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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

वाले वैद्य को चाहिये कि कार्य करने से पूर्व सम्पूर्ण परीक्षा से परीक्षणीय वस्तु की परीक्षा करके काम करना आरम्भ करे ॥८१॥ तत्र चेद्विद्वाङ् अभिषग्वा भिषजं कश्चिदेवं पृच्छेत्-वमन-विरेचना- स्थापनानुवासन-शिरोविरेचनानि प्रयोक्तुकामेन भिषजा कतिविधया परीक्षया कतिविधमेव परीक्ष्यं, कश्चात्र परीक्ष्यविशेषः, कथं च परी- क्षितव्यः, किंप्रयोजना च परीक्षा, क्व च वमनादीनां प्रवृत्तिः, क्व च निवृत्तिः, प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणसंयोगे च किं नैष्ठिकं, कानि च वमना- दीनां भेषजद्रव्याण्युपयोगं गच्छन्तीति ॥ ८२ ॥ यदि कभी भिषग् अथवा साधारण मनुष्य, जो वैद्य नहीं, वैद्य से पूछे कि वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, शिरोविरेचन देने की इच्छा वाले वैद्य की कितनी प्रकार की परीक्षायें, कितने प्रकार का परीक्ष्य और परीक्षा में विशे- षता क्या है, उसकी किस प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये, परीक्षा का क्या प्रयोजन है ? वमन आदि का कहाँ प्रयोग करना और कहाँ नहीं करना चाहिये! प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों के लक्षण मिलें तो क्या करना ? वमन आदि कार्यों में कौन से औषध द्रव्य काम में आते हैं, इत्यादि प्रश्न करे तब निम्न प्रकार से उत्तर देना चाहिये ॥ ८२ ॥ स एवं पृष्टो यदि मोहयितुमिच्छेत्, ब्रूयादेनं - बहुविधा हि परी- क्षा तथा परीक्ष्यविधिभेदः, कतमेन विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्नया परीक्षया केन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यस्य भिन्नस्य भेदाग्रं भवान्पृच्छत्याख्यायमानं, नेदानीं भवताऽन्येन विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्नया परीक्षयाऽन्येन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यस्य भिन्नस्या- भिलषितमर्थं श्रोतुमहमन्येन परीक्षाविधिभेदप्रकृत्यन्तरेणान्येन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यं भित्त्वाऽन्यथाऽऽचक्षाण इच्छां प्रपूर- येयमिति ॥ ८३ ॥ यदि वैद्य पूछने वाले को परेशान करना चाहे तो-परीक्षा और परीक्षा- विधि इनके अनेक भेद होते हैं । आप कौन सी विधि-भेद-प्रकृति से भिन्न परीक्षा से अथवा कौन से विधि-भेद-प्रकृति से भिन्न परीक्ष्य के भेद को पूछना चाहते हैं। वही कहा जाय ? आप से बिना यह जाने कि आप कौन से विधि- भेद-प्रकृति से भिन्न परीक्षा वा कौन से विधि-भेद-प्रकृति से भिन्न परीक्ष्य को जानना चाहते हैं, मैं और भेदों को कहकर आपकी इच्छा को पूर्ण नहीं कर सकता ॥८३॥

५८६ चरकसंहिता [ अ० ८ स यदुत्तरं ब्रूयात्तत्परीक्ष्योत्तरं वाक्यं स्याद्यथोक्तं प्रतिवचनविधि- मवेक्ष्य; सम्यग्यदि तु ब्रूयात्, न चैनं मोहयितुमिच्छेद्, प्राप्तं तु वच- नकालं मन्येत काममस्मै ब्रूयादाप्तमेव निखिलेन ॥ ८४ ॥ इस पर जो उत्तर वह दे, उसकी परीक्षा करके, प्रतिवचन विधि के अनु- सार उचित उत्तर दे। यदि वह भली प्रकार से कहे और इसको चक्कर में डालकर चाहे तो इसके लिये सब कुछ विश्वस्त रूप से कह दे ॥८४॥ द्विविधा खलु परीक्षा ज्ञानवतां प्रत्यक्षमनुमानं च, एतद्धि द्वय- मुपदेशश्च परीक्षा स्यात् । एवमेषा द्विविधा परीक्षा, त्रिविधा वा सहोपदेशेन ॥ ८५ ॥ बुद्धिमानों के लिये परीक्षा दो प्रकार की है। प्रत्यक्ष और अनुमान (ये दोनों पहले कहे गये हैं) और तीसरी उपदेश भी परीक्षा है, इस प्रकार से यह दो प्रकार की परीक्षा उपदेश (आप्तोपदेश) के साथ तीन प्रकार की हो जाती है ॥ ८५ ॥ दशविधं तु परीक्ष्यं कारणानि यदुक्तमग्रे। तदिह भिषगादिषु संसार्य संदर्शयिष्यामः—इह कार्यप्राप्तेः कारणं भिषक्, करणं पुनर्भै- षजम्, कार्ययोनिर्धातुवैषम्यं, कार्यं धातुसाम्यं, कार्यफलं सुखावाप्तिः, अनुबन्धस्तु खल्वायुः, देशो भूमिरातुरश्च। कालः पुनः संवत्सरश्चाऽऽतु- रावस्था च। प्रवृत्तिः प्रतिकर्मसमारम्भः। उपायस्तु भिषगादीनां सौष्ठ- वमभिविधानं च सम्यक्। इहाप्यस्योपायस्य विषयः पूर्वेणैवो पाय विशे- षेण व्याख्यात इति कारणादीनि दश दशसु भिषगादिषु संसार्य संद- र्शितानि, तथैवाऽऽनुपूर्व्या एतद्दशविधं परीक्ष्यमुक्तम् ॥ ८६ ॥ पहिले यह कहा है कि परीक्ष्य (कारण आदि) वस्तु दस प्रकार की हैं। इसी को भिषग् आदि में घटाकर दिखाते हैं यहां कार्यप्राप्ति में कारण भिषक् है, औषध करण है। धातुओं की विषमता कार्ययोनि है। धातुओं को समान करना कार्य है। सुख का मिलना कार्यफल है। आयु अनुबन्ध है। भूमि और रोगी देश हैं। संवत्सर और रोगी की अवस्था काल है। प्रत्येक कर्म का आरम्भ करना प्रवृत्ति है। भिषग् औषध, परिचारक और रोगी इनका भली प्रकार से मेल उपाय है। यहाँ पर भी इस उपाय के सम्बन्ध में सब बातें पूर्वोक्त उपायविशेष के साथ कह दी हैं। धातुसाम्य रूपी कार्य के करने पर आरोग्यता निश्चित है। इस प्रकार से कारण आदि दसों को भिषग् आदि में घटाकर दिखा दिया है, इसी प्रकार क्रम से यह दश प्रकार का 'परीक्ष्य' कह दिया है ॥ ८६ ॥

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८७

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८७ तस्य यो यो विशेषो यथा यथा च परीक्षितव्यः स तथा तथा व्याख्यास्यते ॥ ८७ ॥ इस दश प्रकार की परीक्षा में जो जो विशेषता है और जिस जिस प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये उसकी उसी २ प्रकार से व्याख्या करते हैं ॥ ८७ ॥ कारणं भिषगित्युक्तमग्रे, तस्य परीक्षा—भिषङ् नाम स यो भेषति, यः सूत्रार्थप्रयोगकुशलः, यस्य चायुः सर्वथा विदितम् यथाव- त्सर्वधातुसाम्यं चिकीर्षन्नात्मानमेवाऽऽदितः परीक्षेत गुणिषु गुणतः कार्याभिनिर्वृत्तिं पश्यन्— कश्चिदहमस्य कार्यस्याभिनिर्वर्तने समर्थो न वेति । तत्रेमे भिषग्गुणा यैरुपपन्नो भिषग्धातुसाम्याभिनिर्वर्तने समर्थो भवति । तद्यथा,-पर्यवदातश्रुतता परिदृष्टकर्मता दाक्ष्यं शौचं जितहस्तता उपकरणवत्ता सर्वेन्द्रियोपपन्नता प्रकृतिज्ञता प्रतिपत्तिज्ञता चेति ॥८८॥ पहिले कहा है कि भिषक् कारण है। इस भिषक् की परीक्षा यह है । जो पीड़ा ( रोग ) को दूर करता, शमन करता है, वह भिषक् है। जो आयुर्वेदीय सूत्रों में, प्रयोग में और कर्म में कुशल है, जिसे रोगी की आयु हित-अहित, सुख-असुख, प्रमाण-अप्रमाण और स्वरूप से भली प्रकार विदित है, शास्त्रज्ञ, कर्म को जानने वाला वैद्य सब धातुओं की समानता करने की इच्छा से सबसे प्रथम अपनी परीक्षा करे । जैसे गुण के योग से कार्य में सफलता को देखता हुआ वैद्य गुणियों अर्थात् भिषग्-द्रव्य, रोगी और परिचारकों में अपनी परीक्षा करे, क्या मैं इस कार्य को करने में समर्थ हूँ वा नहीं । भिषक् के निम्नलिखित गुण हैं जिन गुणों से युक्त होने पर वैद्य धातुसाम्य रूपी कार्य करने में समर्थ होता है । यथा- विमल शास्त्र-ज्ञान, सब प्रकार के कर्म का साक्षात् अनुभव, दक्षता, शस्त्रोपचार आदि में हस्तलाघव, उपकरणों का होना, सब इन्द्रियों से युक्त होना, रोगी की प्रकृति का ज्ञान और प्रतिपत्ति अर्थात् जिस रोगी की जैसी चिकित्सा करनी चाहिये उसका ज्ञान ॥ ८८ ॥ करणं पुनर्भेषजं; भेषजं नाम तद्यदुपकरणायोपकल्पते भिषजो धा- तुसाम्याभिनिर्वृत्तौ प्रयतमानस्य विशेषतश्चोपायान्तरेभ्यः । तद्द्विविधं व्यपाश्रयभेदात् ;-दैवव्यपाश्रयं युक्तिव्यपाश्रयं चेति । तत्र दैवव्यपाश्रयं मन्त्रौषधिमणि-मङ्गलबल्युपहार-होम-नियम-प्रायश्चित्तोपवास-स्वस्त्ययन- प्रणिपात-गमनादि, युक्तिव्यपाश्रयं-संशोधनोपशमने चेष्टाश्च दृष्टफलाः । एतच्चैव भेषजमङ्गभेदादपि द्विविधं द्रव्यभूतमद्रव्यभूतं च । तत्र यद् द्रव्यभूतं तदुपायाभिप्लुतम् । उपायो नाम भयदर्शनबिस्मापन-विस्मारण- क्षोभण-हर्षण-भर्त्सन-वध - बन्ध-स्वप्न - संवाहनादिरमूर्तो भावविशेषो

