आयुर्वेद का कमाल (रोगों के निदान में)
Ayurved Ka Kamaal (Rogon Ke Nidan Mein)
सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
प्राणायाम और योगासनों द्वारा स्वास्थ्य रक्षा
प्राणायाम और योगासनों
द्वारा स्वास्थ्य रक्षा
वस्त्रिका प्राणायाम
पद्मासन या सुखासन या कैसे भी बैठकर कमर को सीधा रखें। धीरे-धीरे दोनों नथुनों से स्वांस अंदर भरें। स्वांस नाभि तक जाना चाहिए और पेट थोड़ा अंदर की ओर जाना चाहिए। छाती स्वांस से फूली हुई नजर आनी चाहिए। बिना रोके अब धीरे-धीरे स्वांस को बाहर निकालें। इस तरह 3 से 5 मिनट तक करें।
कपालभाती प्राणायाम
पद्मासन या सुखासन में बैठकर दोनों हाथ दोनों घुटनों पर ज्ञानमुद्रा (छोटी उँगली और अंगूठे को मिलाते हुए बाकी उँगलियाँ सीधी रखें) में रखें। अब सांस को बाहर छोड़ें। ऐसे में नाभि को पीछे झटका लगेगा। सांस लेना बिलकुल नहीं है। एक बार छोड़ने और दूसरी बार छोड़ने के बीच में जो अंतर आता है, वो अपने आप ही अंदर चला जाता है।
सांस इस प्रकार छोड़ना है, मानो नाक साफ कर रहे हों और पेट को झटना लग रहा हो। यह भी 4-5 मिनट तक कर सकते हैं।
अनुलोमविलोम प्राणायाम
दाएँ नथुने को दाएँ हाथ के अंगूठे से बंद करते हुए बाएँ नथुने से धीरे-धीरे सांस ऊपर खींचें।
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साहिब बन्दगी
अब दाएँ हाथ की ही बीच वाली दो उँगलियों से बाएँ नथुने को बंद करते हुए दाएँ नथुने से धीरे-धीरे सांस छोड़ दें। ऐसे में अंगूठा हटा लें।
अब दाएँ नथुने से पहले की तरह धीरे-धीरे सांस खींचें। फिर दाएँ हाथ के अंगूठे से दाएँ नथुने को बंद करते हुए बाएँ नथुने से धीरे-धीरे सांस छोड़ें।
इस तरह से एक चक्र पूरा होगा। ऐसे आप 5 से 15 मिनट तक करें।
ध्यान रहे, शुरू करते समय बाएँ नथुने से सांस खींचनी है और समाप्त करते समय भी बाएँ नथुने से ही सांस को बाहर छोड़कर खत्म करना है।
लाभ: हृदय, मेदा, अंतर्द्वियाँ, ज्विगर, फेफड़े, दिमाग, कैंसर, लीवर आदि से संबंधित जितनी भी बीमारियाँ हैं, सबमें ये बहुत लाभकारी हैं।
भुजंगासन की विधि
पेट के बल इस तरह लेटें कि आपका माथा जमीन को छू ले और टोड़ी छाती से लग जाए। पैरों को मोड़कर बाहर की ओर करें। टाँगें एक साथ जोड़े रखें। हाथों को कंधे के पास रखें।
अब धीरे-धीरे हाथों के सहारे सिर को ऊपर उठाते जाएँ, पर बाहों पर ज्यादा भार न पड़े। ऐसा करते हुए आप अंदर की ओर सांस लें। पेड़ स्थान (नाभि के नीचे का स्थान) जमीन के साथ लगा रहे, बाकी शरीर को ऊपर उठा लें। आँखों से 90° ऊपर देखने का प्रयास करें। ऊपर जितनी देर रुक सकें, रुकें और खास बात ध्यान दें कि ऊपर जितनी देर रुकें सांस को भी रोके रखें।
अब धीरे-धीरे नीचे वापिस लाते हुए सांस को भी धीरे-धीरे
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छोड़ते जाएँ और हाथों को पीछे मोड़ लें।
अब पुनः इस प्रक्रिया को दोहराएँ। 3 बीर लगातार यह प्रक्रिया कर लें।
लाभ :
- ❑ पेट की बीमारियों को ठीक करता है
