भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
( २२ ) भैषज्यरत्नावली-
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|---|---|
| पञ्चशतिकावर्त्ति | ... १२०२ | प्रदरान्तकरस | ... १२३३ |
| सप्तामृतलौह | ... १२०३ | प्रदरारिलौह, सर्वाङ्गसुन्दररस | ... १२३४ |
| नयनामृतलौह, नेत्राशनिरस | ... १२०४ | रत्नप्रभावटिका | ... १२३५ |
| पटोलाद्यघृत | ... १२०५ | सितकल्याणाद्यघृत | ... १२३६ |
| शशकाद्यघृत, त्रिफलाद्यघृत १--२ | १२-६ | न्यग्रोधाद्यघृत | ... १२३७ |
| महात्रिफलाद्यघृत | ... १२०७ | विश्ववल्लभघृत, अशोकघृत | ... १२३८ |
| नृपवल्लभतैल और घृत | ... १२०९ | अशोकारिष्ट | ... १२३९ |
| भृङ्गराजतैल, नेत्ररोगमें पथ्य | ... १२१० | प्रदरमें पथ्यापथ्यविधि | ... १२४० |
| नेत्ररोगमें अपथ्य | ... १२११ | योनिव्यापदकी चिकित्सा । | |
| शिरोरोगकी चिकित्सा । | रजःप्रवर्त्तक योग | ... १२४० | |
| सूर्यावर्त्तकी चिकित्सा | १२१२ | रजःप्रवर्त्तिनीवटी,गर्भजनक-भेषज | १२४५ |
| अर्द्धावभेदककी चिकित्सा | १२१३ | नष्टपुष्पान्तकरस | ... १२४६ |
| अनन्तवातकी चिकित्सा | १२१४ | फलघृत | ... १२४७ |
| शङ्खककी चिकित्सा | " | कफलल्याणघृत | ... १२४८ |
| शिरोबस्ति | ... १२१५ | सोमघृत | ... १२४९ |
| अर्द्धनाडीनाटकेश्र्वर, चन्द्रकान्तरस | १२१६ | कुमारकल्पद्रुमघृत | ... १२५० |
| शिरःशूलादिवज्ररस | ... " | लोमशातनविधि | १२५३ |
| महालक्ष्मीविलास | ... १२१७ | आरग्वधाद्यतैल | ... १२५४ |
| मयूराद्यघृत, षड्बिन्दुतैल | ... १२१८ | क्षारतैल | ... १२५५ |
| दशमूलतैल १-२ | ... १२१९ | वन्ध्याकी चिकित्सा | १२५६ |
| मध्यमदशमूलतैल | ... १२२० | गर्भिणीरोगकी चिकित्सा | १२५८ |
| बृहद्दशमूलतैल १-२ | ... " | उभयपंचदशक, उभयविंशक कोष्ठ | १२६६ |
| महादशमूलतैल | ... १२२२ | प्रसवमंत्र | ... " |
| महाकनकतैल, रुद्रतैल | ... १२२३ | एरण्डादि, मधूकादि | ... १२६८ |
| तप्तराजतैल | ... १२२४ | लवङ्गादिचूर्ण, गर्भबिलासरस | .. १२६९ |
| कुमारीतैल | ... १२२५ | गर्भबिनोदरस | ... " |
| शिरोरोगमें पथ्य | ... १२२६ | गर्भचिन्तामणि | ... १२७० |
| शिरोरोगमें अपथ्य | ... १२२७ | गर्भचिन्तामणिरस | ... " |
| प्रदररोगकी चिकित्सा । | बृहद्गर्भेचिन्तामणिरस, इन्दुशेखररस | १२७१ | |
| दाग्र्यादि, चंदनादिचूर्ण | ... १२३० | गर्भिणीरोगमें पथ्य | ... १२७२ |
| पुष्यानुगचूर्ण | ... १२३१ | गर्भिणीरोगमें अपथ्य | ... " |
| उत्पन्नादि, मधूकाद्यवलेह | ... १२३२ | सूतिका रोगकी चिकित्सा | १२७३ |
विषयानुक्रमणिका । ( २३ )
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|---|---|
| दशमूलक्वाथ, अमृत्वादि | ... १२७४ | पञ्चमूलादि | ... १३०२ |
| सहचरादि १-२ | ... " | बिल्वादि | ... " |
| सूतिकादशमूल, बृहद्द्दीबेरादि | ... १२७५ | शृङ्ग्यादि | ... " |
| देवदार्वादि | ... " | रजन्यादि | ... " |
| वज्रकाञ्जिक, भद्रोत्कटाद्यवलेह | ... १२७६ | कर्कटादि | ... १३०३ |
| सौभाग्यशुण्ठी १-२ | ... १२७७ | बालचतुर्भद्रिका | ... " |
| बृहत्सौभाग्यशुण्ठी | ... १२७९ | धातक्यादि | ... " |
| पञ्चजीरकगुड | ... १२८१ | पुष्करादि | ... " |
| जीरकाद्यमोदक | ... १२८२ | बालरोगान्तकरस | ... १३०४ |
| सूतिकाविनोदरस | ... " | कुमारकल्याणरस | ... १३०५ |
| बृहत्सूतिकाविनोदरस | ... १२८३ | अश्वगन्धाघृत | ... " |
| सूतकारिरस | ... " | बालचाङ्गेरीघृत | ... " |
| सूतिकाघ्नरस | ... " | अष्टमङ्गलघृत | ... १३०६ |
| सूतिकाहाररस | ... १२८४ | कुमारकल्याणघृत | ... " |
| रसशार्दूल | ... " | लाक्षादितैल | ... १३०७ |
| महारसशार्दूल | ... १२८५ | विषकी चिकित्सा | १३०७ |
| महाभ्रवटी | ... " | रसायनाधिकारः | १३१४ |
| सूतकारिरस | ... १२८६ | ऋतुहरीतकी | ... १३१८ |
| भद्रोत्कटाद्य घृत | ... " | भृङ्गराजादिचूर्ण | ... " |
| सूतिकादशमूलतैल | ... १२८७ | अमृतवर्तिका | ... १३१९ |
| स्तनरोगचिकित्सा | १२८८ | श्रीसिद्धमोदक | ... १३२१ |
| काशीशाद्यतैल | ... १२८९ | निर्गुण्डीकल्प | ... १३२२ |
| श्रीपर्णीतैल | ... १२९० | कार्श्यहरलौह | ... १३२३ |
| बालरोगकी चिकित्सा । | अमृतार्णवरस | ... १३२४ | |
| सारिवादि | ... १३०० | नीलकण्ठरस | ... " |
| मुस्तकादि | ... " | महानीलकण्ठरस | ... १३२५ |
| हरिद्रादि | ... १३०१ | मकरध्वजरसायन | ... १३२६ |
| भद्रमुस्तादि | ... " | बृहत्पूर्णचन्द्ररस | ... १३२७ |
| समङ्गादि | ... " | महालक्ष्मीविलासरस | ... १३२८ |
| नागरादि | ... " | वसन्तकुसुमाकररस | ... १३३० |
| बिल्वादि | ... " | वाजीकरणाधिकारः | १३३१ |
| पटोलादि | ... १३०२ | गोक्षुराद्यचूर्ण | ... १३३१ |
( २४ ) भैषज्यरत्नावली-विषयानुक्रमणिका ।
