अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
३२. इंद्र की महिमा १-३ ३३. इंद्र के लिए सोम रस का संस्कार १-३ ३४. इंद्र के बल की महिमा १-१८ शंबर असुर का वध ११ ३५. इंद्र की स्तुति १-१६ महान् इंद्र के असाधारण कर्म का वर्णन ७ ३६. इंद्र की स्तुति १-११ धन की याचना ३ ३७. इंद्र की स्तुति का वर्णन १-११ इंद्र का वज्र ३ ३८. इंद्र से सोम रस पीने का आग्रह १-६ इंद्र का पूजन ४ ३९. इंद्र का आह्वान १-५ ४०. इंद्र की महिमा का गुणगान १-३ ४१. बलशाली इंद्र का वर्णन १-३ ४२. इंद्र की शक्ति १-३ ४३. इंद्र से शत्रु विनाश की कामना १-३ ४४. इंद्र की स्तुति १-३ ४५. इंद्र को पास बुलाने का आग्रह १-३ ४६. इंद्र की महिमा १-३ ४७. इंद्र का वर्णन व स्तुति १-२१ इंद्र के रथ में घोड़ों को जोड़ना ११ ४८. इंद्र की स्तुति १-६ सूर्य की किरणों के तीस मुहूर्त दीप्त ६ ४९. इंद्र की स्तुति १-७ ५०. इंद्र की महिमा का गुणगान १-२ ५१. इंद्र के आयुधों का वर्णन १-४ ५२. सोमरस १-३ ५३. इंद्र से यज्ञ में आने का अनुरोध १-३ ५४. इंद्र से यज्ञ में आने का अनुरोध १-३ ५५. इंद्र को यज्ञ में बुलाने का संकल्प १-३ ५६. इंद्र की स्तुति और वर्णन १-६ ५७. रक्षा के लिए इंद्र का आह्वान १-१६ ५८. इंद्र की महिमा की प्रशंसा १-४ ५९. इंद्र की स्तुति १-४ इंद्र का यज्ञ भाग ३ ६०. अन्न एवं धन के स्वामी इंद्र की प्रशंसा १-६ ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र को प्रिय लगने वाली स्तुतियां ६ ६१. इंद्र की हवि से पूजा १-६ ६२. इंद्र से रक्षा की कामना १-१० इंद्र की स्तुति ४ ६३. इंद्र की स्तुति १-९ ६४. स्वर्ग के स्वामी इंद्र की स्तुति १-६ ६५. इंद्र की स्तुति १-३ ६६. इंद्र का यज्ञ में बैठना १-३ ६७. इंद्र की महिमा का गुणगान १-७ अग्नि की स्तुति ३ ६८. रक्षा के लिए इंद्र का आह्वान १-१२ यज्ञशाला में इंद्र का गान ११ ६९. इंद्र का चिंतन १-१२ सूर्य रूप इंद्र ११ ७०. इंद्र की स्तुति १-२० इंद्र की महिमा १२ ७१. इंद्र की महिमा का वर्णन १-१६ शत्रुओं द्वारा इंद्र के बल की प्रशंसा १६ ७२. इंद्र की स्तुति और वर्णन १-३ ७३. इंद्र की प्रशंसा १-६ हवि रूप अन्न का सेवन ३ इंद्र द्वारा दुष्कर्म करने वालों का वध ६ ७४. इंद्र की स्तुति १-७ पाप वृत्ति वाले राक्षसों के वध की कामना ५ ७५. गोदान के अवसर पर अन्न की कामना १-३ ७६. अश्विनीकुमारों की स्तुति १-८ इंद्र की प्रशंसा ३ ७७. इंद्र की प्रशंसा १-८ इंद्र हेतु मंत्रों के समूह का उच्चारण २ मंत्रों के द्वारा दर्शनीय स्वर्ग का ज्ञान ३ ७८. सोमरस का संस्कार और इंद्र की स्तुति १-३ ७९. इंद्र की स्तुति १-२ ८०. इंद्र की स्तुति १-२ ८१. इंद्र के समान कोई महान नहीं १-२ ८२. इंद्र की स्तुति १-२ ८३. इंद्र से मंगलकारी घर की कामना १-२ ८४. इंद्र की स्तुति का परामर्श १-३ ebook converter DEMO Watermarks*
८५. इंद्र की स्तुति करने की प्रेरणा १-४ ८६. इंद्र की स्तुति ३ ८७. इंद्र की स्तुति १-७ बृहस्पति की स्तुति ६ ८८. बृहस्पति देव की स्तुति १-६ हवियों और नमस्कारों के द्वारा बृहस्पति की पूजा ६ ८९. इंद्र की स्तुति १-११ तीव्र स्वाद वाला सोमरस ८ बृहस्पति देव से रक्षा की कामना ११ ९०. बृहस्पति की स्तुति १-३ विशाल गोशालाएं ३ ९१. बृहस्पति देव की स्तुति १-१२ बृहस्पति स्तुतिकर्ता के रक्षक ११ इंद्र द्वारा मेघ पर प्रहार १२ ९२. इंद्र की स्तुति १-२१ भार को संभालने वाले इंद्र ११ वृद्धि की कामना २१ ९३. इंद्र की स्तुति १-८ ९४. इंद्र से शत्रु के विनाश का आग्रह १-११ हिंसक शत्रु से रक्षा की कामना ११ ९५. सोमरस पान १-४ इंद्र के बल की पूजा का परामर्श २ ९६. इंद्र की स्तुति १-२४ सोम का संस्कार न करने वाला प्रहार के योग्य ४ रोगी की चिरायु की कामना ९ अग्नि देव की स्तुति ११ यक्ष्मा रोग को नष्ट करना १९ ९७. इंद्र की प्रशंसा १-३ ९८. इंद्र की स्तुति १-२ ९९. इंद्र की स्तुति १-२ १००. इंद्र की स्तुति १-३ १०१. अग्नि की स्तुति १-३ १०२. अग्नि की स्तुति १-३ १०३. अग्नि की स्तुति १-३ १०४. इंद्र के लिए प्रशंसा मंत्रोच्चारण १-४ अग्नि की स्तुति ४ १०५. इंद्र की स्तुति १-५ वृत्र के हंता इंद्र ४ ebook converter DEMO Watermarks*
