गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
प्रकाशक गोविन्द भवन कार्यालय गीताप्रेस, गोरखपुर सं० १९९१ से २०२७ तक १,४१,२५० सं० २०३१ तेरहवाँ संस्करण १५,००० सं० २०४१ चौदहवाँ संस्करण २५,००० कुल १,८१,२५० एक लाख इक्यासी हजार दो सौ पचास मूल्य—पाँच रुपया मिलने का पता—गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस (गोरखपुर) मुद्रक—भार्गव प्रेस, अमीनाबाद लखनऊ।
श्रीराम श्रीरघुनाथ-कथामृत-पोसित काव्यकला रति-सी छबि छाई। ताहि अनेकन भूषन भूषि बरी तुलसी अति ही हरसाई॥ जोवत सो जुग-जोरी खरी हुलसी हुलसी अति मोद उछाई। सो हुलसीके हियेको हुलास हरै हमरे जियकी जड़ताई॥
निवेदन गीतावलीके द्वितीय संस्करणमें सम्माननीय प्रो० श्री- विश्वनाथप्रसादजी मिश्र एम्० ए०, साहित्यरत्नने अनुवादमें कई जगह संशोधन करनेकी कृपा की थी । तबसे इसके ग्यारह संस्करण और हो गये और अब यह चौदहवाँ संस्करण पाठकोंके हाथमें है । आशा है कि प्रेमी पाठक इसे भी पहलेकी भाँति ही अपनानेकी कृपा करेंगे । प्रकाशक
· श्रीहरिः दो शब्द ───x─── कविचक्रचूडामणि गोसाईं श्रीतुलसीदासजीके ग्रन्थोंमें कलेवरकी दृष्टिके रामचरितमानसके पश्चात् दूसरा नंबर गीतावली- का ही है । इसमें सम्पूर्ण रामचरित पदोंमें वर्णन किया गया है । परन्तु रामायणकी अपेक्षा इसकी वर्णनशैली कुछ दूसरे ही ढंगकी है । रामायण महाकाव्य है, उसमें सभी रसोंका साङ्गोपाङ्ग दिग्दर्शन कराया गया है; वहाँ कविहृदयके सभी भावोंका गम्भीर विश्लेषण देखनेमें आता है । परन्तु गीतावलीमें आरम्भसे लेकर अन्तपर्यन्त कविका एक ही भाव दिखायी देता है; वह कथानकके क्रमकी अपेक्षा न करके अपने इष्टदेवकी मधुर झाँकी करानेमें ही संलग्न है । गीतावलीमें उसका ललित भाव ही व्यक्त हुआ है । जहाँ-जहाँ भगवान्के रूपमाधुर्य अथवा करुणरसके आस्वादनका अवसर मिला है, वहाँ-वहाँ तो वे मध्याह्नकालीन सूर्यकी तरह मन्दगतिसे चलते हैं, इसके विपरीत जहां अन्य विषय है उसकी ओर दृष्टिपाततक नहीं करते । यहां तक कि अन्य युद्धोंकी तो बात ही क्या, रावणवधका भी उन्होंने जिक्र नहीं किया; परशुरामजी- के विषयमें 'भंज्यौ भृगुपति-गरब सहित, तिहुँ लोक बिमोह कयो ॥' [बाल० ६०] केवल इतना ही कहा है, किष्किन्धाकाण्ड केवल दो पदोंमें ही समाप्त हो जाता है, लंकादहनका भी हनुमान्जीने सीताजी से विदा होते समय केवल जिक्र ही किया है, तथा लंकाकाण्ड, जो अन्य रामायणोंमें बहुत विस्तृत मिलता है, यहाँ अरण्य और किष्किन्धाको छोड़कर और सबसे छोटा है । इसके विपरीत भगवान्की बाललीला, भरतमिलाप, जटायु- उद्धार, विभीषणशरणांगति, सीताजीकी वियोगव्यथा, राम-
