अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सातवां कांड
सूक्त-१ देवता—आत्मा
धीती वा ये अनयन् वाचो अग्रं मनसा वा ये ऽ वदन्नृतानि.
तृतीयेन ब्रह्मणा वावृधानास्तुरीयेणामन्वत नाम धेनोः.. (१)
प्रजापति अथवा इंद्र और अग्नि की स्तुति करने वालों ने वाणी व्यवहार के समस्त अर्थ
का ध्यान किया. जिन कहने के इच्छुकों ने देवता वाचक शब्दों के रूप में सत्य बोला, उन्होंने
तृतीय ब्रह्म अर्थात् मध्यमा नामक भाषा शक्ति के द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हुए चौथी अर्थात्
वैखरी वाणी से प्रसन्न होने वाले प्रजापति का नाम उच्चारण किया. (१)
स वेद पुत्रः पितरं स मातरं स सूनुर्भुवत् स भुवत् पुनर्मघः.
स द्यामौर्णोदन्तरिक्षं स्व १: स इदं विश्वमभवत् स आभवत्.. (२)
भलीभांति जानने वाले पुत्रों को अनर्थ से बचाने वाला प्रजापति द्युलोक तथा पृथ्वी को
जानता है. वह प्रजापति संसार के लोगों को अपनेअपने कर्म करने की प्रेरणा देता है. वह
आकाश तथा पृथ्वी को अपनी महिमा से व्याप्त करता है. वह प्रजापति ही यह दिखाई देता
हुआ विश्व बन गया है. (२)
सूक्त-२ देवता—आत्मा
अथर्वाणं पितरं देवबन्धुं मातुर्गर्भं पितुरसुं युवानम्.
य इमं यज्ञं मनसा चिकेत प्र णो वोचस्तमिहेह ब्रवः.. (१)
प्रजाओं के पालक देवों की सृष्टि करने वाले, माता के गर्भ से जन्म लेने वाले बालक को
युवा बनाने वाले एवं गर्भ के जनक को प्राण युक्त करने वाले प्रजापति से मैं अपनी
अभिलाषा की सिद्धि के लिए याचना करता हूं. उस ने इस ज्योतिहोम आदि यज्ञ को मन से
जाना है. हे ब्रह्म! उस प्रजापति को मुझे बताओ. इस बात की अभिलाषा पूर्ण करने वाले यज्ञ
कर्म में बताओ. (१)
सूक्त-३ देवता—आत्मा
अया विष्ठा जनयन् कर्वराणि स हि घृणिरुरुर्वराय गातुः.
स प्रत्युदैद् धरुणं मध्वो अग्रं स्वया तन्वा तन्वमैरयत.. (१)
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सूक्त-४ देवता—वायु
इस माया के द्वारा विश्व आत्मा के रूप में स्थित यह प्रजापति यज्ञ आदि कर्मों को
उत्पन्न करता है. वह दीप्तिशाली उत्तम कर्म फल के लिए महान मार्ग है. वह स्थायी एवं
चिरकाल तक रहने वाले मधुर जल को उत्पन्न करता है. उस ने अपने विराट् शरीर के द्वारा
सभी प्राणियों के शरीरों को प्रेरित किया है. (१)
सूक्त-४ देवता—वायु
एकया च दशभिश्चा सुहुते द्वाभ्यामिष्टये विंशत्या च.
तिसृभिश्च वहसे त्रिंशता च वियुग्भिर्वाय इह ता वि मुञ्च.. (१)
हे शोभन आह्वान वाले वायु देव! सब के प्रेरक प्रजापति अपने रथ में जुड़े हुए ग्यारह
घोड़ों के सहारे हमारे यज्ञ में आएं. तुम बाईस तथा तैंतीस अश्वों के द्वारा वहन किए जाते हो.
हे वायु! हमारे यज्ञ में आ कर अपने घोड़ों को यहीं रोके रहो अर्थात् हमारे यज्ञ से दूसरी जगह
मत जाओ. (१)
सूक्त-५ देवता—आत्मा
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्.
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः.. (१)
देवत्व को प्राप्त यजमानों ने अग्नि के द्वारा यज्ञ पूर्ण किया. अग्नि के कर्म उन के प्रमुख
कर्म थे. वे महत्त्व युक्त देव स्वर्ग को प्राप्त हुए. वहां प्राण के अभिमानी प्राचीन देव निवास
करते हैं. (१)
यज्ञो बभूव स आ बभूव स प्र जज्ञे स उ वावृधे पुनः.
स देवानामधपतिर्बभूव सो अस्मासु द्रविणमा दधातु.. (२)
यज्ञ रूप प्रजापति, विश्व आत्मा के रूप में प्रसिद्ध एवं सब के कारण हुए. वे प्रसिद्ध हुए
तथा वे आज भी जगत् की आत्मा के रूप में बारबार बढ़ते हैं. वे इंद्र आदि देवों में प्रमुख हुए.
यह यज्ञ हम सेवकों को अधिक धन प्रदान करे. (२)
यद् देवा देवान् हविषा ऽ यजन्तामर्त्यान् मनसा ऽ मर्त्येन.
मदेम तत्र परमे व्योमन् पश्येम तदुदितौ सूर्यस्य.. (३)
कर्म से देवत्व को प्राप्त जनों ने न मरने वाले इंद्र आदि देवों के हेतु देव विषयक मन से
चरु, पुरोडाश आदि के द्वारा यज्ञ किया. हम यजमान उस विशाल स्वर्ग में प्रसन्न हों एवं जब
तक सूर्य का प्रकाश रहे, तब तक इस यज्ञ का फल रहे. (३)
यत् पुरुषेण हविषा यज्ञं देवा अतन्वत.
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अस्ति नु तस्मादोजीयो यद्विहव्येनेजिरे.. (४)
यजमानों ने पुरुष रूप हवि से पुरुषमेध नामक यज्ञ का विस्तार किया. उस में जो
ओजस्वी एवं सारवान है, उसे हवि के रूप में देखा. (४)
मुग्धा देवा उत शुना ऽ यजन्तोत गोरङ्गैः पुरुधा ऽ यजन्त.
य इमं यज्ञं मनसा चिकेत प्र णो वोचस्तमिहेह ब्रवः.. (५)
कार्य और अकार्य के विवेक से हीन यजमानों ने कुत्ते के द्वारा यज्ञ किया तथा गाय के
अंगों के द्वारा भी अनेक बार यज्ञ किया. जो इस यज्ञ करने योग्य परमात्मा को मन से जानता
है, वह गुरु हमें बताओ. उसे यहीं और इसी समय परमात्मा का स्वरूप बताओ. (५)
सूक्त-६ देवता—अदिति
अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः.
विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्.. (१)
खंड न होने योग्य जो पृथ्वी एवं देवमाता है, वही स्वर्ग और अंतरिक्ष है. वही संसार की
निर्मात्री माता और उत्पन्न करने वाला पिता है. वही माता और पिता से उत्पन्न पुत्र है. ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं निषाद—ये पांच जातियों वाले जन भी अदिति हैं. प्रजाओं की उत्पत्ति
और जन्म का अधिकरण भी अदिति है. (१)
महीमू षु मातरं सुव्रतानामृतस्य पत्नीमवसे हवामहे.
