बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
किसे लगा ? जानते हुए भी तुम अगर नही बताओगे तो तुम्हे पहले वाला ही शाप लगेगा।''
शाप से भयभीत राजा ने जब बेताल की यह बात सुनी तो वह अपना मौन भंग करते हुए बोला— “हे बेताल, सर्प को तो वह पाप लग ही नहीं सकता क्योकि वह तो स्वयं ही विवश था। उसका शत्रु बाज उसे खाने के लिए जा रहा था। खीर देने वाली उस ब्राह्मणी का भी कोई दोष नहीं था क्योंकि वह धर्म में अनुराग रखती थी और उसने अतिथि-धर्म का पालन करते हुए खीर को निर्दोष समझकर ही हरिस्वामी को खाने के लिए दिया था। अतः मैं तो उस जड़बुद्धि हरिस्वामी को ही इसका दोषी मानता हूं, जो खीर को बिना जांच किए, उसका रंग देखे, खा गया था। व्यक्ति को सामने परोसे भोजन की एक नजर जांच तो अवश्य ही करनी चाहिए कि वह कैसा है। इसीलिए तो बुद्धिमान लोग भोजन करने से पहले किसी कुत्ते को टुकड़ा डालकर उसकी परीक्षा करते हैं कि भोजन सामान्य है अथवा जहरीला। अतः मेरे विचार से तो हरिस्वामी ही अपनी मृत्यु का जिम्मेदार है।”
विक्रमादित्य ने बिल्कुल सही उत्तर दिया था, अतः बेताल संतुष्ट हुआ किंतु राजा के मौन भंग करने के कारण फिर उसकी जीत हुई और वह विक्रमादित्य के कंधे से उतरकर पुनः शिंशपा-वृक्ष की ओर उड़ गया। धीर हृदय वाला राजा विक्रमादित्य फिर उसे लाने के लिए उस वृक्ष की ओर चल पड़ा।
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चौदहवां बेताल: वणिक-पुत्री की कथा
चौदहवां बेताल वणिक-पुत्री की कथा
विक्रमादित्य पुनः उस वृक्ष के पास पहुंचा। पहले की ही भांति उसने बेताल को वृक्ष से नीचे उतारा और उसे कंधे पर डालकर खामोशी से उस योगी के पास चल पड़ा। रास्ते मे फिर बेताल ने मौन भंग करते हुए कहा—‘‘राजन ! तुम थक गए हो, इसलिए तुम्हारे मार्ग की थकान दूर करने के लिए तुम्हें इस बार एक विचित्र कथा सुनाता हूं।’’
आर्यावर्त्त में अयोध्या नाम की एक नगरी है। कभी वह नगरी, राक्षस कुल का नाश करने वाले श्री रामचन्द्र के रूप में अवतरित भगवान विष्णु की राजधानी थी। वहां वीरकेतु नाम का एक महाबाहु राजा हुआ करता था, जो उसी प्रकार उस नगर की रक्षा करता था, जैसे नगरी की रक्षा उसकी चारदीवारियां करती हैं।
उस राजा के राज्य की एक नगरी मे रत्नदत्त नाम का एक धनी वणिक रहता था। वह वणिक समूचे वणिक समाज का नायक था। दमयंती नाम की उसकी पत्नी से उसके यहां रत्नवती नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई, जो देवताओं की आराधना से प्राप्त हुई थी। वह मनस्विनी कन्या अपने पिता के घर में रूप-लावण्य, विनय आदि सहज गुणों के साथ बढ़ने लगी।
जब वह युवती हुई, तब रत्नवती से न केवल बड़े-बड़े वणिक ही, अपितु राजा लोग भी विवाह हेतु याचना करने लगे किंतु वह युवती पुरुषों से घृणा करती थी। वह विवाह का नाम सुनते ही अपने प्राण त्यागने को उद्यत हो जाती थी। इकलौती संतान होने के कारण पिता उसकी बात मानने के लिए विवश हो जाता था। धीरे-धीरे यह बात सारी अयोध्या नगरी में फैल चुकी थी।
इस बीच, अयोध्या निवासियो के यहां लगातार चोरियां होने लगीं। तब नगरवासियों ने मिलकर राजा वीरकेतु से निवेदन किया—‘‘हम लोग रोज-रोज चोरों के द्वारा लूटे जाने पर भी हम उन्हे नहीं देख पाते, अतः आप ही इसका कोई उपाय करें।’’
पुरवासियों के ऐसा कहने पर, राजा ने पहरेदारों को आदेश दिया कि वे छिपकर रात के समय उन चोरों का पता लगाएं।
पहरेदारों ने उन चोरो को पकड़ने का भरसक प्रयत्न किया किंतु वे उन चोरों को पकड़ने में असफल रहे। तब राजा ने स्वयं ही उन्हें पकड़ने का निश्चय किया और एक रात अकेला ही उन्हें पकड़ने के लिए निकल पड़ा।
जब रात के समय राजा शस्त्र लेकर चोरो की खोज में घूम रहा था तो एक जगह
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उसने एक अकेले व्यक्ति को एक मकान की चारदीवारी कूदते हुए देखा। वह व्यक्ति बहुत सतर्कता पूर्वक चल रहा था। उसकी आखें शंकित और चंचल थीं तथा वह बार-बार मुड़कर पीछे देखने लगता था।
राजा को संदेह हुआ कि अवश्य ही यही वह चोर है, जो नगर मे चोरियां किया करता है। ऐसा सोचकर वह चोर के निकट पहुंचा। चोर ने उसे अपने समीप आया देखकर उसे भी कोई चोर समझा और जब उसने राजा से उसका परिचय पूछा तो यह कहकर राजा ने उस चोर को संतुष्ट किया कि वह भी एक चोर है।
तब उस चोर ने कहा—‘‘तब तो तुम मेरे ही हमपेशा हुए और कहावत भी है कि चोर-चोर मौसेरे भाई। अतः मित्र तुम मेरे साथ मेरे घर चलो, मैं वहां तुम्हारा उचित स्वागत-सत्कार करूंगा।’’ राजा उसकी बात मानकर उसके घर गया, जो एक वन में खोदी हुई भूमि के नीचे तहखाने के रूप में था।
उस विशाल घर में सुख-सुविधाओं के समस्त साधन मौजूद थे। वहां तेज रोशनी वाले दीपो की रोशनी हो रही थी। राजा जब एक आसन पर बैठ गया, तब चोर घर के एक भीतरी हिस्से में चला गया। कुछ ही समय पश्चात् एक दासी वहां पहुंची और फुसफुसाते स्वर में राजा से बोली—‘‘हे महाभाग, आप यहां मृत्यु के मुख में क्यों चले आए ? यह पापी तो एक कुख्यात चोर है। जब यह बाहर निकलेगा तो निश्चय ही आपके साथ विश्वासघात करेगा। आपके लिए यही अच्छा रहेगा कि आप तुरत यहां से निकल जाएं। ’’
चोर का ठाठ-बाट देखकर बहुत कुछ अनुमान लगा चुका था। अतः उसने दासी के कथनानुसार उस समय वहां से पलायन करना ही उचित समझा और वह चुपचाप वहां से निकलकर अपने महल लौट आया। महल में पहुंचकर उसने तुरंत अपनी सेना की एक बड़ी-सी टुकड़ी को तैयार किया और सैनिकों को ले जाकर उस चोर के आवास को चारों ओर से घेर लिया। चोर ने जब इस प्रकार अपने को घिरा हुआ देखा तो वह समझ गया कि उसका भेद खुल गया है, इसलिए वह मरने का निश्चय करके युद्ध के लिए बाहर निकल आया।
उस चोर ने राजा की सेना के साथ अकेले ही जमकर खूब लोहा लिया। पर अंत में राजा ने उसे निःशस्त्र करके पकड़ ही लिया। राजा उस चोर को बांधकर उसके घर की सारी वस्तुएं और धन लेकर महल लौट आया। सवेरा होने पर उसने उस चोर को सूली पर चढाकर प्राणदण्ड का आदेश दे दिया।
डौंडी पीटकर जब उस चोर को वध-भूमि में ले जाया जा रहा था, तब अपने महल की छत पर से उस वणिक-कन्या रत्नावती ने उसे देखा। वह चोर घायल था, उसके अंग धूल से भरे थे, फिर भी रत्नावती उसे देखकर कामवश हो गई। उसने जाकर अपने पिता से कहा—‘‘पिताजी, जिस पुरुष को ये लोग वध करने ले जा रहा है, मैने मन-ही-मन उसे अपना पति स्वीकार कर लिया है। अतः आप राजा से
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कहकर उसकी प्राण-रक्षा करे, अन्यथा मैं भी उसके पीछे अपने प्राण त्याग दूंगी।''
यह सुनकर वणिक को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने अपनी पुत्री से कहा—‘‘पुत्री यह तुम क्या कह रही हो ? तुम तो उन राजाओं को भी अपना पति नहीं बनाना चाहती जो तुम्हारी कामना करते रहते हैं। फिर भी तुम विपत्ति में पड़े हुए इस दुष्ट चोर की इच्छा कैसे कर रही हो ?’’
