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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

३१० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ ऊर्ध्वरेतस्सु = जिनमें वीर्यको सुरक्षित रखनेका विधान है, ऐसे तीन आश्रमोंमें; च = भी ( ब्रह्मविद्याका अधिकार है ); हि = क्योंकि; शब्दे = वेदमें ऐसा कहा है ( इसलिये ब्रह्मविद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है )। व्याख्या—जैसे गृहस्थ-आश्रममें ब्रह्मविद्याके अनुष्ठानका अधिकार है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास इन तीनों आश्रमोंमें भी उसके अनुष्ठानका अधिकार है; क्योंकि वेदमें ऐसा ही वर्णन है। मुण्डकोपनिषद् ( १ । २ । ११ ) मे कहा है कि— तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः । सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥ 'जो वनमें रहनेवाले ( वानप्रस्थ ), शान्त स्वभाववाले विद्वान् गृहस्थ तथा भिक्षासे निर्वाह करनेवाले ब्रह्मचारी और संन्यासी तप एवं श्रद्धाका सेवन करते हैं, वे रजोगुणसे रहित साधक सूर्यके मार्गसे वहाँ चले जाते हैं, जहाँ जन्म-मृत्युसे रहित नित्य अविनाशी परम पुरुष निवास करता है।' इसके सिवा, अन्य श्रुतियोंमें भी इसी प्रकारका वर्णन मिलता है। (प्र० उ० १ । १०) इससे यह सिद्ध होता है कि विद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है; क्योंकि संन्यासीके लिये वैदिक यज्ञादि कर्मोंका विधान नहीं है और उनका ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। यदि ब्रह्मविद्याको कर्मका अङ्ग मान लिया जाय तो संन्यासीके द्वारा उसका अनुष्ठान कैसे सम्भव होगा ? सम्बन्ध—अब जैमिनिकी ओरसे पुनः शङ्का उपस्थित की जाती है— परामर्शं जैमिनिरचोदना चापवदति हि ॥ ३ । ४ । १८ ॥ जैमिनिः = आचार्य जैमिनि; परामर्शम् = उक्त श्रुतिमें संन्यास-आश्रमका अनुवादमात्र मानते हैं, विधि नहीं; हि = क्योंकि; अचोदना = उसमें विधिसूचक क्रियापदका प्रयोग नहीं है; च = इसके सिवा; अपवदति = श्रुति संन्यासका अपवाद ( निषेध ) भी करती है। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कथन है कि संन्यास-आश्रम अनुष्ठेय ( पालन करनेयोग्य ) नहीं है। गृहस्थ-आश्रममें रहकर कर्मानुष्ठान करते हुए ही मनुष्यका परमपुरुषार्थ सिद्ध हो सकता है। पूर्वोक्त श्रुतिमें 'भैक्ष्यचर्यां चरन्तः' इन पदोंके द्वारा संन्यासका अनुवादमात्र ही हुआ है, विधि नहीं है; क्योंकि वहाँ विधिसूचक क्रियापदका प्रयोग नहीं है। इसके सिवा, श्रुतिने स्पष्ट शब्दोंमें

सूत्र १८-१९ ] अध्याय ३ ३११

सूत्र १८-१९ ] अध्याय ३ ३११ संन्यासका निषेध भी किया है। जैसे—'जो अग्निहोत्रका त्याग करता है, वह देवोंके वीरोंको मारनेवाला है' (तै० सं० १ । ५ । २ । १)। 'आचार्यको उनकी इच्छाके अनुरूप धन दक्षिणामें देकर संतान-परम्पराको बनाये रक्खो, उसका उच्छेद न करो।' (तै० उ० १ । ११) । इन वचनोंद्वारा संन्यास- आश्रमका प्रतिवाद होनेसे यही सिद्ध होता है कि संन्यास-आश्रम आचरणमें लाने- योग्य नहीं है। अतएव संन्यासीका ब्रह्मविद्यामें अधिकार बताकर यह कहना कि 'विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है।' ठीक नहीं है। सम्बन्ध—इसके उत्तरमें सूत्रकार अपना मत व्यक्त करते हैं— अनुष्ठेयं बादरायणः साम्यश्रुतेः ॥ ३ । ४ । १९ ॥ बादरायणः = व्यासदेव कहते हैं कि; अनुष्ठेयम् = गृहस्थकी ही भाँति अन्य आश्रमोंके धर्मोंका अनुष्ठान भी कर्तव्य है; साम्यश्रुतेः = क्योंकि श्रुतिमें समस्त आश्रमोंकी और उनके धर्मोंकी कर्तव्यताका समानरूपसे प्रतिपादन किया गया है। व्याख्या—जैमिनिके उक्त कथनका उत्तर देते हुए वेदव्यासजी कहते हैं— उक्त श्रुतिमें चारों आश्रमोंका अनुवाद है; परन्तु अनुवाद भी उसीका होता है, जो अन्यत्र विहित हो। दूसरी-दूसरी श्रुतियोंमें जैसे गृहस्थ-आश्रमका विधान प्राप्त होता है, उसी प्रकार अन्य आश्रमोंका विधान भी उपलब्ध होता है, इसमें कोई अन्तर नहीं है। अतः जिस प्रकार गृहस्थ-आश्रमके धर्मोंका अनुष्ठान उचित है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यासके धर्मोंका भी अनुष्ठान करना चाहिये। पूर्वपक्षीने जिन श्रुतियोंके द्वारा संन्यासका निषेध सूचित किया है, उनका तात्पर्य दूसरा ही है। वहाँ अग्निहोत्रका त्याग न करनेपर जोर दिया गया है। यह बात उन्हीं लोगोंपर लागू होती है, जो उसके अधिकारी हैं। गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रममें रहते हुए कभी अग्निहोत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। यही बताना श्रुतिको अभीष्ट है। इसी प्रकार संतानपरम्पराका उच्छेद न करनेका आदेश भी उन्हींके लिये है, जो पूर्णतः विरक्त नहीं हुए है। विरक्तके लिये तो तत्काल संन्यास लेनेका विधान श्रुतिमें स्पष्ट देखा जाता है। यथा 'यदहरेव विरजेत्तद- हरेव प्रव्रजेत्।' अर्थात् 'जिस दिन वैराग्य हो, उसी दिन संन्यास ले ले।' अतः संन्यासीका भी ब्रह्मविद्यामे अधिकार होनेके कारण विद्याको कर्मका अङ्ग न मानना ही ठीक है।