१०६. इंद्र की स्तुति १-३ १०७. इंद्र और सूर्य की प्रशंसा १-१५ रणभूमि में विरोधियों की हिंसा ८ सूर्य और उषादेवी १५ १०८. इंद्र की स्तुति १-३ १०९. इंद्र की स्तुति १-३ सोम का संस्कार ३ ११०. इंद्र की पूजा १-३ १११. इंद्र की स्तुति १-३ सोम का संस्कार ३ ११२. सूर्य की प्रशंसा करने वाले इंद्र १-३ ११३. इंद्र के हितकारी कार्य १-२ ११४. इंद्र की स्तुति १-२ ११५. इंद्र की स्तुति १-३ ११६. इंद्र की स्तुति १-२ ११७. इंद्र से सोमरस पान का अनुरोध १-३ ११८. इंद्र की स्तुति १-४ ११९. प्राचीन स्तोत्र के द्वारा इंद्र की स्तुति १-२ १२०. इंद्र से यज्ञ में पधारने का अनुरोध १-२ १२१. स्वर्ग के सृष्टा इंद्र की स्तुति १-३ १२२. इंद्र की स्तुति १-३ १२३. मित्र व वरुण की महिमा का गान १-२ १२४. इंद्र की स्तुति १-६ देवत्व की रक्षा के लिए राक्षसों का वध ५ १२५. इंद्र से चारों दिशाओं से शत्रु को रोकने का आग्रह १-७ इंद्र के सहायक अश्विनीकुमार ४ १२६. इंद्र की स्तुति १-२३ यज्ञ में नारी और पुरुष एक साथ १० इंद्राणी की प्रशंसा ११ वृषाकपि की प्रशंसा १३ १२७. मंत्र उच्चारण १-१४ कुंता सूक्त के वैश्वानर की मंगलमयी स्तुति ७ इंद्र की स्तुति १३ १२८. इंद्र की स्तुति १-१४ १२९. दान और साधु १-२० १३०. प्रकृति का पोषक १-२० १३१. परम तत्त्व १-२० ebook converter DEMO Watermarks*
१३२. रामतोरई का वर्णन १-१६ १३३. असत्य से मुक्ति १-६ १३४. चार दिशाएं १-६ १३५. इंद्र की स्तुति १-१३ १३६. वनस्पति का वर्णन १-१६ महान् अग्नि का कथन ५ १३७. इंद्र का वर्णन व स्तुति १-१४ सोमरस का शोधन ५ इंद्र द्वारा पृथ्वी पर जल वाली शक्तियों की स्थापना ७ १३८. इंद्र की स्तुति १-३ अश्विनीकुमारों की स्तुति २ १३९. अश्विनीकुमारों की स्तुति १-५ १४०. अश्विनीकुमारों की स्तुति १-५ १४१. अश्विनीकुमारों की स्तुति १-५ १४२. अश्विनीकुमारों की स्तुति १-६ १४३. अश्विनीकुमारों की स्तुति १-९
पहला कांड सूक्त-१ देवता—वाचस्पति ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः. वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे.. (१) जो रजोगुण, तमोगुण एवं सतोगुण तीन गुण और पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, तन्मात्रा एवं अहंकार सात पदार्थ दिव्य रूप में सर्वत्र भ्रमण करते हैं, वाणी के स्वामी ब्रह्म उन तत्त्वों और पदार्थों की दिव्य शक्ति मुझे दें. (१) पुनरेहि वाचस्पते देवेन मनसा सह. वसोष्पते नि रमय मय्येवास्तु मयि श्रुतम्.. (२) हे वाणी के स्वामी ब्रह्म देव! आप दिव्य मन के साथ मेरे समीप आइए. हे प्राण के स्वामी ब्रह्म! इच्छित फल दे कर मुझे आनंदित कीजिए. मेरे द्वारा अध्ययन किए गए वेदशास्त्र धारण करने की मुझे बुद्धि दीजिए. (२) इहैवाभि वि तनूभे आर्त्नी इव ज्यया. वाचस्पतिर्नि यच्छतु मय्येवास्तु मयि श्रुतम्. (३) हे वाणी के स्वामी ब्रह्म! जिस प्रकार धनुष की डोरी चढ़ाने से उस के दोनों सिरे समान रूप से खिंच जाते हैं, उसी प्रकार मुझे वेदशास्त्र धारण करने की शक्ति एवं आनंदोपभोग के इच्छित साधन प्रदान करो. (३) उपहूतो वाचस्पतिरुपास्मान् वाचस्पतिर्ह्वयताम्. सं श्रुतेन गमेमहि मा श्रुतेन वि राधिषि.. (४) वाणी के स्वामी ब्रह्म का हम आह्वान करते हैं. हमारे द्वारा आह्वान किए गए ब्रह्म हमें अपने समीप बुलाएं. हम संपूर्ण ज्ञान से सदैव युक्त रहें तथा कभी दूर न हों. (४) सूक्त-२ देवता—पर्जन्य विद्मा शरस्य पितरं पर्जन्यं भूरिधायसम्. विद्मो ष्वस्य मातरं पृथिवीं भूरिवर्पसम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
जड़ चेतन सब का पोषण कर्ता एवं सब को धारण करने वाला बादल बाण का पिता है तथा सभी तत्त्वों से युक्त पृथ्वी इस बाण की माता है. तात्पर्य यह है कि बादल और पृथ्वी दोनों से बाण अर्थात् शक्ति की उत्पत्ति होती है. यह बात हम जानते हैं. (१) ज्या के परि णो नमाश्मानं तन्वं कृधि. वीडुर्वरीयो ऽ रातीरप द्वेषांस्या कृधि.. (२) हे धनुष की निंदनीय डोरी! तुम हमारी ओर न झुक कर हमारे शत्रुओं की ओर झुको. हे देवपति! हमारे शरीरों को पत्थर के समान सुदृढ़ बनाओ, हमें शत्रुओं के द्वेषपूर्ण कर्मों से दूर रखो एवं हमारे शत्रुओं का बल नष्ट करो. (२) वृक्षं यद्गावः परिषस्वजाना अनुस्फुरं शरमर्चन्त्यृभुम्. शरुमस्मद् यावय दिद्युमिन्द्र.. (३) हे इंद्र! जिस प्रकार गरमी से व्याकुल गाएं वट वृक्ष की छाया में शरण लेती हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रुओं के द्वेषपूर्ण बाण हम से दूर रह कर उन्हीं के समीप जाएं. (३) यथा द्यां च पृथिवीं चान्तस्तिष्ठति तेजनम्. एवा रोगं चास्रावं चान्तस्तिष्ठतु मुञ्ज इत्.. (४) जिस प्रकार पृथ्वी और द्युलोक के मध्य तेज रहता है, उसी प्रकार यह बाण बहुमूत्र, अतिसार (दस्त) आदि रोगों तथा घावों को दबाए रहे. (४) सूक्त-३ देवता—पर्जन्य विद्मा शरस्य पितरं पर्जन्यं शतवृष्ण्यम्. तेना ते तन्वे ३ शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति.. (१) हम सैकड़ों सामर्थ्यों वाले एवं बाण के पिता पर्जन्य अर्थात् बादल को जानते हैं. हे मूत्ररोगी! मैं तेरे मूत्रादि रोगों को समाप्त करता हूं. शरीर में रखा हुआ मूत्र बाहर निकल कर पृथ्वी पर गिरे. (१) विद्मा शरस्य पितरं मित्रं शतवृष्ण्यम्. तेना ते तन्वे ३ शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति.. (२) हम सैकड़ों सामर्थ्यों वाले एवं बाण के पिता मित्र अर्थात् सूर्य को जानते हैं. हे रोगी मनुष्य! इसी बाण से मैं तेरे मूत्रादि रोगों को नष्ट करता हूं. तेरे पेट में रुका हुआ मूत्र बाहर निकल कर पृथ्वी पर गिरे. (२) विद्मा शरस्य पितरं वरुणं शतवृष्ण्यम्. ebook converter DEMO Watermarks*
