आयुर्वेद का कमाल (रोगों के निदान में)
Ayurved Ka Kamaal (Rogon Ke Nidan Mein)
सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
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साहिब बन्दशी
| योगमत | संतमत |
|---|---|
| 1. योगमत में काया का नाम है। | |
| 2. योग मत चाचरी, भूचरी, अगोचरी, मुद्राओं के ईर्द-गिर्द घूमता है, जो शरीर में हैं। | |
| 3. यह नाम लिखने-पढ़ने में आता है। इनसे काल-पुरुष ने पाँच तत्व पैदा किये और शरीरों की रचना की। | |
| 4. योगमत में अनहद धुनों को ही परमात्मा माना जाता है। |
5. योगमत करनी अथवा कमाई का मार्ग है। 6. योगमत में सुरति शब्द का अभ्यास किया जाता है। 7. योगमत में काल का नाम लिया जाता है। यह नाम शरीर को दिया जाता है। 8. योगमत में गुरु की भूमिका न के बराबर होती है। 9. योगमत सीमाबद्ध है, जिसमें साधक दसवें द्वार तक ही जाता है। | 1. संतमत में विदेह नाम है। 2. संतमत में पाँच मुद्राओं से आगे शीश से सवा हाथ ऊपर ध्यान रखने को कहा है। 3. यह अकह नाम है जो लिखने-पढ़ने में नहीं आता है और पाँच तत्वों से बाहर है।
4. संतमत में आत्मा किसी शब्द की मोहताज नहीं, क्योंकि आत्मा अपने आप में परिपूर्ण है। 5. यह सहज मार्ग है, गुरु कृपा का मार्ग है और भुंग-मता है। 6. संतमत सुरति को चेतन करने का मार्ग है। 7. संतमत जिंदा नाम प्रदान करता है जोकि शरीर को छोड़ आत्मा को दिया जाता है। 8. संतमत में भक्ति का सार ही संत सदगुरु है। 9. संतमत असीम है जो कि ग्यारहवें द्वार की बात करता है, जो सुरति में है।
आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
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| योगमत | संतमत |
|---|---|
| 10. योगमत निराकार निरंजन की ही सत्ता को ही सर्वश्रेष्ठ मानता है। | 10. संतमत में निराकार सत्ता से आगे चौथे लोक अर्थात् अमर लोक की बात की जाती है। |
| 11. योगमत में कमाई का फल खत्म होने पर वापिस माता के पेट में आना पड़ता है। | 11. संतमत में जीव सदा के लिए आवागमन से मुक्त हो जाता है और अपने निजधाम सत्य लोक को चला जाता है। |
| 12. योगमत वैशाखियों के सहारे चलता है जो कि शास्त्रों की साक्षी देकर अपने आप को स्थापित करता है। | 12. संतमत में संत सदगुरु अपने अनुभव से बोलता है जो किसी का मोहताज नहीं होता है। |
| 13. इसमें रिद्धि-सिद्धि और दिव्य शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, मगर आत्मा का ज्ञान नहीं होता है। | 13. संतमत में जीव को आत्मज्ञान होने से आध्यात्मिक शक्ति याँ मिलती हैं। |
| 14. योगमत मीन और पपील मार्ग है। | 14. जबकि संतमत विहंगम मार्ग है। |
- 1. पाँच शब्द औ पाँचों मुद्रा, सोई निश्चय माना। आगे पूरण पुरुष पुरातन, उसकी खबर न जाना ॥
- 2. नौ नाथ चौरासी सिद्ध लों, पाँच शब्द में अटके। मुद्रा साथ रहे घट भीतर, फिर औंठे मुँह लटके ॥
- 3. काया नाम सबहिं गुण गावैं, विदेह नाम कोई बिरला पावै। विदेह नाम पावेगा सोई, जिसका सदगुरु साँचा होई ॥
- 4. जब तक गुरु मिले नहीं साँचा, तब तक गुरु करो दस पाँचा ॥
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साहिब बन्दगी
दसवें द्वार से आगे—संत वाणी
दशम द्वार से जीव जब जाई। स्वर्ग लोक में वासा पाई ॥ 11वें द्वार से जीव जब जाता। परम पुरुष के लोक समाता ॥
दसवें द्वार से न्यारा द्वारा। ताका भेद कहूँ मैं सारा ॥
नौ द्वारे संसार सब, दसवें योगी साध। एकादश खिड़की बनी, जानत संत सुजान ॥
—कबीर साहिब
.... आठ अटाकी अटारी मजारा, देखा पुरुष न्यारा। न निराकार आकार न ज्योति, नहीं वहाँ वेद विचारा। ओंकार कर्ता नहीं कोई, नहीं वहाँ काल पसारा। वह साहिब सब संत पुकारा, और पाखण्ड है सारा। सदगुरु चीन्ह दीन्ह यह मारग, नानक नजर निहारा ॥
—गुरु नानक देव जी
पलटू कहै साँच कै मानो। और बात झूठ कै जानो ॥ जहवाँ धरती नाहि अकासा। चाँद सूरज नाहि परगासा ॥ जहवाँ ब्रह्मा विष्णु न जाहीं। दस अवतार न तहाँ समाहीं ॥ आदि जोति ना बसै निरंजन। जहवाँ शून्य शब्द नहि गंजन ॥ निरंकार ना उहाँ अकारा। अक्षर शब्द नहि विस्तारा ॥ जहवाँ जोगी जाए न पावै। महादेव ना तारी लावै ॥ जहवाँ हृद अनहद नहि जावै। बेहद वहाँ रहनी ना पावै ॥ जहवाँ नाहि अगनि परगासा। पाँच तत्व ना चलता स्वाँसा ॥
—पलटू साहिब
आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
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संसार से अलग!
