ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
दूसरा अध्याय ४६९ "सन्मृत्तिरसि दिशां मयि देवेभ्यः कल्पत । कल्पतां मे योगक्षेमो- ऽभयं मेऽस्तु ।" "तू दिशाओं को जीतने वाला है। मुझे देवों के योग्य बनाओ । मेरे लिये योगक्षेम हो । अभय हो ।" अब वह विपरीत दिशा की ओर चलता है। पराजय को हटाने के लिये । ऐसा कहते हैं । ( ५ ) १०—देव और असुर इन लोकों में लड़ते थे । वे पूर्व की दिशा में लड़े और असुर जीत गये । वे दक्षिण की दिशा में लड़े । वहाँ भी असुर जीत गये । वे पश्चिम की दिशा में लड़े । वहाँ भी असुर जीत गये । वे उत्तर की दिशा में लड़े । वहाँ भी असुर जीत गये । अब वे पूर्व और उत्तर के बीच की (अवान्तर) दिशा में लड़े और जीत गये । राजा जब दो सेनाओं के बीच में खड़ा होकर लड़ाई को चले तो पूर्व और उत्तर की दिशा में चले और अपने घर के पुरोहित से कहे, "ऐसा कर कि मैं इस सेना को जीत जाऊँ ।" वह कहे, "अच्छा" और रथ के ऊपर के भाग को छूकर यह पढ़े :— "वनस्पते वीड्वंगो हि भूयाः" ( ऋ० ६।४७।२६ ) फिर राजा से कहे, "इस (उत्तर-पूर्व) दिशा में मुड़, तेरा रथ आदि भी इसी दिशा की ओर जावे । अर्थात् उत्तर-पूर्व की ओर, फिर उत्तर-पश्चिम की ओर, दक्षिण-पूर्व की ओर, और अन्त में शत्रु की ओर ।" इस सूक्त को पढ़कर रथ को घुमावे :— अभीवर्तेन हविषा......(ऋ० १०।१७४)
४७० [ आठवीं पञ्चिका और इन सूक्तों को पढ़कर रथ की ओर देखे :— अप्रतिरथ सूक्त (ऋ० १०।१०३) आशुःशिशानो…… शांस सूक्त (ऋ० १०।१५२) शास इत्था…… सौपर्ण सूक्त (प्र धारायन्तु मधुनः) जब युद्ध में जाते समय कहता है, “तथा मे कुरु यथाहमिमं संग्रामं संजयानि”, “मेरे लिये ऐसा कर कि मैं युद्ध में जीत जाऊँ ।” तो वह अवश्य जीत जायगा अब वह उत्तर पूर्व की दिशा में लड़ेगा और जीत जायगा । अगर अपने देश से निकाल दिया गया हो और लड़ाई पर जा रहा हो तो ऐसा कहे, “ऐसा कर कि मैं अपने राष्ट्र को लौट आऊँ ।” अब वह उसको उत्तर-पूर्व की दिशा में जाने देता है और इस प्रकार राजा अपने देश को लौटता है । उत्तर-पूर्व की ओर खड़ा होकर वह महल को लौटता है और नीचे का मंत्र पढ़ता है मानों वह शत्रु को हरा चुका :— अप प्राच इन्द्र……(ऋ० १०।१३१।१) ऐसा करने से वह शत्रु रहित हो जाता है और उत्तरोत्तर श्री को प्राप्त होता है । जो इस मंत्र को पढ़ता हुआ महल को लौटता है वह प्रजाओं के ऐश्वर्य और आधिपत्य को प्राप्त होता है । महल में आकर घर की अग्नि के पास बैठता है । तब ऋत्विज चार प्याले घी के भरता है । और इन्द्र के लिये तीन आहुतियाँ देता है और प्रपद रीति से मंत्र पढ़ता है । जिससे वह रोग, हानि आदि से सुरक्षित रहे, और अभय को प्राप्त हो । (६)
