भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
रसों की मैत्री-वैर स्थिति [ ३४१ वे कुछ न कह सकीं, केवल मुस्कराने लगीं । इसमें माधुर्य्यरस को अंगीरस और हास्यरस अंगरस समझा जायगा । अनेक रसों के मिश्रण का दृष्टान्त इस प्रकार है । जब श्रीकृष्ण की एक मित्र सहचरी ने देखा कि श्रीकृष्ण वृषभासुर से लडने को कमर कस रहे हैं तो वह सोचने लगी कि श्रीकृष्ण कैसे अद्भुत हैं, उनका मुख हँसती हुई चन्द्रवली की भौंहों पर मुग्ध है । उन्होंने अपने सर्प जैसे भुज- दण्ड को अपने सखा के कन्धे पर नियत कर रखा है और साथ ही युद्ध के लिए वृषभासुर को ललकारने के लिये वे सिंहनाद कर रहे हैं ।” इस उदाहरण में मधुररस, सख्यरस और वीररस हैं । यहाँ मधुररस अंगी हैं और अन्य दोनों अंगरस हैं । जब कुब्जा ने श्रीकृष्ण के पीताम्बर को पकड़ लिया तो श्रीकृष्ण ने हँसते हुए लोगों के सामने ही अपने चमकते कपोलों वाले मुख को नीचे झुका लिया । यह मधुररस और हास्यरस के मिश्रण का उदाहरण है । यहाँ हास्यरस अंगी है और मधुररस अंग है । भद्रसेन से लड़ने के लिये कटिबद्ध होते विशाल नामक ग्वाले को किसी दूसरे ने कहा, “हे विशाल ! तुम मेरे सामने अपनी वीरता क्यों प्रकट करना चाहते हो । सैकड़ों श्रीदामा और बलरामों को भी मैं कुछ नहीं गिनता । फिर तुम कौन हो ?” यह सख्यभक्तिरस और वीररस का मिश्रण है । यहाँ वीररस अंगी है और सख्य अंगरस है । शिशुपाल का श्रीकृष्ण को अपशब्द कहने का स्वभाव सा था । परन्तु अपने अपमानजनक शब्दों से उसने श्रीकृष्ण की अपेक्षा पाण्डवों को ही अधिक उत्तेजित किया । अतएव पाण्डवों ने शिशुपाल-वध के लिये शस्त्र-अस्त्र धारण कर लिये । उस समय उनके भावों में रौद्र और सख्यरस का मिश्रण था । रौद्र अंगीरस था और सख्यरस अंगरस था । एक बार श्रीकृष्ण ने देखा कि श्रीदामा अपनी लाठी को बड़ी कुशलता के साथ चलाता हुआ बलरामजी से लड़ रहा है, जो गदायुद्ध में बड़े दक्ष थे और अपनी गदा से जिन्होंने सुर जैसे असुरों तक को मार डाला था । अन्त में जब बलरामजी को केवल एक लाठी से लड़ रहे श्रीदामा ने हरा दिया तो श्रीकृष्ण बडे आनन्दित हुए और श्रीदामा की ओर महान् आश्चर्य से देखने लगे । इस उदाहरण में अद्भुत, सख्य तथा वीररस का मिश्रण है । सख्य तथा वीररस अंग हैं और अद्भुत अंगीरस समझा जाता है । इन नाना प्रकार के रसों के कुशल विश्लेषणकर्त्ता निर्देश करते हैं
३४२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
