भारतकोश
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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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इसमें अन्य पित्तस्थानों का अर्थात् अन्य पाचक पित्तों का अस्तित्व स्वीकार करते हुए भी याकृत पाचक पित्त को सर्वे श्रेष्ठ और सर्वोपकारक कहा गया है। और यही कारण है कि आयुर्वेद में इस पाचक पित्त का कुछ अधिक विवेचन उपलब्ध होता है। यहाँ 'ओष्ण्यं तैश्चण्यं लाघवमनतिस्नेहो वर्णश्च शुक्लारुणवर्णो गंधश्च विलो रसो च कटु काम्लो पित्तस्यात्मरूपाणि, एवं विधत्वाच्च कर्मणः स्नालक्षण्यभिदमस्य भवति' ( च. सू. अ० २० ) और 'पित्तं तीक्ष्णं द्रवं पूति नीरुं पीतं तथैव च। उष्णं कटुरसं चैव विदग्धं चाम्बुकेव च ( सु. सू. अ. २१ ) इन विधानों को ध्यान में रखना चाहिये। इनका विश्लेषण व संशोधन करना होगा।

अब यह जाना गया है कि महास्रोत की श्रेष्ठधारा कला में उदकोत्पादक व पित्तोत्पादक सहजों पिंड हैं और वे अपरा ( जरायु ) से ( जैसा कि कांच से दीप ) आन्च्छादित भी हैं। अतः इनको ही 'सोममंडल' और 'सूर्य मंडल' कहना उचित है।

स्थान विभागानुसार पाचक पित्त के पांच प्रकार होते हैं और उनके द्वारा भिन्न २ अंशों का पाचन होता है। जैसाकि:—

(१) मुखगत पाचकपित्तः—यह 'लुलुकाधःस्थपिंडों' से पैदा होता है। इसमें 'लालासत्व' नामक अभिपूत रहते हैं। इससे पिष्ट षट्पिंडों के कण बारिक होते हैं। 'पष्टिक' अन्नसे 'पिष्ट सत्व' और पिष्टसत्व से 'पैडीशर्करा' का बनना इसीसे आरंभ होता है।

(२) आमाशयस्थ पाचकपित्तः—इसका वास्तविक नाम 'अस्लपित्त' है। यह अमाशयस्थ पिंडों से पैदा होता है। इसमें 'पाचक सत्व' नामक अभिपूत रहते हैं। किंतु इसमें पाचन के समय लाला

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आयुर्वेदिक दर्शन

और ऋदक दोनों मिश्र रहते हैं। और इस मिश्रण को ही 'जाठरस'। Gastric juice कहते हैं। जाठरस, अम्लकल्प और जंतुह्र है। पाचकसत्व में 'पौष्टिक' द्रव्यों के पाचन का धर्म है। इससे इक्षुशर्करा का फलशर्करा में या द्राक्षाशर्करा में परिवर्तन होता है। जाठरस से कुछ अंश में वसा का प्रयुक्करण होता है, दूध का दही बनता है और पिष्ट का पिष्टसत्व बनकर उससे पौष्टीशर्करा बनती है। किंतु इसका प्रधान कार्य पौष्टिक द्रव्यों का पाचन ही है।

(३) याकृत पाचकपित्तः—यह पूर्वोक्त प्रकार से याकृत जीवाणुओं से पैदा होता है। यह पीला, हल्का पीला हल्का लाल, या हल्का हरा रहता है। इसका गंध, कस्तुरी मायल और रस, मधुर तिक्त व अनुक्षार होता है। इसमें सैघवलवण, शारीर मद्य, वसा, ऋदक कफ, रंजक पित्त और कुछ खनिजक्षार मिश्र रहते हैं। वसा के पाचन में यह क्लोम पाचकपित्त का सहायक है। इससे पौष्टिक अन्न का पिंडीभवन (पिंडितम्) होता है। यह कुछ अंश में सारक भी है। इसमें विशेषता यह है कि यह अन्न के साथ पकाशय में से होता हुआ 'अन्नरसवहा' शिराओं में और वहां से वापिस यकृत में चला जाता है। मल के साथ कुछ बाहर भी निकलता है।

(४) क्लोम पाचकपित्तः—यह पूर्वोक्त तरीके से क्लोम में पैदा होता है। इसमें चार प्रकार के अभिपूत (अष्ट हेतु) रहते हैं। पोषकपाचक, पिष्टपाचक, वसापाचक और दधुत्पादक। अम्लकल्प पौष्टिक द्रव्य के पाचन में जिस तरह पाचकसत्व अधिक सफल होता है उस तरह क्षारकल्प पोषकद्रव्य के पाचन में 'पोषकपाचक' अधिक सफल होता है। अत्रत्य पिष्टपाचक से पिष्टपदार्थों का पौष्टी-

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शर्करा बहुत शीघ्र बनती है। अत्रत्य वसापाचक से वसा का क्षीरी-भवन होकर वसाम्ल और वसामधु बनते हैं। दधुपादक से दूध का दही बनता है। क्लौम पाचकपित्त, क्षारकल्प और अन्नकोथ कारक है।

