भारतकोश
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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

६३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जो तीनों लोकोंके सत्पुरुषोंद्वारा सेव्य हैं; उन श्यामसुन्दरने अपनी सेव्यरूपा प्राणवल्लभाकी सेवा की। तदनन्तर सेवकोचित भक्तिसे श्वेत चँवर डुलाया। यह कैसी अद्भुत बात है। इसके बाद समस्त भावोंके जानकारोंमें श्रेष्ठ बोधकलाके ज्ञाता एवं विलास-शास्त्रके मर्मज्ञ श्रीहरिने अपनी प्राणवल्लभाको जगाया और अपने वक्षःस्थलमें उनके लिये स्थान दिया।

इस प्रकार श्रीराधाको जगाकर श्रीकृष्णने उन्हें भाँति-भाँतिके पुष्पमाला, आभूषण तथा कौस्तुभमणि आदिके द्वारा सुसज्जित किया। रत्नपात्रमें भोजन और जल प्रस्तुत किये। इसी समय चरण-चिह्नोंको पहचानती हुई श्रीराधाकी सुप्रतिष्ठित सहचरी सुशीला आदि छत्तीस गोपियाँ अन्यान्य बहुसंख्यक गोपाङ्गनाओंके साथ वहाँ आ पहुँचीं। किन्हींके हाथमें चन्दन था और किन्हींके हाथमें कस्तूरी। कोई चँवर लिये आयी थी और कोई माला। कोई सिन्दूर, कोई कंघी, कोई आलता (महावर) और कोई वस्त्र लिये हुए थी। कोई अपने हाथमें दर्पण, कोई पुष्पपात्र, कोई क्रीड़ाकमल, कोई फूलोंके गजरे, कोई मधुपात्र, कोई आभूषण, कोई करताल, कोई मृदंग, कोई स्वर-यन्त्र और कोई वीणा लिये आयी थीं। जो छत्तीस राग-रागिनियाँ गोपीका रूप धारण करके गोलोकसे राधाके साथ भारतवर्षमें आयी थीं, वे सब वहाँ उपस्थित हुईं। कई गोपियाँ वहाँ आकर नाचने और गाने लगीं तथा कोई श्वेत चँवर डुलाकर राधाकी सेवा करने लगीं। महामुने! कुछ गोपियाँ प्रसन्नतापूर्वक देवी राधाके पैर दबाने लगीं। एकने उन्हें चबानेके लिये पानका बीड़ा दिया। इस प्रकार पवित्र वृन्दावनमें श्रीराधाके वक्षःस्थलमें विराजमान भगवान् श्यामसुन्दर कौतूहलपूर्वक गोपियोंके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए। वत्स! इस प्रकार मैंने श्रीहरिकी रासक्रीड़ाका वर्णन किया। वे भगवान् श्रीकृष्ण स्वेच्छामय रूपधारी, परिपूर्णतम परमात्मा, निर्गुण, स्वतन्त्र, प्रकृतिसे भी परे, सर्वसमर्थ और ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव आदिके भी परमेश्वर हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णजन्मका रहस्य, मनको प्रिय लगनेवाली उनकी बाललीला तथा किशोर-लीलाका भी वर्णन किया गया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?

नारदजीने पूछा—मुनिश्रेष्ठ! इसके बाद कौन-सी रहस्य-लीला हुई? भगवान् श्रीकृष्ण किस प्रकार नन्दभवनसे मथुराको गये? श्रीहरिके वियोगसे पीड़ित हुए नन्दने कैसे अपने प्राण धारण किये? जिनका चित्त सदा श्रीकृष्णके चिन्तनमें ही लगा रहता था, वे गोपाङ्गनाएँ और यशोदाजी भी कैसे जीवन धारण कर सकीं? जो आँखोंकी पलक गिरनेतकका भी वियोग होनेपर जीवित नहीं रह सकती थीं; वे ही देवी श्रीराधा अपने प्राणेश्वरके बिना किस तरह प्राणोंको रख सकीं? जो-जो गोप शयन, भोजन तथा अन्यान्य सुखोंके उपभोग-कालमें सदा श्रीकृष्णके साथ रहे; वे अपने वैसे प्रेमी बान्धवको ब्रजमें रहते हुए कैसे भूल सके? श्रीकृष्णने मथुरामें जाकर कौन-कौन-सी लीलाएँ कीं? परमधाम-गमनपर्यन्त उन्होंने जो कुछ किया हो, उसे आप बतानेकी कृपा करें।

श्रीनारायणने कहा—महामुने! कंसने धनुषयज्ञ नामक यज्ञका आयोजन किया था। उसमें उस राजाका निमन्त्रण पाकर भगवान् श्रीकृष्ण भी गये थे। राजा कंसने श्रीकृष्णको बुलानेके लिये भगवद्भक्त अक्रूरको उनके पास भेजा था।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६३१

अक्रूरजी राजा कंसकी आज्ञा पाकर नन्दभवनमें गये और श्रीकृष्णको उनके साथियोंसहित साथ ले मथुरामें लौट आये। मुने! मथुरा जाकर श्रीकृष्णने राजा कंसको मार डाला। एक धोबीको, चाणूर और मुष्टिक नामक मल्लको तथा कुवलयापीड़ नामक हाथीको वे पहले ही कालके गालमें भेज चुके थे। कंस-वधके अनन्तर बान्धव श्रीकृष्णने माता-पिता तथा भाई-बन्धुओंका उद्धार किया। श्रीहरिने कृपापूर्वक एक मालीको भी मोक्ष प्रदान किया। फिर गोपियोंपर दया आनेसे उद्धवको ब्रजमें भेजकर उन्हींके द्वारा उन्हें समझाया-बुझाया और धीरज बँधाया। तदनन्तर उपनयन-संस्कारके पश्चात् भगवान् अवन्तीनगर (उज्जैन)-में गये और वहाँ गुरु सान्दीपनि मुनिसे विद्या ग्रहण की। उसके बाद जरासंधको जीतकर यवनराजका वध किया और विधिपूर्वक उग्रसेनको राजाके पदपर बिठाया। समुद्रके निकट जा वहाँ द्वारकापुरीका निर्माण कराया और राजाओंके समूहको जीतकर वे रुक्मिणीदेवीको हर लाये। फिर कालिन्दी, लक्ष्मणा, शैव्या, सत्या, सती जाम्बवती, मित्रविन्दा तथा नाग्नजितीके साथ विवाह किया। तत्पश्चात् भयानक संग्रामके द्वारा प्राग्ज्योतिषपुरके नरेश नरकका वध करके उन्होंने सोलह हजार राजकुमारियोंका उद्धार किया और उन्हें पत्नीरूपमें अपनाकर उनके साथ विहार किया। इन्द्रदेवको लीलापूर्वक परास्त करके पारिजातका अपहरण किया और भगवान् शंकरको जीतकर बाणासुरके हाथ काट दिये तथा अपने पौत्र अनिरुद्धको छुड़ाया और फिर द्वारकामें आकर अपने-आपको अपनी प्रत्येक रानीके महलमें उपस्थित दिखाया। वसुदेवजीके यज्ञमें तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे आयी हुई अपने प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी श्रीराधाके दर्शन किये। फिर वे उनके साथ पुण्यमय वृन्दावनमें गये। भारतके उस पुण्यक्षेत्रमें उन जगदीश्वरने श्रीराधाके साथ पुनः चौदह वर्षोंतक रासमण्डलमें रास किया। उन्होंने नन्द-भवनमें पूरे ग्यारह वर्षकी अवस्थातक निवास किया था। फिर मथुरा और द्वारकामें उन भगवान्‌के पूरे सौ वर्ष व्यतीत हुए। उन दिनों महापराक्रमी श्रीहरिने वहाँ रहकर भूतलका भार उतारा था। मुने! इस तरह वे एक सौ पचीस वर्षोंतक भूतलपर रहकर गोलोकमें गये। वहाँ उन्होंने मैया यशोदा और नन्दबाबाको तथा बुद्धिमान् वृषभानु एवं राधा-माता कलावतीको सामीप्य-मुक्ति प्रदान की। श्रीकृष्ण और गोपियोंके साथ राधाने कौतूहलवश प्रत्येक युगमें वेदवर्णित धर्मका सेतु बाँधा। महामुने! इस प्रकार मैंने थोड़ेमें श्रीकृष्णका सारा रम्य चरित्र कह सुनाया जो धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सारा जगत् नश्वर ही है; अतः तुम परमानन्दमय नन्दनन्दनका सानन्द भजन करो। वे स्वेच्छामय परब्रह्म परमात्मा परमेश्वर, अविनाशी, अव्यक्त, भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही शरीर धारण करनेवाले, सत्य, नित्य, स्वतन्त्र, सर्वेश्वर, प्रकृतिसे परे, निर्गुण, निरीह, निराकार और निरञ्जन हैं। (अध्याय ५२—५४)


अभीष्ट स्थानपर पहुँचनेमें विलम्ब होते देखकर उन्हें डाँटना-फटकारना

( उत्तरार्द्ध )

श्रीकृष्णकी महत्ता एवं प्रभावका वर्णन

**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद ! वे ही भगवान् श्रीकृष्ण सर्वात्मा परम पुरुष हैं। वे दुराराध्य होते हुए भी अत्यन्त साध्य हैं अर्थात् आराधनाके बलसे उन्हें रिझा पाना अत्यन्त कठिन है तो भी वे भक्तपर कृपा करके स्वयं ही उसके अधीन हो जाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण सबके आराध्य और सुखदायक हैं। अपने भक्तोंके लिये तो वे अत्यन्त सुलभ हैं। भक्त ही उन्हें आराधनाद्वारा वशमें कर सकता है। वे अपने भक्तको सदा ही दर्शन देते हैं और दे सकते हैं; किंतु अभक्तके लिये उनका दर्शन पाना सर्वथा असम्भव है। उनके लीलाचरित्रोंका रहस्य समझ पाना अत्यन्त कठिन है। केवल उन चरित्रोंका अपने हृदयमें चिन्तन करना चाहिये। संसारके सब लोग श्रीकृष्णकी दुरन्त मायासे बद्ध एवं मोहित हैं। उन्हींके भयसे यह वायु निरन्तर बहती रहती है, कच्छप बिना आधारके ही स्थिर रहता है और यही कच्छप उन्हींके भयसे सदा अनन्त (शेषनाग)-को अपनी पीठपर धारण किये रहता है तथा शेषनाग अपने मस्तकपर अखिल विश्वका भार उठाये रहते हैं। शेषनागके सहस्र सिर हैं। उनके सिरके एक देशमें सात समुद्रों, सात द्वीपों, पर्वतों और काननोंसे युक्त पृथ्वी विद्यमान है। सात पाताल, भूर्भुवः स्वः आदि विभिन्न सात स्वर्ग, जिनमें ब्रह्मलोक भी शामिल है, विश्व कहे गये हैं। इस विश्वको ‘त्रिभुवन’ कहते हैं। इसीको कृत्रिम* जगत् कहा गया है। विधाता प्रत्येक कल्पमें श्रीकृष्णके भयसे ही इस कृत्रिम जगत्की सृष्टि करते हैं। इस तरहके असंख्य विश्व हैं, जिन्हें महाविराट् (महाविष्णु) अपने रोम-कूपोंमें धारण करते हैं। ये श्रीकृष्णके ही अंश हैं। उन्हींके भयसे समस्त ब्रह्माण्डोंको धारण करते हैं और उन्हींका निरन्तर ध्यान किया करते हैं। कृपानिधान विष्णु (लघु विराट्) भी श्रीकृष्णके ही भयसे संसारका पालन करते हैं। उन्हींका भय मानकर कालाग्नि रुद्रस्वरूप काल प्रजाका संहार करता है तथा छहों गुणों और ऐश्वर्योंसे युक्त विरागी एवं विरक्त मृत्युञ्जय महादेव उन्हींके भयसे अनुरागपूर्वक उनका निरन्तर ध्यान करते रहते हैं। उन्हींके भयसे आग जलती और सूर्य तपते हैं। उनका ही भय मानकर इन्द्र वर्षा करते और मृत्यु समस्त प्राणियोंपर धावा बोलती है। उन्हींके भयसे यम एवं धर्म पापियोंको दण्ड देते हैं। उनका ही भय मानकर पृथ्वी चराचर लोकोंको धारण करती और प्रकृति सृष्टिकालमें महत्तत्त्व आदिको जन्म देती है। बेटा ! उन भगवान् श्रीकृष्णका अभिप्राय क्या है ? इसे जानना बहुत कठिन है। कौन ऐसा पुरुष है, जो उसे जाननेका दावा कर सके। वत्स ! ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी जिनके प्रभावको नहीं जानते हैं; उन्हीं भगवान्‌की लीलाका रहस्य मुझ-जैसा मन्दबुद्धि कैसे जान सकता है ?

