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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧ अतो नाशक्नोद्वाचा ग्रहीतुमि- | अतः हमें जान पड़ता है कि वह त्यवगच्छामः पूर्वजोऽपि ॥३॥ | पूर्वोत्पन्न विराट् पुरुष भी उसे वाणीसे | ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं हुआ था॥३॥ ❧❧❧❧❧ समानमुत्तरम्— | आगेका प्रसंग भी इसीके समान | है— तत्प्राणेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुं स यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ४ ॥ फिर उसने इसे प्राणसे ग्रहण करना चाहा; किन्तु इसे प्राणसे ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। यदि वह इसे प्राणसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नके उद्देश्यसे प्राणक्रिया करके तृप्त हो जाता ॥ ४ ॥ तच्चक्षुषाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुं स यद्धैन- च्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ५ ॥ उसने इसे नेत्रसे ग्रहण करना चाहा; परन्तु नेत्रसे ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। यदि वह इसे नेत्रसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नको देखकर ही तृप्त हो जाया करता ॥ ५ ॥ तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ६ ॥ उसने इसे श्रोत्रसे ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह श्रोत्रसे ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे श्रोत्रसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नको सुनकर ही तृप्त हो जाता ॥ ६ ॥

४६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

४६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ तत्त्वचाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्त्वचा ग्रहीतुं स यद्धै- नत्त्वचाग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ७ ॥ उसने इसे त्वचासे ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह त्वचासे ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे त्वचासे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नको स्पर्श करके ही तृप्त हो जाया करता ॥ ७ ॥ तन्मनसाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुं स यद्धै- नन्मनसाग्रहैष्यद्ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ८ ॥ उसने इसे मनसे ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह मनसे ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे मनसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नका ध्यान करके ही तृप्त हो जाया करता ॥ ८ ॥ तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुं स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ६ ॥ उसने इसे शिश्न ( लिङ्ग ) से ग्रहण करना चाहा; परन्तु वह शिश्नसे ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। यदि वह इसे शिश्नसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी पुरुष ] अन्नका विसर्जन करके ही तृप्त हो जाता ॥ ९ ॥ अपानद्वारा अन्नग्रहण तदपानेनाजिघृक्षत्तदावयत् सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद्वा- युरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥ १० ॥ फिर उसने इसे अपानसे ग्रहण करना चाहा और इसे ग्रहण कर लिया। वह यह [ अपान ] ही अन्नका ग्रह (ग्रहण करनेवाला) है। जो वायु अन्नायु (अन्नद्वारा जीवन धारण करनेवाला) प्रसिद्ध है वह यह [ अपान ] वायु ही है ॥ १० ॥

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७

तत्प्राणेन तच्चक्षुषा तच्छ्रोत्रेण | [ इसी प्रकार उसने ] उस अन्न- तत्त्वचा तन्मनसा तच्छिश्नेन | को प्राणसे, नेत्रसे, श्रोत्रसे, त्वचासे, तेन तेन करणव्यापारेणान्नं | मनसे, शिश्नसे एवं भिन्न-भिन्न ग्रहीतुमशक्नुवन्पश्चादपानेन | इन्द्रियोंके व्यापारसे ग्रहण करनेमें वायुना मुखच्छिद्रेण तदन्नमजि- | असमर्थ होकर अन्तमें उसे मुखके घृक्षत् । तदावयत्तदन्नमेवं जग्राह | छिद्रद्वारा अपानवायुसे ग्रहण करने- आशितवान् । तेन स एषोऽपान- | की इच्छा की । तब उसे ग्रहण कर वायुरन्नस्य ग्रहोऽन्नग्राहक इत्ये- | लिया; अर्थात् इस प्रकार इस अन्नको तत् । यद्वायुर्र्यो वायुरन्नायुः | भक्षण कर लिया। उसी कारणसे अन्नबन्धनोऽन्नजीवनो वै प्रसिद्धः | वह यह अपानवायु अन्नका ग्रह स एष यो वायुः ॥ ४-१० ॥ | अर्थात् अन्न ग्रहण करनेवाला है। | जो वायु अन्नायु-अन्नरूप बन्धन- | वाला अर्थात् अन्नरूप जीवनवाला | प्रसिद्ध है वह यह [ अपान ] वायु | ही है ॥ ४-१० ॥ ❖❖❖ परमात्माका शरीरप्रवेशसम्बन्धी विचार स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति । स ईक्षत यदि वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति ॥ ११ ॥ उस परमेश्वरने विचार किया 'यह (पिण्ड) मेरे बिना कैसे रहेगा ?' वह सोचने लगा 'मैं किस मार्गसे [ इसमें ] प्रवेश करूँ ?' उसने विचारा, 'यदि [ मेरे बिना ] वाणीसे बोल लिया जाय, यदि प्राणसे प्राणन क्रिया कर ली जाय, यदि नेत्रेन्द्रियसे देख लिया जाय, यदि कानसे सुना

४८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

४८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ जा सके, यदि त्वचासे स्पर्श कर लिया जाय, यदि मनसे चिन्तन कर लिया जाय, यदि अपानसे भक्षण कर लिया जाय और यदि शिश्नसे विसर्जन किया जा सके तो मैं कौन रहा ? [ अर्थात् यदि मेरे बिना ये सब इन्द्रियोंके व्यापार हो जाते तो मेरा तो कोई प्रयोजन ही न था; तात्पर्य यह कि राजाकी प्रेरणाके बिना नगरके कार्योंके समान मेरी प्रेरणाके बिना इनका होना असम्भव है ]' ॥ ११ ॥