तुविक्षत्रामजरन्तीमुरूचीं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्.. (२)
महती एवं शोभन कर्मों वाली माता को सत्य और यज्ञ का पालन करने वाली माता के
उद्देश्य से हम अपनी रक्षा के लिए यज्ञ करते हैं. अधिक बल एवं शक्ति संपन्न, विनाश रहित,
अति दूर तक जाने वाली, शोभन सुख वाली एवं उत्तम कर्मों से प्रसन्न होने वाली देव माता
अदिति को हम अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं. (२)
सूक्त-७ देवता—अदिति
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्.
दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये.. (१)
भलीभांति रक्षा करती हुई, विस्तीर्ण, पहुंचने योग्य, पाप रहित, सुख वाली सुखमय
कर्मों की प्रेरणा एवं अखंडनीय दैवी नाव में हम सवार हों. उस शोभन डांडों वाली एवं छिद्र
रहित दैवी नाव पर अपराध न करने वाले हम कल्याण प्राप्त करने के लिए सवार हों. (१)
वाजस्य नु प्रसवे मातरं महीमदितिं नाम वचसा करामहे.
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सूक्त-८ देवता—अदिति
यस्या उपस्थ उर्व १ न्तरिक्षं सा नः शर्म त्रिवरूथं नि यच्छात्.. (२)
हम अन्न की उत्पत्ति के लिए, अन्न का निर्माण करने वाली विशाल एवं अखंडनीय
अदिति की स्तुति करते हैं. जिस अदिति की गोद में विस्तृत आकाश है, वही अदिति हमें तीन
मंजिला और तीन कक्षों वाला घर प्रदान करे. (२)
सूक्त-८ देवता—अदिति
दितेः पुत्राणामदितेरकारिषम् अमव देवानां बृहतामनर्मणाम्.
तेषां हि धाम गभिषक् समुद्रियं नैनान् नमसा परो अस्ति कश्चन.. (१)
मैं दिति के पुत्रों अर्थात् दैत्यों का स्थान छीन कर अदिति के पुत्रों अर्थात् देवों को देता
हूं. वे देव गुणों से महान एवं शत्रुओं द्वारा पराजित न होने वाले हैं. उन का सागर अथवा
आकाश में स्थित निवास स्थान दूसरों के लिए दुर्जेय और दुर्गम है. इन देवों से महान कोई भी
नहीं है. (१)
सूक्त-९ देवता—बृहस्पति
भद्रादधि श्रेयः प्रेहि बृहस्पतिः पुरएता ते अस्तु.
अथेममस्या वर आ पृथिव्या आरेषत्रुं कृणुहि सर्ववीरम्.. (१)
हे वस्त्र, धन आदि का लाभ चाहने वाले पुरुष! तू उत्तरोतर कल्याणकारी संपत्ति प्राप्त
कर. लाभ के हेतु जाते हुए तेरे आगेआगे बृहस्पति चलें. हे बृहस्पति! तुम पृथ्वी के उस उत्तम
स्थान पर इस पुरुष को स्थापित करो, जहां धन आदि लाभ प्राप्त हों. इस के सभी पुत्र, पौत्र
आदि वीर हों एवं इस के शत्रु इस से दूर रहें. (१)
सूक्त-१० देवता—पूषा
प्रपथे पथामजनिष्ट पूषा प्रपथे दिवः प्रपथे पृथिव्याः.
उभे अभि प्रियतमे सधस्ते आ च परा च चरति प्रजानन्.. (१)
मार्ग रक्षक सूर्य देव, मार्गों के आरंभ में रक्षा करने के लिए उपस्थित होते हैं. सूर्य देव
पृथ्वी एवं आकाश के प्रवेश द्वार में उपस्थित होते हैं. अत्यधिक प्रेम करने वाले एवं परस्पर
एक साथ स्थित धरती और आकाश दोनों को लक्षित कर के यजमानों द्वारा किए गए कर्म
और उस का फल जानते हुए सूर्य आकाश से पृथ्वी पर आते हैं और पृथ्वी से आकाश पर
जाते हैं. (१)
पूषेमा आशा अनु वेद सर्वाः सो अस्माँ अभयतमेन नेषत्.
स्वस्तिदा आघृणिः सर्ववीरो ऽ प्रयुच्छन् पुर एतु प्रजानन्.. (२)
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सब के पोषक सूर्य देव सभी दिशाओं को जानते हैं. वे हमें भयरहित मार्गों से ले चलें.
कल्याण के दाता, दीप्तिपूर्ण एवं पुत्र, पौत्र आदि वीरों से युक्त तथा प्रमाद न करते हुए और
हमें पूर्ण रूप से जानते हुए आगेआगे चलें. (२)
पूषन् तव व्रते वयं न रिष्येम कदा चन. स्तोतारस्त इह स्मसि.. (३)
हे पूषा! अर्थात् सूर्य देव! तुम्हारे यज्ञरूप कर्म में संलग्न हम कभी भी नष्ट न हों. इस
कर्म में हम सदा तुम्हारे स्तुतिकर्ता बनें. (३)
परि पूषा परस्ताद्धस्तं दधातु दक्षिणम्.
पुनर्नो नष्टमाजतु सं नष्टेन गमेमहि.. (४)
पोषक सूर्य देव अधिक दूर देश से भी धन देने के लिए अपना दाहिना हाथ फैलाएं.
हमारा नष्ट हुआ धन पुनः हमारे पास आए. हम अपने नष्ट हुए धन से पुनः मिल जाएं. (४)
सूक्त-११ देवता—सरस्वती
यस्ते स्तनः शशयर्यो मयोभूर्यः सुम्नयुः सुहवो यः सुदत्रः.
येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे कः.. (१)
हे वाणी की देवी सरस्वती! तेरा जो स्तन शिशु का पोषण करता है, सुख प्रदाता है,
दूसरों को सुख देता है, जो सब के द्वारा आह्वान किया जाता है, जो कल्याण के साधन देता
है और जिस के द्वारा समस्त धनों का पोषण होता है, अपने इस प्रकार के स्तन को इस
जन्मगृहीत करने वाले बालक के पीने योग्य बनाओ. (१)
सूक्त-१२ देवता—सरस्वती
यस्ते पृथु स्तनयित्नुर्य ऋष्वो दैवः केतुर्विश्वमाभूषतीदम्.
मा नो वधीर्विद्युता देव सस्यं मोत वधी रश्मिभिः सूर्यस्य.. (१)
हे देवपर्जन्य! तुम्हारा जो विस्तृत और महान गर्जन करता हुआ वज्र है, जो बाधक, देव
निर्मित एवं अनर्थ ज्ञापक वज्र है, वह इस सारे विश्व को व्याप्त करता है. हे पर्जन्य देव! इस
प्रकार के वज्र से हमारी फसलों का विनाश मत करो, इस के अतिरिक्त सूर्य की किरणों से
हमारी फसलों का विनाश मत होने दो. (१)
सूक्त-१३ देवता—सभा, समिति आदि
सभा च मा समितिश्चावतां प्रजापतेर्दुहितरौ संविदाने.
येना संगच्छा उप मा स शिक्षाच्चारु वदानि पितरः संगतेषु.. (१)
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विद्वानों का समाज एवं संग्राम करने वाले योद्धा जनों का समूह मेरी रक्षा करे. सारे
संसार की सृष्टि करने वाले प्रजापति की वे दोनों पुत्रियां मेरी रक्षा करें. जो मेरी रक्षा के विषय
में एकमत हैं, उन से मैं संगत होऊं तथा विद्वान् मेरे समीप आ कर मुझे शिक्षा दें. हे
सभासदजनो! जो मेरी कही बात का ‘साधुसाधु’ कह कर समर्थन करें, उन के साथ मिल कर
मैं वादविवादों में न्याय युक्त उत्तर दूं. (१)
विद्म ते सभे नाम नरिष्टा नाम वा असि.