तेना ते तन्वे ३ शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति.. (३) हम सैकड़ों सामर्थ्यों से संपन्न एवं बाण के पिता वरुण को जानते हैं. हे रोगी मनुष्य! इसी बाण से मैं तेरे मूत्रादि रोगों को दूर करता हूं. तेरे पेट में रुका हुआ मूत्र बाहर निकल कर धरती पर गिरे. (३) विद्मा शरस्य पितरं चन्द्रं शतवृष्ण्यम्. तेना ते तन्वे ३ शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति.. (४) हम सैकड़ों शक्तियों वाले एवं बाण के पिता चंद्र को जानते हैं. हे रोगी मनुष्य! मैं उसी बाण से तेरे मूत्रादि रोगों को समाप्त करता हूं. तेरे पेट में रुका हुआ मूत्र बाहर निकले और धरती पर गिरे. (४) विद्मा शरस्य पितरं सूर्य शतवृष्ण्यम्. तेना ते तन्वे ३ शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति.. (५) हम सैकड़ों शक्तियों वाले एवं बाण के पिता सूर्य को जानते हैं. हे रोगी! मैं इसी बाण से तेरे मूत्रादि रोगों को नष्ट करता हूं. उदर (पेट) में संचित तेरा मूत्र बाहर निकल कर धरती पर गिरे. (५) यदान्त्रेषु गवीन्योर्यद्वस्तावधि संश्रितम्. एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्.. (६) जो मूत्र तेरी आंतों में, मूत्रनाड़ी में एवं मूत्राशय में रुका हुआ है, वह तेरा सारा मूत्र शब्द करता हुआ शीघ्र बाहर निकल आए. (६) प्र ते भिनद्मि मेहनं वर्त्रं वेशन्त्या इव. एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्.. (७) हे मूत्र व्याधि से पीड़ित रोगी! मैं तेरे मूत्र निकलने के मार्ग का उसी प्रकार भेदन करता हूं, जिस प्रकार जलाशय का जल बाहर निकालने के लिए नाली खोदते हैं. तेरा सारा मूत्र शब्द करता हुआ बाहर निकले. (७) विषितं ते वस्तिबिलं समुद्रस्योदधेरिव. एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्.. (८) हे मूत्र रोग से दुःखी रोगी! जिस प्रकार सागर, जलाशय आदि का जल निकलने के लिए मार्ग बना दिया जाता है, उसी प्रकार मैं ने तेरे रुके हुए मूत्र को बाहर निकालने के लिए तेरे मूत्राशय का द्वार खोल दिया है. तेरा सारा मूत्र शब्द करता हुआ बाहर निकले. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-४ देवता—जल
यथेषुका परापतदवसृष्टाधि धन्वन्:. एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्.. (९) जैसे खिंची हुई डोरी वाले धनुष से छोड़ा हुआ बाण तेजी से लक्ष्य की ओर जाता है, वैसे तेरा रुका हुआ सारा मूत्र शब्द करता हुआ बाहर निकले. (९) सूक्त-४ देवता—जल अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम्. पृंचतीर्मधुना पय:.. (१) यज्ञ करने के इच्छुक जन अपनी माताओं और बहनों के समान जल, सोमरस, दूध एवं घृत आदि यज्ञ सामग्री ले कर आते हैं. (१) अमूर्या उप सूर्ये याभिर्वा सूर्य: सह. ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्.. (२) जो जल सूर्य मंडल में स्थित है अथवा सूर्य जिस जल के साथ स्थित है, वह जल हमारे यज्ञ को फल देने में समर्थ बनाए. (२) अपो देवीरुप ह्वये यत्र गाव: पिबन्ति न:. सिन्धुभ्य: कृत्वं हवि:.. (३) मैं स्वच्छ एवं देवता रूप जलों का आह्वान करता हूं. जल से पूर्ण जलाशयों अर्थात् नदियों और तालाबों में हमारी गाएं जल पीती हैं. (३) अप्स्व १ न्तरमृतमप्सु भेषजम्. अपामुत प्रशस्तिभिरश्वा भवथ वाजिनो गावो भवथ वाजिनी:.. (४) जलों में अमृत है. जलों में ओषधियां निवास करती हैं. इन जलों के प्रभाव से हमारे घोड़े बलवान बनें, हमारी गाएं शक्ति संपन्न बनें. (४) सूक्त-५ देवता—जल आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन. महे रणाय चक्षसे.. (१) हे जल! आप सभी प्रकार का सुख देने वाले हैं. अन्न आदि सुखों का उपभोग करने के इच्छुक हम सब को आप उन के उपभोग की शक्ति प्रदान करें. आप हमें महान एवं रमणीय आनंद स्वरूप ब्रह्म के साक्षात्कार का सामर्थ्य दें. (१) यो व: शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह न:. उशतीरिव मातर:.. (२) जिस प्रकार माताएं अपनी इच्छा से दूध पिला कर बालकों को पुष्ट करती हैं, उसी ebook converter DEMO Watermarks*
