अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
उद्देश्य से घृत, क्षीर आदि से युक्त हवि की अग्नि में आहुति देता हूं. (१) शंतं त आपो धन्वन्त्या ३: शं ते सन्तन्त्वनूप्याः शं ते खनित्रिमा आपः शं याः कुम्भेभिराभृताः.. (२) हे यजमान! मरुस्थल के जल तथा जल वाले प्रदेश के जल तेरे लिए कल्याणकारी हों. कुएं, तालाब आदि के जल तुझे सुख देने वाले बनें. घड़ों के द्वारा लाए गए जल भी तेरा कल्याण करें. (२) अनभ्रयः खनमाना विप्रा गम्भीरे अपसः. भिषग्भ्यो भिषक्तरा आपो अच्छा वदामसि.. (३) खोदने के साधनों में कुदाल आदि से रहित एवं लकड़ी, हाथों और पैरों से खोदने में समर्थ एवं असाध्य कर्मों को भी मंत्र के बल से सिद्ध करने वाले हम मेधावी ब्राह्मण वैद्यों से बढ़ कर वैद्य हैं. हम जलों की वंदना करते हैं. (३) अपामह दिव्यानामपां स्रोतस्यानाम्. अपामह प्रणेजने ऽ श्वा भवथ वाजिनः.. (४) हे ऋत्विजो! तुम आकाश से बरसने वाले, नदियों में बहने वाले तथा अन्य प्रकार के जलों और तेज दौड़ने वाले घोड़ों के समान इस जल शक्ति वाले यज्ञ कर्म में शीघ्रता करने वाले बनो. (४) ता अपः शिवा अपो ऽ यक्ष्मंकरणीरपः. यथैव तृप्यते मयस्तास्त आ दत्त भेषजीः.. (५) हे ऋत्विजो! प्रसिद्ध, कल्याण करने वाले तथा यक्ष्मा आदि रोगों से छुटकारा दिलाने वाले ओषधि रूप जलों को मेरे सुख की वृद्धि के लिए यहां ले आओ. (५) सूक्त-३ देवता—अग्नि दिवस्पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षाद् वनस्पतिभ्यो अध्योषधीभ्यः. यत्रयत्र विभृतो जातवेदास्तत स्तुतो जुषमाणो न एहि.. (१) हे अग्नि देव! आकाश से पृथ्वी से अंतरिक्ष से, वनस्पतियों से, ओषधियों से तथा जहांजहां तुम विशेष रूप से पूर्ण हो, वहांवहां से हमें प्रसन्न करते हुए यहां आओ. (१) यस्ते अप्सु महिमा यो वनेषु य ओषधीषु पशुष्वप्स्व१न्तः. अग्ने सर्वास्तन्व १: सं रभस्व ताभिर्न एहि द्रविणोदा अजस्रः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अग्नि! तुम्हारी जो महिमा वाडवाग्नि रूप से जलों में वर्तमान है, दावाग्नि रूप से वनों में विद्यमान है, जो ओषधियों में फल के पकने का कारण बनती है, जो सभी प्राणियों में जठराग्नि के रूप में स्थित है तथा जो विद्युत के रूप में बादलों में रहती है, इन सब को एकत्र कर के नित्य धनदाता के रूप में आओ. (२) यस्ते देवेषु महिमा स्वर्गो या ते तनूः पितृष्वाविवेश. पुष्टिया॑ ते मनुष्येषु पप्रथे ऽ ग्ने तया रयिमस्मासु धेहि.. (३) हे अग्नि! तुम्हारी जो महिमा स्वर्गगामी के रूप में देवों में है, तुम्हारा जो नाम का हवि स्वधा के रूप में पितृलोक जाने वाला है तथा मनुष्य, पशु आदि चराचर में तुम्हारी जो पुष्टि है, अपने उन सभी रूपों के द्वारा हमें धन दो. (३) श्रुत्कर्णाय कवये वेद्याय वचोभिर्वाकैरुप यामि रातिम्. यतो भयमभयं तन्नो अस्तव देवानां यज हेडो अग्ने.. (४) हे अग्नि देव! तुम हमारे स्तोत्रों को सुनने में समर्थ करने वाले, मनचाहा फल देने वाले एवं सब के द्वारा जानने योग्य हो. मैं मंत्र रूप वाक्यों, अनुवाकों तथा सूक्तों से तुम्हारी स्तुति करता हूं, जिस से मुझे अभय प्राप्त हो, जो देव हमारे प्रति क्रोध करते हों, तुम उन का क्रोध शांत करो. (४) सूक्त-४ देवता—अग्नि यामाहुतिं प्रथमामथर्वा या जाता या हव्यमकृणोज्जातवेदाः. तां त एतां प्रथमो जोहवीमि ताभिष्टुप्तो वहतु हव्यमग्निरग्नये स्वाहा.. (१) हे अग्नि! अथर्वा रूप परमात्मा ने सृष्टि से पूर्व अपने द्वारा रचे हुए देवताओं को प्रसन्न करने के लिए तुम में जो आहुति दी थी और तुम ने उस आहुति को देवगण तक पहुंचने योग्य बनाया, हे अग्नि! मैं सब यजमानों से पहले उस आहुति को तुम्हारे मुख में डालता हूं. हवि प्राप्त कराने वाले दूत रूप, देवता रूप एवं हवि प्रक्षेप के आधार रूप तीन रूपों से स्तुति किए गए अग्नि मेरा यह हवि देवों को प्राप्त कराएं. (१) आकूतिं देवीं सुभगां पुरो दधे चित्तस्य माता सुहवा नो अस्तु. यामाशामेमि केवली सा मे अस्तु विदेयमेनां मनसि प्रविष्टाम्.. (२) मैं तात्पर्य रूप, प्रकाशित होने वाली एवं शोभन भाग्य से युक्त वाणी अर्थात् सरस्वती की सेवा करता हूं. पुत्र जिस प्रकार माता के वश में होता है, उसी प्रकार मेरे मन को वश में रखती हुई हमारे आह्वान से हमारे अनुकूल हो. मैं जो कामना करता हूं, वह केवल मेरी हो, किसी अन्य को प्राप्त न हो. मैं अपनी कामना को सदा प्राप्त करूं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
आकूतया नो बृहस्पत आकूतया न उपा गहि. अथो भगस्य नो धेह्यथो नः सुहवो भव.. (३) हे बृहस्पति! तुम सब देवों के पालनकर्ता हो. तुम सभी को देने के लिए आओ. तुम सरस्वती को हमारे अनुकूल करने के लिए आओ. तुम हमें सौभाग्य प्रदान करो. तुम हमारे आह्वान मात्र से हमारे अनुकूल बनो. (३) बृहस्पतिर्म आकूतिमाङ्गिरसः प्रति जानातु वाचमेताम्. यस्य देवा देवताः संबभूवुः स सुप्रणीताः कामो अन्वेत्वस्मान्.. (४) अंगिराओं के पुत्र बृहस्पति देव सब वाक्यों की रूपा सरस्वती को मुझे देने के लिए स्मरण करें. स्त्री-पुरुष रूप सभी देवता जिस बृहस्पति के वश में है और सभी देवता जिस बृहस्पति के द्वारा कार्यों में लगाए गए हैं, वे बृहस्पति देव हम कामना करने वालों को फल देने के लिए आएं. (४) सूक्त-५ देवता—इंद्र इन्द्रो राजा जगतश्चर्षणीनामधि क्षमि विषुरूपं यदस्ति. ततो ददाति दाशुषे वसूनि चोदद् राध उपस्तुतश्चिदर्वाक्.. (१) तीनों लोकों में निवास करने वाले मनुष्यों एवं देवताओं के स्वामी इंद्र हवि देने वाले यजमान को धन ला कर दें. धरती पर जो अनेक रूपों वाला धन है, उसे मुझे प्रदान करें. स्तुति किए गए इंद्र धनों को हमारे सामने प्रेरित करें, हमें प्रदान करें. (१) सूक्त-६ देवता—पुरुष सहस्रबाहुः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्. स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम्.. (१) अनंत भुजाओं, अनंत नेत्रों और अनंत चरणों वाले यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले नारायण नाम के पुरुष हैं, वे सात समुद्रों और सात द्वीपों वाली भूमि को अपनी महिमा से सभी ओर से व्यक्त कर के दश अंगुल वाले हृदय रूप आकाश में स्थित हुए. (१) त्रिभिः पद्भिर्द्यामरोहत् पादस्येहाभवत् पुनः. तथा व्य क्रामद् विष्वङशनानशने अनु.. (२) यज्ञ के अनुष्ठाता वे नारायण नाम के पुरुष अपने तीन चरणों से स्वर्गलोक पर आरूढ़ हुए. उन का चौथा चरण इस भूलोक में बारबार प्रकट होता है. यह चौथा चरण भोजन करने वाले मनुष्य, पशु आदि और भोजन न करने वाले देव, वृक्ष आदि सभी में व्याप्त है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
