अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
वशा गाय के सामने आने वाले ब्राह्मण अपने ही धन के समान उस के पास जाते हैं. इन्हें वर्जित करना अर्थात् इन्हें रोकना गाय के स्वामी को हानि पहुंचाता है. (१५) चरेदेवा त्रैहायणादविज्ञातगदा सती. वशां च विद्यान्नारद ब्राह्मणास्तर्ह्येष्याः.. (१६) हे नारद! यह धेनु अविजात गद अर्थात् रोग को न जानती हुई तीन वर्ष तक विचरण करे अथवा घास आदि खाए. यजमान इस के बाद इस धेनु को वशा मानता हुआ ब्राह्मणों की खोज करे. (१६) य एनामवशामाह देवानां निहितं निधिम्. उभौ तस्मै भवाशर्वौ परिक्रम्येषुमस्यतः.. (१७) यह वशा इन देवताओं की धरोहर के रूप में है. इस वशा को जो मनुष्य अवशा कहता है वह भव और शर्व के बाणों का लक्ष्य बनता है. (१७) यो अस्या ऊधो न वेदाथो अस्या स्तनानुत. उभयेनैवास्मै दुहे दातुं चेदशकद् वशाम्.. (१८) जो मनुष्य इस वशा के थनों और ऊधस अर्थात् ऐन को जानता हुआ इस का दान करता है, यह वशा उसे अपने थनों और उन दोनों के द्वारा फल देने वाली होती है. (१८) दुरदभ्नैनामा शये याचितां च न दित्सति. नास्मै कामाः समृध्यन्ते सामदत्त्वा चिकीर्षति.. (१९) जो मांगने पर उस वशा का दान नहीं करता है, उस को दुर्द्म्न अर्थात् वश में न आने वाली दशा जकड़ लेती है. जो उसे अपने पास ही रखना चाहता है, उस की इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं. (१९) देवा वशामयाचन् मुखं कृत्वा ब्राह्मणम्. तेषां सर्वेषामददद्धेडं न्येति मानुषः.. (२०) ब्राह्मण को अपना मुख बना कर देवता वशा को मांगते हैं. इसे न देने वाला मनुष्य उन के क्रोध का लक्ष्य बनता है. (२०) हेडं पशूनां न्येति ब्राह्मणेभ्यो ऽ ददद् वशाम्. देवानां निहितं भागं मर्त्यश्चेन्निप्रियायते.. (२१) जो पुरुष देवताओं की धरोहर रूप भाग को अपना अत्यंत प्रिय समझता है, वह ब्राह्मणों को वशा का दमन करने के कारण पशुओं का क्रोध प्राप्त करता है. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*
यदन्ये शतं याचेयुर्ब्राह्मणा गोपतिं वशाम्. अथैनां देवा अब्रुवन्नेवं ह विदुषो वशा.. (२२) गौ के स्वामी से चाहे अन्य सैकड़ों ब्राह्मण वशा की याचना करें, पर वशा विद्वान् की होती है, ऐसी देवों की उक्ति है. (२२) य एवं विदुषे ऽ दत्त्वाथान्येभ्यो ददद् वशाम्. दुर्गा तस्मा अधिष्ठाने पृथिवी सहदेवता... (२३) जो पुरुष विद्वान् को गौ न देता हुआ, अन्य ब्राह्मण को देता है, उस के लिए पृथिवी देवताओं सहित दुर्गम हो जाती है. (२३) देवा वशामयाचन् यस्मिन्नग्रे अजायत. तामेतां विद्यान्नारदः सह देवैरुदाजत... (२४) जिस के सामने वशा प्रकट होती है, देवता उस से वशा मांगते हैं. यह जान कर नारद भी देवताओं सहित वहां पहुंच गए. (२४) अनपत्यमल्पपशुं वशा कृणोति पूरुषम्. ब्राह्मणैश्च याचितामथैनां निप्रियायते... (२५) ब्राह्मणों के द्वारा मांगी गई वशा को जो पुरुष अत्यंत प्रिय मानता हुआ नहीं देता है, वही वशा उसे संतानहीन तथा अन्य पशुओं वाला बना देती है. (२५) अग्नीषोमाभ्यां कामाय मित्राय वरुणाय च. तेभ्यो याचन्ति ब्राह्मणास्तेष्वा वृश्चते ऽ ददत्... (२६) ब्राह्मण सोम के लिए, अग्नि के लिए, काम के लिए और मित्रावरुण के लिए वशा को मांगते हैं. वशा न देने पर ये वशा के स्वामी को काटते हैं. (२६) यावदस्या गोपतिर्नोपशृणुयादृचः स्वयम्. चरेदस्य तावद् गोषु नास्य श्रुत्वा गृहे वसेत्... (२७) गौ का स्वामी जब तक गौ के संबंध में कोई संकल्प न करे, तब तक वह उस की गायों में विचरे, फिर उस के घर में वास न करे. (२७) यो अस्या ऋच उपश्रुत्याथ गोष्वचीचरत्. आयुश्च तस्य भूतिं च देवा वृश्चन्ति हीडिताः... (२८) जो संकल्प रूप वाणी के पश्चात भी अपनी गायों में विचरण करता है, वह देवताओं का अपमान करता है और देवताओं द्वारा ही अपनी आयु और ऐश्वर्य को नष्ट करने वाला होता है. ebook converter DEMO Watermarks*
