भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

१०८ वसिष्ठस्मृतिः ॥

नाऽऽपोमूत्रपुरीषेण नाग्निर्दहनकर्मणा ॥ १ ॥
स्वयंविप्रतिपन्नावा यदिवाविप्रवासिता ।
बलात्कारोपभुक्तावा चौरहस्तगताऽपिवा ॥ २ ॥
नत्याज्यादूषितानारी नास्यास्त्यागोविधीयते ।
पुष्पकालमुपासीत ऋतुकालेनशुध्यति ॥ ३ ॥
स्त्रियःपवित्रमतुलं नैतादुष्यन्तिकर्हिचित् ।
मासिमासिरजोह्यासां दुष्कृतान्यपकर्षति ॥ ४ ॥
पूर्वस्त्रियःसुरैर्भुक्ताः सोमगन्धर्ववन्हिभिः ।
गच्छन्तिमानुषान्पश्चान्नैतादुष्यन्तिधर्मतः ॥ ५ ॥
तासांसोमोऽददच्छौचं गन्धर्वःशिक्षितांगिरम् ।
अग्निश्चसर्वभक्षत्वं तस्मान्निष्कल्मषाःस्त्रियः ॥ ६ ॥
त्रीणिस्त्रियःपातकानि लोकेधर्मविदोविदुः ।


अभिचार ( मारणप्रयोगादि ) से ब्राह्मण, विष्टा मूत्रादि से नद्यादि जलाशय, और अशुद्ध मूर्दादि को जलाने से अग्नि, दूषित नहीं होता है ॥ १ ॥ स्त्री यदि स्वयं विरूद्ध हो कर वा पति आदि के निकाल देने पर कहीं चली जाय उस में कोई दुष्ट वा चोर बलात्कार दुराचार करे ॥ २ ॥ तो इस प्रकार दूषित हुई स्त्री त्याज्य नहीं ऐसी (निरपराध होने से) का त्याग शास्त्र में नहीं कहा है। ऐसी स्त्री रजोधर्महोने से शुद्ध हो जाती है (यह धर्मशास्त्रकार की राय है सो जब जहां लोकव्यवहार के विरुद्ध न हो वहां मान्य होगी और लोकव्यवहार से विरुद्ध होने पर (लोकद्विष्टङ्कुमेवच । मनु० अ० ४ । १७६) के अनुसार धर्मानुकूल विचार भी त्याज्य होगा। तदनुसार दूषित स्त्री का ग्रहण लोक विरुद्ध होने से संप्रति करना उचित नहीं है) ॥ ३ ॥ स्त्रियां अतुल पवित्र हैं इस से कदापि दूषित नहीं होतीं। क्योंकि प्रतिमास निकलने वाला रज उन के दोषों को नष्ट करता रहता है ॥ ४ ॥ पहिले स्त्रियों को सोम, गन्धर्व और अग्नि देवताओं ने भोगा और पीछे मनुष्यों के साथ विवाह हुआ इस से धर्मानुकूल दूषित नहीं होतीं ॥ ५ ॥ सोम देवता ने अपने समय में स्त्रियों को पवित्रता दी, गन्धर्वदेवता ने प्रिय तथा कोमल शिक्षित वाणी दी और अग्नि ने सब कुछ खाने पचाने की शक्ति दी है इस से स्त्रियां स्वाभाविक शुद्ध हैं ॥ ६ ॥ धर्मज्ञ विद्वानों ने स्त्रियों के तीन पातक मुख्यकर माने हैं। एक पति को स्वयं विषादि देके वा अन्यद्वारा मरवा डालना, किसी का गर्भ गिराना, वा अपना गर्भ गिराना (इन से भिन्न अन्य भी स्त्री के पाप

भार्गवसंहिता ॥ १०९

भर्तुर्वधोभ्रूणहत्या स्वस्यगर्भस्यपातनम् ॥ ७ ॥
वत्सःप्रस्रवणेमेध्यः शकुनिःफलपातने ।
स्त्रियश्चरतिसंसर्गे श्वामृगग्रहणेशुचिः ॥ ८ ॥
अजाश्वामुखतोमेध्या गावोमेध्यास्तुपृष्ठतः ।
ब्राह्मणाःपादतोमेध्याः स्त्रियोमेध्यास्तुसर्वतः ॥ ९ ॥
सर्ववेदपवित्राणि वक्ष्याम्यहमतःपरम् ॥
येषांजपैश्चहोमैश्च पूयन्तेनात्रसंशयः ॥ १० ॥
अघमर्षणंदेवकृतं शुद्धवत्यस्तरत्समाः ।
कूष्माण्डानिपावमान्यो दुर्गासावित्रिरेवच ॥ ११ ॥
अभीषङ्गाःपदस्तोमाः सामानिव्याहृतीस्तथा ।
भारुण्डानिचसामानि गायत्रंरैवतंतथा ॥ १२ ॥
पुरुषव्रतंन्यासं च तथावेदव्रतानिच ।


हैं जिन के प्रायश्चित्त पूर्व अ० २१ आदि में कहे हैं पर उन में ये तीन बड़े महापाप हैं ) ॥ ७ ॥ गौ के थनों को चोंखने में बछड़े का मुख शुद्ध है, फल गिराने में पक्षी का मुख शुद्ध, शिकार पकड़ने में कुत्ते का मुख शुद्ध और रति सम्बन्ध में स्त्री शुद्ध है ॥ ८ ॥ बकरा बकरी घोड़ा का मुख, गौ के मल-मूत्र स्थान, तथा ब्राह्मणों के पग पवित्र हैं तथा स्त्रियों का सर्वाङ्ग शुद्ध है ॥ ९ ॥ ( स्त्रियां निर्धन पराधीन होने से भी कम दूषित होती हैं बालककृत अपराध बालक को नहीं लगता है ) सब वेदों के पवित्रांश आगे कहते हैं जिन के जप और होमों द्वारा निःसन्देह मनुष्य पवित्र होते हैं ॥ १०॥ ( ऋतं च सत्यं च०) इत्यादि तीन मन्त्र, (देवकृतस्यैनसो०) इत्यादि छः मन्त्र, (एतोन्विन्द्रं०) इत्यादि तीन शुद्धवती ऋचा, ( तरत्समन्दी० ) इत्यादि चार ऋचा, कूष्माण्ड सूक्त, ऋग्वेद का नवम मण्डल पवमान सूक्त, सविता देवता वाली, दुर्गा की ऋचा, अभीषङ्ग-पदस्तोम- ये साम, सातों व्याहृति, भारुण्ड-गायत्र और रैवत साम, ॥११। १२ ॥ पुरुषव्रत, न्यास, वेदव्रत ये साम, छप शब्दवाले, बृहस्पति शब्दवाले मन्त्र वा सूक्त, ( मधुवाता० ) इत्यादि तीन ऋचा (नमस्तेरुद्र० ) इत्यादि शत रुद्रिय, अथर्वशिरः, त्रिसुपर्ण, महाव्रत, गोसूक्त, अश्व-

११० वसिष्ठस्मृतिः ॥

अब्लिङ्गं वार्हस्पत्यंच वाक्सूक्तंमध्वृचस्तथा ॥ १३ ॥
शतरुद्रियमथर्वशिर-स्त्रिसुपर्णंमहाव्रतम् ।
गोसूक्तंचाश्वसूक्तंच शुद्धःशुद्धेतिसामनी ॥ १४ ॥
त्रीण्याज्यदोहानिरथन्तरञ्च अग्नेर्व्रतंवामदेव्यंबृहच्च ।
एतानिजप्तानिपुनन्तिजन्तू-ञ्जातिस्मरत्वंलभतेयदीच्छेत् ॥ १५ ॥
अग्नेरपत्यंप्रथमंसुवर्णं भूर्वैष्णवीसूर्यसुताश्चगावः ।
तासामनन्तंफलमश्नुवीत यःकाञ्चनं गां चमहींचदद्यात् ॥१६॥
उपरुन्धन्तिदातारं गौरश्वःकनकंक्षितिः ।
अश्रोत्रियस्यांविप्रस्य हस्तंदृष्ट्वानिराकृतेः ॥ १७ ॥
वैशाख्यांपौर्णमास्यांच ब्राह्मणान्सप्तपञ्चवा ।
तिलान्क्षौद्रेणसंयुक्तान् कृष्णान्वायदि वेतरान् ॥ १८ ॥
प्रीयतांधर्मराजेति यद्वामनसिवर्त्तते ।
यावज्जीवकृतंपापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥ १९ ॥
सुवर्णनाभंकृत्वातु सखुरंकृष्णमार्गणम् ।
तिलैःप्रच्छाद्ययोदद्यात्तस्यपुण्यफलंशृणु ॥ २० ॥
ससुवर्णगुहातेन सशैलवनकानना ।


