भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

१६४ भावप्रकाशनिघण्टुः

जब यव क्षुपों पर बाल निकलने वाले हों तब पञ्चांग को संग्रह कर सुखा दें। और सुखाने पर आग लगा कर राख बना उसको २४ घंटे आठगुने पानी में भिगो दें । यदि पञ्चांग जलाने के बाद उसकी राख काली रहे तो जल में डालने के पूर्व उसे कढ़ाई में डाल कर राख सफेद होने तक पकाना चाहिए । फिर ऊपर का स्वच्छ जल निथार लें अथवा फिल्टर से पानी को छान लें । उस स्वच्छ जल को किसी कलईदार कड़ाही में अग्नि पर पकावें । पानी सूखने पर कड़ाही में जमे हुए क्षार को खुरच कर सुरक्षित रखें । इसी को जवाखार कहते हैं। यवक्षार नाम से औषध में उपर्युक्त विधि से तैयार किये हुए क्षार का व्यवहार करना चाहिये । इस क्षार में अधिकांश मात्रा पोटैशियम् कार्बोनेट (Potassium carbonate) की रहती है तथा कुछ अन्य पदार्थ भी रहते हैं। इसी प्रकार अधिकांश वृक्षों की राख में भी पोटैशियम् कार्बोनेट रहता है। तथा उनके अन्दर रहने वाले अन्य विभिन्न पदार्थों के कारण विभिन्न क्षारों के गुणों में अन्तर पाया जाता है। काष्ठमय झाड़ियों की अपेक्षा रसयुक्त वर्षांयु क्षुपों में यह अधिक पाया जाता है। व्यापार की दृष्टिसे पोटैशियम् कार्बोनेट, आर्टिमिसिआ या वार्मवुड (Artemisia; Worm- wood) नामक वृक्षों से, बीटरूट (Beet-root) से, भेड़ के बालों को धो कर उस घोल से, सोराखार से एवं पोटैशियम् सल्फेट (Potassium sulphate) आदि से प्राप्त किया जाता है । भूमि में पोटैशियम् के लवण रहते हैं। वृक्ष भूमि से इनका शोषण कर लेते हैं। इनके बिना वृक्षों की वृद्धि नहीं होती। उपर्युक्त क्षार मृदुक्षार कहलाता है। तीक्ष्ण क्षार बनाने के लिये क्षारोदक (वृक्ष को जला कर बनाई राख के जलीय भाग) में चूना मिलाना चाहिये तथा बाद में उस घोल को सुखाना चाहिये । यह अत्यन्त दाहक होता है तथा इसमें पोटैशियम् हाइड्रोक्साइड रहता है । यवक्षार का स्वाद राखी के समान किन्तु कुछ नमकीन होता है। गुण और प्रयोग—यवक्षार अग्निदीपक, मृदुविरेचक, अम्लतानाशक, रक्तशोधक, सौम्य मूत्रल, कफनिःसारक एवं कुछ स्वेदजनक है । इसका उपयोग शूल, अजीर्ण, अम्लपित्त, अम्लोत्कर्ष, मूत्रकृच्छ्र, यकृत् प्लीहा एवं अन्य ग्रन्थियों की वृद्धि, ज्वर, अर्श, कामला एवं गुल्म में किया जाता है। (१) जीर्ण आमाशयशोथ तथा आमाशय में श्लेष्मा की अधिकता होने पर भोजन के २० मिनट पूर्व यवक्षार का उपयोग अन्य सुगन्धि एवं तिक्त औषधों के साथ किया जाता है जिससे श्लेष्मा कम हो कर पाचक स्रावों की उत्पत्ति होती है तथा पाचन ठीक होता है। परिणाम शूल एवं अम्लपित्त आदि विकारों में भोजन के २ घंटे पश्चात् इसके उपयोग से अम्लता की अधिकता से होने वाला शूल नहीं होता। नींबू के रस के साथ फेनायमान मिश्रण के रूप में लेने से आमाशय पर शामक प्रभाव होकर वमन में लाभ होता है। (२) यकृत्, प्लीहावृद्धि एवं गुल्म आदि में बड़ाहर्रा, रोहितक की छाल एवं छोटी पीपल के क्वाथ के साथ इसका उपयोग किया जाता है। इसके उपयोग से आन्त्रिक श्लेष्मा कम होकर पित्त मार्ग का अवरोध दूर होने से कामला में लाभ होता है । (३) इसके उपयोग से कफ पतला होकर निकलने लगता है। शुष्क कास तथा श्वसनिका- शोथ आदि में ४ रत्ती यवक्षार, १० बूंद अडूसा का रस तथा २ रत्ती लौंग का चूर्ण देने से लाभ होता है। (४) ज्वर तथा अन्य अम्लोत्कर्ष की अवस्थाओं में इसका उपयोग किया जाता है । ज्वर में स्वेदल रूप में पसीना लाने के लिये नीम के रस या क्वाथ के साथ इसका उपयोग लाभदायक है ।


हरीतक्यादिवर्गः १६५ (५) इससे वृक्कों को उत्तेजना मिलने से मूत्रोत्सर्ग अधिक होता है। मूत्रकृच्छ्रता में इससे प्रक्षोभ का शमन होकर पेशाब की जलन दूर होती है। मूत्र की प्रतिक्रिया क्षारीय होने से यूरिक् एसिड (Uric acid) का उत्सर्ग अधिक हो कर आमवात, वातरक्त तथा यूरिक् एसिड से बनने वाली पथरी में लाभ होता है। (६) इसके घोलका बाह्य प्रयोग शीतपित्त, उददं, खुजली, श्वित्र, विचर्चिका एवं कीटदंश पर किया जाता है। इससे त्वचा के ऊपर का तैलीय अंश घुल कर निकल जाता है जिससे सादे जल की अपेक्षा इसके घोल से त्वचा अधिक साफ हो जाती है । अधिक मात्रा में इसके प्रयोग से अतिसार, शोथ, फॉस्फेट्स से बनने वाली पथरी आदि व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं तथा वृक्क भी विकार ग्रस्त हो जाते हैं । मात्रा—१-२ रत्ती । ९४ सज्जी ! हि०-सज्जो, सज्जीखार, सज्जीमिट्टी । बं०-साजिखार, साजीमाटी, साजी खार । म०-सज्जी- खार, साजी । मा०-साजीखार । गु०-साजीखार । क०-साजीखारं, साजी खार, सज्जीखार । ता०-सज्जीकारं । पं०-सज्जी, लोटा सज्जी, खगनखार । फा०-संजारे कखिया, अशखार । अ०- कलिमास्कर, कलिवशम्बूअ असफर । अं०-Barilla (बर्रिला-खारे वृक्ष की राख); Impure Car- bonate of Soda (इम्प्योअर कार्बोनेट ऑफ सोडा ) । सज्जी—सफेदी लिए भूरे रंग का एक प्रसिद्ध खार है। औषध के अतिरिक्त कांच, साबुन एवं कागज आदि अनेक पदार्थों के निर्माण में इसका उपयोग किया जाता है। सज्जी कई प्रकार से बनाई जाती है जिनका संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है। (१) समुद्र के किनारे तथा क्षारीय भूमि में उत्पन्न होने वाले कुछ वृक्ष होते हैं, उनकी राख में सज्जी होती है। समुद्र के सेवार में भी सज्जी होती है जिसकी राख को केल्प (Kelp) कहा जाता है। ये स्पंज के समान कड़े गट्ठे होते हैं तथा इसमें ३-८% सज्जी होती है। खारे वृक्षों की राख को खार सज्जी (Barilla-बॅरिला) कहा जाता है जिनमें २५-४०% सज्जी होती है। भारतवर्ष में निम्न तीन वर्ग के खारे वृक्ष पाये जाते हैं—चिनोपोडिएसी (Chenopodia- ceae), सैलिकोर्निएसी (Salicorniceae) एवं संल्सोलेसी (Salsolaceae) । पंजाब में अक्तूबर से जनवरी तक सज्जी बनाने के कारखाने काम करते हैं । खारे वृक्षों को सुखाकर ६ फीट गोल एवं ३ फीट गहरे गढ़े में डालकर धीरे-धीरे जलाते हैं । गढ़े में हांडियों को नीचे छेद कर उल्टे मुंह रखते हैं । कुछ समय बाद राख में से पतला द्रव निकल कर हांडियों में जमता है । ४ दिन वैसे ही अपने आप ठंडा होने देते हैं । हांडियों में जो सज्जी जमा होती है उसे वहां लोटासज्जी कहा जाता है । हांडियों के बाहर जो सज्जी जमती है वह अशुद्ध होती है । लोटासज्जी कॅरोक्साइलॉन् ग्रिफिथिआइ (Caroxylon Griffithii) नामक वृक्ष से बनाई जाती है। यह सबसे शुद्ध होती है तथा औषध में इसका व्यवहार किया जाता है। मांटगोमरी प्रांत में इसे खगनखार कहा जाता है। दूसरे वृक्षों से प्राप्त संज्जी जो हलके दर्जे की होती है उसे भूसीसज्जी कहते हैं। लोटासज्जी को औषध में व्यवहार में लाने के पूर्व शोधन कर लेना चाहिये । इसके लिये इसे दुगुने जल में बंद पात्र में २ घंटे उबालते हैं तथा बार-बार हिलाते जाते हैं । फिर ऊपर के गरम तरल भाग को छान कर तामचिनी की कड़ाइयों में मन्द आंच पर सुखाते हैं । बचे हुवे नीचे के भाग में फिर जल डालकर उबाल कर ऊपर का द्रव छान कर सुखाते हैं । इस

१६६ भावप्रकाशनिघण्टुः प्रकार प्राप्त हुई सज्जी को फिर उष्ण जल में घोल कर सुखाते हैं जिससे इसकेरवे बनते हैं । इन्हें बंद बोतलों में रखना चाहिये । (२) भारतवर्ष के अनेक प्रान्तों में ऊसर अथवा रेहाल भूमि होती है। ऐसी भूमि में सज्जी, खारीनोन (सोडियम् सल्फेट ), नमक एवं सोरा आदि मिले रहते हैं। भिन्न-भिन्न स्थानों की रेह में इनकी मात्रा कम ज्यादा हुआ करती है तथा और भी कुछ पदार्थ उसमें रहते हैं। जिस रेह में सज्जी की अधिकता होती है उसे सज्जी माटी या धोबी की मट्टी कहा जाता है। उत्तरप्रदेश में गंगा और जमुना नदी के बीच के प्रदेश में रेह बहुत होती है। इसमें ८८% सज्जी होती है। जिस स्थान में रेह अधिक होती है वहां इसका जमीन पर बरफ की तरह सफेद स्तर स्पष्ट दिखलाई देता है। हिमालय से जो नदियां बहती आती हैं वे अपने साथ विभिन्न क्षार तथा लवणों को बहा ले आती हैं। ये आसपास की जमीन में जमा होते हैं। गरमी के दिनों में उष्णता से जब नीचे का जल ऊपर आता है तब उसके साथ ये क्षार ऊपर आकर जम जाते हैं। जिस रेह में सज्जी अधिक होती है उसे जल में घोल कर एवं नितार-छानकर सुखा लेते हैं। (३) मध्यप्रांत में लोणार तालाब से भी सज्जी बनाई जाती है। यह रेह से प्राप्त सज्जी से शुद्ध होती है। इस तालाब में सज्जी के बड़े-बड़े टुकड़े भी मिलते हैं तथा उसके जल को सुखाकर भी सज्जी प्राप्त करते हैं। इस तालाब से सोडियम् बाइकार्बोनेट (Sodium bicarbonate, Na H CO_3), सं०-द्रोणलवण भी प्राप्त होता है। इसको दोने में लेकर जमाते हैं। इसलिये इसे द्रोण लवण कहा जाता है। (४) उपर्युक्त विधियों के अतिरिक्त खाने के नमक एवं खारीनोन आदि से भी सज्जी बनाई जाती है। शुद्ध सज्जी को सुरतीखार कहा जाता है तथा बाजारी अशुद्ध सज्जी को बांगडखार कहते हैं। सर्वप्रथम लिखे हुए प्रकार की शुद्ध सज्जी का औषध में व्यवहार करना चाहिये। यह शुभ्र, गंधहीन, अस्वादु, कुछ नमकीन एवं ताजी अवस्था में रवेदार होती है। खुली हवा में रखने पर इस पर बुरादा जम जाता है। यह जल में विलेय लेकिन मद्यसार में अविलेय होती है। रासायनिक संगठन-इसमें प्रधानतया सोडियम् कार्बोनेट (Sodium carbonate, Na_2 Co_3 10H_2O) रहता है। गुण और प्रयोग- सज्जी के गुण यवक्षार के गुणों के समान ही हैं किन्तु उससे यह कुछ हीनगुण युक्त है। यह दीपन, पाचन, मूत्रल, कफनिःसारक, अम्लतानाशक एवं आध्मानहर है। इसका उपयोग कास, श्वास, अजीर्ण, अम्लपित्त, शूल, आध्मान, मूत्रकृच्छ्र, आमवात एवं गुल्म आदि रोगों में किया जाता है। (१) अग्निमांद्य, अजीर्ण एवं परिणामशूल में सज्जीखार, यवक्षार एवं पञ्चलवण सब समान मात्रा में लेकर नींबू के रस की भावना देकर १० रत्ती की मात्रा में दिया जाता है। (२) सज्जीखार ५ भाग, यवक्षार ५ भा०, सोंठ ४ भा०, सौंचल नमक ४ भा० एवं छोटी पीपल ३ भा० इनका चूर्ण अजीर्ण एवं शूल आदि में गरम जल के साथ दिया जाता है। (३) अनेक चर्म रोगों में इसके हल्के घोल में अवगाहन कराया जाता है एवं जले हुए भाग पर १०% घोल की पट्टी रखने से पीड़ा शांत होती है। सज्जीखार एवं यवक्षार दोनों को जल में मिलाकर फोड़े पर लगाने से फोड़ा जल्दी फूटकर बैठ जाता है। मात्रा-१-२ र०


हरीतक्यादिवर्गः १६७ नोट-पाश्चात्य चिकित्सा में यवक्षार (पोटैशियम् कार्बोनेट) एवं सज्जीखार (सोडियम् कार्बोनेट) की अपेक्षा आंतरिक प्रयोग के लिये पोटैशियम् बाइकार्बोनेट एवं सोडियम् बाइकार्बोनेट का अधिक प्रयोग किया जाता है क्योंकि ये अधिक सौम्य होते हैं। इनमें भी पोटैशियम् के लवण शरीर में एक निश्चित अनुपात में रहते हैं। जब तक इन्हें अत्यधिक मात्रा में या सिरा द्वारा प्रयोग नहीं करते तब तक इनके प्रभाव में विशेष अंतर दिखलाई नहीं देता। भारतवर्ष के लोणार तालाब की सज्जी में सोडियम् बाइ कार्बोनेट रहता है। ९५ सोरा (सुवर्चिका) सं०-सोरक्षार, सूर्यक्षार, सौवर्चल, वह्नयुत्तेजक, सुवर्चिका, कर्पूर शिलाजतु । हि०-सोरा, कलमी सोरा, सोराखार । बं०-सोरा । गु०-सुरोखार । पं०-कलमीसोर । ता०-पोटिलुप्पु । अ०-अव्कर । फा०-शोरा । अं०-Saltpetre (साल्टपीटर = पहाड़ी नमक); Potassium Nitrate (पोटै- शियम् नाइट्रेट) । ले०-Potassii Nitras (पोटसिआइ नाइट्रास्)। भारतवर्ष में सोरे की जानकारी बहुत दिनों से है। शुक्रनीति एवं रसार्णव में इसे सौवर्चल लिखा है। माधवविरचित आयुर्वेद-प्रकाश में सोरे को 'कर्पूराभं शिलाजतु सोरकाख्यं तु पाण्डुरम्' ऐसा लिखकर अग्निवाण में इसका उपयोग होता है, ऐसा लिखा है। रसपद्धति में 'श्वेतं शिलाजतु वह्न्युत्तेजकं' लिखा है तथा उचित रोगोपयोग भी दिया है। रसरत्नसमुच्चय में भी 'कर्पूर शिला- जतु' नाम से इसका उल्लेख है तथा गुण भी सोरे से मिलते हैं। इसका मारण अथवा सत्त्वपातन नहीं किया जाता' यह निर्देश ध्यान देने योग्य है। और भी अनेक स्थानों पर इसका उल्लेख मिलता है। मूल में यह आया है कि 'सुवर्चिकां स्वर्जिकावद् बोद्धव्या गुणतो जनै.' यह बात भ्रमात्मक मालूम होती है। या तो सज्जी का ही कोई भेद होगा जिसके लिए सुवर्चिका शब्द का प्रयोग भावप्रकाशकार ने किया हो या डा० देसाई के कथनानुसार भावप्रकाशकार का कथन गलत हो। इसी प्रकार 'सौवर्चल' शब्द के विषय में भी मतभेद है जिसके संबन्ध में सौवर्चल लवण के अन्तर्गत विवेचन किया गया है। यहां सोरे का वर्णन दिया जा रहा है। प्राचीनकाल में भारतवर्ष से सोरे के निर्यात का व्यापार बहुत थ' लेकिन अंग्रेजों के नियन्त्रण के कारण इसका व्यापार बहुत कम हो गया। यहां उत्तर हिन्दुस्तान, पंजाब, सिंध एवं गङ्गा नदी के बीच के प्रदेश तथा बिहार में यह बहुत उत्पन्न होता है। बिहार में तो यह सबसे अधिक उत्पन्न होता है। वहां पर जमीन पर ओस की तरह जमा हुआ सोरे का पतला स्तर दिखलाई देता है। लकड़ी, गोबर आदि की राख, जानवरों की विष्ठा, मूत्र, कुछ बरसात एवं उष्णता तथा एक प्रकार के कृमि इन सबकी सहायता से सोरा बनता है इसलिए इसे पृथ्वीलवण और कृमिज क्षार ये नाम दिये गये हैं। बरसात के पूर्व गांव के आस पास की भूमि से धूल तक खोदकर उसे जल में मिलाते हैं फिर ऊपर के जल को उबाल कर या सूर्यताप से सुखाकर सोरा निकालते हैं। फिर से अशुद्ध सोरे को साफ किया जाता है। कलमीशोरा काफी शुद्ध रहता है। इसमें ९०% शुद्ध सोरा रहता है। बिहार में सोरा निकालने वाले लोगों को नुनिया कहा जाता है। सोरे के साथ ही साथ उस मिट्टी में खारीनोन एवं खाने का नमक भी होता है जिसे अलग कर लिया जाता है। ऐसे नमक को पंजाब में 'कल्रीनून' या 'निमकशोर' एवं बिहार में 'पकवानिमक' कहा जाता है जिसे कुछ लोगों ने सौवर्चल लवण माना है। सोरा, सोडियम् नाइट्रेट (Sodium Nitrate) तथा पोटैशियम् क्लोराइड् (Potassium Chloride) के परस्पर संयोग के द्वारा कृत्रिम रूप से भी बनाया जाता है।

१६८ भावप्रकाशनिघण्टुः शोधन-बाजारू सोरे में ४०-६४% शुद्ध सोरा होता है और बाकी नमक रहता है। कलमी- शोरा काफी शुद्ध होता है। शोरे को साफ करने के लिये एक तांबे के पात्र में शोरे के बराबर उबलते जल में उसे घोलते हैं तथा मोटे कपड़े से लकड़ी की थालियों में छानते हैं। जब घोल ठंडा होने लगता है तब उसे लकड़ी से हिलाते जाते हैं जिससे इसका दानेदार चूर्ण प्राप्त होता है। औषध-प्रयोग में लाने से पूर्व इलायची के क्वाथ से इसमें ३ बार भावना देनी चाहिये। अशुद्ध सोरे के प्रयोग से दाह, मूर्च्छा, रक्तपित्त, श्रम, अग्निमान्द्य एवं विड्ग्रह आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। अशुद्ध के सेवन से उत्पन्न विकारों की शान्ति के लिए ३ माशा कालीमरिच का चूर्ण घृत के साथ ७ दिन तक प्रातःकाल में सेवन करना चाहिये। शुद्ध सोरा रंगहीन दानेदार चूर्ण रूप में या षट्फलक स्फटिक रूप में होता है। इसका स्वाद शीतल एवं कुछ नमकीन होता है। अंगारे पर डालने से एकदम जलने लगता है। इसमें का आक्सीजन अलग होने में समर्थ होने के कारण किसी गंधक आदि ज्वलनशील पदार्थ के साथ इसे मिलाकर गरम करने से एकाएक बहुत तीव्र उष्णता उत्पन्न होती है जिसमें चांदी का सिक्का तक गल जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें पोटैशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate, KNO₃) रहता है। अल्प मात्रा में सोरे में कुछ नाइट्राइट्स (Nitrites) भी पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह कटु, तीक्ष्ण, मूत्रविरेचनीय, स्वेदजनन, श्लेष्महर एवं शोथहर है। इसका गाढ़ा घोल आमाशय एवं आंत्र में तीव्र प्रक्षोभ उत्पन्न करता है जिससे रक्तवमन, रक्तातिसार तथा हृदयातिपात होकर मृत्यु भी हो सकती है। हृदय के लिए यह अवसादक होने के कारण हृदय की गति कम होती है तथा उसका बल भी कम हो जाता है। यह रक्त कणों के आक्सीजन ग्रहण करने की शक्ति को घटाता है एवं इससे रक्त जमने की क्रिया भी घट जाती है। इसका मूत्रल प्रभाव वृक्क द्वारा अधिक मूत्र के छनने (Filtration) से होता है तथा अधिकांश मात्रा में यह मूत्र द्वारा उत्सर्गित हो जाता है। इसका उपयोग मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, ज्वर, शोथ, प्लीहावृद्धि, पाण्डु, कामला, प्रमेह एवं अग्नि मांद्य आदि में किया जाता है। (१) मूत्रकृच्छ्र एवं अश्मरी में इसको गोखरू के काढ़े के साथ पिलाते हैं तथा बड़ के पत्तों को पीस कर तथा उसमें सोरा मिला कर पेडू पर लेप करते हैं। (२) पुराने सोजाक में सोरा ५, दालचीनी ४, हर्र ३, पाषाणभेद ३, इलायची ५ एवं चीनी २० भाग, इसका अवलेह ४ माशा की मात्रा में उपयोगी हैं। सोरा ५ रत्ती को मात्रा में भिंडी के क्वाथ के साथ देने से भी सोजाक में लाभ होता है। (३) श्वेत प्रदर (ल्यूकोरिया) में ५ र० सोरा तथा तथा २॥ र० फिटकिरी का चूर्ण दिन में ३ बार दिया जाता है। (४) तमक श्वास के आवेग को रोकने के लिये इसके २०% घोल में सुखाए हुए सोख्ते के कागज को जलाकर उसका धुआँ नाक से सूंघने से आवेग रुक जाता है। (५) ज्वर में मद्य, शर्करा एवं उष्ण जल के साथ १० र० सोरा देने से पसीना हो कर ज्वर कम हो जाता है। (६) वातरक्त (गाउट) एवं मदात्ययजन्य शिरःशूल के निवारण के लिये सोरा १० र० एवं पोटैशियम् बाइकार्बोनेट १५ र० एक बोतल सोडावाटर के साथ पिलाने से आवेग रुक जाता है। आमवात में अर्कमूल के चूर्ण के साथ या मांड के साथ इसको दिया जाता है।

