आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
७४
आयुर्वेद-दर्शन
(१) जल ३ भाग रहता है। (२) इसमें जो पोषक द्रव्य (औजस) रहता है वह बहुत महत्व का है। यह अन्य द्रव्यों की अपेक्षा इसमें अधिक भी रहता है। यह मूल में अंगार, (Carbon) उज्जन, (Hydrogen) मरुत, (nitrogen) मित्र (Oxygen) स्फुर (phosphorus) और गंधक इन वायवीय द्रव्यों से बनाहुआ है। (३) इसमें तेज या तैजस्द्रव्य (Lecithin) संज्ञक वसा रहती है। यहाँ की इस वसा में स्फुर वायु भी रहता है। (४) इसके अतिरिक्त इसमें क्षार भी रहते हैं।
उक्त ओज और तेज संज्ञक द्रव्य अन्यत्र भी रहते हैं पर उनमें स्फुरवायु नहीं रहता। किंतु जीवनरसगत इन द्रव्यों
उसका अनुप्रविष्ट भाग ( शिर, ग्रीवा व धड का कुछ अंश ) फलगत द्रव्य में घुलकर उस से ‘बैजिक-जीवनायतनमूल,’ और आकर्षकबिंदु सहित एक आकर्षक केंद्र बनता है। उक्त बैजिक जीवनायतनमूल, फलजीवनायतनमूल के पास जाता है और दोनों आपस में मिलकर घुल जाते हैं। इस घोल से एक जीवनायतन बनता है। इस संस्कार को ‘उपकार’ कहते हैं। यह नूतन जीवनायतन, बीज व फल के आधरे किंतु समान ‘जीवनायतनमूलतंतुओं से युक्त रहता है और इसके साथ आकर्षकबिंदु सहित दो आकर्षककेंद्र रहते हैं। इसी को ‘वंशांकुर’ कहते हैं। आगे इस वंशांकुर का औद्भिज प्रत्यक्ष प्रज्ञानन होकर उसको क्रमशः वंशांकुरगुच्छ, कल्ल, पाकप्रक्रिया-द्वारा संतानिका, कला, खोत, गर्भ आदि अवस्थाएँ प्राप्त होती हैं।
वायोंविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
७५
में यह विशेषता है कि इनमें स्फुर वायु भी रहता है। जीव-नायवतन में भी ओज रहता है किंतु इसमें स्फुर वायु की मात्रा कुछ अधिक रहती है।
प्रत्येक जीवाणुओं में ग्रहणविसर्जनप्रजननादि व्यापार होते हैं। इन व्यापारों पर से आयुर्वेदिक दृष्टि को यह अनुमान होना स्वाभाविक है कि इनमें किसी सूक्ष्मतम रूप में धातुप्रसाद का भी अस्तित्व है।
अणु अवयव विषयक उक्त विवेचन पर से यह भली-भांति विदित होगा कि अणुअवयवों की रचना वातपित्त-इलेष्माओं की बनी हुई है। क्योंकि त्रिधातु सिद्धांत की दृष्टि से अणुअवयवगत उदक व ओज इलेष्मसंज्ञक हैं; तेज व क्षार भी जिनमें कि अग्नि विद्यमान है; पित्त संज्ञक हैं और धातुप्रसाद व अंगार, मित्र आदि वायवीय द्रव्य, वात संज्ञक हैं।
बीजगत और फलगत वातपित्तइलेष्माओं का गर्भांकुर में मिश्रण होकर एक सापेक्षमान बनता है। यह सापेक्षमान प्रत्येक गर्भांकुर में एकसाँ नहीं रहता किसी में वायु की, किसी में पित्त की और किसी में इलेष्मा की अधिकता हो जाती है। कहीं २ दो २ दोषों की अधिकता अथवा सब दोषों की समता भी रहती है।
७६
आयुर्वेद-दर्शन
गर्भांकुरगत अथवा गर्भगत वातापितः श्लेष्मा ओं की इन सापेक्ष मात्रा ओं को ही दोषप्रकृति कहते हैं। इन प्रकृतियों के प्रधान लक्षण निम्नलिखित हैं।
