भारतकोश
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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

युनवैसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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रस से गर्भोत्पादक द्रव्यों की उत्पत्ति और वृद्धि होती है; गर्भस्थ प्राणों का समुचित संबंध होता है और वृत्ति-पुष्ट्यादि भाव पैदा होते हैं।

सत्त्व भी संबंध विधायक अर्थात् औपपादक है। यह स्पर्शनेन्द्रिय के द्वारा (क्योंकि स्पर्शनेन्द्रिय में सत्त्व का संचार रहता है,) जीव और शरीर में संबंध प्रस्थापित करता है। जब (मरण के समय) यह स्पर्शनेन्द्रिय से बाहर जाने को उद्यत होता है तब प्राणी का स्वभाव बदल जाता है; अभिरूचि का विपर्यास होता है; इंद्रिय उपतप्त होते हैं; बलक्षय होता है और रोग, अत्यधिक कुश कर देते हैं। जब यह शरीर को छोड़ देता है तब प्राण भी शरीर को त्याग देते हैं। इंद्रियों को अपने २ विषयों के ग्रहण में प्रवृत्त करनेवाले को ही 'मन' कहते हैं। वह तीन प्रकार का है शुद्ध, राजस् और तामस्। इस जन्म में इन गुणों में से जो गुण अधिक रहता है उसी का अगले जन्म में संबंध रहता है यदि इस जन्म में मन शुद्ध हो, तो उसे गत जन्मों का स्मरण होता है। यह स्मृतिजन्य ज्ञान, आत्मा में रहता है और उसीसे प्राप्त होता है। मन का उसके साथ अनुबंध रहता ही है। ऐसी अवस्था में यदि मन शुद्ध हो तो उसकी वृत्तियाँ, आत्मा के स्मार्त ज्ञान में परिणत होती हैं और इसी हेतु से पुरुष को 'जातिस्मर' कहा

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आधुनिक-दर्शन

जाता है। सत्त्व के कारण भक्ति, शील, शौच, द्वेष, स्मृति, मोह, त्याग, मात्सर्य, शौर्य, भय, क्रोध, तंद्रा, उत्साह, तैक्षण्य, मार्दव, गार्भीर्य, अनवस्थितत्व (अस्थिरता) आदि भाव तथा वे सब सत्त्वज विकार-जिनका सत्त्व के प्रकारों के विवेचन में ( देखो परिशिष्ट ) उपदेश किया जायगा पैदा होते हैं।

सारांश इस तरह उक्त गर्भोत्पादक भावों के समुदाय से गर्भ, पैदा होता है। जिस तरह लकड़ी, मिट्टी, पत्थर आदि नाना द्रव्य समुदाय से मकान बनता है अथवा पहिये आदि अनेक पुरजों के संयोग से रथ तैयार होता है उसी तरह हम लोगों का कथन है कि माता, पिता, आत्मा, सात्त्व, व रस इनके समुदाय से गर्भ बनता है और सत्त्व, संबंध विधायक हैं।

पहिले यह कहा गया है कि सत्त्व, स्पर्शेन्द्रिय के द्वारा जीव और शरीर इनके बीच में संबंध प्रस्थापित करता है अतः दुबारा यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि गर्भोत्पादक भावों का संधान किस तरह होता है। अतः अब यह देखना आवश्यक है कि समुदायप्रभव गर्भ, मनुष्याकर कैसे बनता है और मनुष्य, मनुष्य को क्यों पैदा करता है।

प्राणियों की चार प्रकार की योनि है; जरायुज, अंडज, स्वदेज और उद्भिज। इनमेंसे प्रत्येक योनि के असंख्य

पुनर्वसु आश्रय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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प्रकार हैं। क्योंकि उनमें पैदा होने वाले प्राणियों की रचना असंख्य प्रकार की है। तहाँ जरागुज और अंढज प्राणियों को पैदा करने के समय उक्त गर्भोत्पादक भाव, रचना विशेष के अनुसार भिन्न २ य्रेनिओं में भिन्न-भिन्न रूप-धारण करते हैं। जिस तरह सोना, चाँदी, तांबा आदि धातुओं का तत्परस भिन्न-भिन्न आकार के मोम के सांचे में ढालने पर भिन्न-भिन्न रूप धारण करता है; यदि उसे मनुष्याकृति सांचे में ढाला जाय तो वह मनुष्याकृति बनता है उसी तरह गर्भ, समुदायात्मक होते हुए भी मनुष्य योनि में मनुष्य रूप धारण करता है। यही कारण है कि मनुष्य, मनुष्य से पैदा होता है। इस पर यदि यह कहो कि अंधे से अंधे की और मूर्ख से मूर्ख की पैदाइश क्यों नहीं होती ? तो इसका उत्तर यह है कि बीज व फल में अंगों के जो सूक्ष्म भाग रहते हैं उनमें से एक या अनेक भाग जब विकृत होते हैं, तब गर्भ के भी वे अंग विकृत पैदा होते हैं, अन्यथा नहीं होते। फलतः पितृ सृष्टि पैदा होना और न होना दोनों बातें सम्भवनीय हैं। प्राणीमात्र के इन्द्रिय, आत्मा से ( आत्म-निबद्ध कर्म से ) पैदा होते हैं। उनका होना या न होना देवाधीन है। अतः जड़ आदि से पितृसृष्टि ही सन्तान पैदा हो यह नियम नहीं है।

