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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

१४।९ ] बुद्धवग्गो [ ८५ अनुवाद--क्षमा है परम तप, और तितिक्षा बुद्ध निर्वाणको परम (=उत्तम ) बतलाते हैं; दूसरेका घात करनेवाला, दूसरे- को पीडित करनेवाला प्रव्रजित (=गृहत्यागी ), श्रमण (=संन्यासी ) नहीं हो सकता । निन्दा न करना, घात न करना, प्रातिमोक्ष (=भिक्षु-नियम, आचार-नियम ) द्वारा अपनेको सुरक्षित रखना, परिमाण जानकर भोजन करना, एकान्तमें सोना-बैठना (=शयनासन=निवासगृह ), चित्तको योगमें लगाना, यह बुद्धोंकी शिक्षा है । जेतवन ( उदास भिक्षु ) १८६-न कहापणवस्सेन तित्ति कामेसु विज्जति । अप्पस्सादा दुखा कामा इति विञ्ञाय पण्डितो ॥८॥ ( न कार्षापणवर्षेण तृप्तिः कामेषु विद्यते । अल्पास्वादा दुःखाः कामा इति विज्ञाय पण्डितः ॥८॥ ) १८७-अपि दिब्बेसु कामेसु रतिं सो नाधिगच्छति । तण्हक्खयरतो होति सम्मासम्बुद्धसावको ॥६॥ ( अपि दिव्येषु कामेषु रतिं स नाऽधिगच्छति । तृष्णाक्षयरतो भवति सम्यक्संबुद्धश्रावकः ॥९॥ ) अनुवाद-यदि रुपयों (=कहापण ) की वर्षा हो, तो भी (मनुष्य की) कामो( =भोगों ) से तृप्ति नहीं हो सकती । ( सभी ) काम (=भोग ) अल्प-स्वाद, ( और ) दुःखद हैं, ऐसा जानकर पंडित देवताओंके भोगोंमें भी रति नहीं करता; और सम्यक्संबुद्ध (=बुद्ध )का श्रावक (=अनुयायी ) तृष्णा- को नाश करनेमें लगता है ।

८६ ] धम्मपदं [ १४।१३ जेतवन अग्गिदत्त (ब्राह्मण) १८८-बहुं वे सरणं यन्ति पब्बतानि वनानि च । आरामरुक्खचेत्यानि मनुस्सा भयतज्जिता ॥ १० ॥ ( बहु वै शरणं यान्ति पर्वतान् वनानि च । आरामवृक्षचैत्यानि मनुष्या भयतर्जिताः ॥१०॥ ) १८९-नेतं खो सरणं खेमं नेतं सरणमुत्तमं । नेतं सरणमागम्म सब्बदुक्खा पमुच्चति ॥ ११॥ ( नैतत् खलु शरणं क्षेमं नैतत् शरणमुत्तमम् । नैतत् शरणमागम्य सर्वदुःखात्प्रमुच्यते ॥११॥ ) अनुवाद—मनुष्य भयके मारे पर्वत, वन, आराम ( = उद्यान ), वृक्ष, चैत्य ( = चौरा ) ( आदिको देवता मान उनकी ) शरणमें जाते हैं; किन्तु ये शरण मंगलदायक नहीं, ये शरण उत्तम नहीं; (क्योंकि) इन शरणोंमें जाकर सब दुःखोंसे छुटकारा नहीं मिलता । जेतवन अग्गिदत्त (ब्राह्मण) १९०-यो च बुद्धञ्च धम्मञ्च सङ्घञ्च सरणं गतो । चत्तारि अरियसच्चानि सम्मप्पञ्ञाय पस्सति ॥ १२॥ ( यश्च बुद्धं च धर्मं च संघं च शरणं गतः । चत्वार्यार्यसत्यानि सम्यक् प्रज्ञया पश्यति ॥१२॥ ) १९१-दुक्खं दुक्खसमुप्पादं दुक्खस्स च अतिक्कमं । अरियञ्च'ट्ठङ्गिकं मग्गं दुक्खूपसमगामिनं ॥ १३॥