कि जब कोई रसाभास होता है तो जो रस अंगी, अर्थात् प्रधान हो ता है उसी को संचारी अथवा स्थायी समझा जाता है। 'विष्णुधर्मोत्तर' में प्रमाण है कि जब भक्ति के बहुत से रसों का आपस में मिलना हो तो मुख्यरस अथवा अंगीरस को ही भक्ति का स्थायिभाव कहते हैं। गौणरस का प्रकाश कुछ समय के लिये होता है, परन्तु अन्त में यह मुख्य रस में लीन हो जाता है। ये भक्तिरस के व्यभिचारिभाव माने जाते हैं। इस सन्दर्भ में एक बड़ी सुन्दर उपमा दी गई है, जिससे अंगी और अंग का परस्पर सम्बन्ध स्पष्ट हो जाता है। भगवान् वामन देव वास्तव में आदिपुरुष हैं; परन्तु वे इन्द्र के एक भाई के रूप में 'जन्मे'। यद्यपि वामन देव को कभी-कभी उप-देवता समझ लिया जाता है; परन्तु उनकी यथार्थ स्थिति यह है कि वे सम्पूर्ण देववृन्द के परम स्रोत हैं, देवाधिदेव इन्द्र के भी भर्ता हैं। इसी प्रकार कोई मुख्यरस भी कभी-कभी गौण रूप में प्रकट होता है। किसी कार्य में प्रमुख रूप से व्यक्त होने पर भी व्यभिचारिभाव को अंगरस ही माना जाता है। जब उसकी बहुत अधिक प्रधानता नहीं रहती तब वह अल्प रूप में ही प्रकट होता है और शीघ्र अंगीरस में फिर से लीन हो जाता है। किसी अल्प अभिव्यक्ति के अवसर पर उसे कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। जैसे कोई व्यंजन खाते हुए किसी के मुख में एक तिनका चला जाये तो वह उसका स्वाद नहीं लेगा और न ही उसके स्वाद को जानने का प्रयत्न करेगा।
अध्याय ५० रसों की मैत्री-वैर स्थिति (२) जैसा कहा जा चुका है, विरोधी रसों के मिश्रण को रसाभास कहते हैं। जैसे जब कोई मीठे चावल खा रहा हो तो उसमें नमकीन एवं कड़वे पदार्थों का मिश्रण विरोधी समझा जायगा। रसाभास का एक उत्तम उदाहरण किसी शोक में डूबे हुए निर्विशेष- वादी के इस वाक्य में है, "हाय ! निर्विशेष ब्रह्मज्ञान में आसक्त होने के कारण मैंने अपने दिन व्यर्थ समाधि के अभ्यास में व्यतीत किये हैं। मैंने निर्विशेष ब्रह्म के स्रोत और अखिलरसामृतमूर्ति भगवान् श्रीकृष्ण की ओर कभी ध्यान नहीं दिया।" इस वाक्य में शान्तरस और मधुररस, दोनों के मिश्रण से रसाभास है। कभी वृन्दावन जैसे स्थानों पर देखने में आता है कि श्रीकृष्ण के लिये किंचित् शान्तरस वाला व्यक्ति तुरन्त कृत्रिम रूप से मधुररस के स्तर पर पहुँच जाना चाहता है। परन्तु शान्तरस और मधुररस के परस्पर विरोध के कारण वह भक्ति से पतित हो जाता है, भक्ति से गिर जाता है। शान्तरस के स्तर पर एक महान् भक्त की इस व्यंग्योक्ति में भिन्न- भिन्न रसों का मिश्रण है, "जो पितृलोक के निवासियों से करोड़ों गुणा अधिक वत्सल हैं और जो निरन्तर देवताओं और ऋषियों द्वारा आह्लादित हैं, उन भगवान् श्रीकृष्ण को क्षणभर के लिये देखने को भी मैं आतुर हूँ। परन्तु बड़ा आश्चर्य है कि श्री के पति होने पर भी श्रीकृष्ण के शरीर पर साधारण युवतियों के नखक्षत रहते हैं।" यह रसाभास शान्तरस और उच्च मधुरस के मिश्रण का उदाहरण है। एक गोपी कहने लगी, "हे कृष्ण ! सबसे पहले अपनी लम्बी-लम्बी भुजाओं से मेरा आलिंगन करो। हे सखे ! मेरा सिर सूंघो और तब मैं तुम्हारे साथ रसास्वादन करूँगी।" रसों के इस विरोधी मिश्रण (रसा- भास) में मधुर अंगीरस है और दास्य अंगरस है। एक भक्त बोला, "हे कृष्ण ! तुम्हें महान् वेदान्ती परम सत्य ओर
