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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ, मंगलाचरण एवं ध्वनि-सिद्धान्त विस्तृत भूमिका

श्री विद्याभवन संस्कृत ग्रन्थमाला ९७ हिन्दी- ध्वन्यालोक ( सटिप्पण 'लोचन' व्याख्यासहित ) व्याख्याकार आचार्य जगन्नाथ पाठक चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-१

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Acharya Bushan (M.A. Sahityacharya) R/o Brijbehara Kashmir. آچاریہ بھوشن (ایم۔آے) ــــ ساہتیہ آچاریہ ــــ

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॥ श्रीः ॥ विद्याभवन संस्कृत ग्रन्थमाला ९७ श्रीमदानन्दवर्धनाचार्यविरचितः ध्वन्यालोकः श्रीमदभिनवगुप्तपादविरचित 'लोचन' सहितः सटिप्पण 'प्रकाश' हिन्दीव्याख्योपेतश्च हिन्दीव्याख्याकार आचार्य जगन्नाथ पाठक एम० ए० ( साहित्यशास्त्राचार्य, साहित्यरत्न ) चौखम्बा विद्याभवन वाराणसी-१

प्रकाशक : चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी मुद्रक : विद्याविलास प्रेस, वाराणसी संस्करण : प्रथम, वि० संवत २०२१ मूल्य : १६-०० © The Chowkhamba Vidya Bhawan, Chowk, Varanasi-1 ( INDIA ) 1965 Phone : 3076

THE VIDYABHAWAN SANSKRIT GRANTHAMALA 97 THE DHVANYĀLOKA OF S'rī Ānandavardhanāchārya WITH THE LOCHANA SANSKRIT COMMENTARY OF S'rī Abhinavagupta and THE PRAKĀS'A HINDĪ TRANSLATION OF BOTH THE TEXTS and EXHAUSTIVE NOTES BY ĀCHĀRYA JAGANNĀTH PĀTHAK M. A. THE CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN Post Box No. 69. Varanasi-1 ( India ) Phone : 3076 1965

Also can be had of THE CHOWKHAMBA SANSKRIT SERIES OFFICE Publishers & Antiquarian Book-Sellers POST BOX 8. VARANASI-1 (India) PHONE : 3145

समर्पण कविता और तर्क के विलक्षण सामरस्य प्रातःस्मरणीय गुरुवर श्री स्वामी महेश्वरानन्द सरस्वती जी महाराज [ पूर्वाश्रम के : कवितार्किक चक्रवर्ती श्रीयुत पं० महादेवशास्त्री जी ] को सविनय अन्योन्यस्मिन् स्फुरदभिनवाद्वैतसम्बन्धभावं तत्त्वं साक्षान्मिलितमिव वागर्थयोस्तत्त्वदृष्ट्या । यद्वा साम्यं हिमगिरिसुताशर्वयोर्भूतये न- स्तत् सम्भूयात् किमपि कवितातर्कयोः सामरस्यम् ॥

समर्पणम् [अस्पष्ट] [अस्पष्ट] [अस्पष्ट] [अस्पष्ट] के करकमलों में [अस्पष्ट श्लोक - अत्यधिक धुंधला/पठनीय नहीं] [अस्पष्ट] [अस्पष्ट] [अस्पष्ट]

पश्यन्ती 'ध्वनिनाऽतिगभीरेण काव्यतत्त्वनिवेशिना। आनन्दवर्धनः कस्य नासीदानन्दवर्धनः' ॥ राजशेखर : जल्हणसंकलित 'सूक्तिमुक्तावली' ‘ध्वनिकृतामालङ्कारिकसरणि व्यवस्थापकत्वात्'— पण्डितराज : रसगङ्गाधर ध्वन्यालोक ध्वन्यालोक भारतीय साहित्यशास्त्र का महनीयतम निर्माण है। यह एक आलोक-स्तम्भ की भांति अपने चतुर्दिक् आलोक विकीर्ण करके काव्य के अनुन्मीलितपूर्व आभ्यन्तर पक्षों को आलोकित करता हुआ आज भी चिरनवीन बना हुआ है। जैसा कि पण्डितों का कहना है, ध्वन्यालोक का अलङ्कार-साहित्य में वही स्थान है जो व्याकरण में पाणिनि के सूत्रग्रन्थ का और वेदान्त में वेदान्तसूत्र का। यह प्रमाणित सत्य है कि चाहे विचार का कोई क्षेत्र हो, जब भी स्थूल का आधिपत्य हुआ, तभी सूक्ष्म ने उसके विपरीत या विरोध में क्रान्ति की। दर्शन में कभी स्थूलदर्शी चार्वाकों का बहुत जोर था, इसके विरोध में आचार्य शङ्कर द्वारा सूक्ष्म वेदान्तिक आत्मवाद की प्रतिष्ठा हुई। इसी प्रकार साहित्य में भामह, दण्डी, उद्भट, वामन प्रभृति आचार्यों के सामने काव्य का स्थूल शरीर-पक्ष प्रधान बना रहा। जब आचार्य भामह ने 'शब्दार्थों सहितौ काव्यम्' कह कर स्पष्टतः शब्द-अर्थ को काव्य का शरीर स्वीकार किया, तब इस काव्य-शरीर के शोभाधायक तत्त्वों में गुण, अलङ्कार, रीति तथा वृत्तियाँ स्वीकार की गईं। इन सभी में अलङ्कार को काव्य के सौन्दर्य के लिए अनिवार्य स्वीकार किया गया (काव्यं ग्राह्यमलङ्कारात्···सौन्दर्यमलङ्कारः—वामन )। 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' इस न्याय के बल पर ही व्यापक अर्थ में समग्र साहित्यशास्त्र को 'अलङ्कार-शास्त्र' एवं साहित्यिक आचार्यों को 'आलङ्कारिक' कहने की प्रवृत्ति चल पड़ी थी। 'साहित्य' शब्द काव्य के क्षेत्र में भामह के 'सहितौ' प्रयोग से शब्द और अर्थ के सहभाव या साहचर्य के आधार पर प्रचलित हुआ जान पड़ता है। इस प्रकार साहित्य में शरीरवाद के विपक्ष में आत्मवाद की प्रतिष्ठा के उद्देश्य से ध्वन्यालोक का निर्माण हुआ। इसका आकलनीय सङ्केत 'लोचन' टीका में आचार्य अभिनवगुप्त ने कर दिया है—'वाच्यसंवलनाविमोहितहृदयैस्तु तत्पृथग्भावे विप्रतिपद्यते, चार्वाकै- रिवात्मपृथग्भावे ।' (पृ० ४४) अर्थात् चार्वाक लोग जिस प्रकार आत्मा का शरीर से पृथग्भाव मानने में विरुद्ध आपत्तियाँ उठाते हैं, उसी प्रकार जिन लोगों का हृदय वाच्य अर्थमात्र के सम्मिश्रण में विमोह की स्थिति प्राप्त कर चुका है वे वाच्य के अतिरिक्त किसी अर्थ के पृथग्भाग में सन्देह करते हैं।

