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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

१८८ चरकसंहिता [अ० १५ सुप्रतिविहित-तृण-शरण-पानीयां, जलपाड्याचमनीयोदकोष्ठमणिक-घट- पिठर-पर्योग-कुम्भी-कुम्भ-कुण्ड-शराव-दर्वी-कटोदञ्चन-परिपचन-मन्थान- चर्म-चेल-सूत्र-कार्पासोर्णादीनि च, शयनासनादीनि चोपन्स्त-भृङ्गार- प्रतिग्रहाणि सुप्रयुक्तास्तरणोत्तर-प्रच्छदोपधानानि स्वापाश्रयाणि संवेश- नोपवेशन-स्नेह-स्वेदाभ्यङ्ग-प्रदेह-परिषेकानुलेपन-वमन-विरेचना-स्थापना- नुवासन-शिरोविरेचन-मूत्रोच्चार-कर्मणामुपचारसुखानि, सुप्रक्षालितोप- धानांश्च सुश्लक्ष्ण-खर-मध्यमा दृषदः, शस्त्राणि चोपकरणार्थानि, धूमनेत्रं च, बस्तिनेत्रं चोत्तरवस्तिकं च, कुशहस्तकं च, तुलां च, मानभाण्डं च, घृत-तैल-वसा-मज्ज-क्षौद्र-फाणित-लवणेंधनोदक-मधु-सीधु-सुरा-सौवी- रक-तुषोदक-मैरेय-मेदक-दधि-मण्डोदश्विद्धान्याम्ल-मूत्राणि च, तथा शालि-षष्टिक-मुद्ग-माष-यव-तिल-कुलत्थ-बदर-मृद्वीका-काश्मर्य-परूषका- भयामलक-बिभीतकानि, नानाविधानि च स्नेहस्वेदोपकरणानि द्रव्याणि, तथैवोर्ध्वहरानुलोमिकोभय-भाञ्जि संग्रहणीय-दीपनीय-पाचनीयोपशम- नीय-वातहराणि संख्यातानि चौषधानि, यच्चान्यदपि किंचिद् व्यापदः परिसंख्यायोपकरणं विद्यात्, यच्च प्रतिभांगार्थं; तत्तदुपकल्पयेत् ॥ ७ ॥ इस के उपरान्त पवित्र शुद्ध स्वभाव, निर्मल आचरण के, रोगी से प्रेम रखने वाले, कर्मकुशल, सेवाकर्म में दक्ष, अपने २ कर्म में कुशल ( शिक्षित ) रसोई बनाने में होशियार रसोइये, स्नान कराने वाले, हाथ पांव मलने वाले, शरीर को पकड़ थाम कर खड़ा करने वाले, बिठानेवाले, औषध-दवाई पीसने- वाले सब कार्यों में अनुकूल नौकर, गाने बजाने में चतुर, स्तुतिपाठ करने वाले, श्लोक, गाथा, कहानी, आख्यायिका, बात-चीत, इतिहास, पुराण आदि सुनाने वाले, अभिप्रायों, को उसके इशारों से पहिचाननेवाले, मालिक के मन के अनुकूल, देश, काल को समझने वाले यार-दोस्त, सोसायटी के आदमी वहां रहने चाहियें। इसी प्रकार बटेर, कपिञ्जल ( कबङ्गा ), खरगोश, हरिण; काला हरिण, कालपुच्छ ( हरिण का भेद ), मृगमातृका ( बड़े पेटवाला हरिण, बारहसींगा ), और मेढ़ा इन को भी एकत्र करना चाहिये। दूध देनेवाली, अच्छे शान्त स्वभाव की, रोगरहित, जिसका बछड़ा जीता हो, ऐसी गाय रक्खे। इस गाय के लिये रहने, घास और पानी का अच्छा बन्दोबस्त करे, छोटा पात्र, आचमन का पात्र, पानी रखने का बड़ा पात्र, मणिक ( मटका ), घड़ा, थाली, कड़ाही, बड़ा घड़ा, मजबूत छोटा कलसा, कूंड़ा गहरा बर्तन, तकोरा, ढकन, कड़छी, चटाई, ढांकने का ऊपर का ढकन, तेल पकाने की कड़ाही, रई

( मथानी ), मृगछाल, पुराने ( परन्तु साफ़ धुले ) वस्त्र, सूत, कपास, रूई, ऊन तथा लेटने या बैठने के साधनों ( खाट, तकिया, आसन ) के पास में पानी बरतने का गंगासागर, पीकदान, और सुन्दर सफेद चांदनी की भांति श्वेत चादर और तकिया लगा पलंग, सुखपूर्वक बैठने के लिये गद्दी, तकिया या आराम- कुर्सी, एवं स्नेहन, स्वेदन अभ्यंग, प्रलेप, स्नान, अनुलेपन, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, शिरोविरेचन, मूत्रत्याग ( पेशाब घर ) का स्थान, मल- त्याग का स्थान ( संडास ), उत्तम एवं सुखकारक तथा साधनयुक्त बनावे । स्वच्छ धुली, चिकनी, खुरदरी, मध्यम रूप की पत्थर की शिला ( सिल, दवाई आदि पीसने के लिये ) एवं कैंची, फांवड़ा गण्डासा, दरांती आदि शस्त्र ये सब पदार्थ एकत्र करे । धूमनेत्र-धूम्रनलिका, और उत्तर बस्ति की नलिका, बुहारनी ( झाडू ), तराजू, द्रव मापने के लिये पात्र, घी, तैल, वसा, मज्जा, मधु, राव ( आधा पका गुड़ ), नमक, ईंधन, पानी, मधु, सीधु, सुरा, कांजी, तुषोदक, मैरेय, मेदक, दहो, दही का पानी, छाछ, धान्य, कांजी, आठों प्रकार के मूत्र, शालि ( हेमन्त धान्य ), साठो चावल, मूंग, उड़द, जौ, तिल, कुलत्थी, बेर, किशमिस, फालसा, हरड़, आंवला, बहेड़ा और नाना प्रकार के स्नेह एवं स्वेदन के साधन, वमन, विरेचन के पदार्थ, संग्रहणीय, दीपनीय, पाचनीय, शामक, वातनाशक गण की औषधियां, तथा इनके अतिरिक्त और भी जो साधन या द्रव्य आपत्तियों को दूर करने वाले हों, उनको और जो उपयोग के लिये आवश्यक प्रतीत हों, उन सबका एकत्र करना चाहिये ॥ ७ ॥ ततस्तं पुरुषं यथोक्ताभ्यां स्नेहस्वेदाभ्यां यथार्हमुपपादयेत् । तं चेदस्मिन्नन्तरे मानसः शारीरो वा व्याधिः कश्चित्तीव्रतरः सहसाऽभ्या- गच्छेत्तमेव तावदस्योपावर्तयितुं यतेत । ततस्तमुपावर्त्य तावन्तमेवैनं कालं तथाविधेनैव कर्मणोपचारयेत् ॥ ८ ॥ साधन द्रव्य एकत्र करने के उपरान्त पुरुष को पहिले कही हुई विधि से स्नेह एवं स्वेदन क्रिया करनी चाहिये । स्नेहन और स्वेदन किया करते हुए बीच में यदि सहसा कोई भयानक तीव्र, शारीरिक या मानसिक व्याधि उत्पन्न हो जाय तो स्नेहन और स्वेदन बन्द करके प्रथम उत्पन्न व्याधि का प्रतीकार करना चाहिये । इस उपस्थित रोग के प्रतीकार में जितने दिन लगें, उतने दिनों तक रोग को आराम करना चाहिये ॥८॥ ततस्तं पुरुषं स्नेहस्वेदोपपन्नमनुपहतमनसमभिसमीक्ष्य सुखोषितं प्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातमनुलिप्तगात्रं स्रग्विणमनुपहतवस्त्रसंवीतं देवताग्नि- द्विज-गुरु-वृद्ध-वैद्यानर्चितवन्तं, इष्टे नक्षत्र-तिथि-करण-मुहूर्ते कारयित्वा