सूक्त, शुद्धः-शुद्धा, ये दोनों साम ॥ १३ । १४ ॥ त्रीन् आज्यदोह, रथन्तर, अग्निब्रत, वामदेव, बृहत्, ये साम इन सब का जप करे तो ये जीवों को पवित्र करते हैं और चाहे तो पूर्व जन्म का स्मरण भी हो जाता है ॥ १५ ॥ अग्निदेवता का प्रथम सन्तान सुवर्ण, विष्णुदेव की पृथिवी, और सूर्यनारायण की पुत्री गौ इन तीनों का जो पुरुष दान करता है उस को अनन्त फल प्राप्त होता है ॥ १६ ॥ गौ, घोड़े, सुवर्ण और भूमि ये सब वेदाध्ययन से शून्य ब्राह्मण के हाथ में अपने को जाते देख कर दाता पुरुष को रोकते हैं कि इसे मत दे यह सुपात्र नहीं है ॥ १७ ॥

बशाख की पौर्णमासी के दिन सात वा पांच ब्राह्मणों को शहद से संयुक्तकाले वा अन्य तिल (हे धर्मराज ! प्रसन्न हूजिये ऐसा वा जो मनमें हो कहकर) दान करे तो जीवन भर में किया सब पाप क्षण भर में नष्ट होता है ॥ १८ । १९ ॥ ककुन्दनी गन्ध द्रव्य सहित काले बाण को मध्यमें सुवर्ण लगा के तिलों से ढांपकर जो पुरुष दान करता है उसके पुण्य फल को सुनो ॥ २० ॥ सुवर्ण, गुफा, पर्वत बन, जङ्गल और चारों दिशाओं सहित सब भूमि उसने दाम की कि जिसने

भाषार्थसहिता ॥ १११

चतुर्वक्त्राभवेद्दत्ता पृथिवीनात्रसंशयः ॥ २१ ॥
कृष्णाजिनेतिलान्कृत्वा हिरण्यमधुसर्पिषी ।
ददातियस्तुविप्राय सर्वंतरतिदुष्कृतमितिसर्वंतरतिदुष्कृतमिति२२
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे ऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥२८॥
दानेन सर्वकामानाप्नोति ॥१॥ चिरजीवित्वं ब्रह्मचा-
री रूपवान् ॥ २ ॥ अहिंस्युपपद्यते स्वर्गम् ॥ ३ ॥ अग्निप्रवे-
शाद् ब्रह्मलोकः ॥ ४ ॥ मौनात्सौभाग्यम् ॥ ५ ॥ नागाधिप-
तिरुदकवासात् ॥ ६ ॥ नीरुजः क्षीणकोशः ॥ ७ ॥ तोयदः स-
र्वकामसमृद्धः ॥ ८ ॥ अन्नप्रदाता सचक्षुः ॥ ९ ॥ स्मृतिमान्मे-
धावी सर्वतोऽभयदाता ॥ १० ॥ गोयुक्ते सर्वतीर्थोपस्पर्शन-
म् ॥ ११ ॥ शय्यासनदानादन्तःपुराधिपत्यम् ॥ १२ ॥ छत्र-


उक्त प्रकार बाण का दान किया इसमें सन्देह नहीं ॥ २१ ॥ काले मृग चर्म पर तिल धरके उन तिलों पर सुवर्ण, शहद और घी धर के जो ब्राह्मण को दान देता है वह सब दुष्कर्मों से पार हो जाता है ॥ २२ ॥

यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में अठ्ठाईसवां अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥

दान धर्म से मनुष्य की सब मनोकामना पूरी हो जाती है ॥ १ ॥ दान शील पुरुष चिरंजीवी ब्रह्मचारी तथा सुरूपवान् होता है ॥ २ ॥ दयालु हुआ स्वर्ग को प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ दान शील को अग्नि में प्रवेश करने ( विधिपूर्वक मरणान्तदाह ) से ब्रह्मलोक प्राप्त होता ॥ ४॥ मौन धारण करने से सौभाग्य प्राप्त होता ॥५॥ जलमें भींगते हुए जप करने से नागों का अधिपति अर्थात् नागलोक का राजा होता है ॥ ६ ॥ दान में जिसका धन चुक जाय वह नीरोग होता ॥७॥ प्याऊ आदि जलदान करनेवाला सब कामनाओं से युक्त होता ॥ ८ ॥ अन्न दाता चक्षु हीन नहीं होता ॥ ९ ॥ सब प्रकार से अभय देने वाला स्मरण शक्ति युक्त उत्तम बुद्धिवाला होता ॥ १० ॥ बैल युक्त रथ के दान में सब तीर्थों के स्नान का फल होता है ॥ ११ ॥ शय्या दान और उत्तम२ आसनों के दान से स्त्री रणवास की महारानी होती है ॥ १२ ॥ छाता के दान

