ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
८० [ प्रथम पञ्चिक है “भद्रा शक्तिः” इत्यादि से यजमान के लिये आशीर्वाद देता है। अब वह विश्वरूपी ऋचा पढ़ता है विश्वा रूपाणि प्रति मुञ्चते कविः प्रासावीद् भद्रं द्विपदे चतुष्पदे । वि नाकमख्यत् सविता वरेण्योऽनु प्रयाणमुषसो विराजति ॥ ( ऋ० ५।८१।२ ) इस मंत्र को रराटी की ओर देखते हुए पढ़ना चाहिये, ( रराटी दर्भ की माला है जो हविर्धान के बीच के खंभों पर लटकी रहता है —ले० )। क्योंकि इस रराटी पर ही सफेद ओर काली सभी तरह की चीजें टंगी रहती हैं। जो इस रहस्य को समझ कर रराटी की ओर देखते हुये मंत्र को बोलता है वह अपने लिये और यजमान के लिये हर एक प्रकार की चीज सम्पादित कर लेता है। इस मंत्र को पढ़ कर समाप्त करता है। परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः । वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः ॥ ( ऋ० १।१०।१२ ) इस मंत्र को तब पढ़े जब दोनों हविर्धानों को दर्भ के गुच्छे से ढका हुआ मान ले। जो इस रहस्य को समझ कर दोनों हविर्धानों के ढक जाने पर इस मंत्र को पढ़ता है वह अपने और यजमान के लिये ओढ़ी पहनी हुई स्त्रियों का ( जो नंगी न हों ) सम्पादन करता है। दोनों हविर्धान यजु-मंत्र से ढके जाते हैं। अध्वर्यु इस यजु से इस प्रकार ढकते हैं। जब अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता दोनों ओर से मेथी ( एक प्रकार की लकड़ियां ) चलावें तब समाप्त करना चाहिये। क्योंकि तभी दोनों हविर्धान बन्द होते हैं। यह आठ ऋचायें जो बोली गईं रूप-समृद्ध हैं। जो रूप-समृद्ध होती हैं अर्थात् जिनमें उसी बात का विधान होता है। जो क्रिया की जाती है उसी से यज्ञ में सफलता होती है। इनमें से पहले और पिछले
प्रथम पञ्चिका ] ८१ को तीन बार बोलते हैं जिससे बारह हो जायं। क्योंकि साल में बारह महीने होते हैं। प्रजापति संवत्सर है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजापति सम्बन्धी इन ऋचाओं द्वारा समृद्धि को पाता है। पहली और पिछली ऋचा को तीन २ बार पढ़ कर वह यज्ञ के दोनों सिरों को बांध देता है जिससे यज्ञ काबू में रहे और गिर न जाय। (३) ३०—( उत्तर वेदी में अग्नि और सोम को लाना )। अग्नि और सोम के लाने पर अध्वर्यु होता को आदेश देता है कि उचित मंत्र पढ़ो। वह सविता के मंत्र को पढ़ता हैः— सावीर्हि देव प्रथमाय पित्र वर्ष्माणमस्मै वरिमाणमस्मै । अथ स्मभ्यं सवितर्वार्याणि दिवोदिव आ सुवा भूरि पश्वः ॥ (अथर्व ७।१४।३, आश्व० श्रौ० ४।१० ) यहां प्रश्न होता है कि जब अग्नि और सोम के लाने का प्रसंग है तो सविता का मंत्र क्यों पढ़ा गया। ( इसका उत्तर यह है ) कि सविता प्रसव का स्वामी है। इस मंत्र को पढ़कर ( अग्नि और सोम ) दोनों को सविता द्वारा उत्पन्न कराते हैं। इस लिये सविता का मंत्र पढ़ते हैं। अब वह ब्रह्मणस्पति की ऋचा पढ़ता है :— प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्रदेव्येतु सूनृता । अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥ ( ऋ० १।४०।३ ) यहां प्रश्न होता है कि जब अग्नि और सोम के लाने का प्रसंग है तो ब्रह्मणस्पति का मंत्र क्यों पढ़ते हैं। ( उत्तर यह है ) कि बृहस्पति ही ब्रह्मा है। इस मंत्र को पढ़कर ब्रह्मा को ( अग्नि और सोम ) दोनों का पुरोगव अर्थात् नेता बना देता है और ६