[ ६ ] हिंडोला तथा होली आदि सुललित और करुण भावोंका बड़ा ही विशद और मर्मस्पर्शी वर्णन मिलता है। बालकाण्डके आरम्भमें भगवान्के बालरूपका, अन्तमें जनकपुरकी स्त्रियोंद्वारा उनकी किशोरमूर्तिका, अयोध्याकाण्डमें ग्रामीण स्त्रियोंद्वारा प्रभुके तापसवेषका तथा उत्तरकाण्डमें उनके राजवेषका बड़ा ही अनूठा नख-शिख कहा गया है। परन्तु इतना होनेपर भी गोसाईंजीने अपना मर्यादा-रक्षणका स्वभाव नहीं छोड़ा। छोड़ते कैसे ? यह कोई कवि-कल्पनामात्र तो है नहीं; यह तो उनका प्रत्यक्ष अनुभव है। उनके प्रत्येक पदमें उनके परम पुनीत दास्यभावकी छाप लगी हुई है। इस प्रकार यह ग्रन्थरत्न भक्तिरसज्ञ और साहित्यमर्मज्ञ दोनोंहीका धन है। इन पंक्तियोंके लेखकमें तो इनमेंसे किसी भी सम्पत्तिका लेशमात्र भी नहीं है। श्रद्धेय मित्रवर पं० श्रीलालजी याज्ञिकके मुखसे भरतमिलाप और जटायु-उद्धार-सम्बन्धी कुछ पद सुनकर इसके हृदयमें इस ग्रन्थके अनुवादका मूक संकल्प हो गया और यह उसका सुयोग देखने लगा। भगवान्की असीम कृपासे आज वह संकल्प पूरा हो गया। यह उन लीलामयकी ही लीला है कि मुझ-जैसे विद्या-भक्ति-विवेकहीन व्यक्ति को, इच्छा न रहते हुए भी, इस धंधेमें जोड़ रखा है। जो हो, 'राजी हैं हम उसीमें जिसमें तेरी रजा है।' अबतक इस ग्रन्थके कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। सरस्वतीभण्डार पटनाद्वारा प्रकाशित पाण्डेय श्रीरामावतार शर्माकी प्रति बी० ए० परीक्षाकी पाठ्यपुस्तकोंमें स्वीकृत है। उसके अनुसार इसके बालकाण्डमें १०८, अयोध्याकाण्डमें ८६, अरण्यकाण्डमें १७, किष्किन्धाकाण्डमें २, सुन्दरकाण्डमें ५१, लंकाकाण्डमें २६ और उत्तरकाण्डमें ३६-इस प्रकार कुल ३२८
[ ७ ] पद हैं। यही क्रम नागरीप्रचारिणी सभाद्वारा प्रकाशित तुलसी- ग्रन्थावलीकी प्रतिमें तथा श्रीरामनारायण बुकसेलरद्वारा प्रकाशित श्रीवामदेवजीकी टीकामें भी है। परन्तु नवलकिशोरप्रेस, लखनऊकी श्रीवैद्यनाथजीकी टीकावाली और खड्गविलासप्रेसकी महात्मा हरिहरप्रसादकृत टीकावाली प्रतियोंके बालकाण्डकी पदसंख्या इससे भिन्न है। पद तो सभी प्रतियोंमें एक-से ही हैं, अन्तर केवल उनकी गणनामें है। प्रस्तुत पुस्तकके बालकाण्डमें जो १२ से लेकर १५ वें तक चार पद हैं, उन्हें पहली तीन प्रतियोंमें एक माना है तथा ३७वें पदको दो माना है। हमें उनका मत ठीक नहीं मालूम होता, क्योंकि पुस्तकके सभी पदोंमें यह क्रम रहा है कि प्रत्येक पदके अन्तिम चरणमें गोसाईंजीका नाम रहता है। इस न्यायसे खड्ग- विलास और नवलकिशोर-प्रेसोंकी प्रतियोंका ही पद-विभाग उचित जान पड़ता है और हमने भी उसे ही स्वीकृत किया है। इसलिये इस संस्करणके बालकाण्डकी पदसंख्या ११० है और समस्त पद ३३० हैं। प्रस्तुत पुस्तकके पाठ-संशोधन और अनुवादमें उपर्युक्त सब प्रतियोंसे सहायता ली गयी है तथा इनके सिवा पूज्यपाद श्रीजय- रामदासजी दीन (रामायणी) और श्रद्धेय गोस्वामी श्रीचिम्मन- लालजी एम्० ए० शास्त्रीने भी इस अनुवादकी आद्योपान्त आवृत्ति करके मूल पाठ और अनुवादमें जहाँ-तहाँ संशोधन करनेकी कृपा की है। इसके लिये मैं उपर्युक्त सभी महानुभावोंका अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। आशा है, इन सबकी इस प्रसादीके द्वारा पाठकोंका कुछ मनोरञ्जन हो सकेगा। विनीत :- मुनिलाल