वणिक ने अपनी पुत्री को बहुत समझाया कि वह उस चोर को पति रूप में पाने की अपनी हठ छोड़ दे किंतु रलावती टस-से-मस न हुई और वह बार-बार अपने प्राण त्यागने की धमकी देती रही।
तब वह वणिक शीघ्रता से राजा के पास पहुंचा और अपना सब देकर भी राजा से उस चोर की मुक्ति मांगी। किंतु राजा ने सौ-करोड़ स्वर्ण मुद्राओं के बदले भी उस चोर को मुक्त करने से स्पष्ट इन्कार कर दिया। वणिक असफल होकर घर लौटा और जब उसने राजा के इन्कार के बारे में रलावती को बताया तो वह हठीली भी सबके समझाने-बुझाने के बाद भी चोर के साथ ही मरने को तैयार हो गई।
वह स्नान करके एक पालकी में बैठकर वध-भूमि में गई। पीछे-पीछे रोते हुए उसके माता-पिता एवं बंधु-बांधव भी वध-भूमि में पहुंच गए।
इसी बीच वधिकों (जल्लादों) ने चोर को सूली पर चढ़ा दिया था। सूली पर टंगे हुए उसके प्राण छटपटा रहे थे, तभी अपने कुटुम्बियों के साथ आती हुई रलावती पर उसकी निगाह पड़ी। लोगों से उसका वृत्तांत सुनकर उस चोर ने क्षण-भर तो आंसू बहाए, फिर वह खिलखिलाकर हंस पड़ा और ऐसी ही अवस्था में उसने अपने प्राण त्याग दिए।
बाद में उस साध्वी वणिक-पुत्री ने उस चोर के शरीर को सूली पर से उतरवाया और उसे लेकर श्मशान भूमि में उसके साथ चिता में जलने के लिए बैठ गई।
उसी समय आकाशवाणी और उस श्मशान में भगवान शिव ने अदृश्य रूप पहुचकर कहा—‘‘पतिव्रते ! स्वयं मरे हुए इस पति के प्रति तुमने जो भक्ति दिखलाई है, उससे मैं संतुष्ट हुआ हूं, अतः मुझसे कोई वर मांगो।’’
यह सुनकर रलावती ने देवाधिदेव महादेव को प्रणाम करके उनसे यह वर मांगा—‘‘हे देव ! मेरे पिता का कोई पुत्र नहीं है, उनको सौ पुत्रों की प्राप्ति हो। मेरे अतिरिक्त उनके यहां कोई संतान नहीं है अतः मेरे बिना वे जीवित नहीं रहेंगे।’’
उस साध्वी के ऐसा कहने पर भगवान शिव उससे पुनः बोले—‘‘तुम्हारे पिता को सौ पुत्र प्राप्त होंगे लेकिन तुम कोई दूसरा वर मांगो क्योंकि तुम्हारे जैसी वीर हृदय के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है।‘’
यह सुनकर उसने कहा—‘‘हे प्रभु ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे पति जीवित हो जाएं और धर्म में इनकी मति स्थिर रहे।‘’
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‘‘ऐसा ही होगा। तुम्हारा पति अक्षत शरीर जी उठे, धर्म में इसकी मति स्थिर रहे और राजा वीरकेतु इस पर प्रसन्न हो।’’ आकाश से अदृश्य रूप में स्थित भगवान शिव ने ज्योंही ऐसा कहा, त्योंही वह चोर अक्षत अक्षत शरीर जीवित होकर उठ बैठा।
यह देख वणिक रलदत्त विस्मित भी हुआ और प्रसन्न भी। वह प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुत्री और जमाता को अपने बंधु-बांधवों सहित अपने घर ले गया। बाद में, पुत्र प्राप्ति का वर पाये हुए रलदत्त ने प्रसन्नतापूर्वक खूब धूमधाम से एक उत्सव का आयोजन किया, जिसमे उसने राजा सहित पूरे नगर को भोज के लिए आमंत्रित किया।
जब राजा ने यह समाचार सुना तो संतुष्ट होकर उसने चोर को बुलाकर अपना सेनापति बना दिया। उस अद्वितीय वीर चोर ने भी चोरी की वृत्ति छोड़ दी और उस वणिक-पुत्री से विवाह करके, राजा के अनुकूल रहकर सन्मार्ग अपना लिया।
राजा को यह कथा सुनाकर और उसे शाप का भय दिखाकर, उसके कंधे पर बैठे बेताल ने पूछा—‘‘राजन, अब तुम यह बताओ कि उस वणिक-पुत्री को अपने माता-पिता के साथ आई देखकर सूली पर टंगा हुआ वह चोर पहले रोया क्यों और फिर हंसा क्यों ?’’