दूसरा अध्याय ] ४७१ ११—यह तीन मंत्र यह हैं :— पर्य॑षु प्र धन्व॒ वाज॑सातये परि वृत्रा (भूर्ब्रह्म प्राणममृतं प्रपद्यतेऽ यमसौ शर्म॑ वर्मभयं स्वस्तये, सह प्रजया सह पशुभिः) षि स क्षिः द्विषस्तरध्या ऋणया न ईयसे (स्वाहा) । (ऋ० ६।११०।१) अनु॒ हि त्वा सु॒तं सोम॒मदामसि म॒हे सम (भुवो ब्रह्म प्राणममृतं प्रपद्यतेऽयमसौ शर्म वर्मभयं स्वस्तये । सह प्रजया सह पशुभिर् य राज्ञे वाजां अभि पवमान प्रगाहसे (स्वाहा)···(ऋ० ६।११०।२) अजीजनो॒ हि पव॑मान॒ सूर्य्ये वि॒धारे श (स्वर्ब्रह्म प्राणममृतं प्रपद्यते ऽयमसौ शर्म वर्मभयं स्वस्तये । सह प्रजया सहपशुभिः ) क्मना॒ पयः । गोज॑रीया रंह॑माणाः पुर॒न्ध्या (स्वाहा)···(ऋ० ६।११०।३) जिस राजा के लिये ऋत्विज इन इन्द्र के तीन मंत्रों से जो प्रपद रीति से पढ़े गये हैं चार चार चमसों की तीन आहुतियाँ देता है तो वह अपनी सब अरिष्ट बातों पर विजय पाता है । शत्रुओं से छूट जाता है, त्रयी विद्या के द्वारा सुरक्षित रहता है, सब दिशाओं में विचरता है और इन्द्र लोक में प्रतिष्ठा पाता है । अब वह सन्तान, गायों, घोड़ों और पुरुषों के लिये प्रार्थना करता है :--- “इह गावः प्रजयाध्व मिहाश्वा इह पुरुषाः, इहो सहस्र दक्षिणा वीरत्राता निषीदतु ।” हे गायो, तुम यहाँ उत्पन्न हो; हे घोड़ो, यहाँ उत्पन्न हो; हे पुरुष, यहाँ उत्पन्न हो; यहाँ बहुत बड़ा वीर और जाता (मेरा
- जितना भाग कोष्ठ में बन्द है वे वेद मन्त्र नहीं है किन्तु वेद मन्त्र में बीच में पैवन्द लगाया गया है। यही प्रपद रीति कहलाती है।
४७२ [ आठवीँ पञ्चिका लड़का ) पैदा हो जो हजारों दक्षिणाायें दे ।” ऐसी प्रार्थना करने वाले के बहुत सन्तान और पशु उत्पन्न होंगे । जिस क्षत्रिय के लिये पुरोहित लोग इस रहस्य को समझते हुये यज्ञ करते हैं उसकी प्रतिष्ठा होती है । लेकिन जो रहस्य को न समझकर क्षत्रिय के लिये इस प्रकार यज्ञ कराते हैं, वह उसको मार डालते हैं घसीटते हैं और धन छीन लेते हैं, जैसे अगर कोई बन में जाता हो तो चार डाकू उसको पकड़ लें, और खाई आदि में डालकर उसके धन को छीन लें । परीक्षित के पुत्र जन्मेजय ने जो इस रहस्य को समझता था कहा है, 'मेरे रहस्य समझने वाले ऋत्विजों ने मुझ रहस्य समझने वाले को यज्ञ कराया । इसलिये मैं विजयी हुआ । मैं लड़ने के उत्सुक शत्रु को शीघ्र ही जीतता हूँ । दैवी अथवा मानुषी तीर जो इस सेना से आयें मुझे न ही लग सकते । मैं पूर्ण आयु वाला हूँगा । मैं सब पृथ्वी का स्वामी होऊँगा । ' जो इस रहस्य को समझकर इस प्रकार यज्ञ करता है उसकी पूर्ण आयु होती है और वह सब भूमि का अधिपति होता है । (७) ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त हुआ ।
तीसरा अध्याय १२—अब इन्द्र के महाभिषेक का वर्णन किया जाता है। प्रजापति के सहित देवों ने कहा, 'यह ( इन्द्र ) देवों में सब से अधिक ओजवाला, साहसी, सत्तम अर्थात् सत्त वाला और कामों को सबसे अच्छी भाँति करने वाला है। इसी का अभिषेक करें ( अर्थात् इसी को राजा बनावें ) ।" उन सब ने इन्द्र का महा- भिषेक करना स्वीकार कर लिया। वे उसके लिये ऋचाओं से बने हुये सिंहासन को लाये। उन्होंने बृहत् और रथंतर सामों को सिंहासन के अगले दो पाये बनाया और वैरूप और वैराज को पिछले दो पाये। शक्वर और रैवत को ऊपर का पट्टा, नौधस और कालेय को उसके बगल के तख्ते। ऋचाओं का उन्होंने ताना बनाया, सामों का बाना और यजुषों का बीच का भाग, यश को बिछौना, श्री को तकिया, सविता और बृहस्पति ने उसके अगले पाये पकड़े, वायु और पूषा ने पिछले, ( ४७३ )
