अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
को पणियों द्वारा चुराई गई गायों की खोज के लिए बुलाया जाता है तथा जिन इंद्र के विषय में अर्चना के साधन मंत्र आश्रित हैं, वह इंद्र हमें पाप से बचाएं. (५) यः प्रथमः कर्मकृत्याय जज्ञे यस्य वीर्यं प्रथमस्यानुबुद्धम्. येनोद्यतो वज्रो ऽ भ्यायताहिं स नो मुञ्चत्वंहसः.. (६) जो इंद्र प्रमुख रूप से ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ करने के लिए उत्पन्न हुए थे, जिन प्रमुख इंद्र का वृत्र हनन संबंधी शौर्य कर्म प्रसिद्ध है तथा जिन के द्वारा उठाया गया वज्र सभी ओर हिंसा करता है, वह इंद्र देव मुझे पाप से बचाएं. (६) यः सङ्ग्रामान् नयति सं युधे वशी यः पुष्टानि संसृजति द्वयानि. स्तौमीन्द्रं नाथितो जोहवीमि स नो मुञ्चत्वंहसः.. (७) जो स्वतंत्र इंद्र प्रहार करने के लिए युद्ध करते हैं, जो पुष्ट स्त्रीपुरुषों के जोड़े बनाते हैं, मैं फल की कामना से उन्हीं इंद्र की स्तुति करता हूं और उन के निमित्त बारबार हवन करता हूं. वह मुझे पाप से छुड़ाएं. (७) सूक्त-२५ देवता—वायु, सविता वायोः सवितुर्विदथानि मन्महे यावात्मन्वद् विशथो यौ च रक्षथः. यौ विश्वस्य परिभू बभूवथुस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (१) वायु और सविता के वेदों में वर्णन किए गए कर्मों को मैं जानता हूं. हे वायु एवं सविता देव! तुम दोनों स्थावर और संगम जीवों में प्रवेश करते हो एवं रक्षा करते हो. तुम दोनों विश्व की रक्षा के लिए उत्पन्न हुए हो. तुम दोनों हमें पाप से छुड़ाओ. (१) ययोः सङ्ख्याता वरिमा पार्थिवानि याभ्यां रजो युपितमन्तरिक्षे. ययोः प्रायं नान्वानशे कश्चन तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (२) जिन वायु और सविता देव के महत्त्व जनों के द्वारा भलीभांति प्रसिद्ध हैं, जिन दोनों के द्वारा आकाश में जल को धारण किया जाता है तथा कोई अन्य देव जिन वायु और सविता के उत्तम गमन को प्राप्त नहीं कर पाता, वे दोनों हमें पाप से मुक्त करें. (२) तव व्रते नि विशन्ते जनासस्त्वय्युदिते प्रेरते चित्रभानो. युवं वायो सविता च भुवनानि रक्षथस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (३) हे सविता! तुम से संबंधित कर्म में लोग नियम से लगे रहते हैं. हे विचित्र दीप्ति वाले सूर्य! तुम्हारे निकलने पर सभी लोग अपनेअपने काम में लग जाते हैं. तुम दोनों अर्थात् वायु और सविता लोकों की रक्षा करते हो. तुम दोनों हमें पाप से बचाओ. (३)
अपेतो वायो सविता च दुष्कृतमप रक्षांसि शिमिदां च सेधतम्. सं हू ३ र्जया सृजथः सं बलेन तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (४) हे वायु एवं सविता देव! तुम मेरे पाप को मुझ से दूर करो. उपद्रवकारी राक्षसों तथा जलती हुई कृत्या राक्षसी को यहां से दूर भगाओ. तुम ऊर्जा और बल से मेरा सृजन करो तथा मुझे पाप से बचाओ. (४) रयिं मे पोषं सवितोत वायुस्तनू दक्षमा सुवतां सुशेवम्. अयक्षमतातिं मह इह धत्तं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (५) सविता और वायु मेरे लिए धन और पुष्टि को प्रेरित करें. ये दोनों मेरे शरीर में सुख एवं बल प्रदान करें. इस यजमान के शरीर में ये दोनों रोगहीनता तथा तेज धारण करें और हमें पाप से बचाएं. (५) प्र सुमतिं सवितर्वाय ऊतये महस्वन्तं मत्सरं मादयाथः. अर्वाग् वामस्य प्रवतो नि यच्छतं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (६) हे सविता एवं वायु देव! हमारी रक्षा के लिए हमें उत्तम बुद्धि प्रदान करो तथा दीप्तिशाली एवं मादक सोमरस को पी कर प्रसन्न बनो. तुम दोनों उत्तम धन को हमारी ओर प्रेरित करो तथा हमें पाप से छुड़ाओ. (६) उप श्रेष्ठा न आशिषो देवयोर्धामन्नस्थिरन्. स्तौमि देवं सवितारं च वायुं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (७) वायु और सविता देव के तेज के विषय में हमारी उत्तम एवं फलदायक प्रार्थनाएं उपस्थित हैं. हम धन आदि गुणों से युक्त वायु एवं सविता देव की स्तुति करते हैं. ये दोनों हमें पाप से छुड़ाएं. (७) सूक्त-२६ देवता—द्यावा, पृथिवी मन्वे वां द्यावापृथिवी सुभोजसौ सचेतसौ ये अप्रथेथाममिता योजनानि. प्रतिष्ठे ह्यभवतं वसूनां ते नो मुञ्चतमंहसः.. (१) हे द्यावा पृथ्वी! तुम दोनों शोभन भोगों वाले एवं समान चित्त वाले हो. मैं तुम्हारी स्तुति करता हूं. तुम दोनों अनंत योजन विस्तार वाले हो. तुम दोनों निवास करने वाले देव मनुष्यों अथवा धनों के उत्तम स्थान बनते हों. तुम दोनों हमें पाप से छुड़ाओ. (१) प्रतिष्ठे ह्यभवतं वसूनां प्रवृद्धे देवी सुभगे ऊरूची. द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (२)
सभी प्राणियों के आधार बने हुए द्यावा पृथ्वी सारे जगत् में प्रविष्ट हैं. हे दिव्य, उत्तम सौभाग्य वाले एवं व्याप्त द्यावा पृथ्वी! मेरे सुख के कारण बनो एवं मुझे पाप से बचाओ. (२) असन्तापे सुतपसौ हुवे ऽ हमुर्वी गम्भीरे कविभिर्नमस्ये. द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (३) संताप रहित, उत्तम ताप वाले, गंभीर एवं विद्वानों द्वारा नमस्कार के योग्य द्यावा पृथ्वी, मेरे सुख के कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (३) ये अमृतं बिभृथो ये हवींषि ये स्त्रोत्या बिभृथो ये मनुष्यान्. द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (४) जो द्यावा पृथ्वी अमृत को धारण करते हैं तथा जो चरु, पुरोडाश आदि को, नदियों को एवं मनुष्यों को धारण करते हैं, वे मेरे लिए सुख के कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (४) ये उस्रिया बिभृथो ये वनस्पतीन् ययोर्वा विश्वा भुवनान्यन्तः. द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (५) जो द्यावा पृथ्वी सभी गायों को धारण करते