श्रीहरिः विषय-सूची विषय पृष्ठ बालकाण्ड १-बधाई .... १७ २-नामकरण .... ३४ ३-दुलार .... ३९ ४-विश्वामित्रजीका आगमन. .... ६१ ५-अहल्योद्धार .... १०२ ६-जनकपुर-प्रवेश .... १०५ ७-पुष्पवाटिकामें .... १२० ८-रंगभूमिमें .... १२३ ९-विवाहकी तैयारी .... १५९ १०-अयोध्या आगमन ... १७२ अयोध्याकाण्ड ११-राज्याभिषेककी तैयारी १७४ १२-वनके लिये विदाई .... १७५ १३-वनके मार्गमें .... १८४ १४-चित्रकूट-वर्णन .... २१७ १५-कौसल्याकी विरह-वेदना .... २३३ १६-महाराजदशरथका देह-त्याग २३७ १७-भरतजी अयोध्यामें .... २४१ १८-भरतजीका चित्रकूटको प्रस्थान .... २४४ विषय पृष्ठ १९-राम-भरत-सम्मेलन .... २४६ २०-रामविधुरा अयोध्या .... २५८ अरण्यकाण्ड २१-भगवान्का वन-विहार .... २६७ २२-मारीच-वध .... २६८ २३-सीता-हरण .... २७३ २४-जटायु-वध .... २७४ २५-रामकी वियोगव्यथा .... २७५ २६-जटायुसे भेंट .... २७६ २७-शबरीसे भेंट .... २८३ किष्किन्धाकाण्ड २८-ऋष्यमूकपर राम .... २८६ २९-सीताजीकी खोजका आदेश २६० सुन्दरकाण्ड ३०-अशोकवनमें हनूमान् .... २९१ ३१-हनुमान् और रावणकी भेंट .... ३०५ ३२-सीताजीसे विदाई .... ३०८ ३३-हनूमान्जीका भगवान् रामके पास पहुँचना .... ३१० ३४-वानरसेनाकी लंकायात्रा .... ३१७
[ ६ ] विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ | उत्तरकाण्ड ३५-रावणकी मन्त्रणा .... ३१६ | ४५-रामराज्य .... ३८१ ३६-विभीषण-शरणागति .... ३२३ | ४६-रामरूप-वर्णन .... ३८२ ३७-जानकी-त्रिजटा-संवाद .... ३४६ | ४७-रामहिंडोला ४१३ लंकाकाण्ड | ४८-अयोध्याका रमणीयता .... ४१५ ३८-मन्दोदरी-प्रबोध .... ३५२ | ४६-दीपमालिका .... ४२० ३६-अंगदका दूतकर्म .... ३५४ | ५०-वसन्त-विहार .... ४२१ ४०-लक्ष्मण-मूर्च्छा .... ३५८ | ५१-अयोध्याका आनन्द .... ४२७ ४१-विजयी राम .... ३७० | ५२-रामराज्य .... ४२८ ४२-अयोध्यामें प्रतीक्षा .... ३७१ | ५३-सीता वनवास .... ४२६ ४३-अयोध्यामें आनन्द .... ३७५ | ५४-लव-कुश-जन्म .... ४३८ ४४-राज्याभिषेक .... ३७७ | ५५-रामचरितका उल्लेख .... ४४२ SRI RAMAKRISHNA ASHRAMA LIBRARY, SRINAGAR. Accession No - 3737... Date ... 23-8-1985
श्रीहरिः वर्णानुक्रमणिका
| पद-सूचना | पृष्ठ-संख्या | पद-सूचना | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| अमिय-बिलोकनि करि कृपा.... | ४७ | आजु बन्यो है बिपिन | २२६ |
| अवध आजु आगमी एकु आयो | ५० | आजुको भोर, और सो, माई | २३३ |
| अनुकूल नृपहि सूलपानि हैं | १३० | आरते बचन कहति बंदेही | २७३ |
| अवध बिलोकि हौं जीवत | २३६ | आश्रम निरखि भूले | २७७ |