हरीतक्यादिवर्गः १६६ (७) उरस्तोय (प्लूरिसी), सद्रव हृदयावरणशोथ (पेरीकार्डीइटिस) एवं जलोदर आदि में पुनर्नवा, काली कुटकी, सोंठ आदि के क्वाथ के साथ इसका प्रयोग करते हैं। (८) ५ साल से बड़े बच्चों की खांसी में सोरा ५, हीराक्सीस ४, नौसादर ४ एवं गन्धक ४ भाग इनका चूर्ण ३ र० की मात्रा में देते हैं। (९) शिरःशूल, शोथ, आमवातज सन्धिपीडा, मोच एवं चोट आदि पर नवसादर एवं सोरा जल में घोल कर उसमें कपड़ा भिगो कर उसकी पट्टी रखी जाती है। (१०) औषध के अतिरिक्त सोरे का उपयोग बन्दूक की बारूद, तेजाब, रंगने का काम, मांस-मछली-संरक्षण, खाद, कांच के निर्माण में द्रावण के रूप में एवं आतिशबाजी आदि में किया जाता है। अधिक मात्रा से-हृदय को दुर्बलता, आमाशय एवं आंत्र में प्रक्षोभ, वृक्कशोथ एवं वस्ति- शोथ होता है। इन व्याधियों से पीड़ित व्यक्तियों में इसका उपयोग भी नहीं करना चाहिये। हानिनिवारक-कतीरा एवं मधु। मात्रा-२-१० र०

अथ टङ्कणक्षारः (सुहागाखार) तस्य नामगुणानाह सौभाग्यो टङ्कणं क्षारं धातुद्रावकमुच्यते। टङ्कणं वह्निकृद्रूक्षं कफहृद्वातपित्तकृत् ॥ २५६ ॥ सुहागा के नाम तथा गुण-सौभाग्य, टङ्कण, क्षार तथा धातुद्रावक ये नाम संस्कृत में सुहागा के हैं। सुहागा-अग्निकारक, रूक्ष, कफनाक्षक एवं वातपित्तकारक होता है ॥ २५६ ॥ ९६ सुहागा हि०-सुहागा, सोहागा, टिंकाल । बं०-सोहागा । तिब्बत-चूतरले (साधारण ), तरूलेमेटांग (अच्छा), चूसल । म०-टांकणखार । मा०-सोगो । काश्मी०-बवूत । गु०-खडियाखार,टंकणखार । क०-बिलिगार । पं०-सुहागा । ता०-वेंगा(का)रं । ते०-एलिंगारम्, वेल्लिगारं । फा०-त(ति)न्कार । अ०-बोरक । अं०-Borax (बोरेक्स ); Sodium Borate ( सोडियम् बोरेट ); Biborate of Soda (बाइबोरेट ऑफ सोडा) । ले०-Sodii Biboras ( सोडिआई बाइबोरास )। सुहागा एक प्रसिद्ध खनिज द्रव्य है। भारतवर्ष में इसकी जानकारी बहुत प्राचीन काल से रही है कि लेकिन युरोप वालों को १७ वीं शताब्दी के अन्त तक इसकी अधिक जानकारी नहीं थी। सर्वप्रथम दक्षिण भारत से युरोप में इसका प्रचार हुआ । यह स्वाभाविक एवं कृत्रिम ( रासायनिक विधि द्वारा बनाया ) दो प्रकार का होता है। चूना, गोदन्ती एवं नमक आदि पदार्थों के साथ तथा स्वतन्त्र रूप में यह प्राप्त होता है। हिमालय की पर्वतश्रेणियां, काश्मीर, लद्दाख एवं विशेष रूप से तिब्बत इसके उत्पत्ति-स्थान हैं । तिब्बत से आने वाले चौकोर स्फटिक होते हैं। इन्हें चौकिया सोहागा कहा जाता है जिसका औषधि के लिये व्यवहार करते हैं। इसी को संभवतः आयुर्वेद- प्रकाश में 'नीलकण्ठ' कहा गया है जिसमें नीली आभा रहती है। इन पर मिट्टी लगी रहती है। अंगुली से रगड़कर मिट्टी हटाने पर तेलिया स्पर्श मालूम होता है। खुली हवा में टंकण का जलीयांश निकल जाता है जिससे उसके ऊपर सफेद बुरादा जम जाता है। इसलिये इस पर घी या चर्बी लगा देते हैं। शुद्ध टङ्कण स्फटिक सदृश, वर्णरहित, पारभासक, चमकीला, गन्धहीन, स्वाद में कुछ नमकीन एवं कसैला तथा अल्पक्षारीय होता है। इससे गरम करने पर इसका जलीयांश निकल जाता है

यहाँ दोनों पृष्ठों का सम्पूर्ण पाठ दिया गया है:


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१७८ भावप्रकाशनिघण्टुः और यह फूलकर छिद्रयुक्त ढेला सा हो जाता है। यही इसकी शोधन की विधि भी है क्योंकि इस पर जो चर्बी आदि लगी रहती है वह गरम करने से जल जाती है। अशुद्ध सुहागे के सेवन से चर्बी आदि के कारण वांति और भ्रम आदि उत्पन्न होते हैं। औषध के अतिरिक्त मिट्टी के बर्तनों पर चमक लाने में, मीना बनाने में, बनावटी रत्नों के निर्माण, वार्निश रंग के काम, धातुओं के शोधन एवं द्रावण आदि के लिये इसका उपयोग किया जाता है। **रासायनिक संगठन—**यह सोडियम तथा बोरिक् एसिड के संयोग से बनता है। इसका रासायनिक सूत्र $Na_2 B_4 O_7, 10 H_2 O$ है। **गुण और प्रयोग—**टङ्कण, उष्ण, रूक्ष, कफहर, दीपन, हृद्य, आध्मानहर, विषदोषहर, आर्तव- प्रवर्तक एवं व्रणरोपक है। इसका उपयोग अम्लपित्त, आध्मान, कफज्वर, प्लीहावृद्धि, रक्तप्रदर, अनार्तव, कष्टार्तव, प्रसव के समय आविवृद्धि के लिये तथा इसके सौम्य प्रतिदूषक होने के कारण बाह्य प्रयोग के लिये किया जाता है। (१) बच्चों के कफयुक्त ज्वर, कास विशेषकर गले की खराबी से उत्पन्न होने पर, दुर्गन्धयुक्त अतिसार, अपस्मार तथा आक्षेप आदि में इसका प्रयोग किया जाता है। परिश्रुत जल में बनाया हुआ इसका १० प्रतिशत का घोल सिरा द्वारा सूचीवेध से देने पर अपस्मार में बहुत लाभकर होता है। (२) इसका मूत्र के द्वारा शीघ्र उत्सर्ग होने के कारण जल तथा यूरिया का अधिक उत्सर्ग होता है। यह मूत्र को क्षारीय करता है तथा इसी प्रतिक्रिया में मूत्र जननेन्द्रिय संस्थान के लिये अच्छा प्रतिदूषक है। इसके प्रयोग से दूषित मूत्र साफ हो जाता है। (३) सौम्य प्रतिदूषक (Antiseptic) होने के कारण इसका बाह्य प्रयोग बहुत किया जाता है। प्रक्षोभकारक न होने के कारण कोमल श्लेष्मलकला के उपसर्गों में लाभदायक है। क्षत, व्रण, खुजली, विचर्चिका, दाद, जले हुये व्रण आदि के लिये व्रणप्रक्षालन एवं मलहम के रूप में इसका उपयोग किया जाता है। श्वेतप्रदर, सोजाक, दुर्गन्धयुक्त नासास्राव एवं कर्णस्राव आदि में इसके २३% घोल को पिचकारी के द्वारा प्रयोग करते हैं। नेत्राभिष्यन्द में फिटकिरी के साथ इसके घोल से अक्षिप्रक्षालन किया जाता है। दाह एवं शोथयुक्त मुखपाक में मधु के साथ इसकी लेप किया जाता है तथा पारदविषजन्य लालास्राव तथा अन्य मुखविकारों में इसके घोल का उपयोग कुल्ला करने के लिये किया जाता है। स्वरभङ्ग में इसकी टिकिया मुख में रखकर चूसने से लाभ होता है। बोल के साथ इसका उपयोग मसूढ़ों के व्रणों पर लाभदायक है। २ छ० जल में ४ माशा सुहागा डालकर उससे प्रक्षालन से योनि एवं गुदकंडू दूर होती है। उष्ण जल में इसके घोल में मोजे तर कर उसका उपयोग करने से पैरों के पसीने की दुर्गन्ध दूर होती है। अम्भौरी आदि में इससे युक्त पाउडर का उपयोग किया जाता है। **मात्रा—**२-८ र०। **नोट—**टङ्कण एवं गन्धक के तेजाब के संयोग से बोरिक् एसिड (Boric acid) बनता है जिसके गुण-धर्म एवं प्रयोग सब टङ्कण के समान ही हैं किन्तु यह कुछ अम्ल है। अन्नसंरक्षण (Food preservation) में पहले इसका बहुत प्रयोग किया जाता था लेकिन इसके विषैले परिणाम दृष्टिगोचर होने के कारण इस कार्य में अब इसका प्रयोग नहीं किया जाता। अधिक मात्रा में इनके प्रयोग से अग्निमान्द्य, वमन, विरेचन, मांसपेशी-दुर्बलता, मूत्र में ॲल्ब्यूमिन् एवं अत्यन्त थकावट आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। अधिक दिन तक बाह्य या आभ्यन्तर


[पृष्ठ १७९]

हरीतक्यादिवर्गः १७९ प्रयोग से बालों का झड़ना, विचर्चिका, गजचर्म, त्वक्शोफ, त्वक्शोथ, मुख में प्रक्षोभ, मसूढ़ों पर एक धूसर रेखा तथा अन्य चर्मविकार आदि होते हैं। वृक्क रोगियों में विषैले परिणाम की अधिक सम्भावना रहती है।

अथ क्षारद्वयं क्षारत्रयं क्षाराष्टकं च तेषां लक्षणानि गुणांश्चाह

स्वर्जिका यावशूकश्च क्षारद्वयमुदाहृतम् । टङ्कणेन युतं तच्च क्षारत्रयमुदीरितम् ॥ २५७ ॥ मिलितं तूक्तगुणकृद्विशेषाद्गुल्महृत्परम् । पलाशवज्रिशिखरिचिञ्चाऽर्कतिलनालजाः ॥ २५८ ॥ यवजः स्वर्जिका चेति क्षाराष्टकमुदाहृतम् । क्षारा एतेऽग्निना तुल्या गुल्मशूलहरा भृशम् ॥ २५९ ॥

क्षारद्वय, क्षारत्रय, तथा क्षाराष्टक का वर्णन और गुण— **क्षारद्वय—**सज्जी तथा जवाखार को क्षारद्वय कहते हैं। **क्षारत्रय—**क्षारद्वय (सज्जी तथा जवाखार) में यदि सुहागा मिला दिया जाय तो उसे क्षारत्रय कहते हैं। इन तीनों प्रकार के क्षारों के जो गुण ऊपर पृथक् पृथक् कह आये हैं वे ही सब एकत्र मिल जाने पर भी उपर्युक्त गुणवाले होते हैं किन्तु विशेषरूप से गुल्म दूर करने में उत्तम होते हैं। पलाशक्षार, सेहुँडक्षार, चिचिड़ाक्षार, इमलीक्षार, मदारक्षार, तिलनालका क्षार, जवाखार तथा सज्जी इन सब क्षारों के योग को क्षाराष्टक कहते हैं। ये सब क्षार अग्नि के तुल्य हैं तथा गुल्म एवं शूल के नाश करने में उत्तम होते हैं ॥ २५७-२५९ ॥

९७ क्षारद्वय-क्षारत्रय-क्षाराष्टक

**क्षार बनाने की क्रिया:—**क्षार बनाने के लिये बड़े वृक्ष की छाल और गुल्म तथा क्षुप जाति की वनस्पति का पञ्चांग लेना चाहिये। इष्ट पदार्थ को जला कर उसकी सफेद भस्म (राख) संग्रहकर किसी मिट्टी के पात्र में रख उसमें चौगुना जल छोड़ भली प्रकार घोलकर एक सुरक्षित स्थान में रख दें। कुछ लोग राख को जल में डालकर कुछ देर उबालते हैं जिससे उसमें के क्षार आसानी से जल में घुल जाते हैं। दो-एक दिन के बाद ऊपर का जल नितार लें अथवा फिल्टर से छान लें। नीचे जमे हुए पदार्थ में फिर से चौगुना जल डालकर, उबालकर फिर ऊपर का जल नितार लें। फिर दोनों नितारे हुए जल को कड़ाही में छोड़ अग्नि पर चढ़ाकर जल औटावें। सूख जाने पर पात्र के पेंदे में जमा हुआ पदार्थ खुरचकर निकाल सुरक्षित रखें। उपर्युक्त विधि से जो क्षार तैयार होता है वह मृदुक्षार कहलाता है। इसमें प्रायः कुछ पदार्थों के साथ साथ सोडियम् एवं पोटैशियम् तत्वों के कार्बोनेट लवण हुआ करते हैं। यदि क्षारयुक्त जल को औटाते समय पूरी तरह न औटाकर आधा औटाने के बाद उस द्रव में चूना और शंखनाभि आदि पदार्थों की कुछ भस्म मूल राखी की चौथाई मात्रा में डालकर और थोड़ा उबालकर तथा छानकर प्राप्त द्रव को पूरी तरह औटावें तो तीक्ष्णक्षार प्राप्त होता है। इसमें थोड़ी बहुत मात्रा में प्रायः सोडियम् और पोटैशियम् तत्वों के हाइड्रोक्साइड्स रहते हैं जो अत्यन्त दाहक होते हैं। दाहजनक होने के कारण ही उन्हें तीक्ष्णक्षार (Caustic alkalies) कहा जाता है।

द्वितीयो हरीतक्यादिवर्गः समाप्तः ॥ २ ॥

१७२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ चुक्रम् ( चूक )। तन्नामगुणानाह चुक सहस्रवेधि स्वादम्लं शुक्तमित्यपि। चुक्रमत्यम्लमुष्णञ्च दीपनं पाचनं परम् ॥ २६० ॥ शूलगुल्मविबन्धामवातरलेष्महरं सरम्। वमितृष्णाऽऽस्यवैरस्यहृत्पीडावह्रिमान्द्यहृत् ॥ २६१॥ इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे मिश्रप्रकरणे द्वितीयो हरीतक्यादिवर्गः समाप्तः ॥ २ ॥

चूक के नाम तथा गुण-चुक, सहस्रवेधि, रसाम्ल तथा शुक्त ये सब चूक के संस्कृत नाम हैं। चूक-अत्यन्त खट्टा, उष्णवीर्य, अग्निदीपक तथा अत्यन्त पाचक होता है और यह शूल, गुल्म, विबन्ध, आमवात तथा कफ का नाशक और दस्तावर होता है तथा वमन, प्यास, मुख की विरसता, हृदय की पीड़ा एवम् अग्नि की मन्दता को दूर करता है ॥ २६०-२६१ ॥

९८ चूक हि०-चूक, चूका। मा०-चूका। गु०-चुका। चूक-काले रङ्ग का एक तरल पदार्थ अत्यन्त खट्टा होता है। खट्टा अनार, नीबू, इमली, आमला इत्यादि कितने ही खट्टे पदार्थों के रस से चूक बनाया जाता है। इन में अनार का बना हुआ चूक अच्छा समझा जाता है। चुक नाम से श्वेत, पारदर्शक स्फटिक भी मिलते हैं। जो खट्टे होते हैं। यूनानी वाले कहते हैं कि चूक एक पहाड़ी फल का स्वरस है जिसको पहाड़ी मनुष्य लाते हैं। आगे शाकवर्ग में भी एक चुक्रिक नामक शाक का वर्णन आया है।

अथ कर्पूरादिवर्गः अथ कर्पूरम् । तस्य नामानि गुणांश्चाह पुंसि क्लीबे च कर्पूरः सिताभ्रो हिमवालुकः। घनसारश्चन्द्रसंज्ञो हिमनामाऽपि स स्मृतः॥ कर्पूरः शीतलो वृष्यश्चक्षुष्यो लेखनो लघुः । सुरभिर्मधुरस्तिक्तः कफपित्तविषापहः ॥ २ ॥ दाहतृष्णाऽऽस्यवैरस्यमेदोदौर्गन्ध्यनाशनः । कर्पूरो द्विविधः प्रोक्तः पक्वापक्वप्रभेदतः। पक्वात्कर्पूरतः प्राहुरपक्वं गुणवत्तरम् ॥ ३ ॥

अब कर्पूरादिवर्ग आरम्भ होता है, उसमें प्रथम कर्पूर के नाम तथा गुण-कर्पूर (यह पुंल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिंग में होता है), सिताभ्र, हिमवालुक, घनसार, चन्द्रसंज्ञ (चन्द्रमा के जितने नाम हैं वे सभी इसके पर्यायवाची शब्द हैं) और हिमनामा (जितने हिम के नाम हैं वे सभी इसके पर्यायवाची शब्द हैं) ये सब कपूर के संस्कृत नाम हैं। कपूर-शीतल, वृष्य (वीर्यवर्धक), नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, लघु, सुगन्धयुक्त, मधुर तथा तिक्त रस युक्त एवम्-कफ, पित्त, विष, दाह, प्यास, मुख की विरसता, मेदरोग तथा दुर्गन्ध को नष्ट करने वाला होता है। पक्व तथा अपक्व इन भेदों से कपूर दो प्रकार का होता है। पक्व की अपेक्षा अपक्व कपूर अधिक गुणकारी होता है ऐसा वैद्य लोग कहते हैं ॥ १-३ ॥

१ कपूर हि०-कपूर, भीमसेनी कपूर, बरास कपूर। बं०-कर्पूर। मा०-कापूर। म०-कापूर। गु०- कपूर। ते०, ता०-कर्पूरम्। फा०-कापूर। अ०-काफूर। यू०-रियाही काफूर। अं०-Camphor (कॅम्फर); Borneo Camphor (बोर्निओ कॅम्फर)। ले०-Camphora (कॅम्फोरा)। कपूर-यह एक उड़नशील जमा हुआ श्वेत तैलीय पदार्थ है। यह ४ प्रकार का होता है। (१) भीमसेनी या बरास कपूर, (२) चीनी या जापानी कपूर, (३) पत्री या नागी कपूर, ब्ल्यूमिया कॅम्फर (Blumea Camphor), (४) रासायनिक विधि द्वारा निर्मित कृत्रिम (Synthetic-सिंथेटिक्) कपूर ।

(१) भीमसेनी कपूर-इसके बहुत बड़े वृक्ष बोर्निओ तथा सुमात्रा में होते हैं। इसे ले०- Dryobalanops camphora Colebr.; Fam. Dipterocarpaceae (ड्रायोबॅलेनॉप्स कॅम्फोरा कोले- डिप्टेरोकार्पेसी) कहते हैं जो भारतीय साल से मिलता-जुलता है। इसके वृक्ष भारतवर्ष में नहीं पाये जाते। इधर कुछ वृक्षों को लगाने का प्रयत्न किया गया है। औषध में बहुत प्राचीन काल से कपूर नाम से इसका व्यवहार किया जाता है। प्राचीनों ने कर्पूर का अपक्व भेद जो कहा है वह सम्भवतः यही है क्योंकि यह, वृक्ष में जहां पोल हो अथवा चीरे पड़े हों, वहां जमा हुआ ही प्राप्त होता है। इसको चीनी कपूर की तरह पकाकर बनाना नहीं पड़ता। इस वृक्ष से एक तरल द्रव्य भी प्राप्त होता है जिसे कर्पूर तैल (Camphor oil of Borneo) कहा जाता है। यह कपूर चीनी कपूर की अपेक्षा भारी होने के कारण जल में डूब जाता है। यह हवा की उष्णता से उड़ता नहीं। इसे बोतलों में रखने पर इसके कण बोतल पर जमा नहीं होते। यह