११२ वसिष्ठस्मृतिः ॥

दानाद् गृहलाभः ॥ १३ ॥ गृहप्रदो नगरमाप्नोति ॥ १४ ॥ उपानत्प्रदाता यानमासादयति ॥१५॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥१६॥ यत्किंचित्कुरुतेपापं पुरुषोवृत्तिकर्शितः । अपिगोचर्ममात्रेण भूमिदानेनशुध्यति ॥ १७ ॥ विप्रायाऽऽचमनार्थंतु दद्यात्पूर्णकमण्डलुम् । प्रेत्यतृप्तिंपरांप्राप्य सोमपोजायतेपुनः ॥ १८ ॥ अनडुहांसहस्राणां दानानांधुर्यवाहिनाम् । सुपात्रेविधिदत्तानां कन्यादानेनतत्समम् ॥ १९ ॥ त्रीण्याहुरतिदानानि गावःपृथ्वीसरस्वती । आदिदानंहिरण्यानां विद्यादानंततोऽधिकम् ॥ २० ॥ आत्यन्तिकफलप्रदं मोक्षदंबन्धमोचनम् । योगिनांसंमतोविद्वानाचारमनुवर्तते ॥ २१ ॥ श्रद्दधानःशुचिर्दान्तो धारयेच्छृणुयादपि ।


से घर मिलता (घर एक प्रकार का बड़ा छाता जानो) ॥ १३॥ घर देनेवाला नगर का स्वामी होता है ॥ १४ ॥ जूतों का दान करनेवाले को सवारी प्राप्त होती है ॥ १५ ॥ और भी श्लोकों का प्रमाण कहते हैं कि ॥ १६ ॥ जीविका (रोजगार) न मिलने से दुःखित हुआ मनुष्य जो कुछ पाप करता है वह गोचर्म मात्र भूमि के दान से शुद्ध हो जाता है ॥ १७ ॥ आचमन के लिये ब्राह्मण को जो जल से भरा कमण्डलु दान करे वह जन्मान्तर में परम तृप्ति को प्राप्त होकर अग्निष्टोमादि सोमयाग करने वाला होता है ॥ १८ ॥ बलवान् गाड़ी में बोझा ले चलने में समर्थ एक हजार बैलों का दान सुपात्रों को विधिवत् देवे तो कन्यादान के तुल्य पुण्य होता है ॥ १९ ॥

गौ, पृथिवी और विद्या ये तीन दान बड़े हैं । इन में भी सुवर्ण का दान मुख्य है और विद्या का दान सुवर्ण से भी बड़ा है ॥ २० ॥ बन्धन से छुड़ा के मोक्ष देनेवाला होने से विद्या दान अत्यन्त फल देनेवाला है । जो विद्वान् होकर सदाचार पर चलता है वह योगियों का भी मान्य है ॥ २१ ॥ जो धर्म के विचारों को सुने और धारण (स्वीकार) करे आगे वैसा ही करने लगे, मनको

भाषार्थसहिता ॥ ११३

विहायसर्वपापानि नाकपृष्ठेमहीयत,इति ।
नाकपृष्ठेमहीयते । इति ॥ २२ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
धर्मंचरतमाऽधर्मं सत्यंवदतनानृतम् ।
दीर्घंपश्यतमाह्रस्वं परंपश्यतमाऽपरम् ॥ १ ॥
ब्राह्मणोयज्ञो भवत्यग्निर्वै ब्राह्मणइति श्रुतेः ॥ २ ॥
तच्च कथम् ॥३॥ तत्र सतो ब्राह्मणस्य शरीरं वेदिः संक-
ल्पो यज्ञः पशुरात्मा मनो रशना बुद्धिः सदो मुखमाहवनीयं
नाभ्यामुदरोऽग्निर्गार्हपत्यः प्राणोऽध्वर्युर्पानो होता व्यानो
ब्रह्मा समान उद्गाताऽऽत्मेन्द्रियाणि यज्ञपात्राणि यएवं
विद्वन्निन्द्रियैरिन्द्रियार्थं जुहोतीति ॥ ४ ॥ अपि च काठके
विज्ञायते ॥ ५ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ६ ॥
पानित्रातिचदातार-मात्मानंचैवकिल्विषात् ।
वेदेन्धनसमृद्धेषु हुतंविप्रमुखाग्निषु ॥ ७ ॥


