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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

येन देवा न वियन्ति नो च विद्विषते मिथः. तत् कृण्मो ब्रह्म वो गृहे संज्ञानं पुरुषेभ्यः.. (४) जिस मंत्र के बल से देवगण, भिन्नभिन्न विचारों वाले नहीं बनते और परस्पर द्वेष नहीं करते, उसी मंत्र का प्रयोग मैं तुम्हारे घर में एकमत स्थापित करने के लिए करता हूं. (४) ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वि यौष्ट संराधयन्तः सधुराश्चरन्तः. अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान् वः संमनसस्कृणोमि.. (५) हे मनुष्यो! तुम छोटेबड़े की भावना से एक दूसरे का अनुसरण करते हुए समान चित्त वाले, समान सिद्धि वाले तथा समान कार्य करने वाले बनो. इस प्रकार आचरण करते हुए तुम एक दूसरे से बिछुड़ो मत तथा एक दूसरे से प्रिय वचन बोलते हुए आओ. मैं भी तुम सब से मिलकर तुम्हें कार्यों में प्रवृत्त होने वाला तथा समान विचारों वाला बनाता हूं. (५) समानी प्रपा सह वो ऽ न्नभागः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि. सम्यञ्चो ऽ ग्निं सपर्यतारा नाभिमिवाभितः.. (६) हे समानता के इच्छुक जनो! तुम परस्पर प्रेम के कारण एक स्थान पर रह कर समान जल और अन्न का उपयोग करो. इस के लिए मैं तुम सब को प्रेम के एक बंधन में बांधता हूं. जिस प्रकार पहिए के अनेक अरे एक नाभि को घेरे रहते हैं, उसी प्रकार तुम सब एक फल की कामना करते हुए अग्नि की उपासना करो. (६) सध्रीचीनान् वः संमनसस्कृणोम्येकश्नुष्टीन्संवननेन सर्वान्. देवा इवामृतं रक्षमाणाः सायंप्रातः सौमनसो वो अस्तु.. (७) मैं तुम सब को एक कार्य करने में एक साथ संलग्न कर के समान विचारों वाला बनाता हूं तथा समान अन्न का उपयोग करने वाला और सौमनस्य कर्म के द्वारा तुम्हें वश में करता हूं. स्वर्गलोक में अमृत रक्षा करने वाले इंद्र आदि देवों का मन जिस प्रकार समान बना रहता है, उसी प्रकार मैं तुम्हें सभी समयों में समान मन वाला बनाता हूं. (७) सूक्त-३१ देवता—अग्नि आदि वि देवा जरसावृतन् वि त्वमग्ने अरात्या. व्य१हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तुम इस बालक को आयु की हानि करने वाली वृद्धावस्था से दूर रखो. हे अग्नि! तुम इसे दान न देने के स्वभाव से और शत्रुओं से दूर रखो. मैं इसे रोग आदि दुःखों को उत्पन्न करने वाले पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से संयुक्त करता हूं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

व्यार्त्या पवमानो वि शक्रः पापकृत्यया. व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (२) वायु इस बालक को रोगजनित पीड़ा से अलग रखे तथा इंद्र पाप के कार्यों से बचाएं. मैं इसे रोग आदि दुःखों को उत्पन्न करने वाले पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (२) वि ग्राम्याः पशव आरण्यैर्व्यापस्तृष्णयास्रन्. व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (३) जिस प्रकार गाय, भैंस आदि ग्रामीण पशु वन के पशुओं से तथा जल प्यासे व्यक्तियों से दूर रहता है, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःख उत्पन्न करने वाले पापों से तथा यक्ष्मा रोग से दूर कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (३) वी ३ मे द्यावापृथिवी इतो वि पन्थानो दिशंदिशम्. व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (४) जिस प्रकार धरती और आकाश एक दूसरे से अलग रहते हैं तथा एक गांव से प्रत्येक दिशाओं में जाने वाले मार्ग स्वाभाविक रूप से पृथक् होते हैं, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःखों के उत्पादक पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (४) त्वष्टा दुहित्रे वहतुं युनक्तीतीदं विश्वं भुवनं वि याति. व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (५) त्वष्टा ने अपनी पुत्री के विवाह में जो दहेज दिया था, उसे स्थापित करने के निमित्त धरती और आकाश जिस प्रकार पृथक् हुए थे, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःखों को उत्पन्न करने वाले पापों तथा क्षय रोग से पृथक् कर के दीर्घ जीवन से संयुक्त करता हूं. (५) अग्निः प्राणान्त्सं दधाति चन्द्रः प्राणेन संहितः. व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (६) जिस प्रकार जठराग्नि चक्षु आदि इंद्रियों को अन्न से बना हुआ रस पहुंचा कर अपनाअपना कार्य करने में समर्थ बनाती है तथा चंद्रमा प्राण वायु से युक्त हो कर अमृत रस से सभी आत्माओं का पोषण करता है, उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःखों के उत्पादक पापों से तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् करके दीर्घ जीवन प्रदान करता हूं. (६) प्राणेन विश्वतोवीर्यं देवाः सूर्यं समैरयन्. व्य१हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

देवों ने सारे विश्व के प्रेरक सूर्य को प्राण के रूप में उत्पन्न किया. मैं ऐसे सूर्य को इस ब्रह्मचारी की आयु वृद्धि के निमित्त इस में स्थापित करता हूं. मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःखों के उत्पादक पापों से, तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (७) आयुष्मतामायुष्कृतां प्राणेन जीव मा मृथाः. व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (८) हे ब्रह्मचारी! तू दीर्घ आयु वाले पुरुषों की आयु से दीर्घ आयु प्रदान करने वाले देवों के प्राण से चिरकाल तक जीवन धारण कर तथा मृत्यु को प्राप्त मत हो. मैं तुझे रोग आदि दुःखों के जनक पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (८) प्राणेन प्राणतां प्राणेहैव भव मा मृथाः. व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (९) हे ब्रह्मचारी! श्वास लेने वाले प्राणियों की प्राण वायु से तू सांस ले. तू इसी लोक में निवास कर अर्थात् जीवित रह, मर मत. मैं तुझे रोग के उत्पादक पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (९) उदायुषा समायुषोषधीनां रसेन. व्य १ हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (१०) हम चिर काल के जीवन से मृत्यु को प्राप्त करते हैं, इस लोक में निवास करते हैं तथा जौ, गेहूं आदि के रस से वृद्धि को प्राप्त करते हैं. मैं इस ब्रह्मचारी को रोग आदि दुःखों के जनक पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथक् कर के चिर जीवन से संयुक्त करता हूं. (१०) आ पर्जन्यस्य वृष्ट्योदस्थामामृता वयम्. व्य१हं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा.. (११) हम वृष्टि करने वाले पर्जन्य देव के द्वारा बरसाए हुए जल से अमरता प्राप्त कर के उठ बैठते हैं. हे ब्रह्मचारी! मैं तुझे रोग आदि दुःखों से जन्य पापों से पृथक् कर के चिर जीवन से संयुक्त करता हूं. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१ देवता—बृहस्पति