१७४ भावप्रकाशनिघण्टुः चीनी कपूर की अपेक्षा अधिक उष्णता से जलता है। इसमें कपूर के अतिरिक्त कुछ अम्बर आदि की मिश्रित गन्ध आती है। इसके छोटे, बड़े, गोल स्फटिक होते हैं जो सफेद, चमकीले, चिकने, कुछ कड़े, चूर्ण करने में चीनी कपूर की अपेक्षा देर में चूर्ण होने वाले एवं वायु से आर्द्रता को न सोखने वाले होते हैं। यह कपूर बहुत महंगा होता है। इसका रासायनिक संगठन C10H18O1 है। इसके गुण एवं प्रयोग आदि सब चीनी कपूर के समान ही हैं लेकिन यह त्वचा की रक्तवाहिनियों का अधिक विस्तार करता है तथा चीनी कपूर की अपेक्षा बाह्य प्रयोग में कम दाहजनक है। यह मस्तिष्क के लिये अधिक अवसादक है तथा चीनी कपूर की अपेक्षा अधिक मात्रा में दिया जा सकता है। इसके गुणधर्मों का वर्णन आगे चीनी कपूर के साथ ही दिया गया है। भीमसेनी कपूर के अभाव में निम्न विधि से बनाये हुये कपूर का व्यवहार किया जाता है। दूब, शीतल मिरच इलायची और जो हरड़ इनको समान मात्रा में पीसकर एक बटलोई में बिछा दें और उस पर कपूर के छोटे छोटे टुकड़े पानी में भिगो कर रख दें तथा कुछ घी भी डाल दें। उस बटलोई पर केले का पत्ता ढांक कर उस पर एक दूसरा पीतल का कटोरा रख दें। इस कटोरे में थोड़ा जल डाल दें। फिर बटलोई को जलयुक्त पात्र में रखकर मन्द आंच पर गरम करें। ऊपर के कटोरे का पानी गरम होने पर उसे निकाल कर ठण्डा पानी डालते रहें। जब सब कपूर उड़कर ऊपर जम जाय तब उसे निकालकर व्यवहार करें। (२) चीनी या जापानी कपूर—यह तमाल जाति के वृक्षों से बनाया जाता है। इसका विशेष वर्णन आगे किया गया है। (३) पत्री या नाणी कपूर—वस्तुतः भारतीय कपूर यही है। यद्यपि इसके क्षुप भारतवर्ष में बहुत होते हैं जिनसे बहुत कपूर निकाला जा सकता है तथापि अपने यहां इससे कपूर नहीं निकाला जाता। भारत में जितना भी कपूर आवश्यक होता है वह विदेशों से ही आता है। पत्री कपूर कुकरौंधा जाति के क्षुपों से प्राप्त होता है। इस क्षुप के कई भेद हैं जिनमें ये प्रधान हैं— Blumea balsamifera, DC., B. lacera, DC., B. densiflora, B. DC., malcolmii Hook. f. (ब्ल्यूमिया बालसमीफेरा, ब्यू. लैसेरा, ब्यू. डेन्सिफ्लोरा, ब्यू. मालकोल्माइ । यह Compositae (काम्पोजिटी) वर्ग के क्षुप हैं। यह हिमालय में नेपाल से सिक्किम तक तथा दक्षिणी पठार के पश्चिमी भाग में १७००-२५०० फीट तक पाये जाते हैं। ब्यू. डेन्सिफ्लोरा का छोटा क्षुप आसाम, खासिया पहाड़, चटगांव एवं अन्य स्थानों में पाया जाता है। ब्यू. बाल- समीफेरा के क्षुप बर्मा में इतने अधिक उत्पन्न होते हैं कि वह आधे संसार की कपूर की पूर्ति कर सकता है। ब्ल्यूमिया के अतिरिक्त तुलसी की जाति में ऑसिमम् किलिमॅण्डसुचेरिकम् (Oci- mum kilimandscharicum) तथा 'कर्पूर' (बं.) (Limnophila gratioloides R. Br. लिम्नोफाइला ग्रैटियोलाइड्रीस्) आदि अन्य अनेक वनस्पतियों में कपूर की गन्ध आती है जिनसे कपूर प्राप्त किया जा सकता है। पत्री कपूर का रासायनिक संगठन भीमसेनी कपूर से मिलता- जुलता है। (४) कृत्रिम कपूर—भारतवर्ष में यद्यपि ब्ल्यूमिया से काफी कपूर निकाला जा सकता है तथापि अब रासायनिक विधि द्वारा कृत्रिम कपूर बनाया जाने लगा है जो वृक्षों से प्राप्त कपूर से सस्ता होता है। औषध की अपेक्षा कपूर का अन्य सेल्यूलाइड आदि बनाने में बहुत उपयोग होता है। नोट - राजनिघण्डु में रस, गुण, वीर्य के अनुसार कपूर के पोतास, भीमसेन, शीतकर, शंकरावास, प्रांशु, पिंज, अब्दसार हिमधुता, बालुका, जूटिका, तुषार, हिम, शीतल एवं पक्विका (पिचका) ये १४ भेद लिखे हुये हैं। फिर शिर, मध्य और तल, इन भेदों से तीन प्रकार का कर्पूरादिवर्गः १७५ माना है। स्तम्भ के अग्रभाग में होने वाला कपूर शिरसंज्ञक, मध्य में—मध्यम और पत्तों के तले होने वाला तलसंज्ञक है। प्रकाशवान्, स्वच्छ और फूला हुआ शिर; सामान्य फूला हुआ और स्वच्छ मध्यम और तल में होने वाला चूर्णवत् कुछ पीला सा होता है। अन्य प्रकार से— स्तम्भ के गर्भ में स्थित कपूर उत्तम; स्तम्भ के बाहर होने वाला मध्यम जो निर्मल, कुछ पीलापन युक्त एवं चमकीला होता है; तथा कड़ा, सफेद, रूखा और फूला हुआ बाह्य कपूर कहलाता है। आगे खाने योग्य कपूर के ये लक्षण दिये हैं—साफ, भंगरह्या के पत्तों के समान छोटे २ टुकड़ों वाला, बहुत हलका, बिल्कुल सफेद, स्वाद में तिक्त रस वाला, शीतल, हृदय को प्रिय, घन, आह्लादकारक सुगन्ध युक्त, स्नेहहीन, कड़े परतों से युक्त तथा चमकीला कपूर राजयोग्य होता है और अन्य प्रकार के कपूर के खाने से व्रण एवं स्फोट आदि उत्पन्न होते हैं। इन्होंने 'चीनक' नाम से एक अन्य कृत्रिम भेद भी माना है। धन्वन्तरि निघण्डु में कपूर के भेद नहीं लिखे हुए हैं। कपूर का चरक में देशेमानि में उल्लेख नहीं है लेकिन सू. अ. ५ में 'घ्राणोध्यास्तेष्वेव वैशद्यरुचिसौगन्ध्यमिच्छता।'•••••'तथा कर्पूर- निर्यास'•••••••••' ऐसा उल्लेख है। सुश्रुत सू. अ. ४५ में तिक्त, सुगन्धि, शीतल, लघु, लेखन आदि इसके गुण लिखे हैं एवं तृष्णा, मुखशोष तथा अरुचि आदि में उपयोगी लिखा है। अष्टांगसंग्रह (वृद्धवाग्भट) में लिखा है—'रुचिवैशद्यसौगन्ध्यमिच्छन् वस्त्रेण धारयेत् । जातीलवंग कर्पूर—'। चक्रदत्त, वृन्द आदि ने कास, श्वास, प्रमेह एवं ग्रहणी की चिकित्सा में कपूर का उपयोग नहीं लिखा है लेकिन रसचिकित्सा वालों ने इसका प्रयोग उपर्युक्त रोगों में किया है। अथ चीनाककर्पूरः [ चिनिया ] । तस्य नामानि गुणांश्चाह चीनाकसंज्ञः कर्पूरः कफघ्नस्करः स्मृतः । कुष्ठकण्डूवमिहरस्तथा तिक्तरसश्च सः ॥ ४ ॥ चीनिया कपूर के गुण—चीनिया कपूर को संस्कृत में चीनक कपूर कहते हैं। यह—कफ को नष्ट करने वाला तथा कुष्ठ, खुजली और वमन को भी दूर करने वाला एवम् तिक्त रस से युक्त होता है ॥ ४ ॥ २ चीनिया कपूर हि०-चीनिया कपूर, चीनी कपूर, जापानी कपूर, फारमोसा कपूर । बं०-चीनेर कर्पूर । म०-चीनी कापूर । गु०-चिनाई कपूर । यू०-कैसूरी कपूर । ले०-Cinnamomum camphora Nees & Eberm. (सिर्नमोमम् कॅम्फोरा नीज, एब. ) । Fam. Lauraceae (लॉरेंसी) । इसके वृक्ष कोचीन चाइना से लेकर शंघाई तक तथा हैनाम से दक्षिणी जापान तक पाये जाते हैं। भारत में देहरादून, कुल्लुकंगड़ा, मैसूर एवं नीलगिरी पर्वत आदि स्थानों में इसके वृक्षों को लगाया गया है। दक्षिण की जलवायु इसके लिये अधिक उपयुक्त है लेकिन भारत में लगाये वृक्षों में कपूर कम निकलता है। इसका वृक्ष देखने में सुन्दर, ऊँचा तथा सदाहरित होता है। पत्ते-अण्डाकार, चिकने, चमकीले, नोक की ओर संकुचित, २ से ४ इञ्च लम्बे, एकान्तर एवं पीताभ हरित होते हैं। छाल- यह बाहर से खुरदरी और अन्दर से चिकनी होती है। फूल-छोटे-छोटे पीताभ श्वेत या रक्ताभ-

१७६ भावप्रकाशनिघण्टुः

श्वेत बौर के समान आते हैं। फल-गहरे हरे रंग के मटर के समान तथा गुच्छों में आते हैं। बीज-छोटे तथा कपूर की गन्धयुक्त होते हैं। इस वृक्ष के सभी भागों में विशेष कोशायें होती हैं जिनमें कपूर बनता है। कपूर निकालने के लिये इसकी लकड़ी को टुकड़े-टुकड़े करके भपके के द्वारा गरम करते हैं जिससे लकड़ी में का कपूर उड़कर ऊपर जम जाता है। उस कपूर को फिर से ऊर्ध्वपातन विधि द्वारा शुद्ध कर लिया जाता है। प्राचीनों ने कपूर का जो पक्व भेद कहा है वह यही है क्योंकि इसे लकड़ी को पकाकर निकालते हैं। इसके पत्तों से भी कुछ कपूर प्राप्त होता है।

यह कपूर रंगहीन, सफेद या पारदर्शक, स्फटिकों में, बेडौल डलियों में, चौकोर टिकियों में तथा चूर्णरूप में होता है। यह जल पर तैरता है तथा इसका विशिष्ट गुरुत्व ०.९९५ है। इसकी गन्ध तीक्ष्ण एवं विशिष्ट प्रकार की होती है तथा स्वाद कडुवा एवं तीता होता है। एवं बाद में ठंडक मालूम होती है। यह जलाने से तुरत जलता है तथा हवा की उष्णता से धीरे-धीरे उड़ जाता है। इसका १ भाग ७०० भाग जल में, १ भाग मद्यसार (९०%) में, ४ भाग तैल में, १/३ भाग क्लोरोफॉर्म में घुलता है तथा ईथर में यह बहुत घुलता है। अजवाइन का सत्त्व या पेपरमिंट के साथ इसको मिलाने से पतला द्रव बनता है। भीमसेनी कपूर से इसका भेद पीछे लिखा गया है।

रासायनिक संगठन—यह एक प्रकार का घन उड़नशील तैल (स्टियरॉप्टेनस-Stearoptenes) है। इसका रासायनिक सूत्र $C_{10}H_{16}O$ है। ऊर्ध्वपातन द्वारा कपूर के अतिरिक्त एक तैल भी पाया जाता है।

गुण और प्रयोग—कपूर वातहर, दीपन, कफघ्न, कासहर, ज्वरघ्न, स्वेदजनन, कामोत्तेजक (अल्पमात्रा में), कामवासना कम करने वाला (अधिक मात्रा में), स्तन्यनाशन तथा मस्तिष्क, हृदय एवं श्वसन के लिये उत्तेजक, उद्वेष्टन-निरोधी, सौम्य-प्रतिदूषक, स्थानिक त्वग्‌रागकारक (प्रारंभ में), स्वापजनन (बाद में), शोथहर तथा वेदनाहर है। अधिक मात्रा में यह दाहजनक एवं मादक विष है।

(१) यह आमाशय में पहुँच कर वहां रक्ताभिसरण क्रिया की वृद्धि करता है जिससे पाचक रसों की वृद्धि होती है तथा वायु का अनुलोमन होता है। इसके कारण अतिसार, उष्णकालीन अतिसार, वमन, विसूचिका की प्रारंभिक अवस्था, आध्मान, शूल एवं भूतोन्माद के कारण उत्पन्न वमन आदि में इससे बहुत लाभ होता है। विसूचिका के प्रारम्भ में कर्पूरासव (भै० र०) बताशे के साथ बार बार देने से लाभ होता है। कपूर, अजवाइन का सत्त्व तथा पेपरमिंट तीनों समान मात्रा में मिलाकर उस द्रव को १-२ बूंद बताशे में रख कर देने से भी उपर्युक्त विकारों में लाभ होता है। कर्पूररस (भै० र०) अतिसार, प्रवाहिका एवं संग्रहणी में दस्त कम करने के लिये दिया जाता है। बच्चों के आध्मान एवं शूल में कर्पूराम्बु का उपयोग एवं बड़ों में कर्पूरासव का उपयोग लाभदायक है।

(२) इसके सेवन से त्वचा की रक्तवाहिनियों का विस्फार होता है तथा पसीना अधिक होता है जिससे ज्वर में यह ताप को कम करता है। मसूरिका, रोमान्तिका, आन्त्रिकज्वर एवं ग्रन्थिज्वर आदि में कर्पूराम्बु का उपयोग १-२ औंस की मात्रा में किया जाता है जिससे हृदय को बल मिलता है एवं ताप भी कम हो जाता है। कर्पूराम्बु बनाने के लिये कपूर को महीन कपड़े में बांधकर जल में डुबोते हैं तथा बाद में उस जल का प्रयोग करते हैं।

(३) श्वसन, हृदय तथा रक्ताभिसरण के लिये कपूर उत्तेजक माना जाता है। स्वस्थ हृदय की अपेक्षा दुर्बल, अवसादित तथा अनियमित गति युक्त हृदय पर इसका प्रभाव अधिक होता है।


कर्पूरादिवर्गः १७७

इसका प्रभाव प्रत्यक्षतया हृदय के ऊपर तथा श्वसन के उत्तेजित होने से अप्रत्यक्षतया होता है। ज्वर, फुफ्फुसपाक एवं सन्निपात आदि में यदि हृदय की दुर्बलता से नाड़ी दुर्बल हो जाय, हृदयातिपात के लक्षण हों तो कर्पूरहिङ्गुवटिका ४-४ घंटे पर या १ भाग कपूर आठ भाग दूध में घोंट कर ३ चम्मच ४-४ घंटे पर देने से लाभ होता है। कर्पूरहिङ्गुवटिका बनाने के लिये १ भाग कपूर, १ भाग हींग तथा थोड़ा सा मधु एक साथ घोंटकर २ र० की गोली बनावें तथा आर्द्रक रस के साथ खिलावें। रोगी गोली निगलने में असमर्थ होने पर आर्द्रक रस में घोंट कर आवश्यक होने पर ३ र० कस्तूरी मिलाकर चटावें। कर्पूर का तैलीय सूचिकाभरण हृदय एवं श्वसन को उत्तेजित करने के लिये प्रयोग किया जाता है।

(४) अवसादक तथा नशीली औषधियों के दुष्परिणाम से जब श्वसन क्रिया अवसादित होती है तब कपूर के प्रयोग से उत्तेजना आकर श्वास की गति तथा उसकी गहराई बढ़ती है। कुकास, तमकश्वास एवं जीर्ण श्वसनिकाशोथ आदि कफविकारों में इसके प्रयोग से श्लेष्मलकला का रक्तप्रवाह बढ़कर कफ पतला होकर निकलने लगता है। तमकश्वास में कर्पूरहिङ्गुवटिका ४-४ घंटे पर जब तक दमे का जोर रहता है, देते हैं। प्रतिश्याय में कर्पूरासव या समान मात्रा में कपूर एवं मद्यसार को मिलाकर ५ बूंद की मात्रा में दिया जाता है एवं कपूर को सुंघाया भी जाता है।

(५) यह मस्तिष्क को उत्तेजित करता है जिससे प्रारंभ में संपूर्ण शरीर में उत्तेजना, चक्कर, विचारों में असंगति, गति में असहयोग तथा विषैली मात्रा में आक्षेप एवं बेहोशी आदि लक्षण होते हैं। किसी-किसी में हँसने-नाचने की प्रवृत्ति होती है तो किसी में तन्द्रा आती है। वातिक हृदय की धड़कन, कम्पवात, अपस्मार, योषापस्मार एवं उन्माद आदि में कपूर को थोड़े से मद्यसार के साथ घोंट कर गोली बनाकर १-२ र० की मात्रा में ३-४ वार देते हैं।

(६) अत्यधिक कामोत्तेजना, सुजाक से उत्पन्न पीडायुक्त शिश्नोत्थान एवं वीर्यपात आदि में कपूर का अधिक मात्रा में उपयोग किया जाता है। वीर्यपात में सोते समय २ र० कपूर की गोली खुरासानी अजवाइन के साथ खिलाते हैं। स्त्रियों में अत्यधिक कामवासना, जननेन्द्रिय-कण्डू, गर्भाशय पीडा एवं कष्टार्त्तव में १ से २ र० कपूर दिन में २ बार खिलाते हैं। स्त्रियों में दुग्ध कम करने के लिये इसको खिलाते हैं तथा स्तनों पर इसका लेप करते हैं।

(७) कपूर का स्थानिक एवं बाह्य प्रयोग बहुत किया जाता है। इससे स्थानिक रक्तवाहिनियों की उत्तेजना से उष्णता एवं रक्तिमा उत्पन्न होती है। प्रारम्भ में इससे सांवेदनिक वातनाडियां उत्तेजित होती हैं लेकिन बाद में अवसादित होने के कारण शीतलता का अनुभव होता है तथा पीडा दूर होती है। इसका प्रतिदूषक गुण बहुत अच्छा है। यह त्वग्‌रागकारक एवं प्रतिशोभक होने के कारण ४ गुने तेल में मिला कर जीर्ण आमवात, मोच, मरोड़, चोट, मांसपेशियों में ऐंठन होने से उत्पन्न पीडा, कटिशूल, पार्श्वशूल एवं जीर्ण कास, बच्चों की खांसी, फुफ्फुसपाक एवं फुफ्फुसावरणशोथ आदि में इसकी मालिश की जाती है। जननेन्द्रिय कण्डू एवं विचर्चिका में जसद् भस्म एवं कपूर तैल में मिलाकर लगाते हैं। दांत में गढ़ा होने के कारण दर्द होता हो तो कपूर का मद्यसार में घोल बनाकर उसका फाहा गढ़े में रखते हैं। मुखदौर्गन्धि में स्वल्प खदिरवटिका (भै० र०) अथवा कपूर, कवावचीनी एवं टंकणक्षार की गोली मुख में रखने से लाभ होता है। दन्तमंजनों में कपूर का उपयोग किया जाता है। जीर्ण व्रणों में तथा कण्डू में इसका अवचूर्णन किया जाता है।

विषैला प्रभाव—अत्यधिक मात्रा में कपूर के सेवन से आमाशयोर्ध्व भाग में पीडा, हलास, कभी-कभी वमन, चक्कर, दृष्टिमन्ध्य, प्रलाप, उन्माद, अपस्मार के समान आक्षेप, श्यावता, अंगघात, शीतलप्रस्वेद, मूत्रकृच्छ्र, संन्यास एवं मृत्यु होती है।

