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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

चौथा अध्याय ] ४५१ स्पतियों के ओज से सम्पन्न कर देता है । अश्वत्थ वनस्पतियों के तेज से उत्पन्न हुआ है । अश्वत्थ वनस्पतियों का राजा और तेज है । ( इस का रस पीने से ) क्षत्रियत्व में साम्राज्य और तेज धारण करता है । यह जो प्लाक्ष है वह वनस्पतियों के यश से उत्पन्न हुआ है । इसमें वनस्पतियों का साम्राज्य और तेज है । इस प्रकार क्षत्रिय क्षत्रियत्व में वनस्पतियों का साम्राज्य और यश धारण करा देता है । जब यह चीजें उपस्थित हो जाती हैं तो सोमराजा को खरीदते हैं । और उपवास के कृत्य करते हैं । उसी प्रकार जैसे असली सोम यज्ञ में किया जाता है । उपवास के दिन ( यज्ञ से एक दिन पूर्व ) अध्वर्यु के पास सोम निचोड़ने के सभी सामान आ जाने चाहियें जैसे चर्म, दो तख्ते, द्रोण, कलश दशापवित्र ( छन्ना ), पत्थर, पूतभृत, आधवनीय, स्थाली, उदंचन और चमसा । यह जो राजा के लिये रस निचोड़ा गया इसके दो भाग करने चाहिये एक प्रातः- सवन के लिये, दूसरा दोपहर के सवन के लिये । (६) ३३—जब त्रैत चमसों को आहुति के लिये उठाते हैं तब यजमान के चमसों को भी उठाते हैं । उसमें तो तरुण दर्भ डाल कर । और वषट् कार कहकर परिधि समिधाओं पर डालते हैं । एक दर्भ डालकर— दधिक्राव्णो अकारिषम्... ऋ० ४।३६।६ ) यह मंत्र पढ़ते हैं उसमें स्वाहा जोड़ कर और वषट्कार करके । दूसरा दर्भ डालकर यह मंत्र पढ़ते हैं— आ दधिक्राः शवसा पंच कृष्टीः... ( ऋ० ४।६८।१० )

४५२ [ सातवीं पञ्चिका जब ऋत्विज अपने चमसों को पीने के लिये उठावें, उस समय यजमान भी अपने चमसे को उठावे। जब होता 'इडा' कहे तब यजमान भी अपने चमसे को पिये यह कहता हुआ:— "यदत्र शिष्टं रसिनः सुतस्य यदिन्द्रो अपिबच्छचीभिः। इदं तदस्य मनसा शिवेन सोमं राजानमिह भक्षयामि।" अर्थात् "जो सोम इन्द्र ने इन्द्राणियों के साथ पिया और उसमें से बच रहा उसको मैं प्रसन्नचित्त होकर पीता हूँ।" यह वनस्पति का रस प्रसन्न चित्त से पिया जाकर हितकर होता है। और उसका राष्ट्र उग्र और व्यथा-रहित होता है, जो इस प्रकार सोम का भक्षण करता है। नीचे का मंत्र पढ़कर मुँह पोंछता है:— शं नः एधि हृदेपीतः प्रण आयूंजी'वसे सोम तारीरिति। "हे सोम, तुम जो पिये गये हो हमारे हृदय के लिये कल्याणकारी होओ। हमारे जीवन को बढ़ाओ।" यदि वह मुँह न पोंछे तो सोम कहेगा कि किस नालायक ने मुझे पिया और वह उसकी आयु को कम कर देगा। और जो मुँह को पोंछ डालेगा तो उसका जीवन बढ़ेगा। नीचे के दो मंत्रों से चमसा को आशीर्वाद देता है:— आ प्यायस्व समेतु...( ऋ० १।६१।१६ ) सं ते पयांसि समु यन्तु वाजः...( ऋ० १।६१।१८ ) इसमें रूप समृद्धता है। जिसमें रूप समृद्धता होती है वही सफल होता है। (७) ३४—जब ऋत्विज त्रैत चमसों को रख दें तो यजमान भी अपने चमसे को रख दे। जब वे अपने चमसों को हिलावें तो यजमान भी हिलावे।