(५) श्रुद्रांत्रस्थ पाचकपित्तः—यह श्रुद्रांत्रगत सोममंडलमध्यस्थ सूर्यमंडलों से पैदा होता है। इसमें परिवर्तक संज्ञक अभिषूत रहते हैं। इनके द्वारा इक्षुशर्करा का मधुशर्करामें व फलशर्करा में परिवर्तन होता है। यह पित्त, मांसल द्रव्य के पाचन में क्लौम पित्त का सहायक है। केवल क्लौम पित्त में अथवा केवल इस पित्त में पोषक द्रव्यों के पाचन का उत्तना सामर्थ्य नहीं है जितना कि दोनों के मिश्रण में है। इस पित्त से वसा की अपेक्षा पोषक द्रव्य के पाचन का धर्म अधिक है। उक्त मिश्रण इतना तेज है कि खाली पेट में यह आंतों में सूजन पैदा करता है।

श्रुद्रांत्र में अभिषूतों के द्वारा पिष्ट का दुर्धाम्ल तथा उससे ‘अंगारद्विमित्र,’ Corbon-di-oxide ‘उज्जन’ और ‘नवनीताम्ल’ बनता है। पैंछी भुस्सी का पृथक्करण होता है। अंगारद्विमित्र के पैदा होने पर पेट में अनेक वायवीय द्रव्य [ कठु प्रपाकजन्य वायु ] पैदा होते हैं। इनकी वानस्पत्य अन्न से अधिक पैदाहृष होती है। वसा का क्षीरीभवन होता है और उससे वसाम्ल बनते हैं। पोषक द्रव्य से मांसघटक द्रव्य तथा पोषकाम्ल बनते हैं। इन अभिषूतों के द्वारा जब पोषक द्रव्यों का पाचन होता रहता है तब अत्यंत दुर्गीध युक्त वायु पैदा होते हैं। श्रुद्रांत्रस्थ अन्न का ‘कोथ’ भी पाचन में सहायक है और पाचन के समय में जो क्षारकल्प विषं पैदा होते हैं उनका प्रत्यनीक है।

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आयुर्वेद सूक्ष्म

रंजक पित्तः—इसके विषय में यह कहा गया है कि 'यत्तु यकृत- प्लीहोः पित्तं तस्मिन् रंजकोऽग्निरिति संज्ञा, स रसस्य रागकृद्भुक्तः' । (सु. सू. अ. २१) अर्थात् रंजकपित्त, यकृत और प्लीहा में रहता है। यह रस को रंगता है। इस रंजन के विषय में यह कहा गया है कि 'आहारस्य यस्तेजोभूतः सारः परमसूक्ष्मः स 'रस' इत्युच्यते। तस्य च द्रव्यं स्थानम्। स खल्वाप्यो रसो यकृतप्लीहानो प्राप्य राग- मुपैति। रंजिता स्तेजसात्वापः शरीरस्थेन देहिनाम् । अन्वापन्नाः प्रसन्नेन रक्तमित्यभिधीयते' । (सु. सू. अ. १३) इत्यादि।

उक्त विधान में यद्यपि रंजकपित्त के द्वारा रसरंजन ही बत- लाया है तथापि मारीचि के कथन के अनुसार शरीर के भिन्न २ वर्ण भी इसी के कारण हैं।

यकृत में याकृत जीवाणुओं के बीच में से 'पित्त केशिका'ओं (Bile Capillaries) की केशिकाओं शाखा प्रशाखाएँ फैली हुई हैं। उक्त केशिकाएँ इतनी सूक्ष्म हैं कि उनमें एक रक्त कण का भी प्रवेश होना असंभव है। अतः इनमें सिर्फ आययरस (रक्तवारी) रहता है। याकृत जीवाणु, इस आययरस से अपेक्षित अंश को लेकर उससे याकृत पित्त, पैचिक स्नान और रंजक पित्त तैयार करते हैं।

शुद्ध रंजक पित्त के दो प्रकार हैं; (१) रक्तरंजक पित्त और (२) दयावरंजक पित्त। दोनों में भिन्न वायु [प्राण द्रव्य] रहता है पर पहिले की अपेक्षा दूसरे में अधिक रहता है। रक्तरंजक पित्त (Billi Rubin) से शरीर में पीला, सुनहरा, नारंगी, और लाल रंग रहते हैं। दयावरंजक पित्त (Billi Verdin) से नीला व हरा रंग रहता

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है। मनुष्य के पित्त में श्वाव की अपेक्षा रक्तरंजक अधिक रहता है। किंतु स्त्री में इनके मिश्र प्रकार ही पाये जाते हैं। जैसाकिः—

लोहित रंजक पित्तः—इसमें लोह रहने के कारण इसको 'लोहित' कहा है। इसके दो प्रकार उपलब्ध हैं; (१) 'समित्र' और (२) 'अस्मित्र' अथवा 'अमित्र'। पहिला प्रकार धमनी गत रक्त में रहता है। दूसरा प्रकार शिरागत रक्त में अथवा जब रक्त को मित्र वायु प्राप्त नहीं होता तब समस्त रक्त में रहता है। मित्रवायु को शोषित करने का इसमें धर्म है। एक रक्ती लोहितरंजकपित्त, एक मांसा मित्रवायु को शोषित करता है। इस अवस्था में रक्त का रंग बिलकुल लाल रहता है। किंतु इसमें मित्रवायु की मात्रा जितनी कम रहती है उतनी ही उसमें श्वावता रहती है। आयुर्वेद में रक्त के 'जीवरक्त' और 'श्वावरक्त' दो प्रकार माने जाते हैं। मित्रवायु का कुछ अंश शिरागत अथवा श्वावरक्त में भी रहता है। कुछ विकृतियों में लोहित रंजक पित्त के साथ मित्रवायु का इतना घनिष्ठ संबंध होता है कि वह आसानी से अलग नहीं होता।