१४।१५] बुद्धवग्गो [ ८७ (दुःखं दुःखसमुत्पादं दुःखस्य चातिक्रमम् । आर्याष्टांगिकं मार्गं दुःखोपशमगामिनम् ॥१३॥ ) १६२-एतं खो सरणं खेमं एतं सरणमुत्तमं । एतं सरणमासम्म सव्वदुक्खा पमुच्चति ॥१४॥ ( एतत् खलु शरणं क्षेमं पतत् शरणमुत्तमम् । पतत् शरणमागम्य सर्वदुःखात् प्रमुच्यते ॥ १४ ॥ ) अनुवाद-जो बुद्ध (=परमज्ञानी), धर्म (=सत्यज्ञान) और संघ (=परमज्ञानियोंके अनुयायियोंके समुदाय) की शरण गया, जो चारों आर्यसत्यों* को प्रज्ञासे भलीप्रकार देखता है। (वह चार सत्य हैं-) (१) दुःख, (२) दुःखकी उत्पत्ति, (३) दुःखका अतिक्रमण, और (४, दुःख नाशक) आर्य-अष्टांगिक मार्ग†-जो कि दुःखको शमनकरनेकी ओर ले जाता है; ये हैं मंगलप्रद शरण, ये हैं उत्तम शरण, इन शरणोंको पाकर (मनुष्य) सारे दुःखोंसे छूट जाता है। जेतवन आनन्द (थेर) का प्रश्न १९३-दुल्लभो पुरिसानञ्ञो न सो सव्वत्थ जायति । यत्थ सो जायती धीरो तं कुलं सुखमेधति ॥१५॥

  • दुःख, उसका कारण, उसका नाश, और नाशका उपाय-यह बुद्ध द्वारा आविष्कृत चार उत्तम सच्चाइयाँ हैं। † आर्य-अष्टांगिक मार्ग है-ठीक धारणा, ठीक संकल्प, ठीक वचन, ठीक कर्म, ठीक जीविका, ठीक उद्योग, ठीक स्मृति, और ठीक ध्यान ।

धम्मपदं [ १४।१८ (दुर्लभः पुरुषाजानेयो न स सर्वत्र जायते। यत्र स जायते धीरः तत् कुलं सुखमेधते ॥ १५ ॥) अनुवाद—उत्तम पुरुष दुर्लभ है, वह सर्वत्र उत्पन्न नहीं होता, वह धीर (पुरुष) जहाँ उत्पन्न होता है, उस कुलमें सुखकी वृद्धि होती है। जेतवन बहुतसे भिक्षु १६४—सुखो बुद्धानं उप्पादो सुखा सद्धम्मदेसना । सुखा संघस्स सामग्गी समग्गानं तपो सुखो ॥ १६॥ (सुखो बुद्धानां उत्पादः सुखा सद्धर्म-देशना। सुखा संघस्य सामग्री समग्राणां तपः सुखम् ॥ १६॥) अनुवाद—सुखदायक है बुद्धोंका जन्म, सुखदायक है सच्चे धर्मका उपदेश, संघमें एकता सुखदायक है; और सुखदायक है, एकतायुक्त हो तप करना । चारिकाके समय कस्सप बुद्धका सुवर्ण चैत्य १६५-पूजारहे पूजयतो बुद्धे यदि व सावके । पपञ्चसमतिक्कन्ते तिण्णसोकपरिद्दवे ॥१७॥ (पूजार्हान् पूजयतो बुद्धान् यदि वा श्रावकान् । प्रपंचसमतिक्रान्तान् तीर्णशोकपरिद्ववान् ॥ १७ ॥) १६६-ते तादिसे पूजयतो निब्बुते अकुतोभये । न सक्का पुञ्ञं संख्यातुं इमेत्तमपि केनचि ॥१८॥