- ❑ कमर संबंधित रोग नहीं होने देता।
- ❑ गुदों से संबंधित रोगों में बहुत लाभकारी है।
मत्स्यासन की विधि
सबसे पहले पद्मासन में बैठें। दोनों पैरों को एक-दूसरी जाँघ पर रखें।
अब कोहनियों के सहारे बाकी शरीर को धीरे-धीरे पीछे ले जाते हुए लिटा दें और हाथों से पैरों के अँगूठे पकड़कर कुछ देर इसी मुद्रा में रहें।
अब कमर को धीरे-धीरे ऊपर उठाकर गर्दन को इस तरह पीछे की ओर मोड़ें कि सिर का ऊपरी भाग जमीन को स्पर्श करे और चेहरा पीछे की ओर हो जाए।
अब इस स्थिति में सांस लेते-2 कुछ देर के लिए रोक लें।
अब आपको वापिस सामान्य स्थिति में आना है। इसके लिए सबसे पहले आपने जो पैर के अँगूठे पकड़े हैं, उन्हें छोड़ें, फिर सिर और कमर को सामान्य अवस्था में लाकर लेट जाएँ। अब कोहनियों के सहारे से वापिस पद्मासन वासी स्थिति में पहुँचें। अब टोंगों को जाँघों पर से हटाएँ। यह सब क्रियाएँ धीरे-धीरे करें।
लाभ :
- ❑ टॉन्सिल को ठीक करता है।
- ❑ फेफड़े संबंधी रोग ठीक करता है।
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साहिब बन्दशी
- □ जुकाम को ठीक करता है।
- □ मुँहासे दूर करके चेहरे पर रंगत लाता है।
वज्रासन की विधि
घुटनों के बल बैठकर पाँवों को पीछे बाहर की ओर इस तरह फैलाएँ कि अँगूठे आपस में मिले रहें। अब एड़ियों पर बैठ जाएँ। अब दोनों हथेलियों को घुटनों पर रखें। अँगुलियाँ नीचे भी जा सकती हैं। सांस प्रक्रिया सामान्य ही चलती रहे। ध्यान दें कि रीढ़ की हड्डी बिलकुल सीधी रहे और सिर भी सीधा रहे। जितनी देर इस स्थिति में बैठ सकते हैं, बैठें।
लाभ :
- □ कमर दर्द ठीक करता है।
- □ पाचन क्रिया में लाभकारी है।
सिंह मुद्रासन की विधि
वज्रासन की तरह घुटनों के बल बैठें। अंतर यह रहे कि पैरों को बाहर की ओर न फैलाकर उनके अँगूठों की दिशा अंदर की ओर ही रखें और घुटनों को खुला-2 रखें।
अब शरीर को थोड़ा झुकाकर हाथों को उलटा करके जमीन पर फैलाकर रखें ताकि हाथों की उँगलियाँ घुटने को स्पर्श करें।
अब सिर को आगे की ओर झुकाकर ठोड़ी को छाती के साथ स्पर्श कराएँ और मुँह और नाक दोनों से बाहर की ओर सांस बाहर निकालते हुए जीभ को जितना हो सके बाहर निकालें।
अब इसी तरह से आँखों को चौड़ा करते हुए सामने की ओर देखें। मात्र तीन सेंकेंड बाद जीभ धीरे-धीरे वापिस अंदर करें और नाक
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से सांस लेते हुए वापिस साधारण स्थिति में आ जाएँ। यह प्रक्रिया दो-तीन बार कर सकते हैं।
लाभ :
- ❑ टॉन्सिल ठीक करता है।
- ❑ स्वांस संबंधी रोगों में लाभकारी है।
योग मुद्रासन की विधि
मृदासन में बैठ जाएँ। अब हाथों को पीछे पीठ पर ले जाएँ और एक हाथ से दूसरे की कलाई पकड़ लें। अब सांस को बाहर निकालते हुए धीरे-धीरे नीचे की ओर झुकेँ और सिर को जमीन से लगा दें। कुछ देर इस स्थिति में रहकर सांस अंदर की ओर लेते हुए धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठें। कम-से-कम 3-4 बार यह प्रक्रिया कर लें।
