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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

१८४ दोहावली कुचालपर ही रहती है; मुझ-जैसे मूर्खकी कौन सुनता है। लोगोंको सीख तो यह दी जाती है कि रामायणके अनुसार चलो (अर्थात् स्वार्थत्यागपूर्वक भाई-भाईमें प्रेम रक्खो), परन्तु संसारमें लोग अनु- करण करते हैं महाभारतका (अर्थात् स्वार्थवश परस्पर कलहमें ही लगे रहते हैं) ॥५४५॥ पात पात कै सींचिबो बरी बरी कै लोन । तुलसी खोटें चतुरपन कलि डहके कहु को न ॥५४६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कलियुगमें लोग पेड़के एक-एक पत्तेको अलग-अलग सींचना और एक-एक बरामें अलग अलग नमक मिलाना चाहते हैं (जिससे न तो पेड़की जड़में जल पहुँचता है और न सब वरियोंमें समान नमक पड़ता है) ऐसी हालतमें कहिये अपनी इस खोटी चतुराईसे कलियुगमें कौन नहीं ठगे गये (अपनी ही करनीसे आप ही दुःख पाते हैं) ॥५४६॥ प्रीति सगाई सकल बिधि बनिज उपायँ अनेक । कल बल छल कलि मल मलिन डहकत एकहि एक ॥५४७॥ भावार्थ—कलियुगके पापोंसे मलिन-मन हुए लोग प्रीति करके नाता जोड़कर वाणिज्य आदि अनेक उपायोंसे सब प्रकार कल-बल- छल करके परस्पर एक-दूसरेको ठगा करते हैं ॥५४७॥ दंभ सहित कलि धरम सब छल समेत व्यवहार । स्वारथ सहित सनेह सब रुचि अनुहरत अचार ॥५४८॥ भावार्थ—कलिके धर्म सब दम्भयुक्त हैं, व्यवहार कपटयुक्त हैं, प्रेम स्वार्थयुक्त हैं और आचरण मनमाना है (अर्थात् सच्चा धर्म, निष्कपट व्यवहार, निःस्वार्थ प्रेम और शास्त्रोक्त आचरण नहीं है) ॥५४८॥

दोहावली १८५ चोर चतुर बटमार नट प्रभु प्रिय भँडुआ भांड। सब भच्छक परमारथी कलि सुपंथ पाषंड ॥५४९॥ भावार्थ—कलियुगमें चोर ही चतुर माने जाते हैं (अर्थात् जो सफाईसे दूसरोंका स्वत्व हरण कर लेते हैं, उन्हींको लोग चतुर कहते हैं); लुटेरे ही खिलाड़ी (कलावन्त) गिने जाते हैं (जो मार- पीटकर धन छीन लेते हैं, उनको खिलाड़ी कहा जाता है); भांड और भडुए ही राजाओं या मालिकोंको प्रिय होते हैं (जो खुशामद करके या तरह-तरहकी भाव-भंगियोंसे मूर्ख मालिकोंको रिझाते रहते हैं, वे ही उन्हें प्रिय होते हैं; सत्यवादी सदाचारी नहीं); खान पानका विचार त्यागकर सब कुछ खानेवाले ही महात्मा माने जाते हैं और पाखण्ड ही सन्मार्ग समझा जाता है अर्थात् सभी विपरीत हो रहा है ॥५४९॥ असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं। तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग मांहि ॥५५०॥ भावार्थ—जो लोग अशुभ वेष बनाये रहते हैं—अशुभ अलंकार धारण करते हैं तथा खानेयोग्य और न खानेयोग्य सब कुछ खा जाते हैं—इस कलियुगमें वे ही मनुष्य योगी हैं, वे ही सिद्ध हैं और वे ही पूज्य हैं ॥५५०॥ सोरठा जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ। मन क्रम बचन लबार ते बकता कलिकाल महुँ ॥५५१॥ भावार्थ—जो अपने आचरणसे दूसरोंका बुरा करनेवाले हैं, कलियुगमें उन्हींका गौरव है और वे ही मानके योग्य हैं एवं जो मन, बचन तथा कर्मसे झूठे होते हैं, वे ही वक्ता माने जाते हैं ॥५५१॥

