असफलताको प्रभावित करती तथा शुभ-अशुभका विधान करती है। इसी कारण ज्योतिषशास्त्रका संक्षेपमें भगवान् अग्निदेवने सुन्दर उपदेश दिया, जिससे शुभ-अशुभका निर्णय करनेवाले विवेककी प्राप्ति हो सके। वर-वधूके गुण, विवाहादि संस्कारोंके मुहूर्तका निर्णय, 'काल' को समझनेके लिये गणित, युद्धमें विजय-प्राप्तिके लिये विविध योग, शत्रुके वशीकरणके लिये शान्ति, वशीकरण आदि षट् तान्त्रिक कर्म, ग्रहण-दान और ग्रहोंकी महादशा आदिका सूक्ष्मतापूर्वक विचार किया गया है। इस विवेचनमें ज्योतिषशास्त्रकी प्रायः उपयोगी बातें समाविष्ट हो गयी हैं।

व्यष्टि और समष्टिके हितके लिये अपने-अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार व्यक्तिमात्रके लिये स्वधर्म-पालन आवश्यक है। स्वधर्म-पालन ही सुख-शान्ति तथा मोक्षकी सीढ़ी है। यज्ञ करना-कराना, वेद पढ़ना-पढ़ाना और स्वाध्याय ब्राह्मणके कर्म हैं। दान देना, वेदाध्ययन

१४ * अग्निपुराण *


करना, यज्ञानुष्ठान करना क्षत्रिय-वैश्यके सामान्य धर्म हैं। प्रजा-पालन और दुष्टदमन क्षत्रियके तथा कृषि-गोरक्षा-व्यापार वैश्यके धर्म हैं। सेवा एवं शिल्परचना शूद्रका धर्म है। ब्रह्मचर्याश्रम मानवके पवित्र जीवन-प्रासादके लिये ‘नींवका पत्थर’ है। अन्तेवासीको आजके विद्यार्थियों-जैसा विलास-प्रमादपूर्ण जीवन नहीं, कठोर संयमित-नियमित-अनुशासित जीवन व्यतीत करनेकी आवश्यकता है, जिससे वह वैयक्तिक और सामाजिक धर्मोंके पालनकी क्षमता प्राप्त कर सके। विवाहके उपरान्त गृहस्थाश्रमकी सम्पूर्ण दिनचर्याका उल्लेख करते हुए यह बताया गया है कि गृही नित्य देवाराधन, द्रव्य-शुद्धि, शौचाशौच-विचार एवं शुद्ध आचरणद्वारा किस प्रकार आत्मकल्याण और समाजकल्याणका सम्पादन करे। सद्गृहस्थके लिये तो यहाँतक कहा गया है कि ‘श्री और समृद्धिके लिये गाय, चूल्हा, चाकी, ओखली, मूसल, झाडू एवं खंभेका भी पूजन करे।’ पौत्रके जन्मके बाद गृहस्थको वानप्रस्थ धारण करके पत्नीसहित तपःपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिये। संन्यासीका जीवन तो त्यागका मूर्तिमान् स्वरूप है। संन्यासी शरीरके प्रति उपेक्षाभाव रखता हुआ एकाकी विचरता है और मननशील रहता है। कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस—इन चार प्रकारके संन्यासियोंमें अन्तिम सर्वश्रेष्ठ है, जो नित्य ब्रह्ममें स्थित है।

वास्तु-विद्याका भी अग्निपुराणमें यत्र-तत्र प्रभूत वर्णन है। भूमिके विस्तारका दिग्दर्शन कराते हुए विभिन्न द्वीप तथा देशोंका वर्णन किया गया है। रहनेके लिये गृह-निर्माण कैसे हो, फिर नगर-निर्माणकी योजना कैसी हो—इसे भी युक्तिपूर्वक समझाया गया है। गृह-निर्माण और नगर-निर्माणके साथ देव-प्रतिमा और देवालय-निर्माणका भी विस्तृत विवरण है। नगर, ग्राम तथा दुर्गमें गृहों तथा प्रासादोंकी वृद्धि हो, इसकी सिद्धिके लिये ८१ पदोंका वास्तुमण्डल बनाकर वास्तु-देवताकी पूजा अवश्य करनी चाहिये।

पूजामें पुष्पोंका विशेष स्थान है। देव-पूजनमें मालती, तमाल, पाटल, पद्म आदि विभिन्न पुष्पोंके विभिन्न फल होते हैं; परंतु देवपूजनके लिये श्रेष्ठ पुष्प हैं—अहिंसा, इन्द्रियनिग्रह, दया, शम, तप, सत्य आदि। इन भाव-पुष्पोंसे अर्चित श्रीहरि शीघ्र संतुष्ट होते हैं। भाव-पुष्पोंसे अर्चना करनेवालेको नरक-यातना नहीं सहनी पड़ती; अन्यथा पापाचारीको अवीचि, ताम्र, रौरव, तामिस्र आदि नरकोंके कष्ट भोगने पड़ते हैं। पुण्यात्माको स्वर्गकी प्राप्ति होती है। विशेष पर्वपर, विशेष तीर्थमें, विशेष तिथिमें दानका अलग-अलग फल होता है। दानसे मोक्षतककी प्राप्ति हो सकती है; परंतु फलकी कामनासे दिया गया दान मोक्षकी प्राप्ति न करवाकर व्यर्थ चला जाता है। गायत्री-मन्त्रकी व्याख्या करते हुए भगवान् अग्निदेवने बताया है कि जो लोग भगवती गायत्रीका एवं गायत्री-मन्त्रका आश्रय लेते हैं, उनके शरीर और प्राण दोनोंकी रक्षा होती है।’