लाभ :
- ❑ तनाव को दूर करता है।
- ❑ पाचन संबंधी रोगों में लाभकारी है।
पद्मासन की विधि
टॉगों को सामने की ओर फैलाकर बैठें। अब दाईं टॉग को बाईं जाँघ पर रखें और फिर बाईं टॉग को दाईं जाँघ पर रख लें। पैरों की एड़ियाँ पेट से लग जाएँ। कमर, सिर, गर्दन आदि बिलकुल सीधे रहें। हाथों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर गोद में रख लें अथवा घुटनों पर रख लें। जितनी देर इस स्थिति में रह सकें, रहें और फिर वापिस आने के लिए पहले एक टॉग को पकड़कर उतारें और फिर दूसरी को।
लाभ :
- ❑ पाचन क्रिया को ठीक करता है।
- ❑ जोड़ों के दर्द में लाभकारी है।
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धनुरासन की विधि
पेट के बल लेटें। अब घुटनों को मोड़कर टॉगें ऊपर की ओर ले जाएँ। अब सिर भी ऊपर की ओर उठाएँ। अब हाथों से दोनों टॉगों को पकड़ लें और धीरे-से खींचें, जिससे धनुष का आकार बन जाए। दृष्टि ऊपर की ओर रहे। जितनी देर रह सकें, रहने के बाद धीरे-से साधारण स्थिति में आएँ।
लाभ :
- □ मंदाग्नि को दूर करता है।
- □ कब्ज को दूर करता है।
- □ बवासीर में लाभकारी है।
- □ दिमाग़ तो ताक़त देता है।
नोट : प्रत्येक आसन को करने के बाद शवासन जरूरी है। इसके लिए तनावमुक्त होकर बाज़ुओं को ढीला छोड़कर आँखें बंद करके एक-डेढ़ मिनट के लिए लेट जाएँ और लंबी गहरी सांस लेते रहें।
ये आसन आपको कई छोटी-छोटी ही नहीं, बल्कि बड़ी-से-बड़ी बीमारियों से छुटकारा ही नहीं दिलाते, होने से भी बचाते हैं। इसलिए अपनी सुविधानुसार कुछ आसन और प्राणायाम आप नित्य करके अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर सकते हैं।
चिंता का जहर छोड़ें भरोसे की दवा खाएँ
चिंता का ज़हर छोड़ें; भरोसे
की दवा खाएँ
एक विश्वास ही आपको कई भयंकर बीमारियों से भी छुटकारा दिला सकता है। एक ओर जहाँ चिंता कई भयंकर रोगों का कारण बनती है तो दूसरी ओर भरोसा भयंकर-से-भयंकर रोगों का नाश करता है।
यह विश्वास हो कि आपके इष्ट, आपके गुरु आपके साथ हैं, कोई भी बीमारी आपका कोई नुकसान नहीं कर सकती है। आप डॉक्टरों इलाज जरूर करवाएँ, पर सदगुरु पर पक्का भरोसा हो तो कुछ भी हो सकता है। आप मुसीबतों से घबराएँ नहीं, केवल सदगुरु का ही ध्यान करते रहें, आपकी सब चिंता वो ले लेंगे और आप उस चिंता से बिलकुल ही मुक्त हो जायेंगे।
यह भरोसा बहुत बड़ी बात है, यह विश्वास बहुत लाजवाब चीज़ है। जब भी आप अपना सबकुछ सच्चे दिल से अपने इष्ट, अपने गुरु पर छोड़ते हैं, उनका ही भरोसा करते हैं तो उनको आपकी सहायता करनी पड़ जाती है।
Three stylized lotus flower symbols arranged horizontally, serving as a decorative separator.
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साहिब बन्दगी
आरती
आरति करहुँ संत सदगुरु की, सदगुरु सत्यनाम दिनकर की। काम, क्रोध मद, लोभ नसावन, मोह रहित करि सुरसरि पावन। हरहिं पाप कलिमल की, आरति करहुँ संत सदगुरु की॥ सदगुरु सत्यनाम.....