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|---|---|
| नरसिंह चूर्ण | ... १३३६ | स्वल्पचन्द्रोदयमकरध्वज | ... १३०७ |
| कामदीपक | ... १३३८ | बृहच्चन्द्रोदयमकरध्वज | ... १३५१ |
| कामधेनु | ... ” | खण्डाभ्रक | ... १३५२ |
| हरशशांक | ... ” | गुडकूष्माण्ड | ... १३५४ |
| लक्ष्मणालौह | ... १३३९ | कामेश्वरमोदक | ... १३५५ |
| सिद्धशाल्मलीकल्प | ... ” | अन्य कामेश्वरमोदक | ... १३५६ |
| पञ्चशर | ... १३४० | रतिवल्लभमोदक | ... १३५७ |
| कामिनीमदभञ्जन | ... ” | कामाग्निसन्दीपनमोदक | ... १३५९ |
| कामिनीदर्पघ्न | ... १३४१ | बृहच्छतावरीमोदक | ... १३६० |
| पुष्पधन्वा | ... ” | महाकामेश्वरमोदक | ... १३६२ |
| पूर्णचन्द्ररस | ... ” | श्रीमदनानन्दमोदक | ... १३६४ |
| अनङ्गकुसुमाकर | ... १३४२ | अभिमन्त्रणमन्त्र | ... १३६६ |
| हेमसुन्दररस | ... ” | मृत्युसञ्जीवनी सुरा | ... १३६७ |
| अनङ्गसुन्दररस | ... १३४३ | दशमूलारिष्ट | ... १३६९ |
| गन्धामृतरस | ... ” | गोधूमाद्यघृत | ... १३७१ |
| सिद्धसूत | ... ” | बृहदश्वगन्धाद्यघृत | ... १३७२ |
| मकरध्वजवटी | ... ” | अमृतप्राशघृत | ... १३७३ |
| श्रीमन्मन्मथरस | ... १३४५ | बृहच्छागलाद्यघृत | ... १३७५ |
| श्रीकामदेवरस | ... १३४६ | भल्लातकाद्यतैल | ... १३७८ |
| मकरध्वजरस | ... १३४७ | अश्वगन्धातैल | ... ” |
| महेश्वररस | ... १३४९ | वीर्यस्तम्भनाधिकारः | ” |
| स्वर्णसिन्दूर | ... १३५० |
इति विषयानुक्रमणिका समाप्ता ।
॥ श्रीः ॥
भैषज्यरत्नावली
भाषाटीकासहिता ।
मंगलाचरणम् ।
भक्त्या नतत्रिदशराजकिरीटकोटि-
रत्नावलीकिरणराजिविराजमानम् ।
श्रीमत्करीन्द्रवदनस्य पदारविन्द-
द्वन्द्वं सदा जयति सिद्धिकरं क्रियाणाम् ॥ १ ॥
टीकाकारोक्त-मंगलाचरण ।
नमः श्रीपूर्ववैद्याय भवरोगनिवृत्तये ।
भैषज्यरत्नावल्याश्च भाषाटीका विरच्यते ॥
भक्तिके साथ नम्र हुए देवराज इन्द्रके किरीटमें सुशोभित रत्नावलीकी किरणोंसे शोभायमान, सम्पूर्ण कार्योंके सिद्धिदाता ऐसे श्रीगणेशजीके चरणकमल निर्विघ्नतापूर्वक इस ग्रन्थकी समाप्ति करें ॥ १ ॥
वन्देऽम्बिकाचन्द्रचूडौ जननीजनकावुभौ ।
निपत्य धरणौ भक्त्या प्रत्यूहव्यूहशान्तये ॥ २ ॥
सकल विघ्नोंकी शान्तिके लिये भक्तिसहित जगत्के माता और पिता जो पार्वती शिव उनको मैं ( ग्रन्थकार ) साष्टाङ्ग प्रणाम करता हूं ॥ २ ॥
श्रीगोविन्दपदारविन्दयुगलं वन्दारुवृन्दारक-
श्रेणीनम्रशिरःकिरीटवलिभिर्नीलोत्पलेन्दिन्दिरम् ।
नत्वा सद्भिषजां मुदे वितनुते गोविन्ददासोऽधुना
नानाग्रन्थमहार्णवल्लब्धसगुणां भैषज्यरत्नावलीम् ॥ ३ ॥
२ भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-
स्तुति करतेहुए देवताओंके नम्रहुए शिरोंके किरीटसे शोभायमान और नीलकमलकी कान्तिको लज्जित करनेवाले श्रीकृष्णचन्द्रके चरणकमलको प्रणामकर मैं गोविन्ददास (ग्रन्थकार) वैद्योंकी प्रसन्नताके लिये अनेक ग्रन्थरूपी समुद्रोंको मथकर निकालेहुए नानाप्रकारके गुणोंसे युक्त इस "भैषज्यरत्नावली" नामक ग्रन्थको प्रकाशित करता हूँ ॥ ३ ॥
यदि प्रियतमा न स्याद् वृद्धानां भिषजामियम् । तथाऽपि नव्या नव्थानामानुकूल्यं विधास्यति ॥ ४ ॥
यद्यपि मेरा संग्रह कियाहुआ यह नवीन ग्रन्थ वृद्धवैद्योंको अतिप्रिय न होगा तथापि यह नवीन वैद्योंका विशेष उपकार करेगा, इसमें सन्देह नहीं ॥ ४ ॥
आयुर्वेदके लक्षण ।
आयुर्हिताहितं व्याधेर्निदानं शमनं तथा । विद्यते यत्र विद्वद्भिः स आयुर्वेद उच्यते ॥ ५ ॥
जिस शास्त्रके द्वारा आयुका हित व अहित एवं रोगोंका निदान और रोग नाश करनेके उप.य मालूम हों, उसको आयुर्वेद कहते हैं ॥ ५ ॥
आयुर्वेदकी निरुक्ति ।
अनेन पुरुषो यस्मादायुर्विन्दति वेत्ति च । तस्मान्मुनिवरैरेष आयुर्वेद इति स्मृतः ॥ ६ ॥
इस शास्त्रके द्वारा दीर्घायु प्राप्त होती है और आयुर्विषयक ज्ञान उत्पन्न होता है, इसलिये महर्षियोंने इसको आयुर्वेद कहा है ॥ ६ ॥
आयुर्वेदकी उत्पत्ति ।
ब्रह्मा स्मृत्वाऽऽयुषो वेदं प्रजापतिमजिग्रहत् । सोऽश्विनौ तौ सहस्राक्षं सोऽत्रिपुत्रादिकान्मुनीन् ॥ तेऽग्निवेशादिकाँस्ते तु पृथक् तन्त्राणि तेनिरे ॥ ७ ॥
सबसे प्रथम ब्रह्माने दक्ष प्रजापतिको आयुर्वेदकी शिक्षा दी; फिर दक्षने दोना अश्विनीकुमारोंको, अश्विनीकुमारोंने इन्द्रको, इन्द्रने आत्रेय आदि मुनियोंको और उन्होंने अग्निवेशादि मुनियोंको आयुर्वेदकी शिक्षा दी। फिर उन अग्निवेशादि मुनियोंने संसारके हितके लिये अपने अपने नामोंसे पृथक पृथक् तन्त्रोंकी रचना की ॥ ७ ॥
प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ३
चिकित्सा-प्रकरणम् ।
धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् ।
रोगास्तस्यापहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च ॥ ८ ॥