१२ भा० नि०

१७८ भावप्रकाशनिघण्टुः विष चिकित्सा—वामक द्रव्यों का प्रयोग एवं शीत तथा उष्ण निरूहण बस्ति का क्रम से बारंबार प्रयोग तथा प्रतिक्षोभक, विरेचक एवं उत्तेजक औषधियों का प्रयोग करना चाहिये । कुपीलु सत्व का सूचिकाभरण आवश्यकतानुसार किया जाता है। मद्यसार एवं तैलीय पदार्थों का प्रयोग नहीं करना चाहिये क्योंकि कपूर उनमें घुल जाता है। जीर्ण विषैला प्रभाव—कुछ युवा स्त्रियों में सौन्दर्य वृद्धि के लिये कपूर खाने की आदत पड़ जाती है जिसको छुड़ाना कठिन होता है। इसके कारण साधारण मानसिक उत्तेजना, तन्द्रा, अत्यधिक दौर्बल्य एवं पाण्डुता आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं । नोट—कपूर का चूर्ण बनाने के लिये खरल में घोटते समय रेक्टिफाइड स्पिरिट से कपूर आर्द्र कर लेने से आसानी से चूर्ण बन जाता है तथा खरल में चिपकता नहीं । मात्रा—१-२ र०; आसव—५-२० बूंद; कर्पूराण्डु—१-२ औं० । अथ कस्तूरी । तस्या नामभेदगुणानाह मृगनाभिर्मृगमदः कथितस्तु सहस्रभित् । कस्तूरिका च कस्तूरी वेधमुख्या च सा स्मृता ॥ कामरूपोद्भवा कृष्णा नैपाली नीलवर्णयुक् । काश्मीरी कपिलच्छाया कस्तूरी त्रिविधा स्मृता ॥ कामरूपोद्भवा श्रेष्ठा नैपाली मध्यमा भवेत् । काश्मीरदेशसम्भूता कस्तूरी ह्यधमा मता ॥ कस्तूरिका कटुस्तिक्ता क्षारोष्णा शुक्रला गुरुः। कफवातविषच्छर्दिशीतदौर्गन्ध्यशोफहृत् ॥ कस्तूरी के नाम, भेद तथा गुण—मृगनाभि, मृगमद, सहस्रभित्, कस्तूरिका, कस्तूरी, और वेधमुख्या ये सब कस्तूरी के संस्कृत नाम हैं। वर्णभेद से कस्तूरी तीन प्रकार की होती है जैसे— १ कामरूप (कामरूदेश) में उत्पन्न होने वाली कस्तूरी कृष्णवर्ण की (काली) होती है। २ नेपाल देश में उत्पन्न होनेवाली नीले रङ्ग की होती है। ३ कश्मीर देश में उत्पन्न होने वाली कपिल वर्ण की होती है। इनमें से कामरूप देश की कस्तूरी उत्तम, नेपाल देश की मध्यम एवम् कश्मीर देश की अधम गुण वाली होती है। कस्तूरी-कटु तथा तिक्त रस युक्त, क्षार गुण विशिष्ट, उष्णवीर्य, वीर्यजनक और गुरु होती है। यह कफ, वायु, विष, वमन, शीत, दुर्गन्ध और शोथ को दूर करने वाली होती है ॥ ५-८ ॥ ३ कस्तूरी । हि०—कस्तूरी, मृगनाभि, मृगनाफा। बं०—मृगनाभि । ते०—कास्तूरी । म०—गु०—क०—ता०— कस्तूरी । फा०—मुष्क । अ०—मिस्क । अं०—Musk (मस्क) । ले०—Moschus (मोस्कस्) । हिरन की कई जातियाँ होती हैं किन्तु सब जाति के हिरनों से कस्तूरी नहीं निकलती। जिस हिरन से कस्तूरी निकलती है उसको संस्कृत में 'कस्तूरीमृग', यूनानी में 'हिरनमुस्की' और लेटिन में मोस्कस् मोस्कीफेरस (Moschus moschiferus; Fam. Cervidae) कहते हैं । यह मृग उत्तरी भारत, नेपाल, आसाम, कश्मीर, मध्य एशिया, तिब्बत, भूतान, चीन एवं रूस आदि स्थानों में ७०००-८००० फीट ऊंची पहाड़ी चोटियों पर सघन जंगलों में पाया जाता है। यह विशेष कर तिब्बत में अधिक होते हैं। यह हिरन की जाति का बहुत सुहावना और सुन्दर मृग होता है किन्तु न इसके सींग होते हैं न दुम । यह मृग करीब २० इंच ऊँचा, लौह के समान गहरे धूसर वर्ण का, अत्यन्त सर्शक स्वभाव का प्राणी होता है। इसके ऊपरी जबड़े में दो लंबे दंष्ट कर्पूरादिवर्गः १७६ होते हैं जो बाहर नीचे की ओर हुक की तरह निकले रहते हैं। इसका मुंह लंबा, पैर पतले तथा सीधे एवं बाल रूखे और लम्बे होते हैं। इसके लिंगेन्द्रिय के मणि को ढांकने वाले चमड़े के प्रवर्धन से बनी हुई एक थैली होती है जिसके सूखे हुये स्राव को 'कस्तूरी' कहते हैं। नर हिरन में ही यह पायी जाती है। यह थैली नाभि के पास, नाभि एवं शिश्नावरण के बीच में स्थित रहती है। यह अंडाकार, १३-३ इश्व लम्बी एवं १-२ इश्व चौड़ी होती है। इसके अग्रभाग में केशयुक्त एक छोटासा छिद्र होता है तथा पिछले भाग में एक सिकुड़न सी होती है जो शिश्नाग्रचर्म के मुख से मिल जाती है। इसके अन्दर के चिकने आवरण की अनियमित तहों के कारण यह कई अपूर्ण विभागों में बंटी होती है। कस्तूरी, युवावस्था के मृगों में उनके मदकाल (Rutting season) में अधिक मात्रा में होती है तथा उसी समय उसकी शक्ति एवं गन्ध अधिक रहती है। यह काल करीब १ महीने का होता है। रा० नि० में भी लिखा है कि—'बाले जरति च हरिणे क्षीणे रोगिणि च मन्दगन्धयुता । कामातुरे च तरुणे कस्तूरी बहलपरिमला भवति ॥' बालक, वृद्ध, क्षीण और रोगी हिरन की कस्तूरी मन्द गन्ध वाली होती है तथा कामातुर और तरुण हिरन की कस्तूरी अत्यन्त सुगन्धित होती है। जब उक्त हिरन की नाभि में कस्तूरी बन जाती है तब उसमें से कस्तूरी की गन्ध आती है और वह मृग किसी दूसरे पदार्थ की गन्ध समझ कर इधर-उधर घूम-घूम कर वृक्षों को सूंघा करता है जिससे बहेलिये आसानी से पहचान कर उसको मार डालते हैं और नाभि को काट लेते हैं। स्वस्थ वयस्क प्राणी में करीब २३ तो० कस्तूरी पाई जाती है। १ साल के बच्चे में कस्तूरी नहीं होती तथा २ साल के बच्चे में करीब ६-७ माशे होती है जो दुधिया रहती है। वृद्ध प्राणि में भी ७ माशे से अधिक नहीं होती। इसमें सुगन्ध ही एक मनोहर गुण है जो बहुत तीव्र स्वतन्त्र प्रकार की और शीघ्र फैलने वाली होती है। इसका स्वाद सुगन्ध युक्त कडुवा होता है। कस्तूरी के प्रकार'-मृग के शिकार के बाद इन नाभी को निकाल कर धूप एवं हवा में सुखाते हैं। फिर इन नाभी को मृग के बालों में लपेट कर चमड़े की थैलियों में बन्द किया जाता है तथा बाद में सीलबन्द डब्बों में या अन्दर से टीन का अस्तर लगे हुये लकड़ी के बक्सों में बन्द कर बाहर भेजा जाता है। व्यापार की कस्तूरी ३ प्रकार की होती है। (१) रूस की कस्तूरी—इसमें गन्ध बहुत कम होती है (२) आसाम की कस्तूरी—यह बहुत अच्छी तथा तीव्र गन्ध युक्त होती है तथा इसका रंग काला होता है। सम्भवतः प्राचीनों ने कामरूप कस्तूरी इसी को कहा है। (३) चीन की कस्तूरी-यह सबसे मंहगी होती हैं क्योंकि अन्य हीन श्रेणी की कस्तूरी में जो कभी कभी अमो- मिया आदि की अप्रिय गन्ध होती है वह इसमें बिलकुल नहीं होती। यह कस्तूरी तिब्बत से ही चीन को जाती है। एक अन्य तीक्ष्ण अप्रिय गन्ध वाली कस्तूरी कंबर्डाइन् नामक होती है जो मंगोलिया एवं मंचूरिया के उत्तरी भाग तथा पूर्वी साइबेरिया से आती है। उत्तम कस्तूरी—रक्ताभश्याम वर्ण की, गोल बड़े दानेवाली, तीक्ष्ण गन्ध वाली, स्वाद में तिक्त, हल्की एवं मुलायम कस्तूरी उत्तम होती है। इसकी गन्ध बहुत स्थायी रहती है तथा ३००० १. कपिला पिङ्गला कृष्णा कस्तूरी त्रिविधा क्रमात् । नेपालेऽपि च काश्मीरे कामरूपे च जायते ॥ साऽन्येका खरिका ततश्च तिलका ज्ञेया कुलित्थाऽपरा, पिण्डाऽन्यापि च नायिकेति च परा या पञ्चभेदाभिधा । सा शुद्धा मृगनाभितः क्रमवशद्देशा क्षितीशोचिता पञ्चख्यादिदिनत्रयेषु जनिता कस्तूरिका स्तूयते ॥ चूर्णाकृतिस्तु खरिका तिलका तिलाभा, कौलत्थबीजसदृशी च कुलित्थिका च । स्थूला ततः कियदिदं किल पिण्डिकारूया तस्याश्च किंचिदधिका यदि नायिका सा ॥ रा. नि. ।

यहाँ दोनों पृष्ठों का संपूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

१८० भावप्रकाशनिघण्टुः गुना विरल (Dilute) करने पर भी गन्ध मालूम हो जाती है। यह कहा जाता है कि शिकार के समय इसकी तीव्र गन्ध से शिकारियों के वातनाड़ी संस्थान, आंख एवं कान पर बुरा असर पड़ता है। चीनी व्यापारियों का कहना है कि मदकाल में जब मृग में कस्तूरी की गन्ध तीव्र हो जाती है तब उसके प्रक्षोभ के कारण वह अपने खुरों से उसे खुरच खुरच कर निकाल देता है। ऐसी कस्तूरी मृगों के आवास स्थानों में पड़ी हुई पाई जाती है। लेकिन ऐसी कस्तूरी बहुत कठिनाई से ही मिलती है। असली कस्तूरी की पहचान- कस्तूरी की मांग बहुत होने के कारण तथा कठिनाई से मिलने के कारण इसमें मिलावट की जाती है। असली कस्तूरी मिलना बहुत कठिन है। व्यापारी लोग सूखा हुआ रक्त, यकृत् तथा दाल, गेहूँ एवं जब के दाने आदि मिला देते हैं। केवल गन्ध से कस्तूरी की पहचान करना कठिन है क्योंकि इसके सम्पर्क में आये पदार्थ को यह सुगन्धित कर देती है। चीन तथा तिब्बती व्यापारियों के यहाँ पहचान की कुछ पद्धतियाँ प्रचलित हैं जो वैज्ञानिक न होते हुये भी कुछ हदतक उपयोगी हैं। (१) कस्तूरी के दानों को जल में डालने पर यदि दाने वैसे ही रहें तो असली और यदि वे घुल जाँय तो मिलावटी। रा० नि० में भी लिखा है 'यदप्सु न्यस्ता नैव वैवर्ण्यमीयात्कस्तूरी सा राजभोग्या प्रशस्ता' । जिस कस्तूरी को जल में डालने पर उसके वर्ण में परिवर्तन नहीं होता वह उत्तम होती है। (२) जलते लकड़ी के अंगारे पर कस्तूरी के दाने डालने पर यदि वह पिघल कर उसमें से बुद्बुदे निकलें तो असली और यदि वह एक दम कड़ी होकर कोयला बन जाय तो नकली। रा० नि० में भी लिखा है कि 'दाहं या नैति वह्नौ शिभिशिमिति चिरं चर्मगन्धा हुताशे, सा कस्तूरी प्रशस्ता वरमृगतनुजा राजते राजभोग्या। (३) असली कस्तूरी को गांड़ दें तब भी उसकी गन्ध में कोई परिवर्तन नहीं होता। (४) असली कस्तूरी मुलायम होती है तथा मिलावट होने पर वह कड़ी होती है। (५) पंजाब की तरफ एक परीक्षा प्रचलित है कि हींग में एक तागे को डालकर निकालते हैं फिर उसे नाभे में डालकर निकालते हैं। यदि हींग की गन्ध उस तागे में रहे तो कस्तूरी नकली मानते हैं। (६) कागज में रखने पर इससे कागज में पीला दाग पड़ जाता है तथा जलाने पर इसमें मूत्र की गन्ध आती है। (७) कपूर, हेलेरियन, लहसुन, हाइड्रोसाइनिक् एसिड एवं अर्गट का चूर्ण आदि के सम्पर्क में आने पर कस्तूरी की गन्ध नष्ट हो जाती है। कृत्रिम कस्तूरी (Artificial or synthetic musk)— कस्तूरी की मांग बहुत होने के कारण तथा मृग का शिकार करते, करते कहीं उनकी जाति ही नष्ट न हो जाय इस डर से कृत्रिम रूप से कस्तूरी बनाने की तरफ वैज्ञानिकों का ध्यान आकृष्ट हुआ तथा रासायनिक विधि से कृत्रिम कस्तूरी

१ या स्निग्धा धूमगन्धा वहति विनिहिता पीततां पायसोंऽत निःशेषं या निविष्टा भवति हुतवहे भस्मसादेव सद्यः । या च न्यस्ता तुलायां कलयति गुरुतां मर्दिता रूक्षतां च ज्ञेया कस्तूरिकेयं खलु कृतमतिभिः कृत्रिमा नैव सेव्या ॥ रा. नि. ।


कर्पूरादिवर्गः १८१ अब बनाई जाने लगी है। कृत्रिम कस्तूरी पीताभश्वेत रंग की तथा रवेदार होती है। इनमें बहुत तीव्र तथा स्थायी गन्ध होती है जो कस्तूरी से मिलती-जुलती होते हुये भी प्राकृतिक कस्तूरी से अलग मालूम होती है। मस्क जाइलेन् [Musk xylene, $C_6 (CH_3)_2 (C_4 H_9) (NO_2)_3$ ]—यह परिवर्तनशील दो स्थायी एवं अस्थायी रवेदार स्वरूपों में प्राप्त होती है। मस्क कीटोन् [Musk ketone, $C_6 (CH_3)_2 (C_4 H_9) (CO CH_3) (NO_2)_2$ ]— इसकी गन्ध प्राकृतिक कस्तूरी से मिलती जुलती होती है लेकिन मस्क जाइलेन के इतनी तीव्र नहीं होती। मस्क अम्ब्रेटी [Musk ambrette, $C_6 H (C_4 H_9) (CH_3) (O CH_3) (NO_2)_2$ ]—यह कृत्रिम कस्तूरी में सबसे अच्छी मानी जाती है। इनके अतिरिक्त ॲल्डिहाइड् मस्क (Aldehyde musk), साइनो मस्क (Cyano musk) एवं अॅझिमिडो मस्क (Azimido musk) आदि कृत्रिम कस्तूरी होती हैं जिनका क्वचित् प्रयोग होता है। कृत्रिम कस्तूरी विषैली नहीं होती तथा सुगन्धि के लिये अधिकतर व्यवहार में लाई जाती है लेकिन प्राकृतिक कस्तूरी की अपेक्षा यह हीन श्रेणी की होती है। अन्य प्राणियों एवं वनस्पतियों में कस्तूरी— कस्तूरी की गन्ध के समान गन्धवाले पदार्थ विभिन्न देशों में पाये जानेवाले अनेक प्रकार के प्राणियों एवं वनस्पतियों में पाये जाते हैं। 'अमेरिकन कस्तूरी' नाम से एक प्रकार के चूहे से प्राप्त द्रव्य का उपयोग सुगन्धि के लिये किया जाता है। कुछ प्राणियों के नाम आगे दिये जा रहे हैं—अॅण्टीलोप डॉरकस् (Antilope dorcas) नामक एक प्रकार का हिरन, कॅप्रा आइबेक्स् (Capra ibex) नामक बकरा जिसके रक्त में गन्ध होती है, मस्टेला फॉइना (Mustela foina) नामक नेवले के समान जानवर जिसकी विष्ठा में गन्ध होती है, ओव्हिबोस मॉस्कॅटस् (Ovibos moschatus) नामक बैल जिसके मांस को भारतवर्ष में खाया जाता है, बॉस इण्डिकस् (Bos indicus) नामक एक बैल, डार्डकोटेलिज टॉरकैटस् (Dicotyles torqatus) नामक सूअर की जाति का प्राणी, अॅनस् मॉस्कॅटा (Anas moschata) नामक बत्तख, क्रोकोदाइलस् हुलगॅरिस् (Crocodilus vulgaris) नामक मगर, वाइवेरा सिवेट्टा (Viverra civetta) नामक गन्धमार्जारी, कॅस्टर फाइबर (Castor fibre) नामक जद बिलाव तथा अनेक प्रकार के समुद्री कछुवे एवं सर्प। संसार के विभिन्न स्थानों में पाई जाने वाली अनेक वनस्पतियों में कस्तूरी की गन्ध पाई जाती है जिनमें से भारत में लताकस्तूरी के बीज, कुरई (Rosa moschata Herrm.–रोज़ा मास्केटा), कद्दू, झूफह-यबिस (Hyssopus officinalis Linn.–हाइसोपस् ऑफिसिनेलिस्), सोलोन में पाया जानेवाला बड़ा गोखरू तथा हींग की जाति का वृक्ष आदि अपने यहां पाये जाते हैं। यद्यपि उपर्युक्त अनेक जान्तव एवं वानस्पतिक द्रव्यों में कस्तूरी से मिलती जुलती गन्ध आती है तथापि व्यापार में कस्तूरी का स्रोत कस्तूरी मृग ही है। रासायनिक संगठन— कस्तूरी को बाष्प के साथ आसवन (Distill) तथा शुद्ध करने से एक गाढ़ा रंगहीन तैल प्राप्त होता है जिसमें कस्तूरी की बहुत तेज गन्ध होती है। यह तैल एक प्रकार का कीटोम (Ketone) है जिसे मस्कौन कहा जाता है। एक अन्य कीटोन भी इसमें होता है जिसके विषय में अभी अधिक ज्ञान नहीं है। इसके अतिरिक्त कस्तूरी में वसा, मोम, कोलेस्टेरिन, ओलीन, जिलेटिन एवं अलब्यूमिनियम सदृश पदार्थ, राल एवं अमोनिया आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गन्धक के तेजाव की बाष्प पर इसको सुखाने से इसको गन्ध विल्कुल चली जाती है जो फिर से हवा एवं आर्द्रता के सम्पर्क में आने से आ जाती है। कस्तूरी में ८% राख पाई जाती है जिसमें सोडियम्, पोटैशियम् एवं कैल्शियम के क्लोराइड्स रहते हैं। कस्तूरी मससार में

१८२ भावप्रकाशनिघण्टुः १०-२०% एवं जल में करीब ५०-७५% घुल जाती है। सौ डिग्री उष्णता पर सुखाने से २०-३०% इसका तौल कम हो जाता है। गुण और प्रयोग- कस्तूरी कटु, तिक्त, उष्ण, वृष्य, वक्ष्य, विषघ्न, सौमनस्यजनन, हृदय एवं मस्तिष्क के लिये बलप्रद, आक्षेपहर, उद्वेष्टननिरोधी तथा कफविकार, वातविकार, शीत, दुर्गन्ध एवं शोथ को दूर करने वाली होती है। यह सुषुम्नाशीर्ष के लिये अत्यन्त तीव्र उत्तेजक तथा निपात (Collapse) में बहुत लाभदायक मानी जाती है। इससे रक्तप्रवाह की वृद्धि होती है तथा नाड़ियों में तनाव (Ten- sion) बढ़ता है। यह मूत्रजननरेन्द्रिय एवं श्वसन केन्द्र के लिये उत्तेजक है। इससे प्रथम रक्तवह संस्थान एवं मस्तिष्क को उत्तेजना मिलती है तथा बाद में इसका मादक एवं स्वेदजनक प्रभाव दिखलाई देता है। वातप्रकृति के लोगों में यह ज्यादा प्रभावशाली होती है। इसका उत्सर्ग मूत्र, स्वेद एवं दुग्ध के द्वारा होता है। मुदालियर, डेविड एवं रेड्डी (१९२९) के प्रयोगों से यह देखा गया कि जिन लोगों में श्वेतकणापकर्ष (Leucopenia-ल्यूकोपेनिया) हुआ रहता है उनमें कस्तूरी के टिंक्चर के १०-२० बूंद १ औंस जल के साथ पिलाने से ½-१ घण्टे में श्वेत कणों की वृद्धि होतो है। स्वस्थ व्यक्ति में कम प्रभाव दिखलाई देता है। डा. कर्नल चोपरा लिखते हैं कि उपर्युक्त तथ्य गलत हैं। उनके प्रयोग में स्वस्थ एवं कालज्वर पीड़ित रोगियों में जिनमें श्वेत- कणापकर्ष हुआ रहता है, ½ र. कस्तूरी भोजन के २½ घण्टे पश्चात् खिला कर उसके २, ३ घंटे बाद उन लोगों की तथा उनके रक्त की परीक्षा की गई। सात दिन तक यह प्रयोग किया गया। उनके मत से नाडी की गति, रक्त का दबाव, तनाव, श्वेतकणों की संख्या आदि किसी में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। कुछ लोगों ने कस्तूरी खाने के बाद आमाशय में कुछ उष्णता तथा अच्छेपन का अनुभव किया जो प्रभाव किसी वातानुलोमक मिश्रण (Carminative mixture) की तरह मालूम होता था। कर्नल चोपरा के मत से कस्तूरी का हृदय, श्वसन एवं वातनाडीसंस्थान के लिये उत्तेजक एवं वृष्य प्रभाव कस्तूरी की तीव्र गंध के कारण नासिका द्वारा प्रत्यावर्त्तन क्रिया (Reflex-action- रिफ्लेक्स ॲक्शन) के कारण एवं आमाशय में कुछ प्रक्षोभ के कारण है लेकिन अपस्मार, कंपवात एवं बच्चों के आक्षेप में इसकी उपयोगिता का कोई आधार नहीं है। अपतन्त्रक आदि अन्य आक्षेपयुक्त रोगों में ह्रींग, हुलेरियन आदि तीव्र गन्धयुक्त औषधों की तरह एवं कुकास तथा शूल आदि में अन्य सुगन्धि तेलों की तरह इसका प्रभाव पड़ता है। कर्नल चोपरा का कहना है कि कस्तूरी को वृथा अधिक महत्त्व दिया गया है और उसमें कोई विशेष औषधीय गुण नहीं है। उनका कहना है कि अधिकतर कस्तूरी मिलावटी होने के कारण अत्यन्त विश्वस्त स्थानों से प्राप्त कस्तूरी का ही प्रयोग किया गया था। कस्तूरी को थोड़े से मद्यसार में घोंटकर फिर उसमें जल मिलाकर २४ घण्टे रख कर, छान कर प्रयोग किया गया। इसमें करीब ७०-७५% भाग घुल जाता है। कस्तूरी का उपयोग योषोपस्मार, हिक्का, उद्वेष्टनयुक्त तमकश्वास, हृदय एवं मस्तिष्क की दुर्बलता, हृदय की धड़कन, वातिक उन्माद, अपस्मार, संन्यास, विस्मृति, पक्षाघात, अर्दित, शून्यता, कंपवात, कुकास, शूल, बच्चों के आक्षेप आदि वातिक तथा श्लैष्मिक विकारों में एवं उत्तेजक तथा हृद्य औषध के रूप में आन्त्रिक ज्वर, फुफ्फुसपाक, श्वसनिका शोथ, प्लेग एवं मस्तिष्कावरण शोथ आदि में किया जाता है। हृदय की दुर्बलता के लिये चन्द्रोदय, बृहत् कस्तूरीभैरव का उपयोग बलामूल के साथ लाभदायक है।


कर्पूरादिवर्गः १८३ उद्वेष्टन निरोधि प्रभाव के कारण हनुस्तम्भ, जलसंत्रास, तीव्र श्वसनावरोध एवं कुकास आदि में इसका प्रयोग किया जाता है। अन्य औषधों के साथ वाजीकरण के लिये इसका बहुत उपयोग करते हैं। दक्षिण के वैद्य बच्चों के आक्षेप में अफीम के साथ कस्तूरी का प्रयोग करते हैं। मन्दज्वर, जीर्णकास, दुर्बलता, वातरक्त एवं विसूचिका आदि में यह लाभदायक है। कस्तूरी का प्रयोग मधु के साथ अथवा मृगमदासव (भै. र.) के रूप में तथा मकरध्वज के साथ किया जाता है। उष्ण प्रकृति वालों के लिये यह हानिकारक तथा शिरःशूलजनक होती है तथा इसके दुष्परिणाम को दूर करने के लिये गुलाबजल एवं वंशलोचन का प्रयोग करना चाहिये। मात्रा-१-४ र०, आसव या टिंक्चर-१०-३० बूंद।

अथ लताकस्तूरी (मुष्कबीज) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह लता कस्तूरिका तिक्ता स्वाद्वी वृष्या हिमा लघुः । चक्षुष्या छेदिती श्लेष्मतृष्णावस्यास्यरोगहृत् ॥ ९॥ लता कस्तूरी के गुण-लताकस्तूरी-तिक्त रस युक्त, सुस्वादु, वृष्य (वीर्यवर्धक), शीतवीर्य, लघु, नेत्रों के लिये हितकर, छेदक (गाढे कफादि का छेदन करने वाली), कफ, प्यास, बस्ति तथा मुखसम्बन्धी रोग को दूर करने वाली होती है ॥ ९॥