१२. अत्तवग्गो (आत्म वर्ग)

१४।१८ ] बुद्धवग्गो [ ८९ ( तान् तादृशान् पूजयतो निर्वृतान् अकुतोभयान् । न शक्यं पुण्यं संख्यातुं एवम्मात्रमपि केनचित् ॥ १८ ॥) अनुवाद—पूजनीय बुद्धों, अथवा ( उनके ) अनुगामियों—जो संसार को अतिक्रमणकर गये हैं, जो शोक भयको पारकर गये हैं—की पूजाके, ( या ) उन ऐसे मुक्त और निर्भय (पुरुषों) की पूजाके, पुण्यका परिमाण "इतना है"—यह नहीं कहा जा सकता । १४-बुद्धवर्ग समाप्त

१५—सुखवग्गो शाक्य नगर जाति कलहके उपशमनार्थ १६७-सुसुखं वत ! जीवाम वेरिनेसु अवेरिनो । वेरिनेसु मनुस्सेसु विहराम अवेरिनो ॥ १॥ ( सुसुखं बत ! जीवामो वैरिष्ववैरिणः । वरिषु मनुष्येषु विहरामोऽवैरिणः ॥१॥ ) १६८-सुसुखं वत ! जीवाम आतरेसु अनातुरा । आतरेसु मनुस्सेसु विहराम अनातुरा ॥२॥ ( सुसुखं बत ! जीवाम आतुरेष्वनातुराः । आतुरेषु मनुष्येषु विहरामोऽनातुराः ॥२॥ ) १६६-सुसुखं वत ! जीवाम उस्सुकेसु अनुस्सुका । उस्सुकेसु मनुस्सेसु विहराम अनुस्सुका ॥३॥ ( सुसुखं बत ! जीवाम उत्सुकेष्वनुत्सुकाः । उत्सुकेषु मनुष्येषु विहराम अनुत्सुकाः ॥३॥ ) ९० ]

१५।५ ] सुखवग्गो [ ९१ अनुवाद—वैरियोंके प्रति ( भी ) अवैरी हो, अहो ! हम ( कैसा ) सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं; वैरी मनुष्योंके बीच अवैरी होकर हम विहार करते हैं। भयभीत मनुष्योंमें अभय हो, अहो ! हम सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं; भयभीत मनुष्यों के बीच निर्भय होकर हम विहार करते हैं । उत्सुकौं (=आसक्तों) में उत्सुकता-रहित हो० । पंचसाला ( ब्राह्मणग्राम, मगध ) मार - २००-सुसुखं वत ! जीवाम येसं नो नत्थि किञ्चनं । पीतिमक्खा भविस्साम देवा आभस्सरा यथा ॥४॥ ( सुसुखं वत ! जीवामो येषां नो नास्ति किंचन । प्रीतिभक्ष्या भविष्यामो देवा आभास्वरा यथा ॥४॥ ) अनुवाद—जिन हम ( लोगों ) के पास कुछ नहीं, अहो ! वह हम कितना सुखसे जीवन बिता रहे हैं। हम आभास्वर देवताओं की भाँति प्रीतिभक्ष्य (=प्रीति ही भोजन है जिनका ) हैं । जेतवन कोसलराज २०१-जयं वेरं पसवति दुक्खं सेति पराजितो । उपसन्तो सुखं सेति हित्वा जयपराजयं ॥५॥ ( जयो वैरं प्रसूते दुःखं शेते पराजितः । उपशान्तः सुखं शेते हित्वा जयपराजयौ ॥५॥ ) अनुवाद—विजय वैरको उत्पन्न करती है, पराजित ( पुरुष ) दुःखकी ( नींद ) सोता है; ( राग आदि दोष जिसके ) शान्त ( हैं,