श्लेष्माप्रकृतिः—“श्लेष्मा हि स्निग्ध श्लक्ष्ण मृदुमधुरसार सांद्र मंद स्तिमित गुरु शीत पिच्छिच्छाच्छः। तस्य सेहात् श्लेष्मलाः स्निग्धांगाः, श्लक्ष्णत्वात् श्लक्ष्णाः, मृदुत्वात् दृष्टिसुखमुकुमारावदाताः, माधुर्यात् प्रभूत शुक्ल व्यवायापत्याः, सारत्वात् सारसंहतस्थिरशरीराः, सांद्रत्वात् उपचित परिपूर्ण सर्व गात्राः, मंदत्वात् मंदचेष्टाहाराविहाराः, सौम्यत्वात् अशीघ्रांभक्षोभविकाराः, गुरुत्वात् साराधिष्ठितावस्थितगतयः, सैत्यात् अल्पक्षुत्तूष्णासंतापरवेददोषाः, विज्जलत्वात् सुदिलष्ट सारबंध संधानाः तथा अच्छलत्वात् प्रसन्नदर्शनाननाः प्रसन्नवर्णस्वराश्च। त एवं गुणयोगात् श्लेष्मला बलवंतो वसुमंतो विद्यावंत ओजस्विन आयुष्मंतश्च भवति। ( च. वि. अ. ८ )
इसके अतिरिक्त सुश्रुत संहिता में यह भी कहा गया है कि कफप्रकृति पुरुष स्वप्न में कमल, हंस, चक्रवा इनसे युक्त ( अथवा केवल भी ) जलाक्षरों को देखता है।
इसका तापमान प्रायः ९६ से ९७। अंश तक रहता है, नींद में लार टपकती है और सुर्खाटें लेता है। प्रतिप्रयाय, कास, खास, अग्निमांघ इन व्याधियों की प्रवणता रहती है।
वार्धोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
७७
संतति में सारूप्यता पाई जाती है। स्वास्थ्य शिशिर और वसंत में बिगडा हुआ रहता है। कडुवा, चरपरा और तूरा ये रस हितावह रहते हैं।
पित्त प्रकृतिः—पित्तं उष्णं तीक्ष्णं द्रवं विसं अम्लं कटु- कंच । तस्य औष्ण्यात् पित्तला भवंत्युष्णसहाः सुकृमारावदात गात्राः प्रभूतापिल्लव्यंगतिलकपिटिकाः क्षुत्पिपासावंतः क्षिप्र- वलीपलितखालित्यदोषाः प्रायो मृद्वल्पकपिल्लमश्रुलोमकेशाः, तैक्ष्ण्यात् तीक्ष्ण पराक्रममास्तीक्ष्णाम्रयः प्रभताशनपानाः केशास- हिष्णवदंद्शुकाः, द्रवत्वात् शिथिल मृदुसंधिमांसाः प्रभूतसूक्ष्मवेद- मूत्रपुरीषाश्च, विस्रत्वात् प्रभूतपूतिवक्षः कक्षात्यक्षिरः शरीर- गंधाः कट्वम्लत्वात् अल्पशुक्रव्यवायापत्याः । त एवं गुण- योगात् पित्तला मध्यबला मध्यायुषो ज्ञानविज्ञानचितोप- करणवैतश्च ॥
सुश्रुतसंहिता में यह विशेष कहा गया है कि इनके नख, नेत्र, जिह्वा, हथेली और तलबे विशेष लाल रहते हैं; मुंह में बार २ छोले आते हैं और स्वप्न में सोना, केसू के फूल, लाल कनेल, आग, बिजली, प्रकाश इनका दृश्य देखते हैं।
इनका तापमान ९७।। से ९९ तक रहता है। यकृत, प्लीहा, क्रोम व पक्वाशय के व्यापार अधिक होते हैं। इन अवयवों में व्याधिप्रवणता रहती है। ज्वर, शिरोवेदना, रक्त-
७८
आयुर्वेद दर्शन
विकार, फोड़े फुन्सियाँ, मूत्रकृच्छ्र, पृथमेह, हृद्वैरोग ये अधिक हुआ करते हैं। दस्त की हाजत इतनी होती है कि भगना पड़ता है। ये प्रायः उपःकाल के पहिले ही जाग जाते हैं। बड़े स्तानभ्रिय होते हैं। स्वास्थ्य श्री५म व शरद् में खराब रहता है। प्रायः कन्या संतति अधिक होती है। और तिक्र रस से बहुत द्वेष करते हैं।
वात प्रकृतिः—वातस्तु रूक्ष लघु चल बहु शीघ्र शीत पशुष विषदः। तस्य रौक्ष्यात् वातला रूक्षापचितालपक्षीराः, प्रततरूक्षक्षामभिन्नसक्तजर्जरस्वराः, जागरूकाश्च, लघुत्वात् लघु-चपलगतचिघ्राहारीविहाराः, चलत्वात् अनवस्थित संध्यस्थिघ्न-हन्वोष्ठ जिन्हाशिः स्कंधपाणिपादाः, बहुत्वात् बहुप्रलपकंडर-शिरा प्रतानाः, शीघ्रत्वात् शीघ्र समारंभ क्षोभविकाराः, शीघ्रो-त्वास रागविरागाः श्रुतप्राहिणोऽल्पस्मृतयश्च, शैत्यात् शीतास-हिष्णवः प्रततशीतकोद्वेषकर्स्तंभाः, पारुष्यात् पशुषकेशश्चमश्रुरोम नखदक्षनवदनपाणिपादांगाः, वैश्यात् स्फुटितांगावयवाः, सतत संधिश्चन्द्रगामिनः। त एवं गुणयोगात् वातलाः प्राये-णाल्पबलान्नाल्पायुषान्नाल्पापत्यान्नाल्पसाधनान्नाधन्याः ॥