[मूल शाङ्करभाष्य] स एवं लोकलोकपालसंघात- स्थितिमन्ननिमित्तां कृत्वा पुर- पौरतत्पालयितृस्थितिसमां स्वा- मीव ईक्षत—कथं नु केन प्रका- रेणेति वितर्कयन्निदं मदृते माम- न्तरेण पुरस्वामिनम्, यदिदं कार्यकरणसंघातकार्यं वक्ष्यमाणं कथं नु खलु मामन्तरेण स्यात्प- रार्थं सत् । यदि वाचाभिव्या- हृतमित्यादि केवलमेव वाग्व्य- वहरणादि तन्निरर्थकं न कथंचन भवेद्बलिस्तुत्यादिवत्; पौर- वन्द्यादिभिः प्रयुज्यमानं स्वाम्यर्थं सत्तत्स्वामिनमन्तरेणासत्येव स्वा- मिनि तद्वत् ।

[भाष्यानुवाद] उस परमात्माने नगर, नगरनिवासी और उनके रक्षक [ राजकर्मचारी आदि ] की नियुक्तिके समान अन्नरूप निमित्तवाली लोक और लोकपालोंके संघातकी स्थिति कर नगरके स्वामीके समान विचार किया—'कथं नु' यानी किस प्रकारसे—इस प्रकार वितर्क करते हुए [ उसने सोचा ] यह जो आगे बतलाया जानेवाला कार्य ( भूत ) और करणों (इन्द्रियों) के संघातका कार्य ( व्यापार ) है वह परार्थ ( दूसरेके लिये ) होनेके कारण मेरे सिवा अर्थात् पुरके स्वामी- रूप मेरे बिना कैसे होगा ? जिस प्रकार अपने स्वामीके लिये प्रयुक्त पुरवासी और बन्दीजन आदिकी बलि (कर) एवं स्तुति आदि स्वामीके बिना अर्थात् स्वामीके अभावमें निरर्थक ही है उसी प्रकार [ मेरे बिना भी ] यह जो वाणीसे बोलना आदि है अर्थात् केवल वाग्व्यापारादि है वह निरर्थक ही होगा यानी किसी प्रकार न हो सकेगा।

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९


[वाम स्तम्भ / Left Column]

तस्मान्मया परेण स्वामिना- धिष्ठात्रा कृताकृतफलसाक्षिभूतेन भोक्त्रा भवितव्यं पुरस्येव राज्ञा। यदि नामैतत्संहतकार्यस्य परार्थत्वं परार्थिनं मां चेतनमन्त- रेण भवेत्पुरपौरकार्यमिव तत्स्वा- मिनम्, अथ कोऽहं किंस्वरूपः कस्य वा स्वामी ? यद्यहं कार्यकारणसंघातमनु- प्रविश्य वागाद्यभिव्याहतादिफलं नोपलभेय राजेव पुरमाविश्या- धिकृतपुरुषकृताकृतावेक्षणम्; न कश्चिन्मामयं सन्नेवंरूपश्चेत्यधि- गच्छेद्विचारयेत् । विपर्यये तु योऽयं वागाद्यभिव्याहतादीद- मिति वेद, स सन्वेदनरूपश्चे- त्यधिगन्तव्योऽहं स्याम्; यदर्थ-


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

अतः नगरके [अधिष्ठाता] राजाके समान इस देहरूप संघातके परम प्रभु और अधिष्ठाता मुझे भी इसके पाप- पुण्यके फलके साक्षी और भोक्ता- रूपसे स्थित होना चाहिये । यदि इस देहेन्द्रियसंघातका कार्य परार्थ (दूसरेके लिये) है और वह पुरस्वामी- के बिना पुर और पुरवासियोंके कार्य- के समान मुझ परार्थी अपने चेतन रक्षकके बिना हो सकता है तो मैं क्या रहा ? अर्थात् किस स्वरूपवाला अथवा किसका स्वामी रहा ? जिस प्रकार राजा नगरमें प्रवेश- कर वहाँके अधिकारी पुरुषोंके कार्य- अकार्यादिका निरीक्षण करता है उसी प्रकार यदि मैं भी इस भूत और इन्द्रियोंके संघातमें प्रवेश करके वाणी आदिके उच्चारणादि फलको ग्रहण न करूँगा तो कोई भी मुझे 'यह सत् है और ऐसे स्वरूपवाला है' ऐसा अधिगम—विचार नहीं कर सकेगा। इसके विपरीत अवस्थामें ही मैं इस प्रकार जाना जा सकता हूँ कि जिस प्रकार स्तम्भ और भित्ति आदिसे मिलकर बने हुए मन्दिर आदि संघात अपने अवयवोंके सहित किसी अन्य असंहत वस्तुके लिये

५० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

५० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ मिदं संहतानां वागादीनामभि- | होते हैं उसी प्रकार जिसके लिये व्याहतादि, यथा स्तम्भकुड्या- | इन संघातस्वरूप वाणी आदिके दीनां प्रासादादिसंहतानां स्वाव- | उच्चारणादि व्यापार हैं और जो इन यवैरसंहतपरार्थत्वं तद्वदिति । | वाणी आदिके उच्चारणादिको 'इदम्' इस प्रकार जानता है वह मैं सत् और चेतनस्वरूप हूँ। एवमीक्षित्वातः कतरेण | इस प्रकार विचारकर [ उसने प्रपद्या इति । प्रपदं च मूर्धा चास्य | सोचा ] अतः मैं किस द्वारसे प्रवेश संघातस्य प्रवेशमार्गौ । अनयोः | करूँ ? इस संघातमें प्रवेश करनेके कतरेण मार्गेणेदं कार्यकारण- | दो मार्ग हैं-पदाग्र और मूर्धा । संघातलक्षणं पुरं प्रपद्यै प्रपद्ये- | इनमेंसे मैं किस मार्गसे इस कार्य- येति ॥११॥ | करणके संघातस्वरूप पुरमें प्रवेश करूँ ? ॥ ११ ॥ परमात्मका मूर्द्धद्वारसे शरीरप्रवेश एवमीक्षित्वा न तावन्मद्- | इस प्रकार विचारकर परमेश्वरने भृत्यस्य प्राणस्य मम सर्वार्थाधि- | निश्चय किया-'मैं सम्पूर्ण कार्योंके कृतस्य प्रवेशमार्गेण प्रपदाभ्या- | अधिकारी अपने सेवक प्राणके प्रवेश- मधः प्रपद्ये । किं तर्हि पारि- | मार्ग निम्नदेशीय चरणाग्रोंसे तो शेष्यादस्य मूर्धानं विदार्य प्रपद्ये- | प्रवेश करूँगा नहीं। तो फिर यमिति लोक इवेक्षितकारी- | किससे करूँगा ? अतः पदाग्रको त्यागकर बचे हुए मूर्धाको ही विदीर्ण करके प्रवेश करूँगा। इस प्रकार सोच-समझकर काम करनेवाले लोगों- के समान- स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विद्दतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथा-