( ८ ) ध्वन्यालोक काव्य के जिस आत्मतत्त्व की महती प्रतिष्ठापना के उद्देश्य से लिखा गया वह है, ध्वनि अर्थात् शब्द का चतुर्थकक्षातिविष्ट व्यङ्ग्य अर्थ । कवि-वाणी की समग्र सार्थकता उसीके प्राधान्यतः स्फुरण में निहित होती है। यह बात भामह, उद्भट प्रभृति प्राचीन आलंङ्कारिकों को उतनी स्पष्टता से विदित न थी। यद्यपि उन्हें व्यङ्ग्य अर्थ का आभास पर्यायोक्त आदि अनेक अलङ्कारों में मिल चुका था, तथापि वे वाच्य अर्थ की अपेक्षा व्यङ्ग्य के चारुत्व में विश्वास न रखते थे। इस कारण उनके यहाँ व्यङ्ग्य की स्थिति वाच्यानुगत ही बनी रही। यहाँ तक कि वाच्यता के स्पर्शलेश से भी शून्य रस-भावादि तत्त्व भी उन प्राचीन आलंङ्कारिकों के यहाँ रसवदादि अलङ्कार के रूप में वाच्य के शोभाहेतु ही बने रहे । तब किसी ऐसे विशिष्ट महामेधावी आचार्य की साहित्य को आवश्यकता थी जो काव्य-शरीर के केवल शोभाहेतु तत्त्वों के निरूपण की बोझिल और बेजान परम्परा को धक्का देकर आत्मा के भास्वर रूप को आलोकित करता और काव्य के प्रकीर्ण एवं व्याकीर्ण तत्त्वों को संगत करते हुए काव्यालोचन को नई वाणी, नया वेग, नया जीवन प्रदान करता। निश्चित ही यह महनीयतम कार्य भारतीय साहित्यशास्त्र के सबसे अधिक महत्त्वशाली ध्वनि-सम्प्रदाय के प्रवर्तक, ध्वन्यालोक के रचयिता श्रीमदानन्दवर्धनाचार्य ( नवम शताब्दी ) द्वारा समग्रता के साथ सम्पन्न हुआ। साहित्य के क्षेत्र में 'ध्वनि' शब्द एक नया प्रयोग था, किन्तु स्वरूपतः उसे 'ध्वनि' के आधारभूत प्रतीयमान या व्यङ्ग्य अर्थ की स्वीकृति द्वारा प्राचीन आचार्यों ने आक्षेप, अप्रस्तुत-प्रशंसा, समासोक्ति, व्याजस्तुति आदि अलङ्कारों में ( अप्रधान रूप से ही ) सङ्केतित कर दिया था। 'रसगङ्गाधर' के पर्यायोक्त-प्रकरण में पण्डितराज ने इसे पूर्णतः स्वीकार किया है— 'ध्वनिकारात् प्राचीनैर्भामहोद्भटप्रभृतिभिः स्वग्रन्थेषु कुत्रापि ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्यादिशब्दा न प्रयुक्ता इत्येतावत्तैव तैर्ध्वन्यादयो न स्वीक्रियन्त इत्याधुनिकानां वाचोयुक्तिरयुक्तैव । यतः समासोक्ति- व्याजस्तुत्यप्रस्तुतप्रशंसाद्यलङ्कारनिरूपणे कियन्तोऽपि गुणीभूतव्यङ्ग्यभेदास्तैरपि निरूपिताः । अपरश्च सर्वोऽपि व्यङ्ग्यप्रपञ्चः पर्यायोक्तकुक्षौ निक्षिप्तः । न ह्यनुभवसिद्धोऽर्थो बालेनाप्यपह्नोतुं शक्यते । ध्वन्यादिशब्दैः परं व्यवहारो न कृतः । न ह्येतावतानङ्गीकारो भवति । प्राधान्यादलङ्कार्यो हि ध्वनिरलङ्कारस्य पर्यायोक्तस्य कुक्षौ कथङ्कारं निविशतामिति तु विचारान्तरम् ।' स्वयं आनन्दवर्धनाचार्य ने भी इसका सङ्केत इन शब्दों में कर दिया है— 'यद्यपि ध्वनिशब्दसङ्कीर्तनेन काव्यलक्षणविधायिभिर्गुणवृत्तिरन्यो वा न कश्चित प्रकारः प्रकाशितः, तथापि अमुख्यवृत्त्या काव्येषु व्यवहारं दर्शयता ध्वनिमार्गो मनाक् स्पृष्टोऽपि न लक्षितः ।' ( पृ० ३४ ) इस अंश पर 'लोचन' भी सर्वथा आकलनीय है। जैसा कि लोचनकार ने स्पष्ट करते हुए लिखा है कि उद्भट और वामन आदि आचार्यों ने ध्वनि का दिगुन्मीलन कर दिया था, क्योंकि 'भामहविवरण' (अप्राप्त) नामक अपने ग्रन्थ में भट्ट उद्भट ने भामह के 'शब्दाश्छन्दोभिधानार्थाः' के व्याख्यान में कहा है—'शब्दों का अभिधान या अभिधा व्यापार दो प्रकार का होता है, मुख्य और गुणवृत्ति ।' इसी प्रकार 'वामन' भी लिखते हैं—'सादृश्यालक्षणा वक्रोक्तिः' अर्थात् सादृश्य के कारण ( सादृश्य से गर्भित होने से ) लक्षणा 'वक्रोक्ति' कहलाती है। इस प्रकार अमुख्य व्यापार और सादृश्य की ओर प्रवृत्ति से विदित होता है कि प्राचीन आचार्य व्यङ्ग्य अर्थ के प्रति गतिशील हो चुके थे, वाच्य अर्थ की सीमा उन्हें पसंद न थी, फिर भी वे उस सीमा को तोड़ न सके।