राजा ने उत्तर में कहा—‘‘बेताल ! वह चोर रोया तो इस दुख से था कि ‘यह वणिक जो मेरा अकारण बंधु बना, उससे मैं उऋण नहीं हो सका और हंसा इस विस्मय से कि ‘पति रूप में राजाओं का भी तिरस्कार करने वाली यह कन्या, ऐसी स्थिति में पड़े हुए मेरे प्रति कैसे अनुरक्त हो गई ?’ सच है, स्त्री का चित्त बड़ा विचित्र होता है।’’
राजा से अपने प्रश्न का सटीक उत्तर पाकर वह मायावी बेताल अपनी शक्ति के द्वारा राजा के कंधे से उतरकर पुनः शिशपा-वृक्ष की ओर उड़ गया। राजा भी पहले ही की तरह उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।
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पंद्रहवां बेताल: शशिप्रभा की कथा
पंद्रहवां बेताल
शशिप्रभा की कथा
पहले की ही भांति राजा विक्रमादित्य पुनः उस शिशपा-वृक्ष के पास जा पहुंचा। बेताल को उतारकर कंधे पर डाला और खामोशी से अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा। रास्ते में फिर बेताल ने मौन भंग करते हुए कहा—"राजन ! सचमुच ही तुम बहुत परिश्रम कर रहे हो, तुम्हारे श्रम को भुलाने के लिए इस बार मैं तुम्हें यह कथा सुनाता हूं किंतु शर्त वही रहेगी कि कथा के दौरान तुम मौन धारण किए रहोगे। यदि तुमने मौन भंग किया तो मैं पुनः अपने स्थान पर लौट जाऊंगा।"
विक्रमादित्य ने सहमति जताई तो बेताल ने उन्हें यह कथा सुनाई।
नेपाल में शिवपुर नाम का एक नगर था। वहां यशःकेतु नाम का एक राजा राज करता था। वह राजा अपने नाम के अनुसार ही यशस्वी था। प्रज्ञासागर नाम के अपने मंत्री को राज्यभार सौंपकर वह चंद्रप्रभा नाम की अपनी रानी के साथ सुख-भोग करता था। समय पाकर अपनी रानी से उसे शशिप्रभा नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई। जब वह कन्या युवती हुई, तब एक बार बसंत ऋतु में यात्रा उत्सव देखने के लिए राजा अपनी रानी एवं कन्या सहित यात्रा का मेले देखने के लिए निकले।
उस मेले में एक धनी बाप का बेटा मनःस्वामी नाम का एक ब्राह्मण भी आया हुआ था। मेले के एक भाग में फूल चुनने को उद्यत उसने शशिप्रभा को देखा तो उस पर मोहित हो गया। मनःस्वामी सोचने लगा—'क्या यह रति है, जो कामदेव का बाण बनाने के लिए बसंत के द्वारा सुसज्जित पुष्पों को एकत्र कर रही है अथवा यह कोई वनदेवी है जो बसत-पूजन करने की इच्छा रखती है ?' वह ऐसा सोच ही रहा था कि उस राजकुमारी ने भी उसे देख लिया। कामदेव के समान मनःस्वामी को देखते ही वह भी उत्कंठित हो गई। तब न उसे फूलों की सुध-बुध रही, न अपने अंगों तथा अपने शरीर की। इस प्रकार वे एक-दूसरे के प्रेमरस में लीन रहे। उसी समय 'हाय-हाय' का शोर सुनाई दिया।
'क्या हुआ' यह जानने के लिए कंधे उचकाकर जब उन दोनों ने देखा तो उन्हें दौड़कर आता हुआ एक उन्मत्त हाथी दिखाई पड़ा। किसी दूसरे हाथी की गंध पाकर वह हाथी उन्मत्त हो गया था जो अपने खूंटों को उखाड़कर वृक्षों को रौंदता हुआ उसी दिशा में आ रहा था। उस पर महावत का एक अंकुश भी लटका दिखाई दे रहा था।
उसे देखकर भय से घबराए हुए राजकुमारी के अंगरक्षक भाग निकले। तब मनःस्वामी ने दौड़कर अकेले ही राजकुमारी को अपने दोनो हाथों से उठा लिया।
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राजकुमारी को, जो उसके अंगों से थोड़ा सटी हुई थी और भय, प्रीति एवं लज्जा से व्याकुल हो रही थी, मनःस्वामी हाथी की पहुंच से बाहर, उसे बहुत दूर ले गया।
जब उसके रक्षक निकट आए तो उन्होंने मनःस्वामी की बहुत प्रशंसा की ओर राजकुमारी को उसके महल में ले गए। जाती हुई राजकुमारी बार-बार पलटकर मनःस्वामी को देखती जाती थी।
अपने महल में विकल होकर, वह अपने प्राणरक्षक का स्मरण करती हुई कामाग्नि में दिन-रात जलती हुई-सी रहने लगी।
राजकुमारी अपने अन्तःपुर में चली गई, यह देखकर मनःस्वामी भी उस उद्यान से लौट आया और उत्कंठित होकर सोचने लगा—‘‘इसके बिना अब मुझमें जीने का उत्साह नहीं रह गया। अतः वह अपने सिद्ध और धूर्त गुरु मूलदेव के पास पहुंचा। मूलदेव अपने शशि नामक एक मित्र के साथ रहता था। उन्होंने माया के अद्भुत मार्ग सिद्ध कर लिए थे। अतः उन्हें मायावी शक्तियों का बहुत ज्ञान था। मनःस्वामी ने उनके पास जाकर जब अपनी समस्या बताई तो मूलदेव ने उसे पूरा करने का आश्वासन दे दिया।
अनन्तर, धूर्त शिरोमणि उस मूलदेव ने अपने मुंह में एक मंत्र सिद्ध गोली डाल ली और अपने को एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में बदल लिया। एक दूसरी गोली उसने मनःस्वामी के मुंह में डालने को दी, जिससे वह एक सुन्दर कन्या बन गया।
मूलदेव मनःस्वामी को लेकर उस राजकुमारी के पिता के पास पहुंचा और उसके पिता से बोला—‘‘राजन ! मेरा एक ही पुत्र है। मैं उसके लिए दूर से मांगकर इस कन्या को लाया हूं किंतु इसी बीच मेरे पुत्र न जाने कहां चला गया है। मैं उसे ढूंढ़ने के लिए जा रहा हूं। अतः इस कन्या को आप अपने पास रख लें। आपके विश्वास पर, इसे आपके आश्रय में रखकर, मैं अपने पुत्र को ढूंढ़कर ले आऊंगा। ’’
यह सोचकर कि इन्कार करने पर कहीं यह सिद्ध पुरुष क्रुद्ध होकर कोई शाप न दे दे, राजा यशःकेतु ने उसकी बात स्वीकार कर ली और अपनी कन्या शशिप्रभा को बुलाकर कहा—‘‘बेटी ! तुम इस कन्या को अपने महल में ही रखना और इसका हर तरह से ख्याल रखना। इसे किसी भी वस्तु की आवश्यकता हो, उसे भली-भांति पूर्ण करना।’’
राजकुमारी ने अपने पिता की आज्ञा शिरोधार्य की और वह कन्या बने मनःस्वामी को अपने राजमहल में ले गई।