३४४] भक्तिरसामृतसिन्धु नारदपंचरात्र के अनुगामी वैष्णव भगवान् कहते हैं। फिर ऐसे में मैं तुम्हें अपना पुत्र कैसे कहूँ ? तुम वही परम पुरुष हो फिर मेरी जिह्वा को तुम्हें अपना सामान्य पुत्र कहने का साहस क्यों कर हो ?" इस वाक्य में शान्त और वत्सलरस का मिश्रण है, इसलिए यह रसाभास है। एक अन्य भक्त कहने लगा, "हे मित्र ! आकाश में विद्युत् के विलास के समान ही मेरे नवयौवन की सम्पदा चपल है। अतएव मेरे रूप का कोई महत्त्व नहीं। मेरा आजतक श्रीकृष्ण से मिलन नहीं हुआ। अतएव कृपया तुरन्त ऐसी व्यवस्था करो कि मैं उनसे मिल सकूँ।" इस रसाभास में शान्तरस और मधुररस मिश्रित हैं। कैलास स्थित एक कामिनी ने एक बार श्रीकृष्ण से कहा, "हे कृष्ण ! तुम चिरंजीवी हो।" इस प्रकार कहकर उसने श्रीकृष्ण का प्रगाढ़ आलिंगन किया। वह वत्सल और मधुररस के मिश्रण के रसाभास का दृष्टान्त है। उपरोक्त विवरण का उद्देश्य यह दिखाना है कि यदि श्रीकृष्ण और उनके भक्तों में होने वाले प्रेमविनिमय का परिणाम शुद्ध नहीं होगा तो रसाभास हो जायगा। रूप गोस्वामी जैसे अग्रगण्य भक्तों के मत में भावों में विरोध होते ही रसाभास हो जाता है। एक सामान्य भक्त युवती श्रीकृष्ण का सम्बोधन करते हुए कहती है, "हे श्यामांग ! यह सत्य है कि माँस और शोणितमयी मैं तेरे रमण के योग्य नहीं हूँ। फिर भी अपने कटाक्षों से भेदी हुई मुझको कृपया स्वीकार कर ले।" इस वाक्य में बीभत्स और मधुररस के मिश्रण से रसाभास बन पड़ा है। श्रील रूपगोस्वामी की भक्तों को चेतावनी है कि वे अपनी रचनाओं अथवा व्यवहार में इस प्रकार के रसाभास न करें। विरोधी भावों का होना ही रसाभास कहलाता है। 'कृष्णभावनामृत' के जिस ग्रन्थ में रसाभास हो, विद्वान् अथवा भक्त उसे स्वीकार नहीं करते । 'विदग्धमाधव' (२.१७) में पौर्णमासी नान्दीमुखी से कहती है, "देखो, कैसा आश्चर्य है ! मुनिजन सब पाप-संताप की शान्ति के लिए विषयों से मन को हटाकर जिसमें क्षणभर को लगाने का भी प्रयास करते हैं यह बाला (राधा) उसी श्रीकृष्ण से अपने मन को हटाकर विषयों में लगाना चाहती है। बड़े-बड़े मुनिजन तुच्छ तप-त्याग के द्वारा हृदय में जिसकी लवमात्र स्फूर्ति के लिये उत्कंठित रहते हैं, उसी कृष्ण के स्मरण को यह मुग्धा अपने हृदय से निकालना चाहती है।" यद्यपि इस वाक्य में विरोधी रसों का संचार है; परन्तु परिणाम में कोई विरोध नहीं हैं, क्योंकि इसमें