वे नन्दनन्दन वृन्दावनको छोड़कर मथुरा क्यों चले गये ? उन्होंने गोपियों तथा प्राणाधिका प्रिया राधाको क्यों त्याग दिया ? माता यशोदा और नन्दको तथा अन्यान्य बान्धव आदिको क्यों छोड़ा ? इस बातको उनके सिवा दूसरा कौन जान सकता है ? वे ही दर्प देते हैं और वे ही उस दर्पका दलन करते हैं। सबको सदा सब कुछ


* अनित्य।

४७- अहल्याके उद्धार एवं श्रीराम-चरित्रका संक्षेपसे वर्णन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

देनेवाले श्रीकृष्ण ही हैं। सबके दर्पका नाश करके उन्होंने उन सबपर कृपा ही की। वे ही जगत्‌की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं। वे स्रष्टाके भी स्रष्टा हैं। भगवान् शंकर अपने पाँच मुखोंद्वारा भी उनकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं। चार मुखोंवाले जगत्-विधाता ब्रह्माजी भी उनका स्तवन नहीं कर सकते। शेषनाग सहस्र मुखोंसे भी उनकी स्तुति करनेकी शक्ति नहीं रखते। साक्षात् विश्वव्यापी जनार्दन विष्णु भी उनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं। महाविराट् नारायण भी उन परमेश्वरकी स्तुति नहीं कर सके। प्रकृति उन परमात्माके सामने काँप उठती है। सरस्वती उन परमेश्वरका स्तवन करनेमें जडवत् हो जाती है। नारद! सम्पूर्ण वेद भी उनकी महिमाको नहीं जानते। ब्रह्मन्! इस प्रकार निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्णके प्रभावका वर्णन किया गया। अब और क्या सुनना चाहते हो?

(अध्याय ५५)


इन्द्रके दर्प-भङ्गकी कथा, नहुषकी शचीपर कुदृष्टि, शचीका धर्मकी बातें बताकर नहुषको समझाना और उसके न माननेपर बृहस्पतिजीकी शरणमें जाकर उनका स्तवन करना

**सूतजी कहते हैं—**तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर श्रीनारायणने संक्षेपसे कुछ लोगोंके दर्प-भङ्गकी घटनाएँ सुनायीं। फिर इन्द्रके दर्प-भङ्गका वृत्तान्त बताते हुए बोले।

**श्रीनारायणने कहा—**नारद! इस प्रकार सबके दर्प-भङ्गका प्रसङ्ग कहा गया। अब इन्द्रके दर्प-भञ्जनकी घटना विस्तारपूर्वक सुनो। एक समय इन्द्र अपने ब्रह्मनिष्ठ गुरु बृहस्पतिको आते देखकर भी सभामें दर्पवश अपने श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनसे नहीं उठे। इसे गुरुने अपना अपमान समझा और वे अत्यन्त रुष्ट हो वहाँसे लौट गये। यद्यपि उनके मनमें इन्द्रके प्रति द्वेषभावका उदय हुआ था, तथापि धर्मात्मा गुरुने स्नेहवश कृपा करके उन्हें शाप नहीं दिया; परंतु शाप न मिलनेपर भी इन्द्रका घमंड चूर हो गया। यदि दूसरा कोई धर्म अथवा प्रेमका विचार करके किसीके भारी अपराध करनेपर भी शाप न दे तो भी उसका वह अपराध अवश्य फल देता है। नारद! धर्मदेव ही उस पापीका नाश कर देते हैं। जो धर्मात्मा पुरुष जिस हिंसक या अपराधीको क्रोधपूर्वक शाप दे देता है, उसके उस शापसे अपराधीका अवश्य विनाश होता है; परंतु उस धर्मात्मा पुरुषका धर्म भी उसी मात्रामें क्षीण हो जाता है। इन्द्रने जो गुरुका अपमानरूप अधर्म किया था, उसके कारण वे ब्रह्महत्याके भागी हुए। ब्रह्महत्यासे डरे हुए इन्द्र अपना राज्य छोड़कर एक पवित्र सरोवरको चले गये और उस सरोवरके कमल-नालमें निवास करने लगे। भारतवर्षमें भगवान् विष्णुका वह सरोवर पुण्यमय तीर्थ और तपस्वीजनोंके तपका श्रेष्ठ स्थान है। वहाँ ब्रह्महत्या नहीं जा सकती। उसीको पुराणवेत्ता पुरुष 'पुष्कर'* तीर्थ कहते हैं। इन्द्रको राज्यभ्रष्ट हुआ देख धर्मात्मा हरिभक्त नरेश नहुषने उनके राज्यपर बलपूर्वक अधिकार कर लिया। एक दिन मनोहर अङ्गवाली सुन्दरी शची, जिनके कोई संतान नहीं थी, पतिवियोगके कारण व्यथित-हृदयसे आकाशगङ्गाके तटपर जा रही थीं। उस समय नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा रत्नमय अलंकारोंसे


* ४७वें अध्यायमें भी यह प्रसङ्ग आया है। वहाँ ५६वें श्लोकमें कहा गया है कि इन्द्रने मानसरोवरमें प्रवेश किया था—'विवेश मानससरः।' यहाँ पुष्करतीर्थमें इन्द्रका प्रवेश कहा गया है। यदि वहाँके 'मानस-सरः' का अर्थ केवल सरोवरमात्र हो तो दोनों स्थानोंके वर्णनमें एकता आ सकती है।

६३४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

विभूषित उन सुन्दर दाँतवाली, परम कोमलाङ्गी महासती शचीपर नहुषकी दृष्टि पड़ी। उन्हें देखते ही नहुषके मनमें दूषित वृत्ति जाग उठी। उसने शचीके समक्ष विनयपूर्वक अपनी कुत्सित वासनाकी पूर्तिके लिये प्रस्ताव रखा।

इसपर शचीने कहा—बेटा! मेरी बात सुनो। महाराज! तुम प्रजाके भयका भञ्जन करनेवाले हो। राजा समस्त प्रजाका पालक पिता होता है और वह सबकी भयसे रक्षा करता है। इन दिनों महेन्द्र राज्यलक्ष्मीसे भ्रष्ट हो गये हैं और तुम स्वर्गमें राजाके पदपर प्रतिष्ठित हुए हो। जो राजा होता है, वह निश्चय ही प्रजाजनोंका पालक पिता है। गुरुपत्नी, राजपत्नी, देवपत्नी, पुत्रवधू, माताकी बहिन (मौसी), पिताकी बहिन (बूआ), शिष्यपत्नी, भृत्यपत्नी, मामी, पिताकी पत्नी (माता और विमाता), भाईकी पत्नी, सास, बहिन, बेटी, गर्भमें धारण करनेवाली (जन्मदात्री) तथा इष्टदेवी—ये पुरुषकी सोलह माताएँ हैं*। तुम मनुष्य हो और मैं देवताकी पत्नी हूँ; अतः तुम्हारी वेदसम्मत माता हुई। बेटा! यदि माँके साथ रमण करना चाहते हो तो माता अदितिके पास जाओ। वत्स! सब पापियोंके उद्धारका उपाय है; परंतु मातृगामियोंके लिये कोई उपाय नहीं है। वे ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त कुम्भीपाक नरकमें पकाये जाते हैं। तत्पश्चात् सात कल्पोंतक कीड़े होते हैं। फिर सात जन्मोंतक कोढ़ी और म्लेच्छ होते हैं। उनका कदापि उद्धार नहीं होता; ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। आङ्गिरस-स्मृति कहती है कि वेदोंमें उनके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है। निश्चय ही संसारी जीवोंके लिये स्वर्गकी सम्पत्तिका भोग ही सुख है; परंतु मुमुक्षुओंके लिये मोक्ष, तपस्वीजनोंके लिये तप, ब्राह्मणोंके लिये ब्राह्मणत्व, मुनियोंके लिये मौन, वैदिकोंके लिये वेदाभ्यास, कवियोंके लिये काव्य-वर्णन तथा वैष्णवोंके लिये भगवान् विष्णुका दास्य ही परम सुख है। वे विष्णु-भक्तिके रसास्वादनको ही परम सुख मानते हैं। वैष्णवजन तो विष्णु-भक्तिको छोड़कर मुक्तिको भी लेनेकी इच्छा नहीं करते। राजेन्द्र! तुम चक्रवर्ती राजाओंके प्रकाशमान कुलमें उत्पन्न हुए हो। अनेक जन्मोंके पुण्यसे तुमने भारतवर्षमें जन्म पाया है। चन्द्रवंशी नरेशरूपी कमलोंके विकासके लिये तुम ग्रीष्मकालकी दोपहरीके तेजस्वी सूर्यकी भाँति प्रकट हुए हो। समस्त आश्रमोंमें स्वधर्मका पालन ही उत्तम यशका कारण होता है। स्वधर्महीन मूढ़ मानव नरकमें गिरते हैं।

तीनों संध्याओंके समय श्रीहरिकी पूजा ब्राह्मणका अपना धर्म है। भगवच्चरणोदकका पान तथा भगवान्‌के नैवेद्यका भक्षण उनके लिये अमृतसे भी बढ़कर है। नरेश्वर! जो अन्न और जल भगवान्‌को समर्पित नहीं किया गया, वह मल-मूत्रके समान है। यदि ब्राह्मण उसे खाते हैं तो वे सब-के-सब सूअर होते हैं। ब्राह्मण आजीवन भगवान्‌के नैवेद्यका भोजन करें; परंतु एकादशीको भोजन न करें। पूर्णतः उपवास करें। इसी तरह कृष्ण-जन्माष्टमी, शिवरात्रि तथा रामनवमी आदि पुण्य वासरोंको भी उन्हें निश्चय ही यत्नपूर्वक उपवास करना चाहिये। ब्रह्माजीने जो ब्राह्मणोंका स्वधर्म बताया है; वह कहा गया।

नरेश्वर! पतिव्रताओंका व्रत पतिसेवा है।


* यो राजा स पिता पाता प्रजानामेव निश्चितम्॥
गुरुपत्नी राजपत्नी देवपत्नी तथा वधूः। पित्रोः स्वसा शिष्यपत्नी भृत्यपत्नी च मातुली॥
पितृपत्नी भ्रातृपत्नी श्वश्रूश्च भगिनी सुता। गर्भधात्रीष्टदेवी च पुंसः षोडश मातरः॥
(५९।५४—५६)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६३५