हमारा पंथ भक्ति जगत में वैज्ञानिक तरीके से क्रांति लाया है। सबसे पहले पाँच बातें पूरे संसार को अलग बता रहे हैं।
1. यह संसार काल का देश है। यहाँ तीन लोक में काल-निरंजन का राज्य है। इसी को वेदों ने निराकार, निरंकार, निरंजन, पार-ब्रह्म आदि नामों से पुकारा है। गण, गंधर्व, सिद्ध, साधक, ऋषि-मुनि, पीर-पैगंबर आदि यहाँ तक गये।
2. अमरलोक जाने के लिए (मुक्ति के लिए) कमाई कुछ नहीं करनी है। यह सारा कार्य सदगुरु कृपा से होता है।
3. नाम 52 अक्षर में, लिखने, पढ़ने अथवा सुनने वाला नहीं। नाम एक कला है, जो पूर्ण सदगुरु के पास है, जिससे आत्मा को जागृत किया जाता है और आत्मा मन से अलग हो जाती है। इसे नाम देना कहते हैं। नाम शरीर को नहीं आत्मा को दिया जाता है।
4. इस निरंजन के आगे महाशून्य है, जहाँ कोई वस्तु नहीं है। इनके नाम अचिन्त लोक, सोहंग लोक, मूल सुरति लोक, अंकुर लोक, इच्छा लोक, वाणी लोक और सहज लोक हैं। यह समस्त लोक महाशून्य में हैं। सहज अंश तक जो भी सृष्टि है, इसका परम नाश है।
सहज पुरुष तक जेतक भाखा। सो रचना परलै ते राखा ॥
आगे अक्षय लोक है भाई। आदि पुरुष तहाँ आप रहाई ॥
5. इसके ऊपर अमरधाम, परम-पुरुष का लोक है। यहाँ कभी भी प्रलय नहीं है।
जहवाँ से हँसा आया, अमर है वो लोकवा ॥
तहाँ नहीं परले की छाया, नहीं तहाँ कछु मोह और माया ॥
ज्ञान ध्यान को तहाँ न लेखा, पाप पुण्य तहँवा नहीं देखा ॥
पवन न पानी पुरुष न नारी, हद अनहद तहाँ नाहिं विचारी ॥
यहीं से साहिब आत्माओं के कल्याण के लिए आते हैं।
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साहिब बन्दगी
नाम अथवा भक्ति को
कबीर साहिब जी ने तीन भागों में बाँटा
सगुण भक्ति, निर्गुण भक्ति, परा भक्ति सगुण भक्ति करे संसारा। निर्गुण योगेश्वर अनुसार॥ तुम दोनों के पार बताया। मेरो चित्त एको नहीं आया॥ आपने इन दोनों के पार बताया। दादू दयाल जी ने कहा-
कोई सगुण में रीझ रहा, कोई निर्गुण ठहराय। अटपट चाल कबीर की, मौसे कही न जाय॥
जाप मेरे अजपा मेरे, अनहद भी मर जाय। सुरति समानी शब्द में, उसको काल न खाय॥
अंदर धुनें हैं। कुछ इसे सुरति शब्द अभ्यास भी कह रहे हैं और उनमें खो जाते हैं। कुछ धुनों को ही परमात्मा कह रहे हैं। पर इससे तृतीयतीत की अवस्था से पार नहीं जा सकते हैं। सबका अपना वजूद है। धुनें खत्म हो जाती हैं। फिर यह कौन-सा शब्द हुआ! यानी धुनात्मक शब्द भी नहीं है, वर्णनात्मक शब्द भी नहीं है। साहिब कह रहे हैं- 'सो तो शब्द विदेह॥' आवाज रहित धुन (Sound less sound)
है वो, क्योंकि - 'दो बिन होय न अधर अवाजा॥' आवाज दो के बिना नहीं होती और जहाँ आवाज है, वहाँ माया है।
हद टप्पे सो औलिया, बे-हद टप्पे सो पीर। हद-बेहद दोनों टप्पे, तिसका नाम कबीर॥
आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
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अमर लोक का विदेह नाम