राज्यमें सुख-शान्ति बनाये रखनेके लिये राजाको अपने धर्मका भलीभाँति पालन करना चाहिये। शत्रुसूदन, प्रजापालक, सुदण्डधारी, संयमी, रण-कलाविद्, न्यायप्रिय, दुर्ग-रक्षित, नीतिकुशल राजा ही अपने धर्मका पालन कर सकता है। जो राजा धनुर्वेदके शिक्षण-प्रशिक्षणकी पूर्ण व्यवस्था रखता है और जो लोक-व्यवहारमें परम कुशल है, उसका पराभव नहीं होता।

स्वप्न और शकुनका भी जीवनपर शुभ और अशुभ प्रभाव पड़ता है। सभी स्वप्न और शकुन प्रभावशाली नहीं होते; पर जिनसे अशुभ होता है, उनके निवारणका उपाय भी बताया गया है। शुभ-लक्षणसम्पन्न स्त्री या पुरुषकी संगति सदा

* अग्निपुराणका संक्षिप्त परिचय * १५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

कल्याणकारी होती है; अतः इनके लक्षणोंका भी विस्तृत वर्णन है। जीवन श्रीयुक्त रहे, अतः हीरा, मोती, प्रवाल, शङ्ख आदि रत्नोंको परीक्षाके उपरान्त ही धारण करना चाहिये, जिससे शुभका विधान हो।

भगवान् अग्निदेवने चारों वेदोंकी सभी शाखाओंका विस्तृत वर्णन करके चारों वेदोंकी विभिन्न ऋचाओं या सूक्तोंके सहित पाठ, जप-हवन करनेका विधान बताया, जिससे भुक्ति-मुक्तिकामी पुरुषको अभीष्टकी प्राप्ति तथा सभी उत्पातोंकी शान्ति होती है। जैसे ऋग्वेदके ‘अग्निमीळे पुरोहितम्’—इस सूक्तका सविधि जप करनेसे इष्टकामनाओंकी पूर्ति होती है। भगवान् अग्निदेवने सूर्य, चन्द्र, यदु, पूरु आदि अनेक वंशोंका वर्णन किया, जिनका चरित्र सुननेसे पापोंका क्षय होता है। यदुवंशमें भगवान् श्रीकृष्णका अवतार धर्म-संरक्षण, अधर्म-नाश, सुर-पालन और दैत्य-मर्दनके लिये ही हुआ था—

देवक्यां वसुदेवात्तु कृष्णोऽभूत्तपसान्वितः॥
धर्मसंरक्षणार्थाय ह्याधर्महरणाय च।
सुरादेः पालनार्थं च दैत्यादेर्मथनाय च॥

<p align="right">(अग्निपुराण २७६। १-२)</p>

स्वास्थ्य-रक्षा-सम्बन्धी ज्ञान भी मनुष्यके लिये आवश्यक है। अतः स्वास्थ्यके सिद्धान्त, रोगके भेद एवं कारण, ओषधिका विवेचन, वैद्यका कर्तव्य, उपचारके उपाय, शरीरके अवयव, गज और अश्वकी चिकित्सा आदिका वर्णन करते हुए आयुर्वेदका ज्ञान कराया गया है, जो मृतको भी प्राण-प्रदाता है। अनिष्ट-निवारण मन्त्रोंके प्रयोगोंद्वारा भी होता है, अतः मन्त्र-तन्त्रकी परिभाषा और भेद-प्रभेद बताकर शिव, सूर्य, गणपति, लक्ष्मी, गौरी आदि देवी-देवताओंके अनेक मन्त्र और मण्डल बताये गये हैं, जिनको सिद्ध करके प्रयोग करनेसे विष-शमन, बालग्रह आदिका निवारण होता है।

समाजमें उसका बड़ा आदर होता है, जिसकी वाणीमें रस है, जिसमें अभिव्यक्तिकी कुशलता है और जिसमें प्रस्तुतीकरणकी क्षमता है। अतः अग्निपुराणमें काव्य-मीमांसाका अतिविस्तृत वर्णन है। काव्याङ्ग, नाटक-निरूपण, रस-भेद, शब्दालंकार, अर्थालंकार, शब्द-गुण आदि शास्त्रीय विषयोंकी सूक्ष्म विवेचना है। यह इसीलिये कि—

‘अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः।’

<p align="right">(अग्नि० ३३९। १०)</p>

लोक-परलोक और परमार्थके सर्वोपयोगी स्थूल-सूक्ष्म विषयोंके वर्णनका यही उद्देश्य है कि मानव सुखी, शान्त, समृद्ध एवं स्वस्थ-जीवन व्यतीत करते हुए परम तत्त्वको प्राप्त करे। जीवनमें अर्थ और काम दोनों हों, पर वे हों धर्मके द्वारा नियन्त्रित। जीवन धर्मनिष्ठ हो और अन्तमें मोक्षकी प्राप्ति हो। धर्मशास्त्रका उपदेश देते हुए बताया गया है कि ‘धर्म वही है, जिससे भोग और मोक्ष, दोनों प्राप्त हो सकें। वैदिक कर्म दो प्रकारका है—एक ‘प्रवृत्त’ और दूसरा ‘निवृत्त’। कामनायुक्त कर्मको ‘प्रवृत्तकर्म’ कहते हैं। ज्ञानपूर्वक निष्कामभावसे जो कर्म किया जाता है, उसका नाम ‘निवृत्तकर्म’ है। वेदाभ्यास, तप, ज्ञान, इन्द्रियसंयम, अहिंसा तथा गुरुसेवा—ये परम उत्तम कर्म निःश्रेयस (मोक्षरूप कल्याण)-के साधक हैं। इन सबमें भी सबसे उत्तम आत्मज्ञान है।’ (अग्नि० १६२। ३—७)