यह कहना भी उचित नहीं है कि इंद्रियों के रहते आत्मा, ज्ञाता है और इंद्रियों के बिना अज्ञ। क्योंकि आत्मा, कभी

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आयुर्वेद-दर्शन

भी सत्त्व रहित नहीं रहता बल्कि सत्त्व जिस प्रकार का हो उस प्रकार का उसे ज्ञान रहता है।

यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि 'कर्ता का कार्य-विषयक ज्ञान, इन्द्रियाभाव के कारण प्रवृत्त नहीं होता। क्योंकि जो किया जिन इन्द्रियों के द्वारा होती है वह उन इन्द्रियों के बिना नहीं हो सकती। कुम्भकार, घट बनाना जानता है पर उसका यह कार्य ज्ञान, मिट्टी के अभाव के कारण घट नहीं बना सकता।'

भारद्वाज, अब आप इस 'अध्यात्म' को सुनो। क्योंकि आत्म-विषयक ज्ञान का बल बहुत बड़ा है। इन्द्रियों को उनके विषयों से परावृत्त करके और चंचल मन को भी उस के विषयों से विमुख करके आत्मविद् पुरुष अध्यात्म में प्रविष्ट होता है अर्थात् अपने ज्ञान में ही स्थिर हो जाता है तब वह सर्वत्र 'अंकुठित ज्ञान' होकर बिना इन्द्रियों के ही समस्त भावों को जानता है। इसके अतिरिक्त भारद्वाज, इस निर्णय को भी सुनलो कि 'ज्ञानेन्द्रिय और वाणी के व्यापारों से निवृत्त होकर मनुष्य जब सोता है तब उसे स्वप्न में भी सुख दुःखादि विषयों का अनुभव होता ही है; अर्थात् यह ज्ञान, इन्द्रियों के बिना होता है और इस पर से भी यह जाना जा सकता है कि आत्मा 'अज्ञ' नहीं है। आत्मनिष्ठ उक्त ज्ञान (ज्ञानुत्प) के बिना अकेला इन्द्रियजन्यज्ञान

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जरा भी प्रवृत्त नहीं हो सकता। और यह तो सिद्धान्त ही है कि कोई भी भाव, ( षड्धातुवादानुसार इन्द्रियजन्यज्ञान और इन्द्रिय अथवा सत्त्व और गुण पंचक ) अकेला नहीं रह सकता और अहेतुक भी नहीं रहता। तस्मात् आत्मा, ज्ञाता भी है, प्रकृति भी है, द्रष्टा भी है और कारण भी है। भारद्वाज, यह सब तय हो चुका है अब संदेह को छोड़ दो।

यह वक्तव्य अनेक दृष्टि से मननीय है। इसमें आत्मा व सत्त्व पर अत्यधिक विचार किया गया है। पुनर्वसु आत्रेय को विश्वास था कि अनात्मवादी, विशेषतः भारद्वाज, आत्मा का स्वतःसिद्ध अस्तित्व और सत्त्व का औपपादुकत्व स्वीकार कर लें तो विवाद का एक बहुत बड़ा अंश हल हो जायगा। यज्ञः पुरुषीय परिषद् में उन्होंने अध्यात्म चिन्तन का उपदेश इसी हेतु से किया।

पुनर्वसु आत्रेय का अध्यात्म चिन्तन विषयक उपदेश जितना अर्थ पूर्ण है उतना ही अर्थ पूर्ण पक्षरागत्याग विषयक उपदेश भी है। यह तो स्पष्ट ही है कि यज्ञः पुरुषीय परिषद् में आत्मा, सत्त्व, और शरीर इस त्रयी में, से एक २ के नितान्त समर्थक सम्प्रदाय भी उपस्थित थे। इसके अतिरिक्त उनमें आत्मा के ज्ञातृत्व व कर्तृत्व के विषय में, लोकपक्ष के विषय में और गुणों के विषय में भी दल बन्दियों थीं। इन सब दल बन्दियों का अन्त करने के हेतु से पुनर्वसु आत्रेय

