भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *
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पूर्णिमा विशेष फल देनेवाली है। इन पर्वोंमें जो भी शुभाशुभ कर्म किये जाते हैं, वे अक्षय हो जाते हैं। आश्विनकी पूर्णिमा कौमुदी कही गयी है, इसमें चन्द्रोदय-कालमें विधिपूर्वक लक्ष्मीकी पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक अमावास्याको तर्पण और श्राद्धकर्म अवश्य करना चाहिये। कार्तिक
मासके कृष्ण पक्षकी अमावास्यामें प्रदोषके समय लक्ष्मीका सविधि पूजन कर उनकी प्रीतिके लिये दीपोंको प्रज्वलित करना चाहिये एवं नदीतीर, पर्वत, गोष्ठ, श्मशान, वृक्षमूल, चौराहा, अपने घरमें और चत्वरमें दीपोंको सजाना चाहिये।
(अध्याय ७-८)
गोत्र-प्रवर आदिके ज्ञानकी आवश्यकता
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! गोत्र-प्रवरकी परम्पराको जानना अत्यन्त आवश्यक होता है, इसलिये अपने-अपने गोत्र या प्रवरको पिता, आचार्य तथा शास्त्रद्वारा जानना चाहिये। गोत्र-प्रवरको जाने बिना किया गया कर्म विपरीत फलदायी होता है। कश्यप, वसिष्ठ, विश्वामित्र, आङ्गिरस, च्यवन, मौकुन्य, वत्स, कात्यायन, अगस्त्य आदि अनेक गोत्रप्रवर्तक ऋषि हैं। गोत्रोंमें एक, दो, तीन, पाँच आदि प्रवर होते हैं। समान
गोत्रमें विवाहादि सम्बन्धोंका निषेध है। अपने गोत्र-प्रवरादिका ज्ञान शास्त्रान्तरोंसे कर लेना चाहिये।
वास्तवमें देखा जाय तो सारा जगत् महामुनि कश्यपसे उत्पन्न हुआ है। अतः जिन्हें अपने गोत्र और प्रवरका ज्ञान नहीं है, उन्हें अपने पिताजीसे ज्ञात कर लेना चाहिये। यदि उन्हें मालूम न हो तो स्वयंको काश्यप१ गोत्रीय मानकर उनका प्रवर लगाकर शास्त्रानुसार कर्म करना चाहिये।
(अध्याय ९)
वास्तु-मण्डलके निर्माण एवं वास्तु-पूजनकी संक्षिप्त विधि
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं वास्तु-मण्डलका संक्षिप्त वर्णन कर रहा हूँ। पहले भूमिपर अङ्गुरोंका रोपण करके भूमिकी परीक्षा कर ले।
तदनन्तर उत्तम भूमिके मध्यमें वास्तु-मण्डलका निर्माण करे। वास्तु-मण्डलके देवता पैतालीस हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं—(१) शिखी, (२) पर्जन्य,
१-गोत्र-प्रवर-निर्णयपर 'गोत्र-प्रवर-निबन्ध-कदम्ब' आदि कई स्वतन्त्र निबन्ध ग्रन्थ हैं। मत्स्यपुराणके अध्याय १९५-२०५ तकमें विस्तारसे यह विषय आया है तथा स्कन्दपुराणके माहेश्वरखण्ड एवं ब्रह्मखण्डमें भी इसपर विचार किया गया है।
२-सबके लिये एकमात्र परमात्मा ही परमकल्याणार्थ ध्येय-ज्ञेय हैं और कश्यपनन्दन सूर्यके रूपमें वे प्रत्यक्षरूपसे संसारका पालन, संचालन—उष्मा तथा प्रकाशके रूपमें, फिर वायु—प्राणके रूपमें समस्त प्राणियोंके जीवन बने हैं। इसलिये सभी वैष्णव और संन्यासी अपनेको अच्युत-गोत्रीय ही मानते हैं। प्राचीन परम्पराके अनुसार वेदाध्ययनमें वैदिक शाखा, सूत्र, ऋषि, गोत्र और प्रवरका ज्ञान आवश्यक था। यह विषय आश्वलायन गृह्यसूत्रमें भी निर्दिष्ट है।
३-जिस भूमिपर मनुष्यादि प्राणी निवास करते हैं, उसे वास्तु कहा जाता है। इसके गृह, देवप्रासाद, ग्राम, नगर, पुर, दुर्ग आदि अनेक भेद हैं। इसपर वास्तुराजवल्लभ, समराङ्गणसूत्रधार, वृहत्संहिता, शिल्पस्तु, गृहरत्नभूषण, हयशीर्षपाञ्चरात्र तथा कपिलपाञ्चरात्र आदि ग्रन्थोंमें पूर्ण विचार किया गया है। पुराणोंमें मत्स्य, अग्नि तथा विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें भी यह महत्त्वपूर्ण विषय आया है। 'कल्याण' के देवताङ्गमें भी वास्तु-चक्रादिके विषयमें सामग्री संकलित की गयी है। वास्तुके आविर्भावके विषयमें मत्स्यपुराणमें आया है कि अन्धकासुरके वधके समय भगवान् शंकरके ललाटेसे जो स्वेदबिन्दु गिरे उनसे एक भयंकर आकृतिवाला पुरुष प्रकट हुआ। जब वह त्रिलोकीका भक्षण करनेके लिये उद्यत हुआ, तब शंकर आदि देवताओंने उसे पृथ्वीपर सुलाकर वास्तुदेवता (वास्तुपुरुष)-के रूपमें प्रतिष्ठित किया और उसके शरीरमें सभी
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२६०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
(३) जयन्त, (४) कुलिशायुध, (५) सूर्य, (६) सत्य, (७) वृष, (८) आकाश, (९) वायु, (१०) पूषा, (११) वितथ, (१२) गुहा, (१३) यम, (१४) गन्धर्व, (१५) मृगराज, (१६) मृग, (१७) पितृगण, (१८) दौवारिक, (१९) सुग्रीव, (२०) पुष्पदन्त, (२१) वरुण, (२२) असुर, (२३) पशु, (२४) पाश, (२५) रोग, (२६) अहि, (२७) मोक्ष, (२८) भल्लाट, (२९) सोम, (३०) सर्प, (३१) अदिति, (३२) दिति, (३३) अपू, (३४) सावित्र, (३५) जय, (३६) रूद्र, (३७) अर्यमा, (३८) सविता, (३९) विवस्वान्, (४०) विबुधाधिप, (४१) मित्र, (४२) राजयक्ष्मा, (४३) पृथ्वीधर, (४४) आपवत्स तथा (४५) ब्रह्मा।
इन पैतालीस देवताओंके साथ ही वास्तु-मण्डलके बाहर ईशानकोणमें चरकी, अग्निकोणमें विदारी, नैऋत्यकोणमें पूतना तथा वायव्यकोणमें पापराक्षसीकी स्थापना करनी चाहिये। मण्डलके पूर्व दिशामें स्कन्द, दक्षिणमें अर्यमा, पश्चिममें जृम्भक तथा उत्तरमें पिलिपिच्छकी स्थापना करनी चाहिये। इस प्रकार वास्तु-मण्डलमें तिरपन देवी-देवताओंकी स्थापना होती है। इन सभीका अलग-अलग मन्त्रोंसे पूजन करना चाहिये। मण्डलके बाहर ही पूर्वादि दस दिशाओंमें दस दिक्पाल देवताओं—इन्द्र, अग्नि, यम, निऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा तथा अनन्तकी भी यथास्थान पूजा कर उन्हें बलि (नैवेद्य) निवेदित करनी चाहिये। वास्तु-मण्डलकी रेखाएँ श्वेत वर्णसे तथा मध्यमें कमल लाल वर्णसे अनुरञ्जित करना चाहिये। शिखी आदि पैतालीस
देवताओंके कोष्ठकोंको रक्तादि रंगोंसे अनुरञ्जित करना चाहिये। गृह, देवमन्दिर, महाकूप आदिक निर्माणमें तथा देव-प्रतिष्ठा आदिमें वास्तु-मण्डलका निर्माण कर वास्तुमण्डलस्थ देवताओंका आवाहन कर उनका पूजन आदि करना चाहिये। पवित्र स्थानपर लिपी-पुती डेढ़ हाथके प्रमाणकी भूमिपर पूर्वसे पश्चिम तथा उत्तरसे दक्षिण दस-दस रेखाएँ खींचे। इससे इक्यासी कोष्ठकके वास्तुपद-चक्रका निर्माण होगा। इसी प्रकार ९-९ रेखाएँ खींचनेसे चौंसठ पदका वास्तुचक्र बनता है।
वास्तु-मण्डलमें जिन देवताओंका उल्लेख किया गया है, उनका ध्यान और पूजन अलग-अलग मन्त्रसे किया जाता है। उल्लिखित देवताओंकी तुष्टिके लिये विधिके अनुसार स्थापना तथा पूजा करके हवन-कार्य सम्पन्न करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणोंको सुवर्ण आदि दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिये।
वास्तु-यागादिमें एक विस्तृत मण्डलके अन्तर्गत योनि तथा मेखलाओंसे समन्वित एक कुण्ड और वास्तु-वेदीका विधिके अनुसार निर्माण करना चाहिये। मण्डलके ईशानकोणमें कलश स्थापित कर गणेशजीका एवं कुण्डके मध्यमें विष्णु, दिक्पाल और ब्रह्मा आदिका तत्तद् मन्त्रोंसे पूजन करना चाहिये। प्राणायाम करके भूतशुद्धि करे। तदनन्तर वास्तुपुरुषका ध्यान इस प्रकार करे—वास्तुदेवता श्वेतवर्णके चार भुजावाले शान्तस्वरूप और कुण्डलोंसे अलंकृत हैं। हाथमें पुस्तक, अक्षमाला, वरद एवं अभय-मुद्रा धारण किये हुए
देवताओंने वास किया। इसीलिये वह वास्तुदेवता कहलाया। देवताओंने उसे पूजित होनेका वर भी प्रदान किया। वास्तुदेवताकी पूजाके लिये वास्तुप्रतिमा तथा वास्तुचक्र बनाया जाता है। वास्तुचक्र प्रायः ४९ से लेकर एक सहस्र पदात्मक होता है। भिन्न-भिन्न अवसरोंपर भिन्न-भिन्न वास्तुचक्रोंका निर्माण कर उनमें देवताओंका आवाहन, स्थापन एवं पूजन किया जाता है। चौंसठ पदात्मक तथा इक्यासी पदात्मक वास्तुचक्रके पूजनकी परम्परा विशेषरूपसे प्रचलित है। इस सभी वास्तुचक्रके भेदोंमें प्रायः इन्द्रादि दस दिक्पालोंके साथ शिखी आदि पैतालीस देवताओंका पूजन किया जाता है तथा उन्हें पायसन्न बलि प्रदान की जाती है। वास्तुकलशमें वास्तुदेवता (वास्तोष्पति)-की पूजा कर उनसे सर्वविधि शान्ति एवं कल्याणकी प्रार्थना की जाती है।
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- मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *
२६१
हैं। पितरों और वैश्वानरसे युक्त हैं तथा कुटिल भूसे सुशोभित हैं। उनका मुख भयंकर है। हाथ जानुपर्यन्त लम्बे हैं१। ऐसे वास्तुपुरुषका विधिके अनुसार पूजन कर उन्हें स्नान कराये। 'वास्तोष्पते' यह वास्तुदेवताके पूजनका मुख्य मन्त्र है२। पूजाकी जितनी सामग्री है, उसे प्रोक्षणद्वारा शुद्ध कर ले। आसनकी शुद्धि कर गणेश, सूर्य, इन्द्र और आधारशक्तिरूप पृथ्वी तथा ब्रह्माका पूजन करे। तदनन्तर हाथमें श्वेत चन्दनयुक्त श्वेत पुष्प लेकर विष्णुरूप वास्तुपुरुषका ध्यान कर उन्हें आसन, पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क आदि प्रदान करे और विविध उपचारोंसे उनकी पूजा करे।
