अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
अनुरागसागर वाणी
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आद्य शक्ति ने कहा
कहे कन्या कैसे बोलहु बानी । भ्राता जेठ प्रथम हम जानी ॥ कन्या कहैं सुनो हो ताता । ऐसी विधि जनि बोलहु बाता ॥ अब मैं पुत्री भई तुम्हारी । ताते उदर माँझ लियो डारी । जेठ बंधु प्रथमहि के नाता । अब तो अहो हमारे ताता ॥ निरमल दृष्टि अब चितवहु मोही । नहीं तो पाप होय अब तोही ॥
आद्य शक्ति ने कहा कि यह कैसी बात बोल रहे हो । पहले नाते से तो तुम मेरे बड़े भाई हो चुके हो, क्योंकि परम-पुरुष के बच्चे हैं हम और दूसरे नाते से मैं तुम्हारी पुत्री हो गयी हूँ, क्योंकि तुमने मुझे पेट में डाल लिया था और वहीं से मैं निकली हूँ, इसलिए तुम मेरे पिता हो गये हो । अब तुम मुझे निर्मल दृष्टि से देखो अन्यथा तुम्हें पाप लगेगा ।
निरंजन ने कहा
कहे निरंजन सुनो भवानी । यह मैं तोहि कहों सहिदानी ॥ पाप पुण्य डर हम नहीं डरता । पाप पुण्य के हमहीं करता ॥ पाप पुण्य हमहीं से होई । लेखा मोर न लेहैं कोई ॥ पाप पुण्य हम करम पसारा । जो बाझे सो होय हमारा ॥ ताते तोहि कहों समुझाई । सिख हमार लो सीस चढ़ाई ॥ पुरुष दीन तोहि हम कहैं जानी । मानहु कहा हमार भवानी ॥
निरंजन ने कहा कि मैं पाप-पुण्य से नहीं डरता हूँ, क्योंकि पाप-पुण्य का कर्ता मैं ही हूँ, मेरे पाप-पुण्य का हिसाब लेने वाला कोई नहीं है और आगे मैं पाप-पुण्य कर्मों का जाल ही फैलाऊँगा और जो इनमें उलझ जायेगा, वो कहीं नहीं जा पायेगा, हमारा ही रहेगा ।
विहँसी कन्या सुन अस बाता । इक मति होय दोह रंगराता ॥ हरस वचन बोली मृदु बानी । नारी नीच बुधि रति विधि ठानी ॥ रहस वचन सुन धरम हरषाना । भोग करन को मन में आना ॥
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साहिब बन्दगी
आद्य शक्ति तब हँसते हुए उसके साथ एकमत हो गयी, उसकी बात मान ली और मीठी बाणी बोलकर गुप्त बात कही और निरंजन के साथ रहने का निश्चय कर लिया।
भग न कन्या के हती। अस चरित कीन्ह निरंजना।
नख घात किये भग द्वार तत छिन, घाट उत्पति गंजना॥
नख रेश शोनिता चला। तिहुँको सब खास आरंभनी।
आदि उत्पति सुनहु धर्मनि, कोउ नहिं जानत जम मनी॥
त्रियवार कीन्ही रति तबै, भये ब्रह्मा विष्णु महेश हो।
जेठे विधि विष्णु लघु तिहि, तीजे शम्भू सेष हो॥
उत्पति आदि प्रकाश, यह विधि तेहि प्रसंग भो॥
कीन्हो भोग विलास, इक मति कन्या काल है॥
तेहि पीछे ऐसा भो लेखा। धर्मदास तुम करौ विवेका॥
अग्नि पवन जल महि अकाश। कूर्म उदर ते भयो प्रकाश॥
पाँचों अंस ताहि सन लीन्हा। गुण तीनों सीसन सों कीन्हा॥
यहि विधि भये तत्व गुण तीनों। धर्मराय तब रचना कीनो॥
साहिब धर्मदास से कहते हैं कि कूर्म जी के पेट से पाँच तत्व निकले थे और उसके तीन शीश निरंजन ने खा लिये थे, उन्हीं से तीन गुण-रजगुण (ब्रह्मा जी), सत्गुण (विष्णु जी), और तमगुण (शिवजी) हुए। पाँच तत्व और तीन गुणों से निरंजन ने सब रचना की।
त्रिदेव की उत्पत्ति
त्रिदेव की उत्पत्ति
गुन तत सम कर देविहिं दीन्हा। आपन अंस उत्पन कीन्हा।। बुन्द तीन कन्या भग डारा। ता सँग तीनों अंस सुधारा।। पाँच तत्व गुण तीनों दीन्हा। यहि विधि जग की रचना कीन्हा।। प्रथम बुन्द ते ब्रह्मा भयऊ। रज गुण पंच तत्व तेहि दयऊ।। दूजो बुन्द बिस्तु जो भयऊ। सतगुण पंच तत्व तिन पयऊ।। तीजे बुन्द रुद्र उत्पाने। तमगुण पंच तत्व तेहि साने।। पंच तत्व गुण तीन खमीरा। तीनों जन को रच्यो शरीरा।।
