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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ
६१८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सुन्दरि राधिके! अब इन्द्रका उत्तम वृत्तान्त सुनो, जो पुण्यका बीज तथा पापका नाशक है। मैं विस्तारपूर्वक उसका वर्णन करता हूँ। गुरुके कोप और प्रकृतिकी अवहेलनासे वज्रधारी इन्द्रकी विवेक-शक्ति नष्ट हो गयी थी; अतः उनसे एक दिन ब्रह्महत्याका पाप बन गया। गुरुको तो वे छोड़ ही चुके थे; दैवने भी उन्हें अपना ग्रास बनाया। दैत्योंका आक्रमण हुआ और वे उनसे पीड़ित एवं भयभीत हो जगद्गुरु ब्रह्माजीकी शरणमें गये। ब्रह्माजीकी आज्ञासे उन्होंने विश्वरूपको अपना पुरोहित बनाया। दैवसे उनकी बुद्धि मारी गयी थी; इसलिये इन्द्रने विश्वरूपपर पूरा-पूरा विश्वास कर लिया। विश्वरूपकी माता दैत्यवंशकी कन्या थी; अतः उनके मनमें दैत्योंके प्रति भी पक्षपात था। बुद्धिमान् इन्द्र उनके इस मनोभावको ताड़ गये; अतः उन्होंने अनायास ही तीखे बाण मारकर पुरोहित विश्वरूपका सिर काट लिया। विश्वरूपके पिता त्वष्टाने जब यह बात सुनी तो वे तत्क्षण रोषके वशीभूत हो गये और ‘इन्द्रशत्रो विवर्द्धस्व’ (इन्द्रके शत्रु ! तुम बढ़ो) ऐसा कहकर यज्ञका अनुष्ठान करने लगे, उस यज्ञके कुण्डसे वृत्र नामक महान् असुर प्रकट हुआ, जिसने अनायास ही समस्त देवताओंको क्रोधपूर्वक कुचल डाला। तब दैत्यमर्दन इन्द्रने महामुनि दधीचिकी हड्डियोंसे अत्यन्त भयंकर वज्रका निर्माण करके देवकण्टक वृत्रासुरका वध कर डाला। फिर तो इन्द्रपर ब्रह्महत्याने धावा बोल दिया। वे अचेत-से हो रहे थे। ब्रह्महत्या बूढ़ी स्त्रीका वेष धारण करके आयी थी। वह लाल कपड़े पहन रखी थी। उसके शरीरकी ऊँचाई सात ताड़ोंके बराबर थी तथा कण्ठ, ओठ और तालु सूखे हुए थे। उसके दाँत हरिसके समान लंबे थे। उसने इन्द्रको बहुत डरा दिया। वे जब दौड़ते थे तो उनके पीछे-पीछे वह भी दौड़ती थी। ब्रह्महत्या बलिष्ठ थी और इन्द्र अपनी चेतनातक खो बैठे थे। उसका स्वभाव निर्दय था और वह हाथमें तलवार लेकर बड़े वेगसे दौड़ रही थी। उस घोर ब्रह्महत्याको देखकर गुरुके चरणोंका स्मरण करते हुए वे कमलके नालके सूक्ष्म सूत्रके सहारे मानसरोवरमें प्रविष्ट हो गये। ब्रह्महत्या ब्रह्माजीके शापके कारण वहाँ पहुँचनेमें असमर्थ थी; अतः सरोवरके तटके निकट बरगदकी एक शाखापर जा बैठी। उन दिनों राजा नहुष इन्द्रकी जगह त्रिभुवनके स्वामी बनाये गये। नहुष बलिष्ठ थे और देवता दुर्बल। अतः इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हुए नहुषने देवताओंसे यह माँग की कि इन्द्राणी शची मुझ इन्द्रकी सेवाके लिये उपस्थित हों। यह समाचार सुनकर शचीको बड़ा भय हुआ। वे तारादेवीकी शरणमें गयीं। ताराने अपने पतिको बहुत फटकारा और शिष्य-पत्नीकी रक्षा की। तब शचीको आश्वासन दे गुरु बृहस्पति प्रसन्नतापूर्वक मानसरोवरको गये और वहाँ कातर एवं अचेत हुए देवेन्द्रको सम्बोधित करके बोले।

बृहस्पतिने कहा— बेटा! उठो, उठो। मेरे रहते हुए तुम्हें क्या भय हो सकता है? मैं तुम्हारा स्वामी एवं गुरु हूँ। मेरे स्वरसे ही मुझे पहचानो और भय छोड़ो।

बृहस्पतिके स्वरको पहचानकर सम्पूर्ण सिद्धियोंके स्वामी इन्द्रने सूक्ष्म रूपको त्याग अपना रूप धारण कर लिया और तत्काल उठकर वेगपूर्वक उन सूर्यतुल्य तेजस्वी गुरुको देखा और प्रसन्नतापूर्वक उन्हें प्रणाम किया। गुरुजी उस समय प्रसन्न थे और क्रोधका परित्याग कर चुके थे। पैरोंमें पड़कर भयविह्वल हो रोते हुए इन्द्रको खींचकर उन्होंने प्रेमपूर्वक छातीसे लगा लिया और स्वयं भी प्रेमाकुल होकर रो पड़े! बृहस्पतिजीको संतुष्ट तथा रोते देख देवेश्वर इन्द्रका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठा। भक्तिभावसे उनका मस्तक झुक गया और वे हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे।

४३- श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेसे श्रीराधा और गोपियोंका दुःखसे रोदन, चन्दनवनमें श्रीकृष्णका उन्हें दर्शन देना, गोपियोंके प्रणय-कोपजनित उद्गार, श्रीकृष्णका उनके साथ विहार, श्रीराधा नामके प्रथम उच्चारणका कारण, श्रीकृष्णद्वारा श्रीराधाका शृङ्गार, गोपियोंद्वारा उनकी सेवा और श्रीकृष्णके मथुरागमनसे लेकर परमधामगमनतककी लीलाओंका संक्षिप्त परिचय

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६१९

इन्द्र बोले— भगवन्! मेरे अपराधको क्षमा कीजिये। कृपानिधान! कृपा कीजिये। अच्छे स्वामी अपने सेवकके अपराधको हृदयमें स्थान नहीं देते। अपनी पत्नी, अपने शिष्य, अपने भृत्य तथा अपने पुत्रोंको दुर्बल या सबल कौन मनुष्य दण्ड देनेमें असमर्थ होता है? तीन करोड़ देवताओंमें मैं ही एक देवाधम और मूढ़ हूँ। सुरश्रेष्ठ! आपकी कृपासे ही मैं उच्च पदपर प्रतिष्ठित हूँ। आपने ही दया करके मुझे आगे बढ़ाया है। आप सारे जगत्का संहार करनेकी शक्ति रखते हैं। आपके सामने मेरी क्या बिसात है? मैं वैसा ही हूँ, जैसा बावलीका कीट। आप साक्षात् विधाताके पौत्र हैं; अतः स्वयं दूसरी सृष्टि रचनेमें समर्थ हैं।

इन्द्रके मुखसे यह स्तवन सुनकर गुरु बृहस्पति बहुत संतुष्ट हुए। उनके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे और वे प्रेमपूर्वक बोले।

बृहस्पतिने कहा— महाभाग! धैर्य धारण करो और पहलेसे भी चौगुना महान् ऐश्वर्य पाकर सुस्थिर लक्ष्मीका लाभ लो। वत्स पुरन्दर! मेरे प्रसादसे तुम्हारे शत्रु मारे गये। अब तुम अमरावतीमें जाकर राज्य करो और पतिव्रता शचीसे मिलो।

यों कहकर ज्यों ही शिष्यसहित गुरु वहाँसे चलनेको उद्यत हुए, त्यों ही उन्होंने अत्यन्त दुःसह एवं भयंकर ब्रह्महत्याको सामने खड़ी देखा। उसपर दृष्टि पड़ते ही इन्द्र अत्यन्त भयभीत हो गुरुकी शरणमें गये। बृहस्पतिको भी बड़ा भय हुआ। उन्होंने मन-ही-मन मधुसूदनका स्मरण किया। इसी बीचमें आकाशवाणी हुई, जिसमें अक्षर तो थोड़े थे, परंतु अर्थ बहुत। बृहस्पतिजीने वह आकाशवाणी सुनी— 'संसारविजय नामक जो राधिकाकवच है, वह समस्त अशुभोंका नाश करनेवाला है। इस समय उसीका उपदेश देकर तुम शिष्यकी रक्षा करो।' तब शिष्यवत्सल बृहस्पतिने शिष्यको उस कवचका उपदेश दिया और अनायास ही हुङ्कारमात्रसे ब्रह्महत्याको भस्म कर डाला। तदनन्तर शिष्यको साथ लेकर बृहस्पतिजी अमरावतीपुरीमें गये। इन्द्रने गुरुकी आज्ञासे उस पुरीकी दशा देखी। शत्रुने उस नगरीको तोड़-फोड़ डाला था।

पतिका आगमन सुनकर शचीके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। उसने भक्तिभावसे गुरुदेवको प्रणाम करके प्राणवल्लभके चरणोंमें भी मस्तक झुकाया। प्रिये! इन्द्रका शुभागमन सुनकर सब देवता, ऋषि और मुनि वहाँ आये। उनका चित्त हर्षसे गद्गद हो रहा था। इन्द्रने अमरावतीका निर्माण करनेके लिये एक श्रेष्ठ देवशिल्पीको नियुक्त किया। देवशिल्पीने पूरे सौ वर्षोंतक अमरावतीकी रचना की। नाना विचित्र रत्नोंसे सम्पन्न तथा श्रेष्ठ मणिरत्नोंद्वारा निर्मित उस मनोहर पुरीकी कहीं उपमा नहीं थी। फिर भी उससे देवराज इन्द्र संतुष्ट नहीं हुए। विश्वकर्माको आज्ञा नहीं मिली। इसलिये वे घर जा तो नहीं सके; परंतु उनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो उठा। वे ब्रह्माजीकी शरणमें गये। ब्रह्माजीने उनके अभिप्रायको जानकर कहा— 'कल तुम्हारे प्रतिरोधक कर्मका क्षय हो जानेपर ही तुम्हें छुटकारा मिलेगा।' ब्रह्माजीकी बात सुनकर विश्वकर्मा शीघ्र ही अमरावती लौट आये और ब्रह्माजी वैकुण्ठधाममें गये। वहाँ उन्होंने अपने माता-पिता श्रीहरिको प्रणाम करके उनसे सारी बातें कहीं। तब श्रीहरिने ब्रह्माजीको धैर्य देकर अपने घरको लौटाया और स्वयं ब्राह्मणका रूप धारण करके वे अमरावतीपुरीमें आये। ब्राह्मणकी अवस्था बहुत छोटी थी। शरीर भी अधिक नाटा था। उन्होंने दण्ड और छत्र धारण कर रखे थे। शरीरपर श्वेत वस्त्र और ललाटमें उज्ज्वल तिलकसे वे बड़े मनोहर जान पड़ते थे। मुस्कराते समय उनकी श्वेत दन्तावली चमक उठती थी। अवस्थामें छोटे होनेपर भी

६२०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वे ज्ञान और बुद्धिमें बढ़े-चढ़े थे। विद्वान् तो थे ही, स्वयं विधाताके भी विधाता तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता थे। इन्द्रके द्वारपर खड़े हो वे द्वारपालसे बोले—'द्वाररक्षक! तुम इन्द्रसे जाकर कहो कि द्वारपर एक ब्राह्मण खड़े हैं, जो आपसे शीघ्र मिलनेके लिये आये हैं।' द्वारपालने उनकी बात सुनकर इन्द्रको सूचना दी और इन्द्र शीघ्र आकर उन ब्राह्मणकुमारसे मिले। हँसते हुए बालक और बालिकाओंके समूह उन्हें घेरकर खड़े थे। वे बड़े उत्साहसे मुस्करा रहे थे और उनका स्वरूप अत्यन्त तेजस्वी जान पड़ता था। इन्द्रने उन शिशुरूपधारी हरिको भक्तिभावसे प्रणाम किया और भक्तवत्सल श्रीहरिने प्रेमपूर्वक उन्हें आशीर्वाद दिया। इन्द्रने मधुपर्क आदि देकर उनकी पूजा की और ब्राह्मणबालकसे पूछा—'कहिये, किसलिये आपका शुभागमन हुआ है?' इन्द्रका वचन सुनकर ब्राह्मणबालकने जो बृहस्पतिके गुरुके भी गुरु थे, मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा।

**ब्राह्मण बोले—**देवेन्द्र! मैंने सुना है कि तुम बड़े विचित्र और अद्भुत नगरका निर्माण करा रहे हो; अतः इस नगरको देखने तथा इसके विषयमें मनोवाञ्छित बातें पूछनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ। कितने वर्षोंतक इसका निर्माण कराते रहनेके लिये तुमने संकल्प किया है? अथवा विश्वकर्मा कितने वर्षोंमें इसका निर्माणकार्य पूर्ण कर देंगे? ऐसा निर्माण तो किसी भी इन्द्रने नहीं किया था। ऐसे सुन्दर नगरके निर्माणमें दूसरा कोई विश्वकर्मा भी समर्थ नहीं है।

ब्राह्मणबालककी यह बात सुनकर देवराज इन्द्र हँसने लगे। वे सम्पत्तिके मदसे अत्यन्त मतवाले हो रहे थे; अतः उन्होंने उस द्विजकुमारसे पुनः पूछा—'ब्रह्मन्! आपने कितने इन्द्रोंका समूह देखा अथवा सुना है? तथा कितने प्रकारके विश्वकर्मा आपके देखने या सुननेमें आये हैं? यह मुझे इस समय बताइये।' इन्द्रका यह प्रश्न सुनकर ब्राह्मणकुमार हँसे और अमृतके समान मधुर एवं श्रवणसुखद वचन बोले।

**ब्राह्मणने कहा—**तात! मैं तुम्हारे पिता प्रजापति कश्यपको जानता हूँ। उनके पिता तपोनिधि मरीचिमुनिसे भी परिचित हूँ। मरीचिके पिता देवेश्वर ब्रह्माजीको भी, जो भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए हैं, जानता हूँ और उनके रक्षक सत्त्वगुणशाली महाविष्णुका भी परिचय रखता हूँ। मुझे उस एकार्णव प्रलयका भी ज्ञान है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंसे शून्य एवं भयानक दिखायी देता है। इन्द्र! निश्चय ही सृष्टि कई प्रकारकी है। कल्प भी अनेक हैं तथा ब्रह्माण्ड भी कितने ही प्रकारके हैं। उन ब्रह्माण्डोंमें अनेकानेक ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा इन्द्र भी बहुतेरे हैं। उन सबकी गणना कौन कर सकता है? सुरेश्वर! भूतलके धूलिकणोंकी गणना कर ली जाय तो भी इन्द्रोंकी गणना नहीं हो सकती है; ऐसा विद्वानोंका मत है। इन्द्रकी आयु और अधिकार इकहत्तर चतुर्युगतक है। अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन हो जानेपर विधाताका एक दिन-रात पूरा होता है। इस तरह एक सौ आठ वर्षोंतक ब्रह्माजीकी सम्पूर्ण आयु है। जहाँ विधाताकी भी संख्या नहीं है, वहाँ देवेन्द्रोंकी गणना क्या हो सकती है? जहाँ ब्रह्माण्डोंकी ही संख्या ज्ञात नहीं होती; वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी कहाँ गिनती है? महाविष्णुके रोमकूपजनित निर्मल जलमें ब्रह्माण्डकी स्थिति उसी तरह है, जैसे सांसारिक नदी-नद आदिके जलमें कृत्रिम नौका हुआ करती है। इस प्रकार महाविष्णुके शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने ब्रह्माण्ड हैं; अतएव ब्रह्माण्ड असंख्य कहे गये हैं। एक-एक ब्रह्माण्डमें तुम्हारे-जैसे कितने ही देवता निवास करते हैं।

इसी बीचमें पुरुषोत्तम श्रीहरिने वहाँ चींटोंके समूहको देखा, जो सौ धनुषकी दूरीतक फैला

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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हुआ था। बारी-बारीसे उन सबकी ओर देखकर वे ब्राह्मणबालकका रूप धरकर पधारे हुए भगवान् उच्चस्वरसे हँसने लगे। किंतु कुछ बोले नहीं। मौन रह गये। उनका हृदय समुद्रके समान गम्भीर था। ब्राह्मण-वटुककी गाथा सुनकर और उनका अट्टहास देखकर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। तदनन्तर उनके विनयपूर्वक पूछनेपर ब्राह्मणरूपधारी जनार्दनने भाषण देना आरम्भ किया।

**ब्राह्मण बोले—**इन्द्र! मैंने क्रमशः एक-एक करके चींटोंके समुदायकी सृष्टि की है। वे सब चींटे अपने कर्मसे देवलोकमें इन्द्रके पदपर प्रतिष्ठित हो चुके थे; परंतु इस समय वे सब अपने कर्मानुसार क्रमशः भिन्न-भिन्न जीवयोनियोंमें जन्म लेते हुए चींटोंकी जातिमें उत्पन्न हुए हैं। कर्मसे ही जीव निरामय वैकुण्ठधाममें जाते हैं, कर्मसे ब्रह्मलोकमें और कर्मसे ही शिवलोकमें पहुँचते हैं। अपने कर्मसे ही वे स्वर्गमें तथा स्वर्गतुल्य स्थान पातालमें भी प्रवेश करते हैं। कर्मसे ही अपने लिये दुःखके एकमात्र कारण घोर नरकमें गिरते हैं। कर्मसूत्रसे ही विधाता जीवधारियोंको फल देते हैं। कर्म स्वभावसाध्य है और स्वभाव अभ्यासजन्य। देवेन्द्र! चराचर प्राणियोंसहित समस्त संसार स्वप्नके समान मिथ्या है। यहाँ कालयोगसे सबकी मौत सदा सिरपर सवार रहती है। जीवधारियोंके शुभ और अशुभ सब कुछ पानीके बुलबुलेके समान हैं। इन्द्र! विद्वान् पुरुष इसमें सदा विचरता है; परंतु कहीं भी आसक्त नहीं होता।

यों कहकर ब्राह्मणदेवता वहाँ मुस्कराते हुए बैठे रहे। उनकी बात सुनकर देवेश्वर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। वे अपने-आपको अब अधिक महत्त्व नहीं दे रहे थे। इसी बीच एक मुनीश्वर वहाँ शीघ्रतापूर्वक आये जो ज्ञान और अवस्था दोनोंमें बड़े थे। उनका शरीर अत्यन्त वृद्ध था। वे महान् योगी जान पड़ते थे। वे कटिमें कृष्ण-मृगचर्म, मस्तकपर जटा, ललाटमें उज्ज्वल तिलक, वक्षःस्थलमें रोमचक्र तथा सिरपर चटाई धारण किये हुए थे। उनका सारा रोममण्डल विद्यमान था; केवल बीचमें कुछ रोम उखाड़े गये थे। वे मुनि ब्राह्मणबालक तथा इन्द्रके बीचमें आकर ठूँठे काठकी भाँति खड़े हो गये। महेन्द्रने ब्राह्मणको देखकर सहर्ष प्रणाम किया और मधुपर्क देकर भक्तिभावसे उनकी पूजा की। इसके बाद उन्होंने ब्राह्मणसे कुशल-मङ्गल पूछा और सादर एवं सानन्द आतिथ्य करके उन्हें संतुष्ट किया। तत्पश्चात् ब्राह्मणबालकने उनके साथ बातचीत की और विनयपूर्वक अपना सारा मनोभाव प्रकट किया।

**बालकने कहा—**विप्रवर! आप कहाँसे आये हैं? और आपका नाम क्या है? यहाँ आनेका उद्देश्य क्या है? तथा आप कहाँके रहनेवाले हैं? आपने मस्तकपर चटाई किसलिये धारण कर रखी है? मुने! आपके वक्षःस्थलमें रोमचक्र कैसा है? यह बहुत बढ़ा हुआ है; किंतु बीचमेंसे कुछ रोम क्यों उखाड़ लिये गये हैं? ब्रह्मन्! यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो सब विस्तारपूर्वक कहिये। इन सब अद्भुत बातोंको सुननेके लिये मेरे मनमें उत्कण्ठा है।

ब्राह्मणबालककी यह बात सुनकर वे महामुनि इन्द्रके सामने प्रसन्नतापूर्वक अपना सारा वृत्तान्त बताने लगे।

**मुनि बोले—**ब्रह्मन्! आयु बहुत थोड़ी होनेके कारण मैंने कहीं भी रहनेके लिये घर नहीं बनाया है; विवाह भी नहीं किया है और जीविकाका साधन भी नहीं जुटाया है। आजकल भिक्षासे ही जीवन-निर्वाह करता हूँ। मेरा नाम लोमश है। आप-जैसे ब्राह्मणका दर्शन ही यहाँ मेरे आगमनका प्रयोजन है। मेरे सिरपर जो चटाई है, वह वर्षा और धूपका निवारण करनेके लिये है। मेरे वक्षःस्थलमें जो रोमचक्र है, उसका भी

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कारण सुनिये, जो सांसारिक जीवोंको भय देनेवाला और उत्तम विवेकको उत्पन्न करनेवाला है। मेरे वक्षःस्थलका यह रोममण्डल ही मेरी आयुकी संख्याका प्रमाण है। ब्रह्मन्! जब एक इन्द्रका पतन हो जाता है, तब मेरे इस रोमचक्रका एक रोम उखाड़ दिया जाता है। इसी कारणसे बीचके बहुत-से रोएँ उखाड़ दिये गये हैं; तथापि अभी बहुत-से विद्यमान हैं। ब्रह्माका दूसरा परार्द्ध पूर्ण होनेपर मेरी मृत्यु बतायी गयी है। विप्रवर! असंख्य विधाता मर चुके हैं और मरेंगे। फिर इस छोटी-सी आयुके लिये स्त्री, पुत्र और घरकी क्या आवश्यकता है? ब्रह्माजीका पतन हो जानेपर भगवान् श्रीहरिकी एक पलक गिरती है; अतः मैं निरन्तर उन्हींके चरणारविन्दोंका दर्शन करता रहता हूँ। श्रीहरिका दास्यभाव दुर्लभ है। भक्तिका गौरव मुक्तिसे भी बढ़कर है। सारा ऐश्वर्य स्वप्नके समान मिथ्या और भगवान्‌की भक्तिमें व्यवधान डालनेवाला है। यह उत्तम ज्ञान मेरे गुरु भगवान् शंकरने दिया है; अतः मैं भक्तिके बिना सालोक्य आदि चार प्रकारकी मुक्तियोंको भी नहीं ग्रहण करना चाहता हूँ।

ऐसे कहकर वे मुनि भगवान् शंकरके समीप चले गये और बालकरूपधारी श्रीहरि भी वहीं अन्तर्धान हो गये। इन्द्र स्वप्नकी भाँति यह घटना देखकर बड़े विस्मित हुए। अब उन परमेश्वरके मनमें सम्पत्तिके लिये तृष्णा नहीं रह गयी। उन्होंने विश्वकर्माको बुलाकर उनसे मीठी-मीठी बातें कीं तथा रत्न देकर पूजन करनेके पश्चात् उन्हें घर जानेकी आज्ञा दी। फिर सब कुछ अपने पुत्रको सौंपकर वे भगवान्‌की शरणमें जानेको उद्यत हो गये। उनका विवेक जाग उठा था; अतः वे शची तथा राजलक्ष्मीको त्यागकर प्रारब्ध-क्षयकी कामना करने लगे। अपने प्राणवल्लभको विवेक एवं वैराग्यसे युक्त हुआ देख शचीका हृदय व्यथित हो उठा। वे शोकसे व्याकुल एवं भयभीत हो गुरुकी शरणमें गयीं। वहाँ सब कुछ निवेदन करके बृहस्पतिजीको बुलाकर इन्द्रको नीतिके सार-तत्त्वका उपदेश कराया। गुरु बृहस्पतिने दाम्पत्य-प्रेमसे युक्त शास्त्र-विशेषकी रचना करके स्वयं प्रेमपूर्वक उन्हें पढ़ाया। बृहस्पतिजीने उस शास्त्र-विशेषका भाव इन्द्रको भलीभाँति समझा दिया। वृन्दावनविनोदिनि! तब इन्द्र पूर्ववत् राज्य करने लगे। सुरेश्वरि! इस प्रकार मैंने इन्द्रके अभिमान-भङ्गका सारा प्रसङ्ग कह सुनाया। पिता नन्दके यज्ञमें जो इन्द्रके दर्पका दलन हुआ था, उसे तो तुमने अपनी आँखों देखा ही था। (अध्याय ४७)


सूर्य और अग्निके दर्प-भङ्गकी कथा

राधिका बोलीं— भगवन्! आपने इन्द्रके दर्प-भङ्गका प्रसङ्ग मुझसे कहा। अब मैं सूर्यदेवके गर्वगञ्जनकी बात यथार्थरूपसे सुनना चाहती हूँ।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— सुन्दरि! सूर्य एक ही बार उदय लेकर फिर अस्त हो गये, परंतु माली और सुमाली नामक दो दैत्यराज सूर्यास्त हो जानेके बाद भी वैसा ही प्रकाश बनाये रखनेके लिये उद्यत हुए। भगवान् शंकरके वरसे महान् ऐश्वर्य पाकर वे दोनों दैत्य मदसे उन्मत्त हो गये थे। उनकी प्रभासे रात्रि नहीं होने पाती थी। (रातके समय भी दिनका-सा प्रकाश छाया रहता था।) यह देख सूर्यदेव रुष्ट हो गये और उन्होंने अपने शूलसे अवहेलनापूर्वक उन दोनों दैत्योंको मारा। सूर्यके शूलसे आहत हो वे दोनों दैत्य मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। भक्तोंका विनाश हुआ जान भक्तवत्सल शंकर आये और उन्होंने अपने महान् ज्ञानद्वारा उन दोनोंको जीवन-दान दिया। तब वे दोनों दैत्य भगवान् शिवको

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६२३

भक्तिपूर्वक प्रणाम करके अपने घरको चले गये। इधर महादेवजी रोषसे आगबबूला हो उठे और सूर्यको मारनेके लिये दौड़े। संहारकर्ता हर मेरा विनाश करनेके लिये चले आ रहे हैं, यह देख सूर्यदेव भयसे भागते हुए तत्काल ब्रह्माजीकी शरणमें गये। तब महादेवजीने रोषसे शूल उठाकर ब्रह्माजीके भवनपर धावा किया। भगवान् शिव कालके भी काल और विधाताके भी विधाता हैं। उन परमेश्वर हरको रुष्ट हुआ देख लोकनाथ ब्रह्मा चारों मुखोंसे वेदोक्त स्तोत्र पढ़ते हुए उनकी स्तुति करने लगे।

**ब्रह्माजी बोले—**दक्ष-यज्ञ-विनाशक शिव ! सूर्यदेव मेरी शरणमें आये हैं; अतः आप इनपर कृपा कीजिये। जगद्गुरो ! सृष्टिके आरम्भमें आपने ही सूर्यकी सृष्टि की है। महाभाग आशुतोष ! भक्तवत्सल ! प्रसन्न होइये। कृपासिन्धो ! कृपापूर्वक दिन और रातकी रक्षा कीजिये। ब्रह्मस्वरूप भगवन् ! आप जगत्की सृष्टि, पालन और संहारके कारण हैं। क्या स्वयं ही सूर्यका निर्माण करके स्वयं ही इनका संहार करना चाहते हैं? आप स्वयं ही ब्रह्मा, शेषनाग, धर्म, सूर्य और अग्नि हैं। परात्पर परमेश्वर ! चन्द्र और इन्द्र आदि देवता आपसे भयभीत रहते हैं। ऋषि और मुनि आपकी ही आराधना करके तपस्याके धनी हुए हैं। आप ही तप हैं, आप ही तपस्याके फल हैं और आप ही तपस्याओंके फलदाता हैं।

ऐसा कहकर ब्रह्माजी सूर्यको ले आये और भक्ति तथा प्रीतिके साथ दीनवत्सल शंकरको उन्हें सौंप दिया। भगवान् शिवका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उन जगत्-विधाताने सूर्यको आशीर्वाद देकर ब्रह्माजीको प्रणाम किया और बड़े हर्षके साथ अपने धामको प्रस्थान किया।

जो मनुष्य संकटकालमें ब्रह्माजीद्वारा किये गये इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह भयभीत हो तो भयसे और बँधा हो तो बन्धनसे मुक्त हो जाता है। राजद्वारपर, श्मशान-भूमिमें और महासागरमें जहाज टूट जानेपर इस स्तोत्रके स्मरणमात्रसे मनुष्य संकटमुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है।

**श्रीकृष्ण कहते हैं—**तदनन्तर सूर्यदेव ब्रह्माजीको प्रणाम करके प्रसन्न हुए और उनकी आज्ञासे अभिमान छोड़ प्रेमपूर्वक विनयपूर्ण बर्ताव करने लगे। अब अग्निके मानभञ्जनका उपाख्यान सुनो। यह उत्तम प्रसङ्ग पुराणोंमें गोपनीय है और कानोंमें अमृतके समान मधुर प्रतीत होता है। एक समयकी बात है। अग्निदेव सौ ताड़ोंके बराबर ऊँची और भयंकर लपटें उठाकर तीनों लोकोंको भस्म कर डालनेके लिये उद्यत हो गये। महर्षि भृगुने उन्हें शाप दिया था; इसलिये वे क्षोभ और क्रोधसे भरे थे। अपनेको तेजस्वी और दूसरोंको तुच्छ मानकर वे त्रिलोकीको भस्म करना चाहते थे। इसी बीचमें मायासे शिशुरूपधारी जनार्दन भगवान् विष्णु लीलापूर्वक वहाँ आ पहुँचे और सामने खड़े हो अग्निकी उस दाहिका शक्तिको उन्होंने हर लिया। तत्पश्चात् मन्द-मन्द मुस्कराते हुए भक्तिसे मस्तक झुका वे विनयपूर्वक बोले।

**शिशुने कहा—**भगवन् ! आप क्यों रुष्ट हैं ? इसका कारण मुझे बताइये। व्यर्थ ही आप तीनों लोकोंको भस्म करनेके लिये उद्यत हुए हैं ? भृगुजीने आपको शाप दिया है; अतः आप उनका ही दमन कीजिये। एकके अपराधसे तीनों लोकोंको भस्म कर डालना आपके लिये कदापि उचित नहीं है। ब्रह्माजीने इस विश्वकी सृष्टि की है, साक्षात् श्रीहरि इसके पालक हैं और भगवान् रुद्र संहारक। ऐसा ही क्रम है। जगदीश्वर शंकरके रहते हुए आप स्वयं जगत्को भस्म करनेके लिये क्यों उद्यत हुए हैं? पहले जगत्का पालन करनेवाले भगवान् विष्णुको जीतिये। उसके बाद इसका शीघ्रतापूर्वक संहार कीजिये।

( उत्तरार्द्ध )

६२४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ऐसा कहकर ब्राह्मणबालकने सामने पड़े हुए सरकंडेके एक पत्तेको, जो बहुत ही सूखा हुआ था, हाथमें उठा लिया और उसे जलानेके लिये अग्निको दिया। सूखा ईंधन देख अग्निदेव भयानकरूपसे जीभ लपलपाने लगे। उन्होंने अपनी लपटोंमें ब्राह्मणबालकको उसी तरह लपेट लिया, जैसे मेघोंकी घटासे चन्द्रमा छिप जाता है; परंतु उस समय न तो वह सूखा पत्ता जला और न उस शिशुका एक बाल भी बाँका हुआ। यह देख अग्निदेव उस बालकके सामने लज्जासे ठिठक गये। अग्निदेवका दर्प-भङ्ग करके वह शिशु वहीं अन्तर्धान हो गया तथा अग्निदेव अपनी मूर्तिको समेटकर डरे हुएकी भाँति अपने स्थानको चले गये।

इसी तरह राजा अम्बरीषके यहाँ महर्षि दुर्वासाके दर्पका दलन हुआ था। (वह कथा पहले आ चुकी है।)

**राधिका बोलीं—**जगद्गुरो! अब धन्वन्तरिके दर्प-भङ्गकी कथा सुनाइये।

**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद! राधिकाका यह वचन सुनकर भगवान् मधुसूदन हँसे और उन्होंने उस श्रवणसुखद प्राचीन कथाको सुनाना आरम्भ किया।

(अध्याय ४८—५०)


धन्वन्तरिके दर्प-भङ्गकी कथा, उनके द्वारा मनसादेवीका स्तवन

**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**भगवान् धन्वन्तरि स्वयं महान् पुरुष हैं और साक्षात् नारायणके अंशस्वरूप हैं। पूर्वकालमें जब समुद्रका मन्थन हो रहा था, उस समय महासागरसे उनका प्रादुर्भाव हुआ। वे सम्पूर्ण वेदोंमें निष्णात तथा मन्त्र-तन्त्रविशारद हैं, विनतानन्दन गरुड़के शिष्य और भगवान् शंकरके उपशिष्य हैं। एक दिन वे सहस्रों शिष्योंसे घिरे हुए कैलास पर्वतपर आये। मार्गमें उन्हें भयानक तक्षक दिखायी दिया, जो जीभ लपलपा रहा था। भयानक विषसे भरा हुआ वह पर्वताकार नाग लाखों नागोंसे घिरा हुआ था और धन्वन्तरिको क्रोधपूर्वक काट खानेके लिये आगे बढ़ रहा था। यह देख धन्वन्तरिका शिष्य दम्भी हँसने लगा। उसने भयानक तक्षकको मन्त्रसे जृम्भित करके विषहीन बना दिया और उसके मस्तकमें विद्यमान बहुमूल्य मणिरत्नको हर लिया। इतना ही नहीं, उसने तक्षकको हाथसे घुमाकर दूर फेंक दिया। तक्षक उस मार्गमें मृतककी भाँति निश्चेष्ट पड़ गया। यह देख उसके गणोंने वासुकिके पास जाकर सब समाचार निवेदन किया। उसे सुनकर वासुकि अत्यन्त क्रोधसे जल उठे। उन्होंने भयानक विषवाले असंख्य सर्पोंको वहाँ भेजा। समस्त सेनापतियोंमें पाँच मुख्य थे—द्रोण, कालिय, कर्कोटक, पुण्डरीक और धनञ्जय। ये सब नाग उस स्थानपर आये, जहाँ धन्वन्तरि विराजमान

४५- इन्द्रके दर्प-भङ्गकी कथा—नहुषकी शचीपर कुदृष्टि, शचीका धर्मकी बातें बताकर नहुषको समझाना और उसके न माननेपर बृहस्पतिजीकी शरणमें जाकर उनका स्तवन करना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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थे। उन असंख्य नागोंको देखकर धन्वन्तरिके शिष्योंको बड़ा भय हुआ। वे सब शिष्य नागोंके निःश्वास-वायुसे मृतक-तुल्य हो गये और निश्चेष्ट तथा ज्ञानशून्य हो पृथ्वीपर पड़ गये। भगवान् धन्वन्तरिने गुरुका स्मरण करते हुए मन्त्रका पाठ और अमृतकी वर्षा करके सब शिष्योंको जीवित कर दिया। उनमें चेतना उत्पन्न करके जगद्गुरु धन्वन्तरिने मन्त्रोंद्वारा भयानक विषवाले सर्पसमूहको जृम्भित कर दिया। फिर तो वे सब-के-सब ऐसे निश्चेष्ट हुए, मानो मर गये हों। उन नागगणोंमें कोई ऐसा भी नहीं रह गया, जो नागराजको समाचार दे सके; परंतु नागराज वासुकि सर्वज्ञ हैं, उन्होंने सर्पोंके उन समस्त संकटको जान लिया और अपनी ज्ञानरूपिणी बहिन जगद्गौरी मनसा (या जरत्कारु)-को बुलाया।

वासुकिने उससे कहा—मनसे! तुम जाओ और अत्यन्त संकटसे नागोंकी रक्षा करो। महाभागे! ऐसा करनेपर तुम्हारी तीनों लोकोंमें पूजा होगी।

वासुकिकी बात सुनकर वह नागकन्या हँस पड़ी और विनीत भावसे खड़ी हो अमृतके समान मधुर वचन बोली।

मनसाने कहा—नागराज ! मेरी बात सुनिये। मैं युद्धके लिये जाऊँगी। शुभ और अशुभ (जीत और हार) तो दैवके हाथमें है; परंतु मैं यथोचित कर्तव्यका पालन करूँगी। समराङ्गणमें लीलापूर्वक उस शत्रुका संहार कर डालूँगी। जिसे मैं मार दूँगी, उसकी रक्षा कौन कर सकता है? मेरे बड़े भाई और गुरु भगवान् शेषने मुझे जगदीश्वर नारायणका परम अद्भुत सिद्ध मन्त्र प्रदान किया है। मैं अपने कण्ठमें 'त्रैलोक्य-मङ्गल' नामक उत्तम कवच धारण करती हूँ; अतः संसारको भस्म करके पुनः उसकी सृष्टि करनेमें समर्थ हूँ। मन्त्रशास्त्रोंमें मैं भगवान् शंकरकी शिष्या हूँ। पूर्वकालमें भगवान् शिवने कृपापूर्वक मुझे महान् ज्ञान दिया था।

ऐसा कहकर श्रीहरि, शिव तथा शेषनागको प्रणाम करके मनमें हर्ष और उत्साह लिये मनसा अन्य नागोंको वहीं छोड़ अकेली ही रोषपूर्वक उस स्थानको गयी। उस समय मनसादेवीकी आँखें रोषसे लाल हो रही थीं। वह उस स्थानपर आयी, जहाँ प्रसन्नमुख और नेत्रवाले धन्वन्तरिदेव विराजमान थे। सुन्दरी मनसाने दृष्टिमात्रसे ही सम्पूर्ण सर्पोंको जीवित कर दिया और अपनी विषपूर्ण दृष्टि डालकर शत्रुके शिष्योंको चेष्टाशून्य बना दिया। भगवान् धन्वन्तरि मन्त्र-शास्त्रके ज्ञानमें निपुण थे। उन्होंने मन्त्रद्वारा शिष्योंको उठानेका यत्न किया, परंतु वे सफल न हो सके। तब मनसादेवीने धन्वन्तरिकी ओर देख हँसकर अहंकारभरी बात कही।

मनसा बोली—सिद्धपुरुष! बताओ तो सही, क्या तुम मन्त्रका अर्थ, मन्त्रशिल्प, मन्त्रभेद और महान् औषधका ज्ञान रखते हो? गरुड़के शिष्य हो न? मैं और गरुड़ दोनों भगवान् शंकरके विख्यात शिष्य हैं और दीर्घकालतक गुरुके पास शिक्षा लेते रहे हैं।

यों कहकर जगदम्बा मनसा सरोवरसे कमल ले आयी और उसे मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके क्रोधपूर्वक धन्वन्तरिकी ओर चलाया। प्रज्वलित अग्निशिखाके समान जलते हुए उस कमल-पुष्पको आते देख धन्वन्तरिने निःश्वासमात्रसे उसको भस्म कर दिया। तत्पश्चात् मन्त्रसे अभिमन्त्रित एक मुट्ठी धूल लेकर उसके द्वारा उन्होंने उस भस्मको भी निष्फल कर दिया। फिर वे अवहेलनापूर्वक हँसने लगे। तब मनसादेवीने ग्रीष्मकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होनेवाली शक्ति हाथमें ले ली और उसे मन्त्रसे आवेष्टित करके शत्रुके ओर चला दिया। उस जाज्वल्यमान शक्तिको आते देख धन्वन्तरिने भगवान् विष्णुके दिये हुए शूलसे अनायास ही उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। शक्तिको भी व्यर्थ हुई देख देवी मनसा

६२६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

रोषसे जल उठी। अब उसने कभी व्यर्थ न जानेवाले दुःसह एवं भयंकर नागपाशको हाथमें लिया, जो एक लाख नागोंसे युक्त, सिद्धमन्त्रसे अभिमन्त्रित तथा काल और अन्तकके समान तेजस्वी था। उसने क्रोधपूर्वक उस नागपाशको चलाया। नागपाशको देखकर धन्वन्तरि प्रसन्नतासे मुस्करा उठे; उन्होंने तत्काल गरुड़‌का स्मरण किया और पक्षिराज गरुड़ वहाँ आ पहुँचे। नागास्त्रको आया देख दीर्घकालके भूखे हुए हरिवाहन गरुड़‌ने चोंचसे मार-मारकर सब नागोंको अपना आहार बना लिया। प्रिये! नागास्त्रको निष्फल हुआ देख मनसाके नेत्र रोषसे लाल हो उठे। उसने एक मुट्ठी भस्म उठाया, जिसे पूर्वकालमें भगवान् शिवने दिया था। मन्त्रसे पवित्र किये गये उस मुट्ठीभर भस्मको चलाया गया देख गरुड़‌ने शिष्य धन्वन्तरिको पीछे करके अपने पंखकी हवासे वह सारा भस्म बिखेर दिया। यह देख देवी मनसाको बड़ा क्रोध हुआ। उसने धन्वन्तरिका वध करनेके लिये स्वयं अमोघ शूल हाथमें लिया। उस शूलको भी भगवान् शिवने ही दिया था। उससे सैकड़ों सूर्योंके समान प्रभा फैल रही थी। वह अमोघ शूल तीनों लोकोंमें प्रलयाग्निके समान प्रकाशित होता था। इसी समय ब्रह्मा और शिव धन्वन्तरिकी रक्षा तथा गरुड़‌के सम्मानके लिये उस समराङ्गणमें आये। भगवान् शम्भु तथा जगदीश्वर ब्रह्माको उपस्थित देख मनसाने भक्तिभावसे उन दोनोंको नमस्कार किया। उस समय भी वह निःशङ्क-भावसे शूल धारण किये रही। धन्वन्तरि तथा गरुड़‌ने भी उन दोनों देवेश्वरोंको मस्तक झुकाया और बड़ी भक्तिसे उनकी स्तुति की। उन दोनोंने भी इन दोनोंको आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् लोकहितकी कामनासे मनसादेवीकी पूजाका प्रचार करनेके लिये ब्रह्माजीने धन्वन्तरिसे मधुर एवं हितकर वचन कहा।

ब्रह्माजी बोले— सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशिष्ट विद्वान् महाभाग धन्वन्तरे! मनसादेवीके साथ तुम्हारा युद्ध हो, यह मुझे उचित नहीं जान पड़ता। इसके साथ तुम्हारी कोई समता ही नहीं है। यह देवेश्वरी मनसा शिवके दिये हुए अमोघ शूलसे तीनों लोकोंको जलाकर भस्म करनेकी शक्ति रखती है। कौथुम-शाखामें वर्णित ध्यानके अनुसार मनसादेवीका भक्तिभावसे ध्यान करके एकाग्रचित्त हो षोडशोपचार अर्पित करते हुए इसकी पूजा करो। फिर आस्तीकमुनिद्वारा किये गये स्तोत्रसे तुम्हें इसकी स्तुति करनी चाहिये। इससे संतुष्ट हो मनसादेवी तुम्हें वर प्रदान करेगी।

ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर शिवजीने भी उसका अनुमोदन किया। फिर गरुड़‌ने प्रेमसे प्रयत्नपूर्वक उन्हें समझाया। इन सबकी बात सुनकर स्नानसे शुद्ध हो वस्त्र और आभूषण धारण करके धन्वन्तरि ब्रह्माजीको पुरोहित बना मनसाकी पूजा करनेको उद्यत हुए।

धन्वन्तरि बोले— जगद्गौरी मनसे! यहाँ आओ और मेरी पूजा ग्रहण करो। कश्यपनन्दिनि! पहलेसे ही तीनों लोकोंमें तुम्हारी पूजा होती आयी है। देवि! तुम विष्णुस्वरूपा हो। तुमने सम्पूर्ण जगत्‌को जीत लिया है; इसीलिये रणभूमिमें अस्त्र-प्रयोग नहीं किया है।

ऐसा कहकर संयत हो भक्तिसे मस्तक झुका हाथमें श्वेत पुष्प ले वे ध्यान करनेको उद्यत हुए।

ध्यान

मनसादेवीकी अङ्गकान्ति मनोहर चम्पाके समान गौर है। उनके सभी अङ्ग मनको मोह लेनेवाले हैं। प्रसन्नमुखपर मन्द हासकी छटा छा रही है। महीन वस्त्र उनके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं। परम सुन्दर केशोंकी वेणी अद्भुत शोभासे सम्पन्न है। वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। सबको अभय देनेवाली वे देवी भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर देखी जाती हैं। सम्पूर्ण विद्याओंकी देनेवाली, शान्तस्वरूपा, सर्वविद्याविशारदा,

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६२७


नागेन्द्रवाहना और नागोंकी स्वामिनी हैं; उन परा देवी मनसाका मैं भजन करता हूँ।

प्रिये! इस प्रकार ध्यानकर पुष्प दे नाना द्रव्योंसे युक्त षोडशोपचार चढ़ाकर धन्वन्तरिने उनका पूजन किया। तत्पश्चात् पुलकित-शरीर हो भक्तिसे मस्तक झुका दोनों हाथ जोड़ उन्होंने यत्नपूर्वक मनसादेवीकी स्तुति की।

धन्वन्तरि बोले—सिद्धस्वरूपा मनसादेवीको नमस्कार है। उन सिद्धिदायिनी देवीको बारंबार मेरा प्रणाम है। वरदायिनी कश्यपकन्याको नमस्कार, नमस्कार और पुनः नमस्कार। कल्याणकारिणी शंकरकन्याको बारंबार नमस्कार। तुम नागोंपर सवार होनेवाली नागेश्वरी हो। तुम्हें नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार। तुम आस्तीककी माता और जगज्जननी हो; तुम्हें मेरा नमस्कार है। जगत्की कारणभूता जरत्कारुको नमस्कार है। जरत्कारु मुनिकी पत्नीको नमस्कार है। नागभगिनीको नमस्कार है। योगिनीको बारंबार नमस्कार है। चिरकालतक तपस्या करनेवाली सुखदायिनी मनसादेवीको बारंबार नमस्कार है। तपस्यारूपा देवीको नमस्कार है। फलदायिनी मनसादेवीको नमस्कार है। साध्वी, सुशीला एवं शान्तस्वरूपा देवीको बारंबार नमस्कार है।

ऐसा कहकर धन्वन्तरिने भक्तिभावसे यत्नपूर्वक उन्हें प्रणाम किया। उस स्तुतिसे संतुष्ट हुई देवी मनसा धन्वन्तरिको वर देकर शीघ्र ही अपने घरको चली गयीं। ब्रह्मा, रुद्र और गरुड़ भी अपने-अपने धामको चले गये। भगवान् धन्वन्तरि भी अपने भवनको पधारे। फणोंसे सुशोभित नागगण प्रसन्नतापूर्वक पातालको चले गये। प्रिये! इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण स्तवराज तुमसे कहा है। आस्तीकने विधिपूर्वक माताकी भक्ति की। इससे वह जगद्गौरी अपने पुत्र मुनिवर आस्तीकपर बहुत संतुष्ट हुईं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस परम पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है; उसके वंशजोंको नागोंसे भय नहीं होता, इसमें संशय नहीं है।

(अध्याय ५१)


श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेसे श्रीराधा और गोपियोंका दुःखसे रोदन, चन्दनवनमें श्रीकृष्णका उन्हें दर्शन देना, गोपियोंके प्रणय-कोपजनित उद्गार, श्रीकृष्णका उनके साथ विहार, श्रीराधा नामके प्रथम उच्चारणका कारण, श्रीकृष्णद्वारा श्रीराधाका शृङ्गार, गोपियोंद्वारा उनकी सेवा और श्रीकृष्णके मथुरागमनसे लेकर परमधामगमनतककी लीलाओंका संक्षिप्त परिचय

श्रीकृष्णने कहा—प्रिये! मैंने छोटे-बड़े सभी लोगोंके दर्प-भङ्गकी कहानी कही और तुमने सुनी। इसमें संदेह नहीं कि उन सबका अभिमान भङ्ग किया ही गया था। अब उठो और वृन्दावनमें चलो। सुन्दरि ! अब मैं विरहसे पीड़ित हुई गोपिकाओंको शीघ्र देखना चाहता हूँ।

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! श्यामसुन्दरकी यह बात सुनकर मानिनी रसिकेश्वरी राधाने उनसे कहा—'प्राणेश्वर ! मैं चलनेमें असमर्थ हो गयी हूँ; अतः तुम्हीं मुझे ले चलो।' राधाकी यह बात सुन मधुसूदन हँसकर बोले—'तब मुझपर ही सवार हो जाओ।' ऐसा कह वे तत्काल अदृश्य हो गये। राधा मनकी गतिसे चलनेवाली थीं। वे क्षणभर वहाँ रोती रहीं; फिर इधर-उधर श्यामसुन्दरको ढूँढ़ती हुई वृन्दावनमें जा पहुँचीं। शोकसे कातर हुई राधाने रोते-रोते चन्दनवनमें प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने शोकाकुल गोपियोंको देखा, जो भयसे विह्वल थीं। उनके मुँह लाल हो गये थे।

६२८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण आँखें इधर-उधर घूमती थीं। वे सम्पूर्ण वनमें भ्रमण करतीं और 'हा नाथ ! हा नाथ !' पुकारती हुई बिना खाये-पीये रह रही थीं। उनके मनमें बड़ा रोष था। प्रेमविच्छेदसे कातर राधिकाने उन सबको देखकर उनसे मलयवनमें भ्रमण आदिका अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया। फिर वे उन सबके साथ रोदन करने लगीं। विरहसे आतुर हो 'हा नाथ ! हा नाथ !' का उच्चारण करके बारंबार विलाप करती हुई सब गोपियाँ कुपित हो अपने शरीरका त्याग कर देनेको उद्यत हो गयीं। इसी समय वहाँ चन्दनवनमें पधारकर श्रीकृष्णने राधा तथा गोपियोंको दर्शन दिये। प्राणेश्वरको आया देख गोपाङ्गनाओंसहित राधा आनन्दसे मुस्करायीं और पुलकित-शरीर हो उनकी ओर दौड़ीं। पास जाकर वे सब गोपाङ्गनाएँ प्रेमसे विह्नल हो रोने लगीं। फिर उन सबने श्रीकृष्णसे विरहजनित अपने सारे दुःखको निवेदन किया। दिन-रात स्नान और खाना-पीना छोड़कर वन-वनमें निरन्तर भटकते रहना तथा अन्तमें शरीरको त्याग देनेका विचार करना आदि सब बातें बताकर उन सबने क्षणभर उन्हें बहुत फटकारा। फिर वे एक क्षणतक प्रसन्नतासे उनके गुण गाती रहीं। इसके बाद कुछ देर उन्हें आभूषण पहनाती तथा चन्दन लगाती रहीं। कोई-कोई गोपियाँ बोलीं- 'अरी सखि ! देखो, श्यामसुन्दर हमारे प्राणोंके चोर हैं। इनकी निरन्तर रखवाली करो। ये कहीं जाने न पावें।' यह सुनकर दूसरी बोल उठी- 'नहीं सखी ! अब ये फिर ऐसा अपराध कभी नहीं करेंगे।' कोई कहने लगी- 'अरी सखियो ! इन्हें शीघ्र ही चारों ओरसे घेरकर बीचमें कर लो।' दूसरी बोली- 'नहीं, नहीं सखी ! इन्हें प्रेमपाशसे बाँधकर हृदय-मन्दिरमें कैद कर लो।' कोई बोली- 'ये पुरुष हैं; इनपर कभी विश्वास नहीं किया जा सकता।' अन्य बोल उठी- 'इन चित्तचोरकी यत्नपूर्वक देखभाल करो।' कोई-कोई कुपित होकर कहने लगीं- 'ये निष्ठुर हैं, नरघाती हैं।' कोई बोली- 'अब फिर इनसे बात न करो।' तदनन्तर जो-जो रमणीय और निर्जन वन थे, उन सबमें गोपियाँ श्रीकृष्णके साथ कौतूहलपूर्वक घूमती रहीं। इस तरह उन परमेश्वरको बीचमें करके वे सब गोपियाँ दूसरे वनमें गयीं, जहाँ सुरम्य रासमण्डल विद्यमान था। रासमण्डलमें जाकर रसिकशेखर श्रीकृष्ण स्वर्णसिंहासनपर विराजमान हुए। जैसे रातके समय आकाशमें तारागणोंके साथ चन्द्रमा शोभा पाते हैं; उसी प्रकार वे गोपियोंके साथ सुशोभित हो रहे थे। जनार्दनने अपनी अनेक मूर्तियाँ प्रकट करके गोपियोंके साथ पुनः रासक्रीड़ा की। नारदजीने पूछा- भक्तजनोंके प्रियतम नारायण ! विद्वान् पुरुष पहले 'राधा' शब्दका उच्चारण करके पीछे 'कृष्ण' का नाम लेते हैं, इसका क्या कारण है? यह मुझ भक्तको बताइये। श्रीनारायण बोले- नारद ! इसके तीन कारण हैं; बताता हूँ, सुनो ! प्रकृति जगत्की माता हैं और पुरुष जगत्के पिता। त्रिभुवनजननी प्रकृतिका गौरव पितृस्वरूप पुरुषकी अपेक्षा सौगुना अधिक है। श्रुतिमें 'राधाकृष्ण', 'गौरीशंकर' इत्यादि शब्द ही सुना गया है। 'कृष्ण-राधा' 'शंकर-गौरी' इत्यादिका प्रयोग कभी लोकमें भी नहीं सुना गया है। 'हे रोहिणीचन्द्र ! प्रसन्न होइये और इस अर्घ्यको ग्रहण कीजिये। संज्ञासहित सूर्यदेव ! मेरे दिये हुए इस अर्घ्यको स्वीकार कीजिये। कमलाकान्त ! प्रसन्न होइये और मेरी पूजा ग्रहण कीजिये।' इत्यादि मन्त्र सामवेदकी

४६- बृहस्पतिका शचीको आश्वासन एवं आशीर्वाद देना, नहुषका सप्तर्षियोंको वाहन बनाना और दुर्वासाके शापसे अजगर होना, बृहस्पति-का इन्द्रको बुलाकर पुनः सिंहासनपर बिठाना तथा गौतमसे इन्द्र और अहल्याको शापकी प्राप्ति

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६२९

कौथुमीशाखामें देखे गये हैं। मुनिश्रेष्ठ नारद! 'रा' शब्दके उच्चारणमात्रसे ही माधव हृष्ट-पुष्ट हो जाते हैं और 'धा' शब्दका उच्चारण होनेपर तो अवश्य ही भक्तके पीछे वेगपूर्वक दौड़ पड़ते हैं। जो पहले पुरुषवाची शब्दका उच्चारण करके पीछे प्रकृतिका उच्चारण करता है, वह वेदकी मर्यादाका उल्लङ्घन करनेके कारण मातृहत्याके पापका भागी होता है। तीनों लोकोंमें पुण्यदायक कर्मक्षेत्र होनेके कारण भारतवर्ष धन्य है। उसमें भी श्रीराधाचरणारविन्दोंकी रेणुसे पवित्र हुआ वृन्दावन अतिशय धन्य है। राधाके चरणकमलोंकी पवित्र धूल प्राप्त करनेके लिये ब्रह्माजीने साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की थी।

नारदजीने पूछा—पूर्णमासी बीत जानेपर जगदीश्वर श्रीकृष्णने क्या किया? उस समय उनकी कौन-सी रहस्यलीला हुई? यह बतानेकी कृपा करें।

श्रीनारायणने कहा—रासमण्डलमें रासलीला सम्पन्न करके स्वयं रासेश्वर श्यामसुन्दर रासेश्वरी राधाके साथ यमुनातटपर गये, वहाँ स्नान एवं निर्मल जलका पान करके उन्होंने कालिन्दीके स्वच्छ सलिलमें गोपाङ्गनाओंके साथ जलक्रीड़ा की। तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण राधिकाजीके साथ भाण्डीर वनमें चले गये। इधर प्रेमविह्वला गोपियाँ अपने-अपने घरोंको लौट गयीं। उस समय श्यामसुन्दर श्रीराधाके साथ मालतीकानन, वासन्तीकानन, चन्दनकानन तथा चम्पककानन आदि मनोहर वनोंमें क्रीड़ा करते रहे। फिर पद्मवनमें रातको शयन किया। प्रातःकाल उन्होंने देखा, प्रियाजी फूलोंकी शय्यापर सो रही हैं। शरत्कालिक चन्द्रमाकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले उनके सुन्दर मुखपर पसीनेकी बूँदें दिखायी दे रही हैं। सिन्दूर लुप्त हो गया है, कज्जल मिट गया है, अधरोंकी लाली भी लुप्तप्राय हो गयी है और कपोलोंकी पत्र-रचना मिट गयी है। उनकी वेणी खुल गयी है, नेत्रकमल बंद हैं और रत्नोंके बने हुए दो बहुमूल्य कुण्डलोंसे उनके मुखमण्डलकी अपूर्व शोभा हो रही है। दन्तपंक्तिसे सुशोभित मुख मानो गजमुक्तासे अलंकृत एवं उद्दीप्त है। प्रियाजीको इस अवस्थामें देख भक्तवत्सल माधवने अग्निशुद्ध महीन वस्त्रसे उनके मुखको बड़े प्रेम और भक्तिभावसे पोंछा। फिर केशोंको सँवारकर उनकी चोटी बाँध दी। उस चोटीमें माधवी और मालतीके फूलोंकी माला लगा दी, जिससे उसकी शोभा बहुत बढ़ गयी। वह चोटी रत्नयुक्त रेशमी डोरोंसे बँधी थी। उसकी आकृति सुन्दर, वक्र, मनोहर और अत्यन्त गोल थी। कुन्दके फूलोंसे भी उसका शृङ्गार किया गया था। वेणी बाँधनेके पश्चात् श्यामसुन्दरने प्रियाजीके भाल-देशमें सिन्दूरका तिलक लगाया। उसके नीचे उज्ज्वल चन्दनका शृङ्गार किया। फिर कस्तूरीकी बेंदीसे उनके ललाटकी शोभा बढ़ायी। तत्पश्चात् दोनों कपोलोंपर चित्र-विचित्र पत्र-रचना की। नेत्रकमलोंमें भक्तिभावसे काजल लगाया, जिससे उनका सौन्दर्य खिल उठा। फिर बड़े अनुरागसे राधाके अधरोंमें लाली लगायी। कानमें दो अत्यन्त निर्मल आभूषण पहनाये। गलेमें बहुमूल्य रत्नोंका हार पहनाया, जो उनके वक्षःस्थलको उद्भासित कर रहा था। वह हार मणियोंकी लड़ियोंसे प्रकाशित हो रहा था। तदनन्तर बहुमूल्य, दिव्य, अग्निशुद्ध तथा सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत वस्त्र पहनाया, जो कस्तूरी और कुंकुमसे अभिषिक्त था। दोनों चरणोंमें रत्ननिर्मित मञ्जीर पहनाये और पैरोंकी अँगुलियों एवं नखोंमें भक्तिभावसे महावर लगाया।

६३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जो तीनों लोकोंके सत्पुरुषोंद्वारा सेव्य हैं; उन श्यामसुन्दरने अपनी सेव्यरूपा प्राणवल्लभाकी सेवा की। तदनन्तर सेवकोचित भक्तिसे श्वेत चँवर डुलाया। यह कैसी अद्भुत बात है। इसके बाद समस्त भावोंके जानकारोंमें श्रेष्ठ बोधकलाके ज्ञाता एवं विलास-शास्त्रके मर्मज्ञ श्रीहरिने अपनी प्राणवल्लभाको जगाया और अपने वक्षःस्थलमें उनके लिये स्थान दिया।

इस प्रकार श्रीराधाको जगाकर श्रीकृष्णने उन्हें भाँति-भाँतिके पुष्पमाला, आभूषण तथा कौस्तुभमणि आदिके द्वारा सुसज्जित किया। रत्नपात्रमें भोजन और जल प्रस्तुत किये। इसी समय चरण-चिह्नोंको पहचानती हुई श्रीराधाकी सुप्रतिष्ठित सहचरी सुशीला आदि छत्तीस गोपियाँ अन्यान्य बहुसंख्यक गोपाङ्गनाओंके साथ वहाँ आ पहुँचीं। किन्हींके हाथमें चन्दन था और किन्हींके हाथमें कस्तूरी। कोई चँवर लिये आयी थी और कोई माला। कोई सिन्दूर, कोई कंघी, कोई आलता (महावर) और कोई वस्त्र लिये हुए थी। कोई अपने हाथमें दर्पण, कोई पुष्पपात्र, कोई क्रीड़ाकमल, कोई फूलोंके गजरे, कोई मधुपात्र, कोई आभूषण, कोई करताल, कोई मृदंग, कोई स्वर-यन्त्र और कोई वीणा लिये आयी थीं। जो छत्तीस राग-रागिनियाँ गोपीका रूप धारण करके गोलोकसे राधाके साथ भारतवर्षमें आयी थीं, वे सब वहाँ उपस्थित हुईं। कई गोपियाँ वहाँ आकर नाचने और गाने लगीं तथा कोई श्वेत चँवर डुलाकर राधाकी सेवा करने लगीं। महामुने! कुछ गोपियाँ प्रसन्नतापूर्वक देवी राधाके पैर दबाने लगीं। एकने उन्हें चबानेके लिये पानका बीड़ा दिया। इस प्रकार पवित्र वृन्दावनमें श्रीराधाके वक्षःस्थलमें विराजमान भगवान् श्यामसुन्दर कौतूहलपूर्वक गोपियोंके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए। वत्स! इस प्रकार मैंने श्रीहरिकी रासक्रीड़ाका वर्णन किया। वे भगवान् श्रीकृष्ण स्वेच्छामय रूपधारी, परिपूर्णतम परमात्मा, निर्गुण, स्वतन्त्र, प्रकृतिसे भी परे, सर्वसमर्थ और ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव आदिके भी परमेश्वर हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णजन्मका रहस्य, मनको प्रिय लगनेवाली उनकी बाललीला तथा किशोर-लीलाका भी वर्णन किया गया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?

नारदजीने पूछा—मुनिश्रेष्ठ! इसके बाद कौन-सी रहस्य-लीला हुई? भगवान् श्रीकृष्ण किस प्रकार नन्दभवनसे मथुराको गये? श्रीहरिके वियोगसे पीड़ित हुए नन्दने कैसे अपने प्राण धारण किये? जिनका चित्त सदा श्रीकृष्णके चिन्तनमें ही लगा रहता था, वे गोपाङ्गनाएँ और यशोदाजी भी कैसे जीवन धारण कर सकीं? जो आँखोंकी पलक गिरनेतकका भी वियोग होनेपर जीवित नहीं रह सकती थीं; वे ही देवी श्रीराधा अपने प्राणेश्वरके बिना किस तरह प्राणोंको रख सकीं? जो-जो गोप शयन, भोजन तथा अन्यान्य सुखोंके उपभोग-कालमें सदा श्रीकृष्णके साथ रहे; वे अपने वैसे प्रेमी बान्धवको ब्रजमें रहते हुए कैसे भूल सके? श्रीकृष्णने मथुरामें जाकर कौन-कौन-सी लीलाएँ कीं? परमधाम-गमनपर्यन्त उन्होंने जो कुछ किया हो, उसे आप बतानेकी कृपा करें।

श्रीनारायणने कहा—महामुने! कंसने धनुषयज्ञ नामक यज्ञका आयोजन किया था। उसमें उस राजाका निमन्त्रण पाकर भगवान् श्रीकृष्ण भी गये थे। राजा कंसने श्रीकृष्णको बुलानेके लिये भगवद्भक्त अक्रूरको उनके पास भेजा था।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६३१

अक्रूरजी राजा कंसकी आज्ञा पाकर नन्दभवनमें गये और श्रीकृष्णको उनके साथियोंसहित साथ ले मथुरामें लौट आये। मुने! मथुरा जाकर श्रीकृष्णने राजा कंसको मार डाला। एक धोबीको, चाणूर और मुष्टिक नामक मल्लको तथा कुवलयापीड़ नामक हाथीको वे पहले ही कालके गालमें भेज चुके थे। कंस-वधके अनन्तर बान्धव श्रीकृष्णने माता-पिता तथा भाई-बन्धुओंका उद्धार किया। श्रीहरिने कृपापूर्वक एक मालीको भी मोक्ष प्रदान किया। फिर गोपियोंपर दया आनेसे उद्धवको ब्रजमें भेजकर उन्हींके द्वारा उन्हें समझाया-बुझाया और धीरज बँधाया। तदनन्तर उपनयन-संस्कारके पश्चात् भगवान् अवन्तीनगर (उज्जैन)-में गये और वहाँ गुरु सान्दीपनि मुनिसे विद्या ग्रहण की। उसके बाद जरासंधको जीतकर यवनराजका वध किया और विधिपूर्वक उग्रसेनको राजाके पदपर बिठाया। समुद्रके निकट जा वहाँ द्वारकापुरीका निर्माण कराया और राजाओंके समूहको जीतकर वे रुक्मिणीदेवीको हर लाये। फिर कालिन्दी, लक्ष्मणा, शैव्या, सत्या, सती जाम्बवती, मित्रविन्दा तथा नाग्नजितीके साथ विवाह किया। तत्पश्चात् भयानक संग्रामके द्वारा प्राग्ज्योतिषपुरके नरेश नरकका वध करके उन्होंने सोलह हजार राजकुमारियोंका उद्धार किया और उन्हें पत्नीरूपमें अपनाकर उनके साथ विहार किया। इन्द्रदेवको लीलापूर्वक परास्त करके पारिजातका अपहरण किया और भगवान् शंकरको जीतकर बाणासुरके हाथ काट दिये तथा अपने पौत्र अनिरुद्धको छुड़ाया और फिर द्वारकामें आकर अपने-आपको अपनी प्रत्येक रानीके महलमें उपस्थित दिखाया। वसुदेवजीके यज्ञमें तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे आयी हुई अपने प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी श्रीराधाके दर्शन किये। फिर वे उनके साथ पुण्यमय वृन्दावनमें गये। भारतके उस पुण्यक्षेत्रमें उन जगदीश्वरने श्रीराधाके साथ पुनः चौदह वर्षोंतक रासमण्डलमें रास किया। उन्होंने नन्द-भवनमें पूरे ग्यारह वर्षकी अवस्थातक निवास किया था। फिर मथुरा और द्वारकामें उन भगवान्‌के पूरे सौ वर्ष व्यतीत हुए। उन दिनों महापराक्रमी श्रीहरिने वहाँ रहकर भूतलका भार उतारा था। मुने! इस तरह वे एक सौ पचीस वर्षोंतक भूतलपर रहकर गोलोकमें गये। वहाँ उन्होंने मैया यशोदा और नन्दबाबाको तथा बुद्धिमान् वृषभानु एवं राधा-माता कलावतीको सामीप्य-मुक्ति प्रदान की। श्रीकृष्ण और गोपियोंके साथ राधाने कौतूहलवश प्रत्येक युगमें वेदवर्णित धर्मका सेतु बाँधा। महामुने! इस प्रकार मैंने थोड़ेमें श्रीकृष्णका सारा रम्य चरित्र कह सुनाया जो धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सारा जगत् नश्वर ही है; अतः तुम परमानन्दमय नन्दनन्दनका सानन्द भजन करो। वे स्वेच्छामय परब्रह्म परमात्मा परमेश्वर, अविनाशी, अव्यक्त, भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही शरीर धारण करनेवाले, सत्य, नित्य, स्वतन्त्र, सर्वेश्वर, प्रकृतिसे परे, निर्गुण, निरीह, निराकार और निरञ्जन हैं। (अध्याय ५२—५४)


अभीष्ट स्थानपर पहुँचनेमें विलम्ब होते देखकर उन्हें डाँटना-फटकारना

( उत्तरार्द्ध )

श्रीकृष्णकी महत्ता एवं प्रभावका वर्णन

**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद ! वे ही भगवान् श्रीकृष्ण सर्वात्मा परम पुरुष हैं। वे दुराराध्य होते हुए भी अत्यन्त साध्य हैं अर्थात् आराधनाके बलसे उन्हें रिझा पाना अत्यन्त कठिन है तो भी वे भक्तपर कृपा करके स्वयं ही उसके अधीन हो जाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण सबके आराध्य और सुखदायक हैं। अपने भक्तोंके लिये तो वे अत्यन्त सुलभ हैं। भक्त ही उन्हें आराधनाद्वारा वशमें कर सकता है। वे अपने भक्तको सदा ही दर्शन देते हैं और दे सकते हैं; किंतु अभक्तके लिये उनका दर्शन पाना सर्वथा असम्भव है। उनके लीलाचरित्रोंका रहस्य समझ पाना अत्यन्त कठिन है। केवल उन चरित्रोंका अपने हृदयमें चिन्तन करना चाहिये। संसारके सब लोग श्रीकृष्णकी दुरन्त मायासे बद्ध एवं मोहित हैं। उन्हींके भयसे यह वायु निरन्तर बहती रहती है, कच्छप बिना आधारके ही स्थिर रहता है और यही कच्छप उन्हींके भयसे सदा अनन्त (शेषनाग)-को अपनी पीठपर धारण किये रहता है तथा शेषनाग अपने मस्तकपर अखिल विश्वका भार उठाये रहते हैं। शेषनागके सहस्र सिर हैं। उनके सिरके एक देशमें सात समुद्रों, सात द्वीपों, पर्वतों और काननोंसे युक्त पृथ्वी विद्यमान है। सात पाताल, भूर्भुवः स्वः आदि विभिन्न सात स्वर्ग, जिनमें ब्रह्मलोक भी शामिल है, विश्व कहे गये हैं। इस विश्वको ‘त्रिभुवन’ कहते हैं। इसीको कृत्रिम* जगत् कहा गया है। विधाता प्रत्येक कल्पमें श्रीकृष्णके भयसे ही इस कृत्रिम जगत्की सृष्टि करते हैं। इस तरहके असंख्य विश्व हैं, जिन्हें महाविराट् (महाविष्णु) अपने रोम-कूपोंमें धारण करते हैं। ये श्रीकृष्णके ही अंश हैं। उन्हींके भयसे समस्त ब्रह्माण्डोंको धारण करते हैं और उन्हींका निरन्तर ध्यान किया करते हैं। कृपानिधान विष्णु (लघु विराट्) भी श्रीकृष्णके ही भयसे संसारका पालन करते हैं। उन्हींका भय मानकर कालाग्नि रुद्रस्वरूप काल प्रजाका संहार करता है तथा छहों गुणों और ऐश्वर्योंसे युक्त विरागी एवं विरक्त मृत्युञ्जय महादेव उन्हींके भयसे अनुरागपूर्वक उनका निरन्तर ध्यान करते रहते हैं। उन्हींके भयसे आग जलती और सूर्य तपते हैं। उनका ही भय मानकर इन्द्र वर्षा करते और मृत्यु समस्त प्राणियोंपर धावा बोलती है। उन्हींके भयसे यम एवं धर्म पापियोंको दण्ड देते हैं। उनका ही भय मानकर पृथ्वी चराचर लोकोंको धारण करती और प्रकृति सृष्टिकालमें महत्तत्त्व आदिको जन्म देती है। बेटा ! उन भगवान् श्रीकृष्णका अभिप्राय क्या है ? इसे जानना बहुत कठिन है। कौन ऐसा पुरुष है, जो उसे जाननेका दावा कर सके। वत्स ! ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी जिनके प्रभावको नहीं जानते हैं; उन्हीं भगवान्‌की लीलाका रहस्य मुझ-जैसा मन्दबुद्धि कैसे जान सकता है ?

वे नन्दनन्दन वृन्दावनको छोड़कर मथुरा क्यों चले गये ? उन्होंने गोपियों तथा प्राणाधिका प्रिया राधाको क्यों त्याग दिया ? माता यशोदा और नन्दको तथा अन्यान्य बान्धव आदिको क्यों छोड़ा ? इस बातको उनके सिवा दूसरा कौन जान सकता है ? वे ही दर्प देते हैं और वे ही उस दर्पका दलन करते हैं। सबको सदा सब कुछ


* अनित्य।

४७- अहल्याके उद्धार एवं श्रीराम-चरित्रका संक्षेपसे वर्णन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

देनेवाले श्रीकृष्ण ही हैं। सबके दर्पका नाश करके उन्होंने उन सबपर कृपा ही की। वे ही जगत्‌की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं। वे स्रष्टाके भी स्रष्टा हैं। भगवान् शंकर अपने पाँच मुखोंद्वारा भी उनकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं। चार मुखोंवाले जगत्-विधाता ब्रह्माजी भी उनका स्तवन नहीं कर सकते। शेषनाग सहस्र मुखोंसे भी उनकी स्तुति करनेकी शक्ति नहीं रखते। साक्षात् विश्वव्यापी जनार्दन विष्णु भी उनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं। महाविराट् नारायण भी उन परमेश्वरकी स्तुति नहीं कर सके। प्रकृति उन परमात्माके सामने काँप उठती है। सरस्वती उन परमेश्वरका स्तवन करनेमें जडवत् हो जाती है। नारद! सम्पूर्ण वेद भी उनकी महिमाको नहीं जानते। ब्रह्मन्! इस प्रकार निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्णके प्रभावका वर्णन किया गया। अब और क्या सुनना चाहते हो?

(अध्याय ५५)


इन्द्रके दर्प-भङ्गकी कथा, नहुषकी शचीपर कुदृष्टि, शचीका धर्मकी बातें बताकर नहुषको समझाना और उसके न माननेपर बृहस्पतिजीकी शरणमें जाकर उनका स्तवन करना

**सूतजी कहते हैं—**तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर श्रीनारायणने संक्षेपसे कुछ लोगोंके दर्प-भङ्गकी घटनाएँ सुनायीं। फिर इन्द्रके दर्प-भङ्गका वृत्तान्त बताते हुए बोले।

**श्रीनारायणने कहा—**नारद! इस प्रकार सबके दर्प-भङ्गका प्रसङ्ग कहा गया। अब इन्द्रके दर्प-भञ्जनकी घटना विस्तारपूर्वक सुनो। एक समय इन्द्र अपने ब्रह्मनिष्ठ गुरु बृहस्पतिको आते देखकर भी सभामें दर्पवश अपने श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनसे नहीं उठे। इसे गुरुने अपना अपमान समझा और वे अत्यन्त रुष्ट हो वहाँसे लौट गये। यद्यपि उनके मनमें इन्द्रके प्रति द्वेषभावका उदय हुआ था, तथापि धर्मात्मा गुरुने स्नेहवश कृपा करके उन्हें शाप नहीं दिया; परंतु शाप न मिलनेपर भी इन्द्रका घमंड चूर हो गया। यदि दूसरा कोई धर्म अथवा प्रेमका विचार करके किसीके भारी अपराध करनेपर भी शाप न दे तो भी उसका वह अपराध अवश्य फल देता है। नारद! धर्मदेव ही उस पापीका नाश कर देते हैं। जो धर्मात्मा पुरुष जिस हिंसक या अपराधीको क्रोधपूर्वक शाप दे देता है, उसके उस शापसे अपराधीका अवश्य विनाश होता है; परंतु उस धर्मात्मा पुरुषका धर्म भी उसी मात्रामें क्षीण हो जाता है। इन्द्रने जो गुरुका अपमानरूप अधर्म किया था, उसके कारण वे ब्रह्महत्याके भागी हुए। ब्रह्महत्यासे डरे हुए इन्द्र अपना राज्य छोड़कर एक पवित्र सरोवरको चले गये और उस सरोवरके कमल-नालमें निवास करने लगे। भारतवर्षमें भगवान् विष्णुका वह सरोवर पुण्यमय तीर्थ और तपस्वीजनोंके तपका श्रेष्ठ स्थान है। वहाँ ब्रह्महत्या नहीं जा सकती। उसीको पुराणवेत्ता पुरुष 'पुष्कर'* तीर्थ कहते हैं। इन्द्रको राज्यभ्रष्ट हुआ देख धर्मात्मा हरिभक्त नरेश नहुषने उनके राज्यपर बलपूर्वक अधिकार कर लिया। एक दिन मनोहर अङ्गवाली सुन्दरी शची, जिनके कोई संतान नहीं थी, पतिवियोगके कारण व्यथित-हृदयसे आकाशगङ्गाके तटपर जा रही थीं। उस समय नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा रत्नमय अलंकारोंसे


* ४७वें अध्यायमें भी यह प्रसङ्ग आया है। वहाँ ५६वें श्लोकमें कहा गया है कि इन्द्रने मानसरोवरमें प्रवेश किया था—'विवेश मानससरः।' यहाँ पुष्करतीर्थमें इन्द्रका प्रवेश कहा गया है। यदि वहाँके 'मानस-सरः' का अर्थ केवल सरोवरमात्र हो तो दोनों स्थानोंके वर्णनमें एकता आ सकती है।

६३४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

विभूषित उन सुन्दर दाँतवाली, परम कोमलाङ्गी महासती शचीपर नहुषकी दृष्टि पड़ी। उन्हें देखते ही नहुषके मनमें दूषित वृत्ति जाग उठी। उसने शचीके समक्ष विनयपूर्वक अपनी कुत्सित वासनाकी पूर्तिके लिये प्रस्ताव रखा।

इसपर शचीने कहा—बेटा! मेरी बात सुनो। महाराज! तुम प्रजाके भयका भञ्जन करनेवाले हो। राजा समस्त प्रजाका पालक पिता होता है और वह सबकी भयसे रक्षा करता है। इन दिनों महेन्द्र राज्यलक्ष्मीसे भ्रष्ट हो गये हैं और तुम स्वर्गमें राजाके पदपर प्रतिष्ठित हुए हो। जो राजा होता है, वह निश्चय ही प्रजाजनोंका पालक पिता है। गुरुपत्नी, राजपत्नी, देवपत्नी, पुत्रवधू, माताकी बहिन (मौसी), पिताकी बहिन (बूआ), शिष्यपत्नी, भृत्यपत्नी, मामी, पिताकी पत्नी (माता और विमाता), भाईकी पत्नी, सास, बहिन, बेटी, गर्भमें धारण करनेवाली (जन्मदात्री) तथा इष्टदेवी—ये पुरुषकी सोलह माताएँ हैं*। तुम मनुष्य हो और मैं देवताकी पत्नी हूँ; अतः तुम्हारी वेदसम्मत माता हुई। बेटा! यदि माँके साथ रमण करना चाहते हो तो माता अदितिके पास जाओ। वत्स! सब पापियोंके उद्धारका उपाय है; परंतु मातृगामियोंके लिये कोई उपाय नहीं है। वे ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त कुम्भीपाक नरकमें पकाये जाते हैं। तत्पश्चात् सात कल्पोंतक कीड़े होते हैं। फिर सात जन्मोंतक कोढ़ी और म्लेच्छ होते हैं। उनका कदापि उद्धार नहीं होता; ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। आङ्गिरस-स्मृति कहती है कि वेदोंमें उनके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है। निश्चय ही संसारी जीवोंके लिये स्वर्गकी सम्पत्तिका भोग ही सुख है; परंतु मुमुक्षुओंके लिये मोक्ष, तपस्वीजनोंके लिये तप, ब्राह्मणोंके लिये ब्राह्मणत्व, मुनियोंके लिये मौन, वैदिकोंके लिये वेदाभ्यास, कवियोंके लिये काव्य-वर्णन तथा वैष्णवोंके लिये भगवान् विष्णुका दास्य ही परम सुख है। वे विष्णु-भक्तिके रसास्वादनको ही परम सुख मानते हैं। वैष्णवजन तो विष्णु-भक्तिको छोड़कर मुक्तिको भी लेनेकी इच्छा नहीं करते। राजेन्द्र! तुम चक्रवर्ती राजाओंके प्रकाशमान कुलमें उत्पन्न हुए हो। अनेक जन्मोंके पुण्यसे तुमने भारतवर्षमें जन्म पाया है। चन्द्रवंशी नरेशरूपी कमलोंके विकासके लिये तुम ग्रीष्मकालकी दोपहरीके तेजस्वी सूर्यकी भाँति प्रकट हुए हो। समस्त आश्रमोंमें स्वधर्मका पालन ही उत्तम यशका कारण होता है। स्वधर्महीन मूढ़ मानव नरकमें गिरते हैं।

तीनों संध्याओंके समय श्रीहरिकी पूजा ब्राह्मणका अपना धर्म है। भगवच्चरणोदकका पान तथा भगवान्‌के नैवेद्यका भक्षण उनके लिये अमृतसे भी बढ़कर है। नरेश्वर! जो अन्न और जल भगवान्‌को समर्पित नहीं किया गया, वह मल-मूत्रके समान है। यदि ब्राह्मण उसे खाते हैं तो वे सब-के-सब सूअर होते हैं। ब्राह्मण आजीवन भगवान्‌के नैवेद्यका भोजन करें; परंतु एकादशीको भोजन न करें। पूर्णतः उपवास करें। इसी तरह कृष्ण-जन्माष्टमी, शिवरात्रि तथा रामनवमी आदि पुण्य वासरोंको भी उन्हें निश्चय ही यत्नपूर्वक उपवास करना चाहिये। ब्रह्माजीने जो ब्राह्मणोंका स्वधर्म बताया है; वह कहा गया।

नरेश्वर! पतिव्रताओंका व्रत पतिसेवा है।


* यो राजा स पिता पाता प्रजानामेव निश्चितम्॥
गुरुपत्नी राजपत्नी देवपत्नी तथा वधूः। पित्रोः स्वसा शिष्यपत्नी भृत्यपत्नी च मातुली॥
पितृपत्नी भ्रातृपत्नी श्वश्रूश्च भगिनी सुता। गर्भधात्रीष्टदेवी च पुंसः षोडश मातरः॥
(५९।५४—५६)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६३५

वही उनके लिये उत्तम तप है। पर-पुरुष पतिव्रताओंके लिये पुत्रतुल्य है; यही नारियोंका धर्म है। राजालोग जैसे प्रजाका औरस पुत्रोंकी भाँति पालन करते हैं, उसी प्रकार वे प्रजावर्गकी स्त्रियोंको भी माताके समान देखते हैं। विष्णुकी प्रसन्नताके लिये यज्ञ करते और देवताओं एवं ब्राह्मणोंकी सेवामें लगे रहते हैं। दुष्टोंका निवारण और सत्पुरुषोंका पालन करते हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने क्षत्रियोंका यही धर्म बताया था। वाणिज्य और धर्मसंग्रह यह वैश्योंका अपना धर्म है। ब्राह्मणोंकी सेवा शूद्रोंका परम धर्म निश्चित किया गया है। राजन्! सब कुछ भगवान् श्रीहरिको समर्पण कर देना संन्यासियोंका धर्म है। संन्यासी एकमात्र गेरुआ वस्त्र, दण्ड और मिट्टीका कमण्डलु धारण करता है। सर्वत्र समान दृष्टि रखता और सदा श्रीनारायणका स्मरण करता है। नित्य भ्रमण करता है। किसीके घरमें नहीं टिकता और लोभवश किसीको विद्या और मन्त्रका उपदेश नहीं देता। संन्यासी अपने लिये आश्रम नहीं बनाता। दूसरी किसी वासनाको मनमें स्थान नहीं देता; दूसरे किसीका साथ नहीं करता और आसक्ति एवं मोहसे दूर रहता है। वह लोभवश स्वादिष्ट भोजन नहीं करता, स्त्रीका मुख नहीं देखता तथा व्रतमें अटल रहकर किसी गृहस्थ पुरुषसे मनचाही भोज्य वस्तुके लिये याचना भी नहीं करता। ब्रह्माजीने यही संन्यासियोंका धर्म बताया है। बेटा! यह तुम्हें धर्मकी बात बतायी है। अब तुम सुखपूर्वक अपने स्थानको जाओ। ऐसा कहकर मार्गमें मिली हुई इन्द्राणी चुप हो रहीं और राजा नहुष गर्दन टेढ़ी करके उनसे बोला।

नहुषने कहा—देवि! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब उलटी बात है। यथार्थ वैदिक धर्म क्या है? यह मैं बताता हूँ, सुनो। सुरसुन्दरि! इसमें संदेह नहीं कि सबको अपने कर्मोंका फल भोगना पड़ता है; परंतु स्वर्ग, पाताल तथा दूसरे किसी द्वीपमें जो कर्म किये जाते हैं, उनका फल नहीं भोगना पड़ता। पुण्य क्षेत्र भारतमें शुभाशुभ कर्म करके कर्मी मनुष्य उस कर्मके बन्धनमें बँधकर परलोकमें उसके फलको भोगता है। हिमालयसे लेकर दक्षिण समुद्रतकका पवित्र देश 'भारत' कहा गया है। वह सब स्थानोंमें श्रेष्ठ तथा मुनियोंकी तपोभूमि है। वहाँ जन्म लेकर जीव भगवान् विष्णुकी मायासे वञ्चित हो सदा विषय-सेवन करता है और श्रीहरिकी सेवाको भुला देता है। जो भारतवर्षमें महान् पुण्य करता है, वह पुण्यात्मा पुरुष स्वर्गको जाता है। वहाँ स्वर्गीय कन्याओंको अपनाकर चिरकालतक उनके साथ आनन्द भोगता है। मनुष्य मानव-शरीरका त्याग करके स्वर्गमें आता है; किंतु सुन्दरि! मैं अपने शरीरके साथ यहाँ आया हूँ। देखो, मेरा कैसा पुण्य है? अनेक जन्मोंके पुण्यसे मैं अभीष्ट स्वर्गमें आया हूँ। तदनन्तर न जाने किस पुण्यसे तुमसे मेरा साक्षात्कार हुआ है। यह कर्मका स्थान नहीं, अपने कर्मोंके भोगका स्थान है। यों कहकर कामासक्त नहुषने फिर बहुत-सी युक्तियोंके द्वारा पुनः अपने उसी पापपूर्ण प्रस्तावको दुहराया।

तब शची बोलीं—हाय! इस विवेकशून्य, कर्तव्याकर्तव्यको न जाननेवाले, मूढ़, कामातुर पुरुषकी कितनी बातें आज मुझे सुननी पड़ेंगी! कामने जिनके चित्तको चुरा लिया है, वे विवेकशून्य काममत्त कामी तथा मधुमत्त एवं सुरामत्त मनुष्य अपनी मौतको भी नहीं गिनते। ओ मतवाले नरेश! आज मुझे छोड़ दे। मैं तेरे लिये माताके समान और रजस्वला हूँ। आज मेरी ऋतुका प्रथम दिन है। पहले दिन रजस्वला स्त्री चाण्डालीके समान मानी जाती है। दूसरे दिन म्लेच्छा और तीसरे दिन धोबिनके समान होती है। चौथे दिन वह अपने पतिके लिये शुद्ध होती है; परंतु देवकार्य और पितृकार्यके लिये

६३६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वह उस दिन भी शुद्ध नहीं मानी जाती। दूसरेके लिये वह उस दिन असत् शूद्राके समान होती है। जो पहले दिन अपनी रजस्वला पत्नीके साथ समागम करता है, वह ब्रह्महत्याके चौथे अंशका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। वह पुरुष देवकर्म तथा पितृकर्ममें सम्मिलित होने योग्य नहीं रह जाता। वह लोगोंमें अधम, निन्दित और अपयशका भागी समझा जाता है। जो दूसरे दिन रजस्वला स्त्रीके साथ कामभावसे समागम करता है, उसे अवश्य ही गो-हत्याका पाप लगता है। वह आजीवन देवता, पितर और ब्राह्मणकी पूजाके लिये अपना अधिकार खो बैठता है, मनुष्यतासे गिर जाता है तथा कलङ्कित हो जाता है। जो तीसरे दिन रजस्वला पत्नीके साथ समागम करता है, वह मूढ़ भ्रूण-हत्याका भागी होता है; इसमें संशय नहीं है। पहले बताये हुए लोगोंकी भाँति वह भी पतित होकर सम्पूर्ण कर्मोंका अनधिकारी हो जाता है। चौथे दिन रजस्वला असत् शूद्रा कही जाती है; अतः विद्वान् पुरुष उस दिन भी उसके पास न जाय। मूढ़! मैं तेरी माता हूँ। यदि तू माताको भी बलपूर्वक ग्रहण करना चाहता है तो आज छोड़ दे। ऋतुकाल बीत जानेपर जैसी तेरी मर्जी हो, करना।

इतनेपर भी नहुष नहीं माना और बोला—'देवरमणी सदा ही शुद्ध होती है। तुम अपने घर चलो। मैं अभी आता हूँ'—यों कहकर राजा नहुष प्रसन्नतापूर्वक रत्नमय रथपर आरूढ़ हो नन्दनवनमें शचीके भवनकी ओर गया; परंतु शची अपने घरमें नहीं लौटी। वह सीधे गुरु बृहस्पतिके घर चली गयी। वहाँ जाकर उसने देखा गुरुदेव कुशासनपर विराजमान हैं। तारादेवी उनके चरणारविन्दोंकी सेवा कर रही हैं। वे ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान हैं और हाथमें जपमाला लिये अपने अभीष्ट देव श्रीकृष्णके नामका निरन्तर जप कर रहे हैं। वे श्रीकृष्ण सबसे उत्कृष्ट, परमानन्दमय, परमात्मा एवं ईश्वर हैं। निर्गुण, निरीह, स्वतन्त्र, प्रकृतिसे परे, स्वेच्छामय परब्रह्म हैं तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही शरीर धारण करते हैं। उनके चिन्तनमें लगे और नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाते हुए गुरुदेवको शचीने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया। उस समय भक्तिके समुद्रमें मग्न हुई शची रोती और आँखोंसे आँसू बहाती थी। साथ ही वह शोक-सागरमें भी डूब रही थी। भयभीत शची व्यथित-हृदयसे अपने ब्रह्मनिष्ठ गुरु कृपानिधान बृहस्पतिकी स्तुति करने लगी।

**शची बोली—**महाभाग! मैं भयभीत हो आपकी शरणमें आयी हूँ। आप ईश्वर हैं और मैं शोकसागरमें डूबी हुई आपकी दासी हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। गुरु असमर्थ हो या समर्थ, बलवान् हो या निर्बल, वह अपने शिष्यों, पत्नी तथा पुत्रोंपर सदा शासन करनेमें समर्थ है। प्रभो! आपने अपने शिष्यको उसके राज्यसे दूर कर दिया। बहुत दिन हुए, अब तो उसके दोषकी शान्ति हो गयी होगी। अतः कृपा कीजिये। कृपानिधे! मैं अनाथ हूँ। मेरे लिये सब दिशाएँ सूनी हो गयी हैं। अमरावतीपुरी भी सूनी है तथा मेरा निवासस्थान भी सब प्रकारकी सम्पत्तियोंसे शून्य है। मेरी इस अवस्थापर दृष्टिपात कीजिये और मुझे संकटसे बचाइये। मुझे एक डाकू अपना ग्रास बनाना चाहता है। आप मेरी रक्षा कीजिये। अपने किङ्कर देवराजको यहाँ ले आइये। चरणोंकी धूल देकर उन्हें शुभाशीर्वादसे अनुगृहीत कीजिये।

समस्त गुरुओंमें जन्मदाता पिता श्रेष्ठ गुरु माने गये हैं। पिताकी अपेक्षा माता सौगुनी अधिक पूजनीया, वन्दनीया तथा वरिष्ठ है; परंतु जो विद्यादाता, मन्त्रदाता, ज्ञानदाता और हरिभक्ति प्रदान करनेवाले गुरु हैं, वे मातासे भी सौगुने पूजनीय, वन्दनीय और सेव्य हैं। जिन्होंने

४८- कंसके द्वारा रातमें देखे हुए दुःस्वप्नोंका वर्णन और उससे अनिष्टकी आशङ्का, पुरोहित सत्यकका अरिष्ट-शान्तिके लिये धनुर्यज्ञका अनुष्ठान बताना, कंसका नन्दनन्दनको शत्रु बताना और उन्हें व्रजसे बुलानेके लिये वसुदेवजीको प्रेरित करना, वसुदेवजीके अस्वीकार करनेपर अक्रूरको वहाँ जानेकी आज्ञा देना, ऋषिगण तथा राजाओंका आगमन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६३७

अज्ञानरूपी तिमिर (रतौंधी)-रोगसे अन्धे हुए मनुष्यकी दृष्टिको ज्ञानाञ्जनकी शलाकासे खोल दिया है; उन श्रीगुरुदेवको नमस्कार है। जन्मदाता, अन्नदाता, माता, पिता, अन्य गुरु जीवको घोर संसारसागरसे पार करनेमें समर्थ नहीं हैं। गुरु विष्णु हैं, गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु महेश्वरदेव हैं, गुरु धर्म हैं, गुरु शेषनाग हैं और गुरु सर्वात्मा निर्गुण श्रीकृष्ण हैं; गुरु सम्पूर्ण तीर्थ, आश्रम तथा देवालय हैं। गुरु सम्पूर्ण देवस्वरूप तथा साक्षात् श्रीहरि हैं। इष्टदेवके रुष्ट हो जानेपर गुरुदेव अपने शिष्यकी रक्षा कर सकते हैं; किंतु गुरुके रुष्ट हो जानेपर इष्टदेव उसकी रक्षा नहीं कर सकते। जिसपर सम्पूर्ण ग्रह, देवता और ब्राह्मण रुष्ट हो जाते हैं, उसीपर गुरुदेव रुष्ट होते हैं; क्योंकि गुरु ही देवता हैं। आत्मा (शरीर), पुत्र, धन और पत्नी भी गुरुसे बढ़कर प्रिय नहीं हैं। धर्म, तप, सत्य और पुण्य भी गुरुसे अधिक प्रिय नहीं हैं। गुरुसे बढ़कर शासक और बन्धु दूसरा कोई नहीं है। शिष्योंके लिये सदा गुरु ही शासक, राजा और देवता हैं। अन्नदाता जबतक अन्न देनेमें समर्थ है, तभीतक वह शासक होता है; परंतु गुरु जन्म-जन्ममें शिष्योंके शासक होते हैं। मन्त्र, विद्या, गुरु और देवता—ये पतिकी भाँति पूर्वजन्मके अनुसार ही प्राप्त होते हैं। प्रत्येक जन्ममें गुरुका सम्बन्ध होनेसे उनका स्थान सबसे ऊपर है। पितारूप गुरु जिस जन्ममें जन्म देते हैं, उसी जन्ममें वन्दनीय होते हैं। माता तथा अन्य गुरुओंकी भी यही स्थिति है; परंतु ज्ञानदाता गुरु प्रत्येक जन्ममें वन्दनीय हैं। ब्रह्मन्! आप ब्राह्मणोंमें वरिष्ठ, तपस्वी जनोंमें गरिष्ठ तथा समस्त धर्मात्माओंमें उत्तम धर्मिष्ठ एवं ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ता हैं। मुनिश्रेष्ठ! अब आप मुझपर और इन्द्रपर संतुष्ट हों। आपके संतुष्ट होनेपर ही ग्रह और देवता सदा संतुष्ट रहते हैं।

ब्रह्मन्! ऐसा कहकर शची फिर उच्चस्वरसे रोने लगी। उसका रोना देखकर तारादेवी भी फूट-फूटकर रोने लगीं। तारा अपने पतिके चरणोंपर गिर पड़ीं और बार-बार यह कहकर रोने लगीं कि आप इन्द्रके अपराधको क्षमा करें। तब बृहस्पतिजी संतुष्ट हो तारासे बोले।

गुरुने कहा—तारे! उठो। शचीका सब कुछ मङ्गलमय होगा, मेरे आशीर्वादसे यह अपने पति महेन्द्रको शीघ्र ही प्राप्त कर लेगी।

ऐसा कहकर बृहस्पतिजी चुप हो गये। तारा पुनः उनके चरणोंमें गिरीं और बार-बार रोयीं। फिर ताराने शचीको पकड़कर अपने हृदयसे लगा लिया और उसे नाना प्रकारके आध्यात्मिक-ज्ञानसम्बन्धी उत्तम वचन सुनाकर समझाया एवं धीरज बँधाया।

(अध्याय ५६—५९)


बृहस्पतिका शचीको आश्वासन एवं आशीर्वाद देना, नहुषका सप्तर्षियोंको वाहन बनाना और दुर्वासाके शापसे अजगर होना, बृहस्पतिका इन्द्रको बुलाकर पुनः सिंहासनपर बिठाना तथा गौतमसे इन्द्र और अहल्याको शापकी प्राप्ति

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! शचीद्वारा किये गये स्तोत्रको सुनकर बृहस्पति बहुत संतुष्ट हुए और शान्तभावसे इन्द्रपत्नी शचीके प्रति मधुर वाणीमें बोले।

बृहस्पतिने कहा—बेटी! सारा भय छोड़ दो। मेरे रहते तुम्हें भय किस बातका है? शोभने! मेरे लिये जैसे कचकी पत्नी (पुत्रवधू) रक्षणीय है, उसी प्रकार तुम भी हो। जो स्थान पुत्रका