भारतकोश
संग्रह पर लौटें

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

वायोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धान्त

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जन्य वायु, अन्न के विश्लेषण का अंतिम सूक्ष्मतर शेष अर्थात् ही अन्न का सूक्ष्मतर घटक है। आगे यह भी मालूम हुआ होगा कि इस प्रकार का वायु अनशन व्यायाम आदि के कारण भी पैदा होता है अर्थात् यह शारीर धातुओं का भी सूक्ष्मतर घटक है। इन प्रपाकजन्य वायुओं के अतिरिक्त श्वसनेंद्रिय के द्वारा प्रविष्ट होनेवाले और निकलने वाले वायु का भी ज्ञान था ही। संभव है कि किसी समय इन वायवीय द्रव्यों में किसी प्रकार का भेद न किया जाता हो किंतु जब श्वसनेंद्रिय द्वारा प्रविष्ट होने वाले और उच्छ्वासन द्वारा बाहर निकलने वाले वायुओं के नैसर्गिक आवश्यकता और अनावश्यकताओं पर ध्यान आकृष्ट हुआ तब प्रपाकजन्य वायुओं की अपेक्षा उसको अधिक महत्वपूर्ण एवं शारीरधातुघटक माना गया जो श्वास के द्वारा समस्त शरीर में संचार करता है। आगे इसको 'प्राण' शब्द से और प्रपाकजन्यों को 'उदान' व 'अपान' शब्दों से संबोधित किया जाने लगा। यद्यपि इस विषय में अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता तथापि यह निश्चय है कि आरंभ में कटु प्रपाक जन्य वायु को ही समस्त शारीर धातुओं का प्रधान घटक माना जाता था किंतु अंत में श्वसनेंद्रिय संचारी प्राण को ही प्रधान माना गया और शेष वायुओं को अपान न्यान उदान समान संज्ञाओं से संबोधित किया जाने लगा।

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आयुर्वेद-दर्शन

इसी तरह धातुप्रसाद विषयक ज्ञान में भी प्रगति हुई। धातुप्रसाद को आरंभ में केवल ज्ञानवाहक पंचोद्विगद्रव्य कहते थे किंतु बाद में 'चेष्टावाहक' भी कहा जाने लगा। अब जब कि समस्त शारीर धातुओं का प्रधान घटक प्राणद्रव्य है तब धातुप्रसाद का भी प्रधान घटक प्राण ही होना चाहिये और शरीर गत समस्त चेष्टाएँ भी प्राण के कारण ही होना चाहिये। अतः धातुपंचकवादियों ने धातुप्रसाद का वायु में समन्वय करने के हेतु से उक्त 'सर्वाहिचेष्टावातेन' इत्यादि विधान किया।

इस तरह ओज ऊष्मा व धातुप्रसाद जैसे द्रव्यों का श्लेष्मपित्तवातों में अंतर्भाव किये जाने पर उनको (श्लेष्मपित्तवातों को) मलवर्ग में रखना अनुचित प्रतीत होने लगा और ओज ऊष्मा व धातुप्रसाद का पृथक् उल्लेख करने की आवश्यकता भी नहीं रही। सिवाय इस समय गुणप्रसादाख्यवर्ग के विषय में भी समुचित ज्ञान हो चुका था बल्कि यूं कहना चाहिये कि औजस् और तैजस् समस्त द्रव्य, गुणप्रसादाख्य वर्ग के ही रूपांतर प्रतीत होने लग गये थे। ( विज्ञान दृष्ट्या भी औजस् तैजस् द्रव्य, गुणप्रसादाख्य वर्ग के ही दो प्रधान रूप हैं; इन रूपों में ही इस वर्ग की उपलब्धि होती है। ) इन सब कारणों से शारीरधातुओं का दूसरी बार वर्गीकरण हुआ।

जैसा कि:—

वायोविद का रसवाद आर त्रिधातु सिद्धांत

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दूसरा वर्गीकरण.

शारीरधातवस्त्वेवं (अथवा शारीरधातुगुणाः) द्विविधाः संप्रहेण मलभूताः प्रसाद-भताश्च । तत्र मलभूतास्ते ये शरीरस्य बाधकराः स्युः । तद्यथा-शरीरच्छिद्रेषूपदेहाः पृथक्जनमानो बहिर्मुखः परिपकाश्चधातवः प्रकुपिताश्च वातपित्तश्लेष्माणां ये चान्येऽपिकेचित् शरीरे तिष्ठतो भावाः शरीरस्योपघातायोपतिष्ठन्ते सर्वास्तान् मले प्रचक्षमहे । इतरास्तु प्रसादे, गुर्वादींश्चद्रव-तान् 'गुण' भेदेन, रसादींश्च शुक्तांन् 'द्रव्य' भेदेन ।

( च. शा. अ. ६ )