वही उनके लिये उत्तम तप है। पर-पुरुष पतिव्रताओंके लिये पुत्रतुल्य है; यही नारियोंका धर्म है। राजालोग जैसे प्रजाका औरस पुत्रोंकी भाँति पालन करते हैं, उसी प्रकार वे प्रजावर्गकी स्त्रियोंको भी माताके समान देखते हैं। विष्णुकी प्रसन्नताके लिये यज्ञ करते और देवताओं एवं ब्राह्मणोंकी सेवामें लगे रहते हैं। दुष्टोंका निवारण और सत्पुरुषोंका पालन करते हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने क्षत्रियोंका यही धर्म बताया था। वाणिज्य और धर्मसंग्रह यह वैश्योंका अपना धर्म है। ब्राह्मणोंकी सेवा शूद्रोंका परम धर्म निश्चित किया गया है। राजन्! सब कुछ भगवान् श्रीहरिको समर्पण कर देना संन्यासियोंका धर्म है। संन्यासी एकमात्र गेरुआ वस्त्र, दण्ड और मिट्टीका कमण्डलु धारण करता है। सर्वत्र समान दृष्टि रखता और सदा श्रीनारायणका स्मरण करता है। नित्य भ्रमण करता है। किसीके घरमें नहीं टिकता और लोभवश किसीको विद्या और मन्त्रका उपदेश नहीं देता। संन्यासी अपने लिये आश्रम नहीं बनाता। दूसरी किसी वासनाको मनमें स्थान नहीं देता; दूसरे किसीका साथ नहीं करता और आसक्ति एवं मोहसे दूर रहता है। वह लोभवश स्वादिष्ट भोजन नहीं करता, स्त्रीका मुख नहीं देखता तथा व्रतमें अटल रहकर किसी गृहस्थ पुरुषसे मनचाही भोज्य वस्तुके लिये याचना भी नहीं करता। ब्रह्माजीने यही संन्यासियोंका धर्म बताया है। बेटा! यह तुम्हें धर्मकी बात बतायी है। अब तुम सुखपूर्वक अपने स्थानको जाओ। ऐसा कहकर मार्गमें मिली हुई इन्द्राणी चुप हो रहीं और राजा नहुष गर्दन टेढ़ी करके उनसे बोला।

नहुषने कहा—देवि! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब उलटी बात है। यथार्थ वैदिक धर्म क्या है? यह मैं बताता हूँ, सुनो। सुरसुन्दरि! इसमें संदेह नहीं कि सबको अपने कर्मोंका फल भोगना पड़ता है; परंतु स्वर्ग, पाताल तथा दूसरे किसी द्वीपमें जो कर्म किये जाते हैं, उनका फल नहीं भोगना पड़ता। पुण्य क्षेत्र भारतमें शुभाशुभ कर्म करके कर्मी मनुष्य उस कर्मके बन्धनमें बँधकर परलोकमें उसके फलको भोगता है। हिमालयसे लेकर दक्षिण समुद्रतकका पवित्र देश 'भारत' कहा गया है। वह सब स्थानोंमें श्रेष्ठ तथा मुनियोंकी तपोभूमि है। वहाँ जन्म लेकर जीव भगवान् विष्णुकी मायासे वञ्चित हो सदा विषय-सेवन करता है और श्रीहरिकी सेवाको भुला देता है। जो भारतवर्षमें महान् पुण्य करता है, वह पुण्यात्मा पुरुष स्वर्गको जाता है। वहाँ स्वर्गीय कन्याओंको अपनाकर चिरकालतक उनके साथ आनन्द भोगता है। मनुष्य मानव-शरीरका त्याग करके स्वर्गमें आता है; किंतु सुन्दरि! मैं अपने शरीरके साथ यहाँ आया हूँ। देखो, मेरा कैसा पुण्य है? अनेक जन्मोंके पुण्यसे मैं अभीष्ट स्वर्गमें आया हूँ। तदनन्तर न जाने किस पुण्यसे तुमसे मेरा साक्षात्कार हुआ है। यह कर्मका स्थान नहीं, अपने कर्मोंके भोगका स्थान है। यों कहकर कामासक्त नहुषने फिर बहुत-सी युक्तियोंके द्वारा पुनः अपने उसी पापपूर्ण प्रस्तावको दुहराया।

तब शची बोलीं—हाय! इस विवेकशून्य, कर्तव्याकर्तव्यको न जाननेवाले, मूढ़, कामातुर पुरुषकी कितनी बातें आज मुझे सुननी पड़ेंगी! कामने जिनके चित्तको चुरा लिया है, वे विवेकशून्य काममत्त कामी तथा मधुमत्त एवं सुरामत्त मनुष्य अपनी मौतको भी नहीं गिनते। ओ मतवाले नरेश! आज मुझे छोड़ दे। मैं तेरे लिये माताके समान और रजस्वला हूँ। आज मेरी ऋतुका प्रथम दिन है। पहले दिन रजस्वला स्त्री चाण्डालीके समान मानी जाती है। दूसरे दिन म्लेच्छा और तीसरे दिन धोबिनके समान होती है। चौथे दिन वह अपने पतिके लिये शुद्ध होती है; परंतु देवकार्य और पितृकार्यके लिये

६३६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वह उस दिन भी शुद्ध नहीं मानी जाती। दूसरेके लिये वह उस दिन असत् शूद्राके समान होती है। जो पहले दिन अपनी रजस्वला पत्नीके साथ समागम करता है, वह ब्रह्महत्याके चौथे अंशका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। वह पुरुष देवकर्म तथा पितृकर्ममें सम्मिलित होने योग्य नहीं रह जाता। वह लोगोंमें अधम, निन्दित और अपयशका भागी समझा जाता है। जो दूसरे दिन रजस्वला स्त्रीके साथ कामभावसे समागम करता है, उसे अवश्य ही गो-हत्याका पाप लगता है। वह आजीवन देवता, पितर और ब्राह्मणकी पूजाके लिये अपना अधिकार खो बैठता है, मनुष्यतासे गिर जाता है तथा कलङ्कित हो जाता है। जो तीसरे दिन रजस्वला पत्नीके साथ समागम करता है, वह मूढ़ भ्रूण-हत्याका भागी होता है; इसमें संशय नहीं है। पहले बताये हुए लोगोंकी भाँति वह भी पतित होकर सम्पूर्ण कर्मोंका अनधिकारी हो जाता है। चौथे दिन रजस्वला असत् शूद्रा कही जाती है; अतः विद्वान् पुरुष उस दिन भी उसके पास न जाय। मूढ़! मैं तेरी माता हूँ। यदि तू माताको भी बलपूर्वक ग्रहण करना चाहता है तो आज छोड़ दे। ऋतुकाल बीत जानेपर जैसी तेरी मर्जी हो, करना।

इतनेपर भी नहुष नहीं माना और बोला—'देवरमणी सदा ही शुद्ध होती है। तुम अपने घर चलो। मैं अभी आता हूँ'—यों कहकर राजा नहुष प्रसन्नतापूर्वक रत्नमय रथपर आरूढ़ हो नन्दनवनमें शचीके भवनकी ओर गया; परंतु शची अपने घरमें नहीं लौटी। वह सीधे गुरु बृहस्पतिके घर चली गयी। वहाँ जाकर उसने देखा गुरुदेव कुशासनपर विराजमान हैं। तारादेवी उनके चरणारविन्दोंकी सेवा कर रही हैं। वे ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान हैं और हाथमें जपमाला लिये अपने अभीष्ट देव श्रीकृष्णके नामका निरन्तर जप कर रहे हैं। वे श्रीकृष्ण सबसे उत्कृष्ट, परमानन्दमय, परमात्मा एवं ईश्वर हैं। निर्गुण, निरीह, स्वतन्त्र, प्रकृतिसे परे, स्वेच्छामय परब्रह्म हैं तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही शरीर धारण करते हैं। उनके चिन्तनमें लगे और नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाते हुए गुरुदेवको शचीने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया। उस समय भक्तिके समुद्रमें मग्न हुई शची रोती और आँखोंसे आँसू बहाती थी। साथ ही वह शोक-सागरमें भी डूब रही थी। भयभीत शची व्यथित-हृदयसे अपने ब्रह्मनिष्ठ गुरु कृपानिधान बृहस्पतिकी स्तुति करने लगी।

**शची बोली—**महाभाग! मैं भयभीत हो आपकी शरणमें आयी हूँ। आप ईश्वर हैं और मैं शोकसागरमें डूबी हुई आपकी दासी हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। गुरु असमर्थ हो या समर्थ, बलवान् हो या निर्बल, वह अपने शिष्यों, पत्नी तथा पुत्रोंपर सदा शासन करनेमें समर्थ है। प्रभो! आपने अपने शिष्यको उसके राज्यसे दूर कर दिया। बहुत दिन हुए, अब तो उसके दोषकी शान्ति हो गयी होगी। अतः कृपा कीजिये। कृपानिधे! मैं अनाथ हूँ। मेरे लिये सब दिशाएँ सूनी हो गयी हैं। अमरावतीपुरी भी सूनी है तथा मेरा निवासस्थान भी सब प्रकारकी सम्पत्तियोंसे शून्य है। मेरी इस अवस्थापर दृष्टिपात कीजिये और मुझे संकटसे बचाइये। मुझे एक डाकू अपना ग्रास बनाना चाहता है। आप मेरी रक्षा कीजिये। अपने किङ्कर देवराजको यहाँ ले आइये। चरणोंकी धूल देकर उन्हें शुभाशीर्वादसे अनुगृहीत कीजिये।

समस्त गुरुओंमें जन्मदाता पिता श्रेष्ठ गुरु माने गये हैं। पिताकी अपेक्षा माता सौगुनी अधिक पूजनीया, वन्दनीया तथा वरिष्ठ है; परंतु जो विद्यादाता, मन्त्रदाता, ज्ञानदाता और हरिभक्ति प्रदान करनेवाले गुरु हैं, वे मातासे भी सौगुने पूजनीय, वन्दनीय और सेव्य हैं। जिन्होंने

४८- कंसके द्वारा रातमें देखे हुए दुःस्वप्नोंका वर्णन और उससे अनिष्टकी आशङ्का, पुरोहित सत्यकका अरिष्ट-शान्तिके लिये धनुर्यज्ञका अनुष्ठान बताना, कंसका नन्दनन्दनको शत्रु बताना और उन्हें व्रजसे बुलानेके लिये वसुदेवजीको प्रेरित करना, वसुदेवजीके अस्वीकार करनेपर अक्रूरको वहाँ जानेकी आज्ञा देना, ऋषिगण तथा राजाओंका आगमन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६३७

अज्ञानरूपी तिमिर (रतौंधी)-रोगसे अन्धे हुए मनुष्यकी दृष्टिको ज्ञानाञ्जनकी शलाकासे खोल दिया है; उन श्रीगुरुदेवको नमस्कार है। जन्मदाता, अन्नदाता, माता, पिता, अन्य गुरु जीवको घोर संसारसागरसे पार करनेमें समर्थ नहीं हैं। गुरु विष्णु हैं, गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु महेश्वरदेव हैं, गुरु धर्म हैं, गुरु शेषनाग हैं और गुरु सर्वात्मा निर्गुण श्रीकृष्ण हैं; गुरु सम्पूर्ण तीर्थ, आश्रम तथा देवालय हैं। गुरु सम्पूर्ण देवस्वरूप तथा साक्षात् श्रीहरि हैं। इष्टदेवके रुष्ट हो जानेपर गुरुदेव अपने शिष्यकी रक्षा कर सकते हैं; किंतु गुरुके रुष्ट हो जानेपर इष्टदेव उसकी रक्षा नहीं कर सकते। जिसपर सम्पूर्ण ग्रह, देवता और ब्राह्मण रुष्ट हो जाते हैं, उसीपर गुरुदेव रुष्ट होते हैं; क्योंकि गुरु ही देवता हैं। आत्मा (शरीर), पुत्र, धन और पत्नी भी गुरुसे बढ़कर प्रिय नहीं हैं। धर्म, तप, सत्य और पुण्य भी गुरुसे अधिक प्रिय नहीं हैं। गुरुसे बढ़कर शासक और बन्धु दूसरा कोई नहीं है। शिष्योंके लिये सदा गुरु ही शासक, राजा और देवता हैं। अन्नदाता जबतक अन्न देनेमें समर्थ है, तभीतक वह शासक होता है; परंतु गुरु जन्म-जन्ममें शिष्योंके शासक होते हैं। मन्त्र, विद्या, गुरु और देवता—ये पतिकी भाँति पूर्वजन्मके अनुसार ही प्राप्त होते हैं। प्रत्येक जन्ममें गुरुका सम्बन्ध होनेसे उनका स्थान सबसे ऊपर है। पितारूप गुरु जिस जन्ममें जन्म देते हैं, उसी जन्ममें वन्दनीय होते हैं। माता तथा अन्य गुरुओंकी भी यही स्थिति है; परंतु ज्ञानदाता गुरु प्रत्येक जन्ममें वन्दनीय हैं। ब्रह्मन्! आप ब्राह्मणोंमें वरिष्ठ, तपस्वी जनोंमें गरिष्ठ तथा समस्त धर्मात्माओंमें उत्तम धर्मिष्ठ एवं ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ता हैं। मुनिश्रेष्ठ! अब आप मुझपर और इन्द्रपर संतुष्ट हों। आपके संतुष्ट होनेपर ही ग्रह और देवता सदा संतुष्ट रहते हैं।