तुम पारस संगति पारस तब, कलिमल ग्रसित लौह प्राणी भव। कंचन करहिं सुधर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की॥ सदगुरु सत्यनाम.....
भुलेहुँ जो जिव संगति आवें, कर्म भर्म तेहि बाँधि न पावें। भय न रहे यम घर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की॥ सदगुरु सत्यनाम.....
योग अग्नि प्रगटहि तिनके घट, गगन चढ़े श्रुति खुले वज्रपट। दर्शन हों हरिहर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की॥ सदगुरु सत्यनाम.....
सहस्र कँवल चढ़ि त्रिकुटी आवें, शून्य शिखर चढ़ि बीन बजावें। खुले द्वार सतघर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की॥ सदगुरु सत्यनाम.....
अलख अगम का दर्शन पावें, पुरुष अनामी जाय समावें। सदगुरु देव अमर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की॥ सदगुरु सत्यनाम.....
एक आस विश्वास तुम्हारा, पड़ा द्वार मैं सब विधि हारा। जय, जय, जय गुरुवर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की॥ सदगुरु सत्यनाम.....
आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
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आरती
जय सदगुरु देवा, स्वामी जय सदगुरु देवा, सब कुछ तुम पर अर्पण करहूँ पद सेवा।
जय गुरुदेव दया निधि, दीनन हितकारी, स्वामी भक्तन हितकारी, जय जय मोह विनाशक, जय जय तिमिर विनाशक, भय भंजन हारी। साहिब जय.....
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, गुरु मूर्ति धारी, स्वामी प्रभु मूर्ति धारी, वेद पुराण बखानत, शास्त्र पुराण बखानत, गुरु महिमा भारी। साहिब जय.....
जप तप तीर्थ संयम, दान विधि दीन्हे, स्वामी दान बहुत दीन्हे, गुरु बिन ज्ञान न होवे, दाता बिन ज्ञान न होवे, कोटि यत्न कीन्हे। साहिब जय.....
माया मोह नदी जल, जीव बहे सारे, स्वामी जीव बहे सारे, नाम जहाज बिठाकर, शब्द जहाज चढ़ाकर, गुरु पल में तारे। साहिब जय.....
काम क्रोध, मद, लोभ, चोर बड़े भारी, स्वामी चोर बहुत भारी, ज्ञान खड़ग दे कर में, शब्द खड़ग देकर में, गुरु सब संहारे। साहिब जय.....
नाना पंथ जगत में निज-निज गुण गावें, स्वामी न्यारे-न्यारे यश गावें, सब का सार बताकर, सब का भेद लखा कर, गुरु मार्ग लावें। साहिब जय.....
गुरु चरणामृत निर्मल, सब पातक हारी, स्वामी सब दोषक हारी, वचन सुनत तम नासे, शब्द सुनत भ्रम नासे, सब संशय टारी। साहिब जय.....
तन, मन, धन सब अर्पण, गुरु चरण कीजै, स्वामी दाता अर्पण कीजै, सद्गुरु देव परमपद, सद्गुरु देव अचलपद, मोक्ष गती लीजै। साहिब जय.....
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साहिब बन्दशी
पुस्तक सूची
हिन्दी में
- 1. परा रहस्या
- 2. मासिक पत्रिका सत्यकेतु
- 3. पावन प्रार्थनाएं
- 4. सदगुरु चालीसा
- 5. वार्षिक डायरी
- 6. सदगुरु भक्ति
- 7. कहाँ से तू आया और कहाँ तूझे जाना रे ?