प्रकार हे जल! आप अपने अत्यधिक कल्याणकारी रस का हमें अधिकारी बनाएं. (२) तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ. आपो जनयथा च न:.. (३) हे जल! हम जिस अन्न आदि को पा कर तृप्त होते हैं, उसे प्राप्त करने के लिए हम आप को पर्याप्त रूप में पाएं. हे जल! आप पर्याप्त रूप में आ कर हमें तृप्त करें. (३) ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम्. अपो याचामि भेषजम्.. (४) मैं धनों के स्वामी एवं सुख साधन प्रदान कर के गतिशील मनुष्यों को एक स्थान पर बसाने वाले जल की ओषधि के रूप में याचना करता हूं. (४) सूक्त-६ देवता—जल शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये. शं योरभि स्रवन्तु न:.. (१) दिव्यगुणों वाला जल सभी ओर से हमारा कल्याण करने वाला हो. जल हमारे चारों ओर कल्याण की वर्षा करे एवं पीने के लिए उपलब्ध हो. (१) अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा. अग्निं च विश्वशम्भुवम्.. (२) मुझे सोम ने बताया है कि सारी ओषधियां एवं अग्नि जल में निवास करती हैं. अग्नि सारे संसार का कल्याण करने वाली है. (२) आप: पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे ३ मम. ज्योक् च सूर्यं दृशे.. (३) हे जल! तुम मेरे रोगों का निवारण करने के लिए ओषधियां प्रदान करो. अधिक समय तक सूर्य के दर्शन करने के लिए तुम मेरे शरीर को पुष्ट करो. (३) शं न आपो धन्वन्या ३: शमु सन्त्वनूप्या:. शं न: खनित्रिमा आप: शमु या: कुम्भ आभृता: शिवा न: सन्तु वार्षिकी:.. (४) जल हमें मरु भूमि में सुखकारी हों. जिन स्थानों में जल की प्राप्ति सुलभ है, वहां के जल हमारा कल्याण करें. कुआं, बावड़ी आदि खोद कर प्राप्त किए गए जल हमारे लिए कल्याणकारी हों. घड़े में भर कर लाया गया जल हमें सुख दे. वर्षा से प्राप्त होने वाला जल हमारे लिए सुखकारी हो. (४) सूक्त-७ देवता—अग्नि और इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*
स्तुवानमग्न आ वह यातुधानं किमीदिनम्. त्वं हि देव वन्दितो हन्ता दस्योर्बभूविथ.. (१) हे अग्नि! हम जिन देवों की स्तुति करते हैं, उन्हें तुम हमारे समीप लाओ एवं हमें मारने की इच्छा से घूमने वाले राक्षसों को हम से दूर भगाओ. हे दिव्य गुणों वाले अग्नि! हमारे नमस्कार आदि से प्रसन्न तुम दस्युजनों की हत्या कर देते हो. (१) आज्यस्य परमेष्ठिन् जातवेदस्तनूवशिन्. अग्ने तौलस्य प्राशान यातुधानान् वि लापय.. (२) हे स्वर्ग आदि उत्तम स्थानों में निवास करने वाले, हे जातवेद एवं हे जलशक्ति रूप में सब के शरीरों में स्थित अग्नि! हमारे द्वारा सुवा आदि से नाप कर दिए गए घृत का भोजन कीजिए एवं राक्षसों का विनाश भी कीजिए. (२) वि लपन्तु यातुधाना अत्रिणो ये किमीदिनः. अथेदमग्ने नो हविरिन्द्रश्च प्रति हर्यतम्.. (३) हे अग्नि! आप और परम ऐश्वर्य वाले इंद्र, हमारे दिए गए हवि को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें. राक्षस, सब का भक्षण करने वाले दस्यु एवं इधरउधर घूमने वाले दुष्ट जन नष्ट हो जाएं. (३) अग्निः पूर्व आ रभतां प्रेन्द्रो नुदतु बाहुमान्. ब्रवीतु सर्वो यातुमान् अयमस्मीत्येत्य.. (४) सब से पहले अग्नि देव राक्षसों को दंड देना आरंभ करें. इस के पश्चात शक्तिशाली भुजाओं वाले इंद्र राक्षसों को दूर भगाएं. अग्नि और इंद्र से पीड़ित सभी राक्षस आ कर आत्मसमर्पण करें और अपना परिचय दें कि मैं अमुक हूं. (४) पश्याम् ते वीर्यं जातवेदः प्र णो ब्रूहि यातुधानान् नृचक्षः. त्वया सर्वे परितप्ताः पुरस्तात् त आ यन्तु प्रब्रुवाणा उपेदम्.. (५) हे सब को जानने वाले अग्नि! हम आप का पराक्रम देखें. हे उपासना के योग्य अग्नि! हमारी इच्छानुसार राक्षसों से कहिए कि वे हमें दुःख न दें. आप के द्वारा सताए हुए राक्षस अपना परिचय देते हुए हमारी शरण में आएं. (५) आ रभस्व जातवेदो ऽ स्माकार्थाय जज्ञिषे. दूतो नो अग्ने भूत्वा यातुधानान् वि लापय.. (६) हे सब को जानने वाले अग्नि! तुम राक्षसों के विनाश का कार्य आरंभ करो, क्योंकि तुम हमारे प्रयोजन पूर्ण करने के लिए उत्पन्न हुए हो. हे अग्नि! तुम हमारे दूत बन कर राक्षसों को ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-८ देवता—बृहस्पति
दूर भगाओ. (६) त्वमग्ने यातुधानानुपबद्धाँ इहा वह. अथैषामिन्द्रो वज्रेणापि शीर्षाणि वृश्चतु.. (७) हे अग्नि! तुम रस्सी आदि से राक्षसों के हाथपैर बांध कर उन्हें यहां ले आओ. इस के पश्चात इंद्र अपने वज्र से उन के सिर काट दें. (७) सूक्त-८ देवता—बृहस्पति इदं हविर्यातुधानान् नदी फेनमिव वहत्. यं इदं स्त्री पुमानकरिह स स्तुवतां जनः.. (१) मेरे द्वारा अग्नि आदि देवों को दिया हुआ घृत आदि हवि दुष्ट राक्षसों को यहां से उसी प्रकार दूर हटा दे, जिस प्रकार नदी की धारा फेन को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है. मेरे प्रति अभिचार, जादू, टोना, टोटका करने वाले स्त्रीपुरुष अपने मनोरथ में असफल हो कर यहां मेरी शरण में आएं और मेरी स्तुति