शुश्रुत में विशेष यह कहा है कि वातप्रकृति अपने से ही बहबढाया करता है। और स्वप्न में अपने को उड़ता हुआ देखता है।
बार्बोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
७९
इनका तापमान ९७ से ९८ तक क्रमोबशी हुआ करता है। मस्तिष्क, श्वसन संस्था, स्थुलांत्र, मूत्रबस्ति और आस्थियों में व्याधि प्रवणता रहती है। नाडीसंस्था, उत्तेजित और विषय प्राहिता उत्तम किंतु स्मृति कम रहती है। बाल्यों के आने के पूर्व स्वास्थ्य बिगड़ा हुआ रहता है। जहां सर्दी गर्मी का अंतर बड़ा हो वहां स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
उक्त लक्षण एक दोषाधिक प्रकृति के हैं। इन पर से ही द्विदोषाधिक और समप्रकृति के लक्षणों का अनुमान करना चाहिये। सामान्यतः यह देखा गया है कि 'वातपित्त' प्रकृति के मनुष्यों में दो प्रकार हैं; एक वमन से बहुत घबराते हैं और दूसरों को नशा करने की आदत बहुत जल्दी लगती है और वह छुड़ाए नहीं छूटती। वातकफ-प्रकृति मनुष्य वमन से प्रसन्न रहते हैं। उनको हर ऋतुओं के संधि में प्रतिद्वय होजाता है। इनको फोड़ा फुन्सी बहुत कम होते हैं। कफपित्तप्रकृति के मनुष्य बड़े कष्टसह होते हैं। इनकी व्यधियों का निदान करना और चिकित्सा करना कठिन होता है। इनमें कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनको संगीत की शक्ति बहुत कम होती है।
इन प्रकृतियों के विषय में यह भी कहा गया है कि:—
प्रकोपो वान्यथाभावः क्षयो वा नोपजायते।
प्रकृतीनां स्वभावेन जायते तु गतायुषः ॥
८०
आयुर्वेद-दर्शन
उक्त प्रकृति विवेचन के कारण तदुत्तर कालमें प्राकृत वैकृत शब्दों की कुछ व्याख्या बदल गई अर्थात् प्रकृतिजनक वातपित्तश्लेष्माओं को ही प्राकृत और शेष दोषों को वैकृत कहने की प्रवृत्ति शुरू हुई। इसका स्पष्ट निर्दर्शन अष्टांग संग्रह के निम्न लिखित अंशापर से होता है। जैसा कि:—
द्विविधा वातादयः प्राकृता वैकृताश्च । तत्र प्राकृताः सप्तविधायाः प्रकृते हेतुभूताः, शरीरैकजन्मानः, ते शरीरधारणा द्वातुसंज्ञाः, दोषारूढ्यानां विकृतीनां बीजभूताः ।....वैकृतास्तु गर्भादभिनिःसृतस्य, आहाररसस्य मलाः संभवन्ति प्राकृतेष्वबरोहंति, ते कालादिविभेन स्वप्रमाण वृद्धिक्षययोगात् देह-मनुगृण्वंति दूषयंति च । [ अ. सं. शा. अ. ८ ] अस्तु।
शब्दादिगुणप्रधानतावादां पांचभौतिकी प्रकृति मानते थे। जैसा कि:—प्रकृतिभिहनराणां भौतिकी केचिदाहुः पञ्चनदहनतायैः कीर्तितास्तास्तु तिष्ठः । स्थिर विपुल शरीरः पार्थिवश्वश्वमावान् शुचिरथ चिरजीवी नामसः खैर्महेंद्रः ॥ (सु. शा. अ. ४)
उक्त प्रकृति विषयक अन्वेषण क कारण ही यह कहा जाने लगा कि “ वात पित्त श्लेष्माण एव देह संभव हेतवः ” [ सु. सं. ] अर्थात् वातपित्तश्लेष्मा ही देहोत्पादक कारण है।
वायोविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
८१
वातपित्तश्लेष्माओं का लोकगत अधिष्ठान.