- 8. सत्संग सुधा रस
- 9. नाम अमृत सागर
- 10. अमृत वाणी
- 11. सदगुरु नाम जहाज हैं
- 12. चल हंसा सतलोक
- 13. कोटि नाम संसार में तिनते मुक्ति न होय।
- 14. मूल नाम गुप्त है, जाने बिरला कोय ॥
- 15. गुरु सुमित्रे सो पार
- 16. तीन लोक से न्यारा
- 17. सेहत के लिए जरूरी
- 18. सहजे सहज पाइये
- 19. रोगों से छुटकारा
- 20. सदगुरु महिमा
- 21. भक्ति के चोर
- 22. अनुरागसागर वाणी
- 23. भक्ति सागर
- 24. हरि सेवा युग चार है, गुर सेवा पल एक
- 25. सत्य नाम के सुमरते उबरे पतित अनेक
- 26. काग पलट हंसा कर दीना
- 27. कस्तूरी कुण्डल बसे मृग खोजे बन माहि
- 28. गुरु पारस गुरु परस है
- 29. गुरु अमृत की खान
- 30. शीश दिये जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान
- 31. मूल सुरति
- 32. भृंग मता होय जिहि पास, सो गुरु सत्य धर्मदासा ॥
- 33. मैं कहता हूँ ऑश्चिन देखी
- 34. गुरु संजीवन नाम बतावे
- 35. नाम बिना नर भटक मरे
- 36. रोगों की पहचान
- 37. यह संसार काल का देश
- 38. न्यारी भक्ति
- 39. साहिब तेरी साहिबी सब घट रही समाय
- 40. जाप मरे अजपा मरे अनहद भी मर जाए
- 41. आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
- 42. सुरति समानी नाम में
आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
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सत्यपुरुष का पाँचवा पुत्र निरंजन है जो तीन लोक का राजा, चौरासी लाख योनियों व अनहद का रचयिता है
- 1. मैं सिरजों में मारऊँ, मैं जारौं में खाऊँ। जल थल नभ महँ रमि रहा, मोर निरंजन नाऊँ ॥
- 2. सात शून्य सातहि कमल, सात सुरति स्थान। इक्कीस ब्रह्माण्ड लग, काल निरंजन ज्ञान ॥
- 3. एक पाट धरती चले, एक चले असमानी। काल निरंजन पीसन लगे, सवा लाख की धानी ॥
- 4. गुप्त भयो हैं संग सबके, मन निरंजन जानिये ॥
- 5. अनहद की धुन भँवरगुफा में, अति घनघोर मचाया है। बाजे बजे अनेक भांति के, सुनि के मन ललचाया है ॥
.....
यह सब काल जाल को फँदा, मन कल्पित ठहराया है ॥
- 6. तहाँ अनहद की घोर शब्द झनकार है। लग रहे सिद्ध साधु न पावत पार है ॥
- 7. मन ही निराकार निरंजन जानिए ॥
- 8. ज्योति निरंजन लग काल पसारा। मन माया भई किया सृष्टि विस्तारा ॥
- 9. बिना जाने जो नर भक्ति करई। सो नहीं भवसागर से तरई ॥
- 10. मन ही सरूपी देव निरंजन तोहि रहा भरमाई। हे हंसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई ॥
—कबीर साहिब
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साहिब बन्दशी
| योगमत | संतमत |
|---|---|
| 1. योगमत में काया का नाम है। | |
| 2. योग मत चाचरी, भूचरी, अगोचरी, मुद्राओं के ईर्द-गिर्द घूमता है, जो शरीर में हैं। | |
| 3. यह नाम लिखने-पढ़ने में आता है। इनसे काल-पुरुष ने पाँच तत्व पैदा किये और शरीरों की रचना की। | |
| 4. योगमत में अनहद धुनों को ही परमात्मा माना जाता है। |
5. योगमत करनी अथवा कमाई का मार्ग है। 6. योगमत में सुरति शब्द का अभ्यास किया जाता है। 7. योगमत में काल का नाम लिया जाता है। यह नाम शरीर को दिया जाता है। 8. योगमत में गुरु की भूमिका न के बराबर होती है। 9. योगमत सीमाबद्ध है, जिसमें साधक दसवें द्वार तक ही जाता है। | 1. संतमत में विदेह नाम है। 2. संतमत में पाँच मुद्राओं से आगे शीश से सवा हाथ ऊपर ध्यान रखने को कहा है। 3. यह अकह नाम है जो लिखने-पढ़ने में नहीं आता है और पाँच तत्वों से बाहर है।