५८८ चरकसंहिता [ अ० ८ यथोक्ताः सिद्धयपायाश्चोपायाभिप्लुता इति। यत्त द्रव्यभूतं तद्वमनादिषु योगमुपैति; तस्यापीयं परीक्षा,-इदमेवंप्रकृत्या एवं गुणमेवं प्रभावमस्मि- न्देशे जातमस्मिन्नृताववं गृहीतमेवं निहितमेवमुपस्कृतमनया मात्रया युक्तमस्मिन् रोगे एवंविधस्य पुरुषस्यैतावन्तं दोषमपकर्षत्युपशमयति वा यदन्यदपि चैवंविधं भेषजं भवेत्तच्चानेन विशेषेण युक्तमिति ॥ ८९ ॥ भेषज (औषध) करण है। धातुसाम्यरूप कार्य के करने में प्रयत्न करते हुए वैद्य को जो वस्तु साधन होती हैं उसका नाम 'भेषज' है। यह भेषज (औषध) आश्रय भेद से दो प्रकार की है। (१) दैवव्यपाश्रय और (२) युक्तिव्यपाश्रय। इनमें दैवव्यपाश्रय मंत्र, औषधि, मणि, मंगल, बलि, उपहार, होम, नियम, प्रायश्चित्त, उपवास, दान, स्वस्त्ययन, प्रणिपात (विनय), गमन आदि कार्य दैव का आश्रय करके धातुओं को समान करते हैं। युक्ति- व्यपाश्रय—संशोधन, उपशमन और दृष्टफल वाली चेष्टाएं (धावन, स्वप्न, जागरण आदि)। यही भेषज अंग भेद से दो प्रकार का है। (१) अद्रव्य और (२) द्रव्य। इनमें जो अद्रव्य औषध है वह उपाय से व्याप्त है। भय दिखाना, विस्मय उत्पन्न करना, झिड़कना, बांधना, नींद लाना, अंगमर्दन आदि (दौड़ना, तैरना आदि) अमूर्त्त पदार्थों और चिकित्सा में सफ़लता देने वाले भिषग् आदि गुणों का होना ये उपाय हैं और जो औषध द्रव्य रूप हैं वह वमन आदि शोधन-शमन कार्यों में काम आते हैं। द्रव्य रूप (मूर्त्त) ओषधि की ऐसी परीक्षा करनी उचित है कि इस औषधि की यह प्रकृति है, यह गुण है, ऐसा प्रभाव है, इस देश में उत्पन्न हुई है, इस ऋतु में संग्रह की गई है, इस प्रकार से रक्खी गई है, इस प्रकार के पुरुष को देने से इतने दोष को बाहर करती है अथवा शमन करती है। अन्य भी जो औषध इन या अन्य गुणों से युक्त थी, उसने भी दोषो का निष्कासन अथवा शमन किया था, इस- लिये यह भी करेगी, इस प्रकार अन्यत्र प्रत्यक्ष करके यहां पर अनुमान से निश्चय करना चाहिये ॥ ८६ ॥ कार्ययोनिर्धातुवैषम्यं, तस्य लक्षणं विकारागमः, परीक्षा त्वस्य विकारप्रकृतेश्चैवोनातिरिक्तलिङ्गविशेषावेक्षणं विकारस्य च साध्यासा- ध्य-मृदु-दारुण-लिङ्ग विशेषावेक्षणमिति ॥ ९० ॥ कार्ययोनि—धातुओं की विषमता 'कार्ययोनि' है। विकार का होना यह उसका लक्षण है। इस विकार की प्रकृति के वातादि दोषों के कम अधिक, विशेष लक्षणों को देखना। इसी प्रकार से विकार का साध्य, असाध्य, मृदु, दारुण आदि विशेष लक्षणों से परीक्षा करनी चाहिये ॥ ९० ॥

[अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८६

[अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८६

कार्यं धातुसाम्यं, तस्य लक्षणं विकारोपशमः, परीक्षा त्वस्य रुगप- शमनं स्वरवर्णयोगः शरीरोपचयः बलवृद्धिश्ञ्चाभ्यवहार्याभिलाषा रुचिरा- हारकालेऽभ्यवहृतस्य चाऽऽहारस्य काले सम्यग्जरणं निद्रालाभो यथा- कालं वैकारियाणां च स्वप्नानामदर्शनं सुखेन च प्रतिबोधनं वातमूत्र- पुरीषरेतसां मुक्तिश्च सर्वाकारर्मनोबुद्धीन्द्रियाणां चाव्यापत्तिरिति ॥६१॥ कार्य—धातुओं का समान करना कार्य है। विकार का शान्त होना यह इसका लक्षण है। इसकी परीक्षा दर्द का शान्त होना है। स्वर और वर्ण का प्राकृत रूप में आजाना। शरीर की वृद्धि, बलवृद्धि, भोजन में इच्छा, आहार के समय रुचि होना, खाये हुए भोजन का आहारकाल में भली प्रकार जीर्ण होना, ठीक समय पर नींद आना, विकार (रोग) जन्य स्वप्नों का न देखना, सुखपूर्वक जागना, प्रातः उठना, वायु, मूत्र, मल और शुक्र का ठीक समय पर त्याग होना, सब प्रकार से मन, बुद्धि और इन्द्रियों में सुख होना ॥ ६१ ॥ कार्यफलं सुखावाप्तिः। तस्य लक्षणं मनोबुद्धीन्द्रियशरीरतुष्टिः ॥६२॥ कार्यफल—सुख का प्राप्त होना। इसका लक्षण-मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर का प्रसन्न होना है ॥ ६२ ॥ अनुबन्धस्तु खल्वायुः, तस्य लक्षणं प्राणैः सहः संयोगः ॥ ६३ ॥ अनुबन्ध—आयु है, इसका लक्षण-प्राणों के साथ शरीर का सम्बन्ध बना रहना है ॥ ६३ ॥ देशस्तु भूमिरातुरश्च। तत्र भूमिपरीक्षा—आतुरपरिज्ञानहेतोर्वा स्यादौषधपरिज्ञानहेतोर्वा। तत्र तावदियमातुरपरिज्ञानहेतोः। तद्यथा कस्मिन्नयं भूमिदेशे जातः संवृद्धो व्याधितो वेति । तस्मिंश्च भूमिदेशे मनुष्याणामिदमाहार जातमिदं बिहारजातमेतद्बलमेवंविधं सत्त्वमेवं- विधं सात्म्यमेवंविधा दोषो भक्तिरियमिमे व्याधया हितमिदमहि- तमिदामित (प्रायोग्रहणेन)। औषधपरिज्ञानहेतास्तु कल्पेषु भूमि- परीक्षा वक्ष्यत ॥ ६४ ॥ देश—देश भूमि और रोगी हैं। इनमें भूमि-परीक्षा के ज्ञान का प्रयोजन रोगी के देश के कारण सात्म्य को समझने के लिये और औषधि के ज्ञान के लिये है। इनमें रोगी को समझने के लिये—जैसे-किस भूमि-खण्ड पर यह रोगी उत्पन्न हुआ है? बढ़ा है ? रोगी हुआ है ? उस भूमि पर मनुष्यों का इस प्रकार का अहार है, इस प्रकार का विहार है, इस प्रकार का आचार है, इस प्रकार का बल, इस प्रकार का सत्त्व, इस प्रकार का सात्म्य, इस प्रकार के दोष, इस प्रकार की रुचि, इस प्रकार के रोग, यह हितकर, यह अहितकर है, यह

