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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

वायु और अग्नि दिव्य हैं. मनुष्य होताओं में प्रमुख हैं. वे सुंदर वाणी वाले, यज्ञ के प्रेरक एवं यज्ञ के निर्माता हैं. वायु होताओं पर अनुग्रह करते हैं और आह्वनीय अग्नि की सेवा का आदेश देते हैं. अतएव यज्ञ पर उपकार करने वाले वायु और अग्नि देव मुझ पर भी उपकार करें. (७) आ नो यज्ञं भारती तूयमेत्विडा मनुष्यदिह चेतयन्ती. तिस्रो देवीर्बर्हिरिदं स्योनं सरस्वतीः स्वपसः सदन्ताम्.. (८) सब प्राणियों को जल से संतुष्ट करने वाले अग्नि देव की कांति पृथ्वी का और सरस्वती का आह्वान करने पर सचेत हो. सुंदर कर्म करने वाली ये तीन देवियां कुश पर विराजमान हों. (८) य इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपिंशद् भुवनानि विश्वा. तमद्य होतरिषितो यजीयान् देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान्.. (९) हे अग्नि! जो त्वष्टा देवता द्यावा पृथ्वी तथा समस्त प्राणियों को अनेक रूप प्रदान करता है, हमारी प्रेरणा से आज उस का यजन करो. (९) उपावसृज त्मन्या समञ्जन् देवानां पाथ ऋतुथा हवींषि. वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन.. (१०) हे अग्नि देव! यह यज्ञ रूप अन्न देवों का भाग है. इसे और हवियों को प्रत्येक ऋतु में देवों तक पहुंचाओ. वनस्पति, सविता देव और अग्नि इस हव्य को मधु और घृत से युक्त कर के स्वादिष्ट बनाएं. (१०) सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानामभवत् पुरोगाः. अस्य होतुः प्रशिष्यतस्य वाचि स्वाहाकृतं हविरदन्तु देवाः.. (११) अग्नि देव प्रकट होते ही यज्ञ का आरंभ करते हैं और प्रकट होते ही समस्त देवों में अग्रगण्य बन जाते हैं. देवों का आह्वान करने वाले इस अग्नि के मुख में देव गण स्वाहा शब्द से युक्त हवि ग्रहण करें. (११) सूक्त-१३ देवता—सर्प-विषनाशन ददिर्हि मह्यं वरुणो दिवः कविर्वचोभिरुग्रैर्नि रिणामि ते विषम्. खातमखातमुत सक्तमग्रभमिरेव धन्वन्नि जजास ते विषम्.. (१) स्वर्ग के देवता वरुण ने मुझे उपदेश दिया है. उन के वचनों के द्वारा मैं तेरे विष को दूर करता हूं. जो विष मांस के ऊपर अथवा मांस के भीतर है, उसे मैं ग्रहण करता हूं. जिस प्रकार जल रेत में गिरने पर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तेरा विष नष्ट हो जाए. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

यत् ते अपोदकं विषं तत् त एतास्वग्रभम्. गृह्णामि ते मध्यममुत्तमं रसमुतावमं भियसा नेशदादु ते.. (२) जल को दूषित करने वाला तेरा जो विष है, उसे मैं ने भीतर ही रोक लिया है. तेरे उत्तम और मध्यम रस अर्थात् विष को मैं ग्रहण करता हूं. वह रस अर्थात् तेरा विष नष्ट हो जाए. (२) वृषा मे रवो नभसा न तन्यतुरुग्रेण ते वचसा बाध आदु ते. अहं तमस्य नृभिरग्रभं रसं तमस इव ज्योतिरुदेतु सूर्यः.. (३) मेरा वचन वर्षा करने वाला तथा मेघ के समान गर्जन करता है. मैं अपने उग्र वचन से तुझ सर्प को बांधता हूं. जिस प्रकार सूर्योदय होने पर अंधकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार यह पुरुष विष से मुक्त हो कर जीवित हो जाए. (३) चक्षुषा ते चक्षुर्हन्मि विषेण हन्मि ते विषम्. अहे म्रियस्व मा जीवीः प्रत्यगभ्येतु त्वा विषम्.. (४) हे सर्प! मैं अपनी नेत्र शक्ति से तेरी नेत्र शक्ति का विनाश करता हूं तथा ऋषि के द्वारा तेरे विष को समाप्त करता हूं. तू मृत्यु को प्राप्त हो, जीवित न रहे. तेरा विष तुझ पर ही बुरा प्रभाव डाले. (४) कैरात पृश्न उपतृण्य बभ्र आ मे शृणुतासिता अलीकाः. मा मे सख्युः स्तामानमपि छाताश्रावयन्तो नि विषे रमध्वम्.. (५) हे सर्पो! तुम जंगल में घूमने वाले, काले धब्बों से युक्त, घास में रहने वाले, भूरे वर्ण वाले, काले वर्ण वाले तथा निंदनीय हो. तुम हमारे कथन को सुनो. तुम हमारे सखा के घर के समीप निवास मत करो. हमारा यह कथन तुम दूसरे सर्पों को भी सुना दो. (५) असितस्य तैमातस्य बभ्रोरपोदकस्य च. सात्रासाहस्याहं मन्योरव ज्यामिव धन्वनो वि मुञ्चामि रथाँ इव.. (६) गीली जगह में निवास करने वाले, श्याम एवं श्वेत वर्ण से युक्त, पानी से दूर रहने वाले और सब को पराजित करने वाले क्रोध पूर्ण सर्पों के विष को हम उसी प्रकार दूर करते हैं, जिस प्रकार धनुष की डोरी और रथों के बंधन को उतारा जाता है. (६) आलिगी च विलिगी च पिता च माता च. विद्म वः सर्वतो बन्ध्वरसाः किं करिष्यथ.. (७) हे सर्पो! तुम्हारे मातापिता आलिगी अर्थात् चिपकने वाले और विलिगी अर्थात् न चिपकने वाले हैं. हम तुम्हारे सभी बंधुओं से परिचित हैं. तुम रसहीन अर्थात् विष हीन हो कर ebook converter DEMO Watermarks*