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१ स्त्रयः स्वप्नाः; अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥ १२ ॥ वह इस सीमा ( मूर्द्धा ) को ही विदीर्णकर इसीके द्वारा प्रवेश कर गया । वह यह द्वार 'विदृत्ति' नामवाला है; यह नान्दन ( आनन्द- प्रद ) है । यह आवसथ [ नेत्र ], यह आवसथ [ कण्ठ ], यह आवसथ [ हृदय ] इस प्रकार इसके तीन आवसथ ( वासस्थान ) और तीन स्वप्न हैं ॥ १२ ॥


[संस्कृत-भाष्यम्][हिन्दी-भाष्यार्थ]
स स्रष्टेश्वर एतमेव मूर्द्धसी-वह सृष्टिकर्ता ईश्वर इस मूर्ध-
मानं केशविभागावसानं विदार्य-सीमाको ही, जिसका केशोंका विभाग
च्छिद्रं कृत्वैतया द्वारा मार्गेणेमंही अवसान है, विदीर्ण कर अर्थात्
लोकं कार्यकारणसंघातं प्रापद्यतउसमें छिद्र कर · उसीके द्वारा-उस
प्रविवेश । सेयं हि प्रसिद्धा द्वाःमार्गसे ही इस लोक अर्थात् भूत
मूर्ध्नि तैलादिधारणकाले अन्त-और इन्द्रियोंके संघातमें प्रवेश कर
स्तद्रसादिसंवेदनात् । सैषागया । वही प्रसिद्ध द्वार है, क्योंकि
विदृत्तिर्विदारितत्वाद्विदॄत्तिर्नामशिरमें तैल आदि धारण करते समय
प्रसिद्धा द्वाः ।भीतर उसके रसादिका अनुभव होता
है । विदीर्ण किया जानेके कारण
वह द्वार 'विदृत्ति' अर्थात् विदृति नाम-
से प्रसिद्ध है ।
इतराणि तु श्रोत्रादिद्वाराणिइससे भिन्न जो श्रोत्रादि द्वार हैं
भृत्यादिस्थानीयसाधारणमार्ग-वे भृत्यादिरूप साधारण मार्ग होनेके
त्वान्न समृद्धीनि नानन्दहेतूनि ।कारण समृद्ध अर्थात् आनन्दके हेतु
इदं तु द्वारं परमेश्वरस्यैव केवल-नहीं हैं । किन्तु यह मार्ग तो केवल
स्येति तदेतन्नान्दनं नन्दनमेव ।परमेश्वरका ही है । अतः यह
नान्दन ( आनन्दप्रद ) है । नन्दनको
ही यहाँ नान्दन कहा है ।

५२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

५२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत] नान्दनमिति दैर्घ्यं छान्दसम् । नन्दत्यनेन द्वारेण गत्वा पर- स्मिन्ब्रह्मणीति । तस्यैवं सृष्ट्वा प्रविष्टस्य जीवे- नात्मना राज्ञ इव पुरं त्रय आवसथाः । जागरितकाल इन्द्रियस्थानं दक्षिणं चक्षुः, स्वप्न- कालेऽन्तर्मनः, सुषुप्तिकाले हृदयाकाश इत्येतत् । वक्ष्यमाणा वा त्रय आवसथाः; पितृशरीरं मातृगर्भाशयः स्वं च शरीरमिति । त्रयः स्वप्ना जाग्रत्स्वप्नसुषु- प्स्याख्याः । ननु जागरितं प्रबोधरूपत्वान्न स्वप्नः; नैवम्, स्वप्न एव । कथम् ? परमार्थ- स्वात्मप्रबोधाभावात्स्वप्नवदसद्व- स्तुदर्शनाच्च । अयमेवावसथश्चक्षु- र्दक्षिणं प्रथमः, मनोऽन्तरं द्वितीयः, हृदयाकाशस्तृतीयः ।


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद] 'नान्दनम्' इस पद [के नकार] में दीर्घ वैदिक प्रक्रियाके अनुसार है। तात्पर्य यह है कि इस मार्गसे जाकर पुरुष परब्रह्ममें आनन्द प्राप्त करने लगता है। पुरमें प्रविष्ट हुए राजाके समान इस प्रकार रचना करके उसमें जीवरूपसे प्रवेश करनेवाले उस ईश्वरके तीन आवसथ हैं—(१) जाग्रत्कालमें इन्द्रियोंका स्थान दक्षिण नेत्र, (२) स्वप्नकालमें मनके भीतर और (३) सुषुप्तिमें हृदयाकाशके अन्दर । अथवा आगे बतलाये जानेवाले पितृदेह, मातृ- गर्भाशय और अपना ही शरीर—ये ही तीन आवसथ हैं। तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति नामक तीन स्वप्न हैं। यदि कहो कि प्रबोधरूप होनेके कारण जाग्रत् स्वप्न नहीं है, तो ऐसी बात नहीं है; वह भी स्वप्न ही है। किस प्रकार ? क्योंकि उस समय परमार्थ आत्मस्वरूपके बोधका अभाव होता है और स्वप्नके समान असत् वस्तुएँ दिखलायी दिया करती हैं। [उन आवसथोंमें] यह दक्षिण नेत्र ही प्रथम है, मनका अन्तर्भाग द्वितीय है और हृदयाकाश तृतीय है।