षड्रसवादी वातपित्तश्लेष्माओं का संबंध लोकगत वायु, सूर्य और सोम ( चंद्र ) के साथ मस्थापित करते थे । क्योंकि इनके वर्ष, ऋण, शीत लक्षण जागतिक प्रभावों का और वातपित्तश्लेष्माओं के चय, प्रकोप, प्रक्षमों का घनिष्ठ संबंध अच्छी तरह सिद्ध हो चुका था । इस विषय में किसी को कुछ भी शंका नहीं थी । पर प्रत्येक संप्रदाय, अपने २ स्मृतिविज्ञान के अनुसार उक्त लोकगत ' विभूतियों ' का भी समन्वय मूलभूत द्रव्यों, गुणों अथवा धर्मों में करता था और तदनुसार वातपित्तश्लेष्माओं को भी द्रव्य, गुण, अथवा धर्म कहता था ।
धातुपंचकवादी भारद्वाज, जिस तरह शरीरगत धातु प्रसाद, ओज, तेज इन सचेतन द्रव्यों का शरीरगत अचेतन धातुपंचक में विशेषतः वायु, अग्नि, उदकों में समन्वय करते थे ( जैसा कि अष्टांगसंग्रहोक्त " वाण्वाकाशाभ्यां धातुः, आग्नेयं पित्तम्, अंबुषुषिबीभ्यां श्लेष्मा " और सौश्रुतिक "वायु-रात्मनैवात्मा, आग्नेयं पित्तम्, श्लेष्मा सोम्य इति" इन विधानों पर से सिद्ध होता है ) उसी तरह वायु, सूर्य, चंद्र इन जागतिक विभूतियों का भी धातुपंचक में समन्वय करते थे । सारांश उनकी दृष्टि में वातपित्तश्लेष्माओं का और वायु सूर्य चंद्र का अंतिम समन्वय धातुपंचक में होता था । इस
८२
आयुर्वेद-दर्शन
धातु पंचक को वे ' अभूत ' द्रव्य कहते थे अतः वे वातपित्त- श्लेष्माओं को भी ' द्रव्य ' कहते थे ।
पञ्चधातुवादी, भारद्वाज के उक्त समन्वय को ही स्वीकार करते थे । पर उनकी दृष्टि में आकाशादिक, ' भूत ' एवं चेतनाधातु के ' गुण ' होने के कारण वातपित्तश्लेष्मा भी तत्त्वतः ' गुण ' ही थे ।
किंतु अग्नीषोम लोकपक्षियों की दृष्टि में जिघर-नृधर देवताओं का साम्राज्य था । अतः वे वातपित्तश्लेष्माओं का विश्वगत प्रधान धर्मों में समन्वय करते थे । इस विषय में सर्व प्रथम अग्नीषोमवादियों के कथन को जानना परम आवश्यक है ।
अग्नीषोमवाद.
अग्नीषोमवादी, समस्त विश्व की तह में अग्नि और सोम संहक धर्मों का अस्तित्व प्रतिपादन करते थे । उनके सिद्धांत के अनुसार वे मधुरादि पडास्वादों का, ( अग्नीषोमी- यत्वाज्जगतो रसा द्विविधाः सौम्या अग्नेयाश्च ) गुणप्रसादाख्य वर्ग का अथवा विशिष्ट गुणों का, ( वीर्यं द्विविधमुष्णं शीतं च अग्नीषोमीयत्वाज्जगतः ) तेज व ओज संहक पदार्थों का, ( तेजोऽप्याग्नेयम्, ओजः सोमात्मकम् ) शुक्रार्तवों का, ( सौम्यंशुक्रमार्तवमाग्नेयम् ) पित्तश्लेष्माओं का, ( आग्ने-
ज्ञानोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
८३
यं पित्तम्, श्लेष्मा सौम्यः) और आदान विसर्गात्मक ऋतुप्रभावों का अर्थात् काल का भी ( 'आदानमाग्नेयम्, विसर्गः सौम्यः' तथा ' अन्ये तु गुर्वादीनामग्नीषोमात्मकत्वादादानविसर्गविभागेन कालस्य च उष्णशीतात्मकत्वात् • द्विविधमेवामनन्ति ' ) समन्वय अग्नीषोम संज्ञक धर्मद्वय में करते थे । उनका यह बक्तव्य प्रसिद्ध है कि:—
नानात्मकमपि द्रव्यमग्नीषोमौ महाबलौ ।
व्यक्ताव्यक्तं जगदिव नातिक्रामति जातुचित् ॥ (अ. सं.)