तावन्तो अस्य महिमानस्ततो ज्यायांश्च पूरुषः. पादो ऽ स्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि.. (३) जितनी इस नारायण नाम के पुरुष की महिमाएं हैं, ये उन से भी अधिक महान हैं. इस का एकमात्र अर्थात् चौथा अंश सभी प्राणियों में व्याप्त है. इस के तीन चरण अर्थात् मात्र मरण रहित होते हुए स्वर्गलोक में वर्तमान हैं. (३) पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यम्. उतामृतत्वस्येश्वरो यदन्नेनाभवत् सह.. (४) जो अतीत जगत्, भविष्य में होने वाला जगत् और यह दृश्यमान जगत् है, वह सब पुरुष ही है. यह पुरुष मरण रहित देवों का भी स्वामी है तथा जो भोग्य अन्न के साथ हुए यह उन का भी ईश्वर है. (४) यत् पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्. मुखं किमस्य किं बाहु किमूरू पादा उच्येते.. (५) साध्य और वसु नाम के देवताओं ने जब यज्ञ पुरुष की कल्पना की, तब उन्होंने यह कल्पना कितने प्रकार से की थी. इस का मुख क्या था, इस की भुजाएं क्या थीं और इस के चरण क्या कहलाते थे. (५) ब्राह्मणो ऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यो ऽ भवत्. मध्यं तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत.. (६) इस यज्ञात्मा पुरुष का मुख ब्राह्मण था. इस की भुजाओं क्षत्रिय हुए. इस का जो मध्य भाग था, उससे वैश्य जाति के पुरुष हुए और इस के दोनों चरणों से शुद्र की उत्पत्ति हुई. (६) चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत. मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद् वायुरजायत.. (७) इस यज्ञ रूप पुरुष के मन से चंद्रमा उत्पन्न हुआ और नयनों से सूर्य की उत्पत्ति हुई. इस के मुख से इंद्र और अग्नि देव तथा प्राण से अग्नि की उत्पत्ति हुई. (७) नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत. पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात् तथा लोकाँ अकल्पयन्.. (८) इस यज्ञ पुरुष की नाभि से अंतरिक्ष लोक, शीश से स्वर्गलोक, चरणों से भूमि तथा कानों से दिशाएं उत्पन्न हुईं. इस प्रकार साध्य और वसु नाम के देवों ने लोकों की कल्पना की, लोकों का निर्माण किया. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
विराडग्रे समभवद् विराजो अधि पूरुषः. स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः.. (९) इस सृष्टि के आदि में विराट् उत्पन्न हुआ. उस विराट् से पुरुष की उत्पत्ति हुई. वह पुरुष उत्पन्न होते ही वृद्धि को प्राप्त हुआ. वह भूमि आदि लोकों के पीछे और आगे व्याप्त कर के उन से अतिरिक्त हुआ. तात्पर्य यह है कि पुरुष ने जीवों की रचना की. (९) यत् पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत. वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः.. (१०) जब देवों ने पुरुष रूप अथवा अश्व रूप हवि से यज्ञ किया, उस समय वसंत ऋतु अपनी महिमा से इस यज्ञ का घृत, ग्रीष्म समिधा तथा शरद ऋतु यज्ञीय चरु, पुरोडाश आदि हवि हुआ. (१०) तं यज्ञं प्रावृषा प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रशः. तेन देवा अयजन्त साध्या वसवश्च ये.. (११) सृष्टि के आरंभ में उत्पन्न उस यज्ञीय पशु अथवा पुरुष को वर्षा ऋतु के द्वारा धोया गया. उस पुरुष के द्वारा साध्य और वसु नाम वाले देवों ने यज्ञ किया. (११) तस्मादश्वा अजायन्त ये च के चोभयादतः. गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज्जाता अजावयः.. (१२) उस यज्ञात्मक पुरुष से घोड़े उत्पन्न हुए. उन घोड़ों के अतिरिक्त गधे और खच्चर भी उत्पन्न हुए जो ऊपर और नीचे अर्थात् दोनों ओर दांतों वाले थे. उस यज्ञात्मक पुरुष से गाएं उत्पन्न हुईं तथा उससे बकरियां और भेड़ें उत्पन्न हुईं. (१२) तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे. छन्दो ह जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत.. (१३) उस अश्व रूप यज्ञीय पुरुष से ऋक् नाम के पशु बद्ध मंत्र तथा गीत रूप साम नाम के मंत्र उत्पन्न हुए. उसी यज्ञीय पुरुष से छंदों की उत्पत्ति हुई. उसी से गद्यपद्य के सम्मिलित पाठ वाले यजुष नाम के मंत्र प्रकट हुए. (१३) तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम्. पशूँस्तांश्चक्रे वायव्या नारण्या ग्राम्याश्च ये.. (१४) उस अश्व रूप यज्ञीय पुरुष से दही से मिले हुए घी का संपादन हुआ. साध्य नाम वाले देवों ने वायु देवता वाले वन में विचरणशील सिंह, हाथी आदि पशुओं को तथा ग्रामों में रहने वाले गाय, घोड़े, गधे आदि पशुओं को बनाया. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः. देवा यद् यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्.. (१५) अश्वमेध अथवा पुरुष मेध यज्ञ करते हुए देवों ने अपने यज्ञ में अश्व रूप पुरुष को यूप अर्थात् लकड़ी के खंभे से बांधा. देवों ने गायत्री आदि सात छंदों को परिधि बनाया तथा इक्कीस समिधाओं की रचना की. (१५) मूर्ध्नो देवस्य बृहतो अंशवः सप्त सप्ततीः. राज्ञः सोमस्याजायन्त जातस्य पुरुषादधि.. (१६) उस यज्ञ रूप पुरुष के मस्तक से सोम राजा की चार सौ नब्बे महान शोभा वाली रश्मियां उत्पन्न हुईं. (१६) सूक्त-७ देवता—नक्षत्र चित्राणि साकं दिवि रोचनानि सरीसृपाणि भुवने जवनि. तुर्मिशं सुमतिमिच्छमानो अहानि गीर्भिः सपर्यामि नाकम्.. (१) अनेक रूपों वाले जो प्रकाश युक्त नक्षत्र आकाश में चमकते हैं, वे प्रतिक्षण द्रुत गति से सरकने वाले हैं. मैं उन नक्षत्रों की मंत्र रूप वाली स्तुति करता हूं, क्योंकि मैं उन की बाधा निवारण करने वाली कल्याणमयी बुद्धि की इच्छा करता हूं. (१) सुहवमग्ने कृत्तिका रोहिणी चास्तु भद्रं मृगशिरः शमार्द्रा. पुनर्वसू सूनृता चारु पुष्यो भानुराश्लेषा अयनं मघा मे.. (२) हे अग्नि! कृत्तिका नक्षत्र हमारे आह्वान के अनुकूल हो. हे प्रजापति! रोहिणी नक्षत्र हमारे सुंदर आह्वान के योग्य हो. हे सोम! मृगशिरा नक्षत्र हमारे लिए मंगलदायक तथा आह्वान के योग्य हो. हे रुद्र! आर्द्रा नक्षत्र हमारे लिए सुखकारी हो. हे अदिति! पुनर्वसु नक्षत्र हमें सत्य वाणी देने वाला हो. बृहस्पति संबंधी पुष्य नक्षत्र हमारे लिए श्रेय देने वाला हो. सर्प देवता वाला आश्लेषा नक्षत्र हमें दीप्ति प्रदान करे. पितृ देवता वाला मघा नक्षत्र मेरा गंतव्य स्थान हो. (२) पुण्यं पूर्वा फल्गुन्यौ चात्र हस्तश्चित्रा शिवा स्वाति सुखो मे अस्तु. राधे विशाखे सुहवानुराधा ज्येष्ठा सुनक्षत्रमरिष्ट मूलम्.. (३) अर्यमा देव का पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र, भग देव का उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र, सविता देव का हस्त नक्षत्र तथा इंद्र देव का चित्रा नक्षत्र मुझे पुण्य से भरा हुआ सुख दे. वायु देव का स्वाति नक्षत्र, इंद्र देवता वाला राधा अथवा विशाखा नक्षत्र और मित्र देव का अनुराधा नक्षत्र हमारे लिए सुख से आह्वान योग्य हो. इंद्र देव का ज्येष्ठा नक्षत्र हमें सुखी बनाए. पितर देवों का ebook converter DEMO Watermarks*
व्याधियों से पूर्ण मूल नक्षत्र मेरे लिए कल्याणकारी हो. (३) अन्नं पूर्वा रासतां मे अषाढा ऊर्जं देव्युत्तरा आ वहन्तु. अभिजिन्मे रासतां पुण्यमेव श्रवणः श्रविष्ठाः कुर्वतां सुपुष्टिम्.. (४) जल देवता का पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र मुझे खाने योग्य उत्तम अन्न दे. विश्वे देवों का उत्तराषाढ़ा नक्षत्र हमें बलदायक रस प्रदान करे. ब्रह्म देवता का अभिजित नक्षत्र मुझे पुण्य दे. विष्णु देव का श्रवण नक्षत्र तथा वसु देवता का धनिष्ठा नक्षत्र भी भलीभांति मेरा पालन करे. (४) आ मे महच्छतभिषग् वरीय आ मे द्वया प्रोष्ठपदा सुशर्म. आ रेवती चाश्वयुजौ भगं म आ मे रयिं भरण्य आ वहन्तु.. (५) इंद्र देव का शतभिषा नक्षत्र, अजैकपाद का पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र तथा अहिर्बुध्न्य देव का उत्तराभाद्रपद नक्षत्र हमारे लिए महान फल दे और सुसज्जित घर प्रदान करे. पूषा देव का रेवती नक्षत्र तथा अश्विनीकुमारों का अश्विनी नक्षत्र मुझे सौभाग्यशाली बनाए. यम देवता का भरणी नक्षत्र मुझे ऐश्वर्य प्रदान करे. (५) सूक्त-८ देवता—नक्षत्र यानि नक्षत्राणि दिव्य १ न्तरिक्षे अप्सु भूमौ यानि नगेषु दिक्षु. प्रकल्पयंश्रन्द्रमा यान्येति सर्वाणि ममैतानि शिवानि सन्तु.. (१) जो नक्षत्र अंतरिक्ष अर्थात् आकाश में, जलों में, भूमियों तथा पर्वतों पर एवं दिशाओं में हैं तथा चंद्रमा जिन नक्षत्रों को प्रकट करता हुआ उदय होता है, वे नक्षत्र मुझे सुख देने वाले हों. (१) अष्टाविंशानि शिवानि शग्मानि सह योगं भजन्तु मे. योगं प्र पद्ये क्षेमं च क्षेमं प्र पद्ये योगं च नमो ऽहोरात्राभ्यामस्तु.. (२) देखने में सुख देने वाले तथा सुख प्रदान करने वाले जो अट्ठाईस नक्षत्र हैं, वे एकसाथ मिल कर मुझे प्राप्त हों एवं मुझे सुख प्रदान करें. मैं नक्षत्रों की कृपा से अप्राप्त वस्तुओं को प्राप्त करूं तथा प्राप्त वस्तुओं की सुरक्षा कर सकूं. दिन और रात को मेरा नमस्कार है. (२) स्वस्तितं मे सुप्रातः सुसायं सुदिवं सुमृगं सुशकुनं मे अस्तु. सुहवमग्ने स्वस्त्य १ मर्त्य गत्वा पुनरायाभिनन्दन्.. (३) प्रातःकाल मुझे सुख प्रदान करें, सायं काल मुझे सुख प्रदान करे तथा दिनरात मुझे सुखी बनाएं. मैं जिस प्रयोजन संबंधी नक्षत्र में प्रस्थान करूं, उस में हरिण आदि शुभ शकुन के रूप मेरे अनुकूल गति वाले हों. हे अग्नि! सभी नक्षत्रों के देवताओं का अभिनंदन करने वाले एवं अविनश्वर द्युलोक में जा कर हवि देने वाले हम यजमानों और ऋत्विजों को प्रसन्न ebook converter DEMO Watermarks*
करने के हेतु पुनः यहां आओ. (३) अनुहवं परिहवं परिवादं परिक्षवम्. सर्वैर्मे रिक्तकुम्भान् परा तान्तसवितः सुव.. (४) हे सविता देव! कार्य के निमित्त जाते हुए मुझ को तुम सभी नक्षत्रों में अनुभव नाम ले कर पीछे से बुलाना, परिहव नाम ले कर दोनों ओर से पुकारना. परिवाद अर्थात् कठोर भाषण, परिक्षव अर्थात् वर्जित स्थल में प्रवेश व खाली घड़े आदि देखना—अपशकुनों से बचाओ. (४) अपपापं परिक्षवं पुण्यं भक्षीमहि क्षवम्. शिवा ते पाप नासिकां पुण्यगन्ध्राभि मेहताम्.. (५) अहित करने वाली छींक हम से दूर हो. धन प्राप्ति के लिए जाते हुए पुरुष को गीदड़ी का दर्शन, उस का शब्द सुनना तथा नपुंसक का दर्शन—ये सभी हमारे पापों को शांत करने वाले हों. (५) इमा या ब्रह्मणस्पते विषूचीर्वात ईरते. सध्रीचीरिन्द्रा ताः कृत्वा मह्यं शिवतमास्कृधि.. (६) हे ब्रह्मणस्पति इंद्र! ये सभी दिशाएं आंधी के कारण धुंधली हो जाती हैं तथा पता नहीं चलता कि यह कौन सी दिशा है. उन अंधकार से ढकी हुई दिशाओं को मेरे अनुकूल करते हुए कल्याण करने वाली बनाओ. (६) स्वस्ति नो अस्त्वभयं नो अस्तु नमो ऽ होरात्राभ्यामस्तु.. (७) हमारा कल्याण हो तथा हमारा भय दूर हो. दिन और रात के लिए हमारा नमस्कार हो. (७) सूक्त-९ देवता—मंत्र में बताए हुए शान्ता द्यौः शान्ता पृथिवी शान्तमिदमुर्व१न्तरिक्षम्. शान्ता उदन्वतीरापः शान्ता नः सन्त्वोषधीः.. (१) अपने कारण से उत्पन्न दोषों को शांत करता हुआ द्युलोक हमें सुख प्रदान करे. विशाल अंतरिक्ष और पृथ्वी हमें सुख प्रदान करें. सागरों के जल तथा ओषधियां हमें सुख देने वाले हों. (१) शान्तानि पूर्वरूपाणि शान्तं नो अस्तु कृताकृतम्. शान्तं भूतं च भव्यं च सर्वमेव शमस्तु नः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