४७४ [ आठवीं पञ्चिका मित्र और वरुण ने दो ऊपर के तख्ते और अश्विनों ने दो बगल के तख्ते । इन्द्र तब सिंहासन को इस प्रकार संबोधन करके उस पर चढ़ा, "वसु तुझ पर गायत्री छन्द, त्रिवृत स्तोम, रथंतर साम द्वारा चढ़े । उनके पीछे साम्राज्य के लिये मैं चढूँ । रुद्र तुझ पर त्रिष्टुभ् छन्द से, पंचदश स्तोम से और बृहत् साम से चढ़े । उनके पीछे मैं भोग के लिये चढूँ । आदित्य तुझ पर जगती छन्द, १७ स्तोम और वैरूप साम से चढ़े । उनके पीछे मैं स्वराज्य के लिये चढ़ूँ, विश्वेदेवा तुझ पर अनुष्टुभ् छन्द, २१ स्तोम और वैराज साम से चढ़े । और उनके पीछे मैं तुझ पर वैराज्य के लिये चढूँ । साध्य और आप्त्य तुझ पर पंक्ति छन्द, त्रिणव (२७) स्तोम और शक्वर साम से चढ़े और उनके पीछे मैं तुझ पर राज्य के लिये चढूँ । मरुत और अंगिरा तुझ पर अतिच्छंदस् छन्द से और ३३ स्तोम और रैवत साम से चढ़े और मैं उनके पीछे तुझ पर पारमेष्ठ्य के लिये. महाराज्य के लिये, स्वावश्य के लिये और अधिक जीवन के लिये चढूँ" । इन शब्दों को कह कर सिंहासन पर बैठे । जब इन्द्र इस प्रकार सिंहासन पर बैठ गया तो विश्वेदेवों ने उससे कहा, "जब तक इन्द्र की घोषणा न की जायगी वह पराक्रम के कार्य्य न कर सकेगा। परन्तु यदि ऐसी घोषणा की जायगी तो वह कर सकता है।" तब उन्होंने ऐसा करना अंगीकार कर लिया और इन्द्र के सामने मुँह करके जोर से (इन्द्र के पदों की) घोषणा करने लगे । देवों ने उसको साम्राज्य का सम्राट्, भोगों का भोक्ता, स्वराज्य का स्वराट्, वैराज्य का विराट्, राजों का पिता, परमेष्ठि, बना दिया । उन्होंने कहा, "आज क्षत्र पैदा हुआ,
तीसरा अध्याय ] ४७५ आज क्षत्रिय पैदा हुआ, विश्व का अधिपति पैदा हुआ, विश और लोगों का भोगने वाला पैदा हुआ, पुरों का नाश करने वाला पैदा हुआ । असुरों का घातक पैदा हुआ, ब्राह्मणों का रक्षक पैदा हुआ, धर्म का रक्षक हुआ !” जब घोषणा हो चुकी तो प्रजापति ने अभिषेक करके इन मन्त्रों को पढ़ा:—(१) १३—निषसाद धृत व्रतो वरुणः पस्त्यास्वा । साम्राज्य्याय (भौज़्याय, स्वाराज्याय, वैराज्याय, पारमेष्ठ्याय, राज्याय, माहाराज्याय, आधि- पत्याय, स्वावश्याय, अतिष्ठाय) सुक्रतुः । (ऋ० १।२५।१०) “धृतव्रत वरुण साम्राज्य इत्यादि के लिये बैठा” । इन्द्र गद्दी पर बैठा था । प्रजापति इन्द्र के सामने खड़ा हुआ और पश्चिम को मुँह करके उदुम्बर और पलाश की भीगी शाखा से उसका आभिषिंचन किया (सिर पर पानी छिड़का ) । नीचे की तीन ऋचाओं ( तृच ) और एक यजु और तीन व्याहृतियों का पाठ करके :— इमा आपः शिवतमा...(ऐतरेय ८।७) देवस्य त्वा सवित...(यजु० १।१०) भूर्भुवः स्वः...(तीन व्याहृतियां) (२) १४—अब वसुओं ने पूर्व दिशा में छः और पच्चीस (३१) दिनों में इन्द्र का अभिषेक किया, उन्हीं तीन ऋचाओं, उसी यजु और उन्हीं तीन व्याहृतियों से । उसके साम्राज्य के लिये । इस लिये इस पूर्व दिशा में राजा लोग साम्राज्य के लिये इन्हीं के द्वारा अभिषेक किया करते हैं और 'सम्राट्' कहलाते हैं । यह देवों का अनुकरण रूप है । इन्हीं ऋचाओं, इसी यजु और इन्हीं व्याहृतियों का पाठ करके ३१ दिन में दक्षिण दिशा में रुद्रों ने इन्द्र का अभिषेक
