भारतकोश
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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

२०४ भावप्रकाश निघण्टुः अथ गुग्गुलुः । तस्य नामान्याह गुग्गुलुर्देवधूपश्च जटायुः कौशिकः पुरः । कुम्भोदूखलकं क्लीवे महिषाक्षः पलङ्कषः ॥ ३२ ॥ गूगल के नाम-गुग्गुलु, देवधूप, जटायु, कौशिक, पुर, कुम्भोदूखलक (नपुंसकलिङ्ग), महिषाक्ष और पलङ्कष ये सब गूगल के संस्कृत नाम हैं ॥ ३२ ॥ गुग्गुलुभेदानाह महिषाक्षो महानीलः कुमुदः पद्म इत्यपि । हिरण्यः पञ्चमो ज्ञेयो गुग्गुलोः पञ्च जातयः ॥३३॥ गूगल के भेद-१ महिषाक्ष, २ महानील, ३ कुमुद, ४ पद्म, ५ हिरण्य इस प्रकार से गूगल के ५ पांच भेद जानना चाहिये ॥ ३३ ॥ तेषां लक्षणानि गुणांश्चाह भृङ्गाञ्जनसवर्णस्तु महिषाक्ष इति स्मृतः । महानीलस्तु विज्ञेयः स्वनामसमलक्षणः ॥ ३४ ॥ कुमुदः कुमुदाभः स्यात्पद्मो माणिक्यसन्निभः । हिरण्याख्यस्तु¹ हेमाभः पञ्चानां लिङ्गमोरितम् ॥ महिषाक्षो महानीलो गजेन्द्राणां हितावुभौ । हयानां कुमुदः पद्मः स्वस्त्यारोग्यकरौ परौ ॥ विशेषेण मनुष्याणां कनकः परिकीर्त्तितः । कदाचिन्महिषाक्षश्च मतः कैश्चिद्गुणामपि ॥ ३७ ॥ क्रम से उन्हीं ५ प्रकार के गूगलों के लक्षण एवं गुण-१ जो गूगल भौंरा या स्रोतोंजन के समान काले रङ्ग का होता है वह 'महिषाक्ष' कहलाता है । २ महानील नामक गूगल का लक्षण अपने नाम के अनुरूप ही है अर्थात् वह अत्यन्त नीलवर्ण का होता है । ३ कुमुद नामक गूगल-कुमुद (कुई) पुष्प के समान वर्ण वाला होता है । ४ पद्म नामक गूगल-माणिक के समान वर्ण वाला होता है । ५ हिरण्याख्य गूगल-सोने के समान वर्ण वाला होता है। इनमें से महिषाक्ष तथा महानील ये दोनों गूगल हाथियों के लिये हितकारी होते हैं । कुमुद तथा पद्म ये दोनों गूगल घोड़ों के लिये अत्यन्त कल्याणकारक तथा आरोग्यदायक होते हैं। कनक अर्थात् हिरण्यनामक गूगल तो विशेष करके मनुष्यों के लिये हितकर होता है । कोई-कोई ऐसा भी कहते हैं कि मनुष्य के लिये कहीं-कहीं महिषाक्ष गूगल भी हितकारी होता है ॥ ३४-३७ ॥ सामान्यतो गुग्गुलुगुणानाह गुग्गुलुर्विशदस्तिक्तो वीर्य्योष्णः पित्तलः सरः । कषायः कटुकः पाके कटु रूक्षो लघुः परः ॥ ३८ ॥ भग्नसन्धानकृद् वृष्यः सूक्ष्मः स्वर्यो रसायनः । दीपनः पिच्छिलो बल्यः कफवातव्रणापचीः ॥ ३९ ॥ मेदोमेहाश्मवातांश्च क्लेदकुष्ठाममारुतान् । पिडकाप्रन्थिशोफार्शोगण्डमालाकृमीञ्जयेत्॥४०॥ माधुर्य्याच्छमयेद्वातं कषायाच्चैव पित्तहा । तिक्तत्वाद् कफजित्तेन गुग्गुलुः सर्वदोषहा ॥४१॥ सामान्यरूप से गूगल के गुण- गूगल-विशद गुण युक्त, तिक्त-कषाय तथा कटरसयुक्त, उष्णवीर्य, पित्तजनक, सारक (दस्तावर), विपाक में कटरस युक्त, रूक्ष एवं अत्यन्त लघु होता है। यह टूटे हुये हड्डियों को जोड़ने वाला, वृष्य, सूक्ष्म (सूक्ष्मस्रोतोगामी), स्वर को उत्तम करने वाला, रसायन, अग्निदीपक, पिच्छिलगुणयुक्त तथा बलकारक होता है एवम्-कफ-वात, व्रण, अपची, मेदरोग, प्रमेह, पथरी, वातरोग, क्लेद, कुष्ठ, आमवात, पिड़का, ग्रन्थिरोग, शोथ, बवासीर, १. 'हिरण्याह्वस्तु' इति पाठ० । कर्पूरादिवर्गः २०५ गण्डमाला तथा कृमिरोग का नाशक होता है। गूगल-मधुर रस युक्त होने से वात को, कषाय रसयुक्त होने से पित्त को और तिक्त रस युक्त होने से कफ को नष्ट करने वाला होता है, अतः यह सम्पूर्ण दोषों का नाशक कहा हुआ है ॥ ३८-४१ ॥ नवीनस्य प्राचीनस्य च गुग्गुलोर्लक्षणं गुणांश्चाह स नवो बृंहणो वृष्यः पुराणस्त्वतिलेखनः ॥ ४२ ॥ स्निग्धः काञ्चनसंकाशः पक्वजम्बूफलोपमः । नूतनो गुग्गुलुः प्रोक्त सुगन्धिर्यस्तु पिच्छिलः ॥ ४३ ॥ शुष्को दुर्गन्धकश्चैव त्यक्तप्रकृतिवर्णकः । पुराणः स तु विज्ञेयो गुग्गुलुवर्यिवर्जितः ॥ ४४ ॥ नवीन और पुराने गूगल के गुण तथा लक्षण-नवीन गूगल-बृंहण (धातुवर्धक ) तथा वृष्य (वीर्यजनक ) होता है और पुराना गूगल-अतिलेखन (शरीर के धातु तथा मलों को सुखा कर खुरचने वाला ) होता है। नवीन गूगल वह कहलाता है जो स्निग्ध, सोने के समान वर्ण वाला, पके हुये जामुन के समान स्वरूप वाला, सुगन्ध युक्त तथा पिच्छिल गुण युक्त होता है। पुराना गूगल-वह कहलाता है कि जो शुष्क, दुर्गन्धयुक्त, स्वाभाविक वर्ण हीन तथा वीर्य्य रहित होता है ॥ ४२-४४ ॥ गुग्गुलुसेविनां त्याज्यान्याह अम्लं तीक्ष्णमजीर्णञ्च व्यवायं श्रममातपम् । मद्यं रोषं त्यजेत्सम्यग् गुणार्थी पुरसेवकः ॥४५॥ गूगल सेवन करने वालों के लिये अहितकर अत एव त्याज्य विषय- गूगल का सेवन करने वाला पुरुष यदि गूगल का भली भांति गुण प्राप्त करना चाहे तो वह अम्ल रस युक्त, तीक्ष्ण तथा अजीर्णकारक द्रव्य, मैथुन, परिश्रम, धूप में फिरना, शराब पीना तथा क्रोध करना छोड़ दे ॥ १५ गूगल हि०-गूगल, गुग्गुल । बं-गुग्गुल, मुकुल । म०-गुग्गुल । गु०-गुगल । क०-गुग्गुल । ते०-गुक्कुलु चेट्टु । ता०-मैशाक्षी, गुक्कल । सिंध-गुगरू । फ०-बूएजहूदोन । अ०-मुक्कु-अर्जक, अफलात(तु)न । अ०-Indian Bdellium (इण्डियन डेलिअम्) । लै०-Balsamodendron mukul Hook. ex Stocks (बाल्सेमोडेन्ड्रोन् मुकुल, हुक एक्स स्टॉक्स) । Fam. Burseraceae (बर्सेरेसी) । गूगल के वृक्ष-सिन्ध, राजपूताना, खानदेश, बरार, मैसूर, काठियावाड एवं बेलरी आदि स्थानों में अधिक पाये जाते हैं । इसका वृक्ष- छोटा, ४ से ८ फीट ऊँचा एवं झाड़ीदार होता है जिसकी मोटी फैली हुई शाखाओं के अग्र भाग कंटकित होते हैं। छाल-हरापन युक्त पीली होती है। इससे कागज के समान लम्बे, पतले, चमकीले परत निकलते रहते हैं। लकड़ी-सफेद और कोमल होती है। पत्ते-पत्रक १ से ३ तक, ऊपर से लट्वाकार, अग्र की तरफ दन्त मय धार वाले, चिकने, चमकीले तथा विशेष कर छोटी मोटी प्रशाखाओं के अन्त में रहते हैं। फूल-४-५ दल वाले, छोटे-छोटे तथा भूरापन लिये लाल रंग के आते हैं। फल-छोटे छोटे, मांसल, लंगोल तथा पकने पर लाल हो जाते हैं। उक्त वृक्ष की त्वचा में जाड़े के दिनों में घाव करने से एक प्रकार का तैलीय रालदार गोंद (Oleo gum-resin) निकलता है जिसे गूगल कहते हैं ।

२०६ भावप्रकाशनिघण्टुः गूगल के प्रकार—आकृति, रंग एवं स्थान भेद से गूगल कई प्रकार का होता है। ऊपर मूल में पांच प्रकार के भेद लिखे हुए हैं। यूनानी वाले भी इसके पांच भेद मानते हैं। (१) मुकले सकलाबी—यह भूरा होता है। (२) मुकले अरबी—यह यमन में पैदा होता है और ललाई लिये भूरा या बैगनी होता है। (३) मुकले अर्वक—यह ललाई लिये होता है। (४) मुकले यहूद—यह पिलाई लिये होता है। (५) मुकले हिंदी—यह भारतवर्ष में होता है। बाजार में तीन तरह का गूगल बिकता है जिसमें से प्रथम दो तो गूगल हैं और तीसरा सलई का गोंद है। केवल गूगल कहने से कभी-कभी सलई का गोंद (कुंदुरू) भी व्यापारी दे देते हैं। (१) कण गूगल—यह मारवाड़ से आता है तथा ललाई लिये पीले रंग का होता है। यह भैंसागूगल से नरम होता है। यह अच्छा माना जाता है। (२) भैंसागूगल—यह सिंध तथा कच्छ से आता है। यह हलका हरापन लिये पीले रंग का, टेढ़े मेढ़े, छोटे-बड़े गठों में होता है। इस पर मैल, बाल एवं छाल के टुकड़े आदि चिपके रहते हैं। यह मोम जैसा नरम लेकिन दबाने से सुरमुरा, कड़वा एवं देवदार के समान गंध वाला होता है। इसे जलाने पर गुब्बारे जैसे निकल कर फूटते हैं। इसे जल में घिसने से हरापन लिये सफेद मिश्रण बनता है। यह हल्की जात का होता है। (३) सलई का गोंद—इसका वर्णन आगे किया गया है। यह लाल रंग का होता है तथा जलाने पर अच्छी तरह जलता है। उत्तम गूगल—चमकीला, चिपचिपा, मधुर गंध वाला, कुछ पीला (ताजा), पुराना होने पर कालासा, स्वाद में कडवा तथा आसानी से टूटता है। तोड़ने पर अन्दर से हरी एवं लाल चमक वाला होता है। इसे उष्ण जल में घिसने पर हरी चमक युक्त सफेद रंग का मिश्रण बनता है। इसे जलाने पर यह अच्छी तरह जलता नहीं तथा फूलकर महीन पपड़ी निकलती है। व्यापारी लोग जली हुई लकड़ी आदि में अनेक प्रकार के चिपचिपे गोंद लगाकर गोले बनाकर बेचते हैं इसलिये अच्छी तरह परीक्षा कर खरीदना चाहिये। हमेशा नये गूगल का ही व्यवहार करना चाहिये क्योंकि रखने से यह खराब हो जाता है। गूगल शोधन—गूगल के बराबर त्रिफला एवं गुडूच लेकर उसे मोटा कूटकर अष्टगुण जल में अर्धांश शेष काथ करें। फिर काथ को छानकर उसमें गूगल को कपड़े में बांध उसकी पोटली लटकावें तथा मंद आंच पर स्वेदन करें। बार-बार उस काथ को करछुल से पोटली पर डालते जाँय। जब सब गूगल छनकर काथ में आ जावे तब कपड़े में का मैला फेंक दें तथा काथ को ऊपर-ऊपर से निकाल लें। नीचे जमे हुये गाढ़े भाग को अलग कर दें। गूगल मिश्रित काथ को मंद आंच पर गाढ़ा करें। जब गाढ़ा होने लगे तो उसमें थोड़ा घी डाल दें जिससे जलने न पावे। बाद में उसे खूब अच्छी तरह कूटकर ऊपर घी लगाकर रखें। यद्यपि इस विधि से शोधन करने की परिपाटी है तथापि संभवतः इस विधि से गूगल कुछ हीनवीर्य हो जाता होगा क्योंकि आधुनिक विद्वानों का मत है कि गूगल के गुण विशेष कर उसमें के सुगन्धि तत्त्वों पर निर्भर होते हैं। इसलिये गूगल को केवल खूब अच्छी तरह बीनकर उसमें घी डालकर बहुत कूटकर व्यवहार करें तो ज्यादा उपयुक्त हो सकता है। कुछ लोग त्रिफला काथ के स्थान पर दुग्ध अथवा दशमूल काथ का व्यवहार भी करते हैं। रासायनिक संघटन—इसमें एक उड़नशील तेल, रालदार गोंद (Gum resin) एवं एक कडवा सत्व पाया जाता है। गुण और प्रयोग—गूगल रसायन, त्रिदोषघ्न, वृष्य, बल्य, स्नेहन, संसन, वातानुलोमक, आमाशयोत्तेजक, दीपन, वातहर, वातनाड़ी संस्थान के लिये पुष्टिकारक, उत्तेजक कफनिःसारक तथा

कर्पूरादिर्वर्गः २०७ श्लेष्मल त्वचा के लिये उत्तेजक, संकोचक एवं प्रतिदूषक, श्वेतकायाणुवर्धक, मल्लकायाणुकार्यवृद्धिकर, त्वग्दोषहर, व्रणशोधन, व्रणरोपण, शोथघ्न, रक्तवर्धक एवं आर्तवजनन है। नया गूगल बृंहण एवं वृष्य होता है तथा पुराना कर्षण (लेखन) होता है। इसकी क्रिया बोल (Myrrha-मिरह) जैसी होती है। इसके सेवन के पश्चात् आमाशय में उष्णता मालूम होती है। इसका प्रच्यूषण बहुत जल्दी होता है। इसके गुण संभवतः इसमें के सुगन्धि तत्त्वों के ऊपर निर्भर रहते हैं। इसका उत्सर्ग चर्म, श्लेष्मलत्वचा एवं वृक्कों से होता है तथा उत्सर्ग के समय यह उन-उन अंगों को उत्तेजित करता है तथा जीवाणुनाशन का भी कार्य करता है। बिना किसी दुष्परिणाम के इसका बहुत दिन तक प्रयोग किया जा सकता है। कभी-कभी इससे कोपैबा (Copaiba) की तरह त्वचा पर लाल चकत्ते और क्वचित वृक्क प्रक्षोभ के लक्षण दिखलाई देते हैं जो औषध बन्द करने से ठीक हो जाते हैं। इसका उपयोग जीर्ण कफरोग, वातरोग, नाड्यव्रणसन्ता, गृध्रसी, अर्दित, अग्निमांद्य, अपचन, अतिसार, प्रवाहिका, कंठमाला, ग्रंथि, विद्रधि, कुष्ठ, फिरंग, सोजाक, विभिन्न अवयवों के शोथयुक्त विकार, शोफ, उदर, चर्मरोग, व्रण, भगंदर, कृमि, पांडु, अर्श, प्रमेह, गर्भाशय विकार एवं मेदोवृद्धि में उन उन अवयवों पर कार्य करने वाली प्रयोजक औषधों के साथ किया जाता है। (१) पुराने कफ विकारों में इसको छोटी पीपल, अडूसा, मधु एवं घृत के साथ दिया जाता है। राजयक्ष्मा में इसके प्रयोग से कफ की मात्रा कम होती है तथा जीवाणुनाशन भी होता है। जिन रोगों में कफ अत्यधिक एवं चिपचिपा होता है उसमें इससे विशेष लाभ होता है। दुर्बल, पांडुयुक्त एवं मध्यम आयु के लोगों में यह विशेष लाभदायक होता है। इसके साथ लोहभस्म का प्रयोग किया जा सकता है। श्वास में इसको घृत के साथ खिलाते हैं। (२) आमाशय शिथिलता एवं अतिस्तीर्णता में इसके प्रयोग से क्षुधावृद्धि होती है तथा पाचन सुधरता है। अतिसार, प्रवाहिका, आंत्रप्रदाह एवं क्षयज अतिसार आदि में आंत्रिक प्रतिदूषक (Intestinal antiseptic) के रूप में सुगंधि द्रव्य, इन्द्रजव, एलुवा और गुड़ आदि के साथ यह दिया जाता है। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में इसका अधिक प्रभाव पड़ता है। (३) यह रक्तशोधक, प्रतिदूषक, संपूर्ण शरीर को उत्तेजक एवं बलदायक होने के कारण अनेक शोथयुक्त अवस्थाओं जैसे स्वरयंत्रशोथ, श्वसनीशोथ, कुकास, उरःस्तोय, क्षयज उदरा- वरणशोथजन्य जलोदर, कंठमाला एवं मूत्रसंस्थान के गवीनीमुखशोथ, बस्तिशोथ तथा जीर्ण गर्भाशयशोथ एवं फिरंग आदि में लाभकर होता है। इनमें हर ४ या ६ घंटे के अन्तर पर इसको देते हैं। कंठमाला में पारद, सोमल्ल एवं बायविडंग के साथ गूगल देते हैं। फिरंगादि में अनंतमूल के साथ एवं जीर्ण आमवात या सोजाक से संधिशोथ होने पर गूगल एवं शिलाजतु का प्रयोग किया जाता है। संधिशोथ पर इसका लेप भी करते हैं। सोजाक तथा बस्तिशोथ में गुडूच के साथ इसको देते हैं। उरःस्तोय एवं जलोदर आदि में इससे स्रवित जल का शोषण हो जाता है। (४) गूगल की गर्भाशय के ऊपर बहुत अच्छी क्रिया होती है। तरुणस्त्रियों के अनार्तव में गूगल, एलुवा तथा कसीस की गोलियां खिलाई जाती हैं। श्वेत प्रदर में तथा उसके कारण वन्ध्यत्व हो तो रसौंत के साथ इसे अधिक मात्रा में देते हैं। (५) अंगघात, अर्दित, ऊरुस्तंभ, गृध्रसी एवं वातनाड़ी शूल में कैशोर गुग्गुलु से बहुत लाभ होता है। ऊरुस्तंभ में गोमूत्र के साथ एवं गृध्रसी में रास्ना एवं घृत के साथ इसको देते हैं।