| अवसि हौं आयसु पाइ रहौंगो | २५६ | आये देखि दूत सुनि ... | ३१६ |
| अतिहि अधिक दरसनकी आरति | ३१४ | अपनी अपनी भांति .... | ३२१ |
| अति भोग बिभीषनके भले .... | ३४० | आइ सचिव बिभीषनके कही | ३२६ |
| अबहीं मैं तोसों न कहे री .... | ३४८ | आली, अब राम-लषन कितह्वैं हैं | ३७२ |
| अवधि आजुकिधौं ओरौदिनह्वै हैं | ३७१ | आजु अवध आनंद बधावन | ३७६ |
| अवध नगर अति सुंदर .... | ४२१ | आजु रघुबीर छबि | ३६१ |
| आंगन फिरत घुटुरुवनि धाये | ६४ | आजु रघुपति-मुख .... | ३६६ |
| आंगन खेलत आनंदकंद | ७१ | आली री ! राघोके .... | ४१३ |
| आजु सुदिन सुभ घरी सुहाई | १७ | आइ लषन लैं सौंपी सिय .... | ४३२ |
| आजु महामंगल कोसलपुर .... | २५ | ऋषि संग हरषि चले दोउ भाई | ६५ |
| आजु अनरसेहैं भोरके, पय .... | ४५ | ऋषिराज ! राजा आजु | १४२ |
| आजु सकल सुकृत फलु पाइहौं | ६२ | ऋषि-नृप सीस ठगोरी सी डारी | १६० |
| आये सुनि कौसिकजनकहरषाने हैं | १०५ | ऋतु-पति आए भलो .... | २३० |
| आली ! काहू तो बूझो न .... | २११ | ए कौन कहांते आए ? .... | ११० |
| आली री ! पथिक जे एहि .. | २१३ | एई राम-लषन जे मुनि-सँग | १२५ |
| आली! हौं इन्हहि बुझावौं कैसे | २६३ | ऐसे तैं क्यों कटु बचन .... | २४१ |
| आइ रहे जबतें दोउ भाई .... | २२२ | कनक-रतनमय पालनो रच्यो | ५५ |
[ ११ ] पद-सूचना | पृष्ठ-संख्या | पद-सूचना | पृष्ठ-संख्या कहौ तुम्ह बिनु गृह .... १८० | कृपानिधान सुजान प्रानपति १७६ कहौ सो विपिन हैं .... १८४ | खेलन चलिये आनंदकंद .... ८३ करतराउ मनुमो अनुमान .... २४० | खेलि खेल सुखेलनिहारे .... ८६ कहै सुक सुनहि सिखावन सारो २४७ | खेलत बसंत राजाधिराज .... ४२५ कर-सर-धनु कटि रुचिर निषंग २७० | गये राम सग्न सेबको भलो ३४० कहु कपि ! कब रघुनाथ .... ३०२ | गावें विबुध विमलबर बानी २७ कवहूँ, कपि राघव आवर्हिगे ? ३०३ | गीने मौनही बारहिबार .... ४३५ कपिके चलत सियको .... ३०६ | घर-घर अवध बधावने .... ३० कपिके सुनि कल कोमल बैन ३१६ | चहत महामुनि जाग जयो ६१ करुनाकरकी करुना भई ३३५ | चले लेन लषन हनुमान हैं ... ३३३ कहो, क्यों न बिभीषतकी बनै? ३३६ | चरचा चरनिसों चरची .... ४३१ कब देखौंगी नयन .... ३४६ | चारय्यो भले बेटा .. १०३ कहु, कबहुं देखिहौं .... ३४७ | चित्रकूट अति बिचित्र .... २१७ काहेको खोरि कैकयिहि लावौं? २४३ | चुपिरि उबटि अन्हवाइकै ... ४२ काहेको मानत हानि हिये हौ ? २५५ | छंगन-मंगन-अंगना खेलत ६६ काहूसों काहू समाचार ऐसे पाए २६५ | छेमकरी ! बलि, बोलि सुबानी ३७४ कुंवर सांवरो री सजनी ! १८८ | छोटी-छोटी गोड़ियां, अंगुरियाँ ७४ कैसे पितु मातु .. १६७ | छोटिएँ धनुहियां, पनहियां .... ८७ कैकयी करी धौं चतुराई कौन? २६१ | जनकबिलोकिबारबार रघुवरको १२७ कैकेयी जौलौं जियति रही .... ४४१ | जब तें राम-लषन चितए, री १२८ कोसलरायके कुंअंरोटा .... १०७ | जबहि सब नृपति निरास भए १४७ कोसलपुरी सुहावनी .... ४१५ | जब दोउ दशरथ कुंवर बिलोके १४६ कीसिकके मखके रखवारे .... १०४ | जनक मुदित मन टूटत .... १५३ कैसिक कृपालहूको .... १११ | जयमाल जानकी जलजकर .... १५५ कौतुक ही कपि .... ३६४ | जब तें लै मुनि संग सिधाए ... १६१