इसमें बाधकर और अबाधकर की दृष्टि से मल व प्रसाद संज्ञक दो प्रधान वर्ग किये गये हैं और तदनुसार 'मल' वर्ग में केवल प्रकुपित अर्थात् बाधकर वातपित्त श्लेष्माओं का उल्लेख किया है; अकुपित वातपित्तश्लेष्माओं का नहीं । प्रसाद वर्ग में गुणप्रसादाख्य और द्रव्य प्रसादाख्य इस तरह दो वर्ग किये हैं । तहां गुण प्रसादाख्य वर्ग के प्रकारांतर ही ओज, तेज व धातुप्रसाद हैं और समस्त द्रव्य-प्रसादाख्य वर्ग इनका ही बना हुआ है । चूंकि जब कि इस वर्गीकरण के 'मल' वर्ग में प्रकुपित वातपित्तश्लेष्माओं का स्पष्ट उल्लेख है तब अकुपित वातपित्तश्लेष्माओं का 'प्रसाद' वर्ग में स्पष्ट उल्लेख होना चाहिये था । पर सचेतन द्रव्यों के इस वर्गीकरण में गुण प्रसादाख्य वर्ग का उल्लेख करना ही वचित

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आयुर्वेद-दर्शन

प्रतीत होता है। यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि उस समय श्लेष्म, पित्त और वात इन शब्दों में ओज तेज व धातुप्रसाद जैसे सचेतन द्रव्यों का समावेश किये जाने के साथ २ उदक, अभि और वयवीय द्रव्य (प्राण) जैसे अचेतन द्रव्यों का भी संग्रह हो गया था। अर्थात् वातपित्तश्लेष्म शब्दों से शरीरगत सचेतन व अचेतन दोनों प्रकार के मूलभूत द्रव्यों को संबोधित किया जाता था।

वातपित्तश्लेष्माओं की प्राकृत वैकृत अवस्थाएँ

इस तरह वातपित्तश्लेष्म शब्द अधिक व्यापक हो जाने के कारण उनकी सामन्यतः दो अवस्थाएँ स्वीकार की गईं। एक प्राकृत अथवा अकुपित और दूसरी वैकृत अथवा कुपित। और तदनुसार उनके कार्यों का भी निर्णय किया गया। जैसा कि:—

नित्याः प्राणभूतां देहे वातपित्तकफा क्षयः । विकृताः प्रकृतिस्था वा तान् बुध्दत्सेथ पंडितः ॥ उत्साहोच्छ्वास निःश्वास चैष्टा धातुगतिः समाः । समो मोक्षो गतिमतां वायोः कर्माविकारजम् ॥ दर्शनं पाकिरूष्मा च क्षुत्तुष्णा देहमार्दवम् । प्रभा प्रसादो मेधा च पित्तकर्माविकारजम् ॥ स्नेहो बंधः स्थिरत्वं च गौरवं वृषता बलम् । शुमा धृतिरलोमश्च कफकर्माविकारजम् ॥

ज्ञानोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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वाते पित्ते कफे चैव क्षीणे लक्षणमुच्यते ।

कर्मणः प्राकृताद्वाग्निर्द्वेष्टि वापि विरोधिनाम् ॥

दोष प्रकृति वैशेष्यं नियतं वृद्धि लक्षणम् ।

दोषाणां प्रकृतिर्हानिर्द्वेष्टिश्चैवं परीक्ष्यते ॥

( च. सू. अ. १८ )

यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि इन अंशों में प्राकृत वैकृत शब्द सामान्यतः अकुपित कुपित के समानार्थक हैं और प्राकृत कार्यों में मुख्यतः उन कार्यों का उल्लेख किया गया है जिनकी भित्ति पर तदुत्तर काल में वातपित्तक्षेपमाओं के पांच २ प्रकार किये गये ।

इसके बाद जब ऋषियों का ध्यान भिन्न २ मनुष्यों की भिन्न २ ' प्रकृतियों ' पर और उनके कारणों पर आकृष्ट हुआ तब प्राकृत वैकृत शब्दों की व्याख्या भी बदल गई ।

प्रकृति के विषय में यद्यपि सामान्यतः यह स्वीकार कर लिया गया था कि " प्रकृति में जाति, कुल, देश, काल, वय और आत्मा ( निज ) के भावविशेष शामिल रहते हैं और तदनुसार वह जातिप्रसक्ता, कुलप्रसक्ता, देशानुपातिनी, कालानुपातिनी, वयोनुपातिनी तथा प्रत्यात्मनियता होती है " ( च. इ. अ. १ ) तथापि इनकी सबकी वह में वे मुख्यतः प्रत्यात्मनियता को ही देखते थे ।

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इस प्रत्यात्मनियता को आरंभ में ( क्योंकि बाद में इसके भी दो भेद किये गये और उनको क्रमशः दोषप्रकृति और महाप्रकृति कहा गया ) 'दोषप्रकृति' कहते थे । क्योंकि गर्भावकृतिदृष्ट्या वातपित्तश्लेष्माओं का वंशांकुर गत न्यूनाधिक्य ही इसका कारण सिद्ध हुआ । इस विषय में सर्वप्रथम निम्नलिखित अंश मननीय हैं ।