चौथा कांड सूक्त-१ देवता—बृहस्पति ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः. स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः.. (१) सत्, चित, आनंद और सारे विश्व का कारण ब्रह्म सब से पहले सूर्य रूप में प्रकट हुआ जो पूर्व दिशा में उत्पन्न होता है तथा अपने तेज से सारे जगत् को व्याप्त करता है. यह प्रकाश और वर्षा का कारण सूर्यात्मक तेज सभी दिशाओं से आरंभ हो कर अपने शोभन प्रकाश को फैलाता है. सत् और असत् के उत्पत्ति स्थान के ज्ञान का तथा धरती, आकाश आदि का ज्ञान प्रकट करने वाला वही सूर्यात्मक तेज है. (१) इयं पित्र्या राष्ट्र्येत्वग्रे प्रथमाय जनुषे भुवनेष्ठाः. तस्मा एतं सुरुचं ह्वारमह्यं घर्मं श्रीणन्तु प्रथमाय धास्यवे.. (२) संपूर्ण जगत् को उत्पन्न करने वाले पिता प्रजापति ब्रह्मा हैं. उन से प्राप्त और नाद रूप में सभी प्राणियों में व्याप्त वाणी सारे संसार के व्यवहारों की स्वामिनी है. ये प्रथम शब्द से वाच्य सूर्यात्मक तेज अर्थात् ब्रह्म को स्तुति रूप में प्राप्त हों. (२) प्र यो जज्ञे विद्वानस्य बन्धुर्विश्वा देवानां जनिमा विवक्ति. ब्रह्म ब्रह्मण उज्जभार मध्यान्नीचैरुच्चैः स्वधा अभि प्र तस्थौ.. (३) इस प्रपंच के कारण, हितकारी एवं निरावरण ज्ञान से सारे जगत् को जानते हुए जो देव सर्वप्रथम उत्पन्न हुए, वे इंद्र आदि सभी देवों के जन्मों का वर्णन करते हैं. प्रथम उत्पन्न देव ने सब के कारण रूप ब्रह्म के मध्य भाग से, नीचे वाले भाग से और ऊपर वाले भाग से वेदों का उद्धार किया. इस के पश्चात देवों को हवि के रूप में अन्न मिला. (३) स हि दिवः स पृथिव्या ऋतस्था मही क्षेमं रोदसी अस्कभायत्. महान् मही अस्कभायद् वि जातो द्यां सद्म पार्थिवं च रजः.. (४) सूर्य के रूप में सर्वप्रथम उत्पन्न हुए देव आकाश में कारण रूप में तथा पृथ्वी में सत्य रूप में स्थित हैं एवं उन्होंने धरती व आकाश को अविनाशी रूप में स्थापित किया. धरती और आकाश को व्याप्त कर के वर्तमान उस प्रथम देव ने धरती और आकाश को स्थापित किया है. वह इन दोनों के मध्य में सूर्य के रूप में उत्पन्न हुआ है तथा आकाश और पृथ्वी को ebook converter DEMO Watermarks*

अपने तेज से व्याप्त कर रहा है. (४) स बुध्न्यादाष्ट्र जनुषो ऽ भ्यग्रं बृहस्पतिर्देवता तस्य सम्राट्. अहर्यच्छुक्रं ज्योतिषो जनिष्ठाथ द्युमन्तो वि वसन्तु विप्राः.. (५) प्रथम तेज के रूप में उत्पन्न परब्रह्म ने लोक के मूल अर्थात् निचले भाग से ले कर ऊपर वाले भाग तक को व्याप्त किया. दान आदि गुणों से युक्त बृहस्पति इस लोक के अधिपति हैं. दीप्ति वाला दिन उस प्रकाश वाले सूर्य से उत्पन्न हुआ. इस के पश्चात दीप्ति वाले एवं मेधावी ऋत्विज् अपनेअपने व्यापारों में लग गए. (५) नूनं तदस्य काव्यो हिनोति महो देवस्य पूर्व्यस्य धाम. एष जज्ञे बहुभिः साकमित्था पूर्वे अर्धे विषिते ससन् नु.. (६) ऋत्विजों का यज्ञ इस दिखाई न देने वाले और सब से पहले उत्पन्न सूर्य देव का मंडल निश्चय ही सब को प्रेरणा देता है. यह सूर्य हजारों किरणों के साथ इस प्रकार पूर्व दिशा में प्रकट होता है कि इन्हें हवि लक्षण अन्न शीघ्र प्राप्त हो जाता है. (६) यो ऽ थर्वाणं पितरं देवबन्धुं बृहस्पतिं नमसाव च गच्छात्. त्वं विश्वेषां जनिता यथासः कविर्देवो न दभायत् स्वधावान्.. (७) बृहस्पति देव ने प्रजापति अथर्वा को लोक का उत्पन्न करने वाला और इंद्र आदि देवों का बंधु जाना. बृहस्पति एवं अथर्वा को हमारा नमस्कार है. हवि रूप अन्न से युक्त हो कर वे हम पर उसी प्रकार कृपा करते हैं, जिस प्रकार वे अन्न से युक्त एवं सभी प्राणियों के जन्म दाता हैं. (७) सूक्त-२ देवता—आत्मा य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः. यो ३स्येशे द्विपदो यश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१) जो प्रजापति सभी प्राणियों को प्राण एवं शांति देने वाले हैं, सभी प्राणी एवं देव भी जिन का शासन मानते हैं तथा दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं. हम हवि द्वारा इस प्रकार के प्रजापति देव की पूजा करते हैं. (१) यः प्राणतो निमिषतो महित्वैको राजा जगतो बभूव. यस्य छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (२) जो प्रजापति अपने माहात्म्य से सांस लेने वाले और पलक झपकाने वाले समस्त गतिशील प्राणियों के एकमात्र स्वामी हैं, जीवन और मृत्यु छाया के समान जिन के अधीन हैं, मैं हवि के द्वारा उन प्रजापति देव की पूजा करता हूं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

यं क्रन्दसी अवतश्श्वस्कभाने भियसाने रोदसी अह्वयेथाम्. यस्यासौ पन्था रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (३) संसार की रक्षा के लिए धरती और आकाश अपने स्थान पर स्थिर हैं. प्रजापति ने उन्हें निराधार प्रदेश में धारण किया है. नीचे गिरने की आशंका से भयभीत धरती और आकाश के मध्य विद्यमान वे प्रजापति रोए थे, इसलिए इन दोनों का नाम रोदसी हुआ. जिस प्रजापति का आकाश में स्थित मार्ग वर्षा के जल का निर्माण करता है, हम हवि द्वारा उन प्रजापति की पूजा करते हैं. (३) यस्य द्यौरुर्वी पृथिवी च मही यस्याद उर्व १न्तरिक्षम्. यस्यासौ सूरो विततो महित्वा कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (४) जिन प्रजापति की महिमा से आकाश विस्तीर्ण और पृथ्वी विस्तृत हुई है, जिन की महिमा से अंतरिक्ष अर्थात् आकाश और पृथ्वी के मध्यवर्ती भाग का विस्तार हुआ है तथा आकाश में प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला सूर्य विस्तीर्ण हुआ है, हम हव्य द्वारा उस प्रजापति की पूजा करते हैं. (४) यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा समुद्रे यस्य रसामिदाहुः. इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (५) जिस प्रजापति देव की महिमा से हिमालय आदि सभी पर्वत उत्पन्न हुए हैं, सागर में सभी सरिताएं जिस की महिमा से समा जाती हैं—पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण चार दिशाएं जिस प्रजापति की भुजाएं हैं, हम हवि के द्वारा उस की पूजा करते हैं. (५) आपो अग्रे विश्वमावन् गर्भं दधाना अमृता ऋतज्ञाः. यासु देवीष्वधि देव आसीत् कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (६) सृष्टि के आदि में जिन बलों ने सारे जगत् की रक्षा की, अविनाशी और जगत् के कारण हिरण्यगर्भ को जिन दिव्य जलों ने गर्भ के रूप में धारण किया, उन जलों को अपने मध्य धारण करने वाले प्रजापति की हम हवि के द्वारा पूजा करते हैं. (६) हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्. स दाधार पृथिवीमुत द्यां कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (७) सृष्टि के आदि में हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुए तथा उत्पन्न होते ही सभी प्राणियों के स्वामी हो गए. उन्होंने इस धरती और आकाश को धारण किया. हम हवि द्वारा उन प्रजापति की पूजा करते हैं. (७) आपो वत्सं जनयन्तीर्गर्भमग्रे समैरयन्. तस्योत जायमानस्योल्ब आसीद्धिरण्मयः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-३ देवता—व्याघ्र