कार्य से पहले होने वाले कारण मेरे लिए शांत हों. मेरे द्वारा किए गए और न किए गए दुष्कर्म मुझे शांति प्रदान करने वाले हों. भूतकाल के कार्य और भविष्यत् काल के कार्य मेरे लिए शांतिप्रद हों. भूत, भविष्यत् और वर्तमान कालों से संबंधित सभी कार्य मेरे लिए शांति देने वाले हों. (२) इयं या परमेष्ठिनी वाग् देवी ब्रह्मसंशिता. ययैव ससृजे घोरं तयैव शान्तिरस्तु नः.. (३) उत्तम स्थान में रहने वाली अथवा ब्रह्मा की पत्नी, मंत्रों के द्वारा भलीभांति उत्तेजित एवं विद्वानों के द्वारा स्वयं अनुभव की गई जो वाग्देवी अथवा सरस्वती हैं, ये शाप देने आदि में भी उच्चारण की जाती हैं—ये हमारे लिए शांति देने वाली हों. (३) इदं यत परमेष्ठिनं मनो वां ब्रह्मसंशितम्. येनैव ससृजे घोरं तेनैव शान्तिरस्तु नः.. (४) परमेष्ठी ने सृष्टि के आदि में मन की रचना की, जो संसार का मूल कारण है. ऐसा ब्रह्म ने कहा है. जिस मन के द्वारा कर्म किया जाता है, उसी मन के द्वारा हमें शांति प्राप्त हो. (४) इमानि यानि पञ्चेन्द्रियाणि मनःषष्ठानि मे हृदि ब्रह्मणा संशितानि. यैरेव ससृजे घोरं तैरेव शान्तिरस्तु नः.. (५) जो पांच ज्ञानेंद्रियां, (आंख, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा) हैं, इन के अतिरिक्त मन छठी ज्ञानेंद्रिय है. ये मेरे हृदय में स्थित हैं और चेतन आत्मा इन पर नियंत्रण करता है. इन्हीं के द्वारा घोर कर्म किया जाता है. इन्हीं के द्वारा हमें शांति प्राप्त हो. (५) शं नो मित्रः शं वरुणः शं विष्णुः शं प्रजापतिः. शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो भवत्वर्यमा.. (६) मित्र अर्थात् सूर्य, वरुण, विष्णु, प्रजापति, इंद्र, बृहस्पति और अर्यमा हमें शांति प्रदान करने वाले हों. (६) शं नो मित्रः शं वरुणः शं विवस्वाञ्छमन्तकः. उत्पाताः पार्थिवान्तरिक्षाः शं नो दिविचरा ग्रहाः.. (७) मित्र, वरुण, सूर्य तथा अंतक हमें शांति प्रदान करें. पृथ्वी और अंतरिक्ष में होने वाले उत्पात एवं द्युलोक में संचरण करने वाले गृह हमें शांति प्रदान करें. (७) शं नो भूमिर्वेप्यमाना शमुल्का निर्हतं च यत्. शं गावो लोहितक्षीराः शं भूमिरव तीर्यतीः.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
प्राणियों का संहार करने वाले काल के कारण कांपती हुई पृथ्वी हमारे कंपन रूपी दोष को दूर करने वाली बने. ज्वाला के रूप में गिरने वाली उल्काओं के स्थान हमें शांति प्रदान करें. दूध के स्थान पर रक्त देने वाली गाएं तथा फटती हुई धरती हमें शांति प्रदान करे. (८) नक्षत्रमुल्काभिहतं शमस्तु नः शं नोऽभिचाराः शमु सन्तु कृत्याः. शं नो निखाता वल्गाः शमुल्का देशोपसर्गाः शमु नो भवन्तु.. (९) आकाश से गिरती हुई उल्काओं से अपने स्थान से पतित होने वाले नक्षत्र हमें शांति प्रदान करें. शत्रुओं द्वारा हमें मारने के निमित्त किए गए अभिचार कर्म (जादूटोने, टोटके) तथा पिशाचियां हमारे उपद्रवों को शांत करने वाली हों. भूमि खोद कर तथा हड्डी, केश आदि लपेट कर बनाई गई विष पुत्तलिकाएं हमें शांति देने वाली हों. आकाश से गिरने वाली उल्काएं देखने से जो अनिष्ट होता है, उसे उल्काएं ही शांत करें. राष्ट्र में होने वाले विघ्न भी शांत हों. (९) शं नो ग्रहाश्चान्द्रमसाः शमादित्यश्च राहुणा. शं नो मृत्युर्धूमकेतुः शं रुद्रास्तिग्मतेजसः.. (१०) चंद्र मंडल भेदक मंगल आदि ग्रह हमें शांति प्रदान करें. राहु के द्वारा ग्रसित सूर्य हमारी शक्ति का निमित्त बने. मारक धूमकेतु हमें शांति देने वाला हो. तीक्ष्ण तेज वाले रुद्र हमें शांति देने वाले हों. (१०) शं रुद्राः शं वसवः शमादित्याः शमग्नयः. शं नो महर्षयो देवाः शं देवाः शं बृहस्पतिः.. (११) रुद्र, वायु, आदित्य और अग्नि देव हमारे लिए शांति के कारण बनें. अतिमान तेज वाले सात महर्षि, इंद्र आदि देव और देवों के पुरोहित बृहस्पति हमारी शांति के कारण बनें. (११) ब्रह्म प्रजापतिर्धाता लोका वेदाः सप्तऋषयो ऽग्नयः. तैर्मे कृतं स्वस्त्ययनमिन्द्रो मे शर्म यच्छतु ब्रह्मा मे शर्म यच्छतु. विश्वे मे देवाः शर्म यच्छन्तु सर्वे मे देवाः शर्म यच्छन्तु.. (१२) सच्चिदानंद लक्षण वाला ब्रह्म, प्रजापति, चार मुखों वाले ब्रह्मा, सात लोक, अंगों सहित चार वेद, सात ऋषि तथा तीन अग्नियां मुझे शांति देने वाली हों. इन सब ने मुझे स्वस्त्य यमन अर्थात् शांति प्रदान की है. इंद्र और ब्रह्मा मुझे सुख प्रदान करें. विश्वे देव मुझे सुख प्रदान करें तथा विश्वे देव मुझे सुख प्रदान करें. (१२) यानि कानि चिच्छान्तानि लोके सप्तऋषयो विदुः. सर्वाणि शं भवन्तु मे शं मे अस्त्वभयं मे अस्तु.. (१३) सप्त ऋषि लोक में जिन शक्तियों को जानते थे, वे सब मुझे सुख देने वाली हों, मुझे