१२ ] धम्मपदं [ १५/७ वह पुरुष ) जय ओर पराजयको छोड़ सुखकी (नींद) सोता है। जेतवन कोई कुलकन्या २०२—नत्थि रागसमो अग्गि, नत्थि दोससमो कलि । नत्थि खन्धसमा दुक्खा नत्थि सन्तिपरं सुखं ॥६॥ ( नास्ति रागसमोऽग्निः, नास्ति द्वेषसमः कलिः । नास्ति स्कन्धसमा दुःखाः, नास्ति शान्तिपरं सुखम् ॥६॥ ) अनुवाद—रागके समान अग्नि नहीं, द्वेषके समान मल नहीं, (पाँच) स्कन्धो* के (=समुदाय) समान दुःख नहीं, शान्तिसे बढ़कर सुख नहीं। आलवी एक उपासक २०३—जिघच्छा परमा रोगा, सङ्घारा परमा दुखा । एतं ञत्वा यथाभूतं निब्बाणं परमं सुखं ॥७॥ ( जिघत्सा परमो रोगः, संस्काराः परमं दुःखम् । एतद् ज्ञात्वा यथाभूतं निर्वाणं परमं सुखम् ॥७॥ ) अनुवाद—भूख सबसे बड़ा रोग है, संस्कार सबसे बड़े दुःख हैं,

  • रूप, वेदना, सञ्ञा, सस्कार, विञ्ञान यह पाँच स्कन्ध हैं। वेदना, सञ्ञा, सस्कार विञ्ञानके अन्दर हैं । पृथिवी, जल, अग्नि, वायु ही रूप स्कध है। जिसमें न भारीपन है, और जो न जगह घेरता है, वह विञ्ञान स्कध है। रूप (=Matter) और विञ्ञान (=Mind) इन्हींके मेळसे सारा ससार बना है।

१५।१० ] सुखवग्गो [ ९३ यह जान, यथार्थ निर्वाणको सबसे बड़ा सुख (कहा जाता है)। जेतवन ( पसेनदि कोसलराज ) २०४-आरोग्यपरमा लाभा सन्तुट्ठी परमं धनं । विस्सासपरमा ञाती निब्बाणं परमं सुखं ॥८॥ ( आरोग्यं परमो लाभः, सन्तुष्टिः परमं धनम् । विश्वासः परमा ज्ञातिः, निर्वाणं परमं सुखम् ॥८॥ ) अनुवाद—निरोग होना परम लाभ है, सन्तोष परम धन है, विश्वास सबसे बड़ा बन्धु है, निर्वाण परम (=सबसे बड़ा) सुख है। वैशाली तिस्स (थेर) २०५-पविवेकरसं पीत्वा रसं उपसमस्स च । निद्दरो होति निष्पापो धम्मपीतिरसं पिवं ॥६॥ ( प्रविवेकरसं पीत्वा रसं उपशमस्य च । निर्दरो भवति निष्पापो धर्म प्रीतिरसं पिवन् ॥९॥ ) अनुवाद—एकान्त (चिन्तन)के रस, तथा उपशम (=शान्ति)के रसको पीकर (पुरुष), निडर होता है, (और) धर्मका प्रेमरस पानकर निष्पाप होता है। बेल्लुवग्राम (वेणुग्राम, वैशालीके पास) सक्क (देवराज) २०६-साधु दस्सनमरियानं सन्निवासो सदा सुखो । अदस्सनेन बालानं निच्चमेव सुखी सिया ॥१०॥

