भारतकोश
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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१६६- सर्प, बिच्छू तथा अन्य विषैले जीव-जन्तुओंके विषकी चिकित्सा

३३८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

काली मिर्च तथा तिलके पुष्पोंका अञ्जन कामलारोगका विनाशक है। हरीतकी और गुड़को बराबर मात्रामें मधुके साथ मिलाकर खाना चाहिये। हे रुद्र! निस्संदेह यह विरेचनकारी होता है। त्रिफला, चित्रक, चित्र, कटुकरोहिणीका योग ऊरुस्तम्भ रोगका अपहारक है और यह विरेचनकी भी उत्तम औषधि है। हरीतकी, शृंगवेर, देवदारु, चन्दन, अपामार्ग (चिचड़ा)-की जड़को बकरीके दूधमें पकाकर पान करके ऊरुस्तम्भका विनाश किया जा सकता है अथवा जयन्ती (विष्णुक्रान्ता)-की जड़का क्वाथ पीनेसे भी यह रोग सात दिनमें दूर हो जाता है।

अनन्ता (धमासा) और शृंगवेरका समान भागमें चूर्ण बनाकर बराबर मात्रामें ही गुग्गुल और गुड़ मिला ले, तदनन्तर उसकी गोलियाँ बनाकर सेवन करनेसे स्नायुगत वायुविकार तथा अग्निमान्द्य रोग विनष्ट हो जाता है।

पुष्य नक्षत्रमें डंठल एवं पत्तियों-सहित शंखपुष्पीको उखाड़कर बकरीके दूधके साथ पीनेसे अपस्मार (मिरगी)-का रोग दूर होता है। समभागमें अश्वगन्धा तथा हरीतकीके चूर्णको जलके साथ पीनेसे निश्चित ही रक्त-पित्त-विकारका विनाश होता है। हरीतकी और कूटका चूर्ण बनाकर उसको मुखमें रखना चाहिये। पश्चात् शीतल जल पीनेसे सभी प्रकारके छर्दि रोग अर्थात् वमन दूर हो जाते हैं। गुडूची, पद्मकारिष्ट और नीम, धनिया तथा रक्तचन्दन नामक औषधियोंका योग पित्तश्लेष्मक ज्वर, छर्दि, दाह और तृष्णाके विकारका विनाशक एवं अग्निवर्धक है, किंतु इन औषधियोंका प्रयोग 'ॐ हुं नमः' इस मन्त्रसे अभिमन्त्रण करनेके पश्चात् | करना चाहिये—<br>    ॐ जम्भिनी स्तम्भिनी मोहय सर्वव्याधीन् मे वज्रेण ठः ठः सर्वव्याधीन् मे वज्रेण फट्॥ (१८३। १२)<br>    उपर्युक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित शंखपुष्पीको कानमें बाँधनेसे ज्वरको दूर किया जा सकता है। हे रुद्र! इसी मन्त्रसे १०८ बार जप करके अभिमन्त्रित शंखपुष्पीको रोगीके हाथमें रखकर वैद्य उसके नाखूनोंका स्पर्श करे तो चौथिया ज्वर अथवा अन्य सभी प्रकारके ज्वर विनष्ट हो जाते हैं।<br>    जामुनका फल, हल्दी तथा साँपकी केंचुलका धूप सभी प्रकारके ज्वरोंका विनाशक है। यह धूप तो चौथिया ज्वरका भी विनाश कर देता है।<br>    करवीर (कनेर), भृंगराज, नमक, कूट और कर्कट (काकड़ा सींगी) नामक औषधियोंको समान भागमें लेकर चौगुने गोमूत्रके साथ तैलपाक सिद्ध करना चाहिये। इस तेलका अभ्यङ्ग पामा, विचर्चिका तथा कुष्ठरोगके व्रणोंको दूर कर देता है।<br>    हे रुद्र! पिप्पली और मधुका सेवन करने एवं मधुर भोजन करने तथा सूरणके सेवनसे प्लीहा रोग विनष्ट हो जाता है।<br>    गोमूत्रके साथ पिप्पली और हल्दीका चूर्ण मिलाकर उसको गुदाद्वारमें डालनेसे अर्श रोग दूर किया जा सकता है।<br>    बकरीका दूध और अदरखका चूर्ण मिलाकर पान करनेसे प्लीहा आदि रोग विनष्ट हो जाते हैं। सेंधा नमक, विडंग, सोमलता, सरसों, हल्दी, दारुहल्दी, विष और नीमकी पत्तीको गोमूत्रके साथ पीस लेना चाहिये। इसका लेप करनेसे कुष्ठरोगका विनाश होता है। (अध्याय १८३)

१६७- विविध स्नेह-पाकोंद्वारा रोगोंका उपचार, स्मरण तथा मेधाशक्तिवर्धक ब्राह्मीघृतादिके निर्माणकी विधि ..

काण्ड ] \hfill सिध्म, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, अजीर्ण तथा गण्डमाला आदि रोगोंकी औषधियाँ \hfill ३३९


सिध्म, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, अजीर्ण तथा गण्डमाला आदि रोगोंकी औषधियाँ

श्रीहरिने कहा—[हे चन्द्रचूड़] हल्दी और केलेके क्षारका लेप सिध्मरोगका विनाशक है। एक भाग कूट तथा दो भाग हरीतिकीका चूर्ण उष्ण जलके साथ पान करनेसे कमरका शूल रोग दूर हो जाता है। हरीतिकी, शर्करा और पिप्पलीका चूर्ण नवनीतके साथ सेवन करनेसे वह अर्श-रोगका विनाश करता है। जंगली अडूसेके पत्तोंको घीमें मन्द-मन्द आँचपर पकाकर उसका लेप करना अर्शरोग दूर करनेकी श्रेष्ठतम औषधि है।

गुग्गुल और त्रिफलाका चूर्ण पानकर भगंदर रोगको विनष्ट किया जा सकता है। जीरा, अदरक, दही तथा चावलके माँड़को अग्निमें पकाकर नमकके साथ सेवन करना चाहिये। इससे मूत्रकृच्छ्र नामक रोग दूर होता है। यवक्षार तथा शर्करा भी मूत्रकृच्छ्र-रोगको दूर करता है।

तिलके तेलमें यवको जलाकर उसकी कज्जली बनानी चाहिये। उसके बाद तिलके ही तेलमें उसको मिलाकर अग्निसे जले हुए स्थानपर लेप करनेसे लाभ होता है। घीके सहित लाजवन्ती तथा शरपुंखाकी पत्तियोंका तैयार किया गया लेप भी अग्निजन्य पीड़ाको दूर करता है। निम्न मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके इस लेपका प्रयोग करना चाहिये—

ॐ नमो भगवते ठ ठ छिन्धि छिन्धि ज्वलनं प्रज्वलितं नाशय नाशय हुं फट्॥ (१८४।८)

हाथमें निर्गुण्डीकी जड़ बाँधनेसे ज्वर बहुत ही शीघ्र दूर हो जाता है। श्वेत गुञ्जाफलको सात खण्ड बनाकर उसको हाथमें बाँध लेनेसे अर्श रोग निश्चित ही विनष्ट हो जाता है। विष्णुक्रान्ता (अपराजिता) तथा बकरीके मूत्रका प्रयोग करके चोर और व्याघ्रादि हिंसक जीवोंके प्रहारसे प्राणी अपनी रक्षा कर सकता है। ब्रह्मदण्डीकी जड़ तो सभी कर्मोंमें सिद्धि प्रदान करनेवाली है।

घृतके साथ सिद्ध त्रिफलाका चूर्ण कुष्ठविनाशक है। पुनर्नवा, बिल्व और पिप्पलीके चूर्णसे सिद्ध घृतके द्वारा हिचकी, श्वास तथा खाँसीको दूर किया जा सकता है। इस घृतका पान स्त्रियोंके लिये गर्भकारक होता है।

दूध और घीके साथ वानरी बीज (केवाँच)-को पकाकर घी तथा शर्करामें मिलाकर सेवन करनेसे वीर्य कभी नष्ट नहीं होता।

मधु, घृत तथा दुग्धका पान बलीपलित नामक रोगको दूर करता है।

हे शिव! मधु, घृत, गुड़, करेलेका रस और ताँबेको एक साथ अग्निमें पकानेपर चाँदी बन जाता है। अब आप सोना बनानेकी विधि सुनें।

पीले धतूराका पुष्प और सीसा एक पल तथा लाङ्गलिका (करियारी)-की शाखाको एक साथ मिलाकर अग्निमें पकानेपर सोना बन जाता है।

हे हर! धत्तूरके बीजोंसे निकाले गये तेलद्वारा प्रज्वलित दीपकके प्रकाशमें समाधिस्थ व्यक्तिको देवता भी नहीं देख पाते।

हे शिव! मनुष्यको मदमस्त हाथीके दोनों नेत्रोंमें अपने हाथसे काजल लगाना चाहिये। ऐसा करनेपर वह व्यक्ति युद्धमें विजय प्राप्त करता है और महाबलवान् भी बन जाता है।

डुण्डुभ नामक सर्पके दाँतको मुखमें रखकर मनुष्य जलके बीच भी पृथ्वीके समान ही किसी अन्य विकल्पका आश्रय लिये बिना रह सकता है।

लौहचूर्ण और मट्ठा पान करनेसे पाण्डुरोगका शमन हो जाता है। तण्डुलीयक (चौलाई) तथा

३४०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

गोखरूकी जड़को दूधमें मिलाकर पान करनेसे कामला एवं मुखरोगका विनाश होता है। चमेली और बेरकी जड़को मट्ठेके साथ पीनेसे अजीर्ण रोग दूर होता है।

कुशकी जड़, वानरीमूल, वकुची तथा कांजीका मिश्रित योग दाँतोंके रोगका विनाशक है। इन्द्रवारुणीकी जड़को जलके साथ पीनेसे विषादि-दोष नष्ट होते हैं। हे शिव! चम्पाकी जड़को पान करनेसे भी उक्त दोष दूर हो सकते हैं। कांजीके साथ गुञ्जा (घुँघची)-का चूर्ण मस्तकपर लेप करनेसे सिरका रोग विनष्ट हो जाता है।

बला, अतिबला, मधुयष्टि, शर्करा तथा मधुका पान करके वंध्या स्त्री गर्भ-धारण करनेमें समर्थ हो जाती है। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।

श्वेत अपराजिताकी जड़, पिप्पली और सोंठका पिसा हुआ लेप सिरमें लगानेसे शूल नष्ट हो जाता है। निर्गुण्डीकी फुनगीको पीसकर पान करनेसे गण्डमाला नामक रोग दूर हो जाता है।

केतकीके पत्तोंका क्षार गुड़के साथ अथवा मट्ठेके साथ शरपुंखाका सेवन करनेसे प्लीहा रोग विनष्ट हो जाता है।

बिजौरा नीबूका निर्यास (गोंद), गुड़ और घीके साथ मिलाकर पान करनेसे वात-पित्तजनित शूल दूर होता है। सोंठ, काला नमक तथा हींगका पान हृदयरोगका विनाशक है। (अध्याय १८४)


गणपतिमन्त्रका औषधिक योग तथा शोथ, अजीर्ण, विसूचिका और पीनस आदि विविध रोगोंके उपचार

श्रीहरिने कहा— हे रुद्र! 'ॐ गं गणपतये नमः' भगवान् गणेशका यह मन्त्र धन और विद्या प्रदान करनेवाला है। इस मन्त्रका एक हजार आठ बार जप करनेके बाद अपनी शिखाको बाँधनेवाला व्यक्ति वाद-विवादके व्यवहारमें विजय प्राप्त करता है। एक सौ बार इस मन्त्रका जप करनेवाला प्राणी अन्य लोगोंका प्रिय बन जाता है।