आरोग्यता ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस चतुर्वर्ग प्राप्तिका प्रधान कारण है और रोग उस आरोग्यता, सुख और जीवनको नष्ट करनेवाले हैं ॥ ८ ॥
व्याधयो द्विविधाः प्रोक्ताः शारीरा मानसास्तथा ।
शारीरा ज्वरकुष्ठाद्या उन्मादाद्या मनोभवाः ॥ ९ ॥
व्याधियाँ दो प्रकारकी होती हैं—एक शारीरिक और दूसरी मानसिक; ज्वर, कुष्ठ आदिको शारीरिक ओर उन्माद आदिको मानसिक रोग कहते हैं ॥ ९ ॥
दोषाणां साम्यमारोग्यं वैषम्यं व्याधिरुच्यते ।
सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च ॥ १० ॥
वात, पित्त और कफ इन तीनों दोषोंकी साम्य अवस्था (अर्थात् तीनों दोषोंका समानरूपसे रहना) को आरोग्य कहते हैं । और विषम अवस्था (तीनों दोषोंमेंसे किसीएक दोषका कुपित होकर न्यूनाधिक होना) को रोग कहते हैं । अतः आरोग्यता नाम सुख और रोगका नाम दुःख है ॥ १० ॥
साध्योऽसाध्य इति व्याधिर्द्विधाऽतोऽपि पुनर्द्विधा ।
सुखसाध्यः कृच्छ्रसाध्यो याप्यो यश्चाप्रतिक्रियः ॥ ११॥
याप्यत्वं याति साध्यस्तु याप्यो गच्छत्यसाध्यताम् ।
जीवितं हन्त्यसाध्यस्तु नरस्याप्रतिकारिणः ॥ १२ ॥
याप्याः केचित् प्रकृत्यैव केचिद्याप्या उपेक्षया ।
प्रकृत्या व्याधयोऽसाध्याः केचित्केचिदुपेक्षया ॥ १३ ॥
रोग दो प्रकारके होते हैं, जैसे—साध्य और असाध्य । साध्यरोग भी दो प्रकारके होते हैं—सुखसाध्य और कष्टसाध्य । असाध्य रोग भी दो ही प्रकारके होते हैं, जैसे—याप्य और अचिकित्स्य (अर्थात् त्याज्य—औषधादिके द्वारा जिनका प्रतीकार न हो सके) । जो रोग सहजमें आरोग्य होजाते हैं, उनको सुखसाध्य कहते हैं । एवं जो रोग कठिनतासे आराम होते हैं, उनको कष्टसाध्य कहते हैं । ये दो प्रकारके रोग साध्य हैं । जो रोग औषधादिके द्वारा कुछ शान्त हो जाते हैं, उनको याप्य
भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-
कहते हैं और जो रोग औषधके द्वारा शान्त नहीं होते, उनको असाध्य कहते हैं। याप्य और असाध्य ये दोनों प्रकारके रोग असाध्य हैं। उपर्युक्त समयमें चिकित्सा न करनेसे साध्यरोगभी याप्य हो जाते हैं और याप्यरोग असाध्य हो जाते हैं और असाध्य रोग जीवनको शीघ्र नष्ट करदेते हैं। याप्यरोग दो प्रकारसे उत्पन्न होते हैं। कितनेएक रोग स्वभावसे ही याप्य और कितनेएक चिकित्साके अभावसे याप्य हो जाते हैं। किन्तु स्वभावसे जो रोग याप्य होते हैं वे असाध्य और चिकित्साके अभावसे जो रोग याप्य होते हैं, उनमेंसे कोई चिकित्साद्वारा साध्य होजाते हैं॥११-१३॥
तत्रैकः पापजो व्याधिरपरः कर्मजो मतः । पापजः प्रशमं याति भैषज्यसेवनादिना ॥ १४ ॥ यथाशास्त्रविनिर्णीतो यथा व्याधिश्चिकित्सितः । न शमं याति यो व्याधिः स ज्ञेयः कर्म्मजो बुधैः ॥ १५ ॥ न जन्तुः कश्चिदमरः पृथिव्यामेव जायते । अतो मृत्युरवार्यः स्यात्किन्तु रोगो निवार्यते ॥ १६ ॥
पापज और कर्मज-इन भेदोंसे रोग दो प्रकारके होते हैं। पापजरोग औषधादिके सेवनसे शान्त होजाते हैं। एवं शास्त्रोक्त औषधादिके सेवनसे भी जो रोग दूर नहीं होते, उनको कर्मज व्याधि कहते हैं। इस पृथ्वीपर कोई भी जीव अमर होकर नहीं जन्मा, एक न एक दिन निश्चयही मृत्यु होगी। इसलिये मृत्युको कोई भी नहीं रोक सकता, किन्तु औषधादिके द्वारा रोग दूर किया जा सकता है ॥ १४-१६ ॥
एकोत्तरं मृत्युशतमस्मिन्देहे प्रतिष्ठितम् । तत्रैकः कालसंयुक्तः शेषास्त्वागन्तवः स्मृताः ॥१७॥ ये त्विहागन्तवः प्रोक्तास्ते प्रशाम्यन्ति भेषजैः । जपहोमप्रदानैश्च कालमृत्युर्न शाम्यति ॥ १८ ॥ पीडितं रोगसर्पाद्यैरपि धन्वन्तरिः स्वयम् । सुस्थीकर्तुं न शक्नोति कालप्राप्तं हि देहिनम् ॥ १९ ॥
मनुष्यकी एकसौ एक प्रकारसे मृत्यु हो सकती हैं। उनमें एक कालमृत्यु और सौ आगन्तुक मृत्युयें हैं। आगन्तुक मृत्यु-औषध और जप, होमादिके द्वारा शमन
[ प्रथमखण्ड ] भाषाटीकासहिता । ५
होती है; किन्तु कालमृत्यु किसी प्रकार भी दूर नहीं हो सकती । कालमृत्युके मुखमें पतितहुए व्यक्तिको किसीभी रोगसे ग्रसित होनेपर या सर्पादिके द्वारा काटनेपर स्वयं धन्वन्तरि भी आरोग्य नहीं कर सकते ॥ १७–१९ ॥
आयुषे कर्मणि क्षीणे लोकोऽयं दूयते मया ।
नौषधानि न मंत्राश्च न होमा न पुनर्जपाः ॥ २० ॥
त्रायन्ते मृत्युनोपेतं जरया चापि मानवम् ।
वर्त्याधारस्नेहयोगाद् यथा दीपस्य संस्थितिः ॥
विक्रियाऽपि च दृष्टैवमकाले प्राणसंक्षयः ॥ २१ ॥
आयुषकर्मके क्षय होनेपर मृत्यु मनुष्योंको पीड़ित करती है । उस समय औषध, मंत्र, होम और जप ये मनुष्यको जरा और मृत्युसे नहीं बचा सकते । जिस प्रकार तेल और बत्तीके होनेपर भी दीपक बुझ जाता है, उसीप्रकार आयुके होनेपर भी किसी विशेष कारणसे कभी कभी मनुष्यका प्राण नाश हो जाता है ॥ २० ॥ २१ ॥
व्याधेस्तत्त्वपरिज्ञानं वेदनायाश्च निग्रहः ।
एतद्वैद्यस्य वैद्यत्वं न वैद्यः प्रभुरायुषः ॥ २२ ॥