रसों की मैत्री-वैर स्थिति (२) [ ३४५ माधुर्य का ऐसा उत्कर्ष है कि वह अन्य सभी रसों को परास्त कर देता है । श्रील रूपगोस्वामी ने इस सन्दर्भ में टिप्पणी की है कि ऐसा प्रेममय भाव सबके लिये सम्भव नहीं है । यह तो केवल वृन्दावन की गोपियों में ही पाया जाता है । इसी प्रकार के विरोधी रसों के अन्य अनेक उदाहरण हैं, जहाँ कोई रसाभास नहीं बनता । स्वर्ग में कोई उपदेवता कहने लगा, "जिनके व्यंग्य वचन कभी व्रजवासियों के लिये हास्य के स्रोत थे वे ही श्रीकृष्ण आज कालिय नाग के फनों में फँस कर सबके अतिशय शोक के पात्र बन गये हैं।" इस उदाहरण में हास्य और करुणरस का मिश्रण है । परन्तु कोई विरोध नहीं है, क्योंकि इन दोनों ही रसों से श्रीकृष्ण के लिये दिव्य प्रीति का वर्धन हुआ है । श्रीमती राधारानी से एक बार किसी ने कहा कि यद्यपि उन्होंने सब क्रियाएँ रोक दी हैं, परन्तु फिर भी वे सब प्रकार की भक्ति के लिये प्रेरणा की परम स्रोत हैं । वह वाक्य इस प्रकार है, "हे राधिके ! श्रीकृष्ण के विरह में तुम अब ठीक उसी वृक्ष के समान सुन्दर लग रही हो जिसकी शोभा पत्तों के आवरण से ढकी हुई न हो । तुम्हारे शान्तभाव से लगता है मानो तुम ब्रह्मसाक्षात्कार में पूर्ण रूप से लीन हो चुकी हो ।" इस उदाहरण में मधुररस और शान्तरस का मिश्रण है । परन्तु मधुरता का सब प्रकार से उत्कर्ष है । ब्रह्मसाक्षात्कार वास्तव में एक रुद्ध अस्तित्व है । कृष्ण स्वयं कहते हैं, "श्रीमती राधारानी मेरे लिये मूर्तिमती शान्ति बन गई हैं । उनके कारण मैं अब अपलक रहता हूँ—उनकी ओर देखता हुआ निरन्तर ध्यानमग्न रहता हूँ । उनके कारण मैंने अपना घर भी पर्वत की कन्दरा में बना लिया है।" यह मधुर और शान्तरस के मिश्रण का उदाहरण है; परन्तु इनमें कोई अन्तर्विरोध नहीं है । "हे रम्भे तुम कौन हो ? मूर्तिमती शान्ति हूँ । फिर इस आकाश में क्या कर रही हो ? परब्रह्म का साक्षात्कार । तुमने नेत्रों को क्यों फैला रखा है ? परतत्त्व श्रीकृष्ण की अपूर्व रूपमाधुरी के दर्शन के लिये । ऐसे में तुम व्याकुल क्यों लग रही हो ? क्योंकि कामदेव क्रियाशील है ।" इस उदाहरण में विरोधी रसों के रहते भी कहीं भी रसाभास नहीं हैं, क्योंकि मधुररस ने शान्तरस को अभिभूत कर दिया है । श्रीमद्भागवत् (१०.६० ४५) में रुक्मिणीदेवी कहती हैं, "हे पतिदेव ! जो आपके चरणकमलों के मकरन्द को न सूंघती हो वह मूढ़ स्त्री ही त्वचा, लोम, नख, एवं केशों से ढके माँस, अस्थि, रक्त, कृमि, विष्टा, कफ, वात
३ ४६] भक्तिरसामृतसिन्धु और पित्त से परिपूर्ण जीवित शव को कान्ताभाव से भजती है।” इस वाक्य में उन तत्त्वों का वर्णन है जिनसे प्राकृत शरीर बना है। परन्तु इसमें कोई रसाभास नहीं है क्योंकि इससे जड़ और चेतन का यथार्थ विवेक प्रकट होता है। विदग्धमाधव (२.