८२ [प्रथम पत्रिका यजमान ब्रह्म से युक्त होकर हानि नहीं उठाता। 'प्रदे॒व्ये॑तु सूनृता' से यज्ञ को 'सूनृत' या भद्र युक्त कर देता है। इसलिये ब्रह्मण- स्पति का मंत्र पढ़ता है। अब अग्नि की गायत्री छन्द की तीन ऋचाओं को पढ़ता है:- होता॑ दे॒वो अम॑र्त्यः पुर॒स्तादे॑ति मा॒यया॑। वि॒दथा॑नि प्र॒चोद॑यन् ॥ (ऋ० ३।२७।७) वा॒जी वाजे॑षु धीयतेऽध्व॒रेषु॒ प्र णी॑यते। विप्रो॑ य॒ज्ञस्य॑ सा॒धन॑:॥ (ऋ० ३।२७।८) धि॒या च॑क्रे वरे॒ण्यो भूतानां॒ गर्भ॑माद॒धे। दक्ष॑स्य पि॒तरं॑ त॒ना॥ (ऋ० ३।२७।६) जब सोमराजा को (उत्तर वेदी पर) एक बार ले गये तो असुरों और राक्षसों ने उसको 'सदस्' और हविर्धानों के बीच में मारना चाहा। अग्नि ने माया से उसको बचा लिया। जैसा कि मंत्र में है “पुरस्तादेति मायया” (माया से आगे २ चलता है)। अग्नि ने उसे इस तरह बचाया। इसलिये (सोम के) आगे २ अग्नि को ले चलते हैं। अब नीचे लिखे तीन मंत्र और एक मंत्र बोलते हैं:— (१) उप॑ त्वाग्ने दि॒वे दि॑वे॒ दोषा॑वस्तर्धिया व॒यम्। नमो॒ भर॑न्त॒ एम॑सि। (२) राज॑न्तमध्व॒राणां॑ गो॒पामृ॒तस्य॒ दीदि॑विम्। वर्ध॑मानं॒ स्वे दमे॑॥ (३) स न॑: पि॒तेव॑ सू॒नवेऽग्ने॑ सूपाय॒नो भ॑व। सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑॥ (ऋ० १।१।७-६) (४) उप॑ प्रि॒यं प॑नि॒प्नतं॒ युवान॒माहु॑तीवृधम्॥ अगन्म बिभ्रतो नमः॥ (ऋ० ६।१६।२६) क्योंकि यह दो अग्नियां, एक जो पहले लाई गई और दूसरी जो पीछे लाई गई, यदि आपस में लड़ जायं तो यजमान को कष्ट देंगी। इन तीन और एक मंत्रों को पढ़ कर वह उन में
पाँचवाँ अध्याय ] ८३ भिन्नता कर देता है और उनको उन उन के स्थान में पहुँचा देता है, बिना स्वयं अपने को या यजमान को हानि पहुँचाये हुये । आहुति देते हुये इस मंत्र को बोलता है :— अग्ने जुषस्व प्रति हर्य तद्वचो मन्द्र स्वधाव ऋतजात सुक्रतो॑ । यो विश्वतः प्रत्यङ् ङसि दर्शतो रण्वः सन् दृष्टौ पितुमाँ इव क्षयः ॥ ( ऋ० १।१४४।७ ) इससे अग्नि को एक जुष्टि ❀(१) आहुति देता है । जब सोम राजा को ले जाते हैं तो होता नीचे के तीन मंत्र जो गायत्री छन्द में हैं और सोम देवता के हैं पढ़ता है :— (१) सोमो जिगाति गातुविद् देवानामेति निष्कृतम् । ऋतस्य योनिमासदम् ॥ (२) सोमो अस्मभ्यं द्विपदे चतुष्पदे च पशवे । अनमीवा इषस्करत् ॥ (३) अस्माकमायुर्वर्धयन्नभिमातीः सहमानः । सोमः सधस्थमासदत् ॥ ( ऋ० ३।६२।१३,१४,१५ ) इस मंत्र को पढ़ने से वह सोम को उसी के देवता और उसी के छन्द से बढ़ाता है । ‘सोमः सधस्थमासदत्’ यह अन्तिम शब्द जिनसे प्रकट होता है कि सोम अपने स्थान पर बैठ रहा है होता को उस समय पढ़ने चाहिये जब कि सोम को लिये जा रहे हैं और अग्नीध्र के आगे बढ़ गये हैं तथा होता की पीठ अग्नीध्र की ओर हो गई है । अब विष्णु देवता का नीचे का मंत्र जपता है :— तमस्य राजा वरुणास्तमश्विना ऋतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः । दधार दक्षमुत्तममहर्विदं व्रजं च विष्णुः सखियाँ अपोर्णुते । ( ऋ० १।१५६।४ ) ❀हौग ने जुष्टि का अर्थ किया है- ‘as a favour’ or रियायती । सायण कहता है कि यह आहुति ‘अग्ने प्रियं’ अग्नि को प्रिय लगने के लिये है ।