४७६ [ आठवीं पञ्चिका किया। भोग के लिये। इसलिये दक्षिण दिशा के राजा लोग देवों की क्रियाओं का अनुकरण करके इन्हीं ऋचाओं आदि के द्वारा भोग के लिए अभिषेक कराते हैं और 'भोज' कहलाते हैं। इन्हीं ऋचाओं, इसी यजु और इन्हीं व्याहृतियों का पाठ करके ३१ दिनों में पश्चिम दिशा में आदित्यों ने इन्द्र का स्वाराज्य के लिये अभिषेक किया। इन्हीं देवों का अनुकरण करके पश्चिम में राजा लोग स्वाराज्य के लिये अभिषेक कराते हैं और 'स्वराट्' कहलाते हैं। इन्हीं तीन ऋचाओं, इसी एक यजु और तीन व्याहृतियों का पाठ करके विश्वेदेवों ने ३१ दिन में वैराज्य के लिये इन्द्र का उत्तर दिशा में अभिषेक किया। इसी लिये इन देवों के कृत्यों का अनुकरण करके उत्तर दिशा में जो बर्फीले प्रदेश हैं उत्तर कुरु आदि पहाड़ के उत्तर को, वहाँ के राजा लोग इन्हीं ऋचाओं आदि के द्वारा वैराज्य के लिये अभिषेक कराते हैं और 'विराट्' कहलाते हैं। यह जो ध्रुवा बीच की प्रतिष्ठित दिशा है इसमें साध्य और आप्तों ने ३१ दिन में इन्हीं तीन ऋचाओं एक यजु और तीन व्याहृतियों द्वारा राज्य के लिये इन्द्र का अभिषेक किया। और देवों के कृत्यों के अनुकरण रूप में बीच की प्रसिद्ध ध्रुवा दिशा के जो राजा लोग हैं जैसे कुरु पांचाल सवश और उशीनर ये राज्य के लिये अपना अभिषेक कराते हैं और 'राजा' कहलाते हैं। इन्हीं तीन ऋचाओं, यजु और तीन व्याहृतियों का पाठ करके ३१ दिन में मरुतों और अङ्गिरसों ने 'ऊर्ध्व' दिशा में इन्द्र का पारमेष्ठ्य, महाराज्य, आधिपत्य और स्वावश्य के लिए अभिषेक किया। वह परमेष्ठी और प्रजापति हो गया।
तीसरा अध्याय ] ४७७ इन्द्र ने इस महाभिषेक से सबको जीत लिया और सब लोकों पर स्वतन्त्र कर लिया। ओर सब देवताओं में श्रेष्ठ और प्रतिष्ठित हो गया। साम्राज्य, भौज्य, स्वाराज्य, वैराज्य, पारमेष्ठ्यराज्य, महाराज्य, आधिपत्य को प्राप्त करके इस लोक में स्वयम्भू, स्वराट्, अमृत और उस लोक में सब कामनाओं का पूर्ण करने वाला हो गया। (:) ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ।
चौथा अध्याय १५—जो ऋत्विज इस रहस्य को समझता हुआ यह चाहे कि क्षत्रिय सब को जीत ले, सब लोकों को ले ले, और सब राजों में श्रेष्ठ और बड़ा हो जाय, साम्राज्य, भौज्य, स्वाराज्य, वैराज्य, पारमेष्ठ्य, राज्य, माहाराज्य, आधिपत्य, प्राप्त कर ले; सब जगह उसकी पहुँच हो, सब भूमि का मालिक हो, पूर्ण आयु वाला हो, और पृथिवी पर समुद्र तक राज्य करे और संशयरहित हो, उस ऋत्विज को चाहिये कि उस क्षत्रिय का इन्द्र के महाभिषेक की रीति से अभिषेक करे। और उससे यह शपथ ले कि "जिस रात्रि को तू पैदा हुआ उससे लेकर जिस रात्रि को तू मरेगा उस घड़ी तक जो कुछ तू ने लोक में सुकृत किया या आयु पाई या प्रजा मिली, उस सब को मैं छीन लूँगा अगर तू ने मुझसे द्रोह किया !" ( ४७८ )