१. बालकाण्ड: श्रीरामावतार, बाल-लीला एवं धनुर्भंग पद
[ १२ ] पद-सूचना पृष्ठ-संख्या पद-सूचना पृष्ठ-संख्या जबहि रघुपति सँग सीय चली १८२ तुम्हरे बिरह भई गति जोन.... ३१५ जबतें सिधारे यहि मारग .... २१५ तू देखि देखि री ! पथिक १८७ जननी निरखति बान .... २३३ तू दस कंठ भले कुल जायो .. ३५४ जब-जब भवन बिलोकति सूनो २३५ तें मेरो मरम कछू .... ३५५ जबतें चित्रकूट तें आए .... २५८ तौलौं, मातु ! आपु ३०८ जबहि सिय सुधि सब .... २७८ तौलौं बलि, आपुही .... ४३३ जब रघुबीर पयानो कीन्हों .... ३१७ दीन हित बिरद ३४३ जबतें जानकी रही .... ४३७ दूलह राम, सीय दुलही री ! १६७ जागिये कृपानिधान .... ८० दूर रो न देखतु .... ३२२ जानकी बर सुंदर, माई .... १६६ देखि मुनि ! रावरे पद आज ६२ जानत हौं सबहीके मनकी .... २५१ देखि देखि री! दोउ राजसुवन १३३ जानी है संकर-हनुमान .... २६० देखु, कोक परमसुंदर .. १६६ जाय माय पाँय परि .... ३२३ देखि ! द्वै पथिक गोरे साँवरे १६८ जेहि जेहि मग सिय-राम-लषन २०५ देखु री सखी ! पथिक . २०२ जैसे राम ललित .... ८५ देखत चित्रकूट-बन २२४ जैसे ललित लषन लाल लोने १६८ देखे राम-पथिक नाचत २६७ जो पै हौं मातु मते महं हौं २४३ देखी जानकी जब जाइ .... २६२ जो हौं प्रभु-आयसु लै चलतो ३०७ देखु सखि ! आजु .. ३८८ जो हौं अब अनुसासन पावौं २६१ देखो, राघव-बदन .... ३६८ झूलत राम पालने सोहैं .. ६० देखो रघुपति-छवि ४०८ ठाढ़े हैं लषन कमलकर जोरे १८२ देखत अवधको आनन्द .. ४२७ ताते हौं देत न दूषन तोहू .... २४२ दोउ राजसुवन राजत ६६ ता दिन सृंगबेरपुर आए .... २४८ नाहिन भजिबे जोग बियो ... ३४५ तात ! बिचारोधों, हौं क्योंआवौं २५२ नीके कै मैं न विलोकन पाये २०६ तात तोहूसों कहत .... २६६ नीके कै जानत राम हियो हौं २८१
[ १३ ] पद-सूचना पृष्ठ-संख्या नृप कर जोरि कह्यो गुर पाहीं १७४ नूपति-कुँवर राजत मग जात १८६ नेकु बिलोकि धौं रघुबरनि ... ६७ नेकु, सुमुखि ! चित लाइ चितौ, री .... १२८ पगनि कब चलिहौ चारौ भैया? ४१ परत पद-पंकज .... १०३ पथिक गौरे-सांवरे सुठि .... १६५ पथिक पयादे जात .... १६६ पदपदुम गरीबनवाजके .... ३२८ पालने रघुपति झुलावै .... ५६ पालत राज यों राजा .... ४२८ पुनि न फिरे सोउ बीर बटाऊ २१० पुत्रि ! न सोचिये ... ४३६ पूजि पारबती भले भाय १२१ पौढ़िये लालम,पालनेहौं झुलावौं ५१ प्रभु सों मैं ढीठो .... २५७ प्रभु कपि-नायक बोलि .... २६० [L
[ १४ ]