फल-कल्प ) में कहेगे ॥९४॥

५६० चरकसंहिता [ अ० ८

भूमि परीक्षा कह दी । औषधि परिज्ञान के लिये भूमिपरीक्षा कल्पस्थान ( मदन- फल-कल्प ) में कहेगे ॥९४॥ आतुरस्तु खलु कार्यदेशः, तस्य परीक्षा आयुषः प्रमाणज्ञानहेतोर्वा स्याद्बलदोषप्रमाणज्ञानहेतोर्वा; तत्र तावदियं बलदोषप्रमाणज्ञानहेतोः— दोषप्रमाणानुरूपो हि भेषजप्रमाणविकल्पो बलप्रमाणविशेषापेक्षो भवति । सहसा ह्यतिबलमौषधमपरीक्षकप्रयुक्तमल्पबलमातुरमभिघात- येत्, न ह्यविबलान्याग्नेय-सौम्य-वायवीयान्यौषधान्यग्निक्षारशस्त्रकर्माणि वा शक्यन्तेऽल्पबलैः सोढुम् । अविषह्याति तीक्ष्णवेगत्वद्धि सद्यः प्राण- हराणि स्युः । एतच्चैव कारणमपेक्षमाणा हीनबलमातुरमविषादकरै- मृदुसुकुमारप्रायैरुत्तरोत्तरगुरुभिरविभ्रमैरनात्ययिकैश्चोपचरन्त्यौषधैः , विशेषतश्च नारीः । ता ह्यनवस्थितमृदुविवृत्तविकलहृदयाः प्रायः सुकुमार्योऽबलाः परसंस्तभ्याश्च । तथा बलवति बलवद्व्याधिपरिगते स्वल्पबलमौषधमपरीक्षकप्रयुक्तमसाधकं भवति ॥ ९५ ॥ कार्यदेश — धातुसाम्य कार्य का देश अर्थात् आधार रोगी है । इस की परीक्षा आयु के प्रमाण ज्ञान के लिये है । अथवा रोगी के बल और दोष को जानने के लिये रोगी रूपी देश की परीक्षा होती है । रोगी की बल-प्रमाण और दोष-प्रमाण की परीक्षा का प्रयोजन — औषधि का प्रमाण दोष और बल रोग और रोगी दोनों को देख कर निश्चित किया जाता है । क्योकि यदि बहुत बलवती औषध थोड़े बल वाले रोगी को बिना परीक्षा किये दे दी जाय तो यह औषध रोगी को मार देगी । क्योकि अल्प बल वाले व्यक्ति, अति बल वाली, आग्नेय, वायवीय गुण से युक्त ओषधियों को और अग्नि, क्षार और शस्त्र के कर्मों को सहन नहीं कर सकते†। इनका वेग असह्य और अतितीक्ष्ण होने से ये वस्तुएं शीघ्र प्राणनाशक हो जाती हैं । इन कारणों को देख कर ही हीनबल वाले रोगी की, खास कर स्त्री की चिकित्सा शरीर और मन में ग्लानि उत्पन्न न करने वाली, मृदु-कोमल ओषधियों से तथा धीरे धीरे, उत्तरोत्तर वीर्य और परिमाण में गुरु होते हुए भी व्यापत्ति ( विकार ) न करने वाली, सम्यक् प्रकार से दी हुई ओषधियों से करते हैं । ये स्त्रियां अस्थिर, छोटे दिल की तथा भीरु हृदय वाली, प्रायः सुकुमार, अबला होती हैं और थोड़ी सी भी वेदना को सहन नहीं कर सकतीं और स्वयं अपने को कष्ट में नहीं संभाल सकतीं, उनको दूसरे ही को संभालना पड़ता है ।

†देखिये सुश्रुत, सूत्रस्थान में क्षार और अग्निकर्म ।

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६१

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६१ इसी प्रकार बलवान् रोगों में अथवा बलवान् रोग से आक्रान्त होने पर स्वल्प बल वाली औषधि बिना परीक्षा के दी हुई, रोग को शमन करने में समर्थ नहीं होती ॥६५॥ तस्मादातुरं परीक्षेत-प्रकृतितश्च विकृतितश्च सारतश्च संहननतश्च प्रमाणतश्च सात्म्यतश्च सत्त्वतश्चाऽऽहारशक्तितश्च व्यायामशक्तितश्च वयस्तश्चेति बलप्रमाणविशेषग्रहणहेतोः ॥ ६६ ॥ इसलिये रोगी की परीक्षा ( निम्न साधनों से ) करनी चाहिये । यथा- प्रकृति से, विकृति से, सार से, संहनन अर्थात् शरीर की बनावट से, प्रमाण से, सात्म्य से, सत्त्व से, आहार शक्ति से, व्यायाम-शक्ति से, और वय से रोगी के बल, प्रमाण विशेष को जानने के लिये इन गुणों से परीक्षा करनी चाहिये ॥ ६६ ॥ तत्रामी प्रकृत्यादयो भावाः। तद्यथा—शुक्र-शोणित-प्रकृतिं काल-ग- र्भाशय-प्रकृतिमातुराहारविहार-प्रकृतिं महाभूतविकारप्रकृतिं च गर्भश- रीरमपेक्षते । एता हि येन येन दोषेणाधिकतमेनैकेनानेकेन वा समनु- बध्यन्ते तेन तेन दोषेण गर्भोऽनुबध्यते । ततः सा सा दोषप्रकृतिरु- च्यते मनुष्याणां गर्भादिप्रवृत्ता । तस्माद्वातलाः प्रकृत्या केचित्, पित्तलाः केचित्, श्लेष्मलाः केचित्, संसृष्टाः केचित्, समधातवः प्रकृत्या केचिद्भवन्ति ॥ ६७ ॥ इनमें प्रथम प्रकृति आदि का वर्णन करते हैं । गर्भ का शरीर जैसे शुक्रएवं शोणित की प्रकृति की, काल ( समय ) की, गर्भाशय की प्रकृति की, माता के आहार-विहार की, शुक्र, शोणित में मिले पंच महाभूत, शरीरात्मक भूतों की अपेक्षा करता है। ये शुक्र शोणित आदि प्रकृतियां जिस जिस वातादि दोष से एक अथवा एक से अधिक दो या तीन से सम्बन्ध होती हैं, उसी एक या अधिक दोष से गर्भ भी सम्बन्धित हो जाता है । इससे मनुष्यों की गर्भ में बनी प्रकृति को उसी दोष की प्रकृति कहते हैं । उस उस दोष के बलवान् होने से वह वह प्रकृति होजाती है । इसीलिये कई श्लेष्मप्रकृति, कई पित्तप्रकृति और कई वात-प्रकृति और कई मिश्रित-प्रकृति, कईः समधातु-प्रकृति के होते हैं। इनके लक्षण कहते हैं । तेषां हि लक्षणानि व्याख्यास्यामः - श्लेष्मा हि स्निग्ध-श्लक्ष्ण-मृदु- मधुर-सार-सान्द्र-मन्द-स्तिमित-गुरु-शीत-पिच्छिलाच्छः, तस्य स्नेहात् श्लेष्मलाः स्निग्धाङ्गाः, श्लक्ष्णत्वाच्छ्लक्ष्णाङ्गाः, मृदुत्वाद् दृष्टिसुख-सुकुमा- रावदातगात्राः, माधुर्यात्प्रभूतशुक्रव्यवायापत्याः, सारत्वात् सारसंहत-

५६२ चरकसंहिता [अ० ८ स्थिरशरीराः सान्द्रत्वादुपचितपरिपूर्णसर्वगात्राः मन्दत्वान्मन्द- चेष्टाहारविहाराः, स्तैमित्यादशीघ्रारम्भाल्पक्षोभविकाराः, गुरुत्वा- त्साराधिष्ठितावस्थितगतयः, शैत्यादल्पक्षुत्तृष्णासंतापस्वेददोषाः, पिच्छि- लत्वात् सुश्लिष्टसारसन्धिबन्धनाः, तथाऽच्छत्वात्प्रसन्नदर्शनाननाः प्रसन्नवर्णस्वराश्च । त एवंगुणयोगाच्छ्लेष्मला बलवन्तो वसुमन्तो वि- द्यावन्त ओजस्विनः शान्ता आयुष्मन्तश्च भवन्ति ॥ ९८ ॥ श्लेष्मा—कफ स्निग्ध, श्लक्ष्ण, मृदु, मधुर, सार, सान्द्र, मन्द, स्तिमित (घट्ट), गुरु, शीत, पिच्छिल और निर्मल होता है । कफ के स्नेह गुण के कारण श्लेष्मप्रकृति के मनुष्य स्निग्ध अंगों वाले श्लक्ष्ण होने से चिकने अंग वाले, कोमल होने से आंखों को आनन्ददायक, सुकुमार, गौरवर्ण होते हैं । मधुरता होने से अधिक शुक्र, मैथुनशक्ति और संतान वाले होते हैं । सार के कारण इनका शरीर संहत, दृढ़, स्थिर होता है । सान्द्रता के कारण से पुष्ट, सम्पूर्ण अंगों वाले; मन्द होने से चेष्टा, आहार और विहार में धीमे; स्तैमित्य (आलस्य) होने से देर में वाणी, मन शरीर के कार्य करने वाले एवं क्षोभ तथा मानस विकार वाले, गुरु होने के कारण हाथी के समान मन्द-मस्त चाल वाले, शीतता के कारण थोड़ी, भूख, प्यास, संताप तथा पसीने के दोष वाले; पिच्छिल होने से इनके मांसादि तथा सन्धि-बन्धन अच्छी प्रकार से संयुक्त होते हैं । निर्मल होने से प्रसन्नमुख, प्रसन्न और स्निग्ध वर्ण तथा स्वर वाले होते हैं। इन गुणों के कारण कफप्रकृति के मनुष्य बलवान्, धनवान्, विद्यावान्, ओजस्वी, शान्त और दीर्घायु होते हैं ॐ ॥ ९८ ॥ पित्तमुष्णं तीक्ष्णं द्रवं विस्रमम्लं कटुकं च तस्यौष्ण्यात्पित्तला भवन्ति उष्णसहाः, उष्णमुखाः, सुकुमारावदातगात्राः, प्रभूत- पिप्लुव्यङ्गतिलपिटकाः, क्षुत्पिपासावन्तः, क्षिप्रवलीपलितखालि- त्यदोषाः, प्रायो मृद्वल्पकपिलश्मश्रुलोमकेशाः, तैक्ष्ण्यात्तीक्ष्णपरा- क्रमाः, तीक्ष्णाग्नयः, प्रभूताशनपानाः, क्लेशासहिष्णवो, दन्दशूकाः; द्रवत्वाच्छिथिलमृदुसन्धिवन्धमांसाः, प्रभूतासृष्टस्वेदमूत्रपुरीषाश्च; विस्रत्वात्प्रभूतपूतिकक्षास्यशिरःशरीरगन्धाः; कट्वम्लत्वादल्पशुक- व्यवायापत्याः; त एवंगुणयोगात्पित्तला मध्यबला मध्यायुषो मध्यज्ञान- विज्ञानवित्तोपकरणवन्तश्च भवन्ति ॥ ९९ ॥ पित्त—उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, विस्र (सड़ी गन्ध वाला), अम्ल-कटु रस ॐ देखिये सुश्रुत शारीरस्थान ४र्थ अध्याय में इनके लक्षण