काया नाम सबहिं गुण गवै, विदेह नाम कोई बिरला पावै॥ विदेह नाम पावेगा सोई, जिसका सद्गुरु साँचा होई॥
पाँच तीन यह साज पसारा, न्यारा शब्द विदेही हो। पाँच कहो तो छटवें हम हैं, आठ कहो नौ आई हो॥
पाँच तीन अधीन काया, न्यार शब्द विदेह हो। सुरति माहिं विदेह दरशै, गुरु मता निज एह हो॥
छिन इक ध्यान विदेह समाई॥ ताकी महिमा बरनिन न जाई॥ सार नाम सद्गुरु से पावे। नाम डोर गहि लोक सिधावे॥ सार शब्द विदेह स्वरूपा। निःअक्षर वह रूप अनुपा॥ तत्त्व प्रकृति भाव सब देहा। सार शब्द निःतत्त्व विदेहा॥
बावन अक्षर में संसारा। निःअक्षर सो लोक पसारा॥ सोई नाम है अक्षर बासा। काया ते बाहर परकासा॥
शब्द शब्द सब कोई कहे, वह तो शब्द विदेह। जिभ्या पर आवे नहीं, निरख परख के लेह॥
—साहिब कबीर जी
पिण्ड ब्रह्माण्ड और वेद कितेबै, पाँच तत्त्व के पारा। सतलोक यहाँ पुरुष विदेही, वह साहिब करतारा॥
—दादू दयाल
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साहिब बन्दगी
संतों की बात समझें
संतों की दुनिया सबसे निराली रही है। संतों ने उस परम-सत्य की बात समझाने के लिए संसार को संसार ही की भाषा में समझाया है। कहीं-कहीं संतों ने राम , हरि आदि शब्दों का इस्तेमाल भी किया है, पर 'राम' से उनका मतलब 'साहिब' से ही रहा है। इसलिए भ्रमित न होना। चार राम की बात बताते हुए साहिब ने इसे स्पष्ट भी किया है।
साकार राम दशरथ का बेटा। निराकार राम घट घट में लेटा।
बिंदू राम जिन जगत पसारा। निरालंब राम सबही ते न्यारा ॥
यानी जिस राम को सारी दुनिया पूज रही है, कहीं संतों को भी उसी का उपासक बता रही है, वो तो साकार राम की कोटि में है। फिर कहीं-कहीं संतों को निराकार राम का उपासक बताया जा रहा है, पर वो दूसरी निराकार राम की कोटि में है। तीसरा राम वीर्य है, जिससे सृष्टि का पसार है। पर संतों का राम चौथा है, जो निरालंब है, वो जन्म-मरण में अवतार धारण करके नहीं आता। उसे ही सब संतों ने 'साहिब' पुकारा है।
कुछ सगुण-निर्गुण भक्ति के जो शब्द संतों की वाणी में मिलते हैं, वो इसलिए कि उन्होंने कबीर साहिब से नाम पाने से पहले निरंजन की भक्ति की थी।
फिर कहीं-कहीं संतों ने योग आदि के रहस्यों की बात भी की है, अंदर में होने वाली धुनों की बात भी की है, 10वें द्वार की बात भी की है। तो लोग समझ लेते हैं कि संतों ने योग का महत्व बताया है। नहीं, संतों ने यह सब योग आदि की पहुँच बताने के लिए कहा है। यह सब बताते हुए उन्होंने 'सार शब्द' का महत्व बताया है, जो अन्दर में होने वाला शब्द नहीं है, जो निःशब्द शब्द कहा जाता है। इसलिए संतों की वाणी में आंतरिक धुनें और आंतरिक खेल के वर्णन से भी भ्रमित नहीं होना है। बस, इतनी-सी बात समझ लेना कि संतों ने इस तीन लोक को काल का देश बताते हुए एक अमर लोक की बात की है, जिसकी राह आत्मा के भीतर से ही है, इसलिए बाहर भटकने की जरूरत नहीं है और उस रास्ते की कुंजी सार शब्द (नाम) है, जो केवल संतों के पास है।