ये ते के च सभासदस्ते मे सन्तु सवाचसः.. (२)
हे सभा! मैं तेरे नामों को जानता हूं. तेरा नाम नरिष्टा अर्थात् दूसरों के द्वारा अभिभूत न
होने वाली है. तुझ से संबंधित जो सभासद हैं, वे सब मेरे समान वचन वाले अर्थात् मेरा
अनुमोदन करने वाले हों. (२)
एषामहं समासीनानां वर्चो विज्ञानमा ददे.
अस्याः सर्वस्याः संसदो मामिन्द्र भगिनं कृणु.. (३)
सभा में सामने बैठे हुए इन बोलने वालों के तेज और विज्ञान को मैं स्वीकार करता हूं. हे
इंद्र! मुझे इस समुदाय में स्थित सभा का विजयी बनाओ. (३)
यद् वो मनः परागतं यद् बद्धमिह वेह वा.
तद् व आ वर्तयामसि मयि वो रमतां मनः.. (४)
हे सभासदो! तुम्हारा जो मन हम से हट कर दूर चला गया है तथा जो मन इस विषय से
संबंधित है, मैं तुम्हारे उस मन को अपने अनुकूल करता हूं. तुम्हारा मेरी ओर आया हुआ मन
मेरे अनुकूल चिंतन करे. (४)
सूक्त-१४ देवता—सूर्य
यथा सूर्यो नक्षत्राणामुद्यंस्तेजांस्याददे.
एवा स्त्रीणां च पुंसां च द्विषतां वर्च आ ददे.. (१)
उदय होता हुआ सूर्य जिस प्रकार तारों का प्रकाश छीन लेता है, उसी प्रकार मैं द्वेष
करने वाले स्त्रीपुरुषों के तेज का अपहरण करता हूं. (१)
यावन्तो मा सपत्नानामायन्तं प्रतिपश्यथ.
उद्यन्त्सूर्य इव सुप्तानां द्विषतां वर्च आ ददे.. (२)
शत्रुओं के मध्य में जिन शत्रुओं को मैं युद्ध के लिए आता हुआ देख रहा हूं, उन के तेज
का अपहरण मैं उसी प्रकार करता हूं, जिस प्रकार सूर्य उदय के समय सोने वाले पुरुषों का
तेज छीन लेते हैं. (२)
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सूक्त-१५ देवता—सविता
सूक्त-१५ देवता—सविता
अभि त्यं देवं सवितारमोण्योः कविक्रतुम्.
अर्चामि सत्यसवं रत्नधामभि प्रियं मतिम्.. (१)
धरती और आकाश का निर्माण करने वाले सविता देव की मैं स्तुति करता हूं. ये सविता
देव कमनीय कर्म करने वाले, यथार्थ के प्रेरक, रत्नों को धारण करने वाले एवं सब का प्रिय
करने वाले हैं, इसलिए सब के माननीय हैं. (१)
ऊर्ध्वा यस्यामतिर्भा अदिद्युतत् सवीमनि.
हिरण्यपाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपात् स्वः.. (२)
जिन सविता देव की व्याप्त करने वाली दीप्ति उत्कृष्ट है तथा सारे जगत् को प्रकाशित
करती है उन की आज्ञा होने पर शोभन कर्म वाले ब्रह्मा हाथ में सोना ले कर कल्पना के द्वारा
सुख देने वाले सोम का निर्माण करते हैं. (२)
सावीर्हि देव प्रथमाय पित्र वर्ष्माणमस्मै वरिमणमस्मै.
अथास्मभ्यं सवितर्वार्याणि दिवोदिव आ सुवा भूरि पश्वः.. (३)
हे सविता देव! इस प्रमुख एवं पुष्टि की कामना करने वाले यजमान को पुत्र, पौत्र आदि
संतान की प्रेरणा दो. इस पुष्टि चाहने वाले यजमान को उत्तमता प्रदान करो. हे सविता देव!
इस के पश्चात् हमारे लिए प्रतिदिन वरण करने योग्य फल एवं अधिक मात्रा में पशु प्रदान
करो. (३)
दमूना देवः सविता वरेण्यो दधद् रत्नं दक्षं पितृभ्य आयूंषि.
पिबात् सोमं ममददेनमिष्टे परिज्मा चित् क्रमते अस्य धर्मणि.. (४)
दान देने की इच्छा रखने वाले, श्रेष्ठ एवं सब के प्रेरक सविता देव धन एवं बल प्रदान
करते हुए तथा पूर्वजों के पास से सौ वर्ष की आयु देते हुए निचोड़े गए सोम का पान करें.
पिया हुआ यह सोम सविता देव से संबंधित याग में सविता देव को प्रसन्न करे. सभी ओर
व्याप्त होने वाला वह सोम सविता देव के पेट में निवास करे. (४)
सूक्त-१६ देवता—सविता
तां सवितः सत्यसवां सुचित्रामाहं वृणे सुमतिं विश्ववाराम्.
यामस्य कण्वो अदुहत् प्रपीनां सहस्रधारां महिषो भगाय.. (१)
हे सब के प्रेरक सविता देव! मैं सत्य से अनुमत, इच्छा करने योग्य एवं सब के द्वारा
वरण करने योग्य तुम्हारी कृपा दृष्टि की याचना करता हूं. सविता देव की उस कृपा दृष्टि को
सूक्त-१७ देवता—सविता
कण्व नामक ऋषि ने प्राप्त किया था. वह कृपा दृष्टि अत्यधिक बढ़ी हुई, अनेक धाराओं वाली
तथा सौभाग्यदायिनी थी. (१)
सूक्त-१७ देवता—सविता
बृहस्पते सवितर्वर्धयैनं ज्योतयैनं महते सौभागाय.
संशितं चित् सन्तरं सं शिशाधि विश्व एनमनु मदन्तु देवाः.. (१)
हे बृहस्पति एवं हे सविता देव! सूर्योदय तक सोने वाले इस ब्रह्मचारी और यजमान को
बढ़ाओ. इस यजमान और ब्रह्मचारी को महान सौभाग्य के लिए प्रकाशित करो. व्रत धारण
करने वाले इस को भलीभांति कुशल बनाओ. सभी देव इस यजमान का अनुमोदन करें. (१)
सूक्त-१८ देवता—धाता आदि
धाता दधातु नो रयिमीशानो जगत्स्पतिः.
स नः पूर्णेन यच्छतु.. (१)
सभी साधनों से युक्त एवं जगत् के पालक धाता देव हमारे लिए धन प्रदान करें. वे धाता
देव हमें पूर्ण और समृद्ध करें. (१)
धाता दधातु दाशुषे प्राचीं जीवातुमक्षितात्.
वयं देवस्य धीमहि सुमतिं विश्वराधसः.. (२)
धाता देव हवि देने वाले मुझ यजमान को हमारे अभिमुख आने वाली, जीवनदायिनी
एवं क्षीण न होने वाली सुमति प्रदान करें. हम भी क्षीण न होने वाले धन को धारण करने वाले
धाता देव की अनुग्रह बुद्धि धारण करें. (२)
धाता विश्वा वार्या दधातु प्रजाकामाय दाशुषे दुरोणे.