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३ 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 𑁍 अयमावसथ इत्युक्तानुकीर्त- | अयमावसथः [ ऐसा जो तीन नमेव। तेषु ह्ययमावसथेषु पर्याये- | वार कहा गया है ] यह पूर्वकथित- | का ही अनुकीर्तन है । उन णात्मभावेन वर्तमानोऽविद्यया | आवसथोंमें क्रमशः आत्मभावसे | रहनेवाला यह जीव दीर्घकालतक दीर्घकालं गाढप्रसुप्तः स्वाभावि- | स्वाभाविक अविद्यासे गाढ निद्रामें | सोता रहता है और अनेकों शत- क्या न प्रबुध्यतेऽनेकशतसहस्रा- | सहस्र अनर्थोंकी प्राप्तिसे होनेवाले | दुःखरूप मुद्गरोंके आघातके अनुभव- नर्थसंनिपातजदुःखमुद्गराभिघा- | से भी नहीं जगता ॥ १२ ॥ तानुभवैरपि ॥१२॥ | ❧ जीवका मोह और उसकी निवृत्ति ❧ स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् किमिहान्यं वावदिष- दिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत् । इदम- दर्शमिती ३ ॥ १३ ॥ [ इस प्रकार शरीरमें प्रवेश करके जीवरूपसे ] उत्पन्न हुए उस परमेश्वरने भूतोंको [ तादात्म्यभावसे ] ग्रहण किया । और [ गुरुकृपासे बोध होनेपर ] 'यहाँ [ मेरे सिवा ] अन्य कौन है' ऐसा कहा । और मैंने इसे ( अपने आत्मस्वरूपको ) देख लिया है इस प्रकार उसने इस पुरुषको ही पूर्णतम ब्रह्मरूपसे देखा ॥ १३ ॥ स जातः शरीरे प्रविष्टो जी- | उसने उत्पन्न होकर—जीवभावसे | शरीरमें प्रविष्ट होकर भूतोंको वात्मना भूतान्यभिव्यैख्यद्व्या- | व्याकृत किया [ अर्थात् उन्हें | तादात्म्यरूपसे ग्रहण किया ] । फिर करोत् । स कदाचित्परमकारु- | किसी समय परम कारुणिक आचार्य- | के द्वारा अपने कर्णमूलमें—जिसका णिकेनाचार्येणात्मज्ञानप्रबोधकृ- | शब्द आत्मज्ञानका दृढ़ बोध कराने-

५४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

५४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

च्छब्दिकायां वेदान्तमहावाक्य- | वाला है ऐसी-वेदान्तवाक्यरूप महा- भेर्यां तत्कर्णमूले ताड्यमानाया- | भेरीके बजाये जानेपर उसने, जिस- मेतमेव सृष्ट्यादिकर्तृत्वेन प्रकृतं | का सृष्टि आदिके कर्तृत्वरूपसे प्रकरण चला हुआ है उस पुरुष- [ शरीर- पुरुषं पुरि शयानमात्मानं ब्रह्म | रूप ] पुरमें शयन करनेवाले आत्मा- को ततम-इसमें एक तकारका लोप वृहत्ततमं तकारेणैकेन लुप्तेन | हुआ है अतः तततम-व्याप्ततम तततमं व्याप्ततमं परिपूर्णमाका- | अर्थात् आकाशके समान परिपूर्ण महान् ब्रह्मरूपसे जाना-साक्षात्कार शवत्प्रत्यबुध्यतापश्यत् । कथम् ? | किया । किस प्रकार साक्षात्कार किया [ सो बतलाते हैं-] 'अहो ! इदं ब्रह्म ममात्मनः स्वरूपमदर्शं | मैंने अपने आत्माके स्वरूपको ही इस ब्रह्मरूपसे देखा है' इस प्रकार । दृष्टवानस्मि, अहो इति, विचार- | यहाँ 'इती' पदमें जो प्लुत उच्चारण है वह विचार प्रदर्शित करनेके लिये णार्था प्लुतिः पूर्वम् ॥१३॥ | है ॥ १३ ॥

'इन्द्र' शब्दकी व्युत्पत्ति

यस्मादिदमित्येव यत्साक्षाद- | क्योंकि जो [ जीवरूपसे ] सबके भीतर रहनेवाला है उस ब्रह्मको परोक्षाद्ब्रह्म सर्वान्तरमपश्यत् | 'इदम् ( यह )' इस प्रकार साक्षात् अपरोक्षरूपसे देखा था परोक्ष- परोक्षेण- | रूपसे नहीं-

तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम । तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ १४ ॥

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५ इसलिये उसका नाम 'इदन्द्र' हुआ, वह 'इदन्द्र' नामसे प्रसिद्ध है। 'इदन्द्र' होनेपर ही [ ब्रह्मवेत्ता लोग ] उसे परोक्षरूपसे 'इन्द्र' कहकर पुकारते हैं, क्योंकि देवगण परोक्षप्रिय ही होते हैं, देवता परोक्ष- प्रिय ही होते हैं ॥ १४ ॥ तस्मादिदं पश्यतीतीदन्द्रो | इसलिये जो इसे देखता है वह नाम परमात्मा । इदन्द्रो ह वै | परमात्मा 'इदन्द्र' नामवाला है । नाम प्रसिद्धो लोक ईश्वरः । | लोकमें ईश्वर 'इदन्द्र' नामसे तमेवमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इति | प्रसिद्ध है। इस प्रकार 'इदन्द्र' होने- परोक्षेण परोक्षाभिधानेनाचक्षते | पर भी ब्रह्मवेत्ता व्यवहारके लिये ब्रह्मविदः संव्यवहारार्थं; पूज्यत- | उसे 'इन्द्र' इस परोक्ष नामसे मत्वात्प्रत्यक्षनामग्रहणभयात् । | पुकारते हैं, क्योंकि पूज्यतम होनेके तथा हि परोक्षप्रियाः परोक्षनाम- | कारण उसका प्रत्यक्ष नाम लेनेमें ग्रहणप्रिया इव एव हि यस्मा- | उन्हें भय है। जब कि देवता लोग देवाः; किमुत सर्वदेवानामपि | भी परोक्षप्रिय अर्थात् अपना परोक्ष देवो महेश्वरः । द्विर्वचनं प्रकृता- | नाम ग्रहण किया जाना ही प्रिय ध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् ॥१४॥ | माननेवाले हैं तब सम्पूर्ण देवताओंके | भी देव महेश्वरका तो कहना ही | क्या है ? प्रकृत अध्यायकी समाप्ति | सूचित करनेके लिये यहाँ दो बार | कहा गया है ॥ १४ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावैतरेयोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये तृतीयः खण्डः समाप्तः ॥ ३ ॥ उपनिषत्क्रमेण प्रथमः, आरण्यकक्रमेण चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ।