३१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— विधिर्वा धारणवत् ॥ ३ । ४ । २० ॥ वा=अथवा; विधिः=उक्त मन्त्रमें अन्य आश्रमोंकी विधि ही माननी चाहिये, अनुवाद नहीं; धारणवत्=जैसे समिधा-धारण-सम्बन्धी वाक्यमे 'ऊपर धारण' की क्रियाको अनुवाद न मानकर विधि ही माना गया है । व्याख्या—जैसे 'अधस्तात् समिधं धारयन्ननुद्रवेदुपरि हि देवेभ्यो धारयति ।' अर्थात् 'स्रुग्दण्डके नीचे समिधा-धारण करके अनुद्रवण करे, किन्तु देवताओंके लिये ऊपर धारण करे।' इस वाक्यमे स्रुग्दण्डके अधोभागमे समिधा-धारणकी विधिके साथ एकवाक्यताकी प्रतीति होनेपर भी 'ऊपर धारण' की क्रियाको अपूर्व होनेके कारण विधि मान लिया गया है । उसी प्रकार पूर्वोक्त श्रुतिमे जो चारो आश्रमोंका सांकेतिक वर्णन है, उसे अनुवाद न मानकर विधि ही स्वीकार करना चाहिये । दूसरी श्रुतिमे आश्रमोंका विधान करनेवाले वचन स्पष्ट मिलते है । यथा—'ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य गृही भवेद् गृही भूत्वा वनी भवेद् वनी भूत्वा प्रव्रजेत् । यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा ।....यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत् ।' (जाबा० उ० ४) अर्थात् 'ब्रह्मचर्यको पूर्ण करके गृहस्थ होना चाहिये । गृहस्थसे वानप्रस्थ होकर उसके बाद संन्यासी होना उचित है । अथवा तीव्र इच्छा हो तो दूसरे प्रकारसे—ब्रह्मचर्यसे, गृहस्थसे या वानप्रस्थसे संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिये । जिस दिन पूर्ण वैराग्य हो जाय, उसी दिन संन्यास ले लेना चाहिये ।' इसी प्रकार अन्यान्य श्रुतियोंमे भी आश्रमोंके लिये विधि देखी जाती है । अतः जहाँ केवल सांकेतिकरूपसे आश्रमोंका वर्णन हो, वहाँ संकेतसे ही उनकी विधि भी मान लेनी चाहिये । यहाँ यह बात भी ध्यानमें रखनी चाहिये कि कर्मत्यागका निषेध करनेवाली जो श्रुति है, वह कर्मासक्त मनुष्योंके लिये ही है; विरक्तके लिये नहीं है । इस विवेचनसे यह सिद्ध हो गया कि कर्मों- के बिना केवल ज्ञानसे ही ब्रह्मप्राप्तिरूप परम पुरुषार्थकी सिद्धि होती है । सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें संन्यास-आश्रमकी सिद्धि की गयी । अब यज्ञकर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिमें की जानेवाली जो उपासना है, उसकी तथा उसके लिये बताये हुए गुणोंकी विधेयता सिद्ध करके विद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है यह सिद्ध करनेके उद्देश्यसे अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—

सूत्र २०–२२ ] अध्याय ३ ३१३

सूत्र २०–२२ ] अध्याय ३ ३१३ स्तुतिमात्रमुपादानादिति चेन्नापूर्वत्वात् ॥ ३ । ४ । २१ ॥ चेत्=यदि कहो; उपादानात्=उद्गीथ आदि उपासनाओमे जो उनकी महिमाके सूचक वचन है, उनमे कर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिको लेकर वैसा वर्णन किया गया है, इसलिये; स्तुतिमात्रम्=वह सब, केवल उनकी स्तुतिमात्र है; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; अपूर्वत्वात्=क्योकि वे उपासनाएँ और उनके रसतमत्व आदि गुण अपूर्व है । व्याख्या—यदि कहो कि 'यह जो उद्गीथ है, वह रसोका भी उत्तम रस है, परमात्माका आश्रयस्थान और पृथिवी आदि रसोमे आठवाँ सर्वश्रेष्ठ रस है ।' ( छा० उ० १ । १ । ३ ) इस प्रकारसे जो उद्गीथके विषयमे वर्णन है, वह केवल स्तुतिमात्र है, क्योकि यज्ञके अङ्गभूत उद्गीथको लेकर ऐसा कहा गया है । इसी प्रकार सभी कर्माङ्गभूत उपासनाओमे जिन-जिन विशेष गुणोका वर्णन है, वह सब उस-उस अङ्गकी स्तुतिमात्र है, इसलिये विद्या कर्मका अङ्ग है; तो यह कहना उचित नहीं है, क्योंकि वे उपासनाएँ और उनके सम्बन्धसे बताये हुए गुण अपूर्व है । जो अन्य किसी प्रमाणसे प्राप्त न हो, उसे अपूर्व कहते हैं । इन उपासनाओ और उनके गुणोंका न तो अन्यत्र कहीं वर्णन है और न अनुमान आदिसे ही उनका ज्ञान होता है; अतः उन्हे अपूर्व माना गया है, इसलिये यह कथन स्तुतिके लिये नहीं, किन्तु उद्गीथ आदिको प्रतीक बनाकर उसमे उपास्यदेवकी भावना करनेके लिये स्पष्ट प्रेरणा देनेवाला विधिवाक्य है । अतः विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है । सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको पुष्ट करते हैं— भावशब्दाच्च ॥ ३ । ४ । २२ ॥ च=इसके सिवा; ( उस प्रकरणमे ) भावशब्दात्=इस प्रकार उपासना करनी चाहिये इत्यादि विधिवाचक शब्दोका स्पष्ट प्रयोग होनेके कारण भी ( यही बात सिद्ध होती है ) । व्याख्या—केवल अपूर्व होनेसे ही उसे विधि-वाक्य माना जाता हो, ऐसी बात नहीं है । उस प्रकरणमे 'उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये' ( छा० उ० १ । १ । १ ) 'सामकी उपासना करनी चाहिये' ( छा० उ० २ । २ । १ ) इत्यादि रूपसे अत्यन्त स्पष्ट विधिसूचक शब्दोंका प्रयोग भी है । जैसे उनकी

३१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ अपूर्व विधि है, उसी प्रकार उन-उन उपासनाओंका अपूर्व फल भी बतलाया गया है ( छा० उ० १ । १ । ७; १ । ७ । ९ और २ । २ । ३ ) । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि वह कथन कर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिकी स्तुतिके लिये नहीं है, उनको प्रतीक बनाकर उपासनाका विधान करनेके लिये है और इसीलिये विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है । सम्बन्ध—भिन्न-भिन्न प्रकरणोंमें जो आख्यायिकाओंका ( इतिहासोंका ) वर्णन है, उसका क्या अभिप्राय है? इसका निर्णय करके विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है यह सिद्ध करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— पारिप्लवार्था इति चेन्न विशेषितत्वात् ॥ ३ । ४ । २३ ॥ चेत् = यदि कहो; पारिप्लवार्थाः = उपनिषदोंमे वर्णित आख्यायिकाएँ पारिप्लव नामक कर्मके लिये है; इति न = तो यह ठीक नहीं है; विशेषितत्वात् = क्योंकि पारिप्लव-कर्ममे कुछ ही आख्यायिकाओंको विशेषरूपसे ग्रहण किया गया है । व्याख्या—‘उपनिषदोंमे जो यम और नचिकेता, देवता और यक्ष, मैत्रेयी और याज्ञवल्क्य, प्रतर्दन और इन्द्र, जानश्रुति और रैक तथा याज्ञवल्क्य और जनक आदिकी कथाएँ आती हैं; वे यज्ञ-सम्बन्धी पारिप्लवनामक कर्मकी अङ्गभूत है; क्योकि ‘पारिप्लवमाचक्षीत’ (‘पारिप्लव’ नामक वैदिक उपाख्यान कहे) इस विधि-वाक्यद्वारा श्रुतिमे उसका स्पष्ट विधान किया है । अश्वमेधयागमे जो रात्रिके समय कुटुम्बसहित बैठे हुए राजाको अध्वर्यु वैदिक उपाख्यान सुनाता है, वही ‘पारिप्लव’ कहलाता है । इस पारिप्लव कर्मके लिये ही उपर्युक्त कथाएँ हैं ।’ ऐसा यदि कोई कहे तो यह ठीक नहीं है; क्योकि पारिप्लवका प्रकरण आरम्भ करके श्रुतिने ‘मनुर्वैवस्वतो राजा’ इत्यादि वाक्योंद्वारा कुछ विशेष उपाख्यानोंको ही वहाँ सुनानेयोग्य कहा है । उनमे ऊपर बतायी हुई उपनिषदोंकी कथाएँ नहीं आती है । अतः वे पारिप्लव कर्मकी अङ्गभूत नहीं है । वे सब आख्यान ब्रह्मविद्याको भलीभाँति समझानेके लिये कहे हुए ब्रह्मविद्याके ही अङ्ग हैं । इसीलिये इन सब आख्यानोंका विशेष माहात्म्य बतलाया गया है ( क० उ० १ । ३ । १६ ) । सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको दृढ़ करते हैं—