९४ ] धम्मपदं [ १५।१२ ( साधु दर्शनमार्याणां सन्निवासः सदा सुखः । अदर्शनेन बालानां नित्यमेव सुखी स्यात् ॥१०) २०७-बालसंगतिचारी हि दीघमद्धानं सोचति । दुक्खो बालेहि संवासो अमित्तेनेव सब्बदा । धीरो च सुखसंवासो ञातीनं 'व समागमो ॥११॥ ( बालसंगतिचारी हि दीर्घमध्वानं शोचति । दुःखो बालैः संवासोऽमित्रेणैव सर्वदा । धीरश्च सुखसंवासो ज्ञातीनामिव समागमः ॥११॥) अनुवाद—आर्यों* (=सत्पुरुषों) का दर्शन सुन्दर है, सन्तोंके साथ निवास सदा सुखदायक होता है; मूढ़ोंके न दर्शन होनेसे (मनुष्य) सदा सुखी रहता है। मूढ़ोंकी संगतिमें रहने- वाला दीर्घ काल तक शोक करता है, मूढ़ोंका सहवास शत्रु की तरह सदा दुःखदायक होता है, बन्धुओंके समागम- की भाँति धीरोंका सहवास सुखद होता है। वेलुवगाम सक्क (देवराज) २०८-तस्मा हि धीरं च पञ्ञञ्च बहुस्सुतं च धोरय्हसीलं वतवन्तमरियं । तं तादिसं सप्पुरिसं सुमेधं भजेथ नक्खत्तपथं 'व चन्दिमा ॥१२॥ *निर्वाणके पथपर अविचल रूपसे आरूढ़ स्रोतआपन्न, सकृदागामी, अनागामी तथा निर्वाण-प्राप्त=अर्हत् इन चार प्रकारके पुरुषोंको आर्य कहते हैं।

१३. लोकवग्गो (लोक वर्ग)

१५।१२ ] सुखवग्गो [ ९५ ( तस्माद्धि धीरं च प्राज्ञं च बहुश्रुतं च धुर्यशीलं व्रतवन्तमार्यम् । तं तादृशं सत्पुरुषं सुमेधसं भजेत नक्षत्रपथमिव चन्द्रमा ॥१२॥) अनुवाद—इसलिये धीर, प्राज्ञ, बहुश्रुत, उद्योगी, व्रती, आर्य एवं सुबुद्धि सत्पुरुषका वैसेही सेवन करे, जैसे चन्द्रमा नक्षत्र- पथका ( सेवन करता है ) । १५—सुखवर्ग समाप्त

१६—पियवग्गो जेतवन तीन भिक्षु २०९-अयोगे युञ्जमत्तानं योगस्मिञ्च अयोजयं । अत्थं हित्वा पियग्गाही पिहेत'त्तानुयोगिनं ॥१॥ (अयोगे युंजन्नात्मानं योगे चायोजयन् । अर्थं हित्वा प्रिय-ग्राही स्पृहयेदात्मानुयोगिनम् ॥१॥) २१०-मा पियेहि समागच्छि अप्पियेहि कदाचनं । पियानं अदस्सनं दुक्खं अप्पियानञ्च दस्सनं ॥२॥ (मा प्रियैः समागच्छ, अप्रियैः कदाचन । प्रियाणां अदर्शनं दुःखं, अप्रियाणां च दर्शनम् ॥२॥) २११-तस्मा पियं न कयिराथ पियापायो हि पापको । गन्था तेसं न विज्जन्ति येसं नत्थि पियाप्पियं ॥३॥ (तस्मात् प्रियं न कुर्यात्, प्रियापायो हि पापकः । ग्रन्थाः तेषां न विद्यन्ते येषां नास्ति प्रियाप्रियम् ॥३॥) ९६]