सुख प्राप्त हो तथा मुझे सभी से अभय मिले. (१३) पृथिवी शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिर्द्यौः शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिर्वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे मे देवाः शान्तिः सर्वे मे देवाः शान्तिः शान्तिः शान्तिः शान्तिभिः. ताभिः शान्तिभिः सर्व शान्तिभिः शमयामो ऽ हं यदिह घोरं यदिह क्रूरं यदिह पापं तच्छान्तं तच्छिवं सर्वमेव शमस्तु नः.. (१४) पृथ्वी, अंतरिक्ष, द्युलोक, जल, ओषधियां, वनस्पतियां तथा सभी देव हमारी अपेक्षा अधिक शक्ति प्राप्त करें. सभी प्रकार की इस शांति प्रक्रिया में यहां जो भयानक और निर्दय फल है, उसे हम दूर करते हैं. ये सभी शांत बन कर हमें कल्याण प्रदान करें. (१४) सूक्त-१० देवता—मंत्र में बताए हुए शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शं न इन्द्रावरुणा रातहव्या. शमिन्द्रासोमा सुविताय शं योः शं न इन्द्रापूषणा वाजसातौ.. (१) हे इंद्र और अग्नि! तुम अपनी रक्षा बुद्धि के द्वारा हमारे सकल दुःखों को दूर करने वाले बनो. यजमानों के द्वारा हवि दिए गए इंद्र और वरुण हमारे दुःखों को दूर करें. इंद्र और सोम हमें सुख देने के लिए हमारा दुःख निवारण करें. इंद्र और पूषा देव भयंकर युद्ध में हमारे दुःखों, भयों एवं रोगों का शमन करें. (१) शं नो भगः शमु नः शंसो अस्तु शं नः पुरंधिः शमु सन्तु रायः. शं नः सत्यस्य सुयमस्य शंसः शं नो अर्यमा पुरुजातो अस्तु.. (२) भग और नराशंस देवता हमारा कल्याण करने वाले हों. हमारी बुद्धि और हमारा धन हमें सुख देने वाले हों. शोभन संयम से युक्त सत्य वचन हमारे दुःख निवारण और सुख देने के हेतु बनें. सब से आरंभ में उत्पन्न अर्यमा देव हमें सुख दें. (२) शं नो धाता शमु धर्ता नो अस्तु शं न उरूची भवतु स्वधाभिः. शं रोदसी बृहती शं नो अद्रिः शं नो देवानां सुहवानि सन्तु.. (३) सब का निर्माण करने वाले ब्रह्मा तथा वरुण देव हमें सुख देने वाले हों. पृथ्वी अन्नों के साथ हमारे दुःखों का निवारण कर के सुख देने वाली बने. धाता, पृथ्वी एवं पर्वत हमें सुख प्रदान करें. देवताओं की स्तुतियां हमारा कल्याण करें. (३) शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरुणावश्विना शम्.
शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इषिरो अभि वातु वातः.. (४) जिस के मुख में ज्योति है, ऐसी अग्नि हमें सुख देने वाले हों. मित्र, वरुण और अश्विनीकुमार हमारे सुख के कारण बनें. पुण्य कर्म करने वालों के उत्तम कर्म हमें सुख प्रदान करें. गमनशील वायु हमारे सुख के उद्देश्य से चले. (४) शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु. शं न ओषधीर्वनिणो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः.. (५) देवों के द्वारा सब से पहले स्तुति किए गए द्यावा और पृथ्वी हमारा कल्याण करने वाले हों. अंतरिक्ष अर्थात् मध्यम लोक हमारी दृष्टि को सुख देने वाला हो. ओषधियां अर्थात् जड़ीबूटियां तथा वनों के वृक्ष हमारा कल्याण करें. लोकों के पालनकर्ता एवं जयशील इंद्र हमें सुख प्रदान करें. (५) शं न इन्द्रो वसुभिर्देवो अस्तु शमादित्येभिर्वरुणः सुशंसः. शं नो रुद्रो रुद्रेभिर्जलाषः शं नस्त्वष्टा ग्नाभिरिह शृणोतु.. (६) वसु नाम के देवों के साथ इंद्र हमें सुख प्रदान करें. शोभन स्तुतियों वाले वरुण आदित्य देवों के साथ हमारा कल्याण करें. सुखकारी रुद्र रुद्रों के साथ हमें सुख दें. त्वष्टा देव सभी देव पत्नियों के साथ इस यज्ञ में हमें सुख प्रदान करने वाले बनें. (६) शं नः सोमो भवतु ब्रह्म शं नः शं नो ग्रावाणः शमु सन्तु यज्ञाः. शं नः स्वरूणां मितयो भवन्तु शं नः प्रस्व १: शम्वस्तु वेदिः.. (७) निचोड़े गए सोम, स्तोत्रों तथा शंसों वाले मंत्र, सोमलता कुचलने के साधन पत्थर तथा यज्ञ हमारा कल्याण करें. यूपों के समूह हमें सुख दें. चरु और पुरोडाश बनाने में काम आने वाली तथा अधिकता से उत्पन्न होने वाली ओषधियां अर्थात् जड़ीबूटियां हमारा कल्याण करें. यज्ञ की वेदी हमें सुख प्रदान करे. (७) शं नः सूर्य उरुचक्षा उदेतु शं नो भवन्तु प्रदिशश्चतस्रः. शं नः पर्वता ध्रुवयो भवन्तु शं नः स्सिन्धवः शमु सन्त्वापः.. (८) फैले हुए तेज वाले सूर्य हमें सुख देने के लिए उदय हों. चारों दिशाएं, स्थिर रहने वाले पर्वत, नदियां और जल हमारा कल्याण करने वाले हों. (८) शं नो अदितिर्भवतु व्रतेभिः शं नो भवन्तु मरुतः स्वर्काः. शं नो विष्णुः शमु पूषा नो अस्तु शं नो भवित्रं शम्वस्तु वायुः.. (९) देवमाता अदिति व्रतों के साथ हमें सुख देने वाली हों. उत्तम स्तुतियों वाले मरुत् हमारा कल्याण करें. विष्णु, पूषा, अंतरिक्ष अथवा जल हमें सुख देने वाले हों. वायु हमारा कल्याण ebook converter DEMO Watermarks*
करते हुए चलें. (९) शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूषसो विभातीः. शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शंभुः.. (१०) भयों से रक्षा करते हुए सविता देव हमारे सुख के कारण बनें. सुंदर प्रतीत होती हुई उषाएं हमारा कल्याण करें. वृष्टि करने वाले बादल हमारी प्रजाओं अर्थात् पुत्रों और सेवकों को सुख देने वाले हों. क्षेत्र के स्वामी शंभु हमारा कल्याण करें. (१०) सूक्त-११ देवता—मंत्र में कहे गए शं नः सत्यस्य पतयो भवन्तु शं नो अर्वन्तः शमु सन्तु गावः. शं न ऋभवः सुकृतः सुहस्ताः शं नो भवन्तु पितरो हवेषु.. (१) सत्य का पालन करने वाले देव हमारी शांति के कारण बनें. घोड़े और गाएं हमें शांति देने वाले हों. उत्तम कर्म करने वाले तथा शोभन हाथों वाले देव हमें सुख दें. पितर हमारे स्तोत्रों अथवा मंत्रों को सुन कर सुख देने वाले हों. (१) शं नोः देवा विश्वेदेवा भवन्तु शं सरस्वती सह धीभिरस्तु. शमभिषाचः शमु रातिषाचः शं नो दिव्याः पार्थिवाः शं नो अप्याः.. (२) विश्वे देव एवं इंद्र आदि देव हमें शांति प्रदान करें. हमारी स्तुतियों के साथ सरस्वती हमें सुख देने वाली हों. यज्ञ में चारों ओर से आने वाले एवं दान के हेतु एकत्र होने वाले देवता हमें शांति दें. देव, पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाले मनुष्य, पशु आदि तथा आकाश में उड़ने वाले पक्षी हमें सुख दें. (२) शं नो अज एकपाद् देवो अस्तु शमहिर्बुध्न्य १: शं समुद्रः. शं नो अपां नपात् पेरुरस्तु शं नः पृश्निर्रभवतु देवगोपा.. (३) जन्म न लेने वाले तथा स्थावर जंगम रूप एक चरण वाले एकपाद देव हमें शांति प्रदान करें. अहिर्बुध्न्य नाम के देव एवं सागर हमें सुख दें. अपानपात नाम के देव हमें शांति प्रदान करें तथा दुःखों से पार करने वाले हों. देव जिस की रक्षा करते हैं, ऐसी पृश्नि हमारी रक्षा करे. (३) आदित्या रुद्रा वसवो जुषन्तामिदं ब्रह्म क्रियमाणं नवीयः. शृण्वन्तु नो दिव्याः पार्थिवासो गोजाता उत ये यज्ञियासः.. (४) अदिति के पुत्र देव, रुद्र एवं वसु हमारे किए गए इस नवीन स्तोत्र को स्वीकार करें. दिव्य पार्थिव अर्थात् पृथ्वी पर उत्पन्न मनुष्य पशु, वृक्ष आदि, पृश्नि से उत्पन्न मरुत् नाम के देव तथा यज्ञ के योग्य देव हमारी रक्षा करें. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
