अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
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स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
११७ अकबर बीरबल बिनोद पर हाजिर होने का निश्चय कर वह अपने घर आया। जब बाद- शाह को विदित हुआ कि बीरबल तीर्थाटन कर लौट आया है तो एक दूत उसे बुलाने को भेजा। बीरबल बादशाह के बुलावे पर तुरत दर्बार में हाजिर हुआ और अदब से सलाम कर अपनी जगह पर जा बैठा। बादशाह को अब भी पहली बात की ढक सवार थी। वह बोला- "बीरबल ताक पर का सेव।" बीरबल ने उत्तर दिया- "जी हुजूर पाखाने वाला देव।" बीरबल के इस उत्तर से बादशाह की आँखें खुल गईं और वह अपने किये पर शरमिन्दा हुआ। उसी दिन से सवाल का जवाब पाकर फिर उसने बीरबल से सेव की बात कभी न छेड़ी। कालान्तर में उसे विदित हो गया कि जंगल वाला देव और कोई न था बल्कि वह बीरबल की ही करतूत थी। अत- एव देव का भ्रम जो उसके हृदय में समा गया था वह क्रमशः जाता रहा और दिन सानन्द बीतने लगे। —:🌾:— दर्पण में मोहरें एक रात्रि में किसी मनुष्य को जब कि वह अचेत निद्रा देवी की गोद में पड़ा २ विश्राम कर रहा था, ऐसा स्वप्न दीख पड़ा- "मैं किसी वेश्या के पास सोया हुआ हूँ। तमाम रात उसके साथ सोहबत करने के बाद उसे दस अशर्फियाँ देकर घर लौट रहा हूँ।" जब वह नींद से जगा तो उसे स्वप्न की सारी बातें ज्यों की त्यों स्मरण रहीं। उस का फलाफल जानने के अभिप्राय से उस मनुष्य ने स्वप्न की बातें अपनी मित्रमण्डली
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में चलाई। उसके मित्र कुछ ज्योतिषी तो थे नहीं! फल कैसे बतलाते। यह बात बढ़ते २ उस वेश्या के कान तक पहुँची। वह उस को वज्र मूर्ख समझकर उन अशर्फियों को लेने की फिराक में पड़ी। उसको ज्ञात था कि मूर्ख ने इस बात को तमाम लोगों में बाँट दिया है, गवाहों की कमी न पड़ेगी। दूसरे ही दिन वह उसके मकान पर गई और अपना नाम बतला कर रात वाली अशर्फियाँ माँगने लगी। उस गरीब के घर अशर्फियों का दर्शन मिलना दुर्लभ था, देता कहाँ से। उसे झूठी कहकर नकर गया। वेश्या उससे जबरी करने लगी और उसे पकड़कर शहर कोतवाल के पास ले गई। कोतवाल ने उनका बयान लिया। जब उसे सच झूठ का ज्ञान नहीं हुआ तो लाचार होकर उन्हें बीरबल के पास ले गया। बीरबल ने बारी-बारी दोनों का बयान लिया। उनकी बातें भलीभाँति समझ-बूझकर एक दर्पण और दश अशर्फियाँ बाजार से मँगवाया। तब एक ऐनक वेश्या के सामने रख कर अशर्फियों को इस चालाकी से रक्खा कि जिससे उनका विम्ब दर्पण पर पड़ता रहे। इस प्रकार बीरबल ऐनक में अशर्फियों को दिखलाकर वेश्या से बोला-“इस शीशे में की अशर्फियाँ तू ले ले !” तब वेश्या ने कहा-“भला मैं इन्हें कैसे ले सकती हूँ, यह तो अशर्फियों की शाया दीखती है ?” तब बीरबल को मौका मिला उसने उस वेश्या से कहा-“तुम को भी तो अशर्फियों का देना उसने स्वप्न में ही स्वीकार किया था न । अब तूं उससे क्यों माँग रही है ?”