काले तिलोंको घृतमें मिलाकर इस मन्त्रसे एक हजार आठ आहुतियाँ देनेसे मात्र तीन दिनमें राजा वशमें हो जाता है। अष्टमी और चतुर्दशी तिथिको उपवास रखकर मनुष्य यदि विधिवत् विघ्नराज गणेशका पूजन करे और तिल तथा अक्षतको मिलाकर एक हजार आठ बार उन्हें आहुति प्रदान करे तो वह युद्धमें अपराजित होता है और सभी लोग उसकी सेवा करते हैं। उपर्युक्त मन्त्रका एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ बार जप करके अपनी शिखा बाँधनेवाला प्राणी राजकुल तथा वाद-विवादके व्यवहारमें विजय प्राप्त करता है।

भृंगराज, सहदेवी (सहदेई), वचा (वच) और श्वेत अपराजिता नामक औषधियोंके रसका तिलक करके मनुष्य तीनों लोक वशमें कर सकता है।

काकजंघाका मूल और दूधका मिश्रित पान शोथ रोगका विनाशक है।

अश्वगन्धा, नागबला, गुड़ तथा उड़द मिलाकर खानेवाला पुरुष वैसे ही रूप-सौन्दर्यसे युक्त हो जाता है, जैसे नवयुवकोंका सौन्दर्य होता है।

हे रुद्र! लौहचूर्ण और त्रिफलाचूर्णका मधुके साथ प्रयोग करनेसे परिणाम नामक शूलका विनाश होता है। हे वृषध्वज! हींग, काला नमक और सोंठ—इन औषधियोंके क्वाथका पान सभी प्रकारके शूलोंका अपहारक है। सामुद्रलवणसे युक्त अपामार्गकी जड़का सेवन करनेसे अजीर्ण-शूल नष्ट हो जाता है।

काण्ड ] प्रमेह, मूत्रनिरोध, शर्करा, गण्डमाला, भगंदर तथा अर्श आदि रोगोंका निदान ३४१


हे रुद्र! बरगदकी जटाओंका अंकुर चावलके जलमें घिसकर मट्ठेके साथ पीनेसे अतिसार रोग दूर होता है। अंकोट (अंकोल)-की जड़को आधा कर्ष लेकर चावलके जलमें पीसकर पान करनेसे सभी प्रकारके अतिसार तथा ग्रहणी नामक रोगोंका विनाश होता है। काली मिर्च एक भाग, सोंठ दो भाग तथा कुटजकी छालका चूर्ण चार भाग गुड़में मिलाकर काढ़ा बनाकर पीनेसे ग्रहणी नामक रोग दूर होता है। हे शिव! श्वेत अपराजिताकी जड़, हल्दी, सिक्थ, चावल, अपामार्ग (चिचड़ा) और त्रिकटु (काली मिर्च, सोंठ एवं पिप्पली) नामक इन औषधियोंको पीसकर वटी बना लेना चाहिये। यह वटी निस्संदेह विषूचिका नामक रोगका विनाश करती है।

हे भूतेश! त्रिफला, अगरु, शिलाजीत और हरीतकीको समान भागमें लेकर इनके मिश्रित चूर्णको मधुके साथ मिलाकर सेवन करनेसे सभी प्रकारके प्रमेह रोग नष्ट हो जाते हैं।

मदारका दूध एक प्रस्थ अर्थात् चार सेर, तिलका तेल एक प्रस्थ अर्थात् चार सेर, मैनसिल, काली मिर्च तथा सिन्दूर एक-एक पल अर्थात् आठ-आठ तोलेका चूर्ण बनाकर ताँबेके पात्रमें रखकर उसको धूपमें सुखा ले। स्नुही (थूहड़—सेहुँड़)-का दूध और सेंधा नमक मिलाकर इसका सेवन करे तो शूल रोग दूर हो जाता है।

त्रिकटु (काली मिर्च, सोंठ तथा पिप्पली), त्रिफला, नक्त (कंजा), तिलका तेल, मैनसिल, नीमकी पत्ती, चमेलीका पुष्प, बकरीका दूध, बकरीका मूत्र, शंखनाभि और चन्दनको एकमें ही घिसकर बनायी गयी बत्तीसे नेत्रोंमें अञ्जन लगानेसे पटल, काच, पुष्प तथा तिमिर आदि रोग दूर हो जाते हैं।

मधुसे युक्त बहेड़ेका चूर्ण श्वास रोगका विनाशक होता है। मधु तथा सेंधा नमकसे मिश्रित पिप्पली और त्रिफलाका चूर्ण सभी प्रकारके रोगोंसे उत्पन्न होनेवाले ज्वर, श्वास, शोथ तथा पीनसके विकारको दूर करता है।

देवदारु-वृक्षकी छालके चूर्णको इक्कीस बार बकरीके मूत्रसे भावना देकर सिद्ध करना चाहिये। इसका अञ्जन करनेसे रतौंधी, पटलत्ता और रोमपतन नामक रोग दूर हो जाते हैं।

हे रुद्र! पिप्पली, केतकी, हल्दी, आँवला तथा वचा (वच)-को दूधके साथ पीसकर अञ्जन बनाना चाहिये। इस अञ्जनके प्रयोगसे नेत्रोंके सभी रोग विनष्ट हो जाते हैं।

हे शिव! काकजंघा तथा सहिजनकी जड़को मुखमें रखने या चबानेसे दाँतोंमें लगे हुए कीड़ोंका निश्चित ही विनाश होता है। (अध्याय १८५)


प्रमेह, मूत्रनिरोध, शर्करा, गण्डमाला, भगंदर तथा अर्श आदि रोगोंका निदान

**श्रीहरिने कहा—**हे शिव! मधुके साथ गुडूचीका रस पीनेसे प्रमेह रोग विनष्ट हो जाता है। गोहालिका (जलपिप्पली)-की जड़को तिल, दही तथा घीके साथ पान करनेसे यह वस्तिभागमें अवरुद्ध मूत्रको बाहर करता है। काले नमकके साथ इस जड़का पान करनेसे हिचकी रोग भी दूर हो जाता है। गोरक्ष अर्थात् गोरखमुण्डी तथा कर्कटी (ककड़ी)-की जड़को शीतल जलके साथ पीसकर तीन दिन पीनेसे ही शर्करा नामक रोग नष्ट हो जाता है। ग्रीष्मकालमें मालतीकी जड़को भलीभाँति पीसकर

द्रव्य तथा औषध-सेवनमें भगवान् विष्णुके स्मरणकी महिमा

३४२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-


शर्करा और बकरीके दूधमें पीनेसे मूत्रनिरोध, शर्करा-विकार और पाण्डु रोग विनष्ट हो जाता है।

ब्रह्मयष्टी अर्थात् ब्राह्मीकी जड़को चावलके पानीमें घिसकर तैयार किया गया लेप असाध्य गण्डमाला तथा गलगण्डक रोगको दूर करता है। हे रुद्र! करवीर (कनेर)-की जड़का लेप तथा सुपारीका लेप भी पुरुषत्वसे सम्बन्धित विकारको नष्ट करता है। अब मैं अन्य औषधिक योगोंको कहता हूँ।

दन्तीमूल, हल्दी और चित्रकके लेपसे भगंदर रोग विनष्ट होता है। हे उमापते! हे वृषभध्वज! स्नुही (थूहड़—सेहुँड)-के दूधसे अनेक बार भावित हल्दीकी वटीका लेप अर्श रोगको दूर करता है। घोषाफल और सेंधा नमकको पीसकर बनाया गया लेप अर्श रोगको नष्ट करनेका श्रेष्ठतम योग है। हे शिव! पलाश और क्षारसे बने क्वाथके द्वारा शोधित घृतपाकमें तिगुना मिला हुआ त्रिकटु (काली मिर्च, सोंठ और पिप्पली)-का चूर्ण अर्श रोगको विनष्ट करता है। बेलके फलको भूनकर खानेसे खूनी अर्श विनष्ट होता है। मक्खनके साथ काला तिल खानेसे भी खूनी अर्श रोग नष्ट होता है।

हे वृषभध्वज! प्रातःकाल यवक्षार-मिश्रित सोंठके चूर्णको समान मात्रामें गुड़ मिलाकर खानेसे वह जठराग्निकी वृद्धि करता है। सोंठके चूर्णको काढ़ा बनाकर पान करनेसे भी जठराग्निकी वृद्धि होती है। हे रुद्र! हरीतकी, सेंधा नमक, पिप्पली—इन औषधियोंके चूर्णको गरम जलके साथ मिलाकर पान करनेसे भूख बढ़ती है तथा शूकरकन्दका रस घृतके साथ पान करनेसे अति क्षुधा बढ़ती है।

(अध्याय १८६)


आयुर्वृद्धिकारी औषधिके सेवनकी विधि

श्रीहरिने कहा— हे शिव! हे वृषभध्वज! हे रुद्र! यदि मनुष्य हस्तिकर्ण पलाशके पत्तोंका चूर्ण करके सौ पलकी मात्रामें इस चूर्णको दूधके साथ मिलाकर लगातार सात दिनोंतक प्रयोग करे तो वह वेदविद्याविशारद, सिंहके समान पराक्रमी, पद्मरागके समान कान्तियुक्त तथा सौ वर्षकी आयुमें भी सोलह वर्षका नवयुवक बन सकता है, किंतु सतत दुग्धपान करना अत्यावश्यक है।

हे शिव! मधु और घृतसे युक्त दूधका सेवन आयुवर्धक होता है। उक्त हस्तिकर्ण पलाशके चूर्णको मधुके साथ लेनेसे प्राणी दस हजार वर्षकी आयु प्राप्त कर सकता है। यह योग मनुष्यको वेदवेदाङ्गका ज्ञाता और प्रमदा-जनोंका प्रिय बनानेमें समर्थ है। इस चूर्णका सेवन दहीके साथ करनेसे शरीर वज्रके समान शक्तिसम्पन्न हो जाता है। केशरसे युक्त इस चूर्णका प्रयोग करनेसे मनुष्य हजार वर्षकी आयु प्राप्त करता है। यदि मनुष्य इस चूर्णको कांजीके साथ मिलाकर खाता है तो केशोंकी सफेदी और त्वचाकी झुर्रियोंसे रहित होकर सौ वर्षतक वृद्धावस्थासे रहित दिव्य शरीर प्राप्त करता है।

हे वृषभध्वज! त्रिफला चूर्णके साथ मधुका सेवन नेत्रज्योतिको बढ़ाता है। घीके साथ इस चूर्णको खानेसे अंधा व्यक्ति भी देख सकता है। भैंसके दूधमें मिलाकर तैयार किया गया इस चूर्णका लेप प्राणीके श्वेत बालोंको काला बना देता है। खल्वाटके बाल भी इस लेपके प्रयोगसे निकल आते हैं। इस चूर्णको तेलमें मिलाकर शरीरमें लगानेसे बाल पकनेका प्रभाव तथा त्वचाकी झुर्रियोंका प्रकोप समाप्त हो जाता है।

इस चूर्णका मात्र उबटन लगानेसे सभी रोग दूर हो जाते हैं। बकरीके दूधमें मिलाकर इस चूर्णका

काण्ड ] व्रण आदि रोगोंकी चिकित्सा ३४३


अञ्जन एक मास-पर्यन्त नेत्रोंमें लगानेसे निर्बल दृष्टि सबल हो जाती है।

श्रावणमासमें छिलकेसे रहित पलाशके बीजोंको लेकर उनका चूर्ण मक्खनके साथ आधे कर्षकी मात्रामें खाना चाहिये। भगवान् हरिको नित्य प्रणाम करके इस चूर्णका सेवन करना चाहिये। हे हर! इसके सेवनके पश्चात् जल पीते हुए पुराने साठी चावलका भात पथ्य है। इस योगका पालन करनेवाला व्यक्ति वृद्धावस्थासे रहित होकर एक हजार वर्षतक जीवित रह सकता है।

पुष्यनक्षत्रमें भृंगराजकी जड़को लाकर उसका चूर्ण बनाना चाहिये। यदि प्राणी कांजीके साथ उस चूर्णका सेवन करे तो मात्र एक मासमें वह बलीपलित रोगसे रहित हो जाता है। इसका बराबर प्रयोग करनेसे मनुष्य पाँच सौ वर्षतक जीवित रह सकता है और वह हाथीके समान शक्तिसम्पन्न हो जाता है। हे रुद्र! पुष्यनक्षत्रमें ही इस औषधिका प्रयोग करनेपर प्राणी श्रुतिधर अर्थात् वेद-वेदाङ्गका ज्ञाता बन जाता है।