पाँचवाँ अध्याय ] ४५३ अब नराशंस चमसे को उठावे और यह पढ़कर पियेः- "देव सोम ते मति विदं ऊमैः पितृभिर्भक्षितस्य भक्ष्यामि" "हे देव सोम, मैं तुम को पीता हूँ। तुम, जो मेरे मन को जानते हो और जिनका "ऊम" पितरों ने पिया है।" इस प्रकार यजमान नराशंस चमसे को प्रातः सवन में पीता है। दोपहर के सवन में 'ऊमैः' के स्थान में 'ऊर्वैः' कहता है और तीसरे सवन में "काव्यैः"। क्योंकि पितर लोग प्रातः काल को 'ऊम' होते हैं, दोपहर को 'ऊर्व' और शाम को 'काव्य'। इस प्रकार वह अमृत पितरों को सोम का पान कराता है। प्रियव्रत सोम पीने वाले (सोमपा) ने कहा था, "जो सोम पीता है और जिसके पितर सोम पीते हैं, उसके पितर अमर हो जाते हैं और उसका राज दृढ़ और व्यथारहित हो जाता है। प्रत्यभिमर्श (मुँह पोंछने की विधि) और आप्यायन (चमसे को पानी से धोने की विधि) समान ही हैं अर्थात् वही हैं जैसी ऊपर बयान की गईं। प्रातः सवन में उसी प्रकार कार्य्य करना चाहिये जैसे सोमरस निकालने में, मध्य सवन में भी उसी तरह और तृतीय सवन में भी उसी तरह। (तात्पर्य यह है कि जैसे असली सोमरस निकालने में क्रिया की जाती है उसी तरह राजा के लिये न्यग्रोध आदि का रस निकालने में भी वही क्रिया करनी चाहिये)। इस विधि को राम मार्गवेय ने सुषद्मान के पुत्र विश्वंतर से कहा था। इस पर राजा ने कहा, 'हे ब्राह्मण, हम तुझे एक हजार गौवें देते हैं। मेरे यज्ञ में श्यापर्ण लोग आवे"। इसी विधि का कथन कवष के पुत्र तुर ने परीक्षित के लड़के जन्मेजय से किया और इसी का पर्वत और नारद ने सहदेव के पुत्र सोमक से। फिर यह बात सहदेव सार्जय से कही गई। फिर बभ्रव दैवावृध से, फिर भीम वैदर्भ से, फिर नग्नजित

४५४ [ सातवीं पञ्चिका गांधार से। इसका कथन अग्नि ने सनश्रुत अरिन्दम से किया, ऋतुविद् जानकि से, वशिष्ठ ने पैजवन सुदास से। वे सब इस प्रकार पान करके बड़े हो गये। ये सब महा- राजा थे। जो क्षत्रिय यजमान इस प्रकार पान करता है उसकी श्री सूर्य्य के समान चमकती है। सब दिशाओं से वह सूर्य्य के समान बलि† (कर) लेता है और उसका राज्य व्यथा-रहित हो जाता है। (८) ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका समाप्त हुई। †बलि का अर्थ है कर या महसूल! बलि का अर्थ मांस या पशु- वध नहीं है।

आठवीं पञ्चिका

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पहला अध्याय १—( राजसूय यज्ञ के ) प्रातःसवन और तृतीय सवन के स्तोत्र और शस्त्र ( सोम यज्ञ के ) ऐकाहिकों के ही समान होते हैं। क्योंकि ऐकाहिक के दोनों सवन शांत और प्रतिष्ठा-युक्त हैं और शांति और प्रतिष्ठा के देने वाले हैं। ( परन्तु मध्य सवन में भेद है ) । माध्यं दिन के पवमान का वर्णन हो चुका । जिसके पृष्ठ स्तोत्र में दोनों साम बृहत् सहित होते हैं। और दोनों साम गाये जाते हैं। रथंतर साम का पहला मंत्र यह है :— आ त्वा रथं यथोतये……(१) तुविष्म तुविक्रतो……(२) यस्य ते महिना……(३) (ऋ० ८।४६।१-३) और रथंतर का पिछला मंत्र यह है :— इदं वसो सुतमन्धः……(१) ( ४५७ )