४ लता कस्तूरी हि०, बं०-लताकस्तूरी, कस्तूरी दाना, मुश्कदाना। म०-कस्तूरीमेंडा। मा०-मुश्कदाणा। गु०-लता कस्तूरी। ते०-कर्पूरीबेंडा। ता०-वेत्तिल कस्तूरी, कट्टुक कस्तूरी। पं.-बोनार कस्तूरी। अ०-हब्बुलमि(मु)ष्क। फा०-मुश्कदाना। अं०-Musk-mallow (मस्क-मॅलो)। ले०-Hibi- scus abelmoschus, Linn. (हिबिस्कस् एबेल्मोस्कस्, लिन.)। Fam. Malvaceae (माल्वेसी)। यह बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश तथा विशेषकर इस देशके गरम प्रदेशों में उत्पन्न होती है। इसको बागों में लगाते हैं और यह आपही आप जंगली भी उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-२-३ फुट तक ऊँचा, रोमश तथा जंगली भिंडी के क्षुप के आकार वाला होता है किन्तु कहीं-कहीं इससे भी ऊँचा क्षुप देखने में आता है। पत्ते-भिंडी के पत्तों के आकारवाले, गोला कार गहरे कटे किनारीदार एवं ३ से ५ भागों में विभक्त रहते हैं। फूल-भिंडी के फूलों के समान ही ३-४ इञ्च के घेरे में घंटाकार चमकीले पीले रंग के होते हैं। फली-२॥-३ इञ्च लम्बी, पहल- दार रोमश किञ्चित् नुकीली भिंडी की ही तरह होती है और बीज-भिण्डी के बीजो के समान किन्तु वृक्काकार, कुछ चिपटे तथा काले रंग के होते हैं। इन बीजों को मसलने से कस्तूरी की तरह गंध आती है। इसके पत्र, मूल तथा बीजों का औषध में व्यवहार किया जाता है। लताकस्तूरी के नाम से यह बोध होता है कि इसकी लता होती है। 'निघण्टुरत्नाकर' में लिखा है कि इसकी लता दक्षिण में पाई जाती है परन्तु लता देखने में नहीं आली, इसका क्षुप ही होता है जिसका वर्णन ऊपर किया गया है। श्रीविश्वनाथजी द्विवेदी अपनी भावप्रकाश की टीका में लताकस्तूरी का पर्याय वेदमुष्क लिखते हैं। वास्तव में वेदमुष्क लताकस्तूरी से अलग है

१८४ भावप्रकाशनिघण्टुः तथा उसका लेटिन नाम सैलिक्स कंप्रिया (Salix caprea Linn.) है। चरक-सुश्रुतादि ग्रन्थों में मुखशुद्धि के लिये एवं मुख में रुचि तथा सुगन्धि लाने के लिये मुख में धारण करने के लिये जातीफल, कङ्कुक, पूग, कंकोल, ताम्बूल, सूक्ष्मला, लवङ्ग एवं कर्पूर का उपयोग लिखा है। टीका- कारों ने कङ्कुक शब्द का अर्थ लताकस्तूरी किया है। कुछ लोगों ने कङ्कुक का अर्थ लघुकक्कोल (छोटी कबाबचीनी) किया है तथा कक्कोल का अर्थ बृहत्ककोल (बड़ी कबाबचीनी) किया है। रासायनिक संगठन—इसमें गोंद, एक रवेदार पदार्थ, सुगन्धद्रव्य, राल, अल्ब्यूमिन एवं एक उड़नशील तैल रहता है। यह तैल हरापन लिये पीला होता है तथा वायु में खुला रखने पर गाढ़ा हो जाता है। गुण और प्रयोग—इसके बीज शीतल, दीपन, वाजीकर, बल्य, वातानुलोमक, नेत्र्य, रोचक, बस्तिशोधक, तृषाशामक एवं उद्वेष्टननिरोधी हैं। इनका उपयोग कफरोग, बस्तिविकार, मुखरोग, अपतन्त्रक, दुर्बलता, स्नायुदौर्बल्य, कुपचन, अग्निमान्द्य एवं ज्वर में किया जाता है। (१) इसके फाण्ट को २ से ४ तो० की मात्रा में कफविकार, तमकश्वास एवं ज्वर में दिया जाता है। इससे श्वासमार्ग में स्निग्धता उत्पन्न होकर श्वासनलिकाओं का उद्वेष्टन दूर होता है। उत्तेजक होने के कारण इससे हृदय को भी बल प्राप्त होता है। (२) इसको मुख में रखकर चबाने से मुख स्वच्छ एवं सुगन्धित होता है तथा खाने पर रुचि बढ़ती है। स्वरभङ्ग एवं मुखशोष में इसका धूम्रपान उपयोगी है। (३) २॥ औंस बीज तथा २० औंस मद्यसार में इसका टिंक्चर बनाकर १-२ ड्रा० की मात्रा में उत्तेजक, उद्वेष्टननिरोधी एवं वातानुलोमक रूप में अपतन्त्रक, दुर्बलता तथा अन्य वातिक विकारों में दिया जाता है। (४) सूखी खुजली में दूध में पीसकर इसके उबटन का प्रयोग किया जाता है। सर्पदंश पर इसके चूर्ण को मद्यसार में भिगोकर लगाते हैं तथा आन्तरिक प्रयोग भी करते हैं। महीन चूर्ण को नेत्र में लगाने से लाभ होता है। (५) इसके मूल तथा पत्तों का लुआब निकाल कर मिश्री मिलाकर सोजाक, रतिजन्य रोग एवं बस्तिविकारों में दिया जाता है। शुक्रमेह में बीजों का चूर्ण खिलाते हैं। (६) औषधीय तैलों को सुगन्धित करने के लिये इसके बीजों का उपयोग किया जाता है। (७) कॉफी के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। अधिक मात्रा—२ ड्रा० से अधिक टिंक्चर के प्रयोग से शिरःशूल एवं चक्कर आते हैं। मात्रा—चूर्ण २-४ मा०; टिंक्चर—१-२ ड्रा०। अथ गन्धमार्जारवीर्यम् (जबादकस्तूरी)। तस्य नामानि गुणांश्चाह गन्धमार्जारवीर्यन्तु वीर्यकृत्कफवातहृत् । कण्डूकुष्ठहरं नेत्र्यं सुगन्ध्यं स्वेदगन्धनुत् ॥ १० ॥ गन्धमार्जार का वीर्य अर्थात् जबादकस्तूरी के गुण—गन्धमार्जारवीर्य—वीर्यजनक, कफवात- नाशक, खुजली तथा कुष्ठ को दूर करने वाला, नेत्रों के लिये हितकर, सुगन्धयुक्त तथा पसीने की दुर्गन्ध को दूर करनेवाला होता है ॥ १० ॥ कर्पूरादिवर्गः १८५ ५ जबाद कस्तूरी हि०-जबाद कस्तूरी, जवाद, बेट अजीर, मुश्क बिलाव कस्तूरी, गन्ध ओतु । गु०-जवादिया कस्तूरी। ता०-पुनुगु, जवादी। अ०-ज(जु)बाद, ज(जु)बाद। अं०-Civet (सिहेट)। प्राणिनाम— हि०-मुश्क बिल्ली, खतास । ने०-भ्रान । बं०-माचमोंदर, बगदास, पूडोंगंद । ता०-पुनुगु पूने । फा०-गुर्बए जवाद । अं०-Civet cat ( सिहेट कॅट ) । ले०-Viverra zibetha, Linn. (वाइ- वेरा झिबेथा, लिन.) । यह सुगन्धिपदार्थ गन्धमार्जार नामक एक प्रकार की बिल्ली के पूंछ के नीचे की थैली से प्राप्त द्रव्य है। यह प्राणी अफ्रीका, दक्षिण एशिया एवं भारतवर्ष के मालाबार प्रान्त में पाया जाता है। इसका कद बिल्ली का सा किन्तु दुम बड़ी लम्बी होती है। शरीर पर गहरे रंग के धब्बे होते हैं। गुदा और जननेन्द्रिय के बीच में पूंछ के नीचे एक बड़ी थैली होती है जो दो भागों में विभक्त रहती है। इस थैली में जो द्रव पदार्थ बनता है उसको भी सिहेट ही नाम दिया जाता है। प्राकृतिक दशा में सिहेट की गन्ध अत्यन्त तीक्ष्ण या असह्य होती है, किन्तु जब वह अन्य वस्तुओं के साथ मिलाकर तैयार की जाती है, तो उसमें कस्तूरी की सी सुगन्ध आने लगती है। इस बिल्ली को एक तंग पिंजरे में खड़ाकर देते हैं और थैली में से द्रव पदार्थ को निचोड़ लेते हैं। मलावार की तरफ कृषक लोग खेतों में बांस गाड़ देते हैं। यह मार्जार उस पर अपना शिश्न घर्षण करके वीर्य निकाल देता है जो बांस पर लग जाता है। कृषक लोग उसे संग्रह करके बेच देते हैं। कई लोग इस मार्जार को मारकर उसका अण्डकोष उल्टा करके ग्रन्थियां फेंक देते हैं और उल्टे हुवे कोष में तृण भरकर शुष्क करके बेच देते हैं। कलकत्ता में यह शुष्क कोष 'खट्टाशी' नाम से मिलता है। बंगाली वैद्य नारायण तैल आदि को सुगन्धित करने के लिये खट्टाशी उसमें छोड़कर मन्द अग्नि से पकाते हैं। गन्धमार्जारवीर्य नया होने पर पीताभ श्वेत वर्ण का, नरम और प्रायः मधु के समान गाढ़ा होता है। पुराना होने पर रंग में कुछ श्यामता आ जाती है। यह श्वेत रंग का निकृष्ट समझा जाता है। दक्षिण भारत के बंगलोर, मैसूर, मदुरा आदि शहरों में यह पुनुगु या जबादी नाम से सुगन्धि द्रव्य बेचने वालों के यहां मिलता है। इसमें छोटे बाल, तन्तु, लकड़ी तथा अमोनिया आदि मिले रहते हैं। परीक्षा—'गंजबादावद' में जवाद की परीक्षण विधि इस प्रकार लिखी है— इसे सुजली के सिरे पर लगाकर अग्नि के समीप रखने से पिघल कर तेल हो जाय तो कृत्रिम और यदि एकत्रीभूत होकर सिरे पर लगा रहे तो असली समझे। इसे अग्नि पर गरम करें या दोनों हाथों से इतना मलें कि गरमी पैदा हो जाय, उस समय सूंघने से जो चीज उसमें मिली होगी वह व्यक्त हो जायगी। रासायनिक संगठन—इसमें स्वतन्त्र अमोनिया, राल, वसा, कार्यकारी सत्त्व एवं उड़नशील तैल आदि पदार्थ पाये जाते हैं जिनके कारण इसमें सुगन्ध होती है। गुण और प्रयोग—यह उष्ण, वृष्य, नेत्र्य, सुगन्धि, उत्तेजक, सौमनस्यजनन, आविजनन, हृदय एवं ज्ञानेन्द्रियों के लिये बलकारक, उद्वेष्टननिरोधी तथा कफ, वायु, कण्डू और स्वेद की दुर्गन्ध को दूर करने वाला एवं स्थानिक पीड़नाशामक है। इसका प्रयोग अपतन्त्रक, वातनाड़ी दुर्बलता-

१८६ भावप्रकाश निघण्टुः जन्य शैथिल्य, नपुंसकता एवं सुखप्रसूति के लिये किया जाता है । सुगन्धि के काम में तथा धूपों में इसका औषध की अपेक्षा अधिक प्रयोग किया जाता है। नीचे कुछ यूनानी प्रयोगों को दिया जाता है। (१) मद्य या अन्य औषधों के साथ २ रत्ती की मात्रा में देने से मन उल्लसित होता है एवं मूर्च्छा, हृदय की धड़कन एवं उदासीनता आदि में लाभ होता है । (२) १।। माशा जवाद, थोड़ा सा केशर एवं मुर्गों का मांस रस प्रसव के समय पिलाने से सुख- पूर्वक प्रसव होता है। (३) प्रतिश्याय, शिरःशूल और अर्धावभेदक में इसको सूंघने से लाभ होता है। (४) बादाम के तेल में घिसकर कान में डालने से श्रवणशक्ति बढ़ती है। (५) शिश्न पर लेप करके संभोग करने से अधिक आनन्द होता है तथा गर्भधारणा नहीं होती। (६) इसके मर्दन से दर्द दूर होता है। व्रणशोथ पर लेप करने से वह पककर जल्दी अच्छा होता है। मात्रा-१-२ माशा । नोट-एक अन्य सुगन्धि, जान्तव द्रव्य का प्रयोग यूनानी चिकित्सा में किया जाता है, जिसे जुंदबेदस्तर कहते हैं। यह कॅस्टर फ़ाइबर (Castor fibe:) नामक उदबिलाव की जाति के एक प्राणी के जननांगकोश में संचित पदार्थ है। यह कोश २॥ इञ्च लंबे, भारी तथा खाकी श्यामवर्ण के होते हैं। इसके भीतर कालासा या पीलापन लिये हुये एक लाल रंग का राल जैसा पदार्थ होता है जिसमें कस्तूरी जैसी गंध होती है एवं इसका स्वाद कुछ तीता होता है। इसका सुगन्धि के अतिरिक्त वातकफ-विकारों में अगद के रूप में तथा तिलाओं में उपयोग करते हैं। मात्रा-२ से ४ रत्ती । अथ चन्दनम् । तस्य नामान्याह श्रीखण्डं चन्दनं न स्त्री भद्रश्रीस्तैलपर्णिकः । गन्धसारो मलयजस्तथा चन्द्रद्युतिश्च सः ॥११॥ चन्दन के नाम-श्रीखण्ड, चन्दन (यह पुंल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग में होता है), भद्रश्री, तैल- पर्णिक, गन्धसार, मलयज और चन्द्रद्युति ये सब चन्दन के संस्कृत नाम हैं ॥ ११ ॥ अथोत्तमचन्दनस्य लक्षणमाह स्वादे तिक्तं कषे पीतं छेदे रक्तं तनौ सितम् । ग्रन्थिकोटरसंयुक्तं चन्दनं श्रेष्ठमुच्यते ॥१२॥ श्रेष्ठ चन्दन के लक्षण जो चन्दन स्वाद में तिक्त रस युक्त, घिसने में पीले वर्ण का, टुकड़े करने पर लाल वर्ण का एवम् देखने में श्वेत वर्ण का हो तथा गाँठ और कोटर (खोदरा) से युक्त हो तो श्रेष्ठ कहलाता है ॥ १२ ॥ अथ चन्दनस्य गुणानाह चन्दनं शीतलं रूक्षं तिक्तमाह्लादनं लघु । श्रमशोषविषश्लेष्मतृष्णापित्तास्रदाहहृत् ॥ १३ ॥ चन्दन के गुण-चन्दन-शीतवीर्य, रूक्ष तिक्त रस युक्त, चित्त को आह्लादित करने वाला और लघु होता है तथा श्रम, शोष, विष, कफ, प्यास, पित्तविकार, रक्तदोष और दाह को दूर करने वाला होता है ॥ १३ ॥ कर्पूरादिवर्गः १८७ ६ चन्दन हि०-चंदन, सफेद चंदन । बं०-म०-चंदन । क०-श्रीगन्धमर । गु०-सुखड़ । ता०- चंदन मरं । ते०-गंधपु चेक्का । फ़ा०-संदले सफेद । अ०-संदले अब्यज । आं०-Sandal- wood (सॅन्डलबुड) । ले०-Santalum album, Linn. (सॅन्टैलम् ॲल्बम्) । Fam. Santa- laceae (सॅन्टॅलेसी) । यह मैसूर, कुर्ग, कोयम्बटूर एवं मद्रास के दक्षिणी भागों में ४००० फीट की ऊँचाई तक उत्पन्न होता है तथा इसकी उपज भी की जाती है । करीब ६००० वर्ग मील का क्षेत्र इससे व्याप्त है जिसमें से ८५% भाग मैसूर एवं कुर्ग में है। कहीं कहीं वाटिकाओं में भी रोपण करते हैं। इसका वृक्ष सदाइरित, २०-३० फीट ऊँचा एवं अर्धपराश्रयी स्वरूप का होता है क्यों कि यह दूसरे आस-पास के घास, झाड़ी, क्षुप एवं वृक्षों से कुछ अंशों में पोषक द्रव्यों का शोषण करता है। उद्भेद के कुछ महीने पश्चात् ही इसके मूल आस पास के पेड़-पौधों के मूल में घुस जाते हैं तथा उनसे खाद्य द्रव्यों का शोषण करते हैं। छोटे पौधों को बहुत सावधानी के साथ इतर पोषित् (Host) वृक्षों के साथ पुनः रोपण किया जाता है। यदि सावधानी के साथ रोपण न किया जाय और पास २ रोपण किया जाय तो स्पाइक (Spike) नामक रोग से ये बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं। इसकी छाल-कालापन युक्त भूरे रंग की, अन्तर छाल-लाल, लकड़ी-तेल युक्त दृढ़ और सार भाग-पीलापन युक्त भूरे रंग का तथा सुगन्धित होता है। पत्ते-विपरीत, २-३ इञ्च लम्बे, अंडाकार-लटुवाकार एवं उपपत्र रहित होते हैं। फूल-छोटे, निर्गन्ध, जामुनी रंग के तथा गुच्छों में आते हैं। फल-मांसल, गोल एवं कृष्णाम बैंगनी रंग के होते हैं। इसका केवल काष्ठसार ही सुगंधित होता है। कठिन, पहाड़ी तथा लाल भूमि में उत्पन्न वृक्षों में तैल अधिक होता है। उपजाऊ भूमि में तैल की मात्रा कम होती है। इसके वृक्षों को यद्यपि अन्य स्थानों में रोपित करने का प्रयत्न किया गया तथापि उसमें बहुत कम सफलता मिली। इसके वृक्ष १८-२० वर्षों में परिपक्व होते हैं तब तक इसमें काष्ठसार सतह से २ इञ्च अंदर तक विकसित हो जाता है। इस अवस्था में वृक्षों को काटते हैं। बाहर की छाल एवं बाहरी रसकाष्ठ (Sapwood-सॅपवुड) तथा डालियां जो गंधहीन होती हैं उन्हें फेंक दिया जाता है। अंदर के काष्ठसार (Heart wood-हार्टवुड) को करीब २३ फीट लंबे टुकड़ो में काटकर बंद गोदामों में सूखने के लिये रख दिया जाता है। ऐसा समझा जाता है कि इससे इसकी सुगन्ध और अच्छी हो जाती है। वृक्ष का तिहाई भाग करीब काष्ठसार होता है। काष्ठसार के टुकड़ों तथा बुरादे से आसवन (Distillation-डिस्टिलेशन) के द्वारा तैल निकालते हैं। इसकी उड़नशीलता कम होने के कारण एवं इसका काष्ठ अधिक सघन होने के कारण तैल बहुत धीरे धीरे निकलता है तथा इसमें व्यय भी अधिक होता है। इसके मूल से भी तैल निकाला जाता है जो काष्ठ की अपेक्षा अधिक मात्रा में एवं अधिक अच्छा होता है। औसतन १ टन (२८ मन) काष्ठ से १०५-११० पौण्ड तैल निकलता है। अधिकांश वृक्षों पर राज्य का अधिकार है तथा बंगलौर एवं मैसूर में इसके तैल निकालने के कारखाने हैं। राज्य को अमेरिका आदि देशों में इसके निर्यात से बहुत आमदनी होती है। अन्य देशों में कुछ ऐसे वृक्ष पाये गये हैं जिनसे भारतीय चन्दन तैल सदृश तैल प्राप्त होता है लेकिन वह उतना अच्छा नहीं होता। पूर्वी जावा से चन्दन के ही वृक्ष से निकाला हुआ मॅकेस्सर सॅन्डलबुडू ऑयल (Macassar sandalwood oil) आता है लेकिन उसमें भारतीय

१८८ भावप्रकाशनिघण्टुः तैल जैसी सुगंध नहीं होती । वेस्ट इन्डियन सैंडलवुड् ऑइल (West Indian sandalwood oil) यह चंदन के वृक्ष से नहीं निकालते वरन् फ्यूसैनस् ॲक्यूमिनेटस् (Fusanus acuminatus) से निकालते हैं तथा ईस्ट अफ्रिकन् सैंडलवुड् ऑइल (East African sandalwood oil) ऑसिरिस् टेनूइफोलिया (Osyris tenuifolia) से निकालते हैं । वेस्ट ऑस्ट्रेलियन् सैंडलवुड् ऑइल (West Australian sandalwood oil) यह फ्यूसैनस् स्पाइकैटस् (Fusanus spicatus) से निकालते हैं जो कुछ परिवर्तन करने के पश्चात् भारतीय तैल जैसा बन जाता है एवं व्यापार में भारतीय तैल की प्रतिद्वन्द्विता कर सकता है । चन्दन के भेद— प्राचीन निघण्टुकारों ने चन्दन के कई भेद लिखे हैं । ध. नि. में चन्दन (श्वेतचन्दन), रक्त चन्दन कुचन्दन, कालीयक और बर्बरीक ये पांच प्रकार के चन्दन के भेद लिखे हैं। रा. नि. में बेट्ट और सुक्कडि नामक (श्वेत) चन्दन के दो भेद एवं रक्त चन्दन, पतंग (कुचन्दन), कालीयक, बर्बरक तथा हरिचन्दन ये सब मिलाकर ७ प्रकार लिखे हैं । भावप्रकाश में चन्दन, रक्तचन्दन, कालीयक (पीतचन्दन) एवं कुचन्दन (पतंग) ये ४ भेद लिखे हैं। ध. नि. ने हरिचन्दन का स्वतन्त्र उल्लेख न करके रक्तचन्दन के पर्याय में हरिचन्दन लिखा है तथा भावप्रकाशकार ने कालीयक (पीतचन्दन) के पर्याय में हरिचन्दन को लिखा है । श्वेतचन्दन- रा. नि. ने श्वेतचन्दन के दो भेद किये हैं। आर्द्र अवस्था में वृक्ष को काटने पर प्राप्त चन्दन को बेट्ट संज्ञा दी है। अपने आप वृक्ष के सूख जाने पर काटे हुये चन्दन को सुक्कडि कहा है। कुछ लोगों का मत है कि मलय पर्वत के पास के बेट्ट नामक पर्वत से प्राप्त चन्दन 'बेट्टचन्दन' है । इसी प्रकार 'बर्बर' नामक चन्दन का जो भेद लिखा है वह भी श्वेत ही होता है तथा वह बर्बर नामक पहाड़ पर उत्पन्न होता है। ध. नि. इसे निर्गन्ध एवं रा. नि. सुगन्धि युक्त मानते हैं। श्वेतचन्दन के जो अन्य पर्याय भद्रश्री, तैलपर्ण एवं गोशीर्ष आदि दिये गये हैं वे मलय पर्वत, तिलपर्ण तथा गोशीर्ष पर्वत पर पाये जाने वाले चन्दनों के नाम हैं, ऐसा मानते हैं । चन्दन के प्रयोग के संबन्ध में लिखा है-'उक्ते चन्दनशब्दे तु गृह्यते रक्तचन्दनम् । चूर्णस्नेहासवा लेहाः साध्याः धवलचन्दनैः ॥ कषायलेपयोः प्रायो युज्यते रक्तचन्दनम् ॥' योग में सामान्य चन्दन शब्द से रक्तचन्दन का ग्रहण करना चाहिये । चूर्ण, तैल, घृतादि, आसव-अरिष्टादि एवं लेह में चन्दन से श्वेत चन्दन का ग्रहण करना चाहिये तथा कषाय स्वरस आदि एवं लेप के लिये रक्तचन्दन का ग्रहण करना चाहिये । चरक के कई गणों में चन्दन का उल्लेख एवं सुश्रुत के कई गणों में चन्दन तथा कुचन्दन का प्रयोग आया है। सालसारादि गण में कालीयक का भी उल्लेख है। डल्हण ने सालसारादिगण एवं पटोलादिगण में कुचन्दन का अर्थ रक्त चन्दन किया है। जब कुचन्दन से रक्त चन्दन एवं चन्दन से भी रक्त चन्दन लिया जावेगा तो दो अलग लिखने का क्या अभिप्राय है ? सु० सू० अ० ३८ में प्रियंग्वादिगण में कुचन्दन का अर्थ रक्त चन्दन न करके मलयादि चन्दन किया है तथा चन्दन का अर्थ रक्त चन्दन किया है। गुडूच्यादिगण में चन्दन से रक्तचन्दन लिया है। इस प्रकार 'चन्दने रक्तचन्दनम्' यह उचित नहीं मालूम पड़ता तथा चूर्णादि में श्वेत एवं कषायादि में रक्तचन्दन का प्रयोग भो ऋषि सम्मत नहीं मालूम पड़ता। जिस प्रकार का प्रयोग हो वैसा अर्थ लेना चाहिये। सुगन्धि आदि के लिये श्वेत चन्दन एवं रक्तपित्तादि में रक्त चन्दन का प्रयोग उचित है। रासायनिक संगठन - इसके काष्ठसार में २.५-६% तक एक उड़नशील तैल, राल एवं टैनिक ॲसिड आदि पदार्थ पाये जाते हैं ।