तद्यथा-शुक्रशोणितप्रकृतिं, कालगर्भाक्षयप्रकृतिं, आतुराहारविहारप्रकृतिं, महाभूतविकारप्रकृतिं च गर्भशरीरमपेक्षते । एतानि हि येन येन दोषेण अधिकतमेन एकेन अनेकेन वा समनुबध्यते तेन तेन दोषेण गर्भोऽनुबध्यते । ततः सा सा दोषप्रकृति रुच्यते मनुष्याणां गर्भदिग्भृत्वा । तस्मात् वातलाः प्रकृत्या केचित् पित्तलाः केचित् रलेष्मलाः । ( च. वि. अ. ८ )

इसमें यद्यपि शुक्रशोणित, गर्भाक्षय, काल, सगर्भा के आहारविहारों की भिन्न २ प्रकृतियों का जोकि तत्तद्वत वातपित्तश्लेष्माओं के विभिन्न सापेक्ष मान से ही बनो हुई होती हैं और गर्भ पर अपना २ संस्कार करती हैं; गर्भ में मिश्रण होकर वात पित्त श्लेष्माओंका जो एक सापेक्ष मान बनता है और जन्म से लेकर मृत्यु तक साधारण बना रहता है उसको गर्भदिग्भृत्वा दोषप्रकृति कहा गया है । तथापि इनका लक्ष्य मुख्यतः शुक्र शोणित प्रकृति पर था । क्योंकि वह

वायोंविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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सर्व प्रथम पैदा होती है; गर्भांकुर उसी से बनता है और अन्य प्रकृतियाँ इस पर ही आगे संस्कार करती हैं। प्रायः इसी हेतु से कुछ संप्रदाय उसीका प्रधानतया उल्लेख करते हैं। जैसा कि:—

शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्वैष उत्कटः।

प्रकृति जायते तेन तस्या मे लक्षणं शृणु। (सु.सं.)

गर्भावक्रांतिदृष्ट्या शुक्र शोणित शब्दों से बीज व फल संज्ञक अणु अवयव [अणुभूत, भूताणु, जीवाणु,] अभिप्रेत हैं। उक्त दोनों प्रकार के अथवा सभी प्रकार के अणु अवयवों

१ अणु अवयवों के विषय में यह कहा गया कि है ‘शरीरान्वयास्तु परमाणु भेदेन अपरिसंख्येया भवेति; अति बहुव्यात्, अतिसौक्ष्म्यात् अर्तीन्द्रियत्वाच्च’ (च. शा. अ. ७) इन अगणित, अति सूक्ष्म, अर्तीन्द्रिय और सचेतन परमाणुओं का प्राश्नात्य वैज्ञानिकों ने ‘अणुवीक्षण’ शब्द द्वारा ज्ञान प्राप्त किया है। इन जीवाणुओं के आकार-प्रकार भिन्न २ धातुओं के तथा अवयवों के अनुसार भिन्न २ होते हैं। इनकी सूक्ष्मता ३००००० अंश अंगुल के बराबर है। सामन्यतः इनके दो प्रकार हैं; सावरण और निरावरण उद्भिदों में सावरण रहते हैं और मनुष्यों में निरावरण। इनका शरीर सुरन्ध्रे के सदृश बिलकुल मुलायम होता है। यह जीवनस (Protoplasma) नामक द्रव्य का बना हुआ है। जीवनस के बीज में मीठी के सदृश एक भाग है जिसको कि ‘जीवनायतन (Nucleus)’ कहते हैं। सिवाय एक ‘आकर्षक केंद्र (Attraction Sphere)’ नामक भाग है जो कि जीवनायतन अधीरा रहता है। इस तरह जीवाणु के तीन प्रधान अंग हैं। जीवनस, जीवनायतन और आकर्षक केंद्र।

आयुर्वेद-दर्शन

में सूक्ष्म घटकों के रूप में बात [ धातुप्रसाद, तथा वायवीय द्रव्य ] पित्त [ तेज, व अग्नि ] श्लेष्मा [ ओज व उदक ] ओंका अस्तित्व रहता है ।

जीवनरस में एक जाली है जिसको ' जीवनकोष ' ( Spongioplasm ) कहते हैं । इसमें ' जीवन तरल ' [ Hyalo Plasm ] भरा रहता है । जीवनरस इन दो पदार्थों का बना हुआ है ।

जीवनायतन पर एक आवरण है; इस आवरण के भीतर भी जालीदार कोष है और इस ' जीवनायतन कोष ' ( Chromoplasm ) नामक तरल है । जीवनायतन के बीच में एक ग्रंथि सदृश भाग है; उसको ' जीवन-ग्रंथि ' ( Nucleoli ) कहते हैं ।

आकर्षक केंद्र के मध्य में ' आकर्षक बिंदु ' ( Centriole ) नामक भाग है उसके आसमतात् आरों की सी रचना है ।