तस्मै देवा अमृतं सं व्ययन्तु विश्वे देवा अदितिः सजोषाः.. (३)
धाता देव वरण करने योग्य समस्त फलों को धारण करें. वे फल प्राप्ति की इच्छा करने
वाले यजमान के हेतु हों. उस यजमान के लिए इंद्र आदि अमृत प्रदान करें. वे सभी देव एवं
देवमाता अदिति परस्पर मिल कर प्रयत्नशील हों. (३)
धाता रातिः सवितेदं जुषन्तां प्रजापतिर्निधिपतिर्नो अग्निः.
त्वष्टा विष्णु प्रजया संरराणो यजमानाय द्रविणं दधातु.. (४)
सभी कल्याणों के देने वाले धाता, कर्मों के प्रेरक सविता और वेदों के रक्षक प्रजापति,
अग्नि, रूपों के निर्माता त्वष्टा, व्यापक देव विष्णु—ये सभी हमारे हवि को स्वीकार करें एवं
यज्ञ करने वाले यजमान के लिए धन दें. (४)
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सूक्त-१९ देवता—पृथिवी, पर्जन्य
सूक्त-१९ देवता—पृथिवी, पर्जन्य
प्र नभस्व पृथिवि भिन्द्धी ३ दं दिव्यं नभः.
उदनो दिव्यस्य नो धातरीशानो वि ष्या दृतिम्.. (१)
हे पृथ्वी! बादल फसल की वृद्धि के लिए तुझ पर महती वर्षा करेंगे. उस वर्षा के कारण
तू दृढ़ बन. आकाश में उत्पन्न होने वाला यह बादल पृथ्वी को विदीर्ण करे. हे धाता! आकाश
में होने वाले जल का भाग हमें प्रदान करो. तुम वर्षा प्रदान करने में समर्थ मेघरूपी जलपूर्ण
मशक को छोड़ो अर्थात् महती वर्षा करो. (१)
न घ्रंस्तताप न हिमो जघान प्र नभतां पृथिवी जीरदानुः.
आपश्चिदस्मै घृतमित् क्षरन्ति यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम्.. (२)
ग्रीष्म ऋतु हमें संताप न दे और शीत ऋतु हमें कांपने की बाधा न पहुंचाए. अत्यधिक
दान देने वाली पृथ्वी वर्षा से भीग जाए. इस यजमान के लिए जल भी प्रसन्नता कारक हों.
जहां सोम नामक देव हैं, उस देश में सदा ही कल्याण होता है. (२)
सूक्त-२० देवता—प्रजापति, धाता
प्रजापतिर्जनयति प्रजा इमा धाता दधातु सुमनस्यमानः.
संजानानाः संमनसः सयोनयो मयि पुष्टं पुष्टपतिर्दधातु.. (१)
प्रजापति इस पुत्र, पौत्र आदि रूप प्रजा को उत्पन्न करें तथा अनुकूल मन वाले धाता
इस प्रजा का पोषण करें. ये प्रजाएं समान ज्ञान वाली, मिले हुए मन वाली और समान कारण
वाली हों. पुष्टपति नाम के देव मुझे प्रजा विषयक पोषण प्रदान करें. (१)
सूक्त-२१ देवता—अनुमति
अन्वद्य नो ऽ नुमतिर्यज्ञं देवेषु मन्यताम्.
अग्निश्च हव्यवाहनो भवतां दाशुषे मम.. (१)
सभी कर्मों की अनुमति देने वाली पौर्णमासी की देवी हमारा यज्ञ इस समय देवों को
बताएं. अग्नि देव भी मुझ यजमान की हवि देवों को प्राप्त कराने वाले हों. (१)
अन्विदनुमते त्वं मंससे शं च नस्कृधि.
जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि ररास्व नः.. (२)
हे अनुमति नामक देवी! तुम हमें अनुमति दो तथा हमें सुख प्राप्त कराओ. तुम सामने
आ कर अग्नि में डाला हुआ हमारा हवि स्वीकार करो. हे देवि! पुत्र, पौत्र आदि रूप हमारी
प्रजा की रक्षा करो. (२)
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अनु मन्यतामनुमन्यमानः प्रजावन्तं रयिमक्षीयमाणम्.
तस्य वयं हेडसि मा ऽ पि भूम सुमृडीके अस्य सुमतौ स्याम.. (३)
हे अनुमति नामक देवी! मुझे पुत्र, पौत्र आदि से युक्त एवं कभी समाप्त न होने वाले धन
को प्राप्त कराओ. हम तेरे क्रोध के विषय न बनें. हम इस अनुमति देवी की सुख देने वाली
और अनुग्रह करने वाली बुद्धि में रहें. (३)
यत् ते नाम सुहवं सुप्रणीते ऽ नुमते अनुमतं सुदानु.
तेना नो यज्ञं पिपृहि विश्ववारे रयिं नो धेहि सुभगे सुवीरम्.. (४)
हे यजमानों को धन देने वाली सुप्रणीति देवी एवं हे अनुमति! हमारे यज्ञ को इस प्रकार
पूर्ण करो कि तुम्हारा हवन सिद्ध हो सके. यह प्रसन्न करने योग्य एवं अभिमत फल देने वाला
है. (४)
एमं यज्ञमनुमतिर्जगाम सुक्षेत्रतायै सुवीरतायै सुजातम्.
भद्रा ह्यस्याः प्रमतिर्बभूव सेमं यज्ञमवतु देवगोपा.. (५)
अनुमति देवी हमारे द्वारा दिए जाते हुए यज्ञ में आएं. वे हमें उत्तम फल देने वाली हों. हे
विश्वधारा तथा हे सुभगा अनुमति! हमें उत्तम संतान वाला धन प्रदान करो. (५)
अनुमतिः सर्वमिदं बभूव यत् तिष्ठति चरति यदु च विश्वमेजति.
तस्यास्ते देवि सुमतौ स्यामानुमते अनु हि मंससे नः.. (६)
अनुमति देवी ही यह सारा दिखाई देता हुआ संसार है. वह जगत् में स्थावर, जंगम
आदि के रूप में वर्तमान है एवं बिना विचारे ज्येष्ठता करती हैं. यह सारा संसार बुद्धिपूर्वक
चेष्टा करता है. हे अनुमति देवी! हम तेरी अनुग्रह बुद्धि में हों. हे अनुमति! तुम हमें अनुमति
दो. (६)
सूक्त-२२ देवता—आत्मा
समेत विश्वे वचसा पतिं दिव एको विभूरतिथिर्जनानाम्.
स पूर्व्यो नूतनमाविवासत् तं वर्तनिरनु वावृत एकमित् पुरु.. (१)
हे सब बांधवो! आकाश के स्वामी सूर्य की स्तुति मंत्रों के द्वारा करो. वे सूर्य प्राणियों के
मुख्य स्वामी एवं नित्य चलते रहने वाले हैं. वे पुरातन सूर्य इस नूतन पुरुष की सेवा करें. बहुत
से सत्कर्म उस एकमात्र सूर्य के मार्ग का अनुवर्तन करते हैं. (१)
सूक्त-२३ देवता—ब्रध्न
अयं सहस्रमा नो दृशे कवीनां मतिर्ज्योतिर्विधर्मणि.. (१)
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यह दिखाई देता हुआ सूर्य हजार वर्ष तक हमें दिखाई देता रहे. क्रांतदर्शी पुरुषों के द्वारा
मनन करने योग्य, सब को अपनेअपने कर्मों में लगाने वाले ये सूर्य हमें प्रतिदिन सत्कर्म करने
की प्रेरणा देते रहें. (१)
ब्रध्नः समीचीरुषसः समैरयन्.