क्या करोगे? (७) उरुगूलाया दुहिता जाता दास्यसिक्न्या. प्रतङ्कं दुद्रुषीणां सर्वासामरसं विषम्.. (८) जो सांपिन गूलर नाम के विशाल वृक्ष से उत्पन्न हुई है, वह काली सांपिन की दासी है. जो सांपिन दांतों के माध्यम से अपना क्रोध प्रकट करती है, इस का विष हमें दुःख प्रदान करता है यह विष प्रभावहीन हो जाए. (८) कर्णा श्वावित् तदब्रवीद् गिरेरवचरन्तिका. याः काश्चेमाः खनित्रिमास्तासामरसतं विषम्.. (९) पर्वतों पर घूमने वाली और कांटों वाली ने कहा कि जो सांपिनें धरती में बिल बना कर निवास करती हैं, उन का विष प्रभावहीन हो जाए. (९) ताबुवं न ताबुवं न घेत् त्वमसि ताबुवम्. ताबुवेनारसं विषम्.. (१०) तुम ताबुव नहीं हो, तुम ताबुव नहीं हो, क्योंकि ताबुव विष को प्रभावहीन कर देता है. (१०) तस्तुवं न तस्तुवं न घेत् त्वमसि तस्तुवम्. तस्तुवेनारसं विषम्.. (११) तुम तस्तुव नहीं हो, तुम तस्तुव नहीं हो. निश्चित रूप से तुम तस्तुव नहीं हो. तस्तुव विष को प्रभावहीन कर देता है. (११) सूक्त-१४ देवता—ओषधि सुपर्णस्त्वान्वविन्दत् सूकरस्त्वाखनन्नसा. दिप्सौषधे त्वं दिप्सन्तमव कृत्याकृतं जहि.. (१) हे ओषधि! सुपर्ण अर्थात् गरुड़ या सूर्य ने तुम्हें प्राप्त किया था. सुअर ने अपनी नाक से तुम्हें खोदा था. हे कृत्या से संबंधित ओषधि! तुम कृत्या का प्रयोग करने वाले और हमें मारने का प्रयत्न करने वाले का नाश करो. (१) अव जहि यातुधानानव कृत्याकृतं जहि. अथो यो अस्मान् दिप्सति तमु त्वं जह्योषधे.. (२) हे ओषधि! तुम याततुधानों अर्थात् राक्षसों और कृत्या का निर्माण करने वाले का

विनाश करो. तुम उस का भी विनाश करो जो हमारी मृत्यु की इच्छा करता है. (२) रिश्यस्येव परीशासं परिकृत्य परि त्वचः. कृत्यां कृत्याकृते देवा निष्कमिव प्रति मुञ्चत.. (३) हे देवो! जो हमारी हिंसा करने वाले हैं, उन की त्वचा पर अपने आयुधों से घाव बना कर अपने आयुधों को अलग करो. लोग जिस प्रकार सोने के सिक्के अथवा आभूषण को ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार कृत्या का निर्माण करने वाला उस को स्वीकार करे. (३) पुनः कृत्यां कृत्याकृते हस्तगृह्य परा णय. समक्षमस्मा आ धेहि यथा कृत्याकृतं हनत्.. (४) हे ओषधि! तुम कृत्या का हाथ पकड़ कर उन के समीप ले जाओ, जिन्होंने इस का निर्माण किया है. उन के समीप पहुंची हुई कृत्या उन का विनाश कर देगी. (४) कृत्याः सन्तु कृत्याकृते शपथः शपथीयते. सुखो रथइव वर्ततां कृत्या कृत्याकृतं पुनः.. (५) कृत्या का प्रयोग करने वाले पर कृत्या का बुरा प्रभाव पड़े और शाप देने वाले को ही शाप लगे. जिस प्रकार रथ सरलतापूर्वक घूम जाता है, उसी प्रकार कृत्या अपने प्रेरक की ओर घूम जाए. (५) यदि स्त्री यदि वा पुमान् कृत्यां चकार पाप्मने. तामु तस्मै नयामस्यश्वमिवाश्वाभिधान्या.. (६) यदि किसी स्त्री अथवा पुरुष ने तुझे पाप कर्म अर्थात् मुझे डसने के लिए प्रेरणा दी है तो जिस प्रकार लगाम का संकेत करने से घोड़ा पीछे की ओर लौट पड़ता है, उसी प्रकार हम तुझे प्रेरणा देने वालों की ओर ही लौटाते हैं. (६) यदि वासि देवकृता यदि वा पुरुषैः कृता. तां त्वा पुनर्णीयामसीन्द्रेण सयुजा वयम्.. (७) हे कृत्या! यदि तुझे देवों ने अथवा पुरुषों ने प्रेरित किया है तो हम तुझे उन्हीं की ओर वापस लौटाते हैं, क्योंकि हम इंद्र के सखा हैं. (७) अग्ने पृतनाषाट् पृतनाः सहस्व. पुनः कृत्यां कत्याकृते प्रतिहरणेन हरामसि.. (८) हे राक्षसों की सेना का सामना करने वाले अग्नि देव! तुम इन सेनाओं का सामना करो. हम इस कृत्या को कृत्या के प्रेरक की ओर ही वापस लौटा रहे हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

कृत्यव्यधनि विध्य तं यश्चकार तमज्जहि. न त्वामचकृषे वयं वधाय सं शिशीमहि.. (९) हे संहार का साधन कृत्या! जिस ने तेरा निर्माण किया है, तू उसी का छेदन कर के मार डाल. जिस ने तेरा निर्माण नहीं किया है, उस के वध के निमित्त हम तुझे शक्तिशालिनी नहीं बनाते. (९) पुत्र इव पितरं गच्छ स्वज इवाभिष्ठितो दश. बन्धमिवावक्रामी गच्छ कृत्ये कृत्याकृतं पुनः.. (१०) हे कृत्या! जिस प्रकार पुत्र पिता के पास जाता है, उसी प्रकार तू अपने उत्पत्तिकर्ता के समीप जा. दबने पर जिस प्रकार सांप काट लेता है, उसी प्रकार तू उसे डस ले, जिस ने तुझे बनाया है. जिस प्रकार टूटा हुआ बंधन अपने ही शरीर पर गिरता है, उसी प्रकार तू कृत्याकर्ता के पास लौट जा. (१०) उढेणीव वारण्यभिस्कन्दं मृगीव. कृत्या कर्तारमृच्छतु.. (११) कृत्या इस प्रकार अपने निर्माणकर्ता के पास जाए, जिस प्रकार ऐणी नाम की हिरनी, हथिनी और मृगी शीघ्रता से झपटती है. (११) इष्वा ऋजीयः पततु द्यावापृथिवी तं प्रति. सा तं मृगमिव गृह्णातु कृत्या कृत्याकृतं पुनः.. (१२) कृत्या अपने निर्माण कर्ता की ओर उस के प्रतिकूल आचरण करती हुई अग्नि के समान जाए. जैसे किनारे को काट कर गिराता हुआ जल का वेग मिलता है अथवा रथ जिस प्रकार सरलता से मुड़ जाता है, उसी प्रकार कृत्या अपने निर्माणकर्ता से मिले. (१२) अग्निरिवैतु प्रतिकूलमनुकूलमिवोदकम्. सुखो रथ इव वर्ततां कृत्या कृत्याकृतं पुनः.. (१३) अग्नि की तरह कृत्याकारी से प्रतिकूल आचरण करती हुई वह कृत्या उस के पास पहुंचे. जिस प्रकार पानी किनारों को काटता हुआ बढ़ता है उसी प्रकार वह कृत्या कृत्याकारी के अनुकूल हो कर उस के पास पहुंचे. वह कृत्या सुखकारी रथ के समान कृत्याकारी के पास पुनः चली आए. (१३) सूक्त-१५ देवता—मधुला ओषधि एका च मे दश च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला करः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