(अध्याय १८७)


व्रण आदि रोगोंकी चिकित्सा

श्रीहरिने कहा— हे रुद्र! प्रहारसे हुआ घाव और मवादयुक्त फोड़ा घीके प्रयोगसे ठीक हो जाता है। दोनों हाथोंसे अपामार्गकी जड़ मलकर उसके रससे चोटके घावको भरनेपर रक्तस्राव रुक जाता है। हे शंकर! लाङ्गलिका मूल तथा इक्षुदर्भ नामक औषधिको पीसकर उसके लेपसे शल्य-काँटायुक्त व्रणका मुख संलिप्त करनेपर काँटा निकल जाता है तथा बहुत दिनोंका गड़ा हुआ भी काँटा घावसे बाहर हो जाता है।

नाड़ीके घावमें बालमूल (मोथा)-की जड़को अथवा मेषशृङ्गी (मेढ़ासिंगी)-की जड़ जलमें घिसकर उसका लेप लगानेसे पुराना घाव भी सूख जाता है। भैंसके दहीमें कोदोका भात मिलाकर खानेसे और हींगकी जड़का चूर्ण घावमें भरनेसे भी नाड़ीका व्रण सूख जाता है।

ब्राह्मीके फलको जलके साथ पीसकर और रगड़कर लेप करनेसे रक्तदोष शान्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।

हे शंकर! सहिजनका बीज, अलसी और सफेद सरसोंको अम्लरहित मट्ठेमें पीसकर उसका लेप ग्रन्थिक रोगपर लगानेसे वह रोग निश्चित ही नष्ट हो जाता है। श्वेत अपराजिताकी जड़ चावलकी धोवनमें पीसकर उसका नस्य लेनेसे भूत भाग जाते हैं।

हे शिव! काली मिर्चके साथ अगस्त्य-पुष्पके रसका नस्य शूल रोगका विनाशक है। साँपकी केंचुल, हींग, नीमकी पत्ती, यव तथा सफेद सरसों लेकर इनका लेप करनेसे भूत-प्रेतकी बाधा दूर हो जाती है। हे शिव! गोरोचन, मरिच, पिप्पली, सेंधा नमक और मधु—इन सभीका अञ्जन बनाकर आँखमें आँजनेसे प्रेतबाधा दूर हो जाती है। गुग्गुलकी धूप ग्रह-बाधाका नाशक है। काले वस्त्रको ओढ़नेसे चौथिया ज्वर दूर हो जाता है।

(अध्याय १८८)

१७०- सर्वकामप्रदा विद्या

३४४संक्षिप्त गरुड़पुराण[ आचार-

पटल आदि नेत्ररोग, गुल्म, दन्तकृमि, विविध ज्वर तथा विषदोष-शमनके उपाय

श्रीहरिने कहा— हे नीललोहित! श्वेत अपराजिता-पुष्पके रसको नेत्रोंमें डालनेसे पटल नामक नेत्ररोग नष्ट हो जाता है। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। हे सुरासुरविमर्दन शिव! गोखरूकी जड़ चबाकर दाँतोंमें लगे हुए कीटोंकी व्यथाको दूर किया जा सकता है।

यदि ऋतुकालमें उपवासपूर्वक स्त्री गोदुग्धके साथ मन्दारवृक्षकी जड़को पीसकर पान करती है तो उसके शरीरमें होनेवाला गुल्म और शूलविकार विनष्ट हो जाता है।

हे हर! पलाश अथवा अपामार्गकी जड़ हाथमें बाँधनेपर सभी प्रकारके ज्वरोंका विनाश होता है तथा भूत-प्रेत आदिके द्वारा उत्पन्न होनेवाला कष्ट भी नहीं होता। हे परमेश्वर! वृश्चिकमूल अर्थात् बिछिया-वृक्षकी जड़को बासी जलके साथ पीसकर प्रातःकाल सेवन करनेसे दाहज्वर दूर किया जा सकता है। इसकी जड़को शिखामें बाँधनेसे एकाहिक आदि जो ज्वर हैं, वे भी विनष्ट हो जाते हैं। उस जड़को बासी जलके साथ पीसकर पीनेसे सभी प्रकारका विषदोष विनष्ट हो जाता है।

जो मनुष्य पाढ़ा (पाठा)-की जड़को पीसकर गोघृतके साथ पान करता है, उसका सभी प्रकारका विषदोष दूर हो जाता है। रक्तवर्णवाले चित्रक वृक्षकी जड़को पीसकर कानोंमें डालनेसे कामला रोग विनष्ट हो जाता है, इसमें शंका नहीं है।

श्वेत कोकिलाक्ष (श्वेत तालमखाना)-की जड़को पीसकर बकरीके दूधमें तीन सप्ताहतक पान करनेसे क्षय रोग विनष्ट हो जाता है। नारियल-वृक्षके पुष्पको बकरीके दूधमें मिलाकर पान करनेसे तीनों प्रकारका रक्तवात-विकार नष्ट हो जाता है।

सुदर्शन-वृक्षकी जड़को मालाके मध्य पिरोकर कण्ठमें धारण करनेसे त्र्याहिक (तिजरिया) आदि ज्वर तथा ग्रह एवं भूतादिक व्याधियाँ विनष्ट हो जाती हैं।

हे रुद्र! श्वेत गुञ्जा-वृक्षके पुष्प तथा मूलको लेकर अपने मुखमें रखनेसे नाना प्रकारके विषोंका विनाश हो जाता है। इस औषधिकी जड़को हाथ और कण्ठमें धारण करनेपर ग्रहादिक दोष दूर होता है। हे नीललोहित! कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको लायी गयी इस औषधिकी जड़को कटिप्रदेशमें बाँधकर सिंह आदि हिंसक पशुओंके भयको दूर किया जा सकता है।

हे ईश! विष्णुकान्ता (अपराजिता)-की जड़को रेशमी सूतमें बाँधकर कानमें धारण करनेसे मगरमच्छादिक जन्तुओंका भय नहीं रहता।

(अध्याय १८९)


गण्डमाला, प्लीहा, विद्रधि, कुष्ठ, दद्रु, सिध्म, पीनस तथा छर्दि आदि विविध रोगोंका उपचार और सुगन्धित द्रव्योंके निर्माणकी विधि

श्रीहरिने कहा— हे ईश्वर! गोमूत्रके साथ अपराजिताकी जड़ पीनेसे गण्डमाला रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। इन्द्रवारुणीकी भी जड़ पीनेसे इस रोगका विनाश होता है। जिङ्गणी (मंजीठ), एरण्ड तथा शूकशिम्बी (केवाँच)-को मिलाकर शीतल जलयुक्त लेप लगानेसे भुजाओंमें

१७१- विष्णुधर्माख्यविद्या

काण्ड ] गण्डमाला, प्लीहा, विद्रधि, कुष्ठ, दद्रु, सिध्म, पीनस तथा छर्दि आदि विविध रोगोंका उपचार ३४५

होनेवाली व्यथा और गर्दनकी व्यथा दूर हो जाती है।

भैंसका मक्खन, अश्वगन्धा, पिप्पली, वचा (वच) और दोनों प्रकारका कूट एकमें मिलाकर बनाया गया लेप लिङ्गस्रोत तथा स्तनगत दुःखोंका विनाशक है।

कूट और नागबलाके चूर्णको मक्खनमें मिलाकर सिद्ध किया गया लेप युवतियोंके वक्षःस्थलको सुडौल, ओजगुणसे सम्पन्न तथा सुन्दर बनाता है।

इन्द्रवारुणीकी जड़ उखाड़कर रोगीका नाम लेकर दूरसे ही उसके प्रति फेंक दिया जाय तो रोगीका प्लीहा रोग दूर हो जाता है।

चावलके धोवनमें श्वेत पुनर्नवाकी जड़ पीसकर पीनेसे निश्चित ही विद्रधि रोग नष्ट हो जाता है। इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। केलेका पत्ता और यवक्षार जलमें सिद्ध करके तैयार किया गया पेय पीनेसे उदरजनित समस्त विकार दूर हो जाते हैं। केलेकी जड़ गुड़ और घीमें मिलाकर, अग्निपर पकाकर खाया जाय तो वह उदरजनित कृमियोंको विनष्ट कर देता है।

प्रतिदिन प्रातःकाल आँवले और नीमकी पत्तियोंका चूर्ण भक्षण करनेसे कुष्ठ रोग दूर हो जाता है। हरीतकी, विडंग, हल्दी, श्वेत सरसों, सोमलताकी जड़, कंजेकी जड़ और सेंधा नमकको गोमूत्रमें पीसकर एक सिद्ध-योग बनाना चाहिये। ये सभी औषधियाँ कुष्ठ रोगको दूर करनेवाली हैं।

एक भाग त्रिफला, दो भाग हरीतकी और सोमलताके बीजोंको खाना चाहिये। इस पथ्यसे दद्रु रोग नष्ट हो जाता है। गोमूत्र और नमकसे युक्त खट्टे मट्ठेका क्वाथ बनाकर उसको काँसेके पात्रमें घिसकर लेप करनेसे कुष्ठ और दद्रु दोनोंका विनाश होता है। हल्दी, हरिताल, दूर्वा, गोमूत्र तथा सेंधा नमक मिलाकर तैयार किया गया लेप दद्रु, पामा और गर नामक रोगको दूर करता है।

हे रुद्र ! सोमलताके बीजोंका चूर्ण और मक्खनका मधुके साथ सेवन करना चाहिये। ये औषधियाँ श्वेत कुष्ठ रोगका विनाश करनेवाली हैं। इनके प्रयोगमें मट्ठेके साथ चावल आदिका भोजन पथ्य है। हे हर ! श्वेत अपराजिताकी जड़को उसीके रसके साथ पीसकर किया गया उसका लेप एक मासमें श्वेत कुष्ठको विनष्ट कर देता है।

हे वृषभध्वज ! पामा और दुर्नामा नामक कुष्ठका विनाश काली मिर्च और सिन्दूरसे युक्त भैंसके मक्खनका लेप लगानेसे होता है।

हे ईश्वर ! श्वेत गम्भारी (शतावरी)-की जड़का गोदुग्धके साथ पाक सिद्ध करके उसको खाना चाहिये। यह पाक शुक्लपित्त रोगका विनाशक है। हे रुद्र ! मूलीके बीजोंको अपामार्गकी जड़के रसमें मिलाकर लगाये गये लेपसे सिध्म रोग विनष्ट होता है। केलेका क्षार और हल्दीका लेप भी सिध्म रोगका विनाशक है। हे महादेव ! केला और अपामार्गका क्षार एरण्ड तेलमें मिलाकर उस लेपका अभ्यङ्ग (मालिश) करनेसे तत्काल सिध्म रोग नष्ट हो जाता है।

हे वृषभध्वज ! गोमूत्रसे युक्त कूष्माण्ड (कुम्हड़ा)-के नालका क्षार और जलमें पीसी गयी हल्दीको भैंसके गोबरमें मिलाकर मन्द-मन्द आँचपर सिद्ध करना चाहिये, उसका उबटन लगानेसे शरीरका सौन्दर्य बढ़ जाता है। तिल, सरसों, दारुहल्दी, हल्दी और कूट नामक जो औषधियाँ हैं, उनका उबटन बनाकर जो पुरुष अपने शरीरमें लगाता है, वह दुर्गन्धसे रहित होकर सुगन्धित हो उठता है। दूर्वा, काकजंघा, अर्जुनके पुष्प, जामुनकी पत्तियाँ तथा लोध्र-पुष्प—इन सभीको एकमें मिलाकर पीस लेना चाहिये। इसका प्रतिदिन प्रयोग करनेसे शरीरकी दुर्गन्ध दूर हो जाती है और वह मनोहर हो जाता है। लोध्र-पुष्प तथा जलमें पीसकर तैयार