ब्रह्मन्! ऐसा कहकर शची फिर उच्चस्वरसे रोने लगी। उसका रोना देखकर तारादेवी भी फूट-फूटकर रोने लगीं। तारा अपने पतिके चरणोंपर गिर पड़ीं और बार-बार यह कहकर रोने लगीं कि आप इन्द्रके अपराधको क्षमा करें। तब बृहस्पतिजी संतुष्ट हो तारासे बोले।

गुरुने कहा—तारे! उठो। शचीका सब कुछ मङ्गलमय होगा, मेरे आशीर्वादसे यह अपने पति महेन्द्रको शीघ्र ही प्राप्त कर लेगी।

ऐसा कहकर बृहस्पतिजी चुप हो गये। तारा पुनः उनके चरणोंमें गिरीं और बार-बार रोयीं। फिर ताराने शचीको पकड़कर अपने हृदयसे लगा लिया और उसे नाना प्रकारके आध्यात्मिक-ज्ञानसम्बन्धी उत्तम वचन सुनाकर समझाया एवं धीरज बँधाया।

(अध्याय ५६—५९)


बृहस्पतिका शचीको आश्वासन एवं आशीर्वाद देना, नहुषका सप्तर्षियोंको वाहन बनाना और दुर्वासाके शापसे अजगर होना, बृहस्पतिका इन्द्रको बुलाकर पुनः सिंहासनपर बिठाना तथा गौतमसे इन्द्र और अहल्याको शापकी प्राप्ति

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! शचीद्वारा किये गये स्तोत्रको सुनकर बृहस्पति बहुत संतुष्ट हुए और शान्तभावसे इन्द्रपत्नी शचीके प्रति मधुर वाणीमें बोले।

बृहस्पतिने कहा—बेटी! सारा भय छोड़ दो। मेरे रहते तुम्हें भय किस बातका है? शोभने! मेरे लिये जैसे कचकी पत्नी (पुत्रवधू) रक्षणीय है, उसी प्रकार तुम भी हो। जो स्थान पुत्रका

६३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

है, वही शिष्यका भी है। तर्पण, पिण्डदान, पालन और परितोषण—इन सभी कर्मोंके लिये पुत्र और शिष्यमें कोई भेद नहीं है। जैसे पुत्र पिताके मरनेपर उसके लिये अग्निदाता होता है, अवश्य उसी तरह शिष्य गुरुके लिये अग्निप्रदाता कहा गया है। यह बात कण्वशाखामें ब्रह्माजीने कही है। पिता, माता, गुरु, पत्नी, छोटा बालक, अनाथ एवं कुटुम्बीजन—ये पुरुषमात्रसे नित्य पोषण पानेके योग्य हैं, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है*। जो इनका पोषण नहीं करता उसके शरीरके भस्म होनेतक उसे सूतक (अशौच)—का भागी होना पड़ता है। वह जीते-जी देवयज्ञ तथा पितृयज्ञमें कर्म करनेका अधिकारी नहीं रहता है—ऐसा महेश्वरका कथन है। जो माता, पिता और गुरुके प्रति मानव-बुद्धि रखता है, उसको सर्वत्र अयश प्राप्त होता है और उसे पग-पगपर विघ्नका ही सामना करना पड़ता है। जो सम्पत्तिसे मतवाला होकर अपने गुरुका अपमान करता है, उसका शीघ्र ही सर्वनाश हो जाता है; यह सुनिश्चित बात है। अपनी सभामें मुझे देखकर इन्द्र आसनसे नहीं उठे थे, उसीका फल इस समय भोग रहे हैं। गुरुके अपमानका शीघ्र ही जो कटु फल प्राप्त हुआ, उसे तुम अपनी आँखों देख लो। अब मैं इन्द्रको शापसे छुड़ाऊँगा और निश्चय ही तुम्हारी रक्षा करूँगा। जो शासन और संरक्षण दोनों ही कर सकता हो, वही गुरु कहलाता है। जो हृदयसे शुद्ध है अर्थात् जिसके हृदयमें कलुषित भाव नहीं पैदा हुआ है, उस नारीका सतीत्व नष्ट नहीं होता। परंतु जिसके मनमें विकल्प है, उसका धर्म नष्ट हो जाता है। पतिव्रते ! तुम्हारा दुर्गाजीके समान प्रभाव बढ़ेगा। तुम्हारी प्रतिष्ठा और यश लक्ष्मीजीके समान होंगे। सौभाग्य और पतिविषयक प्रेम श्रीराधिकाके समान होगा। स्वामीके प्रति गौरव, मान, प्रीति तथा प्रधानताका भाव भी तुममें श्रीराधाके ही सदृश होगा। रोहिणीके समान तुममें पतिकी अपेक्षा-बुद्धि होगी। तुम भारतीके समान पूजनीया तथा सावित्रीके तुल्य सदा शुद्धा एवं उपमारहित होओगी।

बृहस्पतिजी ऐसा कह ही रहे थे कि नहुषके दूतने वहाँ आकर शचीसे नन्दनवनमें चलनेके लिये कहा। यह सुनते ही बृहस्पतिजीका सारा शरीर क्रोधसे काँपने लगा और उनकी आँखें लाल हो गयीं। वे उस दूतसे बोले।

गुरुने कहा— दूत ! तू जाकर नहुषसे कह दे कि 'महाराज ! यदि तुम शचीका उपभोग करना चाहते हो तो एक ऐसी सवारीपर चढ़कर रातमें आना, जिसका आजसे पहले किसीने उपयोग न किया हो। सप्तर्षियोंके कंधोंपर अपनी सुन्दर शिविका (पालकी) रख उत्तम वेश-भूषासे सज-धजकर उसीपर आरूढ़ हो तुम्हें यहाँतक यात्रा करनी चाहिये।'

बृहस्पतिजीकी बात सुनकर दूतने नहुषके पास जा उनका संदेश कह सुनाया। सुनकर नहुष हँस पड़ा और अपने सेवकसे बोला— 'जाओ, जाओ, जल्दी जाओ और सप्तर्षियोंको यहाँ बुला लाओ। उन सबके साथ मिलकर कोई उपाय करूँगा। तुम अभी जाओ।'

राजाका आदेश पाकर दूत सप्तर्षियोंके समीप गया और नहुषने जो कुछ कहा था, वह सब उसने उन सबसे कह सुनाया। दूतकी बात सुनकर सप्तर्षि प्रसन्नतापूर्वक नहुषके पास गये। उन


* पिता माता गुरुर्भार्या शिशुश्चानाथबान्धवाः। एते पुंसां नित्यपोष्या इत्याह कमलोद्भवः॥
(६०।५)

·· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ·· ६३१

सबको आया देख राजाने प्रणाम किया और आदरपूर्वक कहा।

**नहुष बोला—**आप लोग ब्रह्माजीके पुत्र हैं, ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होते हैं और सदा ब्रह्माजीके समान ही भक्तवत्सल हैं। निरन्तर भगवान् नारायणकी उपासनामें लगे रहते हैं। शुद्ध सत्त्व ही आपका स्वरूप है। आप मोह और मात्सर्यसे रहित हैं। दर्प और अहंकार आपको छू नहीं सके हैं। आप सब लोग सदा भगवान् नारायणके समान तेजस्वी और यशस्वी हैं। गुण, कृपा, प्रेम और वरदान सभी दृष्टियोंसे निश्चय ही आप श्रीहरिके तुल्य हैं।

ऐसा कहकर राजा उनके चरणोंमें प्रणाम और स्तुति करने लगा। राजाको कातर हुआ देख वे परम हितैषी ऋषि उससे बोले।

**ऋषियोंने कहा—**बेटा! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो; हम सब कुछ देनेमें समर्थ हैं। हमारे लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। इन्द्रपद, मनुका पद, दीर्घायु, सातों द्वीपोंका प्रभुत्व, चिरकालतक बना रहनेवाला अतिशय सुख, सम्पूर्ण सिद्धियाँ, परम दुर्लभ समस्त ऐश्वर्य तथा जो तपस्यासे भी नहीं मिल सकती, वह हरिभक्ति अथवा मुक्ति भी हम तुम्हें दे सकते हैं। वत्स! बोलो, इस समय तुम्हें किस वस्तुकी इच्छा है? वह सब तुम्हें देकर ही हम तपस्याके लिये जायँगे। जो क्षण श्रीकृष्णकी आराधनाके बिना व्यतीत होता है, वह लाख युगोंके समान है अर्थात् श्रीकृष्ण-भजनके बिना यदि एक क्षण भी व्यर्थ बीता तो समझना चाहिये कि हमारे एक लाख युग व्यर्थ बीत गये। जो दिन श्रीहरिके ध्यान और सेवनसे शून्य रह गया, वही सबसे बड़ा दुर्दिन है। जो मनुष्य श्रीहरिकी सेवा छोड़कर किसी दूसरे विषयको पानेकी इच्छा रखता है, वह मनोवाञ्छित अमृतको त्यागकर अपने ही विनाशके लिये मानो विष खाता है*। ब्रह्मा, शिव, धर्म, विष्णु, महाविष्णु (महानारायण), गणेश, सूर्य, शेष और सनकादि मुनि—ये दिन-रात प्रसन्नतापूर्वक जिनके चरणकमलोंका चिन्तन करते रहते हैं, उन जन्म, मृत्यु और जरारूप व्याधिको हर लेनेवाले श्रीकृष्णमें हमलोग सदा अनुरक्त रहते हैं।

सप्तर्षियोंकी यह बात सुनकर राजेश्वर नहुष लज्जित हो गया। उसका सिर झुक गया, तथापि मायासे मोहितचित्त होनेके कारण वह बोला।

**नहुषने कहा—**महर्षियो! आपलोग भक्तवत्सल हैं और सब कुछ देनेकी शक्ति रखते हैं। इस समय मैं शचीको पाना चाहता हूँ; अतः शीघ्र ही मुझे शचीका दान दीजिये। महासती शची ऐसे पतिको पाना चाहती है, जिसके वाहन सप्तर्षि हों। यही मेरा वर है। आपलोग शीघ्र ही मेरे अभीष्ट कार्यको सम्पन्न करें।

नारद! नहुषकी बात सुनकर सब मुनि कौतूहलवश एक-दूसरेको देखते हुए जोर-जोरसे हँसने लगे। राजाको भगवान् विष्णुकी मायासे वेष्टित एवं मोहित मानकर उन दीनवत्सल सप्तर्षियोंने कृपापूर्वक राजाका वाहन बननेकी प्रतिज्ञा कर ली। उसकी शिविका मुक्ता और माणिक्यसे सुशोभित थी। ऋषियोंने उसे कंधेपर उठा लिया और राजा नहुष सुन्दर वेष एवं रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो उस शिविकासे चला। उस वाहनद्वारा अभीष्ट स्थानपर पहुँचनेमें अधिक विलम्ब होता देख राजा सप्तर्षियोंको डाँटने-