‘भुक्ति’ से भी महत्त्वपूर्ण ‘मुक्ति’ है, जिससे जीवात्मा सभी प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त होकर परमात्मस्वरूप हो जाता है। ‘ज्ञान’ वही है, जो ब्रह्मको प्रकाशित करे और ‘योग’ वही है, जिससे चित्त ब्रह्मसे संयुक्त हो जाय।
‘ब्रह्मप्रकाशकं ज्ञानं योगस्तत्रैकचित्तता।’

१६ * अग्निपुराण *

(अग्नि० २७२। १)। अतः भगवान् अग्निदेवने यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, अर्थात् अष्टाङ्गयोगका वर्णन किया, जिससे आत्मा परमात्मचैतन्यरूप हो जाय। परमात्म-चैतन्यकी प्राप्ति ही परम प्राप्तव्य है। इसीकी प्राप्तिके दो प्रधान मार्ग—ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठाका प्रतिपादन करनेवाली श्रीमद्भगवद्गीताका संक्षेपमें कथन करनेके उपरान्त यमगीताका भी वर्णन किया गया है।

वस्तुतः शरीरसे आत्मा पृथक् है। नेत्र, मन, बुद्धि आदि आत्मा नहीं हैं। आत्मा इनका नहीं, ये आत्माके हैं। जीवात्मा परमात्माका सनातन अंश है। ब्रह्मत्वकी प्राप्तिमें ही जीवनकी परम सफलता है। इसके लिये ज्ञानयोग श्रेष्ठ साधन है। साधनाके द्वारा जीव जगत्के स्थूल-सूक्ष्म बन्धनोंसे मुक्त होकर ब्रह्मत्वकी प्राप्ति कर लेता है। साधकको ‘शरीर-भाव’ से अतीत होना आवश्यक है। अपवादकी बात दूसरी है। अन्यथा सभीको अभ्यास करना ही पड़ता है। इसीलिये पूजा, व्रत, तप, वैराग्य और देवाराधनका विधान है। आत्मोत्कर्षके लिये सभीको अपने-अपने स्तरके अनुकूल साधन-पथ चुनना चाहिये। सभीका स्तर एक नहीं, अतः सभीका अधिकार भी समान नहीं। देवोपासनासे भी परमतत्त्वकी प्राप्ति हो सकती है। देवोपासकोंका जो ‘विष्णु’ है, वही याज्ञिकोंका ‘यज्ञपुरुष’ है और वही ज्ञानियोंका ‘मूर्तिमान् ज्ञान’ है। जीवात्मा किसी पथका आश्रय ले, अन्तिम उद्देश्य यही है कि आत्मा और परमात्माका एकत्व प्रकाशित हो जाय। सच्चा श्रेय तो सदा परमार्थमें ही निहित रहता है। परमार्थकी दृष्टिसे तो आत्मा और परमात्माका नित्य अभिन्नत्व है। अग्निपुराणमें श्रीसूतजीने कहा है—‘भगवान् विष्णु ही सारसे भी सार तत्त्व हैं। वे सृष्टि और पालन आदिके कर्ता और सर्वत्र व्यापक हैं।’ ‘वह विष्णुस्वरूप ब्रह्म मैं ही हूँ’—इस प्रकार उन्हें जान लेनेपर सर्वज्ञता प्राप्त हो जाती है।'

ऐसे वेदसम्मत, सर्वविद्यायुक्त और ब्रह्मस्वरूप अग्निपुराणका जो पठन, श्रवण, अध्ययन और मनन करता है उसे भोग और मोक्ष—दोनोंकी ही प्राप्ति होती है—

सारात्सारो हि भगवान् विष्णुः सर्गादिकृद्विभुः।
ब्रह्माहमस्मि तं ज्ञात्वा सर्वज्ञत्वं प्रजायते॥
(अग्नि० १। ४)

॥ श्रीहरिः ॥ * ॐ नमो भगवते वासुदेवाय *

अग्निपुराण

पहला अध्याय मङ्गलाचरण तथा अग्नि और वसिष्ठके संवाद-रूपसे अग्निपुराणका आरम्भ

श्रियं सरस्वतीं गौरीं गणेशं स्कन्दमीश्वरम्।
ब्रह्माणं वह्निमिन्द्रादीन् वासुदेवं नमाम्यहम्॥
'लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, महादेवजी, ब्रह्मा, अग्नि, इन्द्र आदि देवताओं तथा भगवान् वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ'॥ १॥

नैमिषारण्यकी बात है। शौनक आदि ऋषि यज्ञोंद्वारा भगवान् विष्णुका यजन कर रहे थे। उस समय वहाँ तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे सूतजी पधारे। महर्षियोंने उनका स्वागत-सत्कार करके कहा—॥ २॥

ऋषि बोले— सूतजी! आप हमारी पूजा स्वीकार करके हमें वह सारसे भी सारभूत तत्त्व बतलानेकी कृपा करें, जिसके जान लेनेमात्रसे सर्वज्ञता प्राप्त होती है॥ ३॥

सूतजीने कहा— ऋषियो! भगवान् विष्णु ही सारसे भी सारतत्त्व हैं। वे सृष्टि और पालन आदिके कर्ता और सर्वत्र व्यापक हैं। 'वह विष्णुस्वरूप ब्रह्म मैं ही हूँ'—इस प्रकार उन्हें जान लेनेपर सर्वज्ञता प्राप्त हो जाती है। ब्रह्मके दो स्वरूप जाननेके योग्य हैं—शब्दब्रह्म और परब्रह्म। दो विद्याएँ भी जाननेके योग्य हैं—अपरा विद्या और परा विद्या। यह अथर्ववेदकी श्रुतिका कथन है। एक समयकी बात है, मैं, शुकदेवजी तथा पैल आदि ऋषि बदरिकाश्रमको गये और वहाँ व्यासजीको नमस्कार करके हमने प्रश्न किया। तब उन्होंने हमें सारतत्त्वका उपदेश देना आरम्भ किया॥ ४—६॥

