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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

नव भूमीः समुद्रा उच्छिष्टे ऽ धि श्रिता दिवः. आ सूर्यो भात्युच्छिष्टे ऽ होरात्रे अपि तन्मयि.. (१४) नौ खंडों वाली पृथ्वी, सात सागर तथा स्वर्ग यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित है. सूर्य और रात दिन भी उच्छिष्ट अर्थात् यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. ये सभी मेरे द्वारा हों. (१४) उपहव्यं विषूवन्तं ये च यज्ञा गुहा हिताः. बिभर्ति भर्ता विश्वस्योच्छिष्टो जनितुः पिता.. (१५) उपहव्य, विषूवान नाम के सोमयाग तथा जो सोमयाग ज्ञात नहीं है, विश्व का भरणपोषण करने वाला तथा सवनयज्ञ का अनुष्ठान करने वाले का पालनकर्ता यज्ञशेष रूपी ब्रह्म है. (१५) पिता जनितुरुच्छिष्टो ऽ सोः पौत्रः पितामहः. स क्षियति विश्वस्येशानो वृषा भूम्यामत्तिघ्न्यः.. (१६) यज्ञशेष रूपी ब्रह्म अपने को उत्पन्न करने वाले का पिता है. यह भात प्राण वायु का पौत्र और पितामह है. विश्व का स्वामी और कामनाएं पूर्ण करने वाला वह सब को अतिक्रमण कर के भूमि पर निवास करता है. (१६) ऋतं सत्यं तपो राष्ट्रं श्रमो धर्मश्च कर्म च. भूतं भविष्यदुच्छिष्टे वीर्यं लक्ष्मीर्बलं बले.. (१७) ऋत, सत्य, तप, राष्ट्र, श्रम, धर्म, कर्म, भूतकाल, भविष्यकाल, वीर्य, लक्ष्मी और बल यज्ञशेष रूपी बल में आश्रित है. (१७) समृद्धिदोज आकूतिः क्षत्रं राष्ट्रं षडुर्व्यः. संवत्सरो ऽ ध्युच्छिष्ट इडा प्रैषा ग्रहा हविः.. (१८) समृद्धि, ओज, आकूति अर्थात् मन चाहे फल संबंधी संकल्प, क्षत्रिय का तेज, राष्ट्र, छह पृथिवियां, संवत्सर, इडा नाम की देवी, यज्ञ कर्मों में ऋत्विजों के प्रेरक मंत्र, गृह और हवि ये सभी यज्ञ शेषरूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (१८) चतुर्होतार आप्रियश्चातुर्मास्यानि नीविदः. उच्छिष्टे यज्ञा होत्राः पशुबन्धास्तदिष्टयः.. (१९) चतुर्होत्र नाम के मंत्र, पशुयाग संबंधी मंत्र, चार मासों में किए जाने वाले चार पर्व, स्तुति संबंधी देव के उत्कर्ष को बताने वाले मंत्र, नीविद, यज्ञ, होता, इष्टियां—ये सब यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*

अर्धमासाश्च मासाश्चार्तवा ऋतुभिः सह. उच्छिष्टे घोषिणीरापः स्तनयित्नुः श्रुतिर्मही.. (२०) आधा महीना अर्थात् पक्ष, महीने, ऋतुओं के साथ उन में उत्पन्न होने वाले पदार्थ, शब्द करने वाले जल, गर्जन करते हुए मेघ और पवित्र भूमि—ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (२०) शर्कराः सिकता अश्मान ओषधयो वीरुधस्तृणा. अभ्राणि विद्युतो वर्षमुच्छिष्टे संश्रिता श्रिता.. (२१) पत्थरों के छोटे टुकड़े, बालू, पत्थर, जड़ीबूटी और फसलें, लताएं, तिनके, मेघ, बिजलियां और वर्षा ये सब यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (२१) राद्धिः प्राप्तिः समाप्तिर्व्याप्तिर्मह एधतुः. अत्याप्तिरुच्छिष्टे भूतिश्चाहिता निहिता हिता.. (२२) सिद्धि, प्राप्ति, समाप्ति, व्याप्ति, तेज, वृद्धि, अत्यधिक प्राप्ति, समृद्धि तथा सामने स्थित हितकारी पदार्थ यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित है. (२२) यच्च प्राणति प्राणेन यच्च पश्यति चक्षुषा. उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२३) जो प्राण वायु के द्वारा जीवित रहता है, जो आंखों से देखता है, स्वर्ग में स्थित देव और स्वर्ग—ये सभी यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न है. (२३) ऋचः सामानि च्छन्दांसि पुराणं यजुषा सह. उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२४) ऋग्वेद और सामवेद के मंत्र, छंद, यजुर्वेद के सहित प्राचीन मंत्र, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव—ये सभी यज्ञ रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (२४) प्राणापानौ चक्षुः श्रोत्रमक्षितिश्च क्षितिश्च या. उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२५) प्राण और अपान वायु, नेत्र, कान, विनाश का अभाव और विनाश, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव—ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (२५) आनन्दा मोदाः प्रमुदोऽभीमोदमुश्च ये. उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२६) विषयों के उपभोग से उत्पन्न आनंद नाम के विशेष सुख, हर्ष, अधिक प्रसन्नता एवं इन्हें ebook converter DEMO Watermarks*

देने वाले पदार्थ, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव—ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए. (२६) देवाः पितरो मनुष्या गन्धर्वाप्सरसश्च ये. उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२७) देव, पितर, मनुष्य, गंधर्व, अप्सराएं, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव—ये सभी यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए. (२७) सूक्त-१० देवता—मन्यु यन्मन्युर्जायामावहत् संकल्पस्य गृहादधि. क आसं जन्याः के वराः क उ ज्येष्ठवरो ऽ भवत्.. (१) ब्रह्म माया के अभिमुख उसी प्रकार प्राप्त हुआ, जिस प्रकार पति पत्नी के सामने जाता है. ब्रह्म ने माया को उसी प्रकार प्राप्त किया, जिस प्रकार पति अपनी पत्नी को घर से प्राप्त करता है. ब्रह्मा की सृष्टि रचना की इच्छा में वधू पक्ष के बंधन कौन थे? कन्या का वरण करने वाले कौन थे? उस समय प्रधान वर अर्थात् विवाह करने वाला कौन था? (१) तपश्चैवास्तां कर्म चान्तर्महत्यर्णवे. त आसं जन्यास्ते वरा ब्रह्म ज्येष्ठवरो ऽ भवत्.. (२) उस सृष्टि रचना के समय सृष्टि की रचना करने वाले परमेश्वर का तप और कर्म ही उस समय स्थित थे. यह तप और कर्म प्रलय काल के सागर का मंत्र था. विवाह के मुहूर्त पर जो कन्या पक्ष वाले बंधन थे, वे ही विवाह करने वाले थे. ब्रह्म उन में सब से बड़ा वर था. (२) दश साकमजायन्त देवा देवेभ्यः पुरा. यो वै तान् विद्यात् प्रत्यक्षं स वा अद्य महद् वदेत्.. (३) अग्नि आदि देवों की उत्पत्ति से पहले ही ज्ञानेंद्रियां और कर्मेंद्रियां उत्पन्न हुईं. जो उपासक उन देवों को जान सकेगा, वह प्रत्यक्ष ही ब्रह्म का उपदेश करेगा. (३) प्राणापानौ चक्षुः श्रोत्रमक्षितिश्च क्षितिश्च या. व्यानोदानौ वाङ्मनस्ते वा आकूतिमावहन्.. (४) प्राण और अपान वायु, नयन, कान, क्षीण होने वाली क्रिया शक्ति, क्षय रहित ब्रह्म, व्यान और उदान वायुएं, वाणी और मन ने देवकृत संकल्प को धारण किया. (४) अजाता आसन्नृतवो ऽ थो धाता बृहस्पतिः. इन्द्राग्नी अश्विना तर्हि कं ते ज्येष्ठमुपासत.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