सूत्र २३—२५ ] अध्याय ३ ३१५

सूत्र २३—२५ ] अध्याय ३ ३१५ तथा चैकवाक्यतोपबन्धात् ॥ ३ । ४ । २४ ॥ तथा च=इस प्रकार उन आख्यायिकाओको पारिप्लवार्थक न मानकर विद्याका ही अङ्ग मानना चाहिये; एकवाक्यतोपबन्धात्=क्योंकि इन उपाख्यानो- की वहाँ कही हुई विद्याओके साथ एकवाक्यता देखी जाती है । व्याख्या-इस प्रकार उन कथाओको पारिप्लवकर्मका अङ्ग न मानकर वहाँ कही हुई विद्याओका ही अङ्ग मानना उचित है; क्योंकि सन्निकट होनेसे इन विद्याओंके साथ ही इनका सम्बन्ध हो सकता है । विद्यामे रुचि उत्पन्न करने तथा परब्रह्मके स्वरूपका तत्त्व सरलतासे समझानेके लिये ही इन कथाओका उपयोग किया गया है । इस प्रकार इनका उन प्रकरणोमे वर्णित विद्याओके साथ एक- वाक्यतारूप सम्बन्ध है, इसलिये ये सब आख्यान ब्रह्मविद्याके ही अङ्ग है, कर्मोंके नहीं; ऐसा मानना ही ठीक है । सम्बन्ध-यहाँतक यह बात सिद्ध की गयी कि ब्रह्मविद्या यज्ञादि कर्मोंका अङ्ग नहीं है तथा वह स्वयं बिना किसीकी सहायताके परमपुरुषार्थको सिद्ध करनेमें समर्थ है। अब पुनः इसीका समर्थन करते हुए इस प्रकरणके अन्तमे कहते हैं— अतएव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ॥ ३ । ४ । २५ ॥ च=तथा; अतएव=इसीलिये; अग्नीन्धनाद्यनपेक्षा=इस ब्रह्मविद्यारूप यज्ञमें अग्नि, समिधा, घृत आदि पदार्थोंकी आवश्यकता नहीं है । व्याख्या-यह ब्रह्मविद्यारूप यज्ञ अपना ध्येय सिद्ध करनेमे सर्वथा समर्थ है। यह पूर्ण होते ही स्वयं परमात्माका साक्षात्कार करा देता है । इसीलिये इस यज्ञमे अग्नि, समिधा, घृत आदि भिन्न-भिन्न पदार्थोंका विधान न करके केवल- मात्र एक परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका ही प्रतिपादन किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीतामें भी भगवान् श्रीकृष्णने इस बातका समर्थन इस प्रकार किया है— ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ (४।२४) 'उस ब्रह्मचिन्तनरूप यज्ञमे भिन्न-भिन्न उपकरण और सामग्री आवश्यक नहीं होती, किन्तु उसमे तो स्रुवा भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप अग्निमे ब्रह्मरूप होताद्वारा ब्रह्मरूप हवनक्रिया की जाती है, उस ब्रह्मचिन्तनरूप कर्ममे

प्रकरण आरम्भ किया जाता है-

३१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ समाहित हुए साधकद्वारा जो प्राप्त किया जानेवाला फल है, वह भी ब्रह्म ही है।' इस प्रकार यह ब्रह्मविद्या उस परमपुरुषार्थकी सिद्धिमे सर्वथा स्वतन्त्र होनेके कारण कर्मकी अङ्गभूत नहीं हो सकती। सम्बन्ध-यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि क्या ब्रह्मविद्याका किसी भी यज्ञ-यागादि अथवा शम-दमादि कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नही है, क्या इसमें किसी भी कर्मकी आवश्यकता नही है ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है- सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ॥ ३ । ४ । २६ ॥ च=इसके सिवा; सर्वापेक्षा=विद्याकी उत्पत्तिके लिये समस्त वर्णाश्रमोचित कर्मोंकी आवश्यकता है; यज्ञादिश्रुतेः = क्योकि यज्ञादि कर्मोंको ब्रह्मविद्यामे हेतु बतानेवाली श्रुति है; अश्ववत् = जैसे घोड़ा योग्यतानुसार सवारीके काममे ही लिया जाता है, प्रासादपर चढ़नेके कार्यमे नहीं; उसी प्रकार कर्म विद्याकी उत्पत्तिके लिये अपेक्षित है, मोक्षके लिये नहीं। व्याख्या-'यह सर्वेश्वर है, यह समस्त प्राणियोका स्वामी है' इत्यादि वचनोसे परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करके श्रुतिमे कहा है कि 'इस परमेश्वरको ब्राह्मणलोग निष्कामभावसे किये हुए स्वाध्याय, यज्ञ, दान और तपके द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं। इसीको जानकर मनुष्य मननशील होता है, इस संन्यासियोके लोकको पानेकी इच्छासे मनुष्यगण संन्यास ग्रहण करते है।' इत्यादि (बृह० उ० ४ । ४।२२)। तथा दूसरी श्रुतिमे भी कहा है कि 'जिस परमपदका सब वेद बार-बार प्रतिपादन करते है, समस्त तप जिसका लक्ष्य कराते है अर्थात् जिसकी प्राप्तिके साधन है तथा जिसको चाहनेवाले लोग ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, उस पदको मैं तुझे संक्षेपमे कहता हूँ' (क० उ० १ । २ । १५) इत्यादि । श्रुतिके इन वचनोसे यह सिद्ध होता है कि परमात्माके तत्त्वको जाननेके लिये सभी वर्णाश्रमोचित कर्मोंकी आवश्यकता है। इसीलिये भगवान्ने भी गीता ( १८ । ५-६) में कहा है- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानिति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥

सूत्र २६-२७ ] अध्याय ३ ३१७

सूत्र २६-२७ ] अध्याय ३ ३१७ 'यज्ञ, दान और तप ये कर्म त्याज्य नहीं है। इनका अनुष्ठान तो करना ही चाहिये; क्योकि यज्ञ, दान और तप—ये मनीषी पुरुषोको पवित्र करनेवाले है। अर्जुन ! इनका तथा अन्य सब कर्मोंका भी अनुष्ठान फल और आसक्तिको त्यागकर ही करना चाहिये। यही मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है।' जिसका जैसा अधिकार है, उसीके अनुसार शास्त्रोमे वर्ण और आश्रम- सम्बन्धी कर्म बताये गये है। अतः यह समझना चाहिये कि सभी कर्म सब साधकोके लिये उपादेय नहीं होने, किन्तु श्रुतिमे बतलाये हुए ब्रह्मप्राप्तिके साधनोमेसे जिस साधनको लेकर जो साधक अग्रसर हो रहा है, उसे अपने वर्ण, आश्रम और योग्यतानुसार अन्य शास्त्रविहित कर्मोंका अनुष्ठान भी निष्कामभावसे करते रहना चाहिये। इसी उद्देश्यसे श्रुतिमे विकल्प दिखलाया गया है कि कोई तो गृहस्थमे रहकर यज्ञ, दान और तपके द्वारा उसे प्राप्त करना चाहता है, कोई संन्यास-आश्रममे रहकर उसे जानना चाहता है, कोई ब्रह्मचर्यके पालनद्वारा उसे पाना चाहता है और कोई ( वानप्रस्थमे रहकर ) केवल तपस्यासे ही उसे पानेकी इच्छा रखता है, इत्यादि । इस प्रकार ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये कर्म अत्यन्त आवश्यक हैं; परन्तु परमात्माकी प्राप्तिमे उनकी अपेक्षा नहीं है, ब्रह्मविद्यासे ही उस फलकी सिद्धि होती है। इसके लिये सूत्रकारने अश्वका दृष्टान्त दिया है। जैसे योग्यतानुसार घोडा सवारीके काममे लिया जाता है, प्रासादपर चढनेके कार्यमें नहीं, उसी प्रकार कर्म ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिमे सहायक है, ब्रह्मके साक्षात्कारमें नहीं। सम्बन्ध—परमात्माकी प्राप्तिके लिये क्या ऐसे विशेष साधन भी हैं, जो सभी वर्ण, आश्रम और योग्यतावाले साधकोंके लिये समानभावसे आवश्यक हों ? इस जिज्ञासापर कहते हैं -- शमदमाद्युपेतः स्यात्तथापि तु तद्विधेस्तदङ्गतया तेषामवश्यानुष्ठेयत्वात् ॥ ३ । ४ । २७ ॥ तथापि = अन्य कर्म आवश्यक न होनेपर भी ( साधकको ); शमदमा- द्युपेतः = शम, दम, तितिक्षा आदि गुणोसे सम्पन्न; स्यात् = होना चाहिये; तु = क्योंकि; तदङ्गतया = उस ब्रह्मविद्याके अङ्गरूपसे; तद्विधेः = उन शम-दमादिका विधान होनेके कारण; तेषाम् = उनका; अवश्यानुष्ठेयत्वात् = अनुष्ठान अवश्य कर्तव्य है। व्याख्या—श्रुतिमें पहले ब्रह्मवेत्ताके महत्त्वका वर्णन करके कहा गया है कि 'यह ब्रह्मवेत्ताकी महिमा नित्य है। यह न कर्मोंसे बढती है और न घटती है।

३१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ इस महिमाको जानना चाहिये । ब्रह्मवेत्ताकी महिमाको जाननेवाला पापकर्मोंसे लिप्त नहीं होता, इसलिये उस महिमाको जाननेवाला साधक शान्त ( अन्तः- करणका संयमी ), दान्त ( इन्द्रियोंका संयमी ), उपरत, तितिक्षु और ध्यानमे स्थित होकर आत्मामें ही आत्माको देखता है ।' ( बृह० उ० ४ । ४ । २३ ) इस प्रकार श्रुतिमे परमात्माको जाननेकी इच्छावाले साधकके लिये शम-दमादि साधनोंका ब्रह्मविद्याके अङ्गरूपसे विधान है, इस कारण उनका अनुष्ठान करना साधकके लिये परम आवश्यक हो जाता है । अतएव जिस साधकके लिये वर्ण, आश्रमके यज्ञादि कर्म आवश्यक न हों, उसको भी इन शम, दम, तितिक्षा, ध्यानाभ्यास आदि साधनोसे सम्पन्न अवश्य होना चाहिये । सूत्रमे आये हुए तथापि शब्दसे उपर्युक्त भाव तो निकलता ही है । उसके सिवा, यह भाव भी व्यक्त होता है कि अधिकांश साधकोंके लिये तो पूर्वसूत्रके कथनानुसार अपने- अपने वर्ण और आश्रमके लिये विहित सभी कर्म आवश्यक हैं, किन्तु वैराग्य और उपरति आदि किसी विशेष कारणसे किसी-किसीके लिये अन्य कर्म आवश्यक न हों तो भी शम-दमादिका अनुष्ठान तो अवश्य होना चाहिये । सम्बन्ध—श्रुतिमें कहीं-कहीं यह वर्णन भी मिलता है कि प्राणविद्याके रहस्यको जाननेवालेके लिये कोई अन्न अभक्ष्य नहीं होता ( छा० उ० ५ । २ । १ ) ( बृह० उ० ६ । १ । १४ ) । इसलिये साधकको अन्नके विषयमें भक्ष्याभक्ष्यका विचार रखना चाहिये या नही ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— सर्वान्नानुमतिश्च प्राणात्यये तद्दर्शनात् ॥ ३ । ४ । २८ ॥ सर्वान्नानुमतिः = सब प्रकारके अन्नको भक्षण करनेकी अनुमति; च = तो; प्राणात्यये = अन्न बिना प्राण न रहनेकी सम्भावना होनेपर ही है ( सदा नहीं ); तद्दर्शनात् = क्योकि श्रुतिमे वैसा ही आचार देखा जाता है । व्याख्या—श्रुतिमे एक कथा आती है—किसी समय कुरुदेशमे टिड्डियोके गिरने अथवा ओले पड़नेसे भारी अकाल पड़ गया । उस समय उषस्ति नामवाले एक विद्वान् ब्राह्मण अपनी पत्नी आटिकीके साथ इभ्य-ग्राममे रहते थे । वे दरिद्रताके कारण बड़ी दुर्गतिमे थे । कई दिनोसे भूखे रहनेके कारण उनके प्राण जानेकी सम्भावना हो गयी । तब वे एक महावतके पास गये । वह उड़द खा रहा था, उन्होंने उससे उड़द माँगा । महावतने कहा—'मेरे पास इतना ही