विद्वान् ब्राह्मणको चाहिये कि कुण्ड और वास्तुदेवीके मध्यमें कलशकी स्थापना करे। कलशमें पर्वतके शिखर, गजशाला, वल्मीक, नदीसंगम, राजद्वार, चौराहे तथा कुशके मूलकी—यह सात प्रकारकी मिट्टी छोड़े। साथ ही उसमें इन्द्रवल्ली (पारिजात), विष्णुकान्ता (कृष्ण शङ्खुपुष्पी), अमृती (आमलकी), त्रपुष (खीरा), मालती, चम्पक
तथा ऊर्वारुक (ककड़ी)—इन वनस्पतियोंको छोड़े। पारिभद्र (नीम)-के पत्रोंसे कलशके कण्ठका परिवेष्टन करे और कलशके मुखमें फणाकाररूपमें पञ्चपल्लवोंकी स्थापना करे। उसके ऊपर श्रीफल, बीजपूर, नारिकेल, दाड़िम, धात्री तथा जम्बूफल रखे। कलशमें सुवर्णादि पञ्चरत्न छोड़े। गन्ध-पुष्पादि पञ्चोपचारोंसे कलशका पूजन करे। कलशमें वरुणका आवाहन करे। कलशका स्पर्श करते हुए उसमें समस्त समुद्रों, तीर्थों, गङ्गादि नदियों तथा पवित्र जलाशयों आदिके पवित्र जलकी भावना कर, उनका आवाहन करे। कलश-स्थापनके अनन्तर तिल, चावल, मध्वाज्य तथा दही, दूध आदिसे यथाविधि वास्तु-होम करे। वास्तु-हवनके समय वास्तु-देवताके मन्त्रका जप करे। अनन्तर वास्तु-मण्डलके समस्त देवताओंको पायसात्र, कृशरात्र आदि पृथक्-पृथक् क्रमशः बलि निवेदित करे। सभी देवताओंको उन्हींके अनुरूप पताका भी प्रदान करे। अपनी सामर्थ्यके अनुसार मन्त्र-जप और वास्तुपुरुषस्तवका पाठ करे३। भगवान्
१-श्वेतं चतुर्भुजं शान्तं कुण्डलाधैरलंकृतम्। पुस्तकं चाक्षमालां च वराभयकरं परम्॥
पितृवैश्वानरोपेतं कुटिलभूपशोभितम्। करालवदनं चैव आजानुकरलम्बितम्॥ (मध्यमपर्व २।११।११-१२)
२-पूरा मन्त्र इस प्रकार है—
वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्तस्वावेशो अनभीवो भवानः। यत् त्वेमेहे प्रति तन्नो जुपस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥
(ऋ७।५४।१)
हे वास्तुदेव! हम आपके सच्चे उपासक हैं, इसपर आप पूर्ण विश्वास करें और हमारी स्तुति-प्रार्थनाओंको सुनकर हम सभी उपासकोंको आधि-व्याधिमुक्त कर दें तथा जो हम अपने धन-श्रेयर्थकी कामना करते हैं, आप उसे भी परिपूर्ण कर दें, साथ ही इस वास्तुक्षेत्र या गृहमें निवास करनेवाले हमारे स्त्री-पुत्रादि-परिवार-परिजनोंके लिये कल्याणकारक हों एवं हमारे अधीनस्थ गौ, अश्वदि सभी चतुष्पद प्राणियोंका भी कल्याण करें।
३-भगवान् शंकरके द्वारा की गयी 'ब्रह्मस्तव' नामकी विष्णु-स्तुति इस प्रकार है—
विष्णुर्जिष्णुर्विभुर्ज्यो यज्ञियो यज्ञपालकः। नारायणो नरो हंसो विष्वक्सेनो हुताशनः॥
यज्ञेशः पुण्डरीकाक्षः कृष्णः सूर्यः सुरार्चितः। आदिदेवो जगत्कर्ता मण्डलेशो महीधरः॥
पद्मनाभो हृषीकेशो दाता दामोदरो हरिः। त्रिविक्रमस्त्रिलोकेशो ब्रह्मणः प्रीतिवर्धनः॥
भक्तप्रियोऽच्युतः सत्यः सत्यवाक्यो ध्रुवः शुचिः। संन्यासी शास्त्रतत्त्वज्ञस्त्रिपञ्चाशदगुणात्मकः॥
विदारी विनयः शान्तस्तपस्वी वैद्युतप्रभः। यज्ञस्त्वं हि वषट्कारस्त्वमंकारस्त्वमन्यः॥
त्वं स्वधा त्वं हि स्वाहा त्वं सुधा च पुरुषोत्तमः।
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२६२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
शंकरने भगवान् विष्णुस्वरूप वास्तोष्पतिकी इस स्तुतिको कहा है। इसका जो प्रयत्नपूर्वक निरन्तर पाठ करता है, उसे अमरता प्राप्त हो जाती है और जो हल्कमलके मध्य निवास करनेवाले भगवान् अच्युत-विष्णुका ध्यान करता है, वह वैष्णवी सिद्धि प्राप्त करता है। यज्ञकर्मीकी पूर्णतामें आचार्यको पयस्विनी गौ तथा सुवर्ण दक्षिणामें दे, अन्य ब्राह्मणोंको भी सुवर्ण प्रदान करे। प्राजापत्य और स्विष्टकृत हवन करे। आचार्य और ऋत्विज मिलकर यजमानपर कलशके जलसे अभिषेक करें। पूर्णाहुति देकर भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे। ब्राह्मणोंकी
आज्ञा लेकर यजमान घरमें प्रवेश करे, अनन्तर ब्राह्मण-भोजन कराये। दीन, अन्ध और कृपणोंका अपनी शक्तिके अनुसार सम्मान करे। फिर अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वयं भोजन करे। उस दिन भोजनमें दूध, कसैले पदार्थ, भुने हुए शाक तथा करेला आदि निषिद्ध पदार्थोंका उपयोग न करे। शाल्यन्त्र, मूली, कटहल, आम, मधु, घी, गुड़, सेंधा नमकके साथ मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू), बदरीफल, धात्रीफल एवं तिल और मरिच आदिसे बने पदार्थ भोजनमें प्रशस्त कहे गये हैं।
(अध्याय १०—१३)
कुशकण्डिका-विधान तथा अग्नि-जिह्वाओंके नाम
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं याग-विशेषोंमें स्वगृह्याग्नि-विधि कह रहा हूँ। अपनी वेदादि शाखाके अनुकूल ही गृह्याग्नि-विधि करनी चाहिये। दूसरेकी शाखाके विधानसे याग-विशेषोंका अनुष्ठान करनेपर भयकी प्राप्ति होती है और कीर्तिका नाश होता है। पुत्र, कन्या और आगे उत्पन्न होनेवाले पुत्रादि गृह्यानामसे कहे जाते हैं। यजमानके जितने दायद होते हैं, वे सब गृह्यानामसे कहे जाते हैं। उनके संस्कार, याग और शान्तिकर्म-क्रियाओंमें अपने गृह्याग्निसे ही अनुष्ठान करना चाहिये। आचार्यद्वारा विहित कल्पको दक्षस्मृतिमें कहा गया है। आचार्य इन कर्मोंमें तीन कुशाओंका परिग्रहण करता है। जिस मन्त्रसे कुशा ग्रहण करता है, उसके ऋषि दक्ष, जगती छन्द और विष्णु देवता हैं। पृथ्वीके शोधनमें 'भूरसिः' (यजु० १३।१८) इस मन्त्रका विनियोग करे। इस मन्त्रके ऋषि सुवर्ण हैं, गायत्री और
जगती छन्द तथा सूर्य देवता हैं। अनन्तर उन तीन कुशाओंको तर्जनी तथा अँगूटसे पकड़कर ईशानकोणसे लेकर दक्षिण होते हुए ईशानकोणतक वलयाकृतितमें घुमाये तथा उनसे भूमिका मार्जन करे। यही परिसमूहन-क्रिया है। 'मा नस्तोके ०' (यजु० १६।१६) इस मन्त्रके द्वारा गोमयसे भूमिका उपलेपन करे। तदनन्तर (खैरकी लकड़ीसे बने स्पयके द्वारा) रेखाकरण करे। पूरबसे पश्चिमकी ओर तीन रेखाएँ खींचे। पहली रेखा दक्षिणकी ओर अनन्तर उत्तरकी ओर बढ़े। इसके विपरीत करनेपर अमङ्गल होता है। इसके बाद अङ्गुष्ठ तथा अनामिकासे उन तीनों रेखाओंसे मिट्टी निकाले, इसे उद्घरण कहा जाता है। इस समय 'मित्रावरुणाभ्यां' (यजु० ७।२३) इत्यादि मन्त्रोंका स्मरण करे। अनन्तर कुशपुष्पोदक अथवा पञ्चगव्य या पञ्चरत्नोदक अथवा पञ्चपल्लवोंके जलसे अभ्युक्षण (अभिस्निग्धन) करे। अनन्तर
नमो देवादिदेवाय विष्णवे शाश्वताय च । अनन्तायाप्रमेयाय नमस्ते गरुडध्वज ॥
ब्रह्मस्त्वमिमं प्रोक्तं महादेवेन भाषितम् । प्रयत्नाद् यः पठेन्नित्यममृतत्वं स गच्छति ॥
ध्यायन्ति ये नित्यमनन्तामच्युतं हृत्पद्ममध्ये स्वयमाव्यवस्थितम् ।
उपासकानां प्रभुमेकमीश्वरं ते यन्ति सिद्धिं परमां तु वैष्णवीम् ॥ (मध्यमपर्व २।१२।१५६—१६३)
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- मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *
२६३
कर्मसाधनभूत लौकिक स्मार्त अथवा श्रौताग्निका आनयन करे और अपने सामने स्थापित करे। इस क्रियामें 'मे गृह्णाभिः' इस मन्त्रका पाठ करे। 'ऋव्यादमग्निः' (यजुः ३५।१९) इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए लायी गयी अग्निमेंसे कुछ आग दक्षिण दिशाकी ओर फेंक दे, यह 'ऋव्यादाग्निः' कही गयी है। ऋव्यादाग्निका ग्रहण न करे। 'संसरक्षः' इस मन्त्रसे उस अग्निका आवाहन करे। तदनन्तर 'वैश्वानरः' (यजुः २६।७) इस मन्त्रसे कुण्ड आदिमें अग्नि-स्थापन करे। 'बध्नासिः' इस मन्त्रसे अग्निकी प्रदक्षिणा करे तथा अग्निदेवको नमस्कार करे। अग्निके दक्षिणमें वरण किये गये ब्रह्माको कुशके आसनपर 'ब्रह्मन् इह उपविश्यताम्' कहकर बैठाये। उस समय 'ब्रह्म जज्ञानं' (यजुः १३।३) तथा 'दोग्धी धेनुः' इन दो मन्त्रोंका पाठ करे। अग्निके उत्तरभागमें प्रणीता-पात्रको स्थापित करे। 'इमं मे वरुणः' (यजुः २१।१) इस मन्त्रसे प्रणीता-पात्रको जलसे भर दे। इसके अनन्तर कुण्डके चारों ओर कुश-परिस्तरण करे और काष्ठ (समिधा), व्रीहि, अन्न, तिल, अपूप, भुङ्गराज, फल, दही, दूध, पनस, नारिकेल, मोदक आदि यज्ञ-सम्बन्धी प्रयोज्य पदार्थोंको यथास्थान स्थापित करे। विकंकतवृक्षकी लकड़ीसे बनी खुवा तथा शमी, शमीपत्र, चरुस्थाली आदि भी स्थापित करे। प्रणीता-पात्रका स्पर्श होम-कालमें नहीं करना चाहिये। स्नान-कुम्भको यज्ञपर्यन्त स्थिर रखना चाहिये। प्रादेशमात्रके दो पवित्रक बनाकर प्रोक्षणी-पात्रमें स्थापित करे। प्रणीता-पात्रके जलसे प्रोक्षणी-पात्रमें तीन बार जल डाले। प्रोक्षणी-पात्रको बायें हाथमें रखकर मध्यमा तथा अङ्गुष्ठसे पवित्रक ग्रहण कर 'पवित्रं ते' (ऋ ९।८३।१) इस मन्त्रसे तीन बार जल छिड़के, स्थापित पदार्थोंका प्रोक्षण करे और