चौथा अध्याय ] ४७९ ऐसा जानने वाला क्षत्रिय अगर चाहे कि मैं सब को जीत जाऊँ, सब लोक मुझे मिल जायँ, मैं सब राजों में श्रेष्ठ हो जाऊँ, साम्राज्य, भौज्य, स्वाराज्य, वैराज्य, परमेष्ठ्य राज्य, माहाराज्य, आधिपत्य प्राप्त हो जाय, सब भूमि, पूर्ण आयु, मिल जाय और समुद्र तक पृथ्वी का एक मात्र राजा हो जाऊँ तो वह बिना शंका किये श्रद्धा से ऐसी शपथ खाये कि "अगर मैं तेरे साथ द्रोह करूँ तो मुझसे जन्म से मृत्यु तक जो कुछ मैंने सुकृत किया या आयु और प्रजा हुई उसको तू छीन लेना ।" (१) १६—तब ऋत्विज कहे, "चार लकड़ियाँ लाओ, न्यग्रोध की, उदुंबर की, अश्वत्थ की और प्लाक्ष की ।" जो न्यग्रोध है वह वनस्पतियों में क्षत्रिय है। जो न्यग्रोध को लाता है, वह मानों उसमें क्षत्र को धारण कराता है। उदुंबर वनस्पतियों में भौज्य है। जो उदुम्बर लाता है वह उसमें भौज्य धारण कराता है। अश्वत्थ वनस्पतियों में साम्राज्य है। जो अश्वत्थ को लाता है वह उसमें साम्राज्य को धारण कराता है। साक्ष वनस्पतियों में स्वाराज्य और वैराज्य है। जो साक्ष को लाता है वह उसमें स्वाराज्य और वैराज्य धारण कराता है। अब उससे कहे, "चार औषधों (अन्नों) को लाओ, व्रीहि, महाव्रीहि, प्रियंगू, यव ।" व्रीहि ओषधियों में क्षत्रिय है। जो व्रीहि लाता है वह क्षत्रिय में क्षत्र को धारण कराता है। महा- व्रीहि ओषधियों में साम्राज्य है। जो महाव्रीहि को लाता है वह उसमें साम्राज्य को धारण कराता है। प्रियंगू (कांगुनी ओषधियों में भौज्य है। जो प्रियंगू लाता है वह उसमें भौज्य को धारण कराता है। जो यव है वह ओषधियों में सेनानी है। जो यव को लाता है वह उसमें सेना के नेतृत्व को धारण कराता है। (२)
४८० [ आठवाँ कण्डिका ७ १८, १९—अब वह उदुम्बर का सिंहासन लाता है जैसा ऊपर की ब्राह्मण में कहा गया। उदुंबर का चमसा लावे या उदुंबर का कोई और बरतन। और उदुम्बर की शाखा भी। इन सब चीजों को (चार तरह के अन्नों को) उदुम्बर के चमसे या पात्र में मिलाते हैं। इसके पश्चात् उस पर दही, शहद, घी और धूप में बरसता हुआ जल डालते हैं। और सिंहासन को सम्बो- धन करके कहते हैं :— बृहत् और रथंतर तेरे दो अगले पाये हैं और वैरूप और वैराज पिछले दो पाये। इत्यादि (देखो पृ० ४७३ से) (१८, १९ वही हैं जो १२, १३, १४ हैं ऊपर देखो)। (३ ४, ५) २०—इस लोक में जो दही है वह मानो इन्द्रिय है। यह जो दही से सींचता है वह क्षत्रिय में इन्द्रिय धारण कराता है। औषध और वनस्पतियों में जो रस है वह शहद है। इसलिये मधु से सींचकर क्षत्रिय में इन के रस को धारण कराता है। यह जो घी है वह पशुओं का तेज है। यह जो घी से सींचता है वह इस प्रकार क्षत्रिय में तेज धारण कराता है। यह जो जल है यह इस लोक में अमृत है। यह जो जल से सींचता है मानो उसमें अमृतत्व धारण कराता है। जिसका अभिषेक हुआ वह अभिषेक करने वाले ब्राह्मण को सोना, हजार गौयें, और चौकोर खेत दे। यह भी कहते हैं कि अपरिमित दक्षिणा दे क्योंकि क्षत्रिय अपरिमित है और अपरिमित दान देने से अपरिमित फल होगा। अब वह राजा के हाथ में सुरा का प्याला देता है और यह मंत्र पढ़ता है :—
चौथा अध्याय ] ४८१ स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोमधारया इन्द्राय पातवे सुते ॥ ( ऐ० ८।८ ) अब जो शेष रहे उसको इन दो मंत्रों को पढ़ कर पिये :— (१) रसिनः सुतस्य यदिन्द्रो अपिबच्छचीभिः इदं तदस्य मनसा शिवे न सोमं राजानिह भक्षयामि ॥ और (२) अभित्वा वृषभा सुते ···( ऋ० ८।४५।२२ ) सुरा में जो सोम का असर है उसको जैसे इंद्र के लिये महाभिषेक हुआ उसी प्रकार राजा का महभिषेक करके राजा को पिलाते हैं। सुरा को नहीं। और इन दो मंत्रों को पढ़ते हैं :— अपाम सोमम्···( ऋ० ८।४८।३ ) शन्नो भव चक्षसा···( ऋ० १०।३७।१० ) जिस प्रकार प्रिय पुत्र पिता का और प्रिय स्त्री पति का आलिङ्गन करके आनन्दित होती है उसी प्रकार यह राजा भी इन्द्र के समान महाभिषेक कराने के पश्चात् सोम या सुरा पान करके या अन्नाद्य खाकर आनन्दित होता है और अपने को भूल जाता है। (६) २१—कवष के पुत्र तुर ने परीक्षित के लड़के जनमेजय का वही राज्यभिषेक किया था जो इन्द्र का हुआ था। इसलिये जनमेजय सर्वत्र विजयी हुआ और उसने अश्वमेध यज्ञ किया । इसके सम्बन्ध में यह गाथा कही जाती है :— आसंदीवति धान्यादं रुक्मिणं हरितस्रजम् । अश्व बबंध सारंगं देवेभ्यो जनमेजयः ॥ “जनमेजय ने देवों के लिये तख्त के पास धान्य खाने वाले, माथे पर चिह्न वाले और हरी माला वाले घोड़े को बांधा।” ३१
४८२ [ आठवीँ पञ्चिका इसी इन्द्र के महाभिषेक से भृगु के लड़के च्यवन ने मनु के पुत्र शर्यात का अभिषेक किया, इसलिये मनु के पुत्र शर्यात ने
- ने पृथ्वी भर पर फिर कर उसको जीत लिया और अश्वमेध यज्ञ किया और देवों के यज्ञ में गृहपति बना । इसी इन्द्र के महाभिषेक से वाजरत्न के पुत्र सोमशुष्मा ने सत्राजित के पुत्र शतानीक का राज्याभिषेक किया । शतानीक ने पृथ्वी को घूम २ कर जीत लिया और अश्वमेध यज्ञ किया । इसी इन्द्र के महा- भिषेक से पर्वत और नारद ने अम्बाष्ठ्य का अभिषेक किया । इसलिये अम्बाष्ठ्य ने फिर २ कर पृथ्वी को जीत लिया और स्वयं अश्वमेध यज्ञ किया । इसी इन्द्र के महाभिषेक से पर्वत और नारद ने उग्रसेन के लड़के युधांश्रौष्टि का अभिषेक किया और इसने पृथ्वी भर को घूम फिर कर जीत लिया और अश्वमेध यज्ञ किया । इसी इन्द्र के महाभिषेक से कश्यप ने, भुवन के पुत्र विश्व- कर्मा ने घूम फिर कर समस्त पृथ्वी को समुद्र के तट तक जीत लिया और अश्वमेध यज्ञ किया । कहते हैं कि विश्वकर्मा की प्रशंसा में पृथ्वी ने यह गीत गाया :— न मा मर्त्यः कश्चन दातुमर्हति , विश्वकर्मन् भौवन मां दिदासित्थ । निमंक्ष्येऽहं सलिलस्य मध्ये , मोघस्त एष कश्यपायास संगरः । “हे विश्वकर्मा, कोई मेरा दान नहीं कर सकता । तू ने मुझे दान कर दिया । मैं समुद्र में गिर जाऊँगी । तेरा कश्यप को देने की प्रतिज्ञा करना व्यर्थ है ।” इन्द्र के इसी महाभिषेक से वशिष्ठ ने पिजवन के पुत्र