द्वितीय अध्याय

द्वितीय अध्याय

प्रथम खण्ड

प्रस्तावना

अस्मिंश्चतुर्थेऽध्याय एष वा- | इस (पूर्वोक्त) चौथे* अध्यायमें (अतीताध्याय-) क्यार्थः—जगदुत्प- | यह वाक्यार्थ विवक्षित है—† (विषयावलोकनम्) त्तिस्थितिप्रलयकृद- | जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय संसारी सर्वज्ञः सर्वशक्तिः सर्व- | करनेवाले असंसारी सर्वशक्तिमान् वित्सर्वमिदं जगत्स्वतोन्यद्वस्त्व- | सर्वज्ञने अपनेसे भिन्न किसी अन्य न्तरमनुपादायैव आकाशादि- | वस्तुको ग्रहण किये बिना ही इस क्रमेण सृष्ट्वा स्वात्मप्रबोधनार्थं | सम्पूर्ण जगत्की आकाशादिक्रमसे सर्वाणि च प्राणादिमच्छरीराणि | रचना कर अपनेको स्वयं ही स्वयं प्रविवेश। प्रविश्य च स्व- | जाननेके लिये सम्पूर्ण प्राणादियुक्त मात्मानं यथाभूतमिदं ब्रह्मास्मीति | शरीरमें स्वयं ही प्रवेश किया। और साक्षात्प्रत्यबुध्यत। तस्मात्स एव | प्रवेश करके 'मैं यह ब्रह्म हूँ' सर्वशरीरेष्वेक एवात्मा नान्य | इस प्रकार अपने यथार्थ स्वरूपका इति। अन्योऽपि “सम आत्मा | साक्षात् बोध प्राप्त किया। अतः ब्रह्मास्मीत्येवं विद्यात्” इति। | समस्त शरीरोंमें एकमात्र वही आत्मा | है, उससे भिन्न नहीं। [ इसके | सिवा ] “[ सम्पूर्ण भूतोंमें ] जो सम | आत्मा ब्रह्म है वह मैं हूँ—ऐसा जाने'

* आरण्यकके क्रमसे यहाँ चौथी संख्या कही गयी है। † पूर्व अध्यायमें आत्माकी एकता, लोक तथा लोकपालोंकी सृष्टि और क्षुधा-पिपासासे संयोग आदि अनेक विषयोंका वर्णन है उनमें विवक्षित अभिप्रायका प्रतिपादन किया जाता है।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७ “आत्मा वा इदमेक एवाग्र | “निश्चय पहले एक आत्मा ही था” आसीत्” (१।१।१) इति “ब्रह्म | तथा “[ उसने ] ब्रह्मको [ आकाशके ततमम्” (१ । ३ । १३) इति | समान ] अतिशय व्याप्त [ जाना ]” । चोक्तम् । अन्यत्र च । | ऐसा भी कहा है और [ ऐसा | ही ] अन्य उपनिषदोंमें भी | कहा है। सर्वगतस्य सर्वात्मनो बालाग्र- | पूर्व०-उस सर्वगत सर्वात्माके [ प्रवेशश्रुति-विचारः ] मात्रमप्यप्रविष्टं | लिये तो बालका अग्रभाग भी अप्रविष्ट नास्तीति कथं सी- | नहीं है; फिर वह चींटीके बिलप्रवेश- मानं विदार्य प्रापद्यत पिपीलि- | के समान मूर्धसीमाको विदीर्णकर केव सुषिरम् । | किस प्रकार मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट | हुआ ? नन्वत्यल्पमिदं चोद्यं बहु | सिद्धान्ती-तुम्हारा यह प्रश्न तो | अल्प है । अभी तो उपर्युक्त कथनमें चात्र चोदयितव्यम् । अकरणः | बहुत कुछ पूछनेयोग्य बातें हैं। सन्नीक्षत । अनुपादाय किंचि- | ‘उसने इन्द्रियहीन होकर भी ईक्षण | किया । किसी उपादानके बिना ही ल्लोकानसृजत । अद्भ्यः पुरुषं | लोकोंकी रचना की। जलमेंसे पुरुष समुद्धृत्यामूर्छयत् । तस्याभिध्या- | निकालकर उसे अवयवयोजनाद्वारा | पुष्ट किया। अभिध्यानके द्वारा उसका नान्मुखादि निर्भिन्नं मुखादि- | मुख प्रकट हुआ तथा मुखादिसे भ्यश्चाग्न्यादयो लोकपालास्तेषां | अग्नि आदि लोकपाल प्रकट हुए । | उनका क्षुधा-पिपासादिसे संयोग चाशनायापिपासादि संयोजनं त- | कराना, उनका आयतनके लिये दायतनप्रार्थनं तदर्थं गवादि- | प्रार्थना करना, उसके लिये गौ आदि ऐतरेयो० ३—

५८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

५८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २ प्रदर्शनं तेषां यथायतनप्रवेशनं | दिखलाना, उन देवताओंका अपने- | अपने अनुकूल आयतनोंमें प्रवेश सृष्टस्यान्नस्य पलायनं वागादि- | करना, उत्पन्न हुए अन्नका भागना | और उसे वाक् आदि इन्द्रियों- भिस्तज्जिघृक्षा; एतत्सर्वं सीमा- | द्वारा ग्रहण करनेकी इच्छा करना- | ये सब बातें भी सीमा विदीर्ण करने विदारणप्रवेशसममेव । | और शरीरमें प्रवेश करनेके समान | ही [ आश्चर्यजनक ] हैं। अस्तु तर्हि सर्वमेवेदमनुप- | पूर्व०—अच्छा तो, इन सभी | बातोंको अनुपपन्न ( असम्भव ) पन्नम् । | मान लो । न; अत्रात्मावबोधमात्रस्य | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, | क्योंकि श्रुतिको यहाँ केवल आत्मा- विवक्षितत्वात्सर्वोऽयमर्थवाद इत्य- | वबोधमात्र कहना अभीष्ट होनेसे | यह सब अर्थवाद है; अतः इसमें दोषः। मायाविवद्वा महामायावी | कोई दोष नहीं है। अथवा मायावीके | समान महामायावी सर्वज्ञ सर्व- देवः सर्वज्ञः सर्वशक्तिः सर्वमे- | शक्तिमान् प्रभुने इस सम्पूर्ण जगत्- | की रचना की है, और इस रहस्यका तच्चकार । सुखावबोधनप्रति- | सरलतासे ज्ञान प्राप्त करनेके लिये | ही लौकिक रीतिसे यह आख्यायिका पत्त्यर्थं लोकवदाख्यायिकादि- | आदिकी रचना की गयी है—इस | प्रकार भी यह पक्ष युक्तियुक्त जान प्रपञ्च इति युक्ततरः पक्षः। न | पड़ता है, क्योंकि केवल लोक- | रचनाकी आख्यायिका आदिके हि सृष्ट्याख्यायिकादिपरिज्ञा- | परिज्ञानसे कुछ भी फल नहीं | मिलता। परन्तु आत्माके एकत्व और नात्किंचित्फलमिष्यते । ऐका- | यथार्थ स्वरूपके ज्ञानसे-अमरत्वरूप | फल [ प्राप्त होता है—यह ] त्म्यस्वरूपपरिज्ञानात्तु अमृतत्वं | सभी उपनिषदोंमें प्रसिद्ध है। फलं सर्वोपनिषत्प्रसिद्धम् । |

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ स्मृतिषु च गीताद्यासु “समं | तथा “सम्पूर्ण भूतोंमें समान भावसे सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्” | स्थित परमेश्वरको” इत्यादि वाक्यों- ( गीता १३।२७) इत्यादिना । | द्वारा गीता आदि स्मृतियोंमें भी | [ यही बात कही गयी है । ] ननु त्रय आत्मानः । भोक्ता | पूर्व०—आत्मा तो तीन हैं; [आत्मैकत्त्वे विचारः] कर्ता संसारी जीव | उनमें एक तो सम्पूर्ण लोक और एकः सर्वलोक- | शास्त्रमें प्रसिद्ध कर्ता भोक्ता संसारी- शास्त्रप्रसिद्धः । अनेकप्राणिकर्म- | जीव है । नगर और प्रासादादिके फलोपभोगयोग्यानेकाधिष्ठानव- | निर्माणके लिङ्गसे जिस प्रकार ल्लोकदेहनिर्माणेण लिङ्गेन यथा- | तत्सम्बन्धी कौशलके ज्ञानवाले उनके शास्त्रप्रदर्शितेन पुरप्रासादादि- | रचयिता तक्षा (कारीगर) आदिका निर्माणलिङ्गेन तद्विषयकौशलज्ञान- | ज्ञान होता है उसी प्रकार अनेक वांस्तत्कर्ता तक्षादिरिवेश्वरः सर्वज्ञो | प्राणियोंके कर्मफलके उपभोगयोग्य जगतः कर्त्ता द्वितीयश्चेतन आ- | अनेकों अधिष्ठानोंवाले लोक और त्मा अवगम्यते । “यतो वाचो | देहकी रचनाके शास्त्रप्रदर्शित निवर्तन्ते” ( तै० उ० २।४। | लिङ्गसे दूसरे चेतन आत्मा—जगत्- १) “नेति नेति” ( बृ० उ० | कर्ता सर्वज्ञ ईश्वरका ज्ञान होता है । ३।९।२६) इत्यादिशास्त्र- | तथा तीसरा आत्मा “जहाँसे वाणी प्रसिद्ध औपनिषदः पुरुषस्तृ- | लौट आती है” एवं “यह नहीं, तीयः । एवमेते त्रय आत्मानोऽ- | यह नहीं” इत्यादि शास्त्रसे प्रसिद्ध न्योन्यविलक्षणाः । तत्र कथमेक | औपनिषद पुरुष है । इस प्रकार ये एव आत्मा अद्वितीयः असंसा- | तीनों आत्मा एक दूसरेसे विलक्षण रीति ज्ञातुं शक्यते ? | हैं; अतः यह कैसे जाना जा सकता | है कि आत्मा एक, अद्वितीय और | असंसारी ही है ?

६० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

६० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २ तत्र जीव एव तावत्कथं | सिद्धान्ती-इन तीनोंमें पहले ज्ञायते ? | जीवका ही ज्ञान कैसे होता है ? नन्वेवं ज्ञायते श्रोता मन्ता | पूर्व०-इस प्रकार ज्ञान होता है द्रष्टा आदेष्टा आघोष्टा विज्ञाता | कि 'वह श्रवण करनेवाला, मनन करनेवाला, द्रष्टा, आज्ञा करनेवाला, शब्द उच्चारण करनेवाला, विज्ञाता^२ प्रज्ञातेति । | और प्रज्ञाता^३ है।' ननु विप्रतिषिद्धं ज्ञायते यः | सिद्धान्ती-परन्तु, जिसका श्रवणादिकर्तृत्वेनामतो मन्ता- | श्रवणादिके कर्तारूपसे ज्ञान होता है उसे 'अमत और मनन करनेवाला, विज्ञातो विज्ञातेति च । तथा | अविज्ञात और विशेष रूपसे जानने- “न मतेर्मन्तारं मन्वीथा न | वाला' इस प्रकार कहना तथा “मति-के मनन करनेवालेका मनन न करो, विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः” | विज्ञातिके विज्ञाताको न जानो” (बृ०उ० ३।४।२) इत्यादि च। | इत्यादि श्रुतिवचन भी विरुद्ध होगा । सत्यं विप्रतिषिद्धम्, यदि | पूर्व०-यदि उसे सुखादिके प्रत्यक्षेण ज्ञायेत सुखादिवत् । | समान प्रत्यक्षरूपसे जाना जाय तो प्रत्यक्षज्ञानं च निवार्यते “न | अवश्य विरुद्ध होगा । किन्तु “मतिके मनन करनेवालेका मनन न करो” मतेर्मन्तारम् मन्वीथाः” (बृ० | इत्यादि वाक्यसे उसके प्रत्यक्षज्ञानका उ० ३।४।२) इत्यादिना । | निवारण किया गया है। उसका ज्ञायते तु श्रवणादिलिङ्गेन; | ज्ञान तो श्रवणादि लिङ्गसे होता है; तत्र कुतो विप्रतिषेधः । | फिर इसमें विरोध कहाँ है ? ननु श्रवणादिलिङ्गेनापि कथं | सिद्धान्ती-श्रवणादि लिङ्गसे भी आत्माका ज्ञान किस प्रकार हो ज्ञायते ? यावता यदा शृणोत्या- | सकता है ? क्योंकि जब और जिस समय आत्मा सुननेयोग्य शब्दको त्मा श्रोतव्यं शब्दम्, तदा तस्य | सुनता है उस समय श्रवणक्रियाके १. सिद्धान्तीकी यह उक्ति पहले आत्मामें बतलाये हुए कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि धर्मोंका प्रतिषेध करनेके लिये है। २. विशेष जाननेवाला । ३. सबसे अधिक जाननेवाला ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 श्रवणक्रिययैव वर्तमानत्वा- | साथ ही वर्तमान रहनेके कारण न्मननविज्ञानक्रिये न संभवतः | उसके लिये अपनेमें अथवा अन्यत्र आत्मनि परत्र वा । तथान्यत्रापि | मनन या विज्ञानरूप क्रियाएँ संभव | नहीं हैं । [ इस प्रकार विजातीय मननादिक्रियासु । श्रवणादि- | क्रियाओंकी समकालीनताका निषेध | करके अब सजातीय क्रियाओंका क्रियाश्च स्वविषयेष्वेव । न हि | निषेध करते हैं- ] इसी प्रकार | अन्यत्र मनन आदि क्रियाओंमें भी मन्तव्यादन्यत्र मन्तुर्मननक्रिया | समझना चाहिये । श्रवणादि क्रियाएँ | भी अपने विषयोंमें ही प्रवृत्त हो संभवति । | सकती हैं [ आश्रयमें नहीं ] । मनन | करनेवालेकी मननक्रिया मन्तव्यसे | भिन्न स्थानमें सम्भव नहीं है । ननु मनसा सर्वमेव मन्तव्यम् । | पूर्व०-मनसे तो सभीका मनन | किया जाता है । सत्यमेवं तथापि सर्वमपि | सिद्धान्ती-यह ठीक है; परन्तु. मन्तव्यं मन्तारमन्तरेण न मन्तुं | जो कुछ मनन किया जाता है वह | सब मननकर्ताके बिना नहीं किया शक्यम् । | जा सकता । यद्येवं किं स्यात् ? | पूर्व०-यदि ऐसा हो भी तो | इससे क्या होगा ? इदमत्र स्यात् ; सर्वस्य योऽयं | सिद्धान्ती-इससे यहाँ यह मन्ता स मन्तैवेति न स मन्तव्यः | होगा कि जो इस सबका मनन करने- | वाला है वह मनन करनेवाला ही स्यात् । न च द्वितीयो मन्तुर्म- | रहेगा, मन्तव्य नहीं होगा । तथा | उस मनन करनेवालेका कोई दूसरा न्तास्ति । यदा स आत्मनैव | मननकर्ता भी नहीं है । यदि उसे

६२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

६२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

[वाम भाग / संस्कृत मूल] मन्तव्यस्तदा येन च मन्तव्यः आत्मा आत्मना यश्च मन्तव्य आत्मा तौ द्वौ प्रसज्येयाताम् । एक एवात्मा द्विधा मन्तृमन्तव्य- त्वेन द्विशकलीभवेद्वंशादिवत् । उभयथाप्यनुपपत्तिरेव । यथा प्रदोपयोः प्रकाश्यप्रकाशकत्वा- नुपपत्तिः समत्वात्तद्वत् । न च मन्तुर्मन्तव्ये मननव्या- पारशून्यः कालोऽस्त्यात्ममन- नाय । यदापि लिङ्गेनात्मानं मनुते मन्ता; तदापि पूर्ववदेव लिङ्गेन मन्तव्य आत्मा यश्च तस्य मन्ता तौ द्वौ प्रसज्येया- ताम् । एक एव वा द्विधेति- पूर्वोक्तदोषः । न प्रत्यक्षेण नाप्यनुमानेन ज्ञायते चेत् कथ- मुच्यते “स म आत्मेति विद्यात्” (कौषी० ३।९) इति ? कथं वा श्रोता मन्तेत्यादि ?

[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद] आत्माद्वारा ही मन्तव्य माना जाय तो जिस आत्मासे आत्मा मनन किया जाता है और जिस आत्माका मनन किया जाता है उनके दो होने- का प्रसंग उपस्थित हो जायगा । अथवा बाँस आदिके समान एक ही आत्मा मन्ता और मन्तव्यरूपसे दो भागोंमें विभक्त माना जायगा। किन्तु उपर्युक्त दोनों प्रकारसे अनुपपत्ति ही है। जैसे कि समानरूप होनेके कारण दो दीपकोंका परस्पर प्रकाश्य- प्रकाशकत्व नहीं बन सकता, उसी प्रकार [ यहाँ समझना चाहिये ] । इसके सिवा मन्ताको अपना मनन करनेके लिये मन्तव्य पदार्थों- का मनन करनेके व्यापारसे रहित कोई काल भी नहीं है। जिस समय भी किसी लिङ्गके द्वारा मन्ता अपना मनन करता है उस समय भी पहले- हीके समान लिङ्गसे मन्तव्य आत्मा और जो कोई उसका मनन करने- वाला है वे दो सिद्ध होते हैं; अथवा एक ही दो भागोंमें विभक्त है-इस प्रकार पूर्वोक्त दोष उपस्थित हो जाता है। और यदि वह न प्रत्यक्ष- से जाना जाता है और न अनुमानसे तो ऐसा क्यों कहते हैं कि “वह मेरा आत्मा है-ऐसा जाने” और क्यों उसे श्रोता-मन्ता इत्यादि बतलाते हैं ?

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३ ननु श्रोतृत्ववादिधर्मवानात्मा, | पूर्व०-आत्मा तो श्रोतृत्ववादि अश्रोतृत्वादि च प्रसिद्धमात्म- | धर्मवाला है और आत्माके अश्रोतृत्व नः। किमत्र विषमं पश्यसि ? | आदि धर्म भी [ श्रुतिमें] प्रसिद्ध | हैं। फिर इसमें तुम्हें विषमता क्या | दिखलायी देती है ? यद्यपि तव न विषमं तथापि | सिद्धान्ती-यद्यपि तुझे कोई | विषमता ज्ञात नहीं होती, तथापि मम तु विषमं प्रतिभाति । | मुझे तो होती ही है । किस | प्रकार कि जिस समय यह श्रोता कथम् ? यदासौ श्रोता तदा | होता है उस समय मन्ता नहीं | होता और जब मन्ता होता है तब न मन्ता यदा मन्ता तदा न | श्रोता नहीं होता । ऐसा होनेके श्रोता । तत्रैवं सति पक्षे श्रोता | कारण वह एक पक्षमें श्रोता और | मन्ता है तो दूसरे पक्षमें न श्रोता मन्ता पक्षे न श्रोता नापि | है और न मन्ता ही है । ऐसा ही | अन्यत्र (विज्ञाता आदिके सम्बन्धमें) मन्ता । तथान्यत्रापि च । | भी समझना चाहिये । यदैवं तदा श्रोतृत्ववादिधर्म- | जब कि ऐसी बात है तब | आत्मा श्रोतृत्ववादि धर्मवाला है अथवा वानात्मा अश्रोतृत्वादिधर्मवा- | अश्रोतृत्वादि धर्मवाला ? इस प्रकार न्वेति संशयस्थाने कथं तव | संशयस्थान उपस्थित होनेपर तुझे | विषमता क्यों नहीं दिखायी देती ? न वैषम्यम् । यदा देवदत्तो | जिस समय देवदत्त चलता है उस गच्छति तदा न स्थाता | समय वह चलनेवाला ही होता है | ठहरनेवाला नहीं होता, तथा जिस गन्तैव । यदा तिष्ठति तदा | समय वह ठहरता है उस समय | वह ठहरनेवाला ही होता है, चलने- न गन्ता स्थातैव । तदा अस्य | वाला नहीं होता । ऐसी अवस्थामें पक्ष एव गन्तृत्वं स्थातृत्वं | इसका गन्तृत्व और स्थातृत्व पाक्षिक

६४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

६४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २ च। न नित्यं गन्तृत्वं स्थातृत्वं ही होता है, नित्यगन्तृत्व अथवा नित्यस्थातृत्व नहीं होता। इसी प्रकार वा। तद्वत्। [आत्माका श्रोतृत्वादि भी पाक्षिक ही सिद्ध होगा, नित्य नहीं]। तथैवात्र काणादादयः पश्य- काणाद आदि अन्य मतावलम्बी भी इस विषयमें ऐसा ही समझते हैं, न्ति । पक्षप्राप्तेनैव श्रोतृत्वादिना क्योंकि इस विषयमें उनका कथन है कि पक्षमें प्राप्त होनेवाले श्रोत- त्वादिके कारण ही आत्मा श्रोता- मन्ता इत्यादि कहा जाता है। वे ज्ञानका संयोगजत्व (इन्द्रिय और मनके संयोगसे उत्पन्न होना) और अयोगपद्य (एक साथ न होना) प्रतिपादन करते हैं। और मनको एक साथ ज्ञान उत्पन्न न होनेमें वे 'मैं अन्यमनस्क था, इसलिये न देख सका' इत्यादि लिङ्ग प्रदर्शित करते हैं और यह युक्तिसङ्गत भी है। आत्मोच्यते श्रोता मन्तेत्यादि- वचनात् । संयोगजत्वमयौगपद्यं च ज्ञानस्य ह्याचक्षते । दर्शयन्ति चान्यत्रमना अभूवं नादर्शमि- त्यादि युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गममिति च न्याय्यम् । भवत्वेवम्; किं तव नष्टं पूर्व०-ऐसा सिद्धान्त भले ही रहे; किन्तु यदि ऐसा हो भी तो तुम्हारी क्या हानि है ? यद्येवं स्यात् ? अस्त्वेवं तवेष्टं चेत् । श्रुत्य- सिद्धान्ती-यदि तुम्हें अभिमत हो तो तुम्हारे लिये ऐसा भले ही र्थस्तु न संभवति । हो; परन्तु यह श्रुतिका तात्पर्य तो हो नहीं सकता । किं न श्रोता मन्तेत्यादि- पूर्व०-क्या श्रोता मन्ता इत्यादि श्रुत्यर्थः ? श्रुतिका अर्थ नहीं है ? न; न श्रोता न मन्तेत्यादि- सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि [श्रुति- में तो] 'न श्रोता है न मन्ता वचनात् । है' इत्यादि भी कहा है।