अ० ८] ३८ विमानस्थानम् ५६३

अ० ८] ३८ विमानस्थानम् ५६३ होता है। पित्त के उष्ण होने से पित्त-प्रकृति के मनुष्य उष्णिमा को न सहने वाले, शुष्क, कठोर, पीले शरीर वाले, बहुत पिप्लु (फुन्सियों), व्यंग (मुख व्यंग) और तिलपिड़का वाले, अधिक भूख और प्यास वाले होते हैं, इनके बाल शीघ्र ही पक जाते, गिर जाते हैं, तथा मुंह पर झुर्रियां आजाती हैं। ये प्रायः कोमल, थोड़ी एवं धूसर वर्ण दाढ़ी-मूंछ वाले, अल्प लोम तथा अल्पक्रोध वाले होते हैं। तीक्ष्ण गुण के कारण-तीक्ष्ण पराक्रम वाले, तीक्ष्ण अग्नि वाले, बहुत खाने पीने वाले, क्लेश को न सहन करने वाले, दन्दशूक अर्थात् बार-बार खाने वाले होते हैं। द्रव होने से-शिथिल एवं मृदु सन्धिनन्ध तथा मांस वाले होते हैं। इनको स्वेद-मूत्र और मल बहुत अधिक मात्रा में आता है। पित्त के अति दुर्गन्धयुक्त होने से इनके बाल, मुख, शिर और शरीर से बहुत दुर्गन्ध आती है। कटु अल्प होने से थोड़े शुक्र, मैथुन और न्यून संतान वाले होते हैं। इन गुणों के कारण पित्त प्रकृति का मनुष्य मध्यम बल, मध्यम आयु, मध्यम ज्ञान विज्ञान, मध्यम वित्त और मध्यम उपकरणों वाले होते हैं ॥९६॥ वातस्तु रूक्ष-लघु-चल-बहुशीघ्र-शीत-परुष-विशदः। तस्य रौक्ष्याद्वातला रूक्षापचिताल्पशरीराः, प्रतत-रूक्ष-क्षाम-भिन्न-मन्द-सक्त-जर्जर-स्वराः, जागरूकाश्च भवन्ति। लघुत्वाच्च लघु-चपल-गति-चेष्टाहार-व्यवहाराः चलत्वादनवस्थित-सन्ध्यस्थि-भ्रू-हन्वोष्ठ-जिह्वा-शिरः-स्कन्ध-पाणि-पादाः बहुत्वाद् बहुप्रलाप-कण्डरा-सिरो-वितानाः। शीघ्रत्वाच्छीघ्रसमारम्भ- क्षोभविकाराः, शीघ्रोत्त्रासरागविरागाः, श्रुतग्राहिणोऽल्पस्मृतयश्च। शैत्याच्छीतासहिष्णवः, प्रततशीतकोद्वेपकस्तम्भाः। पारुष्यात्परुष-केश- श्मश्रु-रोम-नख-दशन-वदन-पाणि-पादाङ्गाः। वैशद्यात्स्फुटिताङ्गावयवाः, सततसंधिशब्दगामिनश्च भवन्ति। त एवंगुणयोगाद्वातलाः प्रायेणाल्प- बलाश्चाल्पायुषश्चाल्पापत्याश्चाल्पसाधनाश्चाधनाश्च भवन्ति ॥ १०० ॥ वायु—रूक्ष, लघु, चल, प्रमाणादि भेद से अनेक प्रकार की, शीघ्रकारी, शीत, परुष, विशद (अपच्छिल) होती है। वायु के रूक्ष होने से वात प्रकृति के मनुष्य भी रूक्ष, कृश, एवं छोटे शरीर वाले, निरन्तर रूक्ष, क्षीण, फटे बांस के समान जर्जर, असंहत स्वर वाले, जागरणशील (थोड़ी नींद वाले) होते हैं। लघु होने से-शीघ्रकारी, अस्थिर गति, चेष्टा, आहार, व्यवहार वाले होते हैं। वात के चल होने से उनके भी सन्धि आँख, भौं, हनु, जबड़ा, ओठ, जीभ, कंधा, हाथ-पाँव अस्थिर होते हैं। बहुत प्रकार का होने से, बहुत बोलने वाले, बहुत सिराओं के जाल वाले; शीघ्रगामी होने से सब कामों में जल्दी करने वाले,

५६४ चरकसंहिता [ अ० ८ क्षोभ और मन के विकार वाले, जल्दी ही डरने वाले, स्नेह और द्वेष करने वाले, सुनते ही ग्रहण करने वाले, परन्तु स्मृति ( याददास्त ) के कच्चे होते हैं । शीतल होने से शीत को न सहन करने वाले, निरन्तर शीत, कम्प और उद्वेग तथा स्तम्भवृत्ति ( जड़ ) बने रहते हैं । कठोरता से—कठिन केश, श्मश्रु, लोम, नख, दाँत, मुख, हाथ, पांव वाले होते हैं। वायु के विशद होने से उनके हाथ-पाँव फटते हैं, सन्धि बन्धनों में से निरन्तर शब्द निकला करता है, सन्धियाँ चलती रहती हैं, चैन से नहीं बैठते, कुछ न कुछ करते ही रहते हैं। इन गुणों के कारण वात प्रकृति के मनुष्य प्रायः अल्प बल, अल्प आयु, अल्पसंतान, अल्प साधन और अल्प धन वाले होते हैं ॥ १०० ॥ संसर्गात्संसृष्टलक्षणाः। सर्वगुणसमुदितास्तु समधातवः। इत्येवं प्रकृतिनः परीक्षेत ॥ १०१ ॥ दोषों के मिश्रित होने से लक्षण भी मिले जुले होते हैं। सब गुणों के मिलने से समधातुप्रकृति के होते हैं। इस प्रकार प्रकृति से परीक्षा करनी चाहिये ।१०१। विकृतितश्चेति—विकृतिरुच्यते विकारः। तत्र विकारं हेतु-दोष- दूष्य-प्रकृति-देश-काल-बल-विशेषैर्लिङ्गतश्च परीक्षेत, न ह्यन्तरेण हेत्वा- दीनां बलविशेषं व्याधिबलविशेषोपलब्धिः। यस्य हि व्याधेर्दोष-दूष्य- प्रकृति-देश-काल-बल-साम्यं भवति, महच्च हेतु लिङ्गबलं स व्याधिर्बल- वान् भवति । तद्विपर्ययाच्चाल्पबलः, मध्यबलस्तु दोषादीनामन्यतम- सामान्याद्धेतुलिङ्गमध्यबलत्वाच्चोपलभ्यते ॥ १०२ ॥ विकृति से परीक्षा करनी चाहिये। विकृति का अर्थ विकार है। धातुओं की विषमता का नाम 'विकार' है। इसकी हेतु, दूष्य, (रक्त आदि), दोष (वात आदि), प्रकृति (वात-प्रकृति आदि), देश, काल के बल तथा पूर्वरूप से परीक्षा करनी चाहिये। हेतु आदि के बल विशेष को जाने बिना रोग के विशेष बल का ज्ञान नहीं होता। जिस रोग में दोष, दूष्य, प्रकृति, देश, काल, समान हों तथा हेतु और पूर्वरूप के लक्षण भी बलवान् हों, उस रोग को बलवान् समझना चाहिये। इस लिये यह असाध्य है। इनसे विपरीत हो तो निर्बल सम- झना चाहिये। जिस रोग में दोष-दूष्य आदि में से कोई एक असमान हो, तथा हेतु और पूर्वरूप के लक्षण भी मध्यम बल हो तो उस रोग को मध्यम बल समझना चाहिये ॥१०२॥ सारतश्चेति—साराण्यष्टौ पुरुषाणां बलमानविशेषज्ञानार्थमुप- दिश्यन्ते। तद्यथा—त्वग्रक्त-मांस-मेदोस्थि-मज्ज-शुक्र-सत्त्वानि ।।१०३।।