चौथा अध्याय ] ४८३ सुदास का महाभिषेक किया और उसने पृथ्वी भर में घूम कर विजय पाई और अश्वमेध यज्ञ किया । इन्द्र के इसी राज्याभिषेक से अंगिरस् के पुत्र संवर्त ने अविक्षित के पुत्र मरुत्तम का अभिषेक किया और यह सारी पृथ्वी पर घूमा, उसे विजय किया और उसने अश्वमेध यज्ञ किया । इसी के विषय में यह श्लोक गाया जाता है,— मरुतः परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन् गृहे । आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वे देवाः सभासदः ॥ "मरुत लोग मरुत के घर में अन्न बांटने वाले रहे । इसकी सब कामनायें पूरी हुईं और विश्वेदेव वहाँ मौजूद थे ।” (७) २२—इसी इन्द्र के अभिषेक से अत्रि के लड़के उद्मय ने अंग का अभिषेक किया । उससे अंग ने पृथ्वी की विजय की और अश्वमेध यज्ञ किया । उस अलोपांग ( नहीं लोप हुआ कोई अंग जिसका ) ने एक बार कहा था, "हे ब्राह्मण, मैं तुम्हे दस हज़ार हाथी और दस हज़ार दासियाँ देता हूँ, अगर तू मुझे अपने यज्ञ में बुलावे ।” इसके सम्बन्ध में पाँच नीचे के श्लोक कहे जाते हैं :— याभिर्गोभिरुदमयं प्रैयमेधा अयाजयन् । द्वे द्वे सहस्रे बद्धानामात्रेयो मध्यतो ददात् ॥१॥ अष्टाशीति सहस्राणि श्वेतान् वैरोचनो हयान् । प्रष्ठीं निश्चृत्य प्रायच्छद् यजमाने पुरोहिते ॥२॥ देशाद् देशात् समोळ्हानां सर्वासामाव्य दुहितॄणां । दशाददात् सहस्राण्यात्रेयो निष्ककंठ्यः ॥३॥
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चौथा अध्याय ] ४८५ भरतस्यैष दौष्यंतेरग्निः साचिगुणे चितः । यस्मिन्सहस्रं ब्राह्मणा बद्धशो गात्रि मेजिरे ॥२॥ अष्टासप्ततिं भरतो दौष्यंतिर्यमुना मनुः । गंगायां वृत्रघ्ने बदनात्पंचपंचाशतं हयान् ॥३॥ त्रयस्त्रिंशच्छतं राजाऽश्वान् अबधाय मेध्यान् । दौष्यंतिरत्यगाद्राज्ञो मायां मायावत्तरः ॥४॥ महाकर्म भरतस्य न पूर्वे नापरे जनाः । दिवं मर्त्य इव हस्ताभ्यां नोदापुः पंच मानवाः ॥५॥ अर्थ—भरत ने मष्णर देश में १०७ काले और सफ़ेद दांतों वाले, सोने से आभूषित हाथी दिये ॥१॥ जब दुष्यंत के पुत्र भरत ने साचीगुण नामी नगर में अग्नि स्थापित की तो हज़ारों गायों के गल्ले ब्राह्मणों को दान किये ॥२॥ दुष्यन्त के बेटे भरत ने ७८ घोड़े यमुना के किनारे और ५५ गंगा के किनारे इन्द्र के लिये बाँधे ॥३॥ दुष्यन्त के बेटे । राजा भरत ने ३३०० मेध्य घोड़ों को बांधा और अपनी प्रवल माया के द्वारा माया वाले शत्रु को पराजित कर दिया ॥४॥ जैसे पाँच प्रकार के आदमियों में से कोई भी अपने हाथों से आकाश नहीं छू सकता इसी प्रकार भरत के महाकर्म को न कोई पा सका, न पा सकेगा ॥५॥ इसी इन्द्र के महाभिषेक का उपदेश बृहदुक्थ ऋषि ने दुर्मुख पांचाल को किया । इसी से दुर्मुख ने राजा बन कर पृथ्वी भर का पर्यटन किया और उसको जीत लिया । वसिष्ठ गोत्री सत्यहव्य के पुत्र ने जानंतपि के लड़के अत्य- राति को इसका उपदेश किया । इससे अत्यराति ने इस विद्या
ब्राह्मण, जब मैं उत्तर कुरुओं को जीत लूँगा तब तू पृथ्वी का