८४ [ प्रथम पञ्चिका ( उस मरुतों के राजा विष्णु की बुद्धि का वरुण और दोनों अश्विन अनुकरण करते हैं। विष्णु अपने मित्रों सहित अन्धकार के स्थान को खोल कर दिन को उत्पन्न करता है।) विष्णु देवों का द्वारपाल है। इस लिये वह सोम के लिये द्वार खोल देता है । जब सोम को सदस् में रखने के निकट होते हैं तो यह मंत्र पढ़ता है :— अन्तश्च प्रागा अदितिर्भवास्यवयाता हरसो दैव्यस्य । इन्द विन्द्रस्य सख्यं जुषाणः श्रोधीव धुरमनुराय ऋध्याः । ( ऋ० ८।४८।२ ) जब सोम बैठ गया हो तो यह मंत्र पढ़ते हैं :— श्येनो न योनि सदनं धिया कृतं हिरण्ययमसदं देव एषति । प- रिखन्ति बर्हिषि प्रियं गिराश्वो न देवां अप्येति यज्ञियः । ( ऋ० ६।७१।६ ) जैसे बाज पक्षी अच्छी तरह बनाये हुये घोंसले में बैठता है वैसे ही सोम देवता स्वर्ण के आसन पर बैठता है। आसनों पर प्यारी स्तुतियां चलती हैं और यज्ञ सम्बन्धी घोड़े के समान वह देवताओं तक पहुँचता है । स्वर्ण के आसन से काले मृगचर्म का तात्पर्य है जिससे देवों का हवि ढका जाता है । वरुण के इस मंत्र से समाप्त करता है :— अस्तभ्नाद् द्यामसुरो विश्ववेदा अमिमीत वरिमाणं पृथिव्याः । आसीदद् विश्वा भुवनानि सम्राड् विश्वेत्तानि वरुणस्य व्रतानि । ( ऋ० ८।४२।१ ) ( असुर अर्थात् प्राणों के रक्षक देव ने द्यौ को थामा और पृथिवी के विस्तार को नापा । उस सम्राट् ने सब लोकों में प्रवेश किया। यह सब वरुण के व्रत हैं )
पाँचवाँ अध्याय ] ८५ सोम जब तक बंधा हुआ है तब तक वरुण के अधीन है । यह जब तक चल रहा है। इसको इसी के देवता और इसी के छन्द से समृद्ध करते हैं । यदि कोई यजमान का आश्रय चाहे या उसकी रक्षा का मांगने वाला हो तो होता इस मंत्र से समाप्त करे :- एवा वन्दस्व वरुणं बृहन्त नमस्या धीरममृतस्य गोपाम् । स नः शर्म त्रिवरूथं वि यंसत् पातं नो द्यावा पृथिवी उपस्थे । ( ऋ० ८।४२।२ ) जो इस रहस्य को समझ कर इस मंत्र से समाप्त करता है वह जितने लोगों के लिये चाहता है उनके लिये अभय प्राप्त कराता है । जो इस रहस्य को समझता है उसे इसी मंत्र से समाप्त करना चाहिये । यह सब १७ मंत्र जो बोले गये रूप समृद्ध हैं । जो मंत्र रूप समृद्ध होते हैं अर्थात् जिनमें उसी कृत्य का वर्णन होता है जो किया जाता है उससे यज्ञ में सफलता होती है। इन १७ में से पहले और पिछले को तीन-तीन वार पढ़ा । इस प्रकार २१ हो गये । प्रजापति २१ अंक वाला है । क्योंकि प्रजापति में १२ मास, पांच ऋतुयें, तीन लोक और सूर्य शामिल हैं । सूर्य का स्थान सब से ऊंचा है । वह देवों का क्षत्र है, वह श्री है, वह आधिपत्य है, वह चमकने वाले का स्वर्ग है, वह प्रजापति का घर है । वह स्वाराज्य है । होता यजमान को इन १७ मंत्रों से समृद्ध कर देता है ।
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri दूसरी पञ्चिका CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
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पहला अध्याय १—यज्ञ द्वारा ही देव ऊँचे स्वर्ग लोक को गये। उनको भय हुआ कि हमारे इस ( यज्ञ ' को देखकर मनुष्य और ऋषि लोग पीछें से जिज्ञासा करेंगे। उन्होंने यूप ( यज्ञ शाला का खंभा जिसमें पशु बांधते हैं ) द्वारा उनको रोक दिया। ( आयोपयन् ) इसीलिये इसका नाम यूप पड़ा। ( यूप का अर्थ हुआ वह जिसके द्वारा रोका जाय )। उन ( देवों ) ने स्वर्ग जाते हुये यूप को भूमि में इस प्रकार गाड़ा कि सिरा नीचे को रहे। तब मनुष्य और ऋषि भी देवों के यज्ञ करने के स्थान पर आकर सोचने लगे कि हमको भी यज्ञ के विषय में कुछ ज्ञान हो जाय। उन्होंने केवल यूप को पृथ्वी में नीचे की ओर सिरा किये हुये गढ़ा पाया। उन्होंने जाना कि इसी से देवों ने यज्ञ के रहस्य को छिपा दिया। उन्होंने यूप को उखाड़ दिया और उसका सिरा ऊपर को कर दिया। इससे उन्होंने यज्ञ को मालूम किया और स्वर्ग को देख लिया। यही प्रयोजन है कि यूप का सिरा ऊपर को करके गाड़ते हैं कि यज्ञ को जानें और स्वर्ग को देखें। ( ८९ )