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आयुर्वेद-दर्शन

ने अपना त्रिभागात्मक सृष्टि विज्ञान अलग ही प्रस्थापित किया था। और उसी को स्वीकार करने के हेतु से उन्होंने पक्षराग-त्याग का उपदेश भी किया। अतः अब उस पर विचार करें।

त्रिभागात्मक सिद्धान्त

पुनर्वसु आत्रेय के त्रिभागात्मक सिद्धान्त का स्वरूप निम्न लिखित है। जैसा कि:—

सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत् त्रिदंडवत् ।

लोकस्तिष्ठति संयोगात्तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

स पुमान् चेतनं तच्च तच्चाधिकरणं स्मृतम् ।

वेदस्यास्य तदर्थं हि वेदोऽयं संप्रकाशितः ॥ (च.सू.अ.१)

अर्थात् सत्त्व, आत्मा व शरीर ये तीनों त्रिपाही के सहस्र हैं। इनके संयोग पर सचेतन सृष्टि स्थित है और इसी संयोग पर सब कुछ (अचेतन सृष्टि) अवलंबित है। इस संयोग को ही 'पुरुष,' (समुदायात्मक) 'चेतन' (सचेतन द्रव्य) और 'अधिकरण' (आयु) कहते हैं। इसको जानने (व सुरक्षित रखने) के लिये ही यह 'आयुर्वेद' प्रकाशित हुआ है।

इस सिद्धान्त का बाह्य स्वरूप यद्यपि त्रिभागात्मक है तथापि इसके तात्त्विक स्वरूप में एक मात्र आत्मा ही मूल-

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भूत एवं स्वतःसिद्ध पदार्थ है। यह अपनी त्रिपाद अमृतत्व अर्थात 'पर' अवस्था में निर्वाकार है और एकांश प्रजापति अवस्था में इससे सत्त्व तथा शरीर संज्ञक 'भावों' का उद्भव होता है। तात्विक भाषा में सत्त्व और शरीर शब्द क्रमशः ज्ञान व कर्म के वाचक हैं। ज्ञातृत्व और कर्तृत्व दोनों ही आत्मनिष्ठ भिन्न २ 'वृत्तियाँ' (इनको 'चित्तवृत्ति' और 'प्राणवृत्ति' भी कहते हैं) हैं। आत्मा, ज्ञाता व कर्ता होने के कारण सृष्ट्युत्पत्ति के समय उक्त वृत्तियाँ ही सत्त्व और शरीर में परिणत होती हैं।

तहां ज्ञातृत्व, सर्वे प्रथम तीन प्रकारों में परिणत होता है। उन प्रकारों को शुद्ध, रजस् और तमस् कहते हैं। "तत्र शुद्धमदोषमाख्यातं कल्याणांशत्वात्, राजसं सदोषमाख्यातं रोपांशत्वात्, तामसमपि सदोषमाख्यातं मोहांशत्वात्" (च. शा. अ. ४) अर्थात विशुद्ध व कल्याणांशयुक्त ज्ञान को शुद्ध, किंचित् अशुद्ध व रोषयुक्त ज्ञान को राजस् और अशुद्ध मोहांशयुक्त ज्ञान को तामस् कहते हैं।

कर्तृत्व, सर्वे प्रथम त्रिधातुओं में परिणत होता है। यद्यपि षड्धातुवादानुसार चेतनाधातु का कर्तृत्व, भूतगुणों में अर्थात अप्रतीघातकत्व, चक्षुत्व, षण्णत्व, द्रवत्व आर खरत्व में परिणत होता है तथापि इस विषय में पुनर्वसु आत्रेय, प्रजापतिवाद् के ही अनुयायी मालूम होते हैं। और यह भी

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आयुर्वेद-दर्शन

ज्ञात होता है कि पुनर्वसु आव्रेय, इन भूतगुणों का ‘ त्रिवृत्त-करण ’ त्रिधातुओं में करते हैं ।

यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि इस सिद्धांत में आत्मा को और सत्त्व तथा शरीर के अर्थात् ज्ञातृत्व और कर्तृत्व के उक्त प्रकारों ( त्रिगुण व त्रिधातुओं ) को ‘ प्राण ’ शब्द से भी संबोधित किया जाता है। जैसा कि “अभिवायुः सोमः, सत्त्वं रजस्तमः, ( पंचैन्द्रियाणि ) भूतात्मेति प्राणाः” । ( सु. शा. अ. ४ ) इस में कहा गया है। शरीर के प्रत्येक मर्म में ये प्राण ही ( सोममाश्रुततेजांसि, रजस्सत्त्वतमांसि च । मर्मसु प्रायशः पुंसां भूतात्मा चावलिष्ठते ॥ सु. शा. अ. ६ ) रहते हैं। इनका अन्यत्र ‘ प्राणा यत्र प्रतिष्ठिताः, ’ ‘ प्राणांश्चाप्यवलंबते ’ इत्यादि स्थलों में उल्लेख है। और यह भी कहा गया है कि इन प्राणों के संयोग को ही अनुबंध और आयु कहते हैं। जैसा कि ‘ अनुबंधस्तु खल्वायुः, तस्य लक्षणं प्राणैः सह संयोगः ’ । ( च. सू. अ. ११ ) तात्पर्य पुनर्वसु आव्रेय के त्रिभागात्मक सिद्धांत में आत्मा, सत्त्व और शरीर शब्दों से उक्त प्राण ही अभिप्रेत हैं। तहाँ सत्त्व शब्द से त्रिगुण और शरीर शब्द से त्रिधातु ।

त्रिभागात्मक सिद्धांत के अनुसार आत्मनिष्ठ ज्ञान की व कर्म की वृत्तियाँ, भिन्न २ होने के कारण इनमें अथवा

१ इन्द्रियों का उल्लेख केवल महत्व सूचक है ।

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त्रिगुण और त्रिधातुओं में जन्यजनक संबंध नहीं माना जाता। अनात्मवादी, ज्ञान अथवा सत्त्व को धातुपंचक का अथवा त्रिधातुओं का परिणाम कहते थे। इसमें कोई विशेष आश्चर्य की बात नहीं है। पर आश्चर्य इस बात का है कि आत्मवादियों में भी एक संप्रदाय ऐसा था जो कि त्रिधातुओं से मन की उत्पत्ति मानता था। जैसा कि श्वेताश्वतरोपनिषद् के “ अग्निर्वत्राभिमध्यते वायुर्वत्राभिधुज्यते। सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः”। ( श्वे. ४. अ. २ मं. ६ ) इस मंत्र पर से सिद्ध होता है। अर्थात् यह संप्रदाय ज्ञान की वृत्तियों को जन्य और कर्म की वृत्तियों को जनक मानता था। ठीक इसके विपरीत अर्थात् कर्म को जन्य और ज्ञान को जनक मानने वाले संप्रदाय भी थे। इनके मत से कर्तृत्व, चेतना से भिन्न नहीं था। अतः ये सृष्ट्युत्पत्ति का आरंभ ज्ञान से अर्थात् त्रिगुणात्मिका बुद्धि से करते थे और त्रिगुणात्मक अहंकार से आकाशादिकों की उत्पत्ति का विधान करते थे। किंतु पुनर्वसु आत्रेय को षड्धातुवाद का और प्रजापतिवाद का ही मत मान्य था। अतः वे त्रिगुण व त्रिधातुओं में जन्य-जनक संबंध स्वीकार नहीं करते थे।

१ इन संप्रदायों ने अथवा उनके उत्तराधिकारियों ने वायु को रजोबहुल, पित्त को सत्वगुणोत्तर और क्षेप्मा को तमोगुणभय कहने की प्रथा झूठ की जो अबतक भी विद्यमान है। किंतु पुनर्वसु आत्रेय को यह सम्मत नहीं था।

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आयुर्वेद-दर्शन

प्रायः इसी हेतु से उन्होंने एक तरफ सत्त्व को केवल औषपादुर्क सिद्ध किया तो दूसरी तरफ ( वातकलाकलीय-परिषद् में ) त्रिधातुओंका जगदुत्पादकत्व स्वीकार करते हुए उनके सत्त्वजनकत्व का ‘ सर्व एव भवंतः सन्मग्नाहु-रण्यत्रैकालिकवचनात् ’ इस तरह निषेध भी किया । सत्त्व और शरीर का पृथक् २ उल्लेख करना और धातुप्रकृति व महाप्रकृति के भिन्न २ उत्पादक कारणों का विवेचन करना भी यही अर्थ रखता है कि पुनर्वसु आत्रेय, सत्त्व और शरीर में जन्म जनक संबंध स्वीकार नहीं करते थे ।