महल में आई इस कन्या के साथ राजकुमारी थोड़े ही दिनों में हिल-मिल गई और उस पर सखियों जैसी प्रीति तथा विश्वास करने लगी। एक बार, रात के समय जब कन्या के वेश में अपने को छिपाए हुए मनःस्वामी राजकुमारी की शय्या के निकट ही एकान्त में सोया हुआ था, तब उसने विरह से व्याकुल राजकुमारी से, जो अपनी सेज पर छटपटा रही थी, पूछा—‘‘सखी, तुम्हारी कान्ति पीली पड़ गई है, तुम
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दिन-प्रतिदिन दुबली होती जा रही हो। शशिप्रभा, तुम ऐसी दुखी प्रतीत हो रही हो जैसे अपने प्रियतम से तुम्हारा विछोह हो गया हो। मुझे सारी बात सच-सच बताओ क्योकि सखियों से दुराव उचित नही होता। यदि तुम मुझे सारी बाते सच नही बताओगी तो मै अन्न-जल त्यागकर आमरण अनशन शुरू कर दूंगी। "
यह सुनकर राजकुमारी ने गहरी सास ली और धीरे से कहा—"सखी, भला तुम पर अविश्वास कैसा ? तुम अगर जानना चाहती हो तो सुनो—एक बार मै बसंतोद्यान मे होने वाली यात्रा देखने गई थी। वहां मैने एक सुन्दर ब्राह्मण कुमार को देखा। उसकी सुंदरता हिमयुक्त चंद्रमा के समान थी। उसे देखते ही मेरी कामना उद्दीप्त होने लगी। मै उसके चेहरे की ओर एकटक देखने लगी। तभी कालमेघ के समान चिघाड़ता हुआ एक हाथी वहां आया। उसने अपना बंधन तोड़ दिया था। उस हाथी के माथे से मद-जल झर रहा था। उस विशालकाय हाथी को देखकर मेरे अंगरक्षक भाग खड़े हुए। मै भी बेहद भयभीत हो उठी। तभी तीर के समान वह ब्राह्मण कुमार मेरी ओर लपका और मुझे अपनी बाहों में उठाकर हाथी की पहुंच से दूर ले गया। चंदन लगे अमृत से सिक्त जैसे उसके शरीर के स्पर्श से मेरी दशा न जाने कैसी हो गई। मै उसके शरीर के स्पर्श का आनंद लेती रही। स्वयं को उसकी गोद से उतारने का मैने तनिक भी प्रयास नहीं किया। तभी मेरे रक्षक आ पहुंचे और मै लाचार होकर उनके साथ वापस महल चली आई। तभी से अपनी रक्षा करने वाले उस युवक को मै सपनों में देखती रहती हूं। मैं सोते समय स्वप्न में देखती हूं कि वह मेरी खुशामद कर रहा है और सहसा चुम्बन-आलिंगन के द्वारा मेरी लज्जा दूर करने का प्रयत्न करता है किंतु मैं अभागिनी उसका नाम आदि न जानने के कारण उसे पा नहीं सकती। इस तरह प्रियतम के विरह की आग मेरा हृदय जलाती रहती है।"
राजकन्या की इन बातो से कन्या का रूप धारण किए हुए उस ब्राह्मण युवक मनःस्वामी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसे लगा जैसे किसी ने अमृतरस पिला दिया हो। उसने कृतार्थ होकर और अपने को प्रकट करने का अवसर जानकर अपने मुंह से गोली निकाली और अपना असली रूप धारण कर लिया। उसने कहा—"हे चंचल आंखों वाली, मैं ही वह व्यक्ति हूं जिसे उस उद्यान में दर्शन देकर तुमने खरीद लिया था। हे सुन्दरी ! पल-भर के परिचय के बाद ही तुमसे अलग होने पर मुझे जो कष्ट हुआ, उसी का यह परिणाम है कि मुझे स्त्री का रूप धारण करना पड़ा है। अतः मेरी और अपनी इस असहाय विरह व्यथा को दूर करो क्योकि मै इससे अधिक विरह व्यथा सहन नही कर सकता।"
अपने प्रियतम को सामने पाकर शशिप्रभा भाव-विह्वल हो उठी और प्रसन्नता से मनःस्वामी से ऐसे चिपक गई जैसे कोई लता, वृक्ष से चिपकती है। उन्होंने उसी समय गांधर्व विधि से विवाह कर लिया। फिर दोनों प्रेमी अपनी इच्छा के अनुसार सुख-भोग करने लगे।
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इस प्रकार सफल मनोरथ वाला वह मनःस्वामी दो रूप धारण करके राजमहल में ही रहने लगा। दिन में मुंह में गोली डालकर वह स्त्री बन जाता था और रात को गोली निकालकर पुरुष।
कुछ समय बीतने के पश्चात् एक दिन राजा यशःकेतु के साले मृगांकदत्त ने अपनी कन्या मृगांकवती का विवाह प्रज्ञासागर नामक ब्राह्मण महामंत्री के पुत्र से कर दिया। विवाह के पश्चात् उन्होंने प्रज्ञासागर को बहुत-सा धन भी दिया। विवाह का निमंत्रण पाकर राजकुमारी शशिप्रभा अपनी ममेरी बहन के विवाह में सम्मिलित होने के लिए अपने मामा के घर चली गई। उसके साथ उसकी सहेलियां और अनुचरियां भी गईं। सुन्दर स्त्री का रूप धारण किए मनःस्वामी भी उनके साथ गया। वहां जब मंत्री के पुत्र ने स्त्री का रूप धारण किए मनःस्वामी को देखा तो वह उसकी सुन्दरता पर मुग्ध हो गया और उसे प्राप्त करने की इच्छा करने लगा। उस कपट कन्या (मनःस्वामी) ने मंत्री के पुत्र का चित्त चुरा लिया था। वह जब अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ घर लौटा, तब उसे सब कुछ सूना-सा जान पड़ा।
मंत्री के पुत्र का मन हर पल उसी के रूप-लावण्य के ध्यान में रमा रहने लगा। अन्ततः वह एक दिन तीव्र अनुराग के सर्प से डसा जैसे पागल-सा हो उठा। मंत्रीपुत्र के बंधु-बांधव यह सोचकर घबरा उठे कि 'यह क्या हुआ ?' हंसी-खुशी का उत्सव रोक दिया गया। यह वृत्तांत सुनकर उसका पिता प्रज्ञासागर भी वहां आ पहुंचा।
पिता ने जब उसे दिलासा दी तो उसे कुछ होश आया। उसने उन्माद में प्रलय करते हुए अपनी मनोकामना अपने पिता को कह सुनाई।
उसके पिता ने जब यह देखा कि स्थिति उसके हाथ से बाहर हो गई है तो वह बहुत व्याकुल हुआ। सारा वृत्तांत जानकर राजा भी वहां पहुंचे।
राजा ने जाकर देखा कि मनःस्वामी से गहरी वासना के कारण वह सातवीं मदनावस्था में पहुंच चुका है, तब शीघ्र ही उन्होंने अपने प्रजाजनो से कहा- "ब्राह्मण जिस कन्या को मेरे यहां रखकर गया है, उसे मै इसको कैसे दे दूं ? लेकिन यह भी सत्य है कि उसके बिना यह अन्तिम दशा में पहुंच जाएगा। इसके मरने पर मेरा मंत्री भी जीवित न रहेगा, जो इसका पिता है। अब आप लोग ही बतलाइए कि क्या करना चाहिए ?"
मदनावस्था की दस दशाएं बताई गई हैं जो इस प्रकार हैं:-अभिलाषा, चिंता, स्मृति, गुणानुवाद, उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, जड़ता और स्मरण।
राजा की यह बातें सुनकर सभी प्रजाजनों ने कहा- "राजा का धर्म तो यही कहा गया है कि वह प्रजा के धर्म की रक्षा करे। धर्मरक्षा का मूल है, परामर्श और वह परामर्श मंत्रियों से ही मिलता है। इस प्रकार, मंत्री की मृत्यु से उस मूल का नाश हो जाता है अतः धर्म की हानि नहीं होने देनी चाहिए। पुत्र सहित इसे मंत्री का वध करने का पाप लगेगा, अतः इसकी रक्षा अवश्य करनी चाहिए और आसन्न धर्म-हानि
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को रोकना चाहिए। ब्राह्मण जो कन्या आपके यहां छोड़ गया है, उससे मंत्रीपुत्र का विवाह कर देना चाहिए। ब्राह्मण जब लौटकर आएगा और क्रोध करेगा, तब उसका प्रबंध कर लिया जाएगा।"
प्रजाजनो का यह कहना राजा ने मान लिया। वह उस बनी हुई कन्या को मंत्रीपुत्र के हाथो सौंपने के लिए शुभ-मुहूर्त निश्चित करके राजकुमारी के घर से उसे ले आया। तब कन्या-रूप वाले मन स्वामी ने राजा से कहा—'महाराज ! मै दूसरे के द्वारा किसी अन्य पुरुष के लिए लाई गई हूं। हे राजन ! यदि फिर भी आप मुझे किसी और को देना चाहते हैं तो वैसा ही करे। इससे जो धर्म या अधर्म होगा, वह आपका होगा। मै विवाह तो करूंगी लेकिन तब तक अपने पति की सेज पर नहीं जाऊंगी जब-तक कि ब्राह्मण छ माह का तीर्थ भ्रमण करके नहीं लौटेंगे। यदि ऐसा नही हुआ तो मै दातों से अपनी जीभ काटकर अपना प्राणांत कर लूंगी।'
कन्या का रूप धारण करने वाले मनःस्वामी ने जब यह कहा तो राजा ने जाकर मंत्रीपुत्र को समझाया। उसने भी निश्चिंत होकर यह बात मान ली और शीघ्र ही उससे विवाह कर लिया।
अनन्तर, एक ही सुरक्षित घर में अपनी पहली पत्नी मृगांकवती और उस बनावटी पत्नी को रखकर, स्त्री को प्रसन्न करने की इच्छा से वह मूर्ख तीर्थयात्रा के लिए बाहर चला गया। तत्पश्चात् स्त्री रूप धारण किए मनःस्वामी मृगांकवती के साथ एक ही महल में रहने लगा।
मनःस्वामी को इस प्रकार वहां रहते हुए कुछ समय बीत गया। एक बार रात में जब वह मृगांकवती के शयनकक्ष में लेटा हुआ था और परिचारिकाएं बाहर सो रही थीं, तभी उससे मृगांकवती ने एकांत में कहा—"सखी, मुझे नींद नहीं आ रही, कोई कथा सुनाओ।"
यह सुकर मनःस्वामी ने उसे वह कथा सुनाई जिसमें प्राचीन काल में सूर्यवंश के ऐल नामक राजश्री को गौरी के शाप से संसार को मोहित करने वाला स्त्री-रूप प्राप्त हुआ था। नंदनवन मे उसे देखकर बुध मोहित हो गए थे और एक-दूसरे की प्रीति मे हुए उनके संभोग से पुरुस्वा का जन्म हुआ था।
यह कथा सुनाकर उस धूर्त ने पुनः कहा—"इस तरह देवताओं के आदेश या मंत्र और औषधियों के प्रभाव से कभी-कभी पुरुष स्त्री बन जाते हैं और कभी स्त्री पुरुष बन जाती है। इस प्रकार कभी-कभी बड़ों में भी कामज संयोग हुआ करते हैं।"
मृगांकवती को विवाह के बाद ही उसका पति छोड़ गया था। मनःस्वामी के साथ रहने के कारण उसे उस पर भरोसा हो गया था। मनःस्वामी की बात सुनकर उसने कहा—"सखी, तुम्हारी यह कथा सुनते ही मेरा शरीर कांपने लगा है, हृदय बैठा-सा जा रहा है, बताओ तो भला यह कैसी बात है?"
यह सुनकर स्त्री बना मनःस्वामी उससे बोला—"सखी, तुममें काम की जागृति 92 ▢ बेताल पच्चीसी
के यह अपूर्व लक्षण हैं। मैं तो इसका अनुभव कर चुकी हूं पर तुमसे मैने नही कहा। ’’
उसके ऐसा कहने पर मृगांकवती धीरे से बोली—‘‘सखी, तुम मेरे प्राणो के समान मुझे प्रिय हो। तुम समय को भी पहचानती हो। अतः मैं तुमसे क्या छिपाऊ। किसी प्रकार से यहां किसी पुरुष का प्रवेश हो पाता, तो अच्छा था। ’’
मृगांकवती के ऐसा कहने पर धूर्त मनःस्वामी उसका आशय समय गया और बोला—‘‘यदि तुम्हारी ऐसी ही इच्छा है तो तुम चिन्ता मत करो सखी। भगवान विष्णु की कृपा से मुझे एक ऐसा वरदान प्राप्त है कि मै अपनी इच्छा से जब चाहूं स्त्री बन जाऊ और जब चाहू पुरुष। अगर तुम चाहती हो तो मैं तुम्हारे लिए पुरुष बन जाती हू। ’’
ऐसा कहकर मनःस्वामी ने अपने मुख से गोली निकाल ली और उसने यौवन से उद्दीप्त अपना सुन्दर पुरुष-रूप उसे दिखलाया। इस तरह जब वे एक-दूसरे का विश्वास प्राप्त कर चुके और उनकी सारी यन्त्रणाए जाती रहीं तो समय के अनुसार वे सुख-भोग करने लगे। अनन्तर, मंत्रीपुत्र की उस भार्या के साथ वह ब्राह्मण दिन को स्त्री और रात को पुरुष बनकर भोग-विलास मे लिप्त रहने लगा।
कुछ समय बाद मंत्रीपुत्र के लौटने का समय निकट आया, तो जान-बूझकर मनःस्वामी मृगांकवती के साथ रात के समय भागकर चला गया। इन्हीं घटनाओं के बीच, सारा वृत्तांत सुनकर उसका गुरु मूलदेव बूढ़े ब्राह्मण के रूप मे वहां फिर आया। उसके साथ युवक ब्राह्मण के रूप में उसका मित्र शशि भी आया। मूलदेव ने आकर राजा यशःकेतु से नम्रतापूर्वक कहा—‘‘मै अपने पुत्र को ले आया हूं राजन। अब मेरी बहू मुझे लौटा दीजिए। ’’
तब शाप के भय से डरे हुए राजा ने सोच-विचार के साथ कहा—‘‘हे ब्राह्मण, आपकी बहु तो न जाने कहां चली गई, अतः आप मुझे क्षमा करे। अपने अपराध के कारण मैं आपके पुत्र के लिए अपनी कन्या देता हूं। ’’
इस पर बूढ़ा ब्राह्मण धूर्तराज मूलदेव उसे बुरा-भला कहने लगा और उस पर वादे से मुकरने का आरोप लगाने लगा। अन्ततः किसी प्रकार राजा के अनुनय-विनय करने पर वह शांत हुआ और शशिप्रभा का विवाह अपने बनावटी बेटे के साथ होना स्वीकार कर लिया।
धूर्त मूलदेव नवविवाहिता वर-वधू को साथ लेकर अपने स्थान के लिए चल पड़ा। उसने राजा से धन की इच्छा नहीं की। बाद में जब मनःस्वामी वहां आया, तब उसके और शशि के बीच झगड़ा उत्पन्न हुआ। मनःस्वामी ने कहा—‘‘शशिप्रभा को मुझे दे दो। गुरु की कृपा से इस कन्या को पहले मैंने ही ब्याहा था। ’’
शशि बोला—‘‘मूर्ख, तू इसका कौन है ? यह तो मेरी स्त्री है। इसके पिता ने अग्नि को साक्षी मानकर इसको मुझे सौंपा है। ’’
बेताल पच्चीसी 🕮 १३
इस तरह वे दोनों माया के बल से पाई हुई उस राजकुमारी के लिए झगड़ने लगे। लेकिन उनके झगड़े का निबटारा नहीं हो सका।
इतनी कथा सुनाकर बेताल ने विक्रम से पूछा—‘‘हे राजन, अब तुम्हीं मेरा सशय दूर करो कि वह राजकुमारी वस्तुतः किसी स्त्री हुई ? यदि तुम जानते हुए भी मेरा संशय दूर नहीं करोगे तो तुम्हें पहले वाला ही शाप लगेगा। ’’
अपने कधे पर स्थित बेताल की यह बात सुनकर विक्रमादित्य ने उससे कहा—‘‘बेताल, मैं समझता हूं कि न्यायतः वह राजकुमारी, शशि की ही स्त्री मानी जाएगी, जिसे उसके पिता ने सबसे सामने शशि के साथ ब्याहा था। मनःस्वामी ने तो चोरी से गंधर्व विवाह के द्वारा उसे पाया था। पराए धन पर चोर का न्यायसंगत अधिकार कभी नहीं होता। ’’
राजा की ये न्यायसंगत बातें सुनकर बेताल संतुष्ट हुआ और पहले की ही भांति उसके कंधे से अचानक उतरकर पुनः अपनी जगह चला गया।
राजा भी उसे लाने के लिए पुनः वापस लौट पड़ा।
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सोलहवां बेताल: जीमूतवाहन की कथा
सोलहवां बेताल
जीमूतवाहन की कथा
शिशंपा-वृक्ष के पास पहुंचकर विक्रमादित्य ने वृक्ष से बेताल को उतारा और पहले की तरह उसे कंधे पर डालकर मौनभाव से अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा। रास्ते मे फिर मौन भंग करते हुए बेताल ने कहा—‘‘राजन ! इस बार मै तुम्हें ऐक और दिलचस्प कथा सुनाता हूं, पर शर्त वही रहेगी। ’’
राजा ने सहमति जताने पर बेताल ने इस बार यह कथा सुनाई।
बहुत पहले हिमवान पर्वत पर कंचनपुर नाम का एक नगर था। उस नगर का स्वामी जीमूतकेतु नामक एक पराक्रमी राजा था। राजा के महल के उद्यान में उसके पूर्वजों द्वारा देवताओ से प्राप्त एक कल्पवृक्ष था, जो उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करता था। उस देववृक्ष के कारण राजा को धन-धान्य, ऐश्वर्य व वैभव की कोई कमी नहीं रहती थी। उस कल्पवृक्ष की कृपा से ही राजा को जीमूतवाहन नाम का एक पुत्र पैदा हुआ था जो अब युवावस्था में प्रवेश कर चुका था। जीमूतवाहन बहुत दानी था। वह समस्त प्राणियों पर दयाभाव रखता था एवं गुरुजनों की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहता था। जीमूतवाहन क्योकि बोधिसत्व के अश से पैदा हुआ था, अतः उसे अपने पूर्वजन्म का वृत्तांत भी ज्ञात था !