(२८) वशा चरन्ती बहुधा देवानां निहितो निधिः. आविष्कृणुष्व रूपाणि यदा स्थाम जिघांसति... (२९) देवताओं की निधि रूप वशा अनेक प्रकार से विचरण करती हुई जब स्थान को नष्ट करना चाहती है, तब विभिन्न रूपों को प्रकट करती है. (२९) आविरात्मानं कृणुते यदा स्थाम जिघांसति. अथो ह ब्रह्मभ्यो वशा याच्याय कृणुते मनः... (३०) जब वशा अपने स्थान का नाश करने की इच्छा करती है, तब वह ब्राह्मणों के द्वारा मांगे जाने की इच्छा करती हुई अनेक रूपों को प्रकट करती है. (३०) मनसा सं कल्पयति तद् देवाँ अपि गच्छति. ततो ह ब्रह्माणो वशामुपप्रयन्ति याचितुम्... (३१) वशा जब इच्छा करती है, तब उस की इच्छा देवताओं के पास जाती है. तब ब्राह्मण वशा को मांगने के लिए उस के पास आते हैं. (३१) स्वधाकारेण पितृभ्यो यज्ञेन देवताभ्यः. दानेन राजन्यो वशाया मातुर्हेडं न गच्छति... (३२) पितरों के लिए स्वधा करने से, देवताओं के विभिन्न यज्ञ करने से तथा वशा का दान करने से क्षत्रिय अपनी माता का क्रोध प्राप्त नहीं करता है. (३२) वशा माता राजन्यस्य तथा संभूतमग्रशः. तस्या आहुरनर्पणं यद् ब्रह्मभ्यः प्रदीयते.. (३३) वशा क्षत्रिय की माता है. वशाओं का समूह पहले प्रकट हुआ था. ब्राह्मणों को वशा का दान करने से पहले उस वशा को अनर्पण अर्थात् अर्पण न की हुई कहा जाता है. (३३) यथाज्यं प्रगृहीतमालुम्पेत् स्रुचो अग्नये. एवा ह ब्रह्मभ्यो वशामग्नय आ वृश्चते ऽ ददत्.. (३४) ग्रहण किया हुआ घृत जिस प्रकार स्रुवा से अग्नि के लिए पृथक् होता है, उसी प्रकार अग्नि का ध्यान करते हुए ब्राह्मण के लिए वशा का दान करना चाहिए. (३४) पुरोडाशवत्सा सुदुघा लोके ऽ स्मा उप तिष्ठति. सास्मै सर्वान् कामान् वशा प्रददुषे दुहे... (३५) ebook converter DEMO Watermarks*
सुंदरता और सुख से दुहाने वाली वशा इस लोक में यजमान के पास रहती है. यजमान जब वशा का दान करता है तो वह उसे सभी अभीष्ट प्रदान करती है. (३५) सर्वान् कामान् यमराज्ये वशा प्रददुषे दुहे. अथाहुरनारिकं लोकं निरुन्धानस्य याचिताम्... (३६) यह वशा यम के राज्य में दाता की सभी कामनाओं को पूरा करने वाली है. मांगी हुई वशा के न देने पर नरक प्राप्त होता है, ऐसा विद्वानों का कथन है. (३६) प्रवीयमाना चरति क्रुद्धा गोपतये वशा. वेहतं मा मन्यमानो मृत्योः पाशेषु बध्यताम्.. (३७) क्रोध में भरी हुई वशा गाय अपने स्वामी को खाती हुई सी घूमती है. वह कहती है कि मुझ गर्भघातिनी को अपनी जानने वाला मूर्ख मृत्यु के बंधनों में पड़े. (३७) यो वेहतं मन्यमानो ऽ मा च पचते वशाम्. अप्यस्य पुत्रान् पौत्रांश्च याचयते बृहस्पतिः. (३८) यह वशा अन्य गायों में ताप बढ़ाती हुई घूमती है. यदि इस का स्वामी इसे दान नहीं करता तो वह उस के लिए विष का दोहन करती है. (३८) महदेषाव तपति चरन्ती गोषु गौरपि. अथो ह गोपतये वशाददुषे विषं दुहे.. (३९) जो गर्भघातिनी वशा को अपनी मानता है या उस का पाचन करता है, बृहस्पति उस के पुत्र, पौत्र आदि को लेने की इच्छा करते हैं. (३९) प्रियं पशूनां भवति यद् ब्रह्मभ्यः प्रदीयते. अथो वशायास्तत् प्रियं यद् देवत्रा हविः स्यात्.. (४०) ब्राह्मणों को वशा का दान कर देने पर वशा का स्वामी पशुओं का प्रिय होता है. वशा देवताओं को हवि के रूप में प्रदान की जाती है. (४०) या वशा उदकल्पयन् देवा यज्ञादुदेत्य. तासां विलिप्त्यं भीमामुदाकुरुत नारदः.. (४१) यज्ञों से लौट कर देवताओं ने वशा का निर्माण किया, तब नारद ने अधिक घी वाली और विशालकाय वशा को स्वीकार किया. (४१) तां देवा अमीमांसन्त वशेया ३ मवशेति. तामब्रवीन्नारद एषा वशानां वशतमेति.. (४२) ebook converter DEMO Watermarks*
उस समय देवताओं ने यह कहा कि यह वशा अवशा है अर्थात् इस पर किसी का अधिकार नहीं है. नारद ने उसे वशाओं में परम वशा अर्थात् सब से वही वशा बनाया. (४२) कति नु वशा नारद यास्त्वं वेत्थ मनुष्यजाः. तास्त्वा पृच्छामि विद्वांसं कस्या नाश्नीयादब्राह्मणः.. (४३) हे नारद! तुम ऐसी कितनी गायों को जानने वाले हो जो मनुष्यों में प्रकट होती हैं. तुम विद्वान् हो, इसी कारण मैं तुम से पूछता हूं. अब्राह्मण वशा के प्राशन अर्थात् खाने से बचे. (४३) विलिप्त्या बृहस्पते या च सूतवशा वशा. तस्या नाश्नीयादब्राह्मणो य आशंसेत भूत्याम्.. (४४) हे बृहस्पत! जो अब्राह्मण ऐश्वर्य चाहे वह विलिप्ती अर्थात् विशेष प्रयोजनों में लिप्त सूतवशा और वशा का भोजन न करे. (४४) नमस्ते अस्तु नारदानुष्ठु विदुषे वशा. कतमासां भीमतमा यामदत्त्वा पराभवेत्.. (४५) हे नारद! तुम्हें नमस्कार है. वशा विद्वान् की स्तुति के अनुकूल ही है. इन में भयंकर वशा कौन सी है, जिस का दान न करने पर पराजय प्राप्त होती है. (४५) विलिप्ती या बृहस्पते ऽ थो सूतवशा वशा. तस्या नाश्नीयादब्राह्मणो य आशंसेत भूत्याम्.. (४६) हे बृहस्पति! ऐश्वर्य की प्रार्थना करने वाला अब्राह्मण विलिप्ती और सूत वशा और वशा का भोजन न करे. (४६) त्रीणि वै वशाजातानि विलिप्ती सूतवशा वशा. ताः प्र यच्छेद ब्रह्मभ्यः सो ऽ नाव्रस्कः प्रजापतौ.. (४७) वशाओं के तीन भेद होते हैं—विलिप्ती, सूत वशा और वशा. इन्हें ब्राह्मणों को दान कर दे तो वह प्रजापति को क्रोध उत्पन्न करने वाला नहीं होता है. (४७) एतद् वो ब्राह्मणा हविरिति मन्वीत याचितः. वशां चेदेनं याचेयुर्या भीमाददुषो गृहे.. (४८) दान करने वाले के घर में यदि भीमा वशा है तो उस वशा की याचना करने पर यह कहे कि हे ब्राह्मणो! यह तुम्हारे लिए हवि है. (४८) देवा वशां पर्यवदन् न नो ऽ दादिति हीडिताः. ebook converter DEMO Watermarks*