४५८ [आठवीं पञ्चिका नृभिर्धूतः सुतो……(२) तं ते यवं यथा……(३) (ऋ० ८।२१-३) पवमान उक्थ मरुत्वतीय शस्त्र है जिसमें रथंतर साम है। (मध्य सवन में) पवमान स्तोत्र को रथंतर की रीति से गाते हैं। सहारा देने के लिये बृहत् पृष्ठ है। पहले और पिछले स्तुति के मन्त्रों को रथंतर से गाते हैं। रथंतर ब्राह्मण है, बृहत् क्षत्रिय है। ब्राह्मण क्षत्रिय से पहले होता है। राजा को समझना चाहिये कि जब ब्राह्मण मेरे आगे हैं तो मेरा राष्ट्र सुदृढ़ और विघ्नरहित होगा। रथन्तर अन्न है। पहले रखने से वह राजा को खाना प्राप्त कराता है। रथन्तर यह पृथ्वी है, यह प्रतिष्ठा है। पहले रखने से यह राजा को प्रतिष्ठा देता है। इन्द्र को बुलाने का प्रगाथ वही है बिना किसी तबदीली के (अविभक्तः) जो कि और सोम दिनों का है। ब्रह्मणस्पति का प्रगाथ जिसकी विशेषता “उत्” है दोनों सामों में एक सा है। धाय्या भी वही है बिना तबदीली के। मरुत्वतीय प्रगाथ ऐकाहिकों का विशेष है। (१) २—(पवमान उक्थ्य) का निविद् सूक्त यह है :— जनिष्ठा उग्रः……(ऋ० १०।७३) इसमें 'उग्र' भी है और 'सह' भी। यह क्षत्र का रूप है। 'ओजिष्ठ' भी क्षत्र का रूप है। 'बहुलाभिमानः' में 'अभि' शब्द है जो 'पराजित करने का' रूप है। इस सूक्त में ११ ऋचायें हैं। त्रिष्टुभ् में ११ अक्षर होते हैं। क्षत्रिय त्रिष्टुभ् का रूप है। ओज इन्द्र का बल है। यह त्रिष्टुभ् है। ओज क्षत्रिय का वीर्य है। इस प्रकार वह राजा को ओज, क्षत्र और वीर्य से सम्पन्न करता है। यह 'गौरिवीत' सूक्त है। इससे मरुत्वतीय शस्त्र समृद्ध हो जाता है। इसका ब्राह्मण पहले कहा जा चुका है।

पहला अध्याय ] ४५९ त्वामिद्धि हवामहे......(१) स त्वं नश्चित्र......(२) (ऋ० ६।४६।१-२) यह बृहत् पृष्ठ है। बृहत् साम क्षत्र है। क्षत्र से राजा समृद्ध होता है। बृहत् ज्यैष्ठ्य है। इस ज्यैष्ठ्य से राजा समृद्ध होता है। बृहत् श्रेष्ठता है। इस श्रेष्ठता से राजा समृद्ध होता है। "अभित्वासूर नोनुमः" यह रथंतर बृहत् साम का अनुरूप है। यह लोक रथन्तर है, वह लोक बृहत् है। इस लोक का वह लोक अनुरूप है, और उस लोक का यह लोक अनुरूप है। इस प्रकार रथन्तर को बृहत् का अनुरूप बना लेते हैं और दोनों लोकों का यजमान को भोग प्राप्त कर लेते हैं। ब्रह्म रथन्तर है, क्षत्र बृहत् । ब्रह्म में क्षत्र प्रतिष्ठित है। और क्षत्र में ब्रह्म। इस प्रकार दोनों सामों को सयोनिता प्राप्त होती है। धाय्या वही है, यद् वावान (ऋ० १०।७४।६) । इसका ब्राह्मण पहले कहा जा चुका। साम प्रगाथ यह है :- उभयं शृणवच्च न......(१) तं हि स्वराजं......(२) (ऋ० ८।६१।१-२) यह दोनों सामों का रूप है जो गाये जाते हैं। (२) ३-त मुष्टुहि यो अभिभूत्योजा......(ऋ० ६।१८) इसमें 'अभिभूति' में 'अभि' है। 'अषाळ्हम्' 'उग्रं', 'सह- मानम्' क्षत्र के भी रूप हैं। इसमें पन्द्रह मन्त्र हैं। ओज, क्षत्र और वीर्य पन्द्रह अंक वाला है। इस ओज, क्षत्र तथा वीर्य से राजा सम्पन्न होता है। यह भरद्वाज का सूक्त है। बृहत् साम को भी भारद्वाज ने ही निकाला था। और यह आर्ष है। वह राजसूय समृद्ध हो जाता है जिसमें बृहत् होता है। जब