प्रोक्षणी-पात्रको प्रणीता-पात्रके दक्षिण-भागमें यथास्थान रख दे। प्रादेशमात्रके अन्तरमें आज्यस्थाली रखे। घीको अग्निमें तपाये, घीमेंसे अपद्रव्योंका निरसन करे। इसके बाद पर्यग्निकरण करे। एक जलते हुए आगके अंगारेको लेकर आज्यस्थाली और चरुस्थालीके ऊपर भ्रमण कराये। इस समय 'कुलायिनी' (यजुः १४।२) इस मन्त्रका पाठ करे। अनन्तर खुवाको दायें हाथमें ग्रहण कर अग्निपर तपाये। सम्मार्जन-कुशाओंसे खुवाको मूलसे अग्रभागकी ओर सम्माजित करे। इसके बाद प्रणीताके जलसे तीन बार प्रोक्षण करे। पुनः खुवाको आगपर तपाये और प्रोक्षणीके उत्तरकी ओर रख दे। आज्यपात्रको सामने रख ले। पवित्रीसे घीका तीन बार उत्प्लवन कर ले। पवित्रीसे ईशानसे आरम्भकर दक्षिणावर्त होते हुए ईशानपर्यन्त पर्युक्षण करे। अनन्तर अग्निदेवका इस प्रकार ध्यान करे—'अग्नि देवताका रक्त वर्ण है, उनके तीन मुख हैं, वे अपने बायें हाथमें कमण्डलु तथा दाहिने हाथमें खुवा ग्रहण किये हुए हैं।' ध्यानके अनन्तर खुवा लेकर हवन करे।
इस प्रकार स्वगृह्योक्त विधिके द्वारा ब्रह्मा तथा ऋत्विजोंका वरण करना चाहिये। कुशकण्डिका-कर्म करके अग्निका पूजन करे। आधार, आज्यभाग, महाव्याहृति, प्रायश्चित्त, प्राजापत्य तथा स्वष्टकृत् हवन करे। प्रजापति और इन्द्रके निमित्त दी गयी आहुतियाँ आधारसंज्ञक हैं। अग्नि और सोमके निमित्त दी जानेवाली आहुतियाँ आज्यभाग कहलाती हैं। 'भूर्भुवः स्वः'—ये तीन महाव्याहृतियाँ हैं। 'अयाश्रग्ने' इत्यादि पाँच मन्त्र प्रायश्चित्त-संज्ञक हैं। एक प्राजापत्य आहुति तथा एक स्वष्टकृत् आहुति—इस प्रकार होममें चौदह आहुतियाँ नित्य-संज्ञक हैं। इस प्रकार चतुर्दश आहुत्यात्मक हवन कर कर्म-निमित्तक देवताको उद्देश्यकर प्रधान
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२६४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
हवन करना चाहिये। अग्निकी सात जिह्वाएँ कही गयी हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—(१) हिरण्या, (२) कनका, (३) रक्ता, (४) आरक्ता, (५) सुप्रभा,
(६) बहुरूपा तथा (७) सती। इन जिह्वा-देवियोंके ध्यान करनेसे सम्पूर्ण फलकी प्राप्ति होती है।
(अध्याय १४—१६)
अधिवासनकर्म एवं यज्ञकर्ममें उपयोग्य उत्तम ब्राह्मण तथा धर्मदेवताका स्वरूप
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! देव-प्रतिष्ठाके पहले दिन देवताओंका अधिवासन करना चाहिये और विधिके अनुसार अधिवासनके पदार्थ—धान्य आदिकी प्रतिष्ठा कर यूप आदिको भी स्थापित कर लेना चाहिये। कलशके ऊपर गणेशजीकी स्थापना कर दिक्पाल और ग्रहोंका पूजन करना चाहिये। तड़ाग तथा उद्यानकी प्रतिष्ठामें प्रधानरूपसे ब्रह्माकी, शान्ति-यागमें तथा प्रपायागमें वरुणकी, शैव-प्रतिष्ठामें शिवकी और सोम, सूर्य तथा विष्णु एवं अन्य देवताओंका भी पाद्य-अर्घ्य आदिसे अर्चन करना चाहिये। 'द्वुपदादिव' (यजु० २०।२०) इस मन्त्रसे पहले प्रतिमाको स्नान कराये। स्नानके अनन्तर मन्त्रोंद्वारा गन्ध, फूल, फल, दूर्वा, सिंदूर, चन्दन, सुगन्धित तैल, पुष्प, धूप, दीप, अक्षत, वस्त्र आदि उपचारोंसे पूजन करे। मण्डपके अंदर प्रधान देवताका आवाहन करे और उसीमें अधिवासन करे। सुरक्षा-कर्मियोंद्वारा उस स्थानकी सुरक्षा करवाये। तदनन्तर आचार्य, यजमान और ऋत्विक् मधुर पदार्थोंका भोजन करें। बिना अधिवासन-कर्म सम्पन्न किये देव प्रतिष्ठाका कोई फल नहीं होता। नित्य, नैमित्तिक, अथवा काम्य कर्मोंमें विधिके अनुसार कुण्ड-मण्डपकी रचना कर हवनकार्य करना चाहिये।
ब्राह्मणो! यज्ञकार्यमें अनुष्ठानके प्रमाणसे आठ होता, आठ द्वारपाल और आठ याजक ब्राह्मण होने चाहिये। ये सभी ब्राह्मण शुद्ध, पवित्र तथा उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न वेदमन्त्रोंमें पारङ्गत होने चाहिये। एक जप करनेवाले जापकका भी वरण करना चाहिये। ब्राह्मणोंकी गन्ध, माल्य, वस्त्र तथा
दक्षिणा आदिके द्वारा विधिके अनुसार पूजा करनी चाहिये। उत्तम सर्वलक्षणसम्पन्न तथा विद्वान् ब्राह्मण न मिलनेपर किये गये यज्ञका उत्तम फल प्राप्त नहीं होता। ब्राह्मण वरणके समय गोत्र और नामका निर्देश करे। तुलापुरुषके दानमें, स्वर्णपर्वतके दानमें, वृषोत्सर्गमें एवं कन्यादानमें गोत्रके साथ प्रवरका भी उच्चारण करना चाहिये। मृत भार्यावाला, कृपण, शूद्रके घरमें निवास करनेवाला, बौना, वृषलीपति, बन्धुद्वेषी, गुरुद्वेषी, स्त्रीद्वेषी, हीनाङ्ग, अधिकाङ्ग, भग्नदन्त, दाम्भिक, प्रतिग्राही, कुनखी, व्यभिचारी, कुष्ठी, निद्रालु, व्यसनी, अदीक्षित, महाव्रणी, अपुत्र तथा केवल अपना ही भरण-पोषण करनेवाला—ये सब यज्ञके पात्र नहीं हैं। ब्राह्मणोंके वरण एवं पूजनके मन्त्रोंके भाव इस प्रकार हैं—आचार्यदेव! आप ब्रह्मकी मूर्ति हैं। इस संसारसे मेरी रक्षा करें। गुरो! आपके प्रसादसे ही यह यज्ञ करनेका सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ है। चिरकालतक मेरी कीर्ति बनी रहे। आप मुझपर प्रसन्न होवें, जिससे मैं यह कार्य सिद्ध कर सकूँ। आप सब भूतोंके आदि हैं, संसाररूपी समुद्रसे पार करानेवाले हैं। ज्ञानरूपी अमृतके आप आचार्य हैं। आप यजुर्वेदस्वरूप हैं, आपको नमस्कार हैं। ऋत्विग्गणो! आप षडङ्ग वेदोंके ज्ञाता हैं, आप हमारे लिये मोक्षप्रद हों। मण्डलमें प्रवेश करके उन ब्राह्मणोंको अपने-अपने स्थानोंपर क्रमशः आदरसे बैठाये। वेदीके पश्चिम भागमें आचार्यको बैठाये, कुण्डके अग्र-भागमें ब्रह्माको बैठाये। होता, द्वारपाल आदिको भी यथास्थान आसन दे। यजमान उन आचार्य आदिको सम्बोधित कर प्रार्थना करे कि
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- मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *
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आप सब नारायणस्वरूप हैं। मेरे यज्ञको सफल बनायें। यजुर्वेदके तत्त्वार्थको जाननेवाले ब्रह्मरूप आचार्य! आपको प्रणाम है। आप सम्पूर्ण यज्ञकर्मके साक्षीभूत हैं। ऋग्वेदार्थको जाननेवाले इन्द्ररूप ब्रह्मन्! आपको नमस्कार है। इस यज्ञकर्मकी सिद्धिके लिये ज्ञानरूपी मङ्गलमूर्ति भगवान् शिवको नमस्कार है। आप सभी दिशाओं-विदिशाओंसे इस यज्ञकी रक्षा करें। दिक्पालरूपी ब्राह्मणोंको नमस्कार है।
व्रत, देवार्चन तथा यागादि कर्म संकल्पपूर्वक करने चाहिये। काम संकल्पमूलक और यज्ञ संकल्पसम्भूत हैं। संकल्पके बिना जो धर्माचरण करता है, वह कोई फल नहीं प्राप्त कर सकता।
गङ्गा, सूर्य, चन्द्र, द्यौ, भूमि, रात्रि, दिन, सूर्य, सोम, यम, काल, पञ्च महाभूत—ये सब शुभाशुभ-कर्मके साक्षी हैं१। अतएव विचारवान् मनुष्यको अशुभ कर्मोंसे विरत हो धर्मका आचरण करना चाहिये। धर्मदेव शुभ शरीरवाले एवं श्वेत वस्त्र धारण करते हैं। वृषस्वरूप ये धर्मदेव अपने दोनों हाथोंमें वरद और अभय-मुद्रा धारण किये हैं। ये सभी प्राणियोंको सुख देते हैं और सज्जनोंके लिये एकमात्र मोक्षके कारण हैं। इस प्रकारके स्वरूपवाले भगवान् धर्मदेव सत्पुरुषोंके लिये कल्याणकारी हों तथा सदा सबकी रक्षा करें२। (अध्याय १७-१८)
प्रतिष्ठा-मुहूर्त एवं जलाशय आदिकी प्रतिष्ठा-विधि
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! ऋषियोंने देवता आदिकी प्रतिष्ठामें माघ, फाल्गुन आदि छः मास नियत किये हैं। जबतक भगवान् विष्णु शयन नहीं करते, तबतक प्रतिष्ठा आदि कार्य करने चाहिये। शुक्र, गुरु, बुध तथा सोम—ये चार बार शुभ हैं। जिस लगनमें शुभ ग्रह स्थित हों एवं शुभ ग्रहोंकी दृष्टि पड़ती हो, उस लगनमें प्रतिष्ठा करनी चाहिये। तिथियोंमें द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी तथा पूर्णिमा तिथियाँ उत्तम हैं। प्राण-प्रतिष्ठा एवं जलाशय आदि कार्य प्रशस्त शुभ मुहूर्तमें ही करने चाहिये। देवप्रतिष्ठा और बड़े यागोंमें सोलह हाथका एवं चार द्वारोंसे युक्त मण्डपका निर्माण करके उसके दिशा-विदिशाओंमें शुभ्र ध्वजारें फहरानी चाहिये। पाकड़, गूलर, पीपल तथा बरगदके तोरण चारों द्वारोंपर पूर्वादि क्रममें बनाये। मण्डपको मालाओं आदिसे अलंकृत करे। दिक्पालोंकी पताकाएँ
उनके वर्णोंके अनुसार बनवानी चाहिये। मध्यमें नीलवर्णकी पताका लगानी चाहिये। ध्वज-दण्ड यदि दस हाथका हो तो पताका पाँच हाथकी बनवानी चाहिये। मण्डपके द्वारोंपर कदली-स्तम्भ रखना चाहिये तथा मण्डपको सुसज्जित करना चाहिये। मण्डपके मध्यमें एवं कोणोंमें वेदियोंकी रचना करनी चाहिये। योनि और मेखलामण्डित कुण्डका तथा वेदीपर सर्वतोभद्र-चक्रका निर्माण करना चाहिये। कुण्डके ईशान-भागमें कलशकी स्थापना कर उसे माला आदिसे अलंकृत करना चाहिये।
यजमान पञ्चदेव एवं यज्ञेश्वर नारायणको नमस्कार कर प्रतिष्ठा आदि क्रियाका संकल्प करके ब्राह्मणोंसे इस प्रकार अनुज्ञा प्राप्त करे—‘मैं इस पुण्य देशमें शास्त्रोक्त-विधिसे जलाशय आदिकी प्रतिष्ठा करूँगा। आप सभी मुझे इसके लिये आज्ञा प्रदान करें।’ ऐसा कहकर मातृ-श्राद्ध एवं वृद्धि-श्राद्ध सम्पन्न
१-गङ्गा चादित्यचन्द्रौ च द्यौर्भूमौ रात्रिवासरी ॥
सूर्यः सोमो यमः कालो महाभूतानि पञ्च च। एते शुभाशुभस्थेह कर्मणो नव साक्षिणः ॥ (मध्यमपर्व २।१८।४३-४४)
२-धर्मः शुभ्रवपुः सिताम्बधरः कार्याध्वंदेशे वृषो हस्ताभ्यामभयं वरं च सततं रूपं परं यो दधत्।
सर्वप्राणिसुखावहः कृतधियां मोक्षकहेतुः सदा सोऽयं पातु जगन्ति चैव सततं भूयात् सतां भूतये ॥ (मध्यमपर्व २।१८।४६)