हैं, जो सभी वृक्षों को धारण करते हैं तथा जिन दोनों के मध्य समस्त भवन हैं, वे द्यावा पृथ्वी, मेरे लिए सुख का कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (५) ये कीलालेन तर्पयथो ये घृतेन याभ्यामृते न किं चन शक्नुवन्तिः. द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (६) जो द्यावा पृथ्वी अन्न एवं घृत के द्वारा समस्त विश्व को तृप्त करते हैं, जिन दोनों के बिना मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकते, वे द्यावा पृथ्वी मेरे लिए सुख का कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (६) यन्मेदमभिशोचति येनयेन वा कृतं पौरुषेयान्न दैवात्. स्तौमि द्यावापृथिवी नाथितो जोहवीमि ते नो मुञ्चतमंहसः.. (७) यह पाप और उस का फल मुझे सभी ओर से जलाता है एवं इसी के कारण बारबार पाप किए जाते हैं. पुरुषों से प्रेरित पाप के समान देव कर्मों से संबंधित पाप भी मुझे जलाता है. मैं फल की कामना से द्यावा पृथ्वी की स्तुति करता हूं. ये दोनों मुझे पाप से छुड़ाएं. (७) सूक्त-२७ देवता—मरुत् मरुतां मन्वे अधि मे ब्रुवन्तु प्रेमं वाजं वाजसाते अवन्तु. आशूनिव सुयमानह्व ऊतये ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
मैं उनचास मरुतों का माहात्म्य जानता हूं. वे मरुत मुझे अपना कहें. अन्न के लाभ का अवसर आने पर वे इस अन्न की मेरे लिए रक्षा करें. मैं घोड़ों की लगाम के समान संयमित मरुतों को अपनी रक्षा के लिए बुलाता हूं. वे मुझे पाप से छुड़ाएं. (१) उत्समक्षितं व्यचन्ति ये सदा य आसिञ्चन्ति रसमोषधीषु. पुरो दधे मरुतः पृश्निमातृंस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (२) जो मरुत सदैव वर्षा की धाराओं से युक्त एवं विनाश रहित मेघ को आकाश में फैलाते हैं तथा गेहूं, जौ, वृक्ष आदि में रस सींचते हैं. मध्यमा वाणी जिन की माता हैं, ऐसे मरुतों को मैं अपने सामने रखता हूं. वे मुझे पाप से बचाएं. (२) पयो धेनूनां रसमोषधीनां जवमर्वतां कवयो य इन्वथ. शग्मा भवन्तु मरुतो नः स्योनास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (३) हे मरुतो! तुम क्रांतदर्शी हो कर गायों के दूध को, जड़ीबूटियों के रस को तथा घोड़ों के वेग को बढ़ाते हो. सभी कार्य करने में समर्थ वे मरुत् हमारे लिए सुखकारी हों तथा हमें पाप से बचाएं. (३) अपः समुद्राद् दिवमुद् वहन्ति दिवस्पृथिवीमभि ये सृजन्ति. ये अद्भििरीशाना मरुतश्चरन्ति ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (४) जो मरुत् सागर के जल को मेघों के द्वारा अंतरिक्ष में पहुंचाते हैं, इस के पश्चात उसी जल को अंतरिक्ष से धरती पर छोड़ते हैं, उन्हीं जलों के स्वामी बन कर जो मरुत् विचरण करते हैं, वे हमें पाप से छुड़ाएं. (४) ये कीलालेन तर्पयन्ति ये घृतेन ये वा वयो मेदसा संसृजन्ति. ये अद्भििरीशाना मरुतो वर्षयन्ति ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (५) मरुत् वर्षा से उत्पन्न अन्न के द्वारा एवं जलों के द्वारा जनों को तृप्त करते हैं. जो पक्षियों को चरबी से युक्त करते हैं, जो मरुत् मेघों के ईश बन कर विचरण करते हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (५) यदीदिदं मरुतो मारुतेन यदि देवा दैव्येनेद्गार. यूयमीशिध्वे वसवस्तस्य निष्कृतेस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (६) हे मरुतो! यदि मेरा दुःख अथवा दुःख का कारण पाप मुझे मरुत् संबंधी अपराध के कारण प्राप्त हुआ है, हे इंद्र आदि देवो! यदि मुझे यह दुःख देव संबंधी अपराध के कारण प्राप्त हुआ है तो हे मरुतो! इस दुःख अथवा पाप को मिटाने में तुम समर्थ हो. तुम मुझे पाप से छुड़ाओ. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-२८ देवता—भव, शर्व
तिग्ममनीकं विदितं सहस्वन् मारुतं शर्धः पृतनासूग्रम्. स्तौमि मरुतो नाथितो जोहवीमि ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (७) तीक्ष्ण समय बना हुआ प्रसिद्ध एवं पराजित करने वाला मरुतों का बल सेनाओं को दुःसह होता है. उन्हीं मरुतों की मैं स्तुति करता हूं एवं उन्हें सुख प्राप्ति के लिए बुलाता हूं. वे मुझे पाप से बचाएं. (७) सूक्त-२८ देवता—भव, शर्व भवाशर्वौ मन्वे वां तस्य वित्तं ययोर्वामिदं प्रदिशि यद् विरोचते. यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (१) हे भव और शर्व! मैं तुम्हारा महत्त्व जानता हूं. मेरे द्वारा कहा जाता हुआ अपना महत्त्व तुम जानो. तुम दोनों के शासन में यह सारा विश्व प्रकाशित होता है. भव और शर्व शत्रुओं को अपने वज्र से संयुक्त करते हैं, इस समय क्या उत्पन्न हुआ है, ऐसी खोज करने वाले राक्षसों को भी अपने आयुध से मारो. जो भव और शर्व इस विश्व के दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (१) ययोरभ्यध्व उत यद् दूरे चिद् यौ विदिताविषुभृतामसिष्ठौ. यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (२) जिन भव और शर्व के मार्ग के समीप अथवा दूर जो कुछ भी है, वह उन्हीं के अधिकार में है, जो भव और शर्व सब के द्वारा ज्ञात, वपुषधारी और बाण फेंकने में कुशल है, जो इस संसार के दो पैरों वाले मनुष्य तथा चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (२) सहस्राक्षौ वृत्रहणा हुवे ऽ हं दूरेगव्यूती स्तुवन्नेम्युग्रौ. यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (३) मैं हजार आंखों वाले वृत्र का व्रत करता हूं एवं दूर देश में वर्तमान भव और शर्व का आह्वान करता हूं. मैं उन्हीं शक्तिशालीयों की प्रशंसा करता हूं जो भव और शर्व इस संसार के दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (३) यावारेभाथे बहु साकमग्रे प्र चेदसाष्टमभिभां जनेषु. यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (४) हे भव और शर्व! तुम ने सृष्टि के आदि में बहुत से प्राणियों के समूह का निर्माण किया है. इस के पश्चात उन में वीर्य की पर्याप्त मात्रा में रचना कर, जो भव और शर्व इस विश्व के दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से छुड़ाएं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