व्यासजी बोले— सूत! तुम शुक आदिके साथ सुनो। एक समय मुनियोंके साथ मैंने महर्षि वसिष्ठजीसे सारभूत परात्पर ब्रह्मके विषयमें पूछा था। उस समय उन्होंने मुझे जैसा उपदेश दिया था, वही तुम्हें बतला रहा हूँ॥ ७॥

वसिष्ठजीने कहा— व्यास! सर्वान्तर्यामी ब्रह्मके दो स्वरूप हैं। मैं उन्हें बताता हूँ, सुनो! पूर्वकालमें ऋषि-मुनि तथा देवताओंसहित मुझसे अग्निदेवने इस विषयमें जैसा, जो कुछ भी कहा था, वही मैं तुम्हें बता रहा हूँ। अग्निपुराण सर्वोत्कृष्ट है। इसका एक-एक अक्षर ब्रह्मविद्या है, अतएव यह 'परब्रह्मरूप' है। ऋग्वेद आदि सम्पूर्ण वेद-शास्त्र 'अपरब्रह्म' हैं। परब्रह्मस्वरूप अग्निपुराण सम्पूर्ण देवताओंके लिये परम सुखद है। अग्निदेवद्वारा जिसका कथन हुआ है, वह आग्नेयपुराण वेदोंके तुल्य सर्वमान्य है। यह पवित्र पुराण अपने पाठकों और श्रोताजनोंको भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है। भगवान् विष्णु ही कालाग्निरूपसे विराजमान हैं। वे ही


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२ * अग्निपुराण *


ज्योतिर्मय परात्पर परब्रह्म हैं। ज्ञानयोग तथा कर्मयोगद्वारा उन्हींका पूजन होता है। एक दिन उन विष्णुस्वरूप अग्निदेवसे मुनियोंसहित मैंने इस प्रकार प्रश्न किया॥ ८—११॥

**वसिष्ठजीने पूछा—**अग्निदेव! संसारसागरसे पार लगानेके लिये नौकारूप परमेश्वर ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन कीजिये और सम्पूर्ण विद्याओंके सारभूत उस विद्याका उपदेश दीजिये, जिसे जानकर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है॥ १२॥

**अग्निदेव बोले—**वसिष्ठ! मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही कालाग्निरुद्र कहलाता हूँ। मैं तुम्हें सम्पूर्ण विद्याओंकी सारभूता विद्याका उपदेश देता हूँ, जिसे अग्निपुराण कहते हैं। वही सब विद्याओंका सार है, वह ब्रह्मस्वरूप है। सर्वमय एवं सर्वकारणभूत ब्रह्म उससे भिन्न नहीं है। उसमें सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित आदिका तथा मत्स्य-कूर्म आदि रूप धारण करनेवाले भगवान्‌का वर्णन है। ब्रह्मन्! भगवान् विष्णुकी स्वरूपभूता दो विद्याएँ हैं—एक परा और दूसरी अपरा। ऋक्, यजुः, साम और अथर्वनामक वेद, वेदके छहों अङ्ग—शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्दःशास्त्र तथा मीमांसा, धर्मशास्त्र, पुराण, न्याय, वैद्यक (आयुर्वेद), गान्धर्व वेद (संगीत), धनुर्वेद और अर्थशास्त्र—यह सब अपरा विद्या है तथा परा विद्या वह है, जिससे उस अदृश्य, अग्राह्य, गोत्ररहित, चरणरहित, नित्य, अविनाशी ब्रह्मका बोध हो। इस अग्निपुराणको परा विद्या समझो। पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने मुझसे तथा ब्रह्माजीने देवताओंसे जिस प्रकार वर्णन किया था, उसी प्रकार मैं भी तुमसे मत्स्य आदि अवतार धारण करनेवाले जगत्कारणभूत परमेश्वरका प्रतिपादन करूँगा॥ १३—१९॥

इस प्रकार व्यासद्वारा सूतके प्रति कहे गये आदि आग्नेय महापुराणमें पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १॥


दूसरा अध्याय

मत्स्यावतारकी कथा

**वसिष्ठजीने कहा—**अग्निदेव! आप सृष्टि आदिके कारणभूत भगवान् विष्णुके मत्स्य आदि अवतारोंका वर्णन कीजिये। साथ ही ब्रह्मस्वरूप अग्निपुराणको भी सुनाइये, जिसे पूर्वकालमें आपने श्रीविष्णुभगवान्‌के मुखसे सुना था॥ १॥

**अग्निदेव बोले—**वसिष्ठ! सुनो, मैं श्रीहरिके मत्स्यावतारका वर्णन करता हूँ। अवतार-धारणका कार्य दुष्टोंके विनाश और साधु-पुरुषोंकी रक्षाके लिये होता है। बीते हुए कल्पके अन्तमें 'ब्राह्म' नामक नैमित्तिक प्रलय हुआ था। मुने! उस समय 'भू' आदि लोक समुद्रके जलमें डूब गये थे। प्रलयके पहलेकी बात है। वैवस्वत मनु भोग और मोक्षकी सिद्धिके लिये तपस्या कर रहे थे। एक दिन जब वे कृतमाला नदीमें जलसे पितरोंका तर्पण कर रहे थे, उनकी अञ्जलिके जलमें एक बहुत छोटा-सा मत्स्य आ गया। राजाने उसे जलमें फेंक देनेका विचार किया। तब मत्स्यने कहा—'महाराज! मुझे जलमें न फेंको। यहाँ ग्राह आदि जल-जन्तुओंसे मुझे भय है।' यह सुनकर मनुने उसे अपने कलशके जलमें डाल दिया। मत्स्य उसमें पड़ते ही बड़ा हो गया और पुनः मनुसे बोला—'राजन्! मुझे इससे बड़ा स्थान दो।' उसकी यह बात सुनकर राजाने उसे एक बड़े जलपात्र (नाद या कूँडा आदि)-में डाल दिया। उसमें भी बड़ा होकर मत्स्य राजासे बोला—'मनो! मुझे कोई विस्तृत स्थान दो।'