अर्थात् समस्त द्रव्य समुदाय, नानात्मक ( आकाशादि पंचधात्वात्मक ) और अनेक रूपात्मक होते हुए भी अग्नीषोम संज्ञक महान् धर्मों के अतिरिक्त नहीं है जैसाकि समस्त जगत ' व्यक्त ' और ' अव्यक्त ' इन दो अवस्थाओं के अतिरिक्त नहीं है । सारांश अग्नीषोम धर्मों की भिन्न २ मात्राओं के संयुक्त परिणाम स्वरूप ही आकाशादि द्रव्य हैं ।
अग्नीषोमवादी पित्तश्लेष्माओं का आदानविसर्गों में, आदानविसर्गों का सूर्यचंद्र में और सूर्यचंद्रों का अग्नीषोम में समन्वय करते ही थे । वायु के विषय में यद्यपि उनका स्पष्ट कथन उपलब्ध नहीं होता तथापि यह अनुमान करना अनुचित नहीं होगा कि देहगत व लोकगत वायु को वे अग्नीषोमात्मक ही कहते होंगे ।
८४
आयुवैद-दर्शन
अग्नीषोमवाद् का उक्त स्वरूप ध्यान में रखकर ही अग्नीषोमलोकपक्षियों के कथन का विचार करना होगा। कालवादी, यद्यपि अग्नीषोम संज्ञक धर्मद्वयों का अस्तित्व स्वीकार करते थे तथापि उनका यह कथन था कि ‘अग्नीषोम संज्ञक धर्मों के भी तह में ‘काल’ संज्ञक महती गति का अस्तित्व है’। त्रिधातुसिद्धांतवादी भी अग्नीषोम का अस्तित्व स्वीकार करते थे पर उनको अग्नीषोमवादियों का ‘वायु’ विषयक औदासिन्य मान्य नहीं था।
त्रिधातुसिद्धांतवादियों का ‘वायु’ शब्द धर्म बोधक (भी) है। धातुपंचकवादी जिस ‘वायु’ संज्ञक ‘द्रव्य’ को धातुप्रसादगत ‘करणवृत्ति’ रूप चेष्टाओं का जनक मानते थे उस प्राणद्रव्य के भी तह में इनको ‘वायु धर्म’ का अस्तित्व प्रतीत हो रहा था। इस धर्म की प्रतीति अन्यत्र भी होगई थी जैसा कि ‘हृन्मांस’ गत ‘प्रस्पंदन’। (इस धर्म को ओजगत धर्म भी कहा गया है) इस धर्म को वे अग्नीषोम से भी अधिक महत्वपूर्ण मानते थे। और इस-करणवृत्ति रूप वायु धर्म को ही भिन्न २ व्यापारानुसार प्राण, उदान, समान, व्याप्त, अपान कहते थे। लोक में इस वायु-धर्म का संबंध ‘काल’ संज्ञक महान् धर्म के साथ किया जाने लगा था। सरांश त्रिधातुसिद्धांतवादी, वंशांकुर-गत वातपित्तश्लेष्माओं का संबंध देहलोकगत वायु, अग्नि,
चाथोंविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
८५
सोम, संज्ञक धर्मों के साथ प्रस्थापित करते थे। अर्थात् त्रिधातुवादियों की दृष्टि से वातपित्तश्लेष्मा तत्त्वतः ‘धर्म’ हैं।
इतिहास-प्रसिद्ध ‘वातकलाकलीय’ परिषद् इस त्रिधातु-सिद्धांत को प्रस्थापित करने के लिये ही हुई। अतः अब उस पर भी विचार करें।
वातकला कलीय परिषद्
इस परिषद् में सर्व प्रथम सांङ्कलायन कुश ने कहा कि:— ‘रूक्षलघुशीतदारुणखरविषदाः षड्मे वातगुणाभवंति’। इस पर कुमारशिरा भरद्वाज ने कहा कि:— ‘सत्त्रैरेवैगुणैरेवं द्रव्यैरेवंप्रभावेच्छ कर्माभिरभ्यस्यमानैर्वायुः प्रकोपमापद्यते, समानगुणाभ्यासो हि धातूनांवृद्धिकारणम्’। इस पर वाल्ही-कभिषक् कांकायन ने कहा कि ‘अतोविपरीतानि वातस्य प्रशमनानि भवंति, प्रकोपनविपर्ययो हि धातूनां प्रशमकारणम्’। इस पर धामार्गेव बडिस ने कहा कि ‘वातप्रकोपनानि खलु रूक्षलघुशीतदारुणखरविषदसुक्षिरकराणि शरीराणां, तथाविधेषु शरीरेषु वायुराश्रयं गत्वा आप्वायमानः प्रकोप-मापद्यते। वातप्रशमनानि पुनः स्तिग्धगुरुष्णश्चक्षुमृदु पिच्छलघनकराणि शरीराणां, तथा विधेषु शरीरेषु वायुरासञ्जयमानश्चरन् प्रज्ञांतिमापद्यते’। इन ऋषित्रयों के वक्तव्य में ध्यान रखने योग्य बातें यह हैं कि:— इसमें गुर्वादि विशलि गुणों के आधार पर वातपित्तश्लेष्माओं के