तीन गुण और पाँच तत्वों को मिलाकर निरंजन ने अपने पुत्र उत्पन्न किये और इस तरह पाँच तत्व और तीन गुण देकर जगत की रचना की। प्रथम रजगुण के साथ पाँच तत्व दिये, जिससे ब्रह्मा जी हुए और सतगुण के साथ पाँच तत्व दिये तो विष्णु जी हुए और तमगुण के साथ पाँच तत्व देने से शिवजी हुए। इस तरह पाँच तत्व और तीन गुण से तीनों शरीरों की रचना की।
कहै धर्म कामिनि सुन बानी। जो मैं कहूँ लेहू सो मानी।। जीव बीज आहै तुव पासा। सो ले रचना करहु प्रकाशा।। कहै निरंजन पुनि सुनु रानी। अब अस करहु आदि भवानी।। त्रय सुत सौंप तोहि दीना। अब हम पुरुष सेवा चित लीन्हा।। राज करहु तुम लै तिहुँवारा। भेद न कहियो काहु हमारा।। मोर दरश त्रय सुत नहिं पैहैं। जो मुहि खोजत जन्म सिरैहैं।। ऐसो मता दिदैहो जानी। पुरुष भेद नहिं पावै प्रानी।। त्रय सुत जबहिं होहिं बुधवाना। सिंधु मंथन दे पटहु निदाना।।
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साहिब बन्दगी
निरंजन ने कहा कि जीव और बीज तुम्हारे पास हैं और ये तीनों पुत्र भी तुम्हें सौंपता हूँ। अब मैं निराकार रूप में शून्य में समाऊँगा और मन बनकर हर जीव के साथ रहूँगा और तुम तीनों पुत्रों के साथ राज्य करना। निरंजन ने कहा कि तुम मेरा भेद किसी से नहीं कहना, मेरा दर्शन तीनों पुत्रों में से कोई नहीं कर सकेगा, चाहे मुझे खोजते हुए जन्म क्यों न गँवा दै, और मेरा कोई भेद भी न जान पाए। जब ये बड़े हो जाएँ तो इन्हें समुद्र मंथन के लिए भेजना।
मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई। पांच पचीस तीन का पिंजड़ा, जामें तोहि राखा भरमाई॥
निरंजन मन बनकर गुप्त हुआ
निरंजन मन बनकर गुप्त हुआ
कहे उ बहुत बुझाय देविहि, गुप्त भये तब आहि हो। शून्य गुफहि निवास कीन्हो, भेद लह को ताहि हो ॥ वह गुप्त भा पुनि संग सबकैं, मन निरंजन जानिये। मन पुरुष ध्यान उच्छे द देवै, आपु परगट आनिये ॥
निरंजन गुप्त होकर शून्य में समा गया और मन रूप में सबके साथ हो गया। यही मन परम पुरुष का ध्यान नहीं करने देता है।
जीव सतावे काल, नाना कर्म लगाय के। आप चलावे चाल, कष्ट देय पुनि जीव को ॥
काल स्वयं ही चाल चलकर जीवों से कर्म करवाता है और फिर स्वयं ही उन्हें कष्ट देता है।
गुप्त भयो है संग सबके। मन ही निरंजन जानिये ॥
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त्रिदेवों ने किया समुद्र मंथन
त्रिदेवों ने किया समुद्र मंथन
त्रय बालक जब भये सयाने । पठये जननी सिंधु मथाने ॥ बालक मातै खेल खिलारी । सिंधु मंथन नहिं गयै उखरारी ॥ तेहि अन्तर इक भयो तमासा । सो चरित्र बूझो धर्मदासा ॥ धान्यो योग निरंजन राई । पवन अरं भ कीन्ह बहुताई ॥ त्यागो पवन रहित पुनि जबही । निकसेउ वेद स्वास संग तबही ॥ स्वास संग आयेउ सो वेदा । बिरला जन कोई जाने भेदा ॥ अस्तुति कीन्ह वेद पुनि ताहां । आज्ञा का मोहि निरगुन नाहां ॥ कह्यो जाय करु सिंधु निवासा । जेहि भेंटे जैहौ तिहि पासा ॥ उठी अवाज रूप नहिं देखा । जोति अगम दिखलावत भेखा ॥ चलेउ वेद तहँवा को जाई । जहँवा सिंधु रचा धर्मराई ॥ पहुँचे वेद तब सिंधु मँझारा । धर्मराय तब युक्ति विचारा ॥ गुप्त ध्यान देविहिं समुझावा । सिंधु मंथन कहँ कस विलमावा ॥ पठवहु बेगि सिंधु त्रय बारा । दिठकै सोचहु बचन हमारा ॥ बहुरि आप पुनि सिंधु समाना । देवी कीन्ह मथन अनुमाना ॥ तिहुँ बालक को कहा समुझायी । आसिष दे पुनि तहाँ पठायी ॥ पैहो वस्तु सिंधु के माहीं । जाहु बेगि तीनों सुत ताही ॥ चलिभौ ब्रह्मा मान सिखाही । दोइ लहु रा पुनि पाछे जाई ॥
