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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

कृतो यत्नो मया पूर्वं सौशाम्ये कौरवान् प्रति । नाशकयन्त यदा साम्ये ते स्थापितुमञ्जसा ॥ १५ ॥ ततस्ते निधनं प्राप्ताः सर्वे ससुतबान्धवाः । श्रीभगवान्ने कहा—महर्षे! मैंने पहले कौरवोंके पास जाकर उन्हें शान्त करनेके लिये बड़ा प्रयत्न किया, परंतु वे किसी तरह संधिके लिये तैयार न किये जा सके। जब उन्हें समतापूर्ण मार्गमें स्थापित करना असम्भव हो गया, तब वे सब-के-सब अपने पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित युद्धमें मारे गये ।। १५ १/२ ।। न दिष्टमप्यतिक्रान्तुं शक्यं बुद्ध्या बलेन वा ॥ १६ ॥ महर्षे विदितं भूयः सर्वमेतत् तवानघ । तेऽत्यक्रामन् मतिं मह्यं भीष्मस्य विदुरस्य च ॥ १७ ॥ महर्षे! प्रारब्धके विधानको कोई बुद्धि अथवा बलसे नहीं मिटा सकता। अनघ! आपको तो ये सब बातें मालूम ही होंगी कि कौरवोंने मेरी, भीष्मजीकी तथा विदुरजीकी सम्मतिको भी ठुकरा दिया ।। १६-१७ ।। ततो यमक्षयं जग्मुः समासाद्येतरेतरम् । पञ्चैव पाण्डवाः शिष्टा हतामित्रा हतात्मजाः । धार्तराष्ट्राश्च निहताः सर्वे ससुतबान्धवाः ॥ १८ ॥ इसीलिये वे आपसमें लड़-भिड़कर यमलोक जा पहुँचे। इस युद्धमें केवल पाँच पाण्डव ही अपने शत्रुओंको मारकर जीवित बच गये हैं। उनके पुत्र भी मार डाले गये हैं। धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, जो गान्धारीके पेटसे पैदा हुए थे, अपने पुत्र और बान्धवोंसहित नष्ट हो गये ।। १८ ।। इत्युक्तवचने कृष्णे भृशं क्रोधसमन्वितः । उत्तङ्क इत्युवाचैनं रोषादुत्फुल्ललोचनः ॥ १९ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके इतना कहते ही उत्तंक मुनि अत्यन्त क्रोधसे जल उठे और रोषसे आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे। उन्होंने श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा ।। १९ ।। उत्तङ्क उवाच यस्माच्छक्तेन ते कृष्ण न त्राताः कुरुपुङ्गवाः । सम्बन्धिनः प्रियास्तस्माच्छप्स्येऽहं त्वामसंशयम् ॥ २० ॥ उत्तंक बोले—श्रीकृष्ण! कौरव तुम्हारे प्रिय सम्बन्धी थे, तथापि शक्ति रखते हुए भी तुमने उनकी रक्षा न की। इसलिये मैं तुम्हें अवश्य शाप दूँगा ।। २० ।। न च ते प्रसभां यस्मात् ते निगृह्य निवारिताः । तस्मान्मन्युपरीतस्त्वां शप्स्यामि मधुसूदन ॥ २१ ॥

मधुसूदन! तुम उन्हें जबर्दस्ती पकड़कर रोक सकते थे, पर ऐसा नहीं किया। इसलिये मैं क्रोधमें भरकर तुम्हें शाप दूँगा ।। २१ ।। त्वया शक्तेन हि सता मिथ्याचारेण माधव । ते परीताः कुरुश्रेष्ठा नश्यन्तः स्म ह्युपेक्षिताः ।। २२ ।। माधव! कितने खेदकी बात है, तुमने समर्थ होते हुए भी मिथ्याचारका आश्रय लिया। युद्धमें सब ओरसे आये हुए वे श्रेष्ठ कुरुवंशी नष्ट हो गये और तुमने उनकी उपेक्षा कर दी ।। २२ ।। वासुदेव उवाच शृणु मे विस्तरेणेदं यद् वक्ष्ये भृगुनन्दन । गृहाणानुनयं चापि तपस्वी ह्यसि भार्गव ।। २३ ।। श्रीकृष्णने कहा—भृगुनन्दन! मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे विस्तारपूर्वक सुनिये। भार्गव! आप तपस्वी हैं, इसलिये मेरी अनुनय-विनय स्वीकार कीजिये ।। २३ ।। श्रुत्वा च मे तदध्यात्मं मुञ्चेथाः शापमद्य वै । न च मां तपसाल्पेन शक्तोऽभिभवितुं पुमान् ।। २४ ।। न च ते तपसो नाशमिच्छामि तपतां वर । मैं आपको अध्यात्मतत्त्व सुना रहा हूँ। उसे सुननेके पश्चात् यदि आपकी इच्छा हो तो आज मुझे शाप दीजियेगा। तपस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ महर्षे! आप यह याद रखिये कि कोई भी पुरुष थोड़ी-सी तपस्याके बलपर मेरा तिरस्कार नहीं कर सकता। मैं नहीं चाहता कि आपकी तपस्या नष्ट हो जाय ।। २४ १/२ ।। तपस्ते सुमहद्दीप्तं गुरवश्चापि तोषिताः ।। २५ ।। कौमारं ब्रह्मचर्यं ते जानामि द्विजसत्तम । दुःखार्जितस्य तपसस्तस्मान्नेच्छामि ते व्ययम् ।। २६ ।। आपका तप और तेज बहुत बढ़ा हुआ है। आपने गुरुजनोंको भी सेवासे संतुष्ट किया है। द्विजश्रेष्ठ! आपने बाल्यावस्थासे ही ब्रह्मचर्यका पालन किया है। ये सारी बातें मुझे अच्छी तरह ज्ञात हैं। इसलिये अत्यन्त कष्ट सहकर संचित किये हुए आपके तपका मैं नाश कराना नहीं चाहता हूँ ।। २५-२६ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने कृष्णोत्तङ्कसमागमे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तङ्कके उपाख्यानमें श्रीकृष्ण और उत्तङ्कका समागमविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५३ ।।

चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना उत्तङ्क उवाच ब्रूहि केशव तत्त्वेन त्वमध्यात्ममनिन्दितम् । श्रुत्वा श्रेयोऽभिधास्यामि शापं वा ते जनार्दन ॥ १ ॥ उत्तंकने कहा—केशव! जनार्दन! तुम यथार्थरूपसे उत्तम अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करो। उसे सुनकर मैं तुम्हारे कल्याणके लिये आशीर्वाद दूँगा अथवा शाप प्रदान करूँगा ॥ वासुदेव उवाच तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि भावान् मदाश्रयान् । तथा रुद्रान् वसून् वापि विद्धि मत्प्रभवान् द्विज ॥ २ ॥ श्रीकृष्णने कहा—ब्रह्मर्षे! आपको यह विदित होना चाहिये कि तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण—ये सभी भाव मेरे ही आश्रित हैं। रुद्रों और वसुओंको भी आप मुझसे ही उत्पन्न जानिये ॥ २ ॥ मयि सर्वाणि भूतानि सर्वभूतेषु चाप्यहम् । स्थित इत्यभिजानीहि मा तेऽभूदत्र संशयः ॥ ३ ॥ सम्पूर्ण भूत मुझमें हैं और सम्पूर्ण भूतोंमें मैं स्थित हूँ। इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें। इसमें आपको संशय नहीं होना चाहिये ॥ ३ ॥ तथा दैत्यगणान् सर्वान् यक्षगन्धर्वराक्षसान् । नागानप्सरसश्चैव विद्धि मत्प्रभवान् द्विज ॥ ४ ॥ विप्रवर! सम्पूर्ण दैत्यगण, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग और अप्सराओंको मुझसे ही उत्पन्न जानिये ॥ ४ ॥ सदसच्चैव यत् प्राहुरव्यक्तं व्यक्तमेव च । अक्षरं च क्षरं चैव सर्वमेतन्मदात्मकम् ॥ ५ ॥ विद्वान् लोग जिसे सत्-असत्, व्यक्त-अव्यक्त और क्षर-अक्षर कहते हैं, यह सब मेरा ही स्वरूप है ॥ ५ ॥ ये चाश्रमेषु वै धर्माश्चतुर्धा विदिता मुने । वैदिकानि च सर्वाणि विद्धि सर्वं मदात्मकम् ॥ ६ ॥

मुने! चारों आश्रमोंमें जो चार प्रकारके धर्म प्रसिद्ध हैं तथा जो सम्पूर्ण वेदोक्त कर्म हैं, उन सबको मेरा स्वरूप ही समझिये ।। ६ ।। असच्च सदसच्चैव यद् विश्वं सदसत् परम् । मत्तः परतरं नास्ति देवदेवात् सनातनात् ।। ७ ।। असत्, सदसत् तथा उससे भी परे जो अव्यक्त जगत् है, वह भी मुझ सनातन देवाधिदेवसे पृथक् नहीं है ।। ७ ।। ओङ्कारप्रमुखान् वेदान् विद्धि मां त्वं भृगूद्वह । यूपं सोमं चरुं होमं त्रिदशाप्यायनं मखे ।। ८ ।। होतारमपि हव्यं च विद्धि मां भृगुनन्दन । अध्वर्युः कल्पकश्चापि हविः परमसंस्कृतम् ।। ९ ।। भृगुश्रेष्ठ! ॐकारसे आरम्भ होनेवाले चारों वेद मुझे ही समझिये। यज्ञमें यूप, सोम, चरु, देवताओंको तृप्त करनेवाला होम, होता और हवन-सामग्री भी मुझे ही जानिये। भृगुनन्दन! अध्वर्यु, कल्पक और अच्छी प्रकार संस्कार किया हुआ हविष्य—ये सब मेरे ही स्वरूप हैं ।। उद्गाता चापि मां स्तौति गीताघोषैर्महाध्वरे । प्रायश्चित्तेषु मां ब्रह्मन् शान्तिमङ्गलवाचकाः ।। १० ।। स्तुवन्ति विश्वकर्माणं सततं द्विजसत्तम । मम विद्धि सुतं धर्ममग्रजं द्विजसत्तम ।। ११ ।। मानसं दयितं विप्र सर्वभूतदयात्मकम् । बड़े-बड़े यज्ञोंमें उद्गाता उच्च स्वरसे सामगान करके मेरी ही स्तुति करते हैं। ब्रह्मन्! प्रायश्चित्त-कर्ममें शान्तिपाठ तथा मंगलपाठ करनेवाले ब्राह्मण सदा मुझ विश्वकर्माका ही स्तवन करते हैं। द्विजश्रेष्ठ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करना-रूप जो धर्म है, वह मेरा परमप्रिय ज्येष्ठ पुत्र है। मेरे मनसे उसका प्रादुर्भाव हुआ है ।। १०-११ १/२ ।। तत्राहं वर्तमानैश्च निवृत्तैश्चैव मानवैः ।। १२ ।। बह्वीः संसरमाणो वै योनीर्वर्तामि सत्तम । धर्मसंरक्षणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ।। १३ ।। तैस्तैर्वेषैश्च रूपैश्च त्रिषु लोकेषु भार्गव । भार्गव! उस धर्ममें प्रवृत्त होकर जो पाप-कर्मोंसे निवृत्त हो गये हैं ऐसे मनुष्योंके साथ मैं सदा निवास करता हूँ। साधुशिरोमणे! मैं धर्मकी रक्षा और स्थापनाके लिये तीनों लोकोंमें बहुत-सी योनियोंमें अवतार धारण करके उन-उन रूपों और वेषोंद्वारा तदनुरूप बर्ताव करता हूँ ।। १२-१३ १/२ ।। अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शक्रोऽथ प्रभवाप्ययः ।। १४ ।।