* युगलक्षसमं यच्च क्षणं कृष्णार्त्तनं विना। तद्दिनं दुर्दिनं यत्तद्ध्यानसेवनवर्जितम्॥
विना तत्सेवनं यो हि विषयान्यं च वाञ्छति। विषमत्ति प्रणाशाय विहायामृतमीप्सितम्॥
(६०। ३२-३३)

९७- कंसका अक्रूरसे नन्द-व्रजमें जानेके लिये कहना

६४० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


फटकारने लगा। शिविकाके उस मार्गपर सबसे आगे चलते थे दुर्वासा। उन्हें राजाकी फटकारपर क्रोध आ गया और वे शाप देते हुए बोले—

'मूढ़चित्त महाराज! तुम महान् अजगर होकर नीचे गिर पड़ो। धर्मपुत्र युधिष्ठिरके दर्शन होनेसे तुम अजगरकी योनिसे छूट जाओगे। तत्पश्चात् रत्नमय विमानसे वैकुण्ठमें जाकर भगवान् विष्णुका सेवन करोगे। किया हुआ कर्म कभी निष्फल नहीं होता। तुमने श्रीहरिकी आराधना की है; अतः शापसे छूटनेपर तुम्हें उसका फल अवश्य मिलेगा।'

महामुने! यों कहकर वे सब श्रेष्ठ मुनि हँसते हुए चले गये और राजा उनके शापसे सर्प होकर गिर पड़ा। वह समाचार सुनकर शची गुरुदेवको नमस्कार करके अमरावतीमें चली गयी और बृहस्पतिजी शीघ्र उस स्थानपर गये, जहाँ इन्द्र कमल-नालमें निवास करते थे। सरोवरके निकट जाकर कृपानिधान गुरुने अत्यन्त प्रसन्नवदन हो कृपापूर्वक देवराजको पुकारा।

बृहस्पति बोले— वत्स! आओ। मेरे रहते तुम्हें क्या भय हो सकता है? भय छोड़ो और यहाँ आओ। मैं तुम्हारा गुरु बृहस्पति हूँ।

अपने गुरुका स्वर सुनकर महेन्द्रका मन प्रसन्नतासे खिल उठा। वे सूक्ष्मरूपको छोड़कर अपने ही रूपसे उनके निकट आये। उन्होंने भक्तिभावसे गुरुके चरणोंमें दण्डकी भाँति पड़कर सिरसे उन्हें प्रणाम किया और रोने लगे। उस समय महाभयभीत एवं रोते हुए इन्द्रको गुरुने सानन्द हृदयसे लगा लिया। फिर उनसे प्रायश्चित्तके लिये सोमयाग करवाकर उन्हें रमणीय रत्नमय सिंहासनपर बिठाया और पहलेसे चौगुना उत्तम ऐश्वर्य प्रदान किया। तदनन्तर सब देवता आकर उनकी सेवा करने लगे। शचीने पुनः अपने पति देवराज इन्द्रको प्राप्त कर लिया और निवासमन्दिरमें फूलोंकी सेजपर वह उनके साथ आनन्दपूर्वक सुखका अनुभव करने लगी। वत्स! इस प्रकार मैंने इन्द्रके दर्पके भञ्जन तथा शचीके सतीत्वकी रक्षाका प्रसङ्ग कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहते हो?

तदनन्तर नारदके पूछनेपर श्रीनारायणने इन्द्रदर्प-भङ्गके ही प्रसङ्गमें गौतमके द्वारा इन्द्रको शाप प्राप्त होनेकी बात बतायी। साथ ही यह भी कहा कि अहल्या पतिके शापसे पाषाण-शिला हो गयी। गौतमने शाप देकर अहल्यासे कहा— 'जाओ, जाओ। तुम विशाल वनमें पाषाणरूपिणी हो जाओ। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंकी अंगुलिका स्पर्श पाकर तत्काल पवित्र हो जाओगी। उसी पुण्यसे फिर मुझे पाओगी और मेरे पास चली आओगी। प्रिये! इस समय तो विशाल वनमें ही जाओ।' ऐसा कहकर वे मुनि तपस्याके लिये चले गये।

(अध्याय ६०-६१)

४९- भगवद्दर्शनकी सम्भावनासे अक्रूरके हर्षाल्लास एवं प्रेमावेशका वर्णन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६४१ अहल्याके उद्धार एवं श्रीराम-चरित्रका संक्षेपसे वर्णन नारदजीने पूछा—ब्रह्मन्! दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामने किस युगमें और किस प्रकार गौतमपत्नी अहल्याको शापसे मुक्त किया ? महाभाग ! आप रामावतारकी मनोहर एवं सुखदायिनी कथा संक्षेपसे कहिये; मेरे मनमें उसे सुननेके लिये उत्कण्ठा हो रही है। श्रीनारायणने कहा—नारद! त्रेतायुगमें ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे साक्षात् भगवान् विष्णुने दशरथसे उनकी पत्नी कौसल्याके गर्भसे सानन्द जन्म ग्रहण किया। कैकेयीसे भरत हुए, जो रामके समान ही गुणवान् थे और सुमित्राके गर्भसे लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नका जन्म हुआ। वे दोनों ही गुणोंके सागर थे। पिताद्वारा विश्वामित्रके साथ भेजे गये लक्ष्मणसहित श्रीराम सीताको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे रमणीया मिथिलापुरीमें गये। उसी मार्गमें पाषाणमयी स्त्रीको देखकर जगदीश्वर श्रीरामने विश्वामित्रसे उसके शिला होनेका कारण पूछा। श्रीरामका प्रश्न सुनकर महातपस्वी धर्मात्मा मुनि विश्वामित्रने वहाँ सारा रहस्य उन्हें बताया। उनके मुँहसे अहल्याके शिला होनेका कारण सुनकर अखिल भुवन-पावन श्रीरामने अपने चरणकी एक अंगुलिसे उस शिलाका स्पर्श किया। उनका स्पर्श पाते ही अहल्या पद्मगन्धा सुन्दरी नारीके रूपमें परिणत हो गयी और श्रीरामको आशीर्वाद देकर वह पतिके घरमें चली गयी। पत्नीको पाकर गौतमने भी श्रीरामचन्द्रजीको शुभाशीर्वाद प्रदान किया। तदनन्तर श्रीरामने मिथिलामें जाकर शिवका धनुष तोड़ा और सीताका पाणिग्रहण किया। सीतासे विवाह करके राजेन्द्र श्रीरामने परशुरामजीका दर्प चूर्ण किया और क्रीड़ा-कौतुक एवं मङ्गलाचारपूर्वक रमणीय अयोध्यापुरीको प्रस्थान किया। राजा दशरथने आदरपूर्वक सात तीर्थोंका जल मँगवाया और तत्काल ही मुनीश्वरोंको बुलाकर अपने पुत्र श्रीरामको राजा बनानेकी इच्छा की। श्रीराम सम्पूर्ण मङ्गलाचारसे सम्पन्न हो जब अधिवास- कर्म पूर्ण कर चुके, तब भरतकी माता कैकेयी ईर्ष्याजनित शोकसे विह्वल हो गयी। उसने राजा दशरथसे दो वर माँगे, जिन्हें देनेके लिये वे पहले प्रतिज्ञा कर चुके थे। उसने एक वरसे रामका वनवास माँगा और दूसरेके द्वारा भरतका राज्याभिषेक। महाराज दशरथ प्रेमसे मोहित होनेके कारण वर देना नहीं चाहते थे। यह देख श्रेष्ठ बुद्धिवाले श्रीराम धर्म और सत्यके भङ्ग होनेके भयसे महाराजसे बोले। श्रीरामने कहा—तात! सत्यसे बढ़कर कोई धर्म नहीं है और झूठसे बड़ा कोई पातक नहीं है। गङ्गाके समान दूसरा तीर्थ नहीं है; श्रीकेशवसे बढ़कर कोई देवता नहीं है; धर्मसे श्रेष्ठ बन्धु नहीं है और धर्मसे बढ़कर धन नहीं है। धर्मसे अधिक प्रिय और उत्तम कौन है? अतः आप यत्नपूर्वक अपने धर्मकी रक्षा कीजिये। स्वधर्मकी रक्षा करनेपर सदा और सर्वत्र मङ्गल होता है।

५०- श्रीराधाका श्रीकृष्णको अपने दुःस्वप्न सुनाना और उनके बिना अपनी दयनीय स्थितिका चित्रण करना, श्रीकृष्णका उन्हें सान्त्वना देना और आध्यात्मिक योगका श्रवण कराना

६४२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण यश, प्रतिष्ठा, प्रताप और परम आदरकी प्राप्ति होती है *। मैं चौदह वर्षोंतक गृह-सुखका परित्याग करके धर्मपूर्वक विचरता हुआ आपके सत्यकी रक्षाके लिये वनमें वास करूँगा। जो इच्छा या अनिच्छासे सत्य प्रतिज्ञा करके उसका पालन नहीं करता, वह अशौचका भागी होता है और वह अशौच उसके शरीरके भस्म होनेतक बना रहता है। जबतक चन्द्रमा और सूर्य रहते हैं, तबतक वह कुम्भीपाक नरकमें यातना भोगता है। तदनन्तर मानव-योनिमें उत्पन्न हो वह सात जन्मोंतक गूँगा और कोढ़ी होता है। ऐसा कहकर श्रीराम वल्कल और जटा धारण करके सीता और लक्ष्मणके साथ विशाल वनमें चले गये। मुने ! इधर महाराज दशरथने पुत्रशोकसे अपने शरीरको त्याग दिया। श्रीरामचन्द्रजी पिताके सत्यकी रक्षाके लिये वन-वनमें भ्रमण करने लगे। कालान्तरमें उस विशाल एवं घोर वनमें घूमती हुई रावणकी बहिन शूर्पणखा उधर आ निकली। उसने बड़े कौतूहलसे श्रीरामको देखा। उन्हें देखते ही वह कुलटा राक्षसी काम- वेदनासे पीड़ित हो गयी। उसके सारे अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया और वह मूर्च्छित हो गयी। फिर वह श्रीरामके पास गयी। शूर्पणखा सदा बने रहनेवाले यौवनसे युक्त, अत्यन्त प्रौढ़ और कामोन्मत्त थी। वह मनमें कामभाव ले श्रीरामसे मुस्कराती हुई बोली। शूर्पणखाने कहा- हे राम ! हे घनश्याम ! हे रूपधाम ! हे गुणसागर ! मेरा हृदय आपमें अनुरक्त हो गया है। आप एकान्त स्थानमें मुझे स्वीकार कीजिये। तदनन्तर श्रीराम तथा लक्ष्मणसे शूर्पणखाकी बातचीत हुई। अन्तमें लक्ष्मणने तीक्ष्ण धारवाले अर्धचन्द्राकार बाणसे उसकी नाक काट ली। उसका भाई खर-दूषण बड़ा बलवान् था। उसने आकर युद्ध किया और लक्ष्मणके अस्त्रसे सेनासहित मारा जाकर यमलोकको चला गया। चौदह हजार राक्षसों तथा खर-दूषणको मारा गया देख शूर्पणखाने रावणको फटकारा और सारा समाचार बताकर वह तत्काल पुष्करतीर्थमें चली गयी। वहाँ दुष्कर तपस्या करके उसने ब्रह्माजीसे वर प्राप्त किया। उस निराहार-तपस्विनी राक्षसीको दर्शन देकर सर्वज्ञ कृपासिन्धु ब्रह्माजीने उसके मनकी बात जान ली और इस प्रकार कहा। ब्रह्माजी बोले - वरानने ! श्रीराम दुर्लभ हैं। उन्हें तुम प्राप्त नहीं कर सकी हो। इसीलिये यह दुष्कर तपस्या कर रही हो। इसी तरह जितेन्द्रियोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा लक्ष्मणको भी प्राप्त करनेमें तुम्हें सफलता नहीं मिली है; अतः उधरसे निराश होकर तुम तपस्यामें लगी हो। तुम्हारी इस तपस्याका फल तुम्हें दूसरे जन्ममें मिलेगा। जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिके भी ईश्वर तथा प्रकृतिसे भी परे हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको तुम पतिरूपमें प्राप्त करोगी। ऐसा कहकर ब्रह्माजी सानन्द अपने धामको चले गये और शूर्पणखाने अपने शरीरको अग्निमें विसर्जित कर दिया। वही दूसरे जन्ममें कुब्जा हुई। शूर्पणखाके उकसानेसे मायावी राक्षसराज रावण क्रोधसे काँपने लगा। उसने मायाद्वारा सीताको हर लिया। सीताको आश्रममें न देख श्रीराम मूर्च्छित हो गये। तब उनके भाई लक्ष्मणने आध्यात्मिक ज्ञानकी चर्चा करके उन्हें सचेत किया। मुने ! तत्पश्चात् वे