जब तीनों बालक कुछ बड़े हुए तो माता ने कहा कि समुद्र मंथन को जाओ; पर बच्चे खेलने में मस्त रहे, वहाँ नहीं गये। इतने में पहले निरंजन ने तमाशा किया, उसने योग से पवन उत्पन्न की और जब उसका त्याग किया तो स्वांस के साथ वेद बाहर निकले यानी निरंजन ने वायु में वेद के शब्द किये, कोई पुस्तक लिखी हुई नहीं थी। इस भेद को कोई
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बिरला ही जानता है। वेद ने निरंजन की स्तुति की और आज्ञा माँगी। निरंजन ने कहा-जाओ समुद्र में समा जाओ, जब मंथन हो तब जिसे मिलो, उसी के पास चले जाना। निरंजन ने आकाशवानी की, ज्योति दिखाई, पर वेद ने उसका रूप नहीं देखा, इसलिए वेद निराकार के लिए भी कहता है कि उसका पूरा भेद नहीं पा रहा हूँ।.... तो जब वेद चले गये तो निरंजन ने तेज उत्पन्न करके उसे भी समुद्र में समाने को कहा; फिर तेज के बाद विष उत्पन्न करके उसे भी समुद्र में समाने भेज दिया। वेद जब समुद्र मध्य आकर समा गये तो निरंजन ने ध्यान में आद्य शक्ति को कहा कि समुद्र मंथन में बिलम्ब क्यों हो रहा है, हमारे वचन पर ध्यान दो और जल्दी से तीनों पुत्रों को समझाकर और आशीर्वाद देकर समुद्र मंथन के लिए भेजो। तब आद्य शक्ति ने तीनों को समझाकर और आशीर्वाद देकर समुद्र मंथन के लिए भेजा, कहा कि समुद्र के अन्दर कोई वस्तु है, जल्दी जाओ। ब्रह्मा मान सहित आगे-2 चले और पीछे-2 दोनों भाई विष्णु और शिवजी भी चले।
गये सिंधु के पास, भये ठाढ़ तीनों जने।
युक्ति मथन परकास, एक एक को निरखहीं॥
तीनों पुत्र समुद्र के पास जाकर खड़े हो गये और एक दूसरे को देखते हुए मंथन पर विचार करने लगे।
तीनों कीन्ह मंथन तब जाई। तीन वस्तु तीनों जन पाई॥
ब्रह्मा वेद तेज तेहि छोटा। लहुरा तासु मिले विष खोटा॥
भेट वस्तु त्रय तीनों भाई। चलि भये हर्ष कहत जहँ माई॥
माता पहँ आये त्रय बारा। निज-2 वस्तु प्रगट अनुसारा॥
माता आज्ञा कीन्ह प्रकासा। राखु वस्तु तुम निज-2 पासा॥
जब मंथन किया तो तीनों को तीन चीजें मिली। ब्रह्मा को वेद मिले, विष्णु को तेज मिला और शिवजी को विष मिला। तीनों चीजें लेकर तीनों भाई बड़े खुश होकर माता के पास आए। माता ने कहा कि जो चीजे जिसे मिली है, वो अपने पास रख ले।
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पुनि तुम मथहु सिंधु कहँ जाई। जो जिहि मिले लेहु सो भाई॥ कीन्ह चरित अस आदि भवानी। कन्या तीन कीन्ह उत्पानी॥ कन्या तीन उत्पान्यो जबहीं। अंस वारि महँ नायो सबहीं॥ पठयो सिंधु माहिँ पुनि ताहीं। त्रय सुत मरम सो जानत नाहीं॥ पुनि तिन मंथन सिंधु को कीन्हा। भैंट्यो कन्या हरित है लीन्हा॥ कन्या तीनहु लीन्हे साथा। आ जननी कहँ नायउ माथा॥ सब माता के आगे कीन्हा। माता बाँटि तिन्हन कहँ दीन्हा॥ माता कहै सुनहु सुत मोरा। यह तो काज भये सब तोरा॥ एक एक बाँटि तीन्हु को दीन्हा। करहु भोग अस आज्ञा कीन्हा॥ सावित्री ब्रह्मा तुम लेऊ। है लक्ष्मी विष्णु कहँ देऊ॥ पारवती शंकर कहँ दीन्ही। ऐसी माता आज्ञा कीन्ही॥ तीनउ जन लीन्ही सिर नाई। दीन्ह अद्या जस भाग लगाई॥ पाई कामिनी भये अनंदा। जस चकोर पाये निशिचदा॥ काम वसी भए तीनों भाई। देव दैत दोनों उपजाई॥ धरमदास परखो यह बाता। नारी भयी हती सो माता॥