करें. (१) अयं स्तुवान आगमदिमं स्म प्रति हर्यत. बृहस्पते वशे लब्ध्वाग्नीषोमा वि विध्यतम्.. (२) हे बृहस्पति आदि देवो! आप की स्तुति करता हुआ जो यह मनुष्य आप की शरण में आया है, यह हमारा विरोधी शत्रु है. हे बृहस्पति, अग्नि एवं सोम! इन उपद्रवकारियों को वश में कर के अनेक प्रकार से दंडित करो. (२) यातुधानस्य सोमप जहि प्रजां नयस्व च. नि स्तुवानस्य पातय परमक्ष्युतावरम्.. (३) हे सोमरस पीने वाले अग्नि देव! तुम राक्षसों की संतानों के समीप पहुंच कर उन्हें समाप्त कर दो और हमारी संतान की रक्षा करो. हमारे जो शत्रु तुम से भयभीत हो कर तुम्हारी प्रार्थना करते हैं, तुम उन की दाईं और बाईं दोनों आंखें बाहर निकाल लो. (३) यत्रैषामग्ने जनिमानि वेत्थ गुहा सतामत्रिणां जातवेदः. तांस्त्वं ब्रह्मणा वावृधानो जह्येषां शततर्हमग्ने.. (४) हे सब के विषय में जानने वाले अग्नि! तुम गुहा में निवास करने वाले राक्षसों को जानते हो. हे मंत्र द्वारा वृद्धि पाते हुए अग्नि! इन राक्षसों द्वारा सैकड़ों प्रकार की हिंसा को रोको एवं संतान सहित इन का विनाश करो. (४) सूक्त-९ देवता—वसु ebook converter DEMO Watermarks*
अस्मिन् वसु वसवो धारयन्त्विन्द्रः पूषा वरुणो मित्रो अग्निः. इममादित्या उत विश्वे च देवा उत्तरस्मिन् यन्ज्योतिषि धारयन्तु.. (१) भांतिभांति की धन संपत्ति की कामना करने वाले इस पुरुष को वसु, इंद्र, पूषा, वरुण, मित्र, अग्नि एवं विश्वे देव धन प्रदान करें तथा ये देव इसे उत्तम ज्योति संपन्न बनाएं. (१) अस्य देवाः प्रदिशि ज्योतिरस्तु सूर्यो अग्निरुत वा हिरण्यम्. सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्.. (२) हे इंद्रादि देवो! ग्रामादि सुखों के इच्छुक इस पुरुष के अधिकार में सूर्य, अग्नि, चंद्र, स्वर्ग आदि की ज्योति पूर्ण रूप से रहे. इस के कारण शत्रु हमारे अधिकार में रहें. तुम हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ. (२) येनेन्द्राय समभरः पयांस्युत्तमेन ब्रह्मणा जातवेदः. तेन त्वमग्न इह वर्धयेमं सजातानां श्रैष्ठ्य आ धेह्येनम्.. (३) हे सब कुछ जानने वाले अग्नि! आप ने जिन उत्तम मंत्रों द्वारा इंद्र के लिए दुग्ध, घृत आदि रस हवि के रूप में प्राप्त कराए, हे अग्नि! उन्हीं मंत्रों के द्वारा इस पुरुष की वृद्धि करो एवं इसे अपनी जाति वालों में श्रेष्ठ बनाओ. (३) एषां यज्ञमुत वर्चो ददे ऽ हं रायस्पोषमुत चित्तान्यग्ने. सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्.. (४) हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से मैं इन शत्रुओं के स्वर्ग आदि लोकों के साधक यज्ञ, कर्म, तेज, धन एवं चित्त का हरण करता हूं. मेरे शत्रु मुझ से निम्न स्थिति में रहें. आप मुझ यजमान को सभी दुःखों से रहित एवं उत्तम स्वर्ग में पहुंचा दो. (४) सूक्त-१० देवता—वरुण अयं देवानामसुरो वि राजति वशा हि सत्या वरुणस्य राज्ञः. ततस्परि ब्रह्मणा शाशदान उग्रस्य मन्योरुदिमं नयामि.. (१) इंद्रादि देवों में वरुण पापियों को दंड देने वाले हैं. इस प्रकार के यह वरुण सब से उत्कृष्ट हैं. सभी पदार्थ तेजस्वी वरुण देव के वश में हैं. इसलिए मैं वरुण की स्तुति संबंधी मंत्रों से शक्ति प्राप्त कर के वरुण देव के प्रचंड कोप के कारण उत्पन्न जलोदर रोग वाले इस पुरुष को रोगमुक्त करता हूं. (१) नमस्ते राजन् वरुणास्तु मन्यवे विश्वं ह्युग्र निचिकेषि दृग्धम्. सहस्रमन्यान् प्र सुवामि साकं शतं जीवाति शरदस्तव्तायम्.. (२)
हे तेजस्वी वरुण! तुम्हारे क्रोध के लिए नमस्कार है. तुम सभी प्राणियों द्वारा किए गए अपराधों को जानते हो. मैं हजारों अपराधी पुरुषों को तुम्हारी सेवा में भेज रहा हूं. ये मनुष्य आप के प्रति निष्ठा वाले बन कर सौ वर्ष तक जीवित रहें. (२) यदुवक्थानृतं जिह्वया वृजिनं बहु. राज्ञस्तवा सत्यधर्मणो मुञ्चामि वरुणादहम्.. (३) हे जलोदर रोग से ग्रसित पुरुष! अपनी जिह्वा से तूने पाप का साधन असत्य भाषण अधिक किया है. मैं सत्य धर्म वाले एवं तेजस्वी वरुण के कोप से तेरी रक्षा करता हूं. (३) मुञ्चामि त्वा वैश्वानरादर्णवान् महतस्परि. सजातानुग्रहा वद ब्रह्म चाप चिकीहि न:.. (४) हे पुरुष! मैं तुझे जठराग्नि को मंद करने वाले महान जलोदर रोग से छुड़ाता हूं. हे परम शक्तिशाली वरुण! आप अपने सहचरों, भटों अर्थात् अपने सेवकों से कहिए कि वे बारबार आ कर इस मनुष्य को पीड़ा न दें. आप हमारे द्वारा दिए गए हवि रूप अन्न और स्तुति से प्रसन्न हो कर हमारे भय का विनाश कीजिए. (४) सूक्त-११ देवता—पूषा आदि वषट् ते पूषन्नस्मिन्त्सूतावर्यमा होता कृणोतु वेधा:. सिस्रतां नार्यृतप्रजाता वि पर्वाणि जिहतां सूतवा उ.. (१) हे पूषा देव! सुख उत्पन्न करने वाले इस यज्ञ कर्म में प्राणि समूह के प्रेरक