वश में रक्खें, पवित्रता से रहे, तथा श्रद्धालु हो वह सब पापों को त्याग के स्वर्ग के सिंहासन पर पूजा जाता है ॥ २२ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में उनतीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥२९॥
धर्म करो अधर्म नहीं, सत्य बोलो मिथ्या नहीं, दीर्घ दर्शी बनो संकुचित विचार वाले नहीं, परम अविनाशी सब अनित्य पदार्थों में नित्य परम तत्त्व रूप ईश्वर को देखो संसार को नहीं ॥ १ ॥ ब्राह्मण यज्ञ का ही रूप है । “अग्नि ही ब्राह्मण है” ऐसा श्रुति में लिखा है ॥ २ ॥ सो कैसे ? ॥ ३ ॥ उस में सत्पात्र ब्राह्मण का शरीर-वेदि, संकल्प-यज्ञ, पशु-आत्मा, मन-रस्सी, बुद्धि-सदःशाला, मुख-आहवनीय, नाभिस्थल में उदर का जाठराग्नि-गार्हपत्य, प्राण-अध्वर्यु, अपान-होता, व्यान-ब्रह्मा, समान-उद्गाता, इन्द्रियां यज्ञपात्र, जो ऐसा जानता है वह इन्द्रियों के साथ शब्द स्पर्शादि विषयों का होमकर देता है ॥ ४ ॥ और भी कठशाख्य श्रुति से जाना जाता है ॥ ५ ॥ और भी श्लोकों का प्रमाण कहते हैं कि ॥ ६ ॥ दान लेने वाले और दाता पुरुष को वह दान पाप से रक्षा करता है कि जो वेदरूप ईंधन से प्रज्वलित ब्राह्मणों के मुख रूप अग्नि में होम किया जाता है ॥ ७ ॥ न फैजता, न व्यर्थ हो-

११४ वसिष्ठस्मृतिः ॥

नस्कन्दतेनव्यथते नैनमध्यापतेञ्चयत् । वरिष्ठमग्निहोत्रात्तु ब्राह्मणस्यमुखेहुतम् ॥ ८ ॥ ध्यानाग्निः सत्योपचयनं क्षान्त्यापुष्टिग्न्रवं त्रिः पुरोडा- शमहिंसा च सन्तोषो यूपःकृच्छ्रं भूतेभ्योऽभयदाक्षिण्यं स्म- तिं कृत्वा क्रतुं मानसं याति क्षयं बुधः ॥६॥ जीर्यन्ति जीर्यतःकेशा दन्ताजीर्यन्तिजीर्यतः । जीवनाशाधनाशाच जोर्यतोऽपिनजीर्यति ॥१०॥ यादुस्त्यजादुर्मतिभिर्यान्नजोर्यतिजीर्यतः । योऽसौप्राणान्तिको व्याधिस्तांतृष्णांत्यजतः सुखमिति॥११॥ नमोस्तुमित्रावरुणयोरुर्वश्यात्मजाय शतयातवे वसिष्ठाय वसिष्ठायेति ॥१२॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ समाप्ताचेयं वसिष्ठस्मृतिः ॥


ता, और न किसी प्रकार के अनिष्ट का कारण होता है (अर्थात् अग्निहोत्र में ऐसी अनेक दिक्कतें होती हैं इस कारण) अग्नि होत्र से बहुत अच्छा यह है कि जो ब्राह्मण के मुख में होम किया गया है ॥ ८ ॥ ध्यान रूप अग्नि, सत्य का संचय, क्षमा से पुष्टि अन्न वा पुरोडाश, अहिंसा-दया, सन्तोष यूप-स्तम्भ, प्राणियों के लिये अभयदान रूप कृच्छ्रव्रत, ऐसा स्मरण करके विद्वान् पुरुष संसार के साथ संबन्ध का त्याग करता हुआ मानस यज्ञ को प्राप्त होता है ॥६॥ वृद्धावस्था में बालश्वेत हो जाते, दांत गिर जाते हैं, परन्तु जीवन की और धन की तृष्णा जीर्ण (बुड्डी) नहीं होती ॥१०॥ जो शरीर के जीर्ण होते हुए भी जीर्ण नहीं होती जो निकृष्ट बुद्धि वालों से कदापि त्यागी नहीं जा सकती तथा जो मरण पर्यन्त साथ में लगी पूरी व्याधि है उस तृष्णा को त्याग ने पर ही सुख हो सकता है ॥११॥ मित्रावरुण देवतों द्वारा उर्वशीदिव्याङ्गना से उत्पन्न हुए शतयातु नामक महर्षि वसिष्ठ को बारंबार नमस्कार प्राप्त हो ॥१२॥ यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के ब्राह्मणसर्वस्व सम्पादक पं० भीमसेन शर्म कृत भाषानुवाद में तीसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ और यह वसिष्ठस्मृति भी समाप्त हुई॥ ओम्-शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः ॥

इस पृष्ठ पर कोई पाठ (text) उपलब्ध नहीं है। यह पृष्ठ पूर्णतः रिक्त (blank) है।