यहां यह ध्यान में रखना चाहिये कि शुष्करक्त से (अर्थात् ही लोहितरंजक पित्त से) जो लोहरहित रंजकपित्त अलग किया जाता है वह यकृतस्थ 'रक्तरंजकपित्त' के बिलकुल सदृश है। दोनों की पैदाइश एक ही जगह से होती है और रासायनिक परीक्षा द्वारा दोनों में सरीखे द्रव्य पाये जाते हैं। लोहितरंजकपित्त के विघटन या न्यूनता से (आयुर्वेदानुसार प्रकोप से) पांडु, कामला, हर्लमक इ. रोग पैदा होते हैं। यकृत में लोहित रंजक पित्त रहता है और उससे उक्त रक्त-रंजक और श्वाव रंजक दोनों का प्रथकरण होता है। शेष लोह याकृत जीवाणुओं में संचित किया जाता है।

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आधुनिक-दर्शन

लौहित रंजक पित्त, यकृत में जिस तरह पृथक् उपलब्ध होता है उस तरह प्लीहा में पृथक् उपलब्ध नहीं होता।

लोह रहित रंजक पित्त, भी सृष्टि में पाया जाता है। मनुष्य के मूत्र में यह रहता है।

शुद्रांत्रस्थ रंजक पित्तः—यह शुद्रांत्रस्थ क्षार तथा याकृत पित्तस्थ रक्तरंजकपित्त के संयोग से पैदा होता है। यह पुरीष में तथा रक्त के द्वारा मूत्र में पाया जाता है। तदनुसार इनको पुरीषरंजक, और मूत्र-रंजक भी कह सकते हैं।

वसारंजक पित्तः—यह वसा में और अंडे की जर्दी में रहता है।

त्वकरंजक पित्तः—बाह्य त्वक में सबके नीचे 'ताम्रा' त्वक है। उसमें रंगीन कण हैं, (इन कणों को 'तेजो धातु' भी कहा गया है; जैसाकि च. शा. अ. ८ और सु. शा. अ. २ में) इन कणों की वर्ण भिन्नता के कारण ही भिन्न २ मनुष्यों का भिन्न २ वर्ण रहता है।

१ प्लीहा के अंतर्भाग (अंतः प्लीहा) का रंग काला, लाल या भूरा है। इन वर्णों के जीवाणुओं से ही यह बना हुआ है। रंगीन जीवाणुओं के आसपास कुछ स्वयंच्छ कण, रक्त कण, और बड़े लाल कण रहते हैं। प्लीहा में रक्तस्थ श्वेत कण बनते हैं। प्लीहाभिन्वद्वि का व रक्तजन्य पांडुता का संबंध है। कुछ प्राणियों की प्लीहा में रक्त कण भी बनते हैं। रक्त कणों की जीवितयात्रा समाप्त होने पर वे कायकल्प के लिये प्लीहा में आते हैं। यहाँ उनकी अनेक विर्यायमाण अवस्थाएँ उपलब्ध होती हैं। आमाचार को रक्त की सहायता करने के लिये प्लीहा में रक्तसंचय होता है। प्लीहा में मस्तुयुक्त ऋणों का प्रथक्करण होता है। प्लीहा, अंतःस्त्री पिंड है। शरीर में इसके सदृश कार्य करने वाले कुछ और भी पिंड हैं।

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नेत्र रंजकपित्तः—यह लोहयुक्त है और नेत्र के 'कालक' में रहता है। इस जाति का रंजक नीग्रों जाति की त्वचा में भी रहता है। शरीर के किसी २ ( संधानक ) घातु में, अपरा में और नाडियों में भी पाया जाता है।

केशरंजक पित्तः—बालों में अनेक प्रकार के रंग रहते हैं। इन रंगों के कारण किसी के बाल काले तो किसी के भूरे रहते हैं। इसके अभाव में बाल सफेद हो जाते हैं।

साधक पित्तः—इसके विषय में यह कहा गया है कि—

यत् पित्तं हृदयस्थितं तस्मिन् साधकोऽभिरिति संज्ञा; सोऽभिप्राथितमनोरथसाधनकृदुक्तः ॥ (सु. सू. अ. २१)

जो पित्त हृदय में रहता है उसको साधक अग्नि कहते हैं अथवा उसमें स्थित अग्नि को साधक कहते हैं। वह मन के अपेक्षित विषयों का साधक है।

हृदय के विषय में विशेषतः दृढ़त घातुप्रसाद के विषय में दो तरह से विचार किया जाता था; एक करणवृत्तिरूपवायु की दृष्टि से और दूसरा आत्मस्थान की दृष्टि से। जब करणवृत्तिरूपवायु की दृष्टि से विचार किया जाता था तब हृदयस्थित घातुप्रसाद को शीर्षस्थित प्राण का संचार क्षेत्र कहा जाता अर्थात दृढ़त घातुप्रसाद, एक 'वायवीयद्रव्य' माना जाता। किंतु जब आत्मस्थान की दृष्टि से विचार किया जाता तब इसको 'पित्त' शब्द से संबोधित किया जाता। उक्त विधान इस दृष्टि से ही किया गया है।