२०८ \ भावप्रकाशनिघण्टुः (६) आमवात, कटिशूल एवं संधिपीड़ा में इसका बाह्याभ्यंतर प्रयोग किया जाता है। रास्नादि क्वाथ के साथ योगराज या त्रयोदशांग गुग्गुलु का उपयोग अच्छा होता है। (७) कुष्ठ में इससे साधारण स्वास्थ्य अच्छा होता है तथा इसके प्रयोग से दुर्बलता तथा नाड़ीशूल आदि ठीक होता है। सभी प्रकार के चर्मरोगों में गूगुल लाभदायक माना जाता है। इससे कंडू कम होती है तथा त्वचा का वर्ण सुन्दर हो जाता है। (८) व्रणशोधक, व्रणरोपक एवं प्रतिदूषक होने के कारण इसका बाह्य प्रयोग बहुत किया जाता है। १० ड्राम जल में १ ड्राम इसका टिंक्चर (९०% मद्यसार में २०%) मिलाकर मसूड़ों की सूजन, पायरिया, दांतों में गढ़े हो जाना, गले के व्रण, जीर्ण ग्रससिकाशोथ एवं गल- तुण्डिकाशोथ में गंडूष कराया जाता है। पुराने व्रणों के प्रक्षालन के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। फोड़ों की प्रारंभिक अवस्था में इसके गरम लेप से फोड़े बैठ जाते हैं। घी में इसका मलहम बनाकर पुराने व्रणों में प्रयोग किया जाता है। कंठमाला में गूगुल को उष्ण जल में घिस- कर दिन में तीन चार बार मोटा लेप करने से गांठें बैठ जाती हैं। अर्श में इसका लेप एवं धूआं दिया जाता है। आमाशयोर्ध्वप्रदेश में इसे लगाने से हिचकी तुरंत रुकती है। प्राच्यव्रण (Delhi boil) नामक दिल्ली की तरफ होने वाले व्रण में गूगुल, गंधक, सोहागा तथा कत्था इसका मलहम लगाया जाता है। मुखरोगों में गूगुल को मुख में रखकर चूसने से लाभ होता है। मात्रा—२-८ रत्ती । अथ सरलनिर्यासगुग्गुलुः । तस्या नामानि गुणाँश्चाह श्रीवासः सरलस्रावः श्रीवेष्टो वृक्षधूपकः । श्रीवासो मधुरस्तिक्तः स्निग्धोष्णस्तुवरः सरः ॥ पित्तलो वातमूर्द्धाक्षित्वग्रोगकफापहः । रक्षोघ्नः स्वेददौर्गन्ध्ययुकाकण्डूव्रणप्रणुत् ॥ ४७ ॥ सरलनिर्यास अर्थात् चीड़ के गोंद (गन्धाबिरोजा) के नाम तथा गुण—श्रीवास, सरलस्राव, श्रीवेष्ट और वृक्षधूपक ये सब गन्धाबिरोजा के संस्कृत नाम हैं। गन्धाबिरोजा—मधुर तिक्त तथा कषाय रस युक्त, स्निग्ध, उष्णवीर्य, दस्तावर, पित्तजनक एवं वायु, मस्तक, नेत्र तथा स्वरसम्बन्धी रोग, कफ, रक्षोग्रहबाधा, स्वेद, दुर्गन्ध, जूंयें, खुजली और घाव को दूर करता है॥ १६ सरल निर्यास हि०-गन्धाबिरोजा, बिहरोजा, बिरोजा, सरल का गोंद, चीड का गोंद । म०-सरलडीक । गु०-बेरजो । क०-श्रीवेष्टक । ता०-पिनेमारू । लिपचा०-गिन्स्ट । मो०-टोडाँग । नेपा०-धूप । पहाड़ी-विरजेलासा, लीसा । फा०-झारजद, बरजद । अ०-किन्न । अं०-Oleo-resin of Pine (ओलिओ रेजिन् ऑफ् पाइन् ) । ले०-Oleo-resina of Pinus longifolia and other species (ओलिओ रेजिना ऑफ़ पाइनस लांगिफोलिया अण्ड अदर स्पिसीज ) । Fam. Pina- ceae (पिनेंसी ) । धूपसरल वृक्ष (चीड़) के निर्यास को गन्धाबिरोजा कहा जाता है। इसके वृक्ष तथा स्वरूपादि का वर्णन पहले सरल वृक्ष (पृष्ठ १९८) के अन्तर्गत किया जा चुका है। रासायनिक संगठन—इसमें करीब २०% तारपीन का तेल (Tarpeatine oil) होता है जो ऊर्ध्वपातन यंत्र द्वारा निकाला जाता है। लगभग ८०% भाग अवशेष रहता है। इसे डॉक्टरी में रेझिन (रजन) या कोलोफोनि (Resin, colophony) कहते हैं। रेझिन (रजन) पारभासक कर्पूरादिवर्गः २०६ हलके अम्बर के वर्ण का, चमकीला एवं आसानी से टूटने वाला घन पदार्थ होता है। यह तोड़ने पर अन्दर से चमकीला दिखाई देता है। इसम तारपीन सदृश स्वाद एवं गन्ध होती है। यह जलमें अविलेय किन्तु मद्यसार तथा ईथर आदि में आसानी से घुल जाता है। तारपीन का तेल—यह सरल वृक्ष के निर्यास (गन्धाबिरोजा) से वाष्प के साथ ऊर्ध्व नलिका यन्त्र से निकाला हुआ तैल है। औषध की अपेक्षा अन्य उद्योगों में इसकी बहुत खपत होती है। सुगन्धि द्रव्य, कृत्रिम कर्पूर, तैलीय रंग एवं वार्निश बनाने में इसका उपयोग किया जाता है। इस तेल की संसार भर की आवश्यकता का ६७% भाग अमेरिका एवं २२% भाग फ्रांस पूर्ति करता है इतने अधिक वहां इसके वृक्ष पाये जाते हैं। भारतवर्ष में भी यद्यपि इसके वृक्ष बहुत पाये जाते हैं तथापि जंगली प्रदेशों में यातायात की कठिनाइयों के कारण अभी बहुत कम वृक्षों के निर्यास से तैल निकाला जाता है। भवाली, जालो तथा बरेली के पास चित्तरबकगंज आदि स्थानों में इसके निकालने के कारखाने हैं। यह तैल रंगहीन एवं स्वच्छ होता है। इसमें एक विशिष्ट प्रकार की गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कटु एवं कुछ तिक्त होता है। कुछ दिन के बाद तथा इसे खुला रखने पर इसके स्वाद तथा गन्ध दोनों बढ़ जाते हैं जो अधिक अप्रिय हो जाते हैं। इसका विशिष्ट गुरुत्व ०.८६०-०.८७० है। यह सातगुने मद्यसार (९०%) में तथा ईथर, क्लोरोफॉर्म, कार्बन डाइसल्फाइड, विजलीकृत (Dehydrated) मद्यसार एवं ग्लेशियल ॲसिटिक् एसिङ् में चाहे जिस मात्रा में घुल जाता है। भारतीय व्यापारी तैल में ३७.५% अॅल्फा-कॅरेन् (a-carene) एवं ॲल्फा-डी-टर्पेन्स् (a-d- terpenes), १०% अॅल्फा-एल्-टर्पेन् (a-l-terpene), २४.८% एल्-पिनेन् (l-pinene), ९.७% नोपिनेन् (Nopinene), या बीटा-पिनेन् (B-pinene), २०.३% लॉगिफोलीन् (Longifoline) एवं अल्प मात्रा में सिल्वेस्ट्रीन (Sylvestrene) एवं डाइबेंप्टीन (Dipe- ntene) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। अमेरिका और फ्रांस के तैल में प्रधानतया पिनेन् अधिक होते हैं। भारतीय तारपीन के तैल में उपयुक्त पिनेन् की अपर्याप्त मात्रा होने के कारण कृत्रिम कर्पूर निर्माण के यह अयोग्य होता है। भारतीय तैल आसानी से जारित (Oxidized) होने के कारण तथा सूखने पर अधिक राल निकलने के कारण विदेशी तैल की अपेक्षा हीन श्रेणी का समझा जाता है लेकिन अन्य उद्योगों में इसका उपयोग किया जा सकता है। इस तैल को प्रकाशहीन, ठंडी जगह में बंद बोतलों में रखना चाहिये। गुण और प्रयोग—गन्धाबिरोजा एवं तारपीन के तेल के गुण लगभग समान ही होने के कारण दोनों का एक साथ ही वर्णन किया गया है। यह वातानुलोमक, श्लेष्मनिःसारक, कफघ्न, स्वेदजनन, मूत्रजनन, रक्तस्तम्भक, उत्तेजक, कृमिघ्न, शोथघ्न, वातहर, व्रणरोपक, दुर्गन्धिनाशक एवं अल्प प्रतिदूषक (Antiseptic) है। इसको चर्म पर मर्दन करने से प्रारम्भ में त्वचा लाल हो जाती है तथा प्रक्षोभ उत्पन्न होता है, पश्चात् नाड्यंगों के अवसाद से शून्यता उत्पन्न होती है। इससे सूक्ष्म रक्तवाहिनियों का संकोच होकर बाह्य (स्थानिक) रक्तस्राव रुक जाता है। अधिक मर्दन से त्वचा में स्फोट आदि भी उत्पन्न होते हैं। इसका प्रश्वषण महास्रोत, श्वसनसंस्थान एवं त्वचा द्वारा होता है तथा उत्सर्ग मूत्र एवं श्वसनसंस्थान से होता है। उत्सर्ग के समय श्वास में इसकी गन्ध तृण मूत्र में बनफ्शाह् (Vio let-हायोलेट) की गन्ध आती है। 14 १४ भा० नि०

अल्प मात्रा में बार-बार देने से प्रथम वृक्कों की उत्तेजना से मूत्र की मात्रा बढ़ती है लेकिन अधिक काल तक प्रयोग करते रहने से मूत्र में जलन, प्रक्षोभ एवं कभी-कभी तीव्र मूत्रकृच्छ्र होता है। वृक्कों में शोथ उत्पन्न होने से मूत्र की मात्रा कम होती है एवं मूत्र में अल्ब्यूमिन एवं कभी-कभी रक्त भी जाने लगता है। अधिक मात्रा में महास्रोत में प्रक्षोभ से तीव्र विरेचन एवं रक्तातिसार तथा तन्द्रा, सारे शरीर में शिथिलता, अवसाद, सांवेदनिक नाड़ियों का घात, प्रत्याक्षेप क्रिया का घात एवं संन्यास आदि लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। उपर्युक्त परिणाम अधिक मात्रा में तैल को सूंघने से भी हो सकते हैं। (१) यह उत्तम वातानुलोमक होने के कारण आध्मानजन्य शूल के लिये बहुत उपयोगी है। तारपीन के तैल को गोंद के साथ घोंट कर थोड़ी चीनी एवं जल मिलाकर रोगी को दिया जाता है। इससे स्फीतकृमियों का भी नाश होता है। आमाशयिक व्रण से अथवा अन्य कारणों से आंत्र से रक्तस्राव होता हो तो इसको देने से सूक्ष्म रक्तवाहिनियों का संकोच हो कर रक्तस्राव रुक जाता है। आन्त्रिक ज्वर (Typhoid) में न केवल वातानुलोमक प्रभाव के कारण आध्मान (Tympanitis) में लाभ होता है वरन् इसकी उपस्थिति में इस रोगोत्पादक दण्डाणु की वृद्धि रुक जाने से प्रत्यक्ष इस रोग में भी लाभ होता है। इसमें १५-३० बूंद हर घण्टे पर कई बार दिया जाता है। (२) जीर्ण श्वसनीशोथ (Bronchitis) में इसको देने से कफ निकलने लगता है तथा जीवाणुओं का नाश होने से दुर्गन्ध भी दूर होतो है। रोगी के कमरे में तैल को छिड़कने से अपने आप यह श्वास में आकर अपना कार्य करता है। कफक्षय एवं रक्तष्ठीवन में भी इसको खिलाया जाता है तथा सूंघने को भी दिया जाता है । फुफ्फुसों के कोथ में इससे विशेष लाभ होता है। तारपीन का तैल २।। तो०, मुलेठी २।। तो० एवं मधु २ तो० एक साथ घोंट कर ३०-६० र० की मात्रा में इन विकारों में दिया जाता है। (३) पुराने सोज़ाक (Gleet) एवं बस्तिशोथ में खन्नू का तैल १-३ बूंद या शुद्ध गन्धा- बिरोजा १ से २ ड्रा० खिलाते हैं। इन अवस्थाओं में 'पूय मेहारि वटी' को दिन भर में २-४ गोलियां दारुहरिद्रा कषाय के अनुपान से खिलाई जाती हैं। इसको बनाने के लिये शुद्ध गन्धा- बिरोजा १ तो०, शुद्ध राल २।। तो०, गूगल ५ तो०, रूमीमस्तगी २।। तो० एवं चन्दन का तैल १।। तो० इन सब को घोंट कर १॥ माशे की गोलियां बनाई जाती हैं। (४) जीर्ण कोष्ठबद्धता, आध्मान एवं सूत्रकृमि में ६०-१२० बूंद ताड़पीन का तैल एवं ४ पाइण्ट साबुन युक्त जल की बस्ति बहुत ही लाभदायक होती है। (५) इसमें रेंडी का तैल मिलाकर आमवात, कटिशूल, सन्धिपीडा एवं वातनाड़ी शूल में लगाया जाता है। आन्तरिक शोथ विशेष कर उदरगत शोथ एवं आध्मान में इससे स्वेदन किया जाता है। फलालेन जैसे कपड़े को उष्ण जल में निचोड़ कर उस पर थोड़ा सा तैल छिड़क कर उससे सेंका जाता है। पुराने कफविकारों में इसको रूमाल पर डालकर सूंघने को दिया जाता है तथा छाती पर इसको लगाते हैं। (६) गजचर्म, व्रण, क्षत तथा अन्य चर्मविकारों में गन्धाबिरोजा का मलहम उपयोग में आता है। क्षत में तैल से स्थानिक रक्तस्राव भी रुक जाती है। मुख के शल्य कर्म में साधारण रक्त- स्राव को रोकने के लिये तैल का प्रयोग किया जाता है। गन्धाबिरोजा का उपयोग अनेक प्रकार के मलहमों तथा धूप आदि में किया जाता है। कण्ठमाला में इसके लेप से लाभ होता है


गन्धाबिरोजा का डामर जीर्ण कास एवं राजयक्ष्मा आदि में दिया जाता है। इसके रजन (रेझिन, कोलोफोनि) का व्यवहार मलहम बनाने में विशेष रूप से होता है। यह अल्प प्रतिदूषक तथा पुराने व्रणों के लिये लाभदायक होता है। मात्रा - तैल ३-१० बूंद; कृमिघ्न १२०-२४० बूंद; शुद्ध गन्धाबिरोजा १-२ मा०।

अथ रालः । तस्य नामानि गुणांश्चाह रालस्तु शालनिर्यासस्तथा सर्जरसः स्मृतः । देवधूपो यक्षधूपस्तथा सर्वरसश्च सः ॥ ४८ ॥ रालो हिमो गुरुस्तिक्तः कषायो ग्राहको हरेत् । दोषास्रस्वेदवीसर्पज्वरव्रणविपादिकाः ॥ भग्नभ्रमाग्निदग्धांश्च शूलातीसारनाशनः ॥ ४९ ॥ राल के नाम तथा गुण - राल, शालनिर्यास, सर्जरस, देवधूप, यक्षधूप तथा सर्वरस ये राल के संस्कृत नाम हैं। राल - शीतवीर्य, गुरु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त एवं ग्राही होती है। यह दोष (वातादिक), रक्तविकार, स्वेद, विसर्प, ज्वर, व्रण, विपादिका, ग्रहबाधा को दूर करती है तथा भग्न अर्थात् हड्डी के टूट जाने पर फायदा करती है और अग्नि से जल जाने पर भी लाभ करती हैं एवं शूल तथा अतीसार को नष्ट करती है ॥ ४८-४९ ॥ १७ राल हि०-राल, रार, धूना, शाल (साखू) का निर्यास । बं०-धुना, राल, डम्मर । म०-राल पिंवली । गु०-राल । क०-सर्जंरस । तै०-सर्जंरसरुमु, सर्जं । पं०-राल, अलूँ। फा०-राल मगरबी, रातियानः । अ०-रातीनाज, कैकहर । अं०-Resin of Sal Tree (रेझिन् ऑफ़ साल ट्री)। ले०-Resina of Shorea robusta Gaertn. f. (रेझिना ऑफ़ शोरिआ रोबस्टा गार्ट.)। Fam. Dipterocarpaceae (डिप्टेरोकार्पेसी )। शालवृक्ष के गोंद को राल कहते हैं। यह सफेदी लिये पीली किञ्चित् कालापन मिश्रित होती है। नयी अवस्था में यह रंगहीन एवं पारदर्शक होती है। इसमें तारपीन की राल के सदृश गन्ध नहीं होती तथा इसमें स्वाद भी नहीं होता। यह तैल में मिल जाती है तथा आसानी से जलती है। नोट - राल के लिये चरक सुश्रुत में सर्जरस शब्द प्रयुक्त हुआ है। शालनिर्यास शब्द चरक सुश्रुत में देखने में नहीं आता । वैद्य लोग राल से शाल की राल का व्यवहार करते हैं जो अधिकतर सिंगापुर से आती है। डाक्टरी में व्यवहार में लाई जाने वाली राल जिसे रजन (रेझिन) कहते हैं वह गन्धाबिरोजा से तारपीन के तैल निकालने के पश्चात् बचा हुआ अवशेष है। शाल (साखू) के वृक्ष का वर्णन आगे वटादिवर्ग में आया है। सर्ज वृक्ष (शाल भेद) तथा उससे प्राप्त होने वाली राल जिसे चन्द्रस कहते हैं उसका भी वर्णन वटादि वर्ग में है। गुण और प्रयोग - राल उत्तम व्रणशोधन, व्रणरोपण, रक्तस्तम्भन, ग्राही एवं जीवाणु- नाशक होती है। यह रेझिन (रजन) का अच्छा प्रतिनिधि मानी जाती है। (१) राल के मलहम का बहुत व्यवहार किया जाता है। इसके लगाने से स्थानिक रक्त- प्रवाह बढ़ता है तथा जीवाणुनाशन का भी कार्य होता है। फोड़े आदि पर लगाने से बिना पीड़ा के वे फूट कर जल्दी अच्छे हो जाते हैं। नवीन शोथ हो तो बिना फूटे ही बैठ भी जाते हैं। इसके मलहम का उपयोग खुजली, पामा, विवाई (विपादिका), पुराने व्रण एवं अग्निदग्ध व्रण आदि में

२१२ \ भावप्रकाशनिघण्टुः किया जाता है। मलहम बनाने के लिये राल ४, मोम ४, तिल का तैल ४ एवं घृत ३ इन सबको जरा गरम करके एक में घोंट कर मिला दें। (२) आमवातिक पीडा एवं कटिशूल में ब्राण्डी के साथ या अंडे की सफेदी के साथ लगाने से लाभ होता है। (३) खांसी, श्वास, अतिसार, कुपचन एवं सोजाक में राल खिलाई जाती है। बच्चों के रक्त- युक्त आंव में तथा रक्ताशं में चीनी के साथ इसका अधिक अच्छा उपयोग होता है। (४) वाजीकरण के लिए १०-२० राल ई सेर दूध के साथ नित्य प्रातः सेवन की जाती है। मात्रा-४-८ रत्ती। अथ कुन्दरुः (सुगन्धद्रव्यं शल्लकीनिर्यासः ।) तस्य नामानि गुणांश्चाह कुन्दुरुस्तु मुकुन्दः स्यात्सुगन्धः कुन्द इत्यपि ॥ ५० ॥ कुन्दुरुर्मधुरस्तिक्तस्तीक्ष्णस्त्वच्यः कटुर्हरेत् । ज्वरस्वेदग्रहालक्ष्मीमुखरोगकफानिलान् ॥५१॥ कुन्दुरु (सुगन्ध द्रव्य) जो कि शल्लकी का गोंद है उसके नाम तथा गुण—कुन्दुरु, मुकुन्द, सुगन्ध तथा कुन्द ये सब कुन्दरु के संस्कृत नाम हैं। कुन्दुरु-मधुर, तिक्त तथा कटु रसयुक्त, तीक्ष्ण एवं त्वचा के लिये हितकारी होता है। यह ज्वर, स्वेद, ग्रहबाधा, अलक्ष्मी, मुखरोग, कफ और वायु को दूर करता है ॥ ५०-५१ ॥ नोट—प्राचीनों ने शल्लकी (सलई) के निर्यास को ही कुन्दुरु माना है लेकिन बाजार में मिलने वाला कुन्दुरु सलई का निर्यास न होते हुए भी उसी जाति के विदेशी वृक्ष का निर्यास है जो अफ्रीका एवं अरब से आता है। इसका व्यापार मुख्यतया बंबई में होता है। गुणों की दृष्टि से भारतीय सलई के गोंद एवं कुन्दुरु में विशेष अन्तर नहीं है। पार्थक्य के लिये भारतीय निर्यास को 'सलई गूगल' एवं विदेशी निर्यास को 'कुन्दुरु' लिखा गया है तथा दोनों का अलग २ वर्णन किया गया है। बाजार में गूगल नाम से सलई का गूगल एवं कणगूगल (गुग्गुलु) दोनों ही बिकते हैं इसलिये खरीदते समय शल्लकी निर्यास की आवश्यकता होने पर 'सलई गूगल' मांगना चाहिये एवं गुग्गुलु की आवश्यकता होने पर कणगूगल नाम से खरीदना चाहिये। सलई वृक्ष का वर्णन वटादिवर्ग में किया गया है। यद्यपि कुन्दरु का अरबी नाम लबान है तथापि लोबान या कोहबान यह अन्य द्रव्य है, उसका भी प्रसंगतः संक्षेप में वर्णन किया गया है। कुन्दुरु शाक का वर्णन आगे शाकवर्ग में किया हुआ है। १८ शल्लकी निर्यास (सलई गूगल) हि०-सलई गूगल, गूगल, लबान। बं०-सलेधूप। गु०-धूपडो। म०-सालईचा डींक। अजमेर-गंधबिरोजा। अं०-Indian olibanum or Frankincense (इण्डियन् ओलिबैनम् या फ्रैंकिन्सेन्स) । ले०-Gum resin of Boswellia serrata Roxb. (गमरेशिन ऑफ बॉस्वेलिया सेरेटा रॉक्स ) । Fam. Burseraceae (बर्सरेसी) । यह शल्लकी (सलई) वृक्ष का गोंद है। यह कुछ आर्द्र, चिपचिपा, रक्ताभ पीतवर्ण का एवं सुगंधयुक्त होता है। यह जलाने पर कणगूगल की अपेक्षा जल्दी जलता है। जल में डालने पर यह सफेद दिखलाई देता है तथा मद्यसार या जल के साथ घोटने पर सफेद घोक बनता है। नवंबर से जुलाई तक के समय इसके वृक्षों को नीचे छीलते हैं तथा जो स्राव निकलता है उसे कर्पूरादिवर्गः \ २१३ संग्रह करते हैं। ताजी अवस्था में यह कनाडा बाल्सम की तरह दिखलाई देता है। प्राचीनों ने कुन्दुरु इसे ही माना है। रासायनिक संगठन—इसमें गोंद, उड़नशील तैल एवं राल के समान एक अन्य द्रव्य रहता है। गुण और प्रयोग —यह स्नेहन, संसन, रक्तशोधक, कफनिःसारक, उत्तेजक, मूत्रल, आर्तव- जनन एवं त्वच्य है। इसके गुण मिष्ट तथा गूगल के समान हैं। इसका उपयोग ज्वर, स्वेद, जीर्ण कफविकार, रक्तविकार, प्रदर, रक्तातिसार, मुखरोग, कास, श्वास, मूत्रविकार, आर्तवविकार, वातनाडीसंस्थान के रोग, श्लेष्मल त्वचा के कफयुक्त विकार, पाण्डु एवं अनेक प्रकार के ग्रंथि, फोड़े एवं व्रण आदि में किया जाता है। इसका प्रयोग अन्य उपयुक्त औषधों के साथ गोली या चूर्णरूप में किया जाता है। (१) पुराने एवं गद्देदार व्रणों में टंकण, गन्धक, खैर एवं सलई गूगल का मलहम बहुत लाभदायक होता है। दुर्गंधित व्रणों में गरी का तेल या नीबू के रस में इसे मिलाकर लगाने से लाभ होता है। (२) इसको गरम जल में घिसकर गण्डमाला, ग्रन्थि, बद, संधिवात एवं अस्थिशोथ आदि में लगाया जाता है एवं खिलाते भी हैं। (३) पुराने सोजाक एवं फिरङ्ग में स्नेहन औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। (४) दुर्गन्धयुक्त श्वास में बबूल के गोंद के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा—५-१० र०। १८ (अ) कुन्दुरु हि०-कुन्दुरु, लभान, कुन्दुर, थुस। बं०-कुन्दुरुछोटी। म०-६ (वि) सेस। सं०-कुंदरो। फा०- कुन्दुर। अ०-कुन्दुरे जकर, लबान, बस्तज। अं०-Olibanum (ऑलिबैनम् ), Frankincense (फ्रैंकिन्सेस) । ले०-Gum resin of Boswellia carterii Birdw. & other sp. (गम रेजिन ऑफ बॉस्वेलिया कार्टेराइ बर्ड, एण्ड अदर स्पीशीज) Fam. Burseraceae (बर्सरेसी) । यह शल्लकी (सलई) की ही जाति के विदेशी वृक्ष का गोंद है जो अरब तथा अफ्रीका के एबीसीनिया नामक स्थान से आता है। बाजार में कुन्दुरु के नाम से यही बिकता है एवं बम्बई में इसका आयात होता है। इसके छोटे, बड़े एवं अण्डाकार ५-२५ मि. मी. बड़े टुकड़े होते हैं जो कभी-कभी आपस में चिपके रहते हैं। इसका बाह्य स्तर मटमैला एवं पीताभ, नीलाभ या हरी आभा युक्त होता है। यह आसानी से टूट जाता है। भीतरी सतह चिकनी तथा अर्धपारदर्शक होती है। यह जलाने में जल्दी जलता है। यह सुगन्धित तथा स्वाद में कुछ कड़वा होता है। रासायनिक संगठन—इसमें गोंद तथा एक राल सदृश अन्य पदार्थ पाया जाता है। गुण और प्रयोग—यह सुगन्धि, उत्तेजक, कफनिःसारक, ग्राही तथा शोथहर है। इसके गुण सलई के गूगल के समान हैं। इसकी क्रिया श्लेष्मल त्वचा पर होती है। श्वसनसंस्थान की श्लेष्मल त्वचा पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। पाश्चात्य चिकित्सा के बाल्सम् पेरू तथा बाल्सम् टोलू के समान यह कार्य करता है किन्तु इससे आमाशय में कम प्रक्षोभ होता है। (१) इसका उत्सर्ग श्वसनसंस्थान के द्वारा होने के कारण जीर्ण कफ विकार तथा अत्यन्त कसदार कफ गिरना आदि अवस्थाओं में इसे बादाम, खर्करा तथा जल के साथ खिलाते हैं। इससे