माता ने पुत्रों से कहा कि पुनः समुद्र मंथन के लिए जाओ और जो जिसे मिले, वो उसे अपने पास रख ले। इतने में शक्ति ने तीन कन्याओं की उत्पत्ति की और उन्हें भी समुद्र में समाने को कहा। तीनों बेटों में से किसी को भी इसका भेद मालूम न चला। जब तीनों ने पुनः समुद्र मंथन किया तो तीनों कन्याएँ मिलीं। तीनों कन्याएँ लेकर तीनों माता के पास आए। माता ने कहा कि यह सब तुम्हारा काम है, इसलिए एक-एक कन्या सबको दे दी और एक दूजे के संग रहने को कहा। सावित्री ब्रह्मा जी को दी, लक्ष्मी विष्णु जी को और पार्वती शंकर जी को दी। स्त्री पाकर तीनों भाई बड़े खुश हुए। जैसे चकोर को रात्रि का चाँद मिल गया
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हो, ऐसे ही सब उनमें खो गये। फिर तीनों भाई काम के वशीभूत हुए और उनमें ही रम गए। जिससे देवताओं और दैत्यों की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा जी और विष्णु जी से देवताओं की और शिवजी से राक्षसों की उत्पत्ति हुई। इसलिए आगे चलकर शिवजी ने ही राक्षसों को वरदान भी दिये।
माता बहुरि कहै समुझायी। अब फिर सिंधु मथो तुम जाईं ॥ जो जेहि मिलै लेहु सो जाईं। अब जनि करो विलंब तुम भाईं ॥
माता ने पुत्रों से कहा कि अब फिर से समुद्र मंथन के लिए जाओ और अबकी बार विलंब न करना।
त्रय सुत चले माथ नवायी। जो कछु कहै उ करब हम जायी ॥ मथ्यो सिंधु कछु विलंब न कीना। निकसे चौदह रतन सो लीन्हा ॥ चौदह रतन की निकसी खानी। ले माता पहँ पहुँचे आनी ॥ तीनहु बन्धु हरषित हैं लीन्हा। विस्नु सुधा पायउ हर विष दीन्हा ॥
तीनों माता को प्रणाम करके पुनः मंथन के लिए चले और अबकी बार 14 रतन की खानी निकली और उन्हें लेकर माता के पास आए। तब उसमें से विष्णु जी को अमृत और शिवजी को विष दिया गया।
ब्रह्मा को दिया वेद ने रहस्य
ब्रह्मा को दिया वेद ने रहस्य
ब्रह्मा वेद पढ़ न तब लाग। पढ़ त वेद तब भा अनुरागा।। कहे वेद पुरुष इक आही। है निराकार रूप न ताही।। शून्य माहिं वह जोत दिखावे। चितवत देह दृष्टि नहिं आवे।। स्वर्ग सीस पग आहि पताला। तेहि मत ब्रह्मा भी मतवाला।। चतुरानन कहे विष्णु बुझावा। आहि पुरुष मोहिं वेद लखावा।। पुनि ब्रह्मा शिवसों अस कहईष वेद मंथन पुरुष इक अहई।। अहै पुरुष इक वेद बतावा। वेद कहे हम भेद न पावा।।
अब ब्रह्मा वेद पढ़ने लगा। वेद में उसने जाना कि एक पुरुष है, जो निराकार है, जिसका कोई रूप नहीं है, जो शून्य में जोत दिखाता है और पाताल तक उसके पाँव हैं। (वेद में निरंजन ने अपनी ही बात की थी, परम पुरुष का भेद नहीं दिया) यह पढ़ ब्रह्मा मतवाला होकर विष्णु के पास आया और उसे कहा कि मुझे वेद कह रहा है कि एक पुरुष है।
तब ब्रह्मा शिवजी के पास आया और उसे भी यह बात बतायी। ब्रह्मा ने कहा कि वेद का मंथन करने से पता चलता है कि एक पुरुष है, पर वेद कह रहा है कि मैं उसका भेद नहीं जान पा रहा हूँ।
तब ब्रह्मा माता पहँ आवा। करि प्रणाम तब टे के पाँवा।। हे माता मोहि वेद लखावा। सिरजनहार और बतलावा।।
तब ब्रह्मा माता के पास आया और प्रणाम करके कहा कि वेद कह रहा है कि सृष्टि की रचना करने वाला कोई और (निराकार) है।
ब्रह्मा ने कहा
ब्रह्मा कहे जननी सुनो, कहहु कहा कंत तुम्हार है। कीजै कृपा जनि मोहि दुरावो, कहाँ पिता हमार है।।
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ब्रह्मा ने कहा कि तुम्हारा पति कौन है, कृपा करके सच-2 कहो, छिपाओ नहीं, बताओ कि हमारा पिता कहाँ है !