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२६६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
करे। भेरी आदिके मङ्गलमय वाद्योंके साथ मण्डपमें षोडशाक्षर 'हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।' आदि मन्त्र लिखे एवं इन्द्रादि दिकपाल देवताओं तथा उनके आयुधों आदिका भी यथास्थान चित्रण करे। फिर आचार्य और ब्रह्माका वरण करे। वरणके अनन्तर आचार्य तथा ब्रह्मा यजमानसे प्रसन्न हो उसके सर्वविध कल्याणकी कामना करके 'स्वस्ति' ऐसा कहे। अनन्तर सपत्नीक यजमानको सर्वौषधियोंसे 'आपो हि घ्ना' (यजु० ११।५०) इस मन्त्रद्वारा ब्रह्मा, ऋत्विक् आदि स्नान करायें। यव, गोधूम, नीवार, तिल, साँवा, शालि, प्रियंगु और व्रीहि—ये आठ सर्वौषधि कहे गये हैं। आचार्यादिद्वारा अनुज्ञात सपत्नीक यजमान शुक्ल वस्त्र तथा चन्दन आदि धारणकर पुरोहितको आगेकर मङ्गल-घोषके साथ पुत्र-पौत्रादिसहित पश्चिमद्वारसे यज्ञ-मण्डपमें प्रवेश करे। वहाँ वेदीकी प्रदक्षिणा कर नमस्कार करे। ब्राह्मणकी आज्ञाके अनुसार यजमान निश्चित आसनपर बैठे। ब्राह्मणलोग स्वस्तिवाचन करें। अनन्तर यजमान पाँच देवोंका पूजन करे। फिर सरसों आदिसे विघ्नकर्ता भूतोंका अपसर्पण कराये। यजमान अपने बैठनेके आसनका पुष्प-चन्दनसे अर्चन करे। अनन्तर भूमिका हाथसे स्पर्शकर इस प्रकार कहे—'पृथ्वीमाता! तुमने लोकोंको धारण किया है और तुम्हें विष्णुने धारण किया है। तुम मुझे धारण करो और मेरे आसनको पवित्र करो*।' फिर सूर्यको अर्घ्य देकर गुरुको हाथ जोड़कर प्रणाम करे। हृदयकमलमें इष्ट देवताका ध्यान कर तीन प्राणायाम करे। ईशान दिशामें कलशके ऊपर विघ्नराज गणेशजीकी गन्ध, पुष्प, वस्त्र तथा विविध नैवेद्य आदिसे 'गणानां त्वा' (यजु० २३।१९) मन्त्रसे पूजन करे। अनन्तर 'आ ब्रह्मन्' (यजु० २२।२२) इस मन्त्रसे ब्रह्माजीकी, 'तद्विष्णोः' (यजु० ६।५) इस मन्त्रसे भगवान्
विष्णुकी पूजा करे। फिर वेदीके चारों ओर सभी देवताओंको स्व-स्व स्थानपर स्थापित कर उनका पूजन करे। इसके बाद 'राजाधिराजाय प्रसह्य' इस मन्त्रसे भूशुद्धि कर श्वेत पद्यासनपर विराजमान, शुद्धस्फटिक तथा शङ्खु, कुन्द एवं इन्दुके समान उज्ज्वल वर्ण, किरीट-कुण्डलधारी, श्वेत कमल, श्वेत माला और श्वेत वस्त्रसे अलंकृत, श्वेत गन्धसे अनुलिस, हाथमें पाश लिये हुए, सिद्ध गन्धर्वों तथा देवताओंसे स्तूयमान, नागलोककी शोभारूप, मकर, ग्राह, कूर्म आदि नाना जलचरोंसे आवृत, जलशायी भगवान् वरुणदेवका ध्यान करे। ध्यानके अनन्तर पञ्चाङ्गन्यास कर मूलमन्त्रका जप करे तथा उस जलसे आसन, यज्ञ-सामग्री आदिका प्रोक्षण करे। फिर भगवान् सूर्यको अर्घ्य दे। अनन्तर ईशानकोणमें भगवान् गणेश, अग्निकोणमें गुरुपादुका तथा अन्य देवताओंका यथाक्रम पूजन करे। मण्डलके मध्यमें शक्ति, सागर, अनन्त, पृथ्वी, आधारशक्ति, कूर्म, सुमेरु तथा मन्दर और पञ्चतत्त्वोंका साङ्गोपाङ्ग पूजन करे। पूर्व दिशामें कलशके ऊपर श्वेत अक्षत और पुष्प लेकर भगवान् वरुणदेवका आवाहन करे। वरुणको आठ मुद्रा दिखाये। गायत्रीसे स्नान कराये तथा पाद्य, अर्घ्य, पुष्पाञ्जलि आदि उपचारोंसे वरुणका पूजन करे। ग्रहों, लोकपालों, दस दिकपालों तथा पीठपर ब्रह्मा, शिव, गणेश और पृथ्वीका गन्ध, चन्दन आदिसे पूजन करे। पीठके ईशानादि कोणोंमें कमला, अम्बिका, विश्वकर्मा, सरस्वती तथा पूर्वदि द्वारोंमें उनचास मरुद्गणोंका पूजन करे। पीठके बाहर पिशाच, राक्षस, भूत, बेताल आदिकी पूजा करे। कलशपर सूर्यादि नवग्रहोंका आवाहन एवं ध्यानकर पाद्य, अर्घ्य, गन्ध, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य तथा बलि आदिद्वारा मन्त्रपूर्वक उनकी पूजा करे और उनकी पताकाएँ उन्हें निवेदित करे।
- पृथिव्यं त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता ॥
त्वं च धारय मां नित्यं पवित्रभासनं कुरु। (मध्यमपर्व २।२०।२३-२४)
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- मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *
२६७
विधिपूर्वक सभी देवताओंका पूजन कर शतरुद्रियका पाठ करना चाहिये। हवन करनेके समय वारुणसूक्त, रात्रिसूक्त, रौद्रसूक्त, पवमानसूक्त, पुरुषसूक्त, शाक्तसूक्त, अग्निसूक्त, सौरसूक्त, ज्येष्ठसाम, वामदेवसाम, रथन्तरसाम तथा रक्षोच्च आदि सूक्तोंका पाठ करना चाहिये। अपने गृह्योक्त-विधिसे कुण्डोंमें अग्नि प्रदीप्त कर हवन करना चाहिये। जिस देवका यज्ञ होता है अथवा जिस देवताकी प्रतिष्ठा हो उसे प्रथम आहुतियाँ देनी चाहिये। अनन्तर तिल, आज्य, पायस, पत्र, पुष्प, अक्षत तथा समिधा आदिसे अन्य देवताओंके मन्त्रोंसे उन्हें आहुतियाँ देनी चाहिये।
पञ्चदिवसात्मक प्रतिष्ठायागमें प्रथम दिन देवताओंका आवाहन एवं स्थापन करना चाहिये। दूसरे दिन पूजन और हवन, तीसरे दिन बलि-प्रदान, चौथे दिन चतुर्थीकर्म और पाँचवें दिन नीराजन करना चाहिये। नित्यकर्म करनेके अनन्तर ही नैमित्तिक कर्म करने चाहिये। इसीसे कर्मफलकी प्राप्ति होती है।
दूसरे दिन प्रातःकाल सर्वप्रथम प्रतिष्ठाप्य देवताका सर्वोषधिमिश्रित जलसे ब्राह्मणोंद्वारा वेदमन्त्रोंके पाठपूर्वक महास्नान तथा मन्त्राभिषेक कराये, तदनन्तर चन्दन आदिसे उसे अनुलिप्त करे। तत्पश्चात् आचार्य आदिकी पूजा कर उन्हें अलंकृत कर गोदान करे। फिर मङ्गल-घोषपूर्वक तालाबमें जल छोड़नेके लिये संकल्प करे। इसके बाद उस तालाबके जलमें नागयुक्त वरुण, मकर, कच्छप आदिकी अलंकृत प्रतिमाएँ छोड़े। वरुणदेवकी विशेषरूपसे पूजा कर उन्हें अर्घ्य निवेदित करे। पुनः उसी तालाबके जल, सप्तमृत्तिका-मिश्रित जल, तीर्थजल, पञ्चामृत, कुशोदक तथा पुष्पजल आदिसे वरुणदेवको स्नान कराकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि प्रदान
करे। सभी देवताओंको बलि प्रदान करे। मङ्गलघोषके साथ नीराजन कर प्रदक्षिणा करे। एक वेदीपर भगवान् वरुण तथा पुष्करिणीदेवीकी यथाशक्ति स्वर्ण आदिकी प्रतिमा बनाकर भगवान् वरुणदेवके साथ देवी पुष्करिणीका विवाह कराकर उन्हें वरुणदेवके लिये निवेदित कर दे। एक काष्ठका यूप जो यजमानकी ऊँचाईके बराबर हो, उसे अलंकृत कर तडागके ईशान दिशामें मन्त्रपूर्वक गाड़कर स्थिर कर दे। प्रासादके ईशानकोणमें, प्रपाके दक्षिण भागमें तथा आवासके मध्यमें यूप गाड़ना चाहिये। इसके अनन्तर दिव्यालोंको बलि प्रदान करे। ब्राह्मणोंको भोजन एवं दक्षिणा प्रदान करे।
उस तडागके जलके मध्यमें 'जलमातृभ्यो नमः' ऐसा कहकर जलमातृकाओंका पूजन करे और मातृकाओंसे प्रार्थना करे कि मातृका देवियो! तीनों लोकोंके चराचर प्राणियोंकी संतुसिके लिये यह जल मेरे द्वारा छोड़ा गया है, यह जल संसारके लिये आनन्ददायक हो। इस जलाशयकी आपलोग रक्षा करें। ऐसी ही मङ्गल-प्रार्थना भगवान् वरुणदेवसे भी करे। अनन्तर वरुणदेवको बिम्ब, पद्म तथा नागमुद्राएँ दिखाये। ब्राह्मणोंको उस जलाशयका जल भी दक्षिणाके रूपमें प्रदान करे। अनन्तर तर्पण कर अग्निकी प्रार्थना करे। स्वयं भी उस जलका पान करे। पितरोंको अर्घ्य प्रदान करे। अनन्तर पुनः वरुणदेवकी प्रार्थना कर, जलाशयकी प्रदक्षिणा करे। फिर ब्राह्मणोंद्वारा वेद-ध्वनियोंके उच्चारणपूर्वक यजमान अपने घरमें प्रवेश करे और ब्राह्मणों, दीनों, अन्धों, कृपणों तथा कृमारिकाओंको भोजन कराकर संतुष्ट करे एवं भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे।
(अध्याय १९-२१)
॥ मध्यमपर्व, द्वितीय भाग सम्पूर्ण ॥
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
मध्यमपर्व
(तृतीय भाग) उद्यान-प्रतिष्ठा-विधि
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! उद्यान आदिकी प्रतिष्ठामें जो कुछ विशेष विधि है, अब उसे बता रहा हूँ, आपलोग सुनें। सर्वप्रथम एक चौकोर मण्डलकी रचना कर उसपर अष्टदल कमल बनाये। मण्डलके ईशानकोणमें कलशकी स्थापना कर उसपर भगवान् गणनाथ और वरुणदेवकी पूजा करे। तदनन्तर मध्यम कलशमें सूर्यादि ग्रहोंका पूजन करे। फिर पश्चिमादि द्वारदेशोंमें ब्रह्मा और अनन्त तथा मध्यमें वरुणकी पूजा करे। जलपूरित कलशमें भगवान् वरुणका आवाहन करते हुए कहे—‘वरुणदेव! मैं आपका आवाहन करता हूँ। विभो! आप हमें स्वर्ग प्रदान करें।’ तदनन्तर पूर्वभागमें मन्दरगिरिकी स्थापना कर तोरणपर विष्वक्सेनकी पूजा करे और कर्णिका-देशमें भगवान् वासुदेवका पूजन करे। भगवान् वासुदेव शुद्ध स्फटिकके सदृश हैं। वे अपने चारों हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए हैं। उनके वक्षःस्थलपर श्रीवत्स-चिह्न और कौस्तुभमणि सुशोभित है तथा मस्तक सुन्दर मुकुटसे अलंकृत है। उनके दक्षिण भागमें भगवती कमला, वाम भागमें पुष्टिदेवी विराजमान हैं। सुर, असुर, सिद्ध, किन्नर, यक्ष आदि उनकी स्तुति करते हैं। ‘विष्णो रराटः’ (यजु० ५।२१) इस मन्त्रसे भगवान् विष्णुकी पूजा करे। उनके साथमें संकर्वणादि-व्यूह और विमला आदि शक्तियोंकी धूप, दीप आदि उपचारोंसे अर्चना कर प्रार्थना करे। उनके सामने घीका दीप जलाये और गुगुलका धूप प्रदान कर घृतमिश्रित खीरका नैवेद्य लगाये। कर्णिकाके दक्षिणकी ओर कमलके