३१) में श्रीकृष्ण अपने सखा से कहते हैं, “हे सखे ! कैसा आश्चर्य है कि जबसे मैंने राधारानी के सुन्दर नयनकमलों को देखा है तब से चन्द्रमा और कमल को देखकर उद्गमन करने लगा हूँ।” यह बीभत्स मिश्रित मधुररस का वर्णन है; परन्तु यहाँ कोई रसाभास नहीं है। निम्नलिखित वाक्य में नाना प्रकार के भक्तिरसों का उल्लेख है— “रंगभूमि में युद्ध की सज्जा से विभूषित अजित श्रीकृष्ण को विजयी देख कर उनके सखा ग्वालों के शरीर रोमांच को और शत्रुओं के शरीर कालिमा को प्राप्त हो गये।” इस वाक्य में यद्यपि वीररस और भयानक रस का मिश्रण है; परन्तु कोई रसाभास प्रतीत नहीं होता। एक मथुरानिवासिनी ने अपने पिता से द्वार खोलकर उसके साथ सांदीपनी मुनि के यहाँ श्रीकृष्ण को खोजने जाने का निवेदन किया । उसका उपालम्भ था कि श्रीकृष्ण ने उसके चित्त को हर लिया है। इस घटना में मधुर और वत्सलरस का मिश्रण होते हुए भी रसाभास नहीं है । एक ब्रह्मानन्दी का उद्गार इस प्रकार है, “उन परब्रह्म सच्चिदा- नन्दघन भगवान् श्रीकृष्ण को मैं कब देख सकूँगा जिनका वक्षःस्थल रुक्मिणी के स्तनों का स्पर्श करने से उस पर लगे लाल कुंकुम से उपलिप्त हो गया है ।” इस भाव में मधुर और शान्तरस का मिश्रण है। यद्यपि ये दोनों विरोधी रस हैं, परन्तु यहाँ कोई रसाभास नहीं है, क्योंकि एक ब्रह्मानन्दी भी श्रीकृष्ण की ओर आकृष्ट हो सकता है । नन्द महाराज ने अपनी गृहिणी से कहा, “हे प्रिये ! तुम्हारा मल्लिका के समान कोमल और मृदु पुत्र कृष्ण आज पर्वत जैसे बलिष्ठ केशी दानव को मारने गया है। अतएव मुझे चिन्ता हो रही है। परन्तु भय की कोई बात नहीं, तुम्हारे पुत्र का सब प्रकार से कल्याण हो । अपने स्तम्भ जैसे भुजदण्ड को उठाकर केशी दानव को मारकर सारे व्रजमण्डल के निवासियों को चिन्ता से मुक्त कर देगा ।” इस वाक्य में वीररस और भयानक रस दोनों हैं। परन्तु दोनों से वत्सलरस बढ़ता है। अतएव दोनों में विरोध नहीं है ।
रसों की मैत्री-वैर स्थिति (२) [ ३४७ 'ललितमाधव' में श्रील रूपगोस्वामी का उल्लेख है, "कंस की रंग- भूमि में श्रीकृष्ण को आया देखकर कंस के आचार्य का मुख विकार को, मल्ल लालिमा को, मित्र गण्डस्थल की उन्नति को, दुष्ट लोग प्रलय को, ऋषि ध्यान को, देवकी माताएँ आदि गरम-गरम आँसुओं को, योद्धा रोमांच को, इन्द्र आदि देवता विस्मय को, दास लास्य को और वनितामण्डली कटाक्ष को प्राप्त हुई।" इस वाक्य में नाना प्रकार के रसों के मिश्रण का वर्णन है; परन्तु रसाभास नहीं है। इसी प्रकार का एक वाक्य जिसमें रसाभास नहीं है, 'ललितमाधव' में पाया जाता है। ग्रन्थकार सब पाठकों को आशीर्वचन देते हुए कहते हैं, "यद्यपि श्रीभगवान् अपने बाँयें हाथ की एक उँगली पर पर्वत को उठा सकते हैं; फिर भी वे सदा दीन और विनम्र बने रहते हैं। अपने प्रिय भक्तों पर उनकी कृपा निरन्तर रहती है। इन्द्रयज्ञ को बन्द कराकर उन्होंने इन्द्र के द्वेष को परास्त कर दिया। वे सब युवतियों के लिये सम्पूर्ण आनन्द का विधान करने वाले हैं। वे विभो तुम्हारी सदा रक्षा करें !"