| पद-सूचना | पृष्ठ-संख्या | पद-सूचना | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| भोर भयो जागेहु रघुनंदन ! | ७७ | मेरो सुनियो, तात ! | .... २८२ |
| भोर फूल बीनबेको | १२० | मेरो सब पुरुपारथ थाको | .˙. ३६० |
| भोर जानकीजीवन जागे | .... ३८२ | मैं तुम्हसों सतिभाव | |
| मंजुल मंगलमय नृप ढोटा | .... १०० | कही है | .... १८१ |
| मंजु मूरति-मंगलमई | .... ३३६ | मोको बिधुबदन | .... १८३ |
| मनमें मंजु मनोरथ हो, री ! | १६५ | मोहि भावति, कहि आवति | .... २६० |
| मनोहरताके मानो ऐन | .... १६५ | मोपै तौ न कछू ह्वै आई | .... ३५६ |
| महाराज राम पहं जाऊँगी | .... ३२६ | या सिसुके गुन नाम बड़ाई | .... ४८ |
| माथे हाथ ऋषि जब दियो | .... ४६ | ये अवधेसके सुत दोऊ | .... १०८ |
| मातु सकल, कुलगुर बधू | .... ४८ | ये दोऊ दसरथके वारे | .... ११४ |
| माई ! मनके मोहन | , १६२ | ये उपही कोउ कुँवर | |
| माई री ! मोहि कोउ | .. २३४ | अहेरी | .... २१६ |
| मातु काहेको कहति | ३०१ | रंग-भूमि भोरे ही जाइकै | .... ११८ |
| मानु अजहू सिख | .... ३५२ | रंगभूमि आये दसरथके | . १२३ |
| मिलो बरु सुंदर | १३२ | रघुबर बाल-छबि कहौं | .... ६५ |
| मुनिके संग बिराजत बीर | ... ६७ | रहे ठगिसे नृपति | .... ६४ |
| मुनि पदरेनु रघुनाथ माथे | , १५० | रहि चलिये सुंदर | |
| मुदित-मन आरती करै माता | १७३ | रघुनायक | .... १७६ |
| मुएहु न मिटैगो मेरो | २३८ | रहहु भवन हमरे कहे | .... १७८ |
| मुनिबर करि छठीं कीन्ही | ... ४४० | रघुपति! मोहि संग किन लीजैं? | २५३ |
| मेरे बालक कैसे धौं मग | .... १५६ | रघुबर दूरि जाइ मृग मारयौ | २७३ |
| मेरे यह अभिलाषु | रजायसु रामको जब पायो | .... २८१ | |
| बिधाता | .... २३६ | रघुपति ! देखो आयो | |
| मेरो अवध धौं कहहु, कहा हैं | २४४ | हनुमंत | ३१० |
| मेरे एको हाथ न लागी | .... २७६ | रघुकुलतिलक ! बियोग | |
| मेरे जान तात ! कछू | .... २८१ | तिहारे | .... ३१३ |
[ १५ ] पद-सूचना पृष्ठ-संख्या | पद-सूचना पृष्ठ-संख्या रन जीति रामराउ आए ३७७ | राम राजराजमौलि .... ३६३ रघुपति राजीवनयन .... ३८३ | रामचंद्र-करकंज कामतरु .... ४०४ रघुवर-रूप बिलोकु नेकु | राम-चरन अभिराम मन ... ४०६ | कामप्रद .... ४०५ रघुनाथ तुम्हारे चरित .... ४४२ | राम विचारि कै राखी .... ४३० राम-सिसु गोद महामोद .... ४३ | रीति चलिबेकी चाहि .... २०४ राजत सिसुरूप राम .... ६१ | ललन लोने लेरुआ बलि मैया ५३ राम लषन इक ओर .... ८८ | ललित सुतहि लालति सचु पाये ८२ राजन् ! राम-लषन जो दीजै ६३ | ललित ललित लघु-लघु .... ८६ रामपद-पदुम-पराग परी .... १०२ | लाज तोरि, साजि साज .... १५३ राम-लषन जब दृष्टि परे री ! १२७ | लेहु री लोचननिको लाहु .... १५७ रामहि नीके कै निरख