८६
आयुर्वेद-दर्शन
लक्षण, प्रकोप और प्रक्षम का विधान किया है। ' तथा-विधेयुं शरीरेषु ' से ' धातुप्रकृति ' का निर्देश किया है। इस पर से यह ज्ञात होता है कि इस समय के पूर्व ही वात-पित्तकफप्रकृतियों की ज्ञान हो चुका था। ' सुषिर ' गुण का उल्लेख करना यह भी सिद्ध करता है कि त्रिधातुसिद्धांत के समर्थक, आकाश का वायु में अंतर्भाव करते थे।
इसके बाद राजर्षिवायोंविद् ने कहा कि:—एवमेतत्सर्वमनपवादं यथा भगवान् आह। यानि तु खलु वायोः कृपितऽकृपितस्य शरीराशरीरचरस्य च शरीरेषु चरतः कर्माणि वहिःशरीरेभ्यो वा भवन्ति तेषामवयवान् प्रत्यक्षानुमानोपमानैः साधयित्वा नमस्कृत्य वायवे यथाशक्ति प्रवक्ष्यामः। “ वायुस्तत्र-यंत्रधरः, प्राणोदानसमानव्यानापानात्मा, प्रवर्तकश्चैष्टाद्युष्मावचानां, नियंता प्रणेता च मनसः, सर्वेन्द्रियाणामुद्योजकः, सर्वेन्द्रियाथीनामगिबोढा, सर्वशरीरधातुव्यूहकरः, संधानकरः शरीरस्य, प्रवर्तकोवाचः, प्रकृतिः स्पर्शशब्दयोः, श्रोत्रस्पर्शनयोर्मूलम्, हर्षोत्साहयोर्योनिः, समीरणोऽग्नेः, दोषसंशोधनः, क्षेमा बहिर्मलानां, स्थूलाणुलोतसां भेत्ता, कर्ता गर्भांकृतीनां, आयुषोऽनुवृत्तिं प्रत्ययभूतो भवत्यकृपितः। कृपितस्तु खलु शरीरे शरीरं नानाविधैर्विकारैरुपतपति बलवर्णसुखायुषासुपधाताय, मनोव्याहर्षयति, सर्वेन्द्रियाण्युपहति, विनिर्हति गर्भान्, विकृति-मापादयति, अतिकालं धारयति, भयशोकमोहदैन्यातिप्रछापान् जनयति, प्राणांश्चोपरुणाधि ।
वायोविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
८७
प्रकृतिभूतस्य खल्वस्य लोके चरतः कर्माणीमानि भवति । तद्यथा धरणी धारणं, ज्वलनोज्वालनम्, आदित्य-चन्द्रनक्षत्रग्रहगणानां संतानगतिविधानम्, सृष्टिश्च भेदानाम्, अपाविसर्गः, प्रवर्तनं स्रोतसम्, पुष्पफलानां चाभि-निर्वर्तनम्, उद्भेदनं चैन्द्रिदानाम्, कृतूनां प्रविभागः प्रविभागो धातूनाम्, धातुमानसंस्थानव्यक्तिः, बीजाभिसंस्कारः शस्यभिर्वर्द्धनमधिक्रिदोपशेषणे, अवैकारिकविकाराश्रयेति ।
प्रकृपितस्य खल्वस्य लोके चरतः कर्माणीमानि भवति । तद्यथा—शिखरि शिखरावमंथनम्, उन्मथनमनोकहानाम्, सागराणाम्, उद्भेदनं सरसाम्, प्रतिसरणमापगानाम्, उत्पीडनं आकंपनं च भूमेः, आधमनमंनुदानाम्, नीहारनिर्हीर्दपांशु-सिकतामस्त्यभेकरगक्षाररूधिराश्माशनिविसर्गः, भावानां चाभावकरणम्, चतुर्गुणांतकराणां भेद्यसूर्यानलानिलानां विसर्गः ।
आगे कांकायन के प्रजापति वाद में वायु के वैदिक विवेचन के साथ साथ इन अंशों का भी तौलनिक दृष्ट्या विवेचन होगा । सारांशः—
सहि भगवान्, प्रभवश्च अन्ययश्च भूतानाम् भावा-भावकरः, सुखासुखयोर्विधाता, मृत्युः, यमः, नियंता, प्रजापतिः, अदीतिः, विश्वकर्मा, विश्वरूपः, सर्वगः,
बार्योविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
८९
प्रकृतिभूताः पुरुषमन्यापत्रेन्द्रियं बलवर्णसुलोपपन्नमायुषा महता उपपादयति, सन्ध्यगेवाऽऽचरिता धर्मार्यकांसा इव निःश्रेयसेन महता पुरुषमिहचामुष्मिन्न लोके, विकृतास्त्वेन महता विपर्य- येणोपपादयति ऋतवःक्षय इव विकृतिमापन्ना लोकमशुभेनो- पधातकाल इति ।