(८) ईश्वर के द्वारा सब से प्रथम निर्मित जलों ने हिरण्यगर्भ को जन्म देने के लिए ईश्वर के वीर्य को धारण किया. उस उत्पन्न होने वाले प्रजापति के उल्ब अर्थात् गर्भ को घेरने वाली झील स्वर्णमय थी. हम हव्य द्वारा उस प्रजापति की पूजा करते हैं. (८) सूक्त-३ देवता—व्याघ्र उदितस्त्रयो अक्रमन् व्याघ्रः पुरुषो वृकः. हिरुग्धि यन्ति सिन्धवो हिरुग् देवो वनस्पतिर्हिरुङ् नमन्तु शत्रवः.. (१) बाघ, चोर मनुष्य और भेड़िए—ये तीन इस स्थान से भाग कर दूर चले जाएं. जिस प्रकार सरिताएं गूढ़ रूप में बहती हैं, उसी प्रकार बाघ आदि भी दिखाई न दें. वनस्पतियों के अधिष्ठाता देव जिस प्रकार वनस्पतियों में छिपे रहते हैं, उसी प्रकार बाघ आदि भी लुप्त हो जाएं. बाघ आदि के जो शत्रु हैं, वे उन्हें दूर भगा दें. (१) परेणैतु पथा वृकः परमेणोत तस्करः. परेण दत्वती रज्जुः परेणाघायुरर्षतु.. (२) जंगली हिंसक पशु भेड़िया हमारे चलनेफिरने के मार्ग से दूर चला जाए. चोर भेड़िए से भी अधिक दूर चला जाए. दांतों वाले, रस्सी के आकार वाले एवं दूसरे की हिंसा करने वाले सांप के अतिरिक्त अन्य हिंसक प्राणी भी हमारे संचरण मार्ग से दूर चले जाएं. (२) अक्ष्यौ च ते मुखं च ते व्याघ्र जम्भयामसि. आत् सर्वान् विंशतिं नखान्.. (३) हे बाघ! मैं तेरी दोनों आंखों और मुख को नष्ट करता हूं. इस के अतिरिक्त मैं तेरे चारों पैरों के बीस नाखूनों को भी नष्ट करता हूं. (३) व्याघ्रं दत्वतां वयं प्रथमं जम्भयामसि. आदु ष्टेनमथो अहिं यातुधानमथो वृकम्.. (४) हम दांतों से हिंसा करने वाले पशुओं में सब से पहले बाघ का नाश करते हैं. इस के पश्चात हम चोर, सर्प, यक्ष, राक्षस आदि तथा भेड़िए का नाश करते हैं. (४) यो अद्य स्तेन आयति स संपिष्टो अपायति. पथामपध्वंसेनेत्विन्द्रो वज्रेण हन्तु तम्.. (५) आज जो चोर आता है, वह हमारे द्वारा कुटपिट कर दूर भागे. वह मार्गों में से कष्टदायक मार्ग से जाए और इंद्र अपने वज्र से उस की हिंसा करें. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

मूर्णा मृगस्य दन्ता अपिशीर्णा उ पृष्टयः. निम्रुक् ते गोधा भवतु नीचायच्छशयुर्मृगः.. (६) बाघ आदि हिंसक पशुओं के दांत भोथरे अर्थात् खाने में असमर्थ हो जाएं. उन के सींग और पसलियों की हड्डियां भी पैनी न रहें. हे पथिक! वह तेरे मार्ग में दिखाई न दे और सोने वाले दुष्ट पशु भी पिछले मार्ग से दूर चले जाएं. (६) यत् संयमो न वि यमो वि यमो यन्न संयमः. इन्द्रजाः सोमजा आथर्वणमसि व्याघ्रजम्भनम्.. (७) जहां मंत्र के सामर्थ्य से इंद्र और सोम से संबंधित संयमन कभी विपरीत प्रभाव नहीं डालता. हे क्रियाकलाप! तू अथर्वा महर्षि द्वारा दिया हुआ है, इसलिए तू बाघ आदि दुष्ट प्राणियों का हिंसक बन. (७) सूक्त-४ देवता—वनस्पति आदि यां त्वा गन्धर्वो अखनद् वरुणाय मृतभ्रजे. तां त्वा वयं खनामस्योषधिं शेपहर्षणीम्.. (१) हे कपित्थ अर्थात् कैथ नाम के वृक्ष एवं फल! वरुण का पौरुष नष्ट होने पर उन्हें वह शक्ति पुनः प्राप्त कराने के लिए गंधर्वों ने तुझे खोद कर प्राप्त किया था. उसी शक्तिवर्धक ओषधि को हम खोदते हैं. (१) उदुषा उदु सूर्य उदिदं मामकं वचः. उदेजतु प्रजापतिर्वृषा शुष्मेण वाजिना.. (२) सूर्यपत्नी उषा शक्तिशाली वीर्य से युक्त हो तथा सूर्यदेव उसे उत्कृष्ट वीर्य संपन्न करें. मेरा यह मंत्र भी शक्तिशाली हो तथा जगत् के स्रष्टा प्रजापति देव भी इसे अपने बल वीर्य से उन्नत करें. (२) यथा स्म ते विरोहतोऽभितप्तमिवानति. ततस्ते शुष्मवत्तरमियं कृणोत्वोषधिः.. (३) हे वीर्य के इच्छुक पुरुष! पुत्र, पौत्र आदि के रूप में विरोहण के कारण तेरी पुरुष इंद्रिय क्रोधित सांप के फन के समान चेष्टा कर सके, इसी कारण मैं तुझे यह ओषधि प्रदान करता हूं. (३) उच्छुष्मौषधीनां सार ऋषभाणाम्. सं पुंसामिन्द्र वृष्ण्यमस्मिन् धेहि तनूवशिन्.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