त्रिभागात्मक सिद्धांतानुसार त्रिगुण व त्रिधातुओं में यद्यपि जन्मजनक संबंध स्वीकार नहीं किया जाता तथापि उनमें ‘ अन्योऽन्यानुविधायित्व ’ स्वीकार किया ही जाता है । क्योंकि त्रिगुणों के असंख्य प्रकारों पर विचार करते हुए स्पष्ट शब्दों में यह कहा गया है कि “ तेषां तु त्रयाणामपि सत्त्वात्ताम् एकैकस्य च भेदाग्रमपरिसंख्येयम् तरतमयोगात्, शरीरयोनिविशेषेभ्यश्च, अन्योऽन्यानुविधानत्वाच्च शरीरमपि सत्त्वमनुविधीयते सत्त्वं च शरीरम् ” । ( च. शा. अ. ४ ) शरीर, सत्त्व का अनुविधान करता है और सत्त्व, भी शरीर का अनुविधान करता है । सत्त्व और शरीर के


१ सत्त्व को संबंध विधायक कहना पर्याय से त्रिगुणों का शब्द-स्पर्शादि तन्मात्राओं के द्वारा महाभूतजनकत्व अस्वीकार करना ही है ।

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इस ' अन्योऽन्यानुविधायित्व ( सायको फिजिकल् प्यारेल-लिउम Psycho Physical Parallelism के कारण भिन्न २ योनि विशेष, अवयव रचना अथवा इंद्रिय रचना विशेष तथा वय विशेष के अनुसार सत्व के प्रकारों में भी अनेक विशेष पैदा होते हैं। सिवाय शुद्धबहुल, शुद्धबहुलतर और शुद्धबहुलतम इस तरह तरतम भाव से भी सत्व के असंख्य प्रकार होते हैं। इसी तरह सत्व के अनुविधान से शरीर में भी विशेषताएँ पैदा होती हैं। इसी संबंध को लेकर यह भी कहा गया है कि ' निर्विकारः परस्त्वात्मा सर्वभूतानां निर्वि-शेषः सत्वशरीरयोस्तु विशेषात् विशेषोपलब्धिः '। ( च. शा. अ. ४ ) अर्थात् प्राणियों में जो विभिन्नता प्रतीत होती है वह सत्व और शरीर की विविधताओं तथा अन्योऽन्यानु-विधान के कारण होती है। किंतु आत्मा, अपने पर स्वरूप के कारण निर्विकार और एकसाँ रहता है। षड्धातुवादिओं ने यह भी कहा है कि निर्विकार और पर आत्मा, नित्य होकर चैतन्य में कारण है और वह सत्वगुण, भूतगुण तथा इंद्रियों के द्वारा सब व्यापारों को देखता है अर्थात् द्रष्टा है। ( च. सू. अ. १ ) त्रिभागात्मक सिद्धांत के उक्त संबंध को निम्न लिखित सारिणी पर से भी जाना जा सकता है।

जैसा कि:-

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आत्मा

ज्ञानत्वकर्तृत्व
शुद्धरजस्
तमस्सत्त्व
कर्मपुरुष अथवा आयु

पुनर्वसु आत्रेय ने जिन भावों की सम्पद् विपद् को पुरुषरोगोत्पादक कहा है वे उनकी तात्विक भाषा में त्रिगुण और त्रिधातु ही हैं। इनके अन्योऽन्यानुविधान से पांचभौतिक द्रव्यों की, उनसे सूर्यादि लोको की, उनसे ऋतुओं की, ऋतुओं सरस की, रस से ओषधि व अन्न ( गुणप्रसादाख्य सचेतन प्रसादधातु ) की, अन्न से रेत ( द्रव्यप्रसादाख्यधातु ) की और रेत से पुरुष की क्रमशः उत्पत्ति होती है।

इसके बाद कार्षापति वामक ने यह सवाल किया कि 'भगवन्, सपञ्चिमित्तज पुरुष की और विपञ्चिमित्तज रोगों की 'अभिद्युद्धि' में क्या कारण है?' तब पुनर्वसु आत्रेय ने यह उत्तर दिया कि 'हितकारक आहार का सेवन ही पुरुष की अभिद्युद्धि में और अहितकारक आहार का सेवन ही रोगों की अभिद्युद्धि में कारण है। और आहार की सम्पदा विपदा अथवा हिताहितत्व मुख्यतः आहारगत रसों व गुणों

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पर अवलंबित है'। यह प्रश्नोत्तर 'तंत्रभाषा' में हुआ है क्योंकि आयुर्वेद, केवल 'मंत्र' अर्थात् विचार करने के लिये ही प्रस्तुत नहीं हुआ बल्कि 'तंत्र' अर्थात् कुछ करने के लिये प्रवृत्त हुआ है। इसके द्वारा आयु को जाना भी जाता है आर आयु की रक्षा भी की जाती है। रक्षाविधान में अर्थात् तंत्र में सन्निष्ठ कारण ही अधिक महत्व पूर्ण होता है। पुरुषोत्पत्ति में अन्न, सन्निष्ठ भी है। सारांश तंत्र दृष्ट्या आहार को अभिवर्धक कहना उचित है। प्रसंगानुसार माता, पिता, आत्मा, सात्त्व्य, रस, सत्व, इनके समुदाय को भी पुरुषोत्पादक कहा ही गया है किन्तु त्रिभागात्मक सिद्धांत की दृष्टि से इनकी सबकी तह में आत्मा, त्रिगुण और त्रिधातु ही विद्यमान हैं।

मुश्रुत संहिता के गर्भोवक्रांति प्रकरण में प्राणों का उल्लेख किया जाना यह सूचित करता है कि धान्वंतर संप्रदायी

१ द्रव्य प्रधानतावादी, आहार को 'रसगुणाश्रयीभूत द्रव्य' कहते थे और धर्मप्रधानतावादी, आहारद्रव्य को तदगुणमूलक मानते थे। (देखो पृष्ठ ४५ व ४६) पुनर्वसु आत्रेय का कथन था कि यद्यपि मंत्र दृष्ट्या द्रव्यगत गुण, द्रव्य के मूलघटक और उत्पादक हैं तथापि तंत्र में तंत्र की भाषा का व्यवहार करना ही उचित है। धातु पोषण का विषय तंत्र से धानष्ट संबंध रखता है और तंत्र में आहार द्रव्य को अथवा द्रव्यमात्र को प्रधान तथा रसगुणाश्रय माना जाता है।

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आयुर्वेद-दर्शन

महर्षि सुश्रुत भी त्रिभागात्मक सिद्धांत को स्वीकार करते थे। और वे इन प्राणों को ही वंशांकुर (सु. शा. अ. ३) की प्रकृति मानते थे। तदनुसार 'आत्मप्रकृति विकार संमू-च्छितं गर्भ इत्युच्यते'। (सु. शा. अ. ५) इसका अर्थ इस तरह करना ही उचित है कि 'वंशांकुर में समस्त अंग-प्रत्यंगों को पैदा करनेवाले जितने भी बीज-रूप सचेतन अचेतन सूक्ष्म द्रव्य रहते हैं वे सब उक्त 'प्राण' संज्ञक प्रकृति के ही विकार हैं। (अर्थात् यहाँ प्रकृति शब्द सांख्यों के अथवा आत्मवादिओं के प्रकृति का वाचक नहीं है) वंशांकुर अपनी प्राण संज्ञक प्रकृति के विकारों से मूच्छित होकर क्रमशः वंशांकुरगुच्छ, Morula कल्ल, Blastula संता-निका, Blastus कला, Mambans धातु, Tissues स्रोत आदि अवस्थाओं में परिणत होता हुआ 'गर्भ' संज्ञा को प्राप्त होता है। धान्वंतर आगे यह भी कहते हैं कि गर्भ, जब हस्तपादादि स्थूल अंगोपांगों से सम्पन्न होता है तब उसे 'शरीर' कहते हैं। शरीर के प्रत्येक मर्म में इन प्राणों का विशेष रूप से वास्तव्य रहता है। फलतः मर्मों में आघात या रोग होने पर वेदनातिशय अथवा मरण हो जाता है। सारंश धान्वंतरों क मत से भी त्रिभागात्मक सिद्धान्तानुसार प्राणों का अथवा आत्मा, सत्त्व और शरीर का संयोग ही पुरुष और आयु है।

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हमारी सम्मति में भी त्रिभागात्मक सिद्धान्त ही आयुर्वेद का निर्णीत सृष्टि विज्ञान है और इसमें पुनर्वसु आत्रेय ने प्रजापतिवाद् और षड्धातुवाद दोनों का समुचित समन्वय किया है।

परिशिष्ट

इस परिशिष्ट में वातपित्त-लेष्माओं के तथा सत्व के प्रकारों पर विचार करना है।

आयुर्वेद का तंत्र, ( निदान व चिकित्सा ) आरम्भ से ही वात-पित्त-लेष्माओं के आधार पर प्रतिष्ठित है। किन्तु जैसे २ इनकी व्यापकता का और इनके भिन्न २ कार्यों का ज्ञान बढ़ता गया वैसे २ इनके प्रकारों की भी कल्पना होने लगी। कालानुक्रम के अनुसार देखा जाय तो प्रथम वायु के प्रकारों का आविष्कार हुआ और बाद में पित्त-लेष्माओं के प्रकारों का। चरक संहिता में सिर्फ पित्त-लेष्माओं के भिन्न २ कार्यों का उल्लेख है किन्तु सुश्रुत संहिता में उन कार्यों के आधार पर नामतः भिन्न २ प्रकारों का विवेचन किया गया है। इन प्रकारों की सृष्टि जिस समय में हुई उसके पहले ही हेतुसंक्षेप और औषधि-गुण-धर्म-विवेचन पास २ में निबद्ध हो चुका था। इस का परिणाम यह हुआ कि निदान में और औषधि-गुण-धर्म-विवेचन में इन प्रकारों का सन्तोषजनक उल्लेख न हो सका। यदि भाविष्य में इस वटि को पूर्ण करना है तो उस पर अधिक विचार करना भी आवश्यक है।

आयुर्वेद दृष्टया शरीर, वातपित्त-लेष्माओं का बना हुआ है। शरीर में जितने पदार्थ हैं उनमें कुछ वातसंज्ञक, कुछ पित्तसंज्ञक और कुछ लेष्मसंज्ञक हैं। अर्थात् शरीरगत पदार्थों के संक्षेप में तीन प्रधान वर्ग हैं और उनको वात, पित्त और लेष्मा कहा जाता है। आगे इन प्रधान वर्गों का ही कर्म विशेष के आधार पर पांच २

परिशिष्ट

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प्रकारों में वर्गीकरण किया गया और उनका नाम भी तत्कर्म-बोधक ही रक्खा गया। जैसा कि:—

वायु के:—प्राण, उदान, समान, व्यान और अपान.

पित्त के:—पाचक, रंजक, साधक, आलोचक और प्राजक.

क्षेप्मा के:—क्रेदक, अवलंबक, बोधक, तर्पक और क्षेपक.

वास्तव में देखा जाय तो ये प्रकार भी वर्ग ही हैं। अस्तु, अब इन पर अलग २ विचार करें।

वायु के प्रकार

पहिले यह कहा गया है कि कुछ सम्प्रदाय 'वायु द्रव्य' को प्रधान मानते थे तो कुछ 'वायु धर्म' को। तदनुसार दोनों ही सम्प्रदाय अपने २ वायु को प्राणादि प्रकारों में विभाजित करते थे। फलतः आयुर्वेद में दोनों प्रकार का विभक्तीकरण उपलब्ध होता है। यह बात वैदिक वाङ्मय में भी दृग्गोचर होती है। वेदों में प्राण, अपान व उदानसंशक्त प्रकार वायु द्रव्य और वायु धर्म दोनों के उपलब्ध होते हैं। अतः इनका पृथक् २ विवेचन करना ही उचित है।

वायु द्रव्य के प्रकार:—सुश्रुत संहिता में वायु द्रव्य का दो जगह विवेचन है। जैसा कि:—

प्रस्पंदनोद्बहनपूर्णणविवेकधारणलक्षणो वायुः पंचधा प्रविभक्तः शरीरं धारयति। (सु. सू. अ० १५)

इसमें वायु के पांच प्रधान लक्षणों का उल्लेख करके यह सूचित किया है कि वायु, इन लक्षणों के अनुसार पांच प्रकारों में विभाजित

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आयुर्वेद-दर्शन

होकर शरीर को धारण करता है। इस कथन के अनुसार प्राण का प्रसंदन, उदान का उदहरन, न्यान का पूर्ण, समान का विवेक और अपान का धारण मुख्य लक्षण हैं।

अत्र प्राणादिको कर् अलग २ विवेचन करते हैं। जैसा कि:—

वायुयों वक्त्र संचारी स प्राणो नाम देहधृक् ।

सोऽत्र प्रवेशयत्तंतः प्राणांश्चाप्यवलंबते ॥

प्रायशः कुरुते दुष्टो दिकाश्चासादिकान् गदान् ।

अर्थात् जो वायु नाक व मुख से शरीर में प्रविष्ट होता है उस को प्राण कहते हैं। यह देह को धारण करता है, अत्र को भीतर प्रविष्ट करता है और प्राणों का अवलंबन करता है। दूषित होने पर यह दिकाश्वास आदि रोगों को पैदा करता है।

बाहर की हवा नाक व मुख के द्वारा मुख्यतः प्राणवहलोटों (श्वास मार्ग, Trachae अपस्तंभ, Bronchi लघ्वपस्तंभ, Bronchioli वातवह लोत, Air Passages वायु कोष, Air Sacs और ऊपमुखीया भमनी Pulmonary Artery) में प्रविष्ट होता है। इस हवा में प्राण द्रव्य रहता है। यह प्राणद्रव्य, रक्त के द्वारा प्रथम हृदय में और वहां से समस्त शरीर में संचार करता है। यह शरीर धातुओं का पोषक ही नहीं बल्कि जीवन की मुख्य वस्तु होने के कारण इसको देहधारक कहना यथार्थ ही है। अत्र को निगलने के समय बाहर की हवा को अन्नमार्ग में लेने की आवश्यकता रहती है। इनका कथन है कि हृदयस्थ प्राणों का अवलंबन यह प्राणद्रव्य ही करता है।

परिशिष्ट

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इस प्राणद्रव्य का प्रधान स्थान श्वासमार्ग से हृदय तक है। अतः इसका प्रधान कार्य 'प्रस्फंदन' (फुफ्फुस व हृदय दोनों का निमेषोन्मेष) माना गया है और तदनुसार इसकी विकृति में हिकका-श्वास आदि रोगों का सम्भव बतलाया है।

उदानो नाम यस्तूर्ध्वमुपैति पवनोत्तमः ॥

तेन भाषितगीतादि विश्लेषोऽभिप्रवर्तते ।

ऊर्ध्वजन्तुगतान् रोगान् करोति च विशेषतः ॥

अर्थात् जो उत्तम पवन, ऊपर के द्वारों से बाहर निकलता है उसको उदान कहते हैं। इससे भाषा, संगीत आदि पैदा होते हैं। इसकी विकृति से विशेषतः ऊर्ध्वजन्तुगत रोग होते हैं।

इसका प्रधान कार्य 'उद्दहन' है। तदनुसार उत्च्छ्वासन भी इसका एक कार्य होगा। किन्तु यहाँ मुख्यतः भाषा संगीत का उल्लेख किया है। इस विषय में औपनिषदिक ऋषियों का कथन है कि 'प्राण एव उत्पाणेन उत्सिद्धति वाग्नीः' (छां. ब्रा. ३-३) प्राण ही जब उत्पाण के साथ ऊपर उठता है तब वाणी और संगीत की प्रवृत्ति होती है। इस पर से यह ज्ञात होता है कि इनको उद्दहन में प्राण व उत्पाण संज्ञक दो द्रव्यों के अस्तित्व का ज्ञान था। किन्तु वे मुख्यतः उद्गत प्राण को ही वाक्प्रवर्तक मानते थे।

आमसकाशयचरः समानो वनिहसंगतः ।

सोऽन्नं पचति तज्जांश्च विकारान् विविनाकि हि ॥

गुल्माभिसंगातीसारप्रश्चृतीन् कुरुते गदान् ।

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आयुर्वेद-दर्शन

अर्थात् आमाशय व पकाशय में संचार करने वाले ( प्राण ) वायु को समान कहते हैं। यह अग्नि मंडलों ( पिप्पलादक पिंडों ) में पिप्पों को पैदा करके अन्न का पाचन करता है और अन्नरसगत सार व किट्टों को अलग र करता है। इसकी विकृति से गुल्म, अग्निमांघ, अतिसार आदि रोग पैदा होते हैं। विवेक, इसका प्रधान कार्य है। अन्न के रासायनिक पृथकरण को विवेक कहते हैं।

कृत्स्नदेहचरो व्यानो रससंवहनोद्यतः ॥ स्वेदास्तृक्खावणो वापि पंचधा चेष्यत्यपि । कुद्वक्ष कुशते रोगान् प्रायशः सर्वदेहगान् ॥

अर्थात् समस्त शरीर में संचार करने वाले ( प्राण ) वायु को व्यान कहते हैं। वाहिनीयों में यह रस का संवहन करता है। ‘पूर्ण’ इसका प्रधान कार्य है। इस पूर्ण व्यापार (सम्भवतः दवाब) के कारण ही समस्त शरीर में रस संवहन होता है। सरल भाषा में वाहिनीयों को रस से भरा पूरा रखना इसका कार्य है। सामान्यतः स्रोतों के द्वारा स्वेदों ( अन्यान्य तरलों ) को सुत करना और विकृत अवस्था में वाहिनीयों को विशीर्ण करके रक्तसुति करना भी इसका कार्य है। और यह ही मांसखायुओं में तथा धातुप्रसाद में रहकर आकुंचन प्ररसणादि अथवा ग्रहणविसर्जनादि चेषाएँ करता है। किन्तु यह ध्यानमें रखना चाहिये कि केवल ‘पूर्ण’ का उल्लेख करने वाले, ‘चिद्धा’ का उल्लेख नहीं करते। जब यह कृपित होता है तब सार्वदैहिक व्याधियों को पैदा करता है।

इस कथन के अनुसार व्यान के तीन प्रकार होते हैं; वा हिनीगत रस संवहन कर्ता, स्रोतोगत स्वेदसुति कर्ता और धातुप्रसाद व स्नायु गत