रोगके तत्त्वको समझना और पीड़ाको दूर करना—यह ही वैद्यकी वैद्यता है । किन्तु वैद्य आयुका स्वामी नहीं है ॥ २२ ॥
यादृच्छिको मुमूर्षुश्च विहीनः करणैश्च यः ।
वैरी च वैद्यविद्वेषी श्रद्धाहीनः सशंकितः ॥ २३ ॥
भिषजामनियम्यश्च नोपक्रम्यो भिषग्विदा ।
एतानुपाचरन् वैद्यो बहून् दोषानवाप्नुयात् ॥ २४ ॥
स्वेच्छाचारी, मरनेकी इच्छा करनेवाला, इन्द्रियशक्तिहीन (काना, लूला, लंगड़ा इत्यादि), वैरी, वैद्यसे द्वेष रखनेवाला, श्रद्धाहीन, संदिग्धचित्त और चिकित्सासम्बन्धी नियमोंको न पालनेवाला ऐसे मनुष्योंकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये । यदि वैद्य लोभवश ऐसे रोगियोंकी चिकित्सा करता है तो वह अपयशको प्राप्त होता है ॥ २३ ॥ २४ ॥
यावत्कण्ठगताः प्राणा यावन्नास्ति निरिन्द्रियः ।
तावच्चिकित्सा कर्तव्या कालस्य कुटिला गतिः ॥ २५ ॥
| ६ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा- |
|---|
जातमात्रश्चिकित्स्यस्तु नोपेक्ष्योऽल्पतया गदः।
वह्निशस्त्रविषैस्तुल्यः स्वल्पोऽपि विकरोत्यसौ ॥ २६ ॥
यथा स्वल्पेन यत्नेन च्छिद्यते तरुणस्तरुः ।
स एवातिप्रवृद्धस्तु च्छिद्यतेऽतिप्रयत्नतः ॥ २७ ॥
जबतक प्राण कण्ठमें रहें और इन्द्रियोंकी शक्तिका लोप न हो तबतक चिकित्सा करनी चाहिये । कारण—कालकी गति कुटिल है । रोगके उत्पन्न होते ही चिकित्सा आरम्भ करदेनी चाहिये । रोगको सामान्य समझकर उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये । कारण—सामान्यरोग अल्प होनेपर भी अग्नि, शस्त्र और विषकी तरह अत्यन्त प्रबल होजाते हैं । जिस प्रकार तरुणवृक्ष सहजमें ही काटा जासकता है और बड़ा हो जानेपर उसका काटना कठिन हो जाता है ॥ २६-२७ ॥
ग्रहेषु प्रतिकूलेषु नानुकूलं हि भेषजम् ।
ते भेषजानां वीर्याणि हरन्ति बलवन्त्यपि ॥
प्रतिकृत्य ग्रहानादौ पश्चात्कुर्य्याच्चिकित्सितम् ॥ २८ ॥
सूर्यादि ग्रहोंके प्रतिकूल होनेपर किसी भी ओषधिका ठीक २ फल नहीं मालूम होता । कारण ग्रह अतिवीर्य्यवान् ओषधिके भी प्रभावको नष्ट करदेते हैं इसलिये प्रथम ग्रहशान्ति करके फिर चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २८ ॥
याभिः क्रियाभिर्जायन्ते शरीरे धातवः समाः ।
सा चिकित्सा विकाराणां कर्म्म तद्भिषजां मतम् ॥ २९ ॥
जिस क्रियाके द्वारा शरीरकी धातुयें समान अवस्थामें रहती हैं, उसको चिकित्सा कहते हैं और वह ही वैद्योंका कर्म्म है ॥ २९ ॥
आसुरी मानुषी दैवी चिकित्सा त्रिविधा मता ।
शस्त्रैः कषायैर्होमाद्यैः क्रमेणान्त्या सुपूजिता ॥ ३० ॥
चिकित्सा तीन प्रकारकी है, जैसे—आसुरी, मानुषी और दैवी । अस्त्रादिद्वारा जो चिकित्सा की जाती है, वह आसुरी चिकित्सा है; ओषधियोंके काथादिके द्वारा जो चिकित्सा की जाती है वह मानुषी और जप, होमादिके द्वारा जो चिकित्सा की जाती है वह दैवी चिकित्सा कहलाती है ॥ ३० ॥
प्रकरणम् १ ] भाषाटीकासहिता । ९
क्वचिद्धर्म्मः क्वचिन्मैत्री क्वचिदर्थः क्वचिद्यशः ।
कर्म्माभ्यासः क्वचिच्चापि चिकित्सा नास्ति निष्फला ॥३१॥
चिकित्साद्वारा कहीं धर्म्म, कहीं मित्रता, कहीं धन, कहीं यशोलाभ और कहीं चिकित्साकर्ममें अभ्यास ही होता है, इसलिये चिकित्सा कहीं भी निष्फल नहीं होती ॥ ३१ ॥
भिषग् द्रव्यमुपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम् ।
गुणवत्कारणं ज्ञेयं विकारस्योपशान्तये ॥ ३२ ॥
वैद्य, औषध, परिचारक ( अर्थात् जो आदमी रोगीकी सेवा शुश्रूषा करता है ) और रोगी ये चिकित्साके चारों पाद गुणवान् होनेपर रोग आरोग्य होनेके लिये प्रधान कारण हैं ॥ ३२ ॥
श्रुतेः पर्य्यवदातत्वं बहुशो दृष्टकर्म्मता ।
दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम् ॥ ३३ ॥
आयुर्वेदशास्त्रमें कहा है कि—शास्त्रदर्शिता, बहुदर्शिता, निपुणता और पवित्रता ये चार गुण वैद्यमें होने आवश्यक हैं ॥ ३३ ॥
प्रशस्तदेशसम्भूतं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम् ।
अल्पमात्रं महावीर्यं गन्धवर्णरसान्वितम् ॥
उद्भिज्जमपरिक्षुण्णं शुद्धं धात्वादिकं तथा ।
समीक्ष्य काले दत्तं च भेषजं परं मतम् ॥ ३४ ॥
प्रशस्त देश ( अच्छे स्थान ) में उत्पन्न हुई, शुभ दिनमें उखाडी हुई, थोडी मात्रावाली, अत्यन्त वीर्यसम्पन्न एवं गन्ध, वर्ण और रसविशिष्ट तथा कीडे आदिके द्वारा खराब न की हुई, वृक्ष-लतादिसे उत्पन्न हुई, शोधित धातु आ.दि जो यथासमयमें प्रयोग की गयी हों, उनको उत्कृष्ट ओषधि कहते हैं ॥ ३४ ॥
उपचारज्ञता दाक्ष्यमनुरागं च भर्त्तरि ।
शौचं चेति चतुर्थोऽयं गुणः परिचरे जने ॥ ३५ ॥
जो मनुष्य रोगीकी सेवा-शुश्रूषा अच्छे प्रकार करनी जानता हो सब कामोंमें निपुण स्वामीभक्त और शुद्धाचारी हो, ऐसा मनुष्य परिचारक होना चाहिए ॥३५॥
८ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा-