सूत्र २८—२९ ] अध्याय ३ ३१९

सूत्र २८—२९ ] अध्याय ३ ३१९ है, इसे मैंने पात्रमे रखकर खाना आरम्भ कर दिया है, यह जूठा अन्न आपको कैसे दूँ ?' उषस्ति बोले—'इन्हींमेसे मुझे दे दो।' महावतने वे उड़द उनको दे दिये और कहा 'यह जल भी प्रस्तुत है, पी लीजिये।' उषस्तिने कहा—'नहीं, यह जूठा है, इससे जूठा पानी पीनेका दोष लगेगा।' यह सुनकर महावत बोला— 'क्या ये उड़द जूठे नहीं थे?' उषस्तिने कहा—'इनको न खानेसे तो मेरा जीना असम्भव था, किन्तु जल तो मुझे अन्यत्र भी इच्छानुसार मिल सकता है।' इत्यादि (छा० उ० १ । १० । १ से ७ तक)। श्रुतिमे कही हुई इस कथाको देखनेसे यह सिद्ध होता है कि जिस समय अन्नके बिना मनुष्य जीवन धारण करनेमे असमर्थ हो जाय, प्राण बचनेकी आशा न रहे, ऐसी परिस्थितिमे ही अपवित्र या उच्छिष्ट अन्न भक्षण करनेके लिये शास्त्रकी सम्मति है, साधारण अवस्थामे नहीं; क्योकि उड़द खानेके बाद उषस्तिने जल-ग्रहण न करके इस बातको भली प्रकार स्पष्ट कर दिया है। अतएव वहाँ जो यह कहा है कि 'इस रहस्यको जाननेवालेके लिये कोई अभक्ष्य नहीं होता, उसका अभिप्राय प्राणविद्या- के ज्ञानकी स्तुति करनेमे है, न कि अभक्ष्य-भक्षणके विधानमे; क्योकि वैसा कहनेपर अभक्ष्यका निषेध करनेवाले शास्त्र-वचनोसे विरोध होगा। इसलिये साधारण परिस्थितिमें मनुष्यको अपने आचार तथा आहारकी पवित्रताके संरक्षण- सम्बन्धी नियमका त्याग कदापि नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—दूसरी युक्तिसे पुनः इसी बातको पुष्ट करते हैं— अबाधाच्च ॥ ३ । ४ । २९ ॥ अबाधात्=अन्य श्रुतिका बाध नहीं होना चाहिये, इस कारणसे, च=भी (यही सिद्ध होता है कि आपत्कालके सिवा, अन्य परिस्थितिमे आचारका त्याग नहीं करना चाहिये)। व्याख्या—'आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः'—आहारकी शुद्धिसे अन्तःकरणकी शुद्धि होती है (छा० उ० ७। २६। २), इत्यादि जो भक्ष्याभक्ष्यका विचार करने- वाले शास्त्र-वचन हैं, उनके साथ एकवाक्यता करनेके लिये उनका दूसरी श्रुतिके द्वारा बाध (विरोध) होना उचित नहीं है। इस कारणसे भी आपत्तिकालके सिवा, साधारण अवस्थामे भक्ष्याभक्ष्य-विचार एवं अभक्ष्यके त्यागरूप आचारका त्याग नहीं करना चाहिये।

३२० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः इसी बातको सिद्ध करते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ ३ । ४ । ३० ॥ अपि च=इसके सिवा; स्मर्यते=स्मृति भी इसी बातका समर्थन करती है । व्याख्या—मनुस्मृतिमें कहा है कि— जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः । आकाशमिव पङ्केन न स पापेन लिप्यते ॥ 'जो मनुष्य प्राणसङ्कटमे पड़नेपर जहाँ कहींसे भी अन्न लेकर खा लेता है, वह उसी प्रकार पापसे लिप्त नहीं होता जैसे कीचड़से आकाश' ( मनु० १० । १०४ ) । इस प्रकार जो स्मृति-वचन उपलब्ध होते हैं, उनसे भी यही सिद्ध होता है कि प्राण जानेकी परिस्थिति उत्पन्न न होनेतक आहार-शुद्धिसम्बन्धी सदाचारका परित्याग नहीं करना चाहिये । सम्बन्ध—अब श्रुति-प्रमाणसे भी अभक्ष्य-भक्षणका निषेध सिद्ध करते हैं— शब्दश्चातोऽकामकारे ॥ ३ । ४ । ३१ ॥ अकामकारे=इच्छानुसार अभक्ष्यभोजनके निषेधमे; शब्दः=श्रुतिप्रमाण; च=भी है; अतः=इसलिये ( प्राणसङ्कटकी स्थिति आये बिना निषिद्ध अन्न, जलका ग्रहण नहीं करना चाहिये ) । व्याख्या—इच्छानुसार अभक्ष्य-भक्षणका निषेध करनेवाली श्रुति भी है,* इसलिये यह सिद्ध हुआ कि जहाँ कहीं श्रुतिमे ज्ञानकी विशेषता दिखलानेके लिये विद्वान्‌के सम्बन्ध- मे यह कहा है कि 'उसके लिये कुछ भी अभक्ष्य नहीं होता', वह केवल विद्याकी स्तुतिके लिये है। सिद्धान्त यही है कि जबतक प्राण जानेकी परिस्थिति न पैदा हो जाय, तबतक अभक्ष्य-त्यागसम्बन्धी सदाचारका त्याग नहीं करना चाहिये । सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर भी अभक्ष्य-त्याग आदिके आचारका पालन करना चाहिये। अब यह जिज्ञासा होती है

  • स्तेनो हिरण्यस्य सुराँ पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन् ब्रह्महा चैते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरं स्तैरिति ॥ ( छ० उ० ५ । १० । ९ ) 'सुवर्ण चुरानेवाला, शराबी, गुरुपत्नीगामी तथा ब्रह्महत्यारा—ये चारों पतित होते हैं और पाँचवाँ उनके साथ संसर्ग रखनेवाला भी पतित होता है।' सुरा (मद्य) अभक्ष्य है। यहाँ इसे पीनेवालेको महापातकी बताकर उसके पानका निषेध किया गया है ।

सूत्र ३०-३४ ] अध्याय ३ ३२१

सूत्र ३०-३४ ] अध्याय ३ ३२१ किं ज्ञानीको कर्म करना चाहिये या नहीं ? यदि करना चाहिये तो कौन-से कर्म करने चाहिये ? अतः इसके निर्णयके लिये कहते हैं— विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि ॥ ३ । ४ । ३२ ॥ च=तथा; विहितत्वात्=शास्त्रविहित होनेके कारण; आश्रमकर्म=आश्रम- सम्बन्धी कर्मोंका; अपि=भी ( अनुष्ठान करना चाहिये ) । व्याख्या—ज्ञानीके द्वारा भी जिस प्रकार शरीरस्थितिके लिये उपयोगी भोजनादि कर्म तथा ब्रह्मविद्योपयोगी शमदमादि कर्म लोकसंग्रहके लिये कर्तव्य हैं, उसी प्रकार जिस आश्रममें वह रहता हो, उस आश्रमके कर्म भी उसके लिये विहित हैं, ( बृह० उ० ४ । ४ । २२ ) ।* अतः उनका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये; इसीलिये भगवान्ने भी कहा है—‘नियत कर्मोंका त्याग करना नहीं बन सकता, अतः मोह- पूर्वक उनका त्याग देना तामस त्याग कहा गया है ( गीता १८ । ७ )। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको दृढ करते हैं— सहकारित्वेन च ॥ ३ । ४ । ३३ ॥ सहकारित्वेन=साधनमे सहायक होनेके कारण; च=भी ( उनका अनुष्ठान लोकसंग्रहके लिये करना चाहिये ) । व्याख्या—जिस प्रकार शम, दम, तितिक्षादि कर्म परमात्माकी प्राप्तिके साधनमे सहायक हैं, उसी प्रकार निष्कामभावसे किये जानेवाले शास्त्रविहित आश्रमसम्बन्धी आचार, व्यवहार आदि भी सहायक हैं । इसलिये उनका अनुष्ठान भी लोकसंग्रहके लिये अवश्य करना चाहिये, त्याग नहीं करना चाहिये । सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि ब्रह्मविद्याका अभ्यास करनेवाले साधकोंके लिये निष्कामभावसे और परमात्माको प्राप्त हुए महात्माओंके लिये लोकसंग्रहार्थ आश्रम-सम्बन्धी विहित कर्मोंका अनुष्ठान तथा खान-पानसम्बन्धी सदाचारका पालन आवश्यक है । अब परब्रह्म पुरुषोत्तमकी भक्तिके अङ्गभूत जो श्रवण, कीर्तन आदि कर्म हैं, उनका पालन किस परिस्थितिमे और किस प्रकार करना चाहिये ? इसपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सर्वथापि त एवोभयलिङ्गात् ॥ ३ । ४ । ३४ ॥

  • तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन । बृ० द० २१—

३२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ अपि=किसी कारणसे कठिनता प्राप्त होनेपर भी; ते=वे भक्तिसम्बन्धी कर्म या भागवतधर्म तो; सर्वथा=सब प्रकारसे; एव=ही आचरणमें लाने योग्य हैं; उभयलिङ्गात्=क्योंकि श्रुति और स्मृति दोनोंके निश्चयात्मक वर्णनरूप लिङ्ग ( लक्षण ) से यही सिद्ध होता है । व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि— तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । नानुध्यायाद् बहून् शब्दान् वाचो विग्लापनँ हि तत् ॥ 'बुद्धिमान् ब्राह्मणको चाहिये कि उस परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वको समझकर उसीमे बुद्धिको प्रविष्ट करे, अन्य नाना प्रकारके व्यर्थ शब्दोंपर ध्यान न दे; क्योंकि वह तो केवल वाणीका अपव्ययमात्र है ।' (बृह० उ० ४ । ४ । २१ ) तथा— यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥ 'जिस परब्रह्म परमेश्वरमे स्वर्ग, पृथिवी, अन्तरिक्ष, मनसहित समस्त इन्द्रियाँ और प्राण स्थित हैं, उसी एक सबके आत्मा परमेश्वरको कहे हुए उपायोंद्वारा जानो, दूसरी बातोको छोड़ो । यही अमृतरूप परमात्माको पानेके लिये सेतुके सदृश सरल मार्ग है ।' ( मु० उ० २ । २ । ५ ) इसी प्रकार श्रीमद्भागवतमें भी कहा है कि— शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णशः स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जनाः । त एव पश्यन्त्यचिरेण तावकं भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम् ॥ 'जो आपके भक्त आपके चरित्रोंको प्रतिक्षण सुनते हैं, गाते हैं और वर्णन करते है तथा उन्हींका स्मरण करके आनन्दित होते हैं, वे ही अविलम्ब आपके उन चरण-कमलोंका दर्शन करते हैं, जो जन्म-मरणरूप प्रवाहके नाशक हैं ।' ( १ । ८ । ३६ ) । श्रीमद्भगवद्गीतामें भी कहा है— महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥

सूत्र ३५ ] अध्याय ३ ३२३

सूत्र ३५ ] अध्याय ३ ३२३ सततम् कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ 'हे पार्थ ! दैवी प्रकृतिमें स्थित हुए महात्मागण मुझे समस्त प्राणियोंका आदि और अविनाशी जानकर अनन्य मनसे मेरा भजन करते हैं, वे यत्नशील दृढ़ निश्चयवाले भक्त निरन्तर मेरा कीर्तन और मुझे नमस्कार करते हुए, सदा मुझमे ही संलग्न रहकर प्रेमपूर्वक मेरी उपासना करते हैं।' (गीता ९। १३-१४)। इत्यादि श्रुतियों और स्मृतियोंमें वर्णित लक्षणोंसे यही सिद्ध होता है कि आपत्तिकालमे किसी कारणवश अन्य वर्ण, आश्रम और शरीर-निर्वाहसम्बन्धी कर्मोंका पालन पूर्णतया न हो सके तो भी उन भगवदुपासनाविषयक श्रवण, कीर्तन आदि मुख्य धर्मोंका अनुष्ठान तो किसी भी प्रकारसे अवश्य करना ही चाहिये। भाव यह कि किसी भी अवस्थामें इनके अनुष्ठानमे शिथिलता नहीं आने देनी चाहिये। सम्बन्ध-उक्त धर्मानुष्ठानकी विशेषता दिखलाते हैं— अनभिभवं च दर्शयति ॥ ३।४।३५॥ श्रुति (इनका अनुष्ठान करनेवालेका) अनभिभवम्=पापोंसे अभिभूत न होना; च=भी; दर्शयति=दिखलाती है (इससे भी यह सिद्ध होता है कि इनका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये)। व्याख्या—श्रुतिने कहा है कि 'उस परमात्माको प्राप्त करनेवालेकी महिमाको जाननेवाले जिस साधकका मन शान्त है अर्थात् विषय-वासनासे अभिभूत नहीं है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें की हुई हैं, जो अन्य सभी क्रिया-कलापसे उपरत है, सब प्रकारके शारीरिक और मानसिक सुख-दुःखोंको सहन करनेमे समर्थ- तितिक्षु है तथा परमात्माके स्मरणमें तल्लीन है, वह अपने हृदयमे स्थित उस आत्मस्वरूप परमेश्वरका साक्षात्कार करता है; अतः वह समस्त पापोंसे पार हो जाता है, उसे पाप ताप नहीं पहुँचा सकते; अपितु वही पापोंको सन्तप्त करता है।' इत्यादि (बृह० उ० ४।४।२३)। इस प्रकार श्रुतिमें भगवान्का भजन-स्मरण करनेवालेको पाप न लगनेकी बात कही गयी है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि परमात्माकी प्राप्तिके लिये बतलाये हुए जो उपासना-विषयक श्रवण, कीर्तन और स्मरण आदि धर्म है, उनका अनुष्ठान तो प्रत्येक परिस्थितिमें करते ही रहना चाहिये।

३२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः उपासनाविषयक कर्मानुष्ठानकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं— अन्तरा चापि तु तद्दृष्टेः ॥ ३ । ४ । ३६ ॥ तु = इसके सिवा; अन्तरा = आश्रमधर्मोंके अभावमे; च अपि = भी ( केवल उपासनाविषयक अनुष्ठानसे परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है ); तद्दृष्टेः = क्योंकि श्रुतिमें ऐसा विधान देखा जाता है । व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद् ( १ । १४ ) मे कहा है— स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत् ॥ 'अपने शरीरको नीचेकी अरणि और प्रणवको ऊपरकी अरणि बनाकर ध्यानके द्वारा निरन्तर मन्थन करते रहनेसे साधक छिपी हुई अग्निकी भाँति हृदयमें स्थित परमदेव परमेश्वरको देखे ।' इस कथनके पश्चात् उपर्युक्तरूपसे परमेश्वरमे ध्यानकी स्थितिके लिये प्रार्थना करने तथा उन्हीं परमात्माकी शरण ग्रहण करनेका भी वर्णन है ( श्वेता० उ० २ । १ से ५ ) । तदनन्तर यह कहा गया है कि 'हे साधक ! सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक सर्वान्तर्यामी परमेश्वरकी प्रेरणासे तुम्हें उस परब्रह्म परमात्माकी सेवा-समाराधना करनी चाहिये । उन परमेश्वरकी ही शरण लेकर उन्हींमे अपने- आपको विलीन कर देना चाहिये । ऐसा करनेसे तुम्हारे पूर्वकृत समस्त सञ्चित कर्म साधनमे विघ्नकारक नहीं होगे ।' ( श्वेता० उ० २ । ७)। इसके बाद इसका फल आत्मा और परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार बताया है ( २ । १४, १५ ) । इसी तरह अन्य श्रुतियोंमें भी केवल उपासनासे ही परमात्माकी प्राप्ति बतायी है। ( श्वेता० उ० ४ । १७ तथा ६ । २३ ) । इससे यह सिद्ध होता है कि जो अन्य वर्णाश्रमधर्मोंका पालन करनेमें असमर्थ हैं, उनको केवल उपासनाके धर्मोंका पालन करनेसे ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है । सम्बन्ध—इसी बातके समर्थनमें स्मृतिका प्रमाण देते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ ३ । ४ । ३७ ॥ अपि च = इसके सिवा; स्मर्यते = स्मृतियोंमें भी यही बात कही गयी है ।