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आयुर्वेद-दर्शन

क्योंकि प्रायः सभी आर्य वैज्ञानिक हृदय धातुप्रसाद में लिंगदेहधारी जीवात्मा का अस्तित्व स्वीकार करते हैं। उपनिषदों में यह कहा गया है कि “हृदय कमल के भीतर सूक्ष्मतर आकाश में अपने अन्न (तन्त्र धातुप्रसाद ) के सहारे ‘जीवात्मा’ स्थित है। हृदय कमल से एक तो एक ( प्रत्यक्ष में अभी एक का ज्ञान हुआ है ) सूक्ष्म ज्ञान वाहिनियों निकलती हैं जिनके कि सहस्रों प्रश्नखाएँ होती हैं। हूकमलस्थ लिंग देहधारी आत्मा, इन नाडियों द्वारा बुद्धि, मन, इन्द्रिय इनके विषयों की जानकारी प्राप्त करता है। “मैं हूँ” इसमें जो ‘अहंभाव’ अथवा व्यक्तित्व है वह जीवात्मा का परिचय है। योगी, इस जीवात्मा को ‘उदान’ वायु के द्वारा ‘सुषुम्ना’ नाडी के रास्ते से ऊपर मूर्द्धा में मैं ले जाते हैं और वहाँ (शिव रहता है) जीव शिवात्मैक्य का अनुभव करते हैं। योगी, इस जीवात्मा में लीन होकर जो चाहता है वही प्राप्त करता है।” (छांदोग्य, बृहदारण्य, तैत्तिरीय, मुंड और कंड से संग्रहित) और आयुर्वेद में भी यह कहा गया है कि:—

“षडंगमंगं विज्ञानभिद्रियाण्यर्थपंचकम् । आत्मा च सगुणश्वेतश्विन्तयं च हृदि संश्रितम् ॥ प्रतिष्ठार्थं हि भावानामेषां हृदयमिष्यते । गोपानसीनामागारकर्णिकेवार्थाचित्तैः । तस्योपघातान्मूच्छार्थं भेदान्मरणमूच्छति । तत्परस्यौजसः स्थानं तत्र चैतन्यसंप्रहः ॥ हृदयं महदर्थक्ष्म तस्मादुक्तं चिकित्सकैः ।

अर्थात् हृदय, षडंग शरीर का केंद्र है, उसमें ही अर्थ ज्ञान और विज्ञान होता है। सगुण आत्मा और मन हृदय में ही रहते हैं। उक्त

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भावों के प्रतिष्ठार्थ ही हृदय है। हृदय के आवात से मूर्च्छा और भेद से मरण होता है। वह परभोज का स्थान है और उसमें चैतन्य का संग्रह है”।

सारांश यहाँ हृदय स्थित धातुप्रसाद को साधक पित्त शब्द से संबोधित किया गया है और सम्भवतः आत्मा को अग्नि शब्द से। आत्मा को अग्नि शब्द से संबोधित करना तत्कालीन प्रथा के अनुरूप ही है। सिवाय यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि उक्त साधकपित्त कल विवेचन उन संप्रदायों के द्वारा किया गया है जो ‘वायु द्रव्य’ का प्राणादि प्रकारों में वर्गीकरण करते थे। ये जिस तरह द्रवत धातुप्रसाद को पित्त कहते हैं उस तरह नेत्रगत धातुप्रसाद को भी पित्त कहते हैं।

आलोचक पित्तः—इसके विषय में यह कहा है किः—

यत् दृष्ट्वा पित्तं तस्मिन् आलोचकोऽग्निरिति

संज्ञा, स रूपग्रहणेऽधिकृतः॥ (सु. सू. अ. २१)

अर्थात् जो पित्त दृष्टि में रहता है उसको आलोचक अग्नि कहते हैं। वह रूप ग्रहण करता है।

दृष्टि के विषय में यह कहा गया है किः—

नेत्रायामग्निभागं तु कृष्णमंडलमुच्यते ।

कृष्णात् सप्तमभिच्छंति दृष्टि दृष्टिविशारदाः ॥

पक्षमवर्त्मश्वेतकृष्णदृष्टीनां मंडलानि तु ।

अनुपूर्वं तु ते मध्याश्वत्वारोऽत्या यथोत्तरम् ॥

(सु. सू. अ. १)

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आयुर्वेद-दर्शन

मसूरदलमात्रों तु पंचभूतप्रसादजाम् । खद्योतविस्फुल्लिगामां सिद्धां तेजोभिरन्यैः ॥ आवृतां पटलेनाक्षणोर्बोहान विवराकृतिम् । क्षीतसात्स्यां नृणां दृष्टिमाहुर्नयनचित्ताकाः ॥

( सु. उ. अ. ७ )

नेत्र में बाह्यपटल के पीछे जो ' कृष्ण मंडल ' दिखाई देता है उसके पीछे रंगीन धातुओं का बना हुआ विवर युक्त ' दृष्टि मंडल ' है । शारीर शास्त्र दृष्ट्या दृष्टिमंडल गत विवर को ' दृष्टि ' कहते हैं । ' दृष्टि ' शब्द का यदि इतना ही अर्थ स्वीकार किया जाय तो इस दृष्टि में अथवा विवर में जो ' तेजोजल ' भरा हुआ है उसको ' आलोचक ' पित्त कहना होगा । यह दृष्टि में बाह्यपटल से भीतर तृतीयपटल ( अक्षिकाच Lens ) तक भरा हुआ है । अतएव यह कहा भी है कि ' सिद्धां तेजोभिरन्यैः ' और ' तेजोजलाश्रितं बाह्यम् ' इ० । यह तेजोजल, रक्त से परीजने वाला एक तरल है । इन्द्रिय धर्म शास्त्र की दृष्टि से यह तेजोजल ' वक्त्रीकरण सहित्यों ' में से एक है । इसके द्वारा प्रकाश किरणों का ' वक्त्रीभवन ' होता है ।

किंतु ' रूप ग्रहण ' की दृष्टि से विचार किया जाय तो यहाँ ' दृष्टि ' शब्द का अर्थ अधिक व्यापक करना होगा । रूप ग्रहण अथवा आलोचन शब्द, यद्यपि सामान्यतः उन सब व्यापारों के वाचक हैं जिनसे कि बाह्य दृष्य का प्रतिबिंब, चतुर्थपटल के 'लिंग' भाग पर पाडा जाता है तथापि उसका विशेष अर्थ ' रूप ज्ञान ' है और वह अभिप्रेत भी मादूम होता है । ऋषियों को यह भली भांति मादूम था कि रूप ज्ञान में ' लिंग ' भाग ही प्रधान कारण है और लिंग

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नाश से रूप ज्ञान कतई नष्ट हो जाता है। अतः इस पित्त विवेचन में दृष्टि शब्द की व्याप्ति चतुर्थपटलस्थित धातुप्रसाद तक बढ़ाना आवश्यक है।

दृष्टि संज्ञक विवर का और चतुर्थपटल का संबंध इस तरह भी है कि दृष्टिमंडल का जो हिस्सा दृष्टि के भीतर खुला हुआ है उसके पिछले भाग में एक रंगीन अणु अवयवों की तह है। यह तह चतुर्थ पटल के रंगीन स्तर का आगे बढ़ा हुआ हिस्सा ही है।

दृष्टिविवर के पीछे ‘तृतीय पटल’ या ‘अशिकाच’ है। यह ‘भेद’ का ( भेदस्तृतीयं पटलम् ) बना हुआ, पारदर्शक व बाह्यगोल है। इसके पीछे अक्षिलेष्म है जो कि पारदर्शिका कला से ढंका हुआ है। इस अक्षिलेष्म के ही पीछे चतुर्थपटल है। इस चतुर्थपटल में ‘लिंग’ नामक एक भाग है। इसका व्यास दूई अंगुल और रंग ईश्वरीय है। इसके मध्य में एक दबा हुआ अंग है; उसको ‘लिंग नाभि’ कहते हैं। लिंग भाग के और उसके आसपास के नाडीजाल को देखते हुए यह कहना पड़ता है कि यह मस्तिष्क का परिवर्धित रूप है। लिंग भाग में शंक्वाकृति अणुअवयव हैं। प्रकाश से इनमें हलचल पैदा होती है। इसके पास रंगीन अणुअवयवों की तह है।

किसी भी ‘लक्ष्य’ से परावर्तित होने वाले प्रकाशकिरणों को क्रमशः कृष्ण मंडल, दृष्टि, तेजोजल, अशिकाच और अक्षिलेष्म इनमें से पार होकर लिंग भाग पर पड़ना जरूरी है तब कहीं रूप ग्रहण होता है। प्रकाश किरण, जब नेत्र में प्रविष्ट होते हैं तब उनका कृष्ण मंडल, तेजोजल, अशिकाच और अक्षिलेष्म, इनकी बाह्य गोलता व सपेक्ष

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घनविरलता के कारण 'वक्कीभवन' होता है। फलतः फैले हुए प्रकाश किरण लिमिट जाते हैं और बड़े से बड़े दृश्य की प्रतिमा उसके अंतर के सहित अत्यल्प अवकाश या बिंदु में समा जाती है।

रूप ग्रहण के लिये उक्त 'प्रतिमाबिंदु' का लिंग भाग पर पड़ना आवश्यक है। जब तक उक्त 'नेत्रगत प्रतिमाबिंदु' लिंग भाग पर ठीक केंद्रित न होगा (आगे या पीछे पड़ता होगा) तब तक रूप-ग्रहण नहीं होगा। यह कार्य नेत्रगत 'केंद्रीकरणसाहस्य' के द्वारा होता है।

पास का या उजियाले का दृश्य देखने के समय 'वर्तुल स्नायु' संकुचित होता है; फलतः दृष्टिसंघटन व दृष्टि दोनों संकुचित जाते हैं और इससे प्रकाशकिरणों का नियमन होता है। इसके विपरीत अर्थात् अधियारे में दृष्टि बड़ी होती है। दृष्टि के इस आकुंचन प्रसरण से देखने में बड़ी सुविधा होती है। दूर का दृश्य देखने के समय 'नेत्र-कंडरा' मध्य पटल को आवश्यक सीमा तक आगे पीछे तानती है। इस तनाव के कारण तृतीय पटल का पुरोभाग भी ओग की तरफ तनकर अधिक बहिर्गोल बनता है। इस व्यापार से प्रकाश-किरणों का उक्त नेत्रगत प्रतिमाबिंदु लिंग भाग पर ठीक-ठीक केंद्रित होता है।

इस तरह बाह्य दृश्य की प्रतिमा लिंग भाग पर जब पड़ती है तब तत्रत्य संकाशकृति अणु अवयवों के तथा नाडियों के कारण रूप ज्ञान होता है। अतः प्रस्तुत में दृष्टि शब्द का अर्थ व्यापक करके अत्रत्य धातु प्रसाद को आलोचकपिक्त कहना उचित है। फिर भी यह ध्यान में रखना चाहिये कि यह विवेचन उन संप्रदायों को मान्य नहीं हो सकता जो रूप ग्रहण को प्राण धर्म का कार्य मानते हैं।

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भ्राजक पित्तः—इसके विषय में यह कहा गया है किः—

यत्तु त्वच्चि पित्तम् तस्मिन्भ्राजकोऽग्निरिति संज्ञा; सोऽभ्यंगपरिषेकावगाह्यावलेपनादीनां क्रियाद्व्ययाणां पक्ता, छायानां च प्रकाशकः ॥ (सु. सू. अ. २१)

अर्थात् जो पित्त त्वचा में रहता है तद्वत्त आग्नि को भ्राजक कहते हैं। भ्राजक, मालिश, भंपारे, स्नान, लेप आदि उपायों के द्वारा व्यवहार की जानेवाली औषधियों का पाचन करता है और छायाओं को प्रकाशित करता है।

त्वचा के द्वारा कई तरह की औषधियों को तथा स्नेहों को शोषित किया जाता है। भ्राजक पित्त, इन शोषित पदार्थों का पाचन करके उनको शारीर धातुओं में उपशयन करने योग्य बनाता है। वाग्भट ने अपने भ्राजक पित्त के विवेचन में इस कार्य का उल्लेख नहीं किया है।

साधारणतया मनुष्य, काले, कालेसांबले, निमगोरे, या गोरे होते हैं। इसके अतिरिक्त भी कुछ प्राकृतिक वर्ण हैं। फिर भी केवल नील, केवल श्याम, केवल ताम्र, हरित, और श्वेत ये अप्राकृतिक कहे जाते हैं।

वर्ण, प्रभा और छाया से युक्त रहते हैं। कोई भी पुरुष बिना प्रभा या छाया के नहीं रह सकता। प्रभा वर्ण को प्रकाशित करती है तो छाया तिरोहित करती है। प्रभा दूर से भी चमकती है पर छाया पास से दिखाई देती है।

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प्रभा ' तैजसी ' होकर सात प्रकार की है; रक्ता, पीता, श्यामा हरिता, पांडुरा और कृष्णा ।

छाया में दो प्रकार हैं; छाया और प्रतिच्छाया ( पडछाह ) तहां छाया, वर्ण प्रभाश्रिता रहती है और इसके ' सुषमा ' व ' विषमा ' दो प्रकार हैं । चूंकि जब कि शरीर पंच महाभूतों का बना है तब छाया भी विविध होती है । जैसा कि:— नाभसी छाया निर्मला, सस्नेहा, व सप्रभा रहती हैं; वायवी रूक्षा, श्यावारुणा व हतप्रभा रहती है; आग्नेयी रक्ता, दीप्तामा व दर्शनप्रिया रहती है; जलीया, स्फटिक विमला व सुस्निग्धा रहती है और पार्थिवी स्थिरा, स्निग्धा, घना, श्लक्ष्णा, श्यामा व श्वेता रहती है । प्रतिच्छाया ' संस्थानाकृतिलक्षिता ' होती है । इसके संस्थान जल, ऐना, आतप आदि होते हैं और आकृति अल्प, मध्य, महान् इ. होती है ।

ब्राजक पित्त व प्रभा दोनों तेजस् होने के कारण ब्राजक, प्रभा की वृद्धि करता है और प्रभा, छाया को प्रकाशित करती है ।

इस ब्राजक पित्त का संबंध हमारी राय में वसाख्य तेज से है । यह तेज ही मांसधरात्वक् में केश ग्रहों के नीचे जो स्निग्धपिंड ' हैं उनमें रहता है और स्वचा को मृदु, चिकनी व कांतियुक्त रखता है । इसमें पक्ति धर्म भी है जैसा कि ' तेन मार्दवंसौकुमार्यमृदुत्प रोमतात्साहृष्टिस्थितिपात्तिकातिदीप्तयो भवंति ' इसमें स्वीकार किया गया है । और यदि यह सत्य हो तो वसाख्य तेज की व्याप्ती के अनुसार ब्राजक पित्त को भी अधिक व्यापक बनाना उचित था ।

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श्लेष्मा के प्रकार

कार्य के अनुसार श्लेष्मा के भी पांच प्रकार किये गये। जैसा कि:—हृदक, अवलंबक, बोधक, तर्पक, और श्लेपक।

हृदक:—इसके विषय में यह कहा गया है कि:—

तत्र आमाशयः....चतुर्विधस्य आहारस्य आधारः

सच तत्र औदुम्बैर्गुणैराहारः प्रकृत्नो भिन्नसंघातः

सुखजरश्च भवति ॥

माधुर्यातिपिच्छलत्वाच्चप्रकृतेदित्वात्तथैवच ।

आमाशये संभवति श्लेष्मा मधुरशीतलः ॥

सतत्रस्थ एव स्वशक्त्या शेषाणां श्लेष्मस्थानानां

शरीरस्योदक कर्मणाऽनुग्रहं करोति ॥ (सु. सू. अ. २१)

अर्थात् आमाशय, चतुर्विध अन्नपान का (पहिला) आधार-स्थान है उसमें तत्रत्य उदक गत गुणों के द्वारा आहार पतला होता है, उसके कण अलग अलग होते हैं और वह पाचन के योग्य बनता है। उक्त उदक के माधुर्य, पेंच्छित्य और प्रकृतेदित्य इन गुणों पर से यह सिद्ध होता है कि मधुर व सोमात्मक श्लेष्मा, (सर्वेप्रथम) आमाशय में पैदा होता है। आमाशयस्थ यह श्लेष्माही अपनी शक्ति (बल) व उदक कर्म से अन्य श्लेष्मस्थानों को और शरीर को उपकृत करता है।

महास्रोत की श्लेष्मधरा कला में 'सूर्य मंडलों' के सहस्र ही सहस्रों 'सोममंडल' हैं और उनसे हृदक स्रुत होता है। इसके भी स्थानतः प्रभेद किये जा सकते हैं। जैसा कि:—

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मुखगत क्लेदकः—यह कर्णमूलस्थ पिंडोंसे व घीवक पिंडों से स्तुत होता है और लालारस में 'मुखगतपाचकपित्त' के साथ शामिल रहता है। लालारस में इनके साथ २ बोधक कफ भी रहता है अन्नकर्णों को अलग २ करना जो कि एक रासायनिक कार्य है; सुख्यतः लालासत्य नामक अभिपूर्त्ता का अर्थात् मुखगतपाचकपित्त का है। पर यह कार्य सुखपूर्वक होने के लिये क्लेदन की आवश्यकता रहती है।

आमाशय गत क्लेदकः—आमाशय की उपश्लेष्मी कला में जो श्लेष्मपिंड हैं उनसे यह स्तुत होता है और जाठर रस में अम्लपित्त के साथ शामिल रहता है।

शुद्रांत्रगत क्लेदकः—शुद्रांत्र की उपश्लेष्मी कला में सोममंडलों के गुच्छ के गुच्छ हैं जोकि सूर्यमंडलों को घेरे हुए हैं। इनसे क्लेदक स्तुत होता है।

बृहदत्रगत क्लेदकः—यहां के 'सोममंडल,' शुद्रांत्रस्थ मंडलों की अपेक्षा बड़े हैं। उनसे पैदा होने वाला क्लेदक ही यहां का प्रधान रस है।

चूक जब कि शरीरगत उदक सिद्धांततः श्लेष्मा है और उसकी पूर्ति क्लेदक करता है तब पित्तगत उदक भी इसका ही अंश है। और इस कारणही लालारस में तथा याकृतपित्त में पिच्छिच्छगुण श्लेष्क उपलब्ध होता है।

अवलंबकः—इसके विषय में यह कहा गया है किः—

उरःस्थः, त्रिकसंधारणमात्सवीर्येणान्नरस-

सहितेन हृदयावलंबनं करोति । (सु. सू. अ. २१)

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अर्थात् वह हैदक ही उरोभाग में संचार करके त्रिक (ऊर्ध्वत्रिक) को धारण करता है और अन्नरस से युक्त अपनी शक्ति से हृदय का अवलंबन करता है, अतः उसको अवलंबक कहते हैं।

यह श्लेष्मा, 'अवलंबिकाकला' में रहता है। अवलंबिका कला, फुफ्फुसावरण और हृदयावरण इनके दो तहों के बीच में रहती है। इसमें एक तरल बहुत थोड़ी मात्रा में रहता है। इसमें रस धातु मिश्रित है। इस तरल की यहाँ उतनी ही मात्रा रहती है जिससे कि हृदय को व फुफ्फुस को किधर से भी रगड़ या धक्का न लगने पावे और उनका निमेषोन्मेषण भी आसानी से होता रहे। इस तरल के अर्थात् ही अवलंबक के विकृत होने पर 'उरस्तोय' (प्ल्यूरसी) नामक भयंकर रोग होता है। अवलंबिका कला, त्रिक में बंधी हुई है और वहाँ से ही (संभवतः) अवलंबक का आगम होता है। वाग्भट ने इसको ही शेष श्लेष्मस्थानों का अवलंबन कर्ता कहा है।

बोधकः—इसके विषय में यह कहा गया है कि—

जिन्हामूलकंठस्थो जिन्हेन्द्रियस्य

सौम्यस्त्वात् सम्यक् रसज्ञाने प्रवर्तते। (सु. सू. अ. २१)

अर्थात् बोधक कफ, जिन्हामूल व कंठ में रहता है। जिन्हेन्द्रिय, सोमगुणात्मक होने के कारण उससे रसज्ञान होता है।

रसज्ञान यद्यपि धातुप्रसाद के कारण अर्थात् प्राणधर्म के कारण होता है तथापि रसज्ञान के समय अलांश का बोधक से गीला होना जरूरी है। बोधक कफ, जिन्हाधःस्थ 'बोधककफ पिंडों' से सुत होता है।

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आयुर्वेद-दर्शन

तर्पकः—इसके विषय में यह कहा गया है किः—

शिरःस्थः स्नेहसंतर्पणाधिकृतत्वात्

इंद्रियाणामात्मवैर्येणानुग्रहं करोति । (सु. सू. अ.२१)

अर्थात् तर्पक शिर में रहता है । स्नेहन ( चिकनाहट ) और तर्पण ( तरी ) उसका कार्य है । यह अपनी शक्ति से समस्त इंद्रियों पर अनुग्रह करता है ।

मस्तिष्क और सुषुम्नारज्जु के बीच में ' पश्मापरा ' Ciliated Epithelium की बनी हुई एक थैली है । इस थैली में यह भरा रहता है । यह मस्तिष्क तथा सुषुम्ना को भीतर से तर रखता ही है सिवाय इसके आवरणों के बीच में और उनकी सतह पर फैल कर बाहर से भी तर रखता है ।

काय्य ने संभवतः इसीके उपलक्ष्य में यह कहा है कि ' अकुपित स्नेष्मा, उत्साह शान, बुद्धि, क्षमा, धृति, अलोभ आदि भावोंको पैदा करता है आर कुपित स्नेष्मा आलस्य, अशान, मोह, आदि ताद्विपरीत भावों को ।

इस तर्पक की विकृति से ही ' मोहज्वर ' ( Meningitis ) होता है ।

इस तर्पक के द्वारा अन्य इंद्रियों का तर्पण होना जिस हेतु से कहा गया है उस पर विचार किया जाय तो यह ज्ञात होगा कि जहां २ पश्मापरा है वहां २ के तरल को ऋषि, तर्पक कहना चाहते हैं । क्योंकि पश्मापरा शरीर में अन्यत्र भी रहती है; उससे

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( तद्गत श्लेष्मपिंडों से ) भिन्न २ प्रकार के श्लेष्मा भी पैदा होते हैं और उनका भी प्रधान कार्य तर्पण ही है। उदाहरणार्थ—श्रासमार्ग के भीतर की श्लेष्मवराकला में पश्मापरा है और तद्गत पिंडों से एक प्रकार का श्लेष्मा पैदा होता है। उसी तरह दोनों अपस्तंभों और उनकी शाखा प्रशाखाओं की दिवाल में भी पश्मापरा है। फुफ्फुस में इस तर्पक के साथ ‘ श्लेषक ’ भी रहता है। नाक के भीतरी भाग में पश्मापरा है और वहां कुछ पिंड हैं। इन पिंडों से पैदा होने वाले तरल से नाक का भीतरी भाग तर रहता है और इस तरल में जो वस्तु घुल जाती है उसके गंध का ज्ञान होता है। इसका फोफुस तर्पक के साथ संबंध है। स्त्रियों के गर्भाशय और फलवाहिनीयों में पश्मापरा है और उससे पैदा होने वाला तरल स्त्री प्रजननैन्द्रिय का तर्पण करता है। उसी तरह पुरुष के वृषणगत ‘ उर्ध्वगाभीस्त्रोत्तों ’ में पश्मापरा है और उससे भी एक प्रकार का खाव होता है। सारंश पश्मापरा से पैदा होने वाले तरल को सामान्यतः तर्पक कहते हैं।

श्लेषकः—इसके विषय में यह कहा गया है किः—

संधिरथस्तु श्लेष्मा सर्वसंधिसंश्लेषात्

सर्वसंध्यनुग्रहं करोति । ( सु. सू. अ. २१ )

अर्थात् श्लेषक संधियों में रहता है और सब प्रकार की संधियों को लिपट कर बांधता है।

उदक में अथवा क्लेदक में रहने वाले पिच्छल गुण पर से इसका ज्ञान हुआ। शरीर में इसके अनेक प्रकार उपलब्ध होते हैं जो कि भिन्न २ स्थानों में अपने उत्पादक अणु अवयवों अर्थात् पिंडों

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से पैदा होते हैं। तदनुसार इनके रासायनिक संगठन में और गुणधर्मों में भी भिन्नता रहती है। लार, जाठर रस, पित्त, मूत्र तथा शरीर में पैदा होने वाले अन्य कई प्रकार के रसों में ये रहते हैं। प्रत्येक अणु अवयव में, उनकी संधि में, कलाओं में, ( कलाएँ श्लेष्म, स्नायु, fibres और अपरा ओ Epithelium की बनी हुई हैं ) धातुओं में, पर्वों में, प्रतानों में, खास संस्था में, अंतः फलों में, कलल में, तथा नेत्र में ये प्रकार उपलब्ध होते हैं। इनमें कुछ धर्म समान होते हैं। यद्यपि ये सब श्लेषक हैं तथापि इनका सब का जो मूलभूत द्रव्य है वही मुख्य है अतः उसको ही ‘ श्लेषक ’ ( mucin ) कहना उचित है। यह ‘ स्तंभापरा ’ के श्लेष्मपिंडों से विशुद्ध अवस्था में भी पैदा होता है। यह स्तंभापरा महाश्लोत में मुख से गुदतक है।

इस पर से यह भली भांति ज्ञात होता है कि शरीर गत समस्त पदार्थों का वात-पित्त-श्लेष्माओं में समन्वय करने की बुद्धि से उत्क प्रकारों की कल्पना की गई है। इस कल्पना को वैज्ञानिक-दृष्ट्या पूर्ण करना भविष्य-के आधीन है।

सत्व के प्रकार

यद्यपि ‘ वृत्ति ’ तः सत्व, एक है तथापि विशेषताओं के कारण उसके अनेक प्रकार माने गये हैं। विशेषकर भावों के विषय में यह कहा गया है कि “ सत्त्ववैशेष्यकराणि पुनस्तेषां तेषां प्राणिनां मातापितृसत्त्वान्यन्तर्वर्तन्याः श्रुतयश्चाभिर्गुणं स्वीचिन्ते च कर्म सत्त्वविशेषाभ्यासश्चेति ”। [ चं. शा. अ. ८ ] अर्थात् भिन्न २ प्राणियों का ( क्षेत्रज्ञ के साथ आया हुआ ) सत्व, अपने २ मातापिता ( फल क बीज ) के सत्त्वों का अनुकरण करता है। गर्भावस्था में गर्भिणी के