स्मृतिनिर्देशकारित्वमभीरुत्वमथापि च ।
ज्ञापकत्वं च रोगाणामातुरस्य गुणा मताः ॥ ३६ ॥
जो रोगी वैद्यके सामने रोगका पूर्ववृत्तान्त स्मरण करके अच्छे प्रकार कह सकता है और डरता नहीं है तथा रोगकी वर्त्तमान अवस्थाको भी विशेष रूपसे कह सकता है ऐसा रोगीही चिकित्साका उपयुक्त पात्र है । ये रोगीके लक्षण हैं ॥ ३६ ॥
मृद्दण्डचक्रसूत्राद्याः कुम्भकाराहते यथा ।
नावहन्ति गुणं वैद्याहते पादत्रयं तथा ॥ ३७ ॥
जिस प्रकार कुम्हारके विना मृत्तिका, दण्ड, चक्र और सूत्रादि उपकरणोंके होनेपरभी घट आदि कोई पात्र नहीं बन सकता, उसी प्रकार औषध, परिचारक और रोगी इन तीनों पदोंके होनेपर भी एक सुचिकित्सकके विना रोग शमन नहीं होसकता । अत एव उक्त चारों पादोंमें वैद्यही मुख्य है ॥ ३७ ॥
यस्तु रोगमविज्ञाय कर्म्माण्यरभते भिषक् ।
अप्यौषधविधानज्ञस्तस्य सिद्धिर्यदृच्छया ॥ ३८ ॥
यस्तु रोगविशेषज्ञः सर्वभैषज्यकोविदः ।
साध्यासाध्यविधानज्ञस्तस्य सिद्धिः करे स्थिता ॥ ३९ ॥
दृष्टकर्म्मा च शास्त्रज्ञो वैद्यः स्यात्सिद्धिभागसौ ।
एकाङ्गहीनो न श्लाघ्य एकपक्ष इव द्विजः ॥ ४० ॥
जो वैद्य, रोगको अच्छे प्रकार न जानकर चिकित्सा आरंभ करदेता है वह औषधि विधानको अच्छे प्रकारसे जानता भी है तो भी उसको चिकित्सा कार्यमें सिद्धि प्राप्त होना अनिश्चित या दैवाधीन है । और जो वैद्य सर्व प्रकारके रोगोंके तत्त्वको जानता है, सब प्रकारकी ओषधियोंको जानता है, एवं ओषधिप्रयोगमें चतुर और रोगके साध्यासाध्य लक्षणोंको जानता है, उसके आगे सिद्धि सदैव हाथ जोडे खडी रहती है । दृष्टकर्मा और आयुर्वेद शास्त्रका ज्ञाता वैद्यही चिकित्साकार्यमें सिद्धि प्राप्त करनेका भागी हो सकता है । जिसमें उपर्युक्त गुण होते हैं वह ही वैद्य श्रेष्ठ होता है । इन गुणोंमेंसे एक गुणके न होनेपरभी वैद्यको एक पंखवाले पक्षीकी समान अकर्मण्य कहा है ॥ ३८-४० ॥
शास्त्रं गुरुमुखोद्गीर्णमादायोपास्य चासकृत् ।
यः कर्म्म कुरुते वैद्यः स वैद्योऽन्ये तु तस्कराः ॥ ४१ ॥
प्रकरणम् ] भाषाटीकासहित । ९
नाभिज्ञाय तु शास्त्राणि भेषजं कुरुते भिषक् ।
यम एव स विज्ञेयो मर्त्यानां मर्त्यरूपधृक् ॥ ४२ ॥
कुचैलः कर्कशः स्तब्धः कुग्रामी स्वयमागतः ।
पञ्च वैद्या न पूज्यन्ते धन्वन्तरि समा यदि ॥ ४३ ॥
नाडीजिह्वास्यमूत्राणां कोष्ठादीनां च सर्वथा ।
परीक्षां यो न जानाति स वैद्यो यम एव हि ॥ ४४ ॥
जो वैद्य गुरुके पास आयुर्वेद शास्त्रको पढ़कर और उसको बारम्बार विचारकर चिकित्साकार्यमें प्रवृत्त होता है, वह ही प्रकृष्ट वैद्य है। और दूसरे तो केवल धनको हरण करनेवाले तस्कर हैं और जो वैद्य आयुर्वेद शास्त्रको बिना अध्ययन किये चिकित्सा करना आरम्भ करता है, वह मनुष्योंके लिये मानवरूपधारी यमके समान है। मलिन वस्त्रधारी, कठोर बोलनेवाला, जड़ ( रोगके सम्बन्धमें किसीप्रकारका विवेचन न कर सकनेवाला ), बुरे ग्राममें रहनेवाला और बिना बुलाये अपने आप आनेवाला ऐसे पाँच प्रकारके वैद्य धन्वन्तरिके समान भी हों तो सम्मानको प्राप्त नहीं हो सकते। जिस वैद्यको नाड़ी, जिह्वा, मुख, मूत्र और कोष्ठादिकी परीक्षा मालूम नहीं है, वह वैद्य भी यमके समान है ॥ ४१-४४ ॥
अप्येकं नीरुजं कृत्वा जन्तुं यादृशतादृशम् ।
आयुर्वेदप्रसादेन किं न दत्तं भवेद्भुवि ॥ ४५ ॥
कपिलाकोटिदानाद्धि यत्फलं परिकीर्तितम् ।
फलं तत्कोटिगुणितमेकातुरचिकित्सया ॥ ४६ ॥
धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं कारणं यतः ।
तस्मादारोग्यदानेन नरो भवति सर्वदः ॥ ४७ ॥
अप्येकं नीरुजीकृत्य व्याधितं भेषजैर्नरः ।
प्रयाति ब्रह्मसदनं कुलसप्तकसंयुतः ॥ ४८ ॥
आयुर्वेदके प्रसादसे यदि किसी मनुष्यको आरोग्य कियाजाय तो पृथ्वीमें उस ( जीवनदाता ) ने कौनसा दान नहीं किया। करोड़ों गौओंको दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उससे करोड गुना अधिक फल रोगीको रोगसे मुक्त करनेमें होता है। इसकारण आरोग्यताही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस चतुर्वर्ग प्राप्तिका
१० भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-
एकमात्र कारण है। इसलिये आरोग्य दान करनेपर सभी दान हो जाते हैं। एक रोगीको आरोग्य करनेसे, उस पुण्यके प्रभावसे वैद्य अपने सात कुलोंके साथ ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ॥ ४५-४८ ॥
चिकित्सितशरीरं यो न निष्क्रीणाति दुर्मतिः ।
स यत्करोति सुकृतं तत्सर्व्वं भिषग्नुते ॥ ४९ ॥
जो दुर्बुद्धि मनुष्य आरोग्य होकर वैद्यसे उऋण नहीं होता, वह मनुष्य जो कुछ सत्कर्म करता है वे सब वैद्यको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ४९ ॥
दर्शनस्पर्शनप्रश्नैर्व्याधेर्ज्ञानं त्रिधा मतम् ।
दर्शनान्मूत्रजिह्वाद्यैः स्पर्शनान्नाडिकादिभिः ॥
प्रश्नैर्दूत'दिवचनादिति त्रेधा समुच्यते ॥ ५० ॥