भूतग्रामस्य सर्वस्य स्रष्टा संहार एव च। मैं ही विष्णु, मैं ही ब्रह्मा और मैं ही इन्द्र हूँ। सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका कारण भी मैं ही हूँ। समस्त प्राणिसमुदायकी सृष्टि और संहार भी मेरे ही द्वारा होते हैं।। १४ १/३ ।। अधर्मे वर्तमानानां सर्वेषामहमच्युतः ।। १५ ।। धर्मस्य सेतुं बध्नामि चलिते चलिते युगे। तास्ता योनीः प्रविश्याहं प्रजानां हितकाम्यया ।। १६ ।। अधर्ममें लगे हुए सभी मनुष्योंको दण्ड देनेवाला और अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाला ईश्वर मैं ही हूँ। जब-जब युगका परिवर्तन होता है, तब-तब मैं प्रजाकी भलाईके लिये भिन्न-भिन्न योनियोंमें प्रविष्ट होकर धर्ममर्यादाकी स्थापना करता हूँ ।। १५-१६ ।। यदा त्वहं देवयोनौ वर्तामि भृगुनन्दन। तदाहं देववत् सर्वमाचरामि न संशयः ।। १७ ।। भृगुनन्दन! जब मैं देवयोनिमें अवतार लेता हूँ, तब देवताओंकी ही भाँति सारे आचार- विचारका पालन करता हूँ, इसमें संशय नहीं है ।। १७ ।। यदा गन्धर्वयोनौ वा वर्तामि भृगुनन्दन। तदा गन्धर्ववत् सर्वमाचरामि न संशयः ।। १८ ।। भृगुकुलको आनन्द प्रदान करनेवाले महर्षे! जब मैं गन्धर्व-योनिमें प्रकट होता हूँ, तब मेरे सारे आचार-विचार गन्धर्वोंके ही समान होते हैं, इसमें संदेह नहीं है ।। नागयोनौ यदा चैव तदा वर्तामि नागवत्। यक्षराक्षसयोन्योस्तु यथावद् विचराम्यहम् ।। १९ ।। जब मैं नागयोनिमें जन्म ग्रहण करता हूँ, तब नागोंकी तरह बर्ताव करता हूँ। यक्षों और राक्षसोंकी योनियोंमें प्रकट होनेपर उन्हींके आचार-विचारका यथावत् रूपसे पालन करता हूँ ।। १९ ।। मानुष्ये वर्तमाने तु कृपणं याचिता मया। न च ते जातसम्मोहा वचोऽगृह्णन्त मे हितम् ।। २० ।। इस समय मैं मनुष्ययोनिमें अवतीर्ण हुआ हूँ, इसलिये कौरवोंपर अपनी ईश्वरीय शक्तिका प्रयोग न करके पहले मैंने दीनतापूर्वक ही संधिके लिये प्रार्थना की थी; परंतु उन्होंने मोहग्रस्त होनेके कारण मेरी हितकर बात नहीं मानी ।। २० ।।

उत्तङ्कमुनिकी श्रीकृष्णसे विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना

भयं च महदुद्दिश्य त्रासिताः कुरवो मया । क्रुद्धेन भूत्वा तु पुनर्यथावदनुदर्शिताः ॥ २१ ॥ तेऽधर्मेणेह संयुक्ताः परीताः कालधर्मणा । धर्मेण निहता युद्धे गताः स्वर्गं न संशयः ॥ २२ ॥ इसके बाद क्रोधमें भरकर मैंने कौरवोंको बड़े-बड़े भय दिखाये और उन्हें बहुत डराया- धमकाया तथा यथार्थरूपसे युद्धका भावी परिणाम भी उन्हें दिखाया; परंतु वे तो अधर्मसे युक्त एवं कालसे ग्रस्त थे। अतः मेरी बात माननेको राजी न हुए। फिर क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्धमें मारे गये। इसमें संदेह नहीं कि वे सब-के-सब स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ २१-२२ ॥ लोकेषु पाण्डवाश्चैव गताः ख्यातिं द्विजोत्तम । एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ २३ ॥ द्विजश्रेष्ठ! पाण्डव अपने धर्माचरणके कारण समस्त लोकोंमें विख्यात हुए हैं। आपने जो कुछ पूछा था, उसके अनुसार मैंने यह सारा प्रसङ्ग कह सुनाया ॥ २३ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने कृष्णवाक्ये चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तंकके उपाख्यानमें श्रीकृष्णका वचनविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना उत्तङ्क उवाच अभिजानामि जगतः कर्तारं त्वां जनार्दन । नूनं भवत्प्रसादोऽयमिति मे नास्ति संशयः ॥ १ ॥ उत्तंकने कहा—जनार्दन! मैं यह जानता हूँ कि आप सम्पूर्ण जगत्के कर्ता हैं। निश्चय ही यह आपकी कृपा है (जो आपने मुझे अध्यात्मतत्त्वका उपदेश दिया), इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥ चित्तं च सुप्रसन्नं मे त्वद्भावगतमच्युत । विनिवृत्तं च मे शापादिति विद्धि परंतप ॥ २ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले अच्युत! अब मेरा चित्त अत्यन्त प्रसन्न और आपके प्रति भक्तिभावसे परिपूर्ण हो गया है; अतः इसे शाप देनेके विचारसे निवृत्त हुआ समझें ॥ २ ॥ यदि त्वनुग्रहं कंचित् त्वत्तोऽर्हामि जनार्दन । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं तन्निदर्शय ॥ ३ ॥ जनार्दन! यदि मैं आपसे कुछ भी कृपा प्राप्त करनेका अधिकारी होऊँ तो आप मुझे अपना ईश्वरीय रूप दिखा दीजिये। आपके उस रूपको देखनेकी बड़ी इच्छा है ॥ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच ततः स तस्मै प्रीतात्मा दर्शयामास तद् वपुः । शाश्वतं वैष्णवं धीमान् ददृशे यद् धनंजयः ॥ ४ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तब परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्त होकर उन्हें अपने उसी सनातन वैष्णव स्वरूपका दर्शन कराया, जिसे युद्धके प्रारम्भमें अर्जुनने देखा था ॥ ४ ॥ स ददर्श महात्मानं विश्वरूपं महाभुजम् । सहस्रसूर्यप्रतिमं दीप्तिमत् पावकोपमम् ॥ ५ ॥ उत्तंक मुनिने उस विश्वरूपका दर्शन किया, जिसका स्वरूप महान् था। जो सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशमान तथा बड़ी-बड़ी भुजाओंसे सुशोभित था। उससे प्रज्वलित अग्निके समान लपटें निकल रही थीं ॥ ५ ॥ सर्वमाकाशमावृत्य तिष्ठन्तं सर्वतोमुखम् । तद् दृष्ट्वा परमं रूपं विष्णोर्वैष्णवमद्भुतम् ।