१७२- विषहरी गारुडी विद्या तथा भगवान् गरुडके विराट् स्वरूपका वर्णन

३४६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

किया गया धत्तूरके चूर्णके लेपका उबटन लगानेसे मनुष्यके शरीरमें स्थित ग्रीष्मबाधा दूर हो जाती है। प्रातःकाल गरम दूधकी भापसे शरीर-सेंक करनेपर घर्मदोष (स्वेदाधिक्य) नष्ट हो जाता है। काकजंघाका उबटन शरीरके लिये सुन्दर अनुलेपन द्रव्य है।

मुलेठी, शर्करा, अडूसाका रस और मधुका सेवन करनेसे रक्त-पित्त, कामला और पाण्डु रोगका विनाश होता है। अडूसाका रस और मधु पीनेसे रक्त-पित्त-विकार दूर हो जाता है।

प्रातःकाल मात्र जल पीकर भयंकर पीनस रोगको दूर करना चाहिये। हे महेश्वर! बहेड़ा, पिप्पली और सेंधा नमकका चूर्ण, कांजीके साथ पान करनेसे मनुष्यका स्वरभेद दूर हो जाता है। इस दोषके होनेपर मैनसिल, बलामूल, बेरकी पत्ती, गुग्गुल तथा आँवलेका चूर्ण गोदुग्धमें मिलाकर पान करना चाहिये।

हे परमेश्वर ! चमेलीकी पत्ती, बेरकी पत्ती और मैनसिल—इनकी बत्ती बनाकर उसे बेरकी अग्निमें सेंककर धूम्रपान करनेसे कास रोग दूर हो जाता है। त्रिफला और पिप्पलीका चूर्ण मधुके साथ खाना चाहिये। भोजन करनेके पूर्व मधुके साथ प्रयुक्त यह औषधिक योग प्यास और ज्वरके दोषको शान्त करता है। बिल्वकी जड़ तथा गुडूचीका क्वाथ मधुके साथ पान करनेसे तीनों प्रकारके छर्दि रोग विनष्ट हो जाते हैं। चावलके धोवनमें दूर्वारसको मिलाकर पीनेसे भी छर्दि रोग दूर हो जाता है। (अध्याय १९०)


सर्प, बिच्छू तथा अन्य विषैले जीव-जन्तुओंके विषकी चिकित्सा

श्रीहरिने कहा— हे वृषध्वज! पुष्यनक्षत्रमें पुनर्नवाकी श्वेत जड़ लाकर जलके साथ पीनेसे पीनेवालेके आस-पास और घरोंमें सर्प नहीं आ सकते। जो मनुष्य भालूके दाँतमें तार्क्ष्य (गरुड)-की मूर्ति बनाकर धारण करता है, वह सर्पोंके लिये जीवनपर्यन्त अदृश्य हो जाता है। हे रुद्र! जो मनुष्य पुष्यनक्षत्रमें सेमरकी जड़को जलमें पीसकर पी लेता है, उसके ऊपर किया गया विषैले सर्पोंके दाँतोंका प्रहार व्यर्थ हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। पुष्यनक्षत्रमें लाजवन्तीकी जड़ हाथमें बाँधनेसे अथवा उसके लेपको लगाकर भी सर्पोंको पकड़ा जा सकता है। इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। पुष्यनक्षत्रमें लायी गयी सफ़ेद मन्दारकी जड़को शीतल जलमें पीसकर पान करनेसे सर्पदंश तथा करवीर आदिका विष नष्ट हो जाता है। कांजीके साथ महाकालकी जड़ पीसकर उसका लेप दंश-भागपर लगानेसे वोड्र (गोनस) तथा डुंडुभ (पनिहा) सर्पोंका विष दूर होता है।

चौलाईके मूलको चावलके धोवनमें पीसकर घीके साथ पान करनेपर सभी प्रकारके विष नष्ट हो जाते हैं। नीली तथा लाजवन्तीकी जड़ पृथक्-पृथक् अथवा संयुक्त-रूपसे चावलके धोवनमें पीसकर पान करनेपर सभी प्रकारके सर्पोंके दंशका विष नष्ट हो जाता है। गुड़, शर्करा तथा दुग्धमिश्रित कूष्माण्डके रसका पान सर्पदंशके विषको दूर कर देता है। कोदोकी जड़ पीसकर पान करनेसे विषकी मूर्च्छा दूर हो जाती है। मुलेठीके चूर्णसे युक्त शर्करा और दूध तीन राततक पीकर चूहेके विषको दूर किया जा सकता है। तीन चुल्लू शीतल जल पीनेसे ताम्बूल खानेके कारण जलनयुक्त मुँहसे बहनेवाली लार बंद हो जाती है। शर्करासे युक्त घृतका पान करनेसे मद्यका मद नहीं होता।

हे महेश्वर! कृष्णा (काली तुलसी) और अंकोलकी जड़के क्वाथको तीन राततक पीनेसे

काण्ड ] विविध स्नेह-पाकोंद्वारा रोगोंका उपचार ३४७


सामान्य अथवा कृत्रिम विषका प्रभाव नष्ट हो जाता है। सेंधा नमकके साथ गरम गोघृतका पान बिच्छूके डंक मारनेसे शरीरमें उत्पन्न विषकी वेदनाको दूर करता है। हे शिव ! कुसुम्भ (कुसुम), कुंकुम, हरिताल, मैनसिल, कंजा और मन्दार-वृक्षकी जड़ पीसकर पान करनेसे मनुष्योंमें चढ़ा हुआ सर्प या बिच्छूका विष नष्ट हो जाता है। हे हर ! दीपकका तेल लगानेसे सामान्य ततैया आदि कीटोंका विष दूर हो जाता है। इससे कनखजूरेका भी विष नष्ट हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। बिच्छूके डंक लगे हुए स्थानपर सोंठ तथा तगरका लेप लगानेसे विष नष्ट हो जाता है। इसी लेपसे मधुमक्खीके डंकका भी विष दूर किया जा सकता है तथा सोया, सेंधा नमक और घृतका मिश्रित लेप लगानेसे भी वह विष दूर हो जाता है। हे महादेव ! शिरीषके बीजोंको गरम दूधमें घिसकर उसका लेप लगानेसे कुत्तेका विष नष्ट हो जाता है। प्रज्वलित अग्नि और उष्ण जलसे सेंकनेपर मेढकका विष दूर हो जाता है। हे चन्द्रचूड ! धत्तूरके रससे मिश्रित दूध, घी और गुड़का पान कुत्तेके विषको नष्ट कर देता है।

बरगद, नीम और शमी वृक्षकी छालके क्वाथसे सेंक करनेपर मुख और दाँतकी विष-वेदना नष्ट हो जाती है। देवदारु और गैरिकके चूर्णका लेप करनेसे भी इस विषको शान्त किया जा सकता है। हे हर ! नागेश्वर, दारुहल्दी, हल्दी तथा मजीठके मिश्रित लेपसे लूता (मकड़ी)-के काटनेका विष दूर होता है। कंजेके बीज, वरुण-वृक्षके पत्ते, तिल और सरसोंका पिसा हुआ लेप भी विषको दूर कर देता है, इसमें संदेह नहीं है।

हे हर ! नमक और घृतसे युक्त घृतकुमारीके पत्तेका लेप करनेसे घोड़ेके शरीरकी खुजली दस दिनमें दूर हो जाती है। (अध्याय १९१)


विविध स्नेह-पाकोंद्वारा रोगोंका उपचार, स्मरण तथा मेधाशक्तिवर्धक ब्राह्मी-घृतादिके निर्माणकी विधि

श्रीहरिने कहा— [हे हर !] चित्रक आठ भाग, शूरण (सूरन) सोलह भाग, सोंठ चार भाग, काली मिर्च दो भाग, पिप्पलीमूल तीन भाग, विडंग चार भाग, मुशली आठ भाग और त्रिफला चार भाग लेकर इनके दुगुने गुड़के साथ मोदक बनाना चाहिये। इसके सेवनसे अजीर्ण, पाण्डु, कामला, अतिसार, मन्दाग्नि और प्लीहा नामक रोगोंको दूर किया जा सकता है।

बिल्व (बेल), अग्निमन्थ (गनियारी), श्योनाक (सोना पाढ़ा), पाटला (पाढर), पारिभद्रक (नीम), प्रसारिणी (गन्धप्रसारिणी), अश्वगन्धा, बृहती, कण्टकारी, बला, अतिबला, रास्ना (सर्पसुगन्धा), श्वदंष्ट्रा (गोखरू), पुनर्नवा, एरण्ड, शारिवा (अनन्तमूल), पर्णी (शालपर्णी), गुडूची, कपिकच्छुका (केवाँच) नामक इन औषधियोंको दस-दस पलकी मात्रामें एकत्र करके शुद्ध जलमें पकाना चाहिये। जब उस जलका चौथाई भाग शेष रह जाय तो उससे तेलको सिद्ध करे। यदि बकरीका दूध अथवा गौका दूध हो तो उसको उस तैलपाकमें चौगुना मिलाकर तेलकी मात्राके समान शतावरी और सेंधा नमक भी मिलाये। इस प्रकार तैलपाकको सिद्ध करनेके पश्चात् उस तेलमें शतपुष्पा (सोया), देवदारु, बला, पर्णी, वचा (वच), अगुरु, कुष्ठ (कूट), जटामांसी, सेंधा नमक और पुनर्नवा एक-एक पल पीसकर मिलाना चाहिये। इस तेलका प्रयोग पीने, नस्य लेने तथा शरीरमें

१७३- त्रिपुराभैरवी तथा ज्वालामुखी आदि देवियोंके पूजनकी विधि

३४८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

मर्दनके काममें करना चाहिये। इसके प्रयोगसे हृदयगत शूल, पार्श्वशूल, गण्डमाला, अपस्मार और वातरक्त नामक रोग दूर हो जाते हैं तथा शरीर शोभा-सम्पन्न हो जाता है। हे हर! इस तेलके प्रयोगसे खच्चरी भी गर्भ-धारण कर सकती है, स्त्रीके विषयमें तो कहना ही क्या? घोड़ा, हाथी और मनुष्योंमें वात-दोष होनेपर इस तेलका प्रयोग करना चाहिये। इतना ही नहीं सभी वात-विकारसे ग्रस्त प्राणियोंके लिये इसका प्रयोग लाभप्रद है।

हिंगु (हींग), तुम्बुरु (धनिया) और शुण्ठी (सोंठ)-के द्वारा सरसोंका तेल सिद्ध करना चाहिये। इस तेलको कानमें डालनेसे कर्णशूल शान्त हो जाता है। सूखी मूली तथा सोंठका क्षार, हींग और हल्दीका चूर्ण समभागमें लेकर उसके चौगुने मट्ठेके साथ पूर्ववर्णित सरसोंके तेलमें पकाना चाहिये। इस तेलको कानोंमें डालनेसे उनके अंदर उत्पन्न बहरापन, शूल, मवादका स्राव और कृमिदोष विनष्ट हो जाता है।

सूखी मूली और सोंठका क्षार तथा हींग, हल्दी, सोया, वच, कूट, दारुहल्दी, सहिजन, रसाञ्जन, काला नमक, यवक्षार, समुद्रफेन, सेंधा नमक, ग्रन्थिक, विडंग, नागरमोथा, मधु, चार गुना शुक्तिभस्म, बिजौरा नीबूका रस और केलेका रस लेकर इन्हींसे सरसोंका तेल सिद्ध करना चाहिये। यह सिद्ध तेल कर्णशूल दूर करनेका अत्युत्तम उपाय है। हे हर! कानमें इसको डालनेसे बहरापन, कर्णनाद, पीबस्राव तथा कृमिदोष सद्यः विनष्ट हो जाता है। इसका नाम क्षारतैल है। इस तेलसे मुख तथा दाँतोंकी गंदगी भी दूर हो जाती है।