एताभिर्ऋग्भिर्भेदं तस्माद् वै स पराभवत्.. (४९) क्रोधित देवताओं ने वशा से कहा कि इस यजमान ने हम को दान नहीं किया, यह दान न करने वाला इसी कारण पराजित होता है. (४९) उतैनां भेदो नाददाद् वशामिन्द्रेण याचित:. तस्मात् तं देवा आगसो ऽ वृश्चन्नहमुत्तरे.. (५०) इंद्र के प्रार्थना करने पर भी यदि वशा का दान न करे तो उस से इस पाप के कारण देवता अहंकार व्याप्त कर के उसे मिटा देते हैं. (५०) ये वशाया अदानाय वदन्ति परिरापिण:. इन्द्रस्य मन्यवे जाल्मा आ वृश्चन्ते आचित्या.. (५१) जो लोग वशा का दान न करने का परामर्श देते हैं, वे मूर्ख लोग इंद्र के कोप के कारण स्वयं नष्ट हो जाते हैं. (५१) ये गोपतिं पराणीयाथाहुर्र्मा ददा इति. रुद्रस्यास्तां ते हेतिं परि यन्त्यचित्त्य.. (५२) जो लोग वशा गौ के स्वामी से उस का दान न करने के लिए कहते हैं, वे मूर्ख इंद्र के आयुध वज्र के लक्ष्य बनते हैं. (५२) यदि हुतां यद्यहुताममा च पचते वशाम्. देवान्त्सब्राह्मणानृत्व्वा जिह्मो लोकान्निर्र्ऋच्छति.. (५३) हुत अर्थात् दान में दी गई या अहुत अर्थात् दान में न दी गई वशा का पालन करने वाला देवता और ब्राह्मणों का अपमान करने वाला होता है. वह इस लोक में बुरी गति प्राप्त करता है. (५३) सूक्त-५ देवता—ब्रह्मगवी श्रमेण तपसा सृष्टा ब्रह्मणा वित्तर्ते श्रिता.. (१) तप के द्वारा विरचित तथा परब्रह्म में आश्रित इस धेनु को ब्राह्मण ने यम से प्राप्त किया है. (१) सत्येनावृता श्रिया प्रावृता यशसा परीवृता.. (२) यह धेनु सत्य, संपत्ति और यश से परिपूर्ण है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
स्वधया परिहिता श्रद्धया पर्यूढा दीक्षया गुप्ता यज्ञे प्रतिष्ठिता लोको निधनम्.. (३) यह धेनु श्रद्धा से व्याप्त, स्वधा से युक्त और दीक्षा के द्वारा रक्षित है. यह मन से प्रतिष्ठित है. क्षत्रिय का इस की ओर दृष्टि डालना मृत्यु के समान है. (३) ब्रह्म पदवायं ब्राह्मणो ऽ धिपतिः.. (४) इस धेनु के द्वारा ब्रह्म पद प्राप्त होता है. इस गौ का स्वामी ब्राह्मण ही है. (४) तामाददानस्य ब्रह्मगवीं जिनतो ब्राह्मणं क्षत्रियस्य. अप क्रामति सूनृता वीर्यं १ पुण्या लक्ष्मीः.. (५-६) जो क्षत्रिय ब्राह्मण की इस प्रकार की गौ का अपहरण करता है और ब्राह्मण को दुखी करता है, उस की लक्ष्मी, शक्ति और प्रिय वाणी पलायन कर जाती है. (५-६) सूक्त-६ देवता—ब्रह्मगवी ओजश्च तेजश्च सहश्च बलं च वाक् चेन्द्रियं च श्रीश्च धर्मश्च. (१) ब्रह्म च क्षत्रं च राष्ट्रं च विशश्च त्विषिश्च यशश्च वर्चश्च द्रविणं च. (२) आयुश्च रूपं च नाम च कीर्तिश्च प्राणश्चापानश्च चक्षुश्च श्रोत्रं च. (३) पयश्च रसश्चान्नं चान्नाद्यं चर्त्तं च सत्यं चेष्टं च पूर्तं च प्रजा च पशवश्च. (४) तानि सर्वाण्यप क्रामन्ति ब्रह्मगवीमाददानस्य जिनतो ब्राह्मणं क्षत्रियस्य. (५) उस क्षत्रिय के ओज, तेज, ब्रह्म, वाणी, इंद्रियों, लक्ष्मी, धर्म, वेद, क्षात्र शक्ति, राष्ट्र, हवि, यश, पराक्रम, धन, आयु, रूप, नाम, कीर्ति, नेत्र, कान, दूध, रस, अन्न, अग्नि, सत्य, इष्ट, पूर्त, प्रजा आदि सभी छिन जाते हैं. जो ब्राह्मण गौ का अपहरण करता है. वह अपनी आयु को क्षीण करता है. (१-५) सूक्त-७ देवता—ब्रह्मगवी सैषा भीमा ब्रह्मगव्य १ घविषा साक्षात् कृत्या कूर्ल्बजमावृता.. (१) ब्राह्मण की यह धेनु विराजमान होती है. कूर्ल्बज पाप से ढके हुए हिंसा करने वाले विष से युक्त हुई यह धेनु कृत्या के समान हो जाती है. (१)