९० [ दूसरी पञ्चिका यह यूप वज्र है। इसमें आठ धारें होनी चाहियें। वज्र में आठ धारें होती हैं। जब कोई वज्र को अपने शत्रु या वैरी पर मारता है वह मर जाता है। जो वध करने के योग्य है उसका वध करने के लिये। यूप वज्र है जो शत्रु के मारने के लिये खड़ा किया जाता है। इसलिये जो यजमान से द्वेष करता है वह यह देखकर कि यह अमुक पुरुष का यूप है हानि को प्राप्त हो जाता है। स्वर्ग की कामना वाला खदिर का यूप बनावे। क्योंकि खदिर का यूप बना कर ही देवों ने स्वर्ग को प्राप्त किया। इसी प्रकार खदिर का यूप बना कर ही यजमान स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है। जो अन्न और पुष्टि की इच्छा करे वह बिल्व का यूप बनावे। बिल्व पर हर साल फल आता है। वह अन्न आदि का रूप है। वह मूल से शाखा तक बढ़ता है और पुष्टि का द्योतक है। जो इस रहस्य को समझ कर बिल्व का यूप बनाता है वह अपने बच्चों और पशुओं को पुष्ट करता है। बिल्व के यूप के विषय में यह बात है कि बिल्व ज्योति है। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने जाति वालों में ज्योति होता है श्रेष्ठ होता है। जिस को तेज और ब्रह्मज्ञान की इच्छा हो वह पलाश का यूप बनावे। वनस्पतियों में पलाश तेज और ब्रह्मवर्चस है। जो इस रहस्य को समझ कर पलाश का यूप बनाता है वह तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी होता है। पलाश के यूप के विषय में यह है कि पलाश सब वनस्पतियों की योनि है। इसीलिये पलाश वृक्ष के पलाशों अर्थात् पत्तों का अनुकरण करके ही हर वृक्ष के पत्तों को पलाश कहते हैं। जो
प्रथम अध्याय ] ९१ इस रहस्य को समझता है वह सब वृक्षों के सम्बन्ध में जो कामनायें होती हैं उनको पूरा कर लेता है । (१) २-अध्वर्यु होता से कहता है, "हम यूप को चुपड़ते हैं । उपयुक्त मंत्र बोलिये ।" होता पढ़ता है :- अञ्जन्ति त्वामध्वरे देवयन्तो वनस्पते मधुना दैव्येन । यदूर्ध्वस्तिष्ठा द्रविणेह धत्ताद् यद्वा क्षयो मातुरस्या उपस्थे । ( ऋ० ३।८।१ ) ( हे वनस्पति ! तुझ को ऋत्विज लोग यज्ञ में दिव्य मधु से चुपड़ते हैं । जो तू सीधा खड़ा है या इस माता ( भूमि ) की गोद में पड़ा है हमको धन दे ) । यह जो घी है वही दिव्य मधु है । अगले टुकड़े से यह तात्पर्य है कि चाहे खड़ा हो चाहे पड़ा हो मुझे धन दे । अब होता नीचे का मंत्र पढ़ता है :- उच्छ्र यस्व वनस्पते वर्ष्मन् पृथिव्या अधि । सुमिती मीयमानो वर्चो धा यज्ञ वाहसे । ( ऋ० ३।८।३ ) ( हे वनस्पति पृथिवी के ऊपर उठ । तू जो अच्छी तरह पड़ा हुआ है। यज्ञ के वाहक या ले जाने वाले के लिये तेज धारण करा ) । यह मंत्र यूप के उठाने के लिये रूप-समृद्ध है । जिस में रूपसमृद्धता होती है वही सफल होता है । 'वर्ष्मन् पृथिव्या अधि' से तात्पर्य है उस स्थान का जहाँ यूप गाड़ते हैं । "सुमितीमीयमानो वर्चोधा यज्ञ वाहसे" से तात्पर्य है कि यूप से आशीर्वाद चाहता है । अब होता नीचे का मंत्र पढ़ता है :- समिद्धस्य श्रयमाणः पुरस्ताद् ब्रह्म वन्वानो अजरं सुवीरम् । आरे अस्मदमतिं बाधमान उच्छ्रयस्व महते सौभगाय । ( ऋ० ३।८।२ ) ( प्रज्वलित अग्नि के सामने खड़ा हुआ तू नाश न होने वाले