देव अर्यमा होता बन कर आप को हवि प्रदान करें. संपूर्ण जगत् के निर्माता वेधा देव आप को वषट्कार के द्वारा हवि प्रदान करें. आप की कृपा से यह गर्भिणी नारी प्रसव संबंधी कष्ट से छुटकारा पा कर जीवित संतान को जन्म दे. सुखपूर्वक प्रसव के लिए इस के संधि बंध शिथिल हो जाएं. (१) चतस्रो दिवः प्रदिशश्चतस्रो भूम्या उत. देवा गर्भं समैरयन् तं व्यूर्णुवन्तु सूतवे.. (२) द्युलोक से संबंधित प्राची आदि चार दिशाओं एवं भूलोक की आग्नेयी आदि चार दिशाओं ने एवं इन दिशाओं के अधिष्ठाता इंद्र आदि देवों ने पहले गर्भ को पूर्ण किया था. वे सभी देव इस समय गर्भ को गर्भाशय से बाहर निकालें एवं जरायु के आच्छादन से मुक्त करें. (२) सूषा व्यूर्णोतु वि योनिं हापयामसि. श्रथया सूषणे त्वमव त्वं बिष्कले सृज.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
प्रसव की देवता पूषा गर्भ को जरायु के बंधन से अलग करें. हम भी सुखपूर्वक प्रसव के लिए योनि मार्ग को खोल रहे हैं. तुम भी सुखपूर्वक प्रसव के लिए योनि मार्ग को शिथिल करो. हे सूतिमारुत देव! आप भी गर्भ का मुख नीचे को कर के उसे बाहर निकलने हेतु प्रेरित करो. (३) नेव मांसे न पीवसि नेव मज्जस्वाहतम्. अवैतु पृश्नि शेवलं शुने जरायुक्त्तवे ऽ व जरायु पद्यताम्.. (४) हे प्रसव करने वाली नाड़ी! तू इस उदरगत जरायु से पुष्ट नहीं होगी, क्योंकि इस का संबंध मांस, मज्जा आदि से नहीं है. इसलिए उजले रंग की यह जरायु दोनों के ऊपर तैरने वाली काई के समान नीचे गिर जाए. इसे कुत्ते के खाने के लिए नीचे गिर जाने दें. (४) वि ते भिनद्मि मेहनं वि योनिं वि गवीनिके. वि मातरं च पुत्रं च वि कुमारं जरायुणाव जरायु पद्यताम्.. (५) हे गर्भिणी! मैं गर्भस्थ बालक को बाहर निकालने के लिए मूत्रमार्ग को फैलाता हूं तथा योनि के आसपास की नाड़ियों को भी फैलाता हूं. क्योंकि ये प्रसव में बाधा डालती हैं. मैं माता और पुत्र को अलगअलग करता हूं. इस के बाद मैं पुत्र को जरायु से अलग करता हूं. जरायु गर्भाशय से नीचे गिर जाए. (५) यथा वातो यथा मनो यथा पतन्ति पक्षिण:. एवा त्वं दशमास्य साकं जरायुणा पताव जरायु पद्यताम्.. (६) हे दशमास गर्भस्थ शिशु! जिस प्रकार वायु, मन एवं आकाश में उड़ने वाले पक्षी आकाश में बिना रोकटोक के विचरण करते हैं, उसी प्रकार तू जरायु के साथ गर्भ से बाहर आ. जरायु गर्भाशय से नीचे गिरे. (६) सूक्त-१२ देवता—यक्ष्मानाशन जरायुज: प्रथम उस्रिया वृषा वाताभ्रजा स्तनयन्नेति वृष्ट्या. स नो मृडाति तन्व ऋजुगो रुजन् य एकमोजस्त्रेधा विचक्रमे.. (१) नक्षत्रों को पराजित कर के प्रकट होने वाले, संसार में सब से प्रथम उत्पन्न एवं वायु के समान शीघ्रगामी सूर्य बादलों को गर्जन करने के लिए प्रेरित करते हुए वर्षा के साथ आते हैं. वे सूर्य त्रिदोष से उत्पन्न रोग आदि का विनाश करते हुए हमारी रक्षा करें. सीधे चलने वाले जो सूर्य एक हो कर भी अपने तेज को तीन प्रकार से प्रकाशित करते हैं, वे हमें सुख प्रदान करें. (१) अङ्गेअङ्गे शोचिषा शिश्रियाणं नमस्यन्तस्त्वा हविषा विधेम. eBook converter DEMO Watermarks*
अङ्कान्त्समङ्कान् हविषा विधेम यो अग्रभीत् पर्वास्या ग्रभीता.. (२) हे प्राणियों के प्रत्येक अंग में अपनी दीप्ति से वर्तमान सूर्य! हम तुम्हें नमस्कार करते हुए चरु आदि से तुम्हारी उपासना करते हैं. हम तुम्हारे अनुचर एवं परिवार रूप देवों की भी हवि से सेवा करते हैं. जिस ज्वर आदि रोग ने इस पुरुष के शरीर के अवयवों को जकड़ रखा है, हम उस की निवृत्ति के लिए हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं. (२) मुञ्च शीर्षक्त्या उत कास एनं परुष्परूराविवेशा यो अस्य. यो अभ्रजा वातजा यश्च शुष्मो वनस्पतीन्त्सचतां पर्वतांश्च.. (३) हे सूर्य! इस पुरुष को सिर के रोग से छुटकारा दिलाओ. जो खांसी का रोग इस के जोड़जोड़ में प्रवेश कर गया है, उस से भी इसे मुक्त कराओ. वर्षा एवं जल से उत्पन्न जो पित्त के विकार से जनित आदि रोग हैं, उन से इस पुरुष को मुक्त कराइए. ये रोग इस पुरुष को छोड़ कर वनस्पति और पर्वतों में चले जाएं. (३) शं मे परस्मै गात्राय शमस्त्ववराय मे. शं मे चतुर्भ्यो अङ्गेभ्यः शमस्तु तन्वे ३ मम.. (४) मेरे शरीर के अवयव सिर का रोग शांति के रूप में कल्याणकारी हो. मेरे चरण आदि निम्न अंगों को सुख मिले. मेरे दोनों हाथों और दोनों चरणों को सुख प्राप्त हो. मेरे शरीर के मध्य भाग को नीरोगता प्राप्त हो. (४) सूक्त-१३ देवता—विद्युत् नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे. नमस्ते अस्त्वश्मने येना दूडाशे अस्यसि.. (१) हे पर्जन्य! विद्युत को मेरा नमस्कार हो. गर्जन करते हुए वज्र को मेरा नमस्कार हो. आप आततायियों को दूर फेंक देते हैं. (१) नमस्ते प्रवतो नपाद् यतस्तपः समूहसि. मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि.. (२) हे पर्जन्य! आप सत्पुरुषों की रक्षा करते हैं. आप को नमस्कार है. आप जल को भीतर धारण किए रहते हैं और समय से पहले नीचे नहीं गिरने देते हैं. आप पाप विनाशक तप को एकत्र करते हैं एवं पापियों पर अपना वज्र फेंकते हैं. आप हमारे शरीर को सुख दें और हमारे पुत्र, पौत्र आदि का कल्याण करें. (२) प्रवतो नपान्नम एवास्तु तुभ्यं नमस्ते हेतये तपुषे च कृण्मः. विद्म ते धाम परमं गुहा यत् समुद्रे अन्तर्निहितासि नाभिः.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