इन जीवाणुओं में ग्रहण, विसर्जन, प्रजनन, गमन आदि चेतना व्यंजक व्यापार होते हैं । उक्त व्यापारों का जीवनायतन के साथ घनिष्ठ संबंध है । एक अणु अवयव से दूसरे अणु अवयव का प्रजनन ' औद्भिज पद्धति ' से होता है । प्रजनन के समय प्रथम आकर्षकबिंदु विभाजित होता है । इस प्रकार को ' प्रत्यक्ष प्रजनन ' कहते हैं । कहीं २ प्रथम जीवनग्रंथि ही खुलती है और उसके जालीदार भाग के तंतु बनते हैं । इन तंतुओं को ' जीवनायतनमूलतंतु ' ( Chromosomes ) कहते हैं । इन तंतुओं के द्वारा होनेवाले प्रजनन को ' अप्रत्यक्षप्रजनन ' कहते हैं ।

चूंकि जबकि बीज, फल और वंशांकुर भी विशिष्ट प्रकार के 'अणु-अवयव' ही हैं तब उनमें उक्त सामान्य बातों का रहना स्वाभाविक है ।

बार्शोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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वर्तमान वैज्ञानिकों द्वारा अणुअवयवों का रासायनिक पृथक्करण करके यह देखा गया है कि उसके जीवनरस में:-

बीज, लंबे व पूंछदार होते हैं। इनके शिर, ग्रीवा, घड, पूँछ, व पुच्छकेसर इतने अवयव रहते हैं। शिर, त्रिकोण, नुकीला और अन्य अंगों से मोटा रहता है। इसी में उसका जीवनायतन रहता है। ग्रीवा सक्डी रहती है और इसी में इसका आकर्षककेंद्र रहता है। फल की अपेक्षा बीज बहुत सूक्ष्म रहता है यह अपनी पूँछ की हलचल से स्थानांतर करता है और नुकीले मुख से फल में प्रवेश करता है।

फल का आकार चपटा और गोल है। इसपर एक पारदर्शक कवच है; उसको ' फलधवलकवच ' ( Zona Pellucida ) कहते हैं। फल में भी जीवनायतन, जीवनायतन ग्रंथि और आकर्षक केंद्र रहते हैं। इसके जीवनरस में वंशांश ( तेज ) अधिक रहता है।

धानवंतरो का कथन है कि ' शुक्र और आर्तव में अणु विशिष्ट भूतों का भी अस्तित्व रहता है '। ये अणु विशिष्ट भूत, बीज व फल ही हैं। और यह भी कथन है कि 'इन भूतों के परस्पर अनुग्रह, अनु-प्रवेश और उपकार से पैदा होने वाला गर्भ, ( अर्थात् वंशांकुर ) गर्भाशय में प्रविष्ट होता है। ( सु. शा. अ. ३ ग. १-२ ) इन अनु-ग्रहादि व्यापारों के वास्तविक रूप के विषय में यह ध्यान में रखना चाहिये कि बीज, अपनी पूँछ की हलचल से फल को पकड़ने ( ग्रह ) का यत्न करता है। उसके लिये वह गर्भाशय में, फलवाहिनीयों में और अंतःफल में भी प्रवास करता है। इस तरह फलग्रह हो जाने पर वह अपने नुकीले मुख से फल में अनुप्रवेश करता है। बाद में

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आयुर्वेद-दर्शन

(१) जल ३ भाग रहता है। (२) इसमें जो पोषक द्रव्य (औजस) रहता है वह बहुत महत्व का है। यह अन्य द्रव्यों की अपेक्षा इसमें अधिक भी रहता है। यह मूल में अंगार, (Carbon) उज्जन, (Hydrogen) मरुत, (nitrogen) मित्र (Oxygen) स्फुर (phosphorus) और गंधक इन वायवीय द्रव्यों से बनाहुआ है। (३) इसमें तेज या तैजस्द्रव्य (Lecithin) संज्ञक वसा रहती है। यहाँ की इस वसा में स्फुर वायु भी रहता है। (४) इसके अतिरिक्त इसमें क्षार भी रहते हैं।

उक्त ओज और तेज संज्ञक द्रव्य अन्यत्र भी रहते हैं पर उनमें स्फुरवायु नहीं रहता। किंतु जीवनरसगत इन द्रव्यों


उसका अनुप्रविष्ट भाग ( शिर, ग्रीवा व धड का कुछ अंश ) फलगत द्रव्य में घुलकर उस से ‘बैजिक-जीवनायतनमूल,’ और आकर्षकबिंदु सहित एक आकर्षक केंद्र बनता है। उक्त बैजिक जीवनायतनमूल, फलजीवनायतनमूल के पास जाता है और दोनों आपस में मिलकर घुल जाते हैं। इस घोल से एक जीवनायतन बनता है। इस संस्कार को ‘उपकार’ कहते हैं। यह नूतन जीवनायतन, बीज व फल के आधरे किंतु समान ‘जीवनायतनमूलतंतुओं से युक्त रहता है और इसके साथ आकर्षकबिंदु सहित दो आकर्षककेंद्र रहते हैं। इसी को ‘वंशांकुर’ कहते हैं। आगे इस वंशांकुर का औद्भिज प्रत्यक्ष प्रज्ञानन होकर उसको क्रमशः वंशांकुरगुच्छ, कल्ल, पाकप्रक्रिया-द्वारा संतानिका, कला, खोत, गर्भ आदि अवस्थाएँ प्राप्त होती हैं।

वायोंविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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में यह विशेषता है कि इनमें स्फुर वायु भी रहता है। जीव-नायवतन में भी ओज रहता है किंतु इसमें स्फुर वायु की मात्रा कुछ अधिक रहती है।

प्रत्येक जीवाणुओं में ग्रहणविसर्जनप्रजननादि व्यापार होते हैं। इन व्यापारों पर से आयुर्वेदिक दृष्टि को यह अनुमान होना स्वाभाविक है कि इनमें किसी सूक्ष्मतम रूप में धातुप्रसाद का भी अस्तित्व है।

अणु अवयव विषयक उक्त विवेचन पर से यह भली-भांति विदित होगा कि अणुअवयवों की रचना वातपित्त-इलेष्माओं की बनी हुई है। क्योंकि त्रिधातु सिद्धांत की दृष्टि से अणुअवयवगत उदक व ओज इलेष्मसंज्ञक हैं; तेज व क्षार भी जिनमें कि अग्नि विद्यमान है; पित्त संज्ञक हैं और धातुप्रसाद व अंगार, मित्र आदि वायवीय द्रव्य, वात संज्ञक हैं।

बीजगत और फलगत वातपित्तइलेष्माओं का गर्भांकुर में मिश्रण होकर एक सापेक्षमान बनता है। यह सापेक्षमान प्रत्येक गर्भांकुर में एकसाँ नहीं रहता किसी में वायु की, किसी में पित्त की और किसी में इलेष्मा की अधिकता हो जाती है। कहीं २ दो २ दोषों की अधिकता अथवा सब दोषों की समता भी रहती है।

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आयुर्वेद-दर्शन

गर्भांकुरगत अथवा गर्भगत वातापितः श्लेष्मा ओं की इन सापेक्ष मात्रा ओं को ही दोषप्रकृति कहते हैं। इन प्रकृतियों के प्रधान लक्षण निम्नलिखित हैं।

श्लेष्माप्रकृतिः—“श्लेष्मा हि स्निग्ध श्लक्ष्ण मृदुमधुरसार सांद्र मंद स्तिमित गुरु शीत पिच्छिच्छाच्छः। तस्य सेहात् श्लेष्मलाः स्निग्धांगाः, श्लक्ष्णत्वात् श्लक्ष्णाः, मृदुत्वात् दृष्टिसुखमुकुमारावदाताः, माधुर्यात् प्रभूत शुक्ल व्यवायापत्याः, सारत्वात् सारसंहतस्थिरशरीराः, सांद्रत्वात् उपचित परिपूर्ण सर्व गात्राः, मंदत्वात् मंदचेष्टाहाराविहाराः, सौम्यत्वात् अशीघ्रांभक्षोभविकाराः, गुरुत्वात् साराधिष्ठितावस्थितगतयः, सैत्यात् अल्पक्षुत्तूष्णासंतापरवेददोषाः, विज्जलत्वात् सुदिलष्ट सारबंध संधानाः तथा अच्छलत्वात् प्रसन्नदर्शनाननाः प्रसन्नवर्णस्वराश्च। त एवं गुणयोगात् श्लेष्मला बलवंतो वसुमंतो विद्यावंत ओजस्विन आयुष्मंतश्च भवति। ( च. वि. अ. ८ )

इसके अतिरिक्त सुश्रुत संहिता में यह भी कहा गया है कि कफप्रकृति पुरुष स्वप्न में कमल, हंस, चक्रवा इनसे युक्त ( अथवा केवल भी ) जलाक्षरों को देखता है।

इसका तापमान प्रायः ९६ से ९७। अंश तक रहता है, नींद में लार टपकती है और सुर्खाटें लेता है। प्रतिप्रयाय, कास, खास, अग्निमांघ इन व्याधियों की प्रवणता रहती है।

वार्धोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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संतति में सारूप्यता पाई जाती है। स्वास्थ्य शिशिर और वसंत में बिगडा हुआ रहता है। कडुवा, चरपरा और तूरा ये रस हितावह रहते हैं।