९२ [ दूसरी पञ्चिका और वीरता युक्त ब्रह्म तेज को देता है हमारे शत्रुओं को रोकता हुआ हमारे बड़े भाग्य के लिये खड़ा हो ) 'समिद्धस्य श्रयमाणः पुरस्तात्' का अर्थ है प्रज्वलित हुई अग्नि के सामने । 'ब्रह्म चन्वानो अजरं सुवीर्यम्' से आशीर्वाद से तात्पर्य है 'आरे अस्मदमतिं बाधमानः' का अर्थ है कि 'अमति' अर्थात् पाप या भूख है। इस से वह यज्ञ और यजमान को भूख से और पाप से मुक्त कर देता है । 'उच्छ्रयस्व' ( खड़ा हो ) आशीर्वाद है । अब होता नीचे के मंत्र को पढ़ता है:- ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता । ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे । ( ऋ० १।३६ १३ ) ( सीधा खड़ा हो ! सविता के समान ! हमारी रक्षा के लिये । खड़ा होकर अन्न दे । जब हम तुझ को बुलाते हैं उस समय जब कि ऋत्विज तुझ को चुपड़ते हैं ) 'देवो न सविता' में 'न' का अर्थ है 'इव' या 'समान' । 'ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता' का अर्थ है अन्न का बांटने वाला । 'अंजिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे' का तात्पर्य है छन्दों से जिनके द्वारा देवों को बुलाते हैं । जब कई यज्ञों में देवों को बुलाते हैं कि 'मेरे यज्ञ में आइये' । 'मेरे यज्ञ में आइये' तो देवता उसके यज्ञ में जाते हैं जहाँ इस रहस्य को समझने वाला होता मंत्र पढ़ कर आवाहन करता है । अब नीचे का मंत्र पढ़ता है :- ऊर्ध्वो नः पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह । कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः । ( ऋ० १।३६।१४ ) ( सीधे खड़ा होकर पाप से बचा । अपनी आग से सब मांसाहारियों के जला । हमको सीधा कर कि हम खड़े हो सकें और जी सकें । हमार हवि को देवों तक ले जा ) । 'अत्रिणं' यां खाने वाले राक्षस हैं । इसके द्वारा यूप से पापी राक्षसों को मरवाता है । 'चरथाय' का अर्थ है 'चरणाय' ( चलने
प्रथम अध्याय ] ९३ के लिये ) । ‘जीवसे’ कहकर वह यजमान को छुड़ाता है चाहे उसे ( मृत्यु ने ) पकड़ ही क्यों न लिया हो। और उसे साल भर के लिये सुरक्षित कर देता है ‘विदा देवेषु नो दुवः’ से आशीर्वाद का तात्पर्य है ( अपने कर्मों की सफलता के लिये प्रार्थना करता है ) । होता अब नीचे का मन्त्र पढ़ता है :— जातो जायते सुदिनत्वे अह्नां समर्य आ विदथे वर्धमानः। पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा देव्या विप्र उदि यर्त्ति वाचम् ॥ ( ऋ० ३।८।५ ) ( उत्पन्न होकर अपनी युवावस्था में मनुष्य के हित के लिये बढ़ता है। धीर लोग इसको बुद्धिमत्ता से अलंकृत करते हैं। ऋत्विक ब्राह्मण समूह देव विषयक वाणी का उच्चारण करता है। इस मन्त्र के पहले भाग को पढ़ कर वह ( धूप को ) बढ़ाते हैं। “पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा” पढ़ कर उसे पवित्र या अलंकृत करते हैं। ‘देव या विप्र उदियीर्त वाचम्’ से धूप को देवों के प्रति निवेदन करते हैं। अर्थात् उसका देवों को परिचय कराते हैं। होता नीचे के मन्त्र के समाप्त करता है :— युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः। तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः ॥ ( ऋ० ३।८।४ ) ( जवान वस्त्रों से अलंकृत आया है। वह उत्पन्न हुआ श्रेष्ठ है। बुद्धिमान विद्वान् लोग अपने उत्तम विचारों को प्रकट करके उसे बढ़ाते हैं ) । “युवा सुवासा” का अर्थ है प्राण। यह शरीरों से घिरा हुआ है। ‘श्रेयान् भवति जायमानः” ‘यूप’ से तात्पर्य है अर्थात् इस मंत्र को पढ़ने से यूप अधिक सुन्दर प्रतीत होता है। ‘कवयः’ का अर्थ है वह मंत्र वाले विद्वान् जो ‘यूप’ को उन्नत करते हैं।