  • अध्याय ३ * ३

तब उन्होंने पुनः उसे सरोवरके जलमें डाला; किंतु वहाँ भी बढ़कर वह सरोवरके बराबर हो गया और बोला—'मुझे इससे बड़ा स्थान दो।' तब मनुने उसे फिर समुद्रमें ही ले जाकर डाल दिया। वहाँ वह मत्स्य क्षणभरमें एक लाख योजन बड़ा हो गया। उस अद्भुत मत्स्यको देखकर मनुको बड़ा विस्मय हुआ। वे बोले—'आप कौन हैं ? निश्चय ही आप भगवान् श्रीविष्णु जान पड़ते हैं। नारायण ! आपको नमस्कार है। जनार्दन ! आप किसलिये अपनी मायासे मुझे मोहित कर रहे हैं?' ॥ २—१० ॥

मनुके ऐसा कहनेपर सबके पालनमें संलग्न रहनेवाले मत्स्यरूपधारी भगवान् उनसे बोले—'राजन् ! मैं दुष्टोंका नाश और जगत्‌की रक्षा करनेके लिये अवतीर्ण हुआ हूँ। आजसे सातवें दिन समुद्र सम्पूर्ण जगत्‌को डुबा देगा। उस समय तुम्हारे पास एक नौका उपस्थित होगी। तुम उसपर सब प्रकारके बीज आदि रखकर बैठ जाना। सप्तर्षि भी तुम्हारे साथ रहेंगे। जबतक ब्रह्माकी रात रहेगी, तबतक तुम उसी नावपर विचरते रहोगे। नाव आनेके बाद मैं भी इसी रूपमें उपस्थित होऊँगा। उस समय तुम मेरे सींगमें महासर्पमयी रस्सीसे उस नावको बाँध देना।' ऐसा कहकर भगवान् मत्स्य अन्तर्धान हो गये और वैवस्वत मनु उनके बताये हुए समयकी प्रतीक्षा करते हुए वहीं रहने लगे। जब नियत समयपर समुद्र अपनी सीमा लाँघकर बढ़ने लगा, तब वे पूर्वोक्त नौकापर बैठ गये। उसी समय एक सींग धारण करनेवाले सुवर्णमय मत्स्यभगवान्‌का प्रादुर्भाव हुआ। उनका विशाल शरीर दस लाख योजन लंबा था। उनके सींगमें नाव बाँधकर राजाने उनसे 'मत्स्य'नामक पुराणका श्रवण किया, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। मनु भगवान् मत्स्यकी नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा स्तुति भी करते थे। प्रलयके अन्तमें ब्रह्माजीसे वेदको हर लेनेवाले 'हयग्रीव' नामक दानवका वध करके भगवान्‌ने वेद-मन्त्र आदिकी रक्षा की। तत्पश्चात् वाराहकल्प आनेपर श्रीहरिने कच्छपरूप धारण किया ॥ ११—१७ ॥

इस प्रकार अग्निदेवद्वारा कहे गये विद्यासार-स्वरूप आदि आग्नेय महापुराणमें 'मत्स्यावतार-वर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ॥ २॥


तीसरा अध्याय

समुद्र-मन्थन, कूर्म तथा मोहिनी-अवतारकी कथा

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ ! अब मैं कूर्मावतारका वर्णन करूँगा। यह सुननेपर सब पापोंका नाश हो जाता है। पूर्वकालकी बात है, देवासुर-संग्राममें दैत्योंने देवताओंको परास्त कर दिया। वे दुर्वासाके शापसे भी लक्ष्मीसे रहित हो गये थे। तब सम्पूर्ण देवता क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णुके पास जाकर बोले—'भगवन् ! आप देवताओंकी रक्षा कीजिये।' यह सुनकर श्रीहरिने ब्रह्मा आदि देवताओंसे कहा—'देवगण ! तुमलोग क्षीरसमुद्रको मथने, अमृत प्राप्त करने और लक्ष्मीको पानेके लिये असुरोंसे संधि कर लो। कोई बड़ा काम या भारी प्रयोजन आ पड़नेपर शत्रुओंसे भी संधि कर लेनी चाहिये। मैं तुम लोगोंको अमृतका भागी बनाऊँगा और दैत्योंको उससे वञ्चित रखूँगा। मन्दराचलको मथानी और वासुकि नागको नेती बनाकर आलस्यरहित हो मेरी सहायतासे तुमलोग क्षीरसागरका मन्थन करो।' भगवान् विष्णुके

४ * अग्निपुराण *


ऐसा कहनेपर देवता दैत्योंके साथ संधि करके क्षीरसमुद्रपर आये। फिर तो उन्होंने एक साथ मिलकर समुद्र-मन्थन आरम्भ किया। जिस ओर वासुकि नागकी पूँछ थी, उसी ओर देवता खड़े थे। दानव वासुकि नागके निःश्वाससे क्षीण हो रहे थे और देवताओंको भगवान् अपनी कृपादृष्टिसे परिपुष्ट कर रहे थे। समुद्र-मन्थन आरम्भ होनेपर कोई आधार न मिलनेसे मन्दराचल पर्वत समुद्रमें डूब गया॥ १-७॥

तब भगवान् विष्णुने कूर्म (कछुए-)का रूप धारण करके मन्दराचलको अपनी पीठपर रख लिया। फिर जब समुद्र मथा जाने लगा, तो उसके भीतरसे हलाहल विष प्रकट हुआ। उसे भगवान् शंकरने अपने कण्ठमें धारण कर लिया। इससे कण्ठमें काला दाग पड़ जानेके कारण वे 'नीलकण्ठ' नामसे प्रसिद्ध हुए। तत्पश्चात् समुद्रसे वारुणीदेवी, पारिजात वृक्ष, कौस्तुभमणि, गौएँ तथा दिव्य अप्सराएँ प्रकट हुईं। फिर लक्ष्मीदेवीका प्रादुर्भाव हुआ। वे भगवान् विष्णुको प्राप्त हुईं। सम्पूर्ण देवताओंने उनका दर्शन और स्तवन किया। इससे वे लक्ष्मीवान् हो गये। तदनन्तर भगवान् विष्णुके अंशभूत धन्वन्तरि, जो आयुर्वेदके प्रवर्तक हैं, हाथमें अमृतसे भरा हुआ कलश लिये प्रकट हुए। दैत्योंने उनके हाथसे अमृत छीन लिया और उसमेंसे आधा देवताओंको देकर वे सब चलते बने। उनमें जम्भ आदि दैत्य प्रधान थे। उन्हें जाते देख भगवान् विष्णुने स्त्रीका रूप धारण किया। उस रूपवती स्त्रीको देखकर दैत्य मोहित हो गये और बोले—'सुमुखि! तुम हमारी भार्या हो जाओ और यह अमृत लेकर हमें पिलाओ।' 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान्ने उनके हाथसे अमृत ले लिया और उसे देवताओंको पिला दिया। उस समय राहु चन्द्रमाका रूप धारण करके अमृत पीने लगा। तब सूर्य और चन्द्रमाने उसके कपट-वेषको प्रकट कर दिया॥ ८—१४॥

यह देख भगवान् श्रीहरिने चक्रसे उसका मस्तक काट डाला। उसका सिर अलग हो गया और भुजाओंसहित धड़ अलग रह गया। फिर भगवान्को दया आयी और उन्होंने राहुको अमर बना दिया। तब ग्रहस्वरूप राहुने भगवान् श्रीहरिसे कहा—'इन सूर्य और चन्द्रमाको मेरे द्वारा अनेकों बार ग्रहण लगेगा। उस समय संसारके लोग जो कुछ दान करें, वह सब अक्षय हो।' भगवान् विष्णुने 'तथास्तु' कहकर सम्पूर्ण देवताओंके साथ राहुकी बातका अनुमोदन किया। इसके बाद भगवान्ने स्त्रीरूप त्याग दिया; किंतु महादेवजीको भगवान्के उस रूपका पुनर्दर्शन करनेकी इच्छा हुई। अतः उन्होंने अनुरोध किया—'भगवन्! आप अपने स्त्रीरूपका मुझे दर्शन करावें।' महादेवजीकी प्रार्थनासे भगवान् श्रीहरिने उन्हें अपने स्त्रीरूपका दर्शन कराया। वे भगवान्की मायासे ऐसे मोहित हो गये कि पार्वतीजीको त्यागकर उस स्त्रीके पीछे लग गये। उन्होंने नग्न और उन्मत्त होकर मोहिनीके केश पकड़ लिये। मोहिनी अपने केशोंको छुड़ाकर वहाँसे चल दी। उसे जाती देख महादेवजी भी उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे। उस समय पृथ्‍वीपर जहाँ-जहाँ भगवान् शंकरका वीर्य गिरा, वहाँ-वहाँ शिवलिङ्गोंका क्षेत्र एवं सुवर्णकी खानें हो गयीं। तत्पश्चात् 'यह माया है'—ऐसा जानकर भगवान् शंकर अपने स्वरूपमें स्थित हुए। तब भगवान् श्रीहरिने प्रकट होकर शिवजीसे कहा—'रुद्र! तुमने मेरी मायाको जीत लिया। पृथ्‍वीपर तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो मेरी इस मायाको जीत सके।' भगवान्के प्रयत्नसे दैत्योंको अमृत नहीं मिलने पाया; अतः देवताओंने उन्हें

* अध्याय ४ *


युद्धमें मार गिराया। फिर देवता स्वर्गमें विराजमान हुए और दैत्यलोग पातालमें रहने लगे। जो मनुष्य देवताओंकी इस विजयगाथाका पाठ करता है, वह स्वर्गलोकमें जाता है॥ १५-२३ ॥

इस प्रकार विद्याओंके सारभूत आदि आग्नेय महापुराणमें 'कूर्मावतार-वर्णन' नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ॥ ३॥


चौथा अध्याय

वराह, नृसिंह, वामन और परशुराम-अवतारकी कथा

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! अब मैं वराहावतारकी पापनाशिनी कथाका वर्णन करता हूँ। पूर्वकालमें 'हिरण्याक्ष' नामक दैत्य असुरोंका राजा था। वह देवताओंको जीतकर स्वर्गमें रहने लगा। देवताओंने भगवान् विष्णुके पास जाकर उनकी स्तुति की। तब उन्होंने यज्ञवराहरूप धारण किया और देवताओंके लिये कण्टकरूप उस दानवको दैत्योंसहित मारकर धर्म एवं देवताओं आदिकी रक्षा की। इसके बाद वे भगवान् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये। हिरण्याक्षके एक भाई था, जो 'हिरण्यकशिपु' के नामसे प्रसिद्ध था। उसने देवताओंके यज्ञभाग अपने अधीन कर लिये और उन सबके अधिकार छीनकर वह स्वयं ही उनका उपभोग करने लगा। भगवान्ने नृसिंहरूप धारण करके उसके सहायक असुरोंसहित उस दैत्यका वध किया। तत्पश्चात् सम्पूर्ण देवताओंको अपने-अपने पदपर प्रतिष्ठित कर दिया। उस समय देवताओंने उन नृसिंहका स्तवन किया।

पूर्वकालमें देवता और असुरोंमें युद्ध हुआ। उस युद्धमें बलि आदि दैत्योंने देवताओंको परास्त करके उन्हें स्वर्गसे निकाल दिया। तब वे श्रीहरिकी शरणमें गये। भगवान्ने उन्हें अभयदान दिया और कश्यप तथा अदितिकी स्तुतिसे प्रसन्न हो, वे अदितिके गर्भसे वामनरूपमें प्रकट हुए। उस समय दैत्यराज बलि गङ्गाद्वारमें यज्ञ कर रहे थे। भगवान् उनके यज्ञमें गये और वहाँ यजमानकी स्तुतिका गान करने लगे॥ १-७॥

वामनके मुखसे वेदोंका पाठ सुनकर राजा बलि उन्हें वर देनेको उद्यत हो गये और शुक्राचार्यके मना करनेपर भी बोले—'ब्रह्मन्! आपकी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लें। मैं आपको वह वस्तु अवश्य दूँगा।' वामनने बलिसे कहा—'मुझे अपने गुरुके लिये तीन पग भूमिकी आवश्यकता है; वही दीजिये।' बलिने कहा—'अवश्य दूँगा।' तब संकल्पका जल हाथमें पड़ते ही भगवान् वामन 'अवामन' हो गये। उन्होंने विराट् रूप धारण कर लिया और भूर्लोक, भुवर्लोक एवं स्वर्गलोकको अपने तीन पगोंसे नाप लिया। श्रीहरिने बलिको सुतललोकमें भेज दिया और त्रिलोकीका राज्य इन्द्रको दे डाला। इन्द्रने देवताओंके साथ श्रीहरिका स्तवन किया। वे तीनों लोकोंके स्वामी होकर सुखसे रहने लगे।

ब्रह्मन्! अब मैं परशुरामावतारका वर्णन करूँगा, सुनो। देवता और ब्राह्मण आदिका पालन करनेवाले श्रीहरिने जब देखा कि भूमण्डलके क्षत्रिय उद्धत स्वभावके हो गये हैं, तो वे उन्हें मारकर पृथ्वीका भार उतारने और सर्वत्र शान्ति स्थापित करनेके लिये जमदग्निके अंशद्वारा रेणुकाके गर्भसे अवतीर्ण हुए। भृगुनन्दन परशुराम शस्त्र-विद्याके

६ * अग्निपुराण *


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[चित्र १: ऊपर बाएँ]
वक्ता व्यास, श्रोता सूत [ अग्नि० अ० १ ]

[चित्र २: ऊपर दाएँ]
वक्ता वसिष्ठ, श्रोता व्यास-शुकदेव [ अग्नि० अ० १ ]

[चित्र ३: नीचे बाएँ]
वक्ता अग्निदेव, श्रोता वसिष्ठ [ अग्नि० अ० १ ]

[चित्र ४: नीचे दाएँ]
वक्ता नारद, श्रोता वाल्मीकि [ अग्नि० अ० ५ ]

  • अध्याय ५ * ७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

पारंगत विद्वान् थे। उन दिनों कृतवीर्यका पुत्र राजा अर्जुन भगवान् दत्तात्रेयजीकी कृपासे हजार बाँहें पाकर समस्त भूमण्डलपर राज्य करता था। एक दिन वह वनमें शिकार खेलनेके लिये गया॥ ८-१४॥

वहाँ वह बहुत थक गया। उस समय जमदग्नि मुनिने उसे सेनासहित अपने आश्रमपर निमन्त्रित किया और कामधेनुके प्रभावसे सबको भोजन कराया। राजाने मुनिसे कामधेनुको अपने लिये माँगा; किंतु उन्होंने देनेसे इनकार कर दिया। तब उसने बलपूर्वक उस धेनुको छीन लिया। यह समाचार पाकर परशुरामजीने हैहयपुरीमें जा उसके साथ युद्ध किया और अपने फरसेसे उसका मस्तक काटकर रणभूमिमें उसे मार गिराया। फिर वे कामधेनुको साथ लेकर अपने आश्रमपर लौट आये। एक दिन परशुरामजी जब वनमें गये हुए थे, कृतवीर्यके पुत्रोंने आकर अपने पिताके वैरका बदला लेनेके लिये जमदग्नि मुनिको मार डाला। जब परशुरामजी लौटकर आये तो पिताको मारा गया देख उनके मनमें बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने इक्कीस बार समस्त भूमण्डलके क्षत्रियोंका संहार किया। फिर कुरुक्षेत्रमें पाँच कुण्ड बनाकर वहीं उन्होंने अपने पितरोंका तर्पण किया और सारी पृथ्वी कश्यप-मुनिको दान देकर वे महेन्द्र पर्वतपर रहने लगे। इस प्रकार कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन तथा परशुराम अवतारकी कथा सुनकर मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है॥ १५-२१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वराह, नृसिंह, वामन तथा परशुरामावतारकी कथाका वर्णन' नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ॥ ४॥


पाँचवाँ अध्याय

श्रीरामावतार-वर्णनके प्रसङ्गमें रामायण-बालकाण्डकी संक्षिप्त कथा

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! अब मैं ठीक उसी प्रकार रामायणका वर्णन करूँगा, जैसे पूर्वकालमें नारदजीने महर्षि वाल्मीकिजीको सुनाया था। इसका पाठ भोग और मोक्ष—दोनोंको देनेवाला है॥ १॥