पित्त प्रकृतिः—पित्तं उष्णं तीक्ष्णं द्रवं विसं अम्लं कटु- कंच । तस्य औष्ण्यात् पित्तला भवंत्युष्णसहाः सुकृमारावदात गात्राः प्रभूतापिल्लव्यंगतिलकपिटिकाः क्षुत्पिपासावंतः क्षिप्र- वलीपलितखालित्यदोषाः प्रायो मृद्वल्पकपिल्लमश्रुलोमकेशाः, तैक्ष्ण्यात् तीक्ष्ण पराक्रममास्तीक्ष्णाम्रयः प्रभताशनपानाः केशास- हिष्णवदंद्शुकाः, द्रवत्वात् शिथिल मृदुसंधिमांसाः प्रभूतसूक्ष्मवेद- मूत्रपुरीषाश्च, विस्रत्वात् प्रभूतपूतिवक्षः कक्षात्यक्षिरः शरीर- गंधाः कट्वम्लत्वात् अल्पशुक्रव्यवायापत्याः । त एवं गुण- योगात् पित्तला मध्यबला मध्यायुषो ज्ञानविज्ञानचितोप- करणवैतश्च ॥

सुश्रुतसंहिता में यह विशेष कहा गया है कि इनके नख, नेत्र, जिह्वा, हथेली और तलबे विशेष लाल रहते हैं; मुंह में बार २ छोले आते हैं और स्वप्न में सोना, केसू के फूल, लाल कनेल, आग, बिजली, प्रकाश इनका दृश्य देखते हैं।

इनका तापमान ९७।। से ९९ तक रहता है। यकृत, प्लीहा, क्रोम व पक्वाशय के व्यापार अधिक होते हैं। इन अवयवों में व्याधिप्रवणता रहती है। ज्वर, शिरोवेदना, रक्त-

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आयुर्वेद दर्शन

विकार, फोड़े फुन्सियाँ, मूत्रकृच्छ्र, पृथमेह, हृद्वैरोग ये अधिक हुआ करते हैं। दस्त की हाजत इतनी होती है कि भगना पड़ता है। ये प्रायः उपःकाल के पहिले ही जाग जाते हैं। बड़े स्तानभ्रिय होते हैं। स्वास्थ्य श्री५म व शरद् में खराब रहता है। प्रायः कन्या संतति अधिक होती है। और तिक्र रस से बहुत द्वेष करते हैं।

वात प्रकृतिः—वातस्तु रूक्ष लघु चल बहु शीघ्र शीत पशुष विषदः। तस्य रौक्ष्यात् वातला रूक्षापचितालपक्षीराः, प्रततरूक्षक्षामभिन्नसक्तजर्जरस्वराः, जागरूकाश्च, लघुत्वात् लघु-चपलगतचिघ्राहारीविहाराः, चलत्वात् अनवस्थित संध्यस्थिघ्न-हन्वोष्ठ जिन्हाशिः स्कंधपाणिपादाः, बहुत्वात् बहुप्रलपकंडर-शिरा प्रतानाः, शीघ्रत्वात् शीघ्र समारंभ क्षोभविकाराः, शीघ्रो-त्वास रागविरागाः श्रुतप्राहिणोऽल्पस्मृतयश्च, शैत्यात् शीतास-हिष्णवः प्रततशीतकोद्वेषकर्स्तंभाः, पारुष्यात् पशुषकेशश्चमश्रुरोम नखदक्षनवदनपाणिपादांगाः, वैश्यात् स्फुटितांगावयवाः, सतत संधिश्चन्द्रगामिनः। त एवं गुणयोगात् वातलाः प्राये-णाल्पबलान्नाल्पायुषान्नाल्पापत्यान्नाल्पसाधनान्नाधन्याः ॥

शुश्रुत में विशेष यह कहा है कि वातप्रकृति अपने से ही बहबढाया करता है। और स्वप्न में अपने को उड़ता हुआ देखता है।

बार्बोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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इनका तापमान ९७ से ९८ तक क्रमोबशी हुआ करता है। मस्तिष्क, श्वसन संस्था, स्थुलांत्र, मूत्रबस्ति और आस्थियों में व्याधि प्रवणता रहती है। नाडीसंस्था, उत्तेजित और विषय प्राहिता उत्तम किंतु स्मृति कम रहती है। बाल्यों के आने के पूर्व स्वास्थ्य बिगड़ा हुआ रहता है। जहां सर्दी गर्मी का अंतर बड़ा हो वहां स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

उक्त लक्षण एक दोषाधिक प्रकृति के हैं। इन पर से ही द्विदोषाधिक और समप्रकृति के लक्षणों का अनुमान करना चाहिये। सामान्यतः यह देखा गया है कि 'वातपित्त' प्रकृति के मनुष्यों में दो प्रकार हैं; एक वमन से बहुत घबराते हैं और दूसरों को नशा करने की आदत बहुत जल्दी लगती है और वह छुड़ाए नहीं छूटती। वातकफ-प्रकृति मनुष्य वमन से प्रसन्न रहते हैं। उनको हर ऋतुओं के संधि में प्रतिद्वय होजाता है। इनको फोड़ा फुन्सी बहुत कम होते हैं। कफपित्तप्रकृति के मनुष्य बड़े कष्टसह होते हैं। इनकी व्यधियों का निदान करना और चिकित्सा करना कठिन होता है। इनमें कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनको संगीत की शक्ति बहुत कम होती है।