सृष्टि रचना के समय वसंत आदि ऋतुएं उत्पन्न नहीं हुई थीं. धाता, बृहस्पति, इंद्र, अग्नि तथा दो अश्विनीकुमार भी उस समय उत्पन्न नहीं हुए थे. धाता आदि वे देव अपने जन्मदाता ब्रह्म की उपासना कर रहे थे. (५) तपश्चैवास्तां कर्म चान्तर्महत्यर्णवे. तपो ह जज्ञे कर्मणस्तत् ते ज्येष्ठमुपासत.. (६) प्रलय काल के महासागर में तप और कर्म ही थे. तप कर्म से उत्पन्न हुआ था. वे धाता आदि सृष्टि के कारण बने हुए ब्रह्म की उपासना कर रहे थे. (६) येत आसीद् भूमिः पूर्वा यामद्धात्तय इद् विदुः. यो वै तां विद्यान्नामथा स मन्येत पुराणवित्.. (७) सामने वर्तमान इस भूमि से पहले जो भूमि थी. उसे तप के प्रभाव से शक्ति प्राप्त करने वाले ऋषि जानते थे. जो अतीत काल के कल्प में स्थित उस भूमि को जो जानेगा, वह प्राचीन अर्थ को जानने वाला माना जाएगा. (७) कुत इन्द्रः कुतः सोमः कुतो अग्निरजायत. कुतस्त्वष्टा समभवत् कुतो धाताजायत.. (८) कहां से इंद्र, कहां से सोम और कहां से अग्नि उत्पन्न हुई? त्वष्टा कहां से उत्पन्न हुआ तथा धाता की उत्पत्ति कहां से हुई? (८) इन्द्रादिन्द्रः सोमात् सोमो अग्नेरग्निरजायत. त्वष्टा ह जज्ञे त्वष्टुर्धातुर्धाताजायत.. (९) पूर्व काल में जो इंद्र थे, उन से इन वर्तमान काल के इंद्र की उत्पत्ति हुई. इसी सोम से सोम, अग्नि से अग्नि, त्वष्टा से त्वष्टा और धाता से धाता उत्पन्न हुए. (९) ये त आसन् दश जाता देवा देवेभ्यः पुरा. पुत्रेभ्यो लोकं दत्त्वा कस्मिंस्ते लोक आसते.. (१०) प्राचीन काल में देवों से जो दस देव उत्पन्न हुए, वे अपने पुत्रों को यह लोक दे कर भी स्वयं किस लोक में निवास करते हैं? (१०) यदा केशानस्थि स्नाव मांसं मज्जानमाभरत्. शरीरं कृत्वा पादवत् कं लोकमनुप्राविशत्.. (११) जिस सृष्टि रचना के समय रचना करने वाले ने केशों को, अस्थियों को, स्नायुओं अर्थात् नसों को, मांस को और मज्जा अर्थात् चरबी को एकत्र किया. हाथपैरों वाले शरीर की रचना ebook converter DEMO Watermarks*

अङ्गा पर्वाणि मज्जानं को मांसं कुत आभरत्.. (१२)

कर के सृष्टि रचना करने वाले ब्रह्म ने उस शरीर में आत्मा के रूप में प्रवेश किया. (११) कुतः केशान् कुतः स्नाव कुतो अस्थीन्याभरत्. अङ्गा पर्वाणि मज्जानं को मांसं कुत आभरत्.. (१२) सृष्टि रचना करने वाले ईश्वर ने केशों, स्नायुओं अर्थात् नसों को और हड्डियों को किस उपादान कारण से बनाया, अंगों, जोड़ों, चरबी और मांस की रचना उस ने कहां से की? (१२) संसिचो नाम ते देवा ये संभारान्तसमभरन्. सर्वं संसिच्य मर्त्यं देवाः पुरुषमाविशन्.. (१३) ज्ञानेंद्रियां, कर्मेंद्रियों एवं प्राण, अपान आदि के रूप में जिन साधनों को पहले बताया गया है, उन्हें सृष्टि रचना करने वाले ब्रह्म ने एकत्र किया. उन साधनों से बने शरीर को रक्त, मज्जा आदि से गीला कर के उन देवों ने मरण धर्मा पुरुष का निर्माण कर के आत्मा के रूप में उस में प्रवेश किया. (१३) ऊरू पादावष्ठीवन्तौ शिरो हस्तावथो मुखम्. पृष्टीर्बर्जब्ये पार्श्वे कस्तत् समदधादृषिः.. (१४) जंघाओं को, पैरों को, घुटनों को, शीश को, हाथों को और मुख को, पसलियों को किस ऋषि ने बनाया. (१४) शिरो हस्तावथो मुखं जिह्वां ग्रीवाश्च कीकसाः. त्वचा प्रावृत्य सर्वं तत् संधा समदधान्मही.. (१५) शीश को, दोनों हाथों को, मुख को, जीभ को, गरदन को, हड्डियों को एवं उस सारे शरीर को त्वचा से ढक कर इस के निर्माण कर्ता देवता ने आपस में जोड़ दिया. (१५) यत्तच्छरीरमशयत् संधया संहितं महत्. येनेदमद्य रोचते को अस्मिन् वर्णमाभरत्.. (१६) इस प्रकार के शरीर का निर्माण करने वाले देवता सहित जो बढ़ा हुआ शरीर है, वह इस समय जिस रंग के कारण सुंदर लगता है, उस शरीर में किस नाम के देव ने उस रंग को बनाया है? (१६) सर्वे देवा उपाशिक्षन् तदजानाद् वधूः सती. ईशा वशस्य या जाया सास्मिन् वर्णमाभरत्.. (१७) सभी देवों ने समीप में शक्तिशाली होने की इच्छा की. परमेश्वर के साथ विवाह करने वाली माया ने देवों के द्वारा बनाए हुए उस शरीर को जाना. जो माया सारे संसार का नियंत्रण ebook converter DEMO Watermarks*