२१४ भावप्रकाशनिघण्टुः कफ की दुर्गन्ध दूर होती है तथा कफ कम होकर खांसी कम होती है। इसका धूम्रपान भी कराते हैं। (२) सोजाक में इसको ५ २० की मात्रा में बदाम आदि के साथ या गोली के रूप में खिलाते हैं। (३) कुन्दुरू, खसखस का तेल एवं सफेद मोम इनको मन्द आंच पर पिघला कर कपड़े से छान कर इस मलहम का प्रयोग ग्रन्थि, शोथ तथा व्रणों पर किया जाता है। बच्चों के फोड़े फुन्सी जल्दी फूट कर अच्छे हो जाते हैं। पाषाणगर्भम पर लगाने से सूजन दूर हो जाती है। कार्वंकल पर इसका मलहम विशेष उपयोगी है। (४) इसको बाष्प पर जल के साथ गरम करने से एक चिकट गोंद बनाता है। इसमें अफीम, धतूरा, खुरासानी अजवायन या बेलाडोना आदि मिलाकर, मोटे कपड़े पर लगाकर इसकी पट्टी को पीड़ायुक्त अङ्गों पर लगाने से वहां की रक्तवाहिनियों का संकोच होने से तथा उस अंग की गति कम होने से पीड़ा शान्त होती है। मात्रा-१०-३० रत्ती। १८ (ब) लोहबान हिं०-लोहवान, लोवान। म०-ऊद। गु०-लोवान। अं०-Benzoin (बेन्झोइन)। ले०- Benzoinum (बेन्झोइनम्)। वृक्षनाम - Styrax benzoin Dryand (स्टाइरैक्स बेंझोइन ड्रायेंड)। यह एक प्रकार का रालयुक्त गोंद है जिसके वृक्ष भारत में नहीं पाये जाते। इसके दो प्रकार मिलते हैं। उपर्युक्त नाम के वृक्ष से प्राप्त द्रव्य सुमात्रा बेंझोइन कहलाता है एवं दूसरे वृक्ष Styrax tonkinensis (Pierre) Craib ex Hartwich (स्टाइरैक्स टॉन्किनेन्सिस) से प्राप्त द्रव्य को स्याम बेंझोइन कहते हैं। इनके अतिरिक्त इसी जाति के अन्य वृक्षों से भी यह द्रव्य प्राप्त होता है। इसमें पर्याप्त मिलावट भी की जाती है। सुमात्रा बेंझोइन में कुछ अपारदर्शक, श्वेताभ या रक्ताभ बादाम या कौड़ी के आकार के टुकड़े, रालदार रक्ताभ भूरे या धूसर भूरे द्रव्य के साथ मिले हुए रहते हैं। इसका स्वाद कुछ तीता तथा गंध हलकी किन्तु अप्रिय नहीं होती। स्याम बेंझोइन के टुकड़े विभिन्न नाप के या चौपहल तथा कुछ चिपटे होते हैं। यह बाहर से पीताभ भूरे या रक्ताभ भूरे किन्तु अन्दर से दुधिया श्वेत और अपारदर्शक होते हैं। चौपहल टुकड़ों में चमकीले रक्ताभ भूरे रंग के लंब गोल टुकड़े राल के साथ मिले हुये रहते हैं। इसमें वैनिला की तरह गंध तथा बाल्सम् का विशिष्ट स्वाद होता है। लोहबान को हलके हलके गरम करने से श्वेत वर्ण का धूँआ निकलता है जो ठंडी जगह पर रवेदार पदार्थ के रूप में जम जाता है। पोटैशियम परमननेट के घोल के साथ इसके चूर्ण को गरम करने से सुमात्रा बेंझोइन हो तो बेन्झेल्डिहाइड की हलकी गंध आती है। ५ सी. सी. लोबान का ईथरीय सत्व लेकर उसमें २, ३ बूंद गंधक का तेजाब मिलावे तो सुमात्रा बेंझोइन होने पर रक्ताभ भूरा एवं स्याम बेंझोइन में गहरा गुलाबी लाल रंग हो जाता है। ९० प्र० श० मद्यसार में पहले प्रकार का ७५% एवं दूसरे प्रकार का ९०% घुल जाता है। गुण और प्रयोग-लोबान कफ निःसारक एवं प्रतिदूषक है। पुरानी खांसी में बदाम तथा गोंद के साथ इसको देने से कफ बाहर निकलने में मदद होती है। बस्तिशोथ आदि में भी इसको देते हैं। विभिन्न प्रकार के चर्म रोग तथा व्रण आदि में इसका बाह्य प्रयोग लाभदायक है। कर्पूरादिवर्गः २१५ अथ शिलारसः । तस्य नामानि गुणांश्चाह सिह्लकस्तु तुरुष्कः स्यात्ततो यवनदेशजः । कपितैलश्च संख्यातस्तथा च कपि नामकः ॥५२॥ सिह्लकःकटुकःस्वादुःस्निग्धोष्णः शुक्रकान्तिकृत् । वृष्यःकण्ठयःस्वेदकुष्ठज्वरदाहग्रहापहः ॥५३॥ शिलारस के नाम तथा गुण-यवनों (मुसलमानों) के देश में उत्पन्न होने से शिलारस को संस्कृत में तुरुष्क कहते हैं। सिह्लक, कपितैल, कपिनाम्रक (अर्थात् कपि के पर्यायवाची सभी शब्द शिलारस के नामान्तर हैं) ये सब शिलारस के संस्कृत नाम हैं। शिलारस-कट्टररस युक्त, स्वादु, स्निग्ध, उष्णवीर्य, शुक्रजनकं, कान्तिकारक, वृष्य तथा कण्ठ के लिये हितकारी होता है। यह स्वेद, कुष्ठ, ज्वर, दाह तथा ग्रहबाधा को दूर करने वाला होता है॥ १९ शिलारस हिं०, म०, बं०, क०-शिलारस । सिलारस । गु०-शेलारस । ता०-नेरिशरिशिप्पाल । मल०-रसमाल । ते०-शिलारसम् । मा०-शिलारस । फा०-अम्बर माइश, अस्ले लवनी । अ०-मीअः साइला, लग्नी, वृक्षनाम-जिर्व, उस्तुरक । अं०-Liquid Storax (लिक्विड स्टोरॅक्स)। ले०-(वृक्ष नाम) Liquidamber orientalis Miller (लिक्विडम्बर ओरीयण्टे- लिस् मिलर) । Fam. Hamamelidaceae (हैमॅमेलिडेसी) । शिलारस अरब देश से आता है। यह गोंद के समान एक सुगन्ध द्रव्य है। इसके वृक्ष एशिया माइनर में होते हैं। इसी वर्ग का अन्य वृक्ष ले. अल्टिञ्जिया एक्सेलसा नोरोन्हा (Alti- ngia excelsa Noronha) आसाम, भूटान, बर्मा, पूर्वी बंगाल, पेगू, चीन, मलाया और जावा आदि देशों में होता है जिससे निकले हुए शिलारस को विदेशी शिलारस का अच्छा प्रतिनिधि मानते हैं। इसका वृक्ष मध्यमाकार का अनेक शाखायुक्त; पत्ते-करतलाकार ५ खण्डयुक्त; पुष्प-पीत वर्ण के गोल गुच्छों में आते हैं। ३ या ४ वर्ष पुराने वृक्ष की छाल को चोट पहुँचाने से भीतरी छाल में स्राव जमा होता है। फिर बाहरी छाल को हटाकर भीतरी छाल को जल में उबालने से उसके साथ लगा हुआ शिलारस जल पर तैरने लगता है जिसे अलग कर लेते हैं। शिलारस का आयात प्रधानतः फ्रांस से होता है। यह मधु के समान गाढा, वजन में जल से भारी, पिलाई लिए लाल या भूरे रंग का, मुलायम, चिपचिपा तथा तैलीय राल सदृश पदार्थ है। नये शिलारस में मिट्टी के तेल जैसी गन्ध होती है लेकिन पुराना होने पर अच्छी गन्ध आने लगती है। इसका स्वाद तीता होता है। इसकी अन्य जाति के वृक्षों से भी यह प्राप्त किया जाता है। शोधन-पाश्चात्य चिकित्सा में इसको शुद्ध करके व्यवहार करते हैं। मद्यसार में इसे घोल एवं छान कर उस द्रव को उड़ जाने देते हैं तथा जो बचा रहता है उसे व्यवहार करते हैं। यह पीताभ भूरा, चिपचिपा, कुछ पारदर्शक एवं विशिष्ट सुगंध एवं स्वादयुक्त होता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक तैलीय द्रव के साथ मिली हुई एक राल रहती है। राल में सिनेमिक एसिड (Cinnamic acid) के साथ संयुक्त स्टोरैसिनॉल् (Storesinol) नामक द्रव्य रहता है। तैलीय द्रव पदार्थ में स्टाइरॉल् (Styrol), एथिल सिनॅमेट (Ethyl cinnamate) एवं स्टाइरॅसिन (Styracin) ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-शिलारस कफघ्न, मूत्रल, प्रतिदूषक, कृमिघ्न, कण्डूघ्न, व्रणरोपक एवं व्रण- शोधक है। इसका कफघ्न धर्म सौम्य है। इसकी क्रिया लोहबान, बाल्सम् पेरू तथा बाल्सम् टोलू

२१६ भावप्रकाशनिघण्टुः सदृश होती है। इसका उत्सर्ग वृक्क तथा फुफ्फुस द्वारा होता है। कभी-कभी इससे वृक्क शोथ भी हो सकता है। औषधि तेलों को सुगन्धित करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है। चरक में वात व्याधि के वशा तैल के पाठ में 'तुरुष्क' का प्रयोग किया हुआ है। (१) जीर्ण कास आदि कफविकारों में तथा राजयक्ष्मा में इसको अण्डे की सफेदी के साथ घोंटकर शहद मिलाकर चटाते हैं। इससे फुफ्फुसों को बल मिलता है। (२) पुराना सोजाक एवं बस्तिशोथ आदि में मुलेठी के साथ इसको खिलाते हैं। (३) त्वचा के रोगों में शिंकारस का बहुत प्रयोग किया जाता है। इससे जूं तथा खुजली उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं का नाश होता है। इसे चौगुने तिल के तेल में मिलाकर पामा (Scabies), सिध्म तथा जीर्ण दाहयुक्त अपरस में लगाते हैं, इससे खुजली बहुत जल्दी कम हो जाती है। क्षतज व्रणों पर अकेले इसे लगाते हैं। इससे स्थानिक रक्ताभिसरण की वृद्धि होती है तथा क्षतज दण्डाणुओं का नाश होता है। वृषण शोथ में इसको लगाकर ऊपर से तम्बाखू या धतूरे का पत्ता बाँधने से लाभ होता है। मात्रा-५-१० रत्ती।

अथ जातीफलम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह जातीफलं जातिकोशं मालतीफलमित्यपि। जातीफलं रसे तिक्तं तीक्ष्णोष्णं रोचनं लघु ॥ कटुकं दीपनं ग्राहि स्वर्यं श्लेष्मानिलापहम् ॥ ५४ ॥ निहन्ति मुखवैरस्यं मलदौर्गन्ध्यकृष्णताः । कृमिकासवमिश्रासशोषपीनसहृद्रुजः ॥५५॥ जायफल के नाम तथा गुण-जातीफल, जातिकोश और मालतीफल ये सब 'जायफल' के संस्कृत नाम हैं। जायफल-रस में तिक्त होता है एवं तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रोचक, लघु और कटुरस युक्त भी होता है तथा अग्निदीपक, ग्राही एवं बिगड़े हुए गले के स्वर को ठीक करनेवाला होता है, तथा कफ, वात, मुख की विरसता, मलकी दुर्गन्ध एवं कालापन तथा कृमि, खांसी, वमन, श्वास, शोष, पीनस और हृद्रोग इन सबों को दूर करने वाला होता है ॥ ५४-५५ ॥ २० जायफल हि०-जायफल, जायफर । बं०, गु०-जायफल । म०-जायफल, बांडा जायफल । पं०-जबंफल । तै०-जाजिकाय । क०-जाजिकै । ता०-जाडिक्कै। ब्रह्मी०-झाडि·फू । सिलो०-जडिका । मळाया-दुशपल । फा०-जौज बुया । अ०-जौजु बब्बा, जोजुत्तीय । अं०-Nutmeg (नटमेग) । लै०-Myristica fragrans, Houtt (मायरिस्टिका फ्रैग्रेन्स, हाउत) । Fam. Myristicaceae (मायरिस्टिकेसी) । जायफल-सुमात्रा, जावा, सिंगापुर, मोलूक्का, पिनांग एवं लंका तथा वेस्ट इण्डीज में अधि- कता से उत्पन्न होता है। इस देश में इसके वृक्ष से फल पाना कष्ट साध्य है। नीलगिरी पर्वत के पूर्वीय भाग में कन्दूर की घाटी में बर्डियार के सरकारी बगीचों में तथा और दक्षिण में कोर्टलम् की पहाड़ियों पर इसके पेड़ लगाये गये हैं। इसका वृक्ष-सेव के वृक्ष के समान होता है और देखने में बहुत सुहावना हरे रङ्ग का मालूम पड़ता है। पत्ते-२ से ५ इञ्च तक लम्बे, १॥ इञ्च तक चौड़े, चर्मवत्, लंबे पर्णवृन्त से युक्त, अंडाकार या आयताकार भालकार तथा हरुके पीले-भूरे से रंग के होते हैं। फूल-छोटे-छोटे सफेद रङ्ग के

कर्पूरादिवर्गः २१७ गोलाकार आते हैं। फल-गोल, अण्डाकार १॥ से २ इञ्च लम्बे, रक्ताभ या पीताभ तथा पकने पर दो फांकों में फट जाते हैं। इनके फटने पर कड़े आवरण से युक्त जायफल (सूखे हुए बीज) को घेरे हुये जावित्री का लाल वर्ण का वेष्टन दिखाई देता है। जावित्री के अन्दर जायफल रहता है जिसका औषध में व्यवहार किया जाता है। जायफल अंडाकार, गोल तथा एक इञ्च के घेरे में होता है। बाहर से यह खाकीपन लिये हुए भूरा तथा सिकुड़ा हुआ दिखलाई पड़ता है और भीतर का रङ्ग मैला गुलाबी जिसमें लालिमा लिये हुए भूरे रंग के तंतुओं का जाल होता है। इसकी गन्ध एक स्वतन्त्र प्रकार की तेज और स्वाद सुगन्ध युक्त कड़वा होता है। औषध के अतिरिक्त जायफल तथा इसके तैल का उपयोग मसाले, साबुन तथा सुगंधि आदि में किया जाता है। रासायनिक संगठन-जायफल में ५-१५% एक पतला हल्के पीले रंग का उड़नशील तैल पाया जाता है जो इसमें का कार्यकारी तत्त्व है। इसमें २४-४०% एक स्थिर तैल भी होता है जिससे साबुन की तरह गाढ़ा एक स्नेहिक पदार्थ प्राप्त होता है। इसे बांडा साबुन या नटमेग- बटर (Nutmeg-butter) कहते हैं। इसकी पीले रंग की साबुन की तरह बट्टियां बिकती हैं। इसके स्नैहिक अम्लों में प्रधानतया (करीब ६१%) मायरिस्टिक एसिड (Myristic acid) रहता है। इनके अतिरिक्त जायफल में सुगन्धि बाल्सम्, स्टार्च तथा रेशेदार पदार्थ पाये जाते हैं। इसके उड़नशील तैल में मुख्यतया यूजीनॉल (Eugenol) तथा आइसो यूजीनॉल (Iso-eugenol) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-जायफल तथा इसका तैलं सुगन्धि, ग्राही, दीपन, वातानुलोमक, उत्तेजक, मादक, पौष्टिक, वाजीकर, स्तंभन, मुख दौर्गन्ध्यहर तथा वेदना स्थापन है। इसके सेवन के पश्चात् आमाशयिक पाचक रसों की वृद्धि होने से भूख बढ़ती है तथा पाचन सुधरता है एवं वायु का अनु- लोमन भी होता है। अधिक मात्रा में इसका मस्तिष्क पर प्रभाव कपूर के विषैले परिणाम के सदृश होता है। गतिनियंत्रक केन्द्र की उत्तेजना से अपस्मार सदृश आक्षेप आते हैं। यह तीव्र संज्ञाहर (Nar- cotic) है तथा इससे चक्कर तथा संन्यास आदि उत्पन्न हो जाता है। इसका प्रयोग कुपचन, अग्निमांद्य, आध्मान, अतिसार, हल्लास, वमन, गले के रोग, कफ तथा वातविकार, हृद् दौर्बल्य, क्लीबत्व, शीघ्रपतन एवं अनिद्रा आदि में किया जाता है। विरेचक औषधों के ऐंठन, मरोड़ आदि दुष्परिणामों को दूर करने के लिये तथा अन्य उत्तेजक एवं वातानु- लोमक औषधों के निर्माण में इसके तेल का पाश्चात्य चिकित्सा में बहुत उपयोग किया जाता है। (१) उदरशूल, अतिसार एवं बच्चों के आमातिसार आदि में इसे भूनकर नशा आने की मात्रा में देते हैं। वातानुलोमक तथा उत्तेजक गुणों के लिये इसके तेल को मिश्री के साथ खिलाते हैं। अजीर्ण में प्यास बहुत लगे तथा वमन होता हो तो इसका हिम लाभदायक होता है। (२) अफीम के साथ अनेक स्तंभक योगों में इसका उपयोग किया जाता है। (३) शिरःशूल, नाड़ीशूल, प्रसव कालीन कटिशूल, अंगघात तथा विपादिका में इसको जल में घिसकर लगाने से लाभ होता है। व्यंग तथा नीलिमा में इसको जल में घिसकर लगाया जाता है। मुखदुर्गन्धि दूर करने के लिये इसे चवाते हैं।- (४) इसके तैल में ओलिभ ऑयल मिलाकर जीर्ण आमवात में मालिश की जाती है। तैल से दंतशूल में काम होता है। इसका गाढा तैल वेदनाहर होता है तथा जीर्ण संधिशोध, मोच

२१८ भावप्रकाशनिघण्टुः एवं मरोड़ में मालिश किया जाता है। विसूचिका में हाथ एवं पैरों की ऐठन में भी इसके मलने से लाभ होता है। प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण—बंबई जायफल, रामफल या जंगली जायफल नाम से मायूरि- स्टिका मलबारिका लॅम (Myristica malabarica Lam.) के फलों को लोग इसके स्थान पर व्यवहार करते हैं इसके वृक्ष कोंकण, कर्नाटक तथा उत्तर मलबार प्रान्तों में पाये जाते हैं। इससे जो पत्री निकलती है उसे रामपत्री या बंबई की जायपत्री कहते हैं। ये जंगली जायफल अधिक लंबे, कम चौड़े, किंचित् मुलायम एवं करीब २ गंधहीन होते हैं। ये जायफल की अपेक्षा हीन गुण वाले होते हैं। कभी २ खराब जायफल तथा मिट्टी आदि मिलाकर सांचे के द्वारा बने हुवे नकली जायफल भी बाजार में बिकते हैं। मात्रा—चूर्ण २-८ र०; तैल १-५ बूंद ।

अथ जातीपत्री । तस्य नामानि गुणाँश्चाह जातीफलस्य त्वक् प्रोक्ता जातीपत्री भिषग्वरैः ॥ ५६ ॥ जातीपत्री लघुः स्वादुः कटूष्णा रुचिवर्णकृत् । कफकासवमिश्रासतृष्णाकृमिविषापहा ॥५७॥ जावित्री के नाम तथा गुण—वैद्यों में जो श्रेष्ठ हैं वे लोग 'जायफल' के छिल्के को ही 'जावित्री' कहते हैं। जातीपत्री या जातिपत्री और जातिकोष आदि संस्कृत नाम 'जावित्री' के हैं। जावित्री-लघु, स्वादिष्ट, कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य, रुचिकारक तथा वर्णकारक होती है एवम् यह कफ, खांसी, वमन, श्वास, तृष्णा, कृमि और विषविकार इन सबों को दूर करने वाली भी होती है ॥ २१ जावित्री हि०-जावित्री, जायपत्री। बं०-जायित्री, जैत्री । म०-जायपत्री । गु०-जावंतरी । क०-जाय- पत्री । ते०-जातिपत्री । फा०-बजब़ाज । अ०-बस्वास (सः)। अं०-Mace (मेस)। ले०- Myristica fragrans Houtt (मायूरिस्टिका फ्रॅग्रेन्स आउट)। Fam. Myristicaceae (मायूरिस्टिकेसी)। जिस वृक्ष से जायफल उत्पन्न होता है उसी से जावित्री भी उत्पन्न होती है। इस वृक्ष के वास्तविक फल के भीतर के बीज (जायफल) से लिपटा हुआ झालरङ्ग का जालीदार जो वेष्टन दिखाई देता है वही जावित्री है। अन्य वानस्पतिक वर्णन जायफल के साथ पहले किया जा चुका है। रासायनिक संगठन—इसमें जायफल की तरह ही एक उड़नशील तैल ८-१७% पाया जाता है। इसके अतिरिक्त स्थिर तैल, राल, वसा, शर्करा, डेक्स्ट्रीन एवं गोंद आदि पदार्थ इसमें होते हैं। गुण और प्रयोग—इसके गुण जायफल के समान होते हैं। यह दीपन, पाचन, वातानु- लोमक, कफहर, रुचिकर, वर्ण्य एवं वृष्य है। इसका उपयोग कास, कफयुक्त श्वास, क्षयरोग, मन्दज्वर, वमन, आंतों के जीर्ण विकार, विसूचिका एवं कृमि आदि में किया जाता है। मात्रा—२-८ र० ।