कर्पूरादिवर्गः १८६ चन्दन का तैल हलके पीले रंग का, गाढ़ा, चिपचिपा, स्वाद में कड़वा एवं किंचित् तीता तथा तीव्र विशिष्ट गन्धवाला होता है। यह २०° से. उष्णता पर ५ भाग मद्यसार (७०%) में घुल जाता है। इसका विशिष्ट गुरुत्व ०.९७३-०.९८५ होता है। इस तैल में ९०% तक अॅल्फा-सॅण्टेलॉल एवं बीटा-सॅण्टेलॉल (a-santalol and B-santalol, C15H24O) नामक दो समाजिक (Isomeric-आइसोमेरिक्) सेस्किटर्पेन् ॲल्कोहोल्स् (Sesquiterpene alcohols) पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त इस तैल में ॲल्डिहाइड्स (Aldehydes) एवं कीटोन (Ketone) द्रव्य पाये जाते हैं। इस तैल में देवदार का तैल (Cidarwood oil) १० % तक एवं रेंडी का तैल आदि अन्य तैलों की मिलावट की जाती है जिनकी पहचान इसके भौतिक परिवर्तन से की जा सकती है। गुण और प्रयोग - श्वेत चन्दन कड़वा, शीतल, रूक्ष, दाहशामक, पिपासाहर, ग्राही, हृदय- संरक्षक, विषघ्न, वर्ण्य, कण्डूघ्न, वृष्य, आह्लादकारक, रक्तप्रसादक, मूत्रल, दुर्गन्धहर एवं अंगमर्द-शामक है। इसका उपयोग ज्वर, रक्तपित्त, पैत्तिक विकार, तृषा, दाह, वमन, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, रक्तमेह, श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर, उष्णवात (सोजाक), रक्तातिसार तथा अनेक चर्मरोगों में किया जाता है। (१) पित्तज्वर, तीव्रज्वर एवं जीर्णज्वर में चंदन के प्रयोग से दाह एवं तृषा की शांति होती है तथा स्वेद उत्पन्न होकर ज्वर भी कम होता है। ज्वर के कारण हृदय पर जो विषैला परिणाम होता है वह भी इसके देने से नहीं होता। (२) नारियल के जल में चन्दन घिसकर २ तो० की मात्रा में पिलाने से प्यास कम होती है। (३) चन्दन को चावल की धोवन में घिस कर मिश्री एवं मधु मिलाकर पिलाने से रक्ता- तिसार, दाह, तृष्णा एवं प्रमेह आदि में लाभ होता है। इसी प्रकार मूत्रदाह, मूत्राघात, रक्तमेह एवं सोजाक में चन्दन को चावल की धोवन में घिस कर मिश्री मिलाकर पिलाते हैं । (४) आंवले के रस के साथ चन्दन देने से वमन बंद होता है। (५) दुर्गंध युक्त श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर एवं प्रमेह आदि में चन्दन का क्वाथ उपयोगी है। (६) ग्रीष्मऋतु में शीतल, आह्लाददायक पेय के रूप में चन्दन पानक (शरबत) का उपयोग किया जाता है। इससे आमाशयगत उष्णता कम होती है। हृदय, यकृत तथा आमाशय को बल प्राप्त होता है एवं दाह, तृष्णा शांत होती है। (७) त्वक् शोथ, विसर्प, फोड़े-फुन्सी, कण्डू, अत्यधिक स्वेद एवं घमौरी आदि में चंदन एवं कपूर, गुलाब जल में घिसकर लगाते हैं। ज्वर में शरीर में पीडा हो तब इसको लगाने से लाभ होता है। शिरःशूल में लगाने से शिरःशूल दूर होता है। चन्दन का तैल - यह उत्तम मूत्रजनन, मूत्रमार्ग के लिये प्रतिदूषक, वृक्कोत्तेजक, कफदोषहर, कृमिघ्न, कफनिःसारक एवं स्नेहन है। इससे वृक्क को कोई नुकसान नहीं होता । इसका उत्सर्ग मूत्रजननेंद्रिय संस्थान तथा फुफ्फुसों द्वारा होता है और उत्सर्ग के समय इनके स्रावों की वृद्धि होती है तथा जीवाणुनाशन भी होता है। सेवन के पश्चात् गले में खुश्की एवं प्यास तथा अधिक मात्रा में शूलवत वेदना एवं कटिप्रदेश में भारीपन मालूम होता है। इसका प्रयोग सोजाक, बस्तिशोथ, गवीनीमुखशोथ, जीर्णकास, विषम ज्वर एवं खुजली (पामा) में तथा सुगन्धि के लिये किया जाता है। (१) नये अथवा पुराने सोजाक में इसको १५-२० बूंद दिन में ३ बार देने से बहुत लाभ होता है। यदि जलन अधिक हो तो ५-१० बूँद हर घंटे पर दें। कोपाइबा (Copaiba) की तरह

१६० भावप्रकाशनिघण्टुः इससे मूत्रादि में दुर्गन्ध नहीं आती। इसे पूयस्राव बंद होने के २ हफ्ते बाद तक देना चाहिये जिससे फिर से न हो। इसमें इलायची एवं वंशलोचन के साथ या सोंठ या अजवायन के फांट के साथ भी इसका प्रयोग किया जाता है। (२) जीर्ण बस्तिशोथ (Cystitis), गवीनीमुख शोथ (Pyelitis-पाइलाइटिस्), बस्ति के राजयक्ष्मा उपसर्ग से यदि बार बार पेशाब होती हो एवं मूत्रकृच्छ्र में इसको बताशे में डालकर दूध के साथ देते हैं। यह क्षारीय मूत्र में ही प्रतिदूषक का कार्य करता है इसलिये साथ में क्षारीय औषधों का प्रयोग आवश्यक है। (३) दुर्गन्धित कफयुक्त कास में २-३ बूँद बताशे पर डालकर देते हैं। (४) खुजली (पामा-Scabies) में इसको लगाने से लाभ होता है। कर्णशूल, दंतशूल एवं शोथ आदि पर तथा अनेक चर्मरोगों में इसका स्थानिक उपयोग किया जाता है। नाक पर की फुन्सियों पर दुगुने सरसों के तेल में मिलाकर इसे लगाते हैं। चन्दन के बीज-पेसरी के रूप में गर्भपात के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण २-४ मा०, तैल ५-१५ बूँद । अथ पीतचन्दनम् । (कलम्बक इति लोके) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कालीयकं' तु कालीयं पीताभं हरिचन्दनम् ॥ १४ ॥ हरिप्रियं कालसारं तथा कालानुसार्यकम् । कालीयकं रक्तगुणं विशेषाद् व्यङ्गनाशनम्॥१५॥ पीत चन्दन अर्थात् जिसे लोक में 'कलम्बक' कहते हैं उसके नाम तथा गुण-कालीयक, कालीय, पीताभ, हरिचन्दन, हरिप्रिय, कालसार तथा कालानुसार्यक ये सात पीले चन्दन के संस्कृत नाम हैं। पीलाचन्दन-गुणों में रक्तचन्दन के समान ही होता है किन्तु विशेषता यह है कि यह विशेष रूप से व्यङ्ग (मुख की झाँई) को भी दूर करने वाला होता है ॥ १४-१५ ॥ ७ पीतचन्दन हि०-पीतचन्दन, पीला चन्दन, कलंबक । बं-कलंबा । म०-पिंवळे चन्दन । फा०-संदल अबियज । नवीन औद्भिदी विदों के अनुसार पीत चन्दन का स्वतन्त्र कोई वृक्ष नहीं पाया जाता। ध० नि० एवं भावप्रकाश में उत्तम श्वेत चन्दन के विषय में लिखा है कि 'कषे पीतम्', अर्थात् घिसने पर जो पीतवर्ण का हो वह उत्तम श्वेत चन्दन होता है। इसी प्रकार ध० नि० में 'मलयोत्थम् पीतकाष्ठम् चतुर्थं हरिचन्दनम्', लिखा है जिससे ज्ञात होता है कि पीतचन्दन मलयपर्वत पर ही होता है। श्वेत चन्दन का उत्पत्ति स्थान भी मलय पर्वत दिया हुआ है। इस प्रकार उत्पत्ति स्थान एवं घिसने पर पीतवर्ण दोनों चन्दनों के एक ही हैं केवल ऊपर से देखने में पोत चन्दन कुछ अधिक पीला तथा श्वेत चन्दन पीताभ श्वेत होता है। इसलिये यदि उत्तम पीतवर्ण के काष्ठसार को पीतचन्दन एवं कुछ श्वेत वर्ण के काष्ठसार को श्वेत चन्दन मान लिया जाय तो पीत चन्दन की संगति लग सकती है। १. कलम्बकं इति पाठा० ।

कर्पूरादिवर्गः १६१ दूसरा द्रव्य जिसके तरफ ध्यान जाता है वह है कलंबा (Calumba) । यह अफ्रीका में होनेवाली एक लता जेटिओहाइझा पामेटा (Jateorhiza palmata Miers; Fam. Menisperma- ceae) के पीतवर्ण के मूल के टुकड़े हैं जिनका आधुनिक चिकित्सा में तिक्त पौष्टिक एवं दीपन द्रव्य के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह भारत में भी लगाई हुई मिलती है एवं इसका भारतीय प्रतिनिधि है 'झाड़ की हलदी' (पृष्ठ १२२) जिसको दक्षिण में दारुहरिद्रा के स्थान पर व्यवहार करते हैं। इस भारतीय द्रव्य को सीलोन कलंबा या नकली कलंबा भी कहा जाता है। दारूहरिद्रा के पर्यायों में भी 'कालीयक' आता है। इन बातों से ऐसा आभास होता है कि संभवतः 'झाड़ की हलदी' (नकली कलंबा) या कलंबा पीतचन्दन हो । अथ रक्तचन्दनम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह रक्तचन्दनमाख्यातं रक्ताङ्गं क्षुद्रचन्दनम् । तिलपर्णं रक्तसारं तत्प्रवालफलं स्मृतम् ॥ १६ ॥ रक्तं शीतं गुरु स्वादुच्छर्दितृष्णाऽस्रपित्तहृत् । तिक्तं नेत्रहितं वृष्यं ज्वरव्रणविषापहम् ॥ १७ ॥ लाल चन्दन के नाम तथा गुण-रक्तचन्दन, रक्ताङ्ग, क्षुद्रचन्दन, तिलपर्ण, रक्तसार और प्रवालफल ये सब लाल चंदन के संस्कृत नाम हैं। लाल चन्दन-शीतवीर्य, गुरु, स्वादु तथा तिक्त रस युक्त तथा वमन, प्यास और रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। यह नेत्रों के लिये हितकर, वृष्य और ज्वर, व्रण तथा विष को दूर करने वाला होता है ॥ १६-१७ ॥ ८ लालचन्दन हि०-लाल चंदन, रक्तचंदन । बं, म०-रक्तचंदन । गु०-रतांजली । ते०-रक्तचंदनम् । ता०- शेन् चंदनम् । पं, मा०-लाल चंदन । मला०-रक्तचंदैनम् । फा०-संदले सुर्ख । अ०-संदले अहमर । अं०-Red Sanders Wood (रेड सॅण्डर्स वुड ); Red Sandal Wood (रेड सॅण्डल वुड) । ले०-Pterocarpus santalinus, Linn. f. (प्टेरोकार्पस् सॅन्टैलिनस्, लिन.) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह दक्षिण भारत में विशेष कर कुडापा, उत्तर आरकोट, कर्नूल के दक्षिण भाग एवं चिंगलपुट में १५०० फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है। यह दक्षिण भारत तथा फिली पाइन द्वीपों में नैसर्गि- क रूप में उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष-२५ फुट तक ऊँचा होता है। छाल-कालापन युक्त भूरे रङ्ग की, लकड़ी-दृढ़ तथा काष्ठसार-अत्यंत कठिन एवं कालापन युक्त लाल रंग का होता है। पत्ते-संयुक्त, प्रायः पत्रक तीन, १½ -२ इञ्च लम्बे, गोलाई युक्त अंडाकार एवं कुण्ठिताग्र होते हैं। पत्तों के अधोपृष्ठ हल्के वर्ण के एवं मृदु रोमश होते हैं। फूल-अल्प, पीताभ श्वेत एवं सवृंतकाण्डज गुच्छों में आते हैं। फलियाँ- करीब १½ इञ्च व्यासकी, टेढ़ी, आधार की तरफ कम चौड़ी एवं छोटे से डंठल से युक्त होती हैं। इसके काष्ठसार का औषध में व्यवहार किया जाता है। यह गहरे काळे से लाल रंग का, अत्यंत कठोर, वजन में भारी एवं रेशेदार होता है। यह लम्बाई में आसानी से टूट जाता है। इसके सफाई से कटे हुये अनुप्रस्थ विच्छेद में (Transverse section) में वार्षिक चक्र (Annual rings) नहीं होते किन्तु गहरे रंग की घन काष्ठतंतुओं (Wood fibres) की स्पर्श समतलीय (Tangential) पट्टियाँ (Bands) होती हैं जो कम चौड़ी, हल्के रंग की काष्ठ तंतुभित्तिक (Wood parenchyma) की करीब करीब संतत पट्टियों से एकांतरित रहती हैं। इन

१६२ भावप्रकाशनिघण्टुः पट्टियों के अन्दर के किनारों पर महावाहिनियों (Vessels) दूर-दूर पर विन्यस्त रहती हैं। इन पट्टियों को समकोण में काटती हुई अत्यंत महीन, हल्के रंग की मज्जक किरणें (Medullary rays) होती हैं जो १० गुना बड़ा करके ही देखी जा सकती हैं। इसका बुरादा बाजार में मिलता है। इससे मद्यसार का रंग गहरा लाल हो जाता है लेकिन जल में बहुत कम इसका भाग घुलता है। इसमें गन्ध नहीं होती तथा स्वाद कुछ कसैला होता है। नोट-यद्यपि इसे रक्तचंदन कहा गया है तथापि इसमें चंदन के समान सुगंध नहीं होती। रा. नि. में एक सुगंधि युक्त लालचंदन का उल्लेख 'हरिचंदन' नाम से किया है लेकिन यह भी लिखा है कि यह दिव्य होता है एवं दुर्लभ होता है। कुछ लोगों ने रक्तचंदन से पतंग का ग्रहण किया है क्योंकि वह भी रक्तचंदन से मिलता-जुलता होता है लेकिन वह इस वृक्ष से अलग वृक्ष है जिसका आगे वर्णन दिया गया है। 'निघण्डुआदर्श' में कुचंदन का ले० नाम अॅडेनेन्थेरा पॅहोनिना लिन. (Adenanthera pavonina Linn.) बं०-रक्तकंबल; बम्ब०-थोरलीगुञ्ज, वाल; हि०- बड़ी गुमची, रक्तचंदन लिखकर 'वनौषधि दर्पण' से उद्धृत उसकी टीका में लिखा है कि 'कुचंदन यह रा. नि. का पतंग है जिसका रक्तचंदन के स्थान पर प्रयोग किया जाता है।' लेकिन पतंग का वृक्ष अलग होता है जिसे सिझल्पिनिआ सप्पन कहते हैं। बड़ी गुमची को रक्तचंदन अथवा पतंग मानना उचित नहीं। इस प्रकार रक्तचंदन एवं पतंग के अलग अलग वृक्ष पाये जाते हैं। केवल रा. नि. का सुगंध युक्त लालचंदन (हरिचंदन) अभी तक नहीं प्राप्त हो सका है। संभव है वनस्पतियों का व्यापक अनुसंधान होने पर इस विषय का अंतिम निर्णय किया जा सके। रासायनिक संगठन-इसमें संन्टॅलिन् (सॅन्टॅलिक एसिड) [Santalin (santalic acid)] नामक एक रंजक द्रव्य तथा डेसुऑक्सि संन्टेलिन् नामक एक अन्य पदार्थ पाया जाता है। सॅन्टॅलिन् से मद्यसार में रक्त के समान लाल रंग, ईथर में पीला, अमोनिया एवं दाहक क्षार में नीललोहित रंग आता है। यह जल में नहीं घुलता। इसके अतिरिक्त लालचन्दन में प्टेरोकार्पिन (Ptero- carpin), होमो-प्टेरोकार्पिन (Homo-pterocarpin) एवं सॅन्टालू ये तीन रंगहीन रवेदार पदार्थ पाये जाते हैं। इसमें मद्यसार में घुलनशील पदार्थ २% से कम एवं राख २% से अधिक न होनी चाहिये। इसके मद्यसारीय घोल से इसके रंग को खनिज अम्लों (Mineral acids) के द्वारा निस्सादित (Precipitated) किया जा सकता है। गुण और प्रयोग-रक्तचन्दन शीतल, बल्प, सौम्य एवं ग्राही है। इसका बाह्य लेप शीतल, शोथघ्न एवं व्रणरोपक है। इसका प्रयोग पैत्तिक विकार, रक्तदोष, रक्ताशं, रक्तपित्त, अतिसार, संग्रहणी एवं शिरःशूल, शोथ तथा त्वचा के रोगों में किया जाता है। रंजक द्रव्य के रूप में इसका अधिक उपयोग किया जाता है। (१) शोथ, फोड़े, व्रण, अन्हौरी तथा शिरःशूल में इसको शीतल प्रलेप के रूप में जल में घिसकर लगाते हैं। पलकों की सूजन पर इसे लगाने से सूजन दूर होती है। (२) ग्राही होने के कारण अन्य औषधों के साथ इसका काथ अतिसार एवं संग्रहणी आदि में प्रयोग किया जाता है। (३) रक्ताशं में इसे दूध में पीसकर पिलाते हैं एवं जल में घिसकर लेप भी करते हैं। (४) इसके मद्यसारीय घोल से खनिज अम्लों के द्वारा इसके रंजक द्रव्य को निस्सादित कर लिया जाता है जिसका उपयोग रंजन के लिये करते हैं। कंपाउण्ड टिंक्चर आफ् लह्वेण्डर में इसी का रंग होता है। मात्रा-४२०-८२०।


कर्पूरादिवर्गः १६३ बड़ी गुमची Adenanthera pavonina Linn; Fam. Leguminosae (अँडेनेन्थेरा पॅहोनिना लिन, लेग्यूमिनोसी)-यह पूर्वी हिमालय तथा पश्चिमो पेनिन्सुला में पाया जाता है। इसके बीजों का प्रयोग फोड़े तथा सूजन आदि पर किया जाता है तथा छाल का उपयोग आमवात एवं रक्तष्ठीवन में किया जाता है। अथ पतङ्गम् (बकम्) । तस्य नामानि गुणांश्चाह पतङ्गं रक्तसारञ्च सुरङ्गं रञ्जनं तथा । पट्टराङ्कम मख्यातं पट्टरञ्च कुचन्दनम् ॥ १८ ॥ पतङ्गं मधुरं शीतं पित्तश्लेष्मव्रणास्रनुत् । हरिचन्दनवज्ज्ञेयं विशेषाद्दाहनाशनम् ॥ १९ ॥ पतङ्ग के नाम तथा गुण-पतङ्ग, रक्तसार, सुरङ्ग, रञ्जन, पट्टराङ्ग, पट्टर और कुचन्दन ये सब पतङ्ग के संस्कृत नाम हैं। पतङ्ग-मधुररस युक्त, शीतवीर्य एवम् पित्त-कफ, व्रण और रक्तदोष को दूर करने वाला होता है। यद्यपि पतङ्ग का गुण पीले चन्दन के समान ही होता है तथापि इसे विशेष करके दाहनाशक समझना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ ९ पतङ्ग हि०-पतङ्ग, बक, बकम काठ, आल। बं०-बकम काष्ठ, बोकोम । म०, गु०-पतङ्ग । ते०-बुक- पुचेट्टु। ता०-वरत्तंगि, शप्पङ्गु। मला०-चप्पनम् । फा०, अ०-बकम । अं०-Sappan Wood (सॅप्पन वुड)। ले०-Caesalpinia sappan Linn. (सिझल्पिनिया सँप्पन) । Fam. Caesalpiniaceae (सिझल्पिनिएसी) । यह पूर्व और पश्चिम प्रायद्वीप एवं मद्रास प्रान्त में अधिक पाया जाता है। बंगाल और बिहार के किसी किसी स्थान में देखने में आता है। इसका वृक्ष छोटा एवं कांटेदार होता है। लकड़ी दृढ़, सारभाग-नारङ्गी या चमकीले लाल रङ्ग का होता है। पत्ते-संयुक्त, उपपक्ष ८ से १२ जोड़े; पत्रक-१० से १८ जोड़े, ३/४ इन्च तक लंबे, आयताकार, न्यूनाधिक विनाल, गोलाश्म एवं मध्य शिरा के दोनों तरफ के भाग असमान होते हैं। फूल-किंचित पीताभ रंग के आते हैं। फलियां-चपटी, ३-४ इन्च x १ ३/४-२ इन्च बड़ी होती हैं। प्रत्येक में ३-४ बीज होते हैं। इसके काष्ठसार का उपयोग किया जाता है। यह लाल- चन्दन जैसी, फीके लाल रंग की, कड़ी एवं निर्गन्ध होती है। बाजार में सिंगापुरी, धुनसरी और सिलीनी इन तीन नामों से इसकी लकड़ी मिलती है। रासायनिक संगठन-इसमें सॅप्पन रेड (Sappan red) नामक एक लाल रंग, मैलिक एवं टॅनिक एसिड तथा उड़नशील तैल आदि पाये जाते हैं। इसमें का रंग होर्मैटोक्साइलिन (Haema- toxylin) से मिलता-जुलता होता है तथा ईथर, मद्यसार एवं जल में घुल जाता है। पतंग का कायकारी सत्व हीमॅटीन (Haematin) से मिलता-जुलता तथा ब्रॅसिलिन (Brasilin) के समान होता है। इसकी राख में एक रवेदार पदार्थ पाया जाता है जो यदि आसुत करके पोटाँश के साथ गलाया जाए तो रीसॉसिन (Resorcin) प्राप्त होता है। गुण और प्रयोग-यह ग्राही, रक्तसंग्राहक, गर्भाशय के लिये उत्तेजक एवं संकोचक, श्लेष्मघ्न एवं व्रणरोपक है। (१) फुफ्फुस, गर्भाशय एवं आन्त्र आदि स्थानों से रक्तस्राव होने पर इसका काथ पिलाने से 13 लाभ होता है। १३ भा० नि०