शक्ति ने कहा
कहे जननि सुनो ब्रह्मा, कोउ नहीं जनक तुम्हार हो ।
हमहिते भई सबे उत्पत्ति, हमहिं सब कीन सम्हार हो ॥
माता ने कहा-हे ब्रह्मा ! तुम्हारा पिता कोई नहीं है, मुझसे ही तुम्हारी उत्पत्ति हुई है, इसलिए मैं ही तुम्हारी माता हूँ और मैं ही तुम्हारा पिता हूँ ।
ब्रह्मा ने कहा
ब्रह्मा कहे पुकार, सुनु जननि तैं चित्त दे ।
कहत वेद निरुवार, पुरुष एक सो गुप्त है ॥
ब्रह्मा ने कहा-हे माता ! ध्यान से सुनो, वाणी में आ रहा है कि एक पुरुष है, जो गुप्त है । ब्रह्मा ने दिखाया माता को ।
शक्ति ने कहा
कहे अद्या सुनु ब्रह्म कुमारा । मोसे नहीं कोउ स्रष्टा न्यारा ॥
स्वर्ग मृत्यु पाताल बनाई । सात समुद्र हम निरमाई ॥
शक्ति ने कहा कि मैं ही स्रष्टा हूँ, मैंने ही स्वर्ग, पाताल, मृत्यु आदि लोक बनाए हैं, मैंने ही समुद्र बनाया है, मेरे अलावा और कोई नहीं है ।
ब्रह्मा ने कहा
माना वचन तुमहि सब कीन्हा । प्रथम गुप्त तुम कस रख लीन्हा ॥
जबै वेद मुहि कहै बुझाई । अलख निरंजन पुरुष बताई ॥
अब तुम आप बनो करतारा । प्रथम काहे न किया बिचारा ॥
जो तुम वेद आप कथ राखा । सो कस तुम अलख निरंजन भाखा ॥
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आपे आप आप निरमाई । काहे न कथन कीन तुम माई ॥ अब मोसन तुम छल जनि करहू । साँचे साँच सब कहि उच्चरहू ॥
ब्रह्मा ने कहा कि माना तुम्हीं ने सब कुछ बनाया, पर यदि ऐसा था तो पहले हमसे क्यों नहीं कहा, छिपाए क्यों रखा और जब वेद मुझसे कह रहा है कि एक पुरुष है, निरंजन है, निराकार है, दिखता नहीं है तो तुम कह रही हो कि मैं ही सब कुछ हूँ, सब कुछ मैंने ही रचा है । अच्छा, यदि तुमने ही सब कुछ रचा तो वेद के शब्द भी तुम्हारे ही होंगे, फिर उसमें अलख निरंजन की बात की ! इसलिए मुझसे छल मत करो और सच-2 कहो ।
शक्ति ने कहा
जब ब्रह्मा यहि विधि हठ ठाना । तब अद्या मन कीन्ह तिवाना ॥ केहि विधि यहि कहूँ समझाई । विधि नहि मानत मोर बड़ाई ॥ जो यहि कहौं निरंजन बाता । कैहि विधि समझे यह विख्याता ॥ प्रथम कह्यो निरंजन राई । मोर दरश काहू नहिं पाई ॥ अबै जो यही अलख लखावो । कौनी विधि ताको दिखलावों ॥ अब विचार पुनि ब्रह्मै समझावा । अलख निरंजन नहिं दरस दिखावा ॥
जब ब्रह्मा ने जिद् की तो शक्ति ने मन में विचार किया कि यह तो मुझे सृष्टा मान ही नहीं रहा है, इसे कैसे समझाऊँ ! यदि इसे निरंजन की बात कहूँ तो यह कैसे समझेगा ! क्योंकि निरंजन ने तो कहा था कि उसे कोई देख नहीं पायेगा, फिर यदि यह कहेगा कि दिखाओ तो कैसे दिखाऊँगी ! यह विचार कर शक्ति ने उससे कहा कि वो किसी को दिखता नहीं है ।
ब्रह्मा ने कहा
ब्रह्मा कहै मोहिं ठौर बतावो । आगा पीछा जनि तुम लावो ॥ मैं ना मानो तम्हरी बाता । ऐसी बात न मोहि सुहाता ॥
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प्रथम तुम मुहि दीन भुलावा । अब तुम कहो न दरस दिखावा ॥ तासु दरस न पैहो पूता । ऐसी बात कहो अजगूता ॥
ब्रह्मा ने कहा कि मैं नहीं मानूँगा, मुझे बताओ कि वो कहाँ है, क्योंकि पहले भी तुमने कहा कि नहीं है, फिर कहती हो कि दिखाई नहीं देता।