ये देवानामृत्विजो यज्ञियासो मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः. ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) देवताओं के ऋत्विज्, यज्ञकर्ता, मनु के पुत्र अर्थात् मनुष्य, अमृतत्व को प्राप्त तथा सत्यनिष्ठ देवता हैं, वे आज हमें अधिक यज्ञ प्रदान करें. हे देवताओ! तुम कल्याणकारी रक्षा साधनों से सदा हमारी रक्षा करो. (५) तदस्तु मित्रावरुणा तदग्ने शं योरस्मभ्यमिदमस्तु शस्तम्. अशीमहि गाधमुत प्रतिष्ठां नमो दिवे बृहते सादनाय.. (६) हे मित्र और वरुण! हमें कहा जाता हुआ फल प्राप्त हो. भयों एवं रोगों से रक्षा करने वाला प्रशंसनीय फल हमें प्राप्त हो. हम धन लाभ और प्रतिष्ठा का अनुभव करें. विशाल एवं सभी देवों के निवासस्थान द्युलोक को नमस्कार है. (६) सूक्त-१२ देवता—उषा उषा अप स्वसुस्तमः सं वर्तयति वर्तनिं सुजातता. अया वाजं देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीराः.. (१) उषा आते ही अपनी बहन रात्रि के अंधकार को दूर कर देती है. इस के पश्चात उषा लौकिक और वैदिक मार्ग को पूर्ण रूप से खोलती है. इस उषा के द्वारा हम देवों द्वारा भली प्रकार दिए हुए एवं हितकारी अन्न को प्राप्त करें. कर्म करने में कुशल पुत्र एवं पौत्र वाले हम सौ वर्षों तक प्रसन्न हों. (१) सूक्त-१३ देवता—इंद्र इन्द्रस्य बाहू स्थविरौ वृषाणौ चित्रा इमा वृषभौ पारयिष्णू. तौ योक्षे प्रथमो योग आगते याभ्यां जितमसुराणां स्वर्ह्यत्.. (१) इंद्र की भुजाएं देवों से वैर करने वाले राक्षसों पर विजय प्राप्त करने वाली, स्थूल तथा अभिमत फल देने वाली हैं. मैं अपने कल्याण के लिए इन भुजाओं का पूजन करता हूं. ये भुजाएं सब के द्वारा प्रशंसनीय, सांडों के समान सबल तथा शत्रुओं का हनन करने में समर्थ हैं. परम ऐश्वर्य संपन्न इंद्र की दोनों भुजाएं सभी उपासकों के लिए पूर्व निश्चित है. मैं अप्राप्त की प्राप्ति अर्थात् योग और प्राप्त के रक्षण अर्थात् क्षेम के लिए इन की पूजा करता हूं. इन भुजाओं ने स्वर्ग के निवासी देवों को बाधा पहुंचाने वाली सेना को पराजित किया है. (१) आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्. संक्रन्दनो ऽ निमिष एकवीरः शतं सेना अजयत् साकमिन्द्रः.. (२) eBook converter DEMO Watermarks*
शीघ्रकारी, अपनी इच्छा पूरी करने में संलग्न, सांड के समान भयंकर, शत्रुओं के हंता, मनुष्यों को क्षुब्ध करने वाले, युद्ध में शत्रुओं का आह्वान करने वाले, आंखें न झपकाने वाले, बिना किसी सहायक के कार्य पूर्ण करने वाले एवं वीर इंद्र ने शत्रुओं की सौ सेनाओं को एक साथ जीत लिया था. (२) संक्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना ऽ योध्येन दुश्च्यवनेन धृष्णुना. तदिन्द्रेण जयत तत् सहध्वं युधो नर इषुहस्तेन वृष्णा.. (३) युद्ध में शत्रुओं को रुलाने वाले, निमिषहीन नयनों वाले, जयशील, युद्ध में प्रहार करने वाले, दुःख से विचल करने योग्य, शत्रु का वार सहन करने वाले, धनुर्धारी तथा मनचाही वर्षा करने वाले इंद्र की सहायता से हमें विजय प्राप्त हो. हे योद्धाओ! उन्हीं इंद्र की सहायता शत्रु को पराजित करे. (३) स इषुहस्तैः स निषङ्गिभिर्वशी संस्रष्टा स युध इन्द्रो गणेन. संसृष्टजित् सोमपा बाहुशर्यु १ ग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता.. (४) खड्ग धारण करने वाले एवं बाण धारण करने वाले इंद्र अपने वीर अनुचरों को शत्रुओं के सामने भेजते हैं. इंद्र युद्ध की इच्छा से आने वाले शत्रुओं पर इसी प्रकार विजय प्राप्त करते हैं. सोमपान करने वाले इंद्र शत्रुओं के समूहों को जीतने वाले, बाहुबल से युक्त, भयंकर धनुष वाले एवं दूसरों के शरीरों पर मारे गए बाणों से उन के संहारक हैं. हे वीरो! तुम इस प्रकार के इंद्र की सहायता से जय प्राप्त करो. (४) बलविज्ञायः स्थविरः प्रवीरः सहस्वान् वाजी सहमान उग्रः. अभिवीरो अभिषत्वा सहोजिज्जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोविदन्.. (५) शत्रुओं के बल को जानने वाले, पुरातन, उग्र, बलवान वीरों के स्वामी, पराजित करने की शक्ति वाले, वेगवान, शत्रुओं को अपमानित करने वाले, शत्रुओं की सेना के विजेता एवं दूसरों की गायों को अपनी जानने वाले हे इंद्र! तुम हमारी सहायता के लिए अपने जयशील रथ पर बैठने योग्य हो. (५) इमं वीरमनु हर्षध्वमुग्रमिन्द्रं सखायो अनु सं रभध्वम्. ग्रामजितं गोजितं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा.. (६) हे समान बुद्धि और कर्म वाले योद्धाओ! तुम सब इस शत्रु को पराजित करने में समर्थ, वीर एवं उग्र इंद्र को आगे कर के उत्साह वाले बनो. शत्रु के विनाश के लिए उद्योगशील इंद्र के साथ तुम भी उद्योग करो. इंद्र शत्रुओं के समूह के विजेता, शत्रुओं की गायों के विजेता एवं हाथ में वज्र धारण करने वाले हैं. इंद्र शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले एवं अपनी शक्ति से शत्रुओं की सेनाओं का विनाश करने वाले हैं. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