अरेपसः सचेतसः स्वसरे मन्युमत्तमाश्रिते गोः.. (२)
पाप रहित, समान ज्ञान वाले एवं दिन के समय अतिशय दीप्तिशाली सूर्य हमें पूजा
आदि कर्मों में प्रेरित करें. (२)
सूक्त-२४ देवता—दुःस्वप्न विनाश
दौष्वप्न्यं दौर्जीवित्यं रक्षो अभवमराय्यः.
दुर्नाम्नीः सर्वा दुर्वाचस्ता अस्मन्नाशयामसि.. (१)
व्याधि दिखाने वाले बुरे सपने को, राक्षसों को, टोनेटोटके से उत्पन्न भीषण भय को,
पिशाचियों को तथा दरिद्रता को हम इस होने वाले टोटके से ग्रस्त पुरुष से दूर करते हैं. (१)
सूक्त-२५ देवता—सविता
यन्न इन्द्रो अखनद् यदग्निर्विश्वे देवा मरुतो यत् स्वर्काः.
तदस्मभ्यं सविता सत्यधर्मा प्रजापतिरनुमतिर्नि यच्छात्.. (१)
परम ऐश्वर्य वाले इंद्र देव ने हमारे लिए जो फल दिया तथा अग्नि, विश्वे देव, मरुद्गण
और स्वका नामक देवों ने हमारे लिए जो फल दिया. सब के प्रेरक सविता और यथार्थ नाम
वाले प्रजापति ने जिस फल की अनुमति दी. वह फल हमें प्राप्त हो. (१)
सूक्त-२६ देवता—विष्णु
ययोरोजसा स्कभिता रजांसि यौ वीर्यैर्वीरतमा शविष्ठा.
यौ पत्येते अप्रतीतौ सहोभिर्विष्णुमग्न् वरुणं पूर्वहूतिः.. (१)
जिन विष्णु और वरुण के बल के द्वारा पृथ्वी आदि स्थान दृढ़ किए गए हैं, जो विष्णु
और वरुण अपने वीरतापूर्ण कर्मों के द्वारा अतिशय शक्तिशाली ऐश्वर्य प्राप्त कर चुके हैं, उन
विष्णु और वरुण को सभी देवों से पहले किया गया आह्वान प्राप्त हो. (१)
यस्येदं प्रदिशि यद् विरोचते प्र चानति वि च चष्टे शचीभिः.
पुरा देवस्य धर्मणा सहोभिर्विष्णुमग्न् वरुणं पूर्वहूतिः.. (२)
विष्णु और वरुण की आज्ञा में यह जगत् विशेष रूप से दीप्त है, सांस लेता है और
सूक्त-२७ देवता—विष्णु
अपनेअपने कार्यों का फल देखता है. इस के अतिरिक्त जगत् को प्रकाशित करने वाले विष्णु
और वरुण के धारक कर्म और बलों के साथ प्राचीन काल में चेष्टा करता था. इस प्रकार के
विष्णु और वरुण को फल चाहने वाले लोग अपने प्रथम आह्वान से जोड़ें. (२)
सूक्त-२७ देवता—विष्णु
विष्णोर्नु कं प्र वोचं वीर्याणि यः पार्थिवानि विममे रजांसि.
यो अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः.. (१)
मैं उन विष्णु के किन वीरतापूर्ण कर्मों का वर्णन करूं, जिन्होंने पृथ्वी के रूप में लोकों
का निर्माण किया है. विष्णु ने इस से भी ऊंचे स्तर के स्थान स्वर्ग को धारण किया है.
महापुरुषों द्वारा स्तुति किए गए विष्णु ने पृथ्वी, अंतरिक्ष और आकाश में चरण रखते हुए यह
निर्माण किया है. (१)
प्र तद् स्तवते वीर्याणि मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः.
परावत आ जगम्यात् परस्याः.. (२)
वीरतापूर्ण कर्मों के कारण विष्णु की स्तुति की जाती है. विष्णु सिंह के समान भयानक,
भूमि पर विचरण करने वाले एवं पर्वत में स्थित हैं. वे विष्णु मेरी स्तुति सुन कर दूर देश से भी
यहां आएं. (२)
यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वाधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा.
उरु विष्णो वि क्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि.
घृतं घृतयोने पिब प्रप्र यज्ञपतिं तिर.. (३)
उन विष्णु के तीन विस्तृत चरण विक्षेपों में सभी भुवन एवं प्राणी निवास करते हैं. हे
व्यापक विष्णु! तीनों लोकों में अपने तीन चरण रखने का पराक्रम करो तथा हमारे निवास
स्थान को धन संयुक्त बनाओ. हे घृत के कारण रूप विष्णु! यह हवन किया जाता हुआ घृत
पियो तथा यज्ञ के स्वामी यजमान की वृद्धि करो. विष्णु ने इस विश्व में विक्रम का प्रदर्शन
किया है. उन्होंने तीन बार अपने चरण स्थापित किए हैं. इन विष्णु के तीन चरण विक्षेपों में
सारा विश्व स्थापित है. (३)
इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदा. समूढमस्य पांसुरे.. (४)
सब के रक्षक और दूसरों के द्वारा पराजित न होने वाले विष्णु ने इस पृथ्वीलोक से
आरंभ कर के प्राणियों को धारण करने वाले तीनों लोक धारण किए. (४)
त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः. इतो धर्माणि धारयन्.. (५)
हे स्तोताओ! सर्व व्यापक विष्णु देव के उन कर्मों को देखो, जिन कर्मों के द्वारा उन्होंने
तुम्हारे कर्मों का स्पर्श किया. ये विष्णु इंद्र देव के योग्य सखा हैं. (५)
विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (६)
व्यापक विष्णु देव के उत्तम स्थान को मेधावी लोग देखते हैं. उन का स्थान आकाश में
सूर्य मंडल के समान विस्तृत है. (६)
तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः. दिवीव चक्षुराततम्.. (७)
हे विष्णु देव! पृथ्वी एवं द्युलोक से भी महान किसी अन्य लोक से अर्थात् विस्तीर्ण
अंतरिक्ष से लाए हुए बहुत से धनों से अपने हाथों को पूर्ण करो. इस के पश्चात हमारे सामने
आ कर अपने दाहिने और बाएं हाथों से हमें अधिक धनराशि प्रदान करो. (७)
दिवो विष्ण उत वा पृथिव्या महो विष्ण उरोरन्तरिक्षात्.
हस्तौ पृणस्व बहुभिर्वसव्यैराप्रयच्छ दक्षिणादोत सव्यात्.. (८)
हे विष्णु देव! आप अपने दोनों हाथों के द्वारा द्युलोक, भूलोक और अंतरिक्ष लोक से
हमें बहुत से साधन प्रदान करो. (८)
सूक्त-२८ देवता—इडा
इडैवास्मां अनु वस्तां व्रतेन यस्याः पदे पुनते देवयन्तः.