१६।५ ] पियवग्गो [ ९७ अनुवाद—अयोग(=अनासक्ति) में अपनेको लगानेवाले, योग (=आसक्ति) में न योग देनेवाले, अर्थ (=स्वार्थ) छोड प्रियका ग्रहण करनेवाले आत्माऽनुयोगी (पुरुष) की स्पृहा करे । प्रियोंका संग मत करो, और न कभी अप्रियों ही (का संग करो), प्रियोका न देखना दुःखद् होता है, और अप्रियोंका देखना (भी)। इसलिये प्रिय न बनावे, प्रियका नाश बुरा (लगता है); उनके (दिलमें) गाँठ नहीं पडती, जिनके प्रिय अप्रिय नहीं होते । जेतवन कोई कुटुम्बी २१२-पियतो जायते सोको पियतो जायते भयं । पियतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ? ॥४॥ (प्रियतो जायते शोकः प्रियतो जायते भयम् । प्रियतो विप्रमुक्तस्य नास्ति शोकः कुतो भयम् ?॥४॥) अनुवाद—प्रिय (वस्तु) से शोक उत्पन्न होता है, प्रियसे भय उत्पन्न होता है; प्रिय(के बन्धन) से जो मुक्त है, उसे शोक नहीं है, फिर भय कहाँसे (हो) ? जेतवन विशाखा (उपासिका) २१३-पेमतो जायते सोको पेमतो जायते भयं । पेमतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ? ॥५॥ (प्रेम्तो जायते शोकः प्रेम्तो जायते भयम् । प्रेम्तो विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् ?॥५॥ ७

९८ ] धम्मपदं [ १६।८ अनुवाद—प्रेमसे शोक उत्पन्न होता है, प्रेमसे भय उत्पन्न होता है, प्रेमसे मुक्तको शोक नहीं, फिर भय कहाँसे ? वैशाली (कूटागारशाला) लिच्छवि लोग २१४-रतिया जायते सोको रतिया जायते भयं । रतिया विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ॥६॥ (रत्या जायते शोको रत्या जायते भयम् । रत्या विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् ॥६॥) अनुवाद—रति(=राग) से शोक उत्पन्न होता है, रतिसे भय उत्पन्न होता है० । जेतवन अनित्यगन्धकुमार २१५-कामतो जायते सोको कामतो जायते भयं । कामतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ॥७॥ (कामतो जायते शोकः कामतो जायते भयम् । कामतो विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् ? ॥७॥) अनुवाद—कामसे शोक उत्पन्न होता है० । जेतवन कोई ब्राह्मण २१६-तणहाय जायते सोको तणहाय जायते भयं । तणहाय विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ?॥८॥ (तृष्णाया जायते शोकः तृष्णाया जायते भयम् । तृष्णाया विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् ? ॥८॥)

१६।११ ] पियवग्गो [ ९९

अनुवाद—तृष्णासे शोक उत्पन्न होता है० । राजगृह (वेणुवन) पाँच सौ बालक २१७–सीलदस्सनसम्पन्नं धम्मट्ठं सच्चवादिनं । अत्तनो कम्म कुब्बानं तं जनो कुरुते पियं ॥६॥ ( शीलदर्शनसम्पन्नं धर्मिष्ठं सत्यवादिनम् । आत्मनः कर्म कुर्वाणं तं जनः कुरुते प्रियम् ॥९॥ ) अनुवाद—जो शील (=आचरण) और दर्शन (=विद्या) से सम्पन्न, धर्ममें स्थित, सत्यवादी और अपने कामको करनेवाला है, उस (पुरुष) को लोग प्रेम करते हैं । जेतवन (अनागामी) २१८–छन्दजातो अनक्खाते मनसा च फुटो सिया । कामेसु च अप्पटिबद्धचित्तो उद्धंसोतो 'ति वुच्चति ॥१०॥ ( छन्दजातोऽनाख्याते मनसा च स्फुरितः स्यात् । कामेषु चाऽप्रतिबद्धचित्त ऊर्ध्वस्रोता इत्युच्यते ॥१०॥ ) अनुवाद—जो अकथ्य (-वस्तु=निर्वाण) का अभिलाषी है, (उसमें) जिसका मन लगा है, कामो(=भोगों) में जिसका चित्त बद्ध नहीं, वह ऊर्ध्वस्र्रोत कहा जाता है । ऋषिपत्तन नन्दियपुत्त २१६–चिरप्पवासिं पुरिसं दूरतो सोत्थिमागतं । ञातिमित्ता सुहज्जा च अभिनन्दन्ति आगतं ॥११॥