  • न हि सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम्। न हि गङ्गासमं तीर्थं न देवः केशवात् परः ॥ नास्ति धर्मात् परो बन्धुर्नास्ति धर्मात् परं धनम्। धर्मात् प्रियः परः को वा स्वधर्मं रक्ष यत्नतः ॥ स्वधर्मे रक्षते तात शश्वत् सर्वत्र मङ्गलम्। यशस्यं सुप्रतिष्ठा च प्रतापः पूजनं परम् ॥ (६२। २१-२३)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

६४३

जानकीकी खोजके लिये दिन-रात शोकार्त हो गहन वन, पर्वत, कन्दरा, नद, नदी और मुनियोंके आश्रमोंमें घूमने लगे। सुदीर्घ कालतक अन्वेषण करनेपर भी जब उन्हें जानकीका पता न चला, तब भगवान् श्रीरामने स्वयं ही जाकर वानरराज सुग्रीवके साथ मित्रता की और वालीको बाणोंसे मारकर उनका राज्य सुग्रीवको दे दिया। यह सब उन्होंने अपने मित्रके प्रति की गयी प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये किया था। वानरराजने सीताका पता लगानेके लिये समस्त दिशाओंमें दूत भेजे और लक्ष्मणसहित श्रीराम सुग्रीवके यहाँ रहने लगे। श्रीरामने हनुमान्‌जीको प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर उन्हें अपनी परम दुर्लभ पदधूलि प्रदान की और सीताके लिये पहचानके रूपमें श्रेष्ठ एवं सुन्दर रत्नमयी मुद्रिका उनके हाथमें देकर अपना शुभ संदेश भी प्रदान किया, जो सीताकी जीवन-रक्षाका कारण बना। यह सब करनेके पश्चात् उन्होंने हनुमान्‌जीको उत्तम दक्षिण दिशामें भेजा। हनुमान्‌जी रुद्रकी कलासे प्रकट हुए थे। वे श्रीरामका संदेश ले सीताकी खोजके लिये लंकाको गये। वहाँ उन्होंने अशोकवाटिकामें सीताजीको देखा, जो शोकसे अत्यन्त कृश दिखायी देती थीं। अमावास्याको अत्यन्त क्षीण हुई चन्द्रकलाके समान वे उपवासके कारण बहुत ही दुबली-पतली हो गयी थीं और निरन्तर भक्तिपूर्वक 'राम-राम' का जप कर रही थीं। उनके सिरके बाल जटाओंका बोझ बन गये थे। अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णकी भाँति दमक रही थी। वे दिन-रात श्रीरामके चरणकमलोंका ध्यान किया करती थीं। शुद्ध भूमिपर सोती थीं। शुद्ध आचार-विचार तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाली पतिव्रता थीं। उनमें महालक्ष्मीके चिह्न विद्यमान थे। वे अपने तेजसे प्रकाशमान थीं। सम्पूर्ण तीर्थोंको पुण्य प्रदान करनेवाली थीं। उनमें दृष्टिमात्रसे समस्त भुवनोंको पवित्र करनेकी क्षमता थी। उस समय रोती हुई माता जानकीको देखकर पवननन्दन हनुमान्‌ने प्रसन्नतापूर्वक उनके हाथमें वह रत्नमयी मुद्रिका दे दी। धर्मात्मा वायुपुत्र सीताकी दशा देखकर उनके चरणकमलोंको पकड़कर रोने लगे। उन्होंने श्रीरामका वह संदेश सुनाया, जो सीताजीके जीवनकी रक्षा करनेवाला था।

हनुमान्‌जी बोले—मातः ! समुद्रके उस पार श्रीराम और लक्ष्मण इस राक्षसपुरीपर चढ़ाई करनेके लिये तैयार खड़े हैं। बलवान् वानरराज सुग्रीव श्रीरामके मित्र हो गये हैं। श्रीरामने वालीका वध करके अपने मित्र सुग्रीवको निष्कण्टक राज्य दिया है। साथ ही उन्हें उनकी पत्नी भी प्राप्त करा दी है, जिसे पहले वालीने हर लिया था। सुग्रीवने भी धर्मतः तुम्हारे उद्धारकी प्रतिज्ञा की है। उनके समस्त वानर तुम्हें खोजनेके लिये सब ओर गये हैं। मुझसे तुम्हारा मङ्गलमय समाचार पा कमलनयन श्रीराम गहरे सागरपर सेतु बाँधकर शीघ्र यहाँ आ पहुँचेंगे और पापी रावणको उसके पुत्र तथा बान्धवोंसहित मारकर अविलम्ब तुम्हारा उद्धार करेंगे। आज तुम्हारे प्रसादसे इस रत्नमयी लंकाको मैं बेखटके जलाकर भस्म कर दूँगा। तुम मुस्कराती हुई मेरे इस पराक्रमको देखो। सुव्रते ! मैं लंकाको वानरीके बच्चेकी भाँति समझता हूँ। समुद्रको मूत्रके समान और भूतलको पर्ईकी भाँति देखता हूँ। सेनासहित रावण मेरी दृष्टिमें चींटियोंके समूह-जैसा है। मैं आधे मुहूर्तमें अनायास ही उसका संहार कर सकता हूँ; परंतु इस समय श्रीरामकी प्रतिज्ञाकी रक्षाके लिये उसे नहीं मारूँगा। महाभागे ! तुम स्वस्थ एवं निश्चिन्त हो जाओ। मेरी स्वामिनि ! भयको त्याग दो।

वानरकी बात सुनकर सीता बारंबार फूट-फूटकर रोने लगीं। रामकी उन पतिव्रता पत्नीने भयभीत-सी होकर पूछा।

६४४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण सीता बोलीं—वत्स! क्या मेरे दारुण शोकसागरसे पीड़ित श्रीराम अभी जीवित हैं? मेरे प्राणनाथ कौसल्यानन्दन सकुशल हैं? जानकीके जीवनबन्धु इस समय शोकसे कृशकाय होकर कैसे हो गये हैं? मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतम कैसे आहार करते हैं? वे क्या खाते हैं? क्या सचमुच समुद्रके उस पार स्वयं सीतापति विद्यमान हैं? मेरे प्रभु शोकसे नष्ट न होकर क्या सचमुच लंकापर चढ़ाईके लिये तैयार खड़े हैं? जो स्वामीके लिये सदा दुःखरूप ही रही है, उसी मुझ पापिनी सीताको क्या वे स्मरण करते हैं? मेरे स्वामीने मेरे लिये कितना दुःख सहन किया है? जो पहले मिलनमें व्यवधान मानकर अपने कण्ठमें हार नहीं धारण करते थे, वे ही श्रीराम आज इतने दूर हैं! इस समय हम दोनोंके बीचमें सौ योजन विशाल समुद्र व्यवधान बनकर खड़ा है। क्या मैं कभी धर्म-कर्ममें संलग्न, धर्मिष्ठ, नितान्त शान्त करुणासागर प्रियतम भगवान् श्रीरामको देखूँगी? क्या पुनः प्रभुके चरणकमलोंकी सेवा कर सकूँगी? जो मूढ़ नारी पति-सेवासे वञ्चित है, उसका जीवन व्यर्थ है। जो मेरे धर्मपुत्र हैं और मेरे बिना शोकसागरमें मग्न हैं, मेरा अपहरण होनेसे जिनके अभिमानको गहरा आघात पहुँचा है, जो वीरोंमें श्रेष्ठ, धर्मात्मा और देवताके समान हैं; वे मेरे स्वामीके छोटे भाई देवर लक्ष्मण क्या सचमुच जीवित हैं? क्या यह सच है कि वे सदा मेरे उद्धारके लिये संनद्ध रहते हैं? क्या सचमुच प्राणोंसे भी अधिक प्रिय, धर्मात्मा, पुण्यात्मा तथा धन्यातिधन्य वत्स लक्ष्मणको मैं पुनः देखूँगी? मुने! सीताका यह वचन सुन उन्हें शुभ प्रत्युत्तर दे हनुमान्ने खेल-खेलमें ही लंकाको जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर वायुपुत्र कपिवर हनुमान् पुनः जनकनन्दिनीको धीरज दे वेगपूर्वक बिना किसी परिश्रमके उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी विराजमान थे। वहाँ उन्होंने माता मिथिलेशकुमारीका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। सीताका मङ्गलमय समाचार सुनकर श्रीरामचन्द्रजी रो पड़े। लक्ष्मण और सुग्रीव भी फूट-फूटकर रोने लगे। नारद! उस समय महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न समस्त वानर भी रोदन करने लगे। देवर्षे! तदनन्तर समुद्रमें सेतु बाँधकर छोटे भाई और वानर-सेनासहित रघुकुलनन्दन श्रीरामने शीघ्र ही युद्धके लिये तैयार हो लंकापर चढ़ाई कर दी। ब्रह्मन्! वहाँ युद्ध करके श्रीरामने बन्धु-बान्धवोंसहित रावणको मार डाला और शुभ वेलामें सीताका वहाँसे उद्धार किया। फिर सत्यपरायणा सीताको पुष्पक विमानपर बिठाकर वे क्रीड़ाकौतुक एवं मङ्गलाचारके साथ शीघ्रतापूर्वक अयोध्याकी ओर प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर भगवान् रामने सीताको हृदयसे लगा क्रीड़ा की। फिर सीता और रामने तत्काल विरह-ज्वालाको त्याग दिया। भूमण्डलपर श्रीराम सातों द्वीपोंके स्वामी हुए। उनके शासनकालमें सारी पृथ्वी आधि-व्याधिसे रहित हो गयी। श्रीरामके दो धर्मात्मा पुत्र हुए— कुश और लव। उन दोनोंके पुत्रों और पौत्रोंसे सूर्यवंशी क्षत्रियोंका विस्तार हुआ। वत्स नारद! इस प्रकार मैंने तुमसे मङ्गलमय श्रीरामचरित्रका वर्णन किया है। यह सुख देनेवाला, मोक्ष प्रदान करनेवाला, सारतत्त्व तथा भवसागरसे पार होनेके लिये जहाज है। (अध्याय ६२)