चन्दन, कुंकुम, जटामांसी, कर्पूर, चमेलीकी पत्ती, चमेलीका फूल, कंकोल, सुपारी, लौंग, अगरु, कस्तूरी, कुष्ठ, तगर, गोरोचन, प्रियंगु, बला, मेंहदी, सरल, सप्तपर्णी, लाक्षा, आँवला और रक्त कमल—इन औषधियोंको एकत्रकर इनसे तेल सिद्ध करना चाहिये। यह पसीनेके कारण शरीरमें उत्पन्न होनेवाले मल, दुर्गन्ध तथा खुजली और कुष्ठको दूर करनेवाला श्रेष्ठतम औषध है। हे रुद्र! इस तेलका प्रयोग करनेसे पुरुष अधिक पुरुषत्व-सम्पन्न हो जाता है और वंध्या स्त्री भी पुत्र प्राप्त कर सकती है।

यदि यवानी (अजवायन), चित्रक, धनिया, त्रिकटु, जीरा, काला नमक, विडंग, पिप्पलीमूल तथा राजिक (राई सरसों) नामक औषधियोंद्वारा आठ प्रस्थ जलसे युक्त एक प्रस्थ घृतका शोधन किया जाय तो यह सिद्ध घृत अर्श, गुल्म तथा शोथ रोगोंका विनाश करता है और जठराग्निको उद्दीप्त करता है।

काली मिर्च, निशोत, कूट, हरिताल, मैनसिल, देवदारु, हल्दी, दारुहल्दी, जटामांसी, रक्तचन्दन, विशाला (इन्द्रवारुणी), कनेर, मन्दारदुग्ध और गोबरका रस एकत्रकर—इन औषधियोंकी मात्रा एक-एक कर्ष अर्थात् दो-दो तोला हो, किंतु जो औषधियाँ विषैली हैं, उनकी मात्रा आधा पल अपेक्षित है—इन सभी औषधियोंके द्वारा आठ प्रस्थ गोमूत्रके साथ एक प्रस्थ सरसोंका तेल मिट्टीके पात्र अथवा लौहपात्रमें भरकर मन्द-मन्द आँचपर पकाये। जब यह सिद्ध हो जाय तो इस तेलके अभ्यङ्गसे पामा, विचर्चिका, दद्रु, विस्फोटक आदि रोग नष्ट हो जाते हैं और रुग्ण स्थानोंपर शुद्ध एवं कोमल त्वचा आ जाती है। अत्यधिक मात्रामें पहलेसे फैले हुए पुराने श्वेत कुष्ठको भी इस तेलके प्रयोगसे नष्ट किया जा सकता है।

हे शिव! परवलकी पत्ती, कटुकी, मंजीठ, अनन्तमूल, हल्दी, चमेलीकी पत्ती, शमीकी पत्ती, नीमकी पत्ती और मुलेठीके क्वाथसे सिद्ध घृतका लेप करनेसे व्रण पीड़ारहित हो जाता है और उसका बहना भी बंद हो जाता है।

१७४- वायुजय-निरूपण

काण्ड ] विविध स्नेह-पाकोंद्वारा रोगोंका उपचार ३४९


शंखपुष्पी, वचा, सोमलता, ब्राह्मी, काला नमक, हरीतकी, गुडूची, जंगली अडूसा और वकुची नामक औषधियोंको समानरूपसे एक-एक अक्ष (पल)-की मात्रामें एकत्र करके उनसे एक प्रस्थ घृतको यथाविधि सिद्ध करना चाहिये, साथ ही कण्टकारीका रस एक प्रस्थ तथा गोदुग्ध भी एक प्रस्थ मिलाना चाहिये। इस घृतपाकका नाम ब्राह्मीघृत है। यह स्मृति और मेधाशक्तिको बढ़ानेवाला है।

अग्निमन्थ (गनियारी), वचा, वासा (अडूसा), पिप्पली, मधु तथा सेंधा नमक सात रात सेवन करनेसे मनुष्य किन्नरोंके समान मधुर गीत गानेवाला हो जाता है।

समान भागमें गृहीत अपामार्ग, गुडूची, वचा, कूट, शतावरी, शंखपुष्पी, हरीतकी और विडंगके चूर्णको समान भाग घृतके साथ सेवन करनेसे मात्र तीन दिनमें यह मनुष्यको एक सौ आठ ग्रन्थोंको कण्ठस्थ करनेकी क्षमतावाला बना देता है। जल, दूध या घृतके साथ एक मासपर्यन्त सेवन की गयी वचा तो मनुष्यको श्रुतिधारक विद्वान् बना देती है। चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहणके अवसरपर दूधके साथ एक पल सेवन की गयी वचा मनुष्यको उसी समय श्रेष्ठतम प्रज्ञावान् बना देती है।

चिरायता, नीमकी पत्ती, त्रिफला, पित्तपापड़ा, परवल, मोथा और अडूसासे बने हुए क्वाथका पान विस्फोटक व्रणों और रक्तस्रावको विनष्ट कर सकता है। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।

केतकीका फल, शंखभस्म, सेंधा नमक, त्रिकटु (काली मिर्च, सोंठ तथा पिप्पली), वचा, समुद्रफेन, रसाञ्जन, मधु, विडंग और मैनसिल नामक औषधियोंको एकमें मिलाकर बनायी गयी बत्तीका नेत्रोंमें प्रयोग करनेसे काच, तिमिर तथा पटलदोष नष्ट हो जाते हैं।

दो प्रस्थ अर्थात् आठ सेर उड़द लेकर उससे एक द्रोण अर्थात् सोलह सेर जलमें क्वाथ बनाना चाहिये। चौथाई भाग शेष रहनेपर उस क्वाथके द्वारा एक प्रस्थ अर्थात् चार सेर तेलका पाक करे। तदनन्तर उसमें एक आढक अर्थात् आठ सेर कांजी मिलाकर पिसे हुए पुनर्नवा, गोखरू, सेंधा नमक, त्रिकटु, वचा, काला नमक, देवदारु, मंजीठ और कण्टकारी ओषधियोंका चूर्ण मिश्रित करना चाहिये। हे महेश्वर! इस औषधका नस्य लेनेसे और पान करनेसे भयंकर कर्णशूल नष्ट हो जाता है। इसके अभ्यङ्गसे अर्थात् मालिश करनेसे कानोंका बहरापन एवं अन्य सभी प्रकारके शारीरिक रोग दूर हो जाते हैं।

दो पल सेंधा नमक, पाँच पल सोंठ और चित्रक, पाँच प्रस्थ कांजी* तथा एक प्रस्थ तेलको एकमें पकाना चाहिये। जब यह पाक सिद्ध हो जाय तो इसके नस्य, पान एवं अभ्यङ्गसे असृग्दर (प्रदर), स्वरभंग, प्लीहा और सभी प्रकारके वात रोग विनष्ट हो जाते हैं।

गूलर, बरगद, पाकड़, दोनों प्रकारके जामुन, दोनों प्रकारके अर्जुन, पिप्पली, कदम्ब, पलाश, लोध्र, तिन्दुक, महुआ, आम, राल, बेर, कमल, नागकेशर, शिरीष और बीजडूक्तक—इनको एकमें मिलाकर क्वाथ बनाना चाहिये। तदनन्तर उस क्वाथसे तैलपाक सिद्ध करे। इस सिद्ध तेलका लेप करनेसे अत्यन्त पुराने व्रण नष्ट हो जाते हैं।

(अध्याय १९२)


* एक सेर चावलको हँड़ियामें अच्छी तरह पकाकर ठंडा करे। उसमें चार किलो पानी डालकर मोटे कपड़ेसे मुख बंदकर जमीनमें ढककर रखे। सात दिन बाद पानी छानकर निकाल ले, शेषको फेंक दे, उसीको 'कांजी' कहते हैं।

१७५- उत्तम तथा अधम अश्वोंके लक्षण, अश्वोंके आगन्तुक और त्रिदोषज रोगोंकी चिकित्सा तथा अश्वशान्ति, गजायुर्वेद, गजचिकित्सा और गजशान्ति

३५०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

बुद्धि-शुद्धकर ओषधि, विविध अभ्यङ्गों एवं उपयोगी चूर्णोंके निर्माणकी विधि, विरेचक द्रव्य तथा औषध-सेवनमें भगवान् विष्णुके स्मरणकी महिमा

श्रीहरिने कहा—[हे हर!] प्याज, जीरा, कूट, अश्वगन्धा, अजवायन, वचा, त्रिकटु और सेंधा नमकसे निर्मित श्रेष्ठ चूर्णको ब्राह्मीरससे भावित करके घृत तथा मधुके साथ मात्र एक सप्ताह प्रयुक्त करनेपर यह मनुष्यकी बुद्धिको अत्यन्त निर्मल बना देता है।

सरसों, वचा, हींग, करंज, देवदारु, मंजीठ, त्रिफला, सोंठ, शिरीष, हल्दी, दारुहल्दी, प्रियंगु, नीम और त्रिकटुको गोमूत्रमें घिसकर नस्य, आलेपन तथा उबटनके रूपमें प्रयुक्त करना हितकारी होता है। यह अपस्मार, विषोन्माद, शोथ तथा ज्वरका विनाशक है। इसके सेवनसे भूत-प्रेतादि-जन्य तथा राजद्वारीय भय विनष्ट हो जाता है।

नीम, कूट, हल्दी, दारुहल्दी, सहिजन, सरसोंका तेल, देवदारु, परवल और धनियाको मट्ठेमें घिसकर उबटन बना लेना चाहिये। तदनन्तर शरीरमें तेल लगाकर इस उबटनका प्रयोग करे तो निश्चित ही पामा, कुष्ठ, खुजली ठीक हो जाती है।

सामुद्र लवण, समुद्रफेन, यवक्षार राजिका (गौरसर्षप), नमक, विडंग, कटुकी, लौहचूर्ण, निशोथ और सूरन—इन्हें समान भागमें लेकर दही, गोमूत्र तथा दूधके साथ मन्द-मन्द आँचपर पका करके जलसे पान करना चाहिये। यह चूर्ण अग्नि और बलवर्धक है। पुराना अजीर्ण रोग होनेपर इस चूर्णका सेवन जटामांसी आदिसे युक्त घृतके साथ करना चाहिये। यह इस रोगकी उत्तम ओषधि है। यह चूर्ण नाभिशूल, मूत्रशूल, गुल्म और प्लीहाजन्य जो भी शूल हैं, उन सभी शूलोंको विनष्ट करनेवाला है। यह जठराग्निको उद्दीप्त कर देता है। परिणाम नामक शूलमें तो यह परम हितकारी है।

हरीतकी, आँवला, द्राक्षा, पिप्पली, कण्टकारी, काकड़ासिंगी, पुनर्नवा और सोंठके चूर्णको खानेसे कास रोग विनष्ट हो जाता है।

समान भागमें हरीतकी, आँवला, द्राक्षा, पाढ़ा, बहेड़ा तथा शर्कराका चूर्ण खानेसे ज्वर रोग दूर हो जाता है। त्रिफला, बेर, द्राक्षा और पिप्पलीका चूर्ण विरेचक होता है। हरीतकी, गरम जल और नमकका सेवन करनेसे भी विरेचन होता है।

**श्रीहरि बोले—**हे उमापते! मेरे द्वारा कही गयी ये जितनी भी ओषधियाँ हैं, वे समस्त रोगोंको वैसे ही नष्ट कर देती हैं, जैसे इन्द्रका वज्र वृक्षको नष्ट कर देता है। भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए ओषधिका सेवन करनेसे रोग नष्ट हो जाता है। उनका ध्यान, पूजन और स्तवन करते हुए ओषधिसेवन करना निश्चित ही लाभदायक होता है। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।

(अध्याय १९३)


व्याधिहर वैष्णव कवच

**श्रीहरिने कहा—**हे रुद्र! अब मैं समस्त व्याधियोंके विनाशक, कल्याणकारी उस वैष्णव कवचको बताऊँगा, जिसके द्वारा प्राचीन कालमें दैत्योंको विनष्ट करते हुए भगवान् शिवकी रक्षा हुई थी।