हे यज्ञ के निमित्त उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे एक और दस अर्थात् ग्यारह हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना. क्योंकि तू मधुर है. (१) द्वे च मे विंशतिश्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (२) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे दो और बीस अर्थात् बाईस हों, परंतु तू मेरे शब्दों को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (२) तिस्रश्च मे त्रिंशच्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (३) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे तीन और तीस अर्थात् तैंतीस हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (३) चतस्रश्च मे चत्वारिंशच्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (४) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे चार और चालीस अर्थात् चवालीस हों, परंतु तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (४) पञ्च च मे पञ्चाशच्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (५) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे पांच और पचास अर्थात् पचपन हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (५) षट् च मे षष्टिश्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (६) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे छः और साठ अर्थात् छियासठ हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (६) सप्त च मे सप्ततिश्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (७) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे सात और सत्तर अर्थात् सतहत्तर हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (७) अष्ट च मे ऽ शीतिश्च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले आठ और अस्सी अर्थात अट्ठासी हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (८) नव च मे नवतिश्च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (९) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे नौ और नब्बे अर्थात् निन्यानवे हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (९) दश च मे शतं च मे ऽ पवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (१०) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे दस और सौ अर्थात एक सौ दस हों, परंतु तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (१०) शतं च मे सहस्रं चापवक्तार ओषधे. ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (११) हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे सौ और हजार अर्थात् ग्यारह सौ हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (११) सूक्त-१६ देवता—एक वृष यद्येकवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (१) हे लवण! यदि तू एक वृषभ अर्थात् बैल के समान शक्ति वाला है तो इस गाय से संतान उत्पन्न कर, अन्यथा तू प्रभावहीन समझा जाएगा. (१) यदि द्विवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (२) हे लवण! यदि तू दो बैलों के समान शक्तिशाली है तो इस गाय को संतान वाली बना, अन्यथा तू शक्तिहीन समझा जाएगा. (२) यदि त्रिवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (३) हे लवण! यदि तू तीन बैलों के समान शक्ति वाला है तो इस गाय से संतान उत्पन्न कर, अन्यथा तू प्रभावहीन समझा जाएगा. (३) यदि चतुर्वृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (४) हे लवण! यदि तू चार बैलों के समान शक्ति वाला है तो इस गाय को संतान वाली बना, ebook converter DEMO Watermarks*

अन्यथा तू शक्तिहीन समझा जाएगा. (४) यदि पञ्चवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (५) हे लवण! यदि तू पांच बैलों के समान शक्ति वाला है तो इस गाय से संतान उत्पन्न कर, अन्यथा तू प्रभावहीन समझा जाएगा. (५) यदि षड्वृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (६) हे लवण! यदि तू छह बैलों के समान शक्ति वाला है तो इस गाय से संतान उत्पन्न कर, अन्यथा तू शक्तिहीन समझा जाएगा. (६) यदि सप्तवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (७) हे लवण! यदि तू सात बैलों के समान शक्तिशाली है तो इस गाय को संतान वाली बना, अन्यथा तू शक्तिहीन समझा जाएगा. (७) यद्यष्टवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (८) हे लवण! यदि तू आठ बैलों के समान शक्ति वाला है तो इस गाय से संतान उत्पन्न कर, अन्यथा तू शक्तिरहित समझा जाएगा. (८) यदि नववृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (९) हे लवण! यदि तू नौ बैलों के समान शक्तिशाली है तो इस गाय से संतान उत्पन्न कर, अन्यथा तू प्रभावरहित समझा जाएगा. (९) यदि दशवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (१०) हे लवण! यदि तू दस बैलों के समान शक्तिशाली है तो इस गाय को संतान वाली बना, अन्यथा तू प्रभावहीन समझा जाएगा. (१०) यद्येकादशो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (११) हे लवण! यदि तू ग्यारह बैलों के समान शक्ति वाला है तो इस गाय से संतान उत्पन्न कर, नहीं तो तू शक्तिहीन समझा जाएगा. (११) सूक्त-१७ देवता—ब्रह्मजाया ते ऽ वदन् प्रथमा ब्रह्मकिल्बिषे ऽ कूपारः सलिलो मातरिश्वा. वीडुहरास्तप उग्रं मयोभूरापो देवीः प्रथमजा ऋतस्य.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

सूर्य, वरुण, वायु, चंद्र तथा आप अर्थात् जलदेवी—ये देवता ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. इन्होंने ब्राह्मण द्वारा अपराध करने के विषय में कहा है. (१) सोमो राजा प्रथमो ब्रह्मजायां पुनः प्रायच्छदहृणीयमानः. अन्वर्तिता वरुणो मित्र आसीदग्निर्होता हस्तगृह्या निनाय.. (२) सब से पहले सोम ने ब्रह्म के लिए उस गाय को दे दिया, जिस ने उन्हें उत्पन्न किया था. उस समय वरुण और सूर्य सोम के सहयोगी बने और अग्नि उन के होता थे. (२) हस्तेनैव ग्राह्य आधिरस्या ब्रह्मजायेति चेदवोचत्. न दूताय प्रहेया तस्थ एषा तथा राष्ट्रं गुपितं क्षत्रियस्य.. (३) यह हम को उत्पन्न करने वाली है, इस प्रकार जो कहे उस का संकल्प हाथ में ले. यह संकल्प लेने के लिए दूत को न भेजे. (३) यामाहुस्तारकैषा विकेशीति दुच्छुनां ग्राममवपद्यमानाम्. सा ब्रह्मजाया वि दुनोति राष्ट्रं यत्र प्रापादि शश उल्कुषीमान्.. (४) ग्राम की ओर बढ़ती हुई तारिका को उल्का कहते हैं. उस उल्का का अंश जहां गिरता है, उस राज्य का नाश हो जाता है. इस प्रकार ब्रह्म से उत्पन्न तारिका राज्य का नाश कर देती है. (४) ब्रह्मचारी चरति वेविषद् विषः स देवानां भवत्येकमङ्गम्. तेन जायामन्वविन्दद् बृहस्पतिः सोमेन नीतां जुह्वं१ न देवाः.. (५) ब्रह्मचर्य देवता का अंग रूप होता है. वह ब्रह्मचर्य में रमण करता हुआ प्रजा के मध्य घूमता है. जिस प्रकार देवों ने सोम के चमस को प्राप्त किया है, उसी प्रकार बृहस्पति ने ब्रह्मचर्य के द्वारा पत्नी को पाया. (५) देवा वा एतस्यामवदन्त पूर्वे सप्तऋषयस्तपसा ये निषेदुः. भीमा जाया ब्राह्मणस्यापनीता दुर्धा दधाति परमे व्योमन्.. (६) तपस्या में लीन रहने वाले सप्त ऋषियों ने और देवों ने ब्राह्मण जाया की चर्चा की थी कि ब्राह्मण की अपहरण की गई स्त्री स्वर्ग में भयंकर बन जाती है और अपहरण कर्ता की दुर्गति करती है. (६) ये गर्भा अवपद्यन्ते जगद् यच्चापलुप्यते. वीरा ये तृह्यन्ते मिथो ब्रह्मजाया हिनस्ति तान्.. (७) जो गर्भ गिराए जाते हैं, संसार में जो उथलपुथल होती है, वीरों की परस्पर मारकाट, ये ebook converter DEMO Watermarks*