१८६ दोहावली दोहा ब्रह्मग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात । कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात ॥१५२॥ भावार्थ—इस कलियुगमें स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञानको छोड़कर दूसरी चर्चा ही नहीं करते, किंतु वे ही [मिथ्या ब्रह्मज्ञानी] लोभवश एक कौड़ीके लिये ब्राह्मण और गुरुजनोंका घात कर डालते हैं [और कहते हैं कि कौन मरता है, कौन मारता है] ॥१५२॥ बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि । जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि ॥१५३॥ भावार्थ—कलियुगमें शूद्रलोग ब्राह्मणोंसे वाद-विवाद करते हैं, और आँख दिखाकर डांटते हुए कहते हैं कि 'क्या हम तुमसे कुछ कम हैं जो ब्रह्मको जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं' ॥१५३॥ साखी सबदी दोहरा कहि कहनी उपखान । भगति निरूपहिं भगत कलि निंदहिं बेद पुरान ॥१५४॥ भाव

दोहावली १८७ सकल धरम बिपरीत कलि कलपित कोटि कुपंथ । पुन्य पराय पहार बन दुरे पुरान सुग्रंथ ॥५५६॥ भावार्थ—कलियुगमें सभी कुछ धर्मके प्रतिकूल हो गया, नये- नये करोड़ों कुमार्ग कल्पित हो गये (वास्तवमें वे मार्ग नहीं हैं मनमानी कल्पनामात्र हैं)। इससे पुण्य तो पहाड़ोंमें भाग गया और पुराणादि सद्ग्रन्थ वनोंमें जाकर छिप गये (अर्थात वनोंमें और पर्वतोंकी गुहाओंमें एकान्तवास करनेवाले कुछ महात्माओंमें ही पुण्य और सद्ग्रन्थोंका पठन-पाठन रह गया है) ॥५५६॥ धातुबाद निरुपाधि बर सदगुरु लाभ सुमीत । देव दरस कलिकाल में पोथिन दुरे सभीत ॥५५७॥ भावार्थ—कलियुगमें रसायनविद्या, उपाधिरहित (अबाधित) वरदान, सद्गुरुकी प्राप्ति, सच्चे मित्र और देवताके प्रत्यक्ष दर्शन—ये पाँचों बातें डरके मारे पुस्तकोंमें छिप गयी हैं (अर्थात् पुस्तकोंहीमें इनके वर्णन मिलते हैं, प्रत्यक्षमें ये दिखलायी नहीं देते) ॥५५७॥ सुर सदननि तीरथ पुरिन निपट कुचालि कुसाज । मनहुँ मवा से मारि कलि राजत सहित समाज ॥५५८॥ भावार्थ—देवालय (मन्दिर), तीर्थ और पवित्र पुरियोंमें सर्वत्र ही अत्यन्त भ्रष्टाचार और भ्रष्ट वातावरण फैल गया है। मानो उन स्थानोंमें कलियुग अपने सारे समाजके (काम, क्रोध दम्भ, लोभ, कपट, दुराग्रह, असत्य, हिंसा, स्तेय, व्यभिचार आदि दोषों एवं दुर्गुणोंके) साथ किलेबंदी करके विराजमान रहता है ॥५५८॥ गोंड़ गवाँर नृपाल महि जमन महा महिपाल । साम न दाम न भेद कलि केवल दंड कराल ॥५५९॥