ययोर्वधान्नापपद्यते कश्चनान्तर्देवेषूत मानुषेषु. यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (५) जिन भव और शर्व के हनन साधन आयुधों से देवों और मनुष्यों के मध्य कोई नहीं बचता तथा जो इस विश्व के दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (५) यः कृत्याकृन्मूलकृद् यातुधानो नि तस्मिन् धत्तं वज्रमुग्रौ. यावस्येशाथे द्विपदो यौ चतुष्पदस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (६) हे भव और शर्व! जो शत्रु कृत्या राक्षसी के द्वारा दूसरों का विनाश करता है एवं जो राक्षस वंशवृद्धि के मूल आधार संतान का विनाश करता है, इन दोनों प्रकार के शत्रुओं पर अपना वज्र छोड़ो. जो भव और शर्व इस विश्व के दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (६) अधि नो ब्रूतं पृतनासूग्रौ सं वज्रेण सृजतं यः किमीदी. स्तौमि भवाशर्वौ नाथितो जोहवीमि तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (७) हे पराजित न होने वाले भव और शर्व! हमारे विषय में पक्षपात के वचन कहो एवं संग्रामों में हमारे बल को पराजित न होने वाला बनाओ. मैं द्यावा और पृथ्वी की स्तुति करता हूं. मुझे पाप से छुड़ाएं. (७) सूक्त-२९ देवता—मित्र, वरुण मन्वे वां मित्रावरुणावृतावृधौ सचेतसौ द्रुह्वणो यौ नुदेथे. प्र सत्यावानमवथो भरेषु तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (१) हे ऋत् अर्थात् सत्य, जल अथवा यज्ञ को बढ़ाने वाले एवं समान ज्ञान वाले मित्र और वरुण! मैं तुम दोनों के महत्त्व की स्तुति करता हूं. तुम द्रोह करने वालों का हनन कर देते हो. तुम सत्यप्रतिज्ञ पुरुष की संग्राम में रक्षा करते हो. ऐसे मित्र और वरुण मुझे पाप से बचाएं. (१) सचेतसौ द्रुह्वणो यौ नुदेथे प्र सत्यावानमवथो भरेषु. यौ गच्छथो नृचक्षसौ बभ्रुणा सुतं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (२) हे समान ज्ञान वाले मित्र और वरुण! तुम दोनों द्रोह करने वालों का पतन करते हो और सत्यप्रतिज्ञ जनों की युद्ध में रक्षा करते हो. तुम दोनों पीले रंग के रथ के द्वारा चल कर निचोड़े गए सोमरस को प्राप्त करते हो एवं मनुष्यों के कर्मों के साक्षी हो. तुम दोनों हमें पाप से बचाओ. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
यावङ्गिरसमवथो यावगस्तिं मित्रावरुणा जमदग्निमत्रिम्. यौ कश्यपमवथो यौ वसिष्ठं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (३) हे मित्र और वरुण! तुम अगस्त्य, अंगिरस, जमदग्नि एवं अत्रि ऋषि की रक्षा करते हो. जिन मित्र और वरुण ने कश्यप और वसिष्ठ ऋषियों की रक्षा की, वे हमें पाप से छुड़ाएं. (३) यौ श्यावाश्वमवथो वध्रयश्वं मित्रावरुणा पुरुमीढमत्रिम्. यौ विमदमवथः सप्तवध्रिं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (४) जिन मित्र और वरुण ने श्यावाश्व, वध्रयश्व पुरुषमीढ एवं अत्रि की रक्षा की, जिन मित्र और वरुण ने विमद और सप्तवधि ऋषि की रक्षा की, वे हमें पाप से बचाएं. (४) यौ भरद्वाजमवथो यौ गविष्ठिरं विश्वामित्रं वरुण मित्र कुत्सम्. यौ कक्षीवन्तमवथः प्रोत कण्वं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (५) हे मित्र और वरुण! तुम ने भरद्वाज, गविष्ठिर, विश्वामित्र एवं कुत्स ऋषि की रक्षा की. जिन मित्र और वरुण ने कक्षीवान तथा कण्व ऋषि की रक्षा की, वे हमें पाप से बचाएं. (५) यौ मेधातिथिमवथो यौ त्रिशोकं मित्रावरुणावुशनां काव्यं यौ. यौ गोतममवथः प्रोत मुद्गलं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (६) जिन मित्र और वरुण ने मेधातिथि, त्रिशक तथा शुक्राचार्य के पुत्र उशना ऋषि की रक्षा की, जिन्होंने गोतम एवं मुद्गल ऋषि की रक्षा की, वे हमें पाप से छुड़ाएं. (६) ययो रथः सत्यवर्त्मर्जुरश्मिर्मिथुया चरन्तमभियाति दूषयन्. स्तौमि मित्रावरुणौ नाथितो जोहवीमि तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (७) जिन मित्र और वरुण का सत्यमार्ग पर चलने वाला एवं रस्सियों से युक्त रथ निषिद्ध मार्ग पर चलते हुए पुरुष को बाधा पहुंचाता हुआ सामने आता है, मैं ऐसे मित्र और वरुण की स्तुति करता हूं एवं सुख की इच्छा से उन के निमित्त बारबार हवन करता हूं. वे दोनों मुझे पाप से बचाएं. (७) सूक्त-३० देवता—वाक् अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः. अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा.. (१) अंभृण महर्षि की ब्रह्मवादिनी पुत्री वाक् ने स्वयं को ब्रह्म समझ कर स्तुति की है. मैं रुद्रों और वसुओं के साथ संचरण करती हूं. मैं आदित्यों और विश्वे देवों के साथ संचरण करती हूं. मित्र और वरुण को मैं ही धारण करती हूं. इंद्र, अग्नि तथा दोनों अश्विनीकुमारों को भी मैं ने ebook converter DEMO Watermarks*