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६५

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६५ सार द्वारा परीक्षा करनी चाहिये—बल परिमाण को विशेष रूप से जानने के लिये पुरुषों में आठ प्रकार के सारों का उपदेश किया है, जैसे—त्वग्, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र और सत्त्व ॥१०३॥ तत्र स्निग्ध-श्लक्ष्ण-मृदु-प्रसन्न-सूक्ष्माल्प-गम्भीर-सुकुमार-लोमा सप्र- भेव च त्वक् त्वक्साराणाम्। सा सारता सुख-सौभाग्यैश्वर्योपभोग-बुद्धि- विद्यारोग्य -प्रहर्षणान्यायुष्यानित्वरमाचष्टे ॥ १०४॥ इनमें—त्वक् सार वाले पुरुष की त्वचा स्निग्ध, चिकनी, मृदु, प्रसन्न, सूक्ष्म, अल्प, गम्भीर, कोमल लोमवाली और प्रभा (कान्ति) से युक्त होती है। इस प्रकार की सारता, सुख, सौभाग्य, ऐश्वर्य उपभोग, बुद्धि, विद्या, आरोग्य, प्रहर्ष और दीर्घ आयुष्य को बतलाती है ॥१०४॥ कर्णाक्षि-मुख-जिह्वा-नासोष्ठ-पाणि-पादतल-नख-ललाट-मेहनं स्निग्ध- रक्तं श्रीमद् भ्राजिष्णु रक्तसाराणाम्। सा सारता सुखमुद्दग्रतां मेधां मनस्वि- त्वं सौकुमार्यमनतिबलमक्लेशसहिष्णुत्वमुष्णासहिष्णुत्वं चाऽऽचष्टे १०५ रक्तसार वाले पुरुषों के कान, आंख, मुख, जिह्वा, नाक, ओष्ठ, हाथ, पांव के तलुवे, नख, मस्तक, लिंग स्निग्ध और रक्त वर्ण के, शोभा और दीप्ति से युक्त होते हैं। इस प्रकार की रक्त-सारता, व्यक्ति के सुख, विपुल बुद्धि, मन- स्विंता, सुकुमारता, मध्यम बल, क्लेश न सहन करने का स्वभाव और गर्मी न सह सकने की प्रकृति को बतलाती है ॥१०५॥ शङ्ख-ललाट-कृकाटिकाक्षि-गण्ड-हनु-ग्रीवा-स्कन्धोदर-कक्ष-वक्षः-पाणि- पादसन्धयः गुरुस्थिरमांसोपचिता मांससाराणाम्। सा सारता क्षमां धृति- मलौल्यं वित्तं विद्यां सुखमार्जवमारोग्यं बलमायुश्च दीर्घमाचष्टे ॥१०६॥ मांस-सार वाले पुरुषों में शंख (कनपटी), मस्तक, कृकाटिका (घाटा, गलघेंटी), आंख, गण्डस्थल, ठोड़ी, ग्रीवा, स्कन्ध, पेट, कांख, छाती, पांव, हाथ तथा सन्धियां-स्थिर, गुरु और मांस से भरी होती हैं। यह मांस-सारता क्षमा, धृति, निर्लोभता, वित्त, विद्या, सुख, सरलता, आरोग्य, बल और दीर्घ-आयु को बतलाती है ॥१०६॥ वर्ण-स्वर-नेत्र-केश-लोम-नख-दन्तोष्ठ-मूत्र-पुरीषेषु विशेषतः स्नेहो मेदःसाराणाम्। सा सारता वित्तैश्वर्यसुखोपभोगप्रदानान्यार्जवं सुकुमारो- पचारतां चाऽऽचष्टे ॥ १०७ ॥ मेदःसार वाले पुरुषों में—वर्ण, स्वर, नेत्र, केश, लोम, नख, दांत, ओठ, मूत्र, पुरीष और विशेष कर स्नेह (चिकनाई) होता है। यह सारता वित्त, ऐश्वर्य सुखकर उपभोग सरलता और सुकुमारता को बतलाती है ॥१०७॥

५६६ चरकसंहिता [ अ० ८ पार्र्ष्णि-गुल्फ-जान्वरत्नि-जत्रु-चिबुक-शिरः-पर्व-स्थूलाः स्थूलास्थि-नख- दन्ताश्चास्थिसाराः। ते महोत्साहाः क्रियावन्तः क्लेशसहाः सार-स्थिर- शरीरा भवन्त्यायुष्मन्तश्च ॥ १६८ ॥ अस्थिसार वाले पुरुषो में एड़ी, टखना, घुटना, कलाई, हंसली, चिबुक ( ठोड़ी ), शिर, पोरू ( पर्व ) मोटे होते हैं; नख, दांत और अस्थियां मोटी होती हैं । अस्थिसार वाले मनुष्य बड़े उत्साह वाले, क्रियावान्, क्लेश सहने वाले, सार के कारण स्थिर शरीर वाले और आयुष्मान् होते हैं ॥ १६८ ॥ तन्वङ्गा बलवन्तः स्निग्धवर्णस्वराः स्थूल-दीर्घ-वृत्त-संधयश्च मज्ज- साराः। ते दीर्घायुषो बलवन्तः श्रुत-वित्त-विज्ञानापत्य-संमान-भाजश्च भवन्ति ॥ १६६ ॥ मज्जासारवाले पुरुष छोटे या मृदु अंगवाले बलवान्, स्निग्ध वर्ण और स्वर वाले, स्थूल, लम्बी, गोल संधिवाले होते हैं । ये पुरुष दीर्घायु, बलवान्, श्रुत- वान्, विज्ञानवान्, वित्तवान्, अपत्यवान् और संमानवान्, होते हैं ॥ १६६ ॥ सौम्याः सौम्यप्रेक्षिणश्च क्षीरपूर्णलोचना इव प्रहर्षबहुलाः स्निग्ध- वृत्त-सार-समसंहत-शिखरि-दशनाः प्रसन्नस्निग्धवर्णस्वरा भ्राजिष्णवो महास्फिचश्च शुक्रसाराः। ते स्त्रीप्रियाः प्रियोपभोगा बलवन्तः सुखैश्वर्या- रोग्य-वित्त-संमानापत्य-भाजश्च भवन्ति॥ ११०॥ शुक्रसार वाले पुरुष सौम्यमूर्ति, सौम्य दृष्टि, देखने से ही तृप्त करने वाले, दूध से पूर्ण आंख वाले, अत्यन्त कामोत्तेजना वाले, स्निग्ध वृत्त वाले, सार- वान्, एक समान मिले अंगों और उन्नत दांतो वाले, प्रसन्नस्निग्ध वर्ण स्वर वाले; दीप्तिमान्, बड़े नितम्ब प्रदेश वाले होते हैं। ये पुरुष स्त्रियों के प्रिय, उपभोग को चाहने वाले, बलवान्, सुख, ऐश्वर्य, आरोग्यता, धन और संतान वाले होते हैं ॥ ११० ॥ स्मृतिमन्तो भक्तिमन्तः कृतज्ञाः प्राज्ञाः शुचयो महोत्साहा दक्षा धीराः समरविक्रान्तयोधिनस्त्यक्तविषादाः स्ववस्थित गति-गम्भीर-बुद्धि- चेष्टाः कल्याणाभिनिवेशिनश्च सत्त्वसाराः। तेषां स्वलक्षणैरेव गुणा व्याख्याताः ॥ १११ ॥ सत्त्व ( ओज ) सार वाले पुरुष—स्मृतिमान्, भक्तिमान्, कृतज्ञ, प्राज्ञ, शुचिस्वभाव, महोत्साही, दक्ष, धीर, लड़ाई में पराक्रम पूर्वक लड़ने वाले, शोकरहित, सुव्यवस्थित गति वाले, गम्भीर बुद्धि एवं चेष्टादीक, शुभ कार्यों में ध्यान लगाने वाले होते हैं। इनके लक्षणों से ही इनके गुण कह दिये हैं ॥ १११ ॥