१८८ दोहावली भावार्थ—कलियुगमें गोंड़ ( जंगली लोग ) और गँवार तो पृथ्वीके राजा हो रहे हैं और यवन-म्लेच्छादि वादशाह । इनकी राजनीतिमें साम, दान, भेदका प्रयोग न होकर केवल कठोर दण्डका ही प्रयोग होता है ॥५५९॥ फोरहिं सिल लोढ़ा सदन लागें अठुक पहार । कायर कूर कुपूत कलि घर घर सहस डहार ॥५६०॥ भावार्थ—जैसे पहाड़ की ठोकर लगनेपर [उसपर कुछ भी वश न चलनेसे] मूर्ख लोग [पहाड़के बदले] घरके सिल-लोढ़ेको फोड़ डालते हैं । इस प्रकार अपने ही घरवालोंको तंग करनेवाले कायर, क्रूर और कुपूत कलियुगमें सहस्रोंकी संख्यामें घर-घर होंगे ॥५६०॥ प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान । जेन केन बिधि दीन्हें दान करन कल्यान ॥५६१॥ भावार्थ—सत्य, अहिंसा, शौच और दान—धर्मके ये चार चरण प्रसिद्ध हैं, जिनमें से कलियुगमें एक (दान) ही प्रधान रह गया है, जिस किसी भी प्रकारसे दिये जानेपर दान कल्याण ही करता है ॥५६१॥ कलिजुग सम जुग आन नहिं जौ नर कर बिश्वास । गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास ॥५६२॥ भावार्थ—यदि मनुष्य विश्वास करे तो कलियुगके समान और कोई भी युग नहीं है; क्योंकि इसमें केवल श्रीरामचन्द्रजीके निर्मल गुणसमूहोंका गान करके ही मनुष्य बिना ही किसी परिश्रमके भवसागरसे तर जाता है ॥५६२॥

दोहावली १८३ और चाहे जो भी घट जाय, भगवान्‌में प्रेम नहीं घटना चाहिये श्रवन घटहुँ पुनि दृग घटहुँ घटउ सकल बल देह । इते घटें घटिहै कहा जौं न घटै हरिनेह ॥५६३॥ भावार्थ—कानोंसे चाहे कम सुनायी पड़े, आँखोंकी रोशनी भी चाहे घट जाय, सारे शरीरका बल भी चाहे क्षीण हो जाय; किन्तु यदि श्रीहरिमें प्रेम नहीं घटे तो इनके घटनेसे हमारा क्या घट जायगा ? ॥५६३॥ कुसमयका प्रभाव तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन । अब तो दादुर बोलिहैं हमें पूछिहैं कौन ॥५६४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बरसातकी मौसममें कोयल यह समझकर मौन हो जाती है कि अब तो मेढक टर्रायेंगे, हमें कौन पूछेगा ? (बुरा समय आनेपर दुर्जनोंकी ही चलती है, उस समय सज्जन चुप हो रहते हैं) ॥५६४॥ श्रीरामजीके गुणों की महिमा कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाखंड । दहन राम गुन ग्राम जिमि ईंधन अनल प्रचंड ॥५६५॥ भावार्थ—कलियुगके कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल, कपट, दम्भ और पाखण्डको जलानेके लिए श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमुदाय वैसे ही हैं, जैसे ईंधनको जलानेके लिये प्रचण्ड अग्नि ॥५६५॥