ही धारण किया है. (१) अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्. तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तः.. (२) मैं ही दिखाई देने वाले विश्व का नियंत्रण करने वाली, उपासकों को फल के रूप में धन दिलाने वाली, परब्रह्म का साक्षात्कार करने वाली तथा यज्ञ के योग्य देवों में प्रमुख हूं. अनेक भाग से प्रपंचों में स्थित मुझ को उपासकों को फल देने वाले देव बहुत से साधनों में निर्धारित करते हैं. (२) अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवानामुत मानुषाणाम्. यं कामये तन्तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्.. (३) मैं ही स्वयं अनुभव किए गए ब्रह्म के विषय में लोकहित की दृष्टि से कह रही हूं. वह ब्रह्म देवों और मनुष्यों का प्रिय है. मैं जिसजिस पुरुष की रक्षा करना चाहती हूं, उसउस को बलवान बना देती हूं. मैं उसे ब्रह्म, ऋषि और उत्तम बुद्धि वाला बना देती हूं. (३) मया सो ऽ न्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम्. अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धेयं ते वदामि.. (४) भोग करने वाला जो मनुष्य अन्न खाता है, वह मुझ शक्तिरूपा के द्वारा ही अन्न खाता है. जो मनुष्य विश्व को देखता है, सांस लेता है अथवा सुनता है, ये सब व्यापार शक्ति स्थानों में मैं ही करती हूं. मुझे न मानते हुए वे संसार में क्षीण होते हैं. हे सखा! मेरी कही हुई बात सुन. मैं तुझे श्रद्धा के योग्य ब्रह्म का उपदेश करती हूं. (४) अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ. अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश.. (५) मैं ब्राह्मणों के द्वेषी एवं हिंसकों को मारने के लिए महादेव का धनुष तानती हूं अर्थात् उस की डोरी खींचती हूं. मैं ही स्तोता जन के लिए संग्राम करती हूं तथा द्यावा और पृथ्वी में मैं ही प्रविष्ट हूं. (५) अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्. अहं दधामि द्रविणा हविष्मते सुप्राव्या ३ यजमानाय सुन्वते.. (६) निचोड़ने योग्य सोमरस को अथवा शत्रुओं का विनाश करने एवं स्वर्ग में स्थित सोम को मैं ही धारण करती हूं. त्वष्टा, पूषा और भव को भी मैं ही धारण करती हूं. हवि लिए हुए, देवों को हवि प्राप्त कराने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान के लिए यज्ञ के फल के रूप में धन मैं ही धारण करती हूं. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्व १ न्तः समुद्रे. ततो वि तिष्ठे भुवनानि विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि.. (७) इस दिखाई देने वाले प्रपंच के ऊपरी भाग अर्थात् सत्यलोक में वर्तमान इस प्रपंच के जनक को मैं जानती हूं. इस जगत् के कारण रूप मेरा उत्पत्ति स्थान सागर के जलों में स्थित हैं. तेज का कारण होने से मैं भुवनों को प्रकाशित करती हूं. मैं इस देह से स्वर्ग का स्पर्श करती हूं. (७) अहमेव वात इव प्र वाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा. परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावत्ती महिम्ना सं बभूव.. (८) सभी भूतों को कारण के रूप में उत्पन्न करती हुई मैं वायु के समान वर्तमान हूं. इस आकाश और इस पृथ्वी से भिन्न रहने वाली मैं अपनी महिमा से इस प्रकार की हुई हूं. (८) सूक्त-३१ देवता—मन्यु त्वया मन्यो सरथमारुजन्तो हर्षमाणा हृषितासो मरुत्वन्. तिग्मेषव आयुधा संशिशाना उप प्र यन्तु नरो अग्निरूपा:.. (१) हे क्रोध के अभिमानी देव मन्यु! तेरे द्वारा रथ वाले शत्रु को पीड़ित करते हुए, प्रसन्न एवं क्रोध में भरे, तेज बाणों वाले तथा आयुधों की धार तेज करते हुए हमारे मनुष्य तेरी कृपा से वायु के समान वेग वाले एवं अग्नि के समान अपराजित बन कर शत्रु के पास जाएं. (१) अग्निरिव मन्यो त्विषितः सहस्व सेनानीर्नः सहुरे हूत एधि. हत्वाय शत्रून् वि भजस्व वेद ओजो मिमानो वि मृधो नुदस्व.. (२) हे मन्यु! तुम आग के समान दीप्त हो कर शत्रुओं को पराजित करो. हे सहनशील मन्यु! तुम हमारी सेना के सेनापति बन कर बुलाए जाने पर आओ और हमारे शत्रुओं को मार कर उन का धन हमें प्रदान करो. तुम शक्ति का प्रदर्शन करते हुए संग्रामकारी शत्रुओं का वध करो. (२) सहस्व मन्यो अभिमातिमस्मै रुजन् मृणन् प्रमृणन् प्रेहि शत्रून्. उग्रं ते पाजो नन्वा रुरुध्रे वशी वशं नयासा एकज त्वम्.. (३) हे मन्यु! इस राजा के शत्रु की सेना के हाथी, घोड़े आदि को कुचलते हुए एवं नष्ट करते हुए शत्रुओं को पराजित करने के लिए आओ. हे अधिक शक्तिशाली मन्यु! तुम्हारे बल को कोई रोक नहीं सकता. हे बिना सहायक के कार्य करने वाले एवं सब को वश में करने वाले मन्यु! तुम सभी जनों को स्वाधीन बनाते हो. (३) एको बहूनामसि मन्य ईडिता विशंविशं युद्धाय सं शिशाधि. ebook converter DEMO Watermarks*
अकृत्तरुक् त्वया युजा वयं द्युमन्तं घोषं विजयाय कृण्मसि.. (४) हे मन्यु! हमारे द्वारा स्तुत तुम अकेले ही बहुत से शत्रुओं का विनाश करने में समर्थ हो. तुम सभी प्रजाओं में प्रवेश कर के उन्हें युद्ध के लिए प्रेरित करो. हे अविच्छिन्न दीप्ति वाले मन्यु! तुम्हारी सहायता से हम विजय के लिए सिंहनाद के समान घोष करते हैं. (४) विजेषकृदिन्द्र इवानवब्रवो ३ स्माकं मन्यो अधिया भवेह. प्रियं ते नाम सहुरे गृणीमसि विद्या तमुत्सं यत आबभूथ.. (५) हे मन्यु! विजय करने वाले तुम इंद्र के समान विजय के प्राचीन उपायों के बताने वाले बन कर इस संग्राम में हमारा पालन करो. हे सहनशील मन्यु! हम तुम्हें प्रसन्न करने वाली स्तुतियां बोल रहे हैं. जिस स्थान से तुम प्रकट होते हो, हम उस अमृत धारा वाले स्थान को जानते हैं. (५) आभूत्या सहजा वज्र सायक सहो बिभर्षि सहभूत उत्तरम्. क्रत्वा नो मन्यो सह मेद्येधि महाधनस्य पुरुहूत संसृजि.. (६) हे वज्र के समान अकुंठित शक्ति वाले! हे शत्रुओं का अंत करने वाले एवं शत्रुओं के पराजय के साथ उत्पन्न मन्यु! तुम उत्तम बल धारण करते हो. तुम हमारे यज्ञ के साथ चिकने बनो. हे बहुत से यजमानों द्वारा बुलाए गए मन्यु! धन प्राप्ति वाले संग्राम में हमारे सहायक बनो. (६) संसृष्टं धनमुभयं समाकृतमस्मभ्यं दत्तां वरुणश्च मन्युः. भियो दधाना हृदयेषु शत्रवः पराजितासो अप नि लयन्ताम्.. (७) वरुण और मन्यु अपना धन ला कर हमें दें. हमारे शत्रु हृदय में भय धारण करते हुए पराजित हों तथा भयभीत हो कर भाग जाएं. (७) सूक्त-३२ देवता—मन्यु यस्ते मन्यो ऽ विधद् वज्र सायक सह ओजः पुष्यति विश्वमानुषक्. साह्याम दासमार्यं त्वया युजा वयं सहस्कृतेन सहसा सहस्वता.. (१) हे मन्यु! जो पुरुष तुम्हारी सेवा करता है, हे वज्र के समान अकुंठित शक्ति वाले एवं शत्रुओं का अंत करने वाले! वह पुरुष नित्य शत्रुओं को पराजित करने वाला अपना बल संपूर्ण रूप से बढ़ाता है. तुम बल उत्पन्न करने वाले, हराने वाले और शक्ति देने वाले हो. तुम्हारी सहायता से हम असुरों एवं उन के शत्रु देवों को भी पराजित करें. (१) मन्युरिन्द्रो मन्युरेवास देवो मन्युर्होता वरुणो जातवेदाः. मन्युं विश ईडते मानुषीर्याः पाहि नो मन्यो तपसा सजोषाः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