शक्ति ने कहा
कहे जननी सुनो ब्रह्मा, कहों तोसों सत्त ही ॥
सात स्वर्ग हैं माथ ताको, चरण पताल सप्त ही ॥
शक्ति ने कहा—हे ब्रह्मा! मैं तुमसे सच कहती हूँ, सात स्वर्ग तक उसका मस्तक है और सात पाताल तक उसके चरण हैं।
लेहु पुष्प तुम हाथ, जो इच्छा तिहि दरश की ।
जाय नवओ माथ, ब्रह्मा चलै शिर नाइ कै ॥
माता ने उसे फूल देते हुए कहा कि यदि तुम्हें पिता दर्शन की इच्छा है तो यह फूल लो और जाकर माथा टेकना और फूल चढ़ाना। तब ब्रह्मा फूल लेकर आकाश में पिता की खोज में चला।
ब्रह्मा गये आकाश में
ब्रह्मा गये आकाश में
जननी गुन्यो वचन चित माहीं। मोरि कही यह मानत नाहीं॥ या कहँ वेद दीन्ह उपदेसा। पै दरस तै नहिं पावे भेसा॥ कह अष्टंगी सुनो रे बारा। अलख निरं जन पिता तुम्हारा॥ तासु दरस नहिं पैहो पूता। यह मैं बचन कहौं निज गूता॥
शक्ति ने मन में विचार किया कि ब्रह्मा मेरी बात नहीं मान रहा है, क्योंकि वेद ने इसे उपदेश किया है। तब अष्टंगी ने कहा कि अलख निरंजन तुम्हारा पिता है, पर तुम उसका दर्शन नहीं पा सकते।
ब्रह्मा सुनि व्याकुल है धावा। परसन सीस ध्यान हिय लावा॥ ब्रह्मा चले जननी सिर नाई। सीर परसि आवों तोहि ठाई॥ तुरतहि ब्रह्मा दीन्ह रिंगायी। उत्तर दिशा बेगि चलि जायी॥
यह सुन ब्रह्मा व्याकुल होकर दौड़ा, माता से कहा कि पिता के शीश के दर्शन करके फिर तेरे पास आऊँगा और यह कह वह उत्तर दिशा की ओर चला गया।
जेहि खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि अरु देव। कहैं कबीर सुन साधवा, करु सतगुरु की सेव॥
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नहीं पहुँच पाए विष्णु
नहीं पहुँच पाये विष्णु
आज्ञा माँगि विष्णु चले बाला । पिता दरश को चले पताला ॥ इत उत चितय महे स न डोला । सेवा करत कछू नहिं बोला ॥ तेहि शिव मन अस चितं अभावा । सेवा करन जननि चित लावा ॥ यहि विधि बहुत दिवस चलि गयऊ । माता सोच पुत्र कस कियऊ ॥
विष्णु जी भी आज्ञा माँगकर पिता के दर्शन को पाताल में चले गये । पर शिवजी कहीं नहीं गये; वे माता की सेवा में लगे रहे । इस तरह बहुत दिन बीत गये, माता ने सोचा कि पुत्रों ने यह क्या किया ।
प्रथम विष्णु जननी ढिग आये । अपनी कथा कहि समुझाये ॥
सबसे पहले विष्णु लौटकर माता के पास आए और सच्ची-2 बात बता दी कि मैं पिता के चरण नहीं देख सका ।
सुनि हर्षित भइ आदि कुमारी । लीन्ह विष्णु कहँ निकट दुलारी ॥
चूमेउ बदन सीस दियो हाथा । सत्य सत्य बोलेउ सुत बाता ॥
विष्णु की बात सुन शक्ति ने उसे आशीर्वाद दिया और उसका मुख चूमा, उसे प्यार किया, कहा-तुमने सत्य बोला है ।
पुनि कह माता विष्णु दुलारा । सुनहु पुत्र इक वचन हमारा ॥
सत्य सत्य तुम कहो बुझाई । पितु पद परसन जब गै भाई ॥
प्रथम हुतो तुम गौर शरीरा । कारण कौन श्याम भए धीरा ॥
माता ने विष्णु से कहा-तुम सत्य बोलो कि तुम पिता के चरण स्पर्श नहीं कर सके, पर यह बताओ कि पहले तो तुम गौर वर्ण थे, अब श्याम वर्ण कैसे हो गये !