विस्मयं च ययौ विप्रस्तं दृष्ट्वा परमेश्वरम् ।। ६ ।। उसके सब ओर मुख था और वह सम्पूर्ण आकाशको घेरकर खड़ा था। भगवान् विष्णुके उस अद्भुत एवं उत्कृष्ट वैष्णव रूपको देखकर उन परमेश्वरकी ओर दृष्टिपात करके ब्रह्मर्षि उत्तंकको बड़ा विस्मय हुआ ।। ६ ।। उत्तङ्क उवाच (नमो नमस्ते सर्वात्मन् नारायण परात्पर । परमात्मन् पद्मनाभ पुण्डरीकाक्ष माधव ।। उत्तंक बोले—सर्वात्मन्! परात्पर नारायण! आपको बारंबार नमस्कार है। परमात्मन्! पद्मनाभ! पुण्डरीकाक्ष! माधव! आपको नमस्कार है ।। हिरण्यगर्भरूपाय संसारोत्तारणाय च । पुरुषाय पुराणाय चान्तर्यामाय ते नमः ।। हिरण्यगर्भ ब्रह्मा आपके ही स्वरूप हैं। आप संसार-सागरसे पार उतारनेवाले हैं। आप ही अन्तर्यामी पुराण-पुरुष हैं। आपको नमस्कार है ।। अविद्यातिमिरादित्यं भवव्याधिमहौषधिम् । संसारार्णवपारं त्वां प्रणमामि गतिर्भव ।। आप अविद्यारूपी अन्धकारको मिटानेवाले सूर्य, संसाररूपी रोगके महान् औषध तथा भवसागरसे पार करनेवाले हैं। आपको प्रणाम करता हूँ। आप मेरे आश्रय-दाता हों ।। सर्ववेदैकवेद्याय सर्वदेवमयाय च । वासुदेवाय नित्याय नमो भक्तप्रियाय ते ।। आप सम्पूर्ण वेदोंके एकमात्र वेद्यतत्त्व हैं। सम्पूर्ण देवता आपके ही स्वरूप हैं तथा आप भक्तजनोंको अत्यन्त प्रिय हैं। आप नित्यस्वरूप भगवान् वासुदेवको नमस्कार है ।। दयया दुःखमोहान्मां समुद्धर्तुमिहार्हसि । कर्मभिर्बहुभिः पापैर्बद्धं पाहि जनार्दन ।।) जनार्दन! आप स्वयं ही दया करके दुःखजनित मोहसे मेरा उद्धार करें। मैं बहुत-से पाप-कर्मोंद्वारा बँधा हुआ हूँ। आप मेरी रक्षा करें ।। विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन् विश्वसम्भव । पद्भ्यां ते पृथिवी व्याप्ता शिरसा चावृतं नभः ।। ७ ।। विश्वकर्मन्! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्तिके स्थानभूत विश्वात्मन्! आपके दोनों पैरोंसे पृथवी और सिरसे आकाश व्याप्त है ।। ७ ।। द्यावापृथिव्योरन्मध्यं जठरेण तवावृतम् । भुजाभ्यामावृताश्चाशास्त्वमिदं सर्वमच्युत ।। ८ ।।

आकाश और पृथ्वीके बीचका जो भाग है, वह आपके उदरसे व्याप्त हो रहा है। आपकी भुजाओंने सम्पूर्ण दिशाओंको घेर लिया है। अच्युत! यह सारा दृश्य-प्रपंच आप ही हैं ॥ ८ ॥ संहरस्व पुनर्देव रूपमक्षय्यमुत्तमम् । पुनस्त्वां स्वेन रूपेण द्रष्टुमिच्छामि शाश्वतम् ॥ ९ ॥ देव! अब अपने इस उत्तम एवं अविनाशी स्वरूपको फिर समेट लीजिये। मैं आप सनातन पुरुषको पुनः अपने पूर्वरूपमें ही देखना चाहता हूँ ॥ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच तमुवाच प्रसन्नात्मा गोविन्दो जनमेजय । वरं वृणीष्वेति तदा तमुत्तङ्कोऽब्रवीदिदम् ॥ १० ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मुनिकी बात सुनकर सदा प्रसन्नचित्त रहनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'महर्षे! आप मुझसे कोई वर माँगिये।' तब उत्तंकने कहा — ॥ १० ॥ पर्याप्त एष एवाद्य वरस्त्वत्तो महाद्युते । यत् ते रूपमिदं कृष्ण पश्यामि पुरुषोत्तम ॥ ११ ॥ 'महातेजस्वी पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण! आपके इस स्वरूपका जो मैं दर्शन कर रहा हूँ, यही मेरे लिये आज आपकी ओरसे बहुत बड़ा वरदान प्राप्त हो गया' ॥ ११ ॥ तमब्रवीत् पुनः कृष्णो मा त्वमत्र विचारय । अवश्यमेतत् कर्तव्यममोघं दर्शनं मम ॥ १२ ॥ यह सुनकर श्रीकृष्णने फिर कहा—'मुने! आप इसमें कोई अन्यथा विचार न करें। आपको अवश्य ही मुझसे वर माँगना चाहिये; क्योंकि मेरा दर्शन अमोघ है' ॥ १२ ॥ उत्तङ्क उवाच अवश्यं करणीयं च यद्येतन्मन्यसे विभो । तोयमिच्छामि यत्रेष्टं मरुष्वेतद्धि दुर्लभम् ॥ १३ ॥ उत्तंक बोले—प्रभो! यदि वर माँगना आप मेरे लिये आवश्यक कर्तव्य मानते हैं तो मैं यही चाहता हूँ कि मुझे यहाँ यथेष्ट जल प्राप्त हो; क्योंकि इस मरुभूमिमें जल बड़ा ही दुर्लभ है ॥ १३ ॥ ततः संहृत्य तत् तेजः प्रोवाचोत्तङ्कमीश्वरः । एष्टव्ये सति चिन्त्योऽहमित्युक्त्वा द्वारकां ययौ ॥ १४ ॥ तब भगवान्ने अपने उस तेजोमय स्वरूपको समेटकर उत्तंक मुनिसे कहा—'मुने! जब आपको जलकी इच्छा हो, तब आप मेरा स्मरण कीजियेगा।' ऐसा कहकर वे द्वारका चले गये ॥ १४ ॥