[ १६ ] पद-सूचना पृष्ठ-संख्या पद-सूचना पृष्ठ-संख्या सखि ! रघुवीर मुखछबि सुनु खल ! मैं तोहि बहुत .... ५५७ देखु .... ३९७ सुनि हनुमंत बचन रघुबीर ... ३६२ साँचेहु बिभीषन आइहै ! .... ३३२ सुनि रन घायल .... ३६७ साँझ समय रघुबीर पुरी की.... ४२० सुनियत सागरसेतु बंधायो .... ३७५ सादर सुमुखि बिलोकि .... ७५ सुमिरत श्रीरघुबीरकी बाँहैं.... ४०२ सानुज भरत भवन उठि धाए १६२ सुनि ब्याकुल भए .... ४३४ सिरिस-सुमन सुकुमारि .... २०७ सुभ दिन सुभ घरी .... ४३८ सिय ! धीरज धरिये .... ३५० सोइये लाल लाड़िले सीय ! स्वयंबरु, माई ... १२६ रघुराई .... ५२ सुभग सेज सोभित कौसिल्या ३६ सोहत सहज सुहाये नैन .... ७७ सुखनींद कहति आलि आइहौं ५४ सोहत मग मुनि संग .... ६८ सुनु सखि भूपति .... १२६ सोचत जनक पोंच पेच .... १३९ सुजन सराहँ जो .... १४१ सोहैं साँवरे पथिक .... १६४ सुनो भैया भूप सकल .... १४४ सो दिन सोनेको .... ३३६ सुनहु राम मेरे प्रानपियारे ... १७५ हाथ मीजिबो हाथ रह्यो .... २५२ सुन्यो जब फिरि सुमंत .... २३७ हिय बिहसि कहत .... ३३१ सुकसों गहबर हिये .... २४६ हृदय घाउ मेरे .... ३६९ सुनी मैं, सखि मंगल .... २६६ हेमको हरिन हनि .... २७५ सुभग सरासन सायक जोरें .... २६८ ह्वै हौ लाल कबँहि बड़े .... ४० सुमन समीरको धीर धुरीन.... २९६ हो तो नहि जी जग .... ३६६ सुनहु राम विश्रामधाम .... ३३२ हौं तो समुझि रही .... २६३ सुजन सुनि श्रवन .... ३४१ हौं रघुबंसमनि को दूत .... २६८ ──★──
इस पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ (टेक्स्ट) मौजूद नहीं है। यह पृष्ठ रिक्त (ब्लैंक) है अथवा केवल स्कैनिंग के धब्बे/चिह्न ही दिखाई दे रहे हैं।
श्रीश्रीसीताराम
ॐ श्रीसीतारामभ्यां नमः गीतावली बालकाण्ड बधाई राग आसावरी [ १ ] आजु सुदिन सुभ घरी सुहाई। रूप-सील-गुन-धाम राम नृप-भवन प्रगट भए आई॥ १ ॥ श्रति पुनीत मधुमास, लगन-ग्रह-बार-जोग-समुदाई। हरषवन्त चर-अचर, भूमिसुर-तनरुह पुलक जनाई॥ २ ॥ बरषहिं बिबुध-निकर कुसुमावलि, नभ दुन्दुभी बजाई। कौसल्यादि मातु मन हरषित, यह सुख बरनि न जाई॥ ३ ॥ सुनि दसरथ सुत-जनम लिए सब गुरुजन बिप्र बोलाई। बेद-बिहित करि क्रिया परम सुचि, आनँद उर न समाई॥ ४ ॥ सदन बेद-धुनि करत मधुर मुनि, बहु बिधि बाज बधाई। पुरबासिन्ह प्रिय-नाथ-हेतु निज निज सम्पदा लुटाई॥ ५ ॥ मनि तोरन, बहु केतुपताकनि, पुरी रुचिर करि छाई। मागध-सूत द्वार बन्दीजन जहँ तहँ करत बड़ाई॥ ६ ॥ सहज सिङ्गार किए बनिता चली मङ्गल बिपुल बनाई। गावहिं देहिं असीस मुदित, चिर जिवौ तनय सुखदाई॥ ७ ॥ बीथिन्ह कुंकुम-कीच, अरगजा अगर अबीर उड़ाई। नाचहिं पुर-नर-नारि प्रेम भरि देहदसा बिसराई॥ ८ ॥ गी० २—