सारे कर्म ब्राह्मण की पत्नी ही करती है. (७) उत यत् पतयो दश स्त्रियाः पूर्वे अब्राह्मणाः. ब्रह्मा चेद्धस्तमग्रहीत् स एव पतिरेकधा.. (८) ब्राह्मण की पत्नी के पूर्व अब्राह्मण बालक चाहे दस हों, पर जो ब्राह्मण उस का पाणि ग्रहण करता है, वही उस का पति होता है. (८) ब्राह्मण एव पतिर्न राजन्यो ३ न वैश्यः. तत् सूर्यः प्रब्रुवन्नेति पञ्चभ्यो मानवेभ्यः.. (९) ब्राह्मणी का पति ब्राह्मण ही हो सकता है, क्षत्रिय और वैश्य नहीं. सूर्य देव पांच प्रकार के मानव—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद यह कहते हुए दमन करते हैं. (९) पुनर्वे देवा अददुः पुनर्मनुष्या अददुः. राजानः सत्यं गृह्नाना ब्रह्मजायां पुनर्ददुः.. (१०) ब्राह्मण पत्नी को देवों, मनुष्यों और राजाओं ने सत्य को ग्रहण कर के प्रदान किया. (१०) पुनर्दाय ब्रह्मजायां कृत्वा देवैर्नािकल्बिषम्. ऊर्जं पृथिव्या भक्त्वोरुगायमुपासते.. (११) हम देवों द्वारा स्वच्छ किए हुए शक्तिदायक अन्न का विभाग कर के ब्राह्मण पत्नी को देते हैं तथा अत्यधिक कीर्तिशाली परमात्मा की उपासना करते हैं. (११) नास्य जाया शतवाही कल्याणी तल्पमा शये. यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१२) जिस राज्य में ब्राह्मण की पत्नी और गाय को बाधा पहुंचाई जाती है, वहां भांतिभांति के कल्याण करने वाली पत्नी शैय्या पर शयन नहीं करती. (१२) न विकर्णः पृथुशिरास्तस्मिन् वेश्मनि जायते. यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१३) जिस राज्य में ब्राह्मण की पत्नी को अचेत कर के रोका जाता है, उस राज्य में विशाल मस्तक वाले पुरुष जन्म नहीं लेते. (१३) नास्य क्षत्ता निष्कग्रीवः सूनानामेत्यग्रतः. यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*

जिस राज्य में ब्राह्मण की पत्नी को मोहित कर के रोका जाता है, उस राज्य का वीर निष्क नाम का सोने का आभूषण धारण कर के भी सूना से आगे नहीं जा पाता. (१४) नास्य श्वेतः कृष्णकर्णो धुरि युक्तो महीयते. यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१५) जिस राज्य में ब्राह्मण की पत्नी को चेतनाहीन कर के रोका जाता है, उस राज्य में राजा का श्वेत कानों वाला घोड़ा रथ के आगे जुत कर भी प्रशंसित नहीं होता. (१५) नास्य क्षेत्रे पुष्करिणी नाण्डीकं जायते बिसम्. यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१६) जिस राष्ट्र में ब्राह्मण की पत्नी को अचेत कर के रोका जाता है, उस राष्ट्र की पुष्करिणी में कमल और कमल तंतु उत्पन्न नहीं होते. (१६) नास्मै पृश्निं वि दुहन्ति ये ऽ स्या दोहमुपासते. यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१७) जिस राष्ट्र में ब्राह्मण की पत्नी अचेत कर के रोकी जाती है, उस राष्ट्र में दूध दुहने की इच्छा करने वाले थोड़ा दूध भी नहीं दुह पाते. (१७) नास्य धेनुः कल्याणी नानड्वान्सहते धुरम्. विजानिर्यत्र ब्राह्मणो रात्रिं वसति पापया.. (१८) जिस राष्ट्र में जाया अर्थात् पत्नी से रहित ब्राह्मण पाप की भावना से रात्रि निवास करता है, उस राष्ट्र के स्वामी के यहां गाय कल्याण करने वाली नहीं होती और बैल गाड़ी या रथ के जुए को नहीं खींचते. (१८) सूक्त-१८ देवता—ब्राह्मण की गाय नैतां ते देवा अददुस्तुभ्यं नृपते अत्तवे. मा ब्राह्मणस्य राजन्य गां जिघत्सो अनाद्याम्.. (१) हे राजन्! देवों ने यह गाय तुम को भक्षण करने के लिए नहीं दी है. ब्राह्मण की गाय अखाद्य है. इसे खाने की इच्छा मत कर. (१) अक्षद्रुग्धो राजन्यः पाप आत्मपराजितः. स ब्राह्मणस्य गामद्यादद्य जीवानि मा श्वः.. (२) इंद्रियों को वश में न करने वाला एवं आत्मपराजित जो राजा ब्राह्मण की गाय का ebook converter DEMO Watermarks*