१०० ] धम्मपदं [ १६।१२ ( चिरप्रवासिनं पुरुषं दूरतो स्वस्त्यागतम् । ज्ञातिमित्राणि सुहृदश्चाऽभिनन्दन्त्यागतम् ॥११॥ ) २२०--तथेव कतपुञ्ञम्पि अस्मा लोका परं गतं । पुञ्ञानि पतिगण्हन्ति पियं ञातीव आगतं ॥१२॥ ( तथैव कृतपुण्यमप्यस्मात् लोकात् परं गतम् । पुण्यानि प्रतिगृह्णन्ति प्रियं ज्ञातिमिवागतम् ॥१२॥ ) अनुवाद--चिर-प्रवासी (=चिर काल तक परदेशमें रहे) दूर (देश) से सानन्द लौटे पुरुषका, जातिवाले, मित्र और सुहृद् अभि- नन्दन करते हैं; इसी प्रकार पुण्यकर्मा (पुरुष) को इस लोकसे पर(लोक) में जानेपर, (उसके) पुण्य (कर्म) प्रिय जाति(वालों) की भाँति स्वीकार करते हैं। १६-प्रियवर्ग समाप्त

१४. बुद्धवग्गो (बुद्ध वर्ग)

१७—कोधवग्गो कपिलवस्तु ( न्यग्रोधाराम ) रोहिणी २२१-कोधं जहे विप्पजहेय्य मानं संयोजनं सब्बमतिकम्मेय्य । तं नाम-रूपस्मिं असज्जमानं अकिञ्चनं नानुपतन्ति दुक्खा ॥ १॥ (क्रोधं जह्याद् विप्रजह्यात् मानं संयोजनं सर्वमतिक्रामेत् । तं नाम-रूपयोरसज्यमानं अकिंचनं नाऽनुपतन्ति दुःखानि ॥१॥) अनुवाद—क्रोधको छोड़े, अभिमानका त्याग करे, सारे संयोजनों (=बंधनों) से पार हो जाये, ऐसे नाम-रूपमें आसक्त न होनेवाले, तथा परिग्रहरहित (पुरुष)को दुःख संताप नहीं देते।

१०२ ] धम्मपदं [ १७।४ आळवी ( अग्गाळव चैत्य ) कोई भिक्षु २२२-यो वे उप्पतितं कोधं रथं भन्तं 'व धारये । तमहं सारथिं ब्रूमि, रस्मिग्गाहो इतरो जनो ॥२॥ ( यो वै उत्पतितं क्रोधं रथं भ्रान्तमिव धारयेत् । तमहं सारथिं ब्रवीमि, रश्मिग्राह इतरो जनः ॥२॥ ) अनुवाद—जो चढ़े क्रोधको भ्रमण करते रथकी भाँति पकड़ ले, उसे मैं सारथी कहता हूँ, दूसरे लोग लगाम पकड़नेवाले ( मात्र ) हैं । राजगृह ( वेणुवन ) उत्तरा ( उपासिका ) २२३-अक्कोधेन जिने कोधं असाधुं साधुना जिने । जिने कदरियं दानेन सच्चेन अलिकवादिनं ॥३॥ ( अक्रोधेन जयेत् क्रोधं, असाधुं साधुना जयेत् । जयेत् कदर्यं दानेन सत्येनाऽलीकवादिनम् ॥३॥ ) अनुवाद—अक्रोधसे क्रोधको जीते, असाधुको साधु (=भलाई ) से जीते, कृपणको दानसे जीते, झूठ बोलनेवालेको सत्यसे ( जीते ) । जेतवन महामोग्गलान ( थेर ) २२४-सच्चं भणे न कुज्झेय्य, दज्जा'प्पस्मिम्पि याचितो । एतेहि तीहि ठानेहि गच्छे देवान सन्तिके ॥४॥ ( सत्यं भणेत् न क्रुध्येत्, दद्यादल्पेऽपि याचितः । एतैस्त्रिभिः स्थानैः गच्छेद् देवानामान्तके ॥४॥ )

