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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

२६२ चरकसंहिता [ अ० २३

त्रयोविंशतितमोऽध्यायः ।
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अथातः सन्तर्पणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे सन्तर्पणीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
संतर्पयति यः स्निग्धैर्मधुरैर्गुरुपिच्छिलैः ।
नवान्नैर्नवमद्यैश्च मांसैश्चानूपवारिजैः ॥ ३ ॥
गोरसैर्गौडिकैश्चान्न्रैः पैष्टिकैश्चातिमात्रशः ।
चेष्टाद्वेषी दिवास्वप्न-शय्यासन-सुखे रतः ॥ ४ ॥
रोगास्तस्योपजायन्ते संतर्पणनिमित्तजाः ।
जो पुरुष स्निग्ध, मधुर, गुरु और पिच्छिल पदार्थों से शरीर का सन्तर्पण
करते हैं, नये अन्न, नवीन मद्य, जलीय प्रदेश में या जलचर प्राणियों के मांस
का सेवन, दूध से बने या गुड़ से बने पदार्थों का या पौष्टिक भोजनों का अति
उपयोग करते हैं, हाथ पांव हिलाने की क्रिया करना पसन्द नहीं करते, दिन में
सोना, आरामतलबी से उठना-बैठना जिन्दगी बसर करना पसन्द करते हैं उनकी
सन्तर्पणजन्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ३-४ ॥
प्रमेह-कण्डू-पिडकाः कोठ-पाण्ड्वामय-ज्वराः ॥ ५ ॥
कुष्ठान्यामप्रदोषाश्च मूत्रकृच्छ्रमरोचकः ।
तन्द्रा क्लैब्यमतिस्थौल्यमालस्यं गुरुगात्रता ॥ ६ ॥
इन्द्रियस्रोतसां लेपो बुद्धेर्मोहः प्रमीलकः ।
शोफाश्चैवंविधाश्चान्ये शीघ्रमप्रतिकुर्वतः ॥ ७ ॥
सन्तर्पणजन्य रोग-प्रमेह, कण्डू, फुन्सियां, कोठ (बर्रै के काटे के समान
चकत्ते), पाण्डु रोग, ज्वर, कुष्ठ रोग, विषूचिका आदि, मूत्रकृच्छ्र, अरुचि,
तन्द्रा, क्लीबता, अतिस्थूलता, आलस्य, शरीर का भारीपन, इन्द्रिय और स्रोतों
का अवरोध, बुद्धिभ्रंश, निरन्तर एक ही बात की चिन्ता, सूजन एवं इसी प्रकार
के अन्य रोग शीघ्र प्रतिकार न करने से उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ५-७ ॥
शस्तमुल्लेखनं तत्र विरेको रक्तमोक्षणम् ।
व्यायामश्चोपवासश्च धूमाश्च स्वेदनानि च ॥ ८ ॥
सक्षौद्रश्चाभयाप्राशः प्रायो रूक्षाश्नसेवनम् ।
चूर्णप्रदेहा ये चोक्ताः कण्डूकोठविनाशनाः ॥ ६ ॥

अ० २३ ] सूत्रस्थानम् २६३

अ० २३ ] सूत्रस्थानम् २६३ त्रिफलारग्वधं पाठां सप्तपर्णं सवत्सकम् । मुस्तं निम्बं समदनं जलेनोलकथितं पिबेत् ॥ १० ॥ तेन मेहादयो यान्ति नाशमभ्यस्यतो ध्रुवम् । मात्राकालप्रयुक्तेन संतर्पणसमुत्थिताः ॥ ११ ॥ ऐसी अवस्था में वमन, विरेचन, रक्तमोक्षण, व्यायाम, उपवास, धूमपान, स्वेद क्रिया, मधु के साथ हरीतकी खाना (या अगस्त्य हरीतकी का खाना), रूक्ष अन्नों का उपयोग, कण्डू और कोठ को नष्ट करने वाले जो चूर्ण या प्रदेह आरग्वधीय अध्याय में कहे हैं उनका सेवन, त्रिफला (हरड़, बहेड़ा, आंवला), अमलतास, पाढ़ल, सतवन, इन्द्रजौ, नागरमोथा, नीम की छाल, मैनफल इनका जल में काढ़ा बनाकर अभ्यास पूर्वक (नित्यप्रति) पीने से प्रमेह आदि रोग जो कि मात्रा और काल में सन्तर्पण क्रिया से उत्पन्न हुए हैं, नष्ट हो जाते हैं॥८-११॥ मुस्तमारग्वधः पाठा त्रिफला देवदारु च । श्वदंष्ट्रा खदिरो निम्बो हरिद्रे त्वक्व वत्सकात् ॥ १२ ॥ रसमेषां यथादोषं प्रातः प्रातः पिबेन्नरः । संतर्पणकृतैः सर्वैर्व्याधिभिः संप्रमुच्यते ॥ १३ ॥ एभिश्चोद्वर्त्तनोद्धर्षस्नानयोगोपयोजितैः । त्वग्दोषाः प्रशमं यान्ति तथा स्नेहोपसंहितैः ॥ १४ ॥ कुष्ठं गोमेदको हिङ्गु क्रौञ्चास्थि त्र्यूषणं वचा । वृषकैलै श्वदंष्ट्रा च खराह्वा चाश्मभेदकः ॥ १५ ॥ तक्रेण दधिमण्डेन बदराम्लरसेन वा । मूत्रकृच्छ्रं प्रमेहं च पीतमेतद् व्यपोहति ॥ १६ ॥ तक्राभयाप्रयोगैश्च त्रिफलायास्तथैव च । अरिष्टानां प्रयोगैश्च यान्ति मेहादयः शमम् ॥ १७ ॥ त्र्यूषणं त्रिफला क्षौद्रं क्रिमिघ्नं साजमोदकम् । मन्थोऽयं सक्तवः सर्पिर्हितो लोहोदकाप्लुतः ॥ १८ ॥ व्योषं विडङ्गं शिग्रूणि त्रिफलां कटुरोहिणीम् । बृहत्यौ द्वे हरिद्रे द्वे पाठां सातिविषां स्थिराम् ॥ १९ ॥ हिङ्गुकेबूकमूलानि यवानीधान्यचित्रकम् । सौवर्चलमजाजी च हबुषां चेति चूर्णयेत् ॥ २० ॥ चूर्ण-तैल-घृत-क्षौद्र-भागाः स्युर्मानतः समाः । सक्तूनां षोडशगुणो भागः संतर्पणं पिबेत् ॥ २१ ॥

२६४ चरकसंहिता [अ० २३ प्रयोगादस्य शाम्यन्ति रोगाः संतर्पणोत्थिताः । प्रमेहा मूढवाताश्च कुष्ठान्यर्शासि कामलाः ॥ २२ ॥ प्लीहा पाण्ड्वामयः शोफो मूत्रकृच्छ्रमरोचकः । हृद्रोगो राजयक्ष्मा च कासः श्वासो गलग्रहः ॥ २३ ॥ क्रिमयो ग्रहणीदोषाः श्वैत्र्यं स्थौल्यमतीव च । नराणां दीप्यते चाग्निः स्मृतिर्बुद्धिश्च वर्धते ॥ २४ ॥ व्यायामनित्यो जीर्णाशी यव-गोधूम-भोजनः । संतर्पणकृतैर्दोषैः स्थौल्यं मुक्त्वा विमुच्यते ॥२५॥ नागरमोथा, अमलतास, पाढ़ल, त्रिफला, देवदारु, गोखरू, खैर की छाल, नीम की छाल, हल्दी, दारूहल्दी, कूड़े की छाल, इन औषधियों से क्वाथ करके दोषानुसार प्रतिदिन प्रातःकाल पीने से, सन्तर्पणजन्य सब व्याधियों से मुक्त हो जाता है। स्नेह साधन द्वारा त्वचा के रोग मिट जाते हैं। कूठ, गोमेदक मणि, (या अंकोल) हींग, कौंच पक्षी की अस्थि, सोंठ, मिरच, पिप्पली, वच, वासा, इलायची, गोखरू, अजवायन, पाषाणभेद इन सब को तक्र या दधिमण्ड के साथ अथवा खट्टे बेरों के रसों के साथ पीने से मूत्रकृच्छ्र और प्रमेह रोग मिटते हैं। छाछ और हरड़ के प्रयोग से या छाछ और त्रिफला के प्रयोग से, या तक्रा- रिष्ट के प्रयोग से (प्रमेह में कहे अरिष्टों के उपयोग से) प्रमेह आदि रोग शान्त होते हैं। सोंठ, मिरच, पिप्पली, त्रिफला मधु, बायविडंग, अजवायन, पानी में घुला (घिसा) अगर, घी और सत्तू इनका मन्थ बनाकर पीने से प्रमेह आदि रोग मिटते हैं। सोंठ, मिरच, पीपल, वायबिडंग, शोभाञ्जन, त्रिफला, कुटकी, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, हल्दी, दारुहल्दी, पाढ़ल, अतीस, पृश्निपर्णी, हींग, केवूक- मूल, अजवायन, धनिया, चीतामूल, सुवर्चल, जीरा हाऊबेर, इनका चूर्ण कर लेना चाहिये। अब चूर्ण के बराबर तेल, घी और शहद प्रत्येक समान भाग मिलाना चाहिये। इसमें जौ के सत्तू का सोलहवां भाग मिला कर खाना चाहिये। इस प्रकार करने से सन्तर्पणजन्य रोग शान्त हो जाते हैं। प्रमेह, मूढ़वात, कुष्ठ, अर्श, कामला, प्लीहा, पाण्डुरोग, शोफ, मूत्रकृच्छ्र, अरुचि, हृदय रोग, राजयक्ष्मा, कास, श्वास, गले का अवरोध, कृमि, ग्रहणी रोग, श्वित्र रोग, अतिस्थूलता रोग नष्ट होते हैं, जाठराग्नि दीप्त होती है और स्मृति एवं बुद्धि बढ़ती है। नित्य व्यायाम करने वाला, पहिले भोजन के जीर्ण होने पर खाने वाला, जौ और गेहूँ का भोजन करने वाला मनुष्य सन्तर्पणजन्य रोगों से मुक्त होता है, तथा स्थूलता का नाश होता है ॥ १२-२५ ॥

अ० २३ ] सूत्रस्थानम् २६५

अ० २३ ] सूत्रस्थानम् २६५

उक्तं संतर्पणोत्थानामपतर्पणमौषधम् ।
वक्ष्यन्ते सौषधाश्चोर्ध्वमपतर्पणजा गदाः ॥ २६ ॥
देहाग्नि-बल-वर्णौजः-शुक्र-मांस-बल-क्षयः ।
ज्वरः कासानुबन्धश्च पार्श्वशूलमरोचकः ॥ २७ ॥
श्रोत्रदौर्बल्यमुन्मादः प्रलापो हृदयव्यथा ।
विण्मूत्रसंग्रहः शूलं जङ्घोरुत्रिकसंश्रयम् ॥ २८ ॥
पर्वास्थिसंधिभेदश्च ये चान्ये वातजा गदाः ।
ऊर्ध्ववातादयः सर्वे जायन्ते तेऽपतर्पणात् ॥ २९ ॥
तेषां संतर्पणं तज्ज्ञैः पुनराख्यातमौषधम् ।
यत्तदात्वे समर्थं स्यादभ्यासे वा तदिष्यते ॥ ३० ॥
सद्यः क्षीणो हि सद्यो वै तर्पणेनोपचीयते ।
नर्ते सन्तर्पणाभ्यासाच्चिरक्षीणस्तु पुष्यति ॥ ३१ ॥
देहाग्नि-दोष-भैषज्य-मात्रा-कालानुवर्तिना ।
कार्यमत्वरमाणे न भेषजं चिरदुर्बले ॥ ३२ ॥
हिता मांसरसास्तस्मै पयांसि च घृतानि च ।
स्नानानि बस्तयोऽभ्यङ्गास्तर्पणास्तर्पणाश्च ये ॥ ३३ ॥
ज्वर-कास-प्रसक्तानां कृशानां मूत्रकृच्छ्रिणाम् ।
तृष्यतामूर्ध्ववातानां हितं वक्ष्यामि तर्पणम् ॥ ३४ ॥
शर्करा-पिप्पली-मूल-घृत-क्षौद्रैः समांशकैः ।
सक्तुद्विगुणितो वृष्यस्तेषां मन्थः प्रशस्यते ॥ ३५ ॥
सक्तवो मदिरा क्षौद्रं शर्करा चेति तर्पणम् ।
पिबेन्मारुतविण्मूत्रकफपित्तानुलोमनम् ॥ ३६ ॥
फाणितं सक्तवः सर्पिर्दधि-मण्डोऽम्ल-काञ्जिकम् ।
तर्पणं मूत्रकृच्छ्रघ्नमुदावर्तहरं पिबेत् ।
मन्थः खर्जूरमृद्वीका-वृक्षाम्लाम्लीक-दाडिमैः ।
परूषकैः सामलकैर्युक्तो मद्यविकारनुत् ॥ ३८ ॥
स्वादुरम्लो जलकृतः सस्नेहो रूक्ष एव वा ।
सद्यः संतर्पणो मन्थः स्थैर्यवर्णबलप्रदः ॥ ३९ ॥
सन्तर्पण से उत्पन्न रोगों की औषध कह दी, अब अपतर्पण को कहते हैं,
तथा अपतर्पण जन्य रोग और उनकी औषध भी कहते हैं—अपतर्पण से ज्वर,
कास एवं कास सम्बन्धी विकार, बल, कान्ति, ओज, शुक्र और मांस का क्षय,
कर्णेन्द्रिय की निर्बलता, उन्माद, प्रलाप, हृदय-पीड़ा, मल-मूत्र का अवरोध,

२६६ चरकसंहिता [ अ० २३ जंघा, ऊरु और त्रिक ( कटि के नीचे ) प्रदेश में दर्द, पर्व, अस्थि और सन्धियों का टूटना, और अन्य वातजन्य रोग यथा ऊर्ध्ववात ( वायु का ऊपर चढ़ना ) आदि रोग अपतर्पण के कारण उत्पन्न होते हैं। अपतर्पण से उत्पन्न इन रोगों के लिये संतर्पण क्रिया औषध है। सन्तर्पण क्रिया दो प्रकार की है। यथा—सद्यः सन्तर्पण और अभ्यास ( क्रमशः शनैः शनैः ) सन्तर्पण। जो मनुष्य सहसा एकदम से क्षीण होता है, वह सद्यः सन्तर्पण क्रिया से पुष्ट होता है और देर से क्षीण हुआ पुरुष बिना अभ्यास जन्य सन्तर्पण के पुष्ट नहीं होता। जो पुरुष देर से निर्बल हो, उसमें शरीर जाठराग्नि, दोष, औषध बल, मात्रा और समय का विचार करके शान्ति से ( जल्दी न करके ) चिकित्सा करनी चाहिये। इस प्रकार के रोगी के लिये मांस, रस, दूध, घी, स्नान, बस्तियां, मर्दन, सन्तर्पण करने वाले मन्थ आदि प्रयोग करने चाहिये। ज्वर, कास के रोगियों के लिये, निर्बलों के लिये, मूत्रकृच्छ्र रोगियों के लिये, प्यास रोगवालों के लिये, ऊर्ध्ववात रोगियों के लिये, हितकारी तर्पण क्रिया का उपदेश करते हैं—शर्करा, पिप्पलीमूल, घी और शहद ये समान भाग लेकर इन सब से दुगुना सत्तू लेकर मन्थ बनाये। सत्तू, मदिरा, शहद और शर्करा इनसे मन्थ तैयार करके वायु, मल, मूत्र के अनुलोमन ( अधोमार्ग से बाहर करने के लिये ) और कफ, पित्त को अनुकूल करने के लिये प्रयोग करना चाहिये। फाणित ( राव ) सत्तू, घी, दधिमण्ड और धान्याम्ल कांजी, इनसे बना मन्थ मूत्रकृच्छ्र नाशक और उदावर्त्त रोग को नष्ट करने वाला तर्पण है। खजूर, मुनक्का, इमली, कोकम, अनारदाना, फालसा और आंवला उनसे बना हुआ मन्थ मदिरा के विकार को नष्ट करता है। खट्टे और मीठे (अनारदाना ) पदार्थों से पानी में बना और घी युक्त या बिना घी के बना हुआ मन्थ सद्यः सन्तर्पण है और स्थिरता, वर्ण कान्ति और बल को देता है ।। २६-३६ ॥ तत्र श्लोकः—संतर्पणोत्था ये रोगा रोगा ये चापतर्पणात् । संतर्पणीये तेऽध्यायं सौषधाः परिकीर्तिताः ॥ ४० ॥ सन्तर्पण और अपतर्पण से उत्पन्न जो जो रोग हैं उनको तथा उनकी औषध को इस सन्तर्पणीय अध्याय में कह दिया ॥ ४० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के सन्तर्पणीयो नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः ॥ २३ ॥

अ० २४ ] सूत्रस्थानम् २६७

अ० २४ ] सूत्रस्थानम् २६७ चतुर्विंशतितमोऽध्यायः । अथातो विधिशोणितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब विधिशोणितीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विधिना शोणितं जातं शुद्धं भवति देहिनाम् । देश-कालोक-सात्म्यानां विधिर्यः संप्रकाशितः ॥ ३ ॥ तद्विशुद्धं हि रुधिरं बल-वर्ण-सुखायुषा । युनक्ति प्राणिनं प्राणः शोणितं ह्यनुवर्तते ॥ ४ ॥ देशसात्म्य, कालसात्म्य और अभ्याससात्म्य की जो विधि कही है उस विधि से मनुष्यों का जो रक्त उत्पन्न होता है, वह यदि विशुद्ध हो तो पुरुष को बल, वर्ण, सुख, आयु से युक्त करता है । क्योंकि प्राणियों के प्राण रक्त का अनुसरण करते रहते हैं ॥ ३-४ ॥ प्रदुष्टबहुतीक्ष्णोष्णमद्यैरन्यैश्च तद्विधैः । तथाऽतितिलवणक्षारैरम्लैः कटुभिरेव च ॥ ५ ॥ कुलत्थ-माष-निष्पाव-तिल-तैल-निषेवणैः । पिण्डालुमूलकादीनां हरितानां च सर्वशः ॥ ६ ॥ जलजानूपशैलानां प्रसहानां च सेवनात् । दध्यम्ल-मस्तु-शुक्तानां सुरासौवीरकस्य च ॥ ७ ॥ विरुद्धानामुपक्लिन्नपूतीनां भक्षणेन च । भुक्त्वा दिवा प्रस्वपतां द्रवस्निग्धगुरूणि च ॥ ८ ॥ अत्यादानं तथा क्रोधं भजतां चाऽऽतपानलौ । छर्दि-वेग-प्रतीघातात्काले चानवसेचनातू ॥ ६ ॥ श्रमाभिघातसंतापैरजीर्णाध्यशनैस्तथा । शरत्कालस्वभावाच्च शोणितं संप्रदुष्यति ॥ १० ॥ ततः शोणितजा रोगाः प्रजायन्ते पृथग्विधाः । रक्त दूषित होने के कारण—अपनी प्रकृति से विपरीत, बहुत तीक्ष्ण, बहुत गरम मद्य अथवा इसी प्रकार के पानकादि ( या अन्न से ), बहुत नमक, क्षार या खटाई से, कडुवे रस से, कुलथी, उड़द, राजशिम्बी, तिल, तैल के खाने से, पिण्डालू ( कंद ग्रन्थि, पांढरी रतालू, अरवी, घुईयां ), मूली, और हरे शाक

२६८ चरकसंहिता [ अ० २४ सब्जियों के खाने से, पानी में रहने वाले तथा जलीय प्रदेश में रहने वाले, तथा पर्वत पर रहने वाले और मांस खाने वाले पक्षियों ( बाज़, चील ) का मांस खाने से, खट्टी दही, मस्तु, शुक्त ( कांजीभेद ), सुरा, सौवीरक ( कांजी भेद ) के खाने से, विरुद्ध, सड़े, गले, दुर्गन्ध युक्त भोजनों के खाने से, भोजन करके दिन में सोने से, तरल, स्निग्ध और भारी पदार्थों के सेवन से, बहुत अधिक खाने से, क्रोध, धूप, और अग्नि के अधिक सेवन से, वमन के वेग को रोकने से, रक्त के दूषित होने के समय ( शरत्काल ) में रक्त का मोक्षण न करने से, परिश्रम से, चोट से, सन्ताप से, अजीर्ण ( बिना भोजन के पचे पुनः खाने ) से, अध्यशन अर्थात् भोजन के जीर्ण हुए बिना फिर भोजन करनें से तथा शरत्काल में स्वभाव से ही रक्त दूषित हो जाता है । रक्त के दूषित होने से नाना प्रकार के रक्तजन्य रोग उत्पन्न होते हैं ॥ ५-१० ॥ मुखपाकोऽक्षिरागश्च पूतिघ्राणास्यगन्धता ॥ ११ ॥ गुल्मोपकुश-वीसर्प-रक्तपित्त-प्रमीलकाः । विद्रधी रक्तमेहश्च प्रदरो वातशोणितम् ॥ १२ ॥ वैवर्ण्यमग्निनाशश्च पिपासा गुरुगात्रता । सन्तापश्चातिदौर्बल्यमरुचिः शिरसश्च रुक् ॥ १३ ॥ विदाहश्चान्नपानस्य तिक्ताम्लोद्गिरणं क्लमः । क्रोधप्रचुरता बुद्धेः संमोहो लवणास्यता ॥ १४ ॥ स्वेदः शरीरदौर्गन्ध्यं मदः कम्पः स्वरक्षयः । तन्द्रा निद्रातियोगश्च तमसश्चातिदर्शनम् ॥ १५ ॥ कण्डूरुकोष्ठपिडकाः कुष्ठचर्मदलादयः । विकाराः सर्व एवैते विज्ञेयाः शोणिताश्रयाः ॥ १६ ॥ शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैरुपक्रान्ताश्च ये गदाः । सम्यक् साध्या न सिध्यन्ति रक्तजांस्तानविभावयेत् ॥ १७ ॥ यथा मुखपाक, आंख की सूजन ( आंख की लालिमा ), नाक से बदबू, मुख का दुर्गन्ध, गुल्म, उपकुश, वीसर्प, रक्त पित्त, प्रमीलक, विद्रधि, रक्त प्रमेह, प्रदर, वातरक्त, विवर्णता, जाठराग्नि का नष्ट होना, प्यास, शरीर का भारीपन, सन्ताप, अतिनिर्बलता, अरुचि, शिर की दर्द, खान-पान का विदाह ( अपचन ), कडुवी या खट्टी डकार आना, निष्क्रियता, क्रोध की अधिकता, बुद्धिभ्रंश, मुख का नमकीनपन, पसीना आना, शरीर की दुर्गन्धता, मद, कम्पन, स्वरनाश, तन्द्रा, निद्रा का अधिक आना और आंखों के सामने

अ० २४ ] सूत्रस्थानम् २६६

अ० २४ ] सूत्रस्थानम् २६६

अन्धकार का अधिक आना, खाज, कोठ, फुन्सियां, कुष्ठ, चर्मदल ( चर्म फटने का विशेष रोग ), ये सब रोग रक्त के आश्रित होते हैं। जो रोग शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष आदि उपक्रमों (चिकित्सा) द्वारा भली प्रकार साध्य होने पर भी सिद्ध न हों तो इन रोगों को रक्तजन्य समझना चाहिये ॥ ११-१७ ॥ कुर्याच्छोणितरोगेषु रक्तपित्तहरीं क्रियाम्। विरेकमुपवासं वा स्रावणं शोणितस्य वा ॥ १८ ॥ बलदोषप्रमाणाद्वा विशुद्ध्या रुधिरस्य वा। रुधिरं स्रावयेज्जन्तौराशयं प्रसमीक्ष्य वा ॥ १६ ॥ चिकित्सा—रक्तजन्य रोगों में रक्त-पित्तनाशक क्रिया करनी चाहिये अर्थात् विरेचन, उपवास, अथवा रक्त का मोक्षण करना चाहिये । बल की मात्रा और रक्तजन्य व्याधि के स्वरूप की मात्रा, जितने रक्त के निकालने से रक्त शुद्ध हो जाय इतने दूषित रक्त के स्थान को देखकर मनुष्य का रक्त ( थोड़ा या बहुत ) निकालना चाहिये ॥ १८-१६ ॥ अरुणाभं भवेद्वाताद्विशदं फेनिलं तनु । पित्तात्पीतासितं रक्तं स्यात्त्यौष्ण्याच्चिरेण च ॥ २० ॥ ईषत्पाण्डु कफाद् दुष्टं पिच्छिलं तन्तुमद्दनम् । द्विदोषलिङ्गं संसर्गात् त्रिलिङ्गं सान्निपातिकम् ॥ २१ ॥ वायु से दूषित रक्त लाल रंग का, विशद स्वच्छ, झागदार पतला होता है। पित्त से दूषित रक्त पीला, काला, घन ( सान्द्र ), बहुत गरम और जड़ होता है। कफ से दूषित रक्त थोड़ा पीला, पिच्छिल, तन्तु ( तागे जैसा ) और घन ठोस होता है। दो दोषों के संसर्ग होने से दो दोषों के लक्षण होते हैं और तीन दोषों के मिलने से तीनों दोषों के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ॥ २०-२१ ॥ तपनीयेन्द्रगोपाभं पद्मालक्तकसन्निभम् । गुञ्जाफलसवर्णं च विशुद्धं विद्धि शोणितम् ॥ २२ ॥ नात्युष्णशीतं लघु दीपनीयं रक्तेऽपनीते हितमन्नपानम् । तदा शरीरं ह्यनवस्थितासृगग्निविशेषेण च रक्षितव्यः ॥ २३ ॥ प्रसन्नवर्णेन्द्रियमिन्द्रियार्थानिच्छन्तमव्याहतपक्तृवेगम् । सुखान्वितं पुष्टिबलोपपन्नं विशुद्धरक्तं पुरुषं वदन्ति ॥ २४ ॥ तदा तु रक्तवाहिनि रससंज्ञावहानि च । पृथक् पृथक् समस्ता वा स्रोतांसि कुपिता मलाः ॥ २५ ॥ विशुद्ध रक्त का लक्षण—तपे हुए स्वर्ण ( कुन्दन ) के समान, बीर-

२७० चरकसंहिता [ अ० २४ बहूटी के रंग का, लाल कमल या माहवर (जिसे औरतें पैर के तलुवों पर लगाती हैं) के समान रंग, लाल रत्ती के रंग के समान विशुद्ध रक्त का रंग होता है । रक्त मोक्षण करने के उपरान्त न तो बहुत गरम और न बहुत ठण्डा, लघु एवं दीपक (अग्नि को बढ़ाने वाला), खान-पान सेवन करना चाहिये । रक्त मोक्षण होने से शरीर का रक्त अनवस्थित अस्थिर होता है (रक्त का वेग बहुत चंचल होता है), इसलिये अग्नि की रक्षा विशेष रूप से करनी चाहिये, इसको मन्द नहीं होने देना चाहिये । विशुद्ध रक्तवाले पुरुष का लक्षण—जिस पुरुषका वर्ण कान्ति और इन्द्रियां निर्मल हों, इन्द्रियां अपने विषयों की इच्छा करें, जाठराग्नि का बलू तथा मल-मूत्र आदि की प्रवृत्ति बिना रुकावट के हों, मनुष्य का मन आनन्द अनुभव करे, प्रसन्नता और बल दीखता हो, उस पुरुष का रक्त शुद्ध जानना चाहिये ॥२५॥ मलिनाहारशीलस्य रजोमोहावृतात्मनः । प्रतिहत्यावतिष्ठन्ते जायन्ते व्याधयस्तदा ॥ २६ ॥ मद-मूर्च्छाय-संन्यासास्तेषां विद्याद्विचक्षणः । तथोत्तरं बलाधिक्यं हेतुलिङ्गोपशान्तिषु ॥ २७ ॥ दुर्बलं चेतसः स्थानं यदा वायुः प्रपद्यते । मनो विक्षोभयन् जन्तोः संज्ञां संमोहयेत्तदा ॥ २८ ॥ पित्तमेवं कफश्चैवं मनो विक्षोभयन्नृणाम् । संज्ञां नयत्याकुलतां विशेषश्चात्र वक्ष्यते ॥ २६ ॥ सक्ताल्पद्रुतताभाषं चलस्खलितचेष्टितम् । विद्याद्वातमदाविष्टं रूक्षश्यावारुणाकृतिम् ॥ ३० ॥ सक्रोधपरुषाभाषं संप्रहारकलिप्रियम् । विद्याद् पित्तमदाविष्टं रक्तपीतासिताकृतिम् ॥ ३१ ॥ स्वल्पसंबन्धवचनं तन्द्रालस्यसमन्वितम् । विद्यात्कफमदाविष्टं पाण्डुं प्रध्यानातत्परम् ॥ ३२ ॥ सर्वाण्येतानि रूपाणि सन्निपातकृते मदे । जायते शाम्यति त्वाशु मदो मद्यमदाकृतिः ॥ ३३ ॥ यश्च मद्यमदः प्रोक्तो विषजो रौधिरश्च यः । सर्व एते मदा नर्ते वातपित्तकफत्रयात् ॥ ३४ ॥ मलिन आहार खाने वाले एवं रज और तम से आवृत मन वाले के कुपित वात, पित्त, कफ दोष पृथक् पृथक् या मिलकर रसवाही, रक्तवाही या संज्ञावाही

अ० २४ ] सूत्रस्थानम् २७१

अ० २४ ] सूत्रस्थानम् २७१ स्रोतों को रोक लेते हैं, तब निम्न लिखित रोग उत्पन्न होते हैं । यथा—मद, मूर्च्छा और संन्यास ये रोग होते हैं । इन तीनों दोषों के हेतु, लिङ्ग ( लक्षण ) और शान्ति, उपचार में उत्तरोत्तर बल की अधिकता रहती है । अर्थात् मद से अधिक मूर्च्छा में और मूर्च्छा से अधिक संन्यास में बल की अधिकता रहती है। जिस समय चेतना का स्थान हृदय निर्बल हो जाता है और यहां पर वायु का प्रकोप हो, तब वह मन को क्षोभित करके मनुष्य की संज्ञा ( चेतना ) को ढांप लेता है, पित्त और कफ ही मन का विक्षोभ उत्पन्न करके संज्ञा का नाश करते हैं । विशेष रूप से पृथक् पृथक् कहते हैं रुक-रुक कर (तुतलाकर) बोलना, बहुत बोलना, जल्दी-जल्दी बोलना, चलते हुये लड़खड़ा करके गिरते-पड़ते चलना, चेहरे का रंग रूखा, काला, लाल सा होना, वातजन्य मद के लक्षण हैं। क्रोधयुक्त कठोर 'गाली) वाणी बोलना, चोट या आघात करना, झगड़ा करना, चेहरे का रंग लाल, पीला या काला होना, पित्तजन्य मद के लक्षण हैं । थोड़ा परन्तु सम्बन्ध (पूर्वापर सम्बन्ध ) युक्त बोलना, तन्द्रा और आलस्य का होना, चेहरे का रंग धूसरवर्ण, एक ध्यान में मग्न होना ये कफजन्य मद के लक्षण हैं। सन्निपातजन्य मद में सब दोषों के लक्षण मिलते हैं । मद्यजन्य मद में आकृति शराबी पुरुष के समान होती है और यह मद जल्दी चढ़ता है और जल्दी उतर जाता है । मद्यजन्य, विषजन्य, रक्तजन्य और दोषजन्य ये चारों प्रकार के मद, वात, पित्त, कफ को छोड़कर नहीं होते हैं ॥ २६-३४ ॥ नीलं वा यदि वा कृष्णमाकाशमथवाऽरुणम् । पश्यंस्तमः प्रविशति शीघ्रं च प्रतिबुध्यते ॥ ३५ ॥ वेपथुश्चाङ्गमर्दश्च प्रपीडा हृदयस्य च । काश्यं श्यावाऽरुणा छाया मूर्च्छा ये वातसंभवे ॥ ३६ ॥ रक्तं हरितवर्णं वा वियत्पीतमथापि वा । पश्यंस्तमः प्रविशति सस्वेदश्च प्रबुध्यते ॥ ३७ ॥ सपिपासः ससन्तापो रक्तपीताकुलेक्षणः । संभिन्नवर्चाः पीताभो मूर्च्छाये पित्तसंभवे ॥ ३८ ॥ मेघसंकाशमाकाशमावृतं वा तमोधनैः । पश्यंस्तमः प्रविशति चिराच्च प्रतिबुध्यते ॥ ३६ ॥ गुरुभिः प्रावृतैरङ्गैर्यथैवाऽऽर्द्वेण चर्मणा । सप्रसेकः सहृल्लासो मूर्च्छा ये कफसंभवे ॥ ४० ॥ सर्वाकृतिः सन्निपातादपस्मार इवाऽऽगतः ।

२७२ चरकसंहिता [ अ० २४ स जन्तुं पातयत्याशु विना बीभत्सचेष्टितैः ॥ ४१ ॥ दोषेषु मदमूर्छायाः कृतवेगेषु देहिनाम् । स्वयमेवोपशाम्यन्ति संन्यासो नौषधैर्विना ॥ ४२ ॥ वाग्देहमनसां चेष्टामाक्षिप्यातिबला मलाः । संन्यस्यन्त्यबलं जन्तुं प्राणायतनसंश्रिताः ॥ ४३ ॥ स ना संन्याससंन्यस्तः काष्ठीभूतो मृतोपमः । प्राणैर्वियुज्यते शीघ्रं मुक्त्वा सद्यःफलां क्रियाम् ॥ ४४ ॥ मूर्छा के लक्षण—आंखों के सामने आकाश नीला या काला अथवा लाल दीखता है, आंखों के सामने अन्धेरा आ जाता हो और मनुष्य मूर्छा से जल्दी ही सचेत हो जाय, शरीर में कम्पन और अंगों में पीड़ा हो, हृदय में वेदना का अनुभव हो, कृशता और छाया, मुख का वर्ण काला या लाल हो जाय, ये वातजन्य मूर्छा के लक्षण हैं । आकाश लाल पीला या हरा दिखाई दे, अन्ध- कार आता दिखाई दे और उठते समय शरीर पर पसीना, प्यास वा जलन हो, आंखें लाल या. पीली, व्याकुल दीखती हों, मल पतला (अतीसार), चेहरे का रंग पीला पड़ जाता है, ये पित्तजन्य मूर्च्छा के लक्षण हैं। आकाश बादलों से घिरा या अन्धकार से आवृत दिखाई दे, अन्धकार सामने आता दिखाई दे, मूर्च्छा से देर में जागृत हो, भारी तथा गीले कपड़े में शरीर ढपा प्रतीत होता हो, (शरीर जकड़ा एवं भारी), मुख से लार बहना, बेचैनी, ये कफजन्य मूर्च्छा के लक्षण हैं । सन्निपात से सब दोषों के लक्षण होते हैं, अपस्मार के समान इसमें वेग आता है। इस रोग में बीभत्स चेष्टाओं (दांतों से काटना, हाथ पांव आदि फेंकने) के बिना मनुष्य गिर पड़ता है। शरीरधारियों में जब मद- मूर्च्छा को उत्पन्न करने वाले दोषों का बल कम हो जाता है, तब ये रोग अपने आप शान्त हो जाते हैं, परन्तु 'संन्यास' रोग विना औषध के अच्छा नहीं होता । अति बलवान् मल वातादि दोष, प्राणायतन (हृदय आदि) अवयवों का आश्रय करके, वाणी, शरीर और मन की क्रियाओं को एकदम से बन्द कर देते हैं, तब मनुष्य निर्बल, निष्क्रिय, क्रियारहित, लकड़ी के समान निर्जीव होकर गिर पड़ता है । इस समय यदि तात्कालिक फल देने वाली क्रियायें ( अंजन, नस्य आदि ) जल्दी न की जायें तो मनुष्य मर जाता है ॥ ३५-४४ ॥ दुर्गेऽम्भसि यथा मज्जद्राजनं त्वरया बुधः । गृह्णीयात्तलमप्राप्तं तथा संन्यासपीडितम् ॥ ४५ ॥ अञ्जनान्यवपीडांश्च धूमः प्रधमनानि च ।

अ० २४ ] १८ सूत्रस्थानम् २७३

अ० २४ ] १८ सूत्रस्थानम् २७३ सूचीभिस्तोदनं शस्त्रैर्दाहः पीडा नखान्तरे ॥ ४६ ॥ लुञ्चनं केशलोम्नां च दन्तैर्दशनमेव च । आत्मगुप्तावघर्षश्च हितास्तस्यावबोधने ॥ ४७ ॥ संमूर्च्छितानि तीक्ष्णानि मद्यानि विविधानि च । प्रभूतकटुयुक्तानि १ तस्यास्ये गालयेन्मुहुः ॥ ४८ ॥ मातुलुङ्गरसं तद्वन्महौषधसमायुतम् । तद्वत्सौवर्चलं २ दद्याद्युक्तं मद्याम्लकाञ्जिकैः ॥ ४९ ॥ हिङ्गूषणसमायुक्तं यावत्संज्ञाप्रबोधनम् । प्रबुद्धसंज्ञमन्नैश्च लघुभिस्तमुपाचरेत् ॥ ५० ॥ विस्मापनैः स्मारणैश्च प्रियश्रुतिभिरेव च । पटुभिर्गीतवादित्रशब्दैश्चित्रैश्च दर्शनैः ॥ ५१ ॥ स्रंसनोल्लेखनैर्धूमैरञ्जनैः कवलग्रहैः । शोणितस्यावसेकैश्च व्यायामोद्धर्षणैस्तथा ॥ ५२ ॥ प्रबुद्धसंज्ञं मतिमाननुबन्धमुपक्रमेत् । तस्य संरक्षितव्यं हि मनः प्रलयहेतुतः ॥ ५३ ॥ गहरे पानी में डूबते हुए बर्त्तन को बुद्धिमान् मनुष्य जिस प्रकार तली में पहुंचने से पूर्व ही पकड़ने का प्रयत्न करता है, उसी प्रकार सन्यास रोगी की गिरने से पूर्व चिकित्सा करनी चाहिये । इसके लिये अंजन ( आंखों में ), अवपीडन ( नासिका में औषधियों का रस डालना ), नाक से धूम्रपान, प्रधमन ( नाक में फुत्कार से औषध पहुंचाना ), सुई चुभोना, शस्त्र आदि को गरम करके दाह करना, नखों में सुई, पिन आदि चुभोना, शिर या शरीर के बालों या लोमों को खींचना, दांतों से काटना, कौंच की फली का शरीर पर मलना, ये कर्म रोगी को चेतन करने के लिये हितकारी हैं। नाना प्रकार के तीक्ष्ण, मूर्च्छित एवं कटु द्रव्य युक्त मद्य रोगी के मुंह में डालने चाहिये । सोठ में मिलकर बिजौरे निम्बू का रस, या मद्य और खट्टी कांजी में सौंचल मिलाकर वा हींग और सोंठ मिरच, पिप्पली इनको मिलाकर देवे, जबतक मनुष्य चेतन हो । चेतन होने पर हल्का भोजन देना चाहिये । चामत्कारिक बातों को सुनाना, पिछली बातों को याद कराना, मन पसन्द कहानी कहना, बढ़िया गाना-बजाना सुनाकर, सुन्दर सुन्दर चित्रों को दिखाकर, विरेचन, वमन, धूम्रपान, अञ्जन, कवल अर्थात् मु ख में औषध या गोली को रखकर, रक्त मोक्षण, व्यायाम कराके, अंगों के मर्दन से निरन्तर मनुष्य को जाग्रत चेतन रखने का यत्न करना १. तिक्तानीति च पाठः । २. सौवर्चकमिति च पाठः ।

चाहिये। रोगी के मन को मोहित ( मूर्च्छा उत्पन्न ) करने वाले कारणों से बचा कर रखना चाहिये ॥ ४५-५३ ॥ स्नेहस्वेदोपपन्नानां यथादोषं यथाबलम् । पञ्च कर्माणि कुर्वीत मूर्च्छायाेषु मदेषु च ॥ ५४ ॥ अष्टाविंशत्यौषधस्य तथा तिक्तस्य सर्पिषः । प्रयोगः शस्यते तद्वन्महतः षट्पलस्य वा ॥ ५५ ॥ त्रिफलायाः प्रयोगो वा सघृतक्षौद्रशर्करः । शिलाजतुप्रयोगो वा प्रयोगः पयसोऽपि वा ॥ ५६ ॥ पिप्पलीनां प्रयोगो वा प्रयोगश्चित्रकस्य वा । रसायनानां कौम्भस्य सर्पिषो वा प्रशस्यते ॥ ५७ ॥ रक्तावसेकाच्छास्त्राणां सतां सत्त्ववतामपि । सेवनान्मदमूर्च्छायाः प्रशाम्यन्ति शरीरिणाम्॥ ५८ ॥ इति ॥ मूर्च्छा और मद रोगों में बल एवं दोष के अनुसार स्वेदन देकर पीछे से वमन, विरेचन, शिरोविरेचन ( नस्य ), आस्थापन और अनुवासन रूपी पंचकर्म करने चाहिये । उन्माद चिकित्सा में कहे ‘पानीय कल्याण घृत’ ( अट्ठाईस दवाइयां ), महातिक्त घृत या महाषट्पल घृत ( कुष्ठ रोग में ) का पान करना उत्तम है। घी, शहद और शर्करा के साथ त्रिफला का प्रयोग करना, अथवा दूध के साथ शिलाजीत का प्रयोग करना, दूध के साथ पिप्पली चूर्ण या चीतामूल का प्रयोग करना, रसायनों तथा दस वर्ष पुराने मटके में रक्खे हुए घी का प्रयोग करना उत्तम है। रक्त मोक्षण, वेद आदि सत् शास्त्रों का पढ़ना, सज्जन, सत्वगुणी, तपस्वी पुरुषों का सत्संग मद मूर्च्छा रोग को शान्त करते हैं ॥ ५४-५८ ॥ तत्र श्लोकौ—विशुद्धं चाविशुद्धं च शोणितं तस्य हेतवः । रक्तप्रदोषजा रोगास्तेषु रोगेषु चौषधम् ॥ ५६ ॥ मद-मूर्च्छाय-संन्यास-हेतु-लक्षण-भेषजम् । विधिशोणितकेऽध्याये सर्वमेतत्प्रकाशितम् ॥ ६० ॥ शुद्ध या अशुद्ध रक्त, इनके कारण, रक्त प्रदोष से उत्पन्न होने वाले रोग, इनकी औषध, मद, मूर्च्छाय, संन्यास रोगों के कारण लक्षण और औषध, ये सब विषय इस ‘विधिशोणित’ अध्याय में कह दिये ॥ ५६-६० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के विधिशोणितीयो नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥ २४ ॥

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २७५

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २७५ पञ्चविंशतितमोऽध्यायः । अथातो यज्जःपुरुषीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब 'यज्जःपुरुषीय' अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥१-२॥ पुरा प्रत्यक्षधर्माणं भगवन्तं पुनर्वसुम् । समेतानां महर्षीणां प्रादुरासीदियं कथा१ ॥ ३ ॥ आत्मेन्द्रियमनोर्थानां योऽयं पुरुषसंज्ञकः । राशिरस्यामयानां च प्रागुत्पत्तिविनिश्चये ॥ ४ ॥ अथ काशिपतिर्वाक्यं वामकोऽर्थवदन्तरा । व्याजहारर्षिसमितिमभिसृत्याभिवाद्य च ॥ ५ ॥ किं नु स्यात् पुरुषो यज्जस्तज्जास्तस्याऽऽमयाः स्मृताः । न वेत्युक्ते नरेन्द्रेण प्रोवाचर्षीन् पुनर्वसुः ॥ ६ ॥ सर्व एवामित-ज्ञान-विज्ञान-च्छिन्न-संशयाः । भवन्तश्छेत्तुमर्हन्ति काशिराजस्य संशयम् ॥ ७ ॥ धर्म के प्रत्यक्ष किये हुए महर्षि आत्रेय एक बार महर्षियों के साथ मिलकर बातचीत करने लगे कि—'आत्मा, इन्द्रिय, मन और विषय' इन से युक्त जो 'पुरुष' बनता है इसकी तथा रोगों की उत्पत्ति किस प्रकार और कहां से होती है ? इस प्रसंग में काशि के राजा वामक ऋषिसभा के सम्मुख अभिवादन करके बोलने लगे—हे भगवन् ! जिन कारणों से पुरुषों की उत्पत्ति होती है, उन्हीं कारणों से रोग उत्पन्न होते हैं, यह मानना संगत है या नहीं ? ऋषि पुनर्वसु ने कहा कि—हे महर्षियों ! तुम सब अपार ज्ञान रखते हो, विज्ञान से तुम्हारे सब सन्देह मिट चुके हैं। आप लोग इन काशिपति के सन्देह को दूर करें ॥७॥ पारीक्षित्स्तत्परीक्ष्याग्रे मौद्गल्यो वाक्यमब्रवीत् । आत्मजः पुरुषो रोगाश्चाऽऽत्मजाः कारणं हि सः ॥ ८ ॥ स चिनोत्युपभुङ्क्ते च कर्म कर्मफलानि च । नह्यते चेतनाधातोः प्रवृत्तिः सुखदुःखयोः ॥ ६ ॥ पारीक्षि मौद्गल्य कहने लगे कि—पुरुष आत्मा से उत्पन्न होता है और रोग भी आत्मा से ही उत्पन्न होते हैं। वही आत्मा आहार-विहारादि कर्मों को १. महर्षय उपासीना प्रादुश्चकुरिमां कथामिति वा पाठः ।

२७६ चरकसंहिता [ अ० २५ करता है और इसीसे आरोग्यता या रोग रूपी कर्मफलों का भोग करता है। क्योंकि 'चेतना धातु' आत्मा के बिना सुख दुःख के हेतु रूप आरोग्यता या व्याधि नहीं हो सकती ॥ ८-६ ॥ शरलोमा तु नेत्याह न ह्यात्माऽऽत्मानमात्मना । योजयेद् व्याधिभिर्दुःखैर्दुःखद्वेषी कदाचन ॥ १० ॥ रजस्तमोभ्यां तु मनः परीतं सत्त्वसंज्ञकम् । शरीरस्य समुत्पत्तौ विकाराणां च कारणम् ॥ ११ ॥ शरलोमा ऋषि बोले—यह ठीक नहीं। क्योंकि आत्मा स्वभाव से दुःखों से द्वेष रखने वाला 'आनन्दमय' है। इसलिये आत्मा अपने आपको व्याधियों के कष्टों से युक्त नहीं करेगा। वास्तव में, 'सत्त्व' नामक मन के साथ रज और तम गुण मिलकर पुरुष और रोग दोनों को ही उत्पन्न करते हैं ॥ १०-११ ॥ वार्योविदस्त्व नेत्याह नह्येकं कारणं मनः । नर्ते शरीरं शारीररोगा न मनसः स्थितः ॥ १२ ॥ रसजानि तु भूतानि व्याधयश्च पृथग्विधाः । आपो हि रसवत्यस्ताः स्मृता निर्वृत्तिहेतवः ॥ १३ ॥ वार्योविद ऋषि बोले—यह ठीक नहीं है कि अकेला मन ही इनकी उत्पत्ति में कारण है। क्योंकि शरीर के बिना न तो शारीरिक रोग हो सकते हैं और न मन ही रह सकता है। इसलिये प्राणियों की उत्पत्ति में कारण रस है और 'रस' से ही सब नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। रस की उत्पत्ति का जल ही इनकी उत्पत्ति का कारण है ॥ १२-१३ ॥ हिरण्याक्षस्तु नेत्याह न ह्यात्मा रसजः स्मृतः । नातीन्द्रियं मनः सन्ति रोगाः शब्दादिजास्तथा ॥ १४ ॥ षड्धातुजस्तु पुरुषो रोगाः षड्धातुजास्तथा । राशिः षड्धातुजो ह्येष सांख्यैराद्यैः प्रकीर्तितः ॥ १५ ॥ हिरण्याक्ष ऋषि बोले—कि नहीं, यह ठीक नहीं, आत्मा रसजन्य नहीं है, आत्मा और मन अतीन्द्रिय हैं। (कुछ रोग) भी शब्दादि (अतियोग अयोग, मिथ्यायोग) से उत्पन्न होते हैं। जो कि रसजन्य नहीं। वास्तव में पुरुष छः धातुओं (आत्मा और पृथ्वी अप, तेज, वायु एवं आकाश) से उत्पन्न होता है, रोग भी इन्हीं छः धातुओं से पैदा होते हैं। सांख्य दर्शन का सिद्धान्त भी है कि 'छः धातुओं के समूह का नाम पुरुष' है ॥ १४-१५ ॥

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २७७

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २७७ तथा ब्रुवाणं कौशिकमाह तन्नेति शौनकः । कस्मान्मातापितृभ्यां हि बिना षड्धातुजो भवेत् ॥ १६ ॥ पुरुषः पुरुषाद् गौर्गोरश्वादश्वः प्रजायते । पैत्र्या मेहादयश्चोक्ता रोगास्तावत्र कारणम् ॥ १७ ॥ इस प्रकार कहते हुए कुशिक (हिरण्याक्ष) को शौनक ने कहा कि— माता पिता के बिना छः धातु कैसे हो सकते हैं ? पुरुष से, पुरुष गौ से गाय, और घोड़े से घोड़ा उत्पन्न होता है और माता पिता के प्रमेहादि रोग पुत्र में आते हैं, इसलिये रोगों और पुरुषों की उत्पत्ति में कारण माता-पिता ही हैं ॥१७॥ भद्रकाप्यस्तु नेत्याह नह्यन्धोऽन्धात्प्रजायते । मातापित्रोरपि च ते प्रागुत्पत्तिर्न युज्यते ॥ १८ ॥ कर्मजस्तु मतो जन्तुः कर्मजास्तस्य चाऽऽमयाः । नह्यृते कर्मणो जन्म रोगाणां पुरुषस्य च ॥ १९ ॥ भद्रकाप्य ऋषि बोले—यह ठीक नहीं, क्योंकि अन्धे माता-पिता से पुत्र अन्धा उत्पन्न नहीं होता । मता-पिता की उत्पत्ति से पूर्व पुरुष का और रोग का होना असम्भव होता है । इसलिये कर्म से ही पुरुष उत्पन्न होता है और कर्म से ही रोग उत्पन्न होते हैं। कर्म के बिना न तो पुरुष का और न रोगों का जन्म हो सकता है ॥ १८–१९ ॥ भरद्वाजस्तु नेत्याह कर्ता पूर्वं हि कर्मणः । दृष्टं न चाकृतं कर्म यस्य स्यात्पुरुषः फलम् ॥ २० ॥ भावहेतुः स्वभावस्तु व्याधीनां पुरुषस्य च । खरद्रवचलोष्णत्वं तेजोन्तानां यथैव हि ॥ २१ ॥ भरद्वाज ऋषि बोले कि—कर्म से पहिले कर्त्ता है। बिना कर्मों के किये हुए कर्म का फल नहीं देखा जाता । प्रथम कर्म होने से फल होता है, इसलिये प्रथम कर्म होना चाहिये, जिसके फलस्वरूप पुरुष उत्पन्न होना चाहिये । कर्म को करने के लिये कर्त्ता ( पुरुष ) आवश्यक है । इसलिये मनुष्य और रोग की उत्पत्ति में कारण 'स्वभाव' ही है। जिस प्रकार पृथ्बी, अप, वायु और अग्नि में खरत्व ( खरखरापन ) द्रवत्व ( तरलता ), चलत्व ( गति ) और उष्णत्व ( गरमी ), स्वभाव से ही होता है ॥ २०-२१ ॥ काङ्कायनस्तु नेत्याह नह्यारम्भ फलं भवेत् । भवेत्स्वभावाद्भावानांमसिद्धिः सिद्धिरेव वा ॥ २२ ॥

स्रष्टा त्वमितसंकल्पो ब्रह्मापत्यं प्रजापतिः ।

२७८ चरकसंहिता [अ० २५ स्रष्टा त्वमितसंकल्पो ब्रह्मापत्यं प्रजापतिः । चेतनाचेतनस्यास्य जगतः सुखदुःखयोः ॥ २३ ॥ कांकायन ऋषि बोले—यह ठीक नहीं। यदि स्वभाव से ही रोग और पुरुषों की सिद्धि और असिद्धि होती हो, तो आरम्भ अर्थात् लोक और शास्त्र में प्रसिद्ध यज्ञ, कृषि, पढ़ाना, पढ़ना आदि कार्य निष्प्रयोजन होजायें । इस सुख- दुःख को बनाने वाला एवं चेतन तथा अचेतन जगत् का कर्त्ता अनन्त संकल्प वाला, ब्रह्मा का पुत्र प्रजापति है ॥ २२-२३ ॥ तन्नेति भिक्षुरात्रेयो नह्यपत्यं प्रजापतिः । प्रजाहितैषी सततं दुःखैर्युञ्ज्यादसाधुवत् ॥ २४ ॥ कालजस्त्वेव पुरुषः कालजास्तस्य चाऽऽमयाः । जगत्कालवशं सर्वं कालः सर्वत्र कारणम् ॥ २५ ॥ भिक्षुरात्रेय बोले—यह ठीक नहीं है । यह संसार प्रजापति से (पुत्र रूपेण) उत्पन्न नहीं हुआ । क्योंकि प्रजा की मंगलकामना करने वाला प्रजापति, संतान से द्वेष करने वाले की भांति किस प्रकार से दुःखों को देता, अपनी संतान को दुःखी करता, वास्तव में पुरुष काल से उत्पन्न होता है और रोग भी काल से ही उत्पन्न होते हैं । सम्पूर्ण जगत् काल के वश में है और सब जगह काल ही कारण है ॥ २४-२५ ॥ तथर्षीणां विवदतामुवाचेदं पुनर्वसुः । मैवं वोचत तत्त्वं हि दुष्प्रापं पक्षसंश्रयात् ॥ २६ ॥ वादान् सप्रतिवादान् हि वदन्तो निश्चितानिव । पक्षान्तं नैव गच्छन्ति तिलपीडकवद् गतौ ॥ २७ ॥ मुक्त्वैवं वादसंघट्टमध्यात्ममनुचिन्त्यताम् । नाविधूततमःस्कन्धे ज्ञेये ज्ञानं प्रवर्तते ॥ २८ ॥ येषामेव हि भावानां संपत्संजनयेन्नरम् । तेषामेव विपद्व्याधीन् विविधान् समुदीरयेत् ॥२६॥ इस प्रकार ऋषिमण्डल में विवाद चलते हुए देख कर पुनर्वसु ऋषि बोले कि इस प्रकार एक पक्ष को लेकर वादविवाद करते जाओगे तो किसी निश्चित तत्त्व को नहीं पहुंच सकोगे । जिस प्रकार तैल के कोल्हू (चरखी) पर बैठा हुआ मनुष्य चारों ओर अनन्त काल तक घूमता रहता है, परन्तु किसी निश्चित दिशा या स्थान पर नहीं पहुंचता । इस लिये इस वादविवाद को छोड़ कर मत- लब की बात सोचो । अन्धकारसमूह को नष्ट किये बिना ज्ञातव्य विषय में ज्ञान

अ० २५] सूत्रस्थानम् २७९

अ० २५] सूत्रस्थानम् २७९ नहीं प्राप्त होता । जिस प्रकार के गुणों से पुरुष उत्पन्न होता है उसी प्रकार के अप्रशस्त गुणों से रोग उत्पन्न होते हैं। पांच महाभूतों से पुरुष उत्पन्न होता और इन्हीं महाभूतों से वात, पित्त, कफ, (रोगों के कारण) बनते हैं ॥२६-२६॥ अथात्रेयस्य भगवतो वचनमनुनिशम्य पुनरेव वामकः काशिपति- रुवाच भगवन्तमात्रेयं—भगवन् ! संपन्निमित्तजस्य पुरुषस्य विपन्निमि- त्तानां च रोगाणां किमभिवृद्धिकारणमिति ॥ ३० ॥ आत्रेय ऋषि के वचन सुन कर फिर काशिपति वामक कहने लगे । हे भगवन् ! प्रशस्त गुणों से उत्पन्न पुरुष की और अप्रशस्त गुणों से उत्पन्न रोगों की वृद्धि करने वाले कौन से कारण हैं ? ॥३०॥ तमुवाच भगवानात्रेयः—हिताहारोपयोग एक एव पुरुषस्याभिवृ- द्धिकरो भवति, अहिताहारोपयोगः पुनर्व्याधीनां निमित्तमिति ॥३१॥ वामक ऋषि को भगवान् आत्रेय ने उत्तर दिया । हितकारी वस्तुओं का आहार रूप में उपयोग करना ही पुरुष की वृद्धि में अकेला कारण है। अहित- कारी वस्तुओं का सेवन करना ही रोगों की वृद्धि में एकमात्र कारण है ॥३१॥ एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—कथमिह भगवन् ! हिताहितानामाहारजातानां लक्षणमनपवादमभिजानीयान्, हितस- माख्यातानां चैव ह्याहारजातानामहितसमाख्यातानां च मात्राकालक्रि- याभूमिदेहदोषपुरुषावस्थान्तरेषु विपरीतकारित्वमुपलभामहे ।३२। इति इस प्रकार कहते हुए आत्रेय ऋषि को अग्निवेश ने पूछा—हे भगवन् ! किस प्रकार से हितकारी या अहितकारी आहार रूप पदार्थों को बिना दोष (अपवाद) के जान सकते हैं । क्योंकि हितकारी पदार्थ एवं अहितकारी पदार्थ मात्रा, काल, क्रिया (संस्कार), भूमि, देह, दोष और पुरुष भेद से विपरीत, विरुद्ध गुण वाले हितकारी पदार्थ अहितकारी, और अहितकारी पदार्थ हितकारी बन जाते हैं ॥ ३२ ॥ तमुवाच भगवानात्रेयः—यदाहारजातमग्निवेश ! समांश्चैव शरीर- धातून् प्रकृतौ स्थापयति विषमांश्च समीकरोतीत्येतद्धितं विद्धि, विप- रीतमहितमिति; एतद्धिताहितलक्षणमनपवादं भवति ॥ ३३ ॥ अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने उत्तर दिया—हे अग्निवेश जो भोजन (आहार के पदार्थ) शरीर के सम धातुओं को प्रकृति अर्थात् समानावस्था में रखता है और विषम धातुओं को सम करता है वह हितकारी है । इसके विपरीत पदार्थ अहितकारी हैं, हित और अहित पदार्थों का यह लक्षण दोषशून्य है ॥ ३३ ॥

तदेवमुपदिष्टं भूयिष्ठकल्पाः सर्वभिषजो विज्ञास्यन्ति ॥ ३४ ॥

एवंवादिनं च भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—भगवन्! नत्वे- तदेवमुपदिष्टं भूयिष्ठकल्पाः सर्वभिषजो विज्ञास्यन्ति ॥ ३४ ॥ तमुवाच भगवानात्रेयः—येषां विदितमाहारतत्वमग्निवेश! गुणतो द्रव्यतः कर्मतः सर्वावयवतश्च मात्रादयो भावाः, त एतदेवमुपदिष्टं विज्ञातुमुत्सहन्ते। यथा तु खल्वेतदुपदिष्टं भूयिष्ठकल्पाः सर्वभिषजो विज्ञास्यन्ति, तथैतदुपदेक्ष्यामो मात्रादीन् भावानुदाहरन्तः। तेषां हि बहुविधविकल्पा भवन्ति। आहारविधिविशेषांस्तु खलु लक्ष- णतश्चावयवतश्चानुव्याख्यास्यामः॥ ३५॥ तद्यथा—आहारत्वमाहारस्यैकविधमर्थभेदात्; स पुनर्द्वियोनिः, स्थावरजङ्गमात्मकत्वात्; द्विविधप्रभावो हिताहितोदर्कविशेषात्; चतुर्विधोपयोगः पानाशन-भक्ष्य-लेह्योपयोगात्; षडास्वादो रसभेदतः षड्विधत्वात्; विंशतिगुणो गुरु-लघु-शीतोष्ण-स्निग्ध-रूक्ष-मन्द-तीक्ष्ण- स्थिर-सर-मृदु-कठिन-विशद-पिच्छिल-श्लक्ष्ण-खर-सूक्ष्म-स्थूल-सान्द्र- द्रवा-नुगमात्; अपरिसंख्येयविकल्पो द्रव्य-संयोग-करण-बाहुल्यात् ॥ ३६॥ इस प्रकार कहते हुए आत्रेय ऋषि को अग्निवेश बोले—इतना कह देने से सब वैद्य सब बातों को नहीं समझ सकेंगे। अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—कि जिन वैद्यों को आहारयोग्य पदार्थ गुण, (गुरु लघु आदि) कारण (यह आप्य है, यह आग्नेय है इत्यादि), कर्म (यह जीवनीय, यह बृंहणीय इत्यादि) सब अवयव २ (रस, वीर्य, विपाक प्रभाव से), मात्रा एवं पुरुष की अवस्था का ज्ञान होगा वे ही इतने (ऊपर कहे हुए) उपदेश से समझ सकते हैं। जिस प्रकार कहने से सब वैद्य सम्पूर्ण रूप में जान सकेंगे, उसी प्रकार से मात्रा आदि वस्तुओं को उदाहरण के साथ कहेंगे। इनके बहुत से भेद होते हैं। आहार की जो विशिष्ट विधि है, उसको प्रथम साधारण रूप में कहकर फिर विभाग पूर्वक कहेंगे। यथा—आहारत्व (खाद्यत्व) गुण समान होने से सम्पूर्ण आहार एक प्रकार का है, क्योंकि अर्थ में कोई भेद नहीं है। इस आहार के दो उत्पत्ति स्थान हैं, स्थावर और जंगम। इस आहार के दो प्रकार के प्रभाव हैं, एक हितफलजनक और दूसरा अहितफलजनक। इस आहार का चार प्रकार से उपयोग होता है। यथा—पान (पीना), अशन (दांतों से काटकर खाना), भक्ष्य (चबाना) और लेह्य (चाटने) के उपयोग से। इस आहार के छः स्वाद होने से यह रस भेद से छः प्रकार का है, क्योंकि रस छः प्रकार के हैं। इस आहार के गुण बीस प्रकार के हैं। यथा—गुरु, लघु,

[अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २८१

[अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २८१

शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मन्द, तीक्ष्ण, स्थिर, सर, मृदु, कठिन, विशद, पिच्छिल श्लक्ष्ण, खर, सूक्ष्म, स्थूल, सान्द्र, द्रव भेद से । द्रव्य (शूकधान्यादि), संयोग (खाद्य पदार्थों का मिश्रण), करण (संस्कार) भेद से आहार-द्रव्य असंख्य प्रकार का हो जाता है ॥ ३४-३६ ॥ तस्य खलु ये ये विकारावयवा भूयिष्ठमुपयुज्यन्ते, भूयिष्ठकल्पानां च मनुष्याणां प्रकृत्यैव हिततमाश्चाहिततमाश्च, तांस्तान्यथावदनु- व्याख्यास्यामः ॥ (१) तद्यथा-लोहितशालयः शूकधान्यानां पथ्यतमत्वे श्रेष्ठतमा भवन्ति, मुद्गाः शमीधान्यानां, आन्तरिक्षमुदकानां, सैन्धवं लवणानां, जीवन्ती- शाकं शाकानां, ऐणेयं मृगमांसानां, लावः पक्षिणां, गोधा बिलेशयानां, रोहितो मत्स्यानां, गव्यं सर्पिषां, गोक्षीरं क्षीराणां, तिलतैलं स्थावरजा- तानां स्नेहानां, वराहवसा आनूपमृगवसानां, चुलुकीवसा मत्स्यवसानां, पाकहंसवसा जलचरविहङ्गवसानां, कुक्कुटवसा विष्किरशकुनिवसानां, अजमोदः शाखादममेदसां, शृङ्गवेरं कन्दानां, मृद्वीका फलानां, शर्करा इक्षुविकाराणामिति प्रकृत्यैव हिततमानामाहारविकाराणां प्राधान्यतो द्रव्याणि व्याख्यातानि भवन्ति ॥ (२) प्रायः करके जो जो आहार पदार्थ हितकारी और अहितकारी कहे जाते हैं और बहुत अधिक व्यवहार में आते हैं, उन पदार्थों का यहां वर्णन करते हैं। जैसे—लाल चावल शूकधान्यों में सबसे अधिक हितकारी (श्रेष्ठ) है। मूंग शमीधान्यों में, बरसात का पानी सब पानियों में, सेंधा नमक सब नमकों में, जीवन्ती का शाक सब शाकों में, मृग का मांस सब पशुओं के मांसों में, बटेर सब पक्षियों में, गोधा (गोह) बिल में रहने वाले जन्तुओं में, रोहित मत्स्य सब मछलियों में, गौ का घी सब घी में, गाय का दूध सब दूधों में, तिल का तेल स्थावरजन्य सब स्नेहों में, वराह की चर्बी सब जलचर प्राणियों की चर्बियों में, चुलुकी (शुशु) मछली की चर्बी सब मछलियों की चर्बियों में, सफेद हंस की वसा सब जलचर पक्षियों की वसा में, मुर्गे की चर्बी बिखेर कर खाने वाले सब पक्षियों में, बकरी का मेद शाखा या टहनी खाने वाले पशुओं की मेदों में, अदरख सब कन्दों अर्थात् भूमि में रहने वाले फलों में, किशमिश सब फलों में, शकर गन्ने के रस से बनी सब बस्तुओं में श्रेष्ठ है। ये भोज्य पदार्थों में स्वभाव से हितकारी द्रव्य कह दिये हैं ॥ अत ऊर्ध्वमहितानुपदेक्ष्यामः-यवकाः शूकधान्यानामपथ्यतमे