भक्षण करता है, वह पापी राजा जीवित नहीं रहता. (२) आविष्टिाघविषा पृदाकूरिव चर्मणा. सा ब्राह्मणस्य राजन्य तृष्टैषा गौरनाद्या.. (३) ब्राह्मण की चर्म से ढकी हुई गाय केंचुली से ढकी हुई व्यानी सर्पिणी के समान है. हे राजन्! यह भक्षण करने योग्य नहीं है. (३) निर्वै क्षत्रं नयति हन्ति वर्चो ऽग्निरिव रब्धो वि दुनोति सर्वम्. यो ब्राह्मणं मन्यते अन्नमेव स विषस्य पिबति तैमातस्य.. (४) जो राजा ब्राह्मण के पदार्थों का भक्षण करता है, वह विष पीता है और अपना क्षात्र तेज गवां देता है. जिस प्रकार क्रोध में भरे हुए अग्नि देव सब कुछ नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण के पदार्थों को खाने योग्य समझने वाला राजा नष्ट हो जाता है. (४) य एनं हन्ति मृदुं मन्यमानो देवपीयुर्धनकामो न चित्तात्. सं तस्येन्द्रो हृदये ऽग्निमिन्ध उभे एनं द्विषो नभसी चरन्तम्.. (५) ब्राह्मण को मृदु समझने वाला जो अज्ञानी उसे नष्ट करना चाहता है, वह देव हिंसक है. इंद्र उस पापी के हृदय में अग्नि प्रज्वलित कर देते हैं और आकाश तथा पृथ्वी दोनों उस के प्रति वैर भाव रखते हैं. (५) न ब्राह्मणे हिंसितव्यो ३ ग्निः प्रियतनोरिव. सोमो ह्यस्य दायाद इन्द्रो अस्याभिशस्तिपाः.. (६) जिस प्रकार अपने शरीर को कोई नष्ट नहीं करना चाहता, उसी प्रकार अग्नि के समान तेजस्वी ब्राह्मण का नाश भी नहीं करना चाहिए. सोम ब्राह्मण का संबंधी हैं और इंद्र ब्राह्मण के शाप को पूर्ण करते हैं. (६) शतापाष्ठां नि गिरति तां न शक्नोति निःखिदम्. अन्नं यो ब्रह्मणं मल्वः स्वाद्व१द्मीति मन्यते.. (७) जो पापी ब्राह्मण के अन्न को स्वादिष्ट समझ कर भक्षण करता है, वह पापी मानव सैकड़ों विपत्तियों को निगलता है. (७) जिह्वा ज्या भवति कुल्मलं वाङ्नाडीका दन्तास्तपसाभिदिग्धाः. तेभिर्ब्रह्मा विध्यति देवपीयून हृदबलैर्धनुर्भिर्देवजूतैः.. (८) ब्राह्मण की जीभ धनुष की प्रत्यंचा, वाणी धनुष की लकड़ी और तपस्या के कारण पवित्र दांत तीर हैं. ब्राह्मण देवताओं से प्रेरित इन्हीं धनुष बाणों से देव हिंसकों को बींधता है. ebook converter DEMO Watermarks*

(८) तीक्ष्णेषवो ब्राह्मणा हेतिमन्तो यामस्यन्ति शरव्यां ३ न सा मृषा. अनुहाय तपसा मन्युना चोत दूरादव भिन्दन्त्येनम्.. (९) ब्राह्मण अपने तप और क्रोध रूप बाणों को जिस की ओर फेंकता है, वे बेकार नहीं जाते. वे बाण दूर से ही शत्रु को वेध देते हैं. (९) ये सहस्रमराज्ञानासन् दशशता उत. ते ब्राह्मणस्य गां जग्ध्वा वैतहव्याः पराभवन्.. (१०) वीरहव्य के वशंज हजारों राजा पृथ्‍वी पर राज्य करते थे. ब्राह्मण की गाय का अपहरण करने के कारण वे पराभव को प्राप्त हुए. (१०) गौरैव तान् हन्यमाना वैतहव्याँ अवातिरत्. ये केसरप्राबन्धायाश्चरमाजामपेचिरन्.. (११) वीरहव्य के वशंज जिन राजाओं ने केशर प्राबंधा नाम की चरम अजा का मांस पकाया था, उन राजाओं की मार खाते हुए गाय ने ही उन्हें छिन्नभिन्न कर दिया था. (११) एकशतं ता जनता या भूमिर्व्यधूनुत. प्रजां हिंसित्वा ब्राह्मणीमसंभव्यं पराभवन्.. (१२) जो सैकड़ों लोग अपने चलने से धरती को कंपित कर देते थे, वे ब्राह्मण की संतान की हिंसा करने के कारण ही पराजित हुए. (१२) देवपीयुश्चरति मर्त्येषु गरगीर्णो भवत्यस्थिभूयान्. यो ब्राह्मणं देवबन्धुं हिनस्ति न स पितृयाणमप्येति लोकम्.. (१३) जो देवबंधु ब्राह्मण की हिंसा करता है, वह देवशस्त्र मनुष्यों के मध्य विष खाने वाले के समान चलता फिरता है और अस्थि मात्र रह जाता है. वह पितृयान द्वारा मिलने वाले लोक को प्राप्त नहीं करता. (१३) अग्निर्वे नः पदवायः सोमो दायाद उच्यते. हन्ताभिशस्तेन्द्रस्तथा तद् वेधसो विदुः.. (१४) अग्नि हमें हमारे पदों तक पहुंचाता है और सोम हमारा दायाद कहा जाता है. इंद्र हमारी ओर से मारने वाले एवं घायल करने वाले हैं. (१४) इषुरिव दिग्धा नृपते पृदाकूरिव गोपते. सा ब्राह्मणस्येषुर्धोरा तया विध्यति पीयतः.. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*