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६७

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६७ तत्र सर्वैः सारैरुपेतः पुरुषा भवन्त्यतिबलाः परमगौरवयुक्ताक्ले- शसहाः सर्वारम्भेष्वात्मनि जातप्रत्ययाः कल्याणाभिनिवेशिनः स्थिर- समाहितशरीराः सुसमाहितगतयः सानुनाद-स्निग्ध-गम्भीर-महास्वराः सुखैश्वर्यवित्तोपभोगसंमानभाजो मन्दजरसो मन्दविकाराः प्रायस्तु- ल्यगुणविस्तीर्णापत्याश्चिरजीविनश्च भवन्ति ॥ ११२ ॥ [ इनमें सब सारों की विशेषता से बल प्रमाण तीन प्रकार का है। यथा—उत्तम, मध्यम और अधम । ] इनमें जो पुरुष उपरोक्त आठों प्रकार के उत्तम सारों से युक्त होते हैं, वे अति बलवान्, अत्यन्त सुख से युक्त, क्लेश सहने वाले, सब कार्यों में समर्थ होने से प्रयत्नवान्, शुभ कार्यों में मन लगाने वाले, स्थिर और संहत शरीर वाले, सुधीर गतिवाले, प्रतिध्वनि से युक्त स्निग्ध, गम्भीर एव महान् स्वर वाले, सुख-ऐश्वर्य, वित्त, संमान का भोग करने वाले, अल्प जरा वाले, थोड़े रोग वाले, प्रायः अपने ही समान तुल्य गुण वाले, बहुत से चिरंजीवी पुत्रोंवाले होते हैं ॥ ११२ ॥ अतो विपरीतास्त्वसाराः ॥ ११३ ॥ इन उपरोक्त लक्षणों से विपरीत लक्षणों वाले पुरुष सारहीन होते हैं ॥११३॥ मध्यानां मध्यैः सारविशेषैर्गुणविशेषा व्याख्याता भवन्ति इति साराण्यष्टौ पुरुषाणां बलप्रमाणविशेषज्ञानार्थान्युपदिष्टानि भवन्ति ॥११४॥ प्रवर और अवर के मध्यस्थ सार विशेषों से मध्यमसार के पुरुष होते हैं । इस मध्यम सार से ही इनके गुण समझ लेने चाहियें । इस प्रकार से बल- प्रमाण को विशेष रूप में जानने के लिये इन सारों की व्याख्या कर दी है ॥११४॥ कथं नु शरीरमात्रदर्शनादेव भिषङ् मुह्येदयमुपचितत्वाद् बलवान्, अयमल्पबलः कृशत्वात्, महाबलवानयं महाशरीरत्वात्, अयमल्पशरीर- त्वादल्पबल इति; दृश्यन्ते ह्यल्पशरीराः कृशाश्चैके बलवन्तः, तत्र पिपी- लिकाभारहरणवत्सिद्धिः । अतश्च सारतः परीक्षेतेत्युक्तम् ॥११५॥ वैद्य केवल शरीरमात्र के दर्शन से धोखा भी खा जाता है, भरा पूरा शरीर होने से यह बलवान् है, यह मनुष्य कृश होने से अल्पबलवाला है, इसका शरीर बड़ा है, इससे यह मनुष्य बड़ा भारी बलवान् है। यह अल्प शरीर होने से अल्पबलवाला है इत्यादि । परन्तु देखा जाता है कि अल्प शरीर वाले और पतले दुबले व्यक्ति भी बलवान् होते हैं । जिस प्रकार चिउंटी अपने से तिगुने चौगुने बोझ को भी उठा लेती है, उसी प्रकार पतले व्यक्ति भी सार के कारण बलवान् होते हैं और वे अनेक कार्य कर लेते हैं। इस कारण सार से परीक्षा करनी चाहिये यह कहा है ॥११५॥

५६८ चरकसंहिता [ अ० ८

संहननतश्चेति—संहननं संघातः संयोजनमित्येकोऽर्थः । तत्र सम-
सुविभक्तास्थि-सुबद्धसंधि-सुनिष्विष्ट-मांस-शोणितं सुसंहतं शरीरमित्युच्यते।
तत्र सुसंहतशरीराः पुरुषा बलवन्तो विपर्ययेणाल्पबलाः, प्रवरावर-
मध्यत्वात् संहननस्य मध्यबला भवन्ति ॥ ११६ ॥
संहनन अर्थात् शरीर की बनावट से भी परीक्षा करनी चाहिये । संहनन,
संघात और संयोजन ये सब शब्द समानार्थक हैं । जिसकी अस्थियां सम-अनुपात
में विभक्त हों, सन्धियां खूब बंधी, मांस और रक्त अच्छी प्रकार से शरीर में
भरा हो, उसको भली प्रकार से संहत शरीरवाला कहते हैं । सुसंहत शरीर वाले
पुरुष बलवान् होते हैं । इसके विपरीत शरीर वाले पुरुष अल्प बल, मध्य शरीर
वाले पुरुष मध्यम बल होते हैं ॥११६॥
प्रमाणतश्चेति—शरीरप्रमाणं पुनर्यथास्वेनाङ्गुलिप्रमाणेनोपदेक्ष्यते
उत्सेधविस्तारायामैर्यथाक्रमम् । तत्र पादौ चत्वारि षट् चतुर्दश
चाङ्गुलानि, जंघे त्वष्टादशाङ्गुले षोडशाङ्गुलपरिक्षेपे, जानुनी चतुर-
ङ्गुले षोडशाङ्गुलपरिक्षेपे, त्रिंशदङ्गुलपरिक्षेपावष्टादशाङ्गुलावूरू,
षडंगुलदीर्घौ वृषणावष्टांगुलपरिणाहौ, शेफः षडंगुलदीर्घं पञ्चांगुल-
परिणाहं, द्वादशांगुलपरिमितो भगः, षोडशांगुलविस्तारा कटी, दशांगुलं
बस्तिशिरः, दशांगुलविस्तारं द्वादशांगुलमुदरं, दशांगुलविस्तीर्णे द्वादशां-
गुलायामे पार्श्वे, द्वादशांगुलविस्तारं स्तनान्तरं, द्वथंगुलं स्तनपर्यन्तं,
चतुर्विंशत्यंगुलविशालं द्वादशांगुलोत्सेधमुरः, द्वथंगुलं हृदयं, अष्टांगुलौ
स्कन्धौ, षडंगुलावंसौ, षोडशांगुलौ प्रबाहू, पञ्चदशांगुलौ प्रपाणी,
हस्तौ दशांगुलौ, कक्षावष्टांगुलौ, त्रिकं द्वादशांगुलोत्सेधं, अष्टादशांगुलो-
त्सेधं पृष्ठं, चतुरंगुलोत्सेधा द्वाविंशत्यंगुलपरिणाहा शिरोधरा, द्वादशां-
गुलोत्सेधं चतुर्विंशत्यंगुलपरिणाहमाननं, पञ्चांगुलमास्यं, चिबुकोष्ठ-
कर्णाक्षिमध्यनासिकाळलाटं चतुरंगुलं, षोडशांगुलोत्सेधं द्वात्रिंशदंगुल-
परिणाहं शिरः—इति पृथक्त्वेनाङ्गावयवानां मानमुक्तम् । केवलं पुनः
शरीरमंगुलिपर्वाणि चतुरशीतिस्तदायामविस्तारसमं समुच्यते। तत्राऽऽ-
युर्बलमोजःसुखमैश्वर्यं वित्तमिष्टाश्चापरे भावा भवन्त्यायत्ताः प्रमाण-
वति शरीरे, विपर्ययस्त्वतो हीनेऽधिके वा ॥ ११७ ॥
प्रमाण द्वारा शरीर की परीक्षा करनी चाहिये । शरीर का प्रमाण प्रत्येक
व्यक्ति को अपनी अंगुलियों से माप कर जानना चाहिये । उत्सेध ( ऊंचाई ),
विस्तार ( व्याध, चौड़ाई ), आयाम लम्बाई ये क्रमानुसार कहेंगे । इनमें-पांव

की ऊंचाई ४, चौड़ाई ६ और लम्बाई चौदह अंगुल हो। टांगें (घुटने से नीचे टखने तक का भाग) लम्बाई में अठारह अंगुल, घेर में १६ अंगुल, घुटने लम्बाई में ४ अंगुल और घेर में १६ अंगुल, जांघें घेर में ३० अंगुल, लम्बाई में १८ अंगुल, वृषण ६ अंगुल लम्बे और गोलाई में आठ अंगुल, शिश्न (लिंग) छ अंगुल लम्बा और गोलाई में पांच अंगुल (सुश्रुत में चार अंगुल), भग (स्त्रीगुह्यांग) १२ अंगुल, कटी १६ अंगुल चौड़ी, बस्ति का शिर (मेढू की जड़ से नाभि प्रदेश तक पेडू) १० अंगुल लम्बा, नाभि से ऊपर और छाती से नीचे लम्बाई में पेट १२ अंगुल लम्बा और १० अंगुल चौड़ा, पार्श्व (दोनो पार्श्व) १० अंगुल चौड़े और १२ अंगुल लम्बे, स्तनों के बीच का अन्तर १२ अंगुल चौड़ा, स्तनप्रान्त दो अंगुल छाती १२ अंगुल ऊंची, २४ अंगुल चौड़ी, (सुश्रुत में १८ अंगुल चौड़ी छाती कही है, यह स्त्री की समझनी चाहिये), हृदय दो अंगुल, स्कन्ध ८ अंगुल, भुजःसंधि (अंस) ६ अंगुल, प्रबाहू (कंधे से नीचे कोहनी तक का भाग) १६ अंगुल, प्रपाणि (कलाई से कोहनी तक का भाग, प्रकोण्ठ) १५ अंगुल, हाथ १० अंगुल, (उसमें भी मध्यम अंगुलि ५ अंगुल, प्रदेशिनी और अनामिका ४।। अंगुल, कनिष्ठा और अंगुष्ठ ३।। अंगुल), दोनो कक्षा ८ अंगुल, त्रिक १२ अंगुल ऊंचा, पीठ १८ अंगुल ऊंची, ग्रीवा ४ अंगुल ऊंची और घेरा २४ अंगुल, मुख (मस्तक से ठोड़ी तक) १२ अंगुल और २४ अंगुल घेर वाला, खुला मुख ५ अंगुल, चिबुक, (दाढ़ी) कान, ओष्ठ, आंखों के बीच का मध्य भाग, नासिका और ललाट ये प्रत्येक चार अंगुल, शिर १६ अंगुल लम्बा, ऊंचा और ३२ अंगुल घेर वाला होता है। इस प्रकार से पृथक् पृथक् अंगों का माप कह दिया है। सम्पूर्ण शरीर पांव से आरम्भ करके शिर तक सारा ८४ अंगुल होता है (सुश्रुत में एक सो बीस अंगुल लम्बाई कही है। यह परिमाण पांव की अग्र-अस्थि से लेकर हाथों को ऊंचे उठाये हुए पुरुष का समझना चाहिये।) प्रमाण तीन प्रकार का है, सम, हीन और अधिक। इनमें जो शरीर लम्बाई और विस्तार में उपरोक्त कहे हुए प्रमाण के समान हो वह 'समप्रमाण' समझना चाहिये। इस प्रकार के समप्रमाण वाले शरीर में आयु, बल, ओज, सुख, ऐश्वर्य्य, धन और अन्य शुभ भाव रहते हैं। इस समपरिमाण से हीन वा अधिक में ये गुण (आयु आदि) नहीं रहते ॥ ११७ ॥ सात्म्यतश्चेति—सात्म्यं नाम यद्यत्सातत्येनोपयुज्यमानमुपशेते । तत्र ये घृत-क्षीर-तैल-मांस-रस-सात्म्यास्सर्व-रस-सात्म्याश्च, ते बलवन्तः