इन प्रकृतियों के विषय में यह भी कहा गया है कि:—

प्रकोपो वान्यथाभावः क्षयो वा नोपजायते।

प्रकृतीनां स्वभावेन जायते तु गतायुषः ॥

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आयुर्वेद-दर्शन

उक्त प्रकृति विवेचन के कारण तदुत्तर कालमें प्राकृत वैकृत शब्दों की कुछ व्याख्या बदल गई अर्थात् प्रकृतिजनक वातपित्तश्लेष्माओं को ही प्राकृत और शेष दोषों को वैकृत कहने की प्रवृत्ति शुरू हुई। इसका स्पष्ट निर्दर्शन अष्टांग संग्रह के निम्न लिखित अंशापर से होता है। जैसा कि:—

द्विविधा वातादयः प्राकृता वैकृताश्च । तत्र प्राकृताः सप्तविधायाः प्रकृते हेतुभूताः, शरीरैकजन्मानः, ते शरीरधारणा द्वातुसंज्ञाः, दोषारूढ्यानां विकृतीनां बीजभूताः ।....वैकृतास्तु गर्भादभिनिःसृतस्य, आहाररसस्य मलाः संभवन्ति प्राकृतेष्वबरोहंति, ते कालादिविभेन स्वप्रमाण वृद्धिक्षययोगात् देह-मनुगृण्वंति दूषयंति च । [ अ. सं. शा. अ. ८ ] अस्तु।

शब्दादिगुणप्रधानतावादां पांचभौतिकी प्रकृति मानते थे। जैसा कि:—प्रकृतिभिहनराणां भौतिकी केचिदाहुः पञ्चनदहनतायैः कीर्तितास्तास्तु तिष्ठः । स्थिर विपुल शरीरः पार्थिवश्वश्वमावान् शुचिरथ चिरजीवी नामसः खैर्महेंद्रः ॥ (सु. शा. अ. ४)

उक्त प्रकृति विषयक अन्वेषण क कारण ही यह कहा जाने लगा कि “ वात पित्त श्लेष्माण एव देह संभव हेतवः ” [ सु. सं. ] अर्थात् वातपित्तश्लेष्मा ही देहोत्पादक कारण है।

वायोविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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वातपित्तश्लेष्माओं का लोकगत अधिष्ठान.

षड्रसवादी वातपित्तश्लेष्माओं का संबंध लोकगत वायु, सूर्य और सोम ( चंद्र ) के साथ मस्थापित करते थे । क्योंकि इनके वर्ष, ऋण, शीत लक्षण जागतिक प्रभावों का और वातपित्तश्लेष्माओं के चय, प्रकोप, प्रक्षमों का घनिष्ठ संबंध अच्छी तरह सिद्ध हो चुका था । इस विषय में किसी को कुछ भी शंका नहीं थी । पर प्रत्येक संप्रदाय, अपने २ स्मृतिविज्ञान के अनुसार उक्त लोकगत ' विभूतियों ' का भी समन्वय मूलभूत द्रव्यों, गुणों अथवा धर्मों में करता था और तदनुसार वातपित्तश्लेष्माओं को भी द्रव्य, गुण, अथवा धर्म कहता था ।

धातुपंचकवादी भारद्वाज, जिस तरह शरीरगत धातु प्रसाद, ओज, तेज इन सचेतन द्रव्यों का शरीरगत अचेतन धातुपंचक में विशेषतः वायु, अग्नि, उदकों में समन्वय करते थे ( जैसा कि अष्टांगसंग्रहोक्त " वाण्वाकाशाभ्यां धातुः, आग्नेयं पित्तम्, अंबुषुषिबीभ्यां श्लेष्मा " और सौश्रुतिक "वायु-रात्मनैवात्मा, आग्नेयं पित्तम्, श्लेष्मा सोम्य इति" इन विधानों पर से सिद्ध होता है ) उसी तरह वायु, सूर्य, चंद्र इन जागतिक विभूतियों का भी धातुपंचक में समन्वय करते थे । सारांश उनकी दृष्टि में वातपित्तश्लेष्माओं का और वायु सूर्य चंद्र का अंतिम समन्वय धातुपंचक में होता था । इस

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आयुर्वेद-दर्शन

धातु पंचक को वे ' अभूत ' द्रव्य कहते थे अतः वे वातपित्त- श्लेष्माओं को भी ' द्रव्य ' कहते थे ।

पञ्चधातुवादी, भारद्वाज के उक्त समन्वय को ही स्वीकार करते थे । पर उनकी दृष्टि में आकाशादिक, ' भूत ' एवं चेतनाधातु के ' गुण ' होने के कारण वातपित्तश्लेष्मा भी तत्त्वतः ' गुण ' ही थे ।

किंतु अग्नीषोम लोकपक्षियों की दृष्टि में जिघर-नृधर देवताओं का साम्राज्य था । अतः वे वातपित्तश्लेष्माओं का विश्वगत प्रधान धर्मों में समन्वय करते थे । इस विषय में सर्व प्रथम अग्नीषोमवादियों के कथन को जानना परम आवश्यक है ।

अग्नीषोमवाद.