१६० चरकसंहिता [ अ० १५ ब्राह्मणान् स्वस्तिवाचनं प्रयुक्ताभिराशीर्भिरभिमन्त्रितां मधु-मधुक- सैन्धव-फाणितोपहितां मदन-फल-कषाय-मात्रां पाययेत् ॥ ६ ॥ फिर मनुष्य को स्नेह एवं स्वेदन क्रिया से युक्त कराकर, सुखपूर्वक बिठाकर, पहिले दिन का खाया भोजन जीर्ण होने पर, सम्पूर्ण अंगों का स्नान कराके, शरीर पर चन्दन-अगरु आदि द्रव्य लगाकर, माला पहिना कर, उत्तम-स्वच्छ वस्त्र पहिने हुए, देवता, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध और वैद्य की पूजा कराकर, पुण्य नक्षत्र, तिथि मुहूर्त में, ब्राह्मणों से मंगल पाठ करवा कर, प्रशस्त मंगल क्रिया- आशीर्वाद मन्त्रों से अभिमन्त्रित शहद, मुलैहटी, सैन्धव नमक, गुड़ से युक्त मदनफल के कषाय को उचित मात्रा में पिलावे ॥६॥ मदनफल-कषाय-मात्राप्रमाणं तु खलु सर्वसंशोधनमात्राप्रमाणानि च प्रतिपुरुषमपेक्षितव्यानि भवन्ति; यावद्धि यस्य संशोधनं पीतं वैकारिक-दोष-हरणायोपपद्यते; न चातियोगायोगाय, तावदस्य मात्रा- प्रमाणं वेदितव्यं भवति ॥ १० ॥ मदनफल के कषाय की मात्रा, तथा सम्पूर्ण संशोधनों की मात्रा प्रत्येक पुरुष को देखकर निश्चित की जाती है। जितनी मात्रा पान करने पर शरीर के विकार जन्य दोषों को बाहर निकाल सके और अतियोग आदि विकार उत्पन्न न करे, उतनी इस संशोधन औषध की मात्रा वैद्य को समझनी चाहिये ॥ पीतवन्तं तु खल्वेनं मुहूर्तमनुकाङ्क्षेत्। तस्य यदा जानीयात्स्वेद- प्रादुर्भावेण दोषं प्रविलयनमापद्यमानं, लोमहर्षेण च स्थानेभ्यः प्रच- लितं, कुक्षिसमाध्मापनेन च कुक्षिमनुगतं, हृल्लासास्यस्रवणाभ्यामपिचो- र्ध्वमुखीभूतमथास्मै जानुसममसम्बाधं सुप्रयुक्तास्तरणोत्तरप्रच्छदोप- धानं स्वापाश्रयमासनमुपवेष्टुं प्रयच्छेत् ॥ ११ ॥ प्रतिग्रहांश्चोपचारयेत्—ललाटप्रतिग्रहे पार्श्वोपग्रहणे नाभिप्रपीडने पृष्ठोन्मर्दने चानपन्नपनीयाः सुहृदोऽनुमताः प्रयतेरन् ॥ १२ ॥ उचित मात्रा में वमन-औषध पिलाकर कुछ काल तक एकाग्र चित्त से ध्यानावस्थित होकर प्रतीक्षा करे और जब पसीना उत्पन्न होकर दोष निकल जावे, शरीर में रोमांच हो तब दोष को अपने स्थान से चलायमान समझे। जब उदर में अफारा प्रतीत हो, उस समय दोष को पेट में आया समझे। जब वमन की इच्छा, और मुख से थूक गिरने लगे उस समय दोष को एकत्र होकर ऊपर की ओर आता हुआ जानना चाहिये। इसके पीछे रोगी मनुष्य को घुटने उठा- कर मिलाकर, बैठने को उत्तम गद्दे और चद्दर तथा तकिये से युक्त खाट देवे।

अ० १५ ] सूत्रस्थानम् १६१

अ० १५ ] सूत्रस्थानम् १६१ वमन करते हुए रोगी को पकड़ कर सहारा देना चाहिये । इसके लिये कोई माथे को, कोई पसलियों को पकड़े, कोई पेट को दबाये, और कोई पीठ को मले । इस कार्य में जिनके सामने लज्जा अनुभव न हो ऐसे मनोऽनुकूल मित्र सहा- यता करें ॥११-१२॥ अथैनमनुशिष्यात् — विवृतौष्ठ-तालु-कण्ठो नातिमहता व्यायामेन वेगानुदीर्णानुदीरयन् किंचिदवनम्य ग्रीवामूर्ध्वशरीरमुपवेगमप्रवृत्तान् प्रवर्तयन सुपरिलिखितनखाभ्यामङ्गुलीभ्यामुत्पल-कुमुद-सौगन्धिक-ना- लैर्वा कण्ठमनभिस्पृशन् सुखं प्रवर्त्तयस्व—इति ॥ १३ ॥ स तथाविधं कुर्यात् । ततोऽस्य वेगान् प्रतिग्रहागतानवेक्षेताव- हितः । वेगविशेषदर्शनाद्धि कुशलो योगायोगातियोगविशेषानुपलभेत, वेगविशेषदर्शी पुनः कृत्यं यथार्हमवबुध्येत लक्षणेन, तस्माद्वेगानवे- क्षेतावहितः ॥ १४ ॥ इसके अनन्तर वैद्य रोगी को उपदेश दे कि तालु और गला खोल कर बहुत अधिक बल से नहीं, प्रत्युत साधारण शक्ति से बाहर आते हुए वेग को बाहर करे । इसके लिये गर्दन, तथा मुख को आगे की ओर झुका दे तथा अनु- पस्थित वेग को बाहर निकालने के लिये खूब अच्छी प्रकार से नखों से रहित दो अंगुलियों, अथवा कमल, कुमुद या सुगन्धित कमल की डण्डों से धीरे-धीरे गले के भीतर स्पर्श करे और वेग को बाहर कर देवे । रोगी वैद्य के कहे अनु- सार करे । वैद्य रोगी के वमन किये पदार्थ को सावधानी से देखे । कुशल, चतुर वैद्य वेग को देख कर ही सम्यक् योग, अयोग और अतियोग का अनु- मान कर सकता है । वेग को समझने में चतुर वैद्य वेग देखकर लक्षणों से अतियोग आदि के प्रतिकार को ठीक प्रकार से समझ लेता है । इसलिये वैद्य सावधानी से वेगों को देखे ॥१३-१४॥ तत्रामुन्ययोग-योगातियोग-विशेषज्ञानानि भवन्ति, तद्यथा-अप्र- वृत्तिः कुतश्चित् केवलस्य वाऽप्यौषधस्य विभ्रंशो विबन्धो वेगानामयो- गलक्षणानि भवन्ति । काले प्रवृत्तिरनतिमहती व्यथा यथाक्रमं दोषह- रणं स्वयं चावस्थानमिति योगलक्षणानि भवन्ति । योगेन तु दोषप्रमाण- विशेषेण तीक्ष्ण-मृदु-मध्यविभागो ज्ञेयः, योगाधिक्येन तु फेनिल-रक्त- चन्द्रिकोपगमनमित्यतियोगलक्षणानि भवन्ति । तत्रातियोगायोगनि- मित्तानमानुपद्रवान् विद्यात्-आध्मानं परिकर्तिकां परिस्रावो हृदयो- पसरणामङ्गग्रहो जीवादानं विभ्रंशः स्तम्भः क्लम उपद्रव इति ॥ १५ ॥