२- गोलोककी ब्रह्मज्योतिमें स्थित श्यामसुन्दर २६

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६४५ कंसके द्वारा रातमें देखे हुए दुःस्वप्नोंका वर्णन और उससे अनिष्टकी आशङ्का, पुरोहित सत्यकका अरिष्ट-शान्तिके लिये धनुर्यज्ञका अनुष्ठान बताना, कंसका नन्दनन्दनको शत्रु बताना और उन्हें व्रजसे बुलानेके लिये वसुदेवजीको प्रेरित करना, वसुदेवजीके अस्वीकार करनेपर अक्रूरको वहाँ जानेकी आज्ञा देना, ऋषिगण तथा राजाओंका आगमन भगवान् नारायण कहते हैं- नारद! इधर मथुरामें राजा कंस बुरे सपने देख विशेष चिन्तामें पड़कर अत्यन्त भयभीत हो उद्विग्न हो उठा। उसकी खाने-पीनेकी रुचि जाती रही। उसके मनमें किसी प्रकारकी उत्सुकता नहीं रह गयी। वह अत्यन्त दुःखी हो पुत्र, मित्र, बन्धु-बान्धव तथा पुरोहितको सभामें बुलाकर उनसे इस प्रकार बोला। कंसने कहा- मैंने आधी रातके समय जो बुरा सपना देखा है, वह बड़ा भयदायक है; इस सभामें बैठे हुए समस्त विद्वान्, बन्धु-बान्धव और पुरोहित उसे सुनें। मेरे नगरमें एक अत्यन्त वृद्धा और काले शरीरवाली स्त्री नाच कर रही है। वह लाल फूलोंकी माला पहने, लाल चन्दन लगाये तथा लाल वस्त्र धारण किये स्वभावतः अट्टहास कर रही है। उसके एक हाथमें तीखी तलवार है और दूसरेमें भयानक खप्पर। वह जीभ लपलपाती हुई बड़ी भयंकर दिखायी देती है। इसी तरह एक दूसरी काली स्त्री है, जो काले कपड़े पहने हुई है। देखनेमें महाशूद्री विधवा जान पड़ती है। उसके केश खुले हैं और नाक कटी हुई है। वह मेरा आलिङ्गन करना चाहती है। उसने मलिन वस्त्रखण्ड, रूखे केश तथा चूर्ण तिलक धारण कर रखे हैं। पुरोहित सत्यकजी! मैंने देखा है कि मेरे कपाल और छातीपर ताड़के पके हुए काले रंगके छिन्न-भिन्न फल बड़ी भारी आवाजके साथ गिर रहे हैं। एक मैला-कुचैला विकृत आकार तथा रूखे केशवाला म्लेच्छ मुझे आभूषण बनानेके निमित्त टूटी-फूटी कौड़ियाँ दे रहा है। एक पति-पुत्रवाली दिव्य सती स्त्रीने अत्यन्त रोषसे भरकर बारंबार अभिशाप दे भरे हुए घड़ेको फोड़ डाला है। यह भी देखा कि महान् रोषसे भरा हुआ एक ब्राह्मण अत्यन्त शाप दे मुझे अपनी पहनी हुई माला, जो कुम्हलाई नहीं थी और रक्त चन्दनसे चर्चित थी, दे रहा है। यह भी देखनेमें आया कि मेरे नगरमें एक- एक क्षण अङ्गार, भस्म तथा रक्तकी वर्षा हो रही है। मुझे दिखायी दिया कि वानर, कौए, कुत्ते, भालू, सूअर और गदहे विकट आकारमें भयानक शब्द कर रहे हैं। सूखे काष्ठोंकी राशि जमा है, जिसकी कालिमा मिटी नहीं है। अरुणोदयकी बेलामें मुझे बंदर और कटे हुए नख दृष्टिगोचर हुए। मेरे महलसे एक सती स्त्री निकली, जो पीताम्बर धारण किये, श्वेत चन्दनका अङ्गराग लगाये, मालतीकी माला धारण किये रत्नमय

५१- श्रीकृष्णको व्रजमें जाते देख राधाका विलाप एवं मूर्च्छा, श्रीहरिका उन्हें समझाना, श्रीराधाके सो जानेपर ब्रह्मा आदि देवताओंका आना और स्तुति करके श्रीकृष्णको मथुरा जानेके लिये प्रेरित करना, श्रीकृष्णका जाना, श्रीराधाका उठना और प्रियतमके लिये विलाप करके मूर्च्छित होना, श्रीकृष्णका लौटकर आना, रत्नमालाका श्रीकृष्णको राधाकी अवस्था बताना, श्रीकृष्णका राधाके लिये स्वप्नमें मिलनेका वरदान देकर व्रजमें जाना

६४६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके हाथमें क्रीड़ा-कमल शोभा पा रहा था और भालदेश सिन्दूर-बिन्दुसे सुशोभित था। वह रुष्ट हो मुझे शाप देकर चली गयी। मुझे अपने नगरमें कुछ ऐसे पुरुष प्रवेश करते दिखायी दिये, जिनके हाथोंमें फंदा था। उनके केश खुले हुए थे। वे अत्यन्त रूखे और भयंकर जान पड़ते थे। घर-घरमें एक नंगी स्त्री मन्द मुसकानके साथ नाचती दिखायी देती है, जिसके केश खुले हैं और आकार बड़ा विकट है। एक नंगी विधवा महाशूद्री, जिसकी नाक कटी हुई है और जो अत्यन्त भयंकर है, मेरे अङ्गोंमें तेल लगा रही है। अतिशय प्रातःकालमें मैंने कुछ ऐसी विचित्र स्त्रियाँ देखीं, जो बुझे हुए अङ्गार (कोयले) लिये हुए थीं। उनके शरीरपर कोई वस्त्र नहीं था तथा वे सम्पूर्ण अङ्गोंमें भस्म लगाये हुए मुस्करा रही थीं। सपनेमें मुझे नृत्य-गीतसे मनोहर लगनेवाला विवाहोत्सव दिखायी दिया। कुछ ऐसे पुरुष भी दृष्टिगोचर हुए, जिनके कपड़े और केश भी लाल थे। एक नंगा पुरुष दीखा, जो देखनेमें भयंकर था, जो कभी रक्त-वमन करता, कभी नाचता, कभी दौड़ता और कभी सो जाता था। उसके मुखपर सदा मुस्कराहट दिखायी देती थी। बन्धुओ! एक ही समय आकाशमें चन्द्रमा और सूर्य दोनोंके मण्डलपर सर्वग्रास ग्रहण लगा दृष्टिगोचर हुआ है। पुरोहितजी! मैंने स्वप्नमें उल्कापात, धूमकेतु, भूकम्प, राष्ट्र-विप्लव, झंझावात और महान् उत्पात देखा है। वायुके वेगसे वृक्ष झोंके खा रहे थे। उनकी डालियाँ टूट-टूटकर गिर रही थीं। पर्वत भी भूमिपर ढहे दिखायी देते थे। घर-घरमें ऊँचे कदका एक नंगा पुरुष नाच रहा था, जिसका सिर कटा हुआ था। उस भयानक पुरुषके हाथमें नरमुण्डोंकी माला दिखायी देती थी। सारे आश्रम जलकर अङ्गारके भस्मसे भर गये थे और सब लोग चारों ओर हाहाकार करते दिखायी देते थे।

नारद! यों कहकर राजा कंस सभामें चुप हो गया। वह स्वप्न सुनकर सब भाई-बन्धु सिर नीचा किये लंबी साँस खींचने लगे। अपने यजमान कंसके शीघ्र होनेवाले विनाशको जानकर पुरोहित सत्यक तत्काल अचेत-से हो गये। राजभवनकी स्त्रियाँ तथा कंसके माता-पिता शोकसे रोने लगे। सबको यह विश्वास हो गया कि अब शीघ्र ही कंसका विनाशकाल स्वयं उपस्थित होनेवाला है।

**श्रीनारायण कहते हैं—**मुने! बुद्धिमान् पुरोहित सत्यक शुक्राचार्यके शिष्य थे। उन्होंने सब बातोंपर विचार करके कंसके लिये हितकी बात बतायी।

**सत्यक बोले—**महाभाग! भय छोड़ो। मेरे रहते तुम्हें भय किस बातका है? महेश्वरका यज्ञ करो, जो समस्त अरिष्टोंका विनाश करनेवाला है। इस महेश्वर-यागका नाम है—धनुर्यज्ञ, जिसमें बहुत-सा अन्न खर्च होता है और बहुत दक्षिणा बाँटी जाती है। वह यज्ञ दुःस्वप्नोंका विनाश तथा शत्रुभयका निवारण करनेवाला है। उस यज्ञसे आध्यात्मिक, आधिदैविक और उत्कट आधिभौतिक—इन तीन तरहके उत्पातोंका खण्डन होता है। साथ ही वह ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाला है। यज्ञ समाप्त होनेपर समस्त सम्पदाओंके दाता भगवान् शंकर प्रत्यक्ष दर्शन देते और ऐसा वर प्रदान करते हैं, जिससे जरा और मृत्युका निवारण हो जाता है। पूर्वकालमें महाबली बाण, नन्दी, परशुराम तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ भल्लने इस यज्ञका अनुष्ठान किया था। पहले भगवान् शिवने इस यज्ञसे संतुष्ट होकर यह दिव्य धनुष नन्दीश्वरको दिया था। धर्मात्मा नन्दीश्वरने बाणासुरको दिया। फिर यज्ञ करके महासिद्ध हुए बाणासुरने पुष्करतीर्थमें यह धनुष परशुरामजीको अर्पित कर दिया। कृपानिधान परशुरामजीने कृपापूर्वक अब तुमको यह धनुष दे दिया है। नरेश्वर! यह धनुष

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६४७

बड़ा ही कठोर (मजबूत) है। इसकी लंबाई एक सहस्र हाथकी है। खींचनेपर यह दस हाथतक फैलता है। इसका भगवान् शंकरकी इच्छासे निर्माण हुआ है। पशुपतिका यह पाशुपत धनुष जुते हुए रथके द्वारा भी कठिनाईसे ही ढोया जाता है। भगवान् नारायणदेवको छोड़कर अन्य सब लोग कभी इसे तोड़ नहीं सकते। भगवान् शंकरके इस कल्याणकारी यज्ञमें तुम शीघ्र ही इस धनुषकी पूजा करो और शुभ कर्ममें भेजनेयोग्य निमन्त्रण सबके पास भेज दो। नरेश्वर! इस यज्ञमें यदि धनुष टूट जायगा तो यजमानका नाश होगा, इसमें संशय नहीं है। धनुष टूटनेपर निश्चय ही यज्ञ भी भङ्ग हो जाता है। जब यज्ञ-कर्म सम्पन्न ही नहीं होगा तो उसका फल कौन देगा? महामते! इस धनुषके मूलभागमें ब्रह्मा, मध्यभागमें स्वयं नारायण और अग्रभागमें उग्र प्रतापशाली महादेवजी प्रतिष्ठित हैं। इस धनुषमें तीन विकार हैं तथा यह श्रेष्ठ रत्नोंद्वारा जटिल है। ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक प्रचण्ड मार्तण्डकी प्रभाको यह धनुष अपनी दिव्य दीप्तिसे दबा देता है। राजन्! महाबली अनन्त, सूर्य तथा कार्तिकेय भी इस धनुषको झुकानेमें समर्थ नहीं हैं; फिर दूसरेकी तो बात ही क्या है? पूर्वकालमें त्रिपुरारि शिवने इसीके द्वारा त्रिपुरासुरका वध किया था। तुम इस महोत्सवके लिये बिना किसी भयके स्वेच्छापूर्वक माङ्गलिक कार्य आरम्भ करो।

सत्यककी यह बात सुनकर चन्द्रवंशकी वृद्धि करनेवाले कंसने सभी कार्योंमें सदा यजमानका हित चाहनेवाले पुरोहितजीसे कहा।