हे ऊंचाई से नीचे की ओर गिरने वाले पर्जन्य! तुम्हारे लिए नमस्कार है. तुम्हारे संतापकारी आयुध वज्र को नमस्कार है. हम आप के गुफा के समान अगम्य एवं उत्तम निवास स्थान को जानते हैं. जिस प्रकार शरीर में नाभि मध्यस्थ है, उसी प्रकार तुम अंतरिक्ष के केंद्र सागर में स्थित हो. (३) यां त्वा देवा असृजन्त विश्व इषुं कृण्वाना असनाय धृष्णुम्. सा नो मृड विदथे गृणाना तस्यै ते नमो अस्तु देवि.. (४) हे अग्नि! सभी देवों के अप्रिय पुरुषों पर गिराने के लिए एवं शत्रुओं पर बाण के रूप में फेंकने के लिए तुम्हारी रचना की गई है. यज्ञ में तुम्हारी स्तुति भी की जाती है. तुम हमारी रक्षा करो. हे आकाश में चमकती हुई अग्नि! तुम्हारे लिए नमस्कार हो. (४) सूक्त-१४ देवता—यम भगमस्या वर्च आदिष्यधि वृक्षादिव स्रजम्. महाबुध्न इव पर्वतो ज्योक् पितृष्वास्ताम्.. (१) मनुष्य जिस प्रकार वृक्ष से माला बनाने हेतु फूल तोड़ता है, उसी प्रकार मैं इस स्त्री के भाग्य और तेज को स्वीकार करता हूं. धरती में भीतर तक धंसा हुआ पर्वत जिस प्रकार स्थिर रहता है, उसी प्रकार यह बुरे भाग्य वाली स्त्री चिरकाल तक पिता के घर रहे अर्थात् यह कभी पति का मुख न देखे. (१) एषा ते राजन् कन्या वधूर्नि धूयतां यम. सा मातुर्बध्यतां गृहे ऽ थो भ्रातुरथो पितुः.. (२) हे सुशोभित सोम! यह कन्या आप की पत्नी है, क्योंकि इस ने पहले आप को स्वीकार किया है, इसलिए यह पतिगृह से निकाल दी जानी चाहिए. यह कन्या चिरकाल तक अपने पिता एवं भाई के घर पड़ी रहे. (२) एषा ते कुलपा राजन् तामु ते परि दद्मसि. ज्योक् पितृष्वासाता आ शीर्षः शमोप्यात्.. (३) हे सुशोभित सोम! यह स्त्री पतिव्रता होने के कारण आप के कुल का पालन करने वाली है, इसलिए हम इसे रक्षा के लिए आप को देते हैं. यह तब तक अपने पिता के घर पर रहे. यह धरती पर सिर गिरने तक अर्थात् मरण पर्यंत अपने पिता के घर रहे. (३) असितस्य ते ब्रह्मणा कश्यपस्य गयस्य च. अन्तःकोशमिव जामयो ऽ पि नह्यामि ते भगम्.. (४) हे स्त्री! मैं तेरे भाग्य को असित, ब्रह्मा, कश्यप एवं गय ऋषियों के मंत्रों से इस प्रकार ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१५ देवता—सिंधु आदि
सुरक्षित करता हूं, जिस प्रकार स्त्रियां घरों में अपना धन, वस्त्र आदि छिपा कर रखती हैं. (४) सूक्त-१५ देवता—सिंधु आदि सं सं स्रवन्तु सिन्धवः सं वाताः सं पतत्रिणः. इमं यज्ञं प्रदिवो मे जुषन्तां संस्राव्येण हविषा जुहोमि.. (१) नदियां हमारे अनुकूल बहें, पवन हमारे अनुकूल चले एवं पक्षी हमारी इच्छा के अनुसार (गति करें). पुरातन देव मेरे इस यज्ञ को स्वीकार करें, क्योंकि मैं घी, दूध आदि का संग्रह कर के यह यज्ञ कर रहा हूं. (१) इहैव हवमा यात म इह संस्रावणा उतेमं वर्धयता गिरः. इहैतु सर्वो यः पशुरस्मिन् तिष्ठतु या रयिः.. (२) हे देवो! आप सब को त्याग कर मेरे इस यज्ञ में पधारें. इस में आज्य आदि का होम है. हे स्तुतियों द्वारा बढ़ाए जाते हुए देवो! आप इस यजमान की वृद्धि करें. हे देवो! हमारी स्तुतियों को सुन कर प्रसन्न हुए आप की कृपा से हमारे घर में गाय, अश्व आदि पशु एवं अन्य संपत्ति निवास करे. (२) ये नदीनां संस्रवन्त्युत्सासः सदमक्षिताः. तेभिर्मे सर्वैः संस्रावैर्धनं सं स्रावयामसि.. (३) गंगा आदि नदियों की जो अक्षय धारा एवं झरने सदा बहते रहते हैं तथा ग्रीष्म ऋतु में कभी नहीं सूखते हैं, उन के कारण हमारा समस्त पशु धन सदैव समृद्ध हो. (३) ये सर्पिषः संस्रवन्ति क्षीरस्य चोदकस्य च. तेभिर्मे सर्वैः संस्रावैर्धनं सं स्रावयामसि.. (४) घी, दूध और जल के जो प्रवाह सदैव गतिशील रहते हैं, उन सभी न सूखने वाले प्रवाहों के कारण हमारी सभी संपत्ति बढ़ती रहे. (४) सूक्त-१६ देवता—अग्नि, वरुण आदि ये ऽ मावास्यां ३ रात्रिमुदुस्थुर्वाजमत्त्रिणः. अग्निस्तुरीयो यातुहा सो अस्मभ्यमधि ब्रवत्.. (१) मनुष्यों का भक्षण करने वाले जो राक्षस अमावस्या की अंधेरी रात में इधर उधर घूमते हैं. चौथे अग्नि देव उन राक्षसों एवं चोरों का संहार कर के हमारी रक्षा करें. (१) सीसायाध्याह वरुणः सीसायाग्निरुपावति.