सर्वाण्यस्यां घोराणि सर्वे च मृत्यवः.. (२) ब्राह्मण की इस गाय में सभी विकराल कर्म और मृत्यु देने वाले कारण व्याप्त रहते है. (२) सर्वाण्यस्यां क्रूराणि सर्वे पुरुषवधाः.. (३) ब्राह्मण की इस गाय में सभी प्रकार के कूट कर्म तथा पुरुषों के सब प्रकार के वध व्याप्त रहते हैं. (३) सा ब्रह्मज्यं देवपीयुं ब्रह्मगव्या दीयमाना मृत्योः पड्वीश आ द्यति.. (४) ब्राह्मण से छीनी हुई इस प्रकार की यह गाय ब्राह्मणत्व को अपमानित करने वाले मनुष्य को मृत्यु के बंधन में बांध देती है. (४) मेनिः शतवधा हि सा ब्रह्मज्यस्य क्षितिर्हि सा.. (५) जो मनुष्य ब्राह्मण की आयु क्षीण करता है. उस को क्षीण करने वाली यह गौ सैकड़ों प्रकार के संहारक अस्त्रों के समान बन जाती है. (५) तस्माद् वै ब्राह्मणानां गौर्दुराधर्षा विजानता.. (६) इसलिए ब्राह्मण की धेनु को विद्वान् पुरुष सैकड़ों का वध करने वाली के रूप में जाने. (६) वज्रो धावन्ती वैश्वानर उद्दीता.. (७) ब्राह्मण की गाय वज्र के समान दौड़ती है तथा अग्नि के समान ऊपर उठती है. (७) हेतिः शफानुत्खिदन्ती महादेवो ३ पेक्षमाणा.. (८) खुरों का शब्द करती हुई ब्राह्मण की गाय महादेव के आयुध के रूप में बन जाती है. (८) क्षुरपविरीक्षमाणा वाश्यमानाभि स्फूर्जति.. (९) रंभाती हुई ब्राह्मण की गाय के खुर वज्र के समान होते हैं. (९) मृत्युर्हिङ्कृण्वत्यु १ ग्रो देवः पुच्छं पर्यस्यन्ती.. (१०) हुंकार का शब्द करती हुई ब्राह्मण की गाय मृत्यु के समान होती हैं. सभी ओर पूंछ को घुमाती हुई यह गाय उग्र रूप वाली हो जाती है. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
सर्वज्यानिः कर्णौ वरीवर्जयन्ती राजयक्ष्मो मेहन्ती.. (११) सभी प्रकार से आयु को क्षीण करने वाली यह गौ कानों को हिलाती है. यह गौ अपने मूत्र को त्यागती हुई क्षय अर्थात् विनाश को उत्पन्न करने वाली हो जाती है. (११) मेनिर्दुह्यमाना शीर्षक्तिर्दुग्धा.. (१२) यह गौ जब दुही जाती है तब यह अस्त्र के समान होती है. तब दुही जाने के बाद सिर दर्द स्वरूपा बन जाती है. (१२) सेदिरुपतिष्ठन्ती मिथोधः परामृष्टा.. (१३) यह गाय स्पर्श करने पर आपस में युद्ध कराती है तथा समीप खड़ी होने पर विदीर्ण अर्थात् टुकड़े-टुकड़े कर देती है. (१३) शरव्या ३ मुखे ऽ पिनह्यमान ऋतिर्हन्यमाना.. (१४) यह गाय पीटने पर दुर्गति प्रदान करती है तथा ढकने पर विनाश करने वाली होती है. (१४) अघविषा निपतन्ती तमो निपतिता.. (१५) यह गाय बैठती हुई भयानक विष के समान तथा बैठ जाने पर साक्षात मृत्युरूपी अंधकार के समान हो जाती है. (१५) अनुगच्छन्ती प्राणानुप दासयति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यस्य.. (१६) ब्राह्मण की यह गाय ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले के पीछे चलती हुई उस के प्राणों का विनाश करती है. (१६) सूक्त-८ देवता—ब्रह्मगवी वैरं विकृत्यमाना पौत्राद्यं विभाज्यमाना.. (१) यह ब्राह्मण की अपहृत अर्थात् चुराई हुई गाय है. यह पुत्र, पौत्र आदि का बंटवारा कर उन का विनाश करने वाली है. (१) देवहेतिह्रियमाणा वृद्धिर्हृता.. (२) ब्राह्मणों की यह गाय हरण करते समय अर्थात् चुराते समय अस्त्र रूप है और चुराने के बाद चुराने वाले को क्षीण करने वाली होती है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
पाप्माधिधीयमाना पारुष्यमवधीयमाना.. (३) पाप रूप होने वाली ब्राह्मण की यह गाय कठोरता उत्पन्न करती है. (३) विषं प्रयस्यन्ती तक्मा प्रयस्ता.. (४) ब्राह्मण की चुराई हुई गाय यदि दूध देती है तो इस का दूध और मांस विष के समान होता है तथा यह चुराने वाले का जीवन संकट में डालने का कारण बनती है. (४) अघं पच्यमाना दुष्षप्न्यं पक्वा.. (५) ब्राह्मण की यह गाय पकाते समय व्यसनों अर्थात् बुरी लतों को बढ़ाने वाली है तथा पक जाने पर बुरे स्वप्नों का कारण बनती है. (५) मूलबर्हणी पर्याक्रियमाणा क्षितिः पर्याकृता.. (६) ब्राह्मण की चुराई हुई गाय को अगर बेचा जाए तो चुराने वाले को जड़ से उखाड़ देती है. बेचने के बाद यह चुराने वाले को क्षीण करती है. (६) असंज्ञा गन्धेन शुगुद्ध्रियमाणाशीविष उद्धृता.. (७) यदि ब्राह्मण की गाय को उठाया तो उठाते समय यह शोक प्रदान करती है और उठाने के बाद उठाने वाले के लिए सर्प के विष के समान बन जाती है. यह अपनी गंध से चुराने वाले की चेतना नष्ट कर देती है. (७) अभूतिरुपह्रियमाणा पराभूतिरुपहृता.. (८) यदि ब्राह्मण की गाय चुरा कर किसी को उपहार में दी जाए तो यह पराभव अर्थात् हार का कारण बनती है. उपहार में देने के बाद यह उपहार देने वाले की समृद्धि नष्ट करती है. (८) शर्वः क्रुद्धः पिश्यमाना शिमिदा पिशिता.. (९) यदि ब्राह्मण की गाय को क्लेश दिया जाए तो यह क्रोध में भरे शिव शंकर के समान बन जाती है. यदि इस का रक्त निकाला जाए तो यह रक्त निकालने वाले को मृत्यु देने वाली होती है. (९) अवर्तिरश्यमाना निर्ऋतिरशिता.. (१०) यदि ब्राह्मण की गाय का मांस खाया जाए तो यह खाने वाले को दरिद्र बना देती है. मांस खाने के बाद यह खाने वाले को बुरी गति प्रदान करती है. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-९ देवता—ब्रह्मगवी