गीतावली १८ अमित धेनु-गज-तुरग-बसन-मनि, जातरूप अधिकाई । देत भूप अनुरूप जाहि जोइ, सकल सिद्धि गृह आई ॥ ९ ॥ सुखी भए सुर-सन्त-भूमिसुर, खलगन-मन मलिनाई । सबै सुमन बिकसत रबि निकसत, कुमुद-बिपिन बिलखाई ॥ १० ॥ जो सुखसिन्धु-सकृत-सीकर तें सिव-बिरञ्चि-प्रभुताई । सोइ सुख अवध उमँगि रह्यो दस दिसि, कौन जतन कहौँ गाई ॥ ११ ॥ जे रघुवीर-चरन-चिन्तक, तिन्हकी गति प्रगट दिखाई । अबिरल अमल अनूप भगति दृढ़ तुलसिदास तब पाई ॥ १२ ॥ आज बड़ा मङ्गलमय दिन है, आजकी शुभ घड़ी बड़ी सुहावनी है। आज सौन्दर्य, शील और गुणके आगार भगवान् राम महाराज दशरथके भवनमें प्रकट हुए हैं ॥ १ ॥ अति पवित्र चैत्रमास है तथा लग्न; ग्रह, वार और योग, इन सबका समुदाय भी परम पावन है। चराचर प्राणी बड़े हर्षयुक्त हैं तथा ब्राह्मणोंके शरीरोंमें रोमाञ्च हो रहा है ॥ २ ॥ देववृन्द आकाशमें दुन्दुभी बजाते हुए पुष्पोंकी वर्षा कर रहे हैं तथा कौसल्या आदि माताओंका मन बड़ा ही हर्षित हो रहा है। हमसे इस सुखका वर्णन नहीं हो पाता ॥ ३ ॥ दशरथ- जीने पुत्रका जन्म होना सुनकर समस्त गुरुजन और विप्रवृन्दको बुला लिया है और बड़ी पवित्रतासे सम्पूर्ण वेद विहित क्रियाएँ की हैं। इस समय उनके हृदयमें आनन्द अँटता नहीं है ॥ ४ ॥ महलमें मुनि सुमधुर वेदध्वनि कर रहे हैं तथा तरह-तरहकी बधाइयाँ बज रही हैं। पुरवासियोंने भी अपने परम प्रिय नाथके लिये अपनी-अपनी सम्पत्ति लुटा दी है ॥ ५ ॥ मणियोंका तोरण और बहुत-सी ध्वजा- पताकाओंसे पुरीको बड़ी सुन्दरतासे छा दिया है। द्वारपर जहाँ-तहाँ मागध, सूत और बन्दीजन बड़ाई कर रहे हैं ॥ ६ ॥ पुरनारियाँ अपना
१९ बालकाण्ड स्वाभाविक शृङ्गार किये तरह-तरहकी मङ्गलसामग्री लिए चली आ रही हैं। वे गाती हैं और प्रसन्न चित्तसे आशीर्वाद देती हैं कि यह सुखदायक बालक चिरजीवी हों ॥ ७॥ गलियोंमें केसरकी कीच मच रही है तथा अरगजा, अगर और अबीर उड़ रहा है। पुरके नर- नारी प्रेममें भरकर नाच रहे हैं और उन्होंने अपने शरीरकी सुधभी भुला दी है ॥ ८ ॥ महाराज दशरथ अगणित वस्त्र, हाथी, घोड़े, गौ, मणि और सुवर्ण आदि अधिक परिमाणमें दे रहे हैं। जिसके लिए जो चीज उचित है, उसे वही दान कर रहे हैं। इस समय सारी सिद्धियाँ उनके घर-आ गयी हैं ॥ ९ ॥ इस समय देवता, साधुजन और ब्राह्मण तो प्रसन्न हो रहे हैं, किन्तु दुष्टोंका मन मलिन है; जिस प्रकार सूर्योदय होनेपर सभी पुष्प खिल जाते हैं किन्तु कुमुदवन मुरझा जाता है ॥१०॥ जिस आनन्द-समुद्रकी एक बूंदसे ही शिवजी और ब्रह्माजीका जगत्में प्रभुत्व है, वही सुखसागर इस समय अवधपुरीमें दसों दिशाओंमें उमड़ रहा है। उसका वर्णन मैं किस प्रकार गाकर करूँ ? ॥ ११ ॥ जो श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका चिन्तन करनेवाले हैं यहाँ उनकी गति स्पष्ट दिखायी पड़ रही है। हे प्रभो! तुलसीदासने भी आपकी अविरल, अमल और अनुपम सुदृढ़ भक्ति प्राप्त की है ॥ १२ ॥ राग जैतश्री [ २ ] सहेली सुनु सोहिलो रे ! सोहिलो, सोहिलो, सोहिलो, सोहिलो सब जग आज । पूत सपूत कोसिला जायो, अचल भयो कुल-राज ॥ १ ॥