दर्शन, स्पर्शन और प्रश्न इन तीन प्रकारसे रोगकी परीक्षा करनी चाहिये । अर्थात् मूत्र और जिह्वादिका दर्शन, नाडी आदिका स्पर्शन एवं रोगी और दूत आदिसे रोगसम्बन्धी विषयको पूछना-इस प्रकार रोगपरीक्षाके ये तीन प्रकार कहेगये हैं॥५०॥
रोगमादौ परीक्षेत ततोऽनन्तरमौषधम् ।
ततः कर्म भिषक् पश्चात् ज्ञानपूर्व्वं समाचरेत् ॥ ५१ ॥
सबसे प्रथम वैद्य रोगकी परीक्षा (अर्थात् कौनसा रोग है ?) उसका निदान पूर्वरूप और रूपादिके द्वारा निर्धारित करना और वह निर्दिष्ट रोग साध्य वा असाध्य इत्यादिका निर्धारित करना और इसके पश्चात् औषधि-परीक्षा करे, फिर विधिपूर्वक चिकित्सामें प्रवृत्त होवे ॥ ५१ ॥
यथा विषं यथा शस्त्रं यथाऽग्निरशनिर्यथा ।
तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतं यथा ॥ ५२ ॥
विना जानी हुई औषधि प्रयोग करनेपर-विष, अस्त्र, अग्नि और वज्रकी समान अनिष्टकारी होती है, किन्तु ओषधिके गुणोंको जानलेनेपर उसका प्रयोग करनेसे वह अमृतके समान हितकारी होती है ॥ ५२ ॥
मानकी परिभाषा ।
न मानेन विना युक्तिर्द्रव्याणां जायते क्वचित् ।
अतः प्रयोगकार्य्यार्थं मानमत्रोच्यतेऽधुना ॥ ५३ ॥
प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ११
मान (तोल) के बिना द्रव्यों (ओषधियों) की युक्ति ठीक नहीं होती; इस कारण प्रयोगोंके कार्यके लिये यहाँ मानपरिभाषा कही जाती है ॥ ५३ ॥
षट्सर्षपैर्यवस्त्वको गुञ्जैका तु यवैस्त्रिभिः ॥
माषस्तु पञ्चभिः षड्भिस्तथा सप्तभिरष्टभिः ॥ ५४ ॥
दशभिर्द्वादशभिश्च रक्तिभिः षड्विधो मतः ।
चरकस्य तु माषस्तु दशगुञ्जाभिरेव च ॥ ५५ ॥
चरकस्य तु चार्द्धेन सुश्रुतस्य तु माषकः ।
माषैश्चतुर्भिः शाणः स्याद्धरणः स निगद्यते ॥ ५६ ॥
टंकः स एव कथितस्तद्वयं कोल उच्यते ।
क्षुद्रको वटकश्चैव द्रङ्क्षणः स निगद्यते ॥ ५७ ॥
छः सरसोंका एक जौ होता है। तीन जौकी एक गुंजा होती है। पांच रत्तीका, छः रत्तीका, सात रत्तीका, आठ रत्तीका, दश रत्तीका अथवा बारह रत्तीका एक मासा होता है। इस प्रकार देशभेदोंसे मासा छः प्रकारका होता है, चरकके मतसे मासा दश रत्तीका होता है और सुश्रुतके मतसे पांच रत्तीका मासा होता है। चार मासेका एक शाण होता है। उस शाणको धरण तथा टक भी कहते हैं। दो शाणका एक कोल होता है। क्षुद्रक, वटक और द्रंक्षण ये कोलके ही नाम हैं ॥ ५४-५७ ॥
कोलद्वयं तु कर्षः स्यात्स प्रोक्तः पाणिमानिका ।
अक्षः पिचुः पाणितलं किञ्चित्पाणिश्च तिन्दुकम् ॥ ५८ ॥
विडालपदकं चैव तथा षोडशिका मता ।
करमध्यो हंसपदं सुवर्णं कवलग्रहः ॥ ५९ ॥
उदुम्बरं च पर्यायैः कर्षमेव निगद्यते ।
स्यात्कर्षाभ्यामर्द्धपलं शुक्तिरष्टमिका तथा ॥ ६० ॥
शुक्तिभ्यां च पलं ज्ञेयं मुष्टिराम्रं चतुर्थिका ।
प्रकुञ्चः षोडशी बिल्वं पलमेवात्र कीर्त्यते ॥ ६१ ॥
दो कोलका एक कर्ष होता है। पाणिमानिका, अक्ष, पिचु, पाणितल, किञ्चित्पाणि, तिन्दुक, बिडालपदक, षोडशिका, करमध्य, हंसपद, सुवर्ण, कवलग्रह और
| १२ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा- |
|---|
उडुम्बर ये सब कर्षके नाम हैं। दो कर्षका अर्द्धपल होता है। शुक्ति और अष्टमिका ये अर्द्धपलके पर्याय हैं। दो शुक्तियोंका एक पल होता है। मुष्टि, आम्र, चतुर्थिका, प्रकुञ्च, षोडशी ओर बिल्व ये पलके नाम हैं ॥ ५८-६१ ॥
पलाभ्यां प्रसृतिर्ज्ञेया प्रसृतं च निगद्यते ।
प्रसृतिभ्यामञ्जलिः स्यात्कुडवोऽर्द्धशरावकः ॥ ६२ ॥
अष्टमानं च स ज्ञेयः कुडवाभ्यां च मानिका ।
शरावोऽष्टपलं तद्वज्ज्ञेयमत्र विचक्षणैः ॥ ६३ ॥
शरावाभ्यां भवेत्प्रस्थश्चतुःप्रस्थैस्तथाऽऽढकः ।
भाजनं कांस्यपात्रं च चतुष्षष्टिपलश्च सः ॥ ६४ ॥
दो पलकी एक प्रसृति होती है, प्रसृतिको प्रसृतभी कहते हैं। दो प्रसृतिकी एक अञ्जलि होती है। कुडव, अर्द्धशराव और अष्टमान ये अञ्जलिके नाम हैं। दो अंजलिकी एक मानिका होती है। शराव और अष्टपल ये मानिकाके नाम हैं। दो शरावका एक प्रस्थ होता है। चार प्रस्थका एक आढक होता है। भाजन, कांस्यपात्र और चतुःषष्टिपल ये आढकके नाम हैं ॥ ६२-६४ ॥
चतुर्भिराधकैर्द्रोणः कलशो नल्वणोऽर्मणः ।
उन्मानं च घटो राशिर्द्रोणपर्यायसंज्ञितः ॥ ६५ ॥
द्रोणाभ्यां शूर्पकुम्भौ च चतुःषष्टिशरावकः ।
शूर्पाभ्यां च भवेद्द्रोणी वाहो गोणी च सा स्मृता ॥ ६६ ॥
द्रोणीचतुष्टयं खारी कथिता सूक्ष्मबुद्धिभिः ।
चतुःसहस्रपलिका षण्णवत्यधिका च सा ॥ ६७ ॥
पलानां द्विसहस्रं च भार एकः प्रकीर्तितः ।
तुला पलशतं ज्ञेयं सर्वत्रैवैष निश्चयः ॥ ६८ ॥
चार आढकका एक द्रोण होता है। कलश, नल्वण, अर्मण, उन्मान, घट और राशि ये द्रोणके नाम हैं। दो द्रोणका एक शूर्प होता है। कुम्भ और चतुःषष्टि शरावक ये शूर्पके नाम हैं। दो शूर्पकी एक द्रोणी होती है। वाह और गोणी ये द्रोणीके नाम हैं। चार द्रोणीकी खारी होती है। यह खारी ४०९६ पलकी होती है। २००० पलका एक भार होता है। और १०० पलकी एक तुला होती है। ऐसा सब ग्रन्थोंका निश्चय है ॥ ६५-६८ ॥