कुछ समय बाद जीमूतकेतु ने उसे अपना युवराज घोषित किया। प्रजा अपने युवराज को पाकर बहुत खुश हुई। एक दिन राजा के मंत्री ने आकर युवराज जीमूतवाहन से कहा—‘‘युवराज, यह धन-धान्य, यह ऐश्वर्य सब कुछ कल्पवृक्ष के कारण ही है। अतः अपने कुल एवं प्रजा की समृद्धि के लिए इस देववृक्ष का सम्मान करना कभी मत भूलना, यह अजेय है। देवराज इन्द्र भी इसका महत्ता को स्वीकार करते हैं।'
युवराज जीमूतवाहन ने वैसा ही करने का वचन दिया। उसने मन ही मन सोचा—‘‘मेरे पूर्वजों ने इस देववृक्ष का उचित लाभ नहीं उठाया। उन्होंने केवल इससे साधारण स्वार्थ की याचना करके इसे स्वयं तक ही सीमित रखा। इससे न केवल उनका (पूर्वजों) अपितु, इस महात्मा वृक्ष का स्थान बहुत छोटा कर दिया। आखिर संसार में और भी तो मानव रहते हैं। इस देववृक्ष का उपयोग समस्त प्राणिमात्र के कल्याण के लिए होना चाहिए। ’’
ऐसा सोचकर वह अपने पिता के पास पहुंचा और बोला—‘‘पिताश्री, यह तो आप जानते ही हैं कि इस संसार-सागर में शरीर के साथ ही समस्त वस्तुएं लहरों की झलक के समान चंचल हैं। संध्या, बिजली और लक्ष्मी तो विशेष रूप से क्षणस्थायी हैं। देखते-ही-देखते मिट जाने वाली हैं। इन्हें कब किसी ने स्थिर रहते देखा है ?
बेताल पच्चीसी ▢ 95
पिताश्री ! इस संसार मे एकमात्र परोपकार ही चिरस्थायी है, जो धैर्य और यश का जन्मदाता है तथा युगों तक उसका साक्षी बना रहता है। तब फिर ऐसे क्षणिक सुखों के लिए हमने ऐसे देवतुल्य परोपकारी कल्पवृक्ष को व्यर्थ ही क्यो रख छोड़ा है ? जरा सोचिए पिताश्री, जिन हमारे पूर्वजों ने इसे 'मेरा है, मेरा है' कहते हुए रख छोड़ा था, आज वे कहा है ? जबकि यह परोपकारी वृक्ष आज भी मौजूद है।"
“तुम क्या कहना चाहते हो पुत्र ?” जीमूतवाहन की बात सुनकर उसके पिता ने भ्रमित होकर पूछा।
इस पर जीमूतवाहन ने कहा—"पिताश्री ! यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं मनोरथ पूर्ण करने वाले इस देववृक्ष का उपयोग परोपकार की फल-सिद्धि के लिए करूँ ?”
पुत्र की इच्छा जानकर जीमूतकेतु ने उसे ऐसा करने की आज्ञा प्रदान कर दी। तब जीमूतवाहन ने उस कल्पवृक्ष के समीप जाकर कहा—"हे देव ! तुमने हमारे पूर्वजो की सभी मनोकामनाएं पूरी की हैं लेकिन मेरी भी एक मात्र मनोकामना पूरी कर दो। कुछ ऐसा करो जिससे मै इस पृथ्वी को दरिद्रतारहित देख सकूं। जाओ, तुम्हारा कल्याण हो, मै धन की इच्छा रखने वालों के लिए तुम्हारा विसर्जन करता हूं।"
युवराज ने हाथ जोड़कर जब यह कहा तो उस वृक्ष से आवाज आई—"तुम धन्य हो राजकुमार। तुम्हारे त्याग की मैं सराहना करता हूं। तुम्हारे पूर्वज मुझे देवताओं से मांगकर लाये थे, इसलिए मैं अब तक वचनबद्ध था। अब तुमने मेरा त्याग कर दिया है तो मैं जाता हूं। तुम्हारा कल्याण हो।" पल-भर बाद ही वह वृक्ष आकाश में उड़ गया और उसने पृथ्वी पर इतना धन बरसाया कि वहां कोई भी गरीब न रहा। जीमूतवाहन के ऐसा करने से उसका यश तीनों लोकों में फैल गया। लोग उसके नाम की जय-जयकार करने लगे।
लेकिन जीमूतवाहन का कल्पवृक्ष को विसर्जन करना उसके बंधु-बांधवों का रास न आया। वे लोग उससे ईर्ष्या करने लगे। उन्होंने एकत्र होकर सोचा कि विपत्तियों का नाश करने वाला कल्पवृक्ष तो अब उनके पास रहा नहीं, उसे तो जीमूतवाहन ने लोक कल्याण के लिए दे डाला, अतः अब कंचनपुर पर सहज ही अधिकार किया जा सकता है। ऐसा सोचकर वे कचनपुर को अधिकार में लेने के लिए युद्ध की तैयारियां करने लगे।
यह देखकर जीमूतवाहन ने अपने पिता से कहा—"पिताश्री, मैं आपके शौर्य को भली-प्रकार जानता हूं। विश्व में ऐसा कौन है जो शूरता में आपका सामना कर सके किंतु सगे-संबंधियों को मारकर इस पापमय और नाशवान शरीर से राजसुख का उपभोग करना सर्वथा अनुचित है। अतः हमें स्वेच्छा से इस राज्य को त्यागकर कहीं अन्यत्र चल देना चाहिए।"
इस पर उसके पिता ने कहा—"पुत्र, मैं तो तुम्हारे लिए ही इस राज्य की
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कामना करता था। जब तुम स्वयं ही इसके त्याग की बात कह रहे हो तो मुझे राज्य का प्रलोभन कैसे हो सकता है। अतः जैसा तुम उचित समझो, वैसा ही करो।''
इस प्रकार जीमूतवाहन अपना राज्य छोड़कर अपने माता-पिता को साथ लेकर मलय पर्वत पर चला गया और चन्दनवन से ढके हुए एक झरने के पास वाली कंदरा में आश्रम बनाकर रहने लगा। वहां विश्वावसु नाम के सिद्धों के राजा रहते थे। उनके पुत्र मित्रावसु से जीमूतवाहन की मित्रता हो गई।
एक बार घूमता-फिरता जीमूतवाहन, उपवन में स्थित भवानी गौरी का मंदिर देखने के लिए गया। वहां उसने सखियों सहित एक उत्तम कन्या को देखा जो भगवती गौरी को प्रसन्न करने के लिए वीणा बजा रही थी। उस अप्सराओं को भी मात करने वाली कन्या का रूप-सौंदर्य देखकर जीमूतवाहन ठगा-सा रह गया। पहली ही निगाह में उस तन्वेगी (सुकुमारी) ने उसका हृदय चुरा लिया। वह कन्या भी कामदेव जैसे सुन्दर जीमूतवाहन को देखकर उस पर मोहित हो गई। वह एकटक उसी की ओर देखने लगी जिससे उसकी वीणा भी विकल आलाप करने लगी।