अध्याय ५१ रसाभास रसाभास अर्थात् विरोधी रसों के मिश्रण तीन प्रकार के होते हैं— उपरस, अनुरस तथा अपररस। श्रीकृष्ण का साक्षात्कार करके एक निर्विशेषवादी कह उठा, "जब कोई संसार के सम्पूर्ण दोषों से मुक्त हो जाता है तो समाधि में दिव्या- नन्द की अनुभूति होती है। परन्तु हे आदिदेव ! हे आदिपुरुष ! आपके दर्शन से मुझे उसी सुख की प्राप्ति हो रही है।" इस रसाभास का नाम शान्त उपरस है, क्योंकि यह निर्विशेषवाद और सविशेषवाद के मिश्रण से हुआ है। एक अन्य वाक्य इस प्रकार है, "जहाँ भी मेरी दृष्टि जाती है वहीं- वहीं आपका स्वरूप देखता हूँ। अतएव मैं जान गया हूँ कि आप निर्विकार ब्रह्मज्योति और सब कारणों के परम कारण हैं। इस प्रकट सृष्टि में आपके बिना और कुछ भी नहीं है।" यह उपरस का द्वितीय उदाहरण है। जिस समय श्रीकृष्ण का अन्तरंग सखा मधुमंगल व्यंग्य मुद्रा में उनके सामने नाच रहा था तो उसकी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया और वह परिहास में कहने लगा, "हे नाथ ! मैं आपसे कृपा की याचना करता हूँ।" यह सख्यप्रीति और शान्तरस के उपरस का दृष्टान्त है। कंस अपनी बहन देवकी से बोला, "हे बहन ! जबसे मैंने तेरे पुत्र कृष्ण को देखा है तब से मुझे लगता है कि वह पर्वतों के समान बलशाली मल्लों को भी मार सकता है। अतएव अब मैं निश्चिन्त हो गया हूँ कि बड़े भयंकर युद्ध से भी उसको कोई भय नहीं हो सकता।" यह वत्सल उपरस का उदाहरण है। 'ललितमाधव' में श्रील रूपगोस्वामी ने कहा है, "याज्ञिक ब्राह्मणों की सब स्त्रियाँ युवती थीं। वे श्रीकृष्ण की ओर वृन्दावन की गोपियों के समान ही आकृष्ट हो गईं। इस आकर्षणवश उन्होंने श्रीकृष्ण को भोजन कराया।" यहाँ दो भक्तिरस हैं—मधुर और वत्सल और इनका परिणाम है शृंगार उपरस ।
रसाभास [ ३४६ श्रीमती राधारानी की एक सखी उनसे कहने लगी, "हे गान्धार्विके ! तू हमारे ग्राम की सबसे साध्वी युवती थी; परन्तु अब पूर्ण रूप से साध्वी नहीं रही । ऐसा कृष्ण को देखने और उसकी वंशी ध्वनि को सुनने से तुझ पर कामदेव के प्रभाव का ही परिणाम है ।" यह एक के अनेकों में रति से होने वाले उपरस का दृष्टान्त है । कतिपय विद्वानों के मतानुसार नायक-नायिका के भाव नाना प्रकार के रसाभासों को उत्पन्न करते हैं । "श्रीकृष्ण की दृष्टि पड़ने से गोपियाँ पवित्र हो गई हैं । ऐसी अवस्था में उनके शरीर पर कन्दर्प का प्रभाव स्पष्ट दीख रहा है ।" यद्यपि लौकिक दृष्टि से किसी युवक का किसी युवती को देखना दूषित समझा जाता है; परन्तु जब श्रीकृष्ण गोपियों पर अपनी दिव्य दृष्टि डालते तो वे पवित्र हो जातीं । भाव यह है कि श्रीकृष्ण परतत्त्व हैं और उनका प्रत्येक कार्य दिव्य और परम शुद्ध है । यमुनाजल में जिस समय श्रीकृष्ण कालिय नाग का शासन करने के लिये उसके सिरों पर नाच रहे थे तो कालिय की स्त्रियों ने श्रीकृष्ण से कहा, "अपनी मुरली ध्वनि से तुम क्यों हम नागकिशोरियों के चित्त का मन्थन कर रहे हो ।" कालिय की पत्नियाँ श्रीकृष्ण से ग्राम्यवार्ता कर रही थीं जिससे वे उनके पति को छोड़ दें । अतएव यह भी उपरस का लक्षण है । एक भक्त बोला, "हे गोविन्द ! यह रमणीय