४६० [ आठवां पञ्चिका कोई क्षत्रिय यज्ञ करे तो बृहत् पृष्ठ को काम में लावे क्योंकि इससे यज्ञ समृद्ध हो जाता है। (३) ४—( राजसूय यज्ञ के ) होत्रकों ( मैत्रावरुण, ब्राह्मणाच्छंसी और अच्छावाक ) के कृत्य वही हैं जो ऐकाहिक यज्ञों में होते हैं। ये जो ऐकाहिक कृत्य हैं वह शांति के लिये हैं, क्लृप्त ( अर्थात् समर्थ ) और प्रतिष्ठा के लिये हैं। और यह यज्ञ को पूरा करते हैं और त्रुटि नहीं रहने देते। वे सर्वरूप और सर्व- समृद्ध होते हैं अर्थात् उनमें कोई कमी नहीं होती। इससे यज्ञ सर्वरूप और सर्वसमृद्ध हो जाता है। जो क्षत्रिय इसको करता है वह समझता है, "इन होत्रकों के सर्वरूप और सर्वसमृद्ध कृत्यों से मेरी कामनायें पूर्ण हों"। इसलिये जहाँ कहीं एकाहों में स्तोम या पृष्ठ पूरे नहीं होते वहाँ होत्रकों के ऐकाहिक कृत्यों से उनको समृद्ध बना देते हैं। कहते हैं कि उक्थ्य को १५ स्तोम और शस्त्र वाला होना चाहिये। क्योंकि इन्द्रियों की तीव्रता शक्ति है और ओज पन्द्रह अंक वाला है। क्षत्र वीर्य है। क्षत्रिय बल है। इस प्रकार वह ओज, क्षत्र और वीर्य से युक्त होता है। इसके स्तोम और शस्त्र तीस ( पन्द्रह-पन्द्रह ) होते हैं। विराट् छन्द में तीस अक्षर होते हैं। विराट् अन्न है। विराट् में स्थापना करने का अर्थ यह है कि वह उसको अन्न में स्थापित करता है। इसलिये वह उक्थ १५ अंकों वाला होना चाहिये। अग्निष्टोम जो ज्योतिष्टोम का भाग है यहाँ ठीक होगा। त्रिवृत स्तोम ब्रह्म है और पंद्रह अंकों वाला क्षत्रिय। ब्रह्म क्षत्र से पहले हैं। ( राजा को सोचना चाहिये ) "अगर ब्रह्म प्रथम हो जायगा तो हमारा राष्ट्र सुदृढ़ और व्यथा-रहित हो जायगा"। सत्रह वैश्यों का अंक है और इक्कीस शूद्रों का। स्तोमों में

पहला अध्याय ] ४६१ त्रिवृत् तेज है, पंचदश वीर्य है, सप्तदश सन्तान है और इक्कीस प्रतिष्ठा है। इस प्रकार इसको तेज, वीर्य, सन्तान और प्रतिष्ठा से सम्पन्न करता है। इसलिये ज्योतिष्टोम चाहिये। इसमें २४ स्तोम और शस्त्र चाहिये। संवत्सर में २४ अर्द्धमास होते हैं। संवत्सर में सम्पूर्ण अन्न होते हैं। इस प्रकार वह यजमान को सब प्रकार के अन्न से संयुक्त करता है। इसलिये ज्योतिष्टोम का अग्निष्टोम चाहिये। ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका का पहला अध्याय समाप्त हुआ।

दूसरा अध्याय ५—अब जिस क्षत्रिय ने दीक्षा ली है और जिसको नया छत्र प्राप्त हुआ है उसके पुनरभिषेक का प्रश्न है। अवभृथ स्नान और पशुबंध्य कृत्य के पश्चात् अन्तिम इष्टि की जाती है। इष्टि की समाप्ति पर पुनरभिषेक होता है। इसका सामान पहले से ही तैयार होता है। उदुंबर की लकड़ी का तख्त हो। उसके पाये प्रादेश मात्र (अंगूठे और उसके पास की उंगली के बीच के स्थान के बराबर) हों। आधे हाथ के शीर्ष हों, मूंज के बंधन हों, तख्त पर बिछाने के लिये शेर का चमड़ा हो, उदुंबर का चमसा हो, उदुंबर की शाखा हो। उस उदुंबर के चमसे में आठ चीजें हों :—दही, शहद, घी, धूप में बरसने वाला मेंह का पानी, शष्प, तोक्म (जौ के पौधे), सुरा और दूर्व। स्फ्या से लकीर खींचकर दक्षिण की ओर तख्त रखते हैं। और उसका आगे का भाग पूर्व की ओर होता है। उसके दो पाये ( ४६२ )

दूसरा अध्याय ] ४६३ वेदी के भीतर होते हैं दो बाहर । यह पृथ्वी श्री है । जो वेदी के भीतर है वह उसका परिमित रूप है । और जो वेदी के बाहर है वह अपरिमित रूप है। अब यह जो वेदी के भीतर दो पाये हैं और वेदी के बाहर दो पाये, इनसे वे सब कामनायें पूर्ण होती हैं जो वेदी के भीतर से पूरी होती हैं या वेदी के बाहर से । (१) ६—तख्त को शेर के चमड़े से इस प्रकार ढक देता है कि लोमं ऊपर को रहें और गर्दन पूर्व को । व्याघ्र जंगल के पशुओं में क्षत्र है । राजा भी क्षत्र है । इस प्रकार क्षत्र से क्षत्र की समृद्धि होती है । राजा उस पर बैठने के लिये पीछे से आता है। घुटने टेक कर इस प्रकार बैठता है कि दाहिनी जाँघ ज़मीन से छू जाय और दोनों हाथों से तख्त को पकड़ कर इस मंत्र का पाठ करता है :— “अग्निष्ट्वा गायत्र्या सयुक् छन्दसारोहत्व सवितोष्णिहा सोमोऽनुष्टुभा बृहस्पतिर्बृ॑हत्या मित्रावरुणौ पंक्त्येंद्र॑स्त्रिष्टुभा विश्वेदेवा जगत्या तानह- मनुराज्याय साम्राज्याय भौज्याय स्वाराज्याय वैराज्याय पारमेष्ठ्याय राज्याय माहाराज्यायाधिपत्याय स्वावश्यायातिष्ठायारोहामि ।” “हे तख्त, तुझ पर अग्नि गायत्री छन्द से चढ़े । सविता उष्णिक् से, सोम अनुष्टुभ् से, बृहस्पति बृहत् से, मित्रावरुण पंक्ति से, इन्द्र त्रिष्टुभ् से, विश्वेदेवा जगती से । इनके पीछे मैं चढ़ूं, अनुराज्य, साम्राज्य, भोग, स्वाराज्य, वैराज्य, के लिये और प्रजापति के लोक में जाने के लिये, राज्य के लिये, महा- राज्य के लिये आधिपत्य के लिये, स्वतंत्रता के लिये, और दीर्घ काल तक ठहरने के लिये ।” इस मंत्र को पढ़कर राजा पहले दाहिना घुटना रखता है फिर बायां । ऐसा होता है । यह लोगों का कहना है । देव तख्त रूपी श्री के ऊपर इस प्रकार छंदों से युक्त होकर चढ़े कि अगला अगला छन्द पिछले पिछले छन्द से चार अक्षर

४६४ [ आठवीं पञ्चिका अधिक हो । अग्नि गायत्री से, सविता उष्णिक् से, सोम अनु- ष्टुभ् से, बृहस्पति बृहत् से, मित्रावरुण पंक्ति से, इन्द्र त्रिष्टुभ् से, विश्वेदेवा जगती से । अब यह दो मंत्र पढ़े जाते हैं :— अग्नेर्गायत्र्यभवत् सयुग्वो...( ४ ) विवराङ्मित्रावरुणयो...( ५ ) ( ऋ० १०।१३०।४-५ ) जो राजा इस प्रकार इन देवों के पीछे तख्त पर चढ़ता है उसका उत्तरोत्तर योग क्षेम होता है । श्री को प्राप्त होता है। और प्रजा का ऐश्वर्य और आधिपत्य प्राप्त करता है । जब पुरोहित राजा का अभिषेक करता है तो जलों की शान्ति के लिये यह मंत्र बुलवाता है :— “शिवेन मा चक्षुषा पश्यतापः शिवयातन्वोपस्पृशत त्वचं मे सर्वाँ अग्नीँरप्सु षदो हुवे वो मयि वर्चो बलमोजो निधत्त ।” “हे जलो, मुझको कल्याणकारी आँख से देखो, मेरी त्वचा को अपने कल्याणकारी अंगों से छुओ । जो अग्नियाँ जलों में हैं उन सब को मैं बुलाता हूँ कि वे वर्च, बल और ओज को मुझ में धारण करावें ।” यदि जलों का आह्वान न किया जाय तो वे अशांत होकर उस अभिषेक वाले क्षत्रिय से वीर्य को छीन लेते हैं । (२) ७—अब उदुंबर की शाखा को उसके सिर पर रखकर जल छिड़कते हैं और यह मंत्र पढ़ते जाते हैं :— “इमा आपः शिवतमा इमाः सर्वस्य भेषजीः । इमा राष्ट्रस्यबर्ध नीरिमा राष्ट्रभृतोऽमृताः । याभिरिन्द्रमभ्यषिंचत् प्रजापतिः सोमं राजानं वरुणं यमं मनुं ताभिरद्भिरभिषिंचामि त्वामहं राज्ञां त्वमधिराजो भवेह । महान्तं त्वा महीनां सम्राजं चर्षणीनां देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्य जीजनद् देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामग्नेस्तेजसा सूर्य्यस्य वर्चसे न्द्रियेणाभिषिंचामि । बलाय श्रियै यशसेऽन्नाद्याय ।”