९४ [दूसरी पञ्चिका इन सात रूप-समृद्धता युक्त मंत्रों के पढ़ने से यज्ञ सफल हो जाता है। मंत्रों की रूप-समृद्धता यह है कि उन मंत्रों में उसी क्रिया का वर्णन हो जिसके करने में वह मंत्र पढ़े जाते हैं। इसी से यज्ञ की सफलता है। इनमें से पहले और पिछले को तीन तीन बार पढ़ते हैं। इस प्रकार यह ग्यारह हो जाते हैं। त्रिष्टुभ् छन्द के प्रत्येक पाद् में ग्यारह ग्यारह अक्षर होते हैं। त्रिष्टुभ् इन्द्र का वज्र है। जो इस रहस्य को समझता है वह इन इन्द्र-सम्बन्धी ऋचाओं द्वारा वृद्धि पाता है। पहले और पिछले मंत्र को तीन तीन बार पढ़ने से मानो वह यज्ञ के दोनों सिरों में गांठ दे देता है। जिससे यज्ञ बँधा रहे और खिसक न जाय। (२) ३—अब प्रश्न उठता है कि यूप अग्नि के सन्मुख खड़ा रहे या अग्नि में डाल दिया जाय। इसका उत्तर यह है कि यदि पशु की कामना हो तो खड़ा रहे। एक बार देवों को खाना प्राप्त कराने के लिये पशु खड़े नहीं रहे। वे भाग कर देवों से कहते रहे कि "तुम हमको न पाओगे। तुम हमको न पाओगे।" तब देवों ने इस यूप-वज्र को देखा और गाड़ दिया। इस प्रकार डर कर वह लौट आये। यही कारण है कि यूप की ओर मुख करके ही पशु आज भी खड़े होते हैं। इस प्रकार पशु देवों को भोजन प्राप्त कराने के लिये खड़े रहे। इसी भाँति जो इस रहस्य को समझता है और यूप को खड़ा रखता है उसके पशु भी उसको खाना प्राप्त कराने के लिये खड़े रहते हैं। जिसको स्वर्ग की कामना हो उस यजमान के यूप को (आग में) छोड़ दे ! पहले जमाने के यजमान 'यूप' को अग्नि में छोड़ देते थे। यूप यजमान है, प्रस्तर अर्थात् दर्भ यजमान हैं। अग्नि देवतों की योनि है। इन आहुतियों द्वारा यजमान देवों की
प्रथम अध्याय ९५ योनि से संयुक्त होकर स्वर्ण का शरीर धारण करके स्वर्ग को जाता है । जो पिछले जमाने के यजमान थे वह कहते थे कि स्वरू यूप का टुकड़ा है । ( इस लिये यूप का प्रतिनिधि है ) । इस लिये उसी को अग्नि में डाल ते, इससे दोनों कामनायें पूरी हो जायंगी अर्थात् यूप को अग्नि में छोड़ने से जो बात सिद्ध होती है वह भी और यूप को खड़ा रखने से जो बात सिद्ध होती है वह भी । जो पुरुष दीक्षित होता है वह अपने को सब-देवताओं को प्राप्त कराता है । अग्नि सब देवता हैं । सोम सब देवता हैं । जब वह अग्नि और सोम दोनों के लिये पशु को अर्पण करता है तो यजमान सब देवताओं के लिये अपने को अर्पण करने से छुटकारा पा जाता है । कुछ लोग कहते हैं कि अग्नि और सोम के पशु के दो रूप होने चाहियें क्योंकि यह दो देवताओं का है । परन्तु इसकी आवश्यकता नहीं । यज्ञ का पशु मोटा होना चाहिये । क्योंकि पशु मोटे होते हैं और यजमान पतला होता है । यदि पशु मोटा होगा तो यजमान भी उसके मेध से मोटा होगा । कहते हैं कि अग्नि-सोम के पशु को न खाये । जो अग्नि और सोम के पशु को खाता है वह मनुष्य के मांस को खाता है । क्योंकि इसी के द्वारा तो यजमान अपने को छुड़ाता है । परन्तु इस नियम का आदर करना ठीक नहीं । यह जो अग्नि-सोम का पशु है वह वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र के लिये हवि है । क्योंकि अग्नि और सोम के द्वारा ही तो इन्द्र ने वृत्र को मारा था । उन दोनों ने कहा, "तुमने हमारे द्वारा ही तो वृत्र को मारा है इसलिये हम दोनों वर मांगते हैं ।" उसने कहा "मांगो" । इसलिये उन्होंने इन्द्र से यह वर मांग लिया । इस प्रकार वह उस पशु को लेते हैं जो सोम-इष्टि से पहले दिन मारा जाने वाला होता है ।