मन्यु ही इंद्र हैं और मन्यु ही समस्त देव हैं. मन्यु देवों का आह्वान करने वाले, वरुण एवं जातवेद अग्नि हैं. जो मानुषी प्रजाएं हैं, वे भी मन्यु की ही स्तुति करती हैं. हे मन्यु! तुम तप से संयुक्त हो कर हमारी रक्षा करो. (२) अभीहि मन्यो तवसस्तवीयान् तपसा युजा वि जहि शत्रून्. अमित्रहा वृत्रहा दस्युहा च विश्वा वसून्या भरा त्वं नः.. (३) हे मन्यु! हमारे सामने आओ एवं महान से भी महान बन कर अपने संताप की सहायता से हमारे शत्रुओं का विनाश करो. स्नेह न करने वाले के हंता, शत्रु वधकारक एवं दस्यु विनाशकारी तुम हमारे लिए सभी धनों को लाओ. (३) त्वं हि मन्यो अभिभूत्योजाः स्वयंभूर्भामो अभिमातिषाहः. विश्वचर्षणिः सहुरिः सहीयानस्मास्वोजः पृतनासु धेहि.. (४) हे मन्यु! तुम्हारा बल पराजित करने वाला है. तुम स्वयंभू, क्रोधी, शत्रुओं को सहन करने वाले, विश्व के द्रष्टा, सहनशील एवं सहने वालों में श्रेष्ठ हो. तुम संग्राम में हमें बल प्रदान करो. (४) अभागः सन्नप परेतो अस्मि तव क्रत्वा तविषस्य प्रचेतः. तं त्वा मन्यो अक्रतुर्जिहीडाहं स्वा तनूर्बलदावा न एहि.. (५) हे उत्तम ज्ञान वाले मन्यु! तुम्हारे महान यज्ञ में भाग न लेने वाला अर्थात् तुम्हारा यजमान न बनने वाला मैं युद्ध से भाग आया हूं. तुम्हारे संतोष के कर्म न करने वाले मैं ने तुम्हें क्रोधित बना दिया. इस समय तुम मेरे बलदाता बन कर आओ. (५) अयं ते अस्म्युप न एह्यर्वाङ् प्रतीचीनः सहुरे विश्वदावन्. मन्यो वज्रिन्नभि न आ ववृत्स्व हनाव दस्यूंरुत बोध्यापेः.. (६) हे मन्यु! मैं तुम्हारा यज्ञ कर्म करने वाला हो गया हूं. तुम मेरे समीप आओ और मेरे सामने हो कर शत्रुओं की ओर चलो. हे सहनशील एवं सभी फल देने वाले! हे वर्जनशील आयुधधारी मित्र! हमारे सामने रहो. हम दोनों अपने शत्रुओं का विनाश करेंगे. तुम हमें अपना बंधु जानो. (६) अभि प्रेहि दक्षिणतो भवा नो ऽ धा वृत्राणि जङ्घनाव भूरि. जुहोमि ते धरुणं मध्वो अग्रमुभावुपांशु प्रथमा पिबाव.. (७) हे मन्यु! हमारे सामने आओ और हमारी दाहिनी ओर रह कर हमारे सचिव का काम करो. इस के पश्चात हम बहुत से शत्रुओं का विनाश करेंगे. हम तुम्हारे लिए धारण करने वाले मधुर सोमरस का सार अंश देते हैं. हम दोनों सब से पहले इस प्रकार सोमरस पिएं कि किसी को पता नहीं चले. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-३३ देवता—अग्नि
सूक्त-३३ देवता—अग्नि अप नः शोशुचदघमग्ने शुशुग्ध्या रयिम्. अप नः शोशुचदघम्.. (१) हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से हमारा पाप नष्ट हो जाए. तुम हमारे धन को सभी ओर से समृद्ध करो और हमारे पाप को नष्ट करो. (१) सुक्षेत्रिया सुगातुया वसूया च यजामहे. अप नः शोशुचदघम्.. (२) हे अग्नि! हम शोभन क्षेत्र एवं शोभन मार्ग पाने की इच्छा से तुम्हारा हवन करते हैं. तुम हमारे धन को सभी ओर समृद्ध करो तथा हमारे पाप को नष्ट करो. (२) प्र यद् भन्दिष्ठ एषां प्रास्माकासश्च सूरयः. अप नः शोशुचदघम्.. (३) हे अग्नि! मैं उन स्तोताओं के मध्य श्रेष्ठ स्तोता हूं और मेरे ज्ञानी पुत्र आदि भी स्तोताओं में श्रेष्ठ हैं, इसलिए तुम हमारे पाप को नष्ट करो. (३) प्र यत् ते अग्ने सूरयो जायेमहि प्र ते वयम्. अप नः शोशुचदघम्.. (४) हे अग्नि! तुम्हारे स्तोता जो तुम्हारी कृपा से जन्म लेते हैं. इसलिए हम विद्वान् भी तुम्हारी स्तुति के कारण पुत्र, पौत्र आदि से समृद्ध हों. तुम हमारे पाप को नष्ट करो. (४) प्र यदग्नेः सहस्वतो विश्वतो यन्ति भानवः. अप नः शोशुचदघम्.. (५) बलवान अग्नि की किरणें सभी ओर प्रवर्तित होती हैं, इसलिए तुम हमारे पापों को नष्ट करो. (५) त्वं हि विश्वतोमुख विश्वतः परिभूरसि. अप नः शोशुचदघम्.. (६) हे अग्नि! तुम सभी ओर मुख वाले एवं सर्वव्यापक हो. तुम हमारे पाप नष्ट करो. (६) द्विषो नो विश्वतोमुखाति नावेव पारय. अप नः शोशुचदघम्.. (७) हे सभी ओर मुख वाले अग्नि! जिस प्रकार लोग नाव के द्वारा उस पार पहुंच जाते हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रुओं को हम से दूर करो तथा हमारे पापों को नष्ट करो. (७) स नः सिन्धुमिव नावाति पर्षा स्वस्तये. अप नः शोशुचदघम्.. (८) हे उक्त गुणों वाले अग्नि! जिस प्रकार नाव के द्वारा सागर को पार करते हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रुओं को हम से दूर करो एवं हमारे पापों को नष्ट करो. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-३४ देवता—ब्रह्मौदन ब्रह्मास्य शीर्षं बृहदस्य पृष्ठं वामदेव्यमुदरमोदनस्य. छन्दांसि पक्षौ मुखमस्य सत्यं विष्टारी जातस्तपसो ऽ धि यज्ञः.. (१) दिए जाते हुए ब्रह्मौदन की स्तुति की जा रही है—"ब्रह्म अर्थात् रथंतर साम इस ओदन का शीश एवं बृहत् साम इस की पीठ है. वामदेव ऋषि द्वारा देखा गया साम इस का पेट तथा गायत्री आदि छंद इस के पक्ष अर्थात् दोनों कोखें हैं. सत्य नाम का साम इस का मुख है. विस्तार वाला ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ ब्रह्म के भीतरी भाग से उत्पन्न हुआ है." (१) अनस्थाः पूताः पवनेन शुद्धाः शुचयः शुचिमपि यन्ति लोकम्. नैषां शिश्नं प्र दहति जातवेदाः स्वर्गेलोके बहु स्त्रैणमेषाम्.. (२) सत्र यज्ञ के करने वाले अमृतमय, वायु के द्वारा पवित्र, निर्मल, एवं दीप्तिशाली होते हैं और देहावसान के पश्चात ज्योतिर्मय लोक को जाते हैं. स्वर्गलोक में वर्तमान ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ करने वालों की इंद्रियों को अग्नि नहीं जलाती. इन्हें भोगने के लिए स्त्रियों का समूह प्राप्त होता है. (२) विष्टारिणमोदनं ये पचन्ति नैनानवर्तिः सचते कदा चन. आस्ते यम उप याति देवान्त्सं गन्धवैर्मदते सोम्येभिः.. (३) जो यजमान बताई हुई रीति से विस्तृत अवयवों वाले ब्रह्मौदन को पकाते हैं, उन के समीप दरिद्रता कभी नहीं आती. वह यजमान देहांत के पश्चात यमराज के द्वारा पूजित हो कर सुख से निवास करता है तथा यम की अनुमति पा कर देवों के समीप पहुंचता है. वह सोमरस के योग्य विश्वावसु आदि गंधर्वों के साथ प्रसन्न रहता है. (३) विष्टारिणमोदनं ये पचन्ति नैनान् यमः परि मुष्णाति रेतः. रथी ह भूत्वा रथयान ईयते पक्षी ह भूत्वाति दिवः समेति.. (४) जो यजमान बताई हुई रीति से विस्तृत अवयवों वाले ब्रह्मौदन को पकाते हैं, यमराज उन के वीर्य का अपहरण नहीं करते. रथ द्वारा जाने योग्य भूलोक में वे जब तक जीवित रहते हैं, तब तक रथ पर बैठ कर चलते हैं या पक्षों वाले हो कर अंतरिक्ष के ऊपर वर्तमान लोक को पार कर के भोगों से युक्त होते हैं. (४) एष यज्ञानां विततो वहिष्ठो विष्टारिणं पक्त्वा दिवमा विवेश. आण्डीकं कुमुदं सं तनोति बिसं शालूकं शफको मुलाली. एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत् पिन्वमाना उप त्वा तिष्ठन्तु पुष्करिणीः समन्ताः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
वह ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ विस्तृत होने के कारण यज्ञों में सब से अधिक वहन करने वाला है. यजमान इस विस्तीर्ण अवयवों वाले ओदन को पका कर स्वर्ग प्राप्त करता है, अंडे की आकृति वाले कंद से उत्पन्न कुमुद फूल को हृदय पर रखता है तथा कमल तंतुओं को, उत्पल (कमल) के कंद को एवं जल में उत्पन्न तथा खुर की आकृति वाली मृणाली अर्थात् कमलिनी को सीने पर रखता है. हे यजमान! स्वर्ग में तेरे समीप चारों ओर कमल के सरोवर स्थित रहें. ये सभी धाराएं ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ के फल के रूप में प्राप्त स्वर्ग में मधुरता पूर्ण सिंचन करती हुई तेरे समीप पहुंचें तथा समीप में वर्तमान सरोवर भी तेरे समीप उपस्थित हों. (५) घृतहदा मधुकूलाः सुरोदकाः क्षीरेण पूर्णा उदकेन दध्ना. एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत् पिन्वमाना उप त्वा तिष्ठन्तु पुष्करिणीः समन्ताः.. (६) हे यजमान! स्वर्गलोक में घी से भरे हुए गड्ढों वाली, शहद के किनारों वाली, मदिरा रूपी जल वाली तथा दूध, दही एवं जल से पूर्ण सभी धाराएं तेरे समीप पहुंचें. ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ के फल के रूप में प्राप्त स्वर्ग में मधुरता पूर्ण सिंचन करती हुई ये सभी धाराएं तेरे समीप पहुंचें तथा समीप में वर्तमान सरोवर भी उपस्थित हों. (६) चतुरः कुम्भांश्चतुर्धा ददामि क्षीरेण पूर्णाँ उदकेन दध्ना. एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत् पिन्वमाना उप त्वा तिष्ठन्तु पुष्करिणीः समन्ताः.. (७) मैं दूध, दही, शहद और मदिरा से भरे हुए चार घड़ों को पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं उत्तर दिशाओं में रखता हूं. हे यजमान! ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ के फल के रूप में प्राप्त स्वर्ग में दूध, जल एवं दही से पूर्ण ये सभी धाराएं तेरे समीप पहुंचें एवं माधुर्य का सिंचन करते हुए सरोवर तेरे समीप उपस्थित रहें. (७) इममोदनं नि दधे ब्राह्मणेषु विष्टारिणं लोकजितं स्वर्गम्. स मे मा क्षैष्ट स्वधया पिन्वमानो विश्वरूपा धेनुः कामदुघा मे अस्तु.. (८) इस विस्तृत अवयवों वाले, कर्म फल को जीतने वाले एवं स्वर्ग के साधन ओदन को मैं ब्राह्मणों में रखता हूं. क्षीर आदि रस से बढ़ता हुआ यह नष्ट न हो. इस के फल के रूप में मुझे भांतिभांति के फल देने वाली एवं कामनाएं पूर्ण करने वाली धेनु प्राप्त हो. (८) सूक्त-३५ देवता—अतिमृत्यु यमोदनं प्रथमजा ऋतस्य प्रजापतिस्तपसा ब्रह्मणेऽपचत्. यो लोकानां विधृतिर्नाभिरेषात् तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्.. (१) परब्रह्म से प्रथम उत्पन्न हिरण्यगर्भ नामक प्रजापति ने तप के द्वारा ब्रह्म के लिए जो ebook converter DEMO Watermarks*
ओदन पकाया था तथा जो ओदन पृथ्वी आदि लोकों को बांधने वाला है, उस ओदन से मैं मृत्यु को पार करूं. (१) येनातरन् भूतकृतो ऽ ति मृत्युं यमन्वविन्दन् तपसा श्रमेण. यं पपाच ब्रह्मणे ब्रह्म पूर्वं तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्.. (२) प्राणियों के निर्माण कर्ता देवों ने जिस ओदन की सहायता से मृत्यु का अतिक्रमण किया था, जिस ओदन को तप और श्रम के द्वारा प्राप्त किया था तथा जिसे हिरण्यगर्भ प्रजापति ने सब से पहले ब्रह्म के लिए पकाया था, उसी ओदन की सहायता से मैं मृत्यु को पार करूं. (२) यो दाधार पृथिवीं विश्वभोजसं यो अन्तरिक्षमापृणाद् रसेन. यो अस्तभ्नाद् दिवमूर्ध्वो महिम्ना तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्.. (३) जिस ओदन ने समस्त प्राणियों का भोग बनी हुई पृथ्वी को धारण किया था, जो ओदन अपने रस से अंतरिक्ष को पूर्ण करता है तथा जिस ओदन ने अपनी महत्ता से द्युलोक अर्थात् स्वर्ग को ऊपर धारण किया था, उसी ओदन की सहायता से मैं मृत्यु को पार करता हूं. (३) यस्मान्मासा निर्मितास्त्रिंशदराः संवत्सरो यस्मान्निर्मितो