( ६ ) प्राचीनों के यहाँ एकमात्र वाच्य को मूल केन्द्र में रख कर ही तथा उसकी प्रायः सीमा में ही काव्य के विविध तत्त्वों की सार्थकता का परीक्षण किया गया। इसलिए वाच्य के प्राधान्य में चमत्कार का कुछ इस प्रकार उन्हें व्यामोह था कि वे काव्य के बाह्य शरीर के अलङ्करण को ही काव्य का सर्वस्व समझ बैठे थे, किन्तु जब कवि-वाणी के आभ्यन्तर चमत्कार पर ध्वनिकार की दृष्टि गई तब उनके यहाँ शब्द और अर्थ के बाह्य विधानों के सारे रूप एकवारगी शिथिल हो गए और रामायण, महाभारत प्रभृति ग्रन्थों में सर्वत्र अभिनव प्रतीयमान अर्थ स्फुरित होने लगा। ध्वनिकार को ऐसा अनुभव हुआ कि वह प्रतीयमान अर्थ कुछ इस प्रकार है जैसे घंटा का अनुरणन। बस, क्या था, उन्होंने इसी आधार पर उस अर्थ की संज्ञा 'ध्वनि' रख दी तथा इसके प्रमाणस्वरूप उन्हें विद्वान् वैयाकरणों के यहाँ अनुकूल संकेत भी मिल गया। वैयाकरण लोग श्रूयमाण वर्णों में 'ध्वनि' शब्द का व्यवहार करते थे। इतना ही नहीं, शब्द और अर्थ के बाह्य समग्र रूपों और विच्छित्तियों को अतिशयित करके प्राधान्यतः स्फुरित होने वाला वह प्रतीयमान अर्थ उसी प्रकार उन्हें बाह्य तत्त्वों से पृथक् लगा जिस प्रकार अङ्गनाओं में उनका लावण्य उनके अङ्गसंस्थान से अभिव्यङ्ग्य होकर अङ्ग से व्यतिरिक्त होता है। 'लावण्य' के सम्बन्ध में यह श्लोक प्रसिद्ध है— मुक्ताफलेषु च्छायायास्तरळत्वमिवान्तरा। प्रतिभाति यदङ्गेषु तल्लावण्यमिहोच्यते ॥ अर्थात् मुक्ताओं में 'आब' के रूप में जो छाया की तरलता सी कुछ झलकती-दिपती रहती है वही अङ्गों में 'लावण्य' कहलाती है। ध्वनिकार लिखते हैं— प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् । यत्तत्प्रसिद्धावयवातिरिक्तं विभाति लावण्यमिवाङ्गनासु ॥ पृ० ४७ अर्थात् महाकवियों की वाणियों में वह प्रतीयमान कुछ और ही है जो वह प्रसिद्ध अवयवों से अतिरिक्त रूप में अङ्गनाओं में लावण्य की भांति भासित होता है। यही नहीं, उस प्रतीयमान अर्थ की छाया, स्त्रियों की लज्जा की भांति, महाकवियों की अलङ्कार- सम्पन्न वाणियों की मुख्य भूषण है— मुख्या महाकविगिरामलङ्कृतिभृतामपि । प्रतीयमानच्छायैषा भूषा लज्जेव योषिताम् ॥ ध्व० ३।३७ ( यद्यपि आचार्य कुन्तक इस पद्य में 'लावण्य' के स्थान पर 'सौभाग्य' पद को अभिषिक्त करते हैं, क्योंकि इस प्रकार सहृदयों के ही संवेद्य प्रतीयमान के साथ सकललोकलोचनसंवेद्य 'लावण्य' का समीकरण नहीं हो सकता और 'सौभाग्य' के वहाँ नियोजन से काव्यपरमार्थज्ञ सहृदयों के ही अनुभव-गोचर और कामिनियों के विलक्षण 'सौभाग्य', जो तदुपभोगोचित नायक- जनों के ही संवेद्य के साथ समीकृत हो जाता है, तथापि जो 'लावण्य' को प्रसिद्धावयवव्यतिरेकिता के साथ प्रतीयमान की प्रसिद्धालंकृत या प्रतीत अवयवों से व्यतिरेकित्व की बात अधिक संगत लगती है और साथ ही जो 'लावण्य' में आकर्षण और स्वारस्य है वह 'सौभाग्य' में नहीं। अस्तु ) ध्वन्यालोककार इस प्रतीयमान या व्यङ्ग्य अर्थ के तीन भेद करते हैं—वस्तु, अलङ्कार और रसादि। इनमें वस्तुध्वनि और अलङ्कारध्वनि, शब्दाभिधेय होने के कारण लौकिक हैं किन्तु