इस पर से यह बिलकुल स्पष्ट है कि इस परिपद में भारद्वाज को छोड़कर अन्य सब ऋषि, पंचात्मक लोकपक्षीय नहीं थे अपितु द्विधात्मक लोकपक्ष को त्रिधात्मक बनाने वाले थे । इसमें वातपित्तश्लेष्माओं के तात्विक स्वरूप पर विचार हुआ और उनका संबंध वायुअग्निसेमसंज्ञक जागतिक धर्मों के साथ प्रस्थापित किया गया । ये समस्त ऋषि गुर्विदि गुणों को प्रधान माननेवाले थे । इनमें कांकायन और पुनर्वसु आत्रेय आत्मा को स्वतःसिद्ध कहते थे और शेष सब ऋषि आत्मा और सत्व को रसज अथवा त्रिधातुज मानते थे । पुनर्वसु आत्रेय को (और कांकायन को भी) त्रिधात्वात्मक सिद्धांत यद्यपि स्वीकृत था तथापि सर्वांश में वे उससे सहमत नहीं थे । क्योंकि इसमें आत्मा या प्रजापति का स्वतः सिद्ध अस्तित्व नहीं माना जाता था, अतः उन्होंने अन्यत्रैकान्तिक 'वचनात्' कहकर अपने मत को सुरक्षित रक्खा ।
कुछ लोग दो बार्योविदों की कल्पना करते हैं पर वह कल्पना ही है । आगे चलकर हम देखेंगे कि इस त्रिधातु-
९०
आयुर्वेद-दर्शन
सिद्धांत का प्रजापतिवाद में और उसका भी पुनर्वसु आत्रेय के त्रिभागात्मक सिद्धांत में किस प्रकार समन्वय हुआ। अस्तु।
शारीरधातुओं का तीसरा वर्गीकरण प्रायः लक्षणस्कंध से संबंध रखता है। इसका अस्पष्ट आरंभ यद्यपि ‘वातादीनां रसादीनां मलानामोजसस्तथा’ (च. सू. अ. १७) इसमें दिखाई देता है तथापि उसका संशोधित रूप ‘दोष, धातु, मल, मूलं हि शरीरम्’ (सु. सू. अ. १५) इसीमें व्यक्त हुआ है। इसमें शारीरधातुओं के दोष, धातु और मल संज्ञक तीन प्रधान विभाग किये हैं।
हिरण्याक्ष कुशिक और षड्धातु वाद
वायोंविद के बाद हिरण्याक्ष ने कहा किः—
हिरण्याक्षस्तुनेत्याह नक्षात्मा रसजस्मृतः । नार्ताद्रियं मनः संति रोगाः शब्दादिजास्तथा ॥
अर्थात् रस को पुरुषरोगोत्पादक कहना उचित नहीं है । क्योंकि आत्मा, रसज नहीं है; अर्ताद्रिय मन, रसज नहीं है और शब्दादि अर्थों के हीनमिथ्यातियोग से पैदा होने वाले रोग भी रसज नहीं हैं ।
वायोंविद आत्मा को रसज कहते थे । वायोंविद को शब्दादि अर्थों के हीनमिथ्यातियोग से रोगों का पैदा होना यद्यपि मान्य था तथापि उनका यह कथन था कि शब्दादि जन्म रोगों कि वह में सत्त्ववादी जिस सत्त्व को कारण मानते हैं वह सत्त्व भी जब कि रस से ही पैदा होता है तब रस ही इनका कारण है । हिरण्याक्ष ने वायोंविद के इन विधानों का ही प्रतिवाद किया है । प्रतिवाद के पश्चात् अब स्वकीय मत कहते हैं किः—
षड्धातुजस्तु पुरुषो रोगाः षड्धातुजास्तथा । राशिः षड्धातुजः सांख्यैराद्यैः सम्पारिकीर्तितः ॥
१२
आयुर्वेद-दर्शन
अर्थात् पुरुष, षड्धातुओं से पैदा होता है और रोग भी षड्धातुओं से पैदा होते हैं। आद्यसारंख्यों ने भी (सारंख्यों में इनको ‘आद्यसारंख्य’ कहा जाता था) हेतुज पुरुष को षड्धातुओं का समुदाय ही कहा है।
यज्ञःपुरुषीय परिषद् में हिरण्याक्ष यद्यपि वार्योंविद् के रसवाद का प्रतिवाद करते हुए दिखाई देते हैं तथापि ये मुख्यतः भारद्वाज के धातुपंचकवाद के प्रतिस्पर्धी हैं।