द्वादशारः. अहोरात्रा यं परियन्तो नापुस्तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्.. (४) जिस ब्रह्मोदन से मास उत्पन्न हुए, जिन में पहिए के 'अरे' के समान तीस दिन स्थित हैं, जिस ब्रह्मोदन से बारह महीनों वाला संवत्सर उत्पन्न हुआ, जिस ब्रह्मोदन को रात और दिन समीप रहते हुए भी प्राप्त नहीं कर पाते, उसी ओदन की सहायता से मैं मृत्यु को पार करूं. (४) यः प्राणदः प्राणदवान् बभूव यस्मै लोका घृतवन्तः क्षरन्ति. ज्योतिष्मतीः प्रदिशो यस्य सर्वास्तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्.. (५) जो ओदन मृत्यु के समीप पहुंचे हुए जनों को प्राण देने वाला हुआ, जिस ओदन के लिए लोक घी की धाराएं बरसाते हैं तथा जिस ओदन के तेज से सभी दिशाएं प्रकाशित हैं, उसी ओदन की सहायता से मैं मृत्यु को पार करता हूं. (५) यस्मात् पक्वादमृतं संबभूव यो गायत्र्या अधिपतिर्बभूव. यस्मिन् वेदा निहिता विश्वरूपास्तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्.. (६) जिस पके हुए ब्रह्मोदन से स्वर्ग का अमृत उत्पन्न हुआ, जो छंदों की प्रमुख गायत्री का अधिपति बना तथा जिस में शाखा भेद से समस्त वेद स्थित हैं, उसी ओदन की सहायता से मैं मृत्यु को पार करता हूं. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-३६ देवता—सत्य ओज वाले अग्नि
अव बाधे द्विषन्तं देवपीयुं सपत्ना ये मे ऽ प ते भवन्तु. ब्रह्मोदनं विश्वजितं पचामि शृण्वन्तु मे श्रद्दधानस्य देवाः.. (७) मैं हिंसा करने वाले शत्रु का वध करता हूं तथा देवों के हिंसकों की हत्या करता हूं. जो मेरे शत्रु हैं, वे भाग जाएं. इस के निमित्त मैं सब को जीतने वाले ब्रह्मोदन को पकाता हूं. मुझ श्रद्धालु के वचनों को देव सुनें और मेरी सहायता करें. (७) सूक्त-३६ देवता—सत्य ओज वाले अग्नि तान्तसत्यौजाः प्र दहत्वग्निर्वैश्वानरो वृषा. यो नो दुरस्याद् दिप्साच्चाथो यो नो अरातियात्.. (१) सच्चे बल वाले, वैश्वानर एवं गर्भाधान में समर्थ अग्नि उन शत्रुओं को जलाएं, जो हमारे प्रति दुष्टों के समान आचरण करें, जो हमारी हिंसा करना चाहें तथा जो हमारे प्रति शत्रु के समान आचरण करें. (१) यो नो दिप्साददिप्सतो दिप्सतो यश्च दिप्सति. वैश्वानरस्य दंष्ट्रयोरग्नेरपि दधामि तम्.. (२) जो शत्रु हिंसा की इच्छा न करने वाले मुझ को मारना चाहता है तथा जिस हिंसा की इच्छा करने वाले को मैं मारना चाहता हूं, उस को मैं वैश्वानर अग्नि की दाढ़ों में रखता हूं. (२) य आगरे मृगयन्ते प्रतिक्रोशे ऽ मावास्ये. क्रव्यादो अन्यान् दिप्सतः सर्वांस्तान्सहसा सहे.. (३) युद्ध भूमि में जो पिशाच हमें खाने के लिए खोजते हैं तथा शत्रुओं द्वारा किए गए आक्रोश के कारण अमावस्या की आधी रात में हमें मारना चाहते हैं, हम मंत्रों के प्रभाव से उन्हें पराजित करते हैं. (३) सहे पिशाचान्त्सहसैषां द्रविणं ददे. सर्वान् दुरस्यतो हन्मि सं म आकूतिर्ऋध्यताम्.. (४) मैं बल के द्वारा राक्षसों को पराजित करता हूं तथा उन राक्षसों के धन को अपने अधिकार में करता हूं. मैं द्वेष करने वाले सभी शत्रुओं को मारता हूं. मेरा इष्ट फल विषयक संकल्प और सुख समृद्ध हो. (४) ये देवास्तेन हासन्ते सूर्येण मिमते जवम्. नदीषु पर्वतेषु ये सं तैः पशुभिर्विदे.. (५) हे अग्नि आदि देवो! जो पशु, राक्षस, पिशाच आदि से बचना चाहते हैं तथा उन्हें छोड़ ebook converter DEMO Watermarks*
कर सूर्य के समान वेग से भागते हैं तथा जो पशु नदियों और तीर्थों में घूमते हैं, तुम्हारे प्रभाव से मैं उन राक्षस आदि को मार कर उन पशुओं के साथ संयुक्त होता हूं. (५) तपनो अस्मि पिशाचानां व्याघ्रो गोमतामिव. श्वानः सिंहमिव दृष्ट्वा ते न विन्दन्ते न्यञ्चनम्.. (६) मैं मंत्रों के सामर्थ्य से पिशाचों को उसी प्रकार संताप देता हूं, जिस प्रकार बाघ गायों के स्वामियों को दुःखी करता है. सिंह को देख कर जिस प्रकार कुत्ता भय से छिप जाता है, उसी प्रकार मेरे मंत्रों के प्रभाव से वे अधोगति पाते हैं. (६) न पिशाचैः सं शक्नोमि न स्तेनैर्न वनर्गूभिः. पिशाचास्तस्मान्नश्यन्ति यमहं ग्राममाविशे.. (७) मैं पिशाचों, चोरों और वन में रहने वाले लुटेरों से न मिलूं. मैं जिस ग्राम में प्रवेश कर के निवास करूं, उस से पिशाच भाग जाएं. (७) यं ग्राममाविशत इदमुग्रं सहो मम. पिशाचास्तस्मान्नश्यन्ति न पापमुप जानते.. (८) मंत्र के प्रभाव से उत्पन्न मेरा यह बल जिस ग्राम में प्रवेश कर के निवास करता है, पिशाच उस ग्राम से भाग जाता है. वहां रहने वाले लोग पिशाचों के हिंसा रूपी पाप को नहीं जानते. (८) ये मा क्रोधयन्ति लपिता हस्तिनं मशका इव. तानहं मन्ये दुर्हितान् जने अल्पशयूनिव.. (९) जो पिशाच मिल कर मुझे इस प्रकार क्रोधित करते हैं, जिस प्रकार मच्छर हाथी को क्रोध बढ़ा देते हैं; मैं उन्हें उसी प्रकार हनन के योग्य दुष्ट जानता हूं, जिस प्रकार जनसंचार के स्थान पर छोटे शरीर वाले कीड़े होते हैं. (९) अभि तं निर्ऋतिर्धत्तामश्वमिवाश्वाभिधान्या. मल्वो यो मह्यं क्रुध्यति स उ पाशान्न मुच्यते.. (१०) पाप देवता मेरे शत्रु को उसी प्रकार बांध लें, जिस प्रकार रस्सी घोड़े को बांधती हैं. जो शत्रु मेरे लिए क्रोध करता है, वह शत्रु पाप देवता निर्ऋति के पाश से न छूटे. (१०) सूक्त-३७ देवता—जड़ीबूटी आदि त्वया पूर्वमथर्वाणो जघ्नु रक्षांस्योषधे. त्वया जघान कश्यपस्त्वया कण्वो अगस्त्यः.. (१)