अजन्मा, नित्य, अनामय, ईशान, सर्वेश्वर,

काण्ड ]
व्याधिहर वैष्णव कवच
३५१


सर्वव्यापी, जनार्दन, देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुको प्रणाम करके मैं रक्षाके निमित्त अमोघ अप्रतिम वैष्णव कवचको धारण करता हूँ। जो सभी दुःखोंका निवारण करनेवाला और सर्वस्व है, वह कवच इस प्रकार है* —

भगवान् विष्णु मेरी आगेसे रक्षा करें। कृष्ण मेरी पीछेसे रक्षा करें। हरि मेरे सिरकी रक्षा करें। जनार्दन हृदयकी रक्षा करें। मेरे मनकी रक्षा हृषीकेश और जिह्वाकी रक्षा केशव करें। वासुदेव दोनों नेत्रोंकी तथा संकर्षण (बलराम) दोनों कानोंकी रक्षा करें। प्रद्युम्न मेरे नाककी, अनिरुद्ध शरीरके चर्मभागकी रक्षा करें। भगवान्‌की वनमाला मेरे कण्ठप्रदेशके नीचे अन्तःकरणतक और उनका श्रीवत्स मेरे अधोभागकी रक्षा करे। दैत्योंका निवारण करनेवाला चक्र मेरे वामपार्श्वकी रक्षा करे। समस्त असुरोंका निवारण करनेवाली गदा मेरे दक्षिण पार्श्वकी रक्षा करे। मेरे उदरभागकी रक्षा मुसल और पृष्ठभागकी रक्षा लाङ्गल (हल) करे। मेरे ऊर्ध्वभागकी रक्षा शार्ङ्ग नामक धनुष तथा मेरे दोनों जंघा-प्रदेशोंकी रक्षा नन्दक नामक तलवार करे। मेरे पार्ष्णिभागकी रक्षा शंख और दोनों पैरोंकी रक्षा पद्म करे। गरुड सदैव मेरे सभी कार्योंके अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये रक्षा करते रहें। भगवान् वराह जलमें, भगवान् वामन विषम परिस्थितिमें, भगवान् नरसिंह वनमें और भगवान् केशव सब ओरसे मेरी रक्षा करते रहें।

हिरण्यगर्भभगवान् मुझे हिरण्य अर्थात् स्वर्णकी राशि प्रदान करें। सांख्यदर्शनके आचार्य भगवान् कपिल मुनि मेरे शरीरमें स्थित सभी प्रकारके धातुओंमें समानता बनाये रखें। श्वेतद्वीपमें निवास करनेवाले भगवान् अजन्मा विष्णु मुझको भी श्वेतद्वीपमें ले चलें। मधुकैटभका मर्दन करनेवाले विष्णु मेरे सभी शत्रुओंका विनाश करें। मेरे शरीरमें विद्यमान समस्त पापोंको खींच-खींचकर सदैव


* विष्णुर्मामग्रतः पातु कृष्णो रक्षतु पृष्ठतः। हरिर्मे रक्षतु शिरो हृदयं च जनार्दनः॥
मनो मम हृषीकेशो जिह्वां रक्षतु केशवः। पातु नेत्रे वासुदेवः श्रोत्रे सङ्कर्षणो विभुः॥
प्रद्युम्नः पातु मे घ्राणमनिरुद्धस्तु चर्म च। वनमाला गलस्यान्तं श्रीवत्सो रक्षतादधः॥
पार्श्वं रक्षतु मे चक्रं वामं दैत्यनिवारणम्। दक्षिणं तु गदा देवी सर्वसुरनिवारिणी॥
उदरं मुसलं पातु पृष्ठं मे पातु लाङ्गलम्। ऊर्ध्वं रक्षतु मे शार्ङ्गं जङ्घे रक्षतु नन्दकः॥
पार्ष्णी रक्षतु शङ्खश्च पद्मं मे चरणवुभौ। सर्वकार्यार्थसिद्धयर्थं पातु मां गरुडः सदा॥
वराहो रक्षतु जले विषमेषु च वामनः। अटव्यां नरसिंहश्च सर्वतः पातु केशवः॥
हिरण्यगर्भो भगवान् हिरण्यं मे प्रयच्छतु। सांख्याचार्यस्तु कपिलो धातुसाम्यं करोतु मे॥
श्वेतद्वीपनिवासी च श्वेतद्वीपं नयत्वजः। सर्वान् सूदयतां शत्रून् मधुकैटभमर्दनः॥
सदाकर्षतु विष्णुश्च किल्बिषं मम विग्रहात्। हंसो मत्स्यस्तथा कूर्मः पातु मां सर्वतो दिशम्॥
त्रिविक्रमस्तु मे देवः सर्वपापानि कृन्ततु। तथा नारायणो देवो बुद्धिं पालयतां मम॥
शेषो मे निर्मलं ज्ञानं करोत्वज्ञाननाशनम्। वडवामुखो नाशयतां कल्मषं यत्कृतं मया॥
पद्भ्यां ददातु परमं सुखं मूर्ध्नि मम प्रभुः। दत्तात्रेयः प्रकुरुतां सपुत्रपशुबान्धवम्॥
सर्वानरीन् नाशयतु रामः परशुना मम। रक्षोघ्नस्तु दाशरथिः पातु नित्यं महाभुजः॥
शत्रून् हलेन मे हन्याद्रामो यादवन्दनः। प्रलम्बकेशिशाणूरपूतनाकंसनाशनः।
कृष्णस्य यो बालभावः स मे कामान् प्रयच्छतु॥
अन्धकारतमोघोरं पुरुषं कृष्णपिङ्गलम्। पश्यामि भयसंत्रस्तः पाशहस्तमिवान्तकम्॥
ततोऽहं पुण्डरीकाक्षमच्युतं शरणं गतः। धन्योऽहं निर्भयो नित्यं यस्य मे भगवान् हरिः॥
ध्यात्वा नारायणं देवं सर्वोपद्रवनाशनम्। वैष्णवं कवचं बद्ध्वा विचरामि महीतले॥
अप्रधृष्योऽस्मि भूतानां सर्वदेवमयो ह्यहम्। स्मरणाद्देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः॥ (१९४।४—२२)

१७६- स्त्रियोंके विविध रोगोंकी चिकित्सा, बालकोंकी रक्षाके उपाय तथा बलवर्धक औषधियाँ

३५२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

भगवान् विष्णु विनष्ट करते रहें। हंसावतार, मत्स्यावतार तथा कूर्मावतार धारण करनेवाले विष्णु सभी दिशाओंमें मेरी रक्षा करें। भगवान् त्रिविक्रमदेव मेरे समस्त पापोंको काट डालें। भगवान् नारायणदेव मेरी बुद्धिका विकास करें। शेषनारायण मेरे ज्ञानको निर्मल बनायें तथा अज्ञानका विनाश करें। मैंने जो कुछ भी पाप किया है, उस समस्त पापको भगवान् वडवामुख हयग्रीव विनष्ट करें।

भगवान् विष्णु मेरे दोनों पैरोंको और सिरको सुख प्रदान करें। भगवान् दत्तात्रेय मुझे पुत्र और बन्धु-बान्धव तथा पशुओंसे सम्पन्न रखें। भगवान् जामदग्न्य—परशुराम अपने परशुसे मेरे सभी शत्रुओंका विनाश करें। राक्षसोंके निहन्ता दशरथसुत आजानुभुज भगवान् श्रीराम मेरी नित्य रक्षा करें। यादवनन्दन बलराम अपने हलसे मेरे शत्रुओंका विनाश करें। प्रलम्ब, केशी, चाणूर, पूतना तथा कंसका संहार करनेवाला जो बालभाव भगवान् कृष्णका है, वही मेरे समस्त मनोरथोंको पूर्ण करे।

हे देव! मैं अन्धकारके समान तमोगुणसे सम्पन्न, हाथमें पाश धारण करनेवाले यमराजके सदृश काले-पीले वर्णवाले भयंकर पुरुषको देख रहा हूँ, उसके भयसे मैं संत्रस्त हो गया हूँ। हे पुण्डरीकाक्ष भगवान् अच्युत! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आपके इस आश्रयसे मैं धन्य हो उठा हूँ। आपकी शरण ग्रहण करनेसे अब मुझे कोई भय नहीं रह गया है, अतः मैं नित्य निर्भय हो गया हूँ।

समस्त सांसारिक उपद्रवोंको विनष्ट करनेवाले भगवान् नारायणदेवका ध्यान करके वैष्णव कवचसे आबद्ध मैं पृथ्वीतलपर विचरण करता हूँ। इसीके प्रभावसे मैं सभी प्राणियोंके लिये अजेय हो गया हूँ। इतना ही नहीं, सर्वदेवमय भी हो गया हूँ। अपरिमित तेजसे सम्पन्न देवाधिदेव भगवान् विष्णुका स्मरण करनेसे मेरा समस्त मनोरथ नित्य सिद्ध होता रहे।

भगवान् वासुदेवके चक्रमें जो अरे लगे हैं, वे यथाशीघ्र मेरे समस्त पापोंका विनाश करें और मेरी हिंसा करनेवाले शत्रुओंका संहार करें।

राक्षस एवं पिशाचोंसे तथा गहन वन, प्रान्त, विवाद, राजमार्ग, द्यूतक्रीड़ा, लड़ाई, झगड़ा, नदी पार करनेकी स्थिति, आपत्काल, प्राणोंका संकट-काल, अग्निभय, चौरभय, ग्रहबाधा, विद्युत्-उत्पीड़न, सर्पविषका उद्वेग, रोग, विघ्न, संकट आनेपर तथा भयविह्वल होनेपर इसका जप तो करना ही चाहिये, किंतु नित्य इसका जप करना विशेष लाभप्रद है। यह भगवान् विष्णुका मन्त्ररूपी कवच परम श्रेष्ठ तथा सभी पापोंका विनाशक है।
(अध्याय १९४)


सर्वकामप्रदा विद्या

श्रीहरिने कहा— हे शिव! अब मैं 'सर्वकामप्रदा विद्या' का वर्णन करता हूँ, उसे सुनें। इसकी उपासना मात्र सात रात करनेसे ही सभी कामनाएँ सफल हो जाती हैं। सर्वकामप्रदा विद्या इस प्रकार है*—

हे भगवान् वासुदेव! आपका मैं ध्यान करता


* सर्वकामप्रदां विद्यां सप्तरात्रेण तां शृणु। नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय धीमहि॥
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः संकर्षणाय च। नमो विज्ञानमात्राय परमानन्दमूर्तये॥
आत्मारामाय शान्ताय निवृत्तद्वैतदृष्टये। त्वद्रूपाणि च सर्वाणि तस्मात्तुभ्यं नमो नमः॥
हृषीकेशाय महते नमस्तेऽनन्तमूर्तये। यस्मिन्निदं यतश्चैतत् तिष्ठत्यग्रेऽपि जायते॥
मृण्मयीं वहसि क्षोणीं तस्मै ते ब्रह्मणे नमः। यन्न स्पृशन्ति न विदुः मनोबुद्धीन्द्रियासवः।
अन्तर्बहिश्च त्वं चरसि व्योमतुल्यं नमाम्यहम्॥
ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाभूतपतये सकलसत्त्वभाविव्रीडनिकरकमलरेणूपलनिभधर्माख्यविद्यया चरणारविन्दयुगल परमेष्ठिन् नमस्ते। अवाप विद्याधरतां चित्रकेतुश्च विद्यया॥ (१९५। १—६)