सीसं म इन्द्रः प्रायच्छत् तदङ्ग यातुचातनम्.. (२) वरुण देव ने फेन के विषय में कहा है. सीसे जस्ते के विषय में अग्नि ने भी यही कहा है. परम ऐश्वर्ययुक्त इंद्र ने मुझे सीसा प्रदान किया है. इंद्र ने कहा है कि हे प्रिय! यह सीसा राक्षसों का संहार करने वाला है. (२) इदं विष्कन्धं सहत इदं बाधते अत्रिणः. अनेन विश्वा ससहे या जातानि पिशाच्याः.. (३) यह सीसा राक्षस, पिशाच आदि द्वारा डाले जाने वाले विघ्नों को समाप्त करने वाला है. यह मनुष्यों का भक्षण करने वाले राक्षसों को नष्ट करता है. मैं इस सीसे के द्वारा सभी राक्षसों को पराजित करता हूं. वे राक्षस पिशाची से उत्पन्न हैं. (३) यदि नो गां हंसि यद्यश्वं यदि पूरुषम्. तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नो ऽ सो अवीरहा.. (४) हे शत्रु! यदि तू हमारी गायों, घोड़ों एवं सहायता करने वाले सेवकों की हत्या करता है तो मैं सीसे से तुझे मारूंगा. तू मेरे वीरों की हत्या नहीं कर सकेगा. (४) सूक्त-१७ देवता—स्त्रियां एवं धर्मपत्नियां अमूर्या यन्ति योषितो हिरा लोहितवाससः. अभ्रातर इव जामयस्तिष्ठन्तु हतवर्चसः.. (१) स्त्रियों की लाल रक्त प्रवाहिनी जो नाड़ियां रोग के कारण सदा प्रवाहित होती रहती हैं, वे रोग नष्ट हो जाने के कारण इस प्रकार रुक जाएं, जिस प्रकार बिना भाइयों वाली बहनें ससुराल न जा कर अपने पिता के घर में ही रुक जाती हैं. (१) तिष्ठावरे तिष्ठ पर उत त्वं तिष्ठ मध्यमे. कनिष्ठिका च तिष्ठति तिष्ठादिद्धमनिर्मही.. (२) हे शरीर के निचले भाग में वर्तमान नाड़ी! हे शरीर के ऊपरी भाग में स्थित नाड़ी! हे शरीर के मध्य भाग में वर्तमान नाड़ी! तू भी स्थिर हो जा. रुधिर का प्रवाह बंद करने के लिए छोटी और बड़ी सभी नाड़ियां स्थिर हो जाएं. (२) शतस्य धमनीनां सहस्रस्य हिराणाम्. अस्थूरिन्मध्यमा इमाः साकमन्ता अरंसत.. (३) हृदय संबंधी सैकड़ों धमनियां, हजारों शिराएं एवं उन की मध्यवर्ती रक्तवाहिनी नाड़ियां इस मंत्र के प्रभाव से खून बहाना बंद कर दें. शेष नाड़ियां पूर्ववत रक्त प्रवाह ebook converter DEMO Watermarks*
चालू रखें. (३) परि वः सिकतावती धनूर्बृहत्यक्रमीत्. तिष्ठतेलयता सु कम्.. (४) हे पथरी रोग उत्पन्न करने वाली नाड़ी! हे धनु और बृहती नाड़ी! तुम रुधिर प्रवाह के सभी मार्गों को चारों ओर से घेर कर फैली हुई हो. तुम रक्त स्राव रहित बनो तथा इस जन का सुख बढ़ाओ. (४) सूक्त-१८ देवता—सावित्री आदि निर्लक्ष्म्यं ललाम्यं १ निररातिं सुवामसि. अथ या भद्रा तानि नः प्रजाया अरातिं नयामसि.. (१) हम ललाट के असौभाग्य सूचक चिह्न को शत्रु के समान अपने शरीर से दूर करते हैं. जो सौभाग्य सूचक चिह्न हैं, वे हमारी संतान को प्राप्त हों. हम ने अपने शरीर से बुरे चिह्न दूर किए हैं, वे हमारे शत्रुओं को प्राप्त हों. (१) निररणिं सविता साविषक् पदोर्निहस्तयोर्वरुणो मित्रो अर्यमा. निरस्मभ्यमनुमती रराणा प्रेमां देवा असाविषुः सौभाग्याय.. (२) सब को प्रेरणा देने वाले सविता देव, वरुण देव, मित्र एवं अर्यमा देव हमारे हाथों और पैरों में स्थित असौभाग्य सूचक लक्षणों को दूर कर दें. अनुमति देवी, ‘भय मत करो’, कहती हुई हमारे शरीर में वर्तमान सभी बुरे लक्षणों को निकाल दें. इंद्र आदि देवों ने इस अनुमति देवी को हमें सौभाग्य देने के लिए प्रेरित किया है. (२) यत्त आत्मनि तन्वां घोरम् अस्ति यद्वा केशेषु प्रतिचक्षणे वा. सर्वं तद् वाचाप हन्मो वयं देवस्त्वा सविता सूदयतु.. (३) हे पुरुष! तेरे अपने शरीर, केशों एवं नेत्रों के जो बुरे लक्षण हैं, हम मंत्र रूपी वाणी से उन सभी बुरे लक्षणों का विनाश करते हैं. सविता देव तुझे कल्याण की प्रेरणा दें. (३) रिश्यपदीं वृषदतीं गोषेधां विधमामृत. विलीढ्यं ललाम्यं १ ता अस्मन्नाशयामसि.. (४) हम से संबंधित जो स्त्री हरिण के समान पैरों वाली, बैल के समान दांतों वाली, गाय के समान गति वाली एवं विकृत शब्द बोलने वाली है; हम मंत्रों के प्रभाव से उस के इन दुर्लक्षणों को दूर करते हैं. जिस स्त्री के माथे पर दुर्लक्षणों के प्रतीक उलटे रोम हैं, उन्हें भी हम अपने मंत्रों के प्रभाव से दूर करते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*