**कंस बोला—**पुरोहितजी! वसुदेवके घरमें मेरा वध करनेवाला एक कुलनाशक पुत्र उत्पन्न हुआ है, जो नन्दके भवनमें नन्दनन्दन होकर स्वच्छन्दतापूर्वक पालित-पोषित हो रहा है। उस बलवान् बालकने मेरे बुद्धिमान् मन्त्रियों, शूरवीर बान्धवों तथा पवित्र बहिन पूतनाको मार डाला है। वह इच्छानुसार अपने बलको बढ़ा लेता है। उसने गोवर्द्धन पर्वतको एक हाथपर ही धारण कर लिया था और शूरवीर महेन्द्रको भी पराजित कर दिया था। उसने ब्रह्माजीको समस्त चराचर जगत्‌का ब्रह्मरूपमें दर्शन कराया था तथा बालकों और बछड़ोंके कृत्रिम समुदायकी रचना कर ली थी। सत्यकजी! उस बलवान् बालकका वध करनेके लिये ही कोई सलाह दीजिये। निश्चय ही इस भूतलपर, स्वर्ग और पातालमें एवं तीनों लोकोंमें उसके सिवा दूसरा कोई मेरा शत्रु नहीं है। सर्वत्र जो श्रेष्ठ राजा हैं, वे मेरे प्रति बान्धवभाव रखते हैं। ब्रह्माजी और भगवान् शंकर तो तपस्वी हैं। उन्हें तपस्यासे ही छुट्टी नहीं है। रह गये सनातन भगवान् विष्णु; परंतु वे भी सबके आत्मा हैं और सबपर समान दृष्टि रखते हैं। यदि नन्दपुत्रको मार डालूँ तो तीनों लोकोंमें मेरा सम्मान बढ़ जायगा। मैं सार्वभौम सम्राट् एवं सातों द्वीपोंका महाराज हो जाऊँगा। स्वर्गमें जो इन्द्र हैं, वे भी दैत्योंसे परास्त होनेके कारण दुर्बल ही रहते हैं; अतः उनका वध करके मैं महेन्द्र हो जाऊँगा। इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होकर मैं सूर्यको, राजयक्ष्मासे ग्रस्त हुए अपने ही पूर्वपुरुष चन्द्रमाको तथा वायु, कुबेर और यमको भी निश्चय ही जीत लूँगा; अतः आप शीघ्र ही नन्द-व्रजमें जाइये और नन्द, नन्दनन्दन श्रीकृष्ण तथा उसके बलवान् भाई बलरामको भी अभी बुला लाइये।

कंसकी बात सुनकर सत्यकने हितकर, सत्य, नीतिका सारभूत, उत्तम एवं समयोचित वचन कहा।

**सत्यक बोले—**महाभाग! तुम नन्द-व्रजके अभीष्ट स्थानमें अक्रूर, उद्धव अथवा वसुदेवजीको भेजो।

सत्यककी बात सुनकर उसी सभामें स्वर्णसिंहासनपर बैठे हुए वसुदेवजीसे उसने कहा।

**राजेन्द्र कंस बोला—**मेरे प्रिय बन्धु

६४८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण वसुदेवजी ! आप नीतिशास्त्रके तत्त्वज्ञ और उपाय ढूँढ़ निकालनेमें चतुर हैं; अतः नन्द-व्रजमें अपने पुत्रके घर आप ही जाइये। वृषभानु, नन्दराय, बलराम, नन्दनन्दन श्रीकृष्ण तथा समस्त गोकुल- वासियोंको यज्ञमें यहाँ शीघ्र बुला लाइये। मेरे दूत समस्त राजाओं तथा मुनियोंको इसकी सूचना देनेके लिये चिट्ठी लेकर चारों दिशाओंमें जायँ। ब्रह्मन् ! राजाकी बात सुनकर वसुदेवजीके ओठ, तालु और कण्ठ सूख गये; वे व्यथित- हृदयसे बोले। वसुदेवजीने कहा-राजेन्द्र ! इस कार्यके लिये इस समय नन्द-व्रजमें मेरा जाना उचित नहीं होगा। मुझ वसुदेवके पुत्र अथवा नन्दनन्दनको इस यज्ञका समाचार मैं दूँ और अपने साथ बुलाकर लाऊँ-यह किसी दृष्टिसे उचित नहीं कहा जा सकता। यदि तुम्हारे यज्ञ-महोत्सवमें नन्दपुत्रका आगमन हुआ तो अवश्य ही तुम्हारे साथ उसका विरोध होगा; अतः मैं उस बालकको बुलाकर यहाँ युद्ध करवाऊँ - यह मेरी दृष्टिमें श्रेयस्कर नहीं है। इसमें उस बालककी और तुम्हारी भी हानि हो सकती है। यदि वह बालक मारा गया तो सब लोग यही कहेंगे कि पिताने ही साथ ले जाकर कृष्णको मरवा दिया और यदि तुम्हें कुछ हो गया, तब लोग कहने लगेंगे कि वसुदेवने अपने पुत्रके द्वारा राजाको ही मौतके घाट उतार दिया। दोमेंसे एककी तत्काल मृत्यु होगी; यह निश्चित है। इसके सिवा और भी बहुत-से शूरवीर धराशायी होंगे; क्योंकि युद्ध कभी निरापद नहीं होता। मुने ! वसुदेवजीकी यह बात सुनकर राजेन्द्र कंसके नेत्र रोषसे लाल हो गये। वह तलवार लेकर उन्हें मार डालनेके लिये आगे बढ़ा। यह देख अत्यन्त बलवान् उग्रसेनने 'हाय! हाय!' करके अपने पुत्र महाराज कंसको तत्काल रोक दिया। रोषसे भरे हुए वसुदेव अपने आसनसे उठकर घरको चले गये। तब राजा कंसने अक्रूरको नन्द-व्रजमें जानेके लिये कहा और शीघ्र ही प्रत्येक दिशामें दूत भेजे। कंसका निमन्त्रण पाकर समस्त मुनि और नरेश आवश्यक सामानोंके साथ वहाँ आये। समस्त दिक्पाल, देवता, तपस्वी ब्राह्मण, सनकादि मुनि, पुलस्त्य, भृगु, प्रचेता, जाबालि और मार्कण्डेय आदि बहुत-से महान् ऋषिगण अपने शिष्योंसहित पधारे। हम दोनों भाई (नर और नारायण) भी वहाँ पहुँचे थे। राजाओंमें जरासंध, दन्तवक्र, द्रविड़-नरेश दाम्भिक, शिशुपाल, भीष्मक, भगदत्त, मुद्गल, धृतराष्ट्र, धूमकेश, धूमकेतु, शंबर, शल्य, सत्राजित, शंकु तथा अन्यान्य महाबली नरेश आये थे। इनके सिवा भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, महाबली अश्वत्थामा, भूरिश्रवा, शाल्व, कैकेय तथा कौशल भी पधारे थे। महाराज कंसने सबके साथ यथोचित सम्भाषण किया और पुरोहित सत्यकने यज्ञके दिन शुभ कृत्यका सम्पादन किया। (अध्याय ६३-६४)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६४९ भगवद्दर्शनकी सम्भावनासे अक्रूरके हर्षोल्लास एवं प्रेमावेशका वर्णन श्रीनारायण कहते हैं - नारद ! कंसकी बात सुनकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ शान्तस्वरूप अक्रूरके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; वे शान्तस्वभाव उद्धवसे बोले । अक्रूरने कहा- उद्धव ! आजकी रातका बड़ा सुन्दर प्रभात हुआ। आज मेरे लिये शुभ दिन प्राप्त हुआ है। निश्चय ही देवता, ब्राह्मण और गुरु मुझपर संतुष्ट हैं। करोड़ों जन्मोंके पुण्य आज स्वयं मुझे फल देनेको उपस्थित हैं। मेरा जो-जो शुभाशुभ कर्म था, वह सब मेरे लिये सुखद हो गया। कर्मसे बँधे हुए मुझ अक्रूरका बन्धन आज कर्मने ही काट दिया। मैं संसाररूपी कारागारसे मुक्त होकर श्रीहरिके धामको जा रहा हूँ। विद्वान् कंसने आज रोषवश मुझे मित्रार्थी बना दिया। इस नरदेवका क्रोध मेरे लिये वरदान-तुल्य हो गया। इस समय व्रजराजको लानेके लिये मैं व्रजमें जाऊँगा और वहाँ भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले परमपूज्य परमात्मा श्रीकृष्णके दर्शन करूँगा। नूतन जलधरके समान श्यामकान्ति, नीलकमलके सदृश नेत्र तथा कटिप्रदेशमें पीताम्बर धारण करनेवाले वे भगवान् या तो व्रजकी धूलिसे धूसरित होंगे या चन्दनसे चर्चित होंगे अथवा उनके अङ्गोंमें नवनीत लगा होगा और वे मुस्करा रहे होंगे। इस झाँकीमें मैं उनके दर्शन करूँगा। विनोदके लिये मुरली बजाते अथवा इधर-उधर झुंड-की-झुंड गौएँ चराते हुए या कहीं बैठे, चलते-फिरते अथवा सोते हुए उन मनोहर नन्दनन्दनको मैं देखूँगा; यह पूर्णतः निश्चित है। शुभ बेलामें आज भगवान्का भलीभाँति दर्शन करके जो सुख मिलेगा, उसके सामने राजाका आदेश क्या महत्त्व रखता है? ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि जिनके चरणकमलोंका निरन्तर ध्यान करते हैं तथा अनन्तविग्रह भगवान् अनन्त भी जिनका अन्त नहीं जानते हैं, देवता और संत भी जिनके प्रभावको सदा नहीं समझ पाते हैं, जिनकी स्तुति करनेमें देवी सरस्वती भी भयभीत एवं जडवत् हो जाती हैं, जिनकी सेवाके लिये महालक्ष्मी भी दासी नियुक्त की गयी हैं तथा जिनके चरणकमलोंसे उन सत्त्वरूपिणी गङ्गाका प्रादुर्भाव हुआ है, जो तीनों लोकोंसे उत्कृष्ट, जन्म-मृत्यु एवं जरारूप व्याधिको हर लेनेवाली और दर्शन एवं स्पर्शमात्रसे मनुष्योंके समस्त पातकोंको नष्ट कर देनेवाली हैं, त्रैलोक्यजननी, मूलप्रकृति ईश्वरी दुर्गतिनाशिनी देवी दुर्गा भी जिनके चरणकमलोंका ध्यान करती हैं, जिन स्थूलसे भी स्थूलतर महाविष्णुके रोमकूपोंमें असंख्य विचित्र ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं, वे भी जिन सर्वेश्वरके सोलहवें अंशरूप हैं, उन माया- मानवरूपधारी श्रीकृष्णको देखनेके लिये मैं व्रजमें जाता हूँ। बन्धु उद्धव! वे नन्दनन्दन सर्वरूप, सबके अन्तरात्मा, सर्वज्ञ, प्रकृतिसे परे, ब्रह्मज्योतिःस्वरूप, भक्तजनोंपर अनुग्रहके लिये दिव्य विग्रह धारण करनेवाले, निर्गुण, निरीह, निरानन्द, सानन्द, निराश्रय एवं परम परमानन्दस्वरूप हैं। उन्हीं स्वेच्छामय, सबसे परे विराजमान, सबके सनातन बीजरूप बालमुकुन्दका योगीजन नित्य-निरन्तर अहर्निश ध्यान करते रहते हैं। पहले पाद्मकल्पमें कमलजन्मा ब्रह्माजीने कमलपर बैठकर एक सहस्र मन्वन्तरोंतक श्रीकृष्ण- दर्शनके लिये तपस्या की थी। उन दिनों सर्वथा उपवासके कारण उनका पेट पीठमें सट गया था। सहस्र मन्वन्तर पूर्ण होनेपर उन्हें आदेश मिला कि 'फिर तपस्या करो, तब मुझे देखोगे।' उन्हें एक बार यह शब्दमात्र सुनायी दिया। इतनी बड़ी तपस्या करनेपर भी वे भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन न पा सके। तब उन्होंने पुनः उतने ही समयतक तपस्या करके श्रीहरिका दर्शन और वरदान पाया। उद्धव ! ऐसे परमेश्वरको