हम यहां यह कहने का साहस करते हैं कि हिरण्याक्ष जिस षड्धातुवाद का समर्थन करते हैं उसका अभ्युत्थान भी ऐतिहासिक दृष्ट्या धातुपंचकवाद में से ही हुआ होगा।
धातुपंचकवाद में आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इनको ‘अभूत’ और समस्त अचेतन सचेतन जगत् के ‘धारक’ कहा जाता था। और चेतना को इनका ही परिणाम माना जाता था। फलतः गर्भोत्पत्ति के विषय में भारद्वाज का यह कथन था किः—
गर्भस्तु खलु अंतरिक्षवाण्वगितोयभूमिविकारश्चेतनाधिष्ठान भूतः। (च. शा. अ. ४) अर्थात् गर्भ आकाशादि धातुपंचक का विकार होकर चेतना का अधिष्ठान है।
किंतु जिनको यह ज्ञात हो गया था कि चेतनाधातु ही स्वतः सिद्ध है और आकाशादिक ‘भूत’ अर्थात् पैदा हुए
हिरण्यगक्ष कुशिक और षड्धातु वाद
९३
हैं वे गर्भ को, शरीर को, अथवा धातुपंचक को चेतना का अधिष्ठान कहना स्वीकार नहीं करते थे अपितु चेतनाधातु को ही उनका सबका अधिष्ठान कहते थे। अतः उनका यह कथन था कि:—
एवम् अनया एव युक्त्या पंचमहाभूतविकारसमुदाया- त्मको गर्भः। चेतना तु अधिष्ठान भूतः। स हि अस्य षष्ठो- धातुरुक्तः। ( च. शा. अ. ४ ) अर्थात् इस युक्ति स इतना ही सिद्ध होता है कि “ गर्भ, पंचमहाभूतों के विकारों का समुदाय ” है और यह मान्य भी है। पर वह चेतना का अधिष्ठान नहीं है बल्कि चेतना ही उसका अधिष्ठान है। क्योंकि गर्भ के जिस तरह उक्त पांच धातु हैं उसी तरह चेतना भी उसका छठा धातु है।
षड्धातुवादियों का यह सामान्य सिद्धांत है कि:—
खादयश्चेतना षष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः।
चेतनाधातुरन्येकः स्मृतः पुरुष संज्ञकः॥ ( च. शा. )
अर्थात् आकाशादि पांच और चेतना इन छः धातुओं के समुदाय को पुरुष कहते हैं। और अकेला चेतनाधातु भी ‘ पुरुष ’ संज्ञक है। तहां चेतनाधातु-पुरुष के विषय में इनका यह कथन है कि:—
९४
आयुर्वेद-दर्शन
सहि हेतुः कारणं निमित्तमक्षरं कर्ता संता वेदिता बोद्धा द्रष्टा धाता ब्रह्मा विश्वकर्मा विश्वरूपः पुरुषः प्रभवोऽन्ययो नित्यो गुणी ग्रहणं प्राधान्यमन्यत्वं जीवो ज्ञः प्रकृतल्लेखतानावात् विमुभूतात्माचंद्रियात्माचांतरात्माचेति । ( च. शा. अ. ४ )
इस में कतिपय विशेषणों का स्पष्टीकरण आत्मवाद के विवेचन में किया गया है। धाता, ब्रह्मा, विश्वकर्मा, विश्वरूप इत्यादि विशेषण विराट् पुरुष के अथवा लोकाभिमानी पुरुष के उपलक्ष्य में हैं। और भूतात्मा, इंद्रियात्मा, क्षेत्रज्ञ, जीवात्मा इत्यादि विशेषण देहाभिमानी पुरुष के उपलक्ष्य में हैं। तहां भूतात्मा अथवा इंद्रियात्मा को 'शरीरधात्वात्मा' भी कहते हैं। जैसा कि 'शरीरधात्वात्मा शुक्रभूतांऽगान्दगात्संभवति' । ( च. शा. अ. ४ ) क्षेत्रज्ञ, अथवा जीवात्मा कर्मानुसार एक देह को छोड़ कर ( मनोजवो देहमुपैति देहात् ) दूसरे देह में प्रवेश करता है। यथा ' क्षेत्रज्ञः.....दैव संयोगात्.....भूतात्मना सह अन्वक्षं गर्भाशयमनु-प्रविश्यावतिष्ठते । ( सु. शा. अ. ३ )
' गुणी ' यह विशेषण महत्वपूर्ण है। चक्रपाणि दत्त ने इसका अर्थ ' भूतरूपगुणवान् ' करके यह भी कहा है कि ' गुणोऽप्रवान्, प्रधानं चात्मा, तव्यतिरिक्तानि भुतानि गुणाः '। सारांश आत्मा, गुणी होकर आकाशादिक उसके ' गुण ' हैं। आगे भी ' गुणग्रहणाय ' ' गुणोपादानम् ' इत्यादि स्थलों