वीर्य वर्धक ओषधियों में श्रेष्ठ तथा गर्भाधान में समर्थ पुरुषों का सार यह ओषधि तुझे वीर्य युक्त करे. हे इंद्र! पुष्ट करने वाली ओषधियों में जो वीर्य है, उसे इस पुरुष के शरीर में धारण करो. (४) अपां रसः प्रथमजो ऽ थो वनस्पतीनाम्. उत सोमस्य भ्रातास्युताशर्मसि वृष्ण्यम्.. (५) हे कपित्थ की जड़! तू जलों के मंथन के समय सब से पहले रस के रूप में उत्पन्न हुई. तू सभी वृक्षों का सार और सोम की सजातीय है. तू अंगिरा आदि ऋषियों के मंत्रों से उत्पन्न वीर्य है. (५) अद्याग्ने अद्य सवितरद्य देवि सरस्वति. अद्यास्य ब्रह्मणस्पते धनुरिवा तानया पसः.. (६) हे अग्नि, सरिता, देवी सरस्वती और ब्रह्मणस्पति! इस वीर्य चाहने वाले पुरुष की पुरुषइंद्रिय को आज वीर्य प्रदान कर के धनुष के समान तान दो. (६) आहं तनोमि ते पसो अधि ज्यामिव धन्वनि. क्रमस्वर्श इव रोहितमनवग्लायता सदा.. (७) हे वीर्य के इच्छुक पुरुष! मैं तेरी पुरुषइंद्रिय को अपने मंत्र के प्रभाव से धनुष पर चढ़ी डोरी के समान सशक्त बनाता हूं. इस कारण तू गर्भाधान करने में समर्थ बैल के समान प्रसन्न मन से सदा अपनी पत्नी पर आक्रमण कर. (७) अश्वस्याश्वतरस्याजस्य पेत्वस्य च. अथ ऋषभस्य ये वाजास्तानस्तिन् धेहि तनूवशिन्.. (८) हे ओषधि! घोड़ों, बच्चों, बकरों, मेढ़ों और बैलों में जो वीर्य है, तू इस पुरुष के शरीर में वैसा ही वीर्य स्थापित कर. (८) सूक्त-५ देवता—वृषभ सहस्रशृङ्गो वृषभो यः समुद्रादुदाचरत्. तेना सहस्येना वयं नि जनान्त्स्वापयामसि.. (१) कामनाओं एवं जल की वर्षा करने वाले सूर्य उदयाचल के समीपवर्ती सागर से उदय होते हैं. उदित एवं शत्रुओं को वश में करने वाले सूर्य के द्वारा हम अपने सामने स्थित व्यक्तियों को निद्रा-परवश बनाते हैं. (१) न भूमिं वातो अति वाति नाति पश्यति कश्चन. ebook converter DEMO Watermarks*

स्त्रियश्च सर्वाः स्वापय शुनश्चेन्द्रसखा चरन्.. (२) भूमि पर वायु अधिक न चले अर्थात् तेज हवा के कारण लोगों की नींद न टूटे. सोए हुए व्यक्तियों में से कोई भी दूसरों को न देख सके. हे इंद्र के मित्र वायु! तुम प्राण वायु के रूप में शरीर में वर्तमान रह कर सभी समीपवर्ती स्त्रियों और कुत्तों को सुला दो. (२) प्रोष्ठेशयास्तल्पेशया नारीर्या वह्यशीवरीः. स्त्रियो याः पुण्यगन्धयस्ताः सर्वाः स्वापयामसि.. (३) जो स्त्रियां आंगन में अथवा पलंग पर सो रही हैं अथवा जो स्त्रियां झूले आदि में सोने की अभ्यस्त हैं और उत्तम गंध वाली हैं, उन सब को मैं सुलाता हूं. (३) एजदेजदजग्रभं चक्षुः प्राणमजग्रभम्. अङ्गान्यजग्रभं सर्वा रात्रीणामतिशर्वरे.. (४) सभी गतिशील प्राणियों को मैं ने सुला दिया. उन के नेत्र और नासिका निद्रा द्वारा गृहीत हैं. उन के हस्त, चरण आदि को भी मैं ने निद्रा मग्न करा दिया है. यह सब मध्य रात्रि के समय किया है, जब अंधकार की अधिकता होती है. (४) य आस्ते यश्चरति यश्च तिष्ठन् विपश्यति. तेषां सं दध्मो अक्षीणि यथेदं हर्म्यं तथा.. (५) हमारे संचरण के समय जो मार्ग में बैठा है तथा जो ठहर कर देख रहा है, मैं उन सब की आंखें इस प्रकार बंद करता हूं, जिस प्रकार दिखाई देने वाला यह भवन देखने में असमर्थ है. (५) स्वप्तु माता स्वप्तु पिता स्वप्तु श्वा स्वप्तु विशपतिः. स्वपन्त्वस्यै ज्ञातयः स्वप्त्वयमभितो जनः.. (६) जिस स्त्री को निद्रित कर के हम वश में करने के इच्छुक हैं, उस की माता सब से पहले सो जाए. इस के पश्चात उस का पिता, घर की रक्षा करने वाला कुत्ता और घर का स्वामी उस का पति भी सो जाए. उस के बंधुबांधव एवं उस के घर की रक्षा के लिए नियुक्त चारों ओर स्थित जन भी सो जाएं. (६) स्वप्न स्वप्नाभिकरणेन सर्वं नि ष्वापया जनम्. ओत्सूर्यमन्यान्त्स्वापायाव्युषं जागृतादहमिन्द्र इवारिष्टो अक्षितः.. (७) हे स्वप्न के देव! शय्या आदि पर सोने वाले इन जनों को तथा अन्य व्यक्तियों को सूर्योदय तक निद्रा मग्न रखो. सब के सो जाने पर हिंसा और क्षय से रहित हो कर इंद्र के समान मैं भोग में संलग्न रहूं एवं जागरण करूं. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-६ देवता—ब्राह्मण आदि ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्यः. स सोमं प्रथमः पपौ स चकारारसं विषम्.. (१) सर्पों में सब से पहले तक्षक उत्पन्न हुआ, जो मनुष्यों में ब्राह्मण के समान सर्पों में पूज्य था. उस के दस शीश और दस मुख थे. क्षत्रिय आदि जातियों वाले सर्पों से पहले उत्पन्न होने के कारण तक्षक ने सब से पहले स्वर्गलोक में स्थित अमृत पिया. सोम अर्थात् अमृत पीने वाला ब्राह्मण तक्षक कंद मूल आदि से उत्पन्न रस को विष के प्रभाव से हीन बनाए. (१) यावती द्यावापृथिवी वरिम्णा यावत् सप्त सिन्धवो वितष्ठिरे. वाचं विषस्य दूषणीं तामितो निरवादिषम्.. (२) धरती और आकाश का जितना विस्तार है तथा सागर जितने परिमाण में स्थित है, मैं इन दोनों स्थानों में स्थित कंद, मूल, फल से उत्पन्न विष को नष्ट करने वाले मंत्रों से युक्त वाणी का उच्चारण करता हूं. (२) सुपर्णस्त्वा गरुत्मान् विष प्रथममावयत्. नामीमदो नारूरुप उतास्मा अभवः पितुः.. (३) हे विष! सब से पहले सुंदर पंखों वाले गरुड़ ने तुम्हें खाया था. इस कारण तू इस पुरुष को मतवाला मत बना एवं विमूढ़ मत कर. हे विष! तू इस के लिए अन्न बन जा. (३) यस्त आस्यत् पञ्चाङ्गुरिर्वक्राच्चिदधि धन्वनः. अपस्कम्भस्य शल्यान्निरवोचमहं विषम्.. (४) पांच अंगुलियों वाले जिस हाथ ने डोरी चढ़े हुए होने के कारण झुके हुए धनुष के द्वारा पुरुष के शरीर में विष को पहुंचाया है, उस हाथ को मैं सुपारी वृक्ष के टुकड़े से मंत्रों की सहायता से प्रभावहीन करता हूं. (४) शल्याद् विषं निरवोचं प्राञ्जनादुत पर्णधेः. अपाष्ठाच्छृङ्गात् कुल्मलान्निरवोचमहं विषम्.. (५) बाणों में लगे फल से जिस विष ने शरीर में प्रवेश किया, उसे मैं मंत्र बल से बाहर निकालता हूं. विषैले पत्तों वाले वृक्ष से, लेप से, पत्तों से, पशु के सींग से एवं मल से जो विष उत्पन्न हुआ है, उसे मैं अपने मंत्र बल से शरीर से अलग करता हूं. (५) अरसस्त इषो शल्यो ऽ थो ते अरसं विषम्. उतारसस्य वृक्षस्य धनुष्टे अरसारसम्.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

हे बाण! तेरा विष बुझा हुआ फल विष रहित हो जाए. इस के बाद तेरा विष प्रभावहीन हो जाए. सारहीन वृक्ष से बना हुआ और तुझ से संबंधित धनुष भी प्रभावहीन हो जाए. (६) ये अपीषन् ये अदिहन् य आस्यन् ये अवासृजन्. सर्वे ते वध्रयः कृता वध्रिर्विषगिरिः कृतः.. (७) जो लोग विषपूर्ण जड़ीबूटियों को पीस कर खिलाते हैं, जो लोग लेप के रूप में विष का प्रयोग करते हैं, जो विष को दूर से फेंकते हैं तथा जो समीप रह कर अन्न, फल आदि में विष मिला देते हैं, मैं ने अपने मंत्र के प्रभाव से इन सब को शक्तिहीन बना दिया है. जिन पर्वतों पर कंद मूल के रूप में विष उत्पन्न होता था, उन्हें भी मैं ने शक्तिहीन कर दिया है. (७) वध्रयस्ते खनितारो वध्रिस्त्वमस्योषधे. वध्रिः स पर्वतो गिर्यतो जातमिदं विषम्.. (८) हे विषयुक्त जड़ीबूटी! तुझे खोदने वाले शक्तिहीन हो जाएं तथा मेरे मंत्र के प्रभाव से तू भी प्रभावहीन हो जा. जिन पर्वतों पर विषैले कंदमूल उत्पन्न होते हैं, वे भी शक्तिहीन हो जाएं. (८) सूक्त-७ देवता—वनस्पति वारिदं वारयातै वरणावत्यामधि. तत्रामृतस्यासिक्तं तेना ते वारये विषम्.. (१) वारण वृक्ष जहां उत्पन्न होते हैं, उस वारणावती का विषहारी जल हम मनुष्यों के विष को दूर करता है. उस जल में स्वर्ग स्थित अमृत का विषनाशक प्रभाव विद्यमान है. इस कारण मैं उस अमृतमय जल से तेरे कंद, मूल आदि से उत्पन्न विष को दूर करता हूं. (१) अरसं प्राच्यं विषमरसं यदुदीच्यम्. अथेदमशराच्यं करम्भेण वि कल्पते.. (२) मेरी मंत्र शक्ति से पूर्व दिशा और उत्तर दिशा में उत्पन्न होने वाला विष प्रभावहीन हो जाए. दक्षिण, पश्चिम तथा नीचे की दिशा में उत्पन्न होने वाले विष करंभ (भात) से सामर्थ्यहीन हो जाए. (२) करम्भं कृत्वा तिर्यं पीबस्पाकममुदारथिम्. क्षुधा किल त्वा दुष्टनो जक्षिवान्त्स न रूरुपः.. (३) हे दुष्ट शरीर वाले विष! बिना जाने हुए खाया हुआ तू चरबी को जलाने वाला और उदर संबंधी रोगों का जनक है. इस पुरुष ने तुझे करंभ (भात) समझ कर खाया था. तू इस पुरुष को मूर्च्छित मत बना. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

वि ते मदं मदावति शरमिव पातयामसि. प्र त्वा चरुमिव येषन्तं वचसा स्थापयामसि.. (४) हे मूर्च्छित करने वाली जड़ीबूटी! तेरे मूर्च्छा लाने वाले विष को मैं शरीर से इस प्रकार दूर करता हूं, जिस प्रकार धनुष से छूटा हुआ बाण दूर गिरता है. हे विष! तू गुप्त रूप से जाने वाले दूत के समान शरीर के अंगों में व्याप्त हो जाता है. मैं अपनी मंत्र शक्ति से तुझे शरीर से निकाल कर दूर करता हूं. (४) परि ग्राममिवाचितं वचसा स्थापयामसि. तिष्ठा वृक्ष इव स्थामन्यभिखाते न रूरुप:.. (५) हे खोदने से प्राप्त होने वाली जड़ीबूटी! जनसमूह के समान प्रभावशाली तेरे विष को भी हम अपनी मंत्र शक्ति के द्वारा शरीर से निकाल कर दूर स्थापित करते हैं. तू अपने स्थान पर वृक्ष के समान निश्चल रह तथा इस पुरुष को मूर्च्छित मत कर. (५) पवस्तैस्त्वा पर्यक्रीणन् दूर्शीभिरजिनैरुत. प्रक्रीरसि त्वमोधे ऽ भ्रिखाते न रूरुप:.. (६) हे विषमूलक जड़ीबूटी! महर्षियों ने तुझे झाड़ू के तिनकों के बदले खरीदा है. तू हरिण आदि पशुओं के चर्म के बदले क्रय की गई है. तू बड़े परिश्रम से खरीदी गई है, इसलिए यहां से दूर हो जा और इस पुरुष को मूर्च्छित मत कर. (६) अनाप्ता ये वः प्रथमा यानि कर्माणि चक्रिरे. वीरान् नो अत्र मा दभन् तद् व एतत् पुरो दधे.. (७) हे पुरुषो! तुम्हारे प्रतिकूल आचरण करने वाले शत्रुओं ने पहले जो यज्ञ आदि कर्म किए हैं, उन कर्मों के द्वारा वे हमारे पुत्र, पौत्र आदि को इस स्थान पर हिंसित न करें. किया जाता हुआ यह चिकित्सा कर्म मैं उन की रक्षा के लिए तुम्हारे सामने उपस्थित करता हूं. (७) सूक्त-८ देवता—जल भूतो भूतेषु पय आ दधाति स भूतानामधिपतिर्बभूव. तस्य मृत्युश्चरति राजसूयं स राजा राज्यमनु मन्यतामिदम्.. (१) अभिषेक द्वारा ऐश्वर्य प्राप्त करने वाला राजा ही समृद्ध जनपदों में भोज्य सामग्री पहुंचाता है. इस प्रकार वह प्राणियों का स्वामी हुआ. मृत्यु के देव यमराज दुष्टों को दंड दिलाने और सज्जनों का पालन करने के लिए ही राजा का राजसूय यज्ञ कराते हैं. वह राजा इस राज्य को तथा दुष्ट निग्रह और सज्जन परिपालन के कर्म को स्वीकार करे. (१) अभि प्रेहि माप वेन उग्रश्चेत्ता सपत्नहा. ebook converter DEMO Watermarks*

आ तिष्ठ मित्रवर्धन तुभ्यं देवा अधि ब्रुवन्.. (२) हे राजा! तुम सिंहासन तथा हाथी, रथ, घोड़ा आदि सवारियों के प्रति अनिच्छा मत करो. तुम शक्तिशाली एवं कार्य अकार्य का ज्ञान रखने वाले हो. तुम शत्रु हंता हो, राजसिंहासन पर बैठ कर तुम मित्रों का कल्याण करो. इंद्र आदि देव तुम्हें अपना कहें. (२) आतिष्ठन्तं परि विश्वे अभूषञ्छ्रियं वसानश्चरति स्वरोचिः. महत् तद् वृष्णो असुरस्य नामा विश्वरूपो अमृतानि तस्थौ.. (३) सिंहासन पर बैठे हुए राजा की सब लोग सेवा करें. राजा भी सिंहासन पर बैठ कर राज्यलक्ष्मी को धारण करे, तेजस्वी बने तथा प्रजा पालन में तत्पर हो. अभिषेक से उत्पन्न राज्यतेज दसों दिशाओं में फैल जाए. शत्रुओं को दूर भगाने वाले राजा के नाममात्र से शत्रु भयभीत होने लगें. यह राजा शत्रु, मित्र, पत्नी आदि के प्रति विविध प्रकार का व्यवहार करता हुआ दंड, युद्ध, अध्ययन आदि कर्म करे. (३) व्याघ्रो अधि वैयाघ्रे वि क्रमस्व दिशो महीः. विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्त्वापो दिव्याः पयस्वतीः.. (४) हे राजा! तुम व्याघ्रचर्म पर बैठ कर और बाघ के समान अपराजेय हो कर पूर्व आदि विशाल दिशाओं को जीतो. तेजस्वी होने के कारण सारी प्रजाएं तुम्हारी कामना करें तथा दिव्य जल तुम्हारे राज्य को प्राप्त हो, जिस से तुम्हारे राज्य में अकाल न पड़े. (४) या आपो दिव्याः पयसा मदन्त्यन्तरिक्ष उत वा पृथिव्याम्. तासां त्वा सर्वासामपामभि षिञ्चामि वर्चसा.. (५) हे राजा! आकाश से बरसने वाले जो जल अपने रस से, प्राणियों को तृप्त करते हैं, अंतरिक्ष और पृथ्वी पर जो जल स्थित हैं, मैं तीनों लोकों में स्थित इन जलों से तुम्हारा अभिषेक करता हूं. (५) अभि त्वा वर्चसासिचन्नापो दिव्याः पयस्वतीः. यथासो मित्रवर्धनस्तथा त्वा सविता करत्.. (६) हे राजा! दिव्य जल अपने तेज से तुम्हें सींचे, जिस से तुम मित्रों के बढ़ाने वाले बनो. सब को प्रेरणा देने वाले सविता देव तुम्हें सामर्थ्य दें. (६) एना व्याघ्रं परिषस्वजानाः सिंहं हिन्वन्ति महते सौभगाय. समुद्रं न सुभुवस्तस्थिवांसं मर्मृज्यन्ते द्वीपिनमप्स्व १ न्तः.. (७) नदी के रूप में जल जिस प्रकार सागर को प्रसन्न करते हैं, उसी प्रकार दिव्य जल राजा को शक्तिशाली बनाएं. जिस प्रकार माता पुत्र का आलिंगन करती है, उसी प्रकार महान ebook converter DEMO Watermarks*

एहि जीवं त्रायमाणं पर्वतस्यास्यक्ष्यम्.

सौभाग्य प्राप्त करने के लिए जल राजा को शक्तिपूर्ण बनाते हैं. जल में वर्तमान गैंडे के समान अपराजेय राजा को सेवक जन अभिषेक के द्वारा और वस्त्राभूषणों से अलंकृत करें. (७) सूक्त-९ देवता—त्रैककुदांजन एहि जीवं त्रायमाणं पर्वतस्यास्यक्ष्यम्. विश्वेभिर्देवैर्दत्तं परिधिर्जीवनाय कम्.. (१) हे अंजन मणि! तू त्रिककुद नामक पर्वत से जीवित प्राणियों की रक्षा के लिए आ. तू त्रिककुद पर्वत की आंख है. इंद्र आदि सभी देवों ने रोग रहित रहने के लिए तुझे चहारदीवारी के रूप में प्रदान किया है. (१) परिपाणं पुरुषाणां परिपाणं गवामसि. अश्वानामर्वतां परिपाणाय तस्थिषे.. (२) हे त्रिककुद् पर्वत पर उत्पन्न अंजन मणि! तू पुरुषों, गायों, घोड़ों और घोड़ियों की रक्षा के लिए स्थित है. (२) उतासि परिपाणं यातुजम्भनमाञ्जन. उतामृतस्य त्वं वेत्थाथो असि जीवभोजनमथो हरितभेषजम्.. (३) हे अंजन! तू राक्षस, पिशाच आदि से उत्पन्न पीड़ा का नाश करने वाला है. तू अमृत का सार जानता है. तू अनिष्ट निवारण करने के कारण जीवों का पालक है. तू पांडु रोग से उत्पन्न कालेपन को दूर करने वाला है. (३) यस्याञ्जन प्रसर्पस्यङ्गमङ्गं परुष्परुः. ततो यक्ष्मं वि बाधस उग्रो मध्यमशीरिव.. (४) हे अंजन! तू जिस पुरुष के शरीर के सभी अंगों और अंगों की संधियों में प्रवेश कर के व्याप्त होता है, उस के शरीर से तू यक्ष्मा रोग को इस प्रकार दूर करता है, जिस प्रकार शक्तिशाली वायु मेघों के जल को क्षणमात्र में दूर ले जाती है. (४) नैनं प्राप्नोति शपथो न कृत्या नाभिशोचनम्. नैनं विष्कन्धमश्नुते यस्त्वा बिभर्त्याञ्जन.. (५) हे अंजन! जो पुरुष तुझे धारण करता है, उस तक दूसरे के द्वारा प्राप्त किया हुआ पाप नहीं पहुंचता तथा दूसरे व्यक्तियों द्वारा किए गए अभिचार से उत्पन्न कृत्या नाम की राक्षसी भी उस तक न पहुंचे. कृत्या से उत्पन्न शोक भी तुझे प्राप्त न हो तथा विघ्न भी उस तक न पहुंचे. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

असन्मन्त्राद् दुष्ष्वप्न्याद् दुष्कृताच्छमलादुत. दुर्हर्दश्चक्षुषो घोरात् तस्मान्नः पाह्याञ्जन.. (६) हे अंजन मणि! अभिचार संबंधी बुरे मंत्रों से उत्पन्न दुःख से, बुरे स्वप्नों से प्राप्त दुःख से, पूर्वजन्म में किए हुए पाप से, दूसरे के द्वारा किए हुए पाप से, दूषित मन से तथा दूसरों के क्रूर नेत्र से हमारी रक्षा करो. (६) इदं विद्वानाञ्जन सत्यं वक्ष्यामि नानृतम्. सनेयमश्वं गामहमात्मानं तव पूरुष.. (७) हे अंजन! तेरी महिमा को जानता हुआ मैं यथार्थ ही कहूंगा, असत्य नहीं बोलूंगा. तुम्हारा दास बन कर मैं घोड़ा, गाय एवं जीवन को प्राप्त करूं. (७) त्रयो दासा आञ्जनस्य तक्मा बलास आदहिः. वर्षिष्ठः पर्वतानां त्रिककुन्नाम ते पिता.. (८) कठिनता से जीवित रखने वाला ज्वर, सन्निपात और सर्प का विष—ये तीन दास के समान अंजन मणि के वश में हैं. अर्थात् अंजनमणि इन के विकार को दूर कर देती है. पर्वतों में सब से प्राचीन त्रिककुद तुम्हारा पिता है. (८) यदाञ्जनं त्रैककुदं जातं हिमवतस्परि. यातूंश्च सर्वाञ्जम्भयत् सर्वाश्च यातुधान्यः.. (९) हिमालय पर्वत के ऊपर के भाग में त्रिककुद नाम का पर्वत है. वहां उत्पन्न अंजन वृक्ष सभी राक्षसों और सभी राक्षसियों को नष्ट करे. (९) यदि वासि त्रैककुदं यदि यामुनमुच्यसे. उभे ते भद्रे नाम्नी ताभ्यां नः पाह्याञ्जन.. (१०) हे अंजन! तू मनुष्यों द्वारा चाहे त्रिककुद पर्वत से संबंधित कहा जाता है अथवा यमुना से संबंधित. तेरे त्रैककुद और यामुन दोनों ही नाम कल्याणकारी हैं. तू अपने दोनों नामों के द्वारा हमारी रक्षा कर. (१०) सूक्त-१० देवता—शंखमणि, तृशन वाताज्जातो अन्तरिक्षाद् विद्युतो ज्योतिषस्परि. स नो हिरण्यजाः शङ्खः कृशनः पात्वंहसः.. (१) वायु से उत्पन्न, अंतरिक्ष से उत्पन्न, बिजली से उत्पन्न, ज्योति मंडल के ऊपर के स्थान से उत्पन्न तथा स्वर्ग से उत्पन्न शंख पाप से हमारी रक्षा करे. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

यो अग्रतो रोचनानां समुद्रादधि जज्ञिषे. शङ्खेन हत्वा रक्षांस्यत्रिणो वि षहामहे.. (२) हे शंख! तू प्रकाशित होने वाले नक्षत्रों के आगे वर्तमान होता है तथा सागर के ऊपर वाले भाग पर जन्म लेता है. हम तेरे द्वारा राक्षसों और पिशाचों को पराजित करते हैं. (२) शङ्खेनामीवाममतिं शङ्खेन्रोत सदान्वा:. शङ्खो नो विश्वभेषज: कृशन: पात्वंहस:.. (३) हम मणि के रूप में प्राप्त शंख से रोग और सभी अनर्थों के मूल अज्ञान के साथसाथ दरिद्रता को भी पराजित करते हैं. सभी उपद्रवों का विनाशक और स्वर्ण से उत्पन्न शंख पाप से हमारी रक्षा करे. (३) दिवि जातः समुद्रजः सिन्धुतस्पर्याभृतः. स नो हिरण्यजा: शङ्ख आयुष्यतरणो मणि:.. (४) शंख पहले स्वर्गलोक में और उस के बाद समुद्र में उत्पन्न हुआ. नदी के उद्गम स्थान से लाया हुआ तथा स्वर्ण निर्मित शंख और शंख से निर्मित मणि हमारी आयु वृद्धि करने वाली हो. (४) समुद्राज्जातो मणिवृ॑त्राज्जातो दिवाकर:. सो अस्मान्त्सर्वतः पातु हेत्या देवासुरेभ्य:.. (५) समुद्र अथवा आकाश से उत्पन्न मणि शंख का उपादान है अर्थात् मणि से ही शंख का निर्माण होता है. यह मणि निर्मित शंख बादलों से बाहर निकले सूर्य के समान चमकता है. शंख से निर्मित यह मणि हमें देवों और असुरों के भय से बचाए. (५) हिरण्यानामेको ऽ सि सोमात् त्वमधि जज्ञिषे. रथे त्वमसि दर्शत इषधौ रोचनस्त्वं प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (६) हे शंख! तू स्वर्ण, रजत आदि भास्वर द्रव्यों में प्रमुख है, क्योंकि तू अमृतमय चंद्रमंडल से उत्पन्न हुआ है. युद्धों में तू रथों पर दिखाई देने योग्य है. तरकश में भरा हुआ तू दीप्त दिखाई देता है. इस प्रकार का शंख अथवा शंख से निर्मित मणि हमारी आयु को बढ़ाए. (६) देवानामस्थि कृशनं बभूव तदात्मन्वच्चरत्यप्स्व १ न्तः. तत् ते बध्नाम्यायुषे वर्च॑से बलाय दीर्घायुत्वाय शतशारदाय कार्शनस्त्वाभि रक्षतु.. (७) इंद्र आदि देवों का जो रक्षक था, वह स्वर्ण शंख का कारण हुआ अर्थात् स्वर्ण से शंख का निर्माण हुआ. वह स्वर्ण शंख के रूप में शरीर धारण कर के जलों के भीतर विद्यमान ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-११ देवता—इंद्र के रूप में

रहता है. हे यज्ञोपवीतधारी ब्रह्मचारी! मैं इस प्रकार से शंख के रूप में स्थित स्वर्ण को तेरे शरीर में चिरकाल जीवन के लिए बांधता हूं. यह स्वर्ण संबंधी मणि तुझे शक्ति, तेज एवं दीर्घ आयु प्रदान करने के साथसाथ सौ वर्ष तक तेरी रक्षा करे. (७) सूक्त-११ देवता—इंद्र के रूप में अनड्वान् अनड्वान् दाधार पृथिवीमुत द्यामनड्वान् दाधारोर्व १ न्तरिक्षम्. अनड्वान् दाधार प्रदिशः षडुर्वीरनड्वान् विश्वं भुवनमा विवेश.. (१) गाड़ी ढोने में समर्थ बैल हल जोतने आदि के कारण पृथ्वि का पोषक है. वही बैल चरु, पुरोडाश आदि की उत्पत्ति में सहायक होने के कारण आकाश और अंतरिक्ष को भी धारण करता है. पूर्व आदि महा दिशाओं का पोषण कर्ता भी यही धर्म रूपी बैल है. इस प्रकार ब्रह्मा द्वारा बनाया गया यह बैल पृथ्वि आदि सभी लोकों की रक्षा के लिए उन में प्रवेश कर के स्थित रहता है. (१) अनड्वानिन्द्रः स पशुभ्यो वि चष्टे त्र्याञ्छक्रो वि मिमीते अध्वनः. भूतं भविष्यद् भुवना दुहानः सर्वा देवानां चरति व्रतानि.. (२) यह बैल इंद्र है. इसलिए सभी पशुओं की अपेक्षा अधिक तेजस्वी है. जिस प्रकार बैल अविच्छिन्न रूप से संतान उत्पन्न करता है, इंद्र उसी प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमान वस्तुओं को उत्पन्न करता हुआ अन्य देवों के कार्य करता है. (२) इन्द्रो जातो मनुष्येष्वन्तर्घर्मस्तप्तश्चरति शोशुचानः. सुप्रजाः सन्तस उदारे न सर्षद् यो नाश्नीयादनडुहो विजानन्.. (३) मनुष्यों में वह बैल इंद्र के समान है. वह बैल धर्म है. वह सूर्य के रूप में सारे जगत् को ऊर्जा एवं प्रकाश देता हुआ विचरण करता है. जो हमारे द्वारा बैल को दिया गया महत्त्व विशेष रूप से जानता है, वह सभी सुखों को भोगता है और शोभन संतान युक्त हो कर देह त्याग करने के बाद संसार में नहीं आता. (३) अनड्वान् दुहे सुकृतस्य लोक ऐनं प्याययति पवमानः पुरस्तात्. पर्जन्यो धारा मरुत ऊधो अस्य यज्ञः पयो दक्षिणा दोहो अस्य.. (४) इंद्र देव रूपी यह बैल यज्ञ आदि पुण्य से प्राप्त लोकों में अधिक फल देता है. यज्ञ के आरंभ में शोधन किया गया यह अमृतमय सोम इस बैल को रस से भर देता है. वृष्टि प्रेरकदेव दुग्ध की धारा है. उनचास पवन ऐन हैं, सभी प्रकार का यज्ञ इस का दूध है और यज्ञ में दी गई दक्षिणा ही दुहने की क्रिया है. इस प्रकार इस इंद्र और धर्म रूपी बैल का दोहन अक्षय होता है. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

यस्य नेशे यज्ञपतिर्न यज्ञो नास्य दातेशे न प्रतिग्रहीता. यो विश्वजिद् विश्वभृद् विश्वकर्मा घर्मं नो ब्रूत यतमश्चतुष्पात्.. (५) यजमान इस देवता रूप बैल का स्वामी नहीं है. यज्ञ, दान देने वाला और दान ग्रहण करने वाला भी इस का स्वामी नहीं है. यह विश्व को जीतने वाला तथा विश्व का भरणपोषण करने वाला है. समस्त विश्व इसी का कार्य है. चार चरणों वाला यह वृषभ हमें तेजस्वी सूर्य का स्वरूप बताता है. (५) येन देवाः स्वरारुरुहुर्हित्वा शरीरममृतस्य नाभिम्. तेन गेष्म सुकृतस्य लोकं घर्मस्य व्रतेन तपसा यशस्यवः.. (६) इस वृषभ रूप धर्म की सहायता से देवगण शरीर त्याग कर स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं. वह स्वर्ग अमृत की नाभि है. इस वृषभ की सहायता से हम पुण्य के फल के रूप में प्राप्त भूलोक पर विजय करते हैं. दीप्ति वाले सूर्य से संबंधित वृत्त के द्वारा हम आदित्य के सुख की इच्छा करते हैं. (६) इन्द्रो रूपेणाग्निर्वहेन प्रजापतिः परमेष्ठी विराट्. विश्वानरे अक्रमत वैश्वानरे अक्रमतानडुह्यक्रमत. सो ऽ दृंहयत सो ऽ धारयत.. (७) यह वृषभ आकृति से इंद्र तथा अपने कंधे से अग्नि के समान है. इस प्रकार यह वृषभ प्रजापति रूप है. (७) मध्यमेतदनडुहो यत्रैष वह आहितः. एतावदस्य प्राचीनं यावान् प्रत्यङ् समाहितः.. (८) इस वृषभ के शरीर में प्रजापति ब्रह्म प्रविष्ट हैं. उन्होंने इस के शरीर के मध्य भाग को भार वहन करने योग्य बनाया है. इस के मध्य भाग में भार रखा है. इस के अगले और पिछले दोनों भाग समान हैं. (८) यो वेदानडुहो दोहान्त्सप्तानुपदस्वतः. प्रजां च लोकं चाप्नोति तथा सप्तऋषयो विदुः.. (९) जो पुरुष इस बैल के क्षय रहित जौ आदि रूप सात दोहनों को जानता है, वह पुत्र, पौत्र आदि संतान तथा स्वर्ग आदि लोकों को प्राप्त करता है. इस बात को सप्त ऋषि जानते हैं. (९) पद्भिः सेदिमवक्रामन्निरां जङ्घाभिरुत्खिदन्. श्रमेणानड्वान् कीलालं कीनाशश्चाभि गच्छतः.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

यह प्रजापति रूप वृषभ निराशा उत्पन्न करने वाली दरिद्रता को अपने चारों चरणों से औंधे मुंह गिरा कर अपनी जंघाओं से धरती को खोदता है. यह बैल अपने श्रम से किसान को अन्न देता है. (१०) द्वादश वा एता रात्रीर्व्रत्या आहुः प्रजापतेः. तत्रोप ब्रह्म यो वेद तद् वा अनडुहो व्रतम्.. (११) इस वृषभ में व्याप्त यज्ञात्मक प्रजापति के व्रत के योग्य बारह रात्रियों को विद्यमान बताते हैं. उन रात्रियों में प्रजापति रूपी वृषभ को जो जानता है, वही इस व्रत का अधिकारी है. (११) दुहे सायं दुहे प्रातर्दुहे मध्यन्दिनं परि. दोहा ये अस्य संयन्ति तान् विद्वांनुपदस्वतः.. (१२) ऊपर बताए गए लक्षणों वाले वृषभ को मैं सायंकाल, प्रातःकाल और दोपहर के समय दुहता हूं. मैं सभी यज्ञों के अनुष्ठान के फलों को भी दुहता हूं. इस वृषभ के जो दोहन फल प्रदान करते हैं, उन्हें मैं जानता हूं. (१२) सूक्त-१२ देवता—रोहिणी वनस्पति रोहण्यसि रोहण्यस्थ्नश्छिन्नस्य रोहिणी. रोहयेदमरुन्धति.. (१) हे लाल रंग वाली लाख! तू घाव को भरने वाली है, इसलिए तू तलवार की धार से कटे हुए इस अंग से बहते रक्त को उसी स्थान पर रोक दे. हे अरुंधती देवी! तू इस रक्त निकले हुए अंग को रक्त युक्त एवं बिना घाव वाला बना. (१) यत् ते रिष्टं यत् ते द्युत्तमस्ति पेष्ट्रं त आत्मनि. धाता तद् भद्रया पुनः सं दधत् परुषा परुः.. (२) हे शस्त्र से घायल पुरुष! तेरा जो अंग घायल और शस्त्र प्रहार की वेदना से जल रहा है तथा तेरा जो अंग मुगदर आदि के प्रहार से भग्न हो गया है, विधाता तेरे उन अंगों को लाख के द्वारा जोड़ दे. (२) सं ते मज्जा मज्ज्ञा भवतु समु ते परुषा परुः. सं ते मांसस्य विस्रस्तं समस्थ्यपि रोहतु.. (३) हे घायल पुरुष! तेरे शरीर की जो चरबी चोट से विभक्त हो गई है, वह जुड़ जाए और तू सुख का अनुभव करे. तेरे शरीर की टूटी हुई हड्डी भी जुड़ जाए. प्रहार के घाव से कटा हुआ मांस सुखपूर्वक उत्पन्न हो जाए तथा तेरे शरीर की टूटी हुई हड्डी सुख से जुड़ जाए. (३) ebook converter DEMO Watermarks*