4. संतमत में आत्मा किसी शब्द की मोहताज नहीं, क्योंकि आत्मा अपने आप में परिपूर्ण है। 5. यह सहज मार्ग है, गुरु कृपा का मार्ग है और भुंग-मता है। 6. संतमत सुरति को चेतन करने का मार्ग है। 7. संतमत जिंदा नाम प्रदान करता है जोकि शरीर को छोड़ आत्मा को दिया जाता है। 8. संतमत में भक्ति का सार ही संत सदगुरु है। 9. संतमत असीम है जो कि ग्यारहवें द्वार की बात करता है, जो सुरति में है।
आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
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| योगमत | संतमत |
|---|---|
| 10. योगमत निराकार निरंजन की ही सत्ता को ही सर्वश्रेष्ठ मानता है। | 10. संतमत में निराकार सत्ता से आगे चौथे लोक अर्थात् अमर लोक की बात की जाती है। |
| 11. योगमत में कमाई का फल खत्म होने पर वापिस माता के पेट में आना पड़ता है। | 11. संतमत में जीव सदा के लिए आवागमन से मुक्त हो जाता है और अपने निजधाम सत्य लोक को चला जाता है। |
| 12. योगमत वैशाखियों के सहारे चलता है जो कि शास्त्रों की साक्षी देकर अपने आप को स्थापित करता है। | 12. संतमत में संत सदगुरु अपने अनुभव से बोलता है जो किसी का मोहताज नहीं होता है। |
| 13. इसमें रिद्धि-सिद्धि और दिव्य शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, मगर आत्मा का ज्ञान नहीं होता है। | 13. संतमत में जीव को आत्मज्ञान होने से आध्यात्मिक शक्ति याँ मिलती हैं। |
| 14. योगमत मीन और पपील मार्ग है। | 14. जबकि संतमत विहंगम मार्ग है। |
- 1. पाँच शब्द औ पाँचों मुद्रा, सोई निश्चय माना। आगे पूरण पुरुष पुरातन, उसकी खबर न जाना ॥
- 2. नौ नाथ चौरासी सिद्ध लों, पाँच शब्द में अटके। मुद्रा साथ रहे घट भीतर, फिर औंठे मुँह लटके ॥
- 3. काया नाम सबहिं गुण गावैं, विदेह नाम कोई बिरला पावै। विदेह नाम पावेगा सोई, जिसका सदगुरु साँचा होई ॥
- 4. जब तक गुरु मिले नहीं साँचा, तब तक गुरु करो दस पाँचा ॥
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साहिब बन्दगी
दसवें द्वार से आगे—संत वाणी
दशम द्वार से जीव जब जाई। स्वर्ग लोक में वासा पाई ॥ 11वें द्वार से जीव जब जाता। परम पुरुष के लोक समाता ॥
दसवें द्वार से न्यारा द्वारा। ताका भेद कहूँ मैं सारा ॥
नौ द्वारे संसार सब, दसवें योगी साध। एकादश खिड़की बनी, जानत संत सुजान ॥
—कबीर साहिब
.... आठ अटाकी अटारी मजारा, देखा पुरुष न्यारा। न निराकार आकार न ज्योति, नहीं वहाँ वेद विचारा। ओंकार कर्ता नहीं कोई, नहीं वहाँ काल पसारा। वह साहिब सब संत पुकारा, और पाखण्ड है सारा। सदगुरु चीन्ह दीन्ह यह मारग, नानक नजर निहारा ॥
—गुरु नानक देव जी
पलटू कहै साँच कै मानो। और बात झूठ कै जानो ॥ जहवाँ धरती नाहि अकासा। चाँद सूरज नाहि परगासा ॥ जहवाँ ब्रह्मा विष्णु न जाहीं। दस अवतार न तहाँ समाहीं ॥ आदि जोति ना बसै निरंजन। जहवाँ शून्य शब्द नहि गंजन ॥ निरंकार ना उहाँ अकारा। अक्षर शब्द नहि विस्तारा ॥ जहवाँ जोगी जाए न पावै। महादेव ना तारी लावै ॥ जहवाँ हृद अनहद नहि जावै। बेहद वहाँ रहनी ना पावै ॥ जहवाँ नाहि अगनि परगासा। पाँच तत्व ना चलता स्वाँसा ॥
—पलटू साहिब
आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
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संसार से अलग!