अभि गोत्राणि सहसा गाहमानो ऽ दाय उग्रः शतमम्युरिन्द्रः. दुश्च्यवनः पृतनाषाडयोध्यो ३ स्माकं सेना अवतु प्र युत्सु.. (७) इंद्र युद्ध क्षेत्र में अपनी शक्ति से शत्रु सेना के सामने से प्रवेश करने वाले, दयाहीन, क्रोध करने वाले एवं प्रचंड पराक्रमी हैं. ये शत्रुओं की सेना को वश में कर लेते हैं. कोई भी इन्हें युद्ध क्षेत्र से भगाने में समर्थ नहीं है. ये शत्रु सेनाओं को पराजित करने वाले हैं. इन से युद्ध करने में कोई भी समर्थ नहीं है. इस प्रकार के इंद्र युद्धों में हमारी सेना की रक्षा करें. (७) बृहस्पते परि दीया रथेन रक्षोहामित्रां अपबाधमानः. प्रभञ्जञ्छत्रून् प्रमृणन्नमित्रानस्माकमेध्यविता तनूनाम्.. (८) हे देवों का पालन करने वाले बृहस्पति! तुम रथ में बैठ कर युद्ध में सभी ओर गमन करो. तुम राक्षसों का वध करने वाले एवं शत्रुओं को बाधा पहुंचाने वाले हो. तुम शत्रुओं को सभी ओर से नष्ट करते हुए एवं उन की हिंसा करते हुए हमारे शरीरों के रक्षक बनो. (८) इन्द्र एषां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः. देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्तु मध्ये.. (९) हमारे शत्रुओं को सामने से नष्ट करने के लिए विजय प्राप्त करने वाली देव सेनाओं के इंद्र नेता हैं. बृहस्पति इन देव सेनाओं की दक्षिण दिशा में चलें. यज्ञ और सोम इन के आगे चलें तथा मरुद्गण इन सेनाओं के मध्य भाग में गमन करें. (९) इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज्ञ आदित्यानां मरुतां शर्ध उग्रम्. महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात्.. (१०) कामनाओं को पूर्ण करने वाले अथवा निरंतर शस्त्रों की वर्षा करने वाले इंद्र, शत्रुओं को युद्ध भूमि से भगाने वाले वरुण, मरुद्गण तथा आदित्य शत्रुओं को वश में करने वाली शक्ति सहित प्रकट हों. आदित्य शत्रुओं को इस लोक से भी दूर भगाने में समर्थ हैं. वे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें. सभी देवों की जयध्वनि उठे. (१०) अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ता जयन्तु. अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्मान् देवासो ऽ वता हवेषु.. (११) ध्वजाओं वाले संग्रामों के प्राप्त होने पर इंद्र हमारे रक्षक हों. हमारे बाण शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें. हमारे वीर उत्तर दिशा में अथवा उत्तम स्थिति में हों. हे देवो! आप सब भी संग्रामों में हमारी रक्षा करो. (११) सूक्त-१४ देवता—द्यावा पृथ्वि इदमुच्छ्रेयो ऽ वसानमागां शिवे मे द्यावापृथिवी अभूताम्. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१५ देवता—इंद्र एवं मंत्र में कहे गए
असपत्नाः प्रदिशो मे भवन्तु न वै त्वा द्विष्मो अभयं.. (१) मैं ने श्रेष्ठ फल के रूप में अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है. द्यावा और पृथिवी मुझे उत्तम फल देने वाले हों. पूर्व आदि उत्तम दिशाएं मेरे लिए शत्रु रहित हों. हे विरोधी! मैं तुझ से द्वेष न करूँ, इसलिए मुझे अभय प्राप्त हो. (१) सूक्त-१५ देवता—इंद्र एवं मंत्र में कहे गए यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कृधि. मघवञ्छग्धि तव त्वं न ऊतिभिर्वि द्विषो वि मृधो जहि.. (१) हे अभय करने वाले इंद्र! हम भयभीत हैं. इसलिए हमारे भय के कारण उपद्रव को समाप्त कर के हमें भय रहित बनाइए. हे धनवान इंद्र! तुम अपने रक्षा साधनों से हमारी रक्षा करने के लिए समर्थ बनो. तुम हमारे शत्रुओं को नष्ट करो तथा हमारे शत्रु संबंधी संग्रामों में हमें विजयी बनाओ. (१) इन्द्रं वयमनूराधं हवामहे ऽ नु राध्यास्म द्विपदा चतुष्पदा. मा नः सेना अरुषीरुप गुर्विषूचीरिन्द्र द्रुहो वि नाशय.. (२) सब अपनेअपने कार्यों की सिद्धि के लिए इंद्र से ही प्रार्थना करते हैं. हम क्रम के अनुसार पूजनीय इंद्र का आह्वान करते हैं. इंद्र की कृपा से हम दो पैरों वाले सेवकों तथा चार पैरों वाले पशुओं से संपन्न बनें. हमारे मन चाहे फल में बाधा डालने वाली शत्रुसेनाएं हमारे सामने न आएं. हे इंद्र! सब स्थानों पर फैली हुई शत्रु सेनाओं का नाश करो. (२) इन्द्रस्त्रातोत वृत्रहा परस्फानो वरेण्यः. स रक्षिता चरमतः स मध्यतः स पश्चात् स पुरस्तान्नो अस्तु.. (३) वृत्र असुर का अथवा जल रोकने वाले मेघ का वध करने वाले इंद्र हमारे रक्षक हों. वरण करने योग्य इंद्र शत्रुओं से हमारी रक्षा करने वाले हैं. वे ही इंद्र अंत में, मध्य में, पीछे और आगे हमारी रक्षा करने वाले हों. (३) उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान्त्स्व१र्यज्ज्योतिरभयं स्वस्ति. उग्रा त इन्द्र स्थविरस्य बाहू उप क्षयेम शरणा बृहन्ता.. (४) हे इंद्र! तुम सब कुछ जानते हो. तुम हमें इहलोक और विस्तृत स्वर्गलोक का सुख प्राप्त कराओ. स्वर्ग को व्याप्त करने वाला प्रकाश हमें भय रहित कर के सुख प्रदान करे. हे इंद्र! तुम महान हो. शत्रुओं का संहार करने में समर्थ, शत्रुओं से रक्षा करने वाली एवं विशाल आप की भुजाओं की हम शरण में जाते हैं. (४) अभयं नः करत्यन्तरिक्षमभयं द्यावापृथिवी उभे इमे. ebook converter DEMO Watermarks*
अभयं पश्चादभयं पुरस्तादुत्तरादधरादभयं नो अस्तु.. (५) अंतरिक्ष अर्थात् मध्यमलोक हमें अभय प्रदान करे. ये दोनों द्यावा और पृथ्वी हमें अभय प्रदान करें. पीछे से, आगे से, ऊपर से तथा नीचे से हमें अभय प्राप्त हो. (५) अभयं मित्रादभयममित्रादभयं ज्ञातादभयं पुरो यः. अभयं नक्तमभयं दिवा नः सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु.. (६) हमें मित्रों से तथा शत्रुओं से अभय प्राप्त हो. हम प्रत्यक्ष और परोक्ष जनों से भयभीत न हों. दिन में और रात में हमें अभय प्राप्त हो. सभी दिशाएं मेरे लिए मित्र के समान हित करने वाली हों. (६) सूक्त-१६ देवता—मंत्र में कहे गए असपत्नं पुरस्तात् पश्चान्नो अभयं कृतम्. सविता मा दक्षिणत उत्तरान्मा शचीपतिः.. (१) हे सब के प्रेरक सविता देव! पूर्व दिशा में हमें शत्रु रहित बनाओ तथा पश्चिम दिशा को भी हमारे शत्रुओं से शून्य कर दो. सविता देव उत्तर दिशा में तथा शची के पति इंद्र दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें. (१) दिवो