घृतपदी शक्वरी सोमपृष्ठोप यज्ञमस्थित वैश्वदेवी.. (१)
गहन रूपा इडा ही हमारे द्वारा किए जाते हुए यह कर्मों को फल देने वाला बनाएं. उस
इडा के चरणों में देवों की कामना करने वाले यजमान अपनेआप को पवित्र करते हैं. हम
जहांजहां चरण रखें वहांवहां घृत टपकाने वाली, फल देने में समर्थ एवं पीठ पर सोम लिए
हुए इडा नाम की बहन हमारे यज्ञ को विस्तृत करें. (१)
सूक्त-२९ देवता—झंडा
वेदः स्वस्तिर्दुघणः स्वस्तिः परशुर्वेदिः परशुर्नः स्वस्ति.
हविष्कृतो यज्ञिया यज्ञकामास्ते देवासो यज्ञमिमं जुषन्ताम्.. (१)
वेद (दर्भ समूह) हमारे लिए अविनाश का कारण बने. पेड़ काटने के काम आने वाली
कुल्हाड़ी हमारा कल्याण करे. घास काटने का साधन वेदि अर्थात् खुरपी तथा परशु हमारा
कल्याण करे. हवि का निर्माण करने वाले, यज्ञ के योग्य एवं यज्ञ की कामना करते हुए मुझ
यजमान का यज्ञ वे देव स्वीकार करें. (१)
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सूक्त-३० देवता—अग्नि, विष्णु
सूक्त-३० देवता—अग्नि, विष्णु
अग्नाविष्णू महि तद् वां महित्वं पाथो घृतस्य गुह्यस्य नाम.
दमेदमे सप्त रत्ना दधानौ प्रति वां जिह्वा घृतमा चरण्यत्.. (१)
हे अग्नि और विष्णु! तुम दोनों कहे जाते हुए माहात्म्यपूर्ण, महान गोपनीय, और
टपकने वाले घृत को पियो. अग्नि और विष्णु प्रत्येक यज्ञशाला में रत्न धारण करते हैं. तुम
दोनों की जिह्वा हवन में डाले गए घृत को सामने आ कर प्राप्त करे. (१)
अग्नाविष्णू महि धाम प्रियं वां वीथो घृतस्य गुह्या जुषाणौ.
दमेदमे सुष्टुत्या वावृधानौ प्रति वां जिह्वा घृतमुच्चरण्यात्.. (२)
हे अग्नि और विष्णु! तुम दोनों का तेज महान एवं सब को प्रसन्न करने वाला है. तुम
दोनों, घृत के चरु, पुरोडाश आदि रूपों का भक्षण करो. परस्पर प्रसन्न होते हुए तुम दोनों
सभी यजमानों के घरों में शोभन स्तुति से बढ़ते हुए अपनी जिह्वाओं से घृत का भक्षण करो.
(२)
सूक्त-३१ देवता—द्यावा, पृथ्वी, मित्र,
बृहस्पति
स्वाक्तं मे द्यावापृथिवी स्वाक्तं मित्रो अकरयम्.
स्वाक्तं मे ब्रह्मणस्पतिः स्वाक्तं सविता करत्.. (१)
धरती और आकाश मेरे यज्ञ के बलिदान वाले खंबे अर्थात् यूप को भलीभांति रंगें.
दिखाई देते हुए ये सूर्य यज्ञ के यूप को रंगें. मंत्र का पालन करने वाले देव मेरे यूप को रंगें. सब
के प्रेरक सविता देव इस यूप को रंगा हुआ बनाएं. (१)
सूक्त-३२ देवता—इंद्र
इन्द्रोतिभिर्बहुलाभिर्नो अद्य यावच्छ्रेष्ठाभिर्मघवञ्छूर जिन्व.
यो नो द्वेष्ट्यधरः सस्पदीष्ट यमु द्विष्मस्तमु प्राणो जहातु.. (१)
हे इंद्र! आज बहुत सी रक्षाओं अर्थात् रक्षा साधनों के द्वारा हमारा पालन करो. हे
धनवान एवं शौर्य संपन्न इंद्र! प्रशंसनीय रक्षा साधनों के द्वारा हमें पूर्णतया प्रसन्न करो. जो
शत्रु हम से द्वेष करते हैं, वे अधोमुख हो कर गिरें. जिस शत्रु से हम द्वेष करते हैं, उसे तुम्हारा
प्राण त्याग दे. (१)
सूक्त-३३ देवता—आयु
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सूक्त-३४ देवता—पूषा
उप प्रियं पनिप्रतं युवानमाहुतीवृधम्.
अगन्म बिभ्रतो नमो दीर्घमायुः कृणोतु मे.. (१)
सब को प्रसन्न करने वाले, स्तुति किए जाते हुए, नित्य तरुण एवं घृत की आहुतियों से
बढ़ने वाले अग्नि देव को हम नमस्कार एवं हविरूप अन्न ले कर मिलें. वे मेरी और मेरे
विद्यार्थी की आयु १०० वर्ष करें. (१)
सूक्त-३४ देवता—पूषा
सं मा सिञ्चन्तु मरुतः सं पूषा सं बृहस्पतिः.
सं मायमग्निः सिञ्चतु प्रजया च धनेन च दीर्घमायुः कृणोतु मे.. (१)
मरुत् आदि देवगण मुझ फल चाहने वाले यजमान को पुत्र आदि रूप प्रजा से और धन
से युक्त करें. अग्नि मेरे विद्यार्थी की आयु लंबी करें. (१)
सूक्त-३५ देवता—जातवेद
अग्ने जातान् प्र णुदा मे सपत्नान् प्रत्यजाताञ्जातवेदो नुदस्व.
अधस्पदं कृणुष्व ये पृतन्यवोऽनागसस्ते वयमदितये स्याम.. (१)
हे अग्नि! मेरे उत्पन्न शत्रुओं को मुझ से बहुत दूर जाने की प्रेरणा दो. हे जातवेद अग्नि!
मेरे जो शत्रु उत्पन्न नहीं हुए हैं, उन का विनाश करो. जो शत्रु सेना ले कर मुझ से युद्ध करने
के इच्छुक हैं. उन्हें अपने पैरों के नीचे कुचल दो. हे खंड न करने योग्य पृथ्वी अथवा अदीना
देवमाता! हम पापरहित हो कर तुम्हारे कृपा पात्र बनें. (१)
सूक्त-३६ देवता—जातवेद
प्रान्यान्त्सपत्नान्त्सहसा सहस्व प्रत्यजाताञ्जातवेदो नुदस्व.
इदं राष्ट्रं पिपृहि सौभगाय विश्व एनमनु मदन्तु देवाः.. (१)
हे अग्नि! मेरे उत्पन्न शत्रुओं को बहुत दूर भगा दो. हे उत्त्पन्नों को जानने वाले अग्नि देव!
मेरे ऐसे शत्रुओं का विनाश करो, जिन्हें मैं नहीं जानता. हमारे इस राष्ट्र को तुम सौभाग्य से
पूर्ण करो. सभी देव शत्रु विनाश का प्रयोग करने वाले इस यजमान को प्रसन्न करें. (१)
इमा यास्ते शतं हिराः सहस्रं धमनीरुत.
तासां ते सर्वासामहमश्मना बिलमप्यधाम्.. (२)
हे मुझ से विद्वेष करने वाली स्त्री! तेरी जो गर्भधारण संबंधी सौ से अधिक नाड़ियां हैं
तथा हजार धमनियां हैं, मैं उन सब का मुख पत्थर से ढक कर तुझे बांझ बनाता हूं. (२)
परं योनेरवरं ते कृणोमि मा त्वा प्रजाभि भून्मोत सूनुः.
अस्वं १ त्वाप्रजसं कृणोम्यश्मानं ते अपिधानं कृणोमि.. (३)
हे मेरे प्रतिकूल रहने वाली नारी! मैं तेरी योनि के भीतर वाले स्थान अर्थात् गर्भाशय को
गर्भ धारण के अयोग्य बनाता हूं. इसीलिए तुझे कन्या रूपी संतान भी प्राप्त न हो. तुझे पुत्र
संतान भी न मिले. मैं तुझे खच्चरी के समान संतान रहित बनाता हूं. मैं तेरे गर्भाशय को
पत्थर से ढकता हूं. (३)
सूक्त-३७ देवता—अक्षि, मन
अक्ष्यौ नौ मधुसंकाशे अनीकं नौ समञ्जनम्.
अन्तः कृणुष्व मां हृदि मन इन्नौ सहासति.. (१)
हे पत्नी! मेरी और तेरी आंखें शहद के समान मधुर हों अर्थात् हम एकदूसरे के प्रति
अनुरक्त हों. हमारी आंखों का अग्रभाग काजल से युक्त हो. तू मुझे हृदयंगम कर अर्थात् ऐसा
प्रयत्न कर, जिस से मैं तेरा प्रिय बन सकूं. हम दोनों का मन समान कार्य करने वाला हो. (१)
सूक्त-३८ देवता—वस्त्र
अभि त्वा मनुजातेन दधामि मम वाससा.
यथा ऽ सो मम केवलॊ नान्यासां कीर्तयाश्चन.. (१)
स्त्री अपने पति से कहती है—हे पति! मैं तुम को अपने मंत्र से युक्त वस्त्र से बांधती हूं.
इस प्रकार तुम केवल मेरे ही हो सकोगे तथा दूसरी नारियों का नाम भी नहीं लोगे. (१)
सूक्त-३९ देवता—वनस्पति
इदं खनामि भेषजं मां पश्यमभिरोरुदम्. परायतो निवर्तनमायतः
प्रतिनन्दनम्.. (१)
मैं वश में करने वाली इस सौवर्चा नामक जड़ी को खोदता हूं. यह मेरे पति को मेरे
अनुकूल बनाए और मेरे पति का अन्य नारियों से संबंध रोके. यह जड़ी मुझे छोड़ कर जाते
हुए पति को वापस लाए तथा मेरी ओर आते हुए पति को आनंदित करे. (१)
येना निचक्र आसुरीन्द्रं देवेभ्यस्परि.
तेना नि कुर्वे त्वामहं यथा ते ऽ सानि सुप्रिया.. (२)
असुरों की माया ने जिस जड़ी के बल से इंद्र के अतिरिक्त सभी देवों को युद्ध में अपने
अधीन किया था, हे पति! उसी जड़ी के द्वारा मैं तुझे अपने वश में करती हूं. मैं ऐसा इसीलिए
करती हूं, जिस से मैं तेरी असाधारण प्यारी हो सकूं. (२)
प्रतीची सोममसि प्रतीच्युत सूर्यम्.
प्रतीची विश्वान् देवान् तां त्वा ऽ च्छावदामसि.. (३)
हे शंखपुष्पी नामक जड़ी! तू वशीकरण के निमित्त सोम के सम्मुख होती है. तू सब के
प्रेरक सूर्य के भी सम्मुख होती है. अधिक कहने से क्या लाभ, तू सभी देवों के सम्मुख होती
है. मैं अपने पति को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए तेरी स्तुति करती हूं. (३)
अहं वदामि नेत् त्वं सभायामह त्वं वद.
ममेदसस्त्वं केवलो नान्यासां कीर्तयाश्चन.. (४)
पति के वशीकरण के लिए जड़ीबूटी पा कर नारी अपने पति से कहती है—हे पति!
आओ. अब मैं ही बोलूंगी. तुम कभी मत बोलना. तुम केवल विद्वानों की सभा में बोलना. हे
पति! तुम केवल मेरे ही रहोगे, अन्य नारियों के नहीं. (४)
यदि वासि तिरोजनं यदि वा नद्यस्तिरः.
इयं ह मह्यं त्वामोषधिर्बद्ध्वेव न्यानयत्.. (५)
हे पति! यदि तुम मेरी दृष्टि से ओझल हो जाओगे अथवा मुझ से दूर नदी के पार चले
जाओगे, तब भी यह शंखपुष्पी नामक जड़ी पति से प्रेम करने वाली मेरे समीप तुम्हें इस
प्रकार लाएगी, जैसे किसी को बांध कर लाया जाता है. (५)
सूक्त-४० देवता—मंत्रों में बताए गए छंद
दिव्यं सुपर्णं पयसं बृहन्तमपां गर्भं वृषभमोषधीनाम्.
अभीपतो वृष्ट्या तर्पयन्तमा नो गोष्ठे रयिष्ठां स्थापयति.. (१)
हे इंद्र! हमारी गोशाला में दिव्य, शोभन गति वाले, जल से पूर्ण, महान जलों के मध्य
रहने वाले, जड़ीबूटियों की वृद्धि के लिए वर्षा करने वाले, सभी ओर से जलों से संगत एवं
सारे संसार को वर्षा से तृप्त करने वाले सारस्वत नामक देव को स्थापित करो. वे सदा धन
वाले प्रदेश में ठहरते हैं. (१)
सूक्त-४१ देवता—सरस्वान
यस्य व्रतं पशवो यन्ति सर्वे यस्य व्रत उपतिष्ठन्त आपः.
यस्य व्रते पुष्टपतिर्निविष्टस्तं सरस्वन्तमवसे हवामहे.. (१)
समस्त पशु अपनी पुष्टि के निमित्त जिस के कर्म का अनुगमन करते हैं, जिस के कर्म में
जल आपस में मिलते हैं तथा जिस के कर्म के अधीन पोषण के स्वामी हैं, उन सरस्वान देव
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की तृप्ति के लिए हम उन का आह्वान करते हैं. (१)
आ प्रत्यञ्चं दाशुषे दाश्वंसं सरस्वन्तं पुष्टपतिं रयिष्ठाम्.
रायस्पोषं श्रवस्युं वसाना इह हुवेम सदनं रयीणाम्.. (२)
सामने हो कर प्रसन्न करने के लिए हम हवि देने वाले यजमान को मनचाहा फल देने
वाले, पोषण के स्वामी, धन के स्थान पर ठहरने वाले एवं धन के पोषक सरस्वान देव को
सेवा के निमित्त बुलाते हैं. (२)
सूक्त-४२ देवता—श्येन
अति धन्वान्यत्यपस्ततर्द श्येनो नृचक्षा अवसानदर्श:.
तरन् विश्वान्यवरा रजांसीन्द्रेण सख्या शिव आ जगम्यात्.. (१)
मनुष्यों के सभी कर्मों के साक्षी एवं अंत में आकाश में दिखाई देने वाले सूर्य मरुस्थल
को पार कर के अत्यधिक जलपूर्ण करें. वे आकाश से नीचे स्थित समस्त लोकों को पार
करते हुए अपने मित्र इंद्र के साथ कल्याणकारी बन कर नवीन गृह निर्माण के स्थान में आएं.
(१)
श्येनो नृचक्षा दिव्यः सुपर्णः सहस्रपाच्छतयोनिर्वायोधाः.
स नो नि यच्छाद् वसु यत् पराभूतमस्माकमस्तु पितृषु स्वधावत्.. (२)
मनुष्यों के सभी कर्मों को देखने वाले, दिव्य एवं शोभन गति वाले, हजार किरणों वाले,
असंख्य कार्यों के कारण एवं अन्न के दाता सूर्य हमें चिरकाल तक स्थापित करें. हमारा जो
धन चोरों ने चुरा लिया है, वह हमारे पितरों के निमित्त स्वधा के रूप में हो. (२)
सूक्त-४३ देवता—सोम
सोमारुद्रा वि वृहतं विषूचीममीवा या नो गयमाविवेश.
बाधेथां दूरं निर्ऋतिं पराचैः कृतं चिदेनः प्र मुमुक्तमस्मत्.. (१)
हे सोम एवं रुद्र देव! सभी ओर फैलने वाले उस अमीवा नामक रोग का विनाश करो जो
हमारे शरीर में प्रवेश कर गया है. इस के अतिरिक्त अमीवा रोग का कारण बनी हुई पिशाची
को विमुख कर के दूर ले जाओ, जिस से वह हमारे पास न आ सके. हमारे द्वारा किए हुए
पाप को भी हम से दूर करो. (१)
सोमारुद्रा युवमेतान्यस्मद् विश्वा तनूषु भेषजानि धत्तम्.
अव स्यतं मुञ्चतं यन्नो असत् तनूषु बद्धं कृतमेनो अस्मत्.. (२)
हे सोम एवं रुद्र देव! तुम दोनों हमारे शरीरों में रोगों को निकालने वाली जड़ीबूटियों को
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सूक्त-४४ देवता—वाक्
स्थापित करो. हमारे शरीरों में स्थित हमारे द्वारा किया हुआ जो पाप है, उसे भी हम से अलग
करो और नष्ट कर दो. (२)
सूक्त-४४ देवता—वाक्
शिवास्त एका अशिवास्त एकाः सर्वा बिभर्षि सुमनस्यमानः.
तिस्रो वाचो निहिता अन्तरस्मिन् तासामेका वि पपातानु घोषम्.. (१)
हे अकारण निंदित पुरुष! तेरे विषय में कुछ वाणियां स्तुति रूपा एवं कल्याणी हैं तथा
कुछ वाणियां तेरे विषय में निंदापूर्ण हैं. सौमनस्य का आचरण करती हुई इन दो प्रकार की
वाणियों के अतिरिक्त तीन वाणियां अर्थात् परा, पश्यंती और मध्यमा-इस शब्द प्रयोग में
शरीर के भीतर छिपी रहती हैं. केवल एक अर्थात् वैखरी वाणी ध्वनि के रूप में निकलती है.
(१)
सूक्त-४५ देवता—इंद्र
उभा जिग्यथुर्न परा जयेथे न परा जिग्ये कतरश्चनैनयोः.
इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम्.. (१)
हे इंद्र और विष्णु! तुम दोनों सर्वदा विजयी बनो और किसी से कभी पराजित न होओ.
इन दोनों में से एक भी दूसरे से पराजित नहीं होता. हे इंद्र और विष्णु! तुम दो असुरों के साथ
जिस वस्तु की स्पर्धा करते हो, वह वस्तु लोक, वेद और वाणी के रूप में स्थित हो कर हजारों
से भी बढ़कर हो. (१)
सूक्त-४६ देवता—ईर्ष्या
जनाद् विश्वजनीनात् सिन्धुतस्पर्याभृतम्.
दूरात् त्वा मन्य उद्भृतमीर्ष्याया नाम भेषजम्.. (१)
ईर्ष्या समाप्त करने वाली जड़ीबूटी को संबोधित कर के कहा जा रहा है— सभी जनों
के हितकारक जनपद से तथा सागर से लाई हुई को एवं दूर देश से उखाड़ कर लाई तुझ,
सक्तुमंथ नामक जड़ीबूटी को मैं क्रोध का निवारण करने वाली मानता हूं. (१)
सूक्त-४७ देवता—ईर्ष्या
अग्नेरिवास्य दहतो दावस्य दहतः पृथक्.
एतामेतस्येष्यार्मुदग्निमिव शमय.. (१)
जिस प्रकार अग्नि वस्तुओं को जलाती है, उसी प्रकार क्रोध के कारण मेरे कार्य
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सूक्त-४८ देवता—सिनीवाली
बिगाड़ने वाले तथा दावाग्नि के जलाने के समान क्रोध करते हुए सामने वाले पुरुष को मेरे
विषय में प्रयोग की जाती हुई ईर्ष्या को इस प्रकार शांत करो, जिस प्रकार शीतल जल डालने
से अग्नि शांत कर दी जाती है. (१)
सूक्त-४८ देवता—सिनीवाली
सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानाम्सि स्वसा.
जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि दिदिड्ढि नः.. (१)
हे सिनीवाली! अर्थात् ऐसी अमावस्या! जिस में चंद्रमा दिखाई नहीं देता है, तू बहुत से
जनों द्वारा स्तुति की गई एवं देवों की बहन है. तू सामने डाले गए हव्य को स्वीकार कर तथा
हमारे लिए पुत्र आदि के रूप में प्रजा प्रदान कर. (१)
या सुबाहुः स्वङगुरिः सुषूमा बहुसूवरी.
तस्यै विशपत्न्यै हविः सिनीवाल्यै जुहोतन.. (२)
हे सिनीवाली! तू सुंदर हाथ वाली, शोभन उंगलियों वाली, सुंदर प्रसव वाली तथा बहुत
सी प्रजाओं को जन्म देने वाली है. हे ऋत्विजो तथा यजमानो! प्रजाओं का पालन करने
वाली उस सिनीवाली के लिए हवि दो. (२)
या विशपत्नीन्द्रमसि प्रतीची सहस्त्रस्तुकाभियन्ती देवी.
विष्णो पत्नि तुभ्यं राता हवींषिपतिं देवि राधसे चोदयस्व.. (३)
जो सिनीवाली प्रजाओं का पालन करने वाली तथा परमैश्वर्य संपन्न इंद्र के सामने खड़ी
होने वाली है तथा हजारों स्तोताओं द्वारा प्रशंसित एवं प्रकाशित होने वाली है. हे विष्णु
अथवा इंद्र की पत्नी! तेरे लिए हवि दी गई है. हे देवी! तू प्रसन्न हो कर अपने पति इंद्र को हमें
धन देने के लिए प्रेरित कर. (३)
सूक्त-४९ देवता—कुहू
कुहूं देवीं सुकृतं विद्मनापसमस्मिन् यज्ञे सुहवा जोहवीमि.
सा नो रयिं विश्ववारं नि यच्छाद् ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम्.. (१)
कुहू अथवा चंद्रमा दिखाई न देने वाली अमावस्या देवी को मैं इस यज्ञ में बुलाता हूं
अथवा हवि से होम करता हूं. शोभन कर्म करने वाली, विदित कर्मों वाली एवं शोभन आह्वान
वाली वह अमावस्या हमें सब के द्वारा वरणीय धन दे तथा अधिक धन देने वाला, प्रशंसनीय
एवं वीर पुत्र प्रदान करे. (१)
कुहूर्देवानाम्मृतस्य पत्नी हव्या नो अस्य हविषो जुषेत.
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