हे राजन्! ब्राह्मण की वाणी रूपी बाण विष में बुझे बाण एवं सर्पिणी के समान भयानक होता है. जो पापी ब्राह्मण को कष्ट देते हैं, ब्राह्मण उन्हें उन्हीं के द्वारा नष्ट करता है. (१५) सूक्त-१९ देवता—ब्रह्मगवी अतिमात्रमवर्धन्त नोदिव दिवमस्पृशन्. भृगुं हिंसित्वा सृञ्जया वैतहव्या: पराभवन्.. (१) संजय के पुत्र एवं वीतहव्य के वंशजों की बहुत वृद्धि हुई. उन्होंने भृगुवंशी ब्राह्मणों की हत्या कर दी, इसलिए उन की पराजय हुई तथा वे स्वर्ग को नहीं पा सके. (१) ये बृहत्सामानमाङ्गिरसमार्पयन् ब्राह्मणं जना:. पेत्वस्तेषामुभयादमविस्तोकान्यावयत्.. (२) जिन लोगों ने बृहत् साम वाले अंगिरा गोत्री ब्राह्मणों को आपत्तियों और विपत्तियों से ढक दिया था, ब्रह्मा ने उन्हें ऐसा पुत्र दिया जो उन्हें नष्ट करने वाला था. देवों ने उन की संतान को दूर फेंक दिया. (२) ये ब्राह्मणं प्रत्यष्ठीवन् ये वास्मिञ्छुल्कमषीषिरे. अस्रस्ते मध्ये कुल्याया: केशान् खादन्त आसते.. (३) जिन्होंने ब्राह्मणों पर थूका और जिन्होंने ब्राह्मणों से धन लेने की इच्छा की, वे रक्त की सरिता में पड़े हैं और बालों को खा रहे हैं. (३) ब्रह्मगवी पच्यमाना यावत् साभि विजङ्गहे. तेजो राष्ट्रस्य निर्हन्ति न वीरो जायते वृषा.. (४) ब्राह्मण की पकाई जाती हुई गाय जिस राष्ट्र में तड़पती है, वह उस राष्ट्र का तेज समाप्त कर देती है और उस में वीर्य को सींचने वाले वीर पुरुष जन्म नहीं लेते. (४) क्रूरमस्या आशनं तृष्टं पिशितमस्यते. क्षीरं यदस्या: पीयते तद् वै पितृषु किल्बिषम्.. (५) ब्राह्मण की गाय को काटना क्रूर कर्म है. इस का मांस खाने के बाद प्यास प्यास करता है. जो लोग मारने की इच्छा से रखी हुई ऐसी गाय का दूध पीते हैं, उन के पितरों को वह दूध पाप का भागी बनाता है. (५) उग्रो राजा मन्यमानो ब्राह्मणं यो जिघत्सति. परा तत् सिच्यते राष्ट्रं ब्राह्मणो यत्र जीयते.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

जो राजा अपनेआप को उग्र मानता हुआ ब्राह्मण की हत्या करता है एवं ब्राह्मण जिस राज्य में दुःखी रहता है, वह राजा और राष्ट्र दोनों समाप्त हो जाते हैं. (६) अष्टापदी चतुरक्षी चतुःश्रोता चतुर्हनुः. द्व्यास्या द्विजिह्वा भूत्वा सा राष्ट्रमव धूनुते ब्रह्मज्यस्य.. (७) राजा के द्वारा ब्राह्मण पर डाली गई विपत्ति आठ पैरों, चार आंखों, चार कानों, चार ठोड़ियों, दो मुखों और दो जीभों वाली राक्षसी बन कर उन के राज्य को समाप्त कर देती है. (७) तद् वै राष्ट्रमा स्रवति नावं भिन्नामिवोदकम्. ब्रह्माणं यत्र हिंसन्ति तद् राष्ट्रं हन्ति दुच्छुना.. (८) जिस राष्ट्र में ब्राह्मण की हिंसा होती है, उस राष्ट्र का ब्रह्मरूपी पाप उसे छेद वाली नौका के साथ डुबा देता है. ब्राह्मण पर डाली गई विपत्ति ही उस राष्ट्र को डुबा देती है. (८) तं वृक्षा अप सेधन्ति छायां नो मोपगा इति. यो ब्राह्मणस्य सद्धनमभि नारद् मन्यते.. (९) हे नारद! जो ब्राह्मण के धन को अपना धन समझता है, उस से वृक्ष भी द्वेष मानते हैं और उसे अपनी छाया में नहीं आने देना चाहते. (९) विषमेतद् देवकृतं राजा वरुणोऽब्रवीत्. न ब्राह्मणस्य गां जग्ध्वा राष्ट्रे जागार कश्चन.. (१०) राजा वरुण ने कहा है कि ब्राह्मण का धन देवों द्वारा निर्मित विष ही है. ब्राह्मण की गाय को मार कर राष्ट्र में कोई भी जीवित नहीं रहता. (१०) नवैव ता नवतयो या भूमिर्व्यधूनुत. प्रजां हिंसित्वा ब्राह्मणीमसंभव्यं पराभवन्.. (११) जिन आठ सौ दस पुरुषों से धरती कांपती थी, वे ब्राह्मण की संतान की हिंसा कर के असंभव पराजय को प्राप्त हुए. (११) यां मृतायानुबध्नन्ति कूहं पदयोपनीम्. तद् वै ब्रह्मज्य ते देवा उपस्तरणमब्रुवन्.. (१२) हे ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले पुरुष! जो रस्सी मरे हुए पुरुष के शव में बांधी जाती है, उसी से देवों ने तेरा बिछौना बनाया है. (१२) अश्रूणि कृपमाणस्य यानि जीतस्य वावृतुः. ebook converter DEMO Watermarks*

तं वै ब्रह्मज्य ते देवा अपां भागमधारयन्.. (१३) हे ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले पुरुष! कृपा के पात्र ब्राह्मणों के आंसुओं का जो जल होता है, वही जल देवों ने तेरे लिए निश्चित किया है. (१३) येन मृतं स्नपयन्ति श्मश्रूणि येनोन्दते. तं वै ब्रह्मज्य ते देवा अपां भागमधारयन्.. (१४) हे ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले पुरुष! जो जल मृतक को स्नान करने के लिए एवं मूंछें भिगोने से बचता है, वही जल देवों ने तेरे पीने के लिए निश्चित किया है. (१४) न वर्षं मैत्रावरुणं ब्रह्मज्यमभि वर्षति. नास्मै समितिः कल्पते न मित्रं नयते वशम्.. (१५) जिस राज्य में ब्राह्मण को दुःख दिया जाता है, उस में वरुण वर्षा नहीं करते. उस राष्ट्र की सभा सामर्थ्य हीन होती है तथा उस की सेना शत्रुओं को वश में नहीं रख पाती है. (१५) सूक्त-२० देवता—वानस्पत्य उच्चैर्घोषो दुन्दुभिः सत्वनायन् वानस्पत्यः संभृत उस्रियाभिः. वाचं क्षुगुवानो दमयन्त्सपत्नान्त्सिंह इव जेष्यन्नभि तंस्तनीहि.. (१) हे दुंदुभि! तू वनस्पतियों से बनाई गई है तथा उच्च स्वर करती है. तू शक्तिशाली जनों के समान आचरण कर तथा उच्च घोष से शत्रुओं का मान मर्दन कर. (१) सिंह इवास्तानीद् द्रुवयो विबद्धोऽभिक्रन्दन्नृषभो वासितामिव. वृषा त्वं वध्रयस्ते सपत्ना ऐन्द्रस्ते शुष्मो अभिमातिषाहः.. (२) हे दुंदुभि! तू सिंह के समान गर्जन कर. हे वृक्ष के समान अधिक आयु वाली दुंदुभी! तू गाय को देख कर रंभाने वाले बैल के समान शब्द करती है. विशेष रूप से बंधी हुई तू वीर्य वर्षा करने वाली है, इस कारण तेरे शत्रु शक्ति रहित हो जाते हैं. तेरा बल इंद्र के समान है, इसलिए उसे वीर्य ही सहन कर पाता है. (२) वृषेव यूथे सहसा विदानो गव्यन्नभि रुव सन्धनाजित्. शुचा विध्य हृदयं परेषां हित्वा ग्रामान् प्रच्युता यन्तु शत्रवः.. (३) जिस प्रकार गाय की कामना करने वाला बैल अपने शब्द के कारण झुंड में भी पहचान लिया जाता है, उसी प्रकार हे दुंदुभी! शत्रुओं को जीतने की इच्छा से शब्द कर के उन के हृदयों में संताप भर दे. वे शत्रु हमारे गांवों को छोड़ कर चले जाएं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