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१६२ चरकसंहिता [ अ० १५ अयोग, सम्यक् योग और अतियोग के विशेष लक्षण ये हैं । जैसे किसी विशेष कारण से ( गले में अंगुली आदि डालने से भी वमन का थोड़ा आना अथवा, वमनकारक औषध ही का केवल बाहर आना,) वेगों का रुक जाना ये अयोग के चिन्ह हैं । न तो बहुत जल्दी और न देर में ठीक समय पर वमन का आना; वमन करने में कष्ट का अधिक न होना, क्रम से पहले कफ, फिर पित्त और अन्त में वायु इन दोषों का बाहर आना; और वमन का अपने आप रुक जाना सम्यक् योग के लक्षण हैं । सम्यक् योग में दोषों के प्रमाणों के अनुसार तीक्ष्ण, मृदु और मध्य भाग होते हैं । वमन के अतियोग से झागदार, रक्तमिश्रित, चन्द्रिका का आना ये अतियोग के लक्षण हैं । अतियोग और अयोग से होने वाले उपद्रवों को जानना चाहिये । अफारा, गुदा में काटने के समान पीड़ा होना, स्राव होना, हृदय का बाहर आना, अर्थात् कलेजे का मुख को आना ( आमाशय का बाहर आना सा प्रतीत होना ), अंगों में वेदना और जकड़ना, रक्त का बाहर निकलना, शरीर का विभ्रम ( चक्कर आना ), शरीर की जड़ता, शरीर में थकान, उदासी का होना, ये अयोग और अतियोग के उपद्रव हैं ॥ १५ ॥ योगेन तु खल्वेनं छर्दितवन्तमभिसमीक्ष्य सुप्रक्षालित-पाणि-पादास्यं मुहूर्तमाश्वास्य, स्नैहिकवैरेचनिकोपशमनीयानां धूमानामन्यतमं साम- र्थ्यतः पाययित्वा, पुनरेवोदकमुपस्पर्शयेत् ॥ १६ ॥ उपस्पृष्टोदकं चैनं निवातमागारमनुप्रवेश्य संवेश्य चानुशिष्यात्— उच्चैर्भाष्यमत्यासनमतिस्थानमतिचङ्क्रमणं क्रोध-शोक-हिमातपावश्याया- तिप्रवातान् यानयानं ग्राम्यधर्ममस्वप्नं निशि दिवा स्वप्नं विरुद्धाजी- र्णासात्म्याकालप्रमितातिहीन-गुरु-विषम-भोजन-वेग-सन्धारणोदीरण- मिति भावानेतान् मनसाऽप्यसेवमानः सर्वमाहारमद्यात्-इति । स तथा कुर्यात् ॥ १७ ॥ सम्यक् योग से वमन कर चुकने पर रोगी को देखकर उसके हाथ पांव, मुख धुलवा कर थोड़ी देर विश्राम लेने दे । इसके पीछे स्नैहिक, वैरेचनिक या उपशमनीय कोई एक प्रकार का धूम यथाशक्ति पिलाकर फिर पानी से हाथ पांव धुला देवे । पानी से मुंह हाथ धुलाकर वमन किये पुरुष को वायुरहित— सीधी वायु जिसमें न आ सके, एक पार्श्व से आये, ऐसे घर में लेजा कर लेटा दे और निम्न आदेश करे—ऊंचा बोलना, बहुत देर बैठना, बहुत सोना, बहुत चलना-फिरना, क्रोध, शोक, ठण्डक, धूप, ओस, वायु में अधिक बैठना, घोड़े आदि की सवारी अधिक करना, मैथुन, रात में जागना, दिन में सोना,

अ० १५ ] १३ सूत्रस्थानम् १६३

अ० १५ ] १३ सूत्रस्थानम् १६३

विरुद्ध भोजन अजीर्ण, असात्म्यप्रकृति के प्रतिकूल, अकाल, कुसमय, मात्रा से कम, गुरु-भारी और विषम भोजन; उपस्थित बेगों को रोकना, अनुपस्थित बेगो को बल पूर्वक बाहर करना, इस प्रकार के कर्मों का विचार मन से भी न करे और सब प्रकार का उचित आहार-भोजन करे। वह रोगी इसी प्रकार करे ॥ १७ ॥

अथैनं सायाह्ने परे वाऽह्रि सुखोदकपरिषिक्तं पुराणानां लोहितशालि- तण्डुलानां स्ववक्लिन्नानां मण्डपूर्वां सुखोष्णां यवागूं पाययेदग्निबलम- भिसमीक्ष्य च, एवं द्वितीये तृतीये चान्नकाले। चतुर्थे त्वन्नकाले तथाविधानामेव शालितण्डुलानामुत्त्वन्नां विलेपीमुष्णोदकद्वितीयाम- स्नेह-लवणामल्प-स्नेह-लवणां वा भोजयेत्, एवं पञ्चमे षष्ठे चान्नकाले, सप्तमे त्वन्नकाले तथाविधानामेव शालीनां द्विप्रसृतं सुस्विन्नमोदनमुष्णो- दकानुपानं तनुना तनु-स्नेह-लवणोपपन्नेन मुद्गयूषेण भोजयेत्, एवमष्टमे नवमे चान्नकाले, दशमे त्वन्नकाले लावकपिञ्जलादीनामन्य- तमस्य मांसरसेनौदकलावणिकेनापि सारवता भोजयेदुष्णोदकानुपानम्, एवमेकादशे द्वादशे चान्नकाले, अत ऊर्ध्वमन्नगुणान् क्रमेणोपभुञ्जानः सप्तरात्रेण प्रकृतिभोजनमागच्छेत् ॥ १८ ॥

इसके पीछे रोगी को सायंकाल अथवा अगले दिन कुछ गरम पानी से सम्पूर्ण अंगों का स्नान कराये। एक साल पुराने सांठी चावलों का यवागू बना कर जब गल जावे, तब थोड़ी गरम यवागू के ऊपर की माण्ड को पहिले पीवे। फिर अग्नि का बल देखकर शेष गाढ़े भाग को खावे। इस प्रकार दूसर तीसरे भोजन के समय भी अग्निबल को देखकर इसी प्रकार का यवागू खावे। चौथे भोजन काल में इसी प्रकार पुराने सांठी के चावलों से (विलेपी रूप में बनाई) थोड़े नमक और स्नेहरहित यवागू को गरम पानी के साथ खाये। (प्रथम दो तीन समयों में जल, नमक और स्नेह नहीं खाना चाहिये)। इस प्रकार पांचवें और छठे अन्न-काल में चौथे समय के अनुसार बरते। सातवें भोजन समय में पुराने सांठी के चावलों को दो प्रसृति लेकर पकाये। इन चावलों को गरम पानी के साथ, थोड़े से घी एवं नमक के साथ मूंग के यूष के साथ खावे। इसी प्रकार आठवें और नवे भोजन के समय में भी करे। दसवें अन्न-काल में बटेर, कपिञ्जल आदि किसी पशु-पक्षी के मांस रस के साथ धनी व भाई चावलों की यवागू खाये, तथा गरम पानी ऊपर से पीये। इसी प्रकार ग्यारहवें और बारहवें अन्न-काल में क्रम से, मृदु, मध्य, कठिन (अथवा

१६४ चरकसंहिता [ अ० १५ गुरु, कठिन मधुर ) पदार्थों को सेवन करने पर सात दिन पीछे अपने स्वाभाविक भोजन को ग्रहण करे ॥१८॥ अथैनं पुनरेव स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्यानुपहतमनसमभिसमीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं कृत-होम-बलि-मङ्गल-जप्य-प्रायश्चित्तमिष्टति- थि-नक्षत्र-करण-मुहूर्ते ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा त्रिवृत्कल्काक्षमात्रं यथार्हालोडनप्रतिविनीतं पाययेत् प्रसमीक्ष्य दोष-भेषज-देश-काल-बल- शरीराहार-सात्म्य-सत्त्व-प्रकृति-वयसामवस्थान्तराणि विकारांश्च । सम्यग्विरिक्तं चैनं वमनानन्तरलक्षणोक्तेन धूमवर्जेन विधिनोपपादये- दाबल-वर्ण-प्रकृति-लाभात् । बलवर्णोपपन्नं चैनमनुपहतमनसमभिस- मीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातमनुलिप्तगात्रं स्रग्विणमनुप- हत-वरू-संवीतमनुरूपालङ्कारालङ्कृतं सुहृदां दर्शयित्वा ज्ञातीनां दर्शयेत् , अथैनं कामेष्ववसृजेत् ॥ १९ ॥ भवन्ति चात्र--अनेन विधिना राजा राजमात्रोऽथवा पुनः । यस्य वा विपुलं द्रव्यं स संशोधनमहर्हति ॥ २० ॥ दरिद्रस्त्वापदं प्राप्य प्राप्तकालं विरेचनम् । पिबेत्काममसंभृत्य संभारानपि दुर्लभान् ॥ २१ ॥ न हि सर्वमनुष्याणां सन्ति सर्वपरिच्छदाः । न च रोगा न बाधन्ते दरिद्रानपि दारुणाः ॥ २२ ॥ यद्यच्छक्यं मनुष्येण कर्तुमौषधमापदि । तत्तत्सेव्यं यथाशक्ति वसनान्यशनानि च ॥ २३ ॥ मलापहं रोगहरं बल-वर्ण-प्रसादनम् । पीत्वा संशोधनं सम्यगायुषा युज्यते चिरम् ॥ २४ ॥ इसके सात दिन पीछे जब मनुष्य में बल आजाय, तब फिर स्नेहन और स्वेदन कर्म करके, प्रसन्न मन देखकर, रात्रि में सुखपूर्वक सोने पर, पहिले दिन का खाया भोजन भली प्रकार जीर्ण होने पर, अग्निहोत्र, बलि, मंगल, जप, प्रायश्चित्त करके, पवित्र तिथि, नक्षत्र मुहूर्त्त का विचार करके, ब्राह्मणों से मंगल पाठ करा कर त्रिवृत् कल्क ( विरेचन द्रव्य ) निशोथ के चूर्ण की एक अक्ष मात्रा, योग्य द्रव्य में मिलाकर पिलावे । औषध देते समय दोष, औषध मात्रा, देश, समय, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति, आयु और रोगों की विवेचना कर ले । सम्यक् विरेचन होने पर वमन के पीछे की सम्पूर्ण विधि ( धूम्रपान को छोड़कर ) करे । जब तक कि शरीर में बल कान्ति न आय,