कर्पूरादिवर्गः २१६ अथ लवङ्गम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह लवङ्गं देवकुसुमं श्रीसंज्ञं श्रीप्रसूनकम् । लवङ्गं कटुकं तिक्तं लघु नेत्रहितं हिमम् ॥ ५८ ॥ दीपनं पाचनं रुच्यं कफपित्तास्रनाशनम् । तृष्णां छर्दि तथाऽऽध्मानं शूलमाशु विनाशयेत् । कासं श्वासञ्च हिक्काञ्च क्षयं क्षपयति ध्रुवम् ॥ ५९ ॥ लौंग के नाम तथा गुण—लवङ्ग, देवकुसुम, श्रीसंज्ञ (लक्ष्मीवाचक सम्पूर्ण शब्द लवङ्गवाचक हैं) और श्रीप्रसूनक ये सब 'लौंग' के संस्कृत नाम हैं। लौंग—कटु तथा तिक्त रस युक्त, लघु, नेत्र के लिये हितकर, शीतवीर्य, अग्नि को दीप्त करने वाली, पाचक एवम् रुचिकारक होती है तथा कफ, पित्त, रक्तविकार, तृषा, वमन, आध्मान, शूल, कास, श्वास, हिचकी एवम् क्षय इन सब रोगों को प्रायः शीघ्र तथा निश्चय दूर करती है ॥ ५८-५९ ॥ लौंग हि०-लौंग, लौंग, लवंग । बं०, म०-लवंग । गु०-लवींग । क०-लवंग कलिका, लंग । ते०-करवप्पू, लवंगमु । ता०-किरांडु । मा०-लौंग । फा०-मेखक । अ०-करन्फुल, करन्फूल । अं०-Cloves (क्लोव्स्) । ले०-Caryophyllus aromaticus Linn. (कॅरियोफालस् एरोमॅटिकस् लिन.); Eugenia aromatica Kuntze (यूजेनिया एरोमॅटिका कुंझे); Syzy- gium aromaticum (Linn.) Merr. & L. M. Perry (सिझिगियन् एरोमॅटिकम् (लिन.) मेर. पेरी) । Fam. Myrtaceae (मिर्टेसी)। इसका वृक्ष मोलक्का द्वीप में नैसर्गिक रूप से उत्पन्न होता है। झंजिबार तथा पेम्बा में इसकी बहुत खेती की जाती है तथा करीब ९०% लौंग की पूर्ति वहीं से होती है। पेनांग, मेडागास्कर, मॉरिशस् एवं सीलोन आदि स्थानों में भी इसकी खेती की जाती है। भारतवर्ष में दक्षिण भारत में अल्प मात्रा में इसकी खेती का प्रयत्न किया गया है। इसके वृक्ष-प्रायः १२-१३ हाथ ऊँचे और सतेज होते हैं तथा देखने में बहुत सुहावने लगते हैं। काण्ड-इसकी लकड़ी कठोर होती है तथा इस पर धूसर वर्ण की चिकनी छाल होती है। पत्ते-अभिमुख, सवृन्त, ४ इञ्च लम्बे, २ इञ्च चौड़े, लट्वाकार-आयताकार; फलकमूल एवं अग्र दोनों पतले एवं लम्बे; पत्रतट अखण्ड किन्तु लहरदार एवं मध्य नाड़ी के दोनों तरफ अनेक समानान्तर नाडियाँ होती हैं। पत्ते चमकीले हरे रंग के होते हैं तथा मसलने से इनमें सुगन्ध आती है। पुष्प-हलके नीलारुण (Purple) रंग के, ६ मि० मि० लम्बे तथा अत्यन्त तीव्र आह्लादकारक सुगन्ध वाले होते हैं। इस वृक्ष की सुखी हुई पुष्प कलिकाओं को लौंग कहा जाता है। ये पहले हरी होती हैं। बाद में जब इनका रंग किरमिजी हो जाता है तब इन्हें वृक्षों से तोड़ कर सुखा लिया जाता है। इसी समय इनमें तैल की मात्रा अधिकतम रहती है। लौंग १०-१७′५ मि० मि० लम्बी तथा रक्ताभ बादामी रंग की होती है। इसके नीचे का भाग जो हायपैन्थियम् (Hypanthium) से बना होता है वह चौकोर तथा कुछ चपटा होता है तथा नख से दबाने पर उसमें से तैल निकलता है एवं इसके अग्र भाग में दो कोष रहते हैं जिनके अन्दर अक्षलग्न जरायु से लगे हुए अनेक बीजभव (Ovule) होते हैं। लौंग के ऊपर के भाग में मोटे, नुकीले तथा फैले हुए ४ बाह्यदल होते हैं जिनके बीच में गुम्बजाकृति हल्के रंग के, न फैले हुए, पतले तथा अनियतारूढ़ (Imbricate) ४ अन्तर्दल होते हैं। अन्तर्दलों के अन्दर अनेक अन्दर की तरफ मुड़े हुए पुंकेशर होते हैं तथा एक स्त्री केशर होता है जिसका कुक्षिवृन्त सीधा तथा कड़ा होता है। लौंग में अत्यन्त तीव्र मसालेदार गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कटु होता है।

२२० भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन—इसमें १५-२०% एक उड़नशील तैल पाया जाता है जिसमें ८५-९२% युजेनॉल (Eugenol, $C_{10} H_{12} O_2$) रहता है। इसके अतिरिक्त लौंग में टैनिन् (गैलोटैनिक ॲसिड् १३%) एवं फाइटोस्टेरॉल सदृश एक कैरियोफाइलीन् (Caryophyllene) नामक गन्धहीन, स्वादहित, रंगहीन रवेदार पदार्थ पाया जाता है। लौंग के तैल में फेनॉल के समान युजेनॉल नामक एक महत्त्व का पदार्थ रहता है। इसके अतिरिक्त तैल में ॲसिटिल् युजेनॉल (Acetyl eugenol १०%), मेथिल् सॅलिसिलेट् (Methyl salicylate), मेथिल ॲमिलकीटोन् (Methylamylketone, $C_5 H_{11} COCH_3$); हॅनिलिन् (Vanillin), कॅरियोफाइलीन् (Caryophyllene) तथा फफ्यू'रॉल् (Furfurole, $C_5 H_4 O_2$) ये पदार्थ पाये जाते हैं। यह तैल ताजी अवस्था में रंगहीन या हलके पीले रंग का होता है लेकिन वह पुराना होने पर या खुला रखने पर गहरे रक्ताभ बादामी रंग का हो जाता है। गुण और प्रयोग—लौंग सुगन्धि, पाचक, वातानुलोमक, उत्तेजक, अग्निदीपक, उद्वेष्टनविरोधि, कफघ्न, मूत्रजनन, रुचिकर, दुर्गन्धनाशक, श्वेतकणवर्धक, वृष्य एवं कृमिघ्न है। यह स्थानिक वेदनाहर, व्रणरोपक एवं व्रणशोधक है। इसका उपयोग उदरशूल, आध्मान, अजीर्ण, कास, तृष्णा, वमन, विसूचिका, क्षय तथा सुगन्धि पदार्थ के रूप में मसाले आदि में किया जाता है। (१) लौंग के फांट (४० में १) को १ से २ तोला की मात्रा में विसूचिका में प्यास की शान्ति के लिये देते हैं। इससे जी मिचलाना भी कम होता है तथा वमन कम हो जाता है। गर्भिणी- वमन में इसके चूर्ण को मधु के साथ चटाया जाता है। (२) अजीर्ण, आध्मान एवं उदरशूल आदि में इसका फांट या चूर्ण खिलाया जाता है। (३) गले की सूजन, कुकास, कास, मुख एवं श्वास की दुर्गन्ध तथा जीमिचलाना आदि में लौंग दिये पर भून कर या उसी तरह मुख में रख कर चूसते हैं। इससे मसूड़े मजबूत होते हैं। (४) प्रतिश्याय एवं मस्तकश्लूल में लौंग को गरम जल में घिस कर ललाट पर लगाते हैं। लौंग का तैल—इसके गुण भी लौंग के समान ही होते हैं। इसका उत्सर्ग वृक्क, चर्म, श्वसनसंस्थान, आंत्र तथा यकृत् आदि से होता है। चरक-सुश्रुत में इसका उल्लेख नहीं मिलता। सिगरेट के लिये प्रयुक्त तम्बाकू को सुगन्धित करने के लिये जावा, सुमात्रा तथा जापान आदि स्थानों में इसका उपयोग किया जाता है। अनेक ओषधों को सुगन्धित करने के लिये तथा विरेचक ओषधों के साथ मरोड़ आदि न हो इसलिये इसका उपयोग करते हैं। मच्छर भगाने के लिये सोते समय इसे थोड़ा सा खुले अङ्गों पर लगा देने से मच्छर नहीं काटते। तैलों को सुगन्धित करने के लिये तथा पदार्थ संरक्षण के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। इसका बाह्य प्रभाव कपूर के सदृश होता है। यह स्थानिक उत्तेजक, त्वग्दागकारक, प्रतिशोथक, अल्पवेदनाहर, कृमिघ्न, सड़न को रोकने वाला एवं प्रतिदूषक है। (१) मिश्री पर ढाल कर या गोंद के साथ मिश्रण के रूप में इसको आन्त्रिकशूल तथा आध्मान में खिलाते हैं (२) क्षयजकास में कफ कम करने के लिये इसको खिलाते हैं। (३) दन्तशूल में दांत के गड्ढे में इसका फाहा रखने से बहुत लाभ होता है। सन्धिपीडा, गुंमसी, कटिशूल एवं वातनाडीशूल आदि में इसको लगाया जाता है। तिलाओं में इसका प्रयोग किया जाता है। कर्पूरादिवर्गः २२१ प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण—बाजार में तैल निकाली हुई लौंग भी बिकती है। इसे नख से दबाने पर तैल नहीं निकलता तथा उबले जल में डालने पर यह तैरती है एवं इसका रंग भी कुछ हलका रहता है। लौंग के चूर्ण में डंठल के टुकड़े का चूर्ण मिला दिया जाता है। लौंग के पक फल भी मदरक्लोह्वस (Mother cloves) नाम से बिकते हैं लेकिन उनमें तैल बहुत कम रहता है तथा उनके बीज में रहने वाले बड़े स्टार्च के कण से इनकी पहचान की जा सकती है। टूटे हुए पुंकेसर, अन्तर्दल एवं विकसित फूल जिनके पुंकेसर एवं अन्तर्दल निकाल लिये गये हों इनका मिश्रण लौंग के चूर्ण में व्यापारी कर देते हैं। लौंग में १५% से कम तैल नहीं होना चाहिये। मात्रा—चूर्ण १-२॥ रत्ती; तैल १-३ बूंद। अथ स्थूलैला (बड़ी इलायची) तस्या नामानि गुणांश्चाह एला स्थूला च बहुला पृथ्वोका त्रिपुटाऽपि च ॥६०॥ भद्रैला बृहदेला च चन्द्रबाला च निष्कुटिः । स्थूलैला कटुका पाके रसे चानलकूल्लघुः १ ॥ रूक्षोष्णा श्लेष्मपित्तास्त्रकण्डूश्वासतृषाऽपहा । हृल्लासविषवस्त्यामयरशिरोरुग्वमिकासनुत् ॥६२॥ बड़ी इलायची के नाम तथा गुण—एला, स्थूला, बहुला, पृथ्वीका, त्रिपुटा, भद्रैला, बृहदेला, चन्द्रबाला, निष्कुटि तथा स्थूलैला ये सब संस्कृत नाम 'बड़ी इलायची' के हैं। बड़ी इलायची- पाक तथा रस (स्वाद) में कड़ु होती है एवं अग्निजनक, लघु, रूक्ष और उष्णवीर्य होती है। यह कफ, पित्त, रक्तविकार, कण्डू (खुजली), श्वास, तृषा, हृल्लास (वमन मालूम पड़ना अर्थात् जीमिचलाना), विष एवं बस्ति, मुख तथा शिर सम्बन्धी रोग, वमन तथा खांसी को दूर करने वाली होती है ॥६०-६२॥ २३ बड़ी इलायची हि०—बड़ी इलायची, पूर्वी इलायची, लाल इलायची। बं०—बड़ा इलाची। म०—मोठी एलची, मोठे वेलदोड़े। गु०—एलचा, मोटी एलची। तै०—पेद्दायेलकी। ता०—पेरेलम, पेरिय एलक्के। क०—डोड्डा एलाक्की। फा०—हीलकलों। अ०—काकुले कुबार, काकुले जंगी। अं०—Nepal or Greater Cardamom (नेपाल या ग्रेटर कार्डैमोग्); Amomum (अॅमोमम् )। ले०—Amomum subulatum Roxb. (एमोमम् सबुलॅटम् राक्स)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबरेसी)। इसकी खेती नेपाल, बंगाल, सिक्किम तथा आसाम के पहाड़ी मार्गों के पास में गीली भूमि में की जाती है। इसका क्षुप-आमा हल्दी के समान होता है और उसकी जड़ के नीचे कन्द रहता है। पत्रदण्ड-३-४ फुट ऊँचा होता है। पत्ते-१-२ फुट लम्बे, ३-४ इञ्च चौड़े, आयताकार-भालाकार, हरे एवं चिकने होते हैं। फूल-अवृन्तकान्डज ब्यूहों (Spike) में नलिकाकार सफेद रङ्ग के आते हैं। फल-किञ्चित लम्बाई लिये गोल, १ इञ्च तक लम्बे तथा लाल भूरे रङ्ग के होते हैं। बीज-शर्करायुक्त गाढ़े गूदे के कारण आपस में चिपके हुए अनेक बीज प्रत्येक कोष में होते हैं। १. 'चानिलकुल्लघुः' इति पाठो० अशुद्धम् ।

२२२ भावप्रकाशनिघण्टुः बड़ी इलायची की बहुत-सी उपजातियाँ भारतवर्ष में पाई जाती हैं जिनमें से (ले०) अमोमम् ॲरोमॅटिकम् राक्स (Amomum aromaticum Roxb. ); हिं०, बं०-मोरंग इलायची पूर्वी बंगाल तथा आसाम के आस-पास बहुत उत्पन्न होती है। यह बंगाल कार्डेमोम् (Bengal Cardamom) नाम से भी कही जाती है। हिमालय की तराई में आसाम तथा बंगाल के आर्द्र प्रदेशों में इसकी खेती की जाती है। इसके क्षुप-के-२-३ फीट लम्बे काण्ड, राइजोम से एक साथ गुच्छों में निकलते हैं। पुष्प-हलके पीले रंग के अवृन्तकाण्डज व्यूहों में निकलते हैं। फल-अभि- अण्डाकार या लट्वाकार करीब बड़े जायफल के इतने बड़े कुछ खुरदरे तथा ३ हिस्सों में विभक्त होते हैं। बीज-प्रत्येक कोष में अनेक तथा करीब ३ मि० मि० लम्बे होते हैं। रासायनिक संगठन- बड़ी इलायची में एक हलके पीले रंग का उडनशील तैल पाया जाता है। इस तैल में सिनिओलू (Cineol) नामक पदार्थ बहुत रहता है। गुण और प्रयोग-यह किंचित् उष्ण, पाचक, सुगन्धि, उत्तेजक एवं वातानुलोमक है। इसके गुण छोटी इलायची के सदृश हैं तथा उसके प्रतिनिधि रूप में इसका व्यवहार किया जाता है। प्राचीन ग्रन्थों में बड़ी एला का बहुत कम प्रयोग किया गया है। इलायची के स्थान में हमेशा छोटी इलायची का ही प्रयोग करना चाहिये जबतक कि विशेष रूप से बड़ी इलायची के लेने का निर्देश न हो। अनेक कड़वी, उत्तेजक तथा विरेचक औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। इसके तैल का उपयोग सुगन्ध के लिये करते हैं। मन्दाग्नि, आध्मान, शूल, अतिसार, यकृच्छोथ तथा मूत्रकृच्छ्र में इसका उपयोग किया जाता है। (१) दाँत तथा मसूड़ों के विकारों में इसके क्वाथ से कुल्ला कराया जाता है। (२) पाचन संस्थान के कुछ विकारों में जिनमें आन्त्रिक स्राव गाढ़े तथा कम हो जाते हैं इसको ५२० की मात्रा में खिलाते हैं। इससे पित्त का स्राव ठीक होकर यकृत्शोथ कम होता है। (३) मूत्रक औषध के रूप में अश्मरी में इसको खरबूजे के बीज के साथ खिलाते हैं। (४) नाड़ीशूल में २ माशे की मात्रा में इसको क्विनीन के साथ देने से लाभ होता है। मात्रा-५-१५ र० । अथैला (गुजराती इलायची) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह सूक्ष्मोपकुञ्चिका तुत्था कोरङ्गी द्राविडी त्रुटिः । एला सूक्ष्मा कफश्वासकासार्शोमूत्रकृच्छ्रहृत् । रसे तु कटुका शीता लघ्वी वातहरी मता ॥ ६३ ॥ छोटी इलायची (गुजराती इलायची) के नाम तथा गुण - सूक्ष्मा, उपकुञ्चिका, तुत्था, कोरङ्गी, द्राविडी, त्रुटि तथा सूक्ष्मका ये सब 'छोटी इलायची' के संस्कृत नाम हैं। छोटी इलायची-कफ, श्वास, कास, अर्श (बवासीर) और मूत्रकृच्छ्र इन सब रोगों को दूर करने वाली होती है तथा कटु रसयुक्त, शीतवीर्य, लघु एवं वातनाशक होती है ॥ ६३ ॥ २४ छोटी इलायची हि०-छोटी इलायची, गुजराती इलायची, चौहरा इलायची, सफेद इलायची । बं०-छोट इलायच । गु०-एलची कागदी, एलची, मलबारी एलची । म०-बारीक वेलदोडे, एलची। ते०-


कर्पूरादिवर्गः २२३ एलाकि । ता०-एलाक्के, चिन्न एलं । मा०-छोटी इलायची । क०-एलाक्कि । फा०-हीलववा, हील, खैरबवा, इलायची खुर्द, हीलउन्सा । अ०-काकुलह सिगार, शूशमीर । आं०-Cardamom Fruit (कार्डेमोम् फ्रूट ); Lesser Cardamom (लेसर कार्डेमोम् ) । ले०-Elettaria carda- momum Maton (इलेट्टेरिआ कार्डेमोमम् मेटन )। Fam. Zingiberaceae झिंज़ीबरेसी ) । यह पश्चिम तथा दक्षिण भारत में, कनारा, मैसूर, कुर्ग, वैनाड, ट्रावंकोर तथा कोचीन में आर्द्र पहाड़ी जंगलों में उत्पन्न होती है। सीलोन तथा दक्षिणी प्रायःद्वीप के चाय, कॉफी एवं रबर के बगानों में इसकी खेती की जाती है। बर्मा के जंगलों में भी यह उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-अदरख के क्षुप के समान तथा बहुवर्षायु होता है और इसकी जड़ के नीचे मोटा, मांसल तथा अनुप्रस्थ फैला हुआ राइजोम (मौमिक काण्ड ) रहता है। राइजोम से ८-२० की संख्या में सीधे, चिकने, हरे रंग के चमकीले तथा ६-९ फीट ऊँचे काण्ड निकलते रहते हैं जिन पर एकान्तरित पत्र लगे होते हैं। पत्ते-१-२ फुट लम्बे, ३ इञ्च तक चौड़े, आयताकार-भालाकार तथा कोषाकार होते हैं। पुष्पद्ण्ड-कांड के आधार भाग से १-२ फीट लम्बा पुष्पद्ण्ड निकला रहता है जो जमीन पर फैला रहता है। पुष्प-पुष्पव्यूहों में तथा किंचित् नील लोहिताभ वर्णयुक्त छोटे-छोटे होते हैं। पंखड़ियों के ओष्ठ श्वेत होते हैं। फल-हलके पीले या हरिताभ पीत रङ्ग के, १-२ से० मि० लम्बे, अण्डाकार, बड़े फल कुछ तिकोने, ३ कोषवाले, अनेक महीन खड़ी धारियों से युक्त सामान्य स्फोटी फल (Capsule) होते हैं जिनका स्फुटन पाश्विक सन्धियों (Loculici- dal) पर होता है। बीज-फलों के अन्दर अनेक छोटेबीज होते हैं जो प्रत्येक कोष में दो-दो कतारों में एवं अक्षलक्ष्य जरायु से लगे हुए एक साथ रहते हैं। यह हलके या गहरे रक्ताभ भूरे रङ्ग के, ४ मि० मि० लम्बे, ३ मि० मि० चौड़े, अनियमित कोण युक्त, कड़े एवं ६-८ आड़ी झुर्रियों (Rug- ae-रूगी) से युक्त होते हैं। प्रत्येक बीज महीन वर्णहीन आवरण (Aril-ॲरिल्) से युक्त रहता है। इसका स्वाद कुछ कटु तथा शीतल एवं गन्ध मनोहर होती है। इलायची के प्रयोग के समय ही उसके बीजों को निकालना चाहिये। निकाल कर रखे हुए बीज खराब हो जाते हैं। भेद-(१) मैसूरी इलायची ही अधिकतर बिकती है। यह अण्डाकार, १०-२० मि० मि० लम्बी, हलके क्रीम के रंग की, करीब-करीब चिकनी तथा मजबूत रहती है। यह मलाबारी इला- यची की अपेक्षा अधिक टिकाऊ रहती है। (२) मलबारी इलायची कुछ छोटी, कम चौड़ी, मरी हुई एवं लम्बाई में झुर्रीदार रहती है। (३) मंगलोरी इलायची, मलबारी इलायची की ही तरह होती है किन्तु यह गोल, बड़ी तथा इसकी सतह खुरदरी होती है। (४) अलेप्पी इलायची, मलबारी इलायची की ही सदृश किन्तु हरी या हरिताभ पीत रङ्ग की रहती है। रासायनिक संगठन-छोटी इलायची के बीजों में ३-८% एक उड़नशील तैल पाया जाता है जिसमें प्रधान रूप में टर्पीनीन (Terpinene ) एवं टर्पिनिओल (Terpineol ) रहते हैं। इसमें टर्पिनिल अॅसिटेट (Terpinyl acetate ) एवं अल्प मात्रा में सीनिओल् (Cineol ) भी पाये जाते जाते हैं। उड़नशील तैल के अतिरिक्त बीजों में ३-४% स्टार्च, नाइट्रोजन युक्त गोंद एवं पीत रंजक द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-छोटी इलायची दीपन, पाचन, रोचन, मूत्रल, वातानुलोमक, उत्तेजक एवं सुगन्धि है। अन्य सुगन्धि पदार्थों के साथ वातानुलोमक औषधों में तथा विरेचक औषधों के साथ मरोड़ न हो इसलिये इसका उपयोग किया जाता है। पाश्चात्य चिकित्सा में जोरा, दारुचीनी,