११६ अकबर बीरबल विनोद
११६ अकबर बीरबल विनोद बीरबल के न्याय से वेश्या की गरदन नीची हो गई और उसने वहाँ से खिसकने का विचार किया। उसको जाते हुए देखकर बीरबल ने कहा- "क्यों कहाँ को चली, अपने किये का प्रतिफल लेती जा, तूने इस गरीब को नाहक परेशान किया है और इसके कार्यों में बाधा पहुँचाई है अतएव इस अपराध में तुझे दो मास का कारागृह वास करना पड़ेगा। इस प्रकार दण्ड देकर बीरबल ने उसे तुरत जेल भेजवा दिया और बिचारे गरीब की छुटकारा हुई।
बुलाता आ
एक दिन बादशाह प्रातः काल हाथ मुँह धोकर अपने एक नौकर से बोला- "बुलाता आ।" लेकिन आगेका मतलब नहीं बतलाया कि फलाँ को बुलाता आ। बिचारे नौकर ने बहुतेरा मूड़ मारा, पर उसकी समझ में कुछ न आया कि आखिरस किसको ले जावे। वह निरर्थक बहुतेरे आदमियों के पास दौड़ा, आया, गया परन्तु किसी की समझ में असल बात न आई कि बादशाह किसे बुलाया चाहते हैं। वह विवश होकर बीरबल के घर पहुँचा और सब घटना कहकर इस बात का जिज्ञासू हुआ कि बादशाह किस को बुला रहे हैं। बीरबल ने उससे पूछा- "उस समय बादशाह क्या कर रहे थे।" तब नौकर ने जवाब दिया- "वे हाथ मुँह धोकर बैठे हुए थे।" बीरबल ने बतलाया कि वे हजामत बनवाना चाहते हैं, अतएव तू हज्जाम को लिवा ले जा।" नौकर हज्जाम को ले
अकबर बीरबल विनोद १२०
अकबर बीरबल विनोद १२० गया। बादशाह हज्जाम को देख कर अति प्रसन्न हुआ और उस नौकर से पूछा-"यह राय तुझे किसने दी।" नौकर ने कहा-"पृथ्वीनाथ ! जब मेरी समझ में आपकी बात न आई तो मैं बड़ा परेशान हुआ अन्त में हारकर बीरबल के पास जाकर सारा किस्सा कह सुनाया। बीरबल ने कहा-"बादशाह हज्जाम को बुला रहे हैं।" सो मैं उन्हीं की सलाह से इस हज्जाम को ले आया हूँ।" बादशाह बीरबल की कुशाग्र बुद्धि से बड़ा सन्तुष्ट हुआ।
रूपचन्द फूलचन्द जौहरी दिल्ली शहर में कपूर चन्द जौहरी के दो पुत्र थे। बड़े का नाम रूपचन्द और छोटे का फूलचन्द जौहरी था। मरते समय कपूरचन्द काफी धन अपने दोनों लड़कों के लिये छोड़ गया था। बाप के क्रिया कर्म के पश्चात जो कुछ धन बच रहा उससे दोनों भाइयों ने कई वर्षों तक गुलछर्रे उड़ाये। आखिरकार उनकी नासमझी से सारा धन खर्च हो गया। तब इनको धनोपार्जन की चिन्ता हुई। जब दिल्ली में रहकर धनोपार्जन की इन्हें कोई तरकीब न सूझी तो परदेश जाने का ठहराया और गृहस्थी के निर्वाहार्थ दो तीन वर्षों के लिये सब सामग्री एकत्रित कर बाहर के लिये रवाना हुए। जब कुछ दूर निकल गये तो इन लोगों ने दिहातों से सामान खरीदना और अगले दिहातों में बेचना प्रारम्भ किया। इसतरह खरीद फरोक्त करते हुये बहुत दूर निकल गये, रास्ते
१२१ अकबर बीरबल विनोद
१२१ अकबर बीरबल विनोद में एक जंगल मिला। उस जंगल के मध्य में एक तालाब था। इनको प्यास सता रही थी अतएव उस तालाब पर बैठकर निर्मल जल पान किया। फिर स्नान करने की इच्छा हुई। तालाब में स्नान करने के निमित्त दो-तीन सीढ़ी नीचे उतरते ही फूलचन्द के पैर के नीचे कोई ठोस चीज पड़ी। उसने डुबकी मारकर उसे बाहर निकाला तो वह एक छोटी सी सन्दूक थी। सन्दूकमें एक छोटा सा ताला बन्द था। फूलचन्द ने ताले को पत्थर से मार-मारकर तोड़ दिया उसमें दो बेशकीमत लाल बन्द थे। वह उनको देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और अपने ज्येष्ठ भ्राता रूपचन्द को दिखलाने के लिये बुलाया। रूपचन्द उसकी आवाज सुनकर नजदीक गया तो देखा कि फूलचन्द के हाथ में दो लाल हैं। वह उन लालों को अपने भाई रूप- चन्द को दिखलाकर बोला-“भाई! यह एक लाल आप अपने पास रक्खें और एक मैं लूँगा। रूपचन्द ने कहा-“भाई इस दौलत को लेकर आप घर लौट चलें मैं भी यह सब तिजारती माल बेचता हुआ थोड़े दिनों में लौट आता हूँ। फूलचन्द भाई की आज्ञा सिरोधार्य कर घर लौटने की तय्यारी करने लगा।” वह लाल दिखलाते हुए रूपचन्द से बोला-“भैया ! मैं घर तो लौट जाऊँगा, परन्तु आप अपने हिस्से का लाल ले लेवें।” रूपचन्द ने भाई को आगा पीछा समझा कर उत्तर दिया-“भाई आप जानते ही हो कि परदेश में अपने पास दौलत रखना कितना खतरनाक होता है अतएव यदि आप मुझे लाल देने की इच्छा रखते हैं तो घर पहुँच