हमारा पंथ भक्ति जगत में वैज्ञानिक तरीके से क्रांति लाया है। सबसे पहले पाँच बातें पूरे संसार को अलग बता रहे हैं।
1. यह संसार काल का देश है। यहाँ तीन लोक में काल-निरंजन का राज्य है। इसी को वेदों ने निराकार, निरंकार, निरंजन, पार-ब्रह्म आदि नामों से पुकारा है। गण, गंधर्व, सिद्ध, साधक, ऋषि-मुनि, पीर-पैगंबर आदि यहाँ तक गये।
2. अमरलोक जाने के लिए (मुक्ति के लिए) कमाई कुछ नहीं करनी है। यह सारा कार्य सदगुरु कृपा से होता है।
3. नाम 52 अक्षर में, लिखने, पढ़ने अथवा सुनने वाला नहीं। नाम एक कला है, जो पूर्ण सदगुरु के पास है, जिससे आत्मा को जागृत किया जाता है और आत्मा मन से अलग हो जाती है। इसे नाम देना कहते हैं। नाम शरीर को नहीं आत्मा को दिया जाता है।
4. इस निरंजन के आगे महाशून्य है, जहाँ कोई वस्तु नहीं है। इनके नाम अचिन्त लोक, सोहंग लोक, मूल सुरति लोक, अंकुर लोक, इच्छा लोक, वाणी लोक और सहज लोक हैं। यह समस्त लोक महाशून्य में हैं। सहज अंश तक जो भी सृष्टि है, इसका परम नाश है।
सहज पुरुष तक जेतक भाखा। सो रचना परलै ते राखा ॥
आगे अक्षय लोक है भाई। आदि पुरुष तहाँ आप रहाई ॥
5. इसके ऊपर अमरधाम, परम-पुरुष का लोक है। यहाँ कभी भी प्रलय नहीं है।
जहवाँ से हँसा आया, अमर है वो लोकवा ॥
तहाँ नहीं परले की छाया, नहीं तहाँ कछु मोह और माया ॥
ज्ञान ध्यान को तहाँ न लेखा, पाप पुण्य तहँवा नहीं देखा ॥
पवन न पानी पुरुष न नारी, हद अनहद तहाँ नाहिं विचारी ॥
यहीं से साहिब आत्माओं के कल्याण के लिए आते हैं।
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साहिब बन्दगी
नाम अथवा भक्ति को
कबीर साहिब जी ने तीन भागों में बाँटा
सगुण भक्ति, निर्गुण भक्ति, परा भक्ति सगुण भक्ति करे संसारा। निर्गुण योगेश्वर अनुसार॥ तुम दोनों के पार बताया। मेरो चित्त एको नहीं आया॥ आपने इन दोनों के पार बताया। दादू दयाल जी ने कहा-
कोई सगुण में रीझ रहा, कोई निर्गुण ठहराय। अटपट चाल कबीर की, मौसे कही न जाय॥
जाप मेरे अजपा मेरे, अनहद भी मर जाय। सुरति समानी शब्द में, उसको काल न खाय॥
अंदर धुनें हैं। कुछ इसे सुरति शब्द अभ्यास भी कह रहे हैं और उनमें खो जाते हैं। कुछ धुनों को ही परमात्मा कह रहे हैं। पर इससे तृतीयतीत की अवस्था से पार नहीं जा सकते हैं। सबका अपना वजूद है। धुनें खत्म हो जाती हैं। फिर यह कौन-सा शब्द हुआ! यानी धुनात्मक शब्द भी नहीं है, वर्णनात्मक शब्द भी नहीं है। साहिब कह रहे हैं- 'सो तो शब्द विदेह॥' आवाज रहित धुन (Sound less sound)
है वो, क्योंकि - 'दो बिन होय न अधर अवाजा॥' आवाज दो के बिना नहीं होती और जहाँ आवाज है, वहाँ माया है।
हद टप्पे सो औलिया, बे-हद टप्पे सो पीर। हद-बेहद दोनों टप्पे, तिसका नाम कबीर॥
आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
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अमर लोक का विदेह नाम