मादित्या रक्षन्तु भूम्या रक्षन्त्वग्नयः. इन्द्राग्नी रक्षतां मा पुरस्तादश्विना— वभितः शर्म यच्छताम्. तिरश्चीनघ्न्या रक्षतु जातवेदा भूतकृतो मे सर्वतः सन्तु वर्म.. (२) आदित्य अर्थात् अदिति के पुत्र सभी देव द्युलोक में मेरी रक्षा करें. भूमि संबंधी उपद्रवों से तीन अग्नियां मेरी रक्षा करें. इंद्र और अग्नि पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें. सूर्य के पुत्र एवं देवों के वैद्य अश्विनीकुमार सभी ओर से मुझे सुख प्रदान करें. जातवेद अग्नि सभी दिशाओं में मेरी रक्षा करें. भूतों और पिशाचों की रक्षा करने वाले देव सभी ओर से हमारी रक्षा करें. (२) सूक्त-१७ देवता—मंत्र में कहे गए अग्निर्मा पातु वसुभिः पुरस्तात् तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (१) पृथ्वी स्थानीय देव अग्नि वसु नाम वाले देवों के साथ पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर रखने की क्रिया में और पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा करें, जहां मैं जाऊं एवं वे मेरा हित साधन करें. मैं सभी प्रकार से रक्षक अग्नि के प्रति समर्पण ebook converter DEMO Watermarks*
करता हूं. यह हवि अग्नि को प्राप्त हो. (१) वायुर्मान्तरिक्षेणैतस्या दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये क्रमे तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (२) अंतरिक्ष के स्थायी देवता वायु अंतरिक्ष में एवं पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर रखने की क्रिया में और पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा करें, जहां मैं जाऊं एवं वे मेरा हित साधन करें. मैं वायु के प्रति आत्म समर्पण करता हूं. यह हवि वायु को प्राप्त हो. (२) सोमो मा रुद्रैर्दक्षिणाया दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (३) सोम देवता रुद्र नाम के देवों के साथ मिल कर दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर रखने की क्रिया में एवं पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा करें, जहां मैं जाऊं. वे मेरा हित साधन करें. मैं सोम के प्रति आत्म समर्पण करता हूं. यह हवि सोम को प्राप्त हो. (३) वरुणो मादित्यैः रेतस्या दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (४) वरुण आदित्यों के साथ मिल कर दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर रखने की क्रिया में एवं पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा करें एवं मेरा हित साधन करें, जहां मैं जाऊं. मैं वरुण के प्रति आत्म समर्पण करता हूं. यह हवि वरुण को प्राप्त हो. (४) सूर्यो मा द्यावापृथिवीभ्यां प्रतीच्या दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (५) सूर्य देवता द्यावा और पृथ्वी के साथ पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करें. वे पैर रखने की क्रिया में एवं पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा एवं मेरा हित साधन करें, जहां मैं जाऊं. मैं सूर्य देव के प्रति आत्म समर्पण करता हूं. यह हवि सूर्य को प्राप्त हो. (५) आपो मौषधीमतीरेतस्या दिशः पान्तु क्रमे तासु श्रये तां पुरं प्रैमि. त् मा रक्षतु सन्तु मा गोपायता तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (६) जल ओषधियों अर्थात् जड़ीबूटियों वाली पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करें. वे मेरी पैर रखने ebook converter DEMO Watermarks*
की क्रिया में एवं पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा एवं मेरा हित साधन करें, जहां मैं जाऊं. मैं वायु देव के प्रति आत्म समर्पण करता हूं. यह हवि जल को प्राप्त हो. (६) विश्वकर्मा मा सप्तऋषिभिरुदीच्याः दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (७) विश्वकर्मा सप्त ऋषियों के साथ उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करें. वे मेरी पैर रखने की क्रिया में एवं स्थान में रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा और हित साधन करें, जहां मैं जाऊं. मैं विश्वकर्मा के प्रति आत्मसमर्पण करता हूं. यह हवि विश्वकर्मा को प्राप्त हो. (७) इन्द्रो मा मरुत्वानेतस्या दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (८) मरुतों से युक्त इंद्र उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करें. वे मेरी पैर रखने की क्रिया में एवं पैर रखने के स्थान पर मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा और मेरा हित साधन करें, जहां मैं जाऊं. मैं इंद्र के प्रति आत्मसमर्पण करता हूं. यह हवि इंद्र को प्राप्त हो. (८) प्रजापतिर्मा प्रजननवान्त्सह प्रतिष्ठया ध्रुवाया दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (९) सर्व जगत् को उत्पन्न करने के साधन वाले प्रजापति प्रतिष्ठा के साथ भूमि की दिशा में मेरी रक्षा करें. वे मेरी पैर रखने की क्रिया में एवं पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करें. वे उस नगर में मेरी रक्षा और मेरा हित साधन करें, जहां मैं जाऊं. मैं प्रजापति के प्रति आत्मसमर्पण करता हूं. यह हवि प्रजापति को प्राप्त हो. (९) बृहस्पतिर्मा विश्वैर्देवैरूर्ध्वाया दिशः पातु तस्मिन् क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि. स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा.. (१०) बृहस्पति विश्वे देवों के साथ ऊपर की दिशा में मेरी रक्षा करें. वे मेरी पैर रखने की क्रिया में तथा पैर रखने के स्थान में मेरी रक्षा करे. वे उस नगर में मेरी रक्षा और मेरा हित साधन करें, जहां मैं जाऊं. मैं बृहस्पति के प्रति आत्मसमर्पण करता हूं. यह आहुति बृहस्पति के लिए हो. (१०) सूक्त-१८ देवता—मंत्र में कहे गए ebook converter DEMO Watermarks*