२२४ भावप्रकाशनिघण्टुः कोचीनेल (इन्द्रगोप) एवं ग्लीसरीन के साथ छोटी इलायची का बना हुआ मद्यसारीय टिंक्चर औषधों को सुगन्धित एवं रंजित करने के लिये बहुत व्यवहार में लाया जाता है। छोटी इलायची का उपयोग श्वास, कास, क्षय, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, अजीर्ण, अतिसार, आध्मान एवं उदर शूल में किया जाता है। (१) पचन नलिका के शिथिलता प्रधान रोगों में तथा दाहयुक्त रोगों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। आंत्रिक रस की उत्पत्ति कम होती हो तथा पित्त का उचित रूप से स्राव न होता हो ऐसी अवस्थाओं के लिये यह अमूल्य औषध है। वमन तथा हृल्लास में इसका फांट पिलाते हैं। उदर शूल, आध्मान एवं मरोड आदि में इलायची २ ड्राम, धनियां २ ड्राम, दालचीनी ४ ड्राम, मुनक्का १ औंस, रक्त चन्दन २ ड्राम एवं मद्यसार (४५%) १ पांइट इसका टिंक्चर २-८ बूंद देने से बहुत लाभ होता है। केले के अजीर्ण में इलायची का उपयोग किया जाता है। आंव तथा प्रवाहिका में मक्खन के साथ इसका चूर्ण खिलाया जाता है। यकृत शोथ में ५ र० की मात्रा में इससे बहुत लाभ होता है। (२) वृक्क के पीडायुक्त विकारों में खरबूजे के बीज के साथ इसे खिलाते हैं। इससे मूत्र की मात्रा बढ़ती है। सोजाक में तथा वाजीकरण के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। मूत्रकृच्छ्र में आंवले के रस के साथ या दही के पानी के साथ इसका चूर्ण लाभदायक होता है। (३) नेत्र रोगों में इसके सूक्ष्म चूर्ण को बकरी के मूत्र की भावना देकर अञ्जन कराया जाता है। (४) हृदय की धड़कन में पिप्पलीमूल के साथ इसको घी में मिला कर खिलाते हैं। गुल्म में भी इससे लाभ होता है। (५) नाडीशूल में १५ र० की मात्रा में छोटी इलायची का चूर्ण थोड़ी सी क्विनीन के साथ मिला कर देने से बहुत लाभ होता है। मस्तिष्क तथा वातनाड़ियों की थकावट में यह लाभदायक होती है। (६) चक्कर आते हों तो छिलके सहित इसका क्वाथ गुड़ मिला कर पिलाया जाता है। प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण- लंका से आने वाली एक जंगली छोटी इलायची होती है जो कुछ लम्बी, सिकुड़ी हुई एवं गहरे धूसरित भूरे रंग की होती है। इसके बीजों में करीब ४ झुर्रियां होती हैं। एक अन्य अमोमम् केपुलेगा रंग्गे, बर्कि (Amomum kepulaga Sprague & Bur- kill) नामक क्षुप से प्राप्त इलायची के बीजों में कपूर की तरह स्वाद रहता है तथा उसमें करीब १४ खण्डित झुर्रियां रहती हैं। इसमें बूरा लगी हुई, अपक्व, कीड़ों द्वारा खाई हुई एवं फटी हुई इलायची का व्यामिश्रण रहता है। मात्रा— चूर्ण ५-१५ रत्ती ।

अथ त्वक्पत्रम् (तज)। तस्य नामानि गुणांश्चाह

त्वक्पत्रञ्च वराङ्गं स्याद् भृङ्गं चोचं तथोत्कटम् । त्वचं लघूष्णं कटुकं स्वादु तिक्तञ्च रूक्षकम् ॥ पित्तलं कफवातघ्नं कण्डूवाम्यहृचिनाशनम् । हृद्वस्तिरोगवातार्शः कृमीपोनसशुक्रहृत् ॥ ६५ ॥ तज के नाम तथा गुण— त्वक्पत्र, वराङ्ग, भृङ्ग, चोच, उत्कट और त्वच ये सब 'तज' के संस्कृत नाम हैं। तज-लघु, उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्त रस युक्त, स्वादिष्ट और रूक्ष होती है एवं


कर्पूरादिवर्गः २२५ यह पित्त उत्पन्न करने वाली, कफ तथा वात को दूर करने वाली, खुजली, आम, अरुचि, हृद्रोग, बस्तिसम्बन्धी रोग, वात, अर्श, कृमि, पीनस तथा शुक्र का भी नाश करने वाली होती है ॥६४-६५॥ तज— दालचीनी का ही एक भेद है। दालचीनी के अनेक जातियों के वृक्ष पाये जाते हैं। लंका से आने वाली दालचीनी पतली छाल वाली होती है जो सबसे अच्छी होती है। इसके वृक्ष को (लॅ.) सिनेमोमम झैलैनिकम् कहते हैं। उसका वर्णन आगे स्वतंत्र किया गया है। एक दालचीनी चीन देश से आती है जिसके वृक्ष को (लै.) सिनेमोमम् कॅशिया कहा जाता है। इसी के जाति का एक वृक्ष भारतवर्ष में पाया जाता है जिसे (लै.) सिनेमोमम् तमाल कहते हैं। इसी की छाल को कुछ लोग तज कहते हैं तथा इसके पत्तों को तमालपत्र (तेजपत्र) कहते हैं। इसको कहीं-कहीं दालचीनी नाम से ही या असली सिंगापुरी दालचीनी में मिलावट करके बेचते हैं क्योंकि सिंगापुरी दालचीनी बहुत मंहगी होने के कारण बजार में कम आती है। इसके अनेक जाति के वृक्ष होने के कारण भिन्न-भिन्न लेखकों ने दालचीनी, तज तथा तमालपत्र इनके लैटिन नाम अलग-अलग दिये हैं। प्रायः मोटी छाल को तज एवं पतली छाल को दालचीनी कहा जाता है। तेजपत्र और तज एक ही वृक्ष के छाल और पत्र हैं। कुछ इन्हें अलग-अलग वृक्षों के मानते हैं। यहां पर वर्णन चीनी दालचीनी का किया जा रहा है। तेजपत्र तथा असली दालचीनी का आगे स्वतंत्र वर्णन किया गया है। कुछ लोग मोटी जाति की तज को नालुका नाम से भी बेचते हैं जिसका लेपादि में बहुत व्यवहार किया जाता है।

२५ तज

हि०, गु०, उर्दू- तज । वं०- दालचीनी । म०, उड़िया- दालचीनी । पं०- लुरुण्ड । तां०, मलं०- लवंगपत्ते । अं०- Cassia cinnamon (कॅशिया सिनॅमोन्), Chinese cassia (चाइनीज कॅशिया)। लै०- Cinnamomum cassia, Blume (सिनॅमोमम् कॅशिया, ब्लूम)। Fam. Lauraceae (लॉरेसी) । चीन एवं बर्मा में अवा नामक स्थान में इसकी खेती की जाती है। इसका वृक्ष चिकना तथा सदाइरित होता है। पत्ते- आयताकार-भालाकार या भालाकार, पतले ६-८ मि. मि. लम्बे पर्णवृन्त से युक्त, तीन नाडियों से युक्त, फलक मूल की तरफ कुछ संकु- चित होते हुये, ३-४ इञ्च लम्बे, सम्बाध युक्त, चर्मवत् एवं अस्पष्ट नाड़ीजाल से युक्त होते हैं। पुष्प- छोटे तथा परिपुष्प (Perianth) के बराबर या कुछ अधिक लम्बे तथा पतले पुष्पवृन्त (Pedicle) से युक्त, बहुव्यर्यक्ष सवृन्तकाण्डज पुष्पव्यूहों में, पत्र के अक्ष में या छोटी शाखाओं के अन्त में रहते हैं। परिपुष्प करीब ३ मि. मि. लम्बे तथा कुछ सिल्क के समान रहते हैं जिनके दल (पंखुड़ियां) आयताकार भालाकार होते हैं। फल- मटर के बराबर, चिकने, अण्डाकार एवं रसदार अष्ठिफल (Drupes) होते हैं। परिपुष्पासन बहुत बड़ा हुआ नहीं होता तथा वह ६ खण्डों में विभक्त रहता है जिनके अग्र कटे हुये मालूम पड़ते हैं या प्रायः खण्ड पूर्ण रूप में स्थायी रहते हैं। इसके काण्ड की सूखी हुई छाल को चीनी दालचीनी कहते हैं। यह २-४० से. मि. लम्बी तथा मुडी होती है। बाहर से यह हल्के धूसर भूरे रंग की, करीब-करीब चिकनी तथा कुछ आड़ी झुर्रियों से युक्त रहती है। अन्दर से यह रक्ताभ भूरे रंग की एवं रेशेदार होती है। इसे तोड़ने से मद्य छोटा तथा असम होता है। इसकी गन्ध मनोहर एवं स्वाद उष्ण, मधुर तथा सुगन्धि रहता है। रासायनिक संगठन- इसमें ०'८% उड़नशील तैल, ४% राल, १४.६% गोंद युक्त निस्सार (टैनिन सहित), ६४.३% लिगनिन (Lignin) तथा बैस्सोरिन (Bassorin), १६.३% जल 15 एवं रंजक द्रव्य ये पदार्थ पाये जाते हैं। १५ भा० नि०

२२६ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग- चीनी दालचीनी बहुत ही आह्लादकारक एवं फलप्रद सुगन्धि द्रव्यों में से है। यह उष्ण, आमाशय के लिये उत्तेजक, वातानुलोमक एवं ग्राही है। यह सार्वदैहिक उत्तेजक की अपेक्षा स्थानिक उत्तेजक है। यद्यपि इसका स्वतंत्र प्रयोग कम किया जाता है तथापि इसके फांट या चूर्ण से हृल्लास दूर होता है तथा आध्मान में लाभ होता है। अतिसार में अन्य ग्राही औषधों के साथ तथा अन्य अनेक मिश्रणों में सहायक द्रव्य के रूप में इसका व्यवहार किया जाता है। मात्रा-२३-१० २०। अथ दारुसिता (दालचीनी)। तस्या नामानि गुणांश्चाह त्वक्स्वाद्दी तु तनुत्वक्त्स्यात्तथा दारुसिता मता ॥ ६६ ॥ उक्ता दारुसिता स्वाद्दी तिक्ताचानिलपित्तहृत् । सुरभिः शुक्रलाबल्या मुखशोषतृषापहा ॥ ६७ ॥ दालचीनी के नाम तथा गुण- त्वक्, स्वाद्दी, किंवा त्वक्स्वाद्दी, तनुत्वक् तथा दारुसिता ये सब 'दालचीनी' के संस्कृत नाम हैं। दालचीनी-स्वादिष्ट, तिक्तरसयुक्त, वातपित्तनाशक, सुगन्धयुक्त, शुक्रजनक, बलकारक, ('वण्या' पाठान्तर में-शरीर के रङ्ग को सुन्दर करने वाली), मुखशोष तथा तृषा को दूर करने वाली होती है ॥ ६६-६७ ॥ २६ दालचीनी हि०-दालचीनी, दारचीनो । बं०-दारुचीनी । म०-दालचीनो । गु०-तज। ते०, मळ०-लवंग पत्ते । ता०-कद्रलवंग पत्ते । अ०-दारसीनी, किर्फा । फा०-दारचीनी । अं०-Cinnamon Bark (सिनेमोन् बार्क)। ले०-Cinnamomum Zeylanicum Blume (सिन्नेमोमम् झेलैनिकम्, ब्लूम) । Fam, Lauraceae (लॉरेसी)। इसके वृक्ष लंका तथा दक्षिणी भारत में पाये जाते हैं। लंका, दक्षिण भारत, मार्टिनिक्यू, कैने, जमेका, ब्राझील तथा सेचिलीस में इसकी खेती की जाती है। इसका वृक्ष-साधारण ऊंचाई का एवं सदा हरित होता है। छाल-कुछ मोटी, चिकनी तथा हल्के रंग की होती है। छोटी शाखाएं कुछ दबी हुई एवं नये भाग चिकने रहते हैं किन्तु कलिकाएं महीन सिल्क की तरह रहती हैं। पत्ते-प्रायः विपरीत, कड़े तथा चर्मवत, ३-८ इञ्च लम्बे, १॥-३ इञ्च चौड़े, अण्डाकार या लट्वाकार-भालाकार, नुकीले अग्रयुक्त, चिकने, ऊपर से चमकीले किन्तु नीचे से कुछ हल्के एवं फलकमूल की तरफ तीक्ष्ण या गोलाई लिये हुए होते हैं। नाड़ियां-३-५ प्रधान नाड़ियां रहती हैं जिनके बीच महीन जालीदार नाड़ियां रहती हैं। पर्णवृन्त- ३-१ इञ्च लंबा तथा ऊपर से चपटा रहता है। पुष्प-बहुत एवं प्रायः पत्तों से लंबे सवृन्तकाण्डज पुष्पव्यूहों में जो सिल्क की तरह मृदुरोमश होते हैं। पुष्पदंड (Peduncle) लंबे, प्रायः एक साथ गुच्छों में, चिकने या मृदुरोमश एवं पुष्पवृन्त (Pedicle) लम्बे होते हैं। परिपुष्प ५-६ मि० मि० लंबे; नलिका १ इञ्च लम्बी एवं दल मृदुरोमश, आयताकार या कुछ अभि-लट्‌वाकार, एवं प्रायः कुण्ठिताग्र रहते हैं। फल-१२.३-१७ से० मि० लंबे, आयताकार या लट्वाकार- आयताकार, शुष्क या किंचित मांसल, गहरे बैगनी रंग के एवं ८ मि० मि० व्यास के संवृद्ध घंटिकाकार परिपुष्प से घिरे हुये रहते हैं। १. वण्यां इति पाठः । कर्पूरादिवर्गः २२७ इस वृक्ष के झाड़ियों को काटने के बाद उत्पन्न नवीन प्ररोहों की सूखी हुई अन्दर की छाल को औषध के लिये लिया जाता है। इसे सीलोनी दालचीनी कहा जाता है। यह सर्वोत्तम दालचीनी होती है। इसकी एक साथ बंधी हुई लंबी जुड़ियां आती हैं। बाह्य सतह हल्के पीताभ भूरे रंग की एवं लंबाई में लहरदार रेखाओं से युक्त तथा प्रायः छोटे दागों या छिद्रों से युक्त होती है। अन्दर से यह गहरे रंग की एवं लम्बाई में हल्की धारियों से युक्त होती है। यह बहुत ही पतली, ०.५ मि० मि० मोटी एवं आसानी से टूटने वाली होती है। इसमें मनोहर गन्ध रहती है तथा इसका स्वाद उष्ण, मधुर एवं सुगन्धि रहता है। रासायनिक संगठन- सिलोनी दालचीनी में ०.५-१% उड़नशील तैल, टैनिन तथा गोंद ये पदार्थ पाये जाते हैं। दालचीनी का तैल नया रहने पर हल्के पीले रंग का रहता है जो पुराना होने पर रक्ताभ भूरे रंग का हो जाता है। इसमें दालचीनी जैसी ही गन्ध एवं स्वाद रहता है। इस तैल में ६०-७५% सिनेमैल्डिहाइड (Cinnamaldehyde), करीब १०% यूजेनॉल (Eugenol) एवं अल्प मात्रा में मेथिल्-एन्-अँमिल् कीटोन (Methyl-n-amyl ketone ), पी-साइमीन (p-cymene ), एल्-फेलैन्ड्रीन (l-phellandrene), एल्-अंल्फा-पिनीन (l-a-pinene), एल्-लिनैलूल (l-linalool), क्यूमिक अॅल्डिहाइड (Cumic aldehyde ), नोनिल् अॅल्डिहाइड (Nonyl aldehyde ), कँर्योफाइलीन (Caryophylline) एवं ब्यूट्रिक अॅसिड के ईस्टर (Esters of butyric acid ) ये पदार्थ पाये जाते हैं । दालचीनी के पत्तों में भी किञ्चित गहरे रंग का एक उड़नशील तैल पाया जाता है। लेकिन यह तैल दालचीनी के तैल से बिलकुल भिन्न है। इसमें कुछ लौंग जैसी तीव्र गन्ध आती है तथा आमवातादि में इसकी मालिश की जाती है। इसमें ७०-९५% यूजेनॉल रहने के कारण लौंग के तैल सदृश इसका उपयोग किया जा सकता है। दालचीनी के तैल में पत्तों के तैल की मिलावट की जाती है जिसकी पहचान उसमें की बढ़ी हुई यूजेनॉल की मात्रा एवं घटी हुई सिनेमिक् अॅल्डिहाइड की मात्रा से की जा सकती है। इसमें रासायनिक विधि द्वारा निर्मित सिनेमिक् अॅल्डिहाइड की मिलावट करते हैं जिसकी पहचान उसमें के क्लोरीन की उपस्थिति, बढ़े हुये विशिष्ट गुरुत्व, भुजायन देशना (Refractive index) एवं अॅल्डिहाइड से की जा सकती है। गुण और प्रयोग- दालचीनी उष्ण, सुगन्धि, वातानुलोमक, साधारण ग्राही, दीपन, पाचन, उत्तेजक, गर्भाशय उत्तेजक, स्तम्भन, शोणितस्थापक, श्वेतकणवर्धक, आक्षेपहर एवं कृमिघ्न है। दालचीनी का तैल वातानुलोमक, प्रतिदूषक, उत्तेजक, आर्त्तवप्रवर्त्तक, वातहर, वेदनाहर, व्रणशोधक एवं व्रणरोपक है। (१) यह उत्तम दीपन होने के कारण इससे आमाशय रस की वृद्धि होकर अन्न का पाचन ठीक होता है तथा वायु का अनुलोमन होता है। आमाशय के रोगों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। आध्मान, मरोड़, आमाशयिक शूल एवं वमन में इसके तैल को मिश्री के साथ खिलाते हैं। हृल्लास एवं वमन में इसकी चूसने से या इसके क्वाथ से लाभ होता है। अतिसार, पुरानी आंव एवं ग्रहणी आदि में इसके क्वाथ से शौच कम होता है, वायु नहीं होता एवं पचननलिका को बल मिलता है। आन्त्रिक ज्वर (Typhoid) में आन्त्रिक प्रतिदूषक औषध के रूप में अन्य औषधों के साथ इसके तैल को देते हैं। इससे आध्मान नहीं होता । (२) राजयक्ष्मा दण्डाणु के उपसर्ग में तैल का व्यवहार किया जाता है। सिनेमिक् एसिड का परिणाम इन जन्तुओं पर होता है। क्षयजव्रण पर इसको लगाते हैं।

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२२८ भावप्रकाशनिघण्टुः

(३) गर्भाशय उत्तेजक होने के कारण प्रसूति के समय आवि वृद्धि के लिये पिपरामूल एवं भांग के साथ इसका प्रयोग करते हैं। अत्यार्तव में गर्भाशय की शिथिलता कम करने के लिये अशोक के साथ इसे देते हैं।

(४) रक्तस्राव में इसके क्वाथ से लाभ होता है। फुफ्फुस एवं गर्भाशय से रक्तस्राव में इसका प्रयोग करते हैं।

(५) प्रतिश्याय तथा एन्फ्लुएंजा में इसके तैल को मिश्री के साथ या कॅपसूल में भरकर खिलाते हैं तथा रुमाल पर डालकर सूंघने को देते हैं।

(६) इसके तैल को दांत के गढ़े में रखने से दर्द दूर होता है। नाडीशूल एवं जिह्वा के लकवे में इसका प्रयोग किया जाता है। चूसने वाली गोलियों में सुगंध द्रव्य के रूप में इसका उपयोग किया जाता है।

(७) बड़ी मात्रा में दालचीनी का उपयोग कैन्सर में किया गया है। औषध के अतिरिक्त मसालों में इसका बहुत प्रयोग करते हैं। तैल को सुगंध द्रव्य रूप में बहुत व्यवहार करते हैं तथा औषध संरक्षण के रूप में भी कभी-कभी व्यवहार किया जाता है।

मात्रा— चूर्ण २ई–१० र०; तैल १–३ बूंद।


अथ पत्रकम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह

पत्रं तमालपत्रञ्च तथा स्यात्पत्रनामकम् । पत्रकं मधुरं किञ्चित्तीक्ष्णोष्णं पिच्छिलं लघु ॥ निहन्ति कफवाताशौहल्लासारुचिपीनसान् ॥ ६८ ॥

तेजपात के नाम तथा गुण— पत्र, तमालपत्र, पत्रनामक (अर्थात् पत्रवाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाची हैं) एवम् पत्रक ये सब 'तेजपात' के संस्कृत नाम हैं। तेजपात–मधुर रसयुक्त, किञ्चित् तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, पिच्छिल और लघु होता है एवम् यह कफ, वात, अर्श, हल्लास (उबकाई), अरुचि तथा पीनस इन सबों को दूर करने वाला होता है ॥ ६८ ॥


२७ तेजपात

हि०— तमालपत्र, पत्रज, तेजपत्ता, तेजपत्र, गुरन्द्रा । बं०— तेजपत्र । म०— तमालपत्र । ते०— आकुपत्री, तालीस पत्री । ने०— चेटा सिंकौली । गु०— तमालपत्र । आसा०— दोपती । ता०— कटड्डु-करुवपत्तै । अ०— साजजेहिन्दी । ले०Cinnamomum tamala Nees & Eberm (सिर्नमोमम् तमाल नीज, एवर्म)। Fam. Lauraceae (लॉरेसी)।

इसका वृक्ष हिमालय में ३ से ७ हजार फीट की ऊंचाई पर पाया जाता है। मौतारगढ़ में ये समुद्बद्ध होकर बहुत अधिक संख्या में पाये जाते हैं। पूर्वी बंगाल तथा खासिया एवं जैन्तिया पहाड़ियों पर तथा बर्मा में भी पाये जाते हैं।

इसका वृक्ष मध्यमाकार का, करीब २५ फीट ऊंचा, साढ़े चार फीट के घेरे में एवं सुगन्धयुक्त होता है और वह बारहो मास हरा भरा रहता है। छाल-पतली, शिकनदार, खुरदरी, गहरे भूरे रंग की वा कृष्णाभ होती है। काट-आधा इञ्च मोटा, गुलाबी या ललाई लिये हुये भूरे रंग का और बाहर की ओर श्वेत रेखांकित होता है। पत्ते–प्रायः ५–८ इञ्च लम्बे, २–३ इञ्च चौड़े, लट्ट्वाकार–आयताकार या–भालाकार, नोकदार, चिकने, चर्मवत, विपरीत या एकान्तर तथा आधार से अग्रतक ३ शिराओं से युक्त एवं ७.५–१३ मि० मि० लम्बे पर्णवृन्त से


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कर्पूरादिवर्गः २२६

युक्त होते हैं। नवीन पत्तियां कुछ-कुछ गुलाबी रंग की रहती हैं। फूल–७.५ मि० मि० लंबे, हल्के पीताभरंग के, ५–१५ से० मी० लंबे सवृन्तकाण्डज पुष्पव्यूहों (Panicles) में रहते हैं। परिपुष्प खंड ६, आयताकार, सिल्क की तरह मृदुरोमश जो पुष्पित होने पर मध्य के नीचे से टूट जाते हैं। पूर्ण पुंकेसर ९ रहते हैं। फल–आध इंच लंबे, अंडाकार, मांसल एवं काले रंग के रहते हैं। ये फल कुछ बढ़े हुये परिपुष्प नाल पर लगे रहते हैं जिनके परिपुष्प खंड अग्रपर कटे हुए (Truncated) मालूम पड़ते हैं।