आज्ञा पाय हम तत्काला । पितु पद परसन चले पताला ॥
अक्षत पुहुप लीन्ह कर माहँ । चले पताल पंथ मग जाहँ ॥
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पहुँचि शेषनाग पहुँ गयऊ । विष के तेज हम अलसयऊ ॥ भयो श्याम विष तेज समावा । भइ अवाज अस वचन सुनावा ॥ अहो विष्णु माता पहुँ जायी । बचन सत्य कहियो समझायी । सतयुग त्रेता जैहै जबही । द्वापर है चौथा पद तबही ॥ तब तुम हौहु कृष्ण अवतारा । लैहो ओयल सो कही विचारा ॥ नाथहु नाग कलिंदी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥ पहुँचे हम तब ही तुव पास । कीन्है उ सत्य वचन परकासा ॥ भेटे उ नाहिं माहि पद ताता । विष ज्वाला साँवले भो गाता ॥ व्याकुल भयो तबै फिरि आयो । पितु पद दर्शन मैं नहिं पायो ॥
विष्णु ने कहा कि तुम्हारी आज्ञा पाकर जब फूल लेकर मैं पाताल लोक में गया तो रास्ते में शेषनाग मिले, उनके विष के प्रभाव से मैं अचेत हो गया और मेरा वर्ण श्याम हो गया, तब शेषनाग ने कहा कि हे विष्णु! माता के पास वापिस लौट जाओ और सत्य कहना। उसने कहा कि सतयुग और त्रेता युग बीत जायेंगे तो द्वापर युग आयेगा, तब तुम्हारा कृष्णावतार होगा, मुझे नाथना, पर अब जल्दी से लौट जाओ। तब हम तुम्हारे पास आ गये और पिता के चरणों का दर्शन नहीं कर सके। (शेषनाग कालीनाग के रूप में यमुना में रहता था।)
ब्रह्मा को लेकर आद्य शक्ति व्याकुल हुई
ब्रह्मा को लेकर आद्य-शक्ति व्याकुल हुई
धर्मदास ने पूछा
कहे धरमनि यह संशय बीती । साहब कहहु ब्रह्मा की रीती ॥ पिता सीस तिन परसन कीन्हा । कि होय निरास पीछे पग दीन्हा ॥
धर्मदास जी ने साहिब से पूछा कि ब्रह्मा के साथ क्या हुआ ! क्या उसने पिता के शीश का स्पर्श किया या फिर निराश होकर लौट गया !
साहिब ने कहा
धर्मदास मुहि अति प्रिय अहहु । कहो सँदेस परखि दूढ़ गहहु ॥ चलत ब्रह्मा तब वार न लावा । पिता दरस कहँ अति मन भावा ॥ तेहि स्थान पहुँचिगै जाई । नहिं तहँ रबि ससि शून्य रहाई ॥ बहु विधि अस्तुत करे बनायी । ज्योति प्रभाव ध्यान तहँ लाई ॥ ऐसे बहु दिन गये बितायी । नहिं पायो ब्रह्मा दर्श पितायी ॥ शून्य ध्यान युग चार गमाना । पिता दरस अजहूँ नहिं पावा ॥
साहिब ने कहा—हे धरमदास ! तुम मुझे बहुत प्रिय हो, अब आगे की बात कहता हूँ, उसे जानो । कहा—ब्रह्मा के दिल में पिता के दर्शन की चाह थी, उसने जाते हुए समय नहीं लगाया । एक स्थान पर पहुँचा तो वहाँ सूर्य, चाँद आदि नहीं थे, शून्य स्थान था । वहाँ ब्रह्मा ध्यान लगाकर बैठ गया और पिता की बहुत भांति से स्तुति करने लगा । ऐसे मैं बहुत समय
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व्यतीत हो गया, पर ब्रह्मा को पिता के दर्शन नहीं हुए। चार युग उसने ध्यान में गँवा दिये, पर दर्शन नहीं पा सका।
ब्रह्मा तात दरश नहीं पाया। शून्य ध्यान महँ बहु जाया ॥
माता चिन्ता करत मन माहाँ। जेठ पुत्र ब्रह्मा रहु काहाँ ॥
किहि विधि रचना रचहु बनाई। ब्रह्मा आवे कौन उपाई ॥
इधर शून्य में ध्यान मग्न ब्रह्मा को युग बीत गये, पर पिता का दर्शन न हुआ और उधर शक्ति को चिंता हुई कि उसका बड़ा बेटा कहाँ रह गया, क्योंकि सृष्टि की रचना जो करनी थी, सो उसने सोचा कि ब्रह्मा को कैसे बुलाया जाए!