संजयन् पृतना ऊर्ध्वमायुर्गृह्या गृहणानो बहुधा वि चक्ष्व. दैवीं वाचं दुन्दुभ आ गुरस्व वेधाः शत्रूणामुप भरस्व वेदः.. (४) हे दुदुंभि! तू उच्च शब्द करती हुई शत्रु सेनाओं को जीत लेती है. तू उन्हें पकड़ कर युद्ध में विजय प्राप्त करती है. तू दैवी वाणी का उच्चारण कर और शत्रुओं का धन मुझे प्राप्त करा. (४) दुन्दुभेर्वाचं प्रयतां वदन्तीमाशृण्वती नाथिता घोषबुद्धा. नारी पुत्रं धावतु हस्तगृह्यामित्री भीता समरे वधानाम्.. (५) दुदुंभि की घोर गर्जना से शत्रुओं की नारियां होश में आ जाती हैं. वे युद्ध में मारे गए शत्रुओं को देख कर भयभीत होती हैं और अपने पुत्र का हाथ पकड़ कर भाग जाती हैं. (५) पूर्वो दुन्दुभे प्र वदासि वाचं भूम्याः पृष्ठे वद रोचमानः. अमित्रसेनाम्अभिजज्जभानो द्युमद् वद दुन्दुभे सूनृतावत्.. (६) हे दुदुंभि! तेरी ध्वनि सब से पहले निकलती है, इसलिए तू शत्रु सेना का विनाश कर तथा पृथ्वी के ऊपर सत्य वचनों का प्रचार कर. (६) अन्तरेमे नभसी घोषो अस्तु पृथक् ते ध्वनयो यन्तु शीभम्. अभि क्रन्द स्तनयोत्पिपानः श्लोककृन्मित्रतूर्याय स्वर्धी.. (७) हे दुदुंभि! धरती और आकाश के मध्य तेरी ध्वनियां अनेक रूपों में व्याप्त हों तथा शोभन प्रतीत हों. तू उच्च शब्द से समृद्ध हो तथा मित्रों में वेग व्याप्त करने के लिए उच्च स्वर से गर्जन कर. (७) धीभिः कृतः प्र वदाति वाचमुद्धर्षय सत्वनामायुधानि. इन्द्रमेदी सत्वनो नि ह्वयस्व मित्रैरमित्राँ अव जङ्घनीहि.. (८) हे दुदुंभि! कुशलतापूर्वक बजाने पर तू मोहक शब्द निकालती है. शक्तिशाली मनुष्यों के आयुधों को ऊंचा कर के तू उन्हें प्रसन्न बना. तू वीरों का आह्वान करती हुई हमारे मित्रों द्वारा हमारे शत्रुओं का विनाश करा, क्योंकि तू इंद्र की प्रिया है. (८) संक्रन्दनः प्रवदो धृष्णुषेणः प्रवेदकृद् बहुधा ग्रामघोषी. श्रेयो वन्वानो वयुनानि विद्वान् कीर्तिं बहुभ्यो वि हर द्विराजे.. (९) हे दुदुंभि! तू गर्जन करने वाले गौवों को गुंजित करने वाली, धनदात्री और सेना को साहस प्रदान करने वाली है. तू कल्याण करने वाली एवं उत्तम पुरुषों को जानने वाली है. तू इन दो राजाओं के युद्ध के मध्य अनेक वीरों को कीर्ति प्रदान कर. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

श्रेयःकेतो वसुजित् सहीयान्त्सङ्ग्रामजित् संशितो ब्रह्मणासि. अंशूनिव ग्रावाधिषवणे अद्रिर्गव्यन् दुन्दुभेऽधि नृत्य वेदः.. (१०) हे संग्राम में विजय प्राप्त करने वाली दुदुंभी! तू कल्याणी, धन जीतने वाली, शक्तिशालिनी एवं मंत्र के द्वारा तीक्ष्ण बनाई हुई है. अधिश्श्रवण काल में पर्वत अपने पाषाण खंडों को दबाता हुआ नृत्य करता है, उसी प्रकार तू भी शत्रुओं के धन पर अधिकार करती हुई नृत्य कर. (१०) शत्रुषाणीषादभिमातिषाहो गवेषणः सहमान उद्भिद्. वाग्वीव मन्त्रं प्र भरस्व वाचं सांग्रामजित्यायैषमुद् वदेह.. (११) हे दुदुंभि! तू ऐसा शब्द निकालती है, जो शत्रुओं की वाणी से टक्कर ले सके. तू गवेषणा करने वाले बातूनी पुरुष के समान युद्ध जीतने के निमित्त शब्द करती हुई गूंज. (११) अच्युतच्युत् समदो गमिष्ठो मृधो जेता पुरएतायोध्यः. इन्द्रेण गुप्तो विदथा निचिक्यद्धृद्द्योतनो द्विषतां याहि शीघ्रम्.. (१२) हे युद्ध में विजय प्राप्त करने वाली दुदुंभी! तू हर्ष से पूर्ण है एवं डिगती नहीं है. तू आगे युद्ध में जा कर योद्धाओं की प्रेरक और युद्ध जीतने वाली है. इंद्र के द्वारा रक्षित तू शत्रुओं के हृदयों को जलाती हुई उन के समीप जा. (१२) सूक्त-२१ देवता—वानस्पत्य विहृदयं वैमनस्यं वदामित्रेषु दुन्दुभे. विद्वेषं कश्मशं भयममित्रेषु नि ध्मस्यवैनान् दुन्दुभे जाहि.. (१) हे दुदुंभि! तू शत्रुओं में वैमनस्य फैला एवं उन के हृदयों में एकदूसरे के प्रति द्वेष भर दे. हम अपने शत्रुओं में द्वेष की भावना फैलाना चाहते हैं. तू उन का तिरस्कार करती हुई उन्हें समाप्त कर दे. (१) उद्वेपमाना मनसा चक्षुषा हृदयेन च. धावन्तु बिभ्यतो ऽ मित्राः प्रत्रासेनाज्ये हुते.. (२) हमारे द्वारा होम किए गए घृत से हमारे शत्रु कंपित हों और मन, नेत्र तथा हृदय से भयभीत हो कर भाग जाएं. (२) वानस्पत्यः संभृत उस्रियाभिर्विश्वगोत्र्यः. प्रत्रासममित्रेभ्यो वदाज्येनाभिघारितः.. (३) हे वनस्पति से बनी हुई दुदुंभी! तू चमड़े से मढ़ी हुई है तथा मेघ घटा के समान घोर ebook converter DEMO Watermarks*

शब्द करती है. घी से चुपड़ी हुई तू शत्रुओं को भय उत्पन्न करने वाला शब्द कर. (३) यथा मृगाः संविजन्त आरण्याः पुरुषादधि. एवा त्वं दुन्दुभे ऽ मित्रानभि क्रन्द प्र त्रासयाथो चित्तानि मोहय.. (४) हे दुंदुभि! वनचारी शिकारी पुरुष से जिस प्रकार वन के पशु भयभीत होते हैं, उसी प्रकार तू अपने गर्जन से शत्रुओं को भयभीत करती हुई, उन के चित्तों को मोहित बना. (४) यथा वृकादजावयो धावन्ति बहु बिभ्यतीः. एवा त्वं दुन्दुभे ऽ मित्रानभि क्रन्द प्र त्रासयाथो चित्तानि मोहय.. (५) जिस प्रकार भेड़ें और बकरियां भेड़िए के कारण अधिक भयभीत हो कर भागती हैं, उसी प्रकार तू गड़गड़ाहट करती हुई शत्रुओं को भयभीत कर के उन का चित्त मोहित कर. (५) यथा श्येनात् पतत्रिणः संविजन्ते अहर्दिवि सिंहस्य स्तनथोर्यथा. एवा त्वं दुन्दुभे ऽ मित्रानभि क्रन्द प्र त्रासयाथो चित्तानि मोहय.. (६) हे दुंदुभि! जिस प्रकार बाज से सभी पक्षी और सिंह से सभी प्राणी भयभीत रहते हैं, उसी प्रकार तू शत्रुओं के प्रति गड़गड़ाहट कर के उन्हें भयभीत कर के उन के चित्तों को मोहित कर. (६) परामित्रान् दुन्दुभिना हरिणस्याजिनेन च. सर्वे देवा अतित्रसन् ये संग्रामस्येशते.. (७) जो संग्राम के देवता हैं, उन्होंने हिरण के चमड़े से मढ़ी हुई दुंदुभि बजा कर शत्रुओं को भयभीत कर के पराजित किया. (७) यैरिन्द्रः प्रक्रीडते पद्घोषैश्छायया सह. तैरमित्रास्त्रसन्तु नो ऽ मी ये यन्त्यनीकशः.. (८) इंद्र जिन पदघोषों से खेलते हैं, उन से अधिक संख्या वाले शत्रु भयभीत हों. (८) ज्याघोषा दुन्दुभयो ऽ भि क्रोशन्तु या दिशः. सेना पराजिता यतीरमित्राणामनीकशः.. (९) शत्रुओं की पराजित सेनाएं जिस ओर भाग रही हैं, हमारे बाणों की डोरी और दुंदुभि का शब्द मिल कर उधर ही उन को भयभीत करें और हरा दें. (९) आदित्य चक्षुरा दत्स्व मरीचयो ऽ नु धावत. पत्सङ्गिनीरा सजन्तु विगते बाहुवीर्ये.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

हे सर्प! तुम शत्रुओं के नेत्रों की देखने की शक्ति छीन लो. हे सूर्य किरणो! तुम दौड़ते हुए शत्रुओं की पीठ पर पड़ो. भुजाओं की शक्ति क्षीण होने पर जब शत्रु भागने लगे तो उन का साथ मत दो. (१०) यूयमुग्रा मरुतः पृश्निमातर इन्द्रेण युजा प्र मृणीत शत्रून्. सोमो राजा वरुणो राजा महादेव उत मृत्युुरिन्द्रः.. (११) हे मरुतो! तुम उग्र कर्म करने वाले हो. तुम इंद्र के साथ मिल कर शत्रुओं का मर्दन करो. सोम राजा, वरुण राजा, महादेव और मृत्युदेव इंद्र का सहयोग करें. (११) एता देवसेनाः सूर्यकेतवः सचेतसः. अमित्रान् नो जयन्तु स्वाहा.. (१२) ये देव सेनाएं समान चित्त वाली हैं और इन के झंडे में सूर्य विराजमान हैं. ये सेनाएं शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें. मेरी यह आहुति ग्रहण करने योग्य हो. (१२) सूक्त-२२ देवता—तक्मानाशन अग्निस्तक्मानमप बाधतामितः सोमो ग्रावा वरुणः पूतदक्षाः. वेदिर्बर्हिः समिधः शोशुचाना अप द्वेषांस्यमुया भवन्तु.. (१) अग्नि देव ज्वर को बाधा पहुंचाएं. पत्थर के समान दृढ़ सौम्य, पवित्र और दक्ष वरण, वेल्वी, कुश तथा प्रज्वलित समिधाएं ज्वर से द्वेष करने वाली हों. (१) अयं यो विश्वान् हरितान् कृणोष्युच्छोचयन्नग्निरिवाभिदुन्वन्. अधा हि तक्मन्नरसो हि भूया अधा न्य ङ्ङधराङ् वा परेहि.. (२) हे देह को नष्ट कर देने वाले ज्वर! तू सभी मनुष्यों को संताप देता है. इसलिए तू तिरस्कृत, निर्बल एवं अधम स्थान को चला जा. (२) यः परुषः पारुषेयो ऽ वध्वंस इवारुणः. तक्मानं विश्वधावीर्याधराज्चं परा सुवा.. (३) हे शक्तिशाली! तुम कठोर एवं अवध्वंस के समान लाल रंग वाले ज्वर को मुझ से दूर हटाओ. (३) अधराज्चं प्र हिणोमि नमः कृत्वा तक्मने. शकम्भरस्य मुष्टिहा पुनरेतु महावृषान्.. (४) मैं ज्वर को नमस्कार कर के उसे निम्न स्थान में जाने के लिए प्रेरित करता हूं. मुक्के के eBook converter DEMO Watermarks*