१७७- गो एवं अश्व-चिकित्सा

काण्ड ]
विष्णुधर्माख्यविद्या
३५३


हूँ, आपको नमस्कार है। हे प्रद्युम्न! हे अनिरुद्ध! हे संकर्षण! आपको नमस्कार है। हे परमानन्दस्वरूप! आप मात्र अनुभवजन्य हैं, आपको मेरा नमस्कार है। आप आत्माराम एवं शान्तमूर्ति हैं तथा द्वैत-दृष्टिसे परे हैं, आपको मेरा नमस्कार है। यह समस्त चराचर जगत् आपका ही रूप है, आपको बारंबार प्रणाम है। हे अनन्तमूर्ति भगवान् हृषीकेश! आप महत्त्वस्वरूपको नमस्कार है। प्रलयकालमें यह सारा जगत् जिस मूर्तिमें प्रविष्ट होकर स्थित रहता है और पुनः प्रलयकालके पश्चात् सृष्टिके प्रारम्भमें सबसे पहले उत्पन्न भी होता है तथा जो इस मृण्मयी पृथ्वीको धारण करता है, उस ब्रह्मदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। जिस देवको स्पर्श करने और पहचाननेमें न मन-बुद्धि समर्थ हैं, न ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय और प्राण समर्थ हैं तथा आकाशके समान जो देव समस्त चराचर प्राणियोंके अंदर और बाहर विचरण करते हैं, ऐसे व्योमस्वरूप आप (देव)-को मैं नमस्कार करता हूँ। हे पञ्चभूतोंके स्वामी ऐश्वर्यमूर्ति महापुरुष भगवान् वासुदेव! आपको नमस्कार है। हे परमेष्ठिन्! आपसे सकल सत्त्वोंकी उत्पत्ति होती है तथा आपके चरणारविन्दयुगल मानो शील-समूहरूपी कमलोंकी धर्माख्यविद्यारूप रेणूत्पल हैं, आपको नमस्कार है। चित्रकेतुने इस विद्याके द्वारा विद्याधरत्वको प्राप्त किया था। (अध्याय १९५)


विष्णुधर्माख्यविद्या

श्रीहरिने कहा—हे महेश्वर! जिस 'विष्णुधर्म' नामक विद्याका जप करके देवराज इन्द्रने समस्त शत्रुओंपर विजय प्राप्तकर इन्द्रत्व-पद प्राप्त किया था, उस विद्याको कहता हूँ।

इस विद्याके जपसे पूर्व दोनों पैर, दोनों जानु, दोनों जंघा-प्रदेश, उदर, हृदय, वक्षःस्थल, मुख और शिरोभागमें ॐकारादि वर्णोंसे यथाक्रम न्यास करना चाहिये। 'नमो नारायणाय' इस मन्त्रद्वारा विपरीत-क्रमसे भी न्यास करे। तदनन्तर द्वादशाक्षर-मन्त्र ('ॐ नमो भगवते वासुदेवाय')-के आदि वर्ण ॐकारसे करन्यास करे। अन्तिम यकारसे अंगुष्ठ आदि अँगुलियोंकी पर्वसंधियोंमें न्यास करके हृदयमें ॐकारका न्यास करना चाहिये। सम्पूर्ण मन्त्रसे मस्तक-भागमें न्यास करे। मूर्धासे प्रारम्भ करके भ्रुवोंके मध्य-भागमें ॐकार-मन्त्रसे न्यास करके शिखा तथा नेत्रादिमें 'ॐ विष्णवे नमः' इस मन्त्रसे न्यास करना चाहिये। अनन्तर अन्तरात्मामें उन परम शक्तियोंसे सम्पन्न परमात्मा शेषनारायणका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये—

मम रक्षां हरिः कुर्यान्मत्स्यमूर्तिर्जलेऽवतु ॥
त्रिविक्रमस्तथाकाशे स्थले रक्षतु वामनः।
अटव्यां नरसिंहस्तु रामो रक्षतु पर्वते ॥
भूमौ रक्षतु वराहो व्योम्नि नारायणोऽवतु।
कर्मबन्धाच्च कपिलो दत्तो रोगाच्च रक्षतु ॥
हयग्रीवो देवताभ्यः कुमारो मकरध्वजात्।
नारदोऽन्यर्चनार्नादेवः कूर्मो वै नैर्ऋते सदा ॥
धन्वन्तरिश्चापथ्याच्च नागः क्रोधवशात् किल।
यज्ञो रोगात् समस्ताच्च व्यासोऽज्ञानाच्च रक्षतु ॥
बुद्धः पाषण्डसंघातात् कल्की रक्षतु कल्मषात्।
पायान्मध्यन्दिने विष्णुः प्रातर्नारायणोऽवतु ॥
मधुहा चापराह्ने च सायं रक्षतु माधवः।
हृषीकेशः प्रदोषेऽव्यात् प्रत्यूषेऽव्याज्जनार्दनः ॥
श्रीधरोऽव्यादर्थरात्रे पद्मनाभो निशीथके।
चक्रकौमोदकीबाणा घ्नन्तु शत्रूंश्च राक्षसान् ॥
शंखः पद्मं च शत्रुभ्यः शार्ङ्गं वै गरुडस्तथा।
बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान् पान्तु पार्श्वविभूषणः ॥
शेषः सर्पस्वरूपश्च सदा सर्वत्र पातु माम्।
विदिक्षु दिक्षु च सदा नरसिंहश्च रक्षतु ॥
एतद्धारयमाणश्च यं यं पश्यति चक्षुषा।
स वशी स्याद्विपाप्मा च रोगमुक्तो दिवं व्रजेत् ॥
(१९६।६–१६)

३५४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

भगवान् हरि मेरी रक्षा करें। मत्स्यमूर्ति भगवान् जलमें मेरी रक्षा करें। भगवान् त्रिविक्रम आकाशमें और भगवान् वामन स्थलमें मेरी रक्षा करें। वन-प्रान्तमें भगवान् नरसिंह, पर्वतभागमें जामदग्न्य-परशुराम मेरी रक्षा करें। भूमिपर भगवान् वराह, व्योममें भगवान् नारायण मेरी रक्षा करें। कर्मोंके बन्धनसे भगवान् कपिल तथा रोगोंके प्रकोपसे भगवान् दत्तात्रेय मेरी रक्षा करें। भगवान् हयग्रीव देवताओंसे, कुमार कामदेवसे मेरी रक्षा करें। भगवान् नारद अन्य देवोंकी उपासनासे और भगवान् कूर्मदेव नैर्ऋतमें सदैव मेरी रक्षा करें। भगवान् धन्वन्तरि अपथ्य-सेवनसे, भगवान् शेषनाग क्रोधसे, भगवान् यज्ञदेव समस्त रोग-समुदायसे और भगवान् व्यास अज्ञानसे मेरी रक्षा करें। भगवान् बुद्ध पाखण्ड-समूहसे एवं भगवान् कल्किदेव पापसे मेरी रक्षा करें। भगवान् विष्णु मध्याह्नकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् नारायण प्रातःकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् मधुसूदन अपराह्नकाल और भगवान् माधव सायंकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् हृषीकेश प्रदोषकालमें तथा भगवान् जनार्दन प्रत्यूषकालमें मेरी रक्षा करें। भगवान् श्रीधर अर्धरात्रि तथा भगवान् पद्मनाभ निशीथकालमें मेरी रक्षा करें। हे भगवन्! आपका सुदर्शन, कौमोदकी गदा और बाण मेरे शत्रुओं तथा राक्षसादिका संहार करे। आपका शंख, पद्म, शार्ङ्ग धनुष तथा वाहन गरुड भी शत्रुओंसे मेरी रक्षा करें। भगवान् वासुदेवके संनिकट स्थित अलंकारस्वरूप सभी पार्षद मेरे बुद्धि, इन्द्रिय, मन और प्राणोंकी रक्षा करें। सर्पका रूप धारण करनेवाले भगवान् शेषनारायण सदैव सर्वत्र मेरी रक्षा करें। भगवान् नरसिंह सदैव सभी दिशाओं और विदिशाओंमें मेरी रक्षा करें।

इस प्रकार जो व्यक्ति इस विष्णुधर्माख्यविद्याको धारण करता है, वह अपने नेत्रोंसे जिस-जिसको देखता है वह उसीके वशमें हो जाता है और सभी पापोंसे मुक्त तथा रोगरहित होकर वह स्वर्गलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १९६)


विषहरी गारुडी विद्या तथा भगवान् गरुडके विराट् स्वरूपका वर्णन

धन्वन्तरिने कहा—अब मैं गरुडके द्वारा कही गयी गारुडी विद्याका वर्णन करता हूँ। इस विद्याको सुमित्रने कश्यपमुनिसे कहा था। यह विद्या सभी प्रकारके विषोंका अपहारक है।

पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच तत्त्व हैं। इन पाँचों तत्त्वोंके पृथक्-पृथक् मण्डल होते हैं तथा उन-उन मण्डलोंके अधिष्ठाता ये पृथ्वी आदि देवता ही माने गये हैं। अन्य देवता भी इन मण्डलोंमें स्थित रहते हैं। इनके पृथक्-पृथक् मन्त्र भी हैं। इन मण्डलाधिपति देवताओंके मन्त्रोंका यथाविधि न्यासपूर्वक जप करनेसे अभीष्ट-सिद्धि होती है और विष-बाधा दूर हो जाती है।

साधकको चाहिये कि वह पृथक्-पृथक् पाँचों मण्डलोंके स्वरूप तथा उनके अधिष्ठातृ देवोंका ध्यान करे। मण्डलोंका स्वरूप इस प्रकार है—पृथ्वीमण्डल चौकोर, फैला हुआ, चारों ओर मुखवाला तथा पीले वर्णका कहा गया है तथा यह मण्डल इन्द्रदेवतापरक है। वरुणमण्डल (जलमण्डल) पद्माकार तथा अर्धचन्द्रयुक्त है। इन्द्रनीलमणिके समान कान्तिवाले, सौम्यस्वरूप, स्वस्तिकसे युक्त, त्रिकोण आकारवाले अग्निमण्डलमें ज्वालामालाओंसे समन्वित अग्निका ध्यान करना चाहिये। विभिन्न

काण्ड ] विषहरी गारुडी विद्या तथा भगवान् गरुडके विराट् स्वरूपका वर्णन ३५५


ओषधियोंको पीसकर तैयार किये गये सुरमेके समान कान्तिवाले वृत्ताकार बिन्दुयुक्त वायुमण्डलमें वायुका ध्यान करे। आकाशमण्डलका चिन्तन क्षीरसागरमें उठती हुई लहरोंके समान आकारवाले, शुद्ध स्फटिकके सदृश आभावाले तथा सम्पूर्ण संसारको अपनी अमृतमयी रश्मियोंसे आप्लावित करनेवालेके रूपमें करे।

जो अष्ट महानाग कहे गये हैं, उनमेंसे वासुकि और शंखपाल नामक नाग पृथ्वीमण्डलमें स्थित रहते हैं। कर्कोटक तथा पद्मनाभ नामक दो नागोंका वास वरुणमण्डल (जलमण्डल)-में है। कुलिक और तक्षक नामक नाग अग्निमण्डलमें निवास करते हैं। महापद्म तथा पद्म नामक नाग वायुमण्डलमें रहते हैं। साधकको इन नागोंका ध्यान करके पृथ्वी आदि पञ्चभूत-तत्त्वोंका न्यास करना चाहिये। अंगुष्ठसे लेकर कनिष्ठापर्यन्त अंगुलियोंमें अनुलोम और विलोम-रीतिसे न्यास करना चाहिये। अंगुलियोंकी पर्वसंधियोंमें जया तथा विजया नामक दो शक्तियोंका न्यास करना चाहिये।

पुनः अपने शरीरमें शिवषडङ्गन्यास, पञ्चतत्त्वन्यास तथा व्यापक-न्यास करे। देवताके नामके आदिमें 'प्रणव' तथा अन्तमें 'नमः' प्रयुक्त करे, यह विधि स्थापन एवं पूजनादिक-मन्त्रके रूपमें बतलायी गयी है। देवताके नामके आद्य अक्षर भी मन्त्ररूप होते हैं। आठों नागोंके जो मन्त्र हैं, वे उनके संनिधानको प्राप्त करानेवाले हैं। पञ्चतत्त्वोंके साथ आदिमें 'ॐ' और अन्तमें 'स्वाहा' लगानेसे मन्त्र बन जाते हैं। ऐसा करनेसे ये मन्त्र साक्षात् गरुडके समान साधकके सभी अभीष्ट कर्मोंको सिद्ध करनेवाले हो जाते हैं।