करने वाली है, उस ने इस शरीर में रंग भरा है. (१७) यदा त्वष्टा व्यतृणत् पिता त्वष्टुर्य उत्तरः. गृहं कृत्वा मर्त्यं देवाः पुरुषमाविशन्.. (१८) उस शरीर में आत्मा के रूप में उस का निर्माण करने वाला ईश्वर स्थित है. उस निर्माण कार्य से भी श्रेष्ठ इस विचित्र संसार का निर्माण करने वाला जो देव है, उस ने निर्माण के समय पुरुष के शरीर, आंखों, कानों आदि के रूप में छेद किए, तब उस निर्माण देव ने उस पुरुष शरीर को घर बना कर उस में प्रवेश किया. (१८) स्वप्नो वै तन्द्रीर्निर्ऋतिः पाप्मानो नाम देवताः. जरा खालत्यं पालित्यं शरीरमनु प्राविशन्.. (१९) नींद, आलस्य, पापदेवता एवं ब्रह्महत्या आदि पापों ने इस शरीर में प्रवेश किया. वृद्धावस्था, नयन आदि का नष्ट होना, त्वचा का ढीला हो जाना आदि के अभिमानी देवों ने शरीर में प्रवेश किया. (१९) स्तेयं दुष्कृतं वृजिनं सत्यं यज्ञो यशो बृहत्. बलं च क्षत्रमोजश्च शरीरमनु प्राविशन्.. (२०) चोरी, सुरा पीना आदि बुरे कर्म, इन से उत्पन्न पाप, सत्य भाषण, यज्ञ, महान यश, बल और क्षत्रियों से संबंधित ओज ने इस शरीर में प्रवेश किया. (२०) भूतिश्च वा अभूतिश्च रातयो ऽ रातयश्च याः. क्षुधश्च सर्वास्तृष्णाश्च शरीरमनु प्राविशन्.. (२१) समृद्धि, असमृद्धि अर्थात् संपन्नता और दीनता, मित्र और शत्रु, भूख और प्यास, इन सब ने पुरुष के शरीर में प्रवेश किया. (२१) निन्दाश्च वा अनिन्दाश्च यच्च हन्तेति नेति च. शरीरं श्रद्धा दक्षिणाश्रद्धा चानु प्राविशन्.. (२२) निंदा और प्रशंसा, हर्ष और शोक, धन की समृद्धि और इच्छा का अभाव— इन्होंने शरीर में प्रवेश किया. (२२) विद्याश्च वा अविद्याश्च यच्चान्यदुपदेश्यम्. शरीरं ब्रह्म प्राविशदृचः सामाथो यजुः.. (२३) शास्त्र आदि में ज्ञान और अज्ञान ने, अन्य उपदेश योग्य भावों ने, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद के मंत्रों के पश्चात ब्रह्म अर्थात् ब्रह्म के अंश आत्मा ने शरीर में प्रवेश किया. (२३) ebook converter DEMO Watermarks*

आनन्दा मोदाः प्रमुदो ऽ भीमोदमुदश्च ये. हसो नरिष्टा नृत्तानि शरीरमनु प्राविशन्.. (२४) आनंद, मोद, प्रमोद, सामने वर्तमान मोद अर्थात् अभिमोद, हंसी, शब्द, रूप, स्पर्श आदि एवं नृत्य आदि ने इस शरीर में प्रवेश किया. (२४) आलापाश्च प्रलापाश्चाभीलापलपञ्च ये. शरीरं सर्वे प्राविशन्नायुजः प्रयजो युजः.. (२५) सार्थक वचन, निरर्थक वचन, अभिलाषाओं से पूर्ण वचन, आयोजन, प्रयोजन और योजना—इन सब ने मनुष्य के शरीर में प्रवेश किया. (२५) प्राणापानौ चक्षुः श्रोत्रमक्षितिश्च क्षितिश्च या. व्यानोदानौ वाङ् मनः शरीरेण त ईयन्ते.. (२६) प्राण और अपान वायुएं, नेत्र, कान, विनाश का अभाव और विनाश, व्यान और उदान वायुएं, वाणी और मन—ये सभी इस शरीर में प्रवेश कर के अपने-अपने काम लगे हैं. (२६) आशिषश्च प्रशिषश्च संशिषो विशिषश्च याः. चित्तानि सर्वे संकल्पाः शरीरमनु प्राविशन्.. (२७) मनचाहे फल की प्रार्थनाएं, उत्कृष्ट प्रार्थनाएं, भलीभांति होने वाली प्रार्थनाएं तथा अनेक प्रकार की प्रार्थनाएं, मनबुद्धि और अहंकार, सभी संकल्प—इन्होंने पुरुष शरीर में प्रवेश किया. (२७) आस्तेयीश्च वास्तेयीश्च त्वरणाः कृपणीश्च याः. गुह्याः शुक्रा स्थूला अपस्ता बीभत्सावसादयन्.. (२८) भलीभांति स्नान, स्नान से संबंधित जल, शीघ्रता से चलने वाले तथा थोड़ी मात्रा में होने वाले जल, गुफा में होने वाले, श्वेत वर्ण के अर्थात् स्वच्छ जल, अधिक मात्रा में होने वाले नदी रूप में वर्तमान जल—इन सब ने पुरुष के शरीर में प्रवेश किया. (२८) अस्थि कृत्वा समिधं तदष्टापो असादयन्. रेतः कृत्वाज्यं देवाः पुरुषमाविशन्.. (२९) हड्डियों को समिधा बना कर पहले कहे गए आठ प्रकार के जलों ने पुरुष के शरीर में प्रवेश किया. वीर्य को घृत बना कर देवों ने पुरुष के शरीर में प्रवेश किया. (२९) या आपो याश्च देवता या विराड् ब्रह्मणा सह. शरीरं ब्रह्म प्राविशच्छरीरे ऽ धि प्रजापतिः.. (३०) ebook converter DEMO Watermarks*

जो जल, जो देवता, जो विराट् तथा जो प्रजापति कहे गए हैं, ब्रह्म के साथ आत्मा के रूप में उन सभी ने पुरुष के शरीर में प्रवेश किया. (३०) सूर्यश्चक्षुर्वातः प्राणं पुरुषस्य वि भेजिरे. अथास्येतरमात्मानं देवाः प्रायच्छन्नग्नये.. (३१) सूर्य ने पुरुष के नयनों को तथा वायु ने पुरुष के प्राणों को मृत्यु के बाद ले लिया. प्राणों और इंद्रियों के अतिरिक्त पुरुष के शरीर को देवों ने अग्नि को दे दिया. (३१) तस्माद् वै विद्वान् पुरुषमिदं ब्रह्मेति मन्यते. सर्वा ह्यस्मिन् देवता गावो गोष्ठ इवासते.. (३२) इसी कारण विद्वान् इस पुरुष को ब्रह्म मानते हैं. जिस प्रकार गाएं गोशाला में रहती हैं, उसी प्रकार सब देवता मनुष्य के इस शरीर में निवास करते हैं. (३२) प्रथमेन प्रमारेण त्रेधाविष्वङ् वि गच्छति. अद एकेन गच्छत्यद एकेन गच्छत्यहैकेन नि षेवते.. (३३) पुरुष के शरीर में प्रवेश करने वाला जीवात्मा इंद्रियों के द्वारा पुण्य और पाप रूपी कर्म पूरे कर के मृत्यु के बाद स्वर्ग या नरक में स्थान प्राप्त करता है. पहले होने वाले स्थूल शरीर की मृत्यु के बाद वह जीवात्मा शरीर त्याग कर अनेक नियमों के अनुसार तीन प्रकार से जाता है. एक अर्थात् पाप कर्म से नरक में जाता है, पुण्य कर्म से स्वर्ग में जाता है तथा पुण्य और पाप से मिले हुए दोनों प्रकार के कर्म से यहां सुख दुःखों को अनुभव करता है. (३३) अप्सु स्तीमासु वृद्धासु शरीरमन्तरा हितम्. तस्मिञ्छवो ऽ ध्यन्तरा तस्माञ्छवो ऽ ध्युच्यते.. (३४) संसार को गीला करने वाले एवं बढ़े हुए उन जलों के मध्य शरीर स्थित है. उस ब्रह्मांड शरीर के ऊपर, नीचे और मध्य में वह आत्मा कहा जाता है. (३४) सूक्त-११ देवता—अर्बुदि ये बाहवो या इषवो धन्वनां वीर्याणि च. असीन् परशूनायुधं चित्ताकूतं च यद्धृदि. सर्वं तदर्बुदे त्वममित्रेभ्यो दृशे कुरूदारांश्च प्र दर्शय.. (१) हमारे योद्धाओं के जो बाण, जो भुजाएं और बल है, तलवारें और फरसारूपी आयुध, चित्त में संकल्पित शत्रुओं को मारना कार्य है, हे अर्बुद ऋषि के पुरुषार्थ! तुम यह सब हमारे शत्रुओं को दिखलाओ. शत्रुओं को डसने के लिए हमें अंतरिक्ष में विचरण करने वाले राक्षसों और पिशाचों को दिखाओ. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

उत्तिष्ठत सं नह्यध्वं मित्रा देवजना यूयम्. संदृष्टा गुप्ता वः सन्तु या नो मित्राण्यर्बुदे.. (२) हे मित्रो अर्थात् हमारी विजय के प्रदानशील देवगणो! तुम सेना की इस छावनी से विजय प्राप्ति के लिए प्रार्थना करो. आप के द्वारा दिए हुए हमारे योद्धा आप के द्वारा रक्षित हैं. हे अर्बुद सर्प! हमारे जो मित्र हैं जो हमारे शत्रुओं के साथ युद्ध करने के लिए आए हैं, उन के तुम अंग बनो. (२) उत्तिष्ठतमा रभेथामादानसंदाननाभ्याम्. अमित्राणां सेना अभि धत्तमर्बुदे.. (३) हे अर्बुदि सर्प! तुम और निर्बुद इस स्थान से चले जाओ. तुम यहां से दूर जाओ. तथा युद्ध करो. तुम आदान और संदान नाम की रस्सियों से शत्रुओं की सेना को बांधो. (३) अर्बुदिर्नाम यो देव ईशानश्च न्यर्बुदिः. याभ्यामन्तरिक्षमावृतमियं च पृथिवी मही. ताभ्यामिन्द्रमेदिभ्यामहं जितमन्वेमि सेनया.. (४) अर्बुदि, ईशान और न्यर्बुदि नाम के जो देव है, उन के द्वारा आकाश और विशाल पृथ्‍वी को ढक लिया है. स्वर्ग और धरती को व्याप्त कर के स्थित एवं इंद्र के मित्र अर्बुदि और न्यर्बुदि के द्वारा जीती हुई सेना का मैं अनुगमन करूं. (४) उत्तिष्ठ त्वं देवजनार्बुदे सेनया सह. भञ्जन्नमित्राणां सेनां भोगेभिः परि वारय.. (५) हे देव जाति से संबंधित अर्बुदि नाम के सर्प! तुम अपनी सेना के साथ उठो. इस के बाद तुम शत्रुओं की सेनाओं का वध करते हुए अपने सर्प शरीरों के द्वारा उन की आंखें बंद कर लो. (५) सप्त जातान् न्यर्बुद उदाराणां समीक्ष्यन्. तेभिष्ट्वमाज्ये हुते सर्वैरुत्तिष्ठ सेनया.. (६) हे न्यर्बुदि नाम के सर्प! पहले बताए हुए आंखों को बंद करने वाले सब शरीरों के शत्रुओं को दिखाते हुए तुम घृत एवं आज्य के होने पर उन सब के द्वारा जाते हुए शत्रुओं को उन सब को दिखाओ जो उन की आंखों को बंद कर देते हैं. तुम उन सब के साथ हमारी सेना के संग उठो. (६) प्रतिघ्नानाश्रुमुखी क्रुधकर्णी च क्रोशतु. विकेशी पुरुषे हते रदिते अर्बुदे तव.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे द्वारा काटे जाने पर हमारे शत्रु पुरुष के मर जाने पर उस की पत्नी छाती पीटती हुई, आंसू बहाती हुई, गहनों से शून्य कानों वाली, बाल बिखराए हुए रोए. (७) संकर्षन्ती करूकरं मनसा पुत्रमिच्छन्ती. पतिं भ्रातरमात् स्वान् रदिते अर्बुदे तव.. (८) हे अर्बुदि नाम के सर्प! काटने के कारण शरीर में विष फैल जाने पर शत्रु की पत्नी हाथ मलती हुई विष के नाश के लिए अपने पुत्र की इच्छा करती हुई, इस के बाद पति की भी इच्छा करती हुई तथा विष दूर करने के लिए अपने संबंधियों की इच्छा करें. (८) अलिक्लवा जाष्कमदा गृध्राः श्येनाः पतत्रिणः. ध्वाङ्क्षाः शकुनयस्तृप्यन्त्वमित्रेषु समीक्षयन् रदिते अर्बुदे तव.. (९) हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे द्वारा हमारे शत्रुओं को काटे जाने पर धृष्ट पक्षी, शरीर को कष्ट देने वाले पक्षी, गिद्ध, बाज तथा अन्य मांस खाने वाले पक्षी और कौवे, जो हमारे शत्रुओं का मांस खाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वे तृप्त हों. (९) अथो सर्वं श्वापदं मक्षिका तृप्यतु क्रिमिः. पौरुषेये ऽ धि कुणपे रदिते अर्बुदे तव.. (१०) हे अर्बुदि! तुम्हारे द्वारा काटे जाने पर हमारे शत्रुओं के शरीर में जो घाव हो जाते हैं, उन के शरीर को खा कर मांसभक्षी पशु, मक्खियां और कीड़े तृप्त हों. (१०) आ गृह्लीतं सं बृहतं प्राणापानान् न्यर्बुदे. निवाशा घोषाः सं यन्त्वमित्रेषु समीक्षयन् रदिते अर्बुदे तव.. (११) हे न्यर्बुदि तथा अर्बुदि नाम के सर्पो! तुम हमारे शत्रुओं के प्राण और अपान को ग्रहण करो. तुम्हारे द्वारा हमारे शत्रुओं को काटे जाने पर उन्हें देखने वालों के द्वारा दुःख भरे स्वर उच्चारण किए जाएं. (११) उद् वेपय सं विजन्तां भियामित्रान्सं सृज. उरुग्राहैर्बाहुड्कैर्विध्यमित्रान् न्यर्बुदे.. (१२) हे न्यर्बुदि नाम के सर्प! तुम हमारे शत्रुओं को कंपित करो. तुम्हारे भय के कारण वे अपने स्थान से भाग जाएं. इस के बाद तुम हमारे शत्रुओं के पैरों और हाथों को बांध कर मारो. (१२) मुह्यन्त्वेषां बाहवश्चित्ताकूतं च यद्धृदि. मैषामुच्छेषि किं चन रदिते अर्बुदे तव.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे खाए जाने पर उन शत्रुओं की भुजाएं निष्क्रिय हो जाएं. उन के मन में जो भी भावनाएं हैं, वे भी मोहित हो जाएं. हमारे शत्रुओं की जो रथ, घोड़ा हाथी आदि सेना है, वह भी शेष न बचे. (१३) प्रतिघ्नाना: सं धावन्तूर: पटूरावाघनाना:. अघारिणीर्विकेश्यो रुदत्य १: पुरुषे हते रदिते अर्बुदे तव.. (१४) हे अर्बुदि! तुम्हारे द्वारा जिन के पतियों को काटा गया है. हमारे उन शत्रुओं की पत्नियां अपने हाथों से अपने मुख और सीने को पीटती हुई, केश बिखेरे हुए उन मृत पुरुषों के समीप शीघ्र जाएं. (१४) श्वन्वतीरप्सरसो रूपका उताबुँदे. अन्तःपात्रे रेरिहतीं रिशां दुर्णिहितैषिणीम्. सर्वास्ता अर्बुदे त्वममित्रेभ्यो दृशे कुरूदारांश्च प्र दर्शय.. (१५) हे अर्बुदि! तुम हमारे शत्रुओं की माया के द्वारा निर्मित ऐसी अप्सराओं को दिखाओ, जिन के साथ शिकारी कुत्ते हों. तुम उन्हें ऐसी गायों को दिखाओ जो पात्र को बारबार चाट रही हों. तुम उन्हें उल्कापात आदि अद्भुत अपशकुन दिखाओ. (१५) खडूरे ऽ धिचङ्क्रमां खर्विकां खर्ववासिनीम्. य उदारा अन्तर्हिता गन्धर्वाप्सरसश्च ये. सर्पा इतरजना रक्षांसि.. (१६) हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम हमारे शत्रुओं को माया के द्वारा निर्मित ऐसे छोटे प्राणियों को दिखाओ. जो आकाश में चलफिर रहे हों और धीमी आवाज कर रहे हों. (१६) चतुर्दंष्ट्रांश्छायावदतः कुम्भमुष्काँ असृङ्मुखान्. स्वभ्यसा ये चोद्भ्यसा:.. (१७) जो यक्ष, राक्षस आदि अपनी माया से छिपे रहते हैं, उन काले रंग वालों और चार दांतों वालों को हमारे शत्रुओं को दिखाओ. जो राक्षस अनेक रूपों के कारण भयानक हैं, उन्हें भी तुम हमारे शत्रुओं को दिखाओ. (१७) उद् वेपय त्वमर्बुदे ऽ मित्राणाममूः सिचः. जयांश्च जिष्णुश्चामित्राँजायतामिन्द्रमेदिनौ.. (१८) हे अर्बुदि नाम के सर्प! विष की अधिकता के कारण हमारे शत्रुओं की जो सेनाएं दुखी हैं, उन्हें कंपित करो. हे विजय प्राप्त करने वाले अर्बुदि और न्यर्बुदि नाम के सर्पो! तुम हमारे शत्रुओं को पराजित करते हुए विजयी बनो एवं इंद्र के साथ मिल कर हमें विजयी बनाओ. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*

प्रब्लीनो मृदितः शयां हतो ३ मित्रो न्यर्बुदे. अग्निजिह्वा धूमशिखा जयन्तीयर्न्तु सेनया.. (१९) हे न्यर्बुदि नाम के सर्प! हमारे शत्रु तुम्हारे द्वारा काटे जाने पर प्राण हीन हो कर सोएं. तुम्हारे द्वारा माया के बल से उत्पन्न की गई अग्नि की ज्वालाएं और धुएं की शिखाएं हमारे शत्रुओं की सेना को पराजित करती हुई हमारे साथ चलें. (१९) तयार्बुदे प्रणुत्तानामिन्द्रो हन्तु वरंवरम्. अमित्राणां शचीपतिर्मामीषां मोचि कश्चन.. (२०) हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे द्वारा युद्ध भूमि से भगाए गए हमारे जो शत्रु हैं, उन में जो श्रेष्ठ हैं, उन्हें शची के पति इंद्र मारें. वे हमारे किसी शत्रु को न छोड़ें. (२०) उत्कसन्तु हृदयान्यूर्ध्वः प्राण उदीषतु. शौष्कास्यमनु वर्तताममित्रान् मोत मित्रिणः.. (२१) हमारे शत्रुओं के हृदय उन के शरीर से निकल जाएं. उन की प्राण वायु भी उन के शरीर से निकल जाए. मुख सूख जाने से हमारे शत्रु मर जाएं. हमारे मित्रों का मुख न सूखे. (२१) ये च धीरा ये चाधीराः पराञ्चो बधिराश्च ये. तमसा ये च तूपरा अथो बस्ताभिवासिनः. सर्वांस्तां अर्बुदे त्वममित्रेभ्यो दृक्षे कुरूदारांश्च प्र दर्शय.. (२२) हे अर्बुदि नाम के सर्प! हमारे शत्रुओं में जो वीर कायर, युद्ध से भागने वाले, भय के कारण कुछ न सुनने वाले, बिना सींग के पशुओं के समान हानि न पहुंचाने वाले और भेड़ों के समान शब्द करने वाले हैं, उन सब को अपनी माया से पराजित होने वाला बनाओ. हे सर्प! तुम हमारे शत्रुओं को अपनी माया के द्वारा उल्कापात आदि अपशकुन दिखाओ. (२२) अर्बुदिश्च त्रिषन्धिश्चामित्रान् नो वि विध्यताम्. यथैषामिन्द्र वृत्रहन् हनाम शचीपते ऽ मित्राणां सहस्रशः.. (२३) त्रिषंधि अर्थात् सेना को मोहित करने वाला देव और अर्बुदि नाम का सर्प हमारे शत्रुओं को अनेक प्रकार से चोट पहुंचाए. हे शचीपति इंद्र! हम जिस प्रकार उन शत्रुओं से संबंधित लोगों को हजारों की संख्याओं में मारे, हमें ऐसी शक्ति दो. (२३) वनस्पतीन् वानस्पत्यानोषधीरुत वीरुधः. गन्धर्वाप्सरसः सर्पान् देवान् पुण्य-जनान् पितॄन्. सर्वांस्तां अर्बुदे त्वममित्रेभ्यो दृशे कुरूदारांश्च प्र दर्शय.. (२४) हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम हमारे शत्रुओं को अपनी माया से वृक्षों, वृक्षों के विकारों, ebook converter DEMO Watermarks*

गेहूं, जौ आदि फसलों, वन के वृक्षों गंधर्वों और अप्सराओं को दिखाओ. तुम उन्हें उल्कापात आदि अद्भुत अपशकुन दिखाओ. (२४) ईशां वो मरुतो देव आदित्यो ब्रह्मणस्पतिः. ईशां व इन्द्रश्चाग्निश्च धाता मित्रः प्रजापतिः. ईशां व ऋषयश्चक्रुरमित्रेषु समीक्षयन् रदिते अर्बुदे तव.. (२५) हे शत्रुओ! मरुत देव और ब्रह्मणस्पति तुम्हारे शिक्षक हों. इंद्र, अग्नि, धाता, मित्र और प्रजापति तुम्हारा नियंत्रण करने वाले हों. हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे द्वारा हमारे शत्रुओं को काटे जाने पर ऋषिगण उन्हें देखते हुए उन के शिक्षक बनें. (२५) तेषां सर्वेषामीशाना उत्तिष्ठ सं नह्यध्वं मित्रा देवजना यूयम्. इमं संग्रामं संजित्य यथालोकं वि तिष्ठध्वम्.. (२६) हमारे मित्र देवगण उन सभी शत्रुओं के शिक्षक होते हुए उठें. ये सभी उन की शिक्षा के लिए तैयार हो जाएं. हे शत्रुओ! देवगण इस संग्राम को जीत कर शत्रुओं का विनाश कर के अपने स्थान को जाएं. (२६) सूक्त-१२ देवता—त्रिषंधि उत्तिष्ठत सं नह्यध्वमुदाराः केतुभिः सह. सर्पा इतरजना रक्षांस्यमित्राननु धावत.. (१) हे उदार गुणों वाले सेनानायको! अपने झंडों के साथ उठो और युद्ध के लिए चलो. तुम कवच आदि पहन कर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ. हे सर्पों की आकृति वाले देवो! हे राक्षसो! तुम भी हमारे शत्रुओं के पीछे दौड़ो. (१) ईशां वो वेद राज्यं त्रिषन्धे अरुणैः केतुभिः सह. ये अन्तरिक्षे ये दिवि पृथिव्यां ये च मानवाः. त्रिषन्धेस्ते चेतसि दुर्णीमान उपासताम्.. (२) हे शत्रुओ! वज्र के अभिमानी देव त्रिषंधि तुम्हारा राज्य छीन कर अपने अधिकार में करें. हे वज्रात्मक देव! तुम्हारे जो लाल झंडे आकाश में उत्पात के रूप में उत्पन्न होते हैं तथा भूलोक में मनुष्य संबंधी हैं, तुम उन के साथ आओ. (२) अयोमुखाः सूचीमुखा अथो विकङ्कतीमुखाः. क्रव्यादो वातरंहस आ सजन्त्वमित्रान् वज्रेण त्रिषन्धिना.. (३) लोहे के समान मुख वाले, सूई के आकार के मुंह वाले, बहुत से कांटों जैसे पंखों वाले पक्षी, गिद्ध आदि मांस भक्षी पक्षी और हवा के समान तेजी से उड़ने वाले पक्षी, हमारे जिस ebook converter DEMO Watermarks*

शत्रु के आसपास मंडराते हैं, वे वज्र से मारे जाएं. (३) अन्तर्धेहि जातवेद आदित्य कुणपं बहु. त्रिषन्धेरियं रोना सुहितास्तु मे वशे.. (४) हे जातवेद अग्नि! आदित्य देव अर्थात् सूर्य को आकाश में गिरते हुए शवों के शरीरों के द्वारा ढक दो. त्रिषंधि नामक देव से संबंध रखने वाली यह सेना भलीभांति मेरे वश में हो, जिस से मैं शत्रुओं को मार सकूं. (४) उत्तिष्ठ त्वं देवजनार्बुदे सेनया सह. अयं बलिर्व आहुतस्त्रिषन्धेराहुतिः प्रिया.. (५) हे देव जाति के अर्बुदि नाम के सर्प! तुम अपनी सेना के साथ उठो. हमारा यह बलि कार्य तुम्हारी तृप्ति करने वाला हो. त्रिषंधि देव की जो सेना है, वह भी बलि प्राप्त होने के कारण शत्रुओं का विनाश करे. (५) शितिपदी सं द्यतु शरव्ये ३ यं चतुष्पदी. कृत्ये ऽ मित्रेभ्यो भव त्रिषन्धेः सह सेनया.. (६) श्वेत चरणों वाली गाय, चार चरणों वाली हो कर तथा बाणों का समूह बना कर हमारे शत्रुओं को प्राप्त हो. हे कृत्यारूपिणी गौ! तू त्रिषंधि देव के समान हमारे शत्रुओं का संहार करने वाली बन. (६) धूमाक्षी सं पततु कृधुकर्णी च क्रोशतु. त्रिषन्धेः सेनया जिते अरुणाः सन्तु केतवः.. (७) हमारे शत्रुओं की सेना माया से उत्पन्न धुएं से ढके हुए नयनों वाली हो जाए. हमारे रण के बाजों के कारण उन के कान बहरे हो जाएं. इस प्रकार त्रिषंधि नामक देव के द्वारा शत्रु की सेना को जीत लिए जाने पर देव सेना के झंडे लाल रंग को हो जाएं. (७) अवायन्तां पक्षिणो ये वयांस्यन्तरिक्षे दिवि ये चरन्ति. श्वापदो मक्षिकाः सं रभन्तामामादो गृध्राः कुणपे रदन्ताम्.. (८) जो पक्षी मरी हुई शत्रु सेना का मांस खाने के लिए नीचे की ओर मुंह कर के आकाश में उड़ते हैं तथा द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में जो पक्षी उड़ते हैं, वे तथा मांसभक्षी सिंह, गीदड़ आदि पशु और मांस भक्षिणी नीले रंग की मक्खियां शवों का मांस खाने के लिए शत्रु सेनाओं में विचरण करें. मांस भक्षक गिद्ध शत्रु सेना के शरीरों को अपनी चोंच से नोचें. (८) यामिन्द्रेण संधां समधत्था ब्रह्मणा च बृहस्पते. तया ऽ हमिन्द्रसंधया सर्वान् देवानिह हुव इतो जयत मामुतः.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

हे बृहस्पति देव! इंद्र और प्रजापति देव के साथ जो आपने प्रतिज्ञा की है. मैं उस देव सेना को उस संग्राम में बुलाता हूं. हे बुलाए गए देव! हमारी सेना को विजय प्रदान करो. हमारे शत्रु सैनिकों को विजय मत प्रदान करो. (९) बृहस्पतिराङ्गिरस ऋषयो ब्रह्मसंशिताः. असुरक्षयणं वधं त्रिषन्धिं दिव्याश्रयन्.. (१०) अंगिरा ऋषि के पुत्र बृहस्पति जो देवों के मंत्री हैं, वेद मंत्रों के अभ्यास से शक्तिशाली बनें अन्य ऋषियों ने असुरों का नाश करने वाले आयुध वज्र को द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में स्थित किया है. (१०) येनासौ गुप्त आदित्य उभाविन्द्रश्च तिष्ठतः. त्रिषन्धिं देवा अभजन्त्तौजसे च बलाय च.. (११) जिस वज्र के द्वारा दिखाई देने वाले आदित्य अर्थात् सूर्य को स्वर्ग में पाला गया है, जिस वज्र की शक्ति के कारण आदित्य और इंद्र दोनों अपनेअपने स्थान पर स्थित हैं, उस त्रिषंधि नाम के देव अर्थात् वज्र की सभी देवों ने तेज और बल की प्राप्ति के लिए सेवा की है. (११) सर्वॉल्लोकान्तसमजयन् देवा आहुत्यानया. बृहस्पतिराङ्गिरसो वज्रं यमसिञ्चतासुरक्षयणं वधम्.. (१२) अंगिरा ऋषि के पुत्र एवं देवों के मंत्री बृहस्पति ने तथा इंद्र आदि देवों ने इस आहुति के द्वारा असुरों को मार कर सभी लोकों को प्राप्त किया है. बृहस्पति ने असुरों का विनाश करने के साधन उस वज्र को इस आहुति के द्वारा ही बनाया है. (१२) बृहस्पतिराङ्गिरसो वज्रं यमसिञ्चतासुरक्षयणं वधम्. तेनाहममूं सेनां नि लिम्पामि बृहस्पते ऽ मित्रान हन्म्योजसा.. (१३) अंगिरा ऋषि के पुत्र एवं देवों के मंत्री बृहस्पति ने तथा इंद्र आदि देवों ने असुरों का वध करने वाले जिस वज्र की रचना घृत की आहुति से की है, हे देवो! उस वज्र के द्वारा मैं अपनी शत्रु सेना का विनाश करता हूं. सेना के विनाश के कारण मैं अपने शत्रुओं का विनाश अपने बल से करूं. (१३) सर्वे देवा अत्यायन्ति ये अश्नन्ति वषट् कृतम्. इमां जुषध्वमाहुतिमितो जयत मामुतः.. (१४) इंद्र आदि सभी देव हमारे शत्रुओं को छोड़ कर हमारे सामने आएं. वे देव वषट् शब्द के साथ दिए गए हवि का भोग करते हैं. वे सब हमारी उस आहुति का सेवन करें. उस आहुति से प्रसन्न सभी देव हमारी सेनाओं को विजयी बनाएं. हमारे शत्रुओं की सेनाओं को विजयी न ebook converter DEMO Watermarks*

बनाएं. (१४) सर्वे देवा अत्यायन्तु त्रिषन्धेराहुतिः प्रिया. संधां महतीं रक्षत ययाग्रे असुरा जिताः. (१५) इंद्र आदि सभी देव हमारे शत्रुओं की सेना को छोड़ कर हमारे पास आएं. सेना को मोहित करने वाले देव को हमारी यह आहुति प्रसन्न करने वाली हो. हे देवो! अपनी असुर विजय की महती प्रतिज्ञा की रक्षा करो. इस त्रिषंधि की आहुति ने पहले असुरों को जीत लिया था. (१५) वायुरमित्राणामिष्वग्राण्याञ्चतु. इन्द्र एषां बाहून् प्रति भनक्तु मा शकन् प्रतिधामिषुम्. आदित्य एषामस्त्रं वि नाशयतु चन्द्रमा युतामगतस्य पन्थाम्. (१६) वायु देव शत्रुओं के बाणों के आगे जाएं. तात्पर्य यह है कि प्रतिकूल हवा के कारण उन के बाण अपना लक्ष्य प्राप्त न कर सकें. इंद्र देव उन की घायल भुजाओं को आयुध पकड़ने के अयोग्य बनाएं. सूर्य उन शत्रुओं के आयुधों का विनाश करें. चंद्रमा हमारे शत्रुओं को उस मार्ग से अलग करें जो हमारे समीप तक आता है. (१६) यदि प्रेयुर्देवपुरा ब्रह्म वर्माणि चक्रिरे तनूपानं परिपाणं कृण्वाना यदुपोचिरे सर्वं तदरसं कृधि.. (१७) हे देव! हमारे शत्रुओं ने तनूपान एवं परिमाण नामक कर्म के समय अपने मंत्रमय कवचों को सिद्ध कर लिया है. तुम इन कर्मों से संबंधित मंत्रों को असफल बनाओ. (१७) क्रव्यादांनुवर्तयन् मृत्युना च पुरोहितम्. त्रिषन्धे प्रेहि सेनया जयामित्रान् प्र पद्यस्व.. (१८) हे त्रिषंधि देव! हमारे सामने स्थित शत्रु के पीछे मांसभक्षी पशु चलें. तुम हमारी सेना के साथ जाओ और हमारे शत्रुओं का विनाश करने के लिए उन में घुसो. (१८) त्रिषन्धे तमसा त्वममित्रान् परि वारय. पृषदाज्यप्रणुत्तानां मामीषां मोचि कश्चन.. (१९) हे त्रिषंधि! तुम हमारे शत्रुओं को अंधकार के द्वारा घेर लो. हमारे यज्ञ कार्य में तुम दही से मिले भात को खाने के लिए बुलाए गए हो. तुम हमारे शत्रुओं में से एक को भी जीवित मत छोड़ो. (१९) शितिपदी सं पतत्वमित्राणाममूः सिचः. मुह्यन्त्वद्यामूः सेना अमित्राणां न्यर्बुदे.. (२०) ebook converter DEMO Watermarks*

श्वेत चरणों वाली गौ हमारे शत्रुओं की उस सेना को शोक प्रदान करने के लिए जाए और हमारे बाणों से पीड़ित उस सेना पर टूट पड़े. हे न्यर्बुदि! सामने दिखाई देने वाली यह सेना आज युद्ध के समय मोह को प्राप्त हो जाए. (२०) मूढा अमित्र न्यर्बुदे जह्योषां वरंवरम्. अनया जहि सेनया.. (२१) हे न्यर्बुदि! तुम हमारे शत्रुओं को अपनी माया के कर्तव्य और अकर्तव्य जानने के लिए मूर्ख बना दो. तुम इस सेना के श्रेष्ठों को नष्ट कर दो. तुम्हारी कृपा से हमारी सेना विजय प्राप्त करे. (२१) यश्च कवची यश्चाकवचो ३ मित्रो यश्चाज्मनि. ज्यापाशैः कवचपाशैरज्मनाभिहतः शयाम्.. (२२) हमारा जो शत्रु कवच धारण किए है अथवा जो कवच रहित है, हमारे जो शत्रु रथ में बैठे हैं, वे अपनेअपने पाशों से बंधे हुए सो जाएं. (२२) ये वर्मिणो ये ऽ वर्माणो अमित्र‍ा ये च वर्मिणः. सर्वांस्ताँ अर्बु दे हतांछ्वानो ऽ दन्तु भूम्याम्.. (२३) हमारे जो शत्रु कवच धारण करने वाले, कवचहीन और कवच के अतिरिक्त अन्य शस्त्र से रक्षा करने वाले साधन से युक्त हैं, हे न्यर्बुदि! तुम्हारे द्वारा मारे गए उन शत्रुओं को कुत्ते आदि मांसभक्षी पशु खाएं. (२३) ये रथिनो ये अरथा असादा ये च सादिनः. सर्वानदन्तु तान् हतान् गृध्राः श्येनाः पतत्रिणः (२४) हमारे जो शत्रु रथ में बैठे हैं, जो रथहीन हैं, जो घोड़े पर सवार हैं और जो बिना घोड़े वाले हैं, उन सब को गिद्ध, बाज तथा अन्य मांसभक्षी पक्षी खाएं. (२४) सहस्रकुणपा शेतामामित्री सेना समरे वधानाम्. विविद्धा ककजाकृता.. (२५) हमारे शत्रुओं की सेना हमारी सेना को प्राप्त कर के आयुध साधनों की युद्ध में भिड़ंत होने पर मरी हुई एवं अनगिनती लाशों वाली हो. (२५) मर्माविधं रोरुवतं सुपर्णैरदन्तु दुश्चितं मृदितं शयानम्. य इमां प्रतीचीमाहुतिममित्रो नो युयुत्सति.. (२६) शोभन पतन वाले बाणों के द्वारा मर्मस्थलों में विद्ध एवं अत्यधिक रोते हुए दुःखों से पूर्ण, चूर्ण किए हुए और धरती पर पड़े हुए शत्रु सैनिकों को गीदड़ आदि मांसभक्षी पशु खाएं. ebook converter DEMO Watermarks*

हमारा जो शत्रु हमारी इस आहुति को पा कर इस की गति प्रतिनिवृत्त कर के हमारे साथ युद्ध करना चाहता है, इस प्रकार के शत्रु को भी मांसभक्षी पशु खाएं. (२६) यां देवा अनुतिष्ठन्ति यस्या नास्ति विराधनम्. तयेन्द्रो हन्तु वृत्रहा वज्रेण त्रिषन्धिना.. (२७) जिस दधि मिश्रित भात की आहुति को देवगण वज्र बनाने का साधन बनाते हैं, जिस आयुध की असमानता नहीं है. उस आहुति द्वारा उत्पन्न वज्र से वृत्र असुर का वध करने वाले इंद्र इस शत्रु सेना का वध करें. (२७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१ देवता—भूमि

बारहवां कांड सूक्त-१ देवता—भूमि सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति. सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु.. (१) पृथ्वी को धारण करने वाले ब्रह्म, तप, यज्ञदीक्षा तथा विशाल रूप में फैले हुए जल हैं. इस पृथ्वी ने भूत काल के जीवों का पालन किया था और भविष्य काल के जीवों का भी पालन करेगी. इस प्रकार की पृथ्वी हमें निवास के हेतु विस्तृत स्थान प्रदान करे. (१) असंबाधं मध्यतो मानवानां यस्या उद्वतः प्रवतः समं बहु. नानावीर्या ओषधीर्या बिभर्ति पृथिवी नः प्रथतां राध्यतां नः.. (२) जिस भूमि पर ऊंचे, नीचे तथा समतल स्थान हैं तथा जो अनेक प्रकार की सामर्थ्य वाली जड़ीबूटियों को धारण करती है, वह भूमि हमें सभी प्रकार तथा पूर्ण रूप से प्राप्त हो और हमारी सभी कामनाओं को पूर्ण करे. (२) यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः. यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत् सा नो भूमिः पूर्वपेये दधातु.. (३) यह पृथ्वी सागरों, नदियों, झरनों और सरोवरों के जल से सुशोभित है. इस पृथ्वी पर कृषि की जाती है, जिस से अन्न उत्पन्न होता है. उस अन्न से संसार के प्राणवान मनुष्य, पशु आदि तृप्ति पाते हैं. इस प्रकार की पृथ्वी हमें उस प्रदेश में प्रतिष्ठित करे, जहां पर रसदार फल उत्पन्न होते हैं. (३) यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्या यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः. या बिभर्ति बहुधा प्राणदेजत् सा नो भूमिर्गोष्वप्यन्ने दधातु.. (४) जिस पृथ्वी पर चार दिशाएं हैं, जिस पर अन्न उत्पन्न होता है और जिस पर किसान खेती करते हैं तथा जो सांस लेने वाले एवं गतिशील प्राणियों को धारण करती है, वह पृथ्वी हमारे लिए दुधारू गाएं और अन्न धारण करे. (४) यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन्. गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु.. (५)

हमारे पूर्व पुरुषों अर्थात् पूर्वजों ने जिस पृथ्वी पर अनेक प्रशंसनीय कार्य किए, जिस पृथ्वी पर देवों ने अत्याचारी दैत्यों के साथ संग्राम किया तथा जो पृथ्वी गायों, घोड़ों तथा पक्षियों को आश्रय प्रदान करने वाली है, वह पृथ्वी हमें तेज और ऐश्वर्य प्रदान करे. (५) विश्वंभरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्यवक्षा जगतो् निवेशनी. वैश्वानरं बिभ्रती भूमिरग्निमिन्द्रऋषभा द्रविणे नो दधातु.. (६) जो पृथ्वी वनों को धारण करने वाली तथा संसार के प्राणियों का भरणपोषण करने वाली है, जो पृथ्वी अपने सीने अर्थात् खदानों में स्वर्ण को धारण करती है तथा वैश्वानर अग्नि को आश्रय प्रदान करती है, वह पृथ्वी हमारे लिए धन प्रदान करे. (६) यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानीं देवा भूमिं पृथिवीमप्रमादम्. सा नो मधु प्रियं दुहामथो उक्षतु वर्चसा.. (७) देवगण जाग्रत रहते हुए अथवा सावधान रहते हुए जिस पृथ्वी की रक्षा करते हैं, वह पृथ्वी हमें मधु, धन एवं बल से युक्त करे. (७) यार्णवे ऽ धि सलिलमग्र आसीद् यां मायाभिरन्वचरन् मनीषिणः. यस्या हृदयं परमे व्योमन्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः. सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे.. (८) जो पृथ्वी पहले सागर के जल में डूबी हुई थी, मनीषीजनों ने अनेक प्रकार के कार्य करते हुए, जिस पृथ्वी पर विचरण किया था, जिस का हृदय विशाल आकाश में स्थित है, वह मरण रहित पृथ्वी हमें श्रेष्ठ राष्ट्र, बल और दीप्ति प्रदान करे. (८) यस्यामापः परिचराः समानीरहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति. सा नो भूमिर्भूरिधारा पयो दुहामथो उक्षतु वर्चसा.. (९) जिस पृथ्वी पर बहता हुआ जल रात में और दिन में समान रूप से गमन करता है, ऐसी अधिक जल वाली पृथ्वी हमें दूध के समान सार रूप फलों तथा तेज से युक्त करे. (९) यामश्विनावमिमातां विष्णुर्यस्यां विचक्रमे. इन्द्रो यां चक्र आत्मने ऽ नमित्रां शचीपतिः. सा नो भूमिर्वि सृजतां माता पुत्राय मे पयः.. (१०) अश्विनीकुमारों ने जिस पृथ्वी का निर्माण किया, विष्णु ने जिस पर पराक्रम का प्रदर्शन किया तथा इंद्र ने जिस पृथ्वी को अपने अधीन कर के शत्रुओं से हीन कर दिया, वह पृथ्वी अपना सार रूप जल मुझे उसी प्रकार पिलाए, जिस प्रकार माता पुत्र को दूध पिलाती है. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*