ऊपर स्थित सोमका ध्यान करे। उनका वर्ण शुक्ल है, वे शान्तस्वरूप हैं, वे अपने हाथोंमें वरद और अभय-मुद्रा धारण किये हैं एवं केयूरादि धारण करनेके कारण अत्यन्त शोभित हैं। ‘इमं देवा’ (यजु० ९।४०) इस मन्त्रसे इनकी पूजा कर इन्हें घृतमिश्रित भातका नैवेद्य अर्पण करे। पूर्व आदि दिशाओंमें इन्द्र, जयन्त, आकाश, वरुण, अग्नि, ईशान, तत्पुरुष तथा वायुकी पूजा करे। कर्णिकाके वाम भागमें शुक्ल वर्णवाले महादेवका ‘ज्यम्बकं’ (यजु० ३।६०) इस मन्त्रसे पूजन कर नैवेद्य आदि प्रदान करे। भगवान् वासुदेवके लिये हविष्यसे आठ, सोमके लिये अट्टाईस तथा शिवके लिये दो खीरकी आहुतियाँ दे। गणेशजीको घीकी एक आहुति दे। ब्रह्मा एवं वरुणके लिये एक-एक आहुति और ग्रहों एवं दिक्पालोंके लिये विहित समिधाओं तथा घीसे एक-एक आहुतियाँ दे।
अग्निकी सात जिह्वाओं—कराली, धूमली, श्वेता, लोहिता, स्वर्णप्रभा, अतिरिक्ता और पद्मरागाको भी मन्त्रोंसे घृत एवं मधुमिश्रित हविष्यद्वारा एक-एक आहुति प्रदान करे। इसी प्रकार अग्नि, सोम, इन्द्र, पृथ्वी और अन्तरिक्षके निमित्त मधु और क्षीरयुक्त यवोंसे एक-एक आहुतियाँ प्रदान करे। फिर गन्ध-पुष्पादिसे उनकी पृथक्-पृथक् पूजा करके रुद्रसूक्त तथा सौरसूक्तका जप करे। अनन्तर यूपको भलीभाँति स्नान कराकर और उसका मार्जन कर उसे उद्यानके मध्य भागमें गाड़ दे। यूपके प्रान्त-भागमें सोम तथा वनस्पतिके लिये ध्वजाओंको लगा दे। ‘कोऽदात्कस्मा’ (यजु० ७।४८) इस
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- मध्यमपर्व, तृतीय भाग *
२६९
मन्त्रसे वृक्षोंका कर्णवेध संस्कार करे। एक तीखी सूर्यसे वृक्षके दक्षिण तथा वाम भागके दो पत्तोंका छेदन करे। नवग्रहोंकी तुसिके लिये लडू आदिका भोग लगाये तथा बालक और कुमारियोंको मालपूआ खिलाये। रंजित सूत्रोंसे उद्यानके वृक्षोंको आवेष्टित करे। उन वृक्षोंको जलादिका प्राशन कराये और यह प्रार्थना-मन्त्र पढ़े—
वृक्षाग्रात् पतितस्यापि आरोहात् पतितस्य च। मरणे वास्ति भङ्गे वा कर्ता पापैर्न लिप्यते ॥
(मध्यमपर्व ३।१।३१)
तात्पर्य यह कि विधिपूर्वक उद्यान आदिमें लगाये गये वृक्षके ऊपरसे यदि कोई गिर जाय, गिरकर मर जाय या अस्थि टूट जाय तो उस पापका भागी वृक्ष लगानेवाला नहीं होता।
उद्यानके निमित्त पूजा आदि कर्म करानेवाले आचार्यको स्वर्ण, धान, गाय तथा दक्षिणा प्रदान कर उनकी प्रदक्षिणा करे। ऋत्विक्को भी स्वर्ण, रजत आदि दक्षिणामें दे। ब्रह्माको भी दक्षिणा देकर संतुष्ट करे एवं अन्य सदस्योंको भी प्रसन्न करे। अनन्तर यजमान स्थापित अधिकलशके जलसे स्नान करे। सूर्यास्तसे पूर्व ही पूर्णाहुति सम्पन्न करे। सम्पूर्ण कार्य पूर्णकर अपने घर जाय और विप्राके द्वारा वहाँ बल, काम, हयग्रीव, माधव, पुरुषोत्तम, वासुदेव, धनाध्यक्ष और नारायण—इन सबका विधिवत् स्मरण कर पूजन कराये और पञ्चगव्यमिश्रित दधि-भातका नैवेद्य समर्पित करे।
बल आदि देवताओंकी पूजा करनेके पश्चात् दक्षिणकी ओर 'स्योना पृथिवी' (यजु० ३५।२१) इस मन्त्रसे पृथ्वीदेवीका पूजन करे। मधुमिश्रित पायसात्रका नैवेद्य अर्पित करे। पृथ्वीदेवी शुद्ध
काञ्चन वर्णकी आभासे युक्त हैं। हाथमें वरद और अभयमुद्रा धारण किये हुए हैं। सम्पूर्ण अलंकारोंसे अलंकृत हैं। घरके वाम भागमें विश्वकर्माका यजन करे। 'विश्वकर्मन्' (ऋ० १०।८१।६) यह मन्त्र उनके पूजनमें विनियुक्त है। भगवान् विश्वकर्माका वर्ण शुद्ध स्फटिकके समान है, ये शूल और टंकको धारण करनेवाले हैं तथा शान्तस्वरूप हैं। इन्हें मधु और पिष्टककी बलि दे। अनन्तर कौष्माण्डसूक्त तथा पुरुषसूक्तका पाठ करे। इसी पृथ्वी-होम-कर्ममें मधु और पायस-युक्त हविष्यसे आठ आहुतियाँ दे तथा अन्य देवताओंको एक-एक आहुति दे।
उद्यानके चारों ओर अथवा बीच-बीचमें उद्यानकी रक्षाके लिये मेड़ोंका निर्माण करे, जिन्हें धर्मसेतु कहा जाता है। उद्यानकी दृढ़ताके लिये विशेष प्रबन्ध करे। धर्मसेतुका निर्माण कर उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे—
पिच्छले पतितानां च उच्छ्रितेनाङ्गसंगतः ॥ प्रतिष्ठिते धर्मसेतौ धर्मो मे स्यान्न पातकम्। ये चात्र प्राणिनः सन्ति रक्षां कुर्वन्ति सेतवः। वेदागमेन यत्पुण्यं यथैव हि समर्पितम् ॥
(मध्यमपर्व ३।१।४४-४६)
तात्पर्य यह कि यदि कोई व्यक्ति इस धर्मसेतु (मेड़)-पर चलते समय गिर जाय, फिसल जाय तो इस धर्मसेतुके निर्माणका कोई पाप मुझे न लगे। क्योंकि इस धर्मसेतुका निर्माण मैंने धर्मकी अभिवृद्धिके लिये ही किया है। इस स्थानपर आनेवाले प्राणियोंकी ये धर्मसेतु रक्षा करते हैं। वेदाध्ययन आदिसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य इस धर्म-सेतुके निर्माण करनेपर प्राप्त होता है। (अध्याय १)
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२७०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
गोचर-भूमिके उत्सर्ग तथा लघु उद्यानोंकी प्रतिष्ठा-विधि
[भारतमें पहले सभी ग्राम-नगरोंकी सभी दिशाओंमें कुछ दूरतक गोचर-भूमि रहती थी। उसमें गाये स्वच्छन्द-रूपसे चरती थीं और वह भूमि सर्वसामान्यके भी घूमने-फिरनेके उपयोगमें आती थी। छोटे-छोटे बालक भी उसमें क्रीड़ा करते थे। यह प्रथा अभी कुछ दिनों पहलेतक थी, पर अब वह सर्वथा लुप्त हो गयी है, इससे गो-धनकी बड़ी हानि हुई है। जिसका फल प्रकृति अनावृष्टि, भीषण महर्घता (महँगरी), दुष्कालकी स्थिति, भूकम्प, महायुद्ध और सर्वत्र निर्दोष लोगोंकी हत्याके रूपमें परोक्ष तथा प्रत्यक्ष-रूपसे दे रही है। इसकी निवृत्तिका एकमात्र समाधान है प्राचीन पुराणोक्त सदाचार, गो-सेवा और आस्तिकतापूर्ण आध्यात्मिक दृष्टिका पुनः अनुसंधान और अनुसरण करना। भला, आजकी दशासे, जहाँ किसीको भी किसी भी स्थितिमें तनिक भी शान्ति नहीं है, इससे अधिक और चिन्ताकी बात क्या हो सकती है। इस दृष्टिसे यह अध्याय विशेष महत्त्वका है और सभी पाठकोंको अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक अपने-अपने ग्राम-नगरोंके चतुर्दिक गोचरका या गो-प्रचार-भूमिका उत्सर्ग कर गो-संरक्षणमें हाथ बँटाना चाहिये।—सम्पादक]
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं गोचर-भूमिके विषयमें बता रहा हूँ, आप सुनें। गोचर-भूमिके उत्सर्ग-कर्ममें सर्वप्रथम लक्ष्मीके साथ भगवान् विष्णुकी विधिके अनुसार पूजा करनी चाहिये। इसी तरह ब्रह्मा, रुद्र, करालिका, वराह, सोम, सूर्य और महादेवजीका क्रमशः विविध उपचारोंसे पूजन करे। हवन-कर्ममें लक्ष्मीनारायणको तीन-तीन आहुतियाँ घीसे दे। क्षेत्रपालोंको मधुमिश्रित एक-एक लाजाहुति दे। गोचरभूमिका उत्सर्ग करके विधानके अनुसार यूपकी स्थापना करे तथा उसकी अर्चना करे। वह यूप तीन हाथका ऊँचा और नागफणोंसे युक्त होना चाहिये। उसे एक हाथसे भूमिके मध्यमें गाड़ना चाहिये। अनन्तर 'विश्वेषा' (ऋ० १०।२।६) इस मन्त्रका उच्चारण करे और 'नागाधिपतये नमः', 'अच्युताय नमः' तथा 'भीमाय नमः' कहकर यूपके लिये लाजा निवेदित करे। 'मधि गृह्णाभ्य' (यजु० १३।१) इस मन्त्रसे रुद्रमूर्तिस्वरूप उस यूपकी पञ्चोपचार-पूजा करे। आचार्यको अन्न, वस्त्र और दक्षिणा दे तथा होता एवं अन्य ऋत्विजोंको भी अभीष्ट दक्षिणा दे। इसके बाद उस गोचरभूमिमें रत्न छोड़कर इस मन्त्रको पढ़ते हुए गोचरभूमिका उत्सर्ग कर दे—
शिवलोकस्तथा गावः सर्वदेवसुपूजिताः ॥ गोभ्य एषा मया भूमिः सम्प्रदत्ता शुभाधिन।
(मध्यमपर्व ३।२।१२-१३)
'शिवलोकस्वरूप यह गोचरभूमि, गोलोक तथा गौएँ सभी देवताओंद्वारा पूजित हैं, इसलिये कल्याणकी कामनासे मैंने यह भूमि गौओंके लिये प्रदान कर दी है।'
इस प्रकार जो समाहित-चित्त होकर गौओंके लिये गोचरभूमि समर्पित करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें पूजित होता है। गोचरभूमिमें जितनी संख्यामें तृण, गुल्म उगते हैं, उतने हजारों वर्षतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। गोचरभूमिकी सीमा भी निश्चित करनी चाहिये। उस भूमिकी रक्षाके लिये पूर्वमें वृक्षोंका रोपण करे। दक्षिणमें सेतु (मेड़) बनाये। पश्चिममें कँटीले वृक्ष लगाये और उत्तरमें कूपका निर्माण करे। ऐसा करनेसे कोई भी गोचरभूमिकी सीमाका लङ्घन नहीं कर सकेगा। उस भूमिको जलधारा और घाससे परिपूर्ण करे। नगर या ग्रामके दक्षिण दिशामें गोचरभूमि छोड़नी चाहिये। जो व्यक्ति किसी अन्य प्रयोजनसे गोचरभूमिको जोतता, खोदता या नष्ट करता है, वह अपने कुलोंको पातकी बनाता है और अनेक ब्रह्म-हत्याओंसे आक्रान्त हो जाता है।
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- मध्यमपर्व, तृतीय भाग *
२७१
जो भलीभाँति दक्षिणाके साथ गोचर्म-भूमिका* दान करता है, वह उस भूमिमें जितने तृण हैं, उतने समयतक स्वर्ग और विष्णुलोकसे च्युत नहीं होता। गोचरभूमि छोड़नेके बाद ब्राह्मणोंको संतुष्ट करे। वृषोत्सर्गमें जो भूमि-दान करता है, वह प्रेतयोनिको प्राप्त नहीं होता। गोचर-भूमिके उत्सर्गके समय जो मण्डप बनाया जाता है, उसमें भगवान् वासुदेव और सूर्यका पूजन तथा तिल, गुड़की आठ-आठ आहुतियोंसे हवन करना चाहिये। 'देहि मे०' (यजु० ३।५०) इस मन्त्रसे मण्डपके ऊपर चार शुक्ल घट स्थापित करे। अनन्तर सौर-सूक्त और वैष्णव-सूक्तका पाठ करे। आठ वटपत्रोंपर आठ दिक्पाल देवताओंके चित्र या प्रतिमा बनाकर उन्हें पूर्वदि आठ दिशाओंमें स्थापित करे और पूर्वदि दिशाओंके अधिपतियों—इन्द्र, अग्नि, यम, निर्वृति आदिसे गोचरभूमिकी रक्षाके लिये प्रार्थना करे। प्रार्थनाके बाद चारों वर्णोंकी, मृग एवं पक्षियोंकी अवस्थितिके लिये विशेषरूपसे भगवान् वासुदेवकी प्रसन्नताके लिये गोचरभूमिका उत्सर्जन करना चाहिये। गोचरभूमिके नष्ट-भ्रष्ट हो जानेपर, घासके जीर्ण हो जानेपर तथा पुनः घास उगानेके लिये पूर्ववत् प्रतिष्ठा करनी चाहिये, जिससे गोचरभूमि अक्षय बनी रहे। प्रतिष्ठाकार्यके निमित्त भूमिके खोदने आदिमें कोई जीव-जन्तु मर जाय तो उससे मुझे पाप न लगे, प्रत्युत धर्म ही हो और इस गोचरभूमिमें निवास करनेवाले मनुष्यों, पशु-पक्षियों, जीव-जन्तुओंका आपके अनुग्रहसे निरन्तर कल्याण हो ऐसी भगवान्से प्रार्थना करनी चाहिये। अनन्तर
गोचरभूमिको त्रिगुणित पवित्र धागेद्वारा सात बार आवेष्टित कर दे। आवेष्टनके समय 'सुत्रामार्ण पृथिवीं०' (ऋ० १०।६३।१०) इस ऋचाका पाठ करे। अनन्तर आचार्यको दक्षिणा दे। मण्डपमें ब्राह्मणोंको भोजन कराये। दीन, अन्ध एवं कृपणोंको संतुष्ट करे। इसके बाद मङ्गल-ध्वनिके साथ अपने घरमें प्रवेश करे। इसी प्रकार तालाब, कुआँ, कूप आदिकी भी प्रतिष्ठा करनी चाहिये, विशेषरूपसे उसमें वरुणदेवकी और नागोंकी पूजा करनी चाहिये।
ब्राह्मणो! अब मैं छोटे एवं साधारण उद्यानोंकी प्रतिष्ठाके विषयमें बता रहा हूँ। इसमें मण्डल नहीं बनाना चाहिये। बल्कि शुभ स्थानमें दो हाथके स्थाण्डिलपर कलश स्थापित करना चाहिये। उसपर भगवान् विष्णु और सोमकी अर्चना करनी चाहिये। केवल आचार्यका वरण करे। सूत्रसे वृक्षोंको आवेष्टित कर पुष्प-मालाओंसे अलंकृत करे। अनन्तर जलधारासे वृक्षोंको सींचे। पाँच ब्राह्मणोंको भोजन कराये। वृक्षोंका कर्णवेध संस्कार करे और संकल्पपूर्वक उनका उत्सर्जन कर दे। मध्य देशमें यूप स्थापित करे और दिशा-विदिशाओं तथा मध्य देशमें कदली-वृक्षका रोपण करे एवं विधानपूर्वक घीसे होम करे। फिर स्विष्टकृत हवन कर पूर्णाहुति दे। वृक्षके मूलमें धर्म, पृथ्वी, दिशा, दिक्पाल और यक्षकी पूजा करे तथा आचार्यको संतुष्ट करे। दक्षिणामें गाय दे। सब कार्य विधानके अनुसार परिपूर्ण कर भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे।
(अध्याय २-३)
- गर्वां शतं वृषश्वेको यत्र तिष्ठत्ययन्त्रितः । तद्गोचर्मिति विख्यातं दत्तं सर्वाधनाशनम् ॥
जिस गोचरभूमिमें सौ गायें और एक बैल स्वतन्त्र रूपसे विचरण करते हों, वह भूमि गोचर्म-भूमि कहलाती है। ऐसी भूमिका दान करनेसे सभी पापोंका नाश होता है। अन्य बृहस्पति, वृद्धहारीत, शातातप आदि स्मृतियोंके मतसे प्रायः ३,००० हाथ लम्बी-चौड़ी भूमिकी संज्ञा गोचर्म है।
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२७२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अश्वत्थ, पुष्करिणी तथा जलाशयके प्रतिष्ठाकी विधि
सूतजी बोले—ब्राह्मणो! अश्वत्थ-वृक्षकी प्रतिष्ठा करनी हो तो उसकी जड़के पास दो हाथ लम्बी-चौड़ी एक वेदीका निर्माण कर चन्दन आदिसे प्रोक्षित करे। उसपर कमलकी रचना कर अर्घ्य प्रदान करे। प्रथम दिनकी रात्रिमें 'तद्विष्णोः' (यजु० ६।५) इस मन्त्रद्वारा कलश-स्थापन कर गन्ध, चन्दन, दूर्वा तथा अक्षत समर्पण करे। चन्दन-लिस श्वेत सूत्रोंसे कलशोंको आवेष्टित करे। प्रथम कलशके ऊपर गणेशजीका, दूसरे कलशपर ब्रह्माजीका पूजन करे। दिशाओंमें दिक्पाल और वृक्षके मूलमें नवग्रहोंका पूजन-अर्चन करे। वृक्षके मूलमें विष्णु, मध्यमें शंकर तथा आगे ब्रह्माकी पूजा कर हवन करे। पिष्टकात्र-बलि दे। आचार्यको दक्षिणा देकर वृक्षको जलधारासे सींचे, उसकी प्रदक्षिणा करे और भगवान् सूर्यको अर्घ्य निवेदित कर घर आ जाय।
बावली आदिकी प्रतिष्ठामें प्रथम भूतशुद्धि करके सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे। तदनन्तर गणेश, गुरुपादुका, जय और भद्रका समाहित होकर पूजन करे। मण्डलके मध्यमें आधार-शक्ति, अनन्त तथा कूर्मकी पूजा करे। चन्द्र, सूर्य आदिका भी मण्डलमें पूजन करे। दूसरे पात्रमें पुष्पादि उपचारोंसे भगवान् वरुणका पूजन करे। कमलके पूर्वादि पत्रोंमें इन्द्रादि दिक्पालोंकी, उनके आयुधोंकी तथा मध्यमें ब्रह्माकी पूजा करे। 'भूर्भुवः स्वः' इन तत्त्वोंकी भी पूजा करे। मण्डलके उत्तर भागमें नागरूप अनन्तकी पूजा करे। इसके बाद हवन करे। प्रथम आहुति वरुणदेवको दे फिर दिक्पालों, नारायण, शिव, दुर्गा, गणेश, ग्रहों और ब्रह्माको प्रदान करे। स्विष्टकृत् हवन करके बलि प्रदान करे। एक अष्टदल कमलके ऊपर वरुणकी रजत-प्रतिमा स्थापित करे और पुष्करिणी (बावली)-
की प्रतिमा स्वर्णकी बनाये तथा उसका पूजनकर जलाशयमें छोड़ दे। जलाशयके मध्यमें नौका आरोपित करे। जलाशयके बीचमें ऋत्विक् होम करे। शेषनागकी मूर्ति भी जलाशयमें छोड़ दे। सम्पूर्ण कार्योंको सम्पन्न कर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। जलाशयमें मकर, ग्राह, मीन, कूर्म एवं अन्य जलचर प्राणी तथा कमल, शैवाल आदि भी छोड़े। अनन्तर जलाशयकी प्रदक्षिणा करे। लावा और सीपी भी छोड़े। दूधकी धारा भी दे। पुष्करिणीको चारों ओरसे रक्तसूत्रसे आवेष्टित करे। दीनोंको संतुष्ट कर घरमें प्रवेश करे।
ब्राह्मणो! अब मैं नलिनी (जिस तालाबमें कमल हो,) वापी तथा हृद (गहरे जलाशय)-की प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि बतला रहा हूँ। इन सबकी प्रतिष्ठा करनेके पहले दिन भगवान् वरुणदेवकी सुवर्ण-प्रतिमा बनाकर 'आपो हि घ्ना' (यजु० ११।५०) इस मन्त्रसे उसका जलाधिवास करे, अनन्तर एक सौ कमल-पुष्पोंसे प्रतिमाका पुष्पाधिवास करे। तत्पश्चात् मण्डलमें आकर पूर्वमुख बैठे और कलशपर गणेश, वरुण, शंकर, ब्रह्मा, विष्णु एवं सूर्यकी पूजा करे। वरुणके लिये घी और पायसकी आहुति दे। अन्य देवताओंको खुवाद्वारा एक-एक आहुति प्रदान कर पायस-बलि दे। फिर नलिनी-वापी आदिका संकल्पपूर्वक उत्सर्जन कर दे। मध्यमें यूपकी स्थापना करे। तदनन्तर गोदान दे और दक्षिणा प्रदान करे। पूर्णाहुतिके अनन्तर भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे और अपने घरमें प्रवेश करे।
द्विजो! अब मैं वृक्षोंके प्रतिष्ठा-विधानका वर्णन करता हूँ। वृक्षकी स्थापना कर सूत्रसे परिवेष्टित करे, फिर उसके पश्चिम भागमें कलश-स्थापना
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- मध्यमपर्व, तृतीय भाग *
२७३
करे। कलशमें ब्रह्मा, सोम, विष्णु और वनस्पतिका पूजन करे। अनन्तर तिल और यवसे आठ-आठ आहुतियाँ दे। कदली-वृक्ष तथा यूपका उत्सर्जन करे, फिर लगाये गये वृक्षके मूलमें धर्म, पृथ्वी,
दिशा, दिक्पाल एवं यक्षकी पूजा करे तथा आचार्यको संतुष्ट करे। आचार्यको गोदान दे, दक्षिणा प्रदान करे। वृक्ष-पूजनके बाद भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे। (अध्याय ४-८)
वट, बिल्व तथा पूगीफल आदि वृक्ष-युक्त उद्यानकी प्रतिष्ठा-विधि
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! वट-वृक्षकी प्रतिष्ठामें वृक्षके दक्षिण दिशामें उसकी जड़के पास तीन हाथकी एक वेदी बनाये और उसपर तीन कलश स्थापित करे। उन कलशोंपर क्रमशः गणेश, शिव तथा विष्णुकी पूजा कर चरुसे होम करे। वट-वृक्षको त्रिगुणित रक्त सूत्रोंसे आवेष्टित करे। बलिमें यव-क्षीर प्रदान करे और यूपस्तम्भ आरोपित करे। वट-वृक्षके मूलमें यक्ष, नाग, गन्धर्व, सिद्ध और मरुदगणोंकी पूजा करे। इस प्रकार सम्पूर्ण क्रियाएँ विधिके अनुसार पूर्ण करे।
बिल्व-वृक्षकी प्रतिष्ठामें पहले दिन वृक्षका अधिवासन करे। त्र्यम्बकं (यजु० ३।६०) इस मन्त्रसे वृक्षको पवित्र स्थानपर स्थापित कर ‘सुनावमा’ (यजु० २१।७) इस मन्त्रसे गन्धोदकद्वारा उसे स्नान कराये। ‘मे गृह्णाभि’ इस मन्त्रसे वृक्षपर अक्षत चढ़ाये। ‘कथा नक्षित्र’ (यजु० २७।३९) इस मन्त्रसे धूप, वस्त्र तथा माला चढ़ाये। तदनन्तर रुद्र, विष्णु, दुर्गा और धनेश्वर—कुबेरका पूजन करे। दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर शास्त्रानुसार नित्यक्रियासे निवृत्त होकर घरमें सात ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराये। फिर बिल्वके मूलप्रदेशमें
दो हाथकी वर्तुलाकार वेदीका निर्माण करे। उसको गेरु तथा सुन्दर पुष्प-चूर्णादिसे रञ्जित कर उसपर अष्टदल-कमलकी रचना करे। वृक्षको लाल सूत्रसे पाँच, सात या नौ बार वेष्टित करे। वृक्ष-मूलमें उत्तराभिमुख होकर व्रीहि रोपे तथा शिव, विष्णु, ब्रह्मा, गणेश, शेष, अनन्त, इन्द्र, वनपाल, सोम, सूर्य तथा पृथ्वी—इनका क्रमशः पूजन करे। तिल और अक्षतसे हवन करे तथा घी एवं भातका नैवेद्य दे। यक्षोंके लिये उड़द और भातका भोग लगाये। ग्रहोंकी तुष्टिके लिये बाँसके पात्रपर नैवेद्य दे। बिल्व-वृक्षको दक्षिण दिशासे दूधकी धारा प्रदान करे। यूपका आरोपण करे, वृक्षका कर्णवेध-संस्कार करे और भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे।
यदि सौ हाथकी लम्बाई-चौड़ाईका उद्यान हो, जिसमें सुपारी या आम्र आदिके फलदायक वृक्ष लगे हों तो ऐसे उद्यानकी प्रतिष्ठामें वास्तुमण्डलकी रचना कर वास्तु आदि देवताओंका पूजन करके यजन-कर्म करे। विशेषरूपसे विष्णु एवं प्रजापति आदि देवताओंका पूजन करे। हवनके अन्तमें ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। (अध्याय ९-११)
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२७४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मण्डप, महायूप और पौसले आदिकी प्रतिष्ठा-विधि
सूतजी कहते हैं—द्विजगणो! अब मैं यागादिके निमित्त निर्मित होनेवाले मण्डपोंकी प्रतिष्ठा-विधि बतलाता हूँ। वह मण्डप शिलामय हो या काष्ठमय अथवा तृण-पत्रादिसे निर्मित हो। ऐसी स्थितिमें अधिवासनके प्रारम्भमें शुभ-लग्न-मुहूर्तमें घट-स्थापन करे। उस कलशपर सूर्य, सोम और विष्णुकी अर्चना करे। 'आपो हि घ्नाः' (यजु० ११।५०) इस मन्त्रद्वारा कुशोदकसे तथा 'आप्यायस्वः' (यजु० १२।११४) इस मन्त्रद्वारा सुगन्ध-जलसे प्रोक्षण करे। 'गन्धद्वाराः' (श्रीसूक्त ९) इस ऋचासे चन्दन, सिन्दूर, आलता और अञ्जन समर्पण करे। फिर दूसरे दिन प्रातः वृद्धि-श्राद्ध करे। शुभ लक्षणवाले मण्डपमें दिवपालोंकी स्थापना करे। मध्यमें वेदीके ऊपर मण्डल चित्रित करे। उसमें सूर्य, सोम, विष्णुकी तथा कलशपर गणेश, नवग्रह आदिकी पूजा करे। सूर्यके लिये १०८ बार पायस-होम करे। विष्णु और सोमका उद्देश्य कर बारह आहुतियाँ एवं पायस-बलि दे। वास्तु-देवताका पूजन करे और उनको अर्घ्य देकर विधिवत् आहुति प्रदान करे, फिर उस मण्डलको संकल्पपूर्वक योग्य ब्राह्मणके लिये समर्पित कर दे। उसे विधिवत् दक्षिणा दे और सूर्यके लिये अर्घ्य प्रदान करे। तृण-मण्डपमें विशेषरूपसे वासुदेवके साथ भगवान् सूर्यकी पूजा करे। एक घटके ऊपर वरदायक भगवान् गणेशजीकी पूजा कर विसर्जन करे। ईशानकोणमें यूप स्थापित कर सभी दिशाओंमें ध्वजा फहराये।
ब्राह्मणो! अब मैं चार हाथसे लेकर सोलह हाथके प्रमाणमें निर्मित महायूपकी एवं पौसला
तथा कुर्ण आदिकी प्रतिष्ठा-विधि बतला रहा हूँ। इनकी प्रतिष्ठामें गर्ग-त्रिरात्र यज्ञ करना चाहिये। पौसलेके पश्चिम भागमें श्वेत कुम्भपर भगवान् वरुणको स्थापित कर 'गायत्री' मन्त्र तथा 'आपो हि घ्नाः' (यजु० ११।५०) इन मन्त्रोंसे उन्हें स्नान कराना चाहिये। उसके बाद गन्ध, तेल, पुष्प और धूप आदिसे मन्त्रपूर्वक उनकी अर्चना कर उन्हें वस्त्र, नैवेद्य, दीप तथा चन्दन आदि निवेदित करना चाहिये। प्रतिष्ठाके अन्तमें श्राद्ध कर एक ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराना चाहिये। आठ हाथका एक मण्डप बनाकर उसमें कलशकी स्थापना करे। उसपर नारायणके साथ वरुण, शिव, पृथ्वी आदिका तत्तद् मन्त्रोंसे पूजन करे, उसके बाद स्थालीपाक-विधानसे हवनके लिये कुशकण्डिका करे। भगवान् वरुणका पूजन कर खुवाद्वारा उन्हें 'वरुणस्यः' (यजु० ४।३६) इत्यादि मन्त्रोंसे दस आहुतियाँ प्रदान करे। अन्य देवताओंके लिये क्रमशः एक-एक आहुति दे। उसके बाद स्वष्टकृत् हवन करे और अग्निकी सप्तजिह्वाओंके नामसे चरुका हवन करे। तदनन्तर सभीको नैवेद्य और बलि प्रदान करे। इसके पश्चात् संकल्प-वाक्य पढ़कर कूपका उत्सर्जन कर दे। ब्राह्मणोंको पयस्विनी गाय एवं दक्षिणा प्रदान करे। यदि छोटे कूपकी प्रतिष्ठा करनी हो तो गणेश तथा वरुणदेवताकी कलशके ऊपर विधिवत् पूजा करनी चाहिये। लाल सूत्रसे कलशको वेष्टित करना चाहिये। यूप स्थापित करनेके पश्चात् संकल्पपूर्वक कूपका उत्सर्जन करना चाहिये। ब्राह्मणोंको विधिवत् सम्मानपूर्वक दक्षिणा देनी चाहिये। (अध्याय १२-१३)
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- मध्यमपर्व, तृतीय भाग *
२७५
पुष्पवाटिका तथा तुलसीकी प्रतिष्ठा-विधि
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! पुष्पवाटिकाकी प्रतिष्ठामें तीन हाथकी एक वेदीका निर्माण कर उसपर घटकी स्थापना करे। पुष्पाधिवाससे एक दिन पूर्व ब्राह्मण-भोजन कराये। कलशपर गणेश, सूर्य, सोम, अग्निदेव तथा नारायणका आवाहन कर पूजन करे। वेदीपर मधु तथा पायससे हवन करे। ईशानकोणमें विधिवत् यूपका समारोपण कर उसके मूलमें गुरुवारके दिन गेहूँओंका रोपण कर उन्हें सींचे। वाटिकाको रक्त सूत्रसे आवेष्टित करे। वाटिकाके पुष्प-वृक्षोंका कर्णवेध कराकर उन्हें कुशोदकसे स्नान कराये और ब्राह्मणोंको धान्य, यव और गेहूँ दक्षिणारूपमें प्रदान करे और वाटिकाको जलधारासे सींचे।
तुलसीकी प्रतिष्ठा ज्येष्ठ और आषाढ़ मासमें विधिपूर्वक करनी चाहिये। प्रतिष्ठाके लिये शुद्ध दिन अथवा एकादशी तिथि होनी चाहिये। रात्रिमें घटकी स्थापना कर विष्णु, शिव, सोम, ब्रह्मा तथा इन्द्रका पूजन करे। गायत्री-मन्त्र तथा पूर्वोक्त देवताओंके मन्त्रोंद्वारा उन्हें स्नान कराये। 'कया नक्षित्रः' (यजु० २७।३९) इस मन्त्रसे गन्ध, 'अःशुनाः' (यजु० २०।२७) इस मन्त्रसे इत्र, 'त्वां गन्धर्वाः' (यजु० १२।१८) तथा 'मा नस्तोकेः' (यजु० १६।१६) आदि मन्त्रोंसे पुष्प, 'श्रीश्च तैः' (यजु० ३१।२२) तथा 'वैश्वदेवीः' (यजु० १९।४४) इन मन्त्रोंसे दूर्वा, 'रूपेण वोः' (यजु० ७।४५) इस मन्त्रसे दर्पण और 'याः फलिनीयाः' (यजु० १२।८९) इस मन्त्रसे फल अर्पण करे तथा
'समिन्द्वोः' (यजु० २९।१) इस मन्त्रसे अञ्जन लगाये। तुलसीको पीले सूत्रसे आवेष्टित कर उसके चारों ओर दूध और जलकी धारा दे। कलश तथा तुलसीको वस्त्रसे भलीभाँति आच्छादित कर घर आ जाय। दूसरे दिन 'तद्विष्णोः' (यजु० ६।५) इस मन्त्रसे सुहागिनी स्त्रियोंद्वारा मङ्गल-गानपूर्वक उसे स्नान कराये। मातृ-पूजापूर्वक वृद्धि-श्राद्ध करे। गन्ध आदि पदार्थोंद्वारा आचार्य, होता और ब्रह्मा आदिका वरण करे। दस हाथके मण्डपमें गोलाकार वेदीका निर्माण करे और वहाँ भगवान् नारायणका पूजन करे। वेदीके मध्य ग्रह, लोकपाल, सूर्य और मरुदग्णोंकी पूजा करे। कलशके चारों ओर रुद्र और वसुओंका पूजन करे। कुश-कण्डिका करके तिल-यवसे हवन करे। विष्णुको उद्दिष्ट कर १०८ आहुतियाँ दे। अन्य देवताओंको यथाशक्ति आहुति प्रदान करे। यूप स्थापित कर चरुकी बलि दे। चतुर्दिक् कदली-स्तम्भ स्थापित कर ध्वजाएँ फहराये। दक्षिणामें स्वर्ण, तिल-धान्य एवं पयस्विनी गाय प्रदान करे। तुलसीको क्षीरधारा दे।
कुछ ऐसे भी वृक्ष हैं, जिनकी प्रतिष्ठा नहीं होती। जैसे—जयन्ती, सोमवृक्ष, सोमवट, पनस (कटहल), कदम्ब, निम्ब, कनकपाटला, शाल्मलि, निम्बक, बिम्ब, अशोक आदि। इनके अतिरिक्त भद्रक, शमीकोण, चंडातक, बक तथा खदिर आदि वृक्षोंकी प्रतिष्ठा तो करनी चाहिये, किंतु इनका कर्णवेध-संस्कार नहीं करना चाहिये।
(अध्याय १४—१७)
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२७६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
एकाह-प्रतिष्ठा तथा काली आदि देवियोंकी प्रतिष्ठा-विधि
सूतजीने कहा—ब्राह्मणो! कलियुगमें अल्प सामर्थ्यवान् व्यक्ति देवता आदिकी प्रतिष्ठा एक दिनमें भी कर सकता है। जिस दिन प्रतिष्ठा करनी हो उसी दिन विद्वान् ब्राह्मण घृताधिवास कराये। जब सूर्यभगवान् उत्तरायणके हों, तब प्रतिष्ठादि कार्य करने चाहिये। शरत्काल व्यतीत हो जानेपर वसन्त-ऋतुमें यज्ञका आरम्भ करना चाहिये। नारायण आदि मूर्तियोंके बत्तीस भेद हैं। गजानन आदि देवताओंकी प्रतिष्ठा विहित कालमें ही करनी चाहिये। बुद्धिमान् मनुष्य नित्य-क्रियासे निवृत्त होकर आभ्युदयिक कर्म करे। अनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर यज्ञ-गृहमें प्रवेश करे। वहाँ प्रत्येक कुम्भके ऊपर भगवान् गणेश, नवग्रह तथा दिक्पालोंका विधिवत् पूजन करे। वेदीपर भगवान् विष्णु और उनके परिवारका पूजन करे। सर्वप्रथम भगवान् विष्णुको विभिन्न तीर्थ, समुद्र, नदियों आदिके जल, पञ्चामृत, पञ्चगव्य, सप्त-मृत्तिकाभिन्न जल, तिलके तेल, कषाय-द्रव्य और पुष्पोदकसे स्नान कराये। तुलसी, आम्र, शमी, कमल तथा करवीरके पत्र-पुष्पोंसे उनकी पूजा करे। इसके बाद मूर्तियोंमें प्राण-प्रतिष्ठा सम्पन्न करे। तत्पश्चात् विधिपूर्वक हवन करे। ब्राह्मणोंको दक्षिणाद्वारा संतुष्टकर पूर्णाहुति प्रदान करे।