अनन्तर, जीमूतवाहन ने उसकी एक सखी से उस कन्या का नाम और उसका वंश पूछा। कन्या की सखी ने बताया कि उसका नाम मलयवती है और वह सिद्धो के राजा विश्वावसु की पुत्री तथा मित्रावसु की बहन है। तब उस सखी ने जीमूतवाहन से उसका नाम एवं वंश पूछा। यह जानने पर कि जीमूतवाहन विद्याधरों का राजा है, उसे बहुत खुशी हुई। उसने मलयवती के पास जाकर कहा—‘‘सखी, विश्व में पूजे जाने योग्य महान विद्याधरों के राजा यहां पधारे हैं, तुम्हें आगे बढ़कर उनका स्वागत करना चाहिए।’’
इस पर मलयवती मौन ही रही। लज्जावश उसके कदम आगे न उठ सके। तब उस सखी ने जीमूतवाहन से कहा—‘‘मेरी यह सखी लजा रही है, अतः आप मुझसे ही यह सत्कार ग्रहण करें।’’ ऐसा कहकर उसने एक पुष्पमाला जीमूतवाहन के गले में पहना दी।
तभी एक दासी ने उस सिद्धकन्या के पास आकर बताया—‘‘राजकुमारी, आपकी माता जी आपको याद कर रही है। चलिए, विलम्ब मत कीजिए।’’ तब मलयवती अनमने-से भाव से जीमूतवाहन की ओर देखती हुई वहां से चल पड़ी। उसके कदमों से ऐसा लग रहा था जैसे जीमूतवाहन के पास से वह विवशता में ही जा रही हो। जीमूतवाहन भी अपने आश्रम में लौट आया। उसका भी मन मलयवती में रमा हुआ था। घर आकर मलयवती अपनी माता से मिली और फिर अपने कक्ष में जाकर शय्या पर गिर पड़ी। उसके हृदय में कामाग्नि जल रही थी। उसकी आंखों में आंसू आ गए थे। उसकी सखियों ने उसके सन्ताप से भरे सारे शरीर पर चन्दन का लेप लगाया और कमल के पत्तों से पंखा झला। फिर भी, न तो वह सखियों की गोद में और न भूमि पर सोकर ही चैन पा सकी। रात-भर वह तड़पती ही रही। लज्जा के
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यहाँ छवि में दिए गए पृष्ठ का देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:
भय से उसने किसी दूत को भी जीमूतवाहन के पास नहीं भेजा। उसके जीवन की आशा टूट-सी रही थी। उधर, कामाग्नि से पीडित जीमूतवाहन का भी लगभग वैसा ही हाल था। वह भी रात मुश्किल से व्यतीत कर सका।
सुबह होने पर वह फिर से गौरी के मंदिर में पहुंचा, जहां उसने मलयवती को देखा था। उसका मित्र मुनिकुमार भी उसके पीछे-पीछे आया और उसे कामज्वाला से विह्वल देखकर आश्वासन देने लगा। उसने पाया कि मलयवती भी वहां उपस्थित थी। मुनिकुमार के आश्वासन पर उस सिद्ध कन्या की ओर बढ़ा जो उसकी ही तरफ निहार रही थी।
जब उसे विश्वास हो गया कि राजपुत्री उसका निवेदन ठुकराएगी नहीं, तो उसने फलों की एक माला मलयवती के गले में डाल दी। मलयवती ने अपनी कोमल दृष्टि से जीमूतवाहन को देखते हुए एक नीलकमल की माला उसके गले में पहना दी ! इस प्रकार आपस में एक शब्द बोले बिना ही उन दोनों ने स्वयंवर-विधि पूरी कर ली। तत्पश्चात् वह जीमूतवाहन की ओर प्रेमपूर्ण नजरों से देखती हुई वहां से विदा हो गई। जीमूतवाहन भी, जिसका मन अभी भी राजपुत्री में रमा हुआ था, थके कदमों से वापस अपने आश्रम लौट आया।
अपने-अपने स्थान पर पहुंचकर दोनों ही विरह-वेदना से तड़पने लगे। उस रात भी न तो जीमूतवाहन को ही नींद आई और न मलयवती ही सो सकी।
तीसरे दिन, जब वह बहुत व्याकुल हो गया तो इस आशा से कि शायद उधर, विरह की आग में जलती हुई मलयवती भी उससे मिलने वहां पहुंचेगी वह अपने मित्र मुनिकुमार के साथ उस गौरी माता के मंदिर जा पहुंचा। मलयवती भी वहां तभी पहुंची थी। माता गौरी के मंदिर में पहुंचकर, आंखों में आंसू भरकर मलयवती ने देवी से प्रार्थना की—‘‘हे देवी माता, आपकी भक्ति से मैं इस जन्म में तो जीमूतवाहन को पति रूप में पा नहीं सकूंगी, अतः आपसे प्रार्थना करती हूं कि आप मुझे अगले जन्म में जीमूतवाहन को पति रूप में पाने का आशीर्वाद दीजिए। ’’
यह कहकर उसने अपने साथ लाई एक चादर से अपना गला घोंटना चाहा।
तभी आकाशवाणी हुई—‘‘बेटी, ऐसा दुस्साहस मत करो। विद्याधरों का राजा जीमूतवाहन ही चक्रवर्ती होकर तुम्हारा पति बनेगा।’’ अपने उस मुनिकुमार मित्र के साथ जीमूतवाहन ने भी वह आकाशवाणी सुनी। वे दोनों एक वृक्ष के पीछे खड़े हुए थे। आकाशवाणी सुनकर तत्काल दोनों मलयवती के पास पहुंच गए।
जीमूतवाहन के उस मित्र मुनिकुमार ने मलयवती से कहा—‘‘देखो, देवी का वर सचमुच तुमको इनके रूप में प्राप्त हो गया है। तुम्हारी मनोकामना भी पूरी हो गई। अब आत्महत्या करने की कोई जरूरत नहीं है। ’’
जब मुनिकुमार ऐसा कह रहा था, तभी जीमूतवाहन ने पास जाकर मलयवती के गले से फंदा निकाल दिया। लज्जा के कारण मलयवती आंखें झुकाकर जमीन
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खुरचने लगी। तभी उसे ढूंढ़ती हुई उसकी सखी ने अचानक आकर प्रसन्नतापूर्वक कहा—‘‘सखी, प्रसन्नता की बात है कि तुम्हारा मनोरथ पूरा हुआ। मेरे सामने ही आज कुमार मित्रावसु ने तुम्हारे पिताश्री महाराज विश्वावसु से यह कहा है कि, ‘पिताजी, विद्याधरों के राजा के पुत्र संसार में सम्मानित और कल्पतरु का दान करने वाले जीमूतवाहन, जो अतिथिरूप में यहां उपस्थित हैं; अपनी मलयवती के लिए उनके जैसा कोई और वर नहीं है। अतः आप मलयवती का विवाह उन्हीं के साथ करके कृतार्थ हों।’ महाराज विश्वावसु ने भी कुमार की बात स्वीकार कर ली है इसलिए अब निश्चित है कि तुम्हारा विवाह जीमूतवाहन के साथ ही होगा। अतः अब तुम अपने घर चलो, और ये महाभाग भी अपने स्थान को जाएं। ’’