इसके सूखे हुए अपक्व फल का काला नागकेशर नाम से दक्षिण भारत में व्यवहार होता है। अर्श के लिए यदि नागकेशर का प्रयोग करना हो तो इसका प्रयोग अधिक उचित मालूम होता है क्योंकि तमाल पत्र के शास्त्रीय गुणों में अर्श का उल्लेख मिलता है।

इसकी छाल को हि०–तज, बं–दालुका तथा अ०–मलीखा कहते हैं। यही भारतीय दालचीनी है जिसको सिलोनी दालचीनी के स्थान पर या मिलावट के रूप में उपयोग में लाते हैं। इसी के पत्ते तेजपात या तमालपत्र नाम से अधिकतर बेचे जाते हैं। कुछ लोगों के मत से तेजपात तथा तज अलग-अलग वृक्षों के पत्ते तथा छाल हैं। इसकी छाल सिलौनी दालचीनी की अपेक्षा मोटी, तेजी में कम तथा जल के साथ पीसने से पिच्छिलता युक्त हो जाती है। नवीन मत से सिलौनी तथा चीनी दालचीनी के गुण पहले लिखे जा चुके हैं तथा भारतीय के गुणों में नवीन दृष्टि से कोई विशेष अन्तर न होने के कारण इनको अलग नहीं लिखा है।

नोट :– भावप्रकाशकार त्वक्पत्र (तज) के गुणों में 'पित्तलं' तथा 'शुक्रहृत्' लिखते हैं। दारुसिता (सिलोनी दालचीनी) के गुणों में 'पित्तहृत्' एवं 'शुक्रला' लिखते हैं। दारुसिता के अन्य नाम 'स्वादी', 'तनुत्वक्' लिखे हैं जिससे दारुसिता यह सिलोनी दालचीनी होगी ऐसा लगता है। इस दृष्टि से सिलोनी तथा भारतीय दालचीनी के गुण भावप्रकाशकार के मत से बिलकुल अलग हैं। भावप्रकाशोक्त तीसरे द्रव्य पत्रक (तेजपात) के गुण त्वक्पत्र से मिलते-जुलते हैं। इससे ऐसा मालूम होता है कि त्वक्पत्र (तज, भारतीय दालचीनी) के वृक्ष के पत्ते ही तेजपत्र हैं।

रासायनिक संगठन— इसमें एक प्रकार का लौंग के समान गन्ध वाला उड़नशील तैल पाया जाता है।

गुण और प्रयोग— तेजपत्र उष्ण, लघु, वातहर, दीपन, स्वेदजनन, मूत्रजनन तथा उत्तेजक हैं। इसका प्रयोग कफ, वात, अर्श, हल्लास, अरुचि एवं पीनस में किया जाता है। कुपचन, उदरस्थवायु, उदरशूल एवं अतिसार आदि पाचननलिका के रोगों में, सब तरह के कफविकारों में एवं गर्भाशय की शिथिलता में इसका उपयोग करते हैं। गर्भाशय की शिथिलता दूर होकर गर्भाधान होने के लिये तथा गर्भस्राव न हो इसलिये इसका प्रयोग करते हैं। यह वातहर होने के कारण बच्चों के सभी प्रकार के रोगों में एवं आमवात में इसको खिलाते हैं।

मात्रा— १-४ माशा ।


अथ नागकेशरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह

नागपुष्पः स्मृतो नागः केशरो नागकेशरः । चाम्पेयो नागकिञ्जल्कः कथितः काञ्चनाह्वयः ॥

नागकेशर के नाम तथा गुण— नागपुष्प, नाग, केशर, नागकेशर, चाम्पेय, नागकिञ्जल्क तथा काञ्चनाह्वय (काञ्चन के वाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाची हैं) ये सब पुँल्लिङ्गी शब्द 'नागकेशर' वृक्षवाची हैं ॥ ६९ ॥

२३० भावप्रकाशनिघण्टुः क्लीवं पुष्पे तु क्लीवे ॥ ६९ ॥ किन्तु यहाँ पर यह भी समझना चाहिये कि यदि उक्त सभी शब्द नपुंसकलिंगी हों तो 'नागकेसर के पुष्प' को कहने वाले होते हैं ॥ ६९ ॥ नागपुष्पं कषायोष्णं रूक्षं लघ्वामपाचनम् ॥ ७० ॥ ज्वरकण्डूतृषास्वेदच्छर्दिहृल्लासनाशनम् । दौर्गन्ध्यकुष्ठवीसर्पकफपित्तविषापहम् ॥ ७१ ॥ नागकेशर (नागकेशर का फूल) - कषायरसयुक्त, उष्णवीर्य, रूक्ष, लघु तथा आम को पचाने वाला होता है एवं यह ज्वर, खुजली, तृषा, पसीना, वमन, हृल्लास, दुर्गन्ध, कुष्ठ, विसर्प, कफ, पित्त और विष को दूर करने वाला होता है ॥ ७०-७१ ॥ २८ नागकेसर (१) हि०-नागकेसर, नागेसर, पीला / नागकेशर, नागचम्पा । बं०-नागेश्वर । म०-नागकेसर, नागचांफा (वृक्ष) । गु०-पीळु नागकेसर । क०-नागसम्पिगे । ते०-नागकेसरमु । ता०-चेरू नगपू । अ०-मिस्रूरुम्मान । फा०-नारेमुश्क । अं०-Cobra's Saffron (कोबराज सैक्रॉन) । ले०-Mesua ferrea Linn. (मेसुआ फेरिआ लिन) । Fam. Guttiferae (गटिफेरी) । यह पूर्वी हिमालय, आसाम, बङ्गाल, दक्षिण हिन्दुस्तान और पूर्व बंगाल के पहाड़ों पर पाया जाता है । इसको बगीचों में भी लगाया जा सकता है । इसका छोटा सुन्दर वृक्ष होता है और वह सदा हराभरा रहता है। स्तम्भ-सीधा, छाल- चिकनी और राख के रङ्ग की होती है । पत्ते-विपरीत, ३ से ५ इञ्च तक लम्बे तथा १-१।। इञ्च चौड़े, आयताकार-भालाकार एवं तीक्ष्णाग्र युक्त होते हैं । इनका ऊपरी पृष्ठ चमकीला और नीचे का श्वेताभ तथा रज से आवृत होता है। शिराएँ सघन और स्पष्ट होती हैं। नये पत्ते लाल रंग के होते हैं । फूल-१ से ३ इञ्च के घेरे में सफेद रङ्ग के सुगन्धयुक्त वसन्त ऋतु में आते हैं । इनमें अन्तर्दल चार होते हैं। इन्हीं फूलों के भीतर के पीले केसरिया रंग के नरकेसर के गुच्छ को नागकेसर कहते हैं। यही असली (पीला) नागकेशर है जिसका औषध में व्यवहार करना चाहिये। फल-एक इञ्च से बड़े, अंडाकार तथा कुछ तुर्कीके एवं प्रवृद्ध बाह्यदल से घिरे हुये होते हैं। एक-एक फल से १ से ४ तक चिकने, कोणयुक्त एवं भूरे रंग के बीज निकलते हैं। नोट-नागकेसर के सम्बन्ध में लोगों में भ्रम है । अधिकांश विद्वानों ने उपर्युक्त मेसुआ फेरिआ के पुष्पों के नरकेसर गुच्छ को नागकेसर माना है जिसके गुण एवं प्रयोग यहाँ दिये गये हैं । इसी वर्ग के दक्षिण की तरफ होने वाले वृक्ष ओक्रोकार्पस लोंगिफोलियस (Ochrocarpus longifolius) की पुष्प-कलिकाओं को लाल नागकेशर के नाम से बेचा जाता है। इसी प्रकार काला नागकेशर के नाम से भारतीय या चीनी दालचीनी के फल बेचे जाते हैं जिसके गुण दालचीनी के समान ही होते हैं। एक बात ध्यान देने की यह है कि नागकेसर के शास्त्रीय गुणों में अर्श का उल्लेख नहीं है। चरक में तथा व्यवहार में रक्तार्श के लिये इसका प्रयोग मिलता है। तज के गुणों में अर्श का उल्लेख है तथा उसके फल का उपयोग काला नागकेशर नाम से व्यवहार में कहीं-कहीं आता है। मेसुआ फेरिआ के गुणादि के पश्चात् ओक्रोकार्पस् लोंगिफोलियस का वर्णन किया गया है। रासायनिक संगठन-इसके फलों में एक तैलीय राल रहती है जिससे सुगंधित, हल्के पीले रंग का एक उड़नशील तेल प्राप्त होता है। कठोर फलभित्ति में टैनिन रहता है। बीजों कर्पूरादिवर्गः २३१ में एक स्थिर तैल पाया जाता है। राल मद्यसार में कम घुलती है लेकिन बेन्झॉल में संपूर्णतया घुलती है। इसके अतिरिक्त इसमें दो कड़वे पदार्थ भी पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-नागकेसर संग्राहक, गर्भस्थापक, किंचित् उष्ण, रक्तसंग्राहक, आमपाचक एवं दीपक है। इसकी छाल तथा मूल तिक्त एवं सुगन्धि हैं। इसकी छाल कुछ संग्राहक होती है। इसके कच्चे फल सुगन्धि, कटु तथा विरेचक होते हैं। (१) रक्तार्श में मक्खन तथा मिश्री के साथ इसे खिलाने से रक्त गिरना बन्द हो जाता है । शतधौत घृत में मिलाकर इसमें लेप भी किया जाता है । (२) गुद द्वार की जलन, रक्तातिसार, वमन, हिका, तृष्णा, रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर एवं अति- स्वेद आदि में नागकेसर का प्रयोग करते हैं। (३) बहुत कफयुक्त खांसी में इसे देते हैं । (४) अतिस्वेद में इसका लेप या इसके सूक्ष्म चूर्ण का भी बाह्य प्रयोग किया जाता है । (५) इसकी छाल एवं मूल का क्वाथ खांसी एवं आमाशय प्रक्षोभ (Gastritis) में दिया जाता है । (६) तीव्र प्रतिश्याय में इसके पत्तों का उपनाह सर पर लगाते हैं । (७) इसके बीजों का तैल शरीर की पीड़ा, जोड़ों में दर्द तथा खुजली (पामा) एवं अन्य चर्मरोगों में लगाया जाता है । (८) इसके पत्ते तथा फूलों का उपयोग बिच्छू एवं सर्पदंश में किया जाता है । (९) हाथ-पैरों की जलन में नागकेशर को शतधौत घृत में मिलाकर लगाने से जलन दूर होती है । मात्रा - ४ र० से १ माशा । लाल नागकेशर (२) सं०-सुरपुन्नाग, नमेरु, सुरपर्णिका । हि०-लाल नागकेशर । म०-सुरंगी (वृक्ष), गोडी उंडी (फल), तांबडे नागकेशर । गु०-रांतु नागकेशर । अं०-Alexandrian Laurel (अॅलेक्झं- न्ड्रियन् लॉरेल ) । ले०-Ochrocarpus longifolius Benth. & Hook. f. (ओक्रोकार्पस् लाँगिफोलिअस् बेन्थ, हुक्) । Fam. Guttiferae (गटिफेरी) । यह पश्चिम प्रायद्वीप के जंगलों में कनारा से कोंकण तक पाया जाता है। उत्तरी सरकार में यह लगाया हुआ मिलता है । इसका वृक्ष साधारण ऊँचा तथा सदाइरित होता है। पत्ते-५-८ इंच लम्बे, १।।-२।। इंच चौड़े, आयताकार, मोटे, चर्मवत् एवं सुन्दर शिराजाल से युक्त होते हैं। पुष्प-अनेक, ४ अन्तर्दल वाले, लाल रेखांकित, श्वेत रंग के, गुच्छों में आते हैं। फल-१ इंच लंबे, अण्डाकार, नुकीले तथा एक बीज से युक्त होते हैं। फलों के गूदरे को लोग खाते हैं। सूखी हुई पुष्पकलिकाओं को लाल नागकेशर कहा जाता है। यह गोल, नुकीले, नारंगरक्त रंग के तथा करीब ३ इंच लम्बे पुष्पवृन्त से युक्त होते हैं। गुण और प्रयोग-इसका उपयोग असली नागकेशर (मेसुआ फेरिआ) के स्थान पर किया जाता है । गुणों में उसके समान होते हुए भी यह कुछ न्यून गुण वाला है । इसके पुष्पों का अर्क निकालकर ज्वर में रोगी के स्नान के लिये प्रयोग करते हैं। इससे रोगी को आह्लाद मालूम होता

२३२ भावप्रकाशनिघण्टुः है। यह उत्तेजक, सुगन्धि, ग्राही, कडुवा एवं दीपन है। अत्यधिक प्यास, आमाशयिक प्रक्षोभ, अर्श, कुपचन तथा अतिसार में इसका प्रयोग करते हैं। मात्रा-१-३ माशा । नोट-कुछ लोग इसी वर्ग के पुन्नाग वृक्ष की कलिकाओं का भी उपयोग नागकेशर के नाम से करते हैं। इसे ले०-Calophyllum inophyllum Linn. (कॅलोफाइलम् आइनोफाइलम् लिन); हिं०-सुलतानचंपा; म०-उंडी, उंडल कहते हैं। इसका बहुत सुन्दर वृक्ष दक्षिण भारत के समुद्री किनारे पर तथा अन्य स्थानों पर लगाया हुआ मिलता है। पत्ते-बड़ के पत्र जैसे लम्बगोल ४ से ६ इञ्च लम्बे तथा २ से ४ इञ्च चौड़े होते हैं। पुष्प-सफेद रंग के चार दल वाले और सुगन्धित होते हैं। फल-गोल, १ से १ १/२ इञ्च लम्बे, चिकने तथा पीले रंग के आते हैं। इसके बीजों से तैल निकालते हैं, जिसे सर्पन का तैल कहते हैं। पुन्नाग-यह मधुर, शीत, सुगन्धि और पित्तनाशक है। इसका तैल पुराने संधिवात में मालिश करते हैं। खुजली तथा सर की फुन्सियों में तैल लगाते हैं। सोज़ाक में इस तैल को खिलाते हैं।

अथ त्रिजातकं चातुर्जातकं च । तयोर्लक्षणं गुणाँश्चाह त्वगेलापत्रकैस्तुल्यैस्त्रिसुगन्धि त्रिजातकम् । नागकेशरसंयुक्तं चातुर्जातकमुच्यते ॥ ७२ ॥ तद् द्वयं रोचनं रूक्षं तीक्ष्णोष्णं मुखगन्धहृत् । लघुपित्ताग्निकृद्वर्ण्य कफवातविषापहम् ॥७३॥ 'त्रिजातक' तथा 'चातुर्जातक' बोधक द्रव्य तथा उनके एकत्र गुण-दालचीनी, इलायची और तेजपात इन्हीं तीनों द्रव्यों का समभाग में योग होने से उसे 'त्रिसुगन्धि' या 'त्रिजातक' कहते हैं और यदि उन्हीं द्रव्यों में समभाग से 'नागकेशर' भी मिला दी जाय तो उसे 'चातुर्जातक' कहते हैं। त्रिजातक तथा चातुर्जातक-रुचिकारक, रूक्ष, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, मुख की दुर्गन्ध को दूर करने वाले, लघु, पित्त तथा अग्निवर्धक, वर्ण्य (शरीर के रङ्ग को उत्तम करने वाले), कफ, वात तथा विष को नष्ट करने वाले होते हैं ॥ ७२-७३ ॥

अथ कुङ्कुमम् ( केशर ) । तस्य नामानि सलक्षणभेदान् गुणाँश्चाह कुङ्कुमं घुसृणं रक्तं काश्मीरं पीतकं वरम् । संकोचं पिशुनं धीरं बाह्लीकं शोणिताभिधम् ॥ काश्मीरदेशजे क्षेत्रे कुङ्कुमं यद्भवेद्धि तत् । सूक्ष्मकेशरमारक्तं पद्मगन्धि तदुत्तमम् ॥७५॥ बाह्लीकदेशसंजातं कुङ्कुमं पाण्डुरं स्मृतम् । केतकीगन्धयुक्तं तन्मध्यमं सूक्ष्मकेशरम् ॥७६॥ कुङ्कुमं पारसीकं यन्मधुगन्धि तदीरितम् । ईषत्पाण्डुरवर्णं तदधमं स्थूलकेशरम् ॥७७॥ कुङ्कुमं कटुकं स्निग्धं शिरोरोगव्रणजन्तुजित् । तिक्तं वमिहरं वर्ण्यं व्यङ्गदोषत्रयापहम् ॥७८॥ केशर के नाम-कुङ्कुम, घुसृण, रक्त, काश्मीर, पीतक, वर, सङ्कोच, पिशुन, धीर, बाह्लीक और शोणिताभिध (रक्तवाची सभी शब्द ) ये सब केशर के संस्कृत नाम हैं। देश भेद से केशर की उत्तमता एवं उसके लक्षण-काश्मीर देश के खेतों में जो 'केशर' उत्पन्न होता है वह सूक्ष्म केशरों से युक्त, कुछ रक्त वर्ण वाला तथा कमल की समान सुन्दर गन्ध से युक्त होता है एवं वह 'उत्तम' माना जाता है। जो 'बाह्लीक' (बुलारा) देश में उत्पन्न होने वाला 'केशर' होता है वह पाण्डुर (शुक्ल तथा पीतवर्ण युक्त) वर्ण का एवं 'केतकी' के समान गंध

कर्पूरादिवर्गः २३३ से युक्त होता है। यह सूक्ष्म केशरों से युक्त होता है और 'मध्यम' माना जाता है। जो 'पारसीक' (फारस) देश में उत्पन्न होने वाला केशर होता है वह मधु (शहद) के समान गन्ध वाला, कुछ पाण्डुर वर्णयुक्त तथा मोटे केशरों से युक्त होता है और वह 'अधम' माना जाता है। केशर-कटु तथा तिक्त रसयुक्त, स्निग्ध और वर्ण्य (शरीर के वर्ण के लिये हितकर) होता है तथा यह शिरोरोग, व्रण, कृमि, वमन, व्यङ्ग (झाईं) तथा त्रिदोष इन सबों को नष्ट करने वाला होता है ॥ ७४-७८ ॥

२९ केशर हिं०-केशर । म०, गु०-केशर । बं०-जाफरान । क०-कुङ्कुम । ते०-कुङ्कुम पुव । ता०- कुङ्कुमपु । फा०-करकीमास । अ०-जाफरान । अं०-Saffron (सॅफ्रॉन) । ले०-Crocus sativus Linn. (क्रोकस् सेटाइवस् लिन.)। Fam. Iridaceae (इरिडेँसी)। केशर का नैसर्गिक उत्पत्ति स्थान दक्षिण योंरप है। यह स्पेन से बम्बई में बहुत आता है और भारतवर्ष के बाजारों में बिकता है। ईरान, स्पेन, फ्रान्स, इटली, ग्रीस, तुर्की, चीन और फारस आदि देशों में इसकी खेती की जाती है। हमारे देश के काश्मीर में पम्पूर (४३०० फीट नामक स्थान पर तथा जम्मू के किश्तवाड़ में इसकी खेती की जाती है। यहाँ का उत्पन्न हुआ केशर भाव- प्रकाशकार की दृष्टि से सर्वोत्तम समझा गया है। इसका बहुवर्षायु क्षुप १।। फुट तक ऊँचा होता है। जड़ के नीचे प्याज के समान गांठदार कन्द (Corm) होता है। इसमें कांड नहीं होता। पत्ते-घास के समान लम्बे, पतले, पनालीदार और जड़ ही से निकले हुए मूलपत्र (Radicle leaf) रहते हैं। इनके किनारे पीछे की तरफ मुड़े हुए होते हैं। आश्विन कार्तिक में इस पर फूल आते हैं। फूल-एकाकी या गुच्छों में, नीलोलोहित वर्ण के, पत्तों के साथ ही शरद्ऋतु में आते हैं। नीचे के पत्रकोश (Spathe), पुष्पध्वज (Scape) को घेरे रहते हैं तथा दो हिस्सों में विभक्त रहते हैं। परिपुष्प (Perianth) निवापसम (Funnel-shaped), नाल (Tube) पतला, दल ६ खण्डों में विभक्त दो श्रेणियों में एवं नाल का कण्ठ श्मश्रुल (बालों से युक्त) रहता है। कण्ठ पर ३ पुंकेशर (Stamen) रहते हैं एवं परागशय (Anther) पीतवर्ण का रहता है। कुक्षिवृन्त (Style) परिपुष्प के बाहर निकले हुए (Exserted), नारंगारक्त रंग के, मुद्रराकार, अखण्ड या खण्डित रहते हैं। फल-सामान्य स्फोटी फल (Capsule) आयताकार एवं बीज गोल होते हैं। इन फूलों के स्त्री केशर के सूखे हुए अग्रभाग जिन्हें कुक्षि (Stigma) कहा जाता है उन्हें ही केशर कहते हैं। कुक्षि (Stigma) ३, कुक्षिवृन्त के ऊपर लगी हुई या अलग, करीब १ इञ्च लम्बी गहरे लाल से लेकर हलके रक्ताभ भूरे रंग की एवं सामान्य दन्तुर या लहरदार होती है। कुक्षिवृन्त (Styles) करीब १ से. मि. लम्बे, करीब-करीब रम्भाकार, ठोस, पीताभ भूरे से लेकर पीताभ नारंगी रंग के रहते हैं। इसमें विशिष्ट प्रकार की तीव्र सुगन्ध रहती है तथा इसका स्वाद सुगन्धि तथा कड़वापन लिये हुए होता है। केशर के पौधे को बीज या उसके कन्द द्वारा लगाया जा सकता है। साधारणतः १ एकड़ भूमि से करीब ५०-५५ पौंड ताजा केशर प्राप्त होता है जो सूखने पर १०-११ पौंड रह जाता है। इसकी खेती तथा माल के तैयार करने में बहुत सावधानी की आवश्यकता रहती है। सूर्योदय के पहले जब फूल लगभग खिलने को होते हैं तब उनको तोड़ लेते हैं। उसमें से केशर को तोड़कर छलनी में डालकर मन्द आंच पर सुखाते हैं। केशर को हमेशा प्रकाशहीन बन्द पात्र में रखना चाहिये।

यहाँ दोनों पृष्ठों का संपूर्ण एवं यथावत पाठ प्रस्तुत है:


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२३४ | भावप्रकाशनिघण्टुः

रासायनिक संगठन— केसर में एक स्नेहीय तैल ८-१३%, करांव १% उड़नशील तैल, एक रंगहीन कडुवा पिकोक्रोसिन (Picrocrocin) नामक ग्लाइकोसाइड् एवं क्रोसेटिन (Crocetin) नामक रंजक द्रव्य का क्रोसिन (Crocin) ग्लाइकोसाइड् ये पदार्थ पाये जाते हैं। क्रोसेटिन नामक रवेदार रंजक द्रव्य ३ प्रकार का होता है। अॅल्फा क्रोसेटिन ($\alpha$-crocetin, $C_{24} H_{28} O_{5}$) ०.७%, बीटा क्रोसेटिन ($B$-crocetin, $C_{25} H_{30} O_{5}$) ०.७%, एवं गामा क्रोसेटिन ($\gamma$-crocetin, $C_{26} H_{32} O_{5}$) ०.३% रहता है। क्रोसिन (Crocin) यह लाल रंग का चूर्ण होता है जो जल तथा मद्यसार में आसानी से घुल जाता है। संकेन्द्रित गन्धक के तेजाब में इसका गहरे नीले रंग का घोल बनता है जो रखने पर नील लोहित, रक्त तथा अन्त में भूरे रंग का हो जाता है। शोरे के तेजाब से यह हरे रंग का हो जाता है।

गुण और प्रयोग— केसर उष्ण, सुगन्धि, दीपन, पाचन, उद्वेष्टन-निरोधि, मनःप्रसादकर, रुचिकर, वर्ण्य, वश्य, कामोत्तेजक, विषघ्न, आर्तवजनक, मूत्रल एवं अल्प वेदनाहर है। आमाशयोत्तेजक एवं उद्वेष्टननिरोधि गुणों के लिये यह बहुत प्रसिद्ध है तथा यह श्रेष्ठ उत्तेजक एवं वृष्य औषध मानी जाती है। यह वातनाड़ियों के लिये शामक है। सुगन्धित रंजक द्रव्य के रूप में इसका बहुत व्यवहार किया जाता है। इसके उड़नशील तैल में अन्य उड़नशील तैलों की तरह ही गुण होते हैं।

इसका उपयोग अतिसार, शूल, मूत्रकृच्छ्र, अनार्तव, पीडितार्तव, कास, श्वास, कण्ठरोग, यकृत-विकार, आमवात, नाड़ीशूल एवं शिरोरोगों में किया जाता है।

  • (१) पीडितार्तव में इसको पूर्ण मात्रा में देने से शूरु कम होता है तथा भार्तव स्राव ठीक होने लगता है। गर्भाशय के पीड़ा युक्त विकारों में इसकी गोली योनि में धारण कराई जाती हैं। स्तनों पर इसके लेप से दूध बढ़ता है।
  • (२) मूत्राघात में १ तोला केशर मधुयुक्त जल में रात में भिगो कर सुबह उसे पिलाने से लाभ होता है। (सु. उ. अ. ५८-३०)
  • (३) बच्चों की सरदी में गरम दूध में केशर खिलाते हैं, तथा ललाट एवं छाती पर लगाते हैं।
  • (४) केसर तथा शर्करा को घृत में भून कर उसके नस्य से सूर्यावर्त एवं अर्धावभेदक आदि में लाभ होता है। शिरःशूल में इसे मस्तक पर लगाते हैं।
  • (५) मसूरिका तथा रोमान्तिका आदि में दाने बाहर निकालने के लिये इसे देते हैं।
  • (६) बच्चों के अतिसार, आध्मान तथा उदर शूल में इसे खिलाते हैं तथा पेट पर लगाते हैं।

प्रमाप तथा परीक्षा— केशर बहुमूल्य होने के कारण इसमें अनेक चीजों की मिलावट रहती है, इसलिये इसको अच्छी तरह परीक्षा कर खरीदना चाहिये। कुछ परीक्षाएँ यहाँ दी जा रही हैं। स्पिरिट में केशर डालने पर यद्यपि स्पिरिट रंगीन हो जाता है तथापि केशर के तन्तु अपने प्राकृतिक रंग में ही रहते हैं। इसे गन्धक के तेजाब (Sulphuric acid) में डालने से गहरा नीला रंग उत्पन्न होता है। जल में घुलनशील पदार्थ ५८% से कम न हों। मद्यसार (९०%) में घुलनशील पदार्थ ६०% से कम न हों। राख ७.५०% से अधिक न हो। १००° उष्णता पर सुखाने से १४% से अधिक वजन कम न हों। कुक्षिकृन्त (Styles) १०% से अधिक न हों। इतर ऑर्र्गैनिक द्रव्य २% से अधिक न हों। रंग की तीव्रता—इसको ०.०२ ग्राम की मात्रा में १०० सी. सी. जल में मिलाने पर पीत वर्ण का घोल बनता है जिसके रंग की तीव्रता ०.१%


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कर्पूरादिवर्गः | २३५

पोटैशियम डाइक्रोमेट (Potassium dichromate) के घोल के समान या इससे कम नहीं होनी चाहिये।

व्यामिश्रण— इसमें केशर पुष्प के ही कुक्षिकृन्त, पुंकेशर, आभ्यन्तर कोश एवं गेंदा (कॅलेण्डुला ऑफिसिनेलिस) के मेथिल् आरेज के द्वारा रंगे हुये पुष्प, कुसुम पुष्प के केशर तथा एक बीज पत्रीय पुष्प आदि मिलाये रहते हैं। कभी-कभी सत्व निकाला हुआ केसर रंग कर के बेचा जाता है। केसर का वजन बढ़ाने के लिये जल, तैल, शर्करा, ग्लूकोज, गिलसरीन तथा पोटैशियम् या अमोनियम् नाइट्रेट के घोल आदि का उपयोग करते हैं।

मात्रा— २-४ र०।


अथ गोरोचना । तस्या नामानि गुणांश्चाह

गोरोचना तु मङ्गल्या वन्द्या गौरी च रोचना । गोरोचना हिमा तिक्ता वश्या मङ्गलकान्तिदा । विषाऽलक्ष्मीग्रहोन्मादगर्भस्रावक्षतासुहृत् ॥ ७९ ॥

गोरोचन के नाम तथा गुण— गोरोचना, मङ्गल्या, वन्द्या, गौरी और रोचना ये सब गोरोचन के संस्कृत नाम हैं। गोरोचन—शीतवीर्य, तिक्तरस युक्त, वश्य (वशीकारक), मङ्गल तथा कान्ति को बढ़ाने वाला एवं विष, अलक्ष्मी (दरिद्रता), ग्रहबाधा, उन्माद (पागलपन), गर्भस्राव तथा क्षतज रक्तस्राव को दूर करने वाला होता है ॥ ७९ ॥


३० गोलोचन

  • हि०— गोलोचन, गोरोचन ।
  • बं०— गोरोचना ।
  • म०— गोरोचन ।
  • गु०— गोरुचन्दन, गोरोचन ।
  • ते०— गोरोचनमु ।
  • ता०— गोरोचनम् ।
  • फा०— संगगाव ।
  • अ०— हजरुल बकर ।
  • अं०— Gall-stone (गॉल-स्टोन); Serpent stone (सर्पेण्ट स्टोन) ।
  • ले०— Bezoar (बेझोर) ।

गाय अथवा बैल के पित्ताशय में से अश्मरी के समान सुपारी से लेकर नींबू तक का गोल अथवा कुछ गोलाई लिये त्रिकोणाकार जो पदार्थ निकलता है उसको गोरोचन कहते हैं। यह ऊपर से कुछ मटमैला पीला और तोड़ने पर भीतर से परतदार पीले रंग का होता है। यह कठोर नहीं, कुछ मुलायम होता है। किसी किसी का रङ्ग नारंगी या लाल युक्त होता है। इसी प्रकार किसी किसी बकरी और ऊँट के पेट से भी कंकड़ी निकलती है, 'कुछ ग्रन्थों में गाय के मस्तक का पित्त गोरोचन है' ऐसा उल्लेख मिलता है। हाथी के मस्तक में मिलने वाली गजमुक्ता और सर्प के फण में मिलने वाली मणि के सादृश्य के लिए गो-मस्तक से इसकी उत्पत्ति की परिकल्पना की गई होगी।

इसका स्वाद कुछ कड़वा होता है तथा इसमें कुछ सुगन्ध भी होती है। औषध के अतिरिक्त तंत्र शास्त्र में मोहन तथा वशीकरण के लिये इसका पर्याप्त उपयोग किया जाता है। गोपित्त में कुछ पदार्थों का मिश्रण कर बनाया हुआ नकली गोरोचन भी बिकता है।

गुण और प्रयोग— गोरोचन शीतल, सुगन्धि, मृदु विरेचक, तिक्त, विषहर, मूत्रल, अश्मरीघ्न, बृंहण, आर्तवजनक एवं विषहर है।

इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतन्त्रक, आक्षेप, रोमान्तिका, मसूरिका, कुकास, अतिसार, कफज्वर, कामला, पाण्डु, गर्भस्राव, पित्त की न्यूनता एवं आन्त्रिक विकार आदि में किया जाता है।

२३६ भावप्रकाशनिघण्टुः ( १ ) अपस्मार में इसको २ माशे की मात्रा में गुलाब जल में घिस कर पिलाने से पुन- राक्रमण नहीं होता, ऐसा हकीम मानते हैं । यूनानी में इसका लेप श्वित्र, चेहरे के काले दाग, चर्म रोग तथा नेत्र के जाले में लाभदायक मानते हैं । ( २ ) मसूरिका आदि में उष्णता कम करने के लिये इसको खिलाया जाता है । ( ३ ) बच्चों के अतिसार, कुकास एवं हरे दस्त आना आदि में इसको खिलाने से लाभ होता है । मात्रा—१-२ र० । नोट—पाश्चात्य चिकित्सा में गोपित्त को शुद्ध करके व्यवहार करने की पद्धति है । गोरोचन के स्थान में उसका प्रयोग करना उचित नहीं है। प्रसंगतः उसका भी वर्णन यहाँ किया गया है । ले०-Extractum fellis bovini ( एक्स्ट्रैक्टम् फेलिस् बोहिनि )। अं०-Purified Ox- Gall ( प्यूरिफाइड ऑक्स-गॉल् )। हि०-गो या बैल का शुद्ध पित्त, जहरमोहरा । ताजे पित्त को सुखाकर जब चतुर्थांश शेष रहे तो उसमें मद्यसार ( ९०% ) मिलाकर छानकर गोली बनाने लायक हो उतना सुखा लें। इनमें पित्त के लवण तथा रंजक पदार्थ पाये जाते हैं। यह गहरे पीताभ हरे रंग का लचीला पदार्थ होता है। इसका स्वाद कडुवा तथा अरुचिकर होता है। यह जल तथा मद्यसार दोनों में घुल जाता है। इसको विशिष्ट आवरण युक्त गोलियों के रूप में भोजन के २ घण्टे पश्चात् प्रयोग करते हैं। गुण और प्रयोग-यह कडुवा पदार्थ होते हुये भी वानस्पतिक कड़वे पदार्थों के उतना अच्छा दीपन पदार्थ नहीं है । इससे पित्त का स्राव ठीक होने लगता है । जिनमें पित्त का उचित स्राव न होने के कारण अपचन तथा विबन्ध रहता है उनमें इसका उपयोग करते हैं। यह अग्न्याशय के स्नेह पाचक स्रावों को बढ़ाता है तथा स्नेह द्रव्यों के प्रचूषण में सहायक होता है। स्नेह द्रव्यों का प्रचूषण ठीक होने के कारण उसमें घुलने वाले जीवतिक्ति (विटामिन्) 'ए', 'डि' तथा 'के' का भी ठीक प्रचूषण होता है। रक्तस्राव की अवस्था में रक्त को जमाने वाले पदार्थों में से रक्त में प्रोथ्रॉम्बिन् ( Prothrombin ) के निर्माण के लिये भिटामिन् 'के' की बहुत आवश्यकता रहती है। जब मल बहुत कड़ा हो जाता है तब इसको २०-३० ग्रेन की मात्रा में १ या २ औंस जल में घोल कर पिचकारी द्वारा बस्ति के रूप में देते हैं। मात्रा-५-१५ ग्रेन । अथ नखं नखी च ( गन्धद्रव्यम् ) तयोर्नामानि गुणांश्चाह नखं व्याघ्रनखं व्याघ्रायुधं तच्चक्रकारकम् ॥ ८० ॥ नखं स्वल्पं नखी प्रोक्ता हनुर्हट्टविलासिनी । नखद्वयं ग्रहश्लेष्मवातास्रज्वरकुष्ठहृत् ॥ ८१ ॥ लघूष्णं शुक्लं वर्ण्य स्वादु व्रणविषापहम् । अलक्ष्मीमुखदौर्गन्ध्यहृत्पाकरसयोः कटु ॥ ८२ ॥ सुगन्धि द्रव्य नख तथा नखी के नाम तथा गुण-नख, व्याघ्रनख, व्याघ्रायुध और चक्रकारक ये सब संस्कृत नाम नख के हैं और दूसरा छोटा नख होता है उसे नखी कहते हैं उसके संस्कृत नाम-हनु तथा हट्टविलासिनी ये दो हैं। दोनों प्रकार के नख-ग्रहबाधा, कफ, वात, रक्ताविकार (किंता वातरक्त), ज्वर तथा कुष्ठ रोग को दूर करते हैं एवं लघु, उष्णवीर्य, शुक्रजनक, वर्णकारक, स्वादिष्ट, व्रण तथा विषनाशक, एवं अलक्ष्मी (दरिद्रता) तथा मुख का दुर्गन्ध को हरण करने वाले, पाक एवं रस में कटु रसयुक्त होते हैं ॥ ८०-८२ ॥ कर्पूरादिवर्गः २३७ ३१ नख-नखी हि०-नख, नखी, छोटा नख । बं०-नखी गन्ध द्रव्य, छोट नखी । म०-नखला, वाघनख । ते०-नखमुच्चिप्प । गु०-नखला, सावजना नख । क०-नख, बाघमख । फा०-नाखून पर्यां । अ०-अजफारुतिब, इकलिलुल मुलुक । अं०-Land snail (लैंड स्नेल)। ले०-Helix aspera (हेलिक्स अॅस्पेरा); Achatina fulica (ॲचॅटिना फूलिका) । नख एक सुगन्धि द्रव्य है। यद्यपि इसे नख, व्याघ्रनख आदि नाम दिये गये हैं तथापि यह किसी जानवर का नाखून नहीं है। यह एक प्रकार के सीप की जाति के समुद्री जीव के मुख के ऊपर का आवरण है जो नख सदृश होने के कारण नख कहा जाता है। भावप्रकाशकार ने इनके दो भेद लिखे हैं। बड़े को नख या व्याघ्रनख तथा छोटे को नखी लिखा है। अन्य ग्रन्थों में नखी के आकृति के अनुसार ५ भेद लिखे हैं। बेर के पत्ते के सदृश, कमलदल सदृश, घोड़े के खुर की आकृति के, हाथी के कान के समान आकार वाले तथा सुअर के कान के समान ये पांच प्रकार होते हैं। इनमें से सुअर के कान के समान निषिद्ध माना गया है। कुछ लोगों ने हाथी के कान सदृश और घोड़े के खुर के समान आकृति वाले नख का उपयोग गन्धयोगों में तथा बेर या कमलदल सदृश नख का उपयोग धूपन में बतलाया है। यह गहरे भूरे रंग का तथा अनेक पटलों से बना हुआ कठोर, अपारदर्शक तथा नख के सदृश होता है। इसके उन्नतोदर पृष्ठ पर परत साफ दिखलाई देते हैं। इसको जलाने से दुर्गन्ध आती है लेकिन तैल के साथ पकाने से तैल सुगन्धित होता है। अन्य ग्रन्थों में इसके शोधन का विधान मिलता है। भैंस के गोबरयुक्त जल, तिन्त्रिड़ी जल या मृत्तिकायुक्त जल के साथ स्वेदन करके, प्रक्षालन करने के पश्चात् भून कर गुड़हरीतकी मिले जल में बुझाते हैं। फिर पीस कर उपयोग में लाते हैं। चरक में प्रायोगिक धूम्रपान की वर्ति के योग में (सू. अ. ५ श्लो. २०), श्वयथुचिकित्सा (चि. अ. १६) में शैलेयकादि तैल और प्रदेह में, महासुगन्धहस्ती नामक अगद के योग में (चि. अ. २३ ), अमृतादि तैल (चि. अ. २८) तथा वातरक्त चिकित्सा (चि. अ. २९) में शतपुष्पादि तैल के योग में अन्य द्रव्यों के साथ नख का प्रयोग लिखा है। सुश्रुत में एला- दिगण में व्याघ्रनख का उल्लेख है । तैलों को सुगन्धित करने के लिये इसका अधिक उपयोग होता है। अथ बालम् [ सुगन्धबाला ] । तस्य नामानि गुणांश्चाह बालं ह्रीबेरबर्हिष्ठोदीच्यं केशाम्बुनाम च । बालकं शीतलं रूक्षं लघु दीपनपाचनम् ॥ हृल्लासारुचिवीसर्पहृद्रोगामातिसारजित् ॥ ८३ ॥ सुगन्धबाला के नाम तथा गुण-बाल, ह्रीबेर, बर्हिष्ठ, उदीच्य, केशनाम (केशवाचक सभी शब्द), एवं अम्बुनाम (जलवाची सभी शब्द ) तथा बालक ये सब 'सुगन्धबाला' के संस्कृत नाम हैं। सुगन्धवाला-शीतवीर्य, रूक्ष, लघु, अग्निदीपक तथा पाचक होती है और यह हृल्लास (जीमिचलाना ), अरुचि, वीसर्प, हृद्रोग, आम तथा अतिसार इन सब रोगों को दूर करने वाली होती है ॥ ८३ ॥ ३२ सुगन्धबाला हि०-सुगन्धवाला, नेत्रवाला । बं०-बाला । म०-काला वाला । गु०-वालो, कालो वालो । क०-बलरकसी-गिडा । ते०-मुत्तुपलागमु, प्ररांकुटी । ता०-पेरामुदिवेर । ले०-Pavonia odorata Willd. (पॅवोनिया ओडोरेटा विल्ड) । Fam. Malvaceae (मालवेसी) ।

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२३८ | भावप्रकाश निघण्टुः सुगन्धवाला - पश्चिमोत्तर प्रदेश, सिन्ध, पश्चिम प्रायद्वीप और सिलोन में अधिक उत्पन्न होती है। इसके क्षुप में थोड़ी सी कस्तूरी की सुगन्ध रहती है। इसका क्षुप-सीधा तथा १॥-२ फीट ऊँचा होता है और समस्त क्षुप पर बारीक रोवें होते हैं। पत्ते-१ से ३ इञ्च लम्बे गोलाकार हृदयाकृति, कंधी के पत्तों के आकार वाले, ३ से ५ भागों में थोड़ी दूर तक विभक्त और ऊपर के पत्ते दन्तुर होते हैं। पत्तों को मसलने से चिपचिपापन मालूम होता है। शाखाओं के अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं। पुष्पद्दल-किञ्चित् हल्के गुलाबी रङ्ग के होते हैं। फल-अण्डाकृति, छोटे एवं चने बराबर होते हैं। बीज-भूरे रंग के, तैल से युक्त लेकिन गन्धहीन होते हैं। मूल-७-८ इञ्च लम्बे, प्रायः ऐंठे हुए तथा अधिक से अधिक ३/४ इञ्च मोटे, चिकने, भूरे रंग के तथा अनेक उपमूलों से युक्त रहते हैं। इसमें कस्तूरी के समान सुगन्ध रहती है। औषध में इन्हीं मूलो का व्यवहार किया जाता है। नोट-बाजार में सुगन्धवाला के नाम से मिलने वाला गांठदार द्रव्य सुगन्धवाला नहीं है। उसे असली तगर मानते हैं। उसका वर्णन पहले किया गया है। कुछ लोगों ने इसके लैटिन नाम में खस का लैटिन नाम दिया है, वह उचित नहीं है। कुछ लोगों ने खस जाति के ही दूसरे तृण का लैटिन नाम सुगन्धवाला के लिए दिया है जिसको कुछ लोग खस का ही पर्याय मानते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें लुआबदार पदार्थ तथा उत्तेजक सुगन्धि द्रव्य है। गुण और प्रयोग-सुगन्धवाला शीतल, स्नेहन, दीपन, वातानुलोमक, उत्तेजक एवं बल्य है। इसका उपयोग ज्वर, रक्तपित्त, दाह, तृषा, हल्लास, वमन, अतिसार, व्रणशोथ एवं विसर्प में किया जाता है। ( १ ) किसी भी प्रकार के ज्वर में षडंग पानीय के रूप में नागरमोथा, पित्तपापड़ा, खस, श्वेत चन्दन, सुगन्धवाला एवं सोंठ का क्वाथ देने से ज्वर का दाह एवं प्यास कम हो जाती है। ( २ ) बेल के साथ इसका उपयोग संग्रहणी में लाभकर होता है। अतिसार में आदी के साथ इसको फाण्ड बना कर पिलाते हैं। बच्चों के अतिसार में चाँवल के धोवन के साथ मिश्री, मधु तथा सुगन्धवाला देते हैं। वमन, हल्लास आदि में भी तण्डुलोदक के साथ इसको देते हैं। ( ३ ) रक्तपित्त में चन्दन, मिश्री तथा तण्डुलोदक के साथ इसका प्रयोग किया गया है। ( ४ ) विसर्प में इसके चूर्ण को घृत के साथ लेप करते हैं। श्वित्र में इसकी जली हुई काली राख का लेप लाभदायक माना जाता है। मात्रा-३-६ माशा।

अथ वीरणम् । तस्य नामानि गुणांश्चाह

स्याद्वीरणं वीरतर्वीरञ्च बहुमूलकम् । वीरणं पाचनं शीतं वान्तिहल्लघु तिक्तकम् ॥ ८४ ॥ स्तम्भनं ज्वरनुद् भ्रान्तिमदहत्कफपित्तहत् । तृष्णाऽस्रविषवीसर्पकृच्छ्रदाहव्रणापहम् ॥८५॥ वीरण अर्थात् गांडर घास के नाम तथा गुण-वीरण, वीरतरु, वीर और बहुमूलक ये नाम संस्कृत में वीरण के हैं। वीरण-पाचक, शीतवीर्य, वमन को दूर करने वाला, लघु, तिक्त रसयुक्त एवम् स्तम्भन होता है। यह ज्वर, भ्रमरोग, मदरोग, कफ, पित्त, तृषा, रक्तप्रकोप, विष, वीसर्प, मूत्रकृच्छ्र, दाह और व्रण को दूर करने वाला होता है ॥ ८४-८५ ॥


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कर्पूरादिवर्गः | २३६

अथोशीरम् । तस्य नामानि गुणांश्चाह

वीरणस्य तु मूलं स्यादाशीरं नलदञ्च तत् । अमृणालञ्च सेव्यञ्च समगन्धिकमित्यपि ॥८६॥ उशीरं पाचनं शीतं स्तम्भनं लघु तिक्तकम् ॥ ८७ ॥ मधुरं ज्वरहद्धान्तिमदनुत्कफपित्तहत् । तृष्णाऽस्रविषवीसर्पदाहकृच्छ्रव्रणापहम् ॥ ८८ ॥ खस के नाम तथा गुण - 'वीरण' नामक घास के जड़ को 'खस' कहते हैं। उसके संस्कृत नाम-उशीर; नलद, अमृणाल, सेव्य और समगन्धिक ये सब हैं। खस-पाचक, शीतवीर्य, स्तम्भन, लघु, तिक्त तथा मधुर रस युक्त होता है और यह ज्वर, वमन, मदरोग, कफ, पित्त, तृषा, रक्तप्रकोप, विष, वीसर्प, दाह, मूत्रकृच्छ्र और व्रण को दूर करने वाला होता है ॥ ८६-८८ ॥