६०० चरकसंहिता [ अ० ८ क्लेशसहाश्चिरजीविनश्च भवन्ति। रूक्षसात्म्याः पुनरेक-रस-सात्म्याश्च ये, ते प्रायेणाल्पबलाश्चाक्लेशसहा अल्पायुषोऽल्पसाधनाश्च। व्यामिश्रसा- त्म्‍यास्तु ये, ते मध्यबलाः सात्म्यनिमित्ततो भवन्ति ॥ ११८ ॥ सात्म्य से परीक्षा करनी चाहिये। जिसके निरन्तर अभ्यास से सुख मिलता है, उसको 'सात्म्य' कहते हैं। इसमें जो पुरुष घी, तैल, दूध, मांस रस का सेवन निरन्तर करते हैं तथा जिनको सब सात्म्य है, वे बलवान्, क्लेश सहने वाले और दीर्घायु होते हैं। जिन पुरुषों को रूक्ष पदार्थ सात्म्य हैं और जो एक ही रस का अभ्यास करते हैं, वे पुरुष प्रायः करके अल्प-बल, थोड़ा कष्ट उठाने वाले, अल्पायु, अल्पक्रिया से गुजारा करने वाले होते हैं। प्रवर और अवर इस मिश्रित सात्म्य वाले पुरुष मध्य सात्म्य के कारण मध्यम बल होते हैं। इसलिये मध्य क्लेश सहन करने वाले, मध्यमायु होते हैं ॥ ११८ ॥ सत्त्वतश्चेति-सत्त्वमुच्यते मनः, तच्छरीरस्य तन्त्रकमात्मसंयो- गात्। तत् त्रिविधं बलभेदेन-प्रवरं मध्यमवरं चेति। अतश्च प्रवर- मध्यावरसत्त्वाश्च भवन्ति पुरुषाः। तत्र प्रवरसत्त्वाः स्वल्पाः, ते सारे- षूपदिष्टाः स्वल्पशरीरा ह्यपि ते निजागन्तुनिमित्तासु महतीष्वपि पीडा- स्वव्यथा दृश्यन्ते, सत्त्वगुणवैशेष्यात्। मध्यसत्त्वास्त्वपरानात्मन्युपनि- धाय संस्तम्भयन्त्यात्मनाऽऽत्मानं परैर्वाऽपि संस्तभ्यन्ते; हीनसत्त्वास्तु नाऽऽत्मना, न च परैः सत्त्वबलं प्रति शक्यन्त उपस्तम्भयितुं, महाशरीरा ह्यपि ते स्वल्पानामपि वेदनानामसहा दृश्यन्ते, संनिहित-भय-शोक-लोभ- मोह-माना रौद्र-भैरव-द्विष्ट-बीभत्स-विकृत-संकथास्वपि च पशुरुषमां- सशोणितानि चावेक्ष्य विषाद-वैवर्ण्य-मूर्च्छान्माद-भ्रम-प्रपतनानामन्यत- ममाप्नुवन्त्यथवा मरणमिति ॥ ११९ ॥ सत्त्व से परीक्षा करनी चाहिये। सत्त्व का अर्थ मन है। यह मन आत्मा के साथ मिलकर इस शरीर को (इन्द्रियों को) प्रेरित करता है। यह सत्त्व- संज्ञा वाला मन बल के भेद से प्रवर मध्य और अवर यह तीन प्रकार का है। इसलिये प्रवर सत्त्व (शुद्ध) मध्यम सत्त्व (राजस) और अवर सत्त्व (तामस) प्रकृति के मनुष्य होते हैं। इनमें प्रवर सत्त्वों का वर्णन 'सत्त्वसार' ओज के वर्णन में (स्मृतिमान् आदि से) कह दिया है। ये प्रवर सत्त्व वाले व्यक्ति छोटे शरीर के होने पर भी शारीरिक एवं आगन्तुज, बड़े रोगों में भी(तीव्र दर्दों में भी) व्यथारहित दीखते हैं, बड़ी पीड़ा को भी कुछ नहीं मानते। इसका कारण सत्त्वगुण की अधिकता है। ये अपने आत्मा से ही अपने को सम्भाल

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०१

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०१ लेते हैं। मध्यम सत्त्व पुरुष तीव्र वेदना को असह्य देख कर वेदना में अपने को अपने आप रोकते हैं, अथवा दूसरे पुरुष इनको सम्भालते हैं। हीन सत्त्व वाले पुरुष स्वयं अपने को सम्भाल नहीं सकते और नहीं दूसरे इनको सम्भाल सकते हैं। ये हीनसत्त्व पुरुष बड़े शरीर वाले होकर भी थोड़ी सी पीड़ा को भी सहन नहीं कर सकते। ये पुरुष भय, शोक, लोभ, मोह, आभान, रौद्र, भैरव, द्विष्ट, बीभत्स और विकृत कथाओं में, और पशु-मनुष्य के मांस-रक्त आदि को देख कर विषाद , विवर्ण, मूर्च्छा, उन्माद, भ्रम, पतन इनमें से किसी एक के वश हो जाते हैं, अथवा मर जाते हैं ॥११६॥ आहारशक्तिश्चेति—आहारशक्तिरभ्यवहरणशक्त्या जरणशक्त्या च परीक्ष्या, बलायुषी ह्याहारायत्ते ॥ १२० ॥ आहार शक्ति से परीक्षा करनी चाहिये—आहार शक्ति की परीक्षा भोजन करने और उसको पचा लेने की शक्ति से करनी चाहिये। क्योंकि बल और आयु आहर के ही अधीन हैं ॥१२०॥ व्यायामशक्तिश्चेति—व्यायामशक्तिरपि कर्मशक्त्या परीक्ष्या कर्मशक्त्या ह्यनुमीयते बलत्रैविध्यम् ॥ १२१ ॥ व्यायाम शक्ति से परीक्षा करनी चाहिये—व्यायाम शक्ति की परीक्षा शरीर में परिश्रम उत्पन्न करने वाले कर्म से करनी चाहिये। कर्म शक्ति से तीनों प्रकार का प्रवर, मध्यम और अवर बल जाना जाता है ॥१२१॥ वयस्तश्चेति, कालप्रमाणविशेषापेक्षिणी हि शरीरावस्था वयोऽभि- धीयते । तद्वयो यथास्थूलभेदेन त्रिविधं—बालं मध्यं जीर्णमिति। तत्र बालमपरिपक्वधातुमाजातव्यञ्जनं सुकुमारमक्लेशसहमसंपूर्णबलं श्लेष्म- धातुप्रायमाषोडशवर्षं, विवर्धमानधातुगुणं पुनः प्रायेणानवस्थितसत्त्व- मात्रिंशद्वर्षमुपदिष्टं,मध्यं पुनः समत्वागत-बल-वीर्य-पौरुष-पराक्रम-ग्रहण- धारण-स्मरण-वचन-विज्ञान-सर्वधातु-गुणं बल-स्थितमवस्थितसत्त्वम- विशीर्यमाण-धातु-गुणं पित्त-धातु-प्रायमाषष्टिवर्षमुपदिष्टं अतः परं परि- हीयमानधात्विन्द्रिय-बल-वीर्य-पौरुष-पराक्रम-ग्रहण-धारणस्मरण-वचन- विज्ञानं भ्रश्यमानधातुगुणं वातधातुप्रायं क्रमेण जीर्णमुच्यते आब- र्षशतं, वर्षशतं खल्वायुषः प्रमाणमस्मिन्काले । सन्ति पुनरधिको- नवर्षशतजीविनो मनुष्याः। तेषां विकृतिवर्जैः प्रकृत्यादिबलविशेषै- रायुषो लक्षणतश्च प्रमाणमुपलक्ष्य वयसस्त्रित्वं विभजेत् ॥ १२२ ॥ आयु से परीक्षा करनी चाहिये—विशेष कालपरिमाण की अपेक्षा से शरीर