देवर्षि नारद कहते हैं—वाल्मीकिजी! भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए हैं। ब्रह्माजीके पुत्र हैं मरीचि। मरीचिसे कश्यप, कश्यपसे सूर्य और सूर्यसे वैवस्वतमनुका जन्म हुआ। उसके बाद वैवस्वतमनुसे इक्ष्वाकुकी उत्पत्ति हुई। इक्ष्वाकुके वंशमें ककुत्स्थ नामक राजा हुए। ककुत्स्थके रघु, रघुके अज और अजके पुत्र दशरथ हुए। उन राजा दशरथसे रावण आदि राक्षसोंका वध करनेके लिये साक्षात् भगवान् विष्णु चार रूपोंमें प्रकट हुए। उनकी बड़ी रानी कौसल्याके गर्भसे श्रीरामचन्द्रजीका प्रादुर्भाव हुआ। कैकेयीसे भरत और सुमित्रासे लक्ष्मण एवं शत्रुघ्नका जन्म हुआ। महर्षि ऋष्यशृङ्गने उन तीनों रानियोंको यज्ञसिद्ध चरु दिये थे, जिन्हें खानेसे इन चारों कुमारोंका आविर्भाव हुआ। श्रीराम आदि सभी भाई अपने पिताके ही समान पराक्रमी थे। एक समय मुनिवर विश्वामित्रने अपने यज्ञमें विघ्न डालनेवाले निशाचरोंका नाश करनेके लिये राजा दशरथसे प्रार्थना की (कि आप अपने पुत्र श्रीरामको मेरे साथ भेज दें)। तब राजाने मुनिके साथ श्रीराम और लक्ष्मणको भेज दिया। श्रीरामचन्द्रजीने वहाँ

८ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

जाकर मुनिसे अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा पायी और ताड़का नामवाली निशाचरीका वध किया। फिर उन बलवान् वीरने मारीच नामक राक्षसको मानवास्त्रसे मोहित करके दूर फेंक दिया और यज्ञविघातक राक्षस सुबाहुको दल-बलसहित मार डाला। इसके बाद वे कुछ कालतक मुनिके सिद्धाश्रममें ही रहे। तत्पश्चात् विश्वामित्र आदि महर्षियोंके साथ लक्ष्मणसहित श्रीराम मिथिला-नरेशका धनुष-यज्ञ देखनेके लिये गये॥ २—९॥

[अपनी माता अहल्याके उद्धारकी वार्ता सुनकर संतुष्ट हुए] शतानन्दजीने निमित्त-कारण बनकर श्रीरामसे विश्वामित्र मुनिके प्रभावका$^१$ वर्णन किया। राजा जनकने अपने यज्ञमें मुनियोंसहित श्रीरामचन्द्रजीका पूजन किया। श्रीरामने धनुषको चढ़ा दिया और उसे अनायास ही तोड़ डाला। तदनन्तर महाराज जनकने अपनी अयोनिजा कन्या सीताको, जिसके विवाहके लिये पराक्रम ही शुल्क निश्चित किया गया था, श्रीरामचन्द्रजीको समर्पित किया। श्रीरामने भी अपने पिता राजा दशरथ आदि गुरुजनोंके मिथिलामें पधारनेपर सबके सामने सीताका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। उस समय लक्ष्मणने भी मिथिलेश-कन्या उर्मिलाको अपनी पत्नी बनाया। राजा जनकके छोटे भाई कुशध्वज थे। उनकी दो कन्याएँ थीं— श्रुतकीर्ति और माण्डवी। इनमें माण्डवीके साथ भरतने और श्रुतकीर्तिके साथ शत्रुघ्नने विवाह किया। तदनन्तर राजा जनकसे भलीभाँति पूजित हो श्रीरामचन्द्रजीने वसिष्ठ आदि महर्षियोंके साथ वहाँसे प्रस्थान किया। मार्गमें जमदग्निनन्दन परशुरामको जीतकर वे अयोध्या पहुँचे। वहाँ जानेपर भरत और शत्रुघ्न अपने मामा राजा युधाजित्की राजधानीको चले गये॥ १०—१५॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'श्रीरामायण-कथाके अन्तर्गत बालकाण्डमें आये हुए विषयका वर्णन' सम्बन्धी पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५॥


छठा अध्याय

अयोध्याकाण्डकी संक्षिप्त कथा

नारदजी कहते हैं— भरतके ननिहाल चले जानेपर [लक्ष्मणसहित] श्रीरामचन्द्रजी ही पिता-माता आदिके सेवा-सत्कारमें रहने लगे। एक दिन राजा दशरथने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— 'रघुनन्दन! मेरी बात सुनो। तुम्हारे गुणोंपर अनुरक्त हो प्रजाजनोंने मन-ही-मन तुम्हें राज-सिंहासनपर अभिषिक्त कर दिया है—प्रजाकी यह हार्दिक इच्छा है कि तुम युवराज बनो; अतः कल प्रातःकाल मैं तुम्हें युवराजपद प्रदान कर दूँगा। आज रातमें तुम सीता-सहित उत्तम व्रतका पालन करते हुए संयमपूर्वक रहो।' राजाके आठ मन्त्रियों तथा वसिष्ठजीने भी उनकी इस बातका अनुमोदन किया। उन आठ मन्त्रियोंके नाम इस प्रकार हैं—दृष्टि, जयन्त, विजय, सिद्धार्थ, राज्यवर्धन, अशोक, धर्मपाल तथा सुमन्त्र$^२$। इनके अतिरिक्त वसिष्ठजी भी मन्त्रणा देते थे। पिता और


१. यहाँ मूलमें, 'प्रभावतः' पद 'प्रभावः' के अर्थमें है। यहाँ 'तसि' प्रत्यय पञ्चम्यन्तका बोधक नहीं है। सार्वविभक्तिक 'तसि' के नियमानुसार प्रथमान्त पदसे यहाँ 'तसि' प्रत्यय हुआ है, ऐसा मानना चाहिये।
२. वाल्मीकीय रामायण, बालकाण्ड ७। ३ में इन मन्त्रियोंके नाम इस प्रकार आये हैं—धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल तथा सुमन्त्र।