३३ वीरण-खस

हि०-खस, वीरण मूल, गांडर, बेना। बं०-वेणर मूल, खसखस । म०-वाला । गु०-वालो । क०-मुडिवाल । ते०-वट्टिवेलु । ता०-वैट्टिवेर । फा०-रेशये वाला, दीखेवाला । अं०-Cuscus grass (कसकस ग्रास ) ले०-Andropogon muricatus Retz. (एन्ड्रोपोगोन् म्युरिकैट्स् रेझ. ); Vetiveria zizanioides (Linn.) Nash (वेटिवेरिया झाझेनिऑईडिस (लिन) नैश)। Fam, Gramineae ( ग्रैमिनी ) । यह इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। यह अधिकतर खुले हुये दलदल वाले स्थानों में होता है। खस-तृणजातीय औषधि का क्षुप २ से ५ फुट तक ऊँचा एवं दृढ होता है। यह गुच्छबद्ध और समूह बद्ध होकर उगता है। पत्ते-सरकण्डें के समान १-२ फुट लम्बे और पतले होते हैं। ये दो कतारों में तथा आधार पर परस्पराच्छादित रहते हैं। मूलीयपत्र कुछ अधिक लम्बे रहते हैं। मध्यशिरा दबी हुई तथा पत्तों के किनारों पर दूर दूर पर तीक्ष्ण कांटे रहते हैं। फूलों का घनहरा पीलापन या किञ्चित् लाली युक्त होता है। इसकी जड़ सुगन्धित होती है। इसी को खस कहते हैं। औषध के अतिरिक्त ग्रीष्म ऋतु में इसके बने परदे एवं पंखों आदि का उपयोग किया जाता है। सुगन्धि के लिये इसके इत्र का भी बहुत व्यवहार होता है। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल, राल, रंजक पदार्थ, अम्लद्रव्य, चूने का लवण, लोहभस्म तथा काष्ठयुक्त पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-खस शीतल, तिक्त, स्तम्भक, पाचक, पित्तनाशक, मूत्रजनक, पसीने की दुर्गन्ध दूर करने वाला, ज्वरहर, दाहशामक, स्तन्यजनक, वमन को रोकने वाला, श्रमहर एवं जल को सुगन्धित करने वाला है। इसका उपयोग फांट के रूप में पित्तज्वर, प्रसूति ज्वर, तृष्णा, दाह, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, विष, स्वेद दुर्गन्ध, वमन, कुष्ठ एवं आमाशयिक प्रक्षोभ आदि में किया जाता है। इसका लेप दाह, त्वचा के रोग तथा पसीने को रोकने वाला है। ( १ ) वमन को रोकने के लिये ३ तो० खस को १ पाव उबलते जल में डालकर उसके फांट को पिलाते हैं। इसके साथ धनियाँ का भी उपयोग लाभदायक है। विसूचिका में वमन रोकने के लिये २ बूँद इत्र बताशा में भरकर खिलाते हैं। ( २ ) पसीने की अधिकता तथा मसूरिका में इसका लेप किया जाता है। ( ३ ) लोहबान के साथ चिलम में रखकर या सिगरेट बनाकर इसका धूम्रपान करने से शिरःशूल दूर होता है। मात्रा-२-४ माशा।

२४० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ जटामांसी । तस्या नामानि गुणांश्चाह जटामांसी भूतजटा जटिला च तपस्विनी । मांसी तिक्ता कषाया च मेध्या कान्तिबलप्रदा ॥ स्वादी हिमा त्रिदोषास्रदाहवीसर्पकुष्ठनुत् ॥ ८९ ॥ जटामांसी (बालछड़) के नाम तथा गुण— जटामांसी, भूतजटा, जटिला, तपस्विनी और मांसी ये सब संस्कृत नाम जटामांसी के हैं। जटामांसी (बाल छड़)-तिक्त तथा कषाय रस युक्त, मेधाजनक, कान्तिकारक, बलप्रद, स्वादिष्ट और शीतवीर्य होती है और यह त्रिदोष, रक्तप्रकोप, दाह, वीसर्प एवम् कुष्ठ को दूर करने वाली होती है ॥ ८९ ॥ ४४ जटामांसी हि०-जटामांसी, बालछड़ । बं०-,गु०-,म०-जटामांसी । ते०-जटामांशी । क०-जेटा- मावशीं । पं०-बिल्लीलोटन । ता०-जटामाशी । का०-भूतजटा । सु०-सम्बुल । फा०-नारदे हिन्दी । अ०-सुंबुलत्तीवे हिन्दी, सुम्बुले हिन्दो । अं०-Spikenard (स्पाइकनार्ड); Indian Nard (इण्डियन नार्ड); Nardus root (नार्डस् रूट) । ले०-Nardostachys jatamansi DC. (नार्डोस्टैकिस् जटामांसी डीसी.) । Fam. Valerianaceae (वैलेरियानेसी) । जटामांसी—यह हिमालय के जंगलों में कुमाऊँ से सिक्कम तक १७ हजार फीट की ऊँचाई पर तथा भूटान में उत्पन्न होती है । इसका बहुवर्षायु क्षुप सीधा खड़ा रहता है । राइजोम (भौमिक तना) काष्ठमय, लम्बा, मजबूत एवं सूखे हुये रेशेदार पर्णवृन्त से युक्त रहता है । भूमि के ऊपर जड़ से कई शाखाए निकलती हैं और वे ५-७ अंगुल तक सघन बारीक जटाकार रोवें से भरी रहती हैं । पत्ते-जटा को छोड़ कर ऊपर ६-७ इञ्च लम्बे तथा १ इञ्च चौड़े, जड़ की ओर संकुचित, मृदु, रोमश या चिकने मूलीय पत्ते रहते हैं । काण्डपत्र-एक या दो जोड़े, १-३ इञ्च लम्बे, अवृन्त, आयताकार या उपलत्वाकार होते हैं । डंडियों के अन्त में सफेद या किंचित् गुलाबी रङ्ग के छोटे- छोटे फूलों के गुच्छे लगते हैं । फल-छोटे-छोटे गोल, सफेद रोयेंदार तथा उनके ऊपर बाह्यकोष के अंडाकार, तीक्ष्ण, दन्तुर बाह्यदल लगे रहते हैं । इसके सूखे हुये राइजोम (भौमिक तना) तथा मूल का औषध में व्यवहार किया जाता है। इसका मूल गहरे धूसर (Grey) रंग का, छोटी अँगुली के बराबर मोटा तथा रक्ताभ भूरे रंग के रोओं से युक्त होता है । ये रोएदार तन्तु इसके सूखे हुये पर्णवृन्त तथा मूल के भाग हैं जिनके आपस में मिलने से जटासी बन जाती है। अन्दर से यह रक्ताभ भूरे रंग की होती है। इसमें एक प्रकार की विशिष्ट गन्ध (असली तगर के समान) होती है तथा इसका स्वाद सुगन्धियुक्त कडुवा होता है। इसको हमेशा ताजी खरीदना चाहिये । नोट—अन्य निघण्टुओं में गन्धमांसी, आकाशमांसी, कृष्णा सुगन्धमांसी आदि भेद लिखे हुवे हैं । प्राचीन ग्रन्थों में इसके स्वतन्त्र उपयोग बहुत कम मिलते हैं । रासायनिक संगठन—इसमें का प्रधान तत्त्व एक उड़नशील तैल है जो ०.३-०.४% पाया जाता है । यह तैल हलके पीले रंग का कुछ हरिताभ, जल से हलका, हवा में जमने वाला, कपूर के समान गन्ध वाला, कडुवा तथा तीता होता है । इस तैल में ईस्टर, अल्कोहल तथा सेस्की टर्पेन हाइड्रोकार्बन पदार्थ होते हैं । इस तैल के अतिरिक्त जटामांसी में १% एक रवेदार किन्तु जल में न घुलने वाला अम्ल द्रव्य तथा राल पाई जाती है । गुण और प्रयोग—जटामांसी शीतल, सुगन्धि, दीपन, पाचन, बल्य, रक्ताभिसरणोत्तेजक, उद्वेष्टननिरोधि, वातानुलोमक, मूत्रल, मृदुविरेचक, आर्तवजनन, वातनाड़ीशामक, संज्ञास्थापन,


कर्पूरादिवर्गः २४१ मेध्य, त्रिदोषघ्न, केश्य, ज्वरहर, स्वेददोषहर, कान्तिवर्धक, वेदनास्थापन, हृदयबल्य एवं सौमनस्य जनन है । इसके सेवन से क्षुधा बढ़ती है, पाचन ठीक होता है किन्तु कोष्ठबद्धता नहीं होती । इसके सेवन से उदर में उष्णता मालूम होती है, डकार आती है, संपूर्ण शरीर में उष्णता मालूम होकर पसीना आता है, मूत्र की मात्रा बढ़ती है तथा नाड़ी सबल होती है। मस्तिष्क एव नाड़ी तन्तुओं पर इसकी पोषक तथा उत्तेजक क्रिया होती है। अल्प मात्रा में बहुत दिन देते रहने से मन की चञ्चलता शान्त होती है, काम करने में उत्साह बढ़ता है तथा नाड़ी का बल बढ़ता है । अपस्मार, अपतन्त्रक तथा अन्य आक्षेपयुक्त व्याधियों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। (१) मस्तिष्क तथा नाड़ी तन्तुओं के विकारों में जटामांसी बहुत लाभप्रद होती है। शरावियों को व्रण होने पर या उन पर कोई शस्त्रक्रिया करने पर उनको एक तरह का भ्रमणयुक्त कम्प उत्पन्न होता है। ऐसी अवस्था में जटामांसी के प्रयोग से पर्याप्त लाभ होता है। अत्यन्त मानसिक परिश्रम या असैथ्र्य से थकावट उत्पन्न होने पर इसका सेवन नाड़ियों के लिए बलकारक तथा श्रमहर होता है। अपतन्त्रक में इससे आवेग कम होते हैं । शिरःशूल के लिये यह उत्कृष्ट औषध है । मानसिक आघात में यह बहुत जल्दी काम करती है । हींग, कस्तूरी आदि की अपेक्षा जटामांसी इन विकारों में अधिक उपयोगी तथा शीघ्र कार्यकर मानी जाती है। भूतावेश जैसी चेष्टाओं में जटामांसी, ब्राह्मी स्वरस तथा घोडबच का मधु के साथ प्रयोग करते हैं। अपस्मार, अपतन्त्रक, हृदय की धड़कन, कम्पवात तथा अन्य आक्षेपयुक्त व्याधियों में इसका फाण्ट बहुत प्रभावशाली माना जाता है। इनमें इसे १ से २ औंस की मात्रा में दिन में ३ बार पिलाते हैं। अपस्मार में इसके तैल का २-५ बूँद की मात्रा में सेवन कराया जाता है । (२) रक्ताभिसरण ठीक न होता हो तो यह बहुत ही उपयुक्त औषध है । इससे मस्तिष्कगत रक्तप्रवाह सन्तुलित होता है जिससे सर का भारीपन, चक्कर, मूर्च्छा, आँखों के सामने अंधियारी, सुनाई कम पड़ना आदि में लाभ होता है। हृदय की धड़कन, कमजोरी तथा हृदय के कारण उदर में वायु सञ्चित होने पर इसे सुगन्ध द्रव्य तथा नवसादर के साथ खिलाते हैं। इससे रक्त- वाहिनियों का संकोच होकर रक्तपित्त, विसर्प तथा रक्तस्राव में लाभ होता है। (३) जटामांसी ४, दालचीनी १, शीतलचीनी १, सौंफ १, सोंठ १ तथा मिश्री ८ भाग इनके चूर्ण को ३-९ माशे की मात्रा में आध्मान, शूल, आमाशयिक शूल तथा आक्षेपयुक्त विकारों में देते हैं। बच्चों के आध्मान, उदरशूल, सुशिक्षितों तथा नाजुक प्रकृति की स्त्रियों के मन्दशूल, कुपचन आदि पचन संस्थान के विकारों में जटामांसी और नवसादर के साथ सुगन्धि द्रव्यों को मिलाकर देते हैं। इससे पित्त का स्राव ठीक होकर पाचन सुधरता है। (४) औपसर्गिक शोथयुक्त ज्वरों में त्रिदोष की वृद्धि होने से रोगी प्रलाप करता है तथा सन्निपात के लक्षण दिखलाई देने लगते हैं । इन अवस्थाओं में इसके प्रयोग से शीघ्र लाक्षणिक लाभ होता है। इससे रक्ताभिसरण ठीक होता है, नाड़ी तन्तुओं को बल मिलता है, कफ ढीला होता है, दाह कम होता है तथा शोथ में भी लाभ होता है। विषम ज्वर में भी इससे पर्याप्त लाभ होता है। (५) विस्फोट एवं व्रणों में इसके लेप से जलन तथा पीडा कम होती है। मुखपाक में भी इससे जलन तथा पीड़ा का शमन होता है। झांई-व्यङ्ग आदि त्वग्दोषों में उबटन के रूप में व्यव- हार करने से त्वचा की कान्ति बढ़ती है । यह बालों के लिये भी लाभदायक है । शिरःशूल में इसका लेप करते हैं । दन्तशूल में इससे मज्जन कराते हैं। मुखदौर्गन्ध में इसे चबाते हैं। स्वेदाधिक्य में इसके चूर्ण का उपयोग मर्दन के लिये करते हैं। बेहोशी में इसे पीसकर आंखों पर लेप 16 करते हैं । १६ भा० नि०

२४२ भावप्रकाशनिघण्टुः ( ६ ) पीडितार्तव में इसके सेवन से पीड़ा कम होती है तथा आर्तव स्राव ठीक होने लगता है । स्त्रियों में रजोनिवृत्ति के काल में कुछ विशिष्ट मानसिक तथा शारीरिक अवसाद के लक्षण उत्पन्न होते हैं ऐसी अवस्थाओं में जटामांसी बहुत उपयोगी होती है । मात्रा—५-१० रत्ती । अथ शैलेयम् ( भूरिछरीला ) । तस्य नामानि गुणांश्चाह शैलेयन्तु शिलापुष्पं वृद्धं कालानुसार्यकम् ॥ ९० ॥ शैलेयं शीतलं हृद्यं कफपित्तहरं लघु । कण्डूकुष्ठाइमरीदाहविष हृद् गुदरुक्हृत् ॥ ९१ ॥ शैलेय ( भूरिछरीला ) के नाम तथा गुण-शैलेय, शिलापुष्प, वृद्ध और कालानुसार्यक ये सब संस्कृत नाम भूरिछरीला के हैं। भूरिछरीला-शीतवीर्य, हृद्य ( हृदय को हितकर ), कफ तथा पित्तनाशक, लघु, एवम् खुजली, कुष्ठ, पथरी, दाह, विष तथा गुदा से रक्त गिरना इन सब को दूर करने वाला है । ३५ छरीला हि०-छरीला, भूरिछरीला, पत्थरफूल । बं-शैलज । म०-दगडफूल । गु०-पत्थरफूल, छडीलो । क०-कल्लुडूवु । ते०-शैलेय मनेद्रव्यमु, रतिपंचे । ता०-कलपसी । फा०-उशनह, गुलेसंग । अ०-उस्नः । अं०-Stone flowers ( स्टोन फ्लावर्स ); Yellow Lichen ( यलो लाइचेन ) । लै०-Parmelia perlata Ach. ( पार्मीलिया परलॅटा आक० ) ; Fam. Parmeliaceae ( पार्मेलीयेंसी ) । छरीला-यह क्षुद्र वनस्पति पहाड़ी जमीन के पत्थरों पर उत्पन्न होती है और जान पड़ता है मानो यह पत्थर से ही अपना आहार लेती है। यह हिमालय और नीलगिरि के पहाड़ों पर पाई जाती है। यह वृक्षों और दीवारों पर भी पाई जाती है। यह हरी पेडींसी सन्निभ होकर जब सूख कर उतरती है तब इसके ऊपर का पृष्ठ काला और नीचे का सफेद होता है। जो अधिक सफेद होती है वही अच्छी समझी जाती है। इसकी कई जातियां पाई जाती हैं। इसका स्वाद फीका तिक्त-कषाय होता है। औषध के लिये हमेशा नया तथा सुगन्धयुक्त छरीला काम में लेना चाहिये । रासायनिक संगठन—इसमें पीत रवेदार पदार्थ, गोंद, लाइचेनिन एवं क्राइसोफेनिक एसिड, ये पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग—छरीला शीतल, सुगन्धि, हृद्य, सौम्य मूत्रल, दीपन, वेदनास्थापन, ग्राही एवं शोथहर है । यह कफ, पित्त, दाह, तृषा, वमन, श्वास, व्रण, कण्डू, अश्मरी, विष, हृद्रोग, गुदरक्तस्राव एवं रक्तविकार दूर करने वाला है। पेशाब रुकने पर १ तो० छरीला के फांट में मिश्री एवं जीरा मिलाकर पिलाते हैं तथा इसे गरम जल में भिगोकर कमर पर बांधते हैं। इसे ठण्डे जल में पीस कर सर पर लेप करने से शिरःशूल दूर होता है। व्रण पर इसे लगाने से लाभ होता है। यकृत् शूल निवारण के लिये इसका उपयोग करते हैं । अञ्जन के योगों में भी इसका प्रयोग किया जाता है । मात्रा-२-४ माशा । १. विषहृल्लासरुग्जित इति पाठान्तरम् । कर्पूरादिवर्गः २४३ अथ मुस्तकं-नागरमुस्तकञ्च । (मोथा-नागरमोथा) । तयोर्नामानि गुणांश्चाह मुस्तकं न स्त्रियां मुस्तं त्रिषु वारिदनामकम् । कुरुविन्दश्च संख्यातोऽपरः क्रोडकसेरुकः ॥९२॥ भद्रमुस्तञ्च गुन्द्रा च तथा नागरमुस्तकः । मुस्तं कटु हिमं ग्राहि तिक्तं दीपनपाचनम् ॥९३॥ कषायं कफपित्तास्रतृड्ज्वरारुचिजन्तुहृत् । अनूपदेशे यज्जातं मुस्तकं तत्प्रशस्यते । तत्रापि मुनिभिः प्रोक्तं वरं नागरमुस्तकम् ॥ ९४ ॥ मोथा तथा नागरमोथा के नाम और गुण- मुस्तक ( इसका स्त्रीलिङ्ग को छोड़ कर शेष लिङ्गों में प्रयोग होता है, मुस्त ( यह तीनों लिङ्गों में होता है ), वारिदनामक ( मेघवाची सभी शब्द ) और कुरुविन्द ये सब संस्कृत नाम मोथा के हैं। दूसरे प्रकार का जो मोथा है जिसे नागरमोथा कहते हैं, उसके संस्कृत नाम-- क्रोडकसेरुक, भद्रमुस्त, गुन्द्रा तथा नागरमुस्तक ये सब हैं । मोथा-कडुतिक्त तथा कषाय रस युक्त, शीतवीर्य, ग्राही, अग्निदीपक तथा पाचक होता है और यह कफ, पित्त, रक्तकोप, तृषा, ज्वर, अरुचि और कृमि का नाशक होता है। जो 'मोथा' अनूप देश में उत्पन्न होता है बड़ी श्रेष्ठ होता है। उसमें भी मुनियों ने 'नागरमोथा' को ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है । ३६ मोथा हि०-मोथा । बं-मुता, मुथा । म०-मोथा, बिम्बल, भद्रमुष्टि । गु०-मोथ । क०-कोरनारि । तै०-तुंगमुस्ते । ता०-कोरइ किलंगु । फा०-मुष्के जमीं । अ०-सोभ (अ) द् कूर्फी । अं०-Nut- grass ( नट्ग्रास ) । लै०-Cyperus rotundus Linn. ( साइपेरस् रोटन्डस् लिन. ) । Fam. Cyperaceae ( साइपेरेंसी ) । मोथा इस देश के सब प्रान्तों में बहुलता से होता है। यह तृणजातीय वनस्पति बारहौ मास पायी जाती है किन्तु बरसात में सर्वत्र देखने में आती है। इसमें मूलीय पत्रगुच्छ होता है जो एक कठोर कन्द सदृश भौमिककाण्ड से निकलता है । नीचे सूत्रकार अन्तर्भूमिकायी कांद भी प्रायः होते हैं जिनने पौन से एक इञ्च के घेरे में अंडाकार कंद निकले रहते हैं जो कसेरू के समान ऊपर से काले रंग के और भीतर से लालीयुक्त सफेद होते हैं और इनमें सुगन्ध आती है। डंडी-पतली, ६ से २४ इञ्च तक ऊँची, त्रिकोणकार तथा पत्तों के बीच से निकली रहती है। पत्ते-लम्बे और पतले होते हैं । डंडी के अग्रपर समस्थमूर्धजक्रम में पुष्पवाहक शाखायें निकलती हैं जो छोटे-छोटे अवृन्त काण्डजव्यूहों का संयुक्तव्यूह होती हैं । पुष्पव्यूह का आधार भाग तीन पत्रसदृश कोणपुष्पकों से घिरा रहता है । इसके काले-काले कंदों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है । नोट-भावप्रकाशकार ने मोथा एवं नागरमोथा ये दो भेद यहां लिखे हैं तथा मुस्ता का एक अन्य कैवर्तमुस्ता ( जलजमुस्ता, केवटीमोथा ) भेद आगे लिखा है । नागरमोथा का ही दूसरा नाम भद्रमुस्ता लिखा है। अन्य निघण्टुओं में भद्रमुस्ता अलग लिखा है। सब मोथे के गुण करीब-करीब समान ही हैं तथा एक दूसरे के स्थान पर इनका उपयोग किया जा सकता है। अनूप देश में होने वाला नागरमोथा अधिक प्रशस्त माना गया है। यह हमेशा ताजा तथा सुगन्धयुक्त खरीदना चाहिये । रासायनिक संगठन—इसमें एक सुगन्धित उड़नशील तैल, वसा, शर्करा, गोंद, कार्बोहाइड्रेट, अॅल्ब्युमिन सदृश पदार्थ, तन्तु तथा राख एवं अत्यल्प मात्रा में क्षाराम आदि पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-मोथा ग्राही, दीपक, पाचक, स्वेदजनक, मूत्रजनक, स्तन्यवर्धक, आर्तव- जनक, किञ्चित् गर्भाशयोत्तेजक, केशवर्धक, व्रणरोपक एवं कृमिघ्न है ।