१६४ भावप्रकाश निघण्टुः ( २ ) पुराने व्रणों पर इसके महीन चूर्ण का अवचूर्णन करने से व्रण जल्दी अच्छे होते हैं तथा स्थानिक रक्तस्राव भी बन्द होता है। इसके काथ की पट्टी रखने से स्थानिक रक्तस्राव रुक जाता है। श्वेत प्रदर में इसके काथ की बस्ति दी जाती है। पतंग एवं बनफ़्शा के काथ से मांसांकुरों का प्रक्षालन करने से पीडा एवं दुर्गन्धि कम हो जाती है। लिचेन (Lichen) नामक त्वग्रोग में इसे पीस कर इसका लेप करते हैं। मात्रा—१-२ माशा ।

अथ सर्वेषां चन्दनानां मध्ये मलयजस्य श्रेष्ठतामाह चन्दनानि तु सर्वाणि सदृशानि रसादिभिः । गन्धेन तु विशेषोऽस्ति पूर्वंः श्रेष्ठतमो गुणैः ॥ सभी प्रकार के चन्दनों में मलयागिरी चन्दन की उत्तमता-यद्यपि रसादिकों में प्रायः सभी प्रकार के चन्दन समान ही होते हैं, उनमें विशेषता केवल गन्ध की ही रहती है। तथापि उनमें सर्वप्रथम जो मलयागिरी चंदन है, वही गुणों में सर्वश्रेष्ठ होता है ॥ २० ॥

अथागुरु कृष्णागुरु च ( अगर, काला अगर ) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह अगुरु प्रवरं लोहं राजाहं योगजं तथा । वंशिकं कृमिजं वाऽपि कृमिजग्धमनार्यकम् ॥ २१ ॥ अगुरुष्णं कटु स्वच्यं तिक्तं तीक्ष्णञ्च पित्तलम् । लघु कर्णाक्षिरोगघ्नं शीतवातकफप्रणुत् ॥२२॥ कृष्णं गुणाधिकं तत्त लोहवद्वारि मज्जति । अगुरुप्रभवः स्नेहः कृष्णागुरुसमः स्मृतः ॥ २३ ॥ अगर तथा काले अगर के नाम और गुण एवं अगर के तेल के गुण-अगुरु, प्रवर, लोह, राजाई, योगज, वंशिक, कृमिज, कृमिजग्ध और अनार्यक ये सब अगर के संस्कृत नाम हैं। अगर- उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्त रस युक्त, त्वचा के लिये हितकारी, तीक्ष्ण, पित्तजनक, लघु एवम् कान व नेत्र संबंधी रोगों को दूर करने वाला तथा शीत, वात व कफ को नष्ट करने वाला होता है। काला अगर-यह अगर की अपेक्षा अधिक गुणकारी होता है तथा पानी में डालने से लोहे की भांति डूब जाने वाला होता है। अगर का तेल-अगर से निकाला हुआ तेल गुणों में काले अगर के समान ही समझा जाता है ॥ २१-२३ ॥ १० अगर हि०-अगर, काला अगर । वं०-अगर काष्ठ, अगरु चन्दन । म०, गु०-अेगर । पं०-ऊद, ऊदफारसी । क०, ता०, ते०-कृष्णाअगरु । अ०-ऊद खाम । अं०-Eagle-wood ( ईगल वुड ) । ले०-Aquilaria agallocha Roxb. ( एक्विलेरिया ऍगोलोचा राक्स.) Fam. Thymelaea- ceae ( थाइमेलिएसी )। यह पूर्व हिमालय, आसाम, भूटान, खासिया पहाड़ एवं सिलहृट आदि प्रान्तों में पाया जाता है ।

कर्पूरादिवर्गः १६५ इसका वृक्ष-बड़ा, ६०-७० फीट ऊँचा, ५-८ फीट व्यास का धारीदार एवं सदाइरित रहता है। काष्ठ-लकड़ी मुलायम, हल्की, लचीली, श्वेत या हलकी पीताभ श्वेत, एवं इसमें कोई विशेष गंध नहीं होती । इसमें वार्षिक वृद्धि के वलय नहीं होते तथा मध्यम या छोटे आकार की ३ से ४ अरीय ( Radial ) वाहिकाओं ( Vessels ) की कतारें एवं इनके बीच तन्तुगुच्छों का फ्लोएम (Phloem) रहता है। काष्ठसार अलग नहीं दिखलाई देता । पत्ते-विपरीत, २-४ ५/८-२ इन्च बड़े, आयताकार मालाकार, या कुछ दीर्घवृत्ताकार, चिकने, तथा बहुत छोटे नाल से युक्त होते हैं । पुष्प-श्वेत रंग के गुच्छों में आते हैं। फल-१५-२ इन्ध लम्बे, अभि- अंडाकार एवं मृदु रोमावृत होते हैं। अगर-यह सुगन्धित द्रव्य पुराने वृक्षों के काष्ठ में कहीं कहीं पाया जाता है। यह एक विशेष प्रकार के फफूंद ( Fungi Imperfecti) के द्वारा निर्मित विकृतिजन्य परिणाम है। प्राचीनों ने संभवतः इसीलिये इसे 'कृमिज' कहा है। विकृत भाग कालासा तेलिया हो जाता है। जिस वृक्ष में इस प्रकार परिवर्तन हुआ रहता है उन्हें दूर से देखने से ही पता लग जाता है। जहां शाखायें विभक्त होती हैं वहां यह अधिक होता है। सिलहृट का अगर अच्छा होता है। इसमें के तैलीय अंश के अनुसार इसका रंग हलका या गहरा काला होता है। इसके कोमल काष्ठ के छिद्रों में राल जैसा पदार्थ जमा रहता है। यद्यपि अन्य निघंटुकारों ने इसके कई भेद लिखे हैं तथापि जो अगर देखने में काले रङ्ग का, वजन में भारी, चबाने पर चिपचिपाहट युक्त और पानी में डालने से डूब जाय तथा दिया- सलाई जला कर लगा देने से जलने लगे वह अगर उत्तम है। इसका स्वाद कडुवा, कसैला तथा तेलिया मालूम होता है। इसमें हलकी मधुर गन्ध होती है जो इसे जलाने पर चारों तरफ फैलती है। सिलहूट की तरफ अगर का इत्र बहुत निकाला जाता है। यह निम्न श्रेणी के मुलायम तथा पीताभ श्वेत अगर से निकालते हैं जो करीब ०.७५ से २.५% निकलता है। नोट-भारतवर्ष में प्राचीन कालने अगर का उपयोग सुगन्धि, धूप तथा शीतहर प्रलेप१ के रूप में किया जा रहा है। अगर तिक्त होते हुए भी उष्ण होता है। २ सुश्रुत इसके तैल को 'दुष्टव्रणशोधन, कृमिकफकुष्ठानिलहर एवं तिक्त, कटु, कषाय मानते हैं (सू. अ. ४५)। सुश्रुत के अनुसार जिसके व्रण में अगरु की गन्ध आती हो उस मनुष्य को मुमूर्षु समझाना चाहिये (सू. अ. २८) । वाग्भट इसे रसायन मानते हैं । धूप तथा अगरबत्ती बनाने में इसका उपयोग किया जाता है। इसकी छाल से आसाम में कागज भी बनाया करते थे । रासायनिक संगठन-इसमें ईथर में घुलने वाला एक उड़नशील तैल ( ६न ) होता है तथा मद्यसार में घुलने वाली एक राल होती है जो ईथर में नहीं घुलती । मद्यसार में ४८% घुलनशील भाग होता है। गुण और प्रयोग- अगर उष्ण, सुगन्धि, उत्तेजक, वातनाड़ी संस्थान के लिये उत्तेजक, वाजीकर, श्वास एवं कफ हर, वातानुलोमक, शीत प्रशमन, रसायन एवं त्वक् रोगों में लाभ- दायक है। (१) वातरक्त तथा आमवात में इसको देते हैं तथा सन्थिशोथ पर लेप भी करते हैं। (२) ज्वर में इसका फांट पिलाने से प्यास कम होती है एवं रोगी को स्फूर्ति मालूम पड़ती है। १. रास्नागुरुणी शीतापनयनप्रलेपनानाम् । (च. सू. अ. २५) २. अकींगुरुगुहूचीनां तिक्तानामुष्णमुच्यते । (च. सू. अ. २६)

१६६ भावप्रकाशनिघण्टुः ( ३ ) चक्कर आना, अंगघात तथा अन्य वातविकारों में इसको खिलाते हैं एवं बाह्य लेप भी करते हैं । ( ४ ) हिचकी में मधु के साथ इसके चूर्ण को खिलाया जाता है । ( ५ ) अग्निमान्द्य, अरुचि, वमन, अतिसार तथा आंव आदि में इसका चूर्ण खिलाया जाता है । ( ६ ) अगर एवं ईश्वरमूल को पीस कर शिरःशूल में एवं बच्चों की खांसी में छाती पर उसका लेप किया जाता है। इससे खुजली एवं दाह कम होने के कारण रक्त त्वचा ( Erythema ), त्वक् शोथ, विचर्चिका, गजचर्म एवं फोड़े आदि में इसको जल में घिस कर लगाते हैं । वातिक पीडा में भी इससे लाभ होता है। इससे जूं आदि में भी लाभ होता है। ( ७ ) अगर का इत्र-१-२ बूंद श्वेत पान पर लगा कर खिलाने से तमकश्वास में आराम मिलता है। वाजीकरण के लिये इसके पुराने इत्र को पान के साथ खिलाते हैं । मात्रा - चूर्ण ५-१५ र०; इत्र १-२ बूंद !

अथ देवदारु । तस्य नामानि गुणांश्चाह देवदारु स्मृतं दारुभद्रं दार्विन्द्रदारु च । मस्तदारु द्रुकिलिमं किलिमं सुरभूरुहः ॥ २४ ॥ देवदारु लघु स्निग्धं तिक्तोष्णं कटुपाकि च । विबन्धाध्मानशोथामतन्द्राहिक्काज्वरास्रजित् । प्रमेहपीनसरुजेष्मकण्डूसमीरनुत् ॥ २५ ॥ देवदारु के नाम तथा गुण-देवदारु, दारुमद्र, दारु, इन्द्रदारु, मस्तदारु, द्रुकिलिम, किलिम और सुरभूरुह ये सब देवदारु के संस्कृत नाम हैं। देवदारु-लघु, स्निग्ध, तिक्त रसयुक्त, उष्णवीर्य, विपाक में कटुरसयुक्त, एवम् विबन्ध, आध्मान, शोथ, आम, तन्द्रा, हिचकी, ज्वर, रक्तदोष, प्रमेह, पीनस, कफ, खांसी, खुजली तथा वायु को नष्ट करने वाला होता है ॥ २४-२५ ॥

११ देवदारु हि०, म०, गु०-देवदार । बं०-देवदारु । पहाड़ी-केलोन । ते०-देवदारि चेट्टु । पं०-केल्लु । ता०-देवदारु चेडि । फा०-देवदार । अं०-Himalayan cedar ( हिमालय सिडार ); Pinus deodar ( पाइनस् देवदार । ले०-Cedrus deodara ( Roxb. ) Loud. ( सेड्रस् देवदार )। Fam. Pinaceae (पिनेसी) । पश्चिमोत्तर हिमालय में कुमाऊँ से पूर्व की ओर यह पाया जाता है। जौनसार और गढवाल में ७ से ८॥ हजार फीट के बीच का भाग देवदारु वृक्षमाला का प्रधान उत्पत्ति स्थान है। इसका वृक्ष-बहुत विशाल, चिरायु, सुन्दर, १६० से १८० फीट तक ऊँचा तथा कहीं कहीं इससे अधिक ऊँचा होता है। शाखाएं-दिगन्तसम फैली हुई परन्तु शाखाम कुछ नीचे की ओर झुके हुये रहते हैं । पत्ते-त्रिकोण युक्त, सूच्याकार, १-१॥ इञ्च लम्बे, लम्बी टहनियों पर एकाकी और पेचदार क्रम से निकले हुये और छोटी टहनियों पर गुच्छों में निकले हुये रहते हैं। फल- शाखाग्रों पर, एकाकी, ४-५ इञ्च लम्बे और ३-४ इञ्च मोटे होते हैं । बीज-३/८ इञ्च तक लम्बे, त्रिकोणाकार या अर्धचन्द्राकार और पक्ष युक्त होते हैं। बीजपत्र लगभग १० होते हैं

कर्पूरादिवर्गः १६७ देवदार की सुगन्ध युक्त लकड़ी (काष्ठसार ) पीताभ बादामी रंग की तथा तैल से भरी होती है । लकड़ी को जलाकर एक तैल निकालते हैं जिसे केलोन का तेल कहा जाता है। यह तैल बहुत पतला होता है। औषध में काष्ठसार, तैल, पत्र एवं कोमल शाखाओं का व्यवहार किया जाता है। दक्षिण तथा गुजरात की तरफ देवदार नाम से सरल ( चीड़ की ) की लकड़ी बिकती है। नोट-चरक एवं सुश्रुत में इसका अनेक रोगों में उपयोग किया गया है। रासायनिक संगठन- इसमें केलोन का तैल नामक एक तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग - देवदार स्वेदजनन, मूत्रजनन, वातानुलोमक, वात-कफहर एवं त्वग्दोषहर है। इसका तैल टर्पेण्टाइन के समान गुण वाला होता है लेकिन उससे यह कुछ न्यून गुण वाला है। देवदार का प्रयोग ज्वर, जीर्ण आमवात, शिरःशूल, श्लीपद, जलोदर, कास, श्वास, अतिसार, वातिक विकार, शोथ, अश्मरी तथा व्रण में किया जाता है। इसके तैल का प्रयोग कुष्ठ, कफ, कास एवं त्वचा के रोगों में किया जाता है। ( १ ) ज्वर में इसको देने से काफी पसीना निकलता है तथा मूत्र की मात्रा भी बढ़ती है। ज्वर चाहे शोथ से हो या कफजन्य हो इसके प्रयोग से शोथ कम होता है तथा कफ की दुर्गन्ध दूर होकर कफ कम होता है। ( २ ) जलोदर में देवदार, मङ्गेजन की छाल तथा अपामार्ग प्रत्येक ३ तो० गोमूत्र में पीसकर देने से मूत्र द्वारा जल निकल जाता है तथा रोगी को स्फूर्ति मालूम पड़ती है। ( ३ ) सोजाक, फिरंग, वातरक्त एवं आमवात में देवदार्व्यादि काथ का रसायन के रूप में प्रयोग करते हैं। ( ४ ) श्लीपद में इसको सरसों के तैल के साथ खिलाते हैं तथा चित्रक के साथ गोमूत्र में पीस कर लगाते हैं । ( ५ ) वातिक हृद्रोग में देवदार एवं सोंठ को पीसकर पिलाने से हृदय की धड़कन तथा शूल आदि दूर होते हैं। ( ६ ) हिक्का तथा श्वास में इसका क्वाथ पीने से लाभ होता है। ( ७ ) शिरःशूल में इसे जल में घिस कर कपाल पर लगाते हैं। पुराने शोथ पर हल्दी एवं गुग्गुलु के साथ इसका लेप किया जाता है । ( ८ ) इसका तैल-कुष्ठ में बहुत लाभदायक माना जाता है। इसको अधिक मात्रा में देना पड़ता है। जीर्ण त्वचा के रोगों में इसको खिलाते हैं तथा बाह्य लगाते भी हैं। इससे पुराने तथा दुर्गन्ध युक्त व्रण अच्छे हो जाते हैं। कर्णशूल में इसका तैल डालने से आराम मिलता है। कफज कास में त्रिकटु एवं यवक्षार के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा--चूर्ण ३-६ माशा; तैल १०-४० बूंद !

अथ सरलः ( धूप ) । तस्य नामानि गुणांश्चाह सरलः पीतवृक्षः स्यात्तथा सुरभिदारुकः । सरलो मधुरस्तिक्तो कटुपाकरसो लघुः ॥ २६ ॥ स्निग्धोष्णः कर्णकण्ठाक्षिशिरोगदहरः स्मृतः । कफानिलस्वेददाहकासमुच्छाव्रणापहः ॥ २७ ॥

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सरल (धूप) अर्थात् चीड़के नाम तथा गुण-सरल, पीतवृक्ष और सुरभिदारुक ये सब संस्कृत नाम चीड़के हैं। चीड़-मधुर तथा तिक्तरस युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, लघु, स्निग्ध तथा उष्ण वीर्य होता है एवम् कर्ण, कण्ठ तथा नेत्र सम्बन्धी रोग, रक्षोघ्न, कफ, वायु, स्वेद (पसीना), दाह, खाँसी, मूर्च्छा तथा व्रण को दूर करने वाला होता है ॥ २६-२७॥ १२ धूप सरल । हि०-धूप सरल, चिर, चीड़, चील। बं०-सरलगाछ, तार्पीन तैलेर गाछ। म०-सरल । गु०- सरल देवदार, तेलियो देवदार । ता०-शिरसाल । नेपा०-धूप सल्सी। अ०-शजसुल बक, सनोबर हिन्दी । फा०-दरख्ते वसक । अं०-Long-leaved Pine (लाँग लीहड पाइन); Chir Pine (चीर पाइन)। ले०-Pinus longifolia Roxb. (पाइनस् लाँगिफोलिया रॉक्स.) । Fam. Pinaceae (पिनेंसी)। इसके वृक्ष हिमालय में अफगानिस्तान से लेकर काश्मीर, पञ्जाब, उत्तर प्रदेश, भूटान तथा आसाम एवं बर्मा में २०००-६००० फीट की ऊंचाई तक प्रायः समृद्धवृद्ध होकर उगे हुए पाये जाते हैं। इसकी ४, ५ जातियां भारतवर्ष में पाई जाती हैं जिनमें से पा. एक्सेल्सा वाल. (P. ex- celsa Wall. ) तथा पा. खासया रायली (P. khasya Royle ) मुख्य हैं। चीड़ के प्रकाशप्रिय विशाल वृक्ष बहुत सीधे (सरल) तथा १००-१५० फीट ऊंचे होते हैं। स्तम्भ-सीधा, गोल एवं घेरा ५-७ फीट या १२ फीट तक होता है। छाल-खुरदरी, ऊंची नीची, गद्देदार एवं १-२ इञ्च मोटी होती है। काष्ठ-स्निग्ध तथा तीक्ष्णगन्धी होता है। पत्ते-छोटी छोटी टहनियों के अन्त में ९ १२ इञ्च लम्बे, पतले, कुछ कुछ त्रिकोणयुक्त, हल्के हरे रंग के एवं तीन तीन के समूह में पाये जाते हैं। माघ से चैत्र तक फूलों के गुच्छे लगते हैं। एक वर्ष के उपरान्त में इसके फल या डोडे पकते हैं। नरमञ्जरी प्रायः ½ इञ्च लम्बी और सामूहिक शंखाकार फल (Cone) एकाकी अथवा ३-५ तक एक साथ रहते हैं जिनमें प्रत्येक ४-८ इञ्च लम्बा और ३-५ इञ्च मोटा लट्वाकार होता है। बीजवाहक पत्रों का अग्र मुड़ा हुआ, मोटा, प्रायः एक तीक्ष्ण काले नोक और पृष्ठ पर ४-५ कोणों से युक्त होता है। चैत्र वैशाख में फल फट जाते हैं जिनमें से बीज निकलते हैं तथा फल वृक्ष पर ही लगे रहते हैं। बीज ⅓ इञ्च से कुछ कम लम्बा, चिपटा, पंखयुक्त (पंख बीज से बड़ा और पतला) और ऊपर से मालाकार होता है। पा० एक्सेल्सा (चौल या कैल) नामक इसकी उपजाति ६-१० हजार फीट के बीच उत्तरप्रदेश एवं पञ्जाब में पाई जाती है। इसके पत्ते नीलहरित और ५-६ तक प्रतिगुच्छे में होते हैं। सामूहिक फल लम्बगोल होते हैं और बीजवाहक पत्रों के अग्र बहुत मोटे नहीं होते। रासायनिक संगठन-इसके बहिःकाष्ठ (Sapwood) से सहज अथवा क्षत करने से एक प्रकार का तेलिया निर्यास निकल कर जम जाता है जिसे गन्धाबिरोजा कहते हैं। पहले यह सफेद कुछ पतला और गाढ़ा होता है। इसके बाद उत्तरोत्तर अधिक गाढ़ा एवं पीला फिर गहरा पीला हो जाता है। यह चिपचिपा, मुलायम तथा उग्रगन्धयुक्त होता है। पा० एक्सेल्सा में निर्यास कम निकलता है पर अधिक अच्छा होता है। गन्धाबिरोजा को बिना जल के ऊर्ध्वनलिका यन्त्र में गरम करके एक गाढ़ा तथा लाल रंग का तैल निकालते हैं जिसे खम्नुतेल या (पं०) सतबिरोजा कहते हैं। इसमें गन्धाबिरोजा की गन्ध रहती है।