सूत्र ३६--३८ ] अध्याय ३ ३२५

सूत्र ३६--३८ ] अध्याय ३ ३२५ व्याख्या-गीता आदि स्मृतियोमे जो वर्णाश्रमोचित कर्मके अधिकारी नहीं है, ऐसे पापयोनि चाण्डाल आदिको भी भगवान्‌की शरणागतिसे परमगतिकी प्राप्ति बतलायी गयी है (गीता ९ । ३२)। वहाँ भगवान्‌ने यह भी स्पष्ट कहा है कि 'मेरी प्राप्तिमें वेदाध्ययन, यज्ञानुष्ठान, दान तथा नाना प्रकारकी क्रिया और उग्र तप हेतु नहीं है, केवलमात्र अनन्यभक्तिसे ही मै जाना, देखा और प्राप्त किया जा सकता हूँ' ( ११ । ४८, ५३, ५४ )। इसी प्रकार श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थोंमें भी जगह-जगह इस बातका समर्थन किया गया है कि वर्ण और आश्रमकी मर्यादासे रहित मनुष्य केवल भक्तिसे पवित्र होकर परमात्माको प्राप्त कर लेता है। यथा- किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा आभीरकङ्का यवनाः खसादयः। येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः शुद्ध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥ 'किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कङ्क, यवन, खस आदि तथा अन्य जितने भी पापयोनिके मनुष्य हैं, वे सब जिनकी शरण लेनेसे शुद्ध हो परमात्माको प्राप्त हो जाते है, उन सर्वसमर्थ भगवान्‌को नमस्कार है।' (श्रीमद्भा० २ । ४ । १८)। इन सब वचनोसे भी यह सिद्ध होता है कि उपासना-सम्बन्धी धर्मोका अनुष्ठान ही परम आवश्यक है। सम्बन्ध-अब भागवतधर्मानुष्ठानका विशेष माहात्म्य सिद्ध करते है- विशेषानुग्रहश्च ॥ ३ । ४ । ३८ ॥ च=इसके सिवा, विशेषानुग्रहः = भगवान्‌की भक्तिसम्बन्धी धर्मोंका पालन करनेसे भगवान्‌का विशेष अनुग्रह होता है। व्याख्या-ऊपर बतलायी हुई अन्य सब बाते तो भागवतधर्मकी विशेषतामे हेतु है ही। उनके सिवा, यह एक विशेष बात है कि अन्य किसी प्रकारके धर्म- कर्म आदिका आश्रय न लेकर जो अनन्य-भावसे केवल भगवान्‌की भक्तिका अनुष्ठान करता है,* उसको भगवान्‌की विशेष कृपा प्राप्त होती है। गीतामे भगवान्‌ने

  • भक्तिका वर्णन श्रीमद्भागवतमे इस प्रकार आया है- श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ (७।५।२३) 'भगवान् विष्णुका श्रवण, कीर्तन, स्मरण, चरणसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन-ये भगवद्भक्तिके नौ भेद हैं।' (इन्हींको नवधा भक्ति कहते हैं।)

पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् ।

३२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ स्वयं कहा है कि 'उन भक्तोंके लिये मै सुलभ हूँ' (गीता ८ । १४), 'उनका योग-क्षेम स्वयं वहन करता हूँ' (९ । २२) । भगवान्‌ने अपने भक्तोंका महत्त्व बतलाते हुए श्रीमद्भागवतमें यहाँतक कह दिया है कि 'मैं सदा भक्तोके अधीन रहता हूँ' (९ । ४ । ६३) । इसके सिवा इतिहास, पुराण और स्मृतियोंमे यह वर्णन विशेषरूपसे पाया जाता है कि भक्तिका अनुष्ठान करनेवालोंपर भगवान्‌की विशेष कृपा होती है। यही कारण है कि भगवान्‌के इस भक्तवत्सल स्वभावको जाननेवाले निरन्तर उनके भजन, स्मरणमे ही लगे रहते हैं (गीता १५ । १९) तथा वे भक्तजन मुक्तिका भी निरादर करके केवल भक्ति ही चाहते है। सम्बन्ध—अब अन्य धर्मोंकी अपेक्षा भागवतधर्मोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते है— अतस्त्वितरज्यायो लिङ्गाच्च ॥ ३ । ४ । ३९ ॥ अतः=ऊपर बतलाये हुए इन सभी कारणोंसे (यह सिद्ध हुआ कि); इतरज्यायः=अन्य सब धर्मोंकी अपेक्षा भगवान्‌की भक्तिविषयक धर्म श्रेष्ठ है; तु=इसके सिवा; लिङ्गात्=लक्षणोंसे; च=भी (यही सिद्ध होता है)। व्याख्या—ऊपर बतलाये हुए कारणोंसे यह बात सिद्ध हो चुकी कि अन्य सभी प्रकारके धर्मोंसे भगवान्‌की भक्ति-विषयक धर्म अधिक श्रेष्ठ है। इसके सिवा, स्मृति-प्रमाणसे भी यही बात सिद्ध होती है। श्रीमद्भागवतमें कहा है— विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् । मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ- प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः ॥ 'बारह प्रकारके गुणोंसे युक्त ब्राह्मण भी यदि भगवान् पद्मनाभके चरणकमल- से विमुख है तो उसकी अपेक्षा उस चाण्डालको श्रेष्ठ मानता हूँ, जिसके मन, धन, वचन, कर्म और प्राण परमात्माको अर्पित है; क्योकि वह भक्त चाण्डाल अपनी भक्तिके प्रतापसे सारे कुलको पवित्र कर सकता है, परन्तु वह बहुत मानवाला ब्राह्मण ऐसा नहीं कर सकता।' (७ । ९ । १०)

सूत्र ३९—४० ] अध्याय ३ ३२७

सूत्र ३९—४० ] अध्याय ३ ३२७ अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम् । तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥ 'अहो आश्चर्य है कि जिसकी जिह्वापर तुम्हारा पवित्र नाम रहता है, वह चाण्डाल भी श्रेष्ठ है, क्योंकि जो तुम्हारे नामका कीर्तन करते हैं, उन श्रेष्ठ पुरुषोने तप, यज्ञ, तीर्थस्नान और वेदाध्ययन आदि सब 'कुछ कर लिये।' ( श्रीमद्भा० ३ । ३३ । ७ ) इसी प्रकार जगह-जगह भगवान्‌के भक्तोंके लक्षण बतलाते हुए वर्ण-आश्रम आदिके धर्मका पालन करनेवालोकी अपेक्षा उनकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन किया गया है। सम्बन्ध—इस प्रकार उपासना-विषयक श्रवण, कीर्तन आदि विशेष धर्मोंका महत्त्व दिखलाया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि यदि कोई मनुष्य किसी कारणवश आश्रमका व्यतिक्रम करना चाहे तो कर सकता है या नहीं ? यदि कर ले तो उसका व्यक्तित्व कैसा माना जाना चाहिये ? इत्यादि। अतः इस विषय- का निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— तद्भूतस्य तु नातद्भावो जैमिनेरपि नियमातद्रूपाभावेभ्यः।३।४।४०। तद्भूतस्य = उच्च आश्रममे स्थित मनुष्यका; तु = तो; अतद्भावः = उसे छोड़कर पूर्व आश्रममें लौट आना; न = नहीं बन सकता; नियमातद्रूपाभावेभ्यः = क्योंकि शास्त्रोंमे पीछे न लौटनेका ही नियम है, श्रुतिमे आश्रम बदलनेका जो क्रम कहा गया है, उससे यह विपरीत है और इस प्रकारका शिष्टाचार भी नहीं है; जैमिनेः अपि = जैमिनि ऋषिकी भी यही सम्मति है। व्याख्या—जो चतुर्थ आश्रम ग्रहण कर चुके हैं, उनका पुनः गृहस्थाश्रममे लौटना शास्त्रसम्मत नहीं है। इसी प्रकार वानप्रस्थका भी पुन. गृहस्थमे प्रवेश उचित नहीं है, क्योकि ऊँचे आश्रममे जाकर पुनः लौटनेका श्रुति-स्मृतियोमे निषेध है तथा आश्रम बदलनेका जो क्रम श्रुतिमे बताया गया है, वह इस प्रकार है—'ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य गृही भवेत्। गृही भूत्वा वनी भवेत्। वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा।'—'ब्रह्मचर्य- को पूरा करके गृहस्थ होवे, गृहस्थसे वानप्रस्थ हो और वानप्रस्थसे संन्यास ले