सार शब्द सर्व से न्यारा, भेद न पावे कोई। चार वेद में ब्रह्मा भूलें, आदि नाम न पाई॥
ब्रह्मा को लाने चली गायत्री
ब्रह्मा को लाने चली गायत्री
उबटि शरीर मैल गहि काढ़ी। पुत्री रूप कीन्ह रचि ठाढ़ी ॥ शक्ति अंश निज ताहि मिलावा। नाम गायत्री ताहि धरावा ॥ गायत्री मातहि सिर नावा। चरण चूम निज सीस चढ़ावा ॥
तब शक्ति ने शरीर से मैल निकालकर गायत्री नामक कन्या की उत्पत्ति की, उसमें अपना अंश मिलाया। गायत्री ने माता के चरणों में शीश नमाकर उसके चरणों को चूमा।
गायत्री ने पूछा
गायत्री विनवै कर जोरी। सुनु जननी इक विनती मोरी ॥ कौन काज मो कहँ निरमाई। कहो बचन लेउँ सीस चढ़ाई ॥
गायत्री ने माता से पूछा कि उसकी उत्पत्ति क्यों की गयी है !
कहे अद्या पुत्री सुनु बाता। ब्रह्मा आहि जेठहि तुव भ्राता ॥ पिता दरश कहँ गयो अकाशा। आनौ ताहि वचन परगासा ॥ दरश तात कर वह नहिं पावे। खोजत खोजत जनम गमावे ॥ जौने विधि ते इहँवा आई। करो जाय तुम तौन उपाई ॥
आद्य शक्ति ने कहा—हे पुत्री ! तम्हारा बड़ा भाई ब्रह्मा पिता का दर्शन करने आकाश को गया है, वो पिता का दर्शन नहीं पा सकेगा और खोजते -2 जन्म गँवा रहा है, इसलिए तुम जाओ और ऐसा उपाय करो जिससे वो यहाँ वापिस आ जाए।
चलि गायत्री मारग आई। जननी वचन प्रीति चित लाई ॥
चलत भई मारग सुकुमारी। जननी वचन ध्यान उर धारी ॥
गायत्री माता के वचनों को ध्यान से सुन हृदय में धारण कर चल पड़ी।
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साहिब बन्दगी
जाय देख्यो चतुरमुख कहैं, नाहिं पलक उधारई। कछु क दिन सो रही तहाँवा, बहु रि युक्ति विचारई॥ कौन विधि यह जागिहैं, अब करें कौन उपाय हो। मन गुनन सोचे बहु त विधि, ध्यान जननी लाय हो॥
गायत्री ने जाकर देखा कि ब्रह्मा ध्यान मगन हैं, आँखें बंद किये हुए है, खोलता नहीं है। उसने कुछ दिन तक तो वहीं इंतजार किया, पर जब देखा कि यह जग नहीं रहा है तो विचार किया कि इसे किस तरह जगाऊँ ! यह सोच उसने अद्या का ध्यान किया।
अद्या आयसु पाय, गायत्री तब ध्यान महँ॥ निज कर परसहु, ब्रह्मा तबही जागिहैं॥
अद्या ने कहा कि अपने हाथों से उसके चरण को छुओ, तभी वो जागेगा।
गायत्री पुनि कीन्ही तैसी। माता युक्ति बतायी जैसी॥ गायत्री तब चित्त लगाई। चरण कमल कहँ परसेउ जायी॥
गायत्री ने वैसा ही किया, उसके चरणों को स्पर्श किया।
ब्रह्मा जाग ध्यान मन डोला। व्याकुल भयो बचन तब बोला॥ कवन अहै पापिन अपराधी। कहा छुड़ायहु मोरि समाधी॥ शाप देहुँ तोकहँ मैं जानी। पिता ध्यान मोहि खंड्यो आनी॥
ब्रह्मा ध्यान से जागा और व्याकुल होकर कहा कि मैं पिता के ध्यान में था; ऐसा कौन पापी है, जिसने मेरी समाधि भंग की है, मैं उसे शाप दे दूँगा।
गायत्री ने कहा
कहि गायत्री मोहि न पापा। बूझि लेहु तब देहहु शापा॥ कहँ तोहि सो सांची बाता। तोहि लेन पठयी तुव माता॥ चलहु वैगि जनि लावहु वारे। तुम बिन रचना को बिस्तारे॥