की अवस्था का नाम 'वय' कहा जाता है। यह वय अवस्था भेद से तीन प्रकार का है। ( १ ) बाल, ( २ ) मध्य और ( ३ ) जीर्ण, इनमें बाल वय तीस वर्ष तक है। इसमें भी १६ वर्ष तक रस, रक आदि धातु अपरिपक्व रहते हैं, दाढ़ी- मूंछ आदि लक्षण स्पष्ट नहीं होते, शरीर सुकुमार, क्लेश न सहने वाला, असम्पूर्ण बल वाला होता है। इस अवस्था में कफ धातु अधिक होता है। प्रायः करके मन अस्थिर, धातु लगातार बढ़ रहे होते हैं। मध्यम वय—तीस से ऊपर और ६० से नीचे तक की आयु है। बल, वीर्य, विक्रम, पौरुष, पराक्रम, अर्थ का ग्रहण, शब्द आदि का धारण, स्मरण, वचन, विज्ञान, तथा सब धातुओं के गुण, समान अवस्था में पहुंचे होते हैं। इस समय बल स्थिर रहता है मन निश्चल हो जाता है, धातुओं के गुण नष्ट नहीं होते, पित्त प्रधान रहता है। जीर्ण वय—६० वर्ष से ऊपर और १०० वर्ष के बीच के समय को जीर्ण वय कहते हैं। इस समय में धातु, इन्द्रिय, बल, वीर्य, पौरुष, पराक्रम, ग्रहण, धारण, स्मरण, वचन, विज्ञान एवं धातुओं के गुण क्रमशः क्षीण होरहे होते हैं। शरीर में वायु की प्रधानता रहती है। इसलिये इस अवस्था को जीर्ण-अवस्था कहते हैं। इस काल में सौ वर्ष से अधिक या कम जीने वाले पुरुष भी हैं। इन पुरुषों में विकृति को छोड़ कर अन्य प्रकृति आदि बल विशेष से तथा इन्द्रिय स्थान में और शरीर स्थान में कहे हुए लक्षणों से आयु का प्रमाण जान कर आयु के तीन विभाग* करने चाहियें ॥१२२॥ एवं प्रकृत्यादीनां विकृतिवर्ज्यानां भावानां प्रवरमध्यावरविभागेन बलविशेषं विभजेत्। विकृतिबलत्रैविध्येन तु दोषबलं त्रिविधमनु- मीयते। ततो भेषजस्य तीक्ष्णमृदुमध्यविभागेन त्रित्वं विभज्य यथा- दोषं भेषज्यमवचारयेदिति ॥ १२३ ॥ इस प्रकार से विकृति को छोड़ कर प्रकृति से आरम्भ करके वय के अन्त तक कहे हुए गुणों से प्रवर, अवर और मध्य विभाग करके इसके अनुसार रोग के बल का प्रवर, अवर और मध्य विभाग करना चाहिये। विकृति बल के भी तीन विभाग करके उनसे दोषों के तीन प्रकार के बलों का अनुमान किया ☸ सुश्रुत ने आयु का विभाग दोषों के संचय काल की दृष्टि से किया है। चरक में धातुओं की वृद्धि, साम्य और क्षय की दृष्टि से किया है, यह ध्यान रखना चाहिये।

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०३

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०३ जाता है। इसके अनन्तर औषध का भी तीक्ष्ण, मृदु और मध्य रूप से विभाग करके दोष एवं बल के औषध का प्रवर, मध्य और अवर रूप से प्रयोग करे ॥ १२३ ॥ आयुषः प्रमाणज्ञानेहेतोः पुनरिन्द्रियेषु जातिसूत्रीये च लक्षणान्यु- पदेक्ष्यन्ते ॥ १२४ ॥ आयु के प्रमाण को जानने के लिये लक्षण इन्द्रियस्थान में तथा शारीर स्थान के जातिसूत्रीय अध्याय में कहेंगे ॥ १२४ ॥ कालः पुनः संवत्सरश्चाऽऽतुरावस्था च । तत्र संवत्सरो द्विधा त्रिधा षोढा द्वादशधा भूयश्चाप्यतः प्रविभज्यते तत्तत्कार्यमभिसमीक्ष्य । तं तु खलु तावत्षोढा प्रविभज्य कार्यमुपदेक्ष्यते—हेमन्तो ग्रीष्मो वर्षाश्चेति शीतोष्णवर्षलक्षणास्त्रय ऋतवो भवन्ति । तेषामन्तरेष्वितरे साधारण- लक्षणास्त्रय ऋतवः प्रावृट्शरद्वसन्ता इति । प्रावृडिति प्रथमः प्रवृष्टेः कालः, तस्यानुबन्धो हि वर्षाः । एवमेते संशोधनमधिकृत्य षड् विभ- ज्यन्ते ऋतवः ॥ १२५ ॥ काल—संवत्सर और रोगी की अवस्था का नाम 'काल' है। इनमें संवत्सर अयन भेद से दो प्रकार का; शीत, उष्ण, वर्षा भेद से तीन प्रकार का, ऋतु विभाग से छः प्रकार का, मास भेद से बारह प्रकार का, पक्ष भेद से चौबीस प्रकार का, और दिन, प्रहरादि के भेद से अनेक प्रकार का है। कार्य की दृष्टि से इसका विभाग किया जाता है। यहां पर वर्ष का ऋतु विभाग से छः प्रकार का विभाग करके इसके कार्य को कहेंगे। हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा रूप से शीत, उष्ण और बरसात के लक्षणों वाली मुख्यतः तीन ऋतुओं के बीच में भी दूसरी साधारण लक्षणों वाली तीन ऋतुएं होती हैं। यथा—प्रावृट्, शरद् और वसन्त अर्थात् प्रवृष्टि इसका प्रथम प्रारम्भ काल होना 'प्रावृट्' है। इसका पिछला भाग वर्षा-ऋतु । इस प्रकार से संशोधनाधिकार में हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म, प्रावृट्, वर्षा और शरद् ये ऋतुएँ कह दी हैं ॥ १२५ ॥ तत्र साधारणलक्षणेष्वृतुषु वमनादीनां प्रवृत्तिर्विधीयते, निवृत्ति- रितरेषु । साधारणलक्षणा हि मन्दशीतोष्णवर्षत्वात् सुखतमाश्च भव- न्त्यविकल्पकाश्च शरीरौषधानां, इतरे पुनरत्यर्थशीतोष्णवर्षत्वादु दुःखतमाश्च भवन्ति विकल्पकाश्च शरीरौषधानाम् ॥ १२६ ॥ इनमें साधारण लक्षणों वाले समय में जब न बहुत शीत और न बहुत गरमी हो, जैसे प्रावृट्, शरद् और वसन्त ऋतु में वमन आदि कार्यों के करने

६०४ चरकसंहिता [अ० ८ का विधान है। अन्य तीन, अधिक शीत, अधिक उष्ण, अधिक वृष्टि, हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा इन ऋतुओं में वमनादि कार्य नहीं किये जाते। क्योकि साधा- रण लक्षणों वाली ऋतुएं मन्द शीत, मन्द उष्ण और मन्द वर्षा वाली होने से शरीर के लिये अति सुखकारक एवं ओषधियों का नाश न करने वाली होती हैं। इसलिये उनमें वमन आदि कार्य किये जाते हैं। अन्य तीन (हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा) ऋतुएँ अति शीत, अति गरमी और अति वर्षा वाली होने से शरीर के लिये दुःखदायक और ओषधियों का नाश करने वाली होती हैं। इसलिये इन ऋतुओं में वमन आदि उपाय नहीं किये जाते ॥१२६॥ तत्र हेमन्ते ह्यतिमात्रशीतोपहतत्वाच्छरीरमसुखोपपन्नं भवत्यति- शीतवाताध्मातमतिदारुणीभूतमाबद्धदोषं च, भेषजं पुनः संशोधनार्थ- मुष्णस्वभावं शीतोपहतत्वान्मन्दवीर्यत्वमापद्यते, तस्मात्तयोः संयोगे संशोधनमयौगायोपपद्यते, शरीरमपि च वातोपद्रवाय। इनमें से हेमन्त ऋतु में अधिक शीत होने के कारण शरीर को सुख नहीं मिलता। अति शीत और अति वायु से शरीर विक्षुब्ध, अति कठोर और बहुत भारी दोष युक्त एवं अतिस्तम्भ दोष वाला हो जाता है। उष्ण स्वभाव वालो संशोधनकारी औषध भी शीत के अधिक होने से हीनवीर्य रहती है। इसलिये इस अवस्था में शरीर और औषध का संयोग अयोग अर्थात् अनुचित रहता है। शरीर में भी प्रायः वायु के उपद्रव होने लगते हैं। ग्रीष्मे पुनर्ऋतुशोष्णोपहतत्वाच्छरीरमसुखोपपन्नं भवत्युष्णवातातपा- ध्मातमतिशिथिलमत्यन्तप्रविलोपदोषं, भेषजं पुनः संशोधनार्थमुष्णस्व- भावमुष्णानुगमनात्तीक्ष्णतरत्वमापद्यते, तस्मात्तयोः संयोगे संशोधन- मतियोगायोपपद्यते, शरीरमपि पिपासोपद्रवाय। ग्रीष्म ऋतु में गरमी के अधिक होने से शरीर को सुख नहीं मिलता। इसलिये उष्ण वायु और उष्ण धूप से शरीर फूल जाता अति शिथिल तथा गरमी के कारण दोष बहुत अधिक छिपे (घुले) रहते हैं। संशोधन के लिये जो औषध दी जाती है, उसका स्वभाव उष्ण होता है। यह उष्ण स्वभाव की औषध सूर्य की किरणों के योग से अति उष्ण होकर अति तीक्ष्ण हो जाती है। इसलिये इस अवस्था में शरीर और औषध का संयोग 'अतियोग' हो जाता है। शरीर में भी प्यास के उपद्रव होने लगते हैं। वर्षासु तु मेघजालाववृते गूढार्कचन्द्रतारे धाराकुले वियति भूमौ पङ्क-जल-पटल-संवृतायामत्यर्थोपक्लिन्नशरीरेषु भूतेषु विहतस्वभावेषु च