३२८ वेदान्त-दर्शन [पाद ४ अथवा दूसरे प्रकारसे यानी ब्रह्मचर्यसे या गृहस्थसे अथवा वानप्रस्थसे ही संन्यास ले।' ( जाबाल० उ० ४ ) । अतः पीछे लौटना उस क्रमसे विपरीत है। इसके सिवा, इस प्रकारका शिष्टाचार भी नहीं है। इन सब कारणोंसे जैमिनि ऋषिकी भी यही सम्मति है कि उच्च आश्रमसे पुनः लौटना नहीं हो सकता। इसलिये यही सिद्ध हुआ कि वेद और स्मृतियोमे जो एक आश्रमसे दूसरे आश्रममे प्रवेश करनेकी रीति बतायी गयी है, उसको छोड़कर आश्रमका व्यतिक्रम करना किसी प्रकार भी न्यायसङ्गत नहीं है। अतः जो इस प्रकार आश्रमभ्रष्ट हो चुका है, उसका ब्रह्मविद्यामे अधिकार नहीं है। सम्बन्ध—इस प्रकारके मनुष्यको प्रायश्चित्त कर लेनेपर तो अधिकार प्राप्त हो जाता होगा ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— न चाधिकारिकमपि पतनानुमानात्तदयोगात् ॥ ३ । ४ । ४१ ॥ च=इसके सिवा; आधिकारिकम्=प्रायश्चित्तके अधिकारी अन्य आश्रम- वालोके लिये जो प्रायश्चित्त बताया गया है, वह; अपि=भी; न=उसके लिये विहित नहीं है; पतनानुमानात्=क्योकि स्मृतिमे उसका महान् पतन माना गया है; तदयोगात्=इसलिये वह प्रायश्चित्तके उपयुक्त नहीं रहा । व्याख्या—ब्रह्मचर्य-आश्रममे यदि ब्रह्मचारीका व्रत भङ्ग हो जाय तो वेद और स्मृतियोमे उसका प्रायश्चित्त बताया गया है ( मनु० २ । १८१ ) तथा गृहस्थ भी ऋतुकाल आदिका नियमपालन भङ्ग कर दे तो उसका प्रायश्चित्त है; क्योकि वे प्रायश्चित्तके अधिकारी है। परन्तु जिन्होने वानप्रस्थ या संन्यास आश्रम स्वीकार कर लिया, वे यदि पुनः गृहस्थ-आश्रममें लौटकर स्त्रीप्रसङ्गादिमे प्रवृत्त होकर पतित हो गये हैं तो उनके लिये शास्त्रोमें किसी प्रकारके प्रायश्चित्तका विधान नहीं है; क्योकि स्मृतियोमे उनका अतिशय पतन माना गया है। इसलिये वे प्रायश्चित्तके अधिकारी नही रहे। जैमिनि आचार्यकी भी सूत्रकारके मतानुसार यही सम्मति है कि उनके लिये प्रायश्चित्तका विधान नहीं है। सम्बन्ध—इसपर अन्य आचार्योंका मत बताते हैं— उपपूर्वमपि त्वेके भावमशनवत्तदुक्तम् ॥ ३ । ४ । ४२ ॥ एके=कई एक आचार्य; उपपूर्वम्=इसे उपपातक; अपि=भी मानते है,

सूत्र ४१—४४ ] अध्याय ३ ३२९

सूत्र ४१—४४ ] अध्याय ३ ३२९ ( इसलिये वे ); अशनवत्=भोजनके नियमभङ्गके प्रायश्चित्तकी भाँति; भावम्= इसके लिये भी प्रायश्चित्तका भाव मानते है; तदुक्तम्=यह बात शास्त्रमे कही है ( यह भी उनका कहना है ) । व्याख्या—कई एक आचार्योंका कहना है कि जिस प्रकार ब्रह्मचारी अपने व्रतसे भ्रष्ट होकर प्रायश्चित्तका अधिकारी होता है, वैसे ही वानप्रस्थी और संन्यासियोंका भी प्रायश्चित्तमे अधिकार है; क्योकि यह महापातक नहीं है; किन्तु उपपातक है और उपपातकके प्रायश्चित्तका शास्त्रमे विधान है ही । अत. अभक्ष्य- भक्षण आदिके प्रायश्चित्तकी भाँति इसका भी प्रायश्चित्त अवश्य होना उचित है । सम्बन्ध—इसपर आचार्य अपनी सम्मति बताते हैं— बहिस्तूभयथापि स्मृतेराचाराच्च ॥ ३ । ४ । ४३ ॥ तु=किन्तु; उभयथापि=दोनो प्रकारसे ही; बहिः=यह विद्याके अधिकारसे बहिष्कृत है; स्मृतेः=क्योकि स्मृतिप्रमाणसे, च=और; आचारात्=शिष्टाचारसे भी ( यही बात सिद्ध होती है ) । व्याख्या—वे उच्च आश्रमसे पतित हुए सन्यासी और वानप्रस्थी लोग महापातकी हों या उपपातकी, दोनों प्रकारसे ही शिष्ट-सम्प्रदाय और वैदिक ब्रह्मविद्याके अधिकारसे सर्वथा बहिष्कृत है; क्योकि स्मृति-प्रमाण और शिष्टोके आचार-व्यवहारसे यही बात सिद्ध होती है । उनका पतन भोगोकी आसक्तिसे ही होता है । अतः वे ब्रह्मविद्याके अधिकारी नहीं हैं । श्रेष्ठ पुरुष उनके साथ यज्ञ, स्वाध्याय और विवाह आदि सम्बन्ध भी नहीं करते है । सम्बन्ध—इस प्रकार उच्च आश्रमसे भ्रष्ट हुए द्विजोंका ब्रह्मविद्यामे अधिकार नहीं है, यह सिद्ध किया गया । अब जो कर्मोंके अङ्गभूत उद्गीथ आदिमें उपासना की जाती है,' उसका कर्ता यजमान होता है या कर्म करनेवाला ऋत्विक्—इसपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— स्वामिनः फलश्रुतेरित्यात्रेयः ॥ ३ । ४ । ४४ ॥ स्वामिनः=उस उपासनामे यजमानका ही कर्तापन है; इति=ऐसा, आत्रेयः=आत्रेय मानते हैं; फलश्रुतेः=क्योकि श्रुतिमे यजमानके लिये ही फलका वर्णन किया गया है ।