अग्नीषोमवादी, समस्त विश्व की तह में अग्नि और सोम संहक धर्मों का अस्तित्व प्रतिपादन करते थे । उनके सिद्धांत के अनुसार वे मधुरादि पडास्वादों का, ( अग्नीषोमी- यत्वाज्जगतो रसा द्विविधाः सौम्या अग्नेयाश्च ) गुणप्रसादाख्य वर्ग का अथवा विशिष्ट गुणों का, ( वीर्यं द्विविधमुष्णं शीतं च अग्नीषोमीयत्वाज्जगतः ) तेज व ओज संहक पदार्थों का, ( तेजोऽप्याग्नेयम्, ओजः सोमात्मकम् ) शुक्रार्तवों का, ( सौम्यंशुक्रमार्तवमाग्नेयम् ) पित्तश्लेष्माओं का, ( आग्ने-

ज्ञानोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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यं पित्तम्, श्लेष्मा सौम्यः) और आदान विसर्गात्मक ऋतुप्रभावों का अर्थात् काल का भी ( 'आदानमाग्नेयम्, विसर्गः सौम्यः' तथा ' अन्ये तु गुर्वादीनामग्नीषोमात्मकत्वादादानविसर्गविभागेन कालस्य च उष्णशीतात्मकत्वात् • द्विविधमेवामनन्ति ' ) समन्वय अग्नीषोम संज्ञक धर्मद्वय में करते थे । उनका यह बक्तव्य प्रसिद्ध है कि:—

नानात्मकमपि द्रव्यमग्नीषोमौ महाबलौ ।

व्यक्ताव्यक्तं जगदिव नातिक्रामति जातुचित् ॥ (अ. सं.)

अर्थात् समस्त द्रव्य समुदाय, नानात्मक ( आकाशादि पंचधात्वात्मक ) और अनेक रूपात्मक होते हुए भी अग्नीषोम संज्ञक महान् धर्मों के अतिरिक्त नहीं है जैसाकि समस्त जगत ' व्यक्त ' और ' अव्यक्त ' इन दो अवस्थाओं के अतिरिक्त नहीं है । सारांश अग्नीषोम धर्मों की भिन्न २ मात्राओं के संयुक्त परिणाम स्वरूप ही आकाशादि द्रव्य हैं ।

अग्नीषोमवादी पित्तश्लेष्माओं का आदानविसर्गों में, आदानविसर्गों का सूर्यचंद्र में और सूर्यचंद्रों का अग्नीषोम में समन्वय करते ही थे । वायु के विषय में यद्यपि उनका स्पष्ट कथन उपलब्ध नहीं होता तथापि यह अनुमान करना अनुचित नहीं होगा कि देहगत व लोकगत वायु को वे अग्नीषोमात्मक ही कहते होंगे ।

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आयुवैद-दर्शन

अग्नीषोमवाद् का उक्त स्वरूप ध्यान में रखकर ही अग्नीषोमलोकपक्षियों के कथन का विचार करना होगा। कालवादी, यद्यपि अग्नीषोम संज्ञक धर्मद्वयों का अस्तित्व स्वीकार करते थे तथापि उनका यह कथन था कि ‘अग्नीषोम संज्ञक धर्मों के भी तह में ‘काल’ संज्ञक महती गति का अस्तित्व है’। त्रिधातुसिद्धांतवादी भी अग्नीषोम का अस्तित्व स्वीकार करते थे पर उनको अग्नीषोमवादियों का ‘वायु’ विषयक औदासिन्य मान्य नहीं था।

त्रिधातुसिद्धांतवादियों का ‘वायु’ शब्द धर्म बोधक (भी) है। धातुपंचकवादी जिस ‘वायु’ संज्ञक ‘द्रव्य’ को धातुप्रसादगत ‘करणवृत्ति’ रूप चेष्टाओं का जनक मानते थे उस प्राणद्रव्य के भी तह में इनको ‘वायु धर्म’ का अस्तित्व प्रतीत हो रहा था। इस धर्म की प्रतीति अन्यत्र भी होगई थी जैसा कि ‘हृन्मांस’ गत ‘प्रस्पंदन’। (इस धर्म को ओजगत धर्म भी कहा गया है) इस धर्म को वे अग्नीषोम से भी अधिक महत्वपूर्ण मानते थे। और इस-करणवृत्ति रूप वायु धर्म को ही भिन्न २ व्यापारानुसार प्राण, उदान, समान, व्याप्त, अपान कहते थे। लोक में इस वायु-धर्म का संबंध ‘काल’ संज्ञक महान् धर्म के साथ किया जाने लगा था। सरांश त्रिधातुसिद्धांतवादी, वंशांकुर-गत वातपित्तश्लेष्माओं का संबंध देहलोकगत वायु, अग्नि,