अ० १६ ] सूत्रस्थानम् १८५

अ० १६ ] सूत्रस्थानम् १८५ शरीर स्वाभाविक रूप में न आय, तब तक वमनान्तर की विधि करे। जब बल और वर्ण आजाय, मन भी स्वस्थ हो जाय, तब सुखपूर्वक सुलाकर, खाया हुआ भोजन भली प्रकार पचने पर, सम्पूर्ण अंगों का स्नान कराके चन्दन, अगर आदि शरीर में मलकर, माला, स्वच्छ वस्त्र पहिना कर, सुन्दर बना कर, आभूषणों से आभूषित करके, मित्रों को दिखाकर, जाति, भाई, बन्धुओं को दिखाये और फिर नित्य के उचित आहार-विहार करने की छूट देदे । इस उपरोक्त विधि से राजा अथवा राजा के समान या बहुत धनी आदमी ही संशोधन करवा सकता है। दरिद्र निर्धन व्यक्ति को जब रोग हो जाय और विरेचन लेने का अवसर हो, तो उस समय कठिन उपकरणों को इकट्ठा करना छोड़कर दवाई पान करावे। सब मनुष्यों को सब साधन नहीं जुट सकते और निर्धन व्यक्तियों को भयंकर रोग भी नहीं सताते ऐसा नहीं, आरत्ति काल (रोगावस्था) में मनुष्य जो भी औषध, वस्त्र या खान-पान कर सके, वह यथाशक्ति उसे करना चाहिये। मल- नाशक, रोगनाशक, बल, कान्ति को बढ़ाने वाले संशोधन औषध को पीकर मनुष्य दीर्घायु होता है ॥ २४ ॥ तत्र श्लोकाः—ईश्वराणां वसुमतां वमनं सविरेचनम् । संभारा ये यदर्थं च समानीय प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥ यथा प्रयोज्यं या मात्रा यद्योगस्य लक्षणम् । योगातियोगयोर्यच्च दोषा ये चाप्युपद्रवाः ॥ २६ ॥ यदसेव्यं विशुद्धेन यश्च संसर्जनक्रमः । तत्सर्वं कल्पनाध्याये व्याजहार पुनर्वसुः ॥ २७ ॥ इसमें श्लोक हैं—राजाओं के या धनी पुरुषों के वमन, विरेचन कार्य, उप- करण, इनको एकत्र करने का कारण, मात्रा, प्रयोग विधि, अयोग के लक्षण, योग और अतियोग के दोष, और उपद्रव, संशुद्ध व्यक्ति को क्या सेवन करना, किस प्रकार से छोड़ना, ये सब बातें इस 'कल्पनाध्याय' में पुनर्वसु आत्रेय ने कह दीं। इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने उपकल्पनीयो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ षोडशोऽध्यायः । अथातश्चिकित्साप्राभृतीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

चिकित्साप्राभृतो विद्वान् शास्त्रवान् कर्मतत्परः ।

१६६ चरकसंहिता [ अ० १६ संशोधन कार्य के अनन्तर 'चिकित्सा प्राभृतीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ चिकित्साप्राभृतो विद्वान् शास्त्रवान् कर्मतत्परः । नरं विरेचयति यं स योगात्सुखमश्रुते ॥ ३ ॥ यं वैद्यमानी त्वबुधो विरेचयति मानवम् । सोऽतियोगादयोगाच्च मानवो दुःखमश्रुते ॥ ४ ॥ चिकित्सा-प्राभृत चिकित्सा में कुशल या साधन सम्पन्न विद्वान्, ज्ञानवान्, शास्त्रवान्, आयुर्वेद शास्त्र का अध्ययन किया हुआ, चिकित्सा-कार्य में कुशल वैद्य जिस मनुष्य को वमन, विरेचन द्वारा संशोधन कराता है, वह मनुष्य वमन और विरेचन के सम्यक् योग से सुख भोगता है । अपने को वैद्य मानने वाला मूर्ख वैद्य जिस मनुष्य का वमन विरेचन द्वारा संशोधन कराता है वह मनुष्य वमन-विरेचन के अयोग या अतियोग के कारण दुःख भोगता है ॥३-४॥ दौर्बल्यं लाघवं ग्लानिर्व्याधीनामणताऽरुचिः । हृद्वर्णशुद्धिः क्षुत्तृष्णा काले वेगप्रवर्तनम् ॥ ५ ॥ बुद्धीन्द्रियमनःशुद्धिर्मारुतस्यानुलोमता । सम्यग्विरिक्तलिङ्गानि कायाग्नेश्चानुवर्तनम् ॥ ६ ॥ सम्यग् विरेचन के लक्षण—शरीर में कमजोरी आना, हलकापन, शरीर में ग्लानि (प्रसन्नता का अभाव), रोगों का घटना, भोजन में अनिच्छा, हृदय का शुद्ध होना, रंग का निखरना, भूख प्यास, समय पर वेगों का उपस्थित होना, बुद्धि-इन्द्रिय और मन की शुद्धता, प्रसन्नता, अपान वायु का नीचे को जाना और जाठराग्नि का क्रमशः बढ़ना ये सम्यग् योग के लक्षण हैं ॥ ५-६ ॥ ष्ठीवनं हृदयाशुद्धिरुत्क्लेशः श्लेष्मपित्तयोः । आध्मानमरुचिश्छर्दिर्दौर्बल्यमलाघवम् ॥ ७ ॥ जङ्घोरुसदनं तन्द्रा स्तैमित्यं पीनसागमः । लक्षणान्यविरिक्तानां मारुतस्य च निग्रहः ॥ ८ ॥ विरेचन के अयोग के लक्षण—मुख से थोड़ा २ थूक या ओषध का बाहर आना, हृदय की जड़ता, वमन आने की भांति कफ और पित्त का मुख में आना, पेट में अफारा, भोजन में अनिच्छा, वमन की इच्छा, शरीर में निर्ब- लता का अनुभव न होना, शरीर में भारीपन, जांघ और टांग में पीड़ा, नींद का भान, शरीर के अंगो का गीले वस्त्र के तुल्य ठंडा प्रतीत होना, सरदी-जुकाम होना, और अपान वायु का रुक जाना, ये विरेचन के अयोग के लक्षण हैं ॥७-८॥

अ० १६ ] सूत्रस्थानम् १६७

अ० १६ ] सूत्रस्थानम् १६७ विट्-पित्त-श्लेष्म-वातानामागतानां यथाक्रमम् । परं स्रवति यद्रक्तं मेदोमांसोदकोपमम् ॥ ६ ॥ निःश्लेष्मपित्तमुदकं शोणितं कृष्णमेव वा । तृष्यतो मारुतार्तस्य सोऽतियोगः प्रमुह्यतः ॥ १० ॥ विरेचन के अतियोग के लक्षण—गुदा से प्रथम क्रमानुसार मल, पित्त, कफ और वायु बाहर निकलते हैं, परन्तु पीछे से रक्त बहता है । यह रक्त मांसरस, मेद मिश्रित या कफमिश्रित अथवा पित्तमिश्रित पानी की भांति, या लाल अथवा काला होता है। रोगी को वायु के कारण प्यास और मूर्च्छा आ जाती है, ये अतियोग के लक्षण हैं ॥६-१०॥ वमनेऽतिकृते लिङ्गान्येतान्येव भवन्ति हि । ऊर्ध्वगा वातरोगारच वाग्ग्रहश्चाधिको भवेत् ॥ ११ ॥ चिकित्साप्राभृतं तस्मादुपैयाच्छरणं नरः । युञ्ज्याद्य एनमत्यन्तमायुषा च सुखेन च ॥ १२ ॥ वमन के अतियोग में भी यही विरेचन के अतियोग के लक्षण होते हैं। परन्तु शरीर के कटिभाग से ऊपर वातरोग एवं जबान का रुकना, ये लक्षण विशेष अधिक होते हैं । इसलिये संशोधन कराने वाले मनुष्य को चाहिये कि विद्वान्, कर्मकुशल वैद्य की शरण में जाय जो इस रोगी को वमन-विरेचन द्वारा आयु और सुख से युक्त कर सके, मूढ़ अज्ञानी के पास नहीं ॥११-१२॥ अविपाकोऽरुचिः स्थौल्यं पाण्डुता गौरवं क्लमः । पिडका-कोठ-कण्डूनां संभवोऽरतिरेव च ॥ १३ ॥ आलस्य-श्रम-दौर्बल्यं दौर्गन्ध्यमवसादकः । श्लेष्म-पित्त-समुत्क्लेशो निद्रानाशोऽतिनिद्रता ॥ १४ ॥ तन्द्रा क्लैब्यमबुद्धित्वमशस्त-स्वप्न-दर्शनम् । बल-वर्ण-प्रणाशश्च तृप्यतो बृंहणैरपि ॥ १५ ॥ बहुदोषस्य लिङ्गानि, तस्मै संशोधनं हितम् । ऊर्ध्वं चैवानुलोम्यं च यथादोषं यथाबलम् ॥ १६ ॥ संशोधन योग्य व्यक्ति—अपचन, अरुचि, मोटापा (स्थूलता ), पाण्डुता, निस्तेज, पीलापन, शरीर का भारीपन, बिना परिश्रम के थकान चढ़ना, उदासी, शरीर पर छोटी २ फुन्सियां होना, कोठ ( छप्पे ) उठना, खाज का होना, बेचैनी, आलस्य, थकान, निर्बलता, शरीर से दुर्गन्ध आना, मन को अप्रसन्नता, सुस्ती, कफ या पित्त का बढ़ना, नींद का न आना, अथवा नींद का बहुत

१६८ चरकसंहिता [ अ० १६ आना, नपुंसकता, निरुत्साहता, बुद्धिमान्द्य बुरे भयानक स्वप्नों का आना, बल और कान्ति का नाश होना, पुष्टिकारक आहार खाने पर शरीर का पुष्ट न होना, जिसके शरीर में इनमें से बहुत से लक्षण हों तो उसमें सब दोष बढ़े हैं यह समझकर संशोधन करना हितकारी है । इसलिये अविपाक आदि लक्षणों को देख कर बल और दोष के अनुसार ऊर्ध्व अनुलोमन ( वमन ) या अधो-अनु- लोमन ( विरेचन ) रूपी संशोधन देना हितकारी है ॥ १३-१६ ॥ एवं विशुद्धकोष्ठस्य कायाग्निरभिवर्धते । व्याधयश्चोपशाम्यन्ति प्रकृतिश्चानुवर्तते ॥ १७ ॥ इन्द्रियाणि मनो बुद्धिवर्णश्चास्य प्रसीदति । बलं पुष्टिर्पत्यं च वृषता चास्य जायते ॥ १८ ॥ जरां कृच्छ्रेण लभते चिरं जीवत्यनामयः । तस्मात्संशोधनं काले युक्तियुक्तं पिबेन्नरः ॥ १९ ॥ दोषाः कदाचित्कुप्यन्ति जिता लङ्घनपाचनैः । जिताः संशोधनैर्यै तु न तेषां पुनरुद्भवः ॥ २० ॥ दोषाणां च द्रुमाणां च मूलेऽनुपहते सति । रोगाणां प्रसवानां च गतानामागतिर्ध्रुवा ॥ २१ ॥ भेषजक्षपिते पथ्यमाहारैरेव बृंहणम् । घृत-मांस-रस-क्षीर-हृद्य-यूषोपसंहितैः ॥ २२ ॥ अभ्यङ्गोत्सादनैः स्नानैनिरूहैः सानुवासनैः । तथा स लभते शर्म युज्यते चाऽऽयुषा चिरम् ॥ २३ ॥ संशोधन का फल—इस उपरोक्त विधि से मनुष्य का कोष्ठ ( उदर ) साफ़ होने पर जाठराग्नि बढ़ जाती है, रोग शान्त हो जाते हैं, शरीर स्वाभाविक अवस्था में आ जाता है । इन्द्रियां, मन-बुद्धि और कान्ति निर्मल हो जाती है । शरीर में बल, शक्ति, सामर्थ्य, संतान और पुरुषत्व उत्पन्न हो जाता है । बुढ़ापा देर में आता है और नीरोगी होकर मनुष्य देर तक जीता है । इसलिये मनुष्य दोष-संचयकाल में और संशोधन काल में वमन-विरेचन कार्य को युक्तियुक्त रूप में करे । लंघन ( उपवास ) और पाचन रूपी संशमन क्रिया द्वारा वश में किये हुए दोष कभी फिर भी ( समय मिलने पर ) कुपित हो सकते हैं; परन्तु जो दोष संशोधन कार्य के द्वारा वश में कर लिये जाते हैं, वे फिर कभी भी उत्पन्न नहीं हो सकते । क्योंकि—दोषों या वृक्षों का मूल अवशेष रहने पर रोगों अथवा न नष्ट होने पर रोगों की उत्पत्ति फिर हो जानी सम्भव होती है । औषध द्वारा दोष की जड़ कट जाने पर संशुद्ध हुए पुरुष को पथ्यकारक एवं शरीर

अ० १६] सूत्रस्थानम् १६६

अ० १६] सूत्रस्थानम् १६६ को बढ़ाने वाले भोजन देवे । यथा घी, मांस रस, दूध, हृदय के लिये हितकारी या मन को अच्छे लगने वाले यूष आदि बना कर देवे । शरीर पर तेल मलना, उबटन लगाना, स्नान, निरूह बस्ति, अनुवासनबस्ति का प्रयोग करे । इस प्रकार करने से सुख मिलता है तथा देर तक आयु का भोगता है ॥१७-२३॥ अतियोग होने पर क्या करना चाहिये— अतियोगानुबद्धानां सर्पिःपानं प्रशस्यते । तैलं मधुरकैः सिद्धमथवाऽप्यनुवासनम् ॥ २४ ॥ यस्य त्वयोगस्तं स्निग्धं पुनः संशोधयेन्नरम् । मात्रा-काल-बलापेक्षी स्मरन् पूर्वमनुक्रमम् ॥ २५ ॥ स्नेहने स्वेदने शुद्धौ रोगाः संसर्जने च ये । जायन्तेऽमार्गविहिते तेषां सिद्धिषु साधनम् ॥ २६ ॥ जिन पुरुषों में अतियोग के लक्षण हों, उनके लिये उन-उन रोगों को शान्त करने वाली उन औषधियों से सिद्ध किया घृत पान करावे और मधुक अर्थात् जीवनीयगण से सिद्ध तैल अनुवासन बस्ति के रूप में दे। जिस पुरुष में अयोग के लक्षण हों, उसको फिर से स्नेह और स्वेद देकर, पूर्व कही हुई मात्रा को, समय, बल आदि को क्रम से स्मरण करता हुआ, फिर से संशोधन के लिये देवे । स्नेहन, स्वेदन संशोधन और पेयादि क्रम से विधिपूर्वक क्रिया न होने से जो रोग उत्पन्न हो जाते हैं, उनको चिकित्सा 'सिद्धिस्थान' में कहेंगे । पहले जो मात्रा दी थी दुबारा उससे कुछ अधिक देवे ॥२४-२६॥ जायन्ते हेतुवैषम्याद्विषमा देहधातवः । हेतुसाम्यात्समास्तेषां स्वभावोपरमः सदा ॥ २७ ॥ प्रवृत्तिहेतुर्भावानां न निरोधेऽस्ति कारणम् । केचित्स्वत्रापि मन्यन्ते हेतुं हेतोरवर्तनम् ॥ २८ ॥ शरीर को धारण करने वाले जो धातु हैं वे कारणों की विषमता अर्थात् बढ़ने या घटने से बढ़ते या घटते हैं और शरीर के धातु कारण की समानता से समान रहा करते हैं। विषम और सम धातुओं का सदा स्वभाव से नाश होता है। इस समता और विषमता की निरन्तर प्रवृत्ति में ऐसा कारण रहता है जिससे कि उनका वृद्धि और क्षय होता है, अर्थात् साम्य या विषमता के होने में कोई कारण अवश्य होता है, बिना कारण इनके स्वाभाविक धर्म में अन्तर नहीं आता । धातु एक क्षण भी विषमावस्था में नहीं रह सकते। यह उनका धर्म है। सब पदार्थों की उत्पत्ति का कारण होता है, परन्तु विनाश कार्य में

स्वभावोपरमे कर्म चिकित्साप्राभृतस्य किम् ॥ २९ ॥

२०० चरकसंहिता [ अ० १६ कारण नहीं होता। इसलिये कुछ आचार्य पदार्थों के निरन्तर विनाश में कारण की अपेक्षा नहीं करते हैं। कुछ विद्वान् पदार्थों के नाश में उत्पादक या प्रवर्तक कारण के अभाव को ही कारण मानते हैं ॥२७-२८॥ एवमुक्तार्थमाचार्यमग्निवेशोऽभ्यभाषत । स्वभावोपरमे कर्म चिकित्साप्राभृतस्य किम् ॥ २९ ॥ भेषजैर्विषमान् धातून् कान समीकुरुते भिषक् । का वा चिकित्सा भगवन् किमर्थं वा प्रयुज्यते ॥ ३० ॥ तच्छिष्यवचनं श्रुत्वा व्याजहार पुनर्वसुः । इस प्रकार कहते हुए आचार्य पुनर्वसु को लक्ष्य करके अग्निवेश बोले— भगवन् ! शरीर की धातुवें जब स्वतः अपने स्वभाव में आ जाती हैं तब चिकित्सा के साधनों से सम्पन्न वैद्य से कर्म साध्य क्या है। फिर क्या काम ? और तब किन विषम हुए धातुओं को ओषधियों से वैद्य समान करता है ? और यदि धातुओं की विषमता ही सदा रहे, तब चिकित्सा क्या वस्तु है ? और यदि विषमता का नाश सदा होना ही अवश्यम्भावी है, फिर वैद्य किस लिये चिकित्सा कर्म करते हैं ? इस प्रकार अग्निवेश के वचन को सुनकर पुनर्वसु आत्रेय बोले॥ श्रूयतामत्र या सौम्य युक्तिर्दृष्टा महर्षिभिः ॥ ३१ ॥ न नाशकारणाभावाद्भावानां नाशकारणम् । ज्ञायते नित्यगस्येव कालस्यात्ययकारणम् ॥ ३२ ॥ शीघ्रगत्वाद्यथाभूतस्तथा भावो विपद्यते । निरोधे कारणं तस्य नास्ति नैवान्यथाक्रिया ॥ ३३ ॥ याभिः क्रियाभिर्जायन्ते शरीरे धातवः समाः । सा चिकित्सा विकाराणां कर्म तद्भिषजां स्मृतम् ॥ ६४ ॥ कथं शरीरे धातूनां वैषम्यं न भवेदिति । समानां चानुबन्धः स्यादित्यर्थं क्रियते क्रिया ॥ ३५ ॥ त्यागाद्विषमहेतूनां समानां चोपसेवनात् । विषमा नानुबध्नन्ति जायन्ते धातवः समाः ॥ ३६ ॥ समैस्तु हेतुभिर्यस्माद्धातून् संजनयेत्समान् । चिकित्साप्राभृतस्तस्माद्दाता देहसुखायुषाम् ॥ ३७ ॥ धर्मस्यार्थस्य कामस्य नृलोकस्योभयस्य च । दाता संपद्यते वैद्यो दानाद्देहसुखायुषाम् ॥ ३८ ॥ हे सौम्य ! जो युक्ति महर्षियों ने बुद्धि द्वारा देखी, वह सुनो। नित्यगमन-

शील काल के नाश के कारण की तरह नाश के कारण के अभाव से पदार्थों के नाश का कारण नहीं जाना जाता। कोई भी पदार्थ जैसा उत्पन्न होता है, वैसा ही शीघ्रगामी होने से नष्ट होता है। उनके विनाश में कोई कारण नहीं है। उनमें किसी संस्कार का आधान नहीं किया जा सकता। पदार्थों के नाश होने के कारण का पता नहीं चलता क्योंकि नाश के कारण का ही अभाव है। जैसे नित्य काल का भी नाश होता दिखाई देता है, परन्तु इस नाश के कारण का पता नहीं चलता, क्योंकि यह काल बहुत शीघ्रगामी है। धातु पदार्थ भी काल के समान बहुत शीघ्रगामी हैं इसलिये इनके नाश का कारण न होने से ही अज्ञात है। धातुओं की पूर्वावस्था के निरोध में भी कोई कारण नहीं है। जिन क्रियाओं के द्वारा शरीर के अन्दर विषम हुए धातु समानावस्था में आते हैं, उन क्रियाओं को रोगों की चिकित्सा कहते हैं, यह 'चिकित्सा' वैद्यों का कर्म है। शरीर के अन्दर धातुओं में विषमता उत्पन्न न हो और समान अवस्था में ही धातु सदा बने रहें, इसलिये चिकित्सा क्रिया की जाती हैं। काल, बुद्धि, इन्द्रियार्थों के अतियोग, अयोग या मिथ्यायोग इन विषम हेतुओं के छोड़ने से, समयोग रूप में कारणों के सेवन करने से धातु विषम नहीं होते, और विषम हुए धातु समान हो जाते हैं। चिकित्सा-कुशल वैद्य समान कारणों से धातुओं को समान बनाने का यत्न करें। इस प्रकार करने से वैद्य शरीर के सुख और आयुष्य अर्थात् दीर्घायु को प्रदान करता है। मनुष्य को शारीरिक सुख और आयुष्य प्रदान करने से वैद्य इहलोक एवं परलोक दोनों लोकों में धर्म, अर्थ और काम ( त्रिवर्ग ) को देने वाला होता है ॥ ३१-३८ ॥ तत्र श्लोकाः—चिकित्साप्राभृतगुणो दोषो यश्चेतराश्रयः । योगायोगातियोगानां लक्षणं शुद्धिसंश्रयम् ॥ ३६ ॥ बहुदोषस्य लिङ्गानि संशोधनगुणाश्च ये । चिकित्सासूत्रमात्रं च सिद्धि-व्यापत्ति-संश्रयम् ॥ ४० ॥ या च युक्तिश्चिकित्सायां यं चार्थं कुरुते भिषक् । चिकित्साप्राभृतेऽध्याये तत्सर्वमवदन्मुनिः ॥ ४१ ॥ चिकित्साप्राभृत में वैद्य के गुण; वैद्य के विपरीत मूढ वैद्य के अवगुण, संशोधन के सम्यकयोग और अतियोग के लक्षण; बहुत दोषों के लक्षण, संशोधन के गुण, चिकित्सा का सूत्र रूप, चिकित्सा के युक्तियुक्त होने में शंका-समाधान;

चिकित्साप्राभृतीयो नाम षोडशोऽध्यायः समाप्तः ॥ १६ ॥

[Page Header: २०२ चरकसंहिता अ० १७]

चिकित्सा का प्रयोजन—ये सब बातें 'चिकित्सा-प्राभृतीय' अध्याय में आत्रेय ऋषि ने उपदेश की हैं ॥ ३६-४१ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने कल्पनाचतुष्के चिकित्साप्राभृतीयो नाम षोडशोऽध्यायः समाप्तः ॥ १६ ॥ इति कल्पनाचतुष्कः समाप्तः ॥ ४ ॥

सप्तदशोऽध्यायः ।

अथातः कियन्तःशिरसीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब रोगों को उपदेश करने की इच्छा से 'कियन्तःशिरसीयं' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ कियन्तः शिरसि प्रोक्ता रोगा हृदि च देहिनाम् ॥ ३ ॥ कति चाप्यनिलादीनां रोगा मानविकल्पजाः । क्षयाः कति समाख्याताः पिडकाः कति चानघ ॥ ४ ॥ गतिः कतिविधा चोक्ता दोषाणां दोषसूदन । अग्निवेश ने पूछा कि हे दोषों को नाश करने वाले महर्षि ! मनुष्यों के शिर सम्बन्धी रोग कितने हैं ? हृदय सम्बन्धी रोग कितने हैं ? वात आदि दोषों के संसर्ग भेद से कुल कितने प्रकार के रोग हो जाते हैं ? क्षय रोग कितने प्रकार के हैं ? पिड़कायें कितनी प्रकार की हैं ? और दोषों की गति कितने प्रकार की है ? कृपा कर कहिये ॥३-४॥ हुताशवेशस्य वचस्तच्छ्रुत्वा गुरुरब्रवीत् ॥ ५ ॥ पृष्टवानसि यत्सौम्य तन्मे शृणु सुविस्तरम् । दृष्टाः पञ्च शिरोरोगाः पञ्चैव हृदयामयाः ॥ ६ ॥ व्याधीनां द्वयधिका षष्टिर्दोष-मान-विकल्पजा । दशाष्टौ च क्षयाः सप्त पिडका माधुमेहिकाः ॥ ७ ॥ दोषाणां त्रिविधा चोक्ता गतिर्विस्तरतः शृणु । सन्धारणाद्दिवास्वप्नाद्रात्रौ जागरणाम्मदात् ॥ ८ ॥ उच्चैर्भाष्यादवश्यायात्प्राग्वातादतिमैथुनात् । गन्धादसात्म्यादाघ्राताद्रजो-धूम-हिमातपात् ॥ ९ ॥

अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०३

अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०३ गुर्वम्ल-हरितदानादतिशीताम्बु-सेवनात् । शिरोभितापाद् दुष्टामाद्रोदनाद् बाष्पनिग्रहात् ॥ १० ॥ मेघागमान्मनस्तापाद्देशकाल-विपर्ययात् । वातादयः प्रकुप्यन्ति शिरस्यस्रं च दुष्यति ॥ ११ ॥ ततः शिरसि जायन्ते रोगा विविधलक्षणाः । अग्निवेश के वचन को सुनकर गुरु महाराज बोले—हे सौम्य ! जो कुछ तुमने पूछा है उसको ध्यान देकर सविस्तर सुनो । शिर के रोग पांच प्रकार के हैं, और पांच ही प्रकार के हृदय रोग हैं। दोषों के वात-पित्त-कफ के परिमाण से होने वाले रोग बासठ (६२) प्रकार के हैं । क्षय अठारह (१८) प्रकार के, प्रमेह मधुमेह के कारण होने वाले फोड़े सात प्रकार के, और दोषों की गति तीन प्रकार की है । इसी को अब विस्तार से सुनो । मूत्र आदि के उपस्थित वेगों को रोकने से, दिन में सोने से, रात्रि में जागने से, नशा करने ( मदकारक पदार्थों के सेवन ) से, ऊँचे या अधिक बोलने से, ओस से, सामने की वायु के झोंके से, अति स्त्री-संभोग से,असात्म्य अर्थात् प्रतिकूल, गंध के सूंघने से, धूल धुवां बर्फ या धूप के सेवन से, गरिष्ठ,खट्टे; धनिया-मरिच आदिके अधिक खाने से बहुत ठण्डे पानी के सेवन से, शिर पर चोट लगने से, आम के दोष युक्त होने से ( अजीर्ण होने से ), रोने से, आंसुओं को रोकने से, बादलों के आने से, मानसिक विक्षोभ से, देश-काल के बदलने से ( इन के अयोग, अतियोग या मिथ्यायोग होने से ), ( अथवा भूकम्प, उल्कापात आदि देश के मिथ्यायोग हैं इनसे वात, पित्त और कफ दूषित होकर शिर में रक्त को दूषित करते हैं । रक्त के दूषित होने से आगे कहे जाने वाले नानाप्रकार के लक्षणों वाले रोग शिर में उत्पन्न होते हैं ॥५-११॥ प्राणाः प्राणभृतां यत्र श्रिताः सर्वेन्द्रियाणि च ॥ १२ ॥ यदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते । प्राणधारियों के प्राण ( जीवन ) और सब इन्द्रियां ( ज्ञानेन्द्रियां ) जहां पर स्थित हैं और जो शरीर के सब अंगों में मुख्य, श्रेष्ठ अंग है, उसको 'शिर' कहते हैं ॥१२॥ अर्धावभेदको वा स्यात्सवं वा रुज्यते शिरः ॥ १३ ॥ प्रतिश्या-मुख-नासाक्षि-कर्ण-रोग-शिरो-भ्रमाः । अर्दितं शिरसः कम्पो गलमन्या-हनुग्रहः ॥ १४ ॥ विविधाश्चापरे रोगा वातादि-क्रिमि-संभवाः ।

२०४ चरकसंहिता [अ० १७ पृथग्दृष्टास्तु ये पञ्च संग्रहे परमर्षिभिः ॥ १५ ॥ शिरोगदांस्तान् शृणु मे यथास्वैर्हेतुलक्षणैः । शिर में उत्पन्न होने वाले रोग — आधे शिर का दुखना, सारे शिर का दुखना, प्रतिश्याय (जुकाम, सर्दी), मुखरोग, नासिका के रोग, आंख के रोग, शिर में चक्कर आना; चेहरे का लक़वा, शिर का हिलना, गलग्रह (गले का बन्द होना), मन्याग्रह (गर्दन का इधर उधर न मुड़ सकना), हनुग्रह (जबड़ा भिचना) और दूसरे वात आदि दोषों तथा कृमियों से उत्पन्न होने वाले रोग शिर में होते हैं। वात, पित्त, कफ, सन्निपात और कृमिजन्य ये जो पांच प्रकार के शिरोरोग (आगे जो अष्टोदरीय अध्याय १६ में) महर्षियों ने कहे हैं उनमें से एक एक लक्षण सुनो ॥ १३-१५॥ उच्चैर्भाष्यातिभाष्याभ्यां तीक्ष्णपानात्प्रजागरात् ॥ १६ ॥ शीत-मारुत-संस्पर्शाद् व्यवायाद् वेगनिग्रहात् । अभिघातोपवासाच्च विरेकाद् वमनादपि ॥ १७ ॥ बाष्प-शोक-भय-त्रासाद् भार-मार्गातिकर्षणात् । शिरोगता वै धमनीर्वायुराविश्य कुप्यति ॥ १८ ॥ ततः शूलं महत्तस्य वातात्समुपजायते । निस्तुद्येते भृशं शङ्खौ घाटा संभिद्यते तथा ॥ १६ ॥ भ्रुवोर्मध्यं ललाटं च तपतीवातिवेदनम् । बध्येते स्वनतः श्रोत्रे निष्कृष्येते इवाक्षिणी ॥ २० ॥ घूर्णतीव शिरः सर्वं संधिभ्य इव मुच्यते । स्फुरत्यतिशिराजालं स्तभ्यते च शिरोधरा ॥ २१ ॥ स्निग्धोष्णमुपशेते च शिरोरोगेऽनिलात्मके । ऊंचे बोलने से, बहुत अधिक बोलने से, मद्य आदि तीक्ष्ण पदार्थों के पीने से, रात्रि में जागने से, ठण्डी वायु के स्पर्श से, अतिमैथुन से, मल मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकने से, उपवास से, शिर पर चोट लगने से, अतिविरेचन से, अतिवमन से, बाष्प (आंसू) को रोकने से, शोक से, भय से, भार के उठाने से, अतिमार्ग के चलने से, परिश्रम से वायु कुपित होकर सिर में गया हुआ, शिराओं में बढ़कर शिर में महान् शूल को उत्पन्न करता है। इस शूल के कारण शंख (कनपटियों) पीड़ित होते हैं, गर्दन फटती है, भ्रुवों के बीच में माथे पर बहुत वेदना होती है और माथा बहुत गरम होता है। कानों में गुंजार (आवाज) सुनाई देती है, आंखें बाहर निकलती प्रतीत होती हैं, शिर घूमता

अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०५

अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०५ हुआ प्रतीत होता है, शिर की सन्धियां फटती प्रतीत होती हैं, शिराओं के अन्दर धड़कन विशेष ( स्पन्दन ) रूप से प्रतीत होती है, गर्दन जड़ बन जाती है, इधर-उधर नहीं हिलाई जा सकती और स्निग्ध और उष्ण क्रिया आराम देत प्रतीत होतो है । ये वातजन्य शिरोरोग के लक्षण हैं ॥१६-२१॥ कट्वम्ल-लवण-क्षार-मद्य-क्रोधातपानलैः ॥ २२ ॥ पित्तं शिरसि संदुष्टं शिरोरोगाय कल्पते । दह्यते रुज्यते तेन शिरः शीतं सुपूयते ॥ २३॥ दह्येते चक्षुषी तृष्णा भ्रमः स्वेदश्च जायते । आस्यासुखैः स्वप्नसुखैर्गुरु-स्निग्धातिभोजनैः ॥ २४ ॥ श्लेष्मा शिरसि संदुष्टः शिरोरोगाय कल्पते । शिरो मन्दरुजं तेन सुप्रस्तिमितभारिकम् ॥ २५ ॥ भवत्युत्पद्यते तन्द्रा तथाऽऽलस्यमरोचकम् । वाताच्छूलं भ्रमः कम्पः पित्ताद्दाहो मदस्तृषा ॥ २६ ॥ कफाद् गुरुत्वं तन्द्रा च शिरोरोगे त्रिदोषजे । तिल-क्षीर-गुडाजीर्ण-पूति-संकीर्ण-भोजनात् ॥ २७॥ क्लेदोऽसृक्कफ-मांसानां दोषमस्योपजायते । ततः शिरसि संक्लेदात्क्रिमयः पापकर्मणः ॥ २८॥ जनयन्ति शिरोरोगं जाता बीभत्सलक्षणम् । व्यथच्छेद-रुजा-कण्डू-शोफ-दौर्गन्ध्य-दुःखितम् ॥ २६ ॥ क्रिमिरोगातुरं विद्यात्क्रिमीणां लक्षणेन च । पित्तजन्य शिरोरोग—कडुवे, खट्टे, नमकीन, क्षार पदार्थों के सेवन से, शराब के पीने से, क्रोध से, धूप से, आग से, पित्त शिर में कुपित होकर शिरोरोग को उत्पन्न करता है । इससे शिर में जलन और पीड़ा होती है, तथा शीत उपचार अनुकूल पड़ता है । आंखें जलती हैं, प्यास होती है, चक्कर आता है, और पसीना आता है । कफजन्य शिरोरोग में निरुद्योगी आलस्य का सुख- मय जीवन व्यतीत करना, दिन में सोना, गुरु, भारी और स्निग्ध घी आदि युक्त पदार्थों के अतिभोजन से; श्लेष्मा अर्थात् कफ शिर में कुपित होकर शिरो- रोग को उत्पन्न करता है । इससे शिर में धीमी २ वेदना होती है, शिर सोया हुआ सा प्रतीत होता है, शिर जड़ हो जाता है, भारी हो जाता है । तन्द्रा, कार्य में अनिच्छा, आलस्य और भोजन में अरुचि उत्पन्न हो जाती है । त्रिदोषजन्य शिरोरोग— वात के कारण चक्कर आना और कम्पन, पित्त के कारण जलन, मूर्च्छा और प्यास, कफ के कारण भारीपन, और तन्द्रा, त्रिदोष जन्य शिरोरोग