( १० ) रसादि ध्वनि किसी भी स्थिति में, बल्कि स्वप्न में भी अभिहित नहीं होता, इसलिए अलौकिक है। इस प्रकार ध्वनिकार के मत में रस ही वस्तुतः आत्मा है, वस्तु और अलङ्कार ध्वनियों का पर्यवसान सर्वथा रस के प्रति होता है, इसलिए वाच्य से उत्कृष्ट होते हैं। अतः सामान्यतः तीनों के लिए 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' कहा है (दे० लोचन, पृ० ४०, ४५, ५०, ५१, ७९, ८६, ९२)। स्वयं आचार्य आनन्दवर्धन ने रस की स्वशब्दवाच्यता का प्रत्याख्यान विस्तार के साथ किया है (पृ० ८१-८४)। मथितार्थ यह कि ध्वनि की प्रतिष्ठा प्रतीयमान या व्यङ्ग्य अर्थ पर है। ध्वनि व्यङ्ग्य अर्थ की प्रधानता की स्थिति में होता है। वाच्य अर्थ व्यङ्ग्य अर्थ की प्रतिष्ठा या भूमि है, इसलिए वह सर्वथा ध्वनि के प्रकरण में उपेक्ष्य नहीं। इसी कारण द्वितीय कारिका में ध्वनिकार ने प्रतीयमान अर्थ के साथ वाच्य अर्थ का समशीर्षिकया गणन किया है, यद्यपि प्रतीयमान अर्थ ही काव्य का आत्मा या सर्वस्व है। 'ध्वनि' का अर्थ ध्वन्यालोक में 'ध्वनि' शब्द का प्रयोग पाँच अर्थों में किया गया है—व्यङ्ग्य अर्थ, वाचक शब्द, वाच्य अर्थ, व्यञ्जना व्यापार और समुदाय रूप काव्य। जैसा कि आचार्य अभिनवगुप्त लिखते हैं— अर्थो वा शब्दो वा व्यापारो वा। अर्थोऽपि वाच्यो वा ध्वनतीति, शब्दोऽप्येवम्। व्यङ्ग्यो वा ध्वन्यत इति। व्यापारो वा शब्दार्थयोर्ध्वननमिति। कारिकया तु प्राधान्येन समुदाय एव काव्यरूपो मुख्यतया ध्वनिरिति प्रतिपादितम्। पृ० १०४-५ तेन वाच्योऽपि ध्वनिः वाचकोऽपि शब्दो ध्वनिः, द्वयोरपि व्यञ्जकत्वं ध्वनतीति कृत्वा। सम्मिश्रयते विभावानुभावसंवलनयेति व्यङ्ग्योऽपि ध्वनिः, ध्वन्यत इति कृत्वा। शब्दनं शब्दः शब्दव्यापारः, न चासावभिधादिरूपः, अपि त्वात्मभूतः, सोऽपि ध्वनिः। काव्यमिति- व्यपदेश्यश्च योऽर्थः सोऽपि ध्वनिः, उक्तप्रकारध्वनिचतुष्टयमयत्वात्। पृ० १४१-१४२ पञ्चधाऽपि ध्वनिशब्दार्थे येन यत्र यतो यस्य यस्मै इति बहुव्रीह्यर्थाश्रयेण यथोचितं सामानाधिकरण्यं सुयोज्यम्। पृ० १४३ 'ध्वनि' शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार उक्त पाँचों अर्थों में इस प्रकार योजना होगी — (१) ध्वनतीति ध्वनिः; (२) ध्वन्यत इति ध्वनिः; (३) ध्वननं ध्वनिः। प्रथम के अनुसार वाच्य अर्थ और वाचक शब्द 'ध्वनि' शब्द से अभिहित होते हैं, द्वितीय के अनुसार केवल व्यङ्ग्य रूप अर्थ ध्वनि है और तृतीय के अनुसार व्यञ्जना व्यापार ध्वनि है। 'ध्वनि' शब्द का पाँचवाँ विषय 'समुदाय रूप काव्य' है, क्योंकि ये चारों प्रकार उसमें होते हैं। इसलिए 'काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः' यहाँ समुदाय रूप काव्य में 'ध्वनि' शब्द का व्यवहार है और प्रथम कारिका में 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' व्यङ्ग्य अर्थ की दृष्टि से कहा गया है। अन्य सभी अर्थों में व्युत्पत्तितः और व्यवहारतः 'ध्वनि' शब्द का प्रयोग होने पर भी मुख्यतः व्यङ्ग्य अर्थ ही 'ध्वनि' शब्द से अभिहित होता है और वह भी शब्द और अर्थ को अतिशयित करके चारुत्वातिशय के कारण प्रधान रूप से प्रतीयमान हो तब 'ध्वनि' कहलाता है। व्यङ्ग्य अर्थ की स्थिति में ही वाच्यादि भी 'ध्वनि' शब्द से वाच्य हो सकते हैं।

( ११ ) साथ ही यह भो समझ लेना आवश्यक है कि 'ध्वनि' को काव्य का आत्मा स्वीकार करते हुए भी ध्वनिकार काव्य में अभिव्यञ्जनीय रस के औचित्य के आधार पर शब्द और अर्थ के अलङ्कार तथा गुणों का समावेश अनिवार्य मानते हैं । इसी उद्देश्य से काव्य का विशेषण देते हुए उन्होंने लिखा है—'विविधवाच्यवाचकरचना-प्रपञ्चचारुणः काव्यस्य०' (पृ० ८९) और भी, 'काव्यस्य हि ललितोचितसन्निवेशचारुणः०' (पृ० ४५) । प्रथम उद्धरण पर लोचनकार का स्पष्ट निर्देश है कि 'तेन सर्वत्रापि ध्वनन सद्भावेऽपि न तथा व्यवहारः, आत्मसद्भावेऽपि क्वचिदेव जीवव्यवहार इत्युक्तं प्रागेव' (पृ० ९०) । केवल ध्वनन रूप आत्मा के होने पर काव्यत्व का निषेध इससे भी और स्पष्ट रूप में लोचनकार लिखते हैं—नन्वेवं 'सिंहो वटुः' इत्यत्रापि काव्यरूपता स्यात् ; ध्वनन- लक्षणस्यात्मनोऽत्रापि समनन्तरं वक्ष्यमाणतया भावात् । ननु घटेऽपि जीवव्यवहारः स्यात् ; आत्मनो विभुत्वेन तत्रापि भावात् । शरीरस्य खलु विशिष्टाधिष्ठानयुक्तस्य सत्यात्मनि जीवव्यवहारः, न यस्य कस्यचिदिति चेत्—गुणालङ्कारौचित्यसुन्दरशब्दार्थशरीरस्य सति ध्वननाख्यात्मनि काव्यरूपता- व्यवहारः । न चात्मनोऽसारता काचिदिति च समानम् । पृ० ५७; काव्यग्रहणात् गुणालङ्कारोपस्कृत- शब्दार्थपृष्ठपाती ध्वनिलक्षण 'आत्मे'त्युक्तम् । पृ० १०३ इस प्रकार प्राचीन आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट काव्य के बाह्य तत्त्वों का उचित रूप से आदर करते हुए ध्वनि को काव्य के आत्मा के रूप में ध्वनिकार ने प्रतिष्ठित किया । इतना होते हुए भी वे स्वयं इस सिद्धान्त के प्रतिष्ठापक बनने को तत्पर नहीं। उनका ध्वनि-सिद्धान्त बुधजनों द्वारा 'समाम्नात- पूर्व' था । केवल उस 'ध्वनि' के सम्बन्ध की विप्रतिपत्तियों का निराकरण तथा उसका उदाहरणों आदि द्वारा स्पष्टीकरण सहृदयजनों के मन की प्रसन्नता के लिए उन्होंने यहाँ किया (तेन ब्रूमः सहृदयमनःप्रीतये तत्स्वरूपम्) । ध्वनि : मूल प्रेरणा किसी 'यथाकथञ्चित् प्रवृत्त' कल्पना पर यह ध्वनि-सिद्धान्त प्रवृत्त नहीं हुआ । इसके मूल में प्राचीन वैयाकरणों की उक्ति विद्यमान है । चूंकि व्याकरणशास्त्र सभी विद्याओं का मूल है अतः प्रथम विद्वान् वैयाकरण ही हुए। जैसा कि महावैयाकरण भर्तृहरि ने कहा है— उपासनीयं यत्नेन शास्त्रं व्याकरणं महत् । प्रदीपभूतं सर्वासां विद्यानां यदवस्थितम् ॥ अर्थात् महान् व्याकरणशास्त्र की यत्नपूर्वक उपासना करनी चाहिए, क्योंकि यह सभी विद्याओं के प्रदीप रूप में अवस्थित है (इसी से सभी विद्यायें प्रकाशित होती हैं) । वैयाकरणों ने श्रूयमाण वर्णों को 'ध्वनि' कहा है और यह ध्वनि (श्रूयमाण वर्ण) चूंकि व्यञ्जक होते हैं, इसी आधार पर काव्य-तत्त्वदर्शी विद्वानों ने वाच्यवाचक-सम्मिश्र शब्द रूप काव्य को भी 'ध्वनि' के अभिधान से संकेतित किया और ध्वनिकार ने इसी पक्ष के काव्यशास्त्रीय आधार पर समर्थन एवं प्रकाशन के लिए ध्वन्यालोक के रूप में अपना संरम्भ प्रस्तुत किया । लोचनकार ने ध्वनिकार के कथन को महान् वैयाकरण भर्तृहरि के श्लोक उद्धृत करते हुए 'ध्वनि' को व्यङ्ग्य, व्यञ्जक शब्द-अर्थ एवं व्यञ्जना व्यापार में चरितार्थ बताया है । इसके पूर्व कि हम

( १२ )

यहां लोचनकार के कथन को और भी पल्लवित रूप दे सकें, वैयाकरणों के 'ध्वनि' के आधारभूत स्फोटवाद पर विचार कर लेना आवश्यक समझते हैं क्योंकि स्फोटवाद शब्द की सृष्टिप्रक्रिया से सम्बन्ध रखता है और हम बिना इसको समझे लोचन के निर्देश को समझ नहीं सकते। स्फोटवाद—यह वह दर्शन है जिसमें शब्द के रूप तथा उससे अर्थ के विकास का निर्णय हुआ है। इस दर्शन का प्रारम्भ कब से हुआ यह निश्चित नहीं, फिर पाणिनि के 'अष्टाध्यायी' ग्रन्थ में एक सूत्र मिलता है—'अवङ् स्फोटायनस्य' (६, १, १२३)। यहाँ किन्हीं 'स्फोटायन' नामक आचार्य का निर्देश है। इनके नाम में 'स्फोट' शब्द है और प्रथमतः उल्लेख के रूप में यही मिलता है अतः कल्पना की जाती है कि स्फोटवाद के प्रतिपादक यह स्फोटायन ही थे। जैसा कि काशिका की टीका 'पदमञ्जरी' में हरदत्त ने लिखा है— 'स्फोटोऽयनं परायणं यस्य स स्फोटायनः स्फोटप्रतिपादनपरो वैयाकरणाचार्यः ।' स्फोटवाद शब्द की नित्यता को स्वीकार करता है और यास्क, पाणिनि ने इसी सिद्धान्त को माना है। शब्द के नित्यत्व पर 'संग्रह' नामक ग्रन्थ में व्याडि ने भी विचार किया था ऐसा निर्देश मिलता है। कात्यायन और पतञ्जलि भी स्फोटवाद के समर्थक हैं। वैयाकरणों ने स्फोटवाद में शब्द को नित्य, एक तथा अखण्ड माना। उस शब्द की अभिव्यक्ति ध्वनि से होती है जिसके दो भेद हैं प्राकृत एवं वैकृत। उनके अनुसार वर्ण और पद सार्थक नहीं, बल्कि वाक्य सार्थक होता है, अर्थात् अर्थ की प्रतीति वाक्य से होती है। पतञ्जलि ने अपना मत स्पष्ट शब्दों में लिखा है— नित्याश्च शब्दाः । नित्येषु च शब्देषु कूटस्थैरविचालिभिर्वर्णैर्भवितव्यमनपायोपजन- विकारिभिः । महाभाष्य, आ० २ पतञ्जलि ने जिस शब्द का लक्षण-निर्देश किया है वह स्फोट शब्द का ही है— श्रोत्रोपलब्धिर्बुद्धिर्निग्राह्यः प्रयोगेणाभिज्वलित आकाशदेशः शब्दः । एकं च पुन- राकाशम् । महाभाष्य, अ.० २ अर्थात् शब्द की उपलब्धि श्रोत्र के माध्यम से होती है। श्रोत्र एक इन्द्रिय है जो कर्णशष्कुल्य- वच्छिन्न आकाशरूप है। तात्पर्य यह कि हमारे कर्ण देश में जितना आकाश है उसी में शब्द की उपलब्धि होती है। श्रोत्रेन्द्रिय एक आकाश ही है। फिर यहां प्रश्न होता है कि जब शब्द में निहित वर्ण अपने उच्चारण के दूसरे क्षण में नष्ट हो जाते हैं तब शब्द का ग्रहण कैसे सम्भव होगा ? इसके समाधान में बुद्धिर्निग्राह्य कहने का तात्पर्य यह है कि पूर्व-पूर्व ध्वनि से उत्पन्न संस्कार का परिपाक होने पर अन्त्य वर्ण के ज्ञान से शब्द का ग्रहण होता है। बुद्धि शब्दों को ग्रहण करती है। बुद्धि में ध्वनियां संस्कार छोड़ती जाती हैं और अन्तिम वर्ण से शब्द का ज्ञान होता है। प्रयोग से अभिज्वलित या प्रकाशित का तात्पर्य यह है कि शब्द तो सर्वदा सर्वत्र विद्यमान रहता है। किन्तु उसकी उपलब्धि उच्चारण से ही होती है। जो विद्यमान शब्द है वही ध्वनि, वर्ण या प्रयोग है। आकाश जो शब्द का आश्रय है वह जब एक है तब उसमें रहने वाला शब्द भी एक ही है। शब्द में वस्तुतः भेद नहीं होता बल्कि उसको व्यक्त करने वाली ध्वनि के तथा देश के भेद के कारण उसमें भेद आरोपित कर लेते हैं, जिस प्रकार एक ही आकाश घटाकाश, मठाकाश आदि रूप में भिन्न हो जाता है।

( १३ ) पतञ्जलि का यह शब्द 'स्फोट' रूप है। ध्वनि स्फोट का गुण है। जिस प्रकार भेरी के आघात में एक अनुरणन होता है, वही ध्वनि है। स्फोट और ध्वनि में प्रथम व्यङ्ग्य है और दूसरा व्यञ्जक। तात्पर्य यह कि ध्वनि से स्फोट रूप शब्द अभिव्यक्त होता है और अभिव्यक्त स्फोट रूप शब्द से अर्थ का ज्ञान होता है। 'वाक्यपदीय' ग्रन्थ में भर्तृहरि ने 'स्फोट' का यथावत विवेचन किया है। वही आगे के सभी वैयाकरणों का आधार हुआ है। वैयाकरणों ने 'स्फोट' शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ किया है—'स्फुटत्यर्थोऽस्मादिति स्फोटः' अर्थात् जिससे अर्थ स्फुटित होता है वह शब्द स्फोट कहलाता है। इस प्रकार यह एक यौगिक शब्द है। 'स्फोटचन्द्रिका' में श्रीकृष्ण ने इसे योगरूढ बताया है। कहा जा चुका है कि वैयाकरणों के अनुसार स्फोट और ध्वनि शब्द के दो भेद माने गए हैं। आचार्य भर्तृहरि ने उसे ही कहा है— द्वावुपादानशब्देषु शब्दौ शब्दविदो विदुः। एको निमित्तं शब्दानामपरोऽर्थे प्रयुज्यते॥ पुण्यराज के अनुसार इसे इस प्रकार समझ सकते हैं कि स्फोट ध्वनि रूप शब्द ६। उपादान कारण है क्योंकि उससे अर्थ का ज्ञान होता है, और दूसरे ध्वनिरूप शब्द का अर्थों में प्रयोग किया जाता है, अथवा वह शब्द-समुदाय (उपादान) जिसे ध्वनि कहते हैं, स्फोट का निमित्त अर्थात् व्यञ्जक होता है तत्पश्चात् दूसरे स्फोट रूप शब्द के अभिव्यक्त होने पर अर्थ की प्रतीति होती है। अभिप्राय यह कि श्रोता की बुद्धि में स्थित क्रमरहित शब्द स्फोट या ध्वनि शब्द के सुनते ही अभिव्यक्त होता है और वह अर्थ का बोध कराता है। इस प्रकार स्फोट व्यङ्ग्य है और ध्वनि व्यञ्जक। जिस प्रकार कारण और कार्य को कुछ दार्शनिक भिन्न मानते हैं तो कुछ अभिन्न, इसी प्रकार का मतभेद स्फोट और ध्वनि के सन्दर्भ में भी प्राचीन दार्शनिकों में हुआ। स्फोट की स्थिति बुद्धि में उस प्रकार की होती है जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि की। उस स्थिति में वह अज्ञात रहता है। किन्तु जब कण्ठ, तालु आदि करणों के आश्रय से विवर्त की स्थिति में आता है तब ध्वनि रूप से प्रतीत होने लगता है। व्यञ्जक ध्वनि के भेद से उसमें भी भेद हो जाता है। जिस प्रकार अग्नि स्वयं को प्रकाशित करता हुआ अन्य घटादि वस्तुओं को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार ध्वनि द्वारा व्यञ्जित स्फोट शब्द भी अपने को प्रकाशित करता हुआ अर्थ को भी प्रकाशित करता है। स्फोट और ध्वनि में तादात्म्य माना जाता है, क्योंकि यदि ऐसा न माना जाय तो किसी भी ध्वनि से किसी अर्थ का ज्ञान होना चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं होता। फिर भी स्फोट में कोई क्रम नहीं होता तथा भेद भी नहीं होता। उसमें क्रम और भेद की प्रतीति ध्वनि की अभिव्यक्ति के क्रम से होती है। जिस प्रकार चन्द्रमा में चञ्चलता नहीं, किन्तु तरल जल में उसके प्रतिबिम्ब को देखकर उसमें भी चञ्चलता आरोपित करते हैं उसी प्रकार स्फोट में क्रम और भेद वास्तविक नहीं हैं, प्रत्युत आरोपित हैं। मनुष्य की बुद्धि में वह ब्रह्माण्डव्यापी शब्द अपने क्रमरहित एवं निर्विभाग रूप में विद्यमान रहता है और जब उच्चारण की इच्छा होती है तब उसमें एक क्रियारूपा वृत्ति होती है, फिर वह

( १४ ) उस वृत्ति के कारण वाक्य, पद आदि के रूप में आता है। स्वतः अखण्ड है, फिर भी वृत्ति के कारण भागों की तथा क्रम की उसमें सत्ता होतो है। यह ठीक उसी प्रकार होता है जिस प्रकार पक्षी के अण्डे के भीतर केवल अरूप अविभक्त एक तरल पदार्थ होता है वही विशेष स्थिति में एक रूप में आने लगता है। वैयाकरणों ने ध्वनि के दो भेद किए हैं—प्राकृत एवं वैकृत। प्राकृत अर्थात् मौलिक ध्वनि तथा वैकृत ध्वनि अर्थात् प्राकृत ध्वनि का अनुरणन रूप। प्राकृत ध्वनि में स्वभाव भेद रहता है उसी के कारण ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत होता है। स्फोट शब्द इस काल-भेद से रहित है किन्तु इसे उसमें आरोपित करते हैं। प्राकृत ध्वनि के काल का शब्द में आरोप करके उसे व्यवहार का विषय बनाते हैं। प्राकृत ध्वनि में ह्रस्व, दीर्घ आदि गुण हैं और वैकृत ध्वनि में द्रुत, मध्य एवं विलम्बित वृत्तियाँ रहती हैं। प्राकृत ध्वनि के पश्चात् वृत्तिभेद होने पर यह ध्वनि उत्पन्न होते हैं। और जैसा कि भगवान् भर्तृहरि का कहना है— स्फोटस्य ग्रहणे हेतुः प्राकृतो ध्वनिरिष्यते । वृत्तिभेदे निमित्तत्वं वैकृतः प्रतिपद्यते ॥ स्फोट का ग्रहण प्राकृत ध्वनि से होता है। प्राकृत को स्फोट का प्रतिबिम्ब माना जाता है। यद्यपि प्राकृत ध्वनि में नित्यता नहीं है, तथापि स्फोट की नित्यता उसमें भी मान ली जाती है। प्राकृत ध्वनि के पश्चात् उत्पन्न होने वाली ध्वनि को मूल का विकार कहा जाता है और उससे ही सब प्रकार की वृत्तियों का भेद होता है। संक्षेप में इस विस्तारगम्य विषय को प्रस्तुत में इतना ही समझ लेने की आवश्यकता है। लोचनकार ने वैयाकरणों के ध्वनि को काव्य-सिद्धान्ताय ध्वनि-विचार में संगत करते हुए भगवान् भर्तृहरि के कुछ श्लोक उद्धृत किए हैं। काव्य में 'ध्वनि' शब्द से मुख्यतः व्यङ्ग्य अर्थ, व्यञ्जक शब्द-अर्थ एवं व्यञ्जनाव्यापार इन सब का ग्रहण होता है। प्रथम जो व्यङ्ग्य अर्थ 'ध्वनि' कहा जाता है वह घण्टादि के शब्द के स्थान पर अनुरणन रूप होता है और व्याकरण-दर्शन में उत्पत्तिवादियों के मतानुसार स्फोट वह शब्द है जो स्थान, प्रयत्न आदि से वायु में संयोग या विभाग के कारण उत्पन्न होता है और उस शब्द से उत्पन्न होने वाले (शब्दज शब्द अर्थात् घण्टानुरणन रूप शब्द) ध्वनि कहे जाते हैं। (ये उत्पत्तिवादी आचार्य स्फोट को नित्य नहीं मानते, बल्कि इनके अनुसार स्फोट उत्पन्न होता है अतएव अनित्य है।) श्लोक इस प्रकार है— यः संयोगवियोगाभ्यां करणैरुपजन्यते । स स्फोटः शब्दजाः शब्दा ध्वनयोऽन्यैरुदाहृताः ॥ वाक्यपदीय, १।१०३ जैसा कि वैयाकरणों का अभिमत है, नाद अर्थात् श्रूयमाण वर्ण स्फोट के अभिव्यञ्जक होते हैं और स्फोट अन्त्यबुद्धिनिर्ग्राह्य होता है। इस प्रकार श्रूयमाण वर्ण या नाद, जिन्हें 'ध्वनि' कहते हैं, क्रमशः स्फोट को बुद्धि में प्रकाशित या अभिव्यक्त करते जाते हैं। भर्तृहरि कहते हैं—

( १५ ) प्रत्ययैरनुपाख्येयैर्ग्रह्णानुगुणैस्तथा । ध्वनिप्रकाशिते शब्दे स्वरूपमवधार्यते ॥ वाक्यपदीय, १।८४ इस प्रकार व्यङ्ग्य अर्थ के व्यञ्जक शब्द-अर्थ भी प्रस्तुत काव्य-सिद्धान्त में ‘ध्वनि’ शब्द से अभिहित हैं । फिर ऐसा होता है कि वर्णों के परिमित होने से अल्पतर यत्न से उच्चारित शब्द को जब बुद्धि नहीं ग्रहण कर पाती, उस स्थिति में वक्ता का जो प्रसिद्ध उच्चारण-व्यापार से अधिक द्रुत, विलम्बित आदि वृत्तियों का भेदरूप व्यापार है उसे भी ध्वनि कहते हैं— शब्दस्योर्ध्वमभिव्यक्तेर्वृत्तिभेदे तु वैकृताः । ध्वनयः समुपोहन्ते स्फोटात्मा तैर्न भिद्यते ॥ वाक्यपदीय, १।७८ कहा जा चुका है कि ये वृत्तियां वैकृत ध्वनि में होती हैं और उच्चारण-व्यापार से ये अतिरिक्त व्यापार हैं । इसी आधार पर प्रस्तुत में ध्वनिकार ने प्रसिद्ध अभिधा, तात्पर्य और लक्षणा व्यापारों से अतिरिक्त व्यञ्जना व्यापार को भी ‘ध्वनि’ कहा है । और व्यङ्ग्य अर्थ, व्यञ्जक शब्द और अर्थ, व्यञ्जना-व्यापार ये चार ध्वनि हैं तो इनके योग से समुदायरूप काव्य भी ‘ध्वनि’ पदवाच्य होता है । वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ का अन्तर ध्वनिकार ने स्वयं वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ का अन्तर स्पष्ट करते हुए जिन भेदों का निर्देश किया है वे क्रमशः इस प्रकार हैं— स्वरूपभेद—इसके कारण जो वाच्य और व्यङ्ग्य का भेद है वह यह है कि कहीं वाच्य विधिरूप है तो व्यङ्ग्य निषेधरूप ( उदाहरण, पृ० ५२ ) ; कहीं वाच्य प्रतिषेधरूप है तो व्यङ्ग्य विधिरूप ( पृ० ७१ ) इत्यादि । विधि और प्रतिषेध के भिन्न होने में किसको संशय हो सकता है ? विषयभेद—वाच्य अर्थ का विषय एक व्यक्ति होता है तो व्यङ्ग्य अर्थ का विषय उससे भिन्न व्यक्ति ( उदा० पृ० ७६ ) । भिन्नसामग्रीवेद्यत्व ( निमित्तभेद )—वाच्य अर्थ को शब्द-अर्थ के नियमों के ज्ञानमात्र से, कोश-व्याकरणादि के परिचय रखने मात्र से प्रत्येक व्यक्ति जान सकता है और व्यङ्ग्यार्थ को काव्यार्थ के तत्त्वज्ञ ही, अर्थात् सहृदयजन ही जान सकते हैं । इनके अतिरिक्त ‘काव्यप्रकाश’ के पञ्चम उल्लास में आचार्य मम्मट ने अनेक कारणों का इस सन्दर्भ में निर्देश किया है, जैसे— संख्याभेद—वाच्य सभी व्यक्तियों के प्रति एकरूप होने से नियत है । किन्तु व्यङ्ग्य अर्थ नानाविध होता है, अतः अनियत है । कालभेद—पहले वाच्य अर्थ अवगत होता है पश्चात् व्यङ्ग्य अर्थ । आश्रय—वाच्य शब्द पर आश्रित है, व्यङ्ग्य शब्द, शब्द के एकदेश, उसके अर्थ, वर्ण, संघटना पर आश्रित है ।

( १६ ) कार्यभेद—वाच्य का कार्य प्रतीतिमात्र होता है और व्यङ्ग्य का कार्य चमत्कृति है । इन सभी पार्थक्य के हेतुओं को एक कारिका में साहित्य-दर्पणकार ने संगृहीत कर दिया है— बोद्धृस्वरूपसंख्यानिमित्तकार्यप्रतीतिकालनाम् । आश्रयविषयादीनां भेदाद् भिन्नोऽभिधीयते व्यङ्ग्यः ॥ यहाँ तक हम ध्वन्यालोक के मुख्य प्रतिपाद्य ध्वनि तत्त्व से सम्बद्ध अनेक तथ्यों से अवगत हो गए । साथ ही ध्वनि, जो स्वरूपतः काव्य में प्रतीयमान या व्यङ्ग्य अर्थ के प्राधान्य की स्थिति में माना जाता है, हमने यह भी देखा, कि वह केवल वाच्य की कक्ष्या से आगे नहीं, वरन्, तात्पर्य, लक्ष्य की कक्ष्याओं से भी आगे चतुर्थ कक्ष्या में रहने वाले व्यङ्ग्य अर्थ में सम्पन्न होता है । लोचन में बड़े विस्तार से व्यङ्ग्य अर्थ की चतुर्थकक्ष्याविविष्टता पर आचार्य अभिनवगुप्त ने विचार किया है । व्यङ्ग्य अर्थ के विरोध में उपस्थित तात्पर्यवृत्ति, लक्षणा, अभिहितान्वयवादी, अन्विताभिधानवादी और भट्टनायक के मत का खण्डन तर्कपूर्ण ढंग से किया है ( पृ० ५४-७० ) । हम ऊपर निर्देश कर चुके हैं कि ध्वनिकार ने रस को अलङ्कार के संकीर्ण क्षेत्र से बाहर निकाल कर मुख्यतः काव्य के आत्मा के योग्य आसन पर प्रतिष्ठित किया । किन्तु रसमात्र के ग्रहण से काव्य की उत्तमता का सर्वाङ्गीण संस्पर्श नहीं हो पाता था, क्योंकि ऐसे भी पद्य मिलते हैं जो रस से कुछ न्यून ही सही, अतिशय चमत्कार उत्पन्न करते हैं, इस दृष्टि से आचार्य आनन्द- वर्धन ने ध्वनि के रूप में उन्हें भी संगृहीत किया जिनमें वस्तु और अलङ्कार प्रधान्यतः प्रतीयमान या व्यङ्ग्य होते हैं । और साथ ही, इन ध्वनियों में भी रस-चमत्कार को ही आचार्य ने पार्यन्तिकता दी । इस प्रकार एक ओर रस अनिवार्य भी रह गया और दूसरी ओर अपनी साधारण स्थिति में काव्य की उत्कृष्टता का बाधक भी नहीं हुआ । भारतीय साहित्य-शास्त्र में रस को इस प्रकार विस्तृत भूमि देने का समग्र रूप से एकमात्र श्रेय ध्वनिकार आनन्दवर्धन को है । रस के चमत्कार को ध्वनिकार काव्य की सर्वोत्कृष्ट भूमि मानते हैं, उनके अनुसार क्रौञ्च के जोड़े के वियोग से उत्पन्न वाल्मीकि का ‘शोक’ जो ‘श्लोक’ बन गया वह दुःख की भूमि नहीं वरन् आनन्द की अलौकिक भूमि है, ‘मा निषाद०’ को पढ़कर सहृदय का मन रस की अलौकिक चर्वणा करने लगता है । काव्यस्यात्मा स एवार्थस्तथा चादिकवेः पुरा । क्रौञ्चद्वन्द्ववियोगोत्थः शोकः श्लोकत्वमागतः ॥ १।५ ध्वनि के सम्बन्ध में विरुद्ध आपत्तियां यद्यपि ध्वनिकार स्वयं को ध्वनिसिद्धान्त का पुरस्कर्ता नहीं कहते, बल्कि उनके अनुसार बुधजनों ने जिस ध्वनि को काव्य के आत्मा रूप में पहले से समाम्नात ( समाम्नातपूर्वः, सम्यग् आ समन्तात् म्नातः प्रकटितः ) किया है वह सहृदय जनों के मन की प्रीति के लिए उसके लक्षण का निरूपण करते हैं । इससे यह लक्षित होता है कि ध्वनि का सिद्धान्त ध्वनिकार से पहले भी प्रचलित था, हां उसे पुस्तक रूप देने का प्रयास सर्वप्रथम ध्वनिकार द्वारा हुआ । जैसा कि लोचन में स्पष्ट निर्देश भी किया है—‘बुधस्यैकस्य प्रामादिकमपि तथाऽभिधानं स्यात्, न तु भूयसां तद् युक्तम् ।