दूसरा अध्याय ] ४६५ “ये जल कल्याणकारी, सब की औषध, राज के बढ़ाने वाले, राज को क़ायम रखने वाले और अमृत हैं। इन्हीं के द्वारा प्रजापति ने इन्द्र का, सोम राजा का, वरुण का, यम का और मनु का राज्याभिषेक किया था। इन्हीं जलों से मैं तेरा राज्याभिषेक करता हूँ, कि तू इस संसार में अधिराज हो। तेरी माता देवी ने तुझे लोगों के ऊपर महान् राज करने के लिये जना। तेरी भद्रा मा ने तुझे जना। देव सविता की प्रेरणा से, अश्विनों के बाहुओं से, पूषा के दोनों हाथों से, अग्नि के तेज से, इन्द्र की शक्ति से मैं तेरा अभिषेक करता हूँ कि तुझे बल, श्री, यश और अन्न आदि प्राप्त हों।” यदि पुरोहित चाहे कि राजा को अकेले ही बल आदि की प्राप्ति हो तो ‘भू’ कहे, यदि दो की ( पुत्र सहित ) तो ‘भूः- भुवः’ कहे। यदि तीन की ( पुत्र पौत्र सहित ), तो “भूर्भुवः स्वः” कहे। कुछ लोगों का कहना है कि चूंकि यह व्याहृतियाँ सब चीजों की प्राप्ति कराती हैं, इसलिये इनके उच्चारण से दूसरों के लिये ही कार्य्य होता है, अपने लिये नहीं। इसलिये यहाँ “भूर्भुवःस्वः” व्याहृतियाँ न कहनी चाहियें। केवल ‘देवस्य त्वा सवितुः’ इत्यादि बोलना चाहिये। कुछ की राय है कि व्याहृतियों को छोड़कर पढ़ने से केवल पहले जन्म के ऊपर ही अधिकार होता है, इस जन्म के लिये नहीं। सत्यकाम जाबाल का कथन है कि यदि व्याहृतियों को छोड़कर मंत्र बोला जाय और अभिषेक किया जाय तो इसी जीवन की सिद्धि होती है। उद्दालक आरुणि कहते हैं कि जो व्याहृतियों सहित अभिषेक होता है उसमें राजा विजय पाकर सभी चीज़ों की प्राप्ति कर लेता है। ३०

४६६ [ आठवीं पञ्चिका इसलिये अभिषेक करते समय "देवस्य त्वा......अन्नाद्याय भूर्भुवः स्वः" ऐसा पाठ करना चाहिये । यज्ञ करने वाले क्षत्रिय से यह चीजें निकल जाती हैं :- ब्रह्मत्व जो क्षत्रिय को प्राप्त हो गया था, ऊर्ज, अन्नाद्य, जल और ओषधियों का रस, ब्रह्मवर्चस्, पुष्टि, संतति, क्षत्र रूप । क्षत्र ओषधियों की प्रतिष्ठा है। जो इन दो आहुतियों को देता है वह ब्रह्मत्व को क्षत्रत्व में स्थापित करता है । (३) ८-तख्त, चमसा और शाखा उदुम्बर की क्यों हो ? इसलिये कि उदुम्बर ऊर्ज है और उदुम्बर अन्न है। उदुम्बर की इन चीजों का प्रयोजन यह है कि ऊर्ज और अन्न धारण कराता है। दही, मधु और घी के विषय में यह बात है कि यह जलों और ओषधियों के रस हैं। इनके द्वारा वह राजा में जलों और ओषधियों का रस धारण कराता है । धूप के समय के मेंह के पानी से तेज और ब्रह्मवर्चस् का तात्पर्य है। इससे वह तेज और ब्रह्मवर्चस् को राजा में स्थापित करता है। शष्प और तोक्म ( घास ) पुष्टि और प्रजा का रूप है। इससे राजा में पुष्टि और प्रजा को स्थापित कराता है। यह जो सुरा है वह क्षत्र रूप है। और यह अन्न का रस भी है। इस प्रकार क्षत्र और अन्न का रस दोनों उसमें स्थापित किये जाते हैं। यह जो दूर्व है वह ओषधियों का राजा है। दूर्व राजा का चिह्न है, जैसे राजा अपने राज में विस्तृत होता है ऐसे ही दूर्व भी विस्तृत रहती है। जैसे दूर्व की जड़ें भली भांति पृथ्वी में प्रतिष्ठित होती हैं उसी प्रकार राजा भी राज्य में प्रतिष्ठित होता है। इस प्रकार राजा में ओषधियों का क्षत्र तथा प्रतिष्ठा स्थापित होती है।

दूसरा अध्याय ] ४६७ जो चीजें यज्ञ करने के अनन्तर राजा में से निकल गई थीं वह फिर उसमें आ जाती हैं। उनके द्वारा वह इस प्रकार सफल होता है। अब वह सुरा के कंस (प्याले) को उसके हाथ में देता है, और यह मंत्र पढ़ता है :- स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धारया। इन्द्राय पातवे सुतः ॥ (ऋ० ६।१।१) "स्वादवाली और मद वाली सोम धारा से पवित्र कर। तू इन्द्र की रक्षा के लिये निचोड़ा गया है।" अब शांति का वचन बोलता है :- "नाना हि वां देवहितं सदस्कृतं मा संसृक्षाथां परमे व्योमनि। सुरा त्वमसि शुष्मिणी सोम एष राजा मैनं हिंसिष्टं स्वां योनिमाविशंतौ ॥ "(हे सुरा और सोम) देवों ने तुम दोनों के लिये अलग- अलग स्थान दिया है। परम आकाश में मत मिलो। सुरा तू बलवान है। सोम, तू राजा है। इसको मत मार। अपने-अपने स्थान को जा।" सोम पान और सुरापान में भिन्नता है। पीकर यह सोचे कि यह (प्याले का देने वाला ऋत्विज्) मेरा मित्र है और जो सुरा बच रहे वह उसको दे। इस प्रकार वह मित्र को सुरा का भाग देता है। इस प्रकार जो इस रहस्य को सम- झता है वह अपने मित्र को उसमें स्थान देता है। (४) ९—अब उदुम्बर शाखा की ओर देखते-देखते उतरता है। उदुम्बर ऊर्ज और अन्नाद्य है। इस प्रकार राजा इनको धारण करता है, ऊपर बैठकर और नीचे दोनों पैर करके अपने उतरने को घोषित करता है :- "प्रतिष्ठामि द्यावापृथिव्योः प्रतिष्ठामि प्राणापानयोः प्रति- तिष्ठाम्यहोरात्रयोः प्रतिष्ठाम्यन्नपानयोः प्रति ब्रह्मन् प्रतिक्षत्रे प्रत्येषु त्रिषु लोकेषु तिष्ठामि"।

१६८ [ आठवीं पञ्चिका अंत को सब-आत्मा ( पूरे बल से ) से खड़ा होता है। और सब लोकों में प्रतिष्ठित होता है। उत्तरोत्तर श्री को प्राप्त करता है। जो राजा पुनरभिषेक करके उतरता है वह अपनी प्रजा के ऐश्वर्य और आधिपत्य को प्राप्त कर लेता है। उतर कर पूर्व की ओर मुखकर कुछ तिरछा खड़ा होकर तीन बार कहता है :— नमो ब्रह्मणे, नमो ब्रह्मणे, नमो ब्रह्मणे। फिर कहता है :— ‘वरं ददामि जित्या अभिजित्यै विजित्यै संजित्यै” “मैं जय, अभिजाय, विजय और संजय के लिये वर देता हूँ।” इस प्रकार तीन बार ब्रह्म को नमस्कार करने से क्षत्र ब्रह्म के वश में आ जाता है। इस प्रकार जब क्षत्र ब्रह्म के वश में आ गया तो राष्ट्र समृद्ध होता है और वीरों को उत्पन्न करता है। यह जो कहता है कि “वरं ददामि जित्या......” इससे वह वाणी को निकालता है। क्योंकि 'ददामि' कहने से यह तात्पर्य है कि वाणी को वश में कर लिया। वह सोचकर कि वाणी को जीत लेने से मेरे सब काम ठीक हो जायंगे वह वाणी को बोलता है और फिर उठकर आहव- नीय अग्नि में समिधा रखता है यह पढ़ कर :— “समिदसि सम्मैधैवेन्द्रियेण वीर्येण स्वाहा ।” इस प्रकार वह इंद्रिय और वीर्य से अपने को सम्पन्न करता है। समिधा रखकर तीन पग पूर्व और उत्तर की ओर बढ़ाता और यह पढ़ता है :—

दूसरा अध्याय ४६९ "सन्मृत्तिरसि दिशां मयि देवेभ्यः कल्पत । कल्पतां मे योगक्षेमो- ऽभयं मेऽस्तु ।" "तू दिशाओं को जीतने वाला है। मुझे देवों के योग्य बनाओ । मेरे लिये योगक्षेम हो । अभय हो ।" अब वह विपरीत दिशा की ओर चलता है। पराजय को हटाने के लिये । ऐसा कहते हैं । ( ५ ) १०—देव और असुर इन लोकों में लड़ते थे । वे पूर्व की दिशा में लड़े और असुर जीत गये । वे दक्षिण की दिशा में लड़े । वहाँ भी असुर जीत गये । वे पश्चिम की दिशा में लड़े । वहाँ भी असुर जीत गये । वे उत्तर की दिशा में लड़े । वहाँ भी असुर जीत गये । अब वे पूर्व और उत्तर के बीच की (अवान्तर) दिशा में लड़े और जीत गये । राजा जब दो सेनाओं के बीच में खड़ा होकर लड़ाई को चले तो पूर्व और उत्तर की दिशा में चले और अपने घर के पुरोहित से कहे, "ऐसा कर कि मैं इस सेना को जीत जाऊँ ।" वह कहे, "अच्छा" और रथ के ऊपर के भाग को छूकर यह पढ़े :— "वनस्पते वीड्वंगो हि भूयाः" ( ऋ० ६।४७।२६ ) फिर राजा से कहे, "इस (उत्तर-पूर्व) दिशा में मुड़, तेरा रथ आदि भी इसी दिशा की ओर जावे । अर्थात् उत्तर-पूर्व की ओर, फिर उत्तर-पश्चिम की ओर, दक्षिण-पूर्व की ओर, और अन्त में शत्रु की ओर ।" इस सूक्त को पढ़कर रथ को घुमावे :— अभीवर्तेन हविषा......(ऋ० १०।१७४)

४७० [ आठवीं पञ्चिका और इन सूक्तों को पढ़कर रथ की ओर देखे :— अप्रतिरथ सूक्त (ऋ० १०।१०३) आशुःशिशानो…… शांस सूक्त (ऋ० १०।१५२) शास इत्था…… सौपर्ण सूक्त (प्र धारायन्तु मधुनः) जब युद्ध में जाते समय कहता है, “तथा मे कुरु यथाहमिमं संग्रामं संजयानि”, “मेरे लिये ऐसा कर कि मैं युद्ध में जीत जाऊँ ।” तो वह अवश्य जीत जायगा अब वह उत्तर पूर्व की दिशा में लड़ेगा और जीत जायगा । अगर अपने देश से निकाल दिया गया हो और लड़ाई पर जा रहा हो तो ऐसा कहे, “ऐसा कर कि मैं अपने राष्ट्र को लौट आऊँ ।” अब वह उसको उत्तर-पूर्व की दिशा में जाने देता है और इस प्रकार राजा अपने देश को लौटता है । उत्तर-पूर्व की ओर खड़ा होकर वह महल को लौटता है और नीचे का मंत्र पढ़ता है मानों वह शत्रु को हरा चुका :— अप प्राच इन्द्र……(ऋ० १०।१३१।१) ऐसा करने से वह शत्रु रहित हो जाता है और उत्तरोत्तर श्री को प्राप्त होता है । जो इस मंत्र को पढ़ता हुआ महल को लौटता है वह प्रजाओं के ऐश्वर्य और आधिपत्य को प्राप्त होता है । महल में आकर घर की अग्नि के पास बैठता है । तब ऋत्विज चार प्याले घी के भरता है । और इन्द्र के लिये तीन आहुतियाँ देता है और प्रपद रीति से मंत्र पढ़ता है । जिससे वह रोग, हानि आदि से सुरक्षित रहे, और अभय को प्राप्त हो । (६)