काया नाम सबहिं गुण गवै, विदेह नाम कोई बिरला पावै॥ विदेह नाम पावेगा सोई, जिसका सद्गुरु साँचा होई॥
पाँच तीन यह साज पसारा, न्यारा शब्द विदेही हो। पाँच कहो तो छटवें हम हैं, आठ कहो नौ आई हो॥
पाँच तीन अधीन काया, न्यार शब्द विदेह हो। सुरति माहिं विदेह दरशै, गुरु मता निज एह हो॥
छिन इक ध्यान विदेह समाई॥ ताकी महिमा बरनिन न जाई॥ सार नाम सद्गुरु से पावे। नाम डोर गहि लोक सिधावे॥ सार शब्द विदेह स्वरूपा। निःअक्षर वह रूप अनुपा॥ तत्त्व प्रकृति भाव सब देहा। सार शब्द निःतत्त्व विदेहा॥
बावन अक्षर में संसारा। निःअक्षर सो लोक पसारा॥ सोई नाम है अक्षर बासा। काया ते बाहर परकासा॥
शब्द शब्द सब कोई कहे, वह तो शब्द विदेह। जिभ्या पर आवे नहीं, निरख परख के लेह॥
—साहिब कबीर जी
पिण्ड ब्रह्माण्ड और वेद कितेबै, पाँच तत्त्व के पारा। सतलोक यहाँ पुरुष विदेही, वह साहिब करतारा॥
—दादू दयाल
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साहिब बन्दगी
संतों की बात समझें
संतों की दुनिया सबसे निराली रही है। संतों ने उस परम-सत्य की बात समझाने के लिए संसार को संसार ही की भाषा में समझाया है। कहीं-कहीं संतों ने राम , हरि आदि शब्दों का इस्तेमाल भी किया है, पर 'राम' से उनका मतलब 'साहिब' से ही रहा है। इसलिए भ्रमित न होना। चार राम की बात बताते हुए साहिब ने इसे स्पष्ट भी किया है।
साकार राम दशरथ का बेटा। निराकार राम घट घट में लेटा।
बिंदू राम जिन जगत पसारा। निरालंब राम सबही ते न्यारा ॥
यानी जिस राम को सारी दुनिया पूज रही है, कहीं संतों को भी उसी का उपासक बता रही है, वो तो साकार राम की कोटि में है। फिर कहीं-कहीं संतों को निराकार राम का उपासक बताया जा रहा है, पर वो दूसरी निराकार राम की कोटि में है। तीसरा राम वीर्य है, जिससे सृष्टि का पसार है। पर संतों का राम चौथा है, जो निरालंब है, वो जन्म-मरण में अवतार धारण करके नहीं आता। उसे ही सब संतों ने 'साहिब' पुकारा है।
कुछ सगुण-निर्गुण भक्ति के जो शब्द संतों की वाणी में मिलते हैं, वो इसलिए कि उन्होंने कबीर साहिब से नाम पाने से पहले निरंजन की भक्ति की थी।
फिर कहीं-कहीं संतों ने योग आदि के रहस्यों की बात भी की है, अंदर में होने वाली धुनों की बात भी की है, 10वें द्वार की बात भी की है। तो लोग समझ लेते हैं कि संतों ने योग का महत्व बताया है। नहीं, संतों ने यह सब योग आदि की पहुँच बताने के लिए कहा है। यह सब बताते हुए उन्होंने 'सार शब्द' का महत्व बताया है, जो अन्दर में होने वाला शब्द नहीं है, जो निःशब्द शब्द कहा जाता है। इसलिए संतों की वाणी में आंतरिक धुनें और आंतरिक खेल के वर्णन से भी भ्रमित नहीं होना है। बस, इतनी-सी बात समझ लेना कि संतों ने इस तीन लोक को काल का देश बताते हुए एक अमर लोक की बात की है, जिसकी राह आत्मा के भीतर से ही है, इसलिए बाहर भटकने की जरूरत नहीं है और उस रास्ते की कुंजी सार शब्द (नाम) है, जो केवल संतों के पास है।