९६ [दूसरी पञ्चिका यही उन दोनों का स्थायी भाग है। इसलिए इसमें से लेना चाहिये और खाना चाहिये। (३) ४-(अब आप्रि मंत्रों का वर्णन आता है) अब होता आप्रि मंत्रों का पाठ करता है। आप्रि मंत्र तेज और ब्रह्मवर्चस के देने वाले हैं। इसलिये इन मंत्रों को पढ़ कर यह यजमान को तेज और ब्रह्मवर्चस दिलाता है। वह समिधाओं के लिये याज्य मंत्र बोलता है। प्राण ही समिधा है। प्राण ही इस सब जगत् को प्रज्वलित करते हैं। इस प्रकार वह प्राणों को संतुष्ट करता है और यजमाने में प्राण धारण कराता है। अब तनूनपात् के लिये याज्य मंत्र बोलता है। प्राण ही तनूनपात् है। क्योंकि वह तनू अर्थात् शरीर की 'पाति' अर्थात् रक्षा करता है। इस प्रकार वह प्राणों को संतुष्ट करता है और प्राण ही यजमान में धारण कराता है। अब नराशंस के लिये याज्य मंत्र बोलता है। 'नर' का अर्थ है संतान और 'शंस' का अर्थ है वाणी। इस प्रकार वह संतान और वाणी को सन्तुष्ट करता है और यजमान में सन्तान और वाणी धारण करता है। अब इला के लिये याज्य मंत्र बोलता है। इला का अर्थ है अन्न। इस प्रकार वह अन्न को संतुष्ट करता है और यजमान में अन्न धारण कराता है। अब वह बर्हि के लिये याज्य मंत्र बोलता है। बर्हि पशु हैं। इस प्रकार वह पशुओं को संतुष्ट करता है और यजमान में पशुओं को धारण कराता है। अब वह यज्ञशाला के द्वारों के लिये याज्य मंत्र बोलता है। द्वार वृष्टि हैं। इस प्रकार वह वृष्टि को संतुष्ट करता है और वृष्टि तथा अन्न आदि को यजमान में धारण कराता है।
प्रथम अध्याय ] ६७ वह उषा और रात्रि के लिए याज्य मंत्र बोलता है। उषा और रात्रि का अर्थ है दिन और रात। इस प्रकार वह रात और दिन को संतुष्ट करता है और यजमान में रात और दिन को धारण कराता है। दो दिव्य होताओं के लिये याज्य मंत्र बोलता है। प्राण और अपान दिव्य होता है। इस प्रकार वह प्राण और अपान को संतुष्ट करता है और प्राण और अपान को यजमान में धारण कराता है। तीन देवियों के लिये याज्य मंत्र बोलता है। प्राण, अपान, और व्यान तीन देवियाँ हैं। इस प्रकार वह इनको संतुष्ट करता है और प्राण, अपान और व्यान को यजमान में धारण कराता है। वह त्वष्टा के लिये याज्य मंत्र बोलता है। वाणी ही त्वष्टा है। वाणी मानो सब संसार को “ताष्ट्रि” या बनाती है। इस प्रकार वह वाणी को संतुष्ट करता है और यजमान में वाणी को धारण कराता है, वनस्पति के लिये याज्य मंत्र बोलता है। वनस्पति प्राण है। इस प्रकार वह प्राण को संतुष्ट करता है और यजमान में प्राण को धारण कराता है। स्वाहाकृतियों के लिये मंत्र बोलता है। स्वाहाकृतियां प्रतिष्ठा हैं। इस प्रकार वह यज्ञ को ठीक ठीक स्थापित करता है। ऐसे मंत्र बोलने चाहिये जिनका सिलसिला ऋषियों से मिल सके। इस प्रकार वह यजमान की ऋषियों के साथ बन्धुता स्थापित कराता है। (४) ५—(अग्नि को ले जाना) जब अग्नि (पशु के) चारों ओर ले जाते हैं तो अध्वर्यु कहता है “मंत्र बोल”। अब होता अग्नि देवता और गायत्री छन्द वाले नीचे के तीन मंत्र बोलता है :— ७
९८ [ दूसरी पञ्चिका ( १ ) अग्नि॒र्होता॑ नो अध्व॒रे वा॒जी सन् परिणीयते । दे॒वो दे॒वेषु॑ य॒ज्ञियः॑ ॥ ( ऋ० ४।१५।१ ) ( २ ) परि॑ त्रि॒विष्ट्य॑ध्व॒रं यात्य॒ग्नी र॑थी॒रिव॑ । आ दे॒वेषु॒ प्रयो॒ दध॑त् ॥ ( ऋ० ४।१५।२ ) ( ३ ) परि॒ वाज॑पतिः क॒विर॒ग्निर्ह॒व्यान्य॑क्रमीत् । दध॒द्रत्ना॑नि दा॒शुषे॑ ॥ ( ऋ० ४।१५।३ ) ( अग्नि होता हमारे यज्ञ में घोड़े के समान बन जाता है । यह देवों में यज्ञ सम्बन्धी देव है ॥१॥ रथी के समान अग्नि यज्ञ के चारों ओर तीन बार जाता है । वह देवों के लिये आहुति को धारण करता है ॥२॥ अन्न का पति, कवि (वस्तुओं का प्रकाश) अग्नि, हवियों की परिक्रमा करता है । वह यजमान को धन देता है ॥३॥ ) इस लाई हुई अग्नि को इस प्रकार इसी के देवता और उसी के छन्दों द्वारा बढ़ाता है । "वाजी सन् परिणीयते" का अर्थ है कि घोड़े के समान उसको चारों ओर फिराते हैं । "परि त्रिविष्ट्यध्वरं यात्यग्नी रथीरिव" का अर्थ है कि यह अग्नि रथी के समान यज्ञ के चारों ओर फिरता है । "परिवाजपतिः कविः" का अर्थ है कि वह वाज अर्थात् अन्नों का पति है । अब अध्वर्यु कहता है, "हे होता, देवों के हव्य के लिये आदेश कर" । अब मैत्रावरुण आदेश करता है, "अग्नि की विजय हो । अग्नि हव्य का खाना दे ।" यहाँ प्रश्न होता है कि जब अध्वर्यु ने आदेश देने के लिये होता को कहा तो मैत्रावरुण ने क्यों आदेश दिया ? इसका उत्तर यह है कि मैत्रावरुण तो यज्ञ का मन है । होता यज्ञ की वाणी है । मन से ही प्रेरित होकर वाणी बोलती है । जो बिना मन के बोलता है, वह आसुरी वाणी है और देव उसको ग्रहण नहीं
प्रथम अध्याय ] ९९ करले। जब मैत्रावरुण आदेश देता है तो वह मन द्वारा वाणी को प्रेरित करता है। मन द्वारा वाणी को प्रेरित करके वह हव्य को देवों के ग्रहण के योग्य करता है । (५) ६-अब होता कहता है, "हे शांति करने वाले देवो और शांति करने वाले मनुष्यो ! आरंभ करो।" इसका तात्पर्य यह है कि जो देवों में शांति करने वाले हैं और जो मनुष्यों में शांति करने वाले हैं उन सब को आदेश करता है। "यज्ञ के स्वामी अर्थात् यजमान और उसकी पत्नी के लिये यज्ञ की सफलता की प्रार्थना करते हुये यज्ञ के योग्य सुन्दर द्वार बनाओ।" पशु मेध है। और यजमान मेधपति है। इस प्रकार होता यजमान को उसी के मेध से बढ़ाता है। इसीलिये वह ठीक कहते हैं कि जिस देवता के लिये पशु लाया जाता है (आलभ्यते) वही मेध-पति हैं। यदि एक देवता के लिये पशु हो तो कहना चाहिये 'मेधपतये' (एकवचन चतुर्थी)। यदि दो देवतों के लिये, तो "मेधपतिभ्यां" (द्विवचन चतुर्थी)। यदि बहुत से देवतों के लिये, तो "मेधपतिभ्यः" (बहुवचन चतुर्थी)। यही स्थिति है। "इसके लिये आग लाओ।" जब पशु को ले जा रहे थे तो उसे सामने मौत दिखाई दी। उसने देवों के पीछे जाना न चाहा तब देवों ने उससे कहा, "तू चला आ ! हम तुझे स्वर्ग को ले जायंगे।" उसने कहा, "अच्छा तुम में से एक आगे-आगे चलो।" उन्होंने कहा, "अच्छा" और अग्नि उसके आगे-आगे चला। और वह अग्नि के पीछे चला। इसीलिये कहते हैं कि प्रत्येक पशु अग्नि का है क्योंकि वह अग्नि का अनुसरण करता है। इसीलिये अग्नि को आगे-आगे ले जाते हैं। "दर्भ बिछा दो।" पशु ओषधियों पर जीता है। इस प्रकार वह पशु को सब आत्मायुक्त करता है (अर्थात् घास पशु का आत्मा है)।