उस सखी के ऐसा कहने पर हर्ष और उत्कंठा से युक्त राजकुमारी बार-बार मुड़-मुड़कर देखती हुई वहां से चली गई। जीमूतवाहन भी अपने आश्रम की तरफ बढ़ चला। वहां उसने प्रतीक्षारत मित्रावसु से अपने अभीष्ट कार्य की बात सुनी और उसका समर्थन किया।
जीमूतवाहन को अपने पूर्वजन्म का स्मरण था। उसने मित्रावसु को बतलाया कि पूर्वजन्म में भी मित्रावसु उसका मित्र था और उसकी बहन उसकी पत्नी थी।
अनन्तर, मित्रावसु ने प्रसन्न होकर जीमूतवाहन के पिता को यह संवाद भेजा, जिससे वे संतुष्ट हुए। तत्पश्चात् अपने लक्ष्य में सफलता पाने वाले मित्रावसु ने जाकर अपने माता-पिता से भी यह संवाद कहा, तो उन्हें भी प्रसन्नता हुई।
उसी दिन मित्रावसु, जीमूतवाहन को अपने घर ले गया और अपनी क्षमता तथा वैभव के अनुसार आनंद-उत्सव की व्यवस्था करने लगा। उसने उस शुभ दिन में विद्याधरों के स्वामी जीमूतवाहन के साथ अपनी बहन मलयवती का विवाह कर दिया। बाद में जीमूतवाहन, जिसका मनोरथ पूरा हो गया था, अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ वहीं रहता रहा।
एक बार सहज कौतूहल से मित्रावसु के साथ घूमता हुआ जीमूतवाहन समुद्र तट के निकट एक वन में जा पहुंचा। वहां हड्डियों के बड़े-से ढेर को देखकर उसने मित्रावसु से पूछा कि हड्डियों के ये ढेर किन प्राणियों के हैं ?
तब मित्रावसु ने दयालु जीमूतवाहन से कहा—‘‘सुनो, मैं इसका सारा वृत्तांत तुम्हें संक्षेप में सुनाता हूं।’’
प्राचीन काल में सर्पों की माता कद्रू ने गरुड़ की माता विनता को बाजी लगाकर धोखे से हरा दिया और अपनी दासी बना लिया था। बाद में बलवान गरुड़ ने यद्यपि अपनी माता को स्वतंत्र करा लिया फिर भी, उस बैर के कारण वह कद्रू के पुत्र सर्पों से द्वेष रखते हुए उनका भक्षण करने लगा। अक्सर वह पाताल लोक में जाकर कुछ सर्पों को मार डालता और कुछ भय के कारण स्वयं ही मर जाते थे।
तब, नागों के राजा वासुकि को यह चिन्ता हुई कि इस तरह से तो सर्पकुल का विनाश
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ही हो जाएगा। अतः उसने विनयपूर्वक गरुड़ के सामने एक योजना रखी—'हे पक्षीराज, इस दक्षिण समुद्र के किनारे तुम्हारे भोजन के लिए मैं प्रतिदिन एक सर्प भेज दिया करूंगा किंतु तुम किसी प्रकार, किसी भी समय पाताल में नहीं आओगे; क्योंकि एक साथ ही सब सर्पों के नष्ट हो जाने से तुम्हें भी कुछ लाभ नहीं होगा।'
गरुड़ ने भी इसमें अपना लाभ देखा और वासुकि की बात स्वीकार कर ली। पक्षीराज गरुड़ इस तट पर वासुकि द्वारा भेजे हुए एक सर्प को प्रतिदिन खाया करता है। यह उसी के द्वारा खाये गए सर्पों की हड्डियां हैं, जो समय पाकर बढ़ते-बढ़ते अब पर्वत शिखर के समान हो गई हैं।
दया और धैर्य के सागर जीमूतवाहन ने मित्रावसु के मुख से जब यह वृत्तांत सुना तो उसके मन को भारी कष्ट पहुंचा। उसने कहा—"शोक करने के योग्य तो सर्पों का राजा वासुकि है जो ऐसा कायर है कि प्रतिदिन अपनी प्रजा को शत्रु को भेंट कर देता है। हजार मुखवाला यह वासुकि अपने एक मुख से भी यह क्यों नहीं कह सका कि 'गरुड़, पहले तुम मुझे ही खा लो।' प्रतिदिन नगरपलियों का विलाप सुनकर भी उस निर्दयी वासुकि ने अपने कुल का नाश करने वाले गरुड़ से प्रार्थना क्यों की ? अरे, मोह भी कैसा गाढ़ा होता है ! यद्यपि गरुड़ महर्षि कश्यप का पुत्र है, वीर है और भगवान विष्णु का वाहन होने के कारण पवित्र है, फिर भी ऐसा पाप करता है।'
ऐसा कहकर परम पराक्रमी जीमूतवाहन ने मन-ही-मन निश्चय किया कि 'इस नाशवान शरीर से मैं अमरता प्राप्त करूंगा। मैं आज ही अपना शरीर देकर गरुड़ के पंजे से कम-से-कम एक ऐसे सर्प की रक्षा करूंगा जो हितैषियों से रहित तथा डरा हुआ है।'
जीमूतवाहन ऐसा सोच ही रहा था तभी मित्रावसु के पिता के पास से एक प्रतिहारी उन्हें बुलाने के लिए वहां पहुंच गया। जीमूतवाहन ने यह कहकर उसे घर भेज दिया कि 'तुम चलो, मैं कुछ देर बाद आऊंगा।'
मित्रावसु के जाने के बाद जीमूतवाहन वैसे ही इधर-उधर विचरण करने लगा। तभी उसके कानों में किसी के रुदन का स्वर सुनाई पड़ा। वह पास पहुंचा और छिपकर एक शिलाखंड के नीचे खड़ा हो गया। वहां उसने एक वृद्धा नागस्त्री को विलाप करते देखा। उसके समीप ही एक सुंदर-सा काले रंग वाला नागयुवक खड़ा था, जो उस स्त्री से अनुनयपूर्वक उसे घर लौट जाने को कह रहा था।
'यह कौन है ?' इसे जानने को उत्सुक जीमूतवाहन ने छिपकर उनकी बातें सुनीं। वृद्धा स्त्री उस युवक से रोते हुए कह रही थी—' 'हा शंखचूड़, हा सौ-सौ दुखों से पाए हुए मेरे गुणी पुत्र ! हा मेरे कुल के एकमात्र सूत्र, अब मैं फिर तुम्हें कहां देख सकूंगी। हा मेरे कुलदीपक ! तुम्हारे बिना तुम्हारे वृद्ध पिता कैसे अपना बुढ़ापा काट सकेंगे ? तुम्हारे जो अंग सूर्यकिरणों के स्पर्श से भी कुम्हला जाते थे, वे गरुड़ के द्वारा खाये जाने की पीड़ा कैसे सहन कर पाएंगे ? नागलोक तो बहुत बड़ा है, फिर विधाता
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