अशिता लोकाञ्छिनत्ति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यमस्माच्चामुष्माच्च.. (११) यदि ब्राह्मण को हानि पहुंचाई जाए तो ब्राह्मण की गाय इहलोक और परलोक दोनों को बिगाड़ देती है. (११) सूक्त-९ देवता—ब्रह्मगवी तस्या आहननं कृत्या मेनिराशसनं वलग ऊबध्यम्. (१) ब्राह्मण की गाय को मारना मरणासन्न बन जाता है. इस को हनन करना कृत्या राक्षसी है. इस का गोबर युक्त आधा पका हुआ चारा शपथ के समान है. (१) अस्वगता परिहृणुता.. (२) ब्राह्मण की अपहरण की गई गाय अपने वश में नहीं रहती है. (२) अग्निः क्रव्याद् भूत्वा ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यं प्रविश्यात्ति. (३) मारी हुई ब्राह्मण की गाय मांसाहारी पशु बन कर मारने वाले को खाती है. (३) सर्वास्याङ्ग पर्वा मूलानि वृश्चति. (४) यदि ब्राह्मण की गाय को कोई मारता है तो यह मारने वाले के शरीर के सभी जोड़ों को छिन्नभिन्न कर देती है. (४) छिनत्त्यस्य पितृबन्धु परा भावयति मातृबन्धु. (५) यह ब्राह्मण की गाय चुराने वाले के पिता के बांधवों का छेदन करती है और माता के बांधवों को अपमानित करती है. (५) विवाहां ज्ञातीन्त्सर्वानपि क्षापयति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यस्य क्षत्रियेणापुनर्दीयमाना. (६) क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मण की गाय न लौटाई जाने पर उस के सभी बंधुओं को नष्ट कर देती है. (६) अवास्तुमेनमस्वगमप्रजसं करोत्यपरावरणो भवति क्षीयते. (७) ब्राह्मण की गाय को अगर क्षत्रिय न लौटाए तो वह क्षत्रिय को गृहहीन तथा संतानहीन कर देती है. ब्राह्मण की गाय चुराने वाला क्षत्रिय अपरा रोग से ग्रसित हो कर नष्ट हो जाता है. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
य एवं विदुषो ब्राह्मणस्य क्षत्रियो गामादत्ते.. (८) ऊपर बताई गई दशा उस क्षत्रिय की होती है, जो विद्वान् की गौ का अपहरण करता है. (८) सूक्त-१० देवता—ब्रह्मगवी क्षिप्रं वै तस्याहनने गृध्राः कुर्वत ऐलबम्.. (१) जो क्षत्रिय ब्राह्मण की गाय को ले जाता है, गिद्ध उस के नेत्र निकालते हैं. (१) क्षिप्रं वै तस्यादहनं परि नृत्यन्ति केशिनीराघ्नानाः. पाणिनोरसि कुर्वाणाः पापमैलबम्.. (२) जो क्षत्रिय ब्राह्मण की गाय ले जाता है, उस की चिता भस्म के समीप केशों वाली स्त्रियां अपनी छाती कूटती हैं और आंसू बहाती हैं. (२) क्षिप्रं वै तस्य वास्तुषु वृकाः कुर्वत ऐलबम्.. (३) जो क्षत्रिय ब्राह्मण की गाय ले जाता है उस के घरों में शृगाल शीघ्र ही अपने नेत्र घुमाते हैं. (३) क्षिप्रं वै तस्य पृच्छन्ति यत् तदासी ३ दिदं नु ता ३ दिति.. (४) जो क्षत्रिय ब्राह्मण की गाय ले जाता है, उस के विषय में यह कहा जाने लगता है कि क्या यह उस का घर है. (४) छिन्ध्या च्छिन्धि प्र च्छिन्ध्यपि क्षापय क्षापय.. (५) हे ब्राह्मण की गाय! तू इस चुराने वाले का छेदन कर और उसे नष्ट कर डाल. (५) आददानमाङ्गिरसि ब्रह्मज्यमुप दासय.. (६) हे आंगिरस! तू अपहरणकर्ता क्षत्रिय का नाश कर दे. (६) वैश्वदेवी ह्यु १ च्यसे कृत्या कूल्बजमावृता.. (७) हे ब्राह्मण की गौ! तू मांस रूपी वज्र से अपने अपहरणकर्ता को नष्ट करने वाली है. (७) ओषन्ती समोषन्ती ब्रह्मणो वज्रः.. (८) हे ब्राह्मण की गाय! तू वज्र से ढकी हुई विश्व देवी कृत्या कही जाती है. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
क्षुरपविर्मृत्युर्भूत्वा वि धाव त्वम्.. (९) हे ब्राह्मण की गौ! तू मृत्यु रूप होती हुई दौड़. (९) आ दस्ते जिनतां वर्च इष्टं पूर्तं चाशिषः.. (१०) हे ब्राह्मण की गाय! तू अपहरण करने वाले के तेज, कामना, पूर्त और आशीर्वादात्मक शब्दों का हरण करती है. (१०) आदाय जीतं जीताय लोके ३ ऽ मुष्मिन् प्र यच्छसि.. (११) हे ब्राह्मण की गाय! तू ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले को न्यून आयु वाला करने के लिए पकड़ कर परलोकगामी बनाती है. (११) अघ्न्ये पदवीर्भव ब्राह्मणस्याभिशस्त्या.. (१२) हे अघ्न्या! ब्राह्मण के शाप के कारण तू अपहरण कर्ता के पैरों की बेड़ी बन जाती है. (१२) मेनिः शरव्या भवाघादघविषा भव.. (१३) हे ब्राह्मण की गाय! तू अस्त्ररूप बाणों के समूह को प्राप्त होती हुई उस के पाप के कारण अधिष्ठाता बन जा. (१३) अघ्न्ये प्र शिरो जहि ब्रह्मज्यस्य कृतागसो देवपीयोरराधसः.. (१४) हे अघ्न्या! तू उस देव हिंसक अपराधी के कार्य को विफल करने के लिए उस के शीश को काट डाल. (१४) त्वया प्रमूर्णं मृदितमग्निर्दहतु दुश्चितम्.. (१५) हे ब्राह्मण की गौ! तेरे द्वारा कुचले और मसले हुए उस पाप पूर्ण चित्त वाले को अग्नि भस्म कर डालें. (१५) सूक्त-११ देवता—ब्रह्मगवी वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्रदह सं दह.. (१) हे ब्राह्मण की गाय! तू अपने अपहरण करने वाले को बारबार काट और जला दे. (१) ब्रह्मज्यं देव्यघ्न्य आ मूलादनुसंदह.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अघ्न्या! तू अपहरण करने वाले को समूल नष्ट कर दे. (२) यथायाद् यमसादनात् पापलोकान् परावतः.. (३) हे अघ्न्या! तेरा अपहरण करने वाला यम के लोकों और पाप के घरों को प्राप्त हो. (३) एवा त्वं देव्यघ्न्ये ब्रह्मज्यस्य कृतागसो देवपीयोरराधसः.. (४) हे अघ्न्या देवी! तू अपराध करने वाले अपहरणकर्ता, देव हिंसक के कंधों और सिर को काट दे. (४) वज्रेण शतपर्वणा तीक्ष्णेन क्षुरभृष्टिना.. (५) हे अघ्न्या! तू सौ पैरों वाले एवं तेज धार वाले वज्र से अपने अपहरणकर्ता का वध कर. (५) प्र स्कन्धान् प्र शिरो जहि.. (६) हे अघ्न्या! तू अपने अपहरणकर्ता को नष्ट कर दे. (६) लोमान्यस्य सं छिन्धि त्वचमस्य वि वेष्टय.. (७) हे अघ्न्या! तू अपने अपहरणकर्ता के लोमों को नष्ट कर उस का चमड़ा उधेड़ दे. (७) मांसान्यस्य शातय स्नावान्यस्य सं वृह.. (८) हे अघ्न्या! तू अपने अपहरणकर्ता के मांस को काट कर उस की नसों को सुखा दे. (८) अस्थीन्यस्य पीडय मज्जानमस्य निर्जहि.. (९) हे अघ्न्या! तू इस अपहरणकर्ता की हड्डियों में दाह और मज्जा में क्षय भर दे. (९) सर्वास्याङ्गा पर्वाणि वि श्रथय.. (१०) हे अघ्न्या! इस अपहरणकर्ता के अवयवों और जोड़ों को ढीला कर दे. (१०) अग्निरेनं क्रव्यात् पृथिव्या नुदतामुदोषतु वायुरन्तरिक्षान्महतो वरिम्र्णः.. (११) इस अपहरण करने वाले को वायु अंतरिक्ष और पृथ्वी से खदेड़ दे तथा क्रव्याद अग्नि इसे भस्म कर दे. (११) सूर्य एनं दिवः प्र णुदतां न्योषतु.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*
सूर्य भी इस अपहरणकर्ता को स्वर्ग से नीचे ढकेल दे तथा भस्म कर डाले. (१२)
सूक्त-१ देवता—अध्यात्म आदि
तेरहवां कांड सूक्त-१ देवता—अध्यात्म आदि उदेहि वाजिन् यो अप्स्व १ न्तरिदं राष्ट्रं प्र विश सूनृतावत्. यो रोहितो विश्वमिदं जजान स त्वा राष्ट्राय सुभृतं बिभर्तु.. (१) हे सूर्य! तुम अंतरिक्ष में क्यों छिपे हो, तुम उदय प्राप्त करो. तुम सत्य और प्रिय वाणी से युक्त हो कर यहां आओ. इस प्रकार के सूर्य देव ने संसार का प्रकाशन किया. सूर्य देव तुम्हें राष्ट्र के भरणकर्ता के रूप में पुष्ट करे. (१) उद्वाज आ गन् यो अप्स्व १ न्तर्विश आ रोह त्वद्योनयो या:. सोमं दधानो ऽ प ओषधीर्गाश्चतुष्पदो द्विपद आ वेशयेह.. (२) हे सूर्य! जल में रहने वाली जो प्रजाएं तथा जलप्रद अन्न हैं, वे तुम्हारे पास आएं. तुम जल पर चढ़ो और सोम को धारण करते हुए जल, ओषधि तथा दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं को इस राष्ट्र में प्रविष्ट करो. (२) यूयमुग्रा मरुतः पृश्निमातर इन्द्रेण युजा प्र मृणीत शत्रून्. आ वो रोहितः शृणवत् सुदानवस्त्रिषप्तासो मरुतः स्वादुसंमुदः.. (३) हे मरुद्गण! तुम इंद्र के सखा हो. तुम शत्रुओं का नाश करो. तुम स्वादिष्ट पदार्थों से प्रसन्न होने वाले हो और सुंदर वर्षा प्रदान करते हो. सूर्य तुम्हारी बात सुनें. (३) रुहो रुरोह रोहित आ रुरोह गर्भो जनीनां जनुषामुपस्थम्. ताभिः संरब्धमन्वविन्दन् षडुर्वीर्गातुं प्रपश्यन्निह राष्ट्रमाहाः.. (४) सूर्य उदय होते हुए आकाश पर चढ़ रहे हैं. छह उर्वियों की प्राप्ति के हेतु वे राष्ट्र को नित्यप्रति देखते हुए उर्वियों को प्राप्त करते हैं. (४) आ ते राष्ट्रमिह रोहितोऽहार्षीद् व्य स्थन्मृधो अभयं ते अभूत्. तस्मै ते द्यावापृथिवी रेवतीभिः कामं दुहातामिह शक्वरीभिः.. (५) हे यजमान! तेरे राष्ट्र पर सूर्य आ गए हैं, इसलिए तू युद्ध का भय मत कर. आकाश, पृथ्वी और धन देने वाली ऋचाएं तेरे लिए कामनाओं का दोहन करें. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
रोहितो द्यावापृथिवी जजान तत्र तन्तुं परमेष्ठी ततान. तत्र शिश्रिये ऽ ज एकपादो ऽ दृंहद् द्यावापृथिवी बलेन.. (६) सूर्य ने आकाश और पृथ्वी को प्रकट किया. सूर्य ने उस में तंतु को बढ़ाया. एक पाद अज ने वहां आश्रय ले कर आकाश और पृथ्वी को बल से युक्त किया. (६) रोहितो द्यावापृथिवी अदृंहत् तेन स्व स्तभितं तेन नाकः. तेनान्तरिक्षं विमिता रजांसि तेन देवा अमृतमन्वविन्दन्.. (७) सूर्य ने आकाश और पृथ्वी को दृढ़ किया. उसी सूर्य ने दुःखों से रहित आकाश को स्थिर किया. उसी सूर्य ने अंतरिक्ष तथा वन्य सुख लोकों को बनाया. देवताओं ने उसी से अमृतत्व प्राप्त किया है. (७) वि रोहितो अमृशद् विश्वरूपं समाकुर्वाणः प्ररुहो रुहश्च. दिवं रुढ्वा महता महिम्ना सं ते राष्ट्रमनक्तु पयसा घृतेन.. (८) रूह और प्ररूह अर्थात् उगने वाले लता वृक्ष आदि को भलीभांति प्रकट करने वाले सूर्य ने सब शरीरों का स्पर्श किया. हे यजमान! वे सूर्य अपने महत्त्व से तेरे राष्ट्र को घृत और दूध से संपन्न करें. (८) यास्ते रुहः प्ररुहो यास्त आरुहो याभिरापृणासि दिवमन्तरिक्षम्. तासां ब्रह्मणा पयसा वावृधानो विशि राष्ट्रे जागृहि रोहितस्य.. (९) हे मनुष्यो! तुम्हारी जो रोहण, प्ररोहण और आरोहण करने वाली फसलें, लताएं आदि हैं, जिन के द्वारा तुम अंतरिक्ष के प्राणियों का भरणपोषण करते हो, उस के दूध के समान सारयुक्त कर्म के द्वारा मित्र बाल और वृद्धि को प्राप्त होते हुए तुम सूर्य के राष्ट्र में सचेत रहो. (९) यास्ते विशस्तपसः संबभूवुर्वत्सं गायत्रीमनु ता इहागुः. तास्त्वा विशन्तु मनसा शिवेन संमाता वत्सो अभ्येतु रोहितः.. (१०) जो प्रजाएं तपोबल से प्रकट हुई हैं, जो गायत्री रूप वत्सों के साथ यहां आई हैं, वे कल्याण करने वाले चित्त से तुम में रमें. इन का वत्स सूर्य तुम्हारे पास आए. (१०) ऊर्ध्वो रोहितो अधि नाके अस्थाद् विश्वा रूपाणि जनयन् युवा कविः. तिग्मेनाग्निर्ज्योतिषा वि भाति तृतीये चक्रे रजसि प्रियाणि.. (११) जब वे सूर्य ऊंचे हो कर स्वर्ग में प्रतिष्ठित होते हैं, तब वे सब रूपों को प्रकट करते हैं. उन सूर्य की ही तीक्ष्ण ज्योति से अग्नि ज्योति वाली है. वे तृतीय लोक अर्थात् द्युलोक में इच्छित फलों को प्रकट करते हैं. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
सहस्रशृङ्गो वृषभो जातवेदा घृताहुतः सोमपृष्ठः सुवीरः. मा मा हासीन्नाथितो नेत् त्वा जहानि गोपोषं च मे वीरपोषं च धेहि.. (१२) सहस्रों सींगों वाले, घृत के द्वारा बुलाए गए, इष्टों की पूर्ति करने वाले, सोम, पृष्ठ, सुवीर तथा जातवेद अग्नि मेरा त्याग न करें. वे अग्नि मुझे गायों तथा पुत्र, पौत्र आदि की पुष्टि में प्रतिष्ठित करें. (१२) रोहितो यज्ञस्य जनिता मुखं च रोहिताय वाचा श्रोत्रेण मनसा जुहोमि. रोहितं देवा यन्ति सुमनस्यमानाः स मा रोहैः सामित्यै रोहयतु.. (१३) सूर्य यज्ञ को प्रकट करने वाले तथा यज्ञ के मुख रूप हैं. वाणी, घोष और मन से मैं उन सूर्य के लिए आहुति देता हूं. सब देवता प्रसन्न होते हुए सूर्य के समीप जाते हैं. वे सूर्य मुझे संग्राम के लिए उन्नत बनाएं. (१३) रोहितो यज्ञं व्य दधाद् विश्वकर्मणे तस्मात् तेजांस्युप मेमान्यागुः. वोचेयं ते नाभिं भुवनस्याधि मज्मानि.. (१४) सूर्य ने विश्वकर्मा के लिए यज्ञ का पोषण किया. उस यज्ञ के द्वारा मुझे वह तेज प्राप्त हो रहा है. मैं तुम्हारी नाभि को लोक की मज्जा पर स्वीकार करता हूं. (१४) आ त्वा रुरोह बृहत्यू ३ त पङ्क्तिरा ककुब् वर्चसा जातवेदः. आ त्वा रुरोहोष्णिहाक्षरो वषट्कार आ त्वा रुरोह रोहितो रेतसा सह.. (१५) हे अग्नि! बृहती पंक्ति और ककुप छंदों ने तथा उष्णिहा अक्षरों ने तुम में प्रवेश किया है. वषट्कार भी तुम में प्रविष्ट हो गया है. सूर्य भी अपने तेज से तुम में प्रवेश करते हैं. (१५) अयं वस्ते गर्भं पृथिव्या दिवं वस्ते ऽ यमन्तरिक्षम्. अयं ब्रध्नस्य विष्टपि स्वर्लोकान् व्यानशे.. (१६) सूर्य पृथ्वी के गर्भ को, आकाश और अंतरिक्ष को भी ढक लेते हैं. ये संपूर्ण संसार के प्रकाशक हैं और सभी स्वर्गों में व्याप्त होते हैं. (१६) वाचस्पते पृथिवी नः स्योना स्योना योनितल्पा नः सुशेवा. इहैव प्राणः सख्ये नो अस्तु तं त्वा परमेष्ठिन् पर्यग्निरायुषा वर्चसा दधातु.. (१७) हे वाचस्पति! हमारे लिए पृथ्वी, योनि और शय्या सुख देने वाली हों. प्राण हमारे लिए सुख देने वाला हो. हम दीर्घ जीवी हों हे परमेष्ठी! ये अग्नि देव हमें दीर्घायु और तेजस्वी बनाएं. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*