कैलास कुञ्ज है । मैं सुन्दर रमणी हूँ और हे माधव ! तुम विदग्ध हो । फिर इससे आगे और क्या कहना है, यह तुम ही सोचो ।" यह मधुररस में धृष्टतार्जनित उपरस का उदाहरण है । वृन्दावन से गुजरते हुए नारद मुनि ने भाण्डीर वन में एक वृक्ष के ऊपर उस तोते-तोती के जोड़े को देखा जो निरन्तर श्रीकृष्ण के साथ रहता था । वे दोनों वेदान्त दर्शन पर सुनी किसी वार्ता का अनुकरण करते हुए नाना प्रकार से वितण्डा कर रहे थे । यह देखकर नारद को बड़ा आश्चर्य हुआ और वे अपलक दृष्टि से देखने लगे । यह अनूरस का उदाहरण है । श्रीकृष्ण को युद्धभूमि से भागता देखकर दूर खड़ा चंचल नयनों वाला जरासन्ध बड़े गर्व का अनुभव कर रहा था । इस प्रकार विजय के अभिमानवश जोर-जोर से हँसने लगा । यह अपरस का उदाहरण है । श्रीकृष्ण से सम्बन्धित सम्पूर्ण भाव, भावाभास तथा रसाभास रस ही माने गये हैं । सारे कुशल भक्तों के मत में जो कुछ भी श्रीकृष्ण के प्रेम को उद्दीप्त करे वह दिव्यरस है ।
विज्ञप्ति श्रील रूपगोस्वामी अपने ग्रन्थ का उपसंहार करते हुए कहते हैं कि ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ साधारण मनुष्यों के लिये समझने को अति दुरूह है। परन्तु उनकी अभिकांक्षा है कि सनातनस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण उनकी इस रचना से सन्तुष्ट हों। श्रील रूपगोस्वामी ने ‘श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु’ को गोकुल वृन्दावन में अनुमानतः १५५२ में समाप्त किया। संसार में अवस्थिति के काल में श्रील रूपगोस्वामी वृन्दावन के नाना भागों में रहा करते थे और उनका मुख्यालय वृन्दावन धाम के राधादामोदर मन्दिर में था। श्रील रूपगोस्वामी की भजनस्थली आज भी विद्यमान है। राधादामोदर में दो अलग-अलग स्तूप हैं। उनमें से एक को उनकी भजनकुटि कहा जाता है और दूसरी में उनकी समाधि है। इस समाधि के ठीक पीछे मेरी अपनी भजनस्थली है। परन्तु १६६५ से मैं वहाँ नहीं हूँ। अब मेरे शिष्य उस स्थान की देखभाल कर रहे हैं। श्रीकृष्ण की इच्छा से अब मैं अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ के लॉस एंजिल्स मन्दिर में निवास कर रहा हूँ। यह तात्पर्यप्रकाश आज ३० जून, १६६६ को समाप्त हुआ। इति भक्तिरसामृतसिन्धौ गौणभक्तिरसादिनिरूपणनामा उत्तर विभागः॥ इति भक्तिवेदान्त भाष्ये उत्तर विभागः ॥४॥ ॥इति श्रीभक्तिरसामृत सिन्धुः॥
भूमिका [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] [अस्पष्ट / अत्यंत क्षीण पाठ] ॥ [अस्पष्ट श्लोक पाद / पाठ] ॥ ॥ [अस्पष्ट श्लोक पाद / पाठ] ॥ ॥ [अस्पष्ट श्लोक पाद / पाठ] ॥
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भक्तिरसामृतसिन्धु की रचना श्रील रूप गोस्वामीने आज से प्रायः ५०० वर्ष पहले की थी। इस ग्रन्थ में उस विज्ञान का पूरा वर्णन है जिसके द्वारा दिव्य सेवाभाव में भगवान् से तुरन्त योग प्राप्त किया जा सकता है। भक्तियोग भगवत्प्राप्ति का सर्वोत्कृष्ट साधन तो है ही, साथ-साथ सरल और उदात्त भी है। आज के युग में यह के युग में यह सब के लिए बना। श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद