चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
४३४ चरकसंहिता [ अ० ३ गर्भ के गिर जाने से, या बालक प्रसव करने के पीछे अथवा ऋतुकाल में वात- प्रकोपक वस्तुओं के सेवन करने से वायु शीघ्र ही प्रकुपित हो जाता है ॥१४॥ स प्रकुपितो योनिमुखमनुप्रविश्याऽऽर्तवमुपरुणद्धि, मासि मासि तदार्तवमुपरुध्यमानं कुक्षिमभिवर्धयति । तस्याः शूल-कासातीसारच्छ- र्द्यरोचकाविपाकाङ्गमर्द-निद्रालस्य-स्तैमित्य-कफ-प्रसेकाः समुपजायन्ते । स्तनयोश्च स्तन्यमोष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च काष्ण्यं, ग्लानिश्चक्षुषोर्मूर्च्छा, हृल्लासो, दोहदः, श्वयथुः पादयोरीषदोद्गमो रोमराज्याः, योन्याश्चाटा- लत्वं, अपि च योन्या दौर्गन्ध्यमास्रावश्चोपजायते, केवलञ्चास्या गुल्मः पिण्डित एव स्पन्दते, तामगर्भा' गर्भिणीमित्याहुर्मूढाः ॥ १५ ॥ रक्तगुल्म की सम्प्राप्ति—यह कुपित वायु योनिमुख में प्रविष्ट होकर आर्तव को रोक देता है। प्रत्येक मास में रुक रुक कर यह आर्तव कोष्ठ को बड़ा कर देता है । इससे स्त्री को शूल, कास, अतीसार, वमन, अरुचि, अविपाक, अंगों का टूटना, निद्रा, आलस्य, कफ का (लार का) मुख से आना, स्तनों में दूध का आना * ओंठ एवं स्तनों के चूचुकों का काला हो जाना, आंखों में ग्लानि, मूर्च्छा, वमन की अभिरुचि, गर्भ के समान अनेक लक्षण, पांव में सूजन, रोमराज़ि में विस्फुरण, योनि का फैल जाना, योनि में दुर्गन्ध आना तथा योनि में से स्राव होना इत्यादि विकार उत्पन्न होजाते हैं। इस प्रकार गुल्म पेट में हिलता है, अज्ञानी लोग गर्भरहित स्त्री को भी गर्भिणी कहने लगते हैं ॥१५॥ एषां तु खलु पञ्चानां गुल्मानां प्रागभिनिवृत्तेरेमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा— अनन्नाभिलषणमरोचकाविपाकावग्निर्वैषम्यं विदाहो भुक्तस्य विपाककाले चायुक्त्या छर्द्युद्गारौ, वातमूत्रपुरीषवेगानाम- प्रादुर्भावः, प्रादुर्भूतानां चाप्रवृत्तिरीषद्रागमनं वा, वातशूलाटोपान्त्र- कूजनापरिकर्षणानिप्रवृत्तपुरीषताऽबुभुक्षा, दौर्बल्यं, सौहित्यस्य चासह- त्वमिति गुल्मपूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ १६ ॥
- आर्तव रोग का यह प्रभाव है कि स्तनों में दूध आजाता है। गर्भावस्था में भी आर्तव के रुकने से स्तनों में दूध आता है। गर्भवती स्त्री में जो रस बनता है, उसके तीन कार्य होते हैं। (१) माता के शरीर का पोषण, (२) स्तनों में दूध, (३) बच्चे का पोषण, इसलिये यह आर्तव भी स्तनों में दूध उत्पन्न कर देता है। १. जो स्त्रियां बच्चों के लिये बहुत लालायित रहती हैं उनमें भी ऋतु- धर्म के रुक जाने पर ये लक्षण दीखने लगते हैं। इस अवस्था में यदि सुंघाकर परीक्षा करें तो सिवाय वायु के और कुछ उपलब्ध नहीं होता
अ० ३ ] निदानस्थानम् ४१५
अ० ३ ] निदानस्थानम् ४१५ गुल्म का पूर्वरूप-इन पांचो प्रकार के गुल्मों की उत्पत्ति से पूर्व निम्न- लिखित लक्षण होते हैं । यथा-अन्न में अनिच्छा, अरुचि, अविपाक, अग्नि की विषमता ( कभी तेज़ और कभी मन्द ), विदाह ( जलन ), भोजन के पचने के समय जलन, बिना कारण के वमन और डकार आना, अधोवायु, मूत्र व मलों की अप्रवृत्ति अथवा प्रवाहण की प्रवृत्ति होने पर भी मलादि का बाहर न निकलना, अथवा थोड़ा आना, वातशूल, पेट में गुड़-गुड़ाहट, आंतों में अफारा, शरीर में रोमांच, गांठदार मल का आना, भूख का न लगना, कृशता, पेट भर अन्न खाने पर उसका सहन न होना, इत्यादि लक्षण सब प्रकार के गुल्मों के पूर्वरूप हैं ॥ १६ ॥ सर्वेष्वपि च खल्वेतेषु न कश्चिद्वातादृते संभवति गुल्मः ॥ १७ ॥ इन सब प्रकार के गुल्मों का मूलभूत कारण वायु ही है, वायु के बिना कोई भी गुल्म नहीं होता ॥१७॥ तेषां सन्निपातजमसाध्यं ज्ञात्वा नोपक्रमेत । एकदोषजे तु यथा- स्वमारम्भं प्रणयेत् । संसृष्टांस्तु साधारणेन कर्मणोपचरेत् । यच्चान्य- दप्यविरुद्धं मन्येत तदवचारयेद्विभज्य गुरुलाघवमुपद्रवाणां समीक्ष्य, गुरून्उपद्रवांस्त्वरमाणश्चिकित्सेज्जघन्यमितरान् , त्वरमाणस्तु विशेषमनु- पलभ्य गुल्मेष्वात्ययिके कर्मणि वातचिकित्सितं प्रणयेत् , स्नेहस्वेदौ वातहरौ, स्नेहोपसंहितं च मृदुविरेचनं, वस्तींश्चाम्ललवणमधुरांश्च रसान् युक्तितोऽवचारयेत् । मारुते ह्युपशान्ते स्वल्पेनापि प्रयत्नेन शक्योऽन्योपि दोषो नियन्तुं गुल्मेष्विति ॥ १८ ॥ इनमें सन्निपातजन्य गुल्म को असाध्य समझ कर चिकित्सा में हाथ नहीं डालना चाहिये। एक दोष से उत्पन्न गुल्म की यथायोग्य रीति से चिकित्सा करनी चाहिये । दो दोषवाले गुल्मों की चिकित्सा साधारण प्रकार से करनी चाहिये । अथवा वैद्य रोगी के उपद्रवों की गुरुता लघुता को देखकर, दूसरे किसी से चिकित्सा विरुद्ध न पड़े, इस प्रकार से चिकित्सा आरम्भ करनी चाहिये । जो उपद्रव गुरु हों, उनकी तत्काल चिकित्सा करनी चाहिये और जो उपद्रव कम हों, उन की पीछे से चिकित्सा करनी चाहिये । जिस गुल्म में कुछ पता न चलता हो या काम ज़रूरी या जल्दी करना हो तो प्रथम वायु की चिकित्सा करनी चाहिये । क्योंकि वायु को शान्त करने के लिये स्नेहन, मृदु विरेचन, बस्तिकर्म, खट्टा, नमकीन और मधुर रस युक्तिपूर्वक देने चाहिये । वायु के । होजाने पर थोड़े से परिश्रम से दूसरे दोष भी सुगमता से वश में किये जा सकते हैं ॥ १८ ॥
४१६ चरकसंहिता [ अ० ४
भवति चात्र—
गुल्मिनाम निलशान्तिरुपा यैः सर्वशो विधिवदाचरितव्या ।
मारुते ह्यवजितेऽन्यमुदीर्णं दोषमल्पमपि कर्म निहन्यात् ॥ १६ ॥
गुल्मरोग में वायु को शान्त करने के लिये सम्पूर्ण विधि काम में लानी
चाहिये । क्योंकि वायु को शान्त न करने पर दूसरा थोड़ा सा बढ़ा हुआ दोष
भी सम्पूर्ण किये कराये पर पानी फेर देता है ॥ १६ ॥
तत्र श्लोकाः—संख्या निमित्तं रूपाणि पूर्वरूपमथापि च ।
दृष्टं निदाने गुल्मानामेकदेशश्च कर्मणाम् ॥ २० ॥
इस गुल्म निदान में गुल्मों की संख्या, कारण, पूर्वरूप और चिकित्सा
कह दी हैं ॥ २० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने गुल्मनिदानं
नाम तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः
अथातः प्रमेहनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे प्रमेह-निदान का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥२॥
त्रिदोषप्रकोपानिमित्ता विंशतिः प्रमेहा भवन्ति, विकाराश्चापरेऽ-
परिसंख्येयाः । तत्र यथा त्रिदोषप्रकोपः प्रमेहानभिनिर्वर्तयति तथाऽ-
नुव्याख्यास्यामः ॥ ३ ॥
प्रमेहों की संख्या—वात आदि तीनों दोषों से उत्पन्न होने वाले प्रमेह बीस
प्रकार के हैं, इनके सिवाय दूसरे रोग असंख्य हैं । त्रिदोष के कोप से प्रमेह
किस प्रकार उत्पन्न होते हैं इसका आगे वर्णन करते हैं ॥३॥
इह खलु निदान-दोष-दूष्य-विशेषेभ्यो विकार-विघात-भावाभाव-
प्रतिविशेषा भवन्ति ॥ ४ ॥
निदान, दोष और दूष्य इनके विशेष-भेदों को लेकर रोगों के विघात
अर्थात् रोग का देर में होना, थोड़ा या अधिक विकार होना आदि
भाव-विशेष उत्पन्न होते हैं । इस सूत्रात्मक सिद्धान्त को विस्तार
कहते हैं ॥४॥
अ० ४] निदानस्थानम् ४३७
अ० ४] निदानस्थानम् ४३७
यदा ह्येते त्रयो निदानादिविशेषाः परस्परं नानुबध्नन्ति, अथवा वा कालप्रकर्षाद्बवलीयांसो वाऽनुबध्नन्ति न तदा विकाराभिनिर्वृत्तिः, चिराद्वाऽप्यभिनिर्वर्तन्ते, तनवो वा भवन्त्यथवाऽप्ययथोक्तसर्वलिङ्गाः । विपर्यये विपरीताः; इति सर्वविकार-विघात-भावाभाव-प्रतिविशेषाभि- निर्वृत्त हेतुर्भवत्युक्तः ॥ ५ ॥ रोगों के उत्पन्न होने और न होने का कारण—निदान दोष और दूष्य भावों की भिन्नता से रोग उत्पन्न होते हैं और नहीं भी उत्पन्न होते हैं । जब निदानादि ये तीनों परस्पर नहीं मिलते, अथवा लम्बे समय पीछे मिलते हैं, या निर्बल अवस्था में मिलते हैं, तब रोग उत्पन्न नहीं होता, यदि उत्पन्न भी होता है तो देर में उत्पन्न होता है या निर्बल रूप में या अपूर्ण लक्षणों के साथ उत्पन्न होता है । परन्तु जब निदान, दोष और दूष्य परस्पर समानरूप में मिलते हैं, तब शीघ्र, बलवान् एवं सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त रोग उत्पन्न होता है । सब रोगों की उत्पत्ति में निदान दोष और द्रव्य का होना या न होना कारण होता है ॥५॥ तत्रेमे त्रयो निदानादिविशेषाः श्लेष्मनिमित्तानां प्रमेहाणामाश्र्व- भिनिर्वृत्तिकरा भवन्ति । तद्यथा-हायनक-यवक-चीनकोद्दालक-नैषधै- त्कट-मुकुन्दक-महाव्रीहि-प्रमोदक-सुगन्धकानां नवानामतिवेलमतिप्रमा- णेनोपयोगः, तथा सर्पिष्मतां नवहरेणुमाषसूप्यानां ग्राम्यानूपौदकानां च मांसानां शाक-तिल-पलल-पिष्टान्न-पायस-कृशर-विलेपीक्षुविकाराणां क्षीर-मन्दक-दधि-द्रव-मधुर-तरुणप्रायाणामुपयोगो, मृजा-व्यायाम-वर्जनं, स्वप्नशयनासनप्रसङ्गो यश्च कश्चिद्विधिरन्योऽपि श्लेष्म-मेदो-मूत्र-सञ्जननः स सर्वो निदानविशेषः ॥ ६ ॥ कफजन्य प्रमेह में निदानादि की भिन्नता—निम्न कारणों से कफजन्य प्रमेह मुख्यतः उत्पन्न होता है । यथा हायनक ( धान्य विशेष ), यवक (जौ ), चीनक, उद्दालक, नैषध, इत्कट, मुकुन्दक, महाव्रीहि, प्रमोदक, सुगन्धक इत्यादि जाति के चावलों को अतिमात्रा में वा नूतन चावलों का उपयोग करने से, इसी प्रकार घी के साथ हरेणु ( मटर ), उड़द की दाल, ग्राम्य या आनूप अथवा जलचर प्राणियों का मांस अधिक खाने से, भाजी, तिल, मांस, पिष्टो से बने पदार्थ खीर, खिचड़ी, विलेपी गाढ़ी कांजी), ईखे के रस से बनी वस्तुओं के अति उपयोग करने से, दूध, मन्दक, दही, द्रव, मधुर पदार्थ या नवीन धान्यों के अति उपयोग करने से, शरीर का शोधन न करने से, अंगों को परिचालन न करने से, सोने, बैठने या
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बैठे रहने से, अथवा कफ, मेद व मूत्र को बढ़ाने वाला जो भी कारण होता है वे सब प्रमेहों के विशेष कारण हैं ॥६॥ बहुद्रवः श्लेष्मा दोषविशेषः ॥ ७ ॥ बह्वबद्धं मेदोमांसं शरीरजक्लेदः शुक्रं शोणितं च वसा मज्जा लसीका रसश्चौजःसंख्यात इति दूष्यविशेषाः ॥ ८॥ कफप्रमेह के दूष्य — बहुत तरल ( द्रव ) कफ इसमें दोष होता है, बहुत अबद्ध ( असंहत अर्थात् ढीला-शिथिल ) मेद मांस, शरीरजन्य क्लेद, शुक्र, शोणित, वसा, मज्जा, लसीका, रस और ओज ये दूष्य विशेष हैं अर्थात् इनमें ही दोष अपना बुरा प्रभाव उत्पन्न करता है१ ॥८॥ त्रयाणामेषां निदानादिविशेषाणां सन्निपाते क्षिप्रं श्लेष्मा प्रको- पमापद्यते प्रागभिभूयस्त्वत् , स प्रकुपितः क्षिप्रमेव शरीरे विसृतिं लभते, शरीरशैथिल्यात्स विसर्पञ्छरीरे मेदसैवादितो मिश्रीभावं गच्छति, मेदसश्चैव बह्वबद्धत्वान्मेदसश्च गुणानां गुणैः समानगुणभूयि- ष्ठत्वात्स मेदसा मिश्रीभावं गच्छन् दूषयत्येनद्विकृतत्वात् , स विकृतो दुष्टेन मेदसोपहितः शरीरक्लेदमांसाभ्यां संसर्गं गच्छति, क्लेदमांसयोर- तिप्रमाणाभिवृद्धत्वात् स मांसे मांसप्रदोषात्पूतिमांसपिडकाः शरा- विकाकच्छपिकाद्याः संजनयति, अप्रकृतिभूतत्वात्, शरीरक्लेदं पुन- र्दूषयन्मूत्रत्वेन परिणमयति । मूत्रवहानां च स्रोतसां वङ्क्षणबस्ति- प्रभवाणां मेदःक्लेदोपहितानि गुरूणि मुखान्यासाद्य प्रतिरुध्यते; ततस्तेषां स्थैर्यमसाध्यतां वा जनयति, प्रकृतिविकृतिभूतत्वात् ॥ ६॥ कफप्रमेह की सम्प्राप्ति—निदान, दोष और दूष्य इन तीनों के मिलने से कफ शीघ्र कुपित हो जाता है। क्योंकि रोग उत्पत्तिकाल में कफ अधिक बढ़ा होता है। इस प्रकार से कुपित कफ जल्दी ही शरीर में फैल जाता है। शरीर के शिथिल होने से फैलता हुआ यह कफ सबसे प्रथम शरीर में मेद के साथ १. प्रमेह में सब से प्रथम कफ का ही बिगाड़ होता है । इसलिये यह तो दोष है, और सप्तधातु, रस, रक्त, मांस आदि ये इससे दूषित होते हैं, इसलिये ये दूष्य हैं। इस अवस्था में जिस अपर ओज का परिमाण आधा अञ्जलि कहा है, वह ओज भाग विकृत होता है । क्लेद रक्त का तरल भाग है जिसके दूषित होने से मधुमेह रोगी के व्रण शीघ्र अच्छे नहीं होते। शरीर में त्वचा के नीचे रहने वाला पतला श्वेत, चिकना पदार्थ है जो की रक्षा करता है। ये सब दूष्य हैं।
मिलता है। क्योंकि मेद बहुत अबद्ध अर्थात् शिथिल रूप में होता है। तथा मेद के गुणों के समान गुण ही कफ के हैं और शरीर में मेद का परिमाण भी बहुत है। मेद के साथ मिलकर कफ अपने आप दूषित होने से इस को भी दूषित बना देता है। यह विकृत कफ दुष्ट मेद के साथ मिलकर शरीर के क्लेद भाग और मांस के साथ मिल जाते हैं। शरीर में क्लेद और मांस बहुत मात्रा में बढ़े होते हैं। यह मांस को दूषित करके मांस में उत्पन्न होने वाली पिडकायें, शराविका, कच्छपिका आदि को उत्पन्न करता है। क्योंकि कफ अपनी प्रकृति में नहीं रहता, इसलिये अपनी शक्ति से इनको उत्पन्न करता है। शरीर के क्लेद को दूषित करके मूत्र रूप में बदल देता है। वंक्षण सन्धि तथा बस्ति से उत्पन्न होने वाले मूत्र वह स्रोतों के मुख मेद और क्लेद के भारी होने से बन्द हो जाते हैं। इसलिये इनमें प्रमेह टिक जाता है। या बहुत बढ़कर असाध्य बन जाता है। क्योंकि कफ, मेद और वसा में समान है, परन्तु रक्तादि में असमान होता है; इसलिये प्रकृति विकृति होने से प्रमेह स्थिर बन जाते हैं या असाध्य हो जाते हैं ॥९॥ शरीरक्लेदस्तू श्लेष्म-मेदो-मिश्रः प्रविशन्मूत्राशयं मूत्रत्वमापद्यमानः श्लैष्मिकैरेभिर्दशभिर्गुणैरुपसृज्यते वैषम्ययुक्तः । तद्यथा—श्वेत-शीत- मूर्त-पिच्छिलाच्छ-स्निग्ध-गुरु-प्रसाद-मधुर-सान्द्र-मन्दैः; अत्र येन गुणेनैकेनानेकेन वा भूयस्तरमुपसृज्यते तत्समाख्यं गौणं नामविशेषं प्राप्नोति ॥१०॥ शरीर की आर्द्रता कफ और मेद से मिलकर मूत्राशय में प्रवेश करती है। वहां पर मूत्ररूप होकर विषमतावाले कफ के दस गुणों के साथ मिल जाती है। कफ के दस गुण-श्वेत, शीतल, मूर्त, पिच्छिल, स्निग्ध, गुरु, प्रसाद, मधुर, सान्द्र और मन्द, इनमें से एक गुण की या अनेक गुणों की प्रधानता होने से उसी के अनुसार सामान्य या विशेष नाम मिलता है ॥१०॥ ते तु खल्विमे दश प्रमेहा नामविशेषेण भवन्ति । तद्यथा—उदक- मेहश्चेक्षुवालिकाऱसमेहश्च, सान्द्रमेहश्च, सान्द्रप्रसादमेहश्च, शुक्लमेहश्च, शुक्रमेहश्च, शीतमेहश्च, सिकतामेहश्च, शनैर्मेहश्चाऽऽलाढमेहश्चेति ॥११॥ ते दश प्रमेहाः साध्याः समानगुणमेदाःस्थानत्वात्कफस्य प्राधान्या- त्क्रियत्वाच्च ॥ १२॥ कफजन्य दस प्रमेह—इस प्रकार से कफजन्य प्रमेह दस प्रकार के हैं। नाम (१) उदकमेह, (२) इक्षुवालिकारसमेह, (३) सान्द्रमेह, (४) सान्द्र-
४४० चरकसंहिता [ अ० ४ ]
प्रसादमेह, (५) शुक्लमेह, (६), शुक्रमेह, (७) शीतमेह (८) सिकतामेह (६) शनैर्मेह और (१०) आलालमेह । ये कफजन्य दस प्रमेह साध्य हैं। क्योंकि कफ और मेद के गुण एवं स्थान समान हैं, तथा कफ की प्रधानता होने से और कफ और मेद की चिकित्सा के समान होने से कफप्रमेह साध्य है ॥ १२॥ तत्र श्लोकाः श्लेष्मप्रमेहविज्ञानार्था भवन्ति । कफप्रमेहों को बताने के लिये श्लोक कहते हैं— अच्छं बहुसितं शान्तं निर्गन्धमुदकोपमम् । श्लेष्मकोपान्नरो मूत्रमुदमेही प्रमेहति ॥ १३ ॥ अत्यर्थमधुरं शीतमीषत्पिच्छिलमाविलम् । काण्डेक्षुरससंकाशं श्लेष्मकोपात्प्रमेहति ॥ १४ ॥ यस्य पर्युषितं मूत्रं सान्द्रीभवति भाजने । पुरुषं कफकोपेन तमाहुः सान्द्रमेहिनम् ॥ १५ ॥ यस्य संहन्यते मूत्रं किंचित् किंचित्प्रसीदति । सान्द्रप्रसादमेहीति तमाहुः श्लेष्मकोपतः ॥ १६ ॥ शुक्लं पिष्टनिभं मूत्रमभीक्ष्णं यः प्रमेहति । पुरुषं कफकोपेन तमाहुः शुक्लमेहिनम् ॥ १७ ॥ शुक्राभं शुक्रमिश्रं वा मुहुर्मेहति यो नरः । शुक्रमेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ १८ ॥ अत्यर्थशीतमधुरं मूत्रं मेहति यो भृशम् । शीतमेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ १६ ॥ मूर्तान्मूत्रगतान्दोषानणन्मेहति यो नरः । सिकतामेहिनं विद्यान्नरं तं श्लेष्मकोपतः ॥ २० ॥ मन्दं मन्दमवेगं तु कृच्छ्रं यो मूत्रयेच्छनैः । शनैर्मेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ २१ ॥ तन्तुबद्धमिवाऽऽलालं पिच्छिलं यः प्रमेहति । आलालमेहिनं विद्यात्तं नरं श्लेष्मकोपतः ॥ २२ ॥ (१) उदकमेह—उदकमेह का रोगी कफ के प्रकोप के कारण बहुत स्वच्छ, बहुत सफेद, शीतल, बिना गन्ध का, पानी के समान मूत्र करता है यह उदक- मेह के लक्षण हैं।
- मूत्रमार्ग से शुक्र का मूत्र से पृथक् रूप में जाना यह शुक्रदोष इसका प्रमेह में अन्तर्भाव नहीं होता ।
अ० ४ ] निदानस्थानम् ४४१
अ० ४ ] निदानस्थानम् ४४१
(२) इक्षुबालिकारसमेह— कफ के प्रकोप से अतिशय मधुर, शीतल, थोड़ा चिकास वाला, मैला, अस्वच्छ, गन्ने के रस के समान मूत्र करता है । यह 'इक्षुमेह' का रोगी है । (३) सान्द्रमेह— पहिले दिन का बरतन में रखा हुआ जिसका मूत्र, कफके कारण दूसरे दिन गाढ़ा हो जाता है, उसको 'सान्द्रमेह का रोगी समझना चाहिये । (४) सान्द्र-प्रसादमेह— कफप्रकोप के कारण मूत्र ऊपर जम जाये और नीचे थोड़ा-थोड़ा पतला रहे तो 'सान्द्रप्रसाद मेह' का रोगी समझना चाहिये । (५) शुक्लमेह— कफप्रकोप के कारण जो मनुष्य श्वेत, पिष्ठी के समान मूत्र बार बार करता है उसको 'शुक्लमेह' का रोगी समझना चाहिये । (६) शुक्रमेह— कफप्रकोप के कारण जो मनुष्य शुक्र के समान, या शुक्र से मिला, मूत्र बार-बार करता है उसको 'शुक्रमेह' का रोगी समझना चाहिये । (७) शीतमेह— जो मनुष्य कफप्रकोप से अत्यन्त शीतल, मीठा-मूत्र अधिकतर करता है, उसको 'शीतमेह' का रोगी जानना चाहिये । (८) सिकतामेह— कफप्रकोप से जब मनुष्य के मूत्र में सूक्ष्म, बालू के समान छोटे छोटे कठिन कण जाने लगते हैं, तब उसे 'सिकता-मेह' का रोगी समझना चाहिये । (९) शनैर्मेह— जब मनुष्य कफ के प्रकोप से धीरे-धीरे, बिना वेग के, कठिनाई से, मूत्र करता हो तब इसको शनैर्मेह का रोगी समझना चाहिये । (१०) आलाह्लमेह—जो मनुष्य कफ के प्रकोप से तारवाला या लार के समान चिकना मूत्र करता है तो इसको 'आलाह्लमेह' का रोगी समझना चाहिये ॥ १३-२२ ॥ इत्येते दश प्रमेहाः श्लेष्मप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ इस प्रकार से कफ के प्रकोप से उत्पन्न होने वाले दस प्रकार के प्रमेहों का वर्णन कर दिया है । उष्णाम्ल-लवण-क्षार-कटुकाजीर्ण-भोजनोपसेविनस्तथाऽतितीक्ष्णा- तपाग्नि-संताप-श्रम-क्रोध-विषमाहारोपसेविनश्च तथाऽऽत्मकशरीरस्यैव क्षिप्रं पित्तं प्रकोपमापद्यते ॥ २३ ॥ तत्प्रकुपितं तयैवाऽऽनुपूर्व्या प्रमेहानिमान् षट् क्षिप्रमभिनिर्वर्त- यति ॥ २४ ॥ तेषामपि च पित्तगुणविशेषेण नामविशेषा पूर्ववद् युक्ता भवन्ति । यथा— क्षारमेहश्च, कालमेहश्च, नीलमेहश्च, लोहितमेहश्च, मञ्जिष्ठा- मेहश्च, हारिद्रमेहश्चेति । ते षड्भिरेतैः क्षाराम्ल-लवण-कटुक-विस्त्रोष्णैः
दोष-मेदः-स्थानत्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वाच्चेति ॥ २५ ॥
४४२ चरकसंहिता [ अ० ४ पित्तगुणैः पूर्ववत्ससम्बन्धा भवन्ति । सर्वे एव च ते याप्याः, संसृष्ट- दोष-मेदः-स्थानत्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वाच्चेति ॥ २५ ॥ पित्तप्रमेह के कारण और सम्प्राप्ति—उष्ण, अम्ल, लवण, क्षार, वा कटु पदार्थों के अति सेवन करने से, अजीर्णावस्था में भोजन करने से, तीव्र धूप, अग्नि, सन्ताप, श्रम, क्रोध वा विषम भोजन के सेवन से, पित्त प्रकृतिवाले पुरुष में पित्त शीघ्रता से प्रकुपित हो जाता है । यह प्रकुपित पित्त, पूर्व वर्णित प्रकार से ही छः प्रकार के प्रमेह उत्पन्न करता है । पित्तजन्य प्रमेह—छः प्रकार के प्रमेह भी, कफप्रमेह के समान ही पित्त के गुण के अनुसार भिन्न २ नाम वाले होते हैं । जैसे—( १ ) क्षारमेह, ( २ ) कालमेह, ( ३ ) नीलमेह, ( ४ ) लोहितमेह, ( ५ ) मञ्जिष्ठामेह और ( ६ ) हारिद्रमेह । ये छः प्रकार के प्रमेह पूर्ववत् क्षार, लवण, कटु, अम्ल, विस्र (दुर्गन्ध) और उष्ण इन पित्त के गुणों से युक्त होते हैं। ये पित्तजन्य प्रमेह सब के सब याप्य हैं। क्योंकि पित्त और मेद इनका स्थान समीप, एवं धर्म परस्पर विरुद्ध हैं, एवं चिकित्सा भी परस्पर विरोधी हैं *॥२३-२५॥ तत्र श्लोकाः पित्तप्रमेहविशेषविज्ञानार्था भवन्ति— पित्त प्रमेह को बताने के लिये ये निम्न लिखित श्लोक कहे हैं— गन्धवर्णरसस्पर्शैर्यथा क्षारस्तथात्मकम् । पित्तकोपान्नरो मूत्रं क्षारमेही प्रमेहति ॥ २६ ॥ मसीवर्णमसक्तं यो मूत्रमुष्णं प्रमेहति । पित्तस्य परिकोपेन तं विद्यात्कालमेहिनम् ॥ २७ ॥ चाषपक्षनिभं मूत्रं मन्दं मेहति यो नरः । पित्तस्य परिकोपेन तं विद्यान्नीलमेहिनम् ॥ २८ ॥ विस्रं लवणमुष्णं च रक्तं मेहति यो नरः । पित्तस्य परिकोपेन तं विद्याद्रक्तमेहिनम् ॥ २९ ॥ मञ्जिष्ठारूपि योऽजस्रं भृशं विस्रं प्रमेहति । पित्तस्य परिकोपात्तं विद्यान्माञ्जिष्ठमेहिनम् ॥ ३० ॥
- पित्त का स्थान आमाशय, और मेद का वसाबहुल स्थान आमाशय का एक प्रदेश है । इसलिये दोष एवं दूष्य के नित्यप्रति पास में रहने से याप्य है । पित्त को शान्त करने वाले जो मधुर, शीत आदि पदार्थ हैं, वे मेद लिये अपथ्य हैं और जो मेद के लिये कटु रस आदि वस्तु पथ्य हैं, वे पित्त लिये अपथ्य हैं । इसलिये चिकित्सा परस्पर विरोधी पड़ जाती है ।
अ० ४ ] निदानस्थानम् ४५३
अ० ४ ] निदानस्थानम् ४५३ हरिद्रोदकसंकाशं कटुकं यः प्रमेहति । पित्तस्य परिकोपात्तु विद्याद्वारिद्रमेहितम् ॥ ३१ ॥ इत्येते षट्प्रमेहाः पित्तप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ ३२ ॥ (१) क्षारमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण क्षार के समान गन्ध, वर्ण रस और स्पर्शवाला मूत्र करता है वह क्षारमेह का रोगी होता है । (२) कालमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण स्याही के समान काला एवं गरम मूत्र बार-बार करता हो उसको कालमेह का रोगी जानना चाहिये । (३) नीलमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण चाष (नीलकण्ठ) पक्षी के पंख के समान नीले रंग का एवं अम्ल मूत्र त्याग करता है, उसे 'नीलमेह' का रोगी समझना चाहिये । (४) रक्तमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण दुर्गन्धयुक्त, नमकीन, गरम एवं लाल रंग का मूत्र त्याग करता है, उसको रक्तमेह का रोगी समझना चाहिये । (५) मंजिष्ठामेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण मंजीठ के समान या ताम्बे के रंगवाला, दुर्गन्धयुक्त, मात्रा में बहुत, बार-बार मूत्र त्याग करता है, उसको मंजिष्ठामेह का रोगी समझना चाहिये । (६) हारिद्रमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण हल्दी के पानी के समान पीला, एवं कडुवा मूत्र त्याग करता है, उसको हारिद्रमेह का रोगी समझना चाहिये । इस प्रकार से पित्तप्रकोप के कारण होनेवाले छः प्रमेहों का वर्णन- कर दिया ॥२६-३२॥ रूक्ष-कटु-कषाय-तिक्त-लघु-शीत-व्यवाय-व्यायाम-वमन-विरेचना- स्थापनशिरोविरेचनातियोग-संधारणानशनाभिघातातपोद्वेग-शोक-शोणि- तातिसेक-जागरण-विषम-शरीरन्यासानुपसेवमानस्य तथात्मकशरीरस्यव क्षिप्रं वायुः प्रकोपमापद्यते । स प्रकुपितस्तथात्मके शरीरे विसर्पन् यदा वसामादाय मूत्रवहानि स्रोतांसि प्रतिपद्यते, तदा वसामेहमभिनिर्वर्तयति यदा पुनर्मज्जानं मूत्रबस्तावार्कर्षति, तदा मज्जमेहमभिनिर्वर्तयति; यदा लसीकां मूत्राशयेऽभिवहन्मूत्रमनुबन्धं च्योतयति लसीकाविबहुत्वाद्वि- क्षेपणाच्च वायोः खल्वस्यातिमूत्रप्रवृत्तिसङ्गं करोति, तदा स मत्त इव गजः क्षरत्यजस्रं मूत्रमवेगं, तं हस्तिमेहिनमाचक्षते; ओजः पुनर्मधुर- स्वभावं, तद्यदा रौक्ष्याद्वायोः कषायत्वेनाभिसंसृज्य मूत्राशयेऽभिवहति । मधुमेहं करोति ॥ ३३ ॥ तानिमांश्चतुरः प्रमेहान् वातजानसाध्यानाचक्षते भिषजः, महात्य- यत्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वाच्च । तेषामपि च पूर्ववद् गुणविशेषेण नामवि-
४४४ चरकसंहिता [ अ० ४ शेषा भवन्ति । तद्यथा—वसामेहश्च, मज्जमेहश्च, हस्तिमेहश्च, मधुमे- हश्चेति ॥ ३४ ॥ वातजमेह के कारण—रूक्ष, कटु, कषाय, तिक्त, लघु,शीत पदार्थों के उप- योग से स्त्रीसंग, व्यायाम, वमन, विरेचन, बस्तिकर्म और शिरोविरेचन इनके अतियोग से, वेगों को रोकना, अनशन ( उपवास ), चोट लगने से, धूप, शोक, उद्वेग, रक्त के अधिक निकलनेसे, जागने मे, शरीर को विषम अवस्था में रखने से, वातप्रकृतिवाले पुरुष में वायु तत्काल प्रकुपित हो जाता है । ( १ ) वसाप्रमेह की सम्प्राप्ति—इन कारणों से कुपित वायु, वात प्रकृति वाले मनुष्य के शरीर में फैलता हुआ जब वसा के साथ मिलकर मूत्रवह स्रोतों- में पहुंच जाता है, तब वसामेह को उत्पन्न करता है । ( २ ) मजमेह—और जब वायु मज्जा को मूत्रबस्ति में खींचकर ले जाताहै उस समय 'मज्जमेह' उत्पन्न होता है । ( ३ ) हस्तिमेह—जिस समय वायु लसीका १ से मिल कर मूत्राशय में जाकर मूत्र रूप से बाहर निकलता है, उस समय लसीका की अधिकता एवं वायु की विक्षेपण शक्ति के कारण मूत्र बहुत अधिक मात्रा में आता है । तब पुरुष मस्त हाथी के समान निरन्तर वेग से रहित मूत्र बहाया करता है, इसको 'हस्तिमेह' कहते हैं । ( ४ ) मधुमेह—शरीर में स्थित ओज का स्वभाव मधुर है । इस के साथ वायु का रूक्ष एवं कषाय गुण ( वायु अपनी शक्ति से ओज को कषाय में बदल देता है ) मिलकर जब मूत्राशय में जाता है, तब 'मधुमेह' रोग उत्पन्न होता है । सब वातजमेह असाध्य—वैद्य लोग इन चार वातजन्य प्रमेहों को असाध्य मानते हैं। क्योंकि मज्जा आदि सार रूप धातुओं का क्षय हो जाता है और चिकित्सा विपरीत पड़ती है, क्योंकि वायु के लिये स्निग्ध आदि पदार्थ पथ्य हैं, यही मेद के लिये अपथ्य और जो रूक्ष आदि मेद के लिये पथ्य हैं वह वायु के लिये अपथ्य हैं । इनके भी नाम पूर्व की भाँति गुणविशेष को लेकर हैं । यथा—१. वसामेह, २. मज्जमेह, ३. हस्तिमेह और ४. मधुमेह ॥ ३१-३४ ॥ तत्र श्लोका वातप्रमेहविशेषविज्ञानार्था भवन्ति— वातप्रमेहों को विशेष रूप से कहने के लिये ये निम्नलिखित श्लोक हैं— १ लसीका का अर्थ मांस की त्वचा के अन्दर रहने वाले जलीय भाग जैसा कहेंगे—'षण्मांसत्वगन्तरे उदकं तल्लसीकाशब्दं लभते ।'
अ० ४ ] निदानस्थानम् ४४५
अ० ४ ] निदानस्थानम् ४४५ वसासमिश्रं वसाभं च मुहुर्मेहति यो नरः । वसामेहिनमाहुस्तमसाध्यं वातकोषतः ॥ ३५ ॥ मज्जानं सह मूत्रेण मुहुर्मेहति यो नरः मज्जमेहिनमाहुस्तमसाध्यं वातकोपतः ॥ ३६ ॥ हस्ती मत्त इवाजस्रं मूत्रं क्षरति यो भृशम् । हस्तिमेहिनमाहुस्तमसाध्यं वातकोपतः ॥ ३७ ॥ कषायमधुरं पाण्डुं रूक्षं मेहति यो नरः । वातकोपादसाध्यं तं प्रतीयान्मधुमेहिनम् ॥ ३८ ॥ इत्येते चत्वारः प्रमेहा वातप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ ३९ ॥ (१) वसामेह—जो मनुष्य वात के प्रकोप के कारण वसामिश्रित या वसा के समान रंगवाला मूत्र बार-बार करता है, उसको वसामेह का रोगी जानना चाहिये, यह रोग असाध्य है। (२) मज्जमेह—जो मनुष्य वायु के प्रकोप से मजा से युक्त मूत्र बारबार त्याग करता हो, उसको मज्जमेह का रोगी जानना चाहिये । यह भी रोग असाध्य है। (३) हस्तिमेह—जो मनुष्य वायु के प्रकोप से मस्त हाथी की भांति एक समान मूत्र, निरन्तर और बहुत अधिक करता है, उसको हस्तिमेह का रोगी कहते हैं, यह भी असाध्य है। (४) मधुमेह—जो मनुष्य वायु के प्रकोप से कषाय, मधुर, पाण्डुवर्ण और रूक्ष मूत्र त्याग करता है उसको मधुमेह का रोगी जानना चाहिये। यह भी असाध्य है। ये चार प्रमेह वायु के प्रकोप के कारण होते हैं ॥ ३५-३९ ॥ त एवं त्रिदोषप्रकोपनिमित्ता विंशतिः प्र ॓हा व्याख्याता भवन्ति ४० इस प्रकार से तीनो दोषो से उत्पन्न होने वाले सम्पूर्ण बीस प्रकार के प्रमेहो का वर्णन कर दिया है ॥ ४० ॥ त्रयस्तु दोषाः प्रकुपिताः प्रमेहानभिनिर्वर्तयिष्यन्त इमानि पूर्व- रूपाणि दर्शयन्ति । तद्यथा—जटिलीभावं केशेषु, माधुर्यमास्ये, करपा- दयोः सुप्ततादाहौ, मुखतालुकण्ठशोषं, पिपासां, आलस्यं, मलं च काये, कायच्छिद्रेषूपदेहं, परिदाहं, सुप्ततां चाङ्गेषु, षट्पद-पिपीलिकाभिश्च शरीरमूत्राभिसरणं, मूत्रे च मूत्रदोषान्, विस्रं शरीरगन्धं, तन्द्रां च ॓र्छादमिति ॥ ४१ ॥ । का पूर्वरूप—तीनों दोष कुपित होकर प्रमेह रोग को उत्पन्न करते समय ये पूर्वरूप दिखाई देते हैं। यथा—बालों का उलझ जाना,
४४६ चरकसंहिता [ अ० ४ मुख में मिठास, हाथ-पांव में शून्यता और जलन, मुख, तालु और कण्ठ में शुष्कता, प्यास का लगना, आलस्य, कार्य करने में अनिच्छा, शरीर में मल का जमना, शरीर के रोम-छिद्रों का बन्द हो जाना, अंगों में जलन एवं शून्यता, शरीर या मूत्र पर भौंरों या चिउंटी का चढ़ना, मूत्र में मूत्र के दोष शरीर से दुर्गन्ध आना, तथा हर समय आंखों में नींद या तन्द्रा ( भारीपन ) रहता है ॥ ४१ ॥ उपद्रवास्तु खलु प्रमेहिणां—तृष्णातीसार-ज्वर-दाह-दौर्बल्यारोच- काविपाकाः पूति-मांस-पिडकाऽलजी-विद्रध्यादयश्च तत्प्रसंगाद्भवन्ति॥४२॥ तत्र साध्यान् प्रमेहान् संशोधनोपशमनैर्यथार्हमुपपाद्यैश्चि- कित्सेदिति ॥ ४३ ॥ प्रमेह के उपद्रव—प्रमेह के रोगियों में ये उपद्रव उत्पन्न होते हैं । यथा- तृष्णा, प्यास, अतिसार, ज्वर, दाह, दुर्बलता, अरुचि, अविपाक, अपचन, मांस में दुर्गन्धयुक्त पिड़कायें, अलजी, विद्रधि आदि ये सब उपद्रव प्रमेह के कारण होते हैं । चिकित्सा—इन सब प्रमेहो में जो प्रमेह साध्य हों, उनकी यथायोग्य रीति से संशोधन या सशमनविधि से चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ४२-४३ ॥ भवन्ति चात्र—गृद्धमभ्यवहार्येषु स्नानचङ्क्रमणद्विषम् । प्रमेहः क्षिप्रमभ्येति नीडद्रुममिवाण्डजः ॥ ४४ ॥ मन्दोत्साहमतिस्थूलमतिस्निग्धं महाशनम् । मृत्युः प्रमेहरूपेण क्षिप्रमादाय गच्छति ॥ ४५ ॥ यस्त्वाहारं शरीरस्य धातुसाम्यकरं नरः । सेवते विविधांश्चान्याश्चेष्टाः स सुखमश्नुते ॥ ४६ ॥ प्रमेह किसको होता है—घोंसले की ओर जिस प्रकार पक्षी जल्दी पहुंच जाता है, उसी प्रकार खाने-पीने के लालची, स्नान एवं चलने-फिरने से द्वेष करने वाले पुरुष को प्रमेह बहुत शीघ्र लग जाता है । मन्द उत्साहवाले निरुत्साही, अतिस्थूल, अत्यन्त स्निग्ध शरीर वाले एवं बहुत खाने वाले पुरुष को मृत्यु प्रमेह रूप लेकर चली आती है । जो मनुष्य शरीर के धातुओं को समान करने वाले आहार तथा अन्य प्रकार की चेष्टाओं ( विहार ) का सेवन करता है, वह सुख भोगता है ॥ ४४-४६ ॥ तत्र श्लोकाः—हेतुर्व्याधिविशेषाणां प्रमेहाणां च कारणम् । दोषधातुसमायोगो रूपं विविधमेव च ॥ ४७ ॥
अ० ५ ] निदानस्थानम् ४६३
अ० ५ ] निदानस्थानम् ४६३ दशश्लेष्मकृता यस्मात्प्रमेहाः षट् च पित्तजाः । यथा करोति वायुश्च प्रमेहांश्चतुरो बली ॥ ४८ ॥ साध्यासाध्यविशेषाश्च पूर्वरूपाण्युपद्रवाः । प्रमेहाणां निदानेऽस्मिन् क्रियासूत्रं च भाषितम् ॥ ४६ ॥ इस प्रमेह-अध्याय में हेतु, व्याधि, प्रमेहों के कारण, दोष एवं दूष्य का वर्णन, इनके नाना रूप, दस प्रकार कफजन्य, छः प्रकार के पित्तजन्य और चार प्रकार के वातजन्य प्रमेह, उनके साध्य-असाध्य भेद, प्रमेहों के पूर्वरूप, उपद्रव और क्रियासूत्र ये सब विषय कह दिये हैं ॥ ४७-४१ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने प्रमेह- निदानं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पञ्चमोऽध्यायः अथातः कुष्ठनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इसके आगे कुष्ठनिदान का व्याख्यान करते हैं । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥२। सप्त द्रव्याणि कुष्ठानां प्रकृति-विकृतिमापन्नानि भवन्ति । तद्यथा— त्रयो दोषा वातपित्तश्लेष्माणः प्रकोपणविकृताः । दूष्याश्च शरीरधात- वस्त्वङ्-मांस-शोणित-लसीकाश्चतुर्धा दोषोपघातविकृताः; इत्येतत्सप्तानां सप्तधातुकमेकंगत्वमाजननं कुष्ठानाम्, अतः प्रभावण्यभिनिर्वर्तमानानि केवलं शरीरमुपतपन्ति ॥ ३ ॥ शरीर के अन्दर सात द्रव्य विकृत होकर कुष्ठ रोग के कारण बनते हैं । यथा—प्रकोपकारक पदार्थों के संयोग से वात, पित्त और कफ ये तीन दोष विकृत होकर, त्वचा, मांस, रक्त और लसीका इन चार दूष्य ( धातु तथा उप- धातुओं ) को अपने संसर्ग से विकृत करते हैं । इस प्रकार से ये सात द्रव्य विकृत होकर कुष्ठ रोग को उत्पन्न करते हैं । १ इन सातों धातुओं से उत्पन्न १. वीसर्प और कुष्ठ रोग में दोष और दूष्य एक समान ही हैं ।' इस समानता पर भी वीसर्प फैलाने वाला तथा रक्त का प्रधान दोष इसमें रहता है । अकेकी और सब चिकित्साओं के समान है। रक्तजन्य कण्डू, पूय, त्वक्-शून्यता, पसीने का न आना होता है जो वीसर्प में
वर्ण-संस्थान-प्रभाव-नाम-चिकित्सित-विशेषः ॥ ४ ॥
५४८ चरकसंहिता [ अ० ५ कुष्ठ सात धातुओं में अपना प्रभाव प्रकट करता हुआ सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करता है ॥ ३॥ न च किंचिदस्ति कुष्ठमेकदोषप्रकोपनिमित्तं, अस्ति तु खलु समान- प्रकृतीनामपि समानां कुष्ठानां दोषांशांश-विकल्प-स्थान-विभागेन वेदना- वर्ण-संस्थान-प्रभाव-नाम-चिकित्सित-विशेषः ॥ ४ ॥ कोई भी कुष्ठ एक दोष के प्रकोप से उत्पन्न नहीं होता । सातों प्रकार के कुष्ठों में प्रकृति के समान होने पर दोष, अंश, बल, विकल्प तथा स्थान भेद से, वेदना, १ रंग, स्थिति, प्रभाव एवं नाम से चिकित्सा में भेद आजाता है ॥ ४ ॥ स सप्तविधोऽष्टादशविधोऽपरिसंख्येयविधो वा भवति । दोषा हि विकल्पैर्विकल्प्यमाना विकल्पयन्ति विकारान्, अन्यत्रासाध्यभा- वात्; तेषां विकल्प-विकार-संख्यानेऽतिप्रसंगमभिसमीक्ष्य सप्तविधमेव कुष्ठविशेषमुपदेक्ष्यामः ॥ ५ ॥ इस प्रकार से कुष्ठ सात प्रकार का, अठारह प्रकार का अथवा असंख्य प्रकार का हो जाता है । कुष्ठ के सात भेद—दोष अनेक प्रकार की विकल्पनाओं के कारण भिन्न होते हुए नाना प्रकार से नाना रोग उत्पन्न कर देते हैं । अर्थात् व्याधि, करण और दोष इनके भेद से कार्यरूप व्याधि के भी बहुत से भेद हो जाते हैं । इसलिये दोषभेद से उत्पन्न भेदों को असाध्य भेद में नहीं गिना जाता । अतः इन कुष्ठों के भेदों की गणना को बहुत विस्तृत जान कर यहां पर केवल सात प्रकार के कुष्ठों का उपदेश करेंगे ॥५॥ इह वातादिषु त्रिषु प्रकुपितेषु त्वगादींश्चतुरः प्रदूषयत्सु वातेऽ- धिकतरे कापालकुष्ठमभिनिर्वर्तते, पित्ते त्वौदुम्बरं, श्लेष्मणि मण्डल- कुष्ठं, वातपित्तयोर्ऋष्यजिह्वं, पित्तश्लेष्मणोः पुण्डरीकं, श्लेष्ममारुतयोः सिध्म, सर्वदोषाभिवृद्धौ काकणकमभिनिर्वर्तते; इत्येवमेष सप्तविधः कुष्ठविशेषो भवति ॥ ६ ॥ स चैष भूयस्तरमतः प्रकृतौ विकल्पमानायां भूयसीं विकारवि- कल्पसंख्यामापद्यते ॥ ७ ॥ १. वेदनाविशेष—कापालं तोदबहुलम् । वर्णविशेष—काकणन्तिकावर्णम् संस्थान—ऋष्यजिह्वासंस्थानम् । प्रभाव—साध्यताऽसाध्यतादि । नामविधे- कापालः, —ये उदाहरण हैं ।
अ० ५] २६ निदानस्थानम् ४४९
अ० ५] २६ निदानस्थानम् ४४९ वातादि दोष के अनुसार कुष्ठ—वात आदि तीनों दोष प्रकुपित होकर जब त्वचा, मांस, रक्त और लसीका इन चारों को दूषित करते हैं, तब कुष्ठ- रोग उत्पन्न होता है । इनमें वात की अधिकता से कापालकुष्ठ, पित्त की अधिकता से औदुम्बर-कुष्ठ, कफ की अधिकता से मण्डल-कुष्ठ, वात-पित्त की अधिकता से ऋष्यजिह्व-कुष्ठ, पित्त-कफ की अधिकता से पुण्डरीक-कुष्ठ, कफ- वायु की अधिकता से सिध्म-कुष्ठ होता है और सब दोषो की वृद्धि होने से काकणक-कुष्ठ उत्पन्न होता है । इस प्रकार से सात कुष्ठ उत्पन्न होते हैं । यही सात प्रकार के कुष्ठ प्रकृति के तर-तम अर्थात् न्यूनाधिक भेद के कारण नाना प्रकार के कुष्ठों के असंख्य भेद उत्पन्न कर देते हैं ॥७॥ तत्रे॒दं सर्वकुष्ठनिदानं समासेनोपदेक्ष्यामः । शीतोष्णव्यत्यासमननु- पूर्व्योपसेवमानस्य तथा संतर्पणापतर्पणाभ्यवहार्यव्यत्यासं च, मधु-फा- णित-मत्स्य-मूल-काकमाचीश्च सततमतिमात्रमप्यजीर्णेऽन्ने समश्नतश्चि- लिचिमं च पयसा,हायनक-यवक-चीनकोद्दालक-कोरदूषप्रायाणि चान्नानि क्षीर-दधि-तक्र-कोल-कुलत्थ-माषातसी-कुसुम्भ-परुष-स्नेहवन्ति, एतैरेवा- तिमात्रं सुहितभक्षितस्य च व्यवाय-व्यायाम-संतापानत्युपसेवमानस्य, अतिभयश्रमसंतापोपहतस्य च सहसा शीतोदकमवतरतो, विदग्धं चाऽऽहारजातमनुल्लिख्य विदाहीन्यभ्यवहरतः, छर्दिं च प्रतिघ्नतः, स्नेहांश्चातिचरतो युगपत् त्रयो दोषाः प्रकोपमापद्यन्ते, त्वगादयश्चत्वारः शैथिल्यमापद्यन्ते, तेषु शिथिलेषु त्रयो दोषाः प्रकुपिताः स्थानमभिगम्य संतिष्ठमानास्तानेव त्वगादीन् दूषयन्तः कुष्ठान्यभिनिर्वर्तयन्ति ॥ ८ ॥ कुष्ठ रोग के कारण—अब संक्षेप से सब कुष्ठों का निदान कहते हैं। शीत और उष्ण के परिवर्त्तन से, शीत और उष्ण के परित्याग से (अर्थात् उष्ण सेवन करके सहसा शीत सेवन या इसके विपरीत तथा अनुचित काल में शीतोष्ण सेवन से ), संतर्पण एवं अतर्पण दोनों के उलट फेर से, मधु, फाणित (राब), मछली, मूली, काकमाची (मकोय), इनके निरन्तर या अधिक मात्रा में खाने से, अजीर्ण में भोजन करने से, दूध के साथ चिलचिम-मछली के उपयोग से, हायनक, यवक, चीनक, उद्दालक, कोद्रव आदि कुधान्यों के बहुत खाने से, दूध, दही, छाछ, बेर, कुलथी, उड़द, अलसी, धनिया, इनके तेल में तैयार किये पदार्थों के अतिसेवन से, मैथुन, व्यायाम और सन्ताप के करने से, भय, श्रम और सन्ताप से युक्त होने पर एकदम ठण्डे पानी से (ठण्डी वायु के स्पर्श से भी), विदाहकारक पदार्थों का वमन
४५० चरकसंहिता [ अ० ५
न करके पुनः विदाहकारक पदार्थों के खाने से; वमन के वेग को रोकने से, स्निग्ध पदार्थों के अति भोजन से, तीनों दोष एक साथ में कुपित होजाते हैं, तथा त्वचा, रक्त, मांस और लसीका चारों धातु शिथिल होजाते हैं। इन शिथिल हुए धातुओं में कुपित हुए दोष किसी एक भाग में स्थान पाकर घर कर लेते हैं। वहां पर रहकर त्वचा आदि को दूषित बनाकर कुष्ठरोग उत्पन्न करते हैं ॥८॥ तेषामिमानि खलु पूर्वरूपाणि । तद्यथा—अस्वेदनमतिस्वेदनं पारुष्यमतिश्लक्ष्णता वैवर्ण्यं कण्डूर्निस्तोदः सुप्तता परिदाहः परिहर्षो लोमहर्षः खरत्वमुष्णायनं गौरवं श्वयथुर्विसर्पागमनमभीक्ष्णं कायच्छि- द्रेषूपदेहः पक-दग्ध-दष्ट-क्षतोपस्खलितेष्वतिमात्रं वेदना स्वल्पानामपि च व्रणानां दुष्टिरसंरोहणं चेति कुष्ठपूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ ६ ॥ कुष्ठरोग के पूर्वरूप ये हैं—जैसे पसीने का सर्वथा न आना या बहुत पसीना आना, त्वचा में कर्कशता या कठोरता, अथवा बहुत चिकनापन, रंग परिवर्तन, खाज, सुई चुभने की सी वेदना, स्पर्शज्ञान की शून्यता, जलन, रोमांच, हर्ष, रूक्षता, उष्णता, भारीपन, सूजन, वीसर्प रोग का होना, शरीर के छिद्रों में बार बार लेप सा होना, अवरोध, पकने या जलने या कटने या चोट लगने या गिरने पर बहुत दर्द होना, थोड़े से व्रण का भी संक्रान्त होना या शीघ्र न भरना, ये कुष्ठ के पूर्वरूप हैं ॥६॥ तेभ्योऽनन्तरं कुष्ठानि जायन्ते । तेषामिदं वेदना-वर्ण-संस्थान- प्रभाव-नाम-विशेष-विज्ञानं भवति । तद्यथा—रूक्षारुणपरुषाणि विष- मविस्तृतानि खरपर्यन्तानि तनुन्युद्गच्छद्बहिरस्तनूनि सुप्तसुप्तानि हृषितलो- माचितानि निस्तोदबहुळान्यल्पकण्डू-दाह-पूय-लसीकान्याशुगतिसमु- त्थानान्याशुभेदीनि जन्तुमन्ति कृष्णारुणकपालवर्णानि च कापालकुष्ठा- नीति विद्यात् ॥ १० ॥ उनके पीछे कुष्ठ उत्पन्न होते हैं । इसके आगे इनके वेदना, वर्ण, संस्थान, प्रभाव, नाम विशेष वर्णन करते हैं । कापाल-कुष्ठ—रूक्ष, अरुण वर्ण, कर्कश, विषम, फैला, तथा किनारों पर खरखर, बाह्य पार्श्व से पतला तथा थोड़ा उभरा हुआ, पतला, फैला, सोये हुये के समान सोया, बहरा ( स्पर्शज्ञान शून्य ), रोमांच सहित, अतिशय चुभने की वेदनावाले, थोड़ी, खाज, दाह, पूय, लसीका युक्त; शीघ्रता उत्पन्न होनेवाले, शीघ्र फटनेवाले, कीड़ेवाले, काले लाल, कपाल वर्ण के, को 'कापाल कुष्ठ' कहते हैं । कपाल-मिट्टी का ठीकरा, उसके समान ॥ १ ॥
अ० ५ ] निदानस्थानम ४५१
अ० ५ ] निदानस्थानम ४५१ वसन्तानि ताम्र-खर-रोम-राजीभिसन्ततानि बहलानि बहुबहल- रक्त-पूय-लसीकानि कण्डू-क्लेद-कोथ-दाह-पाकवन्त्याशुगतिसमुत्थानभे- दीनि ससंतापकृमीणि पक्कोदुम्बरफलसवर्णाम्युदुम्बरकुष्ठानीति वि- द्यात् ॥ ११ ॥ उदुम्बर-कुष्ठ—जो कुष्ठ ताम्बे के समान या ताम्बे के समान रंगवाले तथा कर्कश रोमवाले; बहुत रक्त-पूय और लसी का से युक्त, जिन में खाज, क्लेद ( स्राव ), कोथ ( गलना ), दाह एवं पाक हो, शीघ्रता से उत्पन्न होनेवाले एवं पकनेवाले, जिनमें ताप एवं कृमि हों, जिनका रंग पके हुए गूलर के समान हो उनको 'उदुम्बर कुष्ठ' जानना चाहिये ॥ ११ ॥ स्निग्धानि गुरुण्युत्सेधवन्ति श्लक्ष्णस्थिरपीनपर्यन्तानि शुक्लरक्ता- वभासानि शुक्लरोमराजीसन्ततानि बहुल-बहल-शुक्ल-पिच्छिल-स्रावाणि बहु-क्लेद-कण्डू-कृमीणि सक्तगतिसमुत्थानभेदीनि परिमण्डलानि मण्डल- कुष्ठानीति विद्यात् ॥ १२ ॥ मण्डल कुष्ठ—जो कुष्ठ स्निग्ध, भारी, ऊंचाईवाले, चिकने, स्थिर, किनारों से मोटे, सफेद या लाल रंग के, सफेद बालों ( रोम ) से व्याप्त, जिनमें बहुत, गाढ़ा एवं सफेद तथा चिकना स्राव होता हो, जो बहुत स्राव, खाज तथा कृमि से युक्त हों, जिनकी गति और उत्पत्ति धीरे २ होती हो, जिनका आकार चक्र के समान गोलाकार हो, उनको 'मण्डलकुष्ठ' कहते हैं ॥ १२ ॥ परुषाण्यरुणवर्णानि बहिरन्तःश्यावानि नील-पीत-ताम्रावभासान्या- शुगतिसमुत्थानान्यल्प-कण्डू-क्लेद-कृमीणि दाह-भेद-निस्तोद-पाक-बहुला- नि शूकोपहतोपमानवेदनान्युत्सन्नमध्यानि तनुपर्यन्तानि कर्कशपिड़का- चितानि दीर्घपरिमण्डलानि ऋष्यजिह्वाकृतीनि ऋष्यजिह्वानीति विद्यात् ॥ १३ ॥ ऋष्यजिह्व-कुष्ठ—जो कुष्ठ बाहर के पार्श्व में खरखर तथा लाल रंग के, अन्दर से काले रंग के, जिनमें नीले, पीले, ताम्बे के रंग की झांई दीखती हो, जो कि शीघ्रता से बढ़ते या उत्पत्ति वाले हों, जिनमें कण्डू, कृमि और क्लेद कम हो, जिनमें दाह, फटना, वेदना तथा पाक बहुत हो, जिनमें शूक ( जल शूक, कृमि ) के लगने के समान पीड़ायें हों, बीच से उठे हुए न हों, किनारों से पतले, [ स्पर्शवाली फुन्सियों द्वारा चारों ओर से घिरे हों, बड़े २ चकतेवाले जीभ के समान आकृतिवाले कुष्ठों को ऋष्यजिह्वकुष्ठ जानना । १३ ॥
४५२ चरकसंहिता [ अ० ५ शुक्लरक्तावभासानि रक्तपर्यन्तानि रक्तराजीसंतवान्युत्सेधवन्ति बहु-बहल-रक्त-पूय-लसीकानि कण्डू-कृमि-दाह-पाकवन्त्याशुगतिसमुत्था- नभेदीनि पुण्डरीकपलाशसंकाशानि पुण्डरीकानीति विद्यात् ॥ १४ ॥ पुण्डरीककुष्ठ—सफेद या लाल रंग की चमक वाले, किनारों पर लाल, लाल रोम (बालों) से व्याप्त, त्वचा से ऊपर उठे हुए न हों, गाढ़ी पूय (पीप), रक्त एवं लसीका बहुत हो, खाज, कृमि, दाह और पाकयुक्त, जल्दी बढ़ने एवं उत्पन्न होने वाले, शीघ्रभेदी, कमल के पत्तों के समान आकारवाले कुष्ठों को 'पुण्डरीक-कुष्ठ' कहते हैं ॥ १४ ॥ परुषारुणविशीर्णबहिस्तनून्यन्तःस्निग्धानि बहून्यल्पवेदनान्थल्प-क- ण्डू-दाह-पूय-लसीकानि लघुसमुत्थानान्यल्पभेदकृमीण्यलाबु-पुष्प-संका- शानि सिध्मकुष्ठानीति विद्यात् ॥ १५ ॥ सिध्मकुष्ठ--जो कुष्ठ बाहर से कठिन, लाल वर्ण, किनारों से कटे-फटे, अन्दर से स्निग्ध, जिनमें सफेद या लाल रंग की चमक हो, जो कि बहुत अधिक हों जिनमें पीड़ा कण्डू, दाह, पूय, लसीका कम हो, जिनकी उत्पत्ति धीरे- धीरे हो, जो अल्पभेदी हों, जिनमें कृमि थोड़े हों और जिनका रंग दूधिया, घीया कद्दू के फूल के समान हो उनको 'सिध्म कुष्ठ' कहते हैं ॥१५॥ काकणन्तिकावर्णान्यादौ पश्चात्सर्व-कुष्ठ-लिङ्ग-समन्वितानि पापीयसा सर्वकुष्ठलिङ्गसंभवेनानेकवर्णानि काकणकानीति विद्यात्, तान्यसा- ध्यानि साध्यानि पुनरितराणि ॥ १६ ॥ काकणक-कुष्ठ—जिन कुष्ठों का रंग प्रथम लाल रत्ती के समान हो और पीछे से उनमें सम्पूर्ण कुष्ठों के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, उनको 'काकणक कुष्ठ' कहते हैं । (इनमें अनेक रंग उत्पन्न हो जाते हैं, ) ये कुष्ठ पापी मनुष्यों को होते हैं। इनमें सब कुष्ठों के लक्षण होने से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ १६ ॥ तत्र यदसाध्यं, तदसाध्यतां नातिवर्तते, साध्यं पुनः किंचित्साध्य- तामतिवर्तते कदाचिदपचारात् । साध्यानीह षट् काकणकवर्ज्यान्य- चिकित्स्यमानान्यपचारतो वा दोषैरभिष्यन्दमानान्यसाध्यतामुपयान्ति १७ साध्य-असाध्य भेद—इन कुष्ठों में से कुछ कुष्ठ साध्य हैं, और कुछ कुष्ठ असाध्य हैं, वे कभी अच्छे नहीं होते। परन्तु जो साध्य हैं, वे अपचार और मिथ्या आहार-विहार के कारण असाध्य होजाते हैं। काकणक-कुष्ठ को छोड़कर शेष छः कुष्ठ भी चिकित्सा के न करने से अथवा दोषों के बढ़ असाध्य होजाते हैं ॥१७॥
अ० ५ ] निदानस्थानम् ४५१
अ० ५ ] निदानस्थानम् ४५१ साध्यानामपि ह्युपेक्ष्यमाणानामेषां त्वङ्-मांस-शोणित-लसीका-को- थ-क्लेद-संस्वेदजाः कृमयोऽभिमूर्च्छन्ति । ते भक्षयन्तस्त्वगादीन् दोषांश्च पुनर्दुष्यन्त इमानुपद्रवान् पृथक्पृथगुत्पादयन्ति । साध्य कुष्ठों में भी उपेक्षा करने से त्वचा, मांस, रक्त, लसीका में सड़ना, स्राव और पसीने से कीड़े उत्पन्न होजाते हैं। ये कृमि त्वचा आदि को खाते हैं, और वात आदि दोष और अधिक दूषित होकर नीचे लिखे उपद्रवों को पृथक् पृथक् रूप में उत्पन्न करते हैं। तत्र वातः श्यावारुणवर्णपरुषतामपि च रौक्ष्य-शूल-शोष-तोद-वेपथु- व्यथा-हर्ष-संकोचाऽऽयास-स्तम्भ-सुप्ति-भेद-भङ्गान्, पित्तं पुनर्दाह-स्वेद- क्लेद-कोथ-कण्डू-स्राव-पाक-रागान्, श्लेष्मा त्वस्य श्वैत्य-शैत्य-स्थैर्य- कण्डू-गौरवोत्सेधोपस्नेहोपलेपान्, कृमयस्त्वगादींश्चातुरः शिराः स्नायूनि मांसान्यस्थीन्यपि च तरुणानि खादन्ति ॥ १८ ॥ अस्यामवस्थायामुपद्रवाः कुष्ठिनं स्पृशन्ति । तद्यथा—प्रस्रवण- मङ्गभेदः पतनान्यङ्गावयवानां तृष्णा-ज्वरातिसार-दाह-दौर्बल्यारोचका- विपाकाश्च, तद्विधमसाध्यं विद्यादिति ॥ १९ ॥ उपद्रव—वायु के कोप के कारण रंग लाल, काला, कर्कशता, रूक्षता, शूल चुभने की सी वेदना, बींधने का सा अनुभव, रोमांच, हर्ष, कम्प, संकोच, श्रम, स्तम्भ, अंग का सो जाना, भेदन या भंग अर्थात् अंगों का टूटना—ये उपद्रव होते हैं। पित्तप्रकोप के कारण दाह, पसीना, क्लिन्नता, सड़ना, खाज, स्राव, पकना इत्यादि उपद्रव होते हैं। कफ के प्रकोप के कारण, श्वेत वर्ण, शीतलता, खाज, स्थिरता, भारीपन, उभार, चिकनास, उपलेप होना ये— उपद्रव होते हैं। इस प्रकार से उत्पन्न कीड़े त्वचा आदि चार धातुओ को तथा शिरा, स्नायु, मांस एवं कोमल अस्थियों (जैसे नाक की कोमल अस्थि) को खाने लगते हैं। इस अवस्था में कुष्ठरोगी को निम्न लिखित उपद्रव घेर लेते हैं। यथा-स्राव का बहना, अंगों का फटना या टूटना, अंगों का गिरना, तृष्णा, ज्वर, अतिसार, दाह, निर्बलता, अरुचि, अविपाक ये उपद्रव होते हैं। इस अवस्था में रोग असाध्य हो जाता है ॥ १८-१९ ॥ चात्र—साध्योऽयमिति यः पूर्वं नरो रोगमुपेक्षते । स किंचित्कालमासाद्य मृत एवावबुध्यते ॥ २० ॥ यस्तु प्रागेव रोगेभ्यो रोगेषु तरुणेषु च ।