१६० दोहावली कलियुगमें दो ही आधार हैं सोरठा कलि पाखंड प्रचार प्रबल पाप पामँर पतित । तुलसी उभय अधार राम नाम सुरसरि सलिल ॥५६६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कलियुगमें केवल पाखण्डका प्रचार है; संसारमें पाप बहुत प्रबल हो गया है, सब ओर पामर और पतित ही नजर आते हैं। ऐसी स्थितिमें दो ही आधार हैं—एक श्रीरामनाम और दूसरा देवनदी श्रीगङ्गाजीका पवित्र जल ॥५६६॥ भगवत्प्रेम ही सब मंगलोंकी खान है दोहा रामचंद्र मुख चंद्रमा चित चकोर जब होइ । राम राज सब काज सुभ समय सुहावन सोइ ॥५६७॥ भावार्थ—जिस समय भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रको निरखने के लिये चित्त चकोर बन जाता है, वही समय रामराज्यकी भांति सुहावना होता है और तभी सब काम शुभ होते हैं ॥५६७॥ बीज राम गुन गन नयन जल अंकुर पुलकालि । सुकृती सुतन सुखेत बर बिलसत तुलसी सालि ॥५६८॥ भावार्थ—जब परम पुण्यात्मा पुरुषके [ पापरहित ] निर्मल तनुरूपी सुन्दर और श्रेष्ठ खेतमें श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहरूपी बीज बोये जायँ और प्रेमाश्रुओंके [ पवित्र ] जलसे उन्हें सींचा जाय, तुलसीदासजी कहते हैं कि तब उनमेंसे [ आनन्दातिरेकके

दोहावली १९१ कारण] पुलकावलिरूपी [ शुभ ] अङ्कुर उत्पन्न होते हैं और तभी उसमें [ भगवत्प्रेमरूपी] धानकी खेती लहलहाती है ॥५६८॥ तुलसी सहित सनेह नित सुमिरहु सीता राम । सगुन सुमंगल सुभ सदा आदि मध्य परिनाम ॥५६९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि नित्य-निरन्तर भगवान् श्रीसीतारामजीके सुन्दर सगुण स्वरूपका प्रेमसहित स्मरण-ध्यान करते रहो; इससे आदि, मध्य और अन्तमें सदा ही अच्छे शकुन, परम मङ्गल और कल्याण होगा ॥५६९॥ पुरुषारथ स्वारथ सकल परमारथ परिनाम । सुलभ सिद्धि सब साहिबी सुमिरत सीता राम ॥५७०॥ भावार्थ—श्रीसीतारामजीका स्मरण करते ही मनुष्यके लिये सभी सिद्धियाँ और सबपर स्वामित्व सुलभ हो जाते हैं। तथा सभी तरहके स्वार्थ (लौकिक कार्य), पुरुषार्थ (आध्यात्मिक कार्य) सफल होते हैं और अन्तमें परमार्थ (श्रीभगवान्) की प्राप्ति होती है ॥५७०॥ दोहावलीके दोहोंकी महिमा मनिमय दोहा दीप जहँ उर घर प्रगट प्रकास । तहँ न मोह तम भय तमी कलि कज्जली बिलास ॥५७१॥ भावार्थ—जिसके हृदयरूपी घरमें इन दोहोंरूपी मणिमय दीपकका प्रकाश प्रकट होगा, वहाँ मोहरूपी अन्धकार, भयरूपी रात्रि और कलिकालरूपी कालिमाका विलास नहीं हो सकता ॥५७१॥ का भाषा का संस्कृत प्रेम चाहिए साँच । काम जु आवै कामरी का लै करिअ कुमाच ? ॥५७२॥

१६२ दोहावली भावार्थ—क्या भाषा, क्या संस्कृत, [श्रीभगवान्‌के गुण गानेके लिये तो] सच्चा प्रेम चाहिये। जहाँ कम्बलहीसे काम चल जाता हो, वहाँ बढ़िया दुशाल लेकर क्या करना है? ॥५७२॥ रामकी दीनबन्धुता मनि मानिक महँगे किये सहँगे तृन जल नाज। तुलसी एते जानिये राम गरीब नेवाज ॥५७३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बस, इतना जान रखना चाहिये कि श्रीरामचन्द्रजी 'गरीबनिवाज'—दीनबन्धु हैं। इसीसे उन्होंने मणि-माणिक्य आदि (जिनके बिना आनन्दसे हमारा काम चल सकता है) महँगे किये हैं और तृण, जल तथा अन्न (जिनके बिना पशु-पक्षी और मनुष्यादि प्राणियोंका काम ही नहीं चल सकता) आदि वस्तुओंको सस्ता कर दिया है ॥५७३॥