१७६ ] कोधवग्गो [ १०३ अनुवाद—सच बोले, क्रोध न करे, थोडा भी माँगनेपर दे, इन तीन बातोसे ( पुरुष ) देवताओके पास जाता है । साकेत (=अयोध्या ) ब्राह्मण २२५-अहिंसका ये मुनयो निच्चं कायेन संवुता । ते यन्ति अच्चुतं ठानं यत्थ गन्त्वा न सोचरे ॥५॥ ( अहिंसका ये मुनयो नित्यं कायेन संवृताः । ते यन्ति अच्युतं स्थानं यत्र गत्वा न शोचन्ति ॥५॥ ) अनुवाद—जो मुनि ( लोग ) अहिंसक, सदा कायामें संयम करनेवाले हैं, वह ( उस ) अच्युत स्थान (=जिस स्थान पर पहुँच फिर गिरना नहीं होता )को प्राप्त होते हैं, जहाँ जाकर फिर नहीं शोक किया जाता । राजगृह ( गृध्रकूट ) राजगृह-श्रेष्ठीका पुत्र २२६-सदा जागरमानानं अहोरत्तानुसिक्खिनं । निब्बाणं अधिमुत्तानं अत्थं गच्छन्ति आसवा ॥६॥ ( सदा जाग्रतां अहोरात्रं अनुशिक्षमाणानाम् । निर्वाणं अधिमुक्तानां अस्तं गच्छन्ति आस्रवाः ॥६॥ ) अनुवाद—जो सदा जागता (=सचेत ) रहता है, रातदिन ( उत्तम ) सीख सीखनेवाला होता है, और निर्वाण ( प्राप्त कर ) मुक्त हो गया है, उसके आस्रव (=चित्त मल ) अस्त हो जाते हैं ।

१०४ ] धम्मपदं [ १७।९ जेतवन अतुल (उपासक) २२७–पोराणमेतं अतुल ! नेतं अज्जतनामिव । निन्दन्ति तुण्हीमासीनं निन्दन्ति बहुभाणिनं । मितभाणिनम्पि निन्दन्ति नत्थि लोके अनिन्दितो ॥७॥ ( पुराणमेतद् अतुल ! नैतद् अद्यतनमेव । निन्दन्ति तूष्णीमासीनं निन्दन्ति बहुभाणिनम् । मितभाणिनमपि निन्दन्ति नाऽस्ति लोकेऽनिन्दितः ॥७॥ ) २२८–न चाहु न च भविस्सन्ति न चेतरहि विज्जति । एकन्तं निन्दितो पोसो, एकन्तं वा पसंसितो ॥८॥ ( न चाऽभूत् न च भविष्यति न चैतर्हि विद्यते । एकान्तं निन्दितः पुरुष एकान्तं वा प्रशंसितः ॥८॥ ) अनुवाद—हे अतुल ! यह पुरानी बात है, आजकी नहीं—(लोग) चुप बैठे हुये की निन्दा करते हैं, और बहुत बोलनेवालेकी भी, मितभाषीकी भी निन्दा करते हैं; दुनियामें अनिन्दित कोई नहीं है । बिल्कुल ही निन्दित या बिल्कुल ही प्रशंसित पुरुष न था, न होगा, न आजकल है । जेतवन अतुल (उपासक) २२९–यञ्चे विञ्ञू पसंसन्ति अनुविच्च सुवे सुवे । अच्छिद्दवुत्तिं मेधाविं पञ्ञासीलसमाहितं ॥६॥