२०६ चरकसंहिता [अ० १७ में होती है। कृमि जन्य शिरोरोग—तिल, दूध, गुड़ इनके अधिक सेवन से, अजीर्ण और दुग्धयुक्त सड़ा गला भोजन करने से, संकीर्ण ( बहुत गड़बड़ चीजें मिलाकर) भोजन करने से शिर के वातादि दोष बढ़कर शिर में रक्त, कफ और मांस को दूषित बनाकर रोग उत्पन्न करते हैं। पाप करनेवाले पुरुष के शिर में इस क्लेद से कीड़े उत्पन्न होकर बीभत्स अर्थात् घृणाजनक भयंकर शिरोरोग उत्पन्न करते हैं। इससे काटने, छेदने, के समान पीड़ा, खाज, सूजन, दुर्गन्ध और बहुत अधिक कष्ट होता है। इन लक्षणों को तथा कृमियों को देखकर कृमिरोग समझना चाहिये ॥ २२–२६॥ पांच प्रकार के हृदयरोग— शोकोपवास-व्यायाम-शुष्क-रूक्षालप-भोजनैः ॥ ३० ॥ वायुराविश्य हृदयं जनयत्युत्तमां रुजम् । वेपथुर्वेष्टनं स्तम्भः प्रमोहः शून्यता दरः ॥ ३१ ॥ हृदि वातातुरे रूपं जीर्णे चात्यर्थवेदना । उष्णाम्ल-लवण-क्षार-कटुकाजीर्ण-भोजनैः ॥ ३२ ॥ मद्यक्रोधातपेश्चाशु हृदि पित्तं प्रकुप्यति । हृद्दाहस्तिक्तता वक्त्रे तिक्ताम्लोद्गिरणं क्लमः ॥ ३३ ॥ तृष्णा मूर्च्छा भ्रमः स्वेदः पित्त-हृद्रोगलक्षणम् । अत्यादानं गुरुस्निग्धमचिन्तनमचेष्टनम् ॥ ३४ ॥ निद्रासुखं वाप्यधिकं कफहृद्रोगकारणम् । हृदयं कफहृद्रोगे सुप्त-स्तिमितभारिकम् ॥ ३५ ॥ तन्द्रा-रुचि-परीतस्य भवत्यश्मावृतं यथा । हेतु-लक्षण-संसर्गादुच्यते सान्निपातिकः ॥ ३६ ॥ ( हृद्रोगः कष्टदः कष्टसाध्य उक्तो महर्षिभिः ) त्रिदोषजे तु हृद्रोगे यो दुरात्मा निषेवते । तिल-क्षीर-गुडादीनि ग्रन्थिस्तस्योपजायते ॥ ३७ ॥ मर्मैकदेशे संक्लेदं रसश्चास्योपगच्छति । संक्लेदात्कृमयश्चास्य भवन्त्युपहतात्मनः ॥ ३८ ॥ मर्मैकदेशे संजाताः सर्पन्तो भक्षयन्ति च । तुद्यमानं स हृदयं सूचीभिरिव मन्यते ॥ ३९ ॥ छिद्यमानं यथा शस्त्रैर्जात-कण्डू-महारुजम् । हृद्रोगं क्रिमिजं त्वेतैर्लिङ्गैर्बुद्ध्वा सुदारुणम् । त्वरेत जेतुं तं विद्वान् विकारं शीघ्रकारिणम् ॥४०॥

अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०७

अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०७ ( १ ) शोक, उपवास, व्यायाम ( परिश्रम ), रूक्ष, शुष्क, और स्वल्प भोजनों से कुपित होकर वायु हृदय में जाकर इसको दूषित करके तीव्र वेदना को उत्पन्न करती है। इससे कम्पन, ऐंठन के समान वेदना, जड़ता, मूर्च्छा, शून्यता ( ज्ञान का अभाव ), चक्कर आना आदि लक्षण वातजन्य हृदय वेदना में होते हैं। भोजन के जीर्ण होनेपर ये लक्षण बहुत बढ़ जाते हैं। ( २ ) पित्त- जन्य हृदय शूल—गरम, खट्टे, नमकीन, क्षार, कटु रस के अधिक सेवन से, अजीर्णावस्था में भोजन करने से, मद्यपान से, क्रोध या धूप में बैठने या चलने से, पित्त हृदय में पहुंचकर जल्दी ही कुपित हो जाता है, कुपित होकर तीव्र वेदना उत्पन्न करता है। इस कारण हृदय में जलन, मुख में कडुआपन, खट्टे, पित्तयुक्त डकार का आना, बिना परिश्रम के थकान, प्यास, मूर्च्छा, चक्कर आना, पसीना आना ये पित्तजन्य हृदयशूल के लक्षण हैं। ( ३ ) कफजन्य हृदयशूल—बहुत परिणाम में भोजन करने से, भारी, स्निग्ध पदार्थों के सेवन से, चिन्ता न करने या थोड़ी करने, शारीरिक चेष्टाओं के कम करने से, दिन में बेफिकरी से सोने और अधिक सोने से कफ कुपित होकर हृदय में जाकर रस को दूषित करके हृदयशूल उत्पन्न करता है। इसके कारण हृदय सोया हुआ, सुस्त, गीले वस्त्र से ढंपा हुआ सा, भारी प्रतीत होता है और आलस्य, अरुचि उत्पन्न होती है और ऐसा मालूम होता है कि किसी ने हृदय पर पत्थर रख दिया हो। ( ४ ) त्रिदोषजन्य हृदय शूल—तीनों दोषों के मिलने से, तीनों दोषों के लक्षण उत्पन्न होते हैं, उसको त्रिदोषजन्य हृदयशूल कहते हैं। ( ५ ) कृमि जन्य—त्रिदोषजन्य हृदयरोग में जो दुरात्मा तिल, दूध, गुड़ ( अजीर्णावस्था में भोजन, सड़ा हुआ भोजन, विरुद्ध भोजन आदि ) सेवन करता है, उसके हृदय के एक भाग में ग्रन्थि ( गांठ ) उत्पन्न हो जाती है तथा रस का संक्लिन्न- भाग सड़ने लगता है। रस के संक्लेदन से कृमि उत्पन्न हो जाते हैं। ये कृमि हृदय के एक भाग में उत्पन्न होकर अन्य स्थान में फैलने लगते हैं और हृदय को खाने लगते हैं। इस अवस्था में रोगी को ऐसी वेदना होती है मानो कोई उसके हृदय में सुईयां चुभा रहा है। शस्त्रों से कोई हृदय को काटता है, हृदय में बहुत खाज एवं पीड़ा उठती है। इन लक्षणों को देखकर कृमिजन्य भयानक हृदय रोग को समझकर विद्वान् शीघ्र मृत्यु करने वाले रोग को शान्त करने का यत्न करे ॥३०-४०॥ द्वयुल्बणैकोल्बणैः षट् स्युर्हीनमध्याधिकैश्च षट् । समैश्चैको विकारास्ते सन्निपातास्त्रयोदश ॥ ४१ ॥ संसर्गे नव षट् तेभ्य एकवृद्धया समैस्त्रयः ।