स्वर-वर्णोंसे करन्यास करके पुनः उन्हींसे शरीरके अन्य अङ्गोंमें भी न्यास करना चाहिये। तदनन्तर आत्मशुद्धिकारक उद्दीप्त प्राणशक्तिका चिन्तन करना चाहिये। इसके बाद साधकको अमृतकी वर्षा करनेवाले बीजका ध्यान करना चाहिये। इस प्रकार आप्यायन करके साधकको अपने मस्तिष्कमें आत्मतत्त्वका चिन्तन करना चाहिये। तत्पश्चात् स्वर्णके समान कान्तिवाली, समस्त लोकोंमें फैली हुई तथा लोकपालोंसे समन्वित पृथ्वीका दोनों पैरोंमें न्यास करना चाहिये।

बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि वह भगवती पृथ्वीदेवीका अपने सम्पूर्ण देहमें न्यास करे। इसी प्रकार अपने देहके अङ्गोंमें शेष चार मण्डलों तथा उनमें स्थित देवोंका न्यास करे। इस प्रकार पञ्चभूत-तत्त्वोंका न्यास करके यथाक्रम आठ नागोंका न्यास-ध्यान करना चाहिये।

इसके बाद स्थावर और जंगम प्राणियोंके विष-दोषका विनाश करनेके लिये पक्षिराज गरुडका ध्यान इस प्रकार करना चाहिये—गरुडदेव अपने दोनों पैरों, पंखों तथा चोंचद्वारा पकड़े हुए कृष्णवर्णवाले नागोंसे विभूषित हैं। ग्रह, भूत, पिशाच, डाकिनी, यक्ष, राक्षसका उपद्रव होनेपर विषधर नागोंसे घिरे हुए भगवान् शिवका अपने शरीरमें न्यास करना चाहिये।

यथाविधि ध्यान-पूजन आदि कृत्योंको करके साधकको सभी कर्मोंमें सिद्धि प्राप्त करनेके लिये अभीष्ट रूप धारण करनेवाले, मनपर विजय प्राप्त करनेमें समर्थ, सम्पूर्ण संसारको अपने रसमें आप्लावित करनेवाले एवं सृष्टि तथा संहारके कारण, अपने प्रकाशपुञ्जसे उद्दीप्त और समस्त ब्रह्माण्डमें व्याप्त, दस भुजाओं और चार मुखोंवाले, पिङ्गलवर्णके नेत्रवाले, हाथमें शूल धारण करनेवाले, भयंकर दाँतवाले, अत्यन्त उग्र, त्रिनेत्र तथा चन्द्रचूडसे विभूषित और गरुडस्वरूप भैरवका चिन्तन करना चाहिये।

३५६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

नागोंका विनाश करनेके लिये उन परमतत्त्वने महाभयंकर गरुडका रूप धारण किया है। विराट्-रूप भगवान् गरुडके दोनों पैर पाताललोकमें स्थित हैं और उनके सभी पंख समस्त दिशाओंमें फैले हुए हैं। सातों स्वर्ग उनके वक्षःस्थलपर विद्यमान हैं। ब्रह्माण्ड उनके कण्ठका आश्रय लेकर अवस्थित है, पूर्वसे लेकर ईशानपर्यन्त आठों दिशाओंको उनका शिरोभाग समझना चाहिये। अपनी तीनों शक्तियोंसे समन्वित सदाशिव इनके शिखामूलमें स्थित हैं। ये तार्क्ष्य (गरुड) साक्षात् परात्पर शिव और समस्त भुवनोंके नायक हैं। त्रिनेत्रधारी, उग्र स्वरूपवाले, नागोंके विषोंके विनाशक, सबको ग्रास बनानेवाले, भीषण मुखवाले, गरुडमन्त्रके मूर्तरूप, कालाग्निके सदृश देदीप्यमान गरुडदेवका अपने समस्त अभीष्ट कर्मोंकी सिद्धिके लिये चिन्तन करना चाहिये। जो मनुष्य न्यास-ध्यानकी विधि सम्पन्न करके इन देवकी पूजा करता है, उसका सब कुछ सिद्ध हो जाता है तथा वह स्वयं गरुडदेवकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। भूत, प्रेत, यक्ष, नाग, गन्धर्व तथा राक्षस आदि तो उसके दर्शनमात्रसे ही भाग जाते हैं। चौथिया आदि ज्वर भी विनष्ट हो जाते हैं। (अध्याय १९७)


त्रिपुराभैरवी तथा ज्वालामुखी आदि देवियोंके पूजनकी विधि

भैरवने कहा—इसके बाद मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली त्रिपुरादेवीकी पूजा आदिका वर्णन करूँगा। उसे आप सुनें।

देवीका यथाविधि 'ॐ ह्रीं आगच्छ देवि'—इस मन्त्रसे आवाहन करके 'ऐं ह्रीं ह्रीं'—इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए रेखा करके 'ॐ ह्रीं क्लेदिनी भं नमः'—इस मन्त्रसे उन्हें प्रणाम करे तथा उनकी शक्तियोंके साथ महाप्रेतासनपर विराजमान रहनेवाली देवी त्रिपुराभैरवीका पूजन करे। 'ऐं ह्रीं त्रिपुरायै नमः'—इस मन्त्रसे उन्हें नमस्कार करे। देवीके पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व आदि मुखोंको भी नमस्कार करे। 'ॐ ह्रीं पाशाय नमः', 'क्रों अङ्कुशाय नमः', 'ऐं कपालाय नमः' इत्यादि मन्त्रोंसे उनके पाश, अंकुश, कपाल आदि आयुधोंको नमस्कार करे। त्रिपुराभैरवीदेवीकी पूजामें आठ भैरवों तथा उनके साथ मातृकाओंकी भी पूजा करनी चाहिये। असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव, चण्डभैरव, क्रोधभैरव, उन्मत्तभैरव, कपालिभैरव, भीषणभैरव तथा संहारभैरव—ये आठ भैरव हैं। ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा तथा अपराजिता (दुर्गा)—ये आठ मातृकाएँ हैं।

पूजकको चाहिये कि वह 'ॐ कामरूपाय असिताङ्गाय भैरवाय नमो ब्रह्माण्यै'—इस मन्त्रसे पूर्व दिशामें कामरूप असिताङ्गभैरव और देवी ब्रह्माणीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। उसके बाद 'ॐ स्कन्दाय नमः, रुरुभैरवाय नमः, माहेश्वर्यै नमः' मन्त्रोंद्वारा दक्षिण दिशामें स्कन्ददेव, रुरुभैरव और देवी माहेश्वरीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। 'ॐ चण्डाय नमः, कौमार्यै नमः' इन मन्त्रोंसे पश्चिम दिशामें चण्डभैरव तथा देवी कौमारीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। तत्पश्चात् 'ॐ उल्काय नमः, ॐ क्रोधाय नमः, ॐ वैष्णव्यै नमः'—इन मन्त्रोंसे उत्तर दिशामें उल्कादेव, क्रोधभैरव और देवी वैष्णवीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। 'ॐ अघोराय नमः, ॐ उन्मत्तभैरवाय नमः, ॐ वाराह्यै नमः'—इन मन्त्रोंसे अग्निकोणमें अघोरदेव, उन्मत्तभैरव और देवी वाराहीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। तदनन्तर 'ॐ साराय कपालिने भैरवाय नमः,

काण्ड ] वायुजय-निरूपण ३५७

ॐ माहेन्द्र्यै नमः'—इन मन्त्रोंद्वारा नैर्ऋत्यकोणमें समस्त संसारके सारभूत स्वरूप कपालिभैरव और देवी माहेन्द्रीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। उसके बाद साधकको 'ॐ जालन्धराय नमः, ॐ भीषणाय भैरवाय नमः, ॐ चामुण्डायै नमः'—इन मन्त्रोंसे वायुकोणमें जालन्धर, भीषणभैरव और देवी चामुण्डाका आवाहनपूर्वक पूजन करना चाहिये। तदनन्तर 'ॐ वटुकाय नमः, ॐ संहाराय नमः, ॐ चण्डिकायै नमः'—इन मन्त्रोंसे ईशानकोणमें वटुकदेव, संहारभैरव तथा देवी चण्डिकाका आवाहन करके उनकी पूजा करनी चाहिये।

इसके बाद साधकको रतिदेवी, प्रीतिदेवी, कामदेव और उनके पञ्चबाणोंकी पूजा भी करनी चाहिये। इस प्रकार सदैव ध्यान, पूजा, जप तथा होम करनेसे देवी सिद्ध हो जाती हैं। नित्यक्लिन्ना, त्रिपुरभैरवी और ज्वालामुखी नामक देवियाँ समस्त व्याधियोंकी विनाशिका हैं। अब मैं ज्वालामुखीदेवीके पूजनका क्रम कहूँगा। पद्मके मध्य देवी ज्वालामुखीकी पूजा करनी चाहिये तथा पद्मके बाह्य दलोंमें क्रमशः—नित्या, अरुणा, मदनातुरा, महामोहा, प्रकृति, महेन्द्राणी, कलनाकर्षिणी, भारती, ब्रह्माणी, माहेशी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा, अपराजिता, विजया, अजिता, मोहिनी, त्वरिता, स्तम्भिनी, जृम्भिणी तथा देवी कालिकाकी पूजा करनी चाहिये। देवी ज्वालामुखीकी यथाविधि पूजा करनेसे विष आदि दोष दूर हो जाते हैं।

भैरवने पुनः कहा—चूडामणि-यन्त्रके द्वारा प्रश्नकर्ताको शुभ एवं अशुभ समयका परिज्ञान हो जाता है। (अध्याय १९८-१९९)


वायुजय-निरूपण

भैरवने कहा—हे देवि ! अब मैं जय-पराजय तथा विदेश-यात्राके शुभाशुभ मुहूर्तका संकेत देनेवाले 'वायुजय' नामक विद्याका वर्णन करूँगा।

वायु, अग्नि, जल और इन्द्रको माङ्गलिक चतुष्टयके नामसे जाना जाता है। प्रायः प्राणीके शरीरमें वायु अधिकतर वाम और दक्षिणभागकी नाड़ियोंसे प्रवाहित होता है। अग्नि शरीरमें ऊर्ध्वगामी होता है और जल अधोगामी। महेन्द्र तत्त्व शरीरके मध्यभागमें स्थित रहता है, किंतु शुक्लपक्षमें वह वामभाग तथा कृष्णपक्षमें दक्षिण-भागकी नाड़ियोंसे होकर शरीरमें प्रवाहित होता है। प्रत्येक पक्षका प्रारम्भिक तीन-तीन दिन इसका उदयकाल है। अर्थात् शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे लेकर तृतीया तिथितक जो वायु नासिकाके वाम छिद्रसे होकर प्रवहमान रहता है और कृष्णपक्षकी प्रतिपदा तिथिसे लेकर तृतीया तिथिपर्यन्त जो वायु नासिकाके दक्षिण छिद्रसे होकर प्रवहमान रहता है, वह उदयकालका वायु माना जाता है। यदि इस नियमके अनुसार वायुका प्रवाह होता है तो अच्छा होता है, किंतु विपरीत होनेपर पतन होता है। यदि प्राणीके शरीरमें वायु सूर्यमार्गमें उदित होकर चन्द्रमार्गमें अस्त हो तो गुणोंमें वृद्धि होती है। इसके विपरीत होनेपर शरीरमें विघ्न होता है।

हे वरानने ! दिन और रातमें सोलह संक्रान्तियाँ मानी गयी हैं। आधे-आधे प्रहरके बाद एक-एक संक्रान्तिका परिमाण है। इसी गतिसे शरीरमें प्रवहमान वायुका संक्रमण-काल आता है। जब वायु शरीरके अन्तर्गत आधे प्रहरके बाद ही संक्रान्त होने लगता है, अर्थात् आधे-आधे प्रहरमें वायुका भ्रमण होता है, तो स्वास्थ्यकी हानि अवश्यम्भावी है। भोजन और मैथुनकालमें दाहिने नासापुटसे वायु भ्रमण करे तो हितकर होता है। इस स्थितिमें हाथमें तलवार लेकर योद्धा युद्धमें यथेच्छ शत्रुओंको जीत सकता है। समस्त कार्योंमें यदि वाम नासापुटसे