ततः कदाचिद् भगवानुत्तङ्कस्तोयकाङ्क्षया । तृषितः परिचक्राम मरौ सस्मार चाच्युतम् ॥ १५ ॥ तत्पश्चात् एक दिन उत्तंक मुनिको बड़ी प्यास लगी। वे पानीकी इच्छासे उस मरुभूमिमें चारों ओर घूमने लगे। घूमते-घूमते उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण किया ॥ १५ ॥ ततो दिग्वाससं धीमान् मातङ्गं मलपङ्किनम् । अपश्यत मरौ तस्मिन् श्वयूथपरिवारितम् ॥ १६ ॥ इतनेहीमें उन बुद्धिमान् मुनिको उस मरुप्रदेशमें कुत्तोंके झुंडसे घिरा हुआ एक नंग- धड़ंग चाण्डाल दिखायी पड़ा, जिसके शरीरमें मैल और कीचड़ जमी हुई थी ॥ १६ ॥ भीषणं बद्धनिस्त्रिंशं बाणकार्मुकधारिणम् । तस्याधः स्रोतसोऽपश्यद् वारि भूरि द्विजोत्तमः ॥ १७ ॥ वह देखनेमें बड़ा भयंकर था। उसने कमरमें तलवार बाँध रखी थी और हाथोंमें धनुष- बाण धारण किये थे। द्विजश्रेष्ठ उत्तंकने देखा—उसके नीचे पैरोंके समीप एक छिद्रसे प्रचुर जलकी धारा गिर रही है ॥ १७ ॥ स्मरन्नेव च तं प्राह मातङ्गः प्रहसन्निव । एह्युत्तङ्क प्रतीच्छस्व मत्तो वारि भृगूद्वह ॥ १८ ॥ कृपा हि मे सुमहती त्वां दृष्ट्वा तृट् समाश्रितम् । इत्युक्तस्तेन स मुनिस्तत् तोयं नाभ्यनन्दत ॥ १९ ॥ मुनिको पहचानते ही वह जोर-जोरसे हँसता हुआ-सा बोला—‘भृगुकुलतिलक उत्तंक! आओ, मुझसे जल ग्रहण करो। तुम्हें प्याससे पीड़ित देखकर मुझे तुमपर बड़ी दया आ रही है।’ चाण्डालके ऐसा कहनेपर भी मुनिने उसके जलका अभिनन्दन नहीं किया—उसे लेनेसे इनकार कर दिया ॥ १८-१९ ॥ चिक्षेप च स तं धीमान् वाग्भिरुग्राभिरच्युतम् । पुनः पुनश्च मातङ्गः पिबस्वेति तमब्रवीत् ॥ २० ॥ उस समय बुद्धिमान् उत्तंकने अपने कठोर वचनों-द्वारा भगवान् श्रीकृष्णपर भी आक्षेप किया। उधर चाण्डाल बारंबार आग्रह करने लगा—‘महर्षे! जल पी लीजिये’ ॥ २० ॥ न चापिबत् स सक्रोधः क्षुभितेनान्तरात्मना । स तथा निश्चयात् तेन प्रत्याख्यातो महात्मना ॥ २१ ॥ उत्तंकने उस जलको नहीं पीया। वे अत्यन्त कुपित हो उठे थे। उनके अन्तःकरणमें बड़ा क्षोभ था। उन महात्माने अपने निश्चयपर अटल रहकर चाण्डालको जवाब दे दिया ॥ २१ ॥ श्वभिः सह महाराज तत्रैवान्तरधीयत । उत्तङ्कस्तं तथा दृष्ट्वा ततो व्रीडितमानसः ॥ २२ ॥ मेने प्रलब्धमात्मानं कृष्णेनामित्रघातिना ।

महाराज! मुनिके इनकार करते ही कुत्तोंसहित वह चाण्डाल वहीं अन्तर्धान हो गया। यह देख उत्तंक मन-ही-मन बहुत लज्जित हुए और सोचने लगे कि 'शत्रुघाती श्रीकृष्णने मुझे ठग लिया' ॥ २२१/२ ॥ अथ तेनैव मार्गेण शङ्खचक्रगदाधरः ॥ २३ ॥ आजगाम महाबुद्धिरुत्तङ्कश्चैनमब्रवीत् । न युक्तं तादृशं दातुं त्वया पुरुषसत्तम ॥ २४ ॥ सलिलं विप्रमुख्येभ्यो मातङ्गस्रोतसा विभो । तदनन्तर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण उसी मार्गसे प्रकट होकर आये। उन्हें देखकर महामति उत्तंकने कहा—'पुरुषोत्तम! प्रभो! आपको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके लिये चाण्डालसे स्पर्श किया हुआ वैसा अपवित्र जल देना उचित नहीं है' ॥ २३-२४१/२ ॥ इत्युक्तवचनं तं तु महाबुद्धिर्जनार्दनः ॥ २५ ॥ उत्तङ्कं श्लक्ष्णया वाचा सान्त्वयन्निदमब्रवीत् । उत्तंकके ऐसा कहनेपर महाबुद्धिमान् जनार्दनने उन्हें मधुर वाणीद्वारा सान्त्वना देते हुए कहा— ॥ २५१/२ ॥ यादृशेनेह रूपेण योग्यं दातुं धृतेन वै ॥ २६ ॥ तादृशं खलु ते दत्तं यच्च त्वं नावबुध्यथाः । 'महर्षे! वहाँ जैसा रूप धारण करके वह जल आपके लिये देना उचित था, उसी रूपसे दिया गया; किंतु आप उसे समझ न सके ॥ २६१/२ ॥ मया त्वदर्थमुक्तो वै वज्रपाणिः पुरंदरः ॥ २७ ॥ उत्तङ्कायामृतं देहि तोयरूपमिति प्रभुः । स मामुवाच देवेन्द्रो न मर्त्योऽमर्त्यतां व्रजेत् ॥ २८ ॥ अन्यमस्मै वरं देहीत्यसकृद् भृगुनन्दन । अमृतं देयमित्येव मयोक्तः स शचीपतिः ॥ २९ ॥ 'भृगुनन्दन! मैंने आपके लिये वज्रधारी इन्द्रसे जाकर कहा था कि तुम उत्तंक मुनिको जलके रूपमें अमृत प्रदान करो। मेरी बात सुनकर प्रभावशाली देवेन्द्रने बारम्बार मुझसे कहा कि 'मनुष्य अमर नहीं हो सकता। इसलिये आप उन्हें अमृत न देकर और कोई वर दीजिये।' परंतु मैंने शचीपति इन्द्रसे जोर देकर कहा कि उत्तङ्कको तो अमृत ही देना है ॥ २७—२९ ॥ स मां प्रसाद्य देवेन्द्रः पुनरेवेदमब्रवीत् । यदि देयमवश्यं वै मातङ्गोऽहं महामते ॥ ३० ॥ भूत्वामृतं प्रदास्यामि भार्गवाय महात्मने । यद्येवं प्रतिगृह्णाति भार्गवोऽमृतमद्य वै ॥ ३१ ॥

प्रदातुमेष गच्छामि भार्गवस्यामृतं विभो । प्रत्याख्यातस्त्वहं तेन दास्यामि न कथंचन ॥ ३२ ॥ ‘तब देवराज इन्द्र मुझे प्रसन्न करके बोले—‘सर्वव्यापी महामते! यदि भृगुनन्दन महात्मा उत्तंकको अमृत अवश्य देना है तो मैं चाण्डालका रूप धारण करके उन्हें अमृत प्रदान करूँगा। यदि इस प्रकार आज भृगुवंशी उत्तंक अमृत लेना स्वीकार करेंगे तो मैं उन्हें वर देनेके लिये अभी जा रहा हूँ और यदि वे अस्वीकार कर देंगे तो मैं किसी तरह उन्हें अमृत नहीं दूँगा' ।। ३०—३२ ।। स तथा समयं कृत्वा तेन रूपेण वासवः । उपस्थितस्त्वया चापि प्रत्याख्यातोऽमृतं ददत् ॥ ३३ ॥ ‘इस तरहकी शर्त करके साक्षात् इन्द्र चाण्डालके रूपमें यहाँ उपस्थित हुए थे और आपको अमृत दे रहे थे; परंतु आपने उन्हें ठुकरा दिया ।। ३३ ।। चाण्डालरूपी भगवान् सुमहांस्ते व्यतिक्रमः । यत् तु शक्यं मया कर्तुं भूय एव तवेप्सितम् ॥ ३४ ॥ ‘आपने चाण्डालरूपधारी भगवान् इन्द्रको ठुकराया है, यह आपका महान् अपराध है। अच्छा, आपकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मैं पुनः जो कुछ कर सकता हूँ, करूँगा ।। ३४ ।। तोयेप्सां तव दुर्धर्षां करिष्ये सफलामहम् । येष्वहःसु च ते ब्रह्मन् सलिलेप्सा भविष्यति ॥ ३५ ॥ तदा मरौ भविष्यन्ति जलपूर्णाः पयोधराः । रसवच्च प्रदास्यन्ति तोयं ते भृगुनन्दन ॥ ३६ ॥ उत्तङ्कमेघा इत्युक्ताः ख्यातिं यास्यन्ति चापि ते । ‘ब्रह्मन्! आपकी तीव्र पिपासाको मैं अवश्य सफल करूँगा। जिन दिनों आपको जल पीनेकी इच्छा होगी, उन्हीं दिनों मरुप्रदेशमें जलसे भरे हुए मेघ प्रकट होंगे। भृगुनन्दन! वे आपको सरस जल प्रदान करेंगे और इस पृथिवीपर उत्तंक मेघके नामसे विख्यात होंगे' ।। इत्युक्तः प्रीतिमान् विप्रः कृष्णेन स बभूव ह । अद्याप्युत्तङ्कमेघाश्च मरौ वर्षन्ति भारत ॥ ३७ ॥ भारत! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर विप्रवर उत्तंक मुनि बड़े प्रसन्न हुए। इस समय भी मरुभूमिमें उत्तंक मेघ प्रकट होकर जलकी वर्षा करते हैं ।। ३७ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥ इस प्रकार महाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तङ्कोपाख्यानमें कृष्णवाक्यविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५५ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं)

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना जनमेजय उवाच उत्तङ्कः केन तपसा संयुक्तो वै महामनाः । यः शापं दातुकामोऽभूद् विष्णवे प्रभविष्णवे ।। १ ।। जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! महात्मा उत्तंक मुनिने ऐसी कौन-सी तपस्या की थी, जिससे वे सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत भगवान् विष्णुको भी शाप देनेका संकल्प कर बैठे? ।। १ ।। वैशम्पायन उवाच उत्तङ्को महता युक्तस्तपसा जनमेजय । गुरुभक्तः स तेजस्वी नान्यत् किंचिदपूजयत् ।। २ ।। वैशम्पायनजीने कहा—जनमेजय! उत्तंक मुनि बड़े भारी तपस्वी, तेजस्वी और गुरुभक्त थे। उन्होंने जीवनमें गुरुके सिवा दूसरे किसी देवताकी आराधना नहीं की थी ।। २ ।। सर्वेषामृषिपुत्राणामेष आसीन्मनोरथः । औत्तङ्कीं गुरुवृत्तिं वै प्राप्नुयामेति भारत ।। ३ ।। भरतनन्दन! जब वे गुरुकुलमें रहते थे, उन दिनों सभी ऋषिकुमारोंके मनमें यह अभिलाषा होती थी कि हमें भी उत्तंकके समान गुरुभक्ति प्राप्त हो ।। ३ ।। गौतमस्य तु शिष्याणां बहूनां जनमेजय । उत्तङ्केऽभ्यधिका प्रीतिः स्नेहश्चैवाभवत् तदा ।। ४ ।। जनमेजय! गौतमके बहुत-से शिष्य थे, परंतु उनका प्रेम और स्नेह सबसे अधिक उत्तंकमें ही था ।। स तस्य दमशौचाभ्यां विक्रान्तेन च कर्मणा । सम्यक् चैवोपचारेण गौतमः प्रीतिमानभूत् ।। ५ ।। उत्तंकके इन्द्रियसंयम, बाहर-भीतरकी पवित्रता, पुरुषार्थ, कर्म और उत्तमोत्तम सेवासे गौतम बहुत प्रसन्न रहते थे ।। ५ ।। अथ शिष्यसहस्राणि समनुज्ञातवानृषिः । उत्तङ्कं परया प्रीत्या नाभ्यनुज्ञातुमैच्छत ।

तं क्रमेण जरा तात प्रतिपेदे महामुनिम् ॥ ६ ॥ उन महर्षिने अपने सहस्रों शिष्योंको पढ़ाकर घर जानेकी आज्ञा दे दी; परंतु उत्तङ्कपर अधिक प्रेम होनेके कारण वे उन्हें घर जानेकी आज्ञा नहीं देना चाहते थे। तात! क्रमशः उन महामुनि उत्तंकको वृद्धावस्था प्राप्त हुई ॥ ६ ॥ न चान्वबुध्यत तदा स मुनिर्गुरुवत्सलः । ततः कदाचिद् राजेन्द्र काष्ठान्यानयितुं ययौ ॥ ७ ॥ उत्तङ्कः काष्ठभारं च महान्तं समुपानयत् । किंतु वे गुरुवत्सल महर्षि यह नहीं जान सके कि मेरा बुढ़ापा आ गया। राजेन्द्र! एक दिन उत्तंक मुनि लकड़ियाँ लानेके लिये वनमें गये और वहाँसे काठका बहुत बड़ा बोझ उठा लाये ॥ ७ १/२ ॥ स तद्भाराभिभूतात्मा काष्ठभारमरिंदम ॥ ८ ॥ निचिक्षेप क्षितौ राजन् परिश्रान्तो बुभुक्षितः । तस्य काष्ठे विलग्नाभूज्जटा रूप्यसमप्रभा ॥ ९ ॥ ततः काष्ठैः सह तदा पपात धरणीतले । शत्रुदमन नरेश! बोझ भारी होनेके कारण वे बहुत थक गये। उनका शरीर लकड़ियोंके भारसे दब गया था। वे भूखसे पीड़ित हो रहे थे। जब आश्रमपर आकर उस बोझको वे जमीनपर गिराने लगे, उस समय चाँदीके तारकी भाँति सफेद रंगकी उनकी जटा लकड़ीमें चिपक गयी थी, जो उन लकड़ियोंके साथ ही जमीनपर गिर पड़ी ॥ ८-९ १/२ ॥ ततः स भारनिष्पिष्टः क्षुधाविष्टश्च भारत ॥ १० ॥ दृष्ट्वा तां वयसोऽवस्थां रुरोदार्तस्वरस्तदा । भारत! भारसे तो वे पिस ही गये थे, भूखने भी उन्हें व्याकुल कर दिया था। अतः अपनी उस अवस्थाको देखकर वे उस समय आर्त स्वरसे रोने लगे ॥ १० १/२ ॥ ततो गुरुसुता तस्य पद्मपत्रनिभानना ॥ ११ ॥ जग्राहाश्रूणि सुश्रोणी करेण पृथुलोचना । पितुर्नियोगाद् धर्मज्ञा शिरसावनता तदा ॥ १२ ॥ तब कमलदलके समान प्रफुल्ल मुखवाली विशाललोचना परम सुन्दरी धर्मज्ञ गुरुपुत्रीने पिताकी आज्ञा पाकर विनीत भावसे सिर झुकाये वहाँ आयी और अपने हाथोंमें उसने मुनिके आँसू ग्रहण कर लिये ॥ तस्या निपेततुर्दग्धौ करौ तैरश्रुबिन्दुभिः । न हि तानश्रुपातांस्तु शक्ता धारयितुं मही ॥ १३ ॥ उन अश्रुबिन्दुओंसे उसके दोनों हाथ जल गये और आँसुओंसहित पृथ्वीसे जा लगे। परंतु पृथ्वी भी उन गिरते हुए अश्रुबिन्दुओंके धारण करनेमें असमर्थ हो गयी ॥ १३ ॥ गौतमस्त्वब्रवीद् विप्रमुत्तङ्कं प्रीतमानसः ।

कस्मात् तात तवाद्येह शोकोत्तरमिदं मनः । स स्वैरं ब्रूहि विप्रर्षे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १४ ॥ फिर गौतमने प्रसन्नचित्त होकर विप्रवर उत्तंकसे पूछा—‘बेटा! आज तुम्हारा मन शोकसे व्याकुल क्यों हो रहा है? मैं इसका यथार्थ कारण सुनना चाहता हूँ। ब्रह्मर्षे! तुम निःसंकोच होकर सारी बातें बताओ’ ॥ १४ ॥ उत्तङ्क उवाच भवद्गतेन मनसा भवत्प्रियचिकीर्षया । भवद्भक्तिगतेनेह भवद्भावानुगेन च ॥ १५ ॥ जरेयं नावबुद्धा मे नाभिज्ञातं सुखं च मे । शतवर्षोषितं मां हि न त्वमभ्यनुजानिथाः ॥ १६ ॥ उत्तंकने कहा—गुरुदेव! मेरा मन सदा आपमें लगा रहा। आपहीका प्रिय करनेकी इच्छासे मैं निरन्तर आपकी सेवामें संलग्न रहा, मेरा सम्पूर्ण अनुराग आपहीमें रहा है और आपहीकी भक्तिमें तत्पर रहकर मैंने न तो लौकिक सुखको जाना और न मुझे आये हुए इस बुढ़ापाका ही पता चला। मुझे यहाँ रहते हुए सौ वर्ष बीत गये तो भी आपने मुझे घर जानेकी आज्ञा नहीं दी ॥ १५-१६ ॥ भवता त्वभ्यनुज्ञाताः शिष्याः प्रत्यवरा मम । उपपन्ना द्विजश्रेष्ठ शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १७ ॥ द्विजश्रेष्ठ! मेरे बाद सैकड़ों और हजारों शिष्य आपकी सेवामें आये और अध्ययन पूरा करके आपकी आज्ञा लेकर चले गये (केवल मैं ही यहाँ पड़ा हुआ हूँ) ॥ १७ ॥ गौतम उवाच त्वत्प्रीतियुक्तेन मया गुरुशुश्रूषया तव । व्यतिक्रामन्महाकालो नावबुद्धो द्विजर्षभ ॥ १८ ॥ गौतमने कहा—विप्रवर! तुम्हारी गुरुशुश्रूषासे तुम्हारे ऊपर मेरा बड़ा प्रेम हो गया था। इसीलिये इतना अधिक समय बीत गया तो भी मेरे ध्यानमें यह बात नहीं आयी ॥ १८ ॥ किं त्वद्य यदि ते श्रद्धा गमनं प्रति भार्गव । अनुज्ञां प्रतिगृह्य त्वं स्वगृहान् गच्छ मा चिरम् ॥ १९ ॥ भृगुनन्दन! यदि आज तुम्हारे मनमें यहाँसे जानेकी इच्छा हुई है तो मेरी आज्ञा स्वीकार करो और शीघ्र ही यहाँसे अपने घरको चले जाओ ॥ १९ ॥ उत्तङ्क उवाच गुर्वर्थं कं प्रयच्छामि ब्रूहि त्वं द्विजसत्तम । तमुपाहृत्य गच्छेयमनुज्ञातस्त्वया विभो ॥ २० ॥

उत्तंकने पूछा—द्विजश्रेष्ठ! प्रभो! मैं आपको गुरुदक्षिणामें क्या दूँ? यह बताइये। उसे आपको अर्पित करके आज्ञा लेकर घरको जाऊँ ॥ २० ॥ गौतम उवाच दक्षिणा परितोषो वै गुरूणां सद्द्भिरुच्यते । तव ह्याचरतो ब्रह्मंस्तुष्टोऽहं वै न संशयः ॥ २१ ॥ गौतमने कहा—ब्रह्मन्! सत्पुरुष कहते हैं कि गुरुजनोंको संतुष्ट करना ही उनके लिये सबसे उत्तम दक्षिणा है। तुमने जो सेवा की है, उससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥ इत्थं च परितुष्टं मां विजानीहि भृगूद्वह । युवा षोडशवर्षो हि यद्यद्य भविता भवान् ॥ २२ ॥ ददानि पत्नीं कन्यां च स्वां ते दुहितरं द्विज । एतामृतेऽङ्गना नान्या त्वत्तेजोऽर्हति सेवितुम् ॥ २३ ॥ भृगुकुलभूषण! इस तरह तुम मुझे पूर्ण संतुष्ट जानो। यदि आज तुम सोलह वर्षके तरुण हो जाओ तो मैं तुम्हें पत्नीरूपसे अपनी कुमारी कन्या अर्पित कर दूँगा; क्योंकि इसके सिवा दूसरी कोई स्त्री तुम्हारे तेजको नहीं सह सकती ॥ २२-२३ ॥ ततस्तां प्रतिजग्राह युवा भूत्वा यशस्विनीम् । गुरुणा चाभ्यनुज्ञातो गुरुपत्नीमथाब्रवीत् ॥ २४ ॥ तब उत्तंकने तपोबलसे तरुण होकर उस यशस्विनी गुरुपुत्रीका पाणिग्रहण किया। तत्पश्चात् गुरुकी आज्ञा पाकर वे गुरुपत्नीसे बोले— ॥ २४ ॥ कं भवत्यै प्रयच्छामि गुर्वर्थं विनियुङ्क्ष्व माम् । प्रियं हितं च काङ्क्षामि प्राणैरपि धनैरपि ॥ २५ ॥ ‘माताजी! मुझे आज्ञा दीजिये, मैं गुरुदक्षिणामें आपको क्या दूँ? अपना धन और प्राण देकर भी मैं आपका प्रिय एवं हित करना चाहता हूँ ॥ २५ ॥ यद् दुर्लभं हि लोकेऽस्मिन् रत्नमत्यद्भुतं महत् । तदानयेयं तपसा न हि मेऽत्रास्ति संशयः ॥ २६ ॥ ‘इस लोकमें जो अत्यन्त दुर्लभ, अद्भुत एवं महान् रत्न हो, उसे भी मैं तपस्याके बलसे ला सकता हूँ; इसमें संशय नहीं है’ ॥ २६ ॥ अहल्योवाच परितुष्टास्मि ते विप्र नित्यं भक्त्या तवानघ । पर्याप्तमेतद् भद्रं ते गच्छ तात यथेप्सितम् ॥ २७ ॥ अहल्या बोली—निष्पाप ब्राह्मण! मैं तुम्हारे भक्ति-भावसे सदा संतुष्ट हूँ। बेटा! मेरे लिये इतना ही बहुत है। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच उत्तङ्कस्तु महाराज पुनरेवाब्रवीद् वचः । आज्ञापयस्व मां मातः कर्तव्यं च तव प्रियम् ॥ २८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! गुरुपत्नीकी बात सुनकर उत्तंकने फिर कहा —‘माताजी! मुझे आज्ञा दीजिये—मैं क्या करूँ? मुझे आपका प्रिय कार्य अवश्य करना है’ ॥ २८ ॥ अहल्योवाच सौदासपत्न्या विधृते दिव्ये ये मणिकुण्डले । ते समानय भद्रं ते गुर्वर्थः सुकृतो भवेत् ॥ २९ ॥ अहल्या बोली—बेटा! राजा सौदासकी रानीने जो दो दिव्य मणिमय कुण्डल धारण कर रखे हैं, उन्हें ले आओ। तुम्हारा कल्याण हो। उनके ला देनेसे तुम्हारी गुरु-दक्षिणा पूरी हो जायगी ॥ २९ ॥ स तथेति प्रतिश्रुत्य जगाम जनमेजय । गुरुपत्नीप्रियार्थं वै ते समानयितुं तदा ॥ ३० ॥ जनमेजय! तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर उत्तंकने गुरुपत्नीकी आज्ञा स्वीकार कर ली और उनका प्रिय करनेकी इच्छासे उन कुण्डलोंको लानेके लिये चल दिये ॥ ३० ॥ स जगाम ततः शीघ्रमुत्तङ्को ब्राह्मणर्षभः । सौदासं पुरुषादं वै भिक्षितुं मणिकुण्डले ॥ ३१ ॥ ब्राह्मणशिरोमणि उत्तंक नरभक्षी राक्षसभावको प्राप्त हुए राजा सौदाससे उन मणिमय कुण्डलोंकी याचना करनेके लिये वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थित हुए ॥ ३१ ॥ गौतमस्त्वब्रवीत् पत्नीमुत्तङ्को नाद्य दृश्यते । इति पृष्टा तमाचष्ट कुण्डलार्थे गतं च सा ॥ ३२ ॥ उनके चले जानेपर गौतमने पत्नीसे पूछा—‘आज उत्तंक क्यों नहीं दिखायी देता है?’ पतिके इस प्रकार पूछनेपर अहल्याने कहा—‘वह सौदासकी महारानीके कुण्डल ले आनेके लिये गया’ ॥ ३२ ॥ ततः प्रोवाच पत्नीं स न ते सम्यगिदं कृतम् । शप्तः स पार्थिवो नूनं ब्राह्मणं तं वधिष्यति ॥ ३३ ॥ यह सुनकर गौतमने पत्नीसे कहा—‘देवि! यह तुमने अच्छा नहीं किया। राजा सौदास शापवश राक्षस हो गये हैं। अतः वे उस ब्राह्मणको अवश्य मार डालेंगे’ ॥ ३३ ॥ अहल्योवाच अजानन्त्या नियुक्तः स भगवन् ब्राह्मणो मया । भवत्प्रसादान्न भयं किंचित् तस्य भविष्यति ॥ ३४ ॥

अहल्या बोली— भगवन्! मैं इस बातको नहीं जानती थी, इसीलिये उस ब्राह्मणको ऐसा काम सौंप दिया। मुझे विश्वास है कि आपकी कृपासे उसे वहाँ कोई भय नहीं प्राप्त होगा ।। ३४ ।। इत्युक्तः प्राह तां पत्नीमेवमस्त्विति गौतमः । उत्तङ्कोऽपि वने शून्ये राजानं तं ददर्श ह ।। ३५ ।। यह सुनकर गौतमने पत्नीसे कहा—‘अच्छा, ऐसा ही हो।’ उधर उत्तंक निर्जन वनमें जाकर राजा सौदााससे मिले ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने कुण्डलाहरणे षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तंकके उपाख्यानमें कुण्डलाहरणविषयक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५६ ।।