अकबर बीरबल विनोद १२२
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कर मेरे हिस्से का लाल अपनी भाभी को देकर उसे छिपाकर रखने के लिये भलीभाँति समझा देना। मैं लौटकर उससे अपना लाल ले लूँगा। फूलचन्द अपने बड़े भाई का आज्ञापालक था, उन लालों को सावधानी से कमर में छिपाकर घर का रास्ता लिया। घर पहुँचकर माया की चक्कर में पड़ गया और रूपचन्द के भाग का लाल अपनी भाभी को नहीं दिया, बल्कि उन दोनों लालों को अपने ही पास छिपा कर रख लिया। पैसे के जोर से नगर में एक दूकान खोलकर जौहरी बन बैठा। जब रूपचन्द दो तीन वर्षों के पश्चात् चक्कर लगाता हुआ घर पहुँचा और अपनी स्त्री से लाल माँगा तो वह बोली-"कैसा लाल और किस ने कब मुझे दिया था, जो मैं सहेज कर रखती। स्त्री से ऐसा निरास उत्तर सुनकर रूपचंदने फूलचन्द से पूछा- "क्यों भाई मेरा लाल कहाँ है?" फूलचन्द ने उत्तर दिया "भैया वह लाल तो मैं आते ही भाभी को सौंप दिया था, बल्कि उसे भली भाँति समझा भी दिया था कि देखो भैया के आने पर इसे उन्हें सौंप देना। जान पड़ता है कि अब लालच में पड़कर वह उसे आपको देना नहीं चाहती है। जिस कारण आप से झूठा बोल रही है।" रूपचन्द को भाई के ऐसे उत्तर से बड़ा क्रोध उत्पन्न हुआ और घर आकर अपनी स्त्री को बहुत मारा पीटा, परन्तु फिर भी उसने अपने को निर्दोषी बतलाया। वह बोली-"लाल पाना तो बड़ी दूर की बात है; मैं तो इतना भी नहीं जानती कि लाल कैसा
१२३ अकबर बीरबलविनोद
१२३ अकबर बीरबलविनोद होता है? उसका क्या रंग है।" तब रूपचन्द की आँखें खुलीं और उसने अपने मन में अनुमान किया कि यह सारा फरेब भाई का रचा हुआ है। लालच में आकर लाल को अपनी भाभी को नहीं दिया। अब मेरे पूछने पर उसपर दोषारोपण करता है।" वह इस फर्याद को लेकर बीरबल के पास गया और उसकी अदालत में दरख्वास्त लगाई। बीरबल ने एक निश्चित तिथि पर फूलचन्द को उसके साखियों के सहित तलब किया। इधर रूपचन्द को भी उसकी स्त्री के सहित बुलाया। पहले उसने रूपचन्द और उसकी स्त्री का बयान लिया फिर उन्हें अलग अलग स्थानों पर बैठने की आज्ञा देकर फूलचन्द के साखियों को तलब किया-जब वे आये तो बीरबल ने पूछा- "देखो भाई! जो मैं आप लोगों से पूछता हूँ उसका ठीक ठीक उत्तर देना, नहीं तो यदि बात झूठी जान पड़ेगी तो दोषके उप- युक्त दण्ड पावोगे। क्या तुमने फूलचन्द को रूपचन्द की स्त्री को लाल देते हुये अपनी आँखों देखा था?" उन साखियों ने फूलचन्द का लाल देना स्वीकार किया। तब बीरबलने सोचा- "यह मसला इस प्रकार नहीं हल होगा। उन पाँचों साखियों को भी अलग अगल कोठरी में बन्द करवा दिया और बाजार से मोम मँगवाकर सात सात तोला उन पाँचों को देकर हुक्म दिया-“अच्छा यदि तुम लोगों ने लाल देते हुए देखा है तो इस मोम से उसी शक्लका लाल बना डालो। रूपचन्द की स्त्री को भी लाल की शक्ल बनाने के लिये मोम दिया गया। जब निर्धारित समय बीतगया और सभों से लाल लेने की बारी आई तो बीरबल ने पहले उन्हीं दोनों भाइयों का लाल
अकबरबीरबल विनोद १२४
अकबरबीरबल विनोद १२४ मँगवाया। उन दोनोंके लालों का आकार एक सा था। तब एक एक कर पाँचों साखियों का लाल भी मँगाकर देखा वे पाँचो पाँच ढंग के थे! उनमें लाल के आकार का एक भी न निकला। तब रूपचन्द के स्त्री की तलबी हुई, भला वह बिचारी लाल का हाल क्या जाने निरा चुप रह गई। बीरबल ने उससे पूछा-“तू ने अपना लाल क्यों नहीं बनाया?” वह पर्दे की आड़ से बोली-“सरकार! आजतक मैं ने लाल आँखों से देखा भी नहीं है तो कौन सा आकार बनाकर आपको दिखलाती।” बीरबल ने उसकी करतूतों से उसे निर्दोष समझा और उसको यह भी प्रकट हो गया कि यह सारी करतूत फूलचन्द की ही, है, केवल अपने भाई को ठगने के लिये ही यह सब प्रपंच रच रखा है। बीरबल फूलचन्द के साखियों को फिर से धमकाया, परन्तु वे भलीभाँति गढ़ छोल कर तय्यार किये गये थे। इसलिये उनमें से एक भी नहीं डिगा। तब बीरबल ने दो सिपाहियों को इशारे से बुलाकर कोड़ा लगाने का संकेत किया। वे दोनों चाबुक लेकर आगे आये और बीर- बल के दूसरी आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगे। यह दशा उपस्थित देख उनमें से दो साखी फूट गये और वे सत्यर बात कहने को प्रस्तुत हुये। उनका दूसरा बयान इस प्रकार हुआ-“पृथ्वी- नाथ! हमारा कसूर माफ किया जाय क्योंकि हमने जो कुछ भी झूठ कहा है उसका कारण एकमात्र फूलचन्द है। उसनेही हमलोगों को बहकाकर झूठ बोलवाया है।” बीरबल को फूलचन्द का हीं सारा दोष प्रतीत हुआ और उसे ललकार बोला-“अब बता, तू क्या कहता है, तेरे
१२५ अकबर बीरबल विनोद
१२५ अकबर बीरबल विनोद साखियों ने अभी तेरे सामने क्या कहा है ? फूलचन्द ने उत्तर दिया-“हुजूर मार की डर से भूत भागता है, आखिर वे तो मनुष्य ही हैं। केवल मार से बचने के लिये ही सबों ने आपके सामने झूठ बोलना स्वीकार किया है।" इस पर बीरबल ने कहा-“तब ये मोम का पिंड लाल के आकार का क्यों नहीं बनालाये, यदि लाल को देखे होते तो जरूर बना लाते।” बेशक तू झूठा है और सजा के काबिल है।" बीरबल ने सिपाहियों को उसे कोड़े लगाने की आज्ञा दी। सिपाहियों ने दोनों तरफ से एक एक कोड़े जमाये। रूपचन्द भी ठिकाने आ गया और अपना कसूर गर्दन कर अर्ज किया-“हुजूर वें लाल मेरे ही पास हैं मैं उन्हें अभी ला देता हूँ।” लालों को मँगा कर बीरबल ने एक लाल रूपचन्द को दिया और दूसरा फूलचन्द के हिस्से का राज-कोष में जमा करा दिया। फूलचन्द और उसके साखियों को झूठा बोलने के कारण उचित दण्ड दिया गया। —:*:— सब सयानों का एकमत एक दिन बादशाह ने बीरबल से पूछा-“क्यों बीरबल संसार के मनुष्यों की बुद्धि एक समान होती है वा उसमें कुछ अन्तर भी होता है।” बीरबल ने जवाब दिया- “पृथ्वीनाथ ! क्या आपने इस कहावत को नहीं सुना है-“सब सयानों का एक मत।” यानी और सब बातों में तो लोगों की बुद्धि में विभेद पाया जाता है, परन्तु स्वार्थ सिद्धि में
अकबर बीरबल विनोद १२६
अकबर बीरबल विनोद १२६
सबकी मति एक समान ही देख पड़ती है।” बादशाह बोला-“भला यह कैसे हो सकता है कि बुद्धि तो जुदी जुदी हो और विचार सबका एक हो?” बीरबल ने कहा-“पृथ्वीनाथ ! “हाथ कंगन को आरसी क्या।” यदि आपको प्रमाण की आवश्यकता हो तो मैं कल्ह ही सिद्ध करके दिखला देने को तय्यार हूँ।” बादशाह ने कहा-“बहुत बेहतर ।” दूसरे दिन प्रातः काल बीरबल ने बादशाह की अनुमति प्राप्तकर सरकारी बगीचे का एक बड़ा हौज़ जो पानी से लबालब भरा था रिक्त करवा दिया और सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि सब लोग अपने अपने घरों से एक एक घड़ा दूध लाकर हौज़ को भरें। फिर हौज़ के ऊपर एक सफेद चादर बिछवाकर उसे भलीभाँति ढक दिया। ऐसी तरकीब कर बादशाह को देखने के लिये बुलवा भेजा। समय रात्रिका था लोगों ने विचार किया कि जब हौज़ में इतना घड़ा दूध पड़ेगा तो भला उसमें एकाध घड़ा जल छोड़ देने से खराबी क्या खराबी होगी । इसी विचार से प्रत्येक घरों से दूध की जगह पानी ही डाला गया। अँधेरी रात में किसी को भी न सूझा कि हौज़ में सभी लोग पानी ही छोड़ रहे हैं। उनका निजी अनुमान था कि मेरे सिवा अन्य नागरिक हौज़ को दूध ही से भर रहे हैं? यदि किसी ने साहस कर देखा भी तो चादर की सफेदी के कारण दूध का भ्रम हो गया, पानी तो नीचे छिपा हुआ था जब सबेरा हुआ तो बादशाह बीरबल के साथ हौज़ का दूध
२७ अकबर बीरबल विनोद
२७ अकबर बीरबल विनोद खने के लिये गया। बीरबल ने बागवान को हौज की चादर उठाने की आज्ञा दी। जब चादर उठा दी गई तो हौज एकदम पानी से भरा हुआ निकला उसमें दूध का लेश मात्र भी नहीं था। यह अजीब तमाशा देखकर बादशाह दंग हो गया और उसकी समझ में न आया कि आखिर मामला क्या है। जब बीरबल से उसका कारण पूछा गया तो वह बोला- "गरीबपरवर ! आपने अपनी आँखों देख लिया अब भी "सब सयानों का एक मत" वाली कहावत मानने को तय्यार हैं वा नहीं ? बादशाह ने सशंक होकर उत्तर दिया- "बीरबल कहावत तो अक्षरशः सत्य प्रतीत होती है, परन्तु फिर भी मैं पूर्णतया संतुष्ट नहीं हुआ हूँ अतएव इसमें और भी खोज बीन करने की आवश्यकता प्रतीत होती है। अब मैं उसका स्वयं अन्वेषण कर लूँगा तुम्हे कुछ करने की आवश्य- कता नहीं है। बीरबल तो हृदय से बादशाह का भक्त था इसलिये चुप रह गया। दूसरे दिन जब बादशाह सोकर उठा तो उसे वही बात वाली धुन समाई। वह अन्वेषण करने के अभिप्राय से भेष बदल कर नगर की तरफ चला। कई चक्कर काटने के बाद उसको एक मकान दृष्टिगत हुआ। इसकी दीवारें बहुत ऊँची न थीं और न कोई टीम टाम की सजावट ही थी, परन्तु मकान खूब साफ सुथरा था। बादशाह ने इसी मकान को अपने अन्वेषण का केन्द्र ठहराया और द्वार पर पहुँच कर मकान की घुन्डी खड़खड़ाइ । किवाड़ खुल गया। भीतर से
अकबर बीरबल विनोद १२८
अकबर बीरबल विनोद १२८ एक आदमी ने पूछा-"आप कहाँ से आये हैं और आपका यहाँ किससे और क्या प्रयोजन है?" बादशाह बोला-मैं एक मुसाफर हूँ, कल का इसशहर में आया हूँ मैने अपना डेरा सराय में डाला है, आज नगर देखने की इच्छा से निकला तो घूमते फिरते रास्ता भूलकर इधर आ पहुँचा, थकावट के कारण मेरे बदन में पीड़ा हो रही है इसलिये कुछ समय तक विश्राम लेकर अपनी थकावट दूर करना चाहता हूँ। बादशाह के प्रस्ताव को मकान मालिक ने स्वीकार करते हुये उसे भीतर बुला लिया और एक चारपाई दिखला कर विश्राम करने की आज्ञा दी बादशाह चारपाई पर जा पड़ा और मकान मालिक अपना निजी काम करने लगा। जब वह सब कामों से निपट चुका तो मुसाफर के पास आया और उससे कुछ खाने पीने का अनुरोध किया, परन्तु बादशाह ने उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उससे मकान मालिक से आपस दारी की बातें होने लगीं। मुसाफिर (बादशाह)-"भाई कलह मैं इस नगर में आकर एक ढिंढोरा सुना था क्या यह बराबर प्रति मास पीटा जाता है वा इसी बार पीटा गया था। मैं बड़े आश्चर्य में पड़ गया हूँ कि इस ढिंढोरे से बादशाह का क्या प्रयोजन है।" मकान मालिक ने उत्तर दिया-"नहीं भाई पहले ऐसा कभी नहीं सुनने में आया था, कल्ही अचानक यह नई बात सुनने में आई, मुझे इसका भेद कुछ भी नहीं मालूम है।" उसने फिर पूछा-"तो बादशाह इतने दूध को लेकर
१२६ अकबर बीरबल विनोद
१२६ अकबर बीरबल विनोद
आखिरश करेगा क्या।" मकानमालिक-“भाई चाहे वह जो कुछ भी करे, परन्तु मैं आपसे सत्य २ बतलाता हूँ कि मैं तो दूध की जगह हौज़ में पानी हीं डाल आया था।” मैंने देखा कि शहर में जब सभी लोग दूध की तलाश में हैं तो इतना दूध कहाँ से आवेगा और यदि हजारों घड़े दूध में इक घड़ा पानी ही डाल दूँगा तो उससे क्या होता जाता है!” बादशाह ने मुस्करा कर कहा-“बेशक! युक्ति तो आपने अच्छी निकाली, परन्तु यह बात कहीं बादशाह की कानों तक पहुँचे तो फिर आपकी कौन सी दुर्गति हो, इसपर भी आपने कुछ बिचार किया था?” मकान मालिक ने कहा-“भाई यह बात किसी प्रकार प्रकट नहीं हो सकती।” बादशाह ने सोचा कि अब अपना असली स्वरूप इसपर प्रगट कर देना चाहिये ताकि अपनी धूर्तता पर इसे पश्चात्ताप हो। वह तुरत अपना ऊपरी लिवास हटाकर शाही लिवास में प्रकट हुए। मकान मालिक बड़ा भयभीत हुआ और उसका मुख मलीन हो गया। तब बादशाह उसे ढाढ़स बँधाते हुए बोले-“तुम घबराओ नहीं, इससे तुम्हारा कोई अनिष्ट न होगा। फिर असल बात तो यह है कि आपने अपने मुख से ही अपना दोष स्वीकार किया है, सुनो मैं यहाँ किसी अपराधी को दण्ड देने के अभिप्राय से नहीं आया हूँ केवल मुझे झूठ सच की जाँच करनी थी, जो मैं शाही लिवास में आया होता तो यह बात मुझे न मालूम होती।” इस प्रकार उस मकानदार को निर्भय कर बादशाह अपने चेहरे को फिर नकली लिवास में ढक लिया और उससे ६
अकबर बीरबल विनोद १३०
अकबर बीरबल विनोद १३० बिदा हो एक दूसरे धनी के घर जा पहुँचे। यह धनी अपनी दयालुता के कारण सारे नगर में विख्यात हो रहा था। बाद- शाह ने उससे भी अपनी वही पहली युक्ति निकाली, यानी अपने को बहुत थका माँदा बतलाकर थोड़ी देर के लिये आश्रय माँगा। वह रईस बादशाह की थकावट सुन दयार्द्र हो कर बोला- “मियाँ मुसाफिर! यह घर आपका ही है, आप सानन्द जितनी देर जी चाहे विश्राम कर लो, वह सामनें कई चारपाइयाँ पड़ी हुई हैं। वहाँ पर आपको सब प्रकार का सुपास मिलेगा।” बादशाह ने कहा-“महाशय जी! मैं अपने भार से आपको दबाने नहीं आया हूँ, बल्कि थोड़ी थकावट मिटाकर राही हो जाऊँगा।” फिर उन दोनों में देशकाल की बातें छिड़ीं। बातों २ में फँसाकर बादशाह ने फिर उससे वही बात छेड़ी। तब रईस बोला-“भाई ! किफायत सभी को पसन्द है, दूसरे लोगों ने चाहे भले ही दूध डाला हो; परन्तु मैंने तो पानी ही डाला है। बादशाह ने कहा-“परन्तु इसपर आपने आगा-पीछा का विचार नहीं किया नहीं तो दूध की जगह पानी न डालते। अगर किसी प्रकार यह बात बादशाह को प्रगट हो जायगी तो आप राजाज्ञा भंग करने के अपराधी होंगे।” धनाढ्य ने कहा- “सिवा मेरे और आपके दूसरा कोई भी मनुष्य इस बात को नहीं जानता। यदि तुम नहीं कहोगे तो बादशाह किसी प्रकार नहीं जान सकता।” बादशाह ने अपना नकली लिवास उतार कर अलग रख दिया और उसके देखते २ असली लिवास में हो गया। “काटो तो बदन में लोहू नहीं।” विचारा धनाढ्य एकदम ठिठुक गया
१३१ अकबर बीरबल विनोद
१३१ अकबर बीरबल विनोद उसके हवास गुम हो गये । तब बादशाह उसे आश्वासन देते हुए बोला-“चिन्ता करने की कोई बात नहीं है, जैसे आपने किया है उसी प्रकार सभी लोग अपने २ घर किया करते हैं, परन्तु उसके लिये किसी को दण्ड नहीं दिया जाता।” उसे धीरज दे बादशाह शाही पोशाक बदल कर चला गया और बीरबल के पाण्डित्य की सतत प्रशंसा की ।
थोड़ा और बहुत एक दिन बीरबल अपनी छोटी कन्या को साथ लेकर दर्बार में गया । पहले बादशाह ने उस का बहुत प्यार किया जब वह प्रसन्न होकर कुछ बातें करने को उद्यत हुई तो बाद- शाह ने पूछा-“क्यों बेटी ! क्या तुम बातें करना जानती हो ?” तब उस लड़की ने जवाब दिया-‘थोड़ा और बहुत ।’ बादशाह ने पूछा-इस “थोड़ा और बहुत” का क्या मतलब है?” लड़की बोली-“सरकार ! इसका मतलब यह है कि बड़ों से थोड़ा बोलना जानती हूँ और छोटों से बहुत ।” उस लड़की की ऐसी बुद्धिमत्तापूर्ण बातें सुनकर बादशाह को बड़ी प्रसन्नता हुई, और बीरबल के घराने की स्वाभाविक हाजिर जवाबी पर ईश्वर को कोटिशः धन्यवाद दिया । —:०:*:०:— घुँघची की माला एक दिन धार्मिक बातों पर चरचा छिड़ी तो बादशाह ने बीरबल से पूछा-“क्यों बीरबल ! तुम्हारे कृष्ण
अकबर बीरबल विनोद १३२
अकबर बीरबल विनोद १३२ भगवान घुँघची की माला क्यां पसंद करते हैं, ? उन्हें एक से एक अमूल्य रत्नों की मालाएँ क्यों नहीं पसन्द आतीं ?” बीरबल ने उत्तर दिया—“पृथिवीनाथ ! हमारे शास्त्र में ऐसा लिखा है कि जो एक बार भी सोने से तौला जाता है वह पवित्र हो जाता है; फिर यह घुँघची तो बारंबार सोने से तौली जाती है। यही खास कारण है कि घुँघची के माले की इतनी प्रतिष्ठा की जाती है। इसी विचार से भगवान कृष्ण भी बहुमूल्य हीरे मोतियों की मालाओं को न पहनकर इसे अपने गले का हार बनाते हैं। इस उत्तर से बादशाह का चेहरा खिल गया और हँस पड़े। बीरबल के कुटुम्ब की परीक्षा । एक दिन बादशाह के मन में बीरबल के कुटुम्ब की परीक्षा लेने का उमंग उठा। वे अपना भेष बदलकर कई अन्य सभासदों के साथ बीरबल के घर पहुँचे। इस समय बीरबल के घर पर कोई बड़ा बूढ़ा आदमी नहीं था, वे लोग निजी काम से घर से बाहर चले गये थे। केवल बीरबल का एक छोटा लड़का और एक लड़की आपस में द्वार पर खेल कूद मचा रहे थे। लड़के ने बादशाह को देखकर कहा—“वह आये।” तब लड़की ने लड़के के प्रश्न का उत्तर दिया—“वह नहीं हैं।” बीरबल की स्त्री दालान में बैठी हुई कुछ दस्तकारी कर रही थी, वह भी इनकी बातें बराबर सुनती जा रही थी। वह बोली—“बच्चों ! यह भी होता है और वह भी होता है।”
१३३ अकबल बीरबल विनोद
१३३ अकबल बीरबल विनोद इन तीनों की उपरोक्त गुप्त वार्ता सुनकर बादशाह लौट गया और दरबार में पहुँच कर समस्त दरबारियों के सामने इस बात की चर्चा की और उसका अर्थ भी पूछा—"वह आये।” “वह नहीं हैं।” “और यह भी होता है वह भी होता है।” ऐसी भेदभरी बातें सुनकर सब लोग चकित होकर बादशाह का मुह देखने लगे। कितने दरबारियों ने तो लज्जा वश अपनी गरदन नीची कर ली और नाखून से जमीन कुरेदने लगे। जब बादशाह ने देखा कि इनसे कोई मतलब नहीं निकलेगा तो वह बीरबल को बुलवाया और उससे भी ऊपर कही बातें सुनाकर उसका अर्थ पूछा। बीरबल ने कहा—"गरीब परवर ! यह वार्ता किसी मूर्ख पर छिड़ी थी। प्रश्नका तात्पर्य यह निकलता है कि किसी सभ्य के घर उसकी अनुपस्थिति में जाना उचित नहीं है और यदि कोई हठकर मूर्खतावश जावे ही और उसके घर वाले उसके लिये ऐसा कहें तो समझना चाहिये, "वह आये" यानी बैल राज आये। "वह नहीं है।" याने इनको सींग नहीं है। "यह भी होता है और वह भी होता है" "का यह अभिप्राय है कि किसी २ बैल को सींग रहती है और किसी किसी को नहीं भी।" बादशाह बीरबल के ऐसे सारगर्भित उत्तर को सुनकर शरमिन्दा हुआ और उसने मन में ऐसी गुस्ताखी आगामी कभी न करने का प्रण कर लिया। —०*०—
अकबर बीरबल विनोद १३४
अकबर बीरबल विनोद १३४ मित्र मित्र में ईर्षा । लोग कहा करते हैं कि सन्तान पर माता पिता के खून का बड़ा असर पड़ता है; सो प्रत्यक्ष देखने में भी आया। बाद- शाह और दीवानके मैत्री का प्रभाव उनके लड़कों पर भी पड़ा। वे आपस में बड़े मित्र हो गए। यहाँ तक नौबत पहुँची कि वे दोनों अपना सारा कारोबार छोड़कर। मैत्रीभाव का पालन करने लगे। यह बात बढ़ते २ बादशाह के कान तक पहुँची, जिस कारण वह बहुत क्षुभित हुआ और उनकी मैत्री भंग करने का उपाय सोचने लगा। उसने इस काम का भार बीरबल को सुपुर्द किया। एक दिन वह भरी सभा में दीवान के लड़के को बुलाकर उसके कान से मुँह सटा कर अलग कर लिया, परन्तु कहा कुछ भी नहीं। फिर लोगों को सुनाकर बोला- “सावधान ! इस बात को किसी दूसरे के सामने कदापि न कहना।” दीवान का लड़का वहाँ से विदा होकर चुपचाप अपने घर चला गया। जब दोनों मित्र फिर अपने समय पर एकत्रित हुए तो शाहजादे ने पूछा- “कहिये मित्र ! आपके कान से लगकर कल सभा में बीरबल ने क्या कहा था?” तब दीवान के लड़के ने उत्तर दिया- “मित्रवर ! उसने मुझसे कहा तो कुछ भी नहीं, परन्तु झूठमूठ मेरे कान से मुँह लगाकर हटा लिया।” शाह- जादे ने कहा- “मित्रवर ! आज यह नयी प्रणाली कैसी? आप तो कभी किसी बात की मुझसे छिपाव नहीं करते थे?” शाह- जादे के मनमें इतनेही से खटका उत्पन्न हो गया, जिससे वह थोड़े समय में ही दीवान के लड़के से पृथक हो गया और फिर
१३५ अकबर बीरबल विनोद
१३५ अकबर बीरबल विनोद कभी उससे मित्रता न की। इधर से दिल का झुकाव हट जाने से उसका मन निजी कारोबार में लग गया। बादशाह ने बीरबलकी इस बुद्धिमत्ता से बड़ा प्रसन्न हुआ और उसे खुश करने के लिये बहुत सा पुरस्कार दिया। मट्ठीचूस का द्रव्य । दिल्ली नगर एक बड़ा शहर है, उसमें सभी श्रेणी के मनुष्य निवास करते हैं। इसी शहर में एक अति दीन मनुष्य भी रहता था। यह बड़ा कंजूस था। कंजूसी के कारण धीरे २ इसके पास बहुतेरी मुहरें इकट्ठी हो गईं । जब उसे मुहरों को घर में रखने से चोरी हो जाने की आशंका हुई तो उन को एक छोटे से बक्स में बन्द कर एक विस्तृत मैदान में आशापल्लव के नीचे गढ़ा खोदकर गाढ़ आया ताकि उसे कोई चुरा न सके। उसकी देखरेख करने के लिये कभी २ उस वृक्ष तले जाकर गुपचुप लौट आता। एक दिन उसका द्रव्य वहाँ से गायब हो गया, और जब वह नित्य के अनुसार पेड़तले अपना द्रव्य देखने गया तो क्या देखता है कि वह जगह खुदी पड़ी है, वहाँ द्रव्य का नामो- निशान तक नहीं है। मारे चिन्ता के छाती पीट २ कर रोने और चिल्लाने लगा। इस प्रकार बड़ी देर तक कुँहुक २ कर रोता रहा, जब थककर लाचार हो गया तो हृदय को ढाढ़स देते हुए कुछ शान्त हुआ। वह रात्रि चिन्तना करते ही बीत गई। दूसरे दिन साहस कर बादशाह की अदालत में गया। वहाँ के कुछ दरबारियों की सम्मति से
अकबर बीरबल विनोद १३६
अकबर बीरबल विनोद १३६ एक कागज पर अपनी विपत्ति गाथा लिखकर बादशाह के पास पेश किया। बादशाह उसका समाचार पढ़कर बड़े चिन्तित हुए। सूमड़ा उनके सामने और भी फूट-फूटकर रोने लगा। इसकी चिल्लाहट और रुलाई से सारा दर्बार घबड़ा उठा सब लोग अपना २ कामकाज बंद कर एकमात्र उसकी दर्दभरी रुलाई सुनने लगे। बादशाह के पूछने पर उस दुःखित सूमड़े ने अपना आद्योपान्त समाचार कहकर गिड़गिड़ाता हुआ बोला-"गरीबपरवर ! मैं बेहद लुट गया, मेरे निर्वाह के लिये अब मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं है, क्योंकर जीवन-रक्षा करूँगा।" बादशाह का हृदय पिघल गया खजांची को हुक्म दिया-"जबतक इसका द्रव्य नहीं मिलता तबतक इसे खाने पहनने को दर्बार से दिया जाय।" फिर सूमड़े को जाँच कराने की तसल्ली देकर बादशाह ने दूसरा कार्य्यारम्भ किया। जब सब कामों से निश्चिन्त होकर बादशाह और बीर- बल सन्ध्या समय एकत्रित हुए तो बादशाह सूमड़े के संबंध की बातें बतलाकर बोला- "बीरबल ! इसका खोज कराना बड़ा जरूरी है।" यदि धन न मिला तो सूमड़ा रोते २ अपना प्राण गँवा देगा।" बीरबल ने कहा- "पृथिवीनाथ ! मैं खोज कराकर उसका द्रव्य यथाशीघ्र ढूँढ निकालने की कोशिश करूंगा।" तब बादशाह को कुछ शान्ति मिली और फिर बीरबल के सहित महल में दाखिल हुआ। वे एक अलग कमरे में बैठकर आपस में गुप्त परामर्श करने लगे। कुछ देर 'बाद बीरबल को एक युक्ति सूझी और वह उसे बादशाह से कहकर सुनाया।