वाचस्पत ऋतवः पञ्च ये नौ वैश्वकर्मणाः परि ये संबभूवुः. इहैव प्राणः सख्ये नो अस्तु तं त्वा परमेष्ठिन् परि रोहित आयुषा वर्चसा दधातु.. (१८) हे वाचस्पति! हमारे कर्म के द्वारा जो पांच ऋतुएं उत्पन्न हुई हैं, उन में हमारा हमारा प्राण मित्र के भावों से स्थिर रहे. हे प्रजापति! सूर्य तुम्हें अपने तेज और आयु से धारण करे. (१८) वाचस्पते सौमनसं मनश्च गोष्ठे नो गा जनय योनिषु प्रजाः. इहैव प्राणः सख्ये नो अस्तु तं त्वा परमेष्ठिन् पर्यहमायुषा वर्चसा दधामि.. (१९) हे वाचस्पति! हमारा मन प्रसन्न रहे. तुम हमारे गोष्ठ में गायों को प्रकट करो तथा हमारी पत्नियों में संतान को उत्पन्न करो. प्राण हमारे साथ मित्र भाव से रहे. मैं आयु और तेज से तुम्हें धारण करता हूं. (१९) परि त्वा धात् सविता देवो अग्निर्वर्चसा मित्रावरुणावभि त्वा. सर्वा अरातीरवक्रामन्नेहीदं राष्ट्रमकरः सूनृतावत्.. (२०) हे राजन्! सविता देव तुम्हें सभी ओर से पुष्ट करें. अग्नि, मित्र और वरुण तुम्हें पुष्ट बनाएं. तुम सभी शत्रुओं को वश में करते हुए इस राष्ट्र में आ कर सच्ची और प्रिय वाणी बोलो. (२०) यं त्वा पृषती रथे प्रष्टिर्वहति रोहित. शुभा यासि रिणन्नपः.. (२१) हे सूर्य! हिरणियों का समूह तुम्हें रथ में धारण करता है. तुम जलों में चलते हुए कल्याण के निमित्त गति करते हो. (२१) अनुव्रता रोहिणी रोहितस्य सूरिः सुवर्णा बृहती सुवर्चाः. तया वाजान् विश्वरूपां जयेम तया विश्वाः पृतना अभि ष्याम.. (२२) रोहिणी चढ़ते हुए से रोहित अर्थात् लाल वर्ण के सूर्य का अनुगमन करने वाली है. सुंदर वर्ण वाली वह बृहती सुंदर तेज वाली है. उसी के कारण हम विभिन्न रूपों वाले प्राणियों पर विजय प्राप्त करते हैं. उसी के कारण हम सेनाओं को अपने वश में करें. (२२) इदं सदो रोहिणी रोहितस्यासौ पन्थाः पृषती येन याति. तां गन्धर्वाः कश्यपा उन्नयन्ति तां रक्षन्ति कवयो ऽ प्रमादम्.. (२३) यह रोहिणी और रोहित का धाम है, पृषती इसी मार्ग से गमन करती है. उसे गंधर्व ऊपर ले जाते हैं. चतुर व्यक्ति सावधानी से इस की रक्षा करते हैं. (२३) ebook converter DEMO Watermarks*
सूर्यस्याश्वा हरयः केतुमन्तः सदा वहन्त्यमृताः सुखं रथम्. घृतपावा रोहितो भ्राजमानो दिवं देवः पृषतीमा विवेश.. (२४) सूर्य के घोड़े वेगशाली और ज्ञान युक्त हैं. वे अमरत्व वाले रथ को सरलता से खींचते हैं. फल से संपन्न करने योग्य वे सूर्य पृषती के साथ स्वर्ग में प्रवेश करें. (२४) यो रोहितो वृषभस्तिग्मशृङ्गःपर्यग्निं परि सूर्यं बभूव. यो विष्टभ्नाति पृथिवीं दिवं च तस्माद् देवा अधि सृष्टिः सृजन्ते.. (२५) वे रोहित अर्थात् लाल रंग के तथा अभीष्ट की वर्षा करने वाले हैं. वे तीक्ष्ण राशियों वाले हैं. जो अग्नि देव सूर्य, पृथ्वी और आकाश को स्थिर रखते हैं, देवता उन्हीं के बल से सृष्टि की रचना करते हैं. (२५) रोहितो दिवमारुहन्महतः पर्यर्णवात्. सर्वा रुरोह रोहितो रुहः.. (२६) वे सूर्य आकाश पर चढ़ते हैं तथा रोहणशील वस्तुओं पर भी चढ़ते हैं. (२६) वि मिमीष्व पयस्वतीं घृताचीं देवानां धेनुरनपस्पृगेषा. इन्द्रः सोमं पिबतु क्षेमो अस्त्वग्निः प्र स्तौतु वि मृधो नुदस्व.. (२७) हे यजमान! तुम देवताओं की दुधारू और पूजनीय गौ का मान करने के कारण अन्यों को स्पर्श करने वाले अर्थात् पराजित करने वाले हो. अग्नि तुम्हारा कुशलमंगल करें तथा इंद्र देव सोम रस का पान करें. इस के बाद तू शत्रुओं को युद्धस्थल से खदेड़ दे. (२७) समिद्धो अग्निः समिधानो घृतवृद्धो घृताहुतः. अभीषाड् विश्वाषाडग्निः सपत्नान् हन्तु ये मम.. (२८) ये अग्नि प्रदीप्त हो कर घृत से प्रबुद्ध हुए हैं. इस में घृत की आहुति दी गई है. अग्नि देव शत्रुओं को पराजित करने वाले हैं. अतः वे मेरे शत्रुओं का संहार करें. (२८) हन्त्वेनान् प्र दहत्यरियो नः पृतन्यति. क्रव्यादग्निना वयं सपत्नान् प्र दहामसि.. (२९) अग्नि देव उन सब शत्रुओं का संहार करें जो शत्रु सेना सहित आ कर हमें मारना चाहे, अग्नि देव उसे भस्म कर दें. (२९) अवाचीनानव जहीन्द्र वज्रेण बाहुमान्. अधा सपत्नान् मामकानग्नेस्तेजोभिादिषि.. (३०) हे शक्तिशाली भुजाओं वाले इंद्र! तुम हमारे शत्रुओं को मारो. हे अग्नि! तुम अपनी ज्वालाओं से उन्हें भस्म कर दो. (३०) ebook converter DEMO Watermarks*