हे जड़ीबूटियो! प्राचीन काल में तुम्हें साधन बना कर अथर्ववेद संबंधी महर्षियों ने राक्षसों को मारा था. तुम्हारे द्वारा कश्यप, कण्व और अगस्त्य ऋषियों ने राक्षसों का वध किया. (१) त्वया वयमप्सरसो गन्धर्वाञ्चातयामहे. अजशृङ्गयज रक्षः सर्वान् गन्धेन नाशय.. (२) हे अजशृंगी नाम की जड़ी! तुझे साधन बना कर हम उपद्रव करने वाली अप्सराओं और गंधर्वों का नाश करते हैं. तू राक्षसों को यहां से दूर भगा तथा अपनी गंध से सभी राक्षसों का विनाश कर. (२) नदीं यन्त्वप्सरसो ऽ पां तारमवश्वसम्. गुल्गुलूः पीला नलद्यौ ३ क्षगन्धिः प्रमन्दनी. तत् परेताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन.. (३) गंधर्वों की पत्नियां अप्सराएं अपने वास स्थान पर उसी प्रकार चली जाएं, जिस प्रकार नदी पार करने वाले मल्लाह के समीप पहुंचते हैं. हे अप्सराओ! गुग्गुलु, पीला, नलवी, ओक्षगंधि एवं प्रमंदिनी के हवन से भयभीत हो कर अपने निवास स्थान को चली जाओ तथा वहीं रहो. (३) यत्राश्वत्था न्यग्रोधा महावृक्षाः शिखण्डिनः. तत् परेताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन.. (४) जहां अश्वत्थ, न्यग्रोध आदि महावृक्ष एवं मोर होते हैं, हे अप्सराओ! वहां से अपने निवास स्थान को चली जाओ तथा वहीं रुकी रहो. (४) यत्र वः प्रेङ्खा हरिता अर्जुना उत यत्राघाटाः कर्कर्यः संवदन्ति. तत् परेताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतनः.. (५) हे अप्सराओ! तुम्हारे खेलने के लिए जहां झूले पड़े हैं, उन झूलों का रंग हरा और सफेद है. जहां कर्करी नाम के बाजे बजाए जाते हैं, वहां से भाग कर अपने निवास स्थान को चली जाओ तथा वहीं रहो. (५) एयमगन्नोषधीनां वीरुधां वीर्यावती. अजशृङ्गयराट्की तीक्ष्णशृङ्गी वृषतु.. (६) जड़ीबूटियों एवं वृक्षों में सब से अधिक शक्ति वाली अजशृंगी, अराटकी तथा तीक्ष्ण शृंगी नाम की जड़ीबूटियां आ गई हैं. इस स्थान से राक्षस भाग जाएं. (६) आनृत्यतः शिखण्डिनो गन्धर्वस्याप्सरापतेः. भिनद्मि मुष्कावपि यामि ebook converter DEMO Watermarks*
शेषः.. (७) मैं मोर के समान नाचते हुए अप्सरा के पति गंधर्व के अंडकोषों को फोड़ता हूं तथा उस के पुरुष जननांग को निष्क्रिय बनाता हूं. (७) भीमा इन्द्रस्य हेतयः शतमृष्टीरयस्मयीः. ताभिर्हविरदान् गन्धर्वानवकादान् व्यृषतु.. (८) इंद्र का आयुध भयंकर, सौ धारों वाला एवं लोहे का बना हुआ है. उसी से वह हवि न देने वाले एवं शैवाल खाने वाले गंधर्वों को मारें. (८) भीमा इन्द्रस्य हेतयः शतमृष्टीर्हिरण्ययीः. ताभिर्हविरदान् गन्धर्वानवकादान् व्यृषतु.. (९) इंद्र के आयुध भयंकर, सौ धारों वाले एवं सोने के बने हैं. इंद्र उन्हीं से हवि न देने वाले तथा शैवाल भक्षण करने वाले गंधर्वों का वध करें. (९) अवकादानभिशोचानप्सु ज्योतय मामकान्. पिशाचान्त् सर्वानोषधे प्र मृणीहि सहस्व च.. (१०) हे अजशृंगी जड़ी! शैवाल खाने वाले, सभी को शोक पहुंचाने वाले उन गंधर्वों को जलों में प्रकाशित करो, जो युद्ध से संबंधित हैं. तुम सभी पिशाचों को मारो तथा पराजित करो. (१०) श्वैवैकः कपिरिवैकः कुमारः सर्वकेशकः. प्रियो दृश इव भूत्वा गन्धर्वः सचते स्त्रियस्तमितो नाशयामसि ब्रह्मणा वीर्यवता.. (११) मायावी होने के कारण एक गंधर्व कुत्ते के समान, दूसरा बंदर के समान है. गंधर्व सारे शरीर पर बाल उगे होने पर भी बालक ही होता है. गंधर्व देखने में प्रिय रूप बना कर स्त्रियों से मिलते हैं. मैं अत्यधिक शक्तिशाली मंत्रों की सहायता से उन्हें यहां से भगाता हूं. (११) जाया इद् वो अप्सरसो गन्धर्वाः पतयो यूयम्. अप धावतामर्त्या मर्त्यान् मा सचध्वम्.. (१२) हे गंधर्वों! ये अप्सराएं तुम्हारी पत्नियां हैं और तुम इन के पति हो. तुम गंधर्व जाति के हो, इसलिए मनुष्यों से दूर भाग जाओ, इन से मत मिलो. (१२) सूक्त-३८ देवता—अप्सराएं, अक्ष शलाका ebook converter DEMO Watermarks*
उद्भिन्दतीं सञ्जयन्तीमप्सरां साधुदेविनीम्. ग्लहे कृतानि कृण्वानामप्सरां तामिह हुवे.. (१) बाजी लगा कर धन का भेदन करती हुई एवं भलीभांति जुए में जीतने वाली एवं अक्ष शलाका आदि से अच्छी तरह जुआ खेलने वाली अप्सरा की मैं स्तुति करता हूं. सदैव दांव पर लगाए गए धन पर जुआ जीतने के चिह्न बनाने वाली उस अप्सरा को मैं यहां बुलाता हूं. (१) विचिन्वतीमाकिरन्तीमप्सरां साधुदेविनीम्. ग्लहे कृतानि गृह्णानामप्सरां तामिह हुवे.. (२) एक निश्चित काठ पर तीनचार अक्षों अर्थात् पासों को एक करती हुई, पुनः उन्हें ही जुए में जीतने के लिए बहुत से काठों पर बिखेरती हुई एवं जय के उपाय जानने के कारण भलीभांति जुआ खेलती हुई अप्सरा को मैं अपने समीप बुलाता हूं. वह जुए में लगाए गए धन को चिह्न बना कर जीत लेती है. (२) यायैः परिनृत्यत्याददाना कृतं ग्लहात्. सा नः कृतानि सीषती प्रहामाप्नोतु मायया. सा नः पयस्वत्यैतु मा नो जैषुरिदं धनम्.. (३) जो अप्सरा जुए में जीते गए धन को 'यह मेरा है' कह कर अधिकार में कर लेती हैं तथा पासों की संख्याओं के द्वारा जुए में जीत कर प्रसन्नतापूर्वक नृत्य करती हैं, वे हमारे कृतों में अर्थात् चार संख्या के दांवों को सोखती हुई पासों को अपनी माया से प्राप्त कर के गाय आदि धन वाली अप्सराएं हमारे समीप आएं. जुए के दांव पर लगा हमारा धन दूसरे न जीत सकें. (३) या अक्षेषु प्रमोदन्ते शुचं क्रोधं च बिभ्रती. आनन्दिनीं प्रमोदिनीमप्सरां तामिह हुवे.. (४) जो अप्सरा जुए में जीतने के कारण प्रसन्नता एवं हार के कारण शोक और क्रोध को धारण करती है, जुए के कारण हर्षित होने वाली तथा ज्वारियों को प्रसन्नता देने वाली उस अप्सरा को मैं बुलाता हूं. (४) सूर्यस्य रश्मीननु याः सञ्चरन्ति मरीचीर्वा या अनुसञ्चरन्ति. यासामृषभो दूरतो वाजिनीवान्त्सद्यः सर्वान् लोकान् पर्येति रक्षन्. स न ऐतु होममिमं जुषाणो ३ न्तरिक्षेण सह वाजिनीवान्.. (५) जो अप्सराएं सूर्य की किरणों के पीछे घूमती हैं अथवा सूर्य की किरणें उन के पीछे चलती हैं, उन अप्सराओं के गर्भाधान में समर्थ पति सदा उषाओं से संबंधित रहते हैं. वे सभी लोकों की रक्षा करने के लिए प्रतिदिन आते हैं. उषा के पति सूर्य अप्सराओं के साथ हमारे ebook converter DEMO Watermarks*