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बिरोजे का आभ्यन्तरिक प्रयोग करने के लिये निम्नलिखित विधि से शुद्ध किये हुये बिरोजे का व्यवहार करना चाहिये । समभाग दूध और जल भरे हुये पात्र पर कपड़ा बांध, उस पर गन्धा- बिरोजा डाल कर नीचे आंच देते हैं, जिससे बिरोजा कपड़े से टपक कर नीचे के पात्र में जम जाता जाता है। इसको निकाल कर सुखा कर रख लें। गन्धाबिरोजा को वाष्प के साथ ऊर्ध्व नलिका यन्त्र द्वारा गरम करने से एक रंगहीन तैल प्राप्त होता है जिसे तारपीन का तेल (Turpentine oil) कहते हैं। ५६ पौंड गन्धाबिरोजा से ८ पौंड तैल निकलता है । तैल निकालने के बाद जो अवशेष रह जाता है उसे डाक्टरी में रेजिन या कोलोफोनि (Resin, Colophony ) कहा जाता है। इसे छान कर उबलते हुये जल के साथ कड़ाई में डाल कर घोटते हैं। जिससे एक काला सा मधु के समान गाढ़ा पदार्थ तैयार होता है जिसे गन्धाबिरोजा का डामर कहते हैं। यह यूरोपीय बरगंडी पिच के समान होता है। यहां पर सरल (चीड़) वृक्ष के गुण और प्रयोग दिये जा रहे हैं। आगे 'सरलनिर्यास' के अन्तर्गत गन्धाबिरोजा तथा तारपीन के तैल आदि के गुण और प्रयोग दिये गये हैं। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धि, दुर्गन्पहर, उत्तेजक, दीपन, वातानुलोमक, स्वेदल, मूत्रल, प्रतिदूषक एवं कफहर है। इसका आन्तरिक उपयोग अन्य औषधों के साथ क्वाथ के रूप में दाह, कास, मूर्च्छा, आध्मान, अङ्गघात आदि वातिक व्याधियां, अश्मरी, कफज्वर, कृमि, श्लेष्मातिसार एवं वातज हिक्का में किया जाता है। इसका लेप व्रण, शोथ, कंठमाला, जन्तुओं के दंश, त्वचा के अनेक विकार एवं वातव्याधियों में किया जाता है । व्रण में इसकी छाल का धूआं दिया जाता है। इसकी लकड़ी को कपड़ा लपेट कर तथा घृत में डुबोकर जलाते हैं तथा जो तेल टपकता है उसे कान में डालने से कर्णशूल दूर होता है। व्रणरोपण तेलों में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा-३ माशा ।

अथ तगरं पिण्डतगरं च तयोर्नामानि गुणांश्चाह

कालानुसार्यं तगरं कुटिलं नहुषं नतम् । अपरं पिण्डतगरं दण्डहस्ती च बर्हिणम् ॥ २८ ॥ तगरद्वयमुष्णं स्यात्स्वादु स्निग्धं लघु स्मृतम् । विपाकेऽम्लंशूलाक्षिरोगदोषत्रयापहम् ॥२९॥ अब तगर तथा तगर भेद एवम् दोनों के नाम और गुण-तगर दो प्रकार का होता है उसमें प्रथम प्रकार के तगर के-कालानुसार्य, तगर, कुटिल, नहुष और नत ये सब संस्कृत नाम हैं। दूसरे प्रकार के तगर के-पिण्डतगर, दण्डहस्ती और बर्हिण ये सब संस्कृत नाम हैं। दोनों प्रकार के तगर-उष्णवीर्य, स्वादिष्ट, स्निग्ध तथा लघु होते हैं। यह विष, अपस्मार (मिरगीरोग), शूल, नेत्ररोग तथा त्रिदोष को दूर करने वाले होते हैं ॥ २८-२९ ॥ १३ तगर । हि०-तगर, सुगन्ध बाला, मुस्क़ बाला। बं०-तगर पादुका, शुमियो, असारून । म०-तगर गण्ठोडा, तगरमूल । गु०-तगर गण्ठोडा । फा०-असारून । उर्दू-रिशेवाल । पं०-दालमुश्क, मुस्केवली । अं-Indian Valerian Rhizome (इन्डियन वेलेरियन राइजोम) ।

२०० भावप्रकाशनिघण्टुः ले०-Valeriana wallichii DC. (वेलेरिआना वालिशिआइ) । Fam. Valerianaceae (वैलेरिअॅनेसी) । तगर क्या है इसके सम्बन्ध में पहले मतभेद था। कुछ लोग श्वेत पुष्पवाले एक छोटे वृक्ष टेबर्नी मोन्टॅना कोरोनेरिया (Tabernae montana coronaria R. Br.), हि०- चांदनी के मूल को तगर मानते थे। कहीं कहीं श्यामवर्ण की चंदन जैसी वजनदार लकड़ी बिकती है। बंगाल में कोई जल में उत्पन्न होने वाली घास तथा पंजाब में कोई पीले काष्ठ आदि का व्यवहार किया जाता रहा। लेकिन अब निर्विवाद रूप से यह सिद्ध हो गया है कि ऊपर लिखे हुवे वेलेरि- आना वालिशिआइ का मूलस्तम्भ (मूल) ही तगर है। बाजार में यह 'सुगन्ध बाला' के नाम से बिकता है तथा इसे वैद्य 'बालकम् या हीवेर' के स्थान पर प्रयोग करते रहे हैं। वास्तव में यह सुगन्धबाला नहीं है। बालक या हीबेर (सुगन्धबाला) का स्वतन्त्र वर्णन आगे दिया हुआ है। बाजार में 'तगर' नाम से जो द्रव्य बिकता है वह कोई निर्गन्ध काष्ठ है और किसी सुगन्धित द्रव्य के साथ रख कर गन्धयुक्त बना दिया जाता है। भारतीय तगर-पाश्चात्य चिकित्सा में व्यवहार में लाये जाने वाले विदेशी वॅलेरियन, वॅलेरि- आना ऑफिसिनॅलिस् Linn. (Valeriana officinalis Linn.) के स्थान में उत्तम प्रतिनिधि माना जाता है। यद्यपि भारतीय तगर अपने यहां पर्याप्त होता है तथापि व्यापारी तगर अधि- कतर अफगानिस्तान से निर्यात किया हुआ रहता है। भारत में विदेशी तगर (वे० ऑफिसिने- लिस्) बहुत थोड़ी मात्रा में काश्मीर के उत्तर में सोनमर्ग स्थान पर ८ से ९ हजार फीट की ऊँचाई पर पाया जाता है। इसकी अन्य उपजाति वे० हार्डविक़ाई वाल. (V. hardwickii Wall.) भी वे० वालिशिआइ के साथ पाई जाती है। बाजार में इस तगर को सुगन्धबाला एवं असारून नाम से लोग बेचते हैं। श्री डा० दलजीतसिंहजी द्वारा लिखित यूनानी द्रव्यगुण विज्ञान में असारून का ले० नाम असारूम युरोपियम लिन., परिस्टोलोकीएसी (Asarum europae- um Linn.; Fam. Aristolochiaceae) लिखा हुआ है। स्वरूपादि का वर्णन भी उसी का (अ० युरोपियम्) मालूम पड़ता है लेकिन गुण धर्म जो लिखे हैं वे तगर (वेलेरियन) से मिलते लिखे हैं। इन्होंने इसका एक प्रतिनिधि भारतीय भेद माना है जिसको 'तुग्गुर' नाम दिया है। डा० देसाई ने तगर (वेलेरिआना वालिशिआइ) एवं असारून (अ० युरोपियम्) का अलग अलग वर्णन किया है तथा दोनों के गुण धर्म भी अलग लिखे हैं। डा० देसाई ने असारून को वामक, शिरोविरेचक, स्वेदजनन, कफघ्न, संसन एवं शोधन लिखा है जो तगर से भिन्न हैं। इसके परिचय में लिखा है कि असारून की जड़ में मिरिच जैसी गन्ध तथा स्वाद कटु (तीता) होता है तथा इसके पंचाग के चूर्ण को सूंघने से छींक आती है। तगर का स्वाद कड़वा एवं गन्ध अलग प्रकार की होती है। डा० चोश्रा भी डा० देसाई के मत से सहमत हैं। डा० देसाई ने यह स्पष्ट लिखा है कि असारून के समान ही दिखलाई देने वाली लेकिन गुणों में भिन्न एक दूसरी वनस्पति है जिसको तुग्गुर कहते हैं तथा उसका लोग असारून के स्थान पर व्यवहार करते हैं। इस दृष्टि से बाजार में सुगन्धबाला के नाम से बिकने वाला द्रव्य असली तगर (वेलेरिअन) है एवं इसे असारून नाम देना या असारून के स्थान पर प्रयोग करना उचित नहीं है। असारून अलग द्रव्य है। इसी प्रकार सुगन्धबाला भी अलग द्रव्य है। बाजार में तगर नाम से बिकने वाले कृष्ण वर्ग के काष्ठ चूर्ण आदि को भी तगर नहीं मानना चाहिये । इसके क्षुप हिमालय पहाड़ के साधारण भाग में काश्मीर से भूटान तक ४ से १२ हजार फीट की ऊंचाई पर तथा खासिया के पहाड़ों पर ४ से ६ हजार फीट की ऊंचाई पर बहुत पाये जाते हैं।


कर्पूरादिवर्गः २०१ इसका क्षुप (Herb) -किंचित् रोमश एवं बहुवर्षायु होता है। मूलस्तम्भ-मोटा, अधोगामी मोटे तन्तुओसे युक्त एवं जमीन में दिगन्तसम फैला रहता है। काण्ड-१५-४५ से. मी. ऊंचे एवं प्रायः गुच्छेदार होते हैं। पत्ते-आधारीय पत्र प्रायः २॥-७॥ से. मी. व्यास में, लम्बे नाल से युक्त, लट्वाकार, आधार पर गहरे ताम्बूलाकार, तीक्ष्णाग्र तथा धारयुक्त दन्तुर या लहरदार होते हैं। काण्डपत्र संख्या में थोड़े, बहुत छोटे एवं अखंड या खंडित होते हैं। फूल-श्वेत रंग के या कुछ कुछ गुलाबी होते हैं और समशिख क्रम से शाखाओं पर पाये जाते हैं। ये प्रायः एकलिंगी होते हैं तथा पुंपुष्प एवं स्त्रीपुष्प अलग-अलग क्षुपों पर होते हैं। वृन्तपत्रक (Bracteoles)-फल के इतने लम्बे, आयताकार रेखाकार होते हैं। बाह्यकोश-पुष्पित होते समय बाह्यदल के खंड क्वचित् व्यक्त लेकिन बाद में करीब १२, रेखाकार, रोमयुक्त खण्डों में दिखलाई देते हैं। आभ्यन्तर कोश- यह कुप्पी के आकार का, पांच खण्डों से युक्त तथा फैला हुआ होता है। पुंकेशर-संख्या में ३ होते हैं। स्त्रीकेशरी-कुक्षिक्वृन्त पतला, अविभाजित तथा कुक्षि अग्र में स्थित रहती हैं। अंडा- शय-३ गहरों वाला होता है। फल-रोमश या करीब करीब रोमहीन होते हैं। इसके मूल तथा मूलस्तम्भ का व्यवहार औषध में किया जाता है। मूलस्तम्भ के अत्यन्त गांठदार, टेढ़े मेढ़े, खुरदरे, हल्के पीताभ बादामी (Dull yellowish-brown) रंग के, ४-८ से. मी लम्बे तथा ५-१० मि. मी. मोटे टुकड़े होते हैं। यह कुछ चिपटे से होते हैं। इनके उपरी पृष्ठ पर अनेक टूटे हुवे पत्तों के निशान तथा अधोपृष्ठ पर टूटे हुवे मूल के निशान रहते हैं तथा अधोपृष्ठ से कुछ मोटे मूल निकले हुवे रहते हैं। इसका भग्न-छोटा तथा कंटकित होता है। इसका स्पष्ट अनुप्रस्थ (Trausverse) विच्छेद करके देखने से गहरे रंग का बाह्यक (Cortex), मज्जक (Pith), एधा (Cambium) की स्पष्ट रेखा एवं चौड़े मज्जक किरणों (Medullary rays) से पृथक किये हुवे १२ १५ छोटे हलके रंग के दारुपूलों (Xylem bundles) का वर्तुल आदि भाग दिखलाई देते हैं। इसके मूल बहुत से, ६-७ मि. मी. लम्बे एवं १-२ मि. मी. मोटे या कभी-कभी नहीं भी रहते। इसके अन्दर का भाग हलके वर्ण का काष्ठमय एवं छाल गहरे रंग की होती है। तगर में एक विशिष्ट उग्र गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कड़वा होता है। रासायनिक संगठन-भारतीय वेलेरियन (तगर) में एक उड़नशील तैल ०.५-२.१२% पाया जाता है। वसन्त ऋतु में संग्रहीत ताजे मूल में इसकी अधिकतम मात्रा होती है। इस तैल में प्रधानतया सेस्क्वटरपैन् (Sesquiterpenes), वेलेरिक् एसिड (Valeric acid) एवं टर्पेन अल्कोहोल (Terpene alcohols) स्वतन्त्र या ऐस्टर के रूप में संयुक्त अवस्था में पाये जाते हैं। इस तैल के अतिरिक्त इसमें अराचिडिक एसिड (Arachidic acid), हेन्ट्रियाकोन्टेन (Hentria- contane) तथा स्नेहीय अम्लों के मिश्रण रहते हैं। ताजे मूल में जल में घुलनशील कार्यकारी पदार्थ अल्प मात्रा में पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग- यह वातहर, उद्वेष्टननिरोधी, रक्ताभिसरण एवं वातनाड़ी तन्तुओं के लिये उत्तेजक, चेतनाकारक, स्वापजनक, वातानुलोमक, केन्द्रीय वातनाड़ीसंस्थान के लिये अवसा- दक एवं स्थानिक वेदनास्थापक तथा व्रणरोपक है। अल्प मात्रा में देने से अन्य सुगन्धित तैलों की तरह इससे आमाशयोर्ध्वप्रदेश में उष्णता मालूम होती है, नाडी की गति बढ़ती है तथा कुछ मानसिक उत्तेजना होती है। इससे सांवेदनिक नाड़ियों के अग्र में बधिरता उत्पन्न होती है। अधिक मात्रा में इसको देने से चक्कर आने लगते हैं, हिचकी आती है, वमन होता है, एवं हृद- यावसाद होता है।

यहाँ दोनों पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:


[बायाँ पृष्ठ - पृष्ठ २०२]

२०२ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) अपतन्त्रक, अतत्वाभिनिवेश (Hypochondriasis—हाइपोकॉण्ड्रियासिस् ), अशान्ति तथा इसी प्रकार की मानसिक व्यथाओं में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। इसके साथ यशद- भस्म का उपयोग भी किया जाता है। इसका यह प्रभाव संभवतः इसके अरुचिकारक स्वाद एवं उग्र गन्ध के कारण होता है। कंपवात में भी कभी-कभी इसका उपयोग किया जाता है। (२) जीर्ण ज्वर के कारण जब हृदय तथा सम्पूर्ण शरीर में शिथिलता आई रहती है तथा त्रिदोष की तीव्रता रहती है तब इसके देने से हृदय को बल मिलता है एवं प्रलाप, अस्वस्थता आदि दूर होकर रोगी को चेतना आती है। बेहोशी एवं हृदय की धड़कन में इसका तैल २-५ बूंद की मात्रा में गोंद के साथ मिलाकर दालचीनी के फांट के साथ देते हैं। (३) यह वातानुलोमक होने के कारण आध्मान आदि में इससे लाभ होता है। (४) कुकास, तमकश्वास, जीर्णविबन्ध, पीड़ायुक्त व्रण, घाव, अस्थिभग्न एवं तीव्र आमवात में शोथयुक्त संधिशूल कम करने के लिये इसके फांट का उपयोग करते हैं। (५) वातनाड़ी संस्थान के रोगों के कारण उत्पन्न मधुमेह तथा बहुमूत्र में इसके साथ सूक्ष्म मात्रा में अफीम का प्रयोग किया जाता है। (६) विषम ज्वर में मनःशिला, यशदभस्म, तगर, भांग या अफ़ीम को पान के रस के साथ गोली बनाकर देते हैं जिससे ज्वर के कारण उत्पन्न मानसिक तथा शारीरिक थकावट कम होती है। शीत ज्वर में पारी न आकर केवल शिरःशूल या उदरशूल हो तो तगर एवं यशदभस्म को देते हैं। मात्रा—चूर्ण २-८ र० । अथ पद्मकम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पद्मकं पद्मगन्धि स्यात्तथा पद्माह्वयं स्मृतम् । पद्मकं तुवरं तिक्तं शीतलं वातलं लघु ॥ ३० ॥ वीसर्पदाहविस्फोटकुष्ठश्लेष्मास्रपित्तनुत् । गर्भसंस्थापनं रुच्यं वमिव्रणतृषाप्रणुत् ॥ ३१ ॥ पद्माख के नाम तथा गुण—पद्मक, पद्मगन्धि तथा पद्माह्वय (कमल के पर्याय वाचक समस्त शब्द) ये सब पद्माख के संस्कृत नाम हैं। पद्माख—कषाय तथा तिक्तरस युक्त, शीतवीर्य, वात- जनक तथा लघु होता है एवं विसर्प, दाह, विस्फोट, कुष्ठ, कफ और रक्तपित्त को दूर करता है। यह गर्भ का स्थापन करने वाला, रुचिकारक एवं वमन, व्रण तथा तृषा को दूर करने वाला होता है ॥ ३०-३१ ॥ १४ पद्माख हि०-पद्माक, पद्माख, पदुम काठ, फाजा । बं०-पद्म काष्ठ । म०-पद्म काष्ठ, पद्माक । गु०- पद्मकनुं लांकडुं, पद्माकष्ठ । कं०-पद्मक । पं०-चभिअरी । लिपचा०-कौंगकी । अं०-Mild Hima- laya Cherry (माइल्ड हिमालय चेरी)। ले०-Prunus puddum Roxb. ex Wall. (प्रूनस् पड्डुम्, राक्सबू ) । Fam. Rosaceae (रोजेंसी) । यह गरम हिमालय में शिमला, गढ़वाल से सिक्किम और भूटान तक एवं दक्षिण में कुडाई- कनाल और उटकमंड में पाया जाता है।

१. 'हृष्यमिति पाठो० ।


[दायाँ पृष्ठ - पृष्ठ २०३]

कर्पूरादिवर्गः २०३ इसका वृक्ष मध्यमाकार का अचिरस्थायी होता है। छाल—फीके भूरे रङ्ग की या कालापन युक्त भूरे रङ्ग की और चमकीली होती है। इससे पतली चमकीली पपड़ियां छूटती रहती हैं। काष्ठसार रक्ताभ तथा सुगन्ध युक्त होता है। पत्ते—३-५ इञ्च लम्बे, १-१।। इञ्च चौड़े, भालाकार लट्वाकार, लम्बे नोकवाले, चिकने और दोहरे दांतों वाले होते हैं। फूल—सफेद गुलाबी या लाल रङ्ग के आते हैं और पतझड़ के बाद नवीन पत्ते निकलने के पहले ही खिल जाते हैं। फल—छोटे छोटे गोलाकार या अंडाकार होते हैं और वे पीले या गुलाबी रङ्ग के दिखाई पड़ते हैं। इन फलों को लोग खाते हैं तथा इनसे एक प्रकार का मद्य बनाते हैं। बाजार में पद्माकाष्ठ के कांड के टुकड़े बिकते हैं। ये वजन में भारी तथा इनके छाल का वर्ण कृष्ण-रक्त रहता है। छाल पर आड़ी खांचे रहती हैं। इसे हाथ से रगड़ने से आह्लादकारक तथा मृदु सुगन्ध आती है। इनके भीतर का भाग रक्तपीताभ श्वेतवर्ण का होता है। पद्माकाष्ठ हमेशा नया काम में लाना चाहिये क्योंकि कालान्तर से उसका औषधधर्म नष्ट हो जाता है। पद्माख का क्वाथ बनाकर प्रयोग नहीं करना चाहिये क्योंकि इसे उबालने से इसका सत्व उड़ जाता है। इसका हमेशा गुनगुने जल में फांट बनाकर प्रयोग करना चाहिये। रासायनिक संगठन—इसकी छाल में एक अत्यन्त विषैला द्रव्य हाइड्रोसायनिक एसिड् ( Hydrocyanic acid ) तथा अॅमिग्डॅलिन् (Amygdalin ) इत्यादि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग—पद्माख शीतल, रक्तस्तम्भक, तिक्तपौष्टिक, छर्दिनिग्रहण, स्तम्भन, वेदना- स्थापक, वर्ण्य, गर्भस्थैर्यकर एवं ज्वरहर है। इसका वेदनाहर गुण इसके विषैले सत्व में है तथा स्तम्भन एवं तिक्तपौष्टिक गुण काष्ठ में है। इसके विषैले सत्व की क्रिया सम्पूर्ण शरीर पर एवं विशेषकर जीवनीय केन्द्र स्थान पर शामक रूप में होती है। (१) अपचन के कारण आमाशय की श्लेष्मल त्वचा में शोथ होकर वमन एवं अतिसार होने पर तथा आमाशय के व्रण में इसको दिया जाता है। इससे व्रण की वेदना कम होती है तथा स्तम्भन गुण के कारण अतिसार तथा वमन में लाभ होता है। इसके फांट से भी वमन तथा हृल्लास में लाभ होता है। (२) श्वसनकेन्द्र के ऊपर इसके शामक प्रभाव के कारण शुष्क कास एवं क्षयज प्रस्वेद कम हो जाता है। हिक्का एवं श्वास में इसको मधु के साथ चटाते हैं। (३) हृदय के केन्द्रस्थान के शमन के कारण हृदय की धड़कन तथा हृदय के वामपटल रोग से रक्त का पीछे बहना ( Mitral regurgitation ) एवं हृदय पर मेद संचित होकर एक प्रकार की जो खांसी होती है उसमें यह गुणकारक है। (४) रक्तपित्त में चन्दन, शर्करा एवं तंडुल जल के साथ इसको देते हैं। (५) गर्भपात रोकने के लिये इसे जल में घिस कर पिलाते हैं। चरक एवं सुश्रुत ने इसे गर्भस्थैर्यकर नहीं माना है। (६) जननेन्द्रिय की शुष्क कण्डू में इसे शीतल जल में घिसकर लगाते हैं। शुष्क कण्डू युक्त त्वचा के रोगों में इसके लेप से त्वचा शुद्ध होकर कान्ति बढ़ती है। मात्रा—५-१५ र०। इसमें तीव्र विषैला द्रव्य होने के कारण भली प्रकार विचार करके इसका प्रयोग करें।