४८६ [ आठवीं पञ्चिका को ग्रहण करके पृथ्वी भर का भ्रमण किया और उसे जीत कर राजा हो गया । वसिष्ठ गोत्री सत्यहव्य के पुत्र ने राजा से कहा, “तू ने समुद्र के तट तक सम्पूर्ण पृथ्वी जीत ली । अब तू मुझे भी ( दक्षिणा देकर ) बड़ा बना ।” अत्यराति ने उत्तर दिया, “हे ब्राह्मण, जब मैं उत्तर कुरुओं को जीत लूँगा तब तू पृथ्वी का राजा होगा और मैं तेरा सेनापति होऊँगा ।” सत्यहव्य के लड़के ने कहा, “यह देवक्षेत्र है । इसको कोई नहीं जीत सकता । तूने मुझे धोखा दिया . इस लिये मैं इसको तुझसे लिये लेता हूँ । जब अत्यराति से यह सब छीन लिया गया और वह निःशुक्र हो गया तो शिन्य के पुत्र शुष्मिण ने उसे मार डाला । इस लिये जो क्षत्रिय इस रहस्य को समझे और जिसका अभिषेक हो जाय उसको चाहिये कि ब्राह्मण से छल न करे । नहीं तो उसकी सम्पत्ति छिन जायगी और वह मार डाला जायगा । (९) ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ ।
पाँचवाँ अध्याय २४-अब पुरोहित के विषय में कहते हैं। देव उस राजा का अन्न नहीं खाते जिसके पुरोहित न हो। इसलिये यज्ञ की इच्छा करने वाला राजा पुरोहित को नियुक्त करे। 'देव मेरे अन्न को खावें' ऐसा सोचकर राजा पुरोहित को नियुक्त करके स्वर्ग को ले जाने वाली अग्नियों को स्थापित करे। पुरोहित उसका आहवनीय है। स्त्री गार्हपत्य है। पुत्र आन्वा- हार्यपचन या दक्षिणाग्नि है। जो कुछ वह पुरोहित के लिये करता है मानो आहवनीय में यज्ञ करता है। और जो स्त्री के लिये करता है मानों गार्हपत्य अग्नि में यज्ञ करता है। और जो पुत्र के लिये करता है मानों दक्षिणाग्नि में यज्ञ करता है। ये अग्नियाँ शांततनु ( विघ्न नाशक ) होकर पुरोहित से पूजी जाकर और यजमान से प्रसन्न होकर उसको स्वर्गलोक में ले जाती हैं। और क्षत्र, ( ४८७ )
४८८ [ आठवाँ पञ्चिका बल, राष्ट्र और प्रजा को देने वाली होती हैं। और यही अग्नियाँ यदि पुरोहित द्वारा अर्चित न हों तो प्रसन्न नहीं होतीं और यजमान को स्वर्ग लोक, तथा क्षत्र, बल, राष्ट्र और प्रजा से च्युत कर देती हैं। यह पुरोहित जो वैश्वानर अग्नि है पांच विघ्न कारक शक्तियाँ रखता है, एक उसकी वाणी में और एक पैरों में, एक त्वचा में, एक हृदय में और एक उपस्थ-इन्द्रिय में। इन जलती हुई शक्तियों से वह राजा पर आक्रमण करता है। वाणी में जो विघ्नकारक शक्ति है उसको वह यह कहकर शांत करता है, “भगवन्, आप अब तक कहां रहे। नौकर लोगो, इनके लिये तृण लाओ। यह जो पैरों में विघ्नकारक शक्ति है उसको वह पैर धोने के लिये जल लाकर शांत करते हैं। यह जो उसकी त्वचा में विघ्नकारक शक्ति है उसको वह अलंकारों द्वारा शांत कर रहा है। यह जो उसके हृदय में विघ्नकारक शक्ति है उसको तर्पण करके शांत करता है। यह जो उसकी उपस्थ इन्द्रियों में विघ्नकारक शक्ति है उसको वह घर में स्वच्छन्द निवास कराके शांत करता है। वह इस प्रकार शांततनु और प्रसन्न होकर उस को स्वर्ग को ले जाता है। और क्षत्र, बल, राष्ट्र, और प्रजा से संपन्न करता है। यदि यह शांततनु और प्रसन्न न हो तो स्वर्ग लोक से तथा क्षत्र, बल, राष्ट्र और प्रजा से उसको च्युत कर देता है। (१) २५—यहं जो पुरोहित अग्नि वैश्वानर है, इसमें पांच विघ्नकारक शक्तियाँ होती हैं। जैसे समुद्रभूमि को घेर कर सुरक्षित रखता है इसी प्रकार यह भी राजा को घेर कर सुरक्षित रखता है। जो राजा इस रहस्य को समझकर राष्ट्र के रक्षा करने वाले ब्राह्मण को पुरोहित नियत करता है उसका राष्ट्र सुरक्षित