ब्राह्मणो! अब मैं काली आदि महाशक्तियोंकी प्रतिष्ठा एवं अधिवासनकी संक्षिप्त विधि बतला रहा हूँ। प्रतिष्ठाके पूर्व दिन देवीकी प्रतिमाका अधिवासन कर आभ्युदयिक श्राद्ध करे। सर्वप्रथम
भगवतीकी प्रतिमाको कमलयुक्त जलसे, फिर पञ्चगव्यसे स्नान कराये। कुम्भके ऊपर भगवती दुर्गाकी अर्चना करे। तदनन्तर मूर्तिकी प्राण-प्रतिष्ठा करे। बिल्व-पत्र और बिल्व-फलोंसे सौ आहुतियाँ दे। दक्षिणामें सुवर्ण प्रदान करे। भगवती कालिका और ताराकी प्रतिमाओंका अलग-अलग अर्चन करे। भगवतीको नाना प्रकारके सुगन्धित द्रव्योंसे तीन दिनतक स्नान कराये और नैवेद्य अर्पण करे। ताँबेके कलशपर तीन दिनतक प्रातःकालमें देवीकी अर्चना करे, फिर कन्याओंद्वारा सुगन्धित जलसे भगवतीको स्नान कराये। आठवें दिन भी रात्रिमें विशेष पूजन करे एवं पायस-होम करे।
आगमोंके अनुसार शिवलिङ्गकी प्रतिष्ठामें तीन ब्राह्मणोंको भोजन कराये और विशेषरूपसे भगवान्की प्रतिमाका अधिवासन करे। नित्य-क्रिया करके आभ्युदयिक श्राद्ध करे। दूसरे दिन प्रातः आचार्यका वरण करे। विधिके अनुसार प्रतिमाको स्नान कराकर शिवलिङ्गका परिवारके साथ पूजन करे। विधिपूर्वक तिलमयी या स्वर्णमयी अथवा साक्षात् गौका दान करे। हवनकी समाप्तिपर शुद्ध घृतसे वसुधारा प्रदान करे। इसी तरह सूर्य, गणेश, ब्रह्मा आदि देवताओं तथा वाराही एवं त्रिपुरादेवी और भुवनेश्वरी, महामाया, अम्बिका, कामाक्षी, इन्द्राक्षी तथा अपराजिता आदि महाशक्तियोंकी प्रतिमाओंकी प्रतिष्ठा भी विधिपूर्वक करनी चाहिये और रात्रि-जागरण कर महान् उत्सव करना चाहिये। देवीकी प्रतिष्ठामें कुमारी-पूजन भी करना चाहिये।
(अध्याय १८-१९)
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- मध्यमपर्व, तृतीय भाग *
२७७
दिव्य, भौम एवं अन्तरिक्षजन्य उत्पात तथा उनकी शान्तिके उपाय१
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं विविध प्रकारके अपशकुनो, उत्पातों एवं उनके फलोंका वर्णन कर रहा हूँ। आपलोग सावधान होकर सुनें। जिस व्यक्तिकी लगन-कुण्डली अथवा गोचरमें पाप-ग्रहोंका योग हो तो उसकी शान्ति करानी चाहिये। दिव्य, अन्तरिक्ष और भौम—ये तीन प्रकारके उत्पात होते हैं। ग्रह, नक्षत्र आदिसे जो अनिष्टकी आशंका होती है वह दिव्य उत्पात कहलाता है। उल्कापात, दिशाओंका दाह (मण्डलोंका उदय, सूर्य-चन्द्रके ईर्द-गिर्द पड़नेवाले घेरैका दिखायी देना), आकाशमें गन्धर्वनगरका दर्शन, खण्डवृष्टि, अनावृष्टि या अतिवृष्टि आदि अन्तरिक्षजन्य उत्पात हैं। जलाशयों, वृक्षों, पर्वतों तथा पृथ्वीसे प्रकट होनेवाले भूकम्प आदि उत्पात भौम उत्पात कहलाते हैं। अन्तरिक्ष एवं दिव्य उत्पातोंका प्रभाव एक ससाहतक रहता है। इसकी शान्तिके लिये तत्काल उपाय करना चाहिये अन्यथा वे बहुत कालतक प्रभावी रहते हैं। देवताओंका हँसना, रुधिर-खाव होना, अकस्मात् बिजली एवं वज्रका गिरना, हिंसा और निर्दयताका बढ़ना, सर्पोंका आरोहण करना—ये सब दैव दुर्निमित्त हैं। मेघसे उत्पन्न वृष्टि केवल शिलातलपर ही गिरे तो एक ससाहेके अंदर उत्पन्न प्राणी नष्ट हो जाते हैं। एक राशिपर शनि, मंगल और सूर्य—ये पापग्रह स्थित हो जायँ और पृथ्वी अकस्मात् धुएँसे ढकी दीखे तो भारी जनसंहारकी सम्भावना होती है। यदि बृहस्पति अपनी राशिका अतिचार२ करे और शनि वहाँ स्थित न हो तो राज्य-नष्ट होनेकी सम्भावना रहती है। यदि सूर्य कुछ समयतक न दिखायी दे और दिशाओंमें दाह
होने लगे, धूमकेतु दिखायी दे और बार-बार भूकम्प होता हो तथा राजाके जन्म-दिनमें इन्द्रधनुष दिखायी पड़े तो वह उसके लिये भारी दुर्निमित्त है। भयंकर आँधी-तूफान आ जाय, ग्रहोंका आपसमें युद्ध दिखलायी दे, तीन महीनेमें ही दूसरा ग्रहण लग जाय अथवा उल्कापात हो, आकाश और भूमिपर मेढ़क दौड़ने लगे, हल्दीके समान पीली वृष्टि हो, पत्थरोंमें सिंह और बिल्लीकी आकृति दिखलायी पड़े तो राष्ट्रमें दुर्भिक्ष और राजाका विनाश होता है। चैत्रमें अथवा कुम्भके सूर्यमें (फाल्गुन मासमें) नदीका वेग अकस्मात् बहुत बढ़ जाय तो राष्ट्रमें विप्लव होता है। ये सब सूर्यजन्य अद्भुत उत्पात हैं। हवन आदिद्वारा इनकी शान्ति करानी चाहिये। 'आ कृष्णोन्' (यजु० ३३।४३) इस सूर्यमन्त्रद्वारा हवन कराना चाहिये। धान्यादिका निस्सार हो जाना, गौओंका निस्तेज हो जाना, कुओंका जल सहसा सूख जाना—ये सब भी सूर्यजनित उत्पात हैं, इनकी शान्तिके लिये कमल-पुष्पोंसे एक सहस्र आहुतियाँ देनी चाहिये। विकृत पक्षी, पाण्डुवर्ण कपोत, श्वेत उल्लू, काला कौआ और कराकुल पक्षी यदि घरमें गिरें तो उस घरमें महान् उत्पात मच जाता है। गलेकी मालाएँ आपसमें टकराने लगे, सद्यः उत्पन्न बालकको दाँत हो, देवताओंकी मूर्तियाँ हँसती हों, मूर्तियोंमें पसीना दीख पड़े और घड़ेमें अथवा घरमें सर्प और मण्डूकका प्रसव हो जाय तो उस घरकी गृहिणी छः मासके अंदर नष्ट हो जाती है। घरपर या वृक्षपर बिजली कड़कड़ाकर गिरने और आगकी ज्वालाएँ दिखायी देनेपर महान् उत्पात होता है। इन सबकी
१-इन उत्पातोंका तथा इनकी शान्तियोंका विस्तृत विधान आथर्वण शाक्तिकल्प एवं अथर्वपरिशिष्टादिमें दिया गया है। मत्स्यपुराणके २२८ से २३८ तकके अध्यायोंमें भी यह विषय विवेचित है।
२-एक राशिका भोगकाल समाप्त हुए बिना तीव्रगतिसे आगे चला जाना। यह स्थिति केवल मंगलसे लेकर शनितकके ग्रहोंकी होती है।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
शान्तिके लिये रविवारके दिन भगवान् सूर्यकी प्रसन्नता-हेतु उनकी पूजा करे। तिल एवं पायसकी दस हजार आहुतियाँ प्रदान करे। गो-दान करे और ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। इससे शीघ्र शान्ति होती है। अचानक ध्वज, चामर, छत्र तथा सिंहासनसे विभूषित रथपर राजाका दिखलायी देना तथा स्त्री-पुरुषोंकी लड़ाई—ये भी महान् उत्पात हैं। पृथ्वीका काँपना, पहाड़ोंका टकराना, कोयल और उल्लूका रोना आदि सुनायी पड़े तो राजा, मन्त्री, राजपुत्र, हाथी आदि विनष्ट होते हैं।
ताड़ एवं सुपारीके वृक्ष एक साथ उत्पन्न हो जायँ तो उस घरमें रहनेवालोंपर विपत्तिकी सम्भावना होती है। दूसरे वृक्षोंमें अन्य वृक्षोंके फूल-फल लगे हुए दीखें तो ये सोमग्रहजन्य उत्पात है। इसकी शान्तिके लिये सोमवारके दिन सोमके निमित्त दधि, मधु, घृत तथा पलाश आदिसे 'इमं देवाः' (यजु० १।४०) इस मन्त्रसे एक हजार आहुतियाँ दे और चरुसे भी हवन करे।
उड़द और जौकी ढेरियाँ सहसा लुप्त हो जायँ, दही, दूध, घी और पक्कात्रोंमें रुधिर दिखलायी पड़े, एकाएक घरमें आग-जैसा लगना दिखायी दे, बिना बादलके ही बिजली चमकने लगे, घरके सभी पशु तथा मनुष्य रुग्ण-से दिखायी पड़ें तो मङ्गल ग्रहसे उत्पन्न उत्पात समझने चाहिये। इनसे राजा, अमात्य तथा घरके स्वामियोंका विनाश होता है। ऐसे भयंकर उपद्रवोंको देखकर मङ्गलकी शान्तिके लिये दही, मधु, घीसे युक्त खैर और गूलरकी समिधासे 'अग्निर्मूर्धोः' (यजु० ३।१२) इस मन्त्रसे दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये। तीन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दक्षिणामें लाल वस्तुएँ देनी चाहिये तथा सोने या ताँबेकी मङ्गलकी प्रतिमा बनाकर दानमें देनी चाहिये। इससे शान्ति होती है।
गौएँ यदि घरमें पूँछ उठाकर स्वयं दौड़ने लगे और कुत्ते तथा सूअर घरपर चढ़ने लगे तो उस घरकी स्त्रियोंको भीषण क्लेशकी आशंका होती है। गृहस्वामीका पूर्णतः मिथ्यावादी होना तथा राजाका वाद-विवादमें फँसना, घरमें गौओंका चिल्लाना, पृथ्वीका हिलना, घरमें मेढक तथा साँपका जन्म लेना—ये सभी उत्पात बुधग्रहजन्य हैं। इसमें राज्य तथा घरके नष्ट होनेकी सम्भावना होती है। इन उत्पातोंकी शान्तिके लिये बुधवारके दिन बुधग्रहके उद्देश्यसे दही, मधु, घी तथा अपामार्गकी समिधा एवं चरुसे 'उदबुध्चस्वः' (यजु० १५।५४) इस मन्त्रद्वारा दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये। बुधकी सुवर्णकी प्रतिमा तथा पयस्विनी गाय ब्राह्मणको दानमें देनी चाहिये।
पशुओंका असमयमें समागम और उनसे यमल संततियोंकी उत्पत्ति, जौ, ब्रीहि आदिका सहसा लुप्त हो जाना, गृहस्तम्भका सहसा टूटना, आँगनमें बिल्ली तथा मेढकका नखोंसे जमीन कुरेदना और इनका घरपर चढ़ना, ये सभी दोष जहाँ दिखायी दें, वहाँ छः महीनेके भीतर ही घरका विनाश होता है—कोई प्राणी मर जाता है या कुटुम्बमें कलह होता है तथा अनेक व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। बिल्व-वृक्षपर गृध्र और गृध्रीका एक साथ दिखलायी देना राजाके लिये विश्रमकारक तथा प्रासादके लिये हानिकारक होता है। इस दोषसे अमात्यवर्ग राजाके विपरीत हो जाता है। ये सभी बृहस्पतिजनित दोष हैं। इनकी शान्तिके लिये बृहस्पतिके निमित्त शान्ति-होम करना चाहिये तथा पयस्विनी गाय एवं स्वर्णकी बृहस्पतिकी प्रतिमाका दान करना चाहिये।
राक्षसद्वारा घड़ेका जल पीनेका आभास होना; सिंह, शर्करा, तेल, चाँदी, ताण्डवनृत्य, उड़द-
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