- प्रकरणम् १ ] भाषाटीकासहिता । १३
| ६ सरसोंका | १ जौ | २ प्रसृतिका | १ कुडव |
| ३ जौ या ४ धानकी | १ गुंजा, रत्ती | २ कुडवका | १ शराव |
| १० रत्तीका | १ मासा | २ शरावका | १ प्रस्थ |
| ४ माशेका | १ शाण | ४ प्रस्थका | १ आढक |
| २ शाणका | १ कोल | ४ आढकका | १ द्रोण |
| २ कोलका | १ कर्ष | २ द्रोणका | १ कुंभ |
| २ कर्षकी | १ शुक्ति | २ कुंभकी | १ गोणी |
| २ शुक्तिका | १ पल | ४ गोणीका | १ खारी |
| २ पलकी | १ प्रसृति | १०० पलकी | १ तुला |
| २०० पलका | १ भार |
गुञ्जादिमानमारभ्य यावत्स्यात्कुडवस्थितिः ।
द्रवार्द्रशुष्कद्रव्याणां तावन्मानं समं मतम् ॥ ६९ ॥
प्रस्थादिमानमारभ्य द्विगुणं तद्द्रवार्द्रयोः ।
मानं तथा तुलायास्तु द्विगुणं न क्वचित्स्मृतम् ॥ ७० ॥
मृद्वृक्षवेणुलोहादेर्भाण्डं यच्चतुरङ्गुलम् ।
विस्तीर्णं च तथोच्चं च तन्मानं कुडवं वदेत् ७१ (मा० मा०)
गुंजासे लेकर कुडवतक पतले पदार्थोंको, गीले पदार्थोंको और सूखे पदार्थोंको समान भाग लेवे । किन्तु, द्रव ( पतले ) पदार्थ और गीले पदार्थोंको प्रस्थसे लेकर दूने लेने चाहिये । किंतु तुलाका मान दूना न करे ॥ ६९-७१ ॥
ज्वरकी चिकित्सा ।
पूर्वरूपे प्रयुञ्जीत ज्वरस्य लघुभोजनम् ।
लंघनं च यथादोषं विरेकं वातिके पुनः ॥ ७२ ॥
पाययेत् सर्पिरेवाच्छं पैत्तिके तु विरेचनम् ।
मृदुप्रच्छर्दनं तद्वत् कफजे तु विधीयते ॥
द्वन्द्वजेषु द्वयं कुर्यात् बुद्ध्वा सर्वं तु सर्वजे ॥ ७३ ॥
ज्वरके पूर्वरूपमें यथा दोषानुसार (अर्थात्-दोषोंकी अल्पता व प्रबलताके अनुसार) लघु आहार, लंघन ( उपवास ) और विरेचन करावे । वातज्वरके पूर्वरूपमें स्वच्छ घृत पान करावे । पित्तज्वरके पूर्वरूपमें केवल विरेचन ( दस्त ) ही कराना चाहिये;
( १४ ) भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-
और कफज्वरके पूर्वरूपमें मृदु वमनकारक औषध सेवन करानी चाहिये एवं द्वन्द्वज (अर्थात वात-पित्तजज्वर, पित्त-कफजज्वर और वात-कफज) ज्वरोंके पूर्वरूपमें दोनों दोषोंकी मिश्रित और सन्निपातज्वरमें त्रिदोषनाशक चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ७२ ॥ ७३ ॥
नवज्वरे दिवास्वप्नस्नानाभ्यङ्गान्नमैथुनम् । क्रोधप्रवातव्यायामकषायाँश्च विवर्जयेत् ॥ ७४ ॥
नवीन ज्वरमें दिनमें सोना, स्नान, तैल आदिका मलना, अन्नका आहार, स्त्रीप्रसंग, क्रोध, प्रवल व पूर्वकी तीव्र वायुका सेवन, परिश्रम और काथ इनको त्यागदेना चाहिये ॥ ७४ ॥
कषायं यः प्रयुञ्जीत नराणां तरुणज्वरे । स सुप्तं कृष्णसर्पं तु कराग्रेण परामृशेत् ॥ ७५ ॥ न कषायं प्रयुञ्जीत नराणां तरुणज्वरे । कषायेणाकुलीभूता दोषा जेतुं सुदुष्कराः ॥ ७६ ॥ चतुर्भागावशिष्टस्तु यः षोडशगुणाम्भसा । स कषायः कषायः स्यात्स वर्ज्यस्तरुणज्वरे ॥ ७७ ॥
जो वैद्य नवीन ज्वरमें काथ (काढ़े) को प्रयोग करता है, वह सोतेहुए काले साँपको हाथसे छूकर जगाता है। इसलिये नवीन ज्वरमें कषाय (काथ) कभी नहीं प्रयोग करना चाहिये। कारण, काथके प्रयोगसे दोष आकुलित होकर इतने प्रबल हो जाते हैं कि, उनको जीतना अत्यन्त कठिन हो जाता है। काथकी एक छटाँक औषधियोंको एक सेर जलमें पकाकर चौथाई भाग जल शेष रहनेपर नीचे उतारकर छानलेवे। इसको कषाय(काथ-पाचन) कहते हैं। यह नवीन ज्वरमें वर्जित है ॥ ७५-७७ ॥
न द्विरद्यान्न पूर्वाह्ने नाभिष्यन्दि कदाचन । न नक्तं न गुरुप्रायं भुञ्जीत तरुणज्वरी ॥ ७८ ॥ परिषेकान् प्रदेहाँश्च स्नानं संशोधनानि च । दिवास्वप्नं व्यवायं च व्यायामं शिशिरं जलम् ॥ ७९ ॥
प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १५
क्रोधप्रवातभोज्यानि वर्जयेत्तरुणज्वरी ।
शोषच्छर्द्दिमदं मूर्च्छा-भ्रमतृष्णाऽरोचकान् ॥
प्राप्नोत्युपद्रवानेतान् परिषेकादिसेवनात् ॥ ८० ॥
नवीन ज्वरवाला रोगी दो वार भोजन न करे । अर्थात् प्रातःकाल और रात्रिको भोजन न करे । एवं कफकारक और गुरुपाकी पदार्थोंका भोजन भी नहीं करे । शरीरपर जलका सेचन, चन्दनादिका प्रलेप, तैलादिकी मालिश, स्नान, संशोधन ( वमन, विरेचनादि ), दिनमें सोना, स्त्रीसंसर्ग, परिश्रम, शीतल जलपान, क्रोध, वायुका सेवन और अन्नादिका भोजन नवीन ज्वरमें त्यागदेवे । इनका परित्याग न करनेसे मुखशोष, वमन, मद, मूर्च्छा, भ्रम, तृष्णा और अरुचि आदि अनेक उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ७८-८० ॥
ज्वरे लंघनमेवादावुपदिष्टमृते ज्वरात् ।
क्षयानिलभयक्रोधकामशोकश्रमोद्भवात् ॥ ८१ ॥
धातुक्षय, यक्ष्मारोग, निरामवायु, भय, क्रोध, काम, शोक और परिश्रम इन कारणोंको छोड़कर और किसी भी कारणसे ज्वर होनेपर पहले उपवास करना चाहिये ॥ ८१ ॥
आमाशयस्थो हत्वाऽग्निं सामो मार्गान् पिधापयेत् ।
विदधाति ज्वरं दोषस्तस्माल्लंघनमाचरेत् ॥ ८२ ॥
अनवस्थितदोषाग्नेर्लंघनं दोषपाचनम् ।
ज्वरघ्नं दीपनं कांक्षारुचिलाघवकारकम् ॥ ८३ ॥
प्राणाविरोधिना चैनं लंघनेनोपपादयेत् ।
बलाधिष्ठानमारोग्यं यदर्थोऽयं क्रियाक्रमः ॥ ८४ ॥
तन्नु मारुतक्षुत्तृष्णामुखशोषभ्रमान्विते ।
कार्य्यं न बाले नो वृद्धे न गर्भिण्यां न दुर्बले ॥ ८५ ॥
सामदोष ( अपक्व रसयुक्त वात, पित्त, कफ ) आमाशयमें स्थित होकर पहले अग्निको मन्द करते हैं । फिर पसीनेको बहानेवाले और रस बहानेवाले और स्रोतोंको बन्द करके ज्वर उत्पन्न करते हैं । इसलिये ज्वरकी प्रथम अवस्थामें लंघन कराने चाहिये । सामदोषोंसे अग्नि मन्द होकर ज्वर होनेपर लंघन करानेसे सामदोषोंका परिपाक, ज्वरका नाश, अग्निकी वृद्धि, भोजनकी इच्छा, भोजनमें रुचि और शरीरमें
१६ भैषज्यरत्नावली । चिकित्सा-
हल्कापन मालूम होता है। लंघन अत्यंत हितकर होनेपर भी इस प्रकार कराने चाहिये, जिससे रोगीका शरीर अधिक दुर्बल न होजाय। कारण—आरोग्यताके लिये ही यह सारा क्रियाक्रम है और बल ही उस आरोग्यताका एकमात्र प्रधान कारण है। अर्थात् बलके बिना आरोग्य होना असम्भव है। इसलिये—वातप्रकृतिवाले, क्षुधा तृषासे पीडित, मुखशोष और भ्रमयुक्त मनुष्योंको एवं बालक, वृद्ध, गर्भिणी स्त्री और दुर्बल मनुष्यको लंघन नहीं कराने चाहिये ॥ ८२ ॥
वातमूत्रपुरीषाणां विसर्गे गात्रलाघवे ।
हृदयोद्गारकण्ठास्यशुद्धौ तन्द्राक्लमे गते ॥ ८६ ॥
स्वेदे जाते रुचौ चापि क्षुत्पिपाससहोदये ।
कृतं लंघनमादेश्यं निर्व्यथे चान्तरात्मनि ॥ ८७ ॥
पर्वभेदोऽङ्गमर्दश्च कासः शोषो मुखस्य च ।
क्षुत्प्रणाशोऽरुचिस्तृष्णा दौर्बल्यं श्रोत्रनेत्रयोः ॥८८॥
मनसः सम्भ्रमोऽभीक्ष्णमूर्द्धवातस्तमो हृदि ।
देहाग्निबलहानिश्च लंघनेऽतिकृते भवेत् ॥ ८९ ॥
उत्तम प्रकार (जबतक लंघन करानेकी आवश्यकता हो) से लंघन करानेसे मल-मूत्र और अपान वायुका निकलना, शरीरमें लघुता और हृदयका भारीपन दूर होता है। एवं उद्गार (डकार) शुद्ध आती है, कण्ठ और मुख शुद्ध होता है। विशेषकर तन्द्रा और ग्लानि दूर होती है। पसीना आता है, भोजनमें रुचि उत्पन्न होती है। क्षुधा और तृषा उत्पन्न होती हैं, एवं चित्त प्रसन्न होता है। इन सब लक्षणोंके प्रगट होनेपर फिर ज्वरमें लंघन नहीं कराने चाहिये। कारण—अधिक लंघन करानेसे पर्वभेद, सन्धियोंमें तोड़ने सरीखी पीड़ा, अङ्गोंमें पीड़ा, खाँसी, मुखशोष, भूखका न लगना, अरुचि, तृषा, नेत्र और कर्णशक्तिका ह्रास, चित्तमें भ्रम, ऊर्ध्ववात, हृदयमें अन्धकार, शरीर, अग्नि और बलकी हानि होती है ॥ ८६-८९ ॥
सद्यो भुक्तस्य वा जाते ज्वरे सन्तर्पणोत्थिते ।
वमनं वमनार्हस्य शस्तमित्याह वाग्भटः ॥ ९० ॥
कफप्रधानानुत्क्लिष्टान् दोषानामाश्ये स्थितान् ।
बुद्ध्वा ज्वरकरान् काले वम्यानां वमनैर्हरेत् ॥ ९१ ॥
प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १७
अनुपस्थितदोषाणां वमनं तरुणज्वरे ।
हृद्रोगं श्वासमानाहं मोहं च कुरुते भृशम् ॥ ९२ ॥
तृष्यते सलिलं चोष्णं दद्याद्वातकफज्वरे ।
मद्योत्थे पैत्तिके वाथ शीतलं तिक्तकैः शृतम् ॥ ९३ ॥
दीपनं पाचनं चैव ज्वरघ्नमुभयं च तत् ।
स्रोतसां शोधनं बल्यं रुचिस्वेदप्रदं शिवम् ॥ ९४ ॥
वाग्भटमें लिखा है कि—यदि भोजनके पश्चात् तत्काल ज्वर होजाय वा सन्तर्पण ( रसादि धातुओंकी वृद्धि करनेवाले पदार्थोंके ) द्वारा ज्वर होजाय तब वमनके योग्य व्यक्तिको वमन करानी चाहिये । किन्तु, रोगी वमनके योग्य है वा नहीं यह बात पहले ही देखलेनी चाहिये । यदि आमाशयमें स्थित दोषोंमें कफकी अधिकता हो और वमनकी इच्छा होनेसे यह दोष मानो अपने आप ही निकल जायँगे—ऐसा मालूम हो तो क्या नवीन ज्वरवाले, क्या जीर्ण ज्वरवाले वमनयोग्य मनुष्यको वमन करानी चाहिये. किन्तु, नवीन ज्वरमें इन सब लक्षणोंके प्रगट न होनेपर वमन करानेसे हृदयरोग, श्वास, आनाह ( मल-मूत्रका अवरोध ) और अत्यन्त मोह उत्पन्न होता है । वातज्वर कफज्वर और वातकफज्वरमें—गरम जल पान, कराना चाहिये । मद्यपानजन्य ज्वरमें और पित्तज्वरमें—तिक्त ओषधियोंके द्वारा सिद्ध कियेहुए जलको शितिल करके पान करावे । इस प्रकारका जलपान करनेसे अग्निकी वृद्धि, अपक्व रसका परिपाक, ज्वरका नाश, मल-मूत्र और पसीने आदिके द्वारा स्रोतोंकी शुद्धि, बलकी वृद्धि और भोजनमें रुचि होती है एवं पसीना आने लगता है ॥ ९०–९४ ॥
षडङ्गपानीय ।
मुस्तपर्पटकोशीरचन्दनोदीच्यनागरैः ।
शृतशीतं जलं देयं पिपासाज्वरशान्तये ॥ ९५ ॥
तृषा और ज्वरको शान्त करनेके लिये—नागरमोथा, पित्तपापडा, खस, लालचन्दन, सुगन्धवाला और सोंठ सब ओषधियोंको समानभाग मिलीहुई दो तोले लेकर एकत्र कूटकर ४ सेर जलमें पकावे । जब पककर दो सेर जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर शीतल